विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/विष

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विषंग (१)
वि० [सं० विषङ्ग] १. लगा हुआ। २. जो लटकता हो [को०]।

विषंग पु (२)
वि० [सं० विषाङ्ग] विषयुक्त। विषवर। उ०—काहर कंधन कितक कितक स्वानन मुष टुट्टन। बिंछी सर्प विषंग मंत्रवादी मिल लुट्टत।—पृ० रा०, ६।१०५।

विषंगी
वि० [सं० विषङ्गी] साथ लगनेवाला। संलग्न रहनेवाला। [को०]।

विषंड
संज्ञा पुं० [सं० विषण्ड] कमल की नाल। मृग्गाल।

विष
संज्ञा पुं० [सं०] वह पदार्थ जो किसी प्राणी के शरीर में किसी प्रकार पहुँचने पर उसके प्राण ले लेता हो अथवा उसका स्वास्थ्य नष्ट करता हो। गरल। जहर। विशेष—वैद्यक में स्थावर और जंगम ये दो प्रकार के विष माने गए हैं। स्थावर विष वृक्षों, पौधों और खानों आदि में से निकला हुआ माना जाता है; औ जंगम विष वह कहलाता है जो अनेक प्रकार के जीवों के शरीर, नख, दाँत या डंग आदि में होता हैं। कुछ विष कृत्रिम भी होते हैं और रासायनिक क्रियाओं से बनाए जाते हैं। चिकित्सा में अनेक विषों का प्रयोग, बहुत थोड़ी मात्रा में, अनेक रोगों को दूर करने और दुर्बल रोगो के शरीर में बल लाने के लिये किया जाता है। मुहा०—के लिये दे० 'जहर'। २वह जो किसी की सुख शांति आदि में बाधक हो। मुहा०—विष की गाँठ = वह जो अनेक प्रकार के उपद्रव और अपकार आदि करता हो। खराबी पैदा करनेवाला। जैसे—यही तो विष की गाँठ हैं, सब का झगड़ा इन्हीं का खड़ा किया हुआ है। ३. जल। ४. पद्यकेशर। ५. कमल की नाल। ६. बोल नामक गंध- द्रव्य। ७. बछनाग। वत्सनाभ (को०)। ८. अतीस। ९. कलिहारी। १०. जहरीला तीर। बिषाक्त वाण (को०)। ११. तंत्र में 'म' का बोधक शब्द। 'म' की ध्वनि (को०)। १२. अनुचर (को०)।

विषई पु
वि० [सं० विषयिन्] दे० 'विषयी'। उ०—विषई विषै सब विष की खानी। ए सब कहिये जम सहदानी।—कबीर सा०, पृ० ८०६।

विषकंट
संज्ञा पुं० [सं० विषकण्ट] इंगुदी।

विषकंटक
संज्ञा पुं० [सं० विषकण्टक] दुरालभा।

विषकंटका
संज्ञा स्त्री० [सं० विषकण्टका] वंध्या कर्कोटी। बाँझ ककोटी।

विषकंटकी
संज्ञा स्त्री० [सं० विषकण्टकी] बाँझ ककोटी।

विषकंठ
संज्ञा पुं० [सं० विषकण्ठ] शिव। महादेव।

विषकंठिका
संज्ञा स्त्री० [सं० विषकण्ठिका] बगला।

विषकंद
संज्ञा पुं० [सं० विषकन्द] १. भैंसा कंद। नील कंद। २. हिंगोट। इंगुदी।

विषकन्यका
संज्ञा स्त्री० [सं०]दे० 'विषकन्या' [को०]।

विषकन्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह कन्या या स्त्री जिसके शरीर में इस आशय से कुछ विष प्रविष्ट कर दिए गए हों कि जो उसके साथ संभोग करे, वह मर जाय। विशेष—प्राचीन काल में राजाओं के यहाँ बाल्यावस्था से ही कुछ कन्याओं के शरीर में अनेक प्रकार से विष प्रविष्ट करा दिए जाते थे। जिनके कारण उनके शरीर में ऐसा प्रभाव आ जाता था कि जो उनके साथ विषय करता था, वह मर जाता था। जब राजा को अपने किसी शत्रु को गुप्त रूप से मारना अभीष्ट होता था, तब वह इस प्रकार की विषकन्या उसके पास भेज देता था, जिसके साथ संभोग करके वह शत्रु मर जाता था।

विषकुंभ
संज्ञा पुं० [सं० विषकुम्भ] जहर का घड़ा। कुंभ जो विष से भरा हो [को०]।

विषकृत
वि० [सं०] विषैला। विषयुक्त [को०]।

विषकृमि
संज्ञा पुं० [सं०] विष से उत्पन्न कीड़ा [को०]।

विषकृमि न्याय
संज्ञा पुं० [सं०] एक न्याय विशेष, जिसके द्वारा यह प्रकट किया जाता है कि दूसरों के लिये प्राणहारक वस्तु अपने में से उत्पन्न जीव के लिये घातक नहीं होती [को०]।

विषक्त
वि० [सं०] १. दृढतापूर्वक जमा हुआ। जड़ा हुआ। २. संलग्न। चिपका या चिपटा हुआ। ३. लटका हुआ। अवलंबित। ४. उत्पादित। ५. अधिकृत। ६. फैला हुआ। विस्तृत। प्रस- रित [को०]।

विषगंधक
संज्ञा पुं० [सं० विषगन्धक] एक प्रकार का तृण जिसमें भीनी गंध होती है।

विषगंधा
संज्ञा स्त्री० [सं० विषगन्धा] काली अपराजिता।

विषगिरि
संज्ञा पुं० [सं०] वह पर्वत जिसपर उत्पन्न होनेवाले वृक्ष और पौधे आदि जहरीले होते हों।

विषग्रंथि
संज्ञा स्त्री० [सं० विषग्रन्थि] एक जहरीला क्षुप [को०]।

विषघ
वि० [सं०] विष का नाश करनेवाला।

विषघटिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक सौर मास का नाम [को०]।

विषघा
संज्ञा पुं० [सं०] गुड़ुच।

विषघात
संज्ञा पुं० [सं०] विष का घातन करनेवाला। जहर का असर दूर करनेवाला। विषवैद्य [को०]।

विषघातक
संज्ञा पुं० [सं०] वह जिससे विष का प्रभाव दूर होता हो।

विषघाती
संज्ञा पुं० [सं० विषघातिन्] १. वह जिससे विष का प्रभाव नष्ट होता हो। २. सिरिस का पेड़।

विषघ्न (१)
वि० [सं०] विष का प्रभाव दूर करनेवाला। विषनाशक।

विषघ्न (२)
संज्ञा पुं० १. सिरिस का वृक्ष। २. भिलावाँ। ३. चंपा का वृक्ष। भूकदंब। ५. गंध तुलसी। ६. जवासा। घमासा (को०)।

विषघ्ना
संज्ञा स्त्री० [सं०] अतिविषा। अतीस।

विषघ्निका
संज्ञा स्त्री० [सं०] सफेद अपामार्ग या चिचड़ा।

विषघ्नी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. हिलमोचिका या हिलंच नामक साग। २. बनतुलसी। बबुई तुलसी। ३. इंद्रवारुणी। ४. भुइँ आँवला। ५. लाल पुनर्नवा। गदहपूरना। ६. हलदी। ७. महाकरंज। ८. वृश्चिकाली नाम की लता। ९. देवदाली या पीतघोषा नाम की लता। १०. कठकेला। ११. सफेद अपामार्ग। १२. रास्ना।

विषचक्र
संज्ञा पुं० [सं०] चकोर पक्षी।

विषज
वि० [सं०] विष से उत्पन्न। विष से होनेवाला [को०]।

विषजल
संज्ञा पुं० [सं०] विषयुक्त जल [को०]।

विषजित्
संज्ञा पुं० [सं०] एक तरह का शहद [को०]।

विषजिह्व
संज्ञा पुं० [सं०] देवताड़ नामक वृक्ष।

विषजुष्ट
वि० [सं०] १. विषाक्त। जहरीला। २. विष से प्रभावित। विषयुक्त [को०]।

विषज्वर
संज्ञा पुं० [सं०] १. वैद्यक के अनुसार वह ज्वर जो विष के कारण उत्पन्न हुआ हो। विशेष—ऐसे ज्वर में दाह होती है, दस्त आते हैं, भोजन की ओर रुचि नहीं होती, प्यास बहुत लगती है और रोगी मूर्छित हो जाता है। २. बैँसा। महिष।

विषझाल पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० विष + झाल] विष की ज्वाला। विषय- रूपी विष की आग। उ०—पंच चोर चितवत रहीं, मया मोह विषझाल। चेतन पहरै आपणौ, कर गहि खड़ग सँभाल।— दादू० पृ० ३८०।

विषणि
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का साँप।

विषण्ण
वि० [सं०] १. जिसका चित दुःखी हो। जिसे विषाद, शोक या रंज हो। २. दुःखपूर्ण। वेदनायुक्त। खिन्न। उ०— विफलता में भी एक निराला ही विषण्ण सौंदर्य होता है।— रस०, पृ० ६०। यौ०—विषण्णचेता = खिन्न। उदास। विषण्ण मना = उदास। विष्णमुख, विषण्णवदन = जिसके मुख पर उदासी छाई हो। विषण्णरूप = उदासी की दशा या अवस्था।

विषण्णता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विषण्ण या दुःखी होने का भाव। २. मूर्खता। बेवकूफी। जड़ता।

विषण्णांग
संज्ञा पुं० [सं० विषण्णाङ्ग] शिव।

विषतंत्र
संज्ञा पुं० [सं० विषतन्त्र] वैद्यक के अनुसार वह प्रकिया जिसके द्वारा साँप आदि का विष दूर किया जाता है।

विषतरु
संज्ञा पुं० [सं०] १. कुचला। २. जहरीला वृक्ष। विष- वृक्ष।

विषता
संज्ञा स्त्री० [सं०] विष का भाव या धर्म। जहरीलापन।

विषतिंदु
संज्ञा पुं० [सं० विषतिन्दु] १. कुच लता। २. कुपीलु।

विषतिंदुक
संज्ञा पुं० [सं० विषतिन्दुक] एक प्रकार का जहरीला पौधा [को०]।

विषतुल्य
वि० [सं०] प्राणहारक [को०]।

विषतैल
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्यक में एक प्रकार का तेल जो कड़ुए तेल में गोमूत्र, हलदी, दारु हल्दी, बच, लालचंदन, मजीठ आदि डालकर बनाया जाता है और जिसका व्यवहार कुष्ठ आदि रोग दूर करने के लिये होता है।

विषदंड
संज्ञा पुं० [सं० विषदण्ड] १. कमल की नाल। उ०—केशव कोदंड विषदंड ऐसो खंड अब मेरे भुजदंडन की बड़ी है विडंबना।—केशव (शब्द०)। २. विष दूर करनेवाला ऐंद्र जालिक डंडा।

विषदंत
संज्ञा पुं० [सं० विषदन्त] १. बिल्ली। २. वह जिसकी दाँतों में जहर हो।

विषदंतक
संज्ञा पुं० [सं० विषदन्तक] साँप।

विषदंश
संज्ञा पुं० [सं०] बिल्ली।

विषदंष्ट्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. साँप का वह दाँत जिसमें जहर होता। है। २. सर्पकंकालिका नाम की लता। ३. नागदमनी।

विषद (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. हीरा कसोस। २. सफेद रंग। ३. अतिविषा। अतीस। ४. बादल।

विषद (२)
वि० निर्मल। स्वच्छ। साफ। उ०—विषद वासों के विभूषण, चरण के तल तू तरेगा।—अर्चना, पृ० ८९।

विषदमूला
संज्ञा स्त्री० [सं०] माकंदा नामक पौधा जिसके पत्तों का साग होता है।

विषदर्शनमृत्यु, विषदर्शनमृत्युक
संज्ञा पुं० [सं०] चकोर पक्षी [को०]।

विषदा
संज्ञा स्त्री० [सं०] अतिविषा। अतीस।

विषदाता
संज्ञा पुं० [सं० विषदातृ] वह जो किसी को मार डालने या बेहोश करने के अभिप्राय से जहर दे।

विषदायक
संज्ञा पुं० [सं०] जहर देनेवाला।

विषदायी
संज्ञा पुं० [सं० विषदायिन्]दे० 'विषदाता'।

विषदिग्ध
वि० [सं०] विष में बुझाया हुआ। जहरीला। विषाक्त [को०]।

विषदुष्ट
वि० [सं०] जो जहर मिलाकर खराब कर दिया गया हो।

विषदूषण (१)
वि० [सं०] विष दूर करनेवाला।

विषदूषण (२)
संज्ञा पुं० [सं०] भोज्य या पेय वस्तु में विष मिलाना [को०]।

विषद्रुम
संज्ञा पुं० [सं०] कुचला। कारस्कर।

विषद्विषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की गुरुच [को०]।

विषधर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० विषधरी] १. सर्प। साँप। २. जल- धर। बादल। यौ०—विषधरनिलय = पाताल। नागलोक।

विषधर (२)
वि० विषैला। जहरीला [को०]।

विषधरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] सर्पिणी। साँपिन।

विषधर्मा
संज्ञा स्त्री० [सं०] केवाँच [को०]।

विषधात्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] जरत्कारु ऋषि की स्त्री मनसा देवी का एक नाम।

विषध्वंसी
संज्ञा पुं० [सं० विषध्वंसिन्] नागरमोथा।

विषनाडी
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक मुहूर्त जिसमें जनन अशुभ कहा गया है [को०]।

विषनाशन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सिरिस का पेड़। २. मानकंद। ३. विष को दूर करना।

विषनाशन (२)
वि० जो विष को दूर करता हो। विषनाशक।

विषनाशिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सर्पकंकाली नाम की लता। २. बाँझ ककोटी। ३. गँधनाकुली।

विषनुत्
संज्ञा पुं० [सं०] सानापाठा। श्योनाक [को०]।

विषन्न पु
वि० [सं० विषण्ण] दे० 'विषण्ण'। उ०—रोते रोते कंठरोध जब है हो जाता। उस विषन्न नीरव क्षण में हो कहती गिरा तुम्हारी।—चिंता, पृ० १४८।

विषपत्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. किसी जहरीले बीज का छिलका। २. कोई जहरीला पत्ता।

विषपन्नग
संज्ञा पुं० [सं०] जहरीला साँप।

विषपर्णी
संज्ञा स्त्री० [सं०] न्यग्रोध। वट वृक्ष [को०]।

विषपादप
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'विषवृक्ष'।

विषपीत
वि० [सं०] जिसने जहर पी लिया हो। विष पीनेवाला [को०]।

विषपुच्छ
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० विषपुच्छी] बिच्छू जिसकी पूँछ में विष होती है।

विषपुट
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्राचीन ऋषि का नाम।

विषपुष्प
संज्ञा पुं० [सं०] १. नीला पद्य। २. अलसी का फूल। ३. मैनफल का पेड़। ४. विषयुक्त फूल (को०)।

विषपुष्पक
संज्ञा पुं० [सं०] १. मदन नामक वृक्ष। मैनफल। २. विषैले फूलों के खाने से होनेवाला रोग (को०)।

विषप्रदिग्ध
वि० [सं०]दे० 'विषदिग्ध' [को०]।

विषप्रयोग
संज्ञा पुं० [सं०] १. दवा में विष का उपयोग करना। २. जहर देना [को०]।

विषप्रशमनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] बाँझ ककोड़ी।

विषप्रस्थ
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत के अनुसार एक पर्वत का नाम।

विषभक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] जहर खाना।

विषभद्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] बड़ी दंती।

विषभद्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] लघु दंती।

विषभिषक्
संज्ञा पुं० [सं० विषभिषज्] साँप आदि के विष को मंत्र द्वारा दूर करनेवाला व्यक्ति। विषवैद्य [को०]।

विषभुजंग
संज्ञा पुं० [सं० विषभुजङ्ग] जहरीला साँप।

विषभृत् (१)
वि० [सं०] जहरीला। विषयुक्त।

विषभृत् (२)
संज्ञा पुं० सर्प। साँप [को०]।

विषमंजरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] विष संबंधी चिकित्सापरक एक आयुर्वेद कृति [को०]।

विषमंत्र
संज्ञा पुं० [सं० विषमंन्त्र] १. वह जो विष को उतारने का मंत्र जानता हो। २. सपेरा। ३. साँप के विष को उतारने का मंत्र (को०)।

विषम (१)
वि० [सं०] १. जो सम या समान न हो। जो बराबर न हो। असमान। २. (वह संख्या) जिसमें दो से भाग देने पर एक बचे। सम या जूस का उल्टा। ताक। ३. जिसकी मीमांसा सहज में ने हो सके। बहुत कठिन। जैसे,—विषम समस्या। ४. बहुत तीव्र। बहुत तेज। ५. भीषण। विकट। जैसे,— विषम विपत्ति। उ०—करेँ न मेरे पीछे स्वामी विषम कष्ट साहस के काम। यही दुःखिनी सीता का सुख सुखी रहें उसके प्रिय राम।—साकेत, पृ० २८९। ६. जो समतल न हो। खुरदरा। ऊबड़ खाबड़ (को०)। ७. अनियमित (को०)। ८. अगम। दुर्गम (को०)। ९. मोटा। स्थूल (को०)। १०. तिरछा। वक्र (को०)। ११. पीड़ाप्रद। कष्टदायक (को०)। १२. बहुन मजबूत। उत्कट (को०)। १३. बुरा। प्रतिकूल। विपरीत (को०)। १४. अजीब। विचित्र। अनुपम। (को०)। १५. बेईमान (को०)। १६. विरामशील। विरत (को०)। १७. दुष्ट (को०)। १८. भिन्न (को०)। १९. अनुपयुक्त। अननुकूल (को०)।

विषम (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. संकट। विपत्ति। आफत। २. वह वृत्त जिसके चारों चरणों में बराबर बराबर अक्षर न हों, बल्कि कम और ज्यादा अक्षर हों। ३. एक अर्थालंकार जिसमें दो विरोधी वस्तुओं का संबंध वर्णन किया जाता है या यथायोग्य का अभाव कह जाता है। उ०—(क) कहाँ मृदुल तल तीय को सिरस प्रसून महान। कहाँ मदन की लाय यह अँव सम दुसह समान। (ख) खड़गलता अति स्याम तें उपजी कीरति सेत। ४. संगीत में ताल का प्रकार। ५. पहली, तीसरी, पाँचवीं आदि विषम संख्याओं पर पड़नेवाली राशियाँ। ६. वैद्यक के अनुसार चार प्रकार की जठराग्नियों में से एक प्रकार की जठराग्नि जो वायु की अधिकता से उत्पन्न होती है। कहते हैं, जब जठराग्नि विषम होती है, तब कभी तो भोजन बहुत अच्छी तरह पच जाता है और कभी बिल्कुल नहीं पचता। ७. विष्णु का एक नाम। ८. असमता (को०) ९. अनोखापन (को०)। १०. दुर्गम स्थान। जैसे,—चट्टान, गड्ढा आदि (को०)। ११. कठिन या भयावह स्थिति। कठिनाई। दुर्भाग्य (को०)।

विषमक
वि० [सं०] १. असम। २. (मोती आदि) जिसकी पालिश सर्वत्र समान रूप से न हुई हो [को०]।

विषमकर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] १. चारों समकोणोंवाले चतुर्भुज में किन्हीं दो कोणों को मिलाती हुई त्रिकोण बनानेवाली रेखा। समकोण त्रिकोण का कर्णा। २. असमान कर्णवाला चतुर्भुज।

विषमकर्म
संज्ञा पुं० [सं०] असाधारण कार्य।

विषमकाल
संज्ञा पुं० [सं०] प्रतिकूल समय। भयंकर समय [को०]।

विषमकोण
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो सम न हो। समकोण से भिन्न और कोई कोण।

विषमखात
संज्ञा पुं० [सं०] असमान खात [को०]।

विषमचक्रवाल
संज्ञा पुं० [सं०] गणित में दीघर्वृत्त। अंडवृत्त। [को०]।

विषमचतुरस्र
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'विषम चतुष्कोण'।

विषमचतुर्भुज
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'विषम चतुष्कोण'।

विषमचतुष्कोण
संज्ञा पुं० [सं०] वह चौकोर क्षेत्र जिसके चारो कोण समान न हों। विषम कोणवाला चतुष्कोण।

विषमच्छद
संज्ञा पुं० [सं०] छतिवन का पेड़।

विषमच्छाया
संज्ञा स्त्री० [सं०] धूपघड़ी के शंकु की दोपहर की छाया [को०]।

विषमज्वर
संज्ञा पुं० [सं०] १. वैद्यक के अनुसार एक प्रकार का ज्वर जो होता तो नित्य है, पर जिसके आने का कोई समय नियत नहीं होता। उ०—जो ज्वर छोड़ दे और फिर आ जावे उसके विषमज्वर कहते हैं।—माधव०, पृ० २०। विशेष—इस ज्वर में तापमान भी समान नहीं रहता और नाड़ी की गति भी सदा एक सी नहीं रहती, बराबर बदलती रहती है। इसलिये इसे विषमज्वर कहते हैं। ज्वर का यह रूप किसी साधारण ज्वर के बिगड़ने अथवा पूरी तरह अच्चे न होने पर कुपथ्य करने के कारण होता है। वैद्यक में इसके अनेक भेद कहे गए हैं। जैसे—संतत, सतत, तृतीयक, चतुर्थक आदि। २. जाड़ा देकर आनेवाला ज्वर। जूड़ी बुखार। ३. क्षयी रोग में होनेवाला ज्वर।

विषमता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विषम होने का भाव। असमानता। २. वैर। विरोध। द्रोह। ३. अंतर। भेद। फर्क (को०)। ४. उलझन। जटिलता (को०)। ५. भीषणता। भयंकरता।

विषमत्रिभुज
संज्ञा पुं० [सं०] वह त्रिभुज जिसके तीनों भुज छोटे बड़े हों, समान न हों।

विषमत्व
संज्ञा पुं० [सं०] विषम होने का भाव। विषमता।

विषमदृष्टि
वि० [सं०] ऐंचाताना [को०]।

विषमधातु
वि० [सं०] जिसकी शरीरस्थ धातुएँ असंतुलित हों। रागी। अस्वस्थ [को०]।

विषमनयन
संज्ञा पुं० [सं०] महादेव। शिव।

विषमनेत्र
संज्ञा पुं० [सं०] शिव। महादेव।

विषमपत्र
संज्ञा पुं० [सं०] सप्तपर्ण वृक्ष [को०]।

विषमपद
वि० [सं०] १. जिसमें असमान पद या चरण हों। जैसे— छंद, कविता। २. असमान या अस्तव्यस्त पैर रखनेवाली।

विषमपलाश
संज्ञा पुं० [सं०] छतिवन का वृक्ष।

विषमबाण
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव [को०]।

विषमर्द्दनिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] गंधनाकुली।

विषमलक्ष्मी
संज्ञा स्त्री० [सं०] कुसमय। दुर्दिन। दुर्भाग्य [को०]।

विषमवल्कल
संज्ञा पुं० [सं०] नारंगी।

विषमवाणा
संज्ञा पुं० [सं० विषमबाण] कामदेव का एक नाम।

विषम विभाजन
संज्ञा पुं० [सं०] सपत्ति आदि का असमान विभाजन [को०]।

विषमविलोचन
संज्ञा पुं० [सं०] शिव। ञ्यंबक [को०]।

विषमविशिख
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव का एक नाम।

विषमवृत्त
संज्ञा पुं० [सं०] वह वृत्त या छंद जिसके चरण या पद समान न हों। असमान पदोंवाला वृत्त।

विषम व्यूह
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का सैनिक व्यूह। समव्यूह का उलटा व्यूह विशेष दे० 'समव्यूह'।

विषमशर
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव [को०]।

विषमशिष्ट
संज्ञा पुं० [सं०] प्रायश्चित आदि के लिये व्यस्था देने के संबंध का एक दोष। विशेष—यह दोष उस समय माना जाता है, जब कोई भारी पाप करने पर हल्का प्रायश्चित करने की या हलका पाप करने पर भारी प्रायश्चित करने की व्यवस्था दी जाती है।

विषमशील (१)
संज्ञा पुं० [सं०] विक्रमादित्य का एक नाम [को०]।

विषमशील (२)
वि० क्रोधी स्वभाववाला। असमान शीलवाला [को०]।

विषमसंधि
संज्ञा स्त्री० [सं० विषमसन्धि] वह संधि जिसमें शक्ति के अनुसार तत्काल सहायता न दी जाय। समसंधि का उलटा। 'तुम आगे से हमारे मित्र रहोगे' इस प्रकार की संधि।

विषमसाहस
संज्ञा पुं० [सं०] उद्धतपन। उद्दंडता [को०]।

विषमस्थ
वि० [सं०] संकट में फँसा हुआ [को०]।

विषमस्पृहा
संज्ञा पुं० [सं०] दूसरे का धन हड़पने का लालच [को०]।

विषमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. झरबेरी। २. एक प्रकार का बछनाग।

विषमाक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] शिव। महादेव।

विषमाग्नि
संज्ञा स्त्री० [सं०] वैद्यक में एक प्रकार की जठराग्नि। विशेष—कहते हैं, यह अग्नि कभी तो खाए हुए पदार्थों की अच्छी तरह पचा देती है और कभी बिल्कुल नहीं पचाती।

विषमाधुर
संज्ञा पुं० [सं०] शृंगी विष। सींगिया।

विषमान्न
संज्ञा पुं० [सं० विषम + अन्न] अनियमित आहार [को०]।

विषमायुध
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव।

विषमावतार
संज्ञा पुं० [सं० विषम + अवतार] १. असमतल भूमि पर उतरना। २. खतरा मोल लेना [को०]।

विषमावरण पु
संज्ञा पुं० [सं० विषमवर्ण] दग्धाक्षर। उ०— धुररूपक ज्याँही धरे, विषमावरण विशेष।—रघु० रू०, पृ० ११।

विषमाशन
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्यक के अनुसार ठीक समय पर भोजन न करके समय के पहले या पीछे अथवा थोड़ा या अधिक भोजन करना जिसके कारण शरीर में आलस्य या दुर्बलता होती है।

विषमित
वि० [सं०] जो विषम किया गया हो। विषम बनाया हुआ [को०]।

विषमुक्
संज्ञा पुं० [सं० विषमुच्] सर्प। साँप [को०]।

विषमुष्कक
संज्ञा पुं० [सं०] मैनफल।

विषमुष्टि
संज्ञा पुं० [सं०] १. जीवंती। २. बकायन। ३. मीठी नीम। घोड़ा नीम। ४. कलिहारी। ५. कुचला।

विषमुष्टिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] बकायन।

विषमूला
संज्ञा स्त्री० [सं०] शिरामलक। शिर आँवला।

विषमूला
संज्ञा स्त्री० [सं०] शिरामलक। शिर आँवला।

विषमृत्यु
संज्ञा पुं० [सं०] चकोर पक्षी।

विषमेक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] महादेव।

विषमेषु
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव।

विषय
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह बड़ा प्रदेश जिसपर कोई शासन व्यवस्था हो। विशेष—ग्राम से बड़ा राष्ट्र और राष्ट्र से बड़ा विषय माना जाता था। कितने बड़े भूभाग को विषय कह सकते थे, इसका कोई निर्दिष्ट मान नहीं था। २. वह पदार्थ जिसका ग्रहण ज्ञानेंद्रियों द्वारा होता हो। रूप, रस, गंध स्पर्श और शब्द जिनका संबंध क्रमशः आँख, जिह्वा, नाक, त्वचा और कान से है। इंद्रियार्थ (को०)। ३. भौतिक वस्तु (को०)। ४. कोरोबार। व्वव- साय (को०)। ५. इंद्रियसुख। वासनात्मक आनंद (को०)। ६. विभागक्षत्र। ७. पहुँच। परिधि। विस्तार (को०)। ८. लक्ष्य। उद्देश्य (को०)। ९. प्रसंग। प्रकरण (को०)। १०. वीर्य। शुक्र (को०)। ११. स्वामी (को०)। १२. धार्मिक कृत्य (को०)। १३. पाँच की संख्या (को०)। १४. उपमेय। वर्ण्य पदार्थ (को०)। १५. राज्य (को०)। १६. आश्रयस्थल, शरणस्थल (को०)। १७. ग्रामों का समूह (को०)। १८. प्रेमी पति (को०)। १९. शृंगार विषयक ग्रंथ (को०)। यौ०—विषयकर्म = भौतिक कृत्य। सांसारिक कार्य। विषय- काम = भौतिक पदार्थों या सुखों की कामना। विषयग्राम = ऐंद्रिक विषयों का समूह। विषयज्ञ। विषयज्ञान = सांसारिक सुखों का ज्ञान। वासनात्मक ज्ञान। विषयनिरत। विषय- निर्धारिणी समिति। विषयनिड्नुति। विषयपति। विषयरस। विषयसमिति। विषयस्पृहा।

विषयक
अव्य० [सं०] विषय का। संबंधी। जैसे,—इस पत्र में राज- नीति विषयक बातें अधिक रहती है।

विषयज्ञ
वि० [सं०] विषय का ज्ञाता। किसी विशिष्ट विषय का जानकार [को०]।

विषयता
संज्ञा स्त्री० [सं०] विषय का भाव या धर्म।

विषयनिरत
वि० [सं०] विषयासक्त। इंद्रियासक्त [को०]।

विषयनिरति
संज्ञा स्त्री० [सं०] भोग विलास के प्रति लगाव। सांसा- रिक उपभोग्य पदार्थों के प्रति आसक्ति। विषयासक्ति [को०]।

विषयनिर्द्धारिणी समिति
संज्ञा स्त्री० [सं० विषय + निर्द्धारिणी + समिति]दे० 'विषयनिर्वाचिनी समिति'।

विषयनिर्वाचिनी समिति
संज्ञा स्त्री० [सं० विषय + निर्वाचिनी + समिति] कुछ विशिष्ट सदस्यों को वह सभा जो किसी महासभा या संमेलन में उपस्थित किए जानेवाला विषय या प्रस्ताव आदि निश्चित या प्रस्तुत करती है। (अं० 'सबजेक्ट कमिटी')।

विषयनिह्नृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] किसी विषय के प्रति गोपनीयता का भाव [को०]।

विषयपति
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी जनपद या छोटे प्रांत का राजा या शासक। उ०—श्रेष्ठी नगरशासन तथा जिले के शासन में नगरपति (जिलाधीश) की सहायता किया करता था।—पू० म० भा०, पृ० १२७। २. राज्यपाल (को०)।

विषयपराङमुख
वि० [सं०] साँसारिक सुखों से विमुख। जो विषयों से विमुख हो। [को०]।

विषयप्रवण
वि० [सं०] भोगलिप्सु। विषयासक्त [को०]।

विषयप्रसंग
संज्ञा पुं० [सं० विषयप्रसङग] विषय में आसक्ति। भोगविलास में रति [को०]।

विषयरत
वि० [सं०] विषयासक्त [को०]।

विषयरस
संज्ञा पुं० [सं० विषय + रस] लौकिक भोग विलास का सुख। विषयानंद। उ०—हुआ इस जग में ऐसा कौन विषयरस किया न जिसने पान ?—मधुज्वाल, पृ० ८४।

विषयलोलुप
वि० [सं०] विषयेच्छु। भोगेच्छु [को०]।

विषयविरत
वि० [सं०] जो लौकिक विषयों से विरक्त हो। विषयों से पराङमुख।

विषयसंग
संज्ञा पुं० [सं० विषयसङग] विषयों में रति [को०]।

विषयसमिति
संज्ञा स्त्री० [सं०]दे० 'विषयनिर्वाचिना समिति'।

विषयसुख
संज्ञा पुं० [सं०] विषयानंद। इंद्रिय संबधी सुख [को०]।

विषयस्नेह
संज्ञा पुं० [सं०] विषयैषणा। इंद्रिय संबंधी पदार्थों की कामना [को०]।

विषयस्पृहा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'विषयस्नेह'।

विषयांत
संज्ञा पुं० [सं० विषयांत] विषय या प्रेदश की सीमा [को०]।

विषयांतर
संज्ञा पुं० [सं० विषयान्तर] १. प्रस्तुत वर्ण्य विषय को त्याग कर अन्य विषय का ग्रहण या प्रवर्तन। २. प्रस्तुत या वर्ण्य विषय की उपेक्षा [को०]।

विषया पु ‡
संज्ञा स्त्री० [सं० विषय] सांसारिक भोग्य पदार्थ। उ०— तनमन ताको दिजिए, जाके विषया नाहिं। आपा सबही डारि कै, राखै साहेब माहिं।—कबीर सा० सं०, पृ० २।

विषयाज्ञान
संज्ञा पुं० [सं० विषय + अज्ञान] १. विषय को न जानना। तंद्रा [को०]।

विषयात्मक
वि० [सं०] १. विषय, प्रकरण या प्रसंगवाला। २. ३. आलस्य। थकावट। इंद्रिय संबंधी।

विषयाधार
संज्ञा पुं० [सं० विषय + आधार] विषयों का आश्रय। उ०—आत्मा को विषयाधार बना, दिशि पल के दृश्यों को सँवार। गा, गा, एकोहं बहु स्याम, हर लिए भेद, भव भीति भार।—युगांत, पृ० ५९।

विषयाधिकृत
संज्ञा पुं० [सं०] किसी विषय या प्रांत का सर्वश्रेष्ठ अधिकारी [को०]।

विषयाधिप
संज्ञा पुं० [सं०] किसी छोटे प्रांत का राजा या शासक।

विषयाधिपति
संज्ञा पुं० [सं०] राजा। विषयाधिप [को०]।

विषयाभिरति
संज्ञा स्त्री० [सं०] विषयों या सांसारिक सुखों के प्रति अनुराग [को०]।

विषयानुक्रमणिका, विषयानुक्रमणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] ग्रँथादि की विषयसूची।

विषयायी
संज्ञा पुं० [सं० विषयायिन्] १. भौतिकवादी। नास्तिक। २. सांसारिक व्यक्ति। इंद्रिय़सुखों में लिप्त व्यक्ति। विलासी मनुष्य। ३. प्रेम का देवता। कामदेव। ४. राजा। ५. ज्ञानेंद्रिय।

विषयासक्त
वि० [सं० विषय + आसक्त] भोगरत। विलासा [को०]।

विषयासक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं० विषय + आसाक्त] सांसारिक विषयों के प्रति आसक्त होना। लोगों के प्रति लगाव या प्रेम [को०]।

विषयी (१)
संज्ञा पुं० [सं० विषयिन्] १. वह जो भोग विलास या विषय आदि में बहुत अधिक आसक्त हो। विलासी। कामी। २. राजा। ३. कामदेव। ४. जिसके पास बहुत अधिक विषय या धन संपत्ति हो। धनवान। अमीर। ५. विषय को जाननेवाला। विषयज्ञ। उ०—विषयी या ज्ञाता अपने चारों ओर उपस्थित वस्तुओं को कभी कभी अपने तत्कालीन भोवों के रंग मे देखता है।—चिंतामणि, भा० २, पृ० १८।१९। ६. भौतिकवादी। ७. ज्ञानेंद्रिय (को०)। ८. ज्ञान (को०)। ९. उपमेय। (अलकारशास्त्र)।

विषयी (२)
वि० कामुक। इंद्रियपरायण।

विषयीकरण
संज्ञा पुं० [सं०] किसी वस्तु को विचार का विषय बनाना [को०]।

विषयीय (१)
संज्ञा पुं० [सं०] विषय। सांसारिक पदार्थ।

विषयीय (२)
वि० विषम संबंधी [को०]।

विषयैषी
वि० [सं० विषयैषिन्] विषयलोलुप। भोगेच्छु [को०]।

विषयोपरम
संज्ञा पुं० [सं०] विषयों से उपरम या विरक्ति [को०]।

विषयोपसेवा
संज्ञा स्त्री० [सं०] विषयों के प्रति आसक्ति [को०]।

विषरूपा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अतिविषा। अतीस। २. मीठी नीम। घोड़ानीम। ३. खेकसा।

विषल
संज्ञा पुं० [सं०] विष। जहर।

विषलता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. इंद्रवारुणी नाम की लता। २. मृणाल। कमलनाल।

विषलांगल
संज्ञा पुं० [सं० विषलाङ्गल] कलिहारी।

विषवंचिका
संज्ञा स्त्री० [सं० विषवञ्चिका] बिच्छू नामक पौधा।

विषवल्लरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'विषवल्ली'।

विषवल्लि, विषवल्ली
संज्ञा स्त्री० [सं०] इंद्रवारुणी नाम की लता।

विषविटपी
संज्ञा पुं० [सं० विषषिटपिन्] जहरीला पेड़ [को०]।

विषविद्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] मंत्र आदि की सहायता से झाड़ फूँककर विष उतारने की विद्या।

विषवधान
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'विषविधि'।

विषविधि
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्राचीन व्यवहारशास्त्र के अनुसार एक प्रकार की परीक्षा या दिव्य जिससे यह जाना जाता था कि अमुक व्यक्ति अपराधी है या नहीं। विशेष दे० 'दिव्य'।

विषवृक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १. गूलर। २. विष का वृक्ष। विषमय फल देनेवाला वृक्ष। उ०—माँ, क्या कठोर और क्रुर हाथों से ही राज्य सुशासित होता है ? ऐसा विषवृक्ष लगाना क्या ठीक होगा।—अज्ञात, पृ० २५।

विषवृक्ष न्याय
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का न्याय जिसके अनुसार अपनी उत्पन्न की हुई हानिकारक वस्तु भी स्वयं नष्य नहीं करनी चाहिए [को०]।

विषवेग
संज्ञा पुं० [सं०] विष की व्याप्ति। विष की लहर। विष का प्रभाव [को०]।

विषवैद्य
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो मंत्र तंत्र आदि की सहायता से विष उतारता हो।

विषवैरिणी
संज्ञा स्त्री [सं०] निर्विषी नामक घास।

विष व्यवस्था
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. शरीर में विष भिदने की अवस्था। २. विष का प्रभाव [को०]।

विषव्रण
संज्ञा पुं० [सं०] जहरीला फोड़ा। जहरबाद [को०]।

विषशालूक
संज्ञा पुं० [सं०] कसलकद। भसींड़।

विषशूक
संज्ञा पुं० [सं०] भीमरोल नामक कीड़ा।

विषशृंगी
संज्ञा पुं० [सं० विषशृंङ्गन्] भीमरोल नामक कीड़ा।

विषसंयोग
संज्ञा पुं० [सं०] सिंदूर। सेंदुर।

विषसूचक
संज्ञा पुं० [सं०] चकोर नामक पक्षी।

विषसृक्क
संज्ञा पुं० [सं० विषसृक्कन्] विषशूक। भृंगरोल [को०]।

विषहंता (१)
संज्ञा पुं० [सं० विषहन्तृ] सिरिस का पेड़।

विषहंता (२)
वि० जिससे विष का प्रभाव दूर हो। विषनाशक।

विषहंत्री
संज्ञा स्त्री० [सं० विषहन्त्री] १. अपराजिता। २. निर्विषी।

विषह (१)
वि० [सं०] जो विष का नाश करता हो। विषघ्न।

विषह (२)
संज्ञा पुं० १. देवदाली। २. निर्विषी।

विषहर
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह औषध या मंत्र आदि जिससे विष का प्रभाव दूर होता हो। २. भटेउर। चोरक। धनहर।

विषहरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. देवदाली। बंदाल। २. निर्विषी। ३. मनसादेवी का एक नाम।

विषहरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] मनसा देवी का एक नाम।

विषहा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. देवदाली। बंदाल। २. निर्विषी।

विषहा (२)
संज्ञा पुं० [सं० विषदृन्] १. वह जो विषध्न हो या विष दूर करनेवाला हो। २. एक प्रकार का कदंब वृक्ष। भुँइकंदब। [को०]।

विषहारक
संज्ञा पुं० [सं०] भुइँक्दंब।

विषहारिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] निर्विषी नामक घास।

विषहीन
वि० [सं०] जिसमें विष न हो [को०]।

विषहृदय
वि० [सं०] कुटिल मनवाला। कपटी [को०]।

विषहेति
संज्ञा पुं० [सं०] सर्प [को०]।

विषहुय
वि० [सं० वि + सह्य (षह्य)] १. सहन करने योग्य। जो बर्दाश्त किया जा सके। २. जिसका निर्धारण या निश्चय किया जा सके। ३. संभव। शक्य। ४. पराभूत करने योग्य [को०]।

विषांकुर
संज्ञा पुं० [सं० विषाङकुर] १. तीर जिसकी नोक विष युक्त हो। २. भाला। कुंत (को०)।

विषांगना
संज्ञा स्त्री० [सं० विषाङ्गना] दे० 'विषकन्या'।

विषांतक
संज्ञा पुं० [सं० विषान्तक] १. वह जिससे विष का नाश हो। २. शिव का एक नाम।

विषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अतिविषा। अतीस। २. कलिहारी। ३. कड़वी कँदूरी। ४. कड़वी तरोई। ५. काकोली। ६. बुद्धि। अक्ल।

विषाक्त
वि० [सं०] जिसमें विष मिला हो। विषयुक्त। विषपूर्ण। जहरीला।

विषाख्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] अतीस।

विषाग्नि
संज्ञा स्त्री० [सं० विष + अग्नि] विष की ज्वाला या दाह विषप्रयोगजन्य शरीरदाह [को०]।

विषाग्रज
संज्ञा पुं० [सं०] कृपाण। तलवार [को०]।

विषाण
संज्ञा पुं० [सं०] १. कुट या कूट नामक ओषधि। २. हाथी दाँत। ३. पशु का सींग। ४. मेढ़ासिंगी। ५. वाराहीकंद। गेंठी। ६. ऋषभक नामक ओषधि। ७. सूअर का दाँत। ८. इमली। ९. फूँककर बजाया जानेवाला एक प्रकार का सींग का बाजा। शृंगी। उ०—क्वणित मंजुविषाण हुए कई। रणित शृंग हुए बहु साथ ही।—प्रिय०, पृ० २। १०. चोटी। सिरा (को०)। ११. कुवाग्र। चुचुक (को०)। १२. अपने वर्ग का प्रधान। १३. तलवार या चाकू (को०)। १४. केकड़े का पंजा (को०)। १५. सींग जैसी शिव के सिर पर बँधी हुई जटा (को०)।

विषाणक
संज्ञा पुं० [सं०] १. हाथी। २. सींग [को०]।

विषाणकोश
संज्ञा पुं० [सं०] सींग का खोखला भाग [को०]।

विषाणांत
संज्ञा पुं० [सं० विषणान्त] गणेश जी का दाँत।

विषाणिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मेढ़ासिंगी। २. सातला नाम का थूहर। ३. काकड़ासिंगी। ४. आवर्तकी या भगवतवल्ली नाम की लता। ५. सिंघाड़ा। ६. ऋषभक नामक ओषधि। ७. काकोली।

विषाणी (१)
संज्ञा पुं० [सं० विषाणिन्] १. वह जिसे सींग हो। सींगवाला। २. हाथी। ३. सूअर। ४. साँड़। सिंघाड़ा। ६. ऋषभक नामक ओषधि।

विषाणी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. क्षीर काकोली। २. ऋषभक नामक ओषधि। ३. मेढ़ासिंगी। ४. वृश्चिकाली। बिछाती। ५. इमली। ६. सिंघाड़ा। ७. विष। जहर। ८. भगवतवल्ली या आवर्त्तकी नाम की लता।

विषाद्
संज्ञा पुं० [सं०] हलाहल विष खानेवाले, शिव।

विषाद (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. खेद। दुःख। रंज। २. निराशा। हताशा। नैराश्य (को०)। ३. जड़ या निश्चेष्ट होने का भाव। ४. काम करने को बिलकुल जी न चाहना। थकना। म्लान अवस्था (को०)। ५. मूर्खता। बेवकूफी। ६. एक प्रकार का संचारी भाव (को०)।

विषाद (२)
संज्ञा पुं० [सं० विष + √ अद्(= भक्षण)] विष पीनेवाले शिव। शंकर [को०]।

विषाद (३)
वि० विषभक्षी। विष खानेवाला [को०]।

विषादन
संज्ञा पुं० [सं०] १. कष्ट। दुःख। खेद। रंज। २. निराशा। ३. एक काव्यालंकार, जो वहाँ होता है जहाँ इच्छा के विपरीत निराशा हाथ लगती है। जैसे,—हौं सोई सखि सुपन में मन भावन के पास। छोर छरा को छुवत ही आनि जगाओ सास।—मति० ग्रं०, पृ० ६०।

विषादनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पलाशी नाम की लता। २. इंद्रवारुणी।

विषादित
वि० [सं०] विषण्ण। विषादयुक्त। खिन्न [को०]।

विषादिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] विषाद का धर्म या भाव।

विषादित्व
संज्ञा पुं० [सं०]दे० 'विषादिता' [को०]।

विषादिनी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पलाशी नाम की लता। २. इंद्रवारुणी।

विषादिनी (२)
वि० स्त्री० [सं०] विष पीनेवाली। उ०—विचर रही निर्मम अबाध तुम, विश्व विषादिनी, लोकप्रसादिनी।— रजत०, पृ० ७९।

विषादी (१)
संज्ञा पुं० [सं० विषादिन्] वह जिसे विषाद हो। विषाद युक्त। दुःखी व्यक्ति।

विषादी (२)
वि० विष खानेवाला [को०]।

विषादाश्रु
संज्ञा पुं० [सं०] दुःख या निराशा के कारण उत्पन्न आँसू।

विषानन
संज्ञा पुं० [सं०] साँप।

विषान्न
संज्ञा पुं० [सं० विष + अन्न] विषमिश्रित भोजन [को०]।

विषापवादिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] विष का प्रभाव दूर करने की एक मांत्रिक क्रिया [को०]।

विषापवादी
वि० [सं० विषापवादिन्] विष को दूर करनेवाला [को०]।

विषापह (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. मोखा नामक वृक्ष। मुष्कक। २. वह जिससे विष का नाश हो। ३. गरुड़ (को०)।

विषापह (२)
वि० विष का प्रभाव नष्ट कर देनेवाला [को०]।

विषापहरण
संज्ञा पुं० [सं०] विष का प्रभाव हटाना [को०]।

विषापहा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. इंद्रवारुणी। इंद्रायन। २. निर्विषी। ३. नागदमन। ४. अर्कपञा। इसरौल। ५. सर्पकंकाली। ६. सर्पदंष्ट्रा। इस्पंद। ७. त्रिपर्णी नामक कंद।

विषाभाव
संज्ञा स्त्री० [सं० ] निर्विषी [को०]।

विषायका
संज्ञा स्त्री० [सं०] निर्विषी।

विषायुध
संज्ञा पुं० [सं०] १. साँप। २. वह अस्त्र जो जहर में बुझाया गया हो। ३. विषैला जंतु (को०)।

विषार
संज्ञा पुं० [सं०] विषैला साँप।

विषाराति
संज्ञा पुं० [सं०] काला धतूरा।

विषारि (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. महाचंचु या चेंच नामक साग। २. घीकरंज।

विषारि (२)
वि० जिससे विष का नाश होता हो।

विषाला
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की मछली जिसका मांस वायु और कफ बढ़ानेवाला माना जाता है।

विषालु
वि० [सं०] विषैला। जहरीला [को०]।

विषासहि
वि० [सं०] विजेता। जयी। विजयी [को०]।

विषास्ञ
संज्ञा पुं० [सं०] १. साँप। २. जहर में बुझाया हुआ अस्त्र।

विषास्य
संज्ञा पुं० [सं०] साँप।

विषास्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] भिलावाँ।

विषी (१)
संज्ञा पुं० [सं० विषिंन्] १. विषपूर्ण वस्तु। जहरीली चीज। २. विषधर सर्प। जहरीला साँप।

विषी (२)
वि० [हिं० विष ?] विषयुक्त। जहरीला।

विषु
वि० [सं०] १. समान रूप से। २. विविध प्रकार से। अनेक प्रकार से। ३. समान। तुल्य [को०]।

विषुण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'विषुव'।

विषुण (२)
वि० १. अनेक रूप का। बहुरूपी। २. सर्वग। सर्वगत। ३. विप्रकीर्ण। बिखरा हुआ। ४. पराङमुख [को०]।

विषुद्रुह
संज्ञा पुं० [सं०] वाण। तीर।

विषुप
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'विषुव'।

विषुप्त
वि० [सं०] गहरी नींद में पड़ा हुआ। विसुप्त [को०]।

विषुव
संज्ञा पुं० [सं०] ज्योतिष के अनुसार वह समय जब सूर्य विषुव रेखा पर पहुँचता है और दिन तथा रात दोनों बराबर होती हैं। विशेष—ऐसा समय वर्ष में दो बार आता है। एक तो सौर चैत मास की नवीं तिथि या अंग्रेजी २१ मार्च को, और दूसरा सौर आश्विन को नवीं तिथि या अँग्रेजी २२ सितंबर को। विशेष दे० 'वुषव रेखा'। यौ०—विषुवच्छाया। विषुवदिन। विषुवरेखा। विषुवसमय।

विषुवच्छाया
संज्ञा स्त्री० [सं०] दोपहर के समय पड़नेवाली धूपवड़ी के शंकु की छाया [को०]।

विषुवत्
संज्ञा पुं० [सं०]दे० 'विषुव'।

विषुवतरेखा
संज्ञा स्त्री० [सं०]दे० 'विषुवरेखा'।

विषुवद्वलय
संज्ञा पुं० [सं० ] विषुवरेखा।

विषुवदवृत्त
संज्ञा पुं० [सं०] विषुवरेखा।

विषुवद्दिन, विषुवद्दिवस
संज्ञा पुं० [सं०] वह दिन जब दिन और रात बराबर हों [को०]।

विषुवद्देश
संज्ञा पुं० [सं०] विषुवरेखा के नीचे आनेवाले देश या भूभाग [को०]।

विषुवरेखा
संज्ञा स्त्री० [सं०] ज्योतिष के कार्य के लिये कल्पित एक रेखा जो पृथ्वीतल पर उसके ठीक मध्यभाग में बेड़े बल में या पूर्व पश्चिम पृथ्वी के चारों मानी जाती है। विशेष—यह रेखा दोनों मेरुओं के ठीक मध्य में दोनों से समान अंतर पर है। आकाश में इस रेखा से उत्तर की ओर मेष से कन्या तक की पहली छह् राशियाँ और दक्षिण की ओर तुला से मीन तक की छह् राशियाँ हैं। इसे 'निरक्ष वृत्त' भी कहते हैं।

विषूचक
संज्ञा पुं० [सं०] विसूचिका नामक रोग।

विषूचिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'विसूचिका'। उ०—जिस अजीर्णं में बादी देह को सुई के सदृश पीड़ा देय अर्थात् सूई सी चुभे उसको वैद्य विषूचिका कहते हैं।—माधव०, पृ० ६६।

विषै पु
संज्ञा पुं० [सं० विषय] दे० 'विषय' उ०—विषई विषै सब विष की खानी। ए सब कहिए जम सहिदानी।—कबीर सा०, पृ० ८०६।

विषैक पु
वि० [सं० विषयक] दे० 'विषयक'। उ०—(क) सुत विषैक तव पद रति होऊ।—मानस, १।१५१। (ख) अब सुनि कृष्ण विषैक निरोध। जदपि अनंत अखंडित बोध।—नंद० ग्रं०, पृ० २१७।

विषैला
वि० [सं० विष + हिं० एला (प्रत्य०)] विषवाला। जहरीला।

विषौषधी
संज्ञा स्त्री० [सं०] नागदंती।

विष्कंद
संज्ञा पुं० [सं० विष्कन्द] १. तितर बितर होना। बिखरना। २. जाना। गमन। दूर गमन [को०]।

विष्कंध
संज्ञा पुं० [सं० विष्कन्ध] १. वह जो गति को रोकता हो। २. बाधा। विघ्न।

विष्कंधाजीर्ण
संज्ञा पुं० [सं० विष्कन्धाजीर्ण] एक प्रकार का अजीर्ण रोग। विशेष—रोग जिसमें रोगी के शरीर में शूल के समान पीड़ा होती है, उसका पेट फूल जाता है और वह मल या अपान वायु का त्याग नहीं कर सकता।

विष्कंभ
संज्ञा पुं० [सं० विष्कम्भ] १. फलित ज्योतिष के अनुसार सत्ताईस योगों में से पहला योग। विशेष—आरंभ के पाँच दंडों को छोड़कर शुभ कार्य के लिये यह योग बहुत अच्छा समझा जाता है। कहते हैं, इस योग में जन्म लेनेवाला मनुष्य सब बातों में स्वाधीन और भाई बंधु आदि से सदा सुखी रहता है। २. विस्तार। ३. बाधा। विघ्न। ४. साहित्यदर्पण के अनुसार नाटक का एक प्रकार का अंक जो प्रायः गर्भांक के समीप होता है। उ०—प्राज अमरता का जीवित हूँ मैं वह भीषण जर्जर दंभ, आह सर्ग के प्रथम अंक का अधम पात्र मय सा विष्कंभ।—कामायनी, पृ० १८। विशेष—जो कथा पहले हो चुकी हो अथवा जो अभी होनेवाली हो, उसकी इसमें मध्यम पात्रों द्वारा सूचना दी जाती है। यह दो प्रकार का होता है—शुद्ध और संकीर्णा। जब एक या अनेक मध्यम पात्र इसका प्रयोग करते हैं, तब यह शुद्ध कहलाता है। और जब मध्यम तथा नीच पात्रों द्वारा इसका प्रयोग होता है, तब इसे संकीर्ण कहते है। शुद्ध विष्कंभ में मध्यम पात्रों का वार्तालाप संस्कृत भाषा में और संकीर्ण विष्कंभ में मध्यम तथा नीच पात्रों का वार्तालाप प्राकृत भाषा में होता है। शुद्ध का उदाहरण मालतीमाधव के पाँचवें अंक में कुंडलाकृत प्रयोग और संकीर्ण का रामाभिनंद में क्षपणक और कापालिककृत प्रयोग है। ५. योगियों का एक प्रकार का बंध। ६. वाराहपुराण के अनुसार एक पर्वत का नाम। ७. वृक्ष। पेड़। ८. अर्गल। ब्योड़ा।९. दे० 'बड़ेरा।' बँड़ेरी (को०)।१०. स्तंभ। खंभा (को०)। ११. मंथनदंड जिसमें रस्सी लपेटकर दधिमंथन करते हैं (को०)।१२. किसी वृत्त या घेरे का व्यास (को०)।१३. क्रियाशीलता। कार्य में निरत रहना (फो०)।

विष्कंभक
संज्ञा पुं० [सं० विष्कम्भक] दे० 'विष्कंभ'।

विष्कंभन
संज्ञा पुं० [सं० विष्कम्भन] १. बाधा उपस्थित करना। २. विस्तृत करना। ३. विदारण करने, खोलने या फाड़ने का उपकरण [को०]।

विष्कंभित
वि० [सं० विष्कम्भित] १. बाधायुक्त। अवरुद्ध २. दूरीकृत। अस्वीकृत। ३. (किसी वस्तु से) पूर्णतः युक्त [को०]।

विष्कंभी (१)
संज्ञा पुं० [सं० विष्कम्भिन्] १. शिव जी का एक नाम। २. अर्गल। ब्योंड़ा। ३. एक तांत्रिक देवी (को०)।४. एक बोधिसत्व (को०)।

विष्कंभी (२)
वि० बाधा डालनेवाला। बाधक [को०]।

विष्क
संज्ञा पुं० [सं०] वह हाथी जिसकी अवस्था बीस वर्ष की हो गई हो।

विष्कन्न
वि० [सं०] १. इतस्ततः। बिखरा हुआ। २. गत। जो चला गया हो [को०]।

विष्कब्ध
वि० [सं०] स्थिर किया हुआ। जिसे टिकाया गया हो। अवलंबित [को०]।

विष्कर
संज्ञा पुं० [सं०] १. पक्षी। चिड़िया। २. अर्गल। ब्योंड़ा। ३. एक दानव का नाम। ४. युद्ध का एक ढंग (को०)।

विष्कल
संज्ञा पुं० [सं०] सुअर। ग्रामशूकर।

विष्कलन
संज्ञा पुं० [सं०] भोजन। आहार।

विष्किर
संज्ञा पुं० [सं०] १. पक्षी। चिड़िया। २. वे पक्षी जो अन्न को इधर उधर छितराकर नखों से कुरेदकर खाते हैं। जैसे,— कबूतर, मुरग, तीतर, बटेर आदि। ३. दर्वीकर नामक जाति के साँपों के अंतर्गत एक प्रकार का साँप। ४. एक अग्निविशेष (को०)।५. फाड़कर टुकड़े टुकड़े करना (को०)।

विष्कुंभ
संज्ञा पुं० [सं० विष्कुम्भ] दे० 'विष्कंभ' (१)।

विष्टंभ
संज्ञा पुं० [सं० विष्टम्भ] १. बाधा। रुकावट। २. एक प्रकार का रोग जिसमें मल रुकने की कारण रोगी का पेट फूल जाता है। अनाह। बिबंध। ३. आक्रमण। चढ़ाई। ४. अच्छी तरह से जमाना। ७. कदम रखना। डग भरना (को०)।८. अवलंब। आसरा। सहारा (को०)।९. सहन। बरदाश्त (को०)।

विष्टंभन
संज्ञा पुं० [सं० विष्टंभन] १.रोकने या संकुचित करने की क्रिया। २. वह जो रोकता या संकुचित करता हो।

विष्टंभित
वि० [सं० विष्टम्भित] १. मजबूती से खड़ा किया हुआ। अचल किया हुआ। २. (किसी वस्तु से) भरा या पूर्ण ढका हुआ [को०]।

विष्टंभी (१)
संज्ञा पुं० [सं० विष्टम्भिन्] वह पदार्थ जिससे पेट का मल रुके (वैद्यक)।

विष्टंभी (२)
वि० १. सहारा देनेवाला। २. स्तंभित करने या रोकनेवाला। ३. विष्टंभ रोग युक्त। ४. विष्टंभ रोग पैदा करनेवाला [को०]।

विष्ट
वि० [सं० विश् + क्त (प्रत्य०)] १. प्रविष्ट। घुसा हुआ। २. सहित। युक्त [को०]।

विष्टप
संज्ञा पुं० [सं०] १. भुवन। लोक। २. पात्र। प्याला (को०)।

विष्टपहारी
वि० [सं० विष्टपहारिन्] भुवनमोहन। सबको लुभानेवाला [को०]।

विष्टप् (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्वर्ग लोक। २. जगत्। दुनिया। भुवन। संसार (को०)।

विष्टप् (२)
संज्ञा स्त्री० सिरा चोटी। ऊंचाई [को०]।

विष्टब्ध
वि० [सं०] १. अच्छी तरह से जमाया हुआ। २. टेक लगा हुआ। सहारा दिया हुआ। ३. रोका हुआ। अवरुद्ध। स्तंभित। गतिहीन। ५. भरा हुआ। ६. जो पचा न हो। ७. कठोर। कर्कश। कड़ा [को०]।

विष्टब्धि
संज्ञा स्त्री० [सं०] टेक लगाना या देना। सहारा देना। मजबूती से स्थिर करना [को०]।

विष्टभ
संज्ञा पुं० [सं०] लोक। संसार [को०]।

विष्टभित
वि० [सं०] जो घर अपनी जगह दृढ़तापूर्वक स्थापित किया हुआ हो [को०]।

विष्टर (१)
वि० [सं०] विस्तृत। लंबा चौड़ा [को०]।

विष्टर (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. आक। मदार। २. वृक्ष। पेड़। ३. पीठ। ४. कुश का बना हुआ आसन। कुशास्तर। आसन। ५. मुट्ठी भर कुश (को०)। ६. यज्ञ में ब्रह्मा का आसन (को०)। ७. पचीस कुशाओं से बना हुआ एक आसन। ८. एक देवता (को०)।

विष्टरपंक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं० विष्टरपङिक्त] एक वैदिक छंद।

विष्टरबृहती
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक वैदिक छंद।

विष्टरभाक्
वि० [सं० विष्टरभाज्] जो आसन पर उपविष्ट हो। आसन पर बैठा हुआ [को०]।

विष्टरश्रवा
संज्ञा पुं० [सं० विष्टरश्रवस्] १. विष्णु। नारायण। २. २. कृष्ण (को०)। ३. शिव (को०)।

विष्टरस्थ
वि० [सं०] आसन पर बैठा हुआ [को०]।

विष्टरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] गुंडासिनी नामक घास।

विष्टराश्र
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणनुसार पृथु के एक पुत्र का नाम।

विष्टरुहा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पीली केतकी।

विष्टा
संज्ञा स्त्री० [सं०]दे० 'विष्ठा'।

विष्टार
संज्ञा पुं० [सं०] १. कुश या घास का आस्तरण। २. एक वैदिक छंद [को०]।

विष्टारपंक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं० विष्टारपङिक्त] एक प्रकार का वैदिक छंद जिसकी प्रथम और चतुर्थ चरणों में १२ वर्ण होते हैं।

विष्टारबृहती
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक वैदिक छंद का नाम जिसके पहले और चौथे चरणों में ८ और दूसरे तथा तीसरे चरणों में १० वर्ण होते हैं।

विष्टारी
वि० [सं० विष्टारिन्] विस्तारयुक्त। विस्तृत। आयामयुक्त। फैला हुआ [को०]।

विष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह काम जो बिना कुछ पुरस्कार दिए कराया जाय। बेगार। २. वेतन। तनख्वाह। ३. काम। ४. वर्षा। ५. फलित ज्योतिष के ग्यारह करणों में से सातवाँ करण जिसे विष्ठिभद्रा भी कहते हैं। उ०—विष्टि करण नाम से कही जाती है।—बृहत्०, पृ० ४४२। ६. व्याप्ति। फैलाव (को०)। ७. प्रेषण। भोजना (को०)। ८. दे० 'विष्टिकारी' (को०)। ९. नरकवास। नरक में पड़ना (को०)।

विष्टिकर
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्राचीन काल में राज्य का वह बड़ा सैनिक कर्मचारी जिसे अपनी सेना रखने के लिये राज्य की ओर से जागीर मिला करती थी। २. अत्याचारी। ३. बेगारों या दामों का अधिकारी (को०)।

विष्टिकर्मांतिक
संज्ञा पुं० [सं० विष्टिकर्मन्तिक] विष्टिकारी। वह जिससे बिना भृति दिए काम कराया जाय [को०]।

विष्टिकारी
संज्ञा पुं० [सं० विष्टिकारिन्] दे० 'विष्टिकर्मांतिक' [को०]।

विष्टिकृत्
संज्ञा पुं० [सं०] बेगार। सेवक। दास [को०]।

विष्टिभद्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'विष्टि'— (५)।

विष्टिव्रत
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार एक प्रकार का व्रत।

विष्ठल
संज्ञा पुं० [सं०] दूर का स्थान। दूरवर्ती स्थान। वह जगह जो निकट न हो [को०]।

विष्ठा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मल। मैला। गुह। पाखाना। २. पेट। उदर (को०)। ३. मध्यभाग। अंतर (को०)।

विष्ठाभुक्
संज्ञा पुं० [सं०] सूअर।

विष्ठाभू
संज्ञा पुं० [सं०] मल में उत्पन्न होनेवाला कृमि [को०]।

विष्ठाभूदारक
संज्ञा पुं० [सं०] ग्रामशूकर [को०]।

विष्ठारुहा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पीली केतकी।

विष्ठाशी
संज्ञा पुं० [सं० विष्ठाशिन्] सूअर।

विष्ठित
वि० [सं०] उपस्थित। पार्श्ववर्ती [को०]।

विष्ठेष्ठा
संज्ञा स्त्री० [सं०] हल्दी।

विष्णु
संज्ञा पुं० [सं०] १. हिंदुओं के एक प्रधान और बहुत बड़े देवता जो सृष्टि का भरण, पोषण और पालन करनेवाले तथा ब्रह्मा के एक विशेष रूप माने जाते हैं। विशेष—भारतवर्ष में विष्णु को देवता के रूप में बहुत दिनों से मानते चले आते हैं और इनकी उपासना बहुत अधिकता से होती आई है। ऋग्वेद में यद्यपि विष्णु गौण देवता माने गए हैं, पर ब्राह्मण ग्रंथों में इनका महत्व बहुत अधिक है। ऋग्वेद में विष्णु विशाल शरीरवाले और युवक माने गए हैं और कहा गया है कि ये त्रि + वि + क्रम अर्थात् तीन कदमों या डगों से सारे विश्र्व को अतिक्रमण करनेवाले हैं। पुराणों के वामन अवतार का यही बीज रूप है। कुछ लोगों ने इन तीनों डगों या कदमों का अर्थ सूर्य का दैनिक उदय और अस्त माना है और कुछ लोग इसका अर्थ भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्गलोक लेते हैं। इसके अतिरिक्त ये नियमित रूप, बहुत दूर तक और जल्दी जल्दी चलनेवाले माने गए हैं। यह भी कहा गया है कि ये इंद्र के मित्र थे और वृत्र के साथ युद्ध करने में इन्होंने इंद्र को सहायता दी थी। विष्णु और इंद्र दोनों मिलकर वातावरण, अंतरिक्ष, सूर्य, उषा और अग्नि के उत्पादक माने गए हैं और विष्णु इस पृथ्वी, स्वर्ग और सब जीवों के मुख्य आधार कहे गए हैं। ऋग्वेद और शतपथ ब्राह्मण में कुछ ऐसी कथाएँ भी हैं जो पौराणिक काल के वराह, मत्स्य तथा कूर्म अवतार का भी मूल या आरंभिक रूप मानी जा सकती हैं। वैदिक काल में विष्णु धन, विर्य और बल देनेवाले तथा सब लोगों का अभीष्ट सिद्ध करनेवाले माने जाते थे। पुराणों के अनुसार विष्णु समय पर पृथ्वी का भार हलका करने के लिये, ससार में शांति और सुख की स्थापना करने के लिये और दुष्टों तथा पापियों का नाश करने के लिये अवतार धारण किया करते हैं। विष्णु के कुल चौबीस अवतार कहे गए हैं, जिनमें से दस मुख्य माने गए हैं (दे० 'अवतार')। भिन्न भिन्न पुराणों में विष्णु के संबंध में अनेक प्रकार की कथाएँ और उनकी उपासना आदि का बहुत अधिक माहात्म्य मिलता है। विष्णु के उपासक वैष्णव कहलाते हैं। इनकी स्त्री का नाम श्री या लक्ष्मी कहा गया हैं। ये युवक, श्यामवर्ण और चतुर्भुज माने गए हैं। ये चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए रहते है। इनके शंख का नाम पांचज य, चक्र का नाम सुदर्शन और गदा का नाम कौमोदकी है। इनकी तलवार का नाम नंदक और धनुष का नाम शार्ङ्ग है। इनका वाहन वैनतेय नामक गरुड़ माना जाता है। पुराणों में इनके एक हजार नाम माने गए हैं, और उन नामें का जप बहुत शुभ फल देनेवाला माना जाता है। नारायण, कृष्ण, वैकुंठ, दामोदर, केशव, माधव, मुरारि, अच्युत, हृषीकेश, गोविंद, पीतांबर, जनार्दन, चक्रपाणि, श्रीपति, मधुसूदन, हरि आदि इनके प्रसिद्ध नाम हैं। २. अग्नि। ३. वसु देवता। ४. बारह आदित्यों में से पहले आदित्य का नाम। ५. एक प्राचीन ऋषि जिनका बनाया हुआ धर्मशास्त्र प्रचलित है। ६. श्रवण नाम का नक्षत्र (को०)। ७. वह जो पुण्यात्मा हो। संत (को०)।

विष्णुऋक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] श्रवण नक्षत्र का एक नाम।

विष्णुकंद
संज्ञा पुं० [सं० विष्णुकन्द] एक प्रकार का बड़ा कंद जो प्रायः कोंकण प्रदेश में होता है। वैद्यक में यह मधुर, शीतल, रुचिकारी, तृप्तिकारक तथा दाह, पित्त और सुजन को दूर करनेवाला माना जाता है। पर्या०—विष्णुगुप्त। सुपुष्ट ? (सुपुट)। बहुसंपुट। जलवासा। बृहत्कंद। दीर्घपत्र। हरिप्रिय।

विष्णुकांची
संज्ञा स्त्री० [सं० विष्णुकाञ्ची] दक्षिण के एक प्राचीन तीर्थ का नाम। कहते हैं कि इसकी स्थापना शंकराचार्य ने की थी।

विष्णुकांता
संज्ञा स्त्री० [सं० विष्णुकान्ता] नीली अपराजिता। नीली कोयल लता।

विष्णुकांती
संज्ञा स्त्री० [सं० विष्णुकान्ती] एक प्राचीन तीर्थ का नाम।

विष्णुकाक
संज्ञा पुं० [सं०] नीली अपराजिता। नीली कोयल लता।

विष्णुक्रांत
संज्ञा पुं० [सं० विष्णुक्रान्त] १. इश्कपेंचा नामक लता या उसका फूल। २. संगीत में एक प्रकार का ताल।

विष्णुक्रांता
संज्ञा स्त्री० [सं० विष्णुक्रान्ता] १. नीली अपराजिता या कोयल नाम की लता। २. वाराहीकंद। गेंठी। ३. नीले फूलवाली शंखाहुली।

विष्णुक्रांति
संज्ञा स्त्री० [सं० विष्णुक्रान्ति] अपराजिता या कोयल नाम की लता।

विष्णुक्षेत्र
संज्ञा पुं० [सं०] एय प्राचीन तीर्थ का नाम।

विष्णुगंगा
संज्ञा स्त्री० [सं० विष्णुगङ्गा] एक प्राचीन नदी का नाम।

विष्णुगंधि
संज्ञा स्त्री० [सं० विष्णुगन्धि] लाल फूल की शंखाहुली।

विष्णुगुप्त
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रसिद्ध ऋषि और वैयाकरण जो लोक में कौटिल्य के नाम से प्रसिद्ध थे। कहते हैं, एक बार शिव जी इनपर बहुत कुपित हुए थे। उस समय विष्णु ने इनकी रक्षा की थी। २. प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ चाणक्य का असली नाम। विशेष दे० 'चाणक्य'। ३. बड़ी मूली। ४. विष्णुकंद। ५. वात्स्यायन मुनि का नाम (को०)।

विष्णुगुप्तक
संज्ञा पुं० [सं०] बड़ी मूली।

विष्णुगृह
संज्ञा पुं० [सं०] १. विष्णु भगवान का मंदिर। २. एक नगर। स्तबपुर। ताम्रलिप्त [को०]।

विष्णुगोल
संज्ञा पुं० [सं०] विषुवत् रेखा [को०]।

विष्णुग्रंथि
संज्ञा स्त्री० [सं० विष्णुग्रन्थि] शरीर की एक संधि [को०]।

विष्णुचक्र
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु के हाथ का चक्र। सुदर्शन चक्र।

विष्णुज
संज्ञा पुं० [सं०] अठारहवें कल्प का नाम [को०]।

विष्णुज (१)
वि० जो विष्णु नक्षत्र में उत्पन्न हो। श्रवण नक्षत्र में जन्म लेनेवाला [को०]।

विष्णुजन
संज्ञा पुं० [सं०] संत। महात्मा। तपस्वी [को०]।

विष्णुतिथि
संज्ञा स्त्री० [सं०] एकादशी और द्वादशी दोनों तिथियाँ जिनके स्वामी विष्णु माने जाते हैं।

विष्णुतैल
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्यक में एक प्रकार का तेल जो वात- रोगों के लिये बहुत उपकारा माना जाता है।

विष्णुत्व
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु का भाव या धर्म।

विष्णुदत्त
संज्ञा पुं० [सं०] राजा परीक्षित का एक नाम [को०]।

विष्णुदेवत
संज्ञा पुं० [सं०] अवण नामक नक्षत्र जिसके स्वामी विष्णु माने जाते हैं।

विष्णुदैवत्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जिसके अधिष्ठाता देवता विष्णु हों। २. श्रवण नक्षत्र [को०]।

विष्णुदैवत्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] मास के प्रत्येक पक्ष की एकादशी और द्वादशी तिथि। विष्णु तिथि [को०]।

विष्णुद्वीप
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणनुसार एक द्वीप का नाम।

विष्णुधर्म
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह धर्म जिसमें विष्णु का वैदिक उपासना होती है। २. एक प्रकार का आद्ध [को०]।

विष्णुधर्मोंत्तर
संज्ञा पुं० [सं०] एक उपपुराण का नाम जो विष्णु राण का एक अंग माना जाता है।

विष्णुधारा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक प्राचीन तीर्थ का नाम। २. पुराणानुसार हिमालय से निकली हुई एक नदी का नाम।

बिष्णुपंजर
संज्ञा पुं० [सं० विष्णुपञ्जर] पुराणानुसार विष्णु का एक कवच। विशेष—कहते हैं, यह कवच धारण करने से सब प्रकार के भय दूर हो जाती हैं।

विष्णुपत्नी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विष्णु की स्त्री, लक्ष्मी। २. अदिति का एक नाम।

विष्णुपद
संज्ञा पुं० [सं०] १. कमल। २. आकाश। आसमान। वियद। ३. विष्णु का चरणचिह्न जो गया में है (को०)। ४. क्षीरसागर। दुग्ध समुद्र (को०)। ४. महाभारत के अनुसार एक तीर्थ का नाम (को०)। ६. एक पर्वत (को०)। ७. भौंहों का मध्य भाग। भ्रूमध्य (को०)।

विष्णुपदी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. गंगा नदी जो विष्णु के पैरों से निकली हुई मानी जाती है। २. वृष, वृश्चिक, कुंभ और सिंह इनमें से प्रत्येक की संक्रांति। ३. द्वारिका पूरी (को०)।

विष्णुपदीचक्र
संज्ञा पुं० [सं०] ज्योतिष में शुभाशुभ फल का ज्ञापक एक नराकार चक्र [को०]।

विष्णुपरायण
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु का भक्त, वैष्णव।

विष्णुपर्णिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] पृश्निपर्णी। पिठवन।

विष्णुपर्णी
संज्ञा स्त्री० [सं०] भुइँआँवला।

विष्णुपीठ
संज्ञा पुं० [सं०] तांत्रिकों के अनुसार एक पीठ या तीर्थस्थान का नाम।

विष्णुपुराण
संज्ञा पुं० [सं०] अठारह प्रमुख पुराणों में से एक।

विष्णुपुरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] विष्णु के रहने का स्थान, वैकुंठ।

विष्णुप्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. तुलसी का पौधा। २. लक्ष्मी।

विष्णुप्रीति
संज्ञा स्त्री० [सं०] विष्णु की पूजा के निमित्त ब्राह्मण को दी जानेवाली भूमि [को०]।

विष्णुभ
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु नक्षत्र। श्रवण नक्षत्र [को०]।

विष्णुभक्ति
संज्ञा पुं० [सं०] भगवत्सेवा [को०]।

विष्णुमाया
संज्ञा स्त्री० [सं०] दुर्गा।

विष्णुमित्र
संज्ञा पुं० [सं०] सार्वलौकिक नाम। अमुक। फलाँ [को०]।

विष्णुयशा
संज्ञा पुं० [सं० विप्णुयशस्] पुराणानुसार वह व्यक्ति जो ब्रह्मयशा का पुत्र और कल्कि अवतार का पिता होगा।

विष्णुयान
संज्ञा पुं० [सं०] गरुड़ [को०]।

विष्णुरथ
संज्ञा पुं० [सं०] गरुड़।

विष्णुरात
संज्ञा पुं० [सं०] राजा परीक्षित का एक नाम। विशेष—कहते हैं, अश्वत्थामा ने इन्हें गर्भ में ही मार डाला था; पर विष्णु ने इन्हें फिर से जिला दिया; इसी से इनका यह नाम पड़ा।

विष्णुलिंगी
संज्ञा स्त्री० [सं० विष्णुलिङ्गी] बटेर।

विष्णुलोक
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु का निवासस्थान, वैकुंठ। गोलोक।

विष्णुवल्लभा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. तुलसी का पौधा। २. लक्ष्मी (को०)। ३. अग्निशिखा। कलिहारी।

विष्णुवाहन
संज्ञा पुं० [सं०] गरुड़।

विष्णुवाह्य
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'विष्णुवाहन'।

विष्णुवृद्ध
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्राचीन गोत्रवर्तक ऋषि का नाम।

विष्णुशक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] लक्ष्मी।

विष्णुशिला
संज्ञा स्त्री० [सं०] शालिग्राम।

विष्णुशृंखल
संज्ञा पुं० [सं० विष्णुश्रृङ्खल] बह द्वादशी जो श्रवण नक्षत्र में हो। इसकी गणना योग और पुण्यकाल में होती है।

विष्णुश्रुत
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्राचीन ऋषि का नाम। २. एक प्रकार का आशीर्वाद वचन जिसका अभिप्राय है कि यह सुनकर विष्णु तुम्हारा मगल करे।

विष्णुसंहिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रसिद्ध स्मृति का नाम।

विष्णुसर्वज्ञ
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रसिद्ध आचार्य जो सायण के गुरु माने जाते हैं।

विष्णुस्तृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रसिद्ध स्मृति जिसका उल्लेख याज्ञवल्कय आदि ने किया है।

विष्णुस्वामी
संज्ञा पुं० [सं० विष्णुस्वामिन्] कृष्णभक्तिपरक विष्णु- स्वामी संप्रदाय के प्रवर्तक का नाम। उ०—इन विष्णु स्वामी संप्रदाय दृढ़ करि ताकौ सार जो सेवा प्रकार ताकौ प्रकास कियो है।—दो सौ बावन०, भ० १, पृ० १४४।

विष्णुहिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. तुलसी का पौधा। २. मरुआ।

विष्णुत्तर
संज्ञा पुं० [सं०] वह भूदान जो विष्णुपूजा के निमित्त किय जाय [को०]।

विष्पंद
संज्ञा पुं० [सं० विष्पन्द] १. स्पंदन। धड़कन। २. आटे, घी और चीनी ले बना हुआ एक व्यंजन [को०]।

विष्पंदन
संज्ञा पुं० [सं० विष्पन्दन] दे० 'विष्पंद'।

विष्पत्री
संज्ञा पु० [सं०] पक्षी। चिड़िया।

विष्पर्धा (१)
संज्ञा पुं० [सं० विष्पर्धग्] स्वर्ग।

विष्पर्धा (२)
वि० जिसे किसी प्रकार की स्पर्धा या मत्सर आदि न हो।

विष्पर्धा (३)
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्पर्धा। होड़। लाग डाँट [को०]।

विष्पित
संज्ञा पुं० [सं०] कठिनता। कठिनाई। मुश्किल [को०]।

विष्पुलिंगक
वि० [सं०] चिनगारी या स्फुलिंग युक्त [को०]।

विष्फार
संज्ञा पुं० [सं०] १. धनुष की टंकार। २. विस्तार। फैलाव। विस्फार (को०)।

विष्फुलिंग
संज्ञा पुं० [सं०] आग की चिनगारी। अग्निकण [को०]।

विष्यंद
संज्ञा पुं० [सं० विष्यन्द] १. बुँद। विंदु। २. बहना। क्षरण। प्रवाह।

विष्यंदन
संज्ञा पुं० [सं० विष्यन्दन] १. बहना। चूना। २. एक मिठाई। दे० 'विष्यंद'। ३. उफनकर बहना। ४. पिघलना। तरल होना (को०)। ५. विलीन होना। मिल जाना।

विष्यंदी
वि० [सं० विष्यन्दिन्] प्रवाही। तरल [को०]।

विष्य
वि० [सं०] जो विष मार डालने के योग्य हो। जहर देकर मार डालने के लायक।

विष्व
वि० [सं०] १. हानिकर। पीड़ाकर। उत्पातकारी। २. हिंसक। हिंस्त्र [को०]।

विष्वक् (१)
संज्ञा पुं० [सं० विष्वच्] १. वह जो सदा इधर उधर घूमता फिरता रहे। २. दे० 'विषुव'।

विष्वक् (२)
क्रि० वि० सर्वत्र। चारों और [को०]।

विष्वक् (३)
वि० सर्वत्र जानेवाला। सर्वव्यापक। २. विभागों में अलग अलग करनेवाला। ३. भिन्न।

विष्वकपर्णी
संज्ञा स्त्री० [सं०] भुइँआँवला।

विष्वक्सेन
संज्ञा पुं० [सं०] १. विष्णु का एक नाम। २. एक मनु का नाम जो मत्स्यपुराण के अनुसार तेरहवें और विष्णुपुराण के अनुसार चौजहवें हैं। ३. शिव का एक नाम। ४. एक प्राचीन ऋषि का नाम। ५. पुराणनुसार शंकर के एक पुत्र का नाम। ६. विष्णु का एक पार्षद (को०)। यौ०—विष्वक्सेनकांता=प्रियंगु। विष्वक्सेनप्रिया=(१) प्रियंगु। (२) लक्ष्मी।

विष्वकसेना
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रियंगु।

विष्वग्गति
वि० [सं०] सर्वत्र गमन करनेवाला [को०]।

विष्वग्लोप
संज्ञा पुं० [सं०] दुबधा। संभ्रम। संक्षोभ। विघ्न।

विष्वग्वात, विष्वग्वायु
संज्ञा पुं० [सं०] सब ओर से बहनेवाली एक प्रकार की वायु।

विष्वाणन
संज्ञा पुं० [सं०] १. भोजन। २. क्वणित करना। शब्द उत्पन्न करना [को०]।

विष्वाण
संज्ञा पुं० [सं०] भोजन। खाना [को०]।

विसंकट (१)
संज्ञा पुं० [सं० विसङ्कट] १. इंगुदी या हिंगोट नामक वृक्ष। २. सिंह। शेर।

विसंकट (२)
वि० विशाल। खौफनाक। बड़ा। डरावना।

विसंकुल (१)
वि० [सं० विसङ्कुल] संकुलतारहित। आकुलतारहित। धैर्यवान्। सुस्थिर।

विसंकुल (३)
संज्ञा पुं० अव्यग्रता। व्यग्र न होना। घबराहट न होना [को०]।

विसंगत
वि० [सं० विसङ्गत] असंगत। बेमेल [को०]।

विसंगति
संज्ञा स्त्री० [सं० विसङ्गति] असंगति। अनमिलपन।

विंसचारी
वि० [सं० विसञ्चारिन्] इनस्ततः भ्रमणशील। इधर उधर घूमनेवाला।

विसंज्ञ
वि० [सं०] जिसे संज्ञा न हो। बेहोश।

विसंज्ञित
वि० [सं०] संज्ञाहीन [क०]।

विसंधि
संज्ञा स्त्री० [सं० बिसन्धि] १. बुरी संधि। अभिसंधि। अनभिमत संधि। १. संधि का अभाव जो साहित्य में एक दोष है [को०]।

विसंधिक
वि० [सं० विसन्धिक] जिनकी संधि न हो सकती हो।

विसंभर पु
संज्ञा पुं० [सं० विश्र्वम्भर] दे० 'विश्र्वंभर'। उ०—तू मेरो बालक हो नंदनंदन, तोहि विसंभर राखैं।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० २३४।

विसंभरा
संज्ञा स्त्री० [सं० विसभ्भरा] पल्ली। छिपकली [को०]।

विसंभीग
संज्ञा पुं० [सं० विसम्भोग] विरह। पार्थक्य [को०]।

विसंमूढ़
वि० [सं० विसम्मूढ] पूर्णतः उन्मत्त [को०]।

विसंयुक्त
वि० [सं०] असंयुक्त। पृथक् [को०]।

विसंवाद (१)
संज्ञा पुं० [सं] १. विरोध। २. डाँट डपट। ३. धोखा। प्रतिज्ञाभंग (को०। ४. असंगति। असंबद्धता। असहमति (को०)। ५. निराश करना (को०)।

विसंवाद (२)
वि० विलक्षण। अदभुत।

विसंवादक
वि० [सं०] १. वचन भंग करनेवाला। कहकर मुकर जानेवाला। २. छली। धोखेबाज [को०]।

विसंवादन
संज्ञा पुं० [सं०] प्रतिज्ञा भंग करना [को०]।

विसंवादी (१)
वि० [सं० विसंवादिन्] १. वंचक। धूर्त। २. वचन या प्रतिज्ञा का पालन न करनेवाला। ३. निराश करनेवाला। ४. खंडन करनेवाल। भिन्न मत रखनेवाला। असहमत [को०]।

विसंवादी (२)
संज्ञा पुं० राग में अल्पप्रयुक्त स्वर जो संवादी के विरुद्ध होता है (संगीत)।

विसंष्ठुल
वि० [सं०] १. अस्थिर। क्षुब्ध। व्यग्र। २. जो हमवार न हो। असमतल [को०]।

विसंहत
वि० [सं०] १. अलग किया हुआ। ढीला किया हुआ [को०]।

विस (१)
संज्ञा पुं० [सं०] कमल की नाल। मृणाल।

विस † (२)
सर्व० [सं० युष्मद्>वस्] दे० 'उस'।

विसकंठिका
संज्ञा स्त्री० [सं० विसकण्ठिका] एक प्रकार का छोटा बगला।

विसकुसुम
संज्ञा पुं० [सं०] कमल।

विसक्ख पु
संज्ञा पुं० [सं० विशिख] विशिख। बाण। उ०—उभे दले उचारयं, मचे सु मार मारयं। विसक्ख, पारवारए, भड़ाँ सनाह मारए।—रा० रू०, पृ० ८३।

विसग्रंथि
संज्ञा पुं० [सं० विसग्रन्थि] कमलकंद। भसींड़।

विसज
संज्ञा पुं० [सं०] कमल।

विसटी †
संज्ञा स्त्री० [देश० तुल० विष्टी] १. ताँबे या पीतल का वह चक्र जिससे नागेसाधु लँगोटी की तरह बाँधते हैं। उ०— कवन मेखला कवन विसटी। कवन सेली कवन किसती।—प्राश०, पृ० ७९। २. कौपीन। चिट। चीरा।

विसतरना पु
क्रि० अ० [सं० विस्तरण] फैलना। विस्तृत होना। उ०—विसतरी बात सारी विसव अणकारी उतपात सी।— रा० रू०, पृ० ९४।

विसदृश
वि० [सं०] १. जो सदृश या समान न हो। विपरीत। विरुद्ध। उलटा। २. विलक्षण। अद्भुत। अजीब।

विसदद पु
वि० [सं० विशद] निर्मल। स्वच्छ। दे० 'विशद'। उ०— गुलिक्क कर्ण राजहीं। विसद्द हार साजही। पदिक्क सीस शोभयँ रिषीस पुंज लोभयं।—प० रासो, पृ० १०।

विसन पु †
संज्ञा पुं० [सं० विष्णु] दे० 'विष्णु'।

विसनाभि
संज्ञा पुं० [सं०] कमलिनी। पद्मिनी।

विसन्न पु
संज्ञा पुं० [सं० व्यसन, प्रा० विसन] १. आदत। दे० 'व्यसन'। उ०—वाध डरै नह वैर सूं वाघा वैर विसन्न।— बाँकी० ग्रं० १, पृ० १६। २. विपत्ति। संकट। उ०— वेंढ़ां नणैं विसन्न।—रा० रू०, पृ० १३७।

विसप्रसून
संज्ञा पुं० [सं०] कमल।—नंद० ग्रं०, पृ० ११०।

विसभाग
वि० [सं०] जिसका विभाग या हिस्सा न हो [को०]।

विसम पु
वि० [सं० विषम]दे० 'विषम'।

विसमता
संज्ञा स्त्री० [सं० विषमता] दे० 'विषमता'।

विसमाद पु †
संज्ञा पुं० [सं० विस्मय + ता] १. संशय। शंका। २. दुःख। वेदना। उ०—कड़िहारी और गृही कौ, कोई ना जाने अंत। बिन परचै बिसमाद है, हरषत परचै संत।—कबीर सा०, पृ० ९५।

विसमाध †
संज्ञा पुं० [हिं० विस्माद]दे० 'विस्माद'।

विसमाधना
क्रि० अ० [हिं विसमाध+ना (प्रत्य०)] मसूसना। दुःखी होना। शोकालु होना।

विसमाप्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] असमाप्ति। पूर्ण न होना [को०]।

विसमै पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० वि० + समय] विकट समय। उ०— सोनागिर चाँपावत हाथ खग तोले। विसमें मैं द्रढ़ देण कोप बैण बोले।—रा० रू०, पृ० ११४।

विसमै पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० विस्मय] अचंभा। आश्चर्य। उ०—कहनै मै विसमै सी देखे बन आवै।—रा० रु०, पृ० ४२।

विसयना †
क्रि० अ० [सं० वि + शयन ?] डूबना। समाप्त होना। अस्त होना।

विसर
संज्ञा पुं० [सं०] १. आगे जाना। गमन करना। जाना। २. फैलना। बढ़ना। विस्तृत होना। ३. भोड़। समूह। झुंड। ४. राशि। ढेर [को०]।

विसरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. फैलना। विस्तृत होना। २. स्त्रस्त होना। ढेला पड़ना [को०]।

विसराम पु
संज्ञा पुं० [सं० विश्राम]दे० 'विश्राम'। उ०—तन कौ विसराम अराम घनो करि दीजतु है पै न दीजतु है।—ठाकुर०, पृ० ९।

विसर्ग
संज्ञा पुं० [सं०] १. दान। २. त्याग। ३. मल का त्याग करना। शौच। ४. व्याकरण के अनुसार एक वर्ण जिसमें ऊपर नीचे दो बिंदु होते हैं और जिनका उच्चारण प्रायः अर्ध ह् के समान होता है। इसका रूप यह (?) होता है। ५. सूर्य का एक अयन। ६. मोक्ष। ७. मृत्यु। ८. प्रलय। ९. वियोग। विछोह। १०. दीप्ति। चमक। ११. सूर्य का दक्षिणायन। वर्षा, शरद और हेमंत ये तीनों ऋतुएँ। १२. भेजना। प्रेषण। विसर्जन। (को०)। १३. गिराना। उड़ेलना। बूँद बूंद करके गिराना (को०)। १४. क्षेपण। डालना। फैंकना (को०)। १५. निर्माण। रचना (को०)। १६. शिश्न (को०)। १७. सृष्टि का व्यापार (को०)। १८. शिव का नाम (को०)।

विसर्गी
वि० [सं० विसर्गिन्] दान या त्याग करनेवाला [को०]।

विसर्जन
संज्ञा पुं० [सं०] १. परित्याग। छोड़ना। उ०—अब मुझे प्राण विसर्जन करने में भी आगा पीछा नहीं है।—राधाकृष्ण (शब्द०)। २. किसी को यह कहकर भेजना कि तुम जाकर अमुक कार्य करो। ३. विदा होना। चला जाना। प्रस्थान करना। ४. षोड़शोपचार पूजन में अंतिम उपचार अर्थात्आवाहन किए हुए देवता से पुनः स्वस्थान गमन की प्रार्थना करना। ५. समाप्ति। अंत। उ०—कथा विसर्जन होति है सुनौ बीर हनुमान।—(शब्द०)। ६. दान। ७. मलत्याग (को०)। ८. डालना। गिराना (को०)। ९. चराने के लिये पशुओं का हाँकना (को०)। १०. प्रतिमा को जल में बहाना (को०)। ११. वृषोत्सर्ग। साँड़ छोड़ना (को०)। १२. निर्माण। रचना (को०)। १३. क्षतिग्रस्त करना (को०)। १४. उत्तर देना (को०)।

विसर्जनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] गुदा के ऊपरी भाग में स्थित तीन वलयों में से एक [को०]।

विसर्जनीय (१)
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'विसर्ग'।

विसर्जनीय (२)
वि० विसर्जन किया जानेवाला। त्यागने योग्य [को०]।

विसर्जयिता
वि० [सं० विसर्जयितृ] विसर्जन करनेवाला। त्यागनेवाला [को०]।

विसर्जिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] त्रेता युग [को०]।

विसर्जित
वि० [सं०] १. त्यागा हुआ। त्यक्त। २. प्रेषित। भेजा हुआ। ३. हटाया हुआ। च्युत। ४. प्रदत्त।

दिसर्प
सज्ञा पु० [सं०] १. एक प्रकार का रोग, जिसमें ज्वर के साथ सारे शरीर में छोटी छोटी फुंसियाँ हो जाती है। २. रेंगना। सरकना (को०)। २. इधर उधर जाना। हिलना डुलना (को०)। ४. फैलाव। संचार (को०)। ५. किसी कर्म का अप्रत्याशित या अनपेक्षित दुःखद फल (को०)।

विसर्पघ्न
संज्ञा पुं० [सं०] मोम [को०]।

विसर्पण
संज्ञा पुं० [सं०] १. फैलना। फैलाव। वृद्धि। बाढ़। २. फोड़े आदि का फूरना। ३. फेंकना। ४. रेंगना। सरकना। धीरे धीरे चलना (को०)। ५. परित्याग (को०)।

विसर्पि
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'विसर्पिका'।

विसर्पिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] विसर्प नामक रोग।

विसर्पिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] यवतिक्ता नाम की लता। विशेष दे० 'शंखिनी'।

विसर्पी
वि० [सं० विसर्पिन्] १. प्रसरणशील। फैलनेवाला। उ०— उठ उठ ह्याँ ते भागु तौ लौं अभागे। मम बचन विसर्पी सर्प जौ लौं न लागे।— केशव (शब्द०)। २. रेंगने या सरकनेवाला (को०)। ३. विसर्प रोग से पीड़ित (को०)।

विसल
संज्ञा पुं० [सं०] वृक्ष का नया पत्ता। पल्लव। बिसल।

विसल्वकृत
संज्ञा पुं० [सं०] भद्रवल्ली।

विसव पु †
संज्ञा पुं० [सं० विश्व] जगत्। दुनियाँ। उ०—(क) विसतरी बात सारी विसव अणकारी उतपात सी।—रा० रू०, पृ० ९४। (ख) विसव अवर जवनाँ वसु करे सको मिल काज।—रा० रू०, पृ० ३६०।

विसवना †
क्रि० अ० [सं० विश्रमण ? या, विस्त्रवण] १. अस्त होना। जैसे, दिन विसवना। २. व्यतीत होना। बीतना। जैसे, बेर विसवना।

विसवर्त्म
संज्ञा पुं० [सं० विसवर्त्मन्] वैद्यक के अनुसार आँखों का एर प्रकार का रोग जिसमें त्रिदोष के प्रकोप के कारण पलकों में सूजन हो आती है और उसमें उसमें छोटी फुंसियाँ हो आती हैं जिनसें से पानी बहा करता है।

विसवासह
संज्ञा पुं० [सं०] जावित्री।

विसवासा
संज्ञा स्त्री० [सं०] जावित्री।

विसशालूक
संज्ञा पुं० [सं०] कमलकंद। भसीड़।

विसाति पु
संज्ञा स्त्री० [अ० बिसात] १. शक्ति। हकीकत। २. गणना। उ०—मुनि सुरपती नाचि बहु भाँति। नर वपुरे की काह बिसाति।—जग० श०, पृ० ६९।

विसामग्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सामग्री या साधन का अभाव। २. कारण का न होना जिससे कार्य की उत्पत्ति हो [को०]।

विसार
संज्ञा पुं० [सं०] १. मछली। २. निर्गम। निकलना। ३. विस्तार। फैलाव। ४. प्रवाह। बहाव। ५. उत्पत्ति। ६. रेंगना या सरकना (को०)। ७. लकड़ी। काष्ठ (को०)। ८. बल्ली। शहतीर (को०)।

विसारथि
वि० [सं०] जिसके पास सारथी न हो [को०]।

विसारिणी (१)
वि० [सं० विसारिन्] फैलनेवाली। प्रसरणशील [को०]।

विसारिणी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] माषपर्णी। मखवन।

विसारित
वि० [सं०] १. जिसका विसार किया गया हो। २. संपादित [को०]।

विसारी (१)
वि० [सं० विसारिन्] १. फैलनेवाला। प्रसार करनेवाला। २. विसार करनेवाला। निकलनेवाला। ३. रेंगने या सरकने वाला। ४. विस्तृत [को०]।

विसारी (२)
संज्ञा पुं० मछली [को०]।

विसारी (३)
संज्ञा पुं० [सं०] वायुमंडल।

विसाल (१)
संज्ञा पुं० [अ०] १. सयोग। मिलाप। २. आत्मा का ईश्वर में मिलना। मृत्यु। मौत। ३. प्रेमी और प्रेमिका का मिलाप।

विसाल पु (२)
वि० [सं० विशाल] दे० विशाल।

विसावण पु ‡
क्रि० स० [हिं०]दे० 'बिसाहना'। उ०—वैर हमेस विसावण वाड़ बिना वसणौह।—बाकी ग्रं०, भा० १, पृ० २३।

विसासी †
वि० [सं० अविश्वासी] [वि० स्त्री० विसासिनी]दे० 'बिसासी'। उ०—...... तु उसी वसासी से पूछ।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० १४।

विसिंचित
वि० [सं० वि + हिं० सिंचन (सं० सेचन)] सींचा हुआ। उ०—सुकृत के जलं से विसिंचित कल्प किंचित् विश्व उपवन।—अपरा, पृ० १६५।

विसिख †
संज्ञा पुं० [सं० विशिख]दे० 'विशिख'। उ०—वर्षा वधिक ने उसे आज तेरे विरह के विसिख से मारा। —प्रेमघन०, भा० २, पृ० १७।

विसिनी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कमलिनी। पद्मिनी। मृणाल। २. पद्मसमूह (को०)।

विसिनी † (२)
संज्ञा पुं० [सं० व्यसनी]दे० 'व्यसनी'।

विसिल
वि० [सं०] मृणाल संबंधी [को०]।

विसुकर्मा पु
संज्ञा पुं० [सं० विश्वकर्मा] दे० 'विश्वकर्मा'। उ०— विसुकर्मा रुचि धवल श्रमन सोभा सुनि जानिय।—प० रासो, पृ० १६९।

विसुकृत
संज्ञा पुं० [सं०] धर्म के विरुद्ध कार्य। पाप। गुनाह।

विसुख
वि० [सं०] सुखहीन। आनंदरहित [को०]।

विसुध
वि० [हिं० बे + सुध] दे० 'बेसुध'। उ०—तुममें ही आश्रय पाते, ये प्रणय विसुध मतवाले। क्तिनी आहों के शोले तुमने शीतल कर डाले।—हिल्लोल, पृ० ९३।

विसुहृद्
वि० [सं०] जिसे कोई सुहृद् न हो। मित्रहीन [को०]।

विसूचन
संज्ञा पुं० [सं०] जनाने की क्रिया। सूचित करना [को०]।

विसूचिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] वैद्यक के अनुसार एक प्रकार का रोग जिसे हैजा मानते हैं। विशेष—वैद्यक के अनुसार इसमें पहले पेट में दर्द होता है और फिर रोगी को बहुत से दप्त आते हैं। शरीर में जलन होती है और प्यास बहुत लगती है, छाती और सिर में पीड़ा होती है; भ्रम, मूर्छा और कंप होता है, जँभाई आती है; निर्बलता बहुत होती है, मुत्र बंद हो जाता है; नाड़ी मंद पड़ जाती है, आँखें बैठ जाती हैं, शरीर का रंग पीला पड़ जाता है और आवाज बदल जाती है। साथ ही वायु आदि के प्रकोप के कारण सारे शरीर में सुइयाँ चुभने की सी पीड़ा होती है; इसी से इसे विसुचिका कहते हैं। कुछ लोग इसे हैजा भी मानते हैं, पर अधिकांश डाक्टर आदि इसे से भिन्न समझते हैं। उनका मत है कि यह विसूचिका रोग अजीर्ण के कारण होता है, और हैजा एक प्रकार के विषाक्त जीवाणुओं के शरीर में प्रवेश करने से होता है।

विसूची
संज्ञा स्त्री० [सं०] विसूचिका नामक रोग।

विसूत्र
वि० [सं०] १. अव्यवस्थित। उद्विग्न। व्याकुल। २. उदास रागहीन। विरक्त [को०]।

विसूरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. दुःख। रंज। शोक। २. चिंता। फिक्र। ३. विरक्ति। वैराग्य।

विसूरण
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'विसूरण'।

विसूरित
संज्ञा पुं० [सं०] पश्चात्ताप। व्यथा। शोक [को०]।

विसूरिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] ज्वर [को०]।

विसृज्य
वि० [सं०] १. जिसका विसर्जन किया जाय। भेजा जानेवाला। २. उत्पन्न किया जाने वाला [को०]।

विसृज्य (२)
संज्ञा पुं० [सं०] सृष्टनिर्माण। सृष्टि का उत्पादन [को०]।

विसृत
वि० [सं०] १. कहा हुआ। २. विस्तृत। फैला हुआ। ३. विस्तारित। तना हुआ [को०]।

विसृत्वर
वि० [सं०] [स्त्री० विसृत्वरी] १. इधर उधर फैलने या व्याप्त होनेवाला। २. विसर्पण करने, रेंगने या सरकनेवाला [को०]।

विसृमर
वि० [सं०] १. फैलनेवाला। प्रसरणशील। २. विसर्पण करनेवाला। रेंगनेवाला [को०]।

विसृष्ट (१)
वि० [सं०] १. जिसकी सृष्टि या रचना विशेष प्रकार से हुई हो। विशेष रूप से बनाया हुआ। २. फेंका हुआ। ३. त्यागा हुआ। छोड़ा हुआ। ढलकाया या टपकाया हुआ। ४. भेजा हुआ। ५. उत्पन्न। निःसृत (को०)। ६. जो कार्यभार से मुक्त किया गया हो (को०)। ७. दिया हुआ। प्रदत्त (को०)।

विसृष्ट (२)
संज्ञा पुं० विसर्ग जो इस प्रकार लिखा जाता है (?)।

विसृष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. निर्माण। रचना। २. प्रेषण। भेजना। ३. परित्याग। ४. दान। प्रदान। ५. निषेक। स्त्राव। क्षरण (शुक्र का)। ६. संतान। संतति [को०]।

विसेस †
संज्ञा पुं० [सं० विशेष] दे० 'विशेष'। उ०—तब प्रभुत की विसेस कृपा जाननी।—दो सौ बावन०, पृ० १५५।

विसेसन पु
संज्ञा पुं० [सं० विशेषण] दे० 'विशेषण'। उ०—होत विसे- सन में बहुत, समझहु कबि कुल कांत।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ५३५।

विसोंटा †
संज्ञा पुं० [सं० वासक] अड़ूसा।

विसोढ
वि० [सं०] जो सह्य हो। सहन किया हुआ [को०]।

विसोम
वि० [सं०] चंद्रहीन (रात्रि)। चंद्रमा से रहित [को०]।

विसौख्य
संज्ञा पुं० [सं०] सुख न होना। सौख्य का अभाव। कष्ट। पीड़ा। दुःख [को०]।

विस्खलित
वि० [सं०] १. भटका हुआ। २. ठीक तरह से न निकला हुआ। लड़खड़ाता हुआ (स्वर)। ३. त्रुटिपूर्ण। गलत। ४. गिरा हुआ। पातत। च्युत [को०]।

विस्त
संज्ञा पुं० [सं०] १. सोना। २. एक प्रकार का परिमाण जो एक कर्ष के बराबर होता है। ३. ८० रत्ती।

विस्तज
संज्ञा पुं० [सं०] कुंदुरु।

विस्तर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रसार। फैलाव। दे० 'विस्तार'। २. प्रेम। ३. समूह। ४. आसन। ५. संख्या। ६. आधार। ७. शिव का एक नाम। ८. विवरण (को०)।

विस्तर (२)
वि० बहुत। अधिक। विशेष।

विस्तरता
संज्ञा स्त्री० [सं०] बहुत या अधिक होने का भाव।

विस्तार
संज्ञा पुं० [सं०] १. लंबे या चौड़े होने का भाव। फैले होने का भाव। फैलाव। जैसे—(क) इस मकान का विस्तार कम है। (ख) तुम बातों का बहुत अधिक विस्तार करते हो। २. पेड़ की शाखा। ३. गुच्छा। ४. शिव का एक नाम। ५. विष्णु का एक नाम। ६. विवरण। पूरा ब्यौरा (को०)। ७. वृत्त का व्यास (को०)। ८. झाड़ी (को०)।

विस्तारण
संज्ञा पुं० [सं०] फैलाने की क्रिया [को०]।

विस्तारता
संज्ञा स्त्री० [सं०] विस्तार का भाव। फैलाव।

विस्तारना पु
क्रि० स० [सं० विस्तरण] फैलाना। विस्तृत या व्याप्त करना।

विस्तारिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] संगीत को एक श्रुति [को०]।

विस्तारित
वि० [सं०] विस्तृत किया हुआ। फैलाया हुआ। बढ़ाया हुआ [को०]।

विस्तारी
संज्ञा पुं० [सं० विस्तारिन्] १. वह जिसका विस्तार अधिक हो। बड़ा। विशाल। २. वह जिसकी शक्ति अधिक हो। ३. बरगद। वड़।

विस्तीर्ण
वि० [सं०] १. जो दूर तक फैला हुआ हो। विस्तृत। २. विशाल। बहुत बड़ा। ३. विपुल। बहुत अधिक।

विस्तीर्णकर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] हाथी।

विस्तीर्णजानु
संज्ञा स्त्री० [सं०] टेढ़े पैरोंवाली लड़की। प्रगतजानु कन्या, जिसे विवाह के अयोग्य कहा गया है [को०]।

विस्तीर्णता
संज्ञा स्त्री० [सं०] विस्तीर्ण होने का भाव। विस्तार। फलाव। उ०—क्षितिज की विस्तीर्णता का पवन अंचल हिल गया है।—क्वासि, पृ० १००।

विस्तीर्णपर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] मानकंद।

विस्तीर्णभेद
संज्ञा पुं० [सं] ललितविस्तर के अनुसार एक बुद्ध का नाम।

विस्तुर †
वि० [देश०] दूर। ओझल। बिहतुर। उ०—एको रोंवा बिस्तुर होइ है, धीर धीर मुगरिन्ह पीटो।—संत० दरिया, पृ० १२६।

विस्तृत
वि० [सं०] १. जो अधिक दूर एक फैला हुआ हो। लंबा- चौड़ा। विस्तारवाला। जेसे, वहाँ आप लोगों के लिये बहुत विस्तृत स्थान है। २. यथेष्ट विवरणवाला। जिसके सब अंग या सब बातें बतलाई गई हों। जैसे०—इस ग्रंथ में नाटक के स्वरूप का बहुत विस्तृत वर्णन है। ३. बहुत बड़ा या लबा चौड़ा। विशाल। ४. बढ़ा हुआ। विकसित (को०)। ५. प्रचुर। आधिक (को०)। ६. व्याप्त (को०)।

विस्तृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. फैलाव। विस्तार। २. व्याप्ति। ३. लंबाई, चौड़ाई और ऊँचाई या गहराई। ४. बृत्त का व्यास।

विस्थान
वि० [सं०] १. दूसरे से संबंध रखनेवाला। २. अन्य स्थान से संबद्ध। अन्य लिंग का। जैसे, वर्ण या ध्वनि [को०]।

विस्थापन
संज्ञा पुं० [सं०] दूसरे स्थान पर के जाने की क्रिया [को०]।

विस्थापित
वि० [सं०] दूसरे स्थान से लाकर बसाया गया। उ०— विस्थापित है, हम धरती के विस्था पत हैं।—रजत०, पृ० २८। २. जिन्हें उत्पीड़ित कर धर द्वार से रहित कर दिया गया हो।

विस्नु पु
संज्ञा पुं० [सं० विष्णु] दे० 'विष्णु'। उ०—विस्नु, नराइन, नरपती, वनम लो हरि स्याँम।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ४५४।

विस्पंद
संज्ञा पुं० [सं० विस्पन्द] १. धड़कन। २. एक प्रकार का व्यंजन। ३. बुँद। कण [को०]।

विस्पष्ट
वि० [सं०] १. सोधा। साफ। सुबोध। २. प्रकट। स्फुट। पुत्यक्ष। खुला हुआ [को०]।

विस्फार
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० विस्फारित] १. धनुष की टंकार। कमान का शब्द। २. धनुष की डोरी। ज्या। ३. विस्तार। फैलाव। ४. स्फूर्ति। तेजी। ५. विकास। ६. काँपना। बार बार हिलना।

विस्फारक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का सन्निपात ज्वर जो बहुत ही भयंकर होता है और जिसमें रोगी को खाँसी, मूर्छा, मोह और कंप आदि होता है।

विस्फारण
संज्ञा पुं० [सं०] १. खोलना। २. प्रसारित करना या फैलाना (पंख) [को०]।

विस्फारित (१)
वि० [सं०] १. खोला हुआ। फैलाया हुआ। २. फैला हुआ या फाड़ा हुआ। जैसे, विस्फारित नेत्र। ३. प्रकट किया हुआ। ४. जिसे कँपाया गया हो। जिसमें थरथराहट पैदा को गई हो। ५. काँपता हुआ। कंपमान। थरथराता हुआ। ६. टंकारयुक्त [को०]।

विस्फारित (२)
संज्ञा पुं० धनुष चढ़ाना या वाण चलाना [को०]।

विस्फीत
वि० [सं०] अधिक। प्रचुर। बहुत ज्यादा [को०]।

विस्फुट
वि० [सं०] १. सुस्पष्ट। खुला हुआ। व्यक्त। प्रकट किया हुआ। २. विकसित। खिला हुआ [को०]।

विस्फुटित
वि० [सं०] दे० 'विस्फुट'।

विस्फुर
वि० [सं०] चपल नेत्रवाला। खुली आँखोंवाला [को०]।

विस्फुरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. कंपन। २. कौंधना। (बिजली का)। ३. फड़कना। उ०—ठहर गए नृप वहीं विटप की छाँह में। हुआ विस्फुरण शकुन रूप धर बाँह में।—शकुं० पृ० ४७।

विस्फुरणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] तेंदुआ या तिंदुक नामक वृक्ष।

विस्फुरित
वि० [सं०] १. कपित। काँपता हुआ। २. फड़कता हुआ। विस्तारित। चंचल। जैसे, विस्फुरित नेत्र। ३. विकसित। फूला हुआ [को०]।

विस्फुलिंग
संज्ञा पुं० [सं० विस्फुल्लिङ्ग] १. एक प्रकार का विष। २. आग की चिनगारी। अग्निकण। उ० विस्फुलिंग से जग दुख तजि तव बिरह अगिन तन ताचौं।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ५३९।

विस्फुलिंङ्गक
वि० [सं० विस्फुलिङ्गक] दीप्तिमान। चमकीला [को०]।

विस्फूर्ज
संज्ञा पुं० [सं०] गर्जन। कड़क [को०]।

विस्फूर्जथु
संज्ञा पुं० [सं०] १. दहाड़ना। गरजना। कड़कना। २. बादल की गरज। बिजली की कड़क। ३. वज्रपात जैसा आकस्मिक आघात। ४. लहरों का आंदोलित होना या उठना गिरना [को०]।

विस्फूर्जन
संज्ञा पुं० [सं०] १. पदार्थ का फैलना या बढ़ना। विकास। २. गर्जन। कड़क।

विस्फर्जनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] तेदुआ या तिंदुक नामक वृक्ष।

विस्फूर्जित (१)
वि० [सं०] १. प्रस्फुटित। २. गरजता हुआ। शब्दाय- मान। ३. प्रसारित। फैलाया हुआ। ४. क्षुब्ध। कपित [को०]।

विस्फूर्जित (२)
संज्ञा पुं० १. दहाड़। चीत्कार। २. धूर्णन। परिभ्रमण। ३. फल। परिणाम। ४. वायु का वेग। ५. संकोच। भौहों का सिकोड़ना। ६. स्फुटन [को०]।

विस्फोट
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी पदार्थ का गरमी आदि के कारण उबल या फूट पड़ना। जैसे,—ज्वालामुखी पर्वत का विस्फोट। उ०—क्षुब्ध नक्र जैसे पानी में पर्वत में जैसेविस्फोट। अरि समूह में विभु वैसे ही करते थे चोटों पर चोट।—साकेत, पृ० ३९४। २. कोई जहरीला और बहुत खराब फोड़ा। ३. विस्फोटक रोग। चेचक (को०)।

विस्फोटक
संज्ञा पुं० [सं०] १. फोड़ा, विशेषतः जहरीला फोड़ा। २. वह पदार्थ जो गरमी या आघात के कारण भभक उठे। भभकनेवाला पदार्थ। ३. शीतला का रोग। चेचक। उ०— डाक्टर और विद्वान् इसी विस्फोटक के नाश का उपाय टीका लगाना आदि कहेंगे।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० ४७९। ४. एक प्रकार का कुष्ठ (को०)।

विस्फोटन
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी पदार्थ का उबाल आदि के कारण फूट बहना। २. जोरों का शब्द।

विस्फोटिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] पादस्फोट। विपादिका [को०]।

विस्पोटित
वि० [सं० विस्फुटित] गर्जन के साथ फूटा हुआ। विस्फोट- युक्त। उ०—सुनता हुँ जब, विस्फोटित है चहुँ ओक भयंकर महा नाश।—दैनिकी, पृ० २५।

विस्मयंकर
वि० [सं० विस्मयङ्कर] आश्चर्य में डालनेवाला [को०]।

विस्मयंगम
वि० [सं० विस्मयङ्गम] आश्चर्यजनक [को०]।

विस्मय (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. आश्चर्य। ताज्जुब। २. साहित्य में अदभुत रस का एक स्यायी भाव जो अनेक प्रकार के अलौकिक और विलक्षण पदार्थी के वर्णन के कारण मन में उत्पन्न होता है। ३. अभिमान। गर्व। शेखी। ४. ऊहापोह। संदेह। शक। यौ०—विस्मयकर, विस्मयकारी=आश्चर्यजनक। विस्मयपद= आश्चर्य का भाजन। जिससे विस्मय हो। आश्चर्य का विषय।

विस्मय (२)
वि० १. जिसका गर्व नष्ट या चूर्ण हो गया हो। २. जो गर्वयुक्त न हो। निरभिमान।

विस्मयन
संज्ञा पुं० [सं०] आश्चर्य। ताज्जुब [को०]।

विस्मयाकुल
वि० [सं०] आश्चर्य से चकित [को०]।

विस्मयाहत
वि० [सं०] आश्चर्यचकित। आश्चर्य से आहत। दुःख मिश्रित आश्चर्य की भावना से युक्त। उ०—विस्मयाहत हो पूछा—'इस धूप में' ?—भस्मावृत०, पृ० ११।

विस्मयी
वि० [सं०] विस्मययुक्त। आश्चर्य करनेवाला। विस्मय में पड़ा हुआ।

विस्मरण
संज्ञा पुं [सं०] स्मरण न रहना। भूल जाना।

विस्मापक
वि० [सं०] आश्चर्यजनक। हैरत अंगेज [को०]।

विस्मापन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. गंधर्वनगर। २. कामदेव का एक नाम। ३. बाजीगर। जादूगर। ४. चाल। छलना। (अँ०) ट्रिक (को०)। ५. आश्चर्य पैदा करना (को०)। कोई भी आश्चर्य में डालनेवाली वस्तु (को०)।

विस्मापन (२)
वि० [वि० स्त्री० विस्मापनी] जिसे देखकर विस्मय हो। आश्चर्य उत्पन्न करनेवाला।

विस्मारक
वि० [सं०] भुला देनेवाला। विस्मरण करानेवाला।

विस्मारण
संज्ञा पुं० [सं०] लीन हो जाना। लय हो जाना। नष्ट हो जाना।

विस्मारित
वि [सं०] भुलाया हुआ। विस्मृत किया हुआ [को०]।

विस्मित (१)
वि० [सं०] १. जिसे विस्मय या आश्चर्य हुआ हो। चकित। उ०—सो मुरारीदास को देखि के नरायनदास और सब कोई विस्मित होई रहे।—दो सौ बावन०, भा० १, पृ० १००।

विस्मित (२)
संज्ञा पुं० १. एक वृत्त का नाम। २. घमंडी। अभिमानी ३. उलट पुलट। अस्तव्यस्त।

विस्मिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विस्मय। आश्चर्य। २. दे० 'विस्तरण' [को०]।

विस्मृत
वि० [सं०] जो स्मरण न हो जो याद न हो। भूला हुआ।

विस्मृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] भूल जाना। विस्मरण।

विस्मेर
वि० [दे०] भौचक्का। आश्चर्यान्वित। चकित [को०]।

विस्त्रंभ
संज्ञा पुं० [सं० विस्रम्भ] १. विश्वास। यकीन। एतबार। २. केलि के समय स्त्री पुरुष में होनेवाला झगड़ा। ३. वध। हत्या।

विस्रंभालाप
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रेमालाप। प्रेमवार्ता। २. विश्वस्त होकर बातें करना।

विस्रंभी
वि० [सं० विस्रम्भिन्] १. विश्र्वासी। विश्र्वस्त। प्रेमी। प्रणयी [को०]।

विस्त्रंस
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० विस्त्रंसा] १. नीचे गिरना। पतन। २. क्षय। शिथिलता। दूर्बलता। ३. क्षरण [को०]।

विस्रंसन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. अधःपतन। नीचे गिरना। २. बहना। टपकना। ३. खोलना या ढीला करना। ४. रेचक। दस्त लानेवाला [को०]।

विस्त्रंसन (२)
वि० १. पतनशील। २. खोलनेवाला। ढीला करनेवाला। जैसे,—नीवीविस्रंसन [को०]।

विस्रंसिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्राचीन काल का एक प्रकार का उपकरण जिससे यज्ञ में आहुति दी जाती थी।

विस्रंसी
वि० [सं० विस्रंसिन्] सरक या फिसलकर गिर जानेवाला। जैसे—हार [को०]।

विस्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. बडी़ मूली। २. मांस के जलने की गंध। चिरायँध। ३. आमगंध। कच्चे मांस की गंध।

विस्रगंध
संज्ञा पुं० [सं० विस्त्रगन्ध] १. प्याज। २. गोदंती हरताल। ३. वह जिसमें कच्चे घास की महक हो (को०)।

विस्रगंधा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. गोदंती हरताल। २. प्याज। ३. हाऊबेर। हवुषा।

विस्रगंधि
संज्ञा पुं० [सं०] गोदंती हरताल।

विस्रब्ध
वि० [सं०] दे० 'विश्रब्ध'।

विस्रव
संज्ञा पुं० [सं०] बहना। बूँद बूँद टपकना [को०]।

विस्रवण
संज्ञा पुं० [सं०] १. बहना। २. झरना। क्षरण। रसना।

विस्रसा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वृद्धावस्था। बुढ़ापा। २. अशक्तता। जर्जरता (को०)।

विस्रस्त
वि० [सं०] १. ढीला किया हुआ। २. दुर्बल। कमजोर। ३. बिखरा हुआ [को०]। यौ०—विस्रस्तचेता=उदास। खिन्न। विस्रस्तबंधन=जिसके बंधन खुल गए हों। विस्रस्तवसन=जिसके वस्त्र अस्तव्यस्त हो गए हों।

विस्रस्य
वि० [सं०] ढीला किया जाने या खोला जानेवाला [को०]।

विस्त्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. हाऊबेर। हवुषा। २. चरबी।

विस्राम पु †
संज्ञा पुं० [सं० विश्राम] दे० 'विश्राम'।

विस्त्राव
संज्ञा पुं० [सं०] १. भात का माँड़। पीच। २. बहना। दे० 'विस्त्रव' (को०)।

विस्रावण
संज्ञा पुं० [सं०] १. रक्त का बहना। २. चूना। रिसना। ३. एक प्रकार की गुड़ की शराब [को०]।

विस्रावित
वि० [सं०] बहामा हुआ [को०]।

विस्त्रुत
वि० [सं०] बहाया हुआ [को०]।

विस्त्रुत
वि० [सं०] बहा हुआ।

विस्त्रुति
संज्ञा स्त्री० [सं०] बहना। चूना। रसना।

विस्वर
वि० [सं०] १. स्वरहीन। २. बेसूरा। बेमेल (स्वर)। कर्कश। ३. कठोर।

विस्वसा पु ‡
संज्ञा पुं० [सं० विश्र्वस] दे० 'विश्र्वास'। उ०—सुन्या बात राजा हँसा खिलखिला, कहा मेरे दिल का टूटया। विस्वसा।—दक्खिनी०, पृ० ३७७।

विस्वा पु ‡
संज्ञा स्त्री० [सं० वेश्या] दे० 'वेश्या'। उ०—साधु लोग कहँ धका चुगुल कहँ किज्जिअ। बहुत प्रीति मसषरहिं दानु विस्वा कहँ दिज्जिअ।—अकबरी०, पृ० ३२२।

विस्वाद
वि० [सं०] स्वादरहित। फीका [को०]।

विस्वास †
संज्ञा पुं० [सं० विश्र्वास] दे० 'विश्र्वास'। उ०—तब वा वैष्णवन ने वाही समै दंडवत करी। तब वाके मन में विस्वास आयो।—दो सौ बावन०, भा० २, पृ० ९।

विस्साल पु
वि० [सं० विशाल] दे० 'विशाल'। उ०—मोतिन्न माल विस्साल अति हीरा पौवी सुद्धरिय। जसराज सुवन अरचे अधिक मिल्लि मारु मंगल करिय।—प० रासं, पृ० १३१।

विहंग (१)
संज्ञा पुं० [सं० विहङ्ग] १. पक्षी। चिड़िया। उ०—सुखी परेवा जगत में एकै तुही विहँग।—बिहारी (शब्द०) २. साना- मक्खी। ३. वाण। तीर। ४. मेघ। बादल। ५. चंद्रमा। ६. सूर्य। ७. एक नाग का नाम जिसका उल्लेख महाभारत में है।

विहंग (२)
वि० [सं०] आकाशगामी। आकाशचारी।

विहंगक (१)
संज्ञा पुं० [सं० विहङ्गक] छोटी चिड़िया [को०]।

विहंगक (२)
वि० आकाशचारी [को०]।

विहंगम (१)
संज्ञा पुं० [सं० विहङ्गम] १. पक्षी। चिड़िया। २. सूर्य।

विहंगम (२)
वि० आकाश में विचरण करनेवाला। उड़नेवाला [को०]।

विहंगमा
संज्ञा स्त्री० [सं० विहङ्गमा] १. सूर्य की एक प्रकार की किरण। २. ग्यारहवें मन्वंतर के देवताओं का एक गण। ३. बहँगी में की वह लकड़ी जिसके दोनों सिरों पर बोझ लटकाया जाता है।

विहंगमिका
संज्ञा स्त्री० [सं० विहङ्गमिका]दे० 'विहंगिका'।

विहंगय पु
संज्ञा पुं० [सं० विहाग] दे० 'विहागराग'। उ०—भणंत श्री विनोदयं, कल्याण केक मोदयं। खँभायची पटंगयं वगेसरी विहंगयं।—रा० रू०, पृ० ३७९।

विहंगराज
संज्ञा पुं० [सं० विहङ्राज] गरुड़।

विहंगहा
संज्ञा पुं० [सं० विहङ्गहन्] बहेलिया। चिड़ीमार।

विहंगिका
संज्ञा स्त्री० [सं० विहङ्गिका] बहँगी जिसपर कहार बोझ ढोते हैं।

विहंडण पु
वि० [सं० विखण्डन] नाश करनेवाला। उच्छेद करनेवाला। उ०—सभा सिँगार सकल कुल मड्ण। धरम सथा- पक पाप विहंडण।—सुंदर ग्रं०, भा० १, पृ० ६२।

विहंतव्य
वि० [सं० विहन्तव्य] मार डालने योग्य [को०]।

विहँड़ना पु
क्रि० स० [सं० विखण्डन, प्रा० विहंड्ण] १. नष्ट करना। २. खंडन करना। मार डालना। ३. मथना। अस्तव्यस्त करना। हिड़ोरना [को०]।

विहँसना
क्रि० अ० [सं० विहसन] दिल खोलकर हँसना। उच्च स्वर से हँसना।

विह
संज्ञा पुं० [सं०] अकाश। गगन। (समस्त पद के प्रांरभ में प्रयुक्त। जैसे, विहग) [को०]।

विहग
संज्ञा पुं० [सं०] १. पक्षी। चिड़िया। उ०—उ०—पाहन पशु विटप विहग अपने कर लीन्हें। महाराज दशरथ के रंकराव कीन्हें।—तुलसी (शब्द०)। २. वाण। तीर। ३. सूर्य। ४. चंद्रमा। ५. ग्रह। ६. बादल (को०)। ७. ग्रहों की एक विशेष अवस्थिति (को०)। यौं०—विहगपति = पक्षियों का स्वामी। गरुड़। विहगराज = गरुड़ । विहगवेग = (१) पक्षियों के समान वेग या गतिवाला (२) एक विद्याधर का नाम [को०]।

विहगेंद्र
संज्ञा पुं० [सं० विहगेन्द्र] गरुड़ [को०]।

विहगेश्वर
संज्ञा पुं० [सं०] गरुड़।

विहड पु
संज्ञा पुं० [सं० विकट] विकट या ऊँची नीची भूमि। बेहड़। उ०—जमुन विहड बर विकट हक्क बज्जिय चावद्दिसि।—पृ० रा०, ५५।१२७।

विहत्
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बाँझ गाय। बंध्या गौ। २. गर्भघातिनी गौ [को०]।

विहत (१)
वि० [सं०] १. बधित। काटा हुआ। मारा हुआ। २. चुटीला। आहत। ३. प्रतिरुद्ध। ४. विदीर्ण [को०]।

विहत (२)
संज्ञा पुं० जैन मंदिर [को०]।

विहति (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वध। २. चोट। आघात। ३. प्रतिरोध। निवारण। ४. पराजय। ५. असफलता। विफलता। ६. असंहत करना। भगा देना [को०]।

विहति
संज्ञा पुं० [सं०] सखा। मित्र। दोस्त [को०]।

विहनन
संज्ञा पुं० [सं०] १. हत्या करना। वध। तोट। २. क्षति। ३. रुकावट डालना। अवरोध। अड़चन। ४. धुनिया की धुनकी (को०)।

विहर
संज्ञा पुं० [सं०] १. वियोग। बिछोह। २. दे० 'विहार'।

विहरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. विहार करने की क्रिया। चलना। फिरना। घूमना। २. वियोग। बिछोह। ३. खोलना। फैलाना। ४. दूर करना। ले जाना। अपहरण करना (को०)। ५. आमोद प्रमोद। मनोरंजन (को०)। ६. बाहर जाना। निकल जाना (को०)।

विहरना पु
क्रि० अ० [सं० विहरण] विहार करना।

विहर्ता
संज्ञा पुं० [सं० विहर्तृ] १. दस्यु। लुटेरा। २. इधर उधर धूमने या विहार करनेवाला व्यक्ति। घुमक्कड़। मौजी [को०]।

विहर्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १. विशेष हर्ष। उल्लास। २. हर्षरहित व्यक्ति [को०]।

विहव
संज्ञा पुं० [सं०] १. यज्ञ। २. युद्ध। लड़ाई।

विहसतिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्मित। मृसकान [को०]।

विहसन
संज्ञा पुं० [सं०] मीठी हँसी। मुस्कान [को०]।

विहसित
संज्ञा पुं० [सं०] वह हास्य, जो न बहुत उच्च हो, न बहुत मधुर। मध्यम हास्य।

विहसित
वि० १. हँसता हुआ। मुस्कराता हुआ। २. जिसपर हँसा जाय [को०]।

विहस्त (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १ पंडित। विद्वान्। २. क्लीब। नपुंसक (को०)।

विहस्त (२)
वि० १. घबराया हुआ। व्याकुल। २. जिसका हाथ टूटा हुआ हो। ३. कार्य करने में अशक्त। अक्षम (को०)। ४. निपुण। चतुर। कुशल (को०)। ५. बुद्धिमान। शिक्षित (को०)।

विहस्तित
वि० [सं०] व्याकुल। घबड़ाया हुआ [को०]।

विहाँगड़ा पु
संज्ञा पुं० [सं० विहंग + ड़ा (प्रत्य०)] दे० 'विहंग'।—ढोला०, पृ० ४९५।

विहाँण पु
संज्ञा पुं० [देश० या सं० विभानु अथवा हिं० विहान]दे० 'विहान'। उ०—ढाढी गाया निसह भरि सुणियउ साल्ह सुजाँण। ओछइ पाणी मच्छ ज्यँउ, बेलत थयड विहाँण।—ढोला०, दू० १९२।

विहाँणी †
संज्ञा स्त्री० [सं० विहाना (छोड़ना)] वह जो गुजरी या व्यतीत हुई हो। वारदात। घटना। उ०—हाजर बुलाए साह सुण दूत वाँणी। देखत ही फुरमाया कहो सो बिहाँणी।— रा० रू०, पृ० ११०।

विहा
अव्य० [सं०] स्वर्ग।

विहाई †
संज्ञा पुं० [सं० विहायस्>विहाय (= आकाश)] आकाश। व्योम। अनंत। उ०—माप का विहाई सा, प्रतप्त का निदान।—रा० रू०, पृ० ९७।

विहाग
संज्ञा पुं० [सं० विभाग] १. एक राग। दे० 'बिहाग' (यह वियोग का राग है)। २. वियोग। जुदाई। बिछोह। (लाक्ष०)। उ०—तू अबतक सोई है आली आँखों में भरे विहाग री।— लहर, पृ० १९।

विहान
संज्ञा पुं० [सं०] प्रातःकाल। सबेरा। भोर [को०]।

विहापित (१)
वि० [सं०] त्यक्त करने या देने के लिये प्रेरित किया हुआ [को०]।

विहापित (२)
संज्ञा पुं० दान। त्याग [को०]।

विहाय (१)
संज्ञा पुं० [सं० विहायस्]दे० 'विहायस' [को०]।

विहाय (२)
अव्य० [सं०] दे० 'विना'।

विहायगति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आकाश में चलने की क्रिया या शक्ति (जैन)।

विहायस्, विहायस
संज्ञा पुं० [सं०] १. आकाश। व्योम। २. दान। ३. पक्षी। चिड़िया।

विहार
संज्ञा पुं० [सं०] १. मनबहलाव के लिए धीरे धीरे चलना। टहलना। धूमना। फिरना। २. रतिक्रीड़ा। संभोग। ३. रतिक्रीड़ा करने का स्थान। ४. बौद्ध वा जैन श्रमणों के रहने का मठ। संघाराम। ५. दूर करना। हटाना (को०)। क्रीड़ा। खेल (को०)। ६. गतिशीलता। गतिमयता। जैसे, चरणविहार, पाणिविहार (को०)। ७. उद्यान। उपवन। क्रीड़ोंद्यान (को०)। ८. स्कंध। कंधा (को०)। ९. देवालय। मंदिर (को०)। १०. इंद्र का प्रासाद (को०)। ११. इंद्र की ध्वजा। वैजयंत (को०)। १२. महल। प्रासाद (को०)। १३. एक प्रकार का पक्षी। बिंदुरेखक पक्षी (को०)। १४. मीमांसकों के अनुसार अग्नित्रय—गाईपत्य आहवनीय और दक्षिणाग्नि (को०)। १५. यजमान का गृह (को०)। १६. विस्तार। प्रसार (को०)। १७. वागिंद्रिय का प्रसार (को०)। १८. मगध का एक नाम। आधुनिक बिहार प्रदेश (को०)। यो०—विहारगृह = क्रीड़ाभवन। विहारदेश = मनोरंजन का स्थान। विहारदासी = सन्यासिनी। भिक्षुणी। विहारभूमि = (१) मनोरंजन का स्थान। (२) चरागाह। विहारवन = क्रीड़ोद्यान। विहारवापी = क्रीड़ा के लिये बना हुआ। तालाब। विहार- स्थली = क्रीड़ाभूमि।

विहारक
वि० [सं०] १. विहार करनेवाला विहरणशील। २. विहार या बौद्ध मठ संबंधी [को०]।

विहारण
संज्ञा पुं० [सं०] आमोद प्रमोद [को०]।

विहारवान्
वि० [सं० विहारवत्] विहार करनेवाला [को०]।

विहारिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] संघाराम। विहार [को०]।

विहारी
संज्ञा पुं० [सं० विहारिन्] १. वह जो विहार करता हो। विहार करनेवाला। २. श्रीकृष्ण का एक नाम। ३. विस्तार- शील। फैलनेवाला (को०)। ४. मनोरम। सुंदर (को०)।

विहारया पु †
संज्ञा पुं० [सं० व्यवहार]दे० 'व्योहरिया'। उ०— हाट विहारया कइ जोवज्यो, कई जोवज्यो राजदुवारि।— बी० रासो०, पृ० ७८।

विहावणी †
वि० स्त्री० [सं० √ भी, प्रा० बिह + हिं० आवनी (प्रत्य०)] भयावना। भयंकर। उ०—सुणि तूँ मनारे मूरखि मूठ विचार। आवै लहरि विहावणी दमैं देह अपार।—दादू०, पृ० ५८६।

विहास
संज्ञा पुं० [सं०] स्मित। मुसकान [को०]।

विहिंसक
वि० [सं०] हानि पहुँचानेवाला। हिंसक [को०]।

विहिंसन
संज्ञा पुं० [सं०] हानि करना। कष्ट देना। [को०]।

विहिंस्त्र
वि० [सं०] क्षति या हानि करनेवाला। विहिंसक [को०]।

विहित (१)
—वि० [सं०] १. जिसका विधान किया गया हो। जैसे,— यह कार्य शास्त्रविहित है। २. किया हुआ। ३. दिया हुआ। ४. क्रमबद्ध। स्थिर किया हुआ। निर्धारित। नियोजित (को०)। ५. निर्मित। संरचित (को०)। ६. रखा हुआ। जमा किया हुआ। (को०)। ७. सुसज्जित। संपन्न (को०)। ८. करणीय। करने योग्य (को०)। ९. विभक्त। विभाजित (को०)।

विहित (२)
संज्ञा पुं० [सं०] आदेश। आज्ञा।

विहिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कोई काम करने को आज्ञा। विधान। २. अनुष्ठान। क्रिया कर्म (को०)। ३. व्यवस्था (को०)।

विहीन
वि० [सं०] १. रहित। बगैर। बिना। २. त्यागा हुआ। छोड़ा हुआ। ३. अधम। नीच (को०)। यौ०—विहीनजाति, विहोनयोनि, विहीनवर्ण = नीच जातिवाला।

विहीनता
संज्ञा स्त्री० [सं०] विहीन होने का भाव या धर्म।

विहीनर
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्राचीन ऋषि का नाम।

विहीनित
वि० [सं०] वचित। रहित।

विहुंडन
संज्ञा पुं० [सं० विहुण्डन] शिव के एक अनुचर का नाम।

विहूण, विहून पु
वि० [सं० विहीन] [वि० स्त्री० विहूणी, विहूती] रहित। वंचित। विहीन। उ०—इसो चरित तिहाँ अति घणउ, साँड़ विहूणी व्यावइ छइ गाई।—बी० रासो, पृ० ७९।

विहृत (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. साहित्य में स्त्रियों के दस प्रकार के स्वाभाविक अलंकारों में से एक प्रकार का अलंकार। २. क्रीड़ा खेल (को०)। ३. टहलना। घूमना। सैर (को०)। ४. हिचकि- चाहटण। झिझक (को०)।

विहृत (२)
वि० १. खिला हुआ। क्रिड़ित। २. फैलाया हुआ। ३. हटाया हुआ। दूर किया हुआ। ४. वितरित। विभक्त [को०]।

विहृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जबरदस्ती या बलपूर्वक कुछ ले लेता या कोई काम करना। २. विहार। क्रिड़ा। ३. खालने की क्रिया। प्रसार। फैलाव (को०)।

विहेठ
संज्ञा पुं० [सं०] १. क्षति। पीडा। दुःख। २. सताना उत्पी- ड़न [को०]।

विहेठक
वि० [सं०] १. उत्पीड़क। सतानेवाला। २. बुराई करनेवाला। र्निदक [को०]।

विहेठन
संज्ञा पुं० [सं०] हानि करना। क्षति पहुँचाना। पेषण। पीसना। २. रगड़ना। ३. उत्पीड़न। पीड़ा। कष्ट। सताना। उत्पीड़न करना [को०]।

विह्वल
वि० [सं०] १. १ भय या इसी प्रकार के मनोवेग के कारण जिसका चित्त ठिकाने न हो। घबराया हुआ। अशांत। क्षुब्ध। व्याकुल। २. डरा हुआ। भय में अभिभूत (को०)। ३. उन्नत्त। जो आपे से बाहर हो (को०)। ४. पीड़ाग्रस्त। कष्ट में पड़ा हुआ (को०)। ५. विषादयुक्त। हतोत्साह। हताश (को०)। ६. द्रवित। तरल। पिघला हुआ (को०)। यौ०—विह्वलचेतन, विह्वलचेता = व्याकुल। विह्वलतनु = शिथिल शरीरवाला। विह्वलद्दष्टि, विह्वलनेत्र, विह्वललोचन = अस्थिर द्दष्टिवाला। जिसकी द्दष्टि चंचल हो।

विह्नलता
संज्ञा स्त्री० [सं०] विह्वल होने री क्रिया या भाव। व्याकु- लता। घबराहट। चिंता। परीशानी।

विह्नलत्व
संज्ञा पुं० [सं०]दे० 'विह्वलता'।

विह्वलित
वि० [सं०] विह्वलतायुक्त। विह्वल [को०]। यौ०—विह्नलितद्दष्टि = दे० 'विह्वल द्दष्ट'। विह्वलित सर्वांग = व्याकुल शरीरवाला। अत्यंत क्षुब्ध। विह्वलितांग = पीड़ित अंगों या अवयवोंवाला।

विह्वली
संज्ञा पुं० [सं० विह्वलिन्] वह जो विह्वल हो गया हो। वह जो बहुत धबरा गया हो।