विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/द

विक्षनरी से
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संस्कृत या हिंदी वर्णमाला में अठारहवाँ व्यंजन जो तवर्ग का तीसरा वर्ण है । इसका उच्चारण स्थान दंतमूल है; दंतमूल में जिह्वा के अगले भाग के स्पर्श से इसका उच्चारण होता है । यह अल्पप्राण है और इसमें संवार, नाद और घोष नामक बाह्य प्रयत्न हैं ।

दंग (१)
वि० [फा़०] विस्मित । चकित । आश्चर्यान्वित । स्तब्ध । हक्का बक्का । क्रि० प्र०—रह जाना ।—होना ।

दंग (२)
संज्ञा पुं० १. घबराहट । भय । उ०—जब रंथ साजि चढ़ौ रण सम्मुख जीय न आनो दंग । राघव सेन समेत सँधारों करौ रुधिरमय अंग ।—सूर (शब्द०) । २. दे० 'दंगा' ।

दंगा † (३)
संज्ञा पुं० [देश०] अग्निकरण । उ०—इक राह चाह लागौ असुर निरसहाय प्राकार नव । अवरंग प्रथी पर उलटियौ, दंग प्रगटयो जाम दव ।—रा० रू०, पृ० २० ।

दंगई
वि० [हिं० दंगा + ई (प्रत्य०)] १. दंगा करनेवाला । उपद्रवी लड़ाका । झगड़ालू । २. प्रचँड । उग्र । ३. दंगली । बहुत लंबा । लंबा चौड़ा । भारी ।

दंगल
संज्ञा पुं० [फा़०] १. मल्लों का युद्ध । पहलवानों की वह कुश्ती जो जोड़ बदकर हो और जिसमें जीतनेवाले को इनाम आदि मिले । २. अखाड़ा । मल्लयुद्ध का स्थान । मुहा०—दंगल में उतरना = कुश्ती लड़ने के लिये अखाड़े में आना । ३. जमावड़ा । समूह । समाज । दल । उ०—सावन नित संतन के घर में, रति मति सियवर में । नित वसंत नित होरी मंगल, जैसी बस्ती तौसोई जंगल, दल बादल से जिनके दंगल पगे रटे की झर में ।—देवस्वामी (शब्द०) । क्रि० प्र०—जमाना ।—बाँधना । ४. बहुत मोटा गद्दा या तोशक । उ०—(क) अहलकार हाथ घोकर सामने बैठे जाते थे, वह दंगल पर रहता था, खाना एक बड़ी सी कुरसी पर चुना जाता था ।—शिवप्रसाद (शब्द०) । (ख) बावर्ची जब छुट्टी पाता हो...किसी बड़े दंगल पर पाँव फैला कर लंबा पड़ जाता ।—शिवप्रसाद (शब्द०) ।

दंगली
वि० [फा़० दंगल] १. युद्ध करनेवाला । लड़ाका । प्रलयंकर । उ०—भूषन भनत तेरी खरगऊ दंगली ।—भूषण ग्रं०, पृ० ४५ । २. दंगल में कुश्ती लड़नेवाला । दंगल जीतनेवाला ।

दंगवारा
संज्ञा पुं० [हिं० दंगल + वारा] वह सहायता जो किसी गाँव के किसान एक दूसरे को हल बौल आदि देकर देते हैं । जिता । हरसीत ।

दंगा
संज्ञा पुं० [फा़० दंगल] १. झगड़ा । बखेड़ा । उपद्रव । उ०— खेलन लाग बालकन संगा । जब तब करिय सखन दते दंगा ।— विश्राम । (शब्द०) । क्रि० प्र०—करना ।—होना ।यौ०—दंगा फसाद । २. गुल गपाड़ा । हुल्लड़ । शोर । गुल । उ०—शीश पर गंगा हँसे भुजन भुजंगा हँसैं हाँस ही को दंगा भयो नंगा के विवाह में ।—पद्माकर (शब्द०) ।

दंगाई
वि० [हिं० दंगा] दे० 'दंगई' ।

दंगैत
वि० [हिं० दंगा + एत या येत (प्रत्य०)] १. दंगा करनेवाला । उपद्रवी । २. बागी । बलवाई ।

दंड
संज्ञा पुं० [सं० दण्ड] १. डंडा । सोंटा । लाठी । विशेष—स्मृतियों में आश्रय और वर्ण के अनुसार दंड धारण करने की व्यवस्था है । उपनयन संस्कार के समय मेखला आदि के साथ ब्रह्मचारी को दंड भी धारण कराया जाता है । प्रत्येक वर्ण के ब्रह्मचारी के लिये भिन्न भिन्न प्रकार के दंडों की व्यवस्था है । ब्राह्मण को बेल या पलाश का दंड केशाँत तक ऊँचा, क्षत्रिय को बरगद या खैर का दंड ललाट तक और वैश्य को गूलर या पलाश का दंड नाक तक ऊँचा धारण करना चाहिए । गृहस्थों के लिये मनु ने बाँस का डंडा या छड़ी रखने का आदेश दिया है । संन्यासियों में कुटीचक और बहूदक को त्रिदंड (तीन दंड), हंस को एक वेणुदंड और परमंहस को भी एक दंड धारण करना चाहिए । ऐसा निर्णयसिंधु में उल्लेख है । पर किसी किसी ग्रंथ में यह भी लिखा है कि परमंहंस परम ज्ञान को पहुँचा हुआ होता है अतः उसे दंड आदि धारण करने की कोई आवश्य- कता नहीं । राजा लोग शआसन और प्रतापसूचक एक प्रकार का राजदंड धारण करते थे । मुहा०—दंड ग्रहण करना = संन्यास लेना । विरक्त या संन्यासी हो जाना । २. डंडे के आकार की कोई वस्तु । जैसे, भुजदंड, शुडादंड, वेतसडंड, इक्षठुदंड इत्यादि । ३. एक प्रकार की कसरत जो हाथ पैर के पेजों के बल औधे होकर की जाती है । क्रि० प्र०—करना ।—पेलना ।—मारना ।—लगाना । यौ०—दंडपेल । चक्रदंड । ४. भूमि पर औंधे लेटकर किया हुआ प्रणाम । दंडवत् । यौ०—दंड प्रणाम । ५. एक प्रकार व्यूह । दे० 'दंडव्यूह' । ६. किसी अपराध के प्रतिकार में अपराधी को पहुँचाई हुई पीड़ा या हानि । कोई भूल चूक या बुरा काम करनेवाले के प्रति वह कठोर व्यवहार जो उसे ठीक करने या उसके द्वार पहुँची हुई हानि को पूरा कराने के लिये किया जाय । शासन और परिशोध की व्यवस्था । सजा । तदारुक । विशेष—राज्य चलाने के लिये साम दान भेद और दंड ये चार नीतियाँ शास्त्र में कही गई हैं । अपने देश में प्रजा के शासन के लिये जिस दंडनीति का राजा आश्रय लेता है उसका विस्तृत वर्णन स्मृति ग्रंथों में हो । ऐसे दंड की तीन श्रेणियाँ मानी गई हैं—उत्तम साहस (भारी दंड, जैसे, वध, सर्वस्वहरण, देश- निकाला, अंगच्छेद इत्यादि); मध्यम साहस और प्रथम साहस । अग्निपुराण तथा अर्थशास्त्र में अन्य देशों के प्रति काम में लाई जानेवाली दंडविधि का भी उल्लेख हैं; जैसे, लुटना, आग लगाना, आघात पहुँचाना, बस्ती उजाड़ना इत्यादि । ७. अर्थदंड । वह धन जो अपराधी से किसी अपराध के कारण लिया जाय । जुरमाना । डाँड़ । क्रि० प्र०—लगाना ।—देना ।—लेना । मुहा०—दंड डालना = (१) जुरमाना करना । अर्थदंड लगाना । (२) कर लगाना । महसूल लगाना । दंड पड़ना = हानि होना । नुकसान होना । घाटा होनवा । जैसे,—घड़ी किसी काम की न निकली, उसका रुपया दंड पड़ा । दंड भरना = (१) जुरमाना देना । (२) दूसरे के नुसकान को पुरा करना । दंड भोगना या भुगताना = (१) सजा अपने ऊपर लेना । दंड सहना । (२) जान बूझकर व्यर्थ कष्ट उठाना । दंड सहना = नुकसान उठाना । घाटा सहना । विशेष—सृतियों में अर्थदंड की भी तीन श्रेणियाँ हैं,—प्रथम साहस ढाई सी पण तक; मध्यम साहस पाँच सौ पण तक और उत्तम साहस एक हजार पण तक । ८. दमन । शासन । वश । शमन । विशेष—संन्यासियों के लिये तीन प्रकार के दंड रखे गए हैं,— (१) वाग्दंड—वाणी को वश में रखना; (२) मनोदंड—मन को चंचल न होने देना, अधिकार में रखना और (३) कायदंड—शरीर को कष्ट का अभ्यास कराना । संन्यासियों का त्रिददंड इन्हीं तीन दंड़ों का सूरचक चिह्न है । ९. ध्वजा या पताका का बाँस । १०. तराजू की डंडी । डाँडी । ११. मथानी । १२. किसी वस्तु (जैरे, करछी, चम्मच आदि) की डंडी । १३. हल की लंबी लकड़ी । हल में लगनेवाली लंबी लकड़ी । हरिस । १४. जहाज या नाव का मस्तूल । १५. एक योग का नाम । १६. लंबाई की एक माप जो चार हाथ की होती थी । १७. हरिवंश पुराण के अनुसार इक्ष्वाकु राजा के सौ पुत्रों में से एक जिनके नाम के कारण दंडकारण्य नाम पड़ा । वि० दे० 'दंडक'—४ । १८. कुबेर के एक पुत्र का नाम । १९. (दंड देनेवाला) । यम । २०. विष्णु । २१. शिव । २२. सेना । फौज । २३. अश्व । घोड़ा । २४. साठ पल का काल । चौबीस मिनट का समय । २५. वह आँगन जिसके पूर्व और उत्तर कोठरियाँ हों । २६. सूर्य का एक पार्श्वचर । सूर्य का एक अनुचर (को०) । २७. गर्व । घमंड । अभिमान (को०) । २८. वाद्य बजाने की एक प्रकार की लकड़ी (को०) । २९. कमल की नास । जैसे, कमलदंड । ३१ राजा के हाथ का दंड जो शासन का प्रतीक होता है (को०) । ३२ डाँड़ । पतवार (को०) ।

दंडऋण
संज्ञा पुं० [सं० दण्डऋण] वह ऋण जो सरकारी जुरमाना देने के लिये लिया गया हो ।

दंडकंदक
संज्ञा [सं० दण्डकन्दक] धरणी कंद । सेमर का मुसला ।

दंडक
संज्ञा पुं० [सं० दण्डक] १. डंडा । २. दंड देनेवाला पुरुष । शासक । ३. छंदों का एक वर्ग । वह छंद जिसमें वर्णों की संख्या २६ से अधिक हो । विशेष—दंडक दो प्रकार का होता है, एक गणात्मक, दूसरा मुक्तक । गणात्मक वह है जिसमें गणों का बंधन होता है अर्थात् किस गण के उपरांत फिर कौन सा गण आना चाहिए, इसका नियम होता है । जैसे, कुसुमस्तक, त्रिभंगी, नीलचक्र इत्यादि । उ०—(नीलचक्र) । जानि कै समै भवाल, रामराज साज साजि ता समै अकाज काज कैकई जु कीन । भूप तें हराय बैन राम सीय बंधु युक्त बोलिकै पठाय बेगि कानन सुदीन ।—(शब्द०) । मुक्तक वह है जिसमें केवल अक्षरों की गिनती होती है अर्थात् जो गणों के बंधन से युक्त होता है । किसी किसी में कहीं कहीं लघु गुरु का नियम होता है । हिंदी काव्य में जो कवित्त (मनहर) और घनाक्षरी छंद अधिक व्यवहत हुए हैं वे इसी मुक्तक के अंतर्गत हैं । उ०—(मनहर कवित्त) । आनँद के कंद जग ज्यावन जगतबंद दशरथनंद के निबाहेई निबहिए । कहै पद्माकर पवित्र पन पालिबे कों चोरे, चक्रपाणि के चरित्रन कों चहिए ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० २३८ । ४. इक्ष्वाकु राजा के पुत्र का नाम । विशेष—ये शुक्राचार्य के शिष्य थे । इन्होंने एक बार गुरु की कन्या का कौमार्य भंग किया । इसपर शुक्राचार्य ने शाप देकर इन्हें इनके पुर के सहित भस्म कर दिया । इनका देश जंगल हो गया और दंडकारण्य कहलाने लगा । ५. दंडकारण्य । ६. एक प्रकार का वातरोग जिसमें हाथ, पैर, पीठ, कमर आदि अंग स्तब्ध होकर एंठ से जाते हैं । ७. शुद्ध राग का एक भेद । ८. हल में लगनेवाली एक लंबी लकड़ी । हरिस (को०) ।

दंडकर्म
संज्ञा पुं० [सं० दंण्डकर्मन्] दंड देने का काम । दंड । सजा [को०] ।

दंडकल
संज्ञा पुं० [सं० दण्ड़कल] एक छंद का नाम जिसमें तीस मात्राएँ होती हैं [को०] ।

दंडकला
संज्ञा स्त्री० [सं० दण्डकला] एक छंद जिसमें १०, ८ और १४ के विराम से ३२ मात्राएँ होती हैं । इसमें जगण न आना चाहिए । जैसे—फल फूलनि ल्यावै, हरिहिं सुनावै, है या लायक भोगन की । अरु सब गुन पूरी, स्वादन रूरी, हरनि अनेकन रोगन की ।

दंडका
संज्ञा स्त्री० [सं० दण्डका] दंडक वन । दंडकारण्य [को०] ।

दंडकाक
संज्ञा पुं० [सं० दण्डाकाक] काला और बड़े आकारवाला कौआ । डोम कौआ [को०] ।

दंडकारण्य
संज्ञा पुं० [सं० दण्डकारण्य] वह प्राचीन वन जो विंध्य पर्वत से लेकर गोदावरी के किनारे तक फैला था । इस वन में श्रीरामचंद्र वनवास के काल में बहुत दिनों तक रहे थे । यहीं शूर्पणक्षा के नाक कान कटे थे और सीताहरण हुआ था ।

दंडकी
संज्ञा स्त्री० [सं० दण्डकी] ढोलक ।

दंडखेदी
संज्ञा पुं० [सं० दण्डखेदिन्] वह मनुष्य जो राज्य से दंड पाने के कारण कष्ट में हो । दंड से दुःखी व्यक्ति । विशेष—प्राचीन काल में भिन्न भिन्न अपराधों के लिये हाथ पैर काटने, अंग जलाने आदि का दंड दिया जाता था जिसके कारण दंडित व्यक्ति बहुत दिनों तक कष्ट में रहते थे । कौटिल्य ने ऐसे व्यक्तियों के कष्ट का उपाय करने की भी व्यवस्था की थी ।

दंडगौरी
संज्ञा स्त्री० [सं० दण्डगौरी] एक अप्सरा का नाम ।

दंडग्रहण
संज्ञा पुं० [सं०दण्डग्रहण] संन्यास आश्रम जिसमें दंड ग्रहण करने का विधान हैं ।

दंडध्न
संज्ञा पुं० [सं० दण्डध्न] १. दंडे से मारनेवाला । दूसरे के शरीर पर आघात पहुँचानेवाला । २. दंड को न माननेवाला । राजा या शासन जिस दंड की व्यवस्था करे उसका भंग करनेवाला । विशेष—मनुस्मृति में लिखा है कि चोर, परस्त्रीगामी, दुष्ट वचन बोलनेवाले, साहसिक, दंडध्न इत्यादि जिस राजा के पुर में न हों वह इंद्रलोक को पाता है ।

दंडचारी
संज्ञा पुं० [सं०] १. सेनापति (कौटि०) । २. सेना का एक विभाग (को०) ।

दंडछदन
संज्ञा पुं० [सं०] वह कमरा जिसमें विभिन्न प्रकार के बर्तन रखे जाते हैं [को०] ।

दंडढक्का
संज्ञा पुं० [सं० दण्डढक्का] दमामा । नगाड़ा । धौंसा ।

दंडताम्री
संज्ञा स्त्री० [सं० दण्डताम्री] वह जलतरंग बाजा जिसमें ताँबे की कटोरियाँ काम में लाई जाती हैं ।

दंडदास
संज्ञा पुं० [सं० दण्डदास] वह जो दंड का रुपया न दे सकने के कारण दास हुआ हो । वह जो जुरेमाने का रुपया नौकरी करके चुकाता हो ।

दंडदेवकुल
संज्ञा पुं० [सं० दण्डदेवकुल] न्यायालय । अदालत [को०] ।

दंडदेवार
वि० [सं० दण्ड + हिं० देवार = देनेवाला] दंड देनेवाला । क्षमताशाली । उ०—समर सिंध मेवार दंडदेवार अजर जर । दीली पत्ति अनंग लरन अड्ढौ सुलोह लरि ।—पृ० रा०, ७ । २४ ।

दंडधर
वि० [सं० दण्डधर] डंडा रखनेवाला ।

दंडघर (२)
संज्ञा पुं० १. यमराज । २. शासनकर्ता । ३. संन्यासी । ४. छड़ी दरदार । द्वाररक्षक । उ०—जहाँ बूढे करणिक, दंडधर, कंचुकी और वाहक तत्परता से इधर उधर घूमते ।—वै० न० पृ० ६४ ।

दंडधार (१)
वि० [सं० दण्डधार] डंडा रखनेवाला ।

दंडधार (२)
संज्ञा पुं० १. यमराज । २. राजा । ३. एक राजा का नाम जो महाभरात में दुर्योधन की ओर था और अर्जुन से लड़करमारा गया था । ४. पांचालर्वंशीय एक यौद्धा जौ पांडवों की ओर से लड़ा था और कर्ण के हाथ से मारा गया था ।

दंडधारण
संज्ञा स्त्री० [सं० दण्डधारण] कौटिल्य के अनुसार वह भूमि या प्रदेश जहाँ प्रबंध और शासन के लिये सेना रखनी पड़े ।

दंडधारी
वि० संज्ञा पुं० [सं० दण्डधारिन्] दे० 'दंडधर' [को०] ।

दंडन
संज्ञा पुं० [सं० दण्डन] [वि० दंडनीय, दंडित, दडय] दंड देने की क्रिया । शासन ।

दंडना पु
क्रि० स० [सं० दण्डन] दंड देना । शासित करना । सजा देना । उ०—मुशल मुग्दर हनत, त्रिविध कर्मनि गनत, मोहि दंडत धर्मदुत हारे ।—सूर (शब्द०) ।

दंडनायक
संज्ञा पुं० [सं० दण्डनायक] १. सेनापति । २. दंड- विधान करनेवाला राजा या हाकिम । ३. सूर्य के एक अनुचर का नाम ।

दंडनीति
संज्ञा स्त्री० [सं० दण्डनीति] १. दंड देकर अर्थात् पीड़ित करके शासन में रखने की राजाओं की नीति । सेना आदि के द्वारा बलप्रयोग करने की विधि । २. दुर्गा का एक रूप (को०) ।

दंडनीय
वि० [सं० दण्डनीय] दंड देने योग्य ।

दंडनेता
संज्ञा पुं० [सं०दण्डनेतृ] १. नृप । राजा । २. यमराज । ३. हाकिम [को०] ।

दंडप
संज्ञा पुं० [सं० दण्डप] नरेश । राजा [को०] ।

दंडपांशुल
संज्ञा पुं० [सं० दण्डपांशुल] दंडधर । छड़ी बरदार । द्वारपाल [को०] ।

दंडपांसुल
संज्ञा पुं० [सं० दण्डपांसुल] दे० 'दंडपांशुल' ।

दंडपाणि
संज्ञा पुं० [सं० दण्डपाणि] १. यमराज । २. काशी में भैरव की एक मूर्ति । विशेष—काशीखंड में लिखा है कि पूर्णभद्र नामक एक यक्ष को हरिकेश नाम का एक पुत्र था जो महादेव काल बड़ा भक्त था । एक बार जब इसने घोर तप किया तब महादेव पार्वती सहित इसके पास आए और साधुओं का पालन करो । संभ्रम और उदभ्रत नाम के मेरे दो गण तुम्हारी सहायता के लिये सदा तुम्हारे पास रहेंगे । बिना तुम्हारी पूजा किए कोई काशी में मुक्ति नहीं पा सकेगा । ३. पुलिस । नगररक्षक कर्मचारी (को०) ।

दंडपात
संज्ञा पुं० [सं० दण्डपात] एक प्रकार का सन्निपात जिसमें रोगी को नींद नहीं आती और वह इधर उधर पागल की तरकह घूमता है ।

दंडपारुष्य
संज्ञा पुं० [सं० दण्डपारुष्य] १. मनुस्मृति के टीकाकार कुल्लूक भट्ट के मतानुसार दूसरे के शरीर पर हाथ, डंडे आदि से आघात करने, धूल मौला आदि फेंकना का दृष्ट कार्य । मार पीट । २. राजाओं के सात व्यसनों में से एक ।

दंडपाल
संज्ञा पुं० [सं० दण्डपाल] दे० 'दंडपालक' ।

दंडपालक
संज्ञा पुं० [सं० दण्डपालक] १. ड्योढ़ीदार । दरवान । द्वारपाल । २. एक प्रकार की मछली । दाँड़िका मछली ।

दंडपाशक
संज्ञा पुं० [सं० दण्डपाशक] १. दंड देनेवाला प्रधान कर्म- चारी । २. घातक । जल्लाद ।

दंडपाशिक
संज्ञा पुं० [सं० दण्डपाशिक] पुलिस का अधिकारी । उ०—पाल, परमार, गहड़वाल तथा प्रतिहार लेखों में पुलिस अधिकारी के लिये दांडिक, दंडपाशिक या दंडशक्ति का प्रयोग किया गया है ।—पू० म० भा०, पृ० ११० ।

दंडप्रणाम
संज्ञा पुं० [सं० दण्डप्रणाम] भूमि में डंडे के समान पड़कर प्रणाम करने की मुद्रा । दंडवत् । सादर अभिवादन । क्रि० प्र०—करना ।—होना ।

दंडप्रनाम पु
संज्ञा पुं० [सं० दण्डप्रणाम] दे० 'दंडप्रणाम' । उ०—दंडप्रनाम करत मुनि देखे । मुरतिमंत भाग्य निज लेखे ।—मानस, २ । २०५ ।

दंडबालधि
संज्ञा पुं० [सं० दण्डबालधि] हाथी ।

दंडभंग
संज्ञा पुं० [सं० दण्डभङ्ग] शासन या आदेश का उल्लंघन । दंडाज्ञा का व्यवहार न होना [को०] ।

दंडभय
संज्ञा पुं० [सं० दण्ड + भय] दंड या सजा का डर ।

दंडभृत् (१)
वि० [सं० दण्डभृत्] डंडा रखनेवाला । डंडा चलाने या घुमानेवाला ।

दंडभृत् (२)
संज्ञा पुं० १. कुम्हार । कुंभकार । २. यमराज (को०) ।

दंडमत्स्य
संज्ञा पुं० [सं० दण्डमत्स्य] एक प्रकार की मछली जो देखने में डंडे या साँप के आकार की होती हैं । बाम मछली ।

दंडमाणव
संज्ञा पुं० [सं० दण्डमाणव] दे० 'दंडमानव' ।

दंडमाथ
संज्ञा पुं० [सं० दण्डमाथ] सीधा रास्ता । प्रधान पथ ।

दंडमान पु
वि० [सं० दण्ड + हिं० मान (प्रत्य०)] दंड पाने योग्य । सजा के लायक । दंडनीय । उ०—अदंडमान दीन गर्व दंडमान भेदवै ।—केशव (शब्द०) ।

दंडमानव
संज्ञा पुं० [सं० दण्डमानव] वह जिसे दंड देने की अधिक आवश्यकता पड़ती हो । बालक । लड़का ।

दंडमुख
संज्ञा पुं० [सं० दण्डमुख] सेनानायक । सेनापति [को०] ।

दंडमुद्रा
संज्ञा स्त्री० [सं० दण्डमुद्रा] १. तंत्र की एक मुद्रा जिसमें मुट्ठी बाँधकर बीच की उँगली ऊपर को खड़ी करते हैं । २. साधुओं के दो चिह्न दंड और मुद्रा ।

दंडयात्रा
संज्ञा स्त्री० [सं० दण्डयात्रा] सेना की चढ़ाई । २. दिग्विजय के लिये प्रस्थान । ३. वरयात्रा । बारात ।

दंडयाम
संज्ञा पुं० [सं० दण्डयाम] १. यम । २. दिन । ३. अगस्त्य मुनि ।

दंडरी
संज्ञा स्त्री० [सं० दण्डरी] एक प्रकार की ककड़ी । डँगरी फल ।

दंडवत
संज्ञा पुं० स्त्री० [सं० दण्डवत्] साष्टांग प्रणाम । पृथ्वी पर लेटकर किया हुआ नमस्कार ।

दंडवत पु
संज्ञा पुं०, स्त्री० [सं० दण्डवत्] दे० 'दंडवत्' । उ०—मुनि कहँ राम दँडवत कीन्हा । आशिरबाद विप्र वर दीन्हा ।— तुलसी (शब्द०) ।विशेष—पूरब में इस शब्द को पुल्लिंग बोलते हैं पर दिल्ली की ओर यह शब्द स्त्रीलिंग बोला जाता है ।

दंडवध
संज्ञा पुं० [सं० दण्डवध] प्राणदंड । फाँसी की सजा ।

दंडवासी
संज्ञा पुं० [सं० दण्डवासिन्] १. द्वारपाल । दरवान । २. गाँव का हाकिम या मुखिया ।

दंडवाही
संज्ञा पुं० [सं० दण्डवाहिन्] राजा की ओर से नगररक्षा विभाग का व्यक्ति । पुलिस का कर्मचारी [को०] ।

दंडविकल्प
संज्ञा पुं० [सं० दण्डविकल्प] निर्धारित दो प्रकार के दंड (जुरमाना या सजा) में से किसी एक को चुन लेने की छूट [को०] ।

दंडविधान
संज्ञा पुं० [सं० दण्डविधान] दे० 'दंडविधि' ।

दंडविधि
संज्ञा स्त्री० [सं० दण्डविधि] अपराधों के दंड से संबंध रखनेवाला नियम या व्यवस्था । जुर्म और सजा का कानुन ।

दंडविष्कंभ
संज्ञा पुं० [सं० दण्डविष्कम्भ] वह खंभा जिसमें दही दूध मथने की रस्सी बाँधी जाय [को०] ।

दंडवृक्ष
संज्ञा पुं० [स दंण्डवृक्ष] थूहर । सेंहुड़ ।

दंडव्यूह
संज्ञा पुं० [सं० दण्डव्यूह] १. सेना की डंडे के आकार की स्थिति । विशेष—इस व्यूह में आगे बलाध्यक्ष, बीच में राजा, पीछे सेनापति, दोनों ओर से हाथी, हाथियों की बगल में घोड़े ओर घोड़ो की बगल में पैदल सिपाही रहते थे । मनुस्मृति में इस ब्यूह का उल्लेख है । अग्निपुराण में इसके सर्वतोवृत्ति तिर्यग्वृति आदि अनेक भेद बतलाए गए हैं । २. कौटिल्य के अनुसार पक्ष, कक्ष तथा उरस्य में सेना की समान स्थिति ।

दंडशास्त्र
संज्ञा पुं० [सं० दण्ड + शास्त्र] दंड देने का विधान या कानून [को०] ।

दंडसंधि
संज्ञा स्त्री० [सं० दण्डसन्धि] कौटिल्य के अनुसार वह संधि जो सेना या लड़ाई का सामान लेकर की जाय । अपने से कम शक्ति या बलवाले राजा से धन लेकर की जानेवाली सँधि ।

दंडस्थान
संज्ञा पुं० [सं० दण्डस्थान] १. वह स्थान जहाँ दंड पहुँचाया जा सकता है । विशेष—मनु ने दंड के लिये दस स्थान बतलाए हैं—(१) उपस्थ, (२) उदर, (३) जिह्वा, (४) दोनों हाथ, (५) दोनों पैर, (६) आँख, (७) नाक, (८) कान, (९) धन और (१०) देह । अपराध के अनुसार राजा नाक, कान आदि काट सकता है या धन हरण कर सकता है । २. कौटिल्य के मत से वह जनपद या राष्ट्र जिसका शासन केंद्र द्वारा होता हो ।

दंडहस्त
संज्ञा पुं० [सं० दण्डहस्त] १. तार का फूल । २. द्वार- रक्षक । द्वारपाल (को०) । ३. यमराज (को०) ।

दंडा
संज्ञा पुं० [सं० दण्डक] दे० 'डंडा' ।

दंडाकरन पु
संज्ञा पुं० [सं० दण्डकारण्य] दे० 'दंडकारण्य' । उ०—परे आइ बन परबत माहाँ । दंडाकरन बींझ बन जाहाँ ।—जायसी (शब्द०) ।

दंडाक्ष
संज्ञा पुं० [सं० दण्डाक्ष] महाभारत के अनुसार चंपा नदी के किनारे का एक तीर्थ ।

दंडाख्य
संज्ञा पुं० [सं० दण्डाख्य] बृहत्संहिता के अनुसार वह भवन जिसके दो पार्श्व में से एक उत्तर और दूसरा पूर्व की ओर हो ।

दंडाजिन
संज्ञा पुं० [सं० दण्डाजिन] १. साधु संन्यासियों के धारण करने का दंड और मृगचम । २. झूठमूठ का आडंबर । धोखेबाजी का ढकोसला । कपटवेश ।

दंडादंडि
संज्ञा स्त्री० [सं० दण्डादण्डि] डंडों की मारपीट । लट्ठबाजी । लाठी की लड़ाई ।

दंडाधिप
संज्ञा पुं० [सं० दण्ड + अधिप] दंड देने का प्रमुख अधिकारी [को०] ।

दंडाध्यक्ष
संज्ञा पुं० [सं० दण्ड + अध्यक्ष] दंडाधिकारी । न्याया- धीश । उ०—दंडाध्यश या प्राचीन न्यायकरणिक का उल्लेख नहीं मिलता ।—पू० म० भा०, पृ० १०८ ।

दंडानीक
संज्ञा पुं० [सं० दण्ड + अनीक] सेना की टुकड़ी या विभाग [को०] ।

दंडापतानक
संज्ञा पुं० [सं० दण्ड + अपतानक] एक प्रकार की वातव्याधि जिसमें कफ और वात के बिगड़ने से मनुष्य का शरीर सूखे काठ की तरह जड़ हो जाता है । उ०—देह को दंड के समान तिरछा कर दे यह दंडापतानक कष्ट साध्य है । माधव०, पृ० १३८ ।

दंडापूपान्याय
संज्ञा पुं० [सं० दण्ड + अपूपन्याय] एक प्रकार का न्याय या दृष्टांत कथन जिसके द्वारा यह सूचित किया जाता है कि जब किसी के द्वारा कोई बहुत कठिन कार्य हो गया तब उसके साथ ही लगा हुआ सहज और सुखकर कार्य अवश्य ही हुआ होगा । जैसे, यदि डंडे में बँधा हुआ अपूप अर्थात् मालपुआ कही रखा हो और पीछे मालूम हो कि डंडे को चूहे खा गए तो यह अवश्य ही समझ लेना चाहिए कि चूहे मालपूए को पहले ही खा गए होंगे ।

दंडायमान
वि० [सं० दण्डायमान] डंडे की तरह सीधा खड़ा । खड़ा । उ०—यह कौतुक देखने के उपरांत विष्णु महाराज देवी की स्तुति करने को दंडायमान हुए । हे महामाया ! सच्चिदानंदरूपिणी । मैं तुमको नमस्कार करता हूँ ।— कबीर मं०, पृ० २१४ । क्रि० प्र०—होना ।

दंडार
संज्ञा पुं [सं० दण्डार] १. धनुष । २. मदगल हाथो । ३. नाच । ४. स्यंदन । रथ । ५. कुम्हार का चाक [को०] ।

दंडाई
संज्ञा पुं० [सं० दण्डाई] दंड देने योग्य । दंडभागी । दंड पाने योग्य [को०] ।

दंडालय
संज्ञा पुं० [सं० दण्डालय] १. न्यायालय जहाँ से दंड का विधान हो । २. वह स्थान जहाँ दंड दिया जाय । जैसे, जेलखाना । ३.एक छंद जिसे दंडकला भी कहते हैं । दे० 'दंडकला' ।

दंडालसिका
संज्ञा पुं० [सं० दण्ड + अलसिका] हैजा । कालरा [को०] ।

दंडावतानक
संज्ञा पुं० [सं० दण्ड + अवतानक] दे० 'दंडापतानक' [को०] ।

दंडाहत (१)
वि० [सं० दण्डाहत] डंडे से मारा हुआ ।

दंडाहत (२)
संज्ञा पुं० छाछ । मट्ठा ।

दंडिक
संज्ञा पुं० [सं० दण्डिक] १. नगररक्षक कर्मचारी । २. दंडधर । छड़ी बरदार । ३. एक प्रकार का मत्स्य [को०] ।

दंडिका
संज्ञा स्त्री० [सं० दण्डिका] १. बीस अक्षरों की एक वर्णवृत्ति जिसके प्रत्येक चरण में एक रगण के उपरांत एक जगण, इस प्रकार गणों का जोड़ा तीन बार आता है और अंत में गुरु लघु होता है । इसे वृत्त और गड़का भी कहते है । जैसे,—रोज रोज राजगैल तें लिए गुपाल ग्वाल तीन सात । वायु सेवनार्थ प्रात बाग जात आव लै सुफूल पात । २. यष्टिका । छड़ी (को०) । ३. कतार । पंक्ति (को०) । ४. रज्जु । डोरी (को०) । ५. मोती की लर, हार आदि (को०) ।

दंडित
वि० पुं० [सं० दण्डित] दंड पाया हुआ । जिसे दंड मिला हो । सजायाफ्ता । २. जिसका शासन किया गया हो । शासित । उ०—पंडित गण मंडित गुण दंडित मनि देखिए ।—केशव (शब्द०) ।

दंडिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० दण्डिनी] दंडोत्पला । एक प्रकार का साग ।

दंडिमुंड
संज्ञा पुं० [सं० दण्डिमुण्ड] शिव का एक नाम [को०] ।

दंडी
संज्ञा पुं० [सं०दण्डिन्] १. दंड धारण करनेवाला व्यक्ति । २. यमराज । ३. राजा । ४. द्वारपाल । ५. वह संन्यासी जो दंड और कमंडलु धारण करे । विशेष—ब्राह्मण के अतिरिक्त और किसी को दंडी होने का अधिकार नहीं है । यद्यापि पिता, माता, स्त्री, पुत्र आदि के रहते भी दंड लेने का निषेध है, तथापि लोग ऐसा करते हैं । मंत्र देने के पहले गुरु शिष्य होनेवाले के सब संस्कार (अन्न- प्राशन आदि) फिर से करते हैं । उसकी शिखा मूँड़ दी जाती है और जनेऊ उतारकर भस्म कर दिया जाता है । पहला नाम भी बदल दिया जाता है । इसके उपरांत दशाक्षर मंत्र देकर गुरु गेरुवा वस्त्र और दंड कमंडलु देते हैं । इन सबको गुरु से प्राप्त कर शिष्य दंडी हो जाता है और जीवनपर्यत कुछ नियमों का पालन करता है । दंडी लोग गेरुआ वस्त्र पहनते हैं, सिर मुड़ाए रहते हैं और कभी कभी भस्म और रुद्राक्ष भी धारण करते हैं । दंडी लोग अग्नि और धातु का स्पर्श नहीं करते, इनसे अपने हाथ से रसोई नहीं बना सकते । किसी ब्राह्मण के घर से पका भोजन माँगकर खा सकते हैं । दंडियों के लियो दो बार भोजन करने का निषेध है । इन सब नियमों का बाराह वर्ष तक पालन करके अंत में दंड को जल में फेंककर दंडी परमहंस आश्रय को प्राप्त करता है । दंडियों के लिये निर्गुण ब्रह्म की उपासना की व्यवस्था है । जिनसे यह उपसना न हो सके वे शिव आदि की उपासना कर सकते हैं । मरने पर दंडियो के शव का दाह नहीं होता, या तो शव मिट्टी में गाड़ दिया जाता है या नदी में फेंक दिया जाता है । काशी में बहुत से दंडी दिखाई पड़ते हैं । ६. सूर्य के एक पार्श्वचर का नाम । ७. जिन देव । ८. धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम । ९. दमनक वृक्ष । दौने का पौधा । १०. मंजुश्री । ११. शिव । महादेव । १२. नाविक । केवट (को०) । १३. संस्कृत के प्रसिद्ध कवि जिनके बनाए हुए दा ग्रंथ मिलते है 'दशकुमाररचित' और 'काव्यादर्श' । ऐसा प्रसिद्ध है कि दंडी ने तीन ग्रंथ लिखे थे दशकुमारचरित (गद्यकाव्य) काव्यदर्श (लक्षण ग्रंथ) और अवंतिसुंदरी कथा, पर तीसरे का पता बहुत दिनों तक नहीं लगा था । इधर उक्त ग्रंथ प्राप्त हो गया है और प्रकाशित भी है । अनेक लोगों का मत है कि ईसा की छठी शताब्दी में दंडी हुए थे । 'शंकरदिग्विजय में 'वाणयमयूरदंडि मुख्यान्' से ज्ञात होता है कि ये वाण और मयूर के समकालीन थे । इतना तो निश्चय है कि ये कालिदास और शूद्रक आदि के पीछे के हैं । इनकी वाक्य- रचना आडंबरपूर्ण है ।

दंडोत पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दण्डवत्] दे० 'दंडवत' । उ०—बंदन सबही सुरन कौ बिधि हू को दंडोत । कर्मन कौ फल देतु हैं इनकौ कहा उदोत ।—ब्रज० ग्रं०, पृ० ७२ ।

दंडोत्पल
संज्ञा पुं० [सं०दण्डोत्पल] एक पौधे का नाम जिसे कुछ लोग गूमा, कुछ लोग कुकरौंधा और लोग बड़ी सहदेया समझते हैं ।

दंडोत्पला
संज्ञा स्त्री० [सं० दण्डोत्पला] दे० 'दंडोत्पल' ।

दंडोपनत
वि० [सं० दण्ड + उपनत] कौटिल्य के अनुसार पराजित और अधीन (राजा) ।

दंडौत पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दण्डवत्] दे० 'दंडवत्' । उ०—सनमुष अंजुलि जाइ करी दंडौत सबन कहुँ । कुसुमंजलि सिर मंडि धूप नैवंद समुह सहुँ ।—पृ० रा०, ६ ।५८ ।

दंड्य
वि० [सं० दण्डय] दंड पाने योग्य । जिसे दंड देना उचित हो ।

दंत
संज्ञा पुं० [सं० दन्त] १. दाँत । उ०—दंत कवाडया नह रँग्या । चालउ सखी होली खेलबा जाई ।—बी० रासो, पृ० ६८ । यौ०—दंतकथा । दंत चिकित्सक = दाँत की चिकित्सा करनेवाला । दंतचिकित्सा = दाँत का इलाज । २. ३२ की संख्या । ३. गाँव के हिस्सों में बहुत ही छोटा हिस्सा जो पाई से भी बहुत कम होता है । (कौड़ियों में दाँत के चिह्न होते हैं इसी से यह संख्या बनी है) । ४. कुंज । ५. पहाड़ की चोटी । ६. वाण का सिरा या नोक (को०) । ७. हाथी का दाँत (को०) । यो०—दंतकार ।

दंतक
संज्ञा पुं० [सं० दन्तक] १. दाँत । २. पहाड़ की चोटी । ३. पहाड़ से निकलनेवाला एक प्रकार का पत्थर । ४. दीवाल में लगी हुई खूँटी (को०) ।

दंतकथा
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्तकथा] ऐसी बात जिसे बहुत दिनों सेलोग एक दूसरे से सुनते चले आए हों; तथा जिसका कोई और पुष्ट प्रमाण न हो । सुनी सुनाई बात । अनुश्रुति । उ०— इति वेद वदंति न दंतकथा । रवि आतप भिन्न न भिन्न यथा ।—तुलसी (शब्द०) ।

दंतकर्षण
संज्ञा पुं० [सं० दन्तकर्षण] जंभीरी नीबू ।

दंतकार
संज्ञा पुं० [सं० दन्तकार] १. वह व्यक्ति जो हाथीदाँत का काम करता हो । २. दाँत बनानेवाला शिल्पी । दंत चिकित्सक डाक्टर ।

दंतकाष्ठ
संज्ञा पुं० [सं० दन्तकाष्ठ] दतुवन । दबून । मुखारी ।

दंतकाष्ठक
संज्ञा पुं० [सं० दन्तकाष्ठक] आहुत्य वृक्ष । तरवट का पेड़ ।

दंतकुली †
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्त + कुल (= समुदाय)] दाँतों की पंक्ति । उ०—दंतकुली अंगुली करी कोपरी कपालाँ । बीच खेत वित्थरी फरी बिहरी किरमालाँ ।—रा० रू०, पृ० २५१ ।

दंतकूर
संज्ञा पुं० [सं० दन्तकूर] युद्ध । संग्राम ।

दंतक्षत
संज्ञा पुं० [सं० दन्तक्षत] कामशास्त्र के अनुसार कामकेलि में नायक नायिका द्वारा प्रेमोन्माद में एक दूसरे के अधर और कपोल में लगा हुआ दांत काटने का चिह्न । दाँत काटने का निशान [को०] ।

दंतघर्ष
संज्ञा पुं० [सं० दन्तघर्ष] दाँत पर दाँत दबाकर घिसने की क्रिया । दाँत किरकिराना । विशेष—निद्रा की अवस्था में बच्चे कभी कभी दाँत किरकिराते हैं जिसे लोग अशुभ समझते हैं । रोगी के पक्ष में यह और भी बुरा समझा जाता है ।

दंतघात
संज्ञा पुं० [सं० दन्तघात] दे० 'दंताघात' ।

दंतच्छद
संज्ञा पुं० [सं० दन्तच्छद] औष्ठ । ओंठ ।

दंतच्छदोपमा
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्तच्छोदोपमा] बिंबाफल । कुँदरू ।

दंतछत पु
संज्ञा पुं० [सं० दन्तक्षत] दे० 'दंतक्षत' ।

दंतछद (१) पु
संज्ञा पुं० [सं० दन्तच्छद] दंतच्छद ।

दंतछद (२)
संज्ञा पुं० [सं० दन्तक्षत] दे० 'दंतक्षत' ।

दंतजात
वि० [सं० दन्तजात] १. (बच्चा) जिसे दाँत निकल आए हों । २. दाँत निकलने योग्य (काल) । विशेष—गर्भोपनिषद में लिखा है कि बच्चे को सातवें महीने में दाँत निकलना चाहिए । यदि उस समय दाँत न निकलें तो अशौच लगता है ।

दंतजाह
संज्ञा पुं० [सं० दन्तजाह] दाँतों की लड़ [को०] ।

दंतताल
संज्ञा पुं० [सं० दन्तताल] एक प्रकार का प्राचीन बाजा जिससे ताल दिया जाता है ।

दंतदर्शन
संज्ञा पुं० [सं० दन्तदर्शन] क्रोध या चिड़िचिड़ाहठ में दाँत निकलने की क्रिया । विशेष—महाभारत (वन पर्व) में लिखा है कि युद्ध में पहले दाँत दिखाए जाते हैं फिर शब्द करके वार किया जाता है ।

दंतधाव
संज्ञा पुं० [सं० दन्तधाव] दे० 'दंतधावन' [को०] ।

दंतधावन
संज्ञा पुं० [सं० दन्तधावन] १. दाँत धोने या साफ करने का काम । दातुन करने की क्रिया । २. दतौन । दातुन । ३. खैर का पेड़ । खदिर वृक्ष । ४. करज का पेड़ । ५. मौलसिरी ।

दंतपत्र
संज्ञा पुं० [सं० दन्तपत्र] कान का एक गहना । विशेष—संभवतः जो हाथी दाँत का बनता रहा हो ।

दंतपत्रक
संज्ञा पुं० [सं० दन्तपत्रक] १. कुंद का पुष्य । २. कान का एक आभूषण । दंतपत्र (को०) ।

दंतपत्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्तपत्रिका] १. कान का एक आभूषण । २. कुंद का पुष्य । ३. कंधी [को०] ।

दंतपवन
संज्ञा पुं० [सं० दन्तपवन] दाँत शुद्ध करने की क्रिया । दंतधावन । २. दतुवन । दातन ।

दंतपांचालिका
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्तपाञ्चालिका] हाथीदाँत की बनी पुतली [को०] ।

दंतपात
संज्ञा पुं० [वि० दन्तपात] दाँतो का गिरना [को०] ।

दंतपार
संज्ञा स्त्री० [हिं० दंत + उपारना] दाँत की पीड़ा । दाँत का दर्द ।

दंतपालि
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्तपालि] तलवार की मूठ । तलवार का कब्जा या दस्ता [को०] ।

दंतपाली
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्तपाली] दाँत की जड़ । मसूड़ा [को०] ।

दंतपुप्पुट
संज्ञा पुं० [सं० दन्तपुप्पुट] मसूड़ों का एक रोग, जिसमें वे सूज जाते हैं और दर्द करते हैं ।

दंतपुर
संज्ञा पुं० [सं० दन्तपुर] प्राचीन कलिंग राज्य का एक नगर जहाँ पर राजा ब्रह्मदत्त ने बुद्धदेव का एक दंत स्थापित करके उसके ऊपर एक बड़ा मंदिर बनवाया था । विशेष—यह दंतपुर कहाँ था, इसके संबंध में मतभेद है । डाक्टर राजेंद्रलाल का मत है कि मेदिनीपुर जिले में जलेश्वर से छह कोस दक्खिन जो दाँतन नामक स्थान है वही बौद्धों का प्राचीन दंतपुर है । सिंहली बौद्धों के 'दाठावंश' नामक ग्रंथ में दंतपुर के संबंध में बहुत सा वृत्तांत दिया हुआ है ।

दंतपुष्ष
संज्ञा पुं० [सं० दन्तपुष्प] १. कतक । निर्मली । २. कुंद का फूल ।

दंतप्रक्षालन
संज्ञा पुं० [सं० दन्तप्रक्षालन] दे० 'दंतपवन' [को०] ।

दंतप्रवेष्ट
संज्ञा पुं० [सं० दन्तप्रवेष्ट] हाथी के दाँत का आवरण [को०] ।

दंतफल
संज्ञा पुं० [सं० दन्तफल] १. कतक फल । निर्मली । २. कपित्थ । कैथ ।

दंतफला
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्तफला] पिप्पली ।

दंतबीज
संज्ञा पुं० [सं० दन्तबीज] वह जिसके बीज दाँत के सदृश हों । दाड़िम । अनार [को०] ।

दंतबीजक
संज्ञा पुं० [सं० दन्तबीजक] दे० 'दंतबीज' [को०] ।

दंतभाग
संज्ञा पुं० [सं० दन्तभाग] १. हाथी के सिर का वह अग्र भाग जहाँ से उसके दाँत निकलते है । २. दाँतों का हिस्सा [को०] ।

दंतमध्य
संज्ञा पुं० [सं० दन्तमध्य] दे० 'दंतांतर' [को०] ।

दंतमांस
संज्ञा पुं० [सं० दन्तमांस] मसुड़ा ।

दंतमूल
संज्ञा पुं० [सं० दन्तमूल] १. दाँत की जड़ । २. दाँत का एक रोग ।

दंतमूलिका
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्तमूलिका] दंती वृक्ष । जमालगोटे का पेड़ ।

दंतमूलीय
वि० [सं० दन्तमूलीय] दंतमूल से उच्चारण किया जानेवाला (वर्ण) । जैसे, तवर्ग । विशेष—व्याकरण के अनुसार स्वर वर्ण लू और त, थ, द, ध, न तथा ल और स व्यंजन दंतमूलीय कहे जातै हैं ।

दंतलेखक
संज्ञा पुं० [सं० दन्तलेखक] दाँतों की रँगने का व्यवसाय करके अपनी जीविका का अर्जित करनेवाला व्यक्ति [को०] ।

दंतलेखन
संज्ञा पुं० [सं० दन्तलेखन] एक अस्त्र जिससे दाँत की जड़ के पास मसुड़ों को चीरकर मवाद आदि निकालते हैं जिससे दाँत की पीड़ा दूर होती है । दंतशर्करा नामक रोग में इस अस्त्र का प्रयोजन होता है ।

दंतवक्र
संज्ञा पुं० [सं० दन्तवक्र] करुष देश का राजा, जो वृद्धशर्मा का पुत्र था । यह शिशुपाल का भाई लगता था और श्रीकृष्ण के हाथ से मारा गया था ।

दंतवर्ण
वि० [सं० दन्तवर्ण] चमकदार । ओपदार ।

दंतवल्क
संज्ञा पुं० [सं० दन्तवल्क] दाँत की जड़ के ऊपर का मांस । मसूड़ा ।

दंतवस्त्र
संज्ञा पुं० [सं० दन्तवस्त्र] ओष्ठ । ओंठ ।

दंतवीज
संज्ञा पुं० [सं० दन्तवीज] अनार ।

दंतवीणा
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्तवीणा] १. वाद्यविशेष । एक प्रकार वा बाजा । २ (शीतादि के कारण) दाँतों का बजना [को०] । यौ०—दंतवौणोपदेशाचार्य = शीत या ठंढक जिसके कारण दाँत बजने लगते हैं ।

दंतवेष्ट
संज्ञा पुं० [सं० दन्तवेष्ट] १. हाथी के दाँत के ऊपर का मढ़ा हुआ छल्ला । २. मसूड़ा । ३. दाँतों में होनेवाला एक रोग [को०] ।

दंतवैदर्भ
संज्ञा पुं० [सं० दन्तवैदर्भ] दाँत का एक रोग । किसी बाहरी आघात से दाँत का हिलनाया टूटना ।

दंतशंकु
संज्ञा पुं० [सं० दन्तशङ्क] चीर फाड़ का एक औजार जो जौ के पत्तों के आकार का होता था (सुश्रुत) । दाँत को उखाड़ने का यंत्र ।

दंतशठ
संज्ञा पुं० [सं० दन्तशठ] १. वे वृक्ष जिनके फल खाने से खटाई के कारण दाँत गुठ्ले हो जायँ । जैसे, कैथ, कमरख, छोटी नारंगी, जंभीरी, नीबू इत्यादि । २. खट्टापन । खटाई ।

दंतशठा
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्तशठा] खट्टी नोनिया । अमलौनी । २. चुक । चूक ।

दंतशर्करा
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्तशर्करा] दाँतों का एक रोग जो मैल जमकर बैठ जाने के कारण होता है ।

दंतशाण
संज्ञा पुं० [सं० दन्तशाण] मिस्सी । स्त्रियों के दाँत पर लगाने का रंगीन मंजन ।

दंतशूल
संज्ञा पुं० [सं० दन्तशूल] दाँत की पीड़ा ।

दंतशोफ
संज्ञा पुं० [सं० दन्तशोफ] दाँत के मसूड़ों में होनेवाला एक प्रकार का फोड़ा । दंतार्बुँद ।

दंतश्लिष्ट
वि० [सं० दन्तश्लिष्ट] दाँतों में उलझा या चिपका हुआ [को०] ।

दंतहर्ष
संज्ञा पुं० [सं० दन्तहर्ष] दाँतों की वह टीस जो अधिक ठंढी या खट्टी वस्तु लगने से होती है । दाँतों का खट्टा होना ।

दंतहर्षक
संज्ञा पुं० [सं० दन्तहर्षक] जंभीरी नीबू ।

दंतहीन
वि० [सं० दन्तहीन] बिना दाँत का । जिसके मुँह में दाँत न हो [को०] ।

दतांतर
संज्ञा पुं० [सं० दन्त + अन्तर] दाँतों के बीच का अंतर या स्थान [को०] ।

दंताघात
संज्ञा पुं० [सं० दन्ताघात] १. दाँत का आघात । २. वह जिससे दाँत को आघात पहुँचे—नीबू ।

दंताज
संज्ञा पुं० [सं० दन्ताज] १. दाँत की जड़ या संधि में पड़नेवाले कीड़े । २. दाँत का रोग जो इन कीड़ों के कारण होता है ।

दंतादंति
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्तादन्ति] एक दूसरे को दाँत से काटने की क्रिया या लड़ाई ।

दंतायुध
संज्ञा पुं० [सं० दन्तायुध] वह जिसका अस्त्र दाँत हो । सूअर । जंगली सूअर ।

दंतार (१)
वि० [हिं० दाँत + आर (प्रत्य०)] बड़े दाँतोंवाला ।

दंतार (२)
संज्ञा पुं० हाथी ।

दंतारा
वि०, संज्ञा पुं० [हिं० दंतार] दे० 'दंतार' ।

दंतार्बुद
संज्ञा पुं० [सं० दन्तार्बुद] मसूड़ों में होनेवाला एक प्रकार का फोड़ा ।

दंताल
संज्ञा पुं० [हिं० दन्तार] हाथी ।

दंतालय
संज्ञा पुं० [सं० दन्ता + आलय] मुख । मुँह [को०] ।

दंतालि
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्तालि] दाँतों की पंक्ति । दाँतों की पाँत [को०] ।

दंतालिका
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्तालिका] लगाम ।

दंताली
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्ताली] लगाम ।

दंतावल
संज्ञा पुं० [सं० दन्तावल] हाथी ।

दंतावली
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्त + अवली] दाँतों की पंक्ति । 'दंतालि' [को०] ।

दंताहल पु
संज्ञा पुं० [सं० दन्तावल] हाथी ।—(डिं०) ।

दंति
संज्ञा पुं० [सं० दन्तिन्] हाथी । उ०—सदा दंति के कुंभ को जो बिदारे ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० १४२ ।

दंतिका
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्तिका] दंती । जमालगोटा ।

दंतिजा
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्तिजा] दंती वृक्ष । दंती [को०] ।

दंतिदंत
संज्ञा पुं० [सं० दन्तिदन्त] हाथीदाँत ।

दंतीबीज
संज्ञा पुं० [सं०दन्तिवीज] जमालगोटा ।

दंतिमद
संज्ञा पुं० [सं० दन्तिमद] हाथी का मद । हाथी के गंड— स्थल का स्त्राव [को०] ।

दंतियाँ
संज्ञा स्त्री० [हिं० दाँत + इया (प्रत्य०)] छोटे छोटे दाँत ।

दंतिवक्त्र
संज्ञा पुं० [सं० दन्तिवक्त्र] हाथी की तरह मुखवाले- गजानन । गणेश [को०] ।

दंती
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्ती] अंडी की जाति का एक पेड़ । विशेष—दंती दो प्रकार की होती है—एक लघुदंती और दूसरी बृहद्दंती । लघुदंती के पत्ते गूलर के पत्तों के ऐसे होते हैं और बृहद्दंत्ती के एरंड अंडी के से । इसके बीज दस्तावर होते हैं और जमालगोटे के स्थान पर औषध में काम आते हैं । वैद्यक में दंती, कटु उष्ण और तृषा, शूल, बवासीर, फोड़े आदि को दूर करनेवाली मानी जाती है । दंती के बीज अधिक मात्रा में देने से विष का काम करते हैं । पर्या०—शीघ्रा । निकुंभी । नागस्फोटा । दंतिनी । उपचिता । भद्रा । रुक्षा । रेचनी । अनुकूला । निःशल्पा । विशल्या । मधुपुष्पा । एरंडफला । तरणी । एरंडपत्रिका । विशोधनी । कुंभी । उदुंबरदला । प्रत्यकपर्णी ।

दंती (२)
संज्ञा पुं० [सं० दन्तिन्] १. हस्ती । हाथी । गज । उ०— झलते थे श्रुति तालवृंत दंती रह रहकर ।—साकेत, पृ० ४१४ । २. गणेश । गजानन । ३. पर्वत । ४. सोम । चंद्रमा (को०) । ५. व्याघ्र । मृगाधिप (को०) । ६. क्रोड़ । अंकोर । गोद (को०) । ७. श्वान । कुत्ता (को०) ।

दंती (३)
वि० दाँतावाला । जिसके दाँत हों [को०] ।

दंतुर (१)
वि० [सं०दन्तुर] जिसके दाँत आगे निकले हों । दँतुला । दाँतू । २. ऊबड़ खाबड़ । नीचा ऊँचा (को०) । ३. खुला हुआ । आवरणरहित (को०) ।

दंतुर (२)
संज्ञा पुं० १. हाथी । २. सूअर ।

दंतुरच्छद
संज्ञा पुं० [दन्तुरच्छद] जँभीरी नीबू । बिजौरा नीबू ।

दंतुरित
वि० [सं० दन्तुरित] १. आवेष्टित । ढका हुआ । दे० 'दंतुर' [को०] ।

दंतुल
वि० [सं० दन्तुल] दे० 'दंतुर' [को०] ।

दंतोलूखलिक
संज्ञा पुं० [सं० दन्त + उलूखलिका] एक प्रकार के संन्यासी जो ओखली आदि में कूटा हुआ अन्न नहीं खाते । ये या तो फल खाते हैं या छिलके सहित अनाज के दानों को दाँत के नीचे कुचलकर खाते हैं ।

दंतोलूखली
संज्ञा पुं० [सं० दन्त + उलूखलिन्] दे० 'दंतोलूखलिक' ।

दंतोष्ठय
वि० [सं०] (वर्ण) जिसका उच्चारण दाँत और ओट से हो । विशेष—ऐसा वर्ण 'व' है ।

दंत्य
वि० [सं० दन्त्य] १. दंत संबंधी । २. (वर्ण) जिसका उच्चारण दाँत की सहायता से हो । जैसे, तवर्ग । ३. दाँतों का हितकारी (औषध) ।

दंद (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० दहन, दन्हह्यमान्] किसी पदार्थ से निकलती हुई गरमी, जैसी तपी हुई भूमि पर मेघ का पानी पड़ने से निकलती है या खानों के भीतर पाई जाती है । क्रि० प्र०—आना ।—निकलना ।

दंद (२)
संज्ञा पुं० [सं० द्वन्द्व प्रा० दंदं] १. लड़ाई झगड़ा । उपद्रव । हलचल । २. युद्ध । संघर्ष । संग्राम । उ०—आज हनो जैचंद दंद ज्यौं मिटै ततष्षिन ।—पृ० रा० ६१ ।१४६ । ३. हल्ला गुल्ला । शोरगुल । ४. दुःख । मानसिक उथल पुथल । उ०— रोहिनि माता उदर प्रगट भए हरन भक्त के दंद ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ५१३ । (ख) त्यागहु संसय जम कर दंदा । सूझि परहि तह भवजल फंदा ।—दरिया० बानी, पृ० ३ । क्रि० प्र० —मचाना ।

दंदना पु †
संज्ञा पुं० [सं० द्वन्द्व] दे० 'द्वंद्व' । उ०—फूले पशु पंछी सब, देखि ताप कटे तब, फूले सब ग्वाल बाल कटे दुख दंदना—नंद० ग्रं०, पृ० ३७६ ।

दंदन
वि० [सं० दमन] नाश करनेवाला । दूर करनेवाला । दमन करनेवाला ।

दंदश
संज्ञा पुं० [सं० दन्दश] दाँत । दंत [को०] ।

दंदशूक (१)
संज्ञा पुं० [सं० दन्दशूक] १. सर्प । २. राक्षस विशेष । ३. कीट । कीड़ा (को०) । ४. एक प्रकार का नरक ।

दंदशूक (२)
वि० हिंसक । काटनेवाला [को०] ।

दंदहर
वि० [सं० द्वन्द्वहर] द्वंद्व को दूर करनेवाला । मानसिक शांति पहुँचानेवाला । उ०—परसति मंद सुगंध दंदहर विपिन विपिन मैं ।—रत्नाकर, भा० १, पृ० ६ ।

दंदह्यमान
वि० [सं० दन्दह्यमान] दहकता हुआ ।

दंदा
संज्ञा पुं० [देश०] ताल देने का एक प्रकार का पुराना बाजा ।

दंदान
संज्ञा पुं० [फा़०] दाँत [को०] । यौ०—दंदानसाज = दंतचिकित्सिक । दाँत बनानेवाला ।

दंदाना † (१)
क्रि० अ० [हिं० दंद] १. गरम लगना । गरमी पहुँचाता हुआ मालूम होना । जैसे, रूई का दंदाना, बंद कोठरी का दंदाना । २. किसी गरम चीज के आसपास होने से गरम होना । जैसे, रजाई या कंबल के नीचे दंदाना ।

दंदाना (२)
संज्ञा पुं० [फा़० दंदानहु] [वि० दंदानेदार] दाँत के आकार की उभरी हुई वस्तुओं की पंक्ति । शंकु या कँगूरे के रूप में निकली हुई चीजों की कतार, जैसी कंघी या आरे आदि में होती है ।

दंदानेदार
वि० [फा़०] जिसमें दंदाने हों । जिसमें दाँत की तरह निकले हुए कंगूरों की पंक्ति हो ।

दंदारू
संज्ञा पुं० [हिं० दंद + आरू (प्रत्य०)] छाला । फफोला ।

दंदी
वि० [सं० द्वन्द्वी, हिं० दंद] झगड़ालू । उपद्रवी । बखेड़ा करनेवाला । हुज्जती । उ०—कलियुग मधे जुपग चारि रचीला चूकिला चार बिचारं । घरि घरि दंदी घरि घरि बादी घरि घरि कथणहारं ।—गोरख०, पृ० १२३ ।

दंदु
संज्ञा पुं० [सं० द्वन्द] दे० 'द्वंद्व' । उ०—अब हो कंठ फाँद गिब चीन्हा । दंदु कै फाँद चाहु का कीन्हा ।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० १७० ।

दंदुल †
वि० [सं० तुन्दिला] दे० 'तुंदिल' । उ०—विद्याभरी दंदुलपेट उसपर साँप की लपेट । विघन करत है चपेट पकड़ फेट काल की ।—दक्खिनी०, पृ० ४५ ।

दंपत पु
संज्ञा पुं० [सं० दम्पती] दे० 'दंपति' । उ०—छाँड़त ना पर एकौ अकेले, न पौढ़त हौ परजंक पै दंपत ।—नट०, पृ० ३४ ।

दंपति पु
संज्ञा पुं० [सं० दम्पती] दे० 'दंपती' ।

दंपती
संज्ञा पुं० [सं० दम्पती] स्त्री पुरुष का जोड़ा । पति पत्नी का जोड़ा ।

दंपा
संज्ञा स्त्री० [हिं० दमकना] बिजली । उ०—चोथते चकोर चहूँ ओर जानि चंदमुखी जौ न होती डरनि दसन दुति दंपा की ।—पूरबी (शब्द०) ।

दंभ
संज्ञा पुं० [सं० दम्भ] [वि० दंभी] १. महत्व दिखाने या प्रयोजन सिद्ध करने के लिये झूठा आडंबर । धोखे में डालने के लिये ऊपरी दिखावट । पाखंड । उ०—आसन मार दंभ धर बैठे मन में बहुत गुमाना ।—कबीर ग्रं०, पृ० ३३८ । २. झूठी ठसक । अभिमान । घमंड । ३. शठता । शाठ्य (को०) । ४. शिव का एक नाम (को०) । ५. इंद्र का वज्र (को०) ।

दंभक
संज्ञा पुं० [सं० दम्भक] पाखंडी । ढकोसलेबाज । प्रतारक ।

दंभन
संज्ञा पुं० [सं० दम्भन] पाखंड करना । ढोंग करना [को०] ।

दंभान पु
संज्ञा पुं० [सं०दम्भ का बहुव०] दे० 'दंभ' ।

दंभी
वि० [सं० दम्भिन्] १. पाखंडी । आडंबर रचनेवाला । ढकोसलेबाज । २. झूठी ठसकवाला । अभिमानी । घमंडी ।

दंभोलि
संज्ञा पुं० [सं० दम्भोलि] इंद्रास्त्र । वज्र । उ०—मत्त मातंग बल अंग दंभेलि दल काछिनी लाल गजमाल सोहै ।— सूर (शब्द०) ।

दंश
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह घाव जो दाँत काटने से हुआ हो । दंतक्षत । २. दाँत काटने का क्रिया । दंशन । ३. साँप या और किसी विषैले जंतु के काटने का घाव । जैसे, सर्पदंश । ४. आक्षेपवचन । बौछार । र्व्यंग्य । कटूक्ति । ५. द्वेष । बैर । क्रि० प्र०—रखना । ६. दाँत । ७. विषैले जंतुओं का डंक । ८. जोड़ । संधि । ग्रंथि (को०) । ९. एक प्रकार की मक्खी जिसकी डंक विषैल होते हैं । डाँस । बगदर । उ०—मसक दंश बीते हिम त्रासा ।— तुलसी (शब्द०) । पर्या०—वनमक्षिका । गौमक्षिका । भमरालिका । पाशुर । दुष्टमुख । क्रूर । १०. वर्म । बकतर । ११. एक असुर । विशेष—इसकी कथा महाभारत में इस प्रकार लिखी है— सत्ययुग में र्दश नामक एक बड़ा प्रतापी असुर रहता था । एक दिन वह भृगु मुनि की पत्नी को हर ले गया । इसपर भृगु ने उसे शाप दिया कि 'तु मल मुत्र का कीड़ा हो जा' । शाप से डरकर जब असुर बहुत गिड़गिड़ाने लगा तब भृगु ने कहा—'मेरे वंश मे जो राम (परशुराम) होंगे वे शाप से तुझे मुक्त करेंगे । वह असुर शाप के अनुसार कीट हुआ । कर्ण जब परशुराम से अस्त्रशिक्षा प्राप्त कर रहे थे तब एक दिन कर्ण के जंघे पर सिर रखकर परशुराम सो गए । ठीक उसी समय वह कीड़ा आकर कर्ण जाँघ में काटने लगा । कर्ण ने गुरु का निद्रा भंग होने के डर से जाँघ नहीं हटाई । जब जाँघ में से रक्त की धारा निकली तब परशुराम की नींद टूटी और उन्होंने उस कीड़े की ओर ताका । उनके ताकते ही उस कीड़े ने उसे रक्त के बीच अपनी कीट शरीर छोड़ा और अपने पूर्व रूप में आ गया ।

दंशक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो कात खाय । दाँत से काटनेवाला । २. डाँस वाम की मक्खी जो बड़े जोर से काटती है । ३. श्वान । कुत्ता (को०) । ४. मशक । मच्छड़ (को०) ।

दंशक (२)
वि० दंशन करनेवाला ।

दंशन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० दंशित, दंशी] १. वाँत से काटना । डसना । जैसे, सर्पदंशन । उ०—और पीठ पर ही तुरंत दंशनों का त्रास ।—लहर, पृ० ५९ । क्रि० प्र०—करना । २. वर्म । बकतर ।

दंशना पु
क्रि० स० [सं० दंश + हिं० ना (प्रत्य०)] काटना । डसना ।

दंशनाशिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार का कीट [को०] ।

दंशभीरु
संज्ञा पुं० [सं०] महिष । भैंसा । विशेष—भैंसों को मच्छड़ और डाँस बहुत लगते हैं ।

दंशभीरुक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दंशभीरु' [को०] ।

दंशमूल
संज्ञा पुं० [सं०] सहँजन का पेड़ । शोभाजन ।

दंशवदन
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का पेड़ । शोभाजन ।

दंशवदन
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का बगुला । बक [को०] ।

दंशित
वि० [सं०] १. दाँत से काटा हुआ । २. वर्म से आच्छादित । बकतर से ढका हुआ ।

दंशी (१)
वि० [सं० दंशिन्] [वि० स्त्री० दंशिनी] १. दाँत से काटनेवाला । डसनेवाला । २. आक्षेप वचन कहनेवाला । कटूक्ति कहनेवाला । ३. द्वेषी । वैर या कसर रखनेवाला ।

दंशी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] छोटा दंश । छोटा डाँस ।

दंशूक
वि० [सं०] डँसनेवाला । डंक मारनेवाला । दंदशूक ।

दंशेर
वि० [सं०] १. दे० 'दंशूक' । २. हानिकारक [को०] ।

दंष्ट्र
संज्ञा पुं० [सं०] दाँत ।

दंष्ट्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मोटे दाँत । स्थूल दाँत । दाढ़ । चौभर । २. बिछुआ नाम का पौधा जिसमें रोईदार फल लगते हैं । वृश्चिकाली । यौ०—दंष्ट्राकराल = भयंकर दाँतोंवाला । दंष्ट्रादंड = वाराह या शुकर का दाँत । दंष्ट्रानलविध । दंष्ट्रा विष । दष्ट्राविषा ।

दंष्ट्रानखबिष
संज्ञा पुं० [सं०] वह जंतु जिसके नख और दाँत में विष हो । जैसे, बिल्ली, कुत्ता, बंदर, मेढक, छिपकली इत्यादि ।

दंष्ट्रायुध
संज्ञा पुं० [सं०] वह जिसका अस्त्र दाँत हो । शुकर । सूअर ।

दंष्ट्राल (१)
वि० [सं०] बड़े बड़े दाँतोंवाला ।

दंष्ट्राल (२)
संज्ञा पुं० १. एक राक्षस का नाम । २. शूकर । वाराह ।

दंष्ट्राविष
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का सर्प । साँप [को०] ।

दंष्ट्राविषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक तरह की मकड़ी [को०] ।

दंष्ट्रास्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दंष्ट्रयुध' [को०] ।

दंष्ट्रिक
वि० [सं०] दंष्ट्रावाला । दंष्ट्राल [को०] ।

दंष्ट्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दंष्ट्रा' [को०] ।

दंष्ट्री (१)
वि० [सं० दष्ट्रिन्] १. बड़े बड़े दाँतोंवाला । २. दाँतों से काटनेवाल (को०) । ३. मांसरक्षक । मांसाहारी । (को०) ।

दंष्ट्री (२)
संज्ञा पुं० १. सूअर । २. साँफ । ३. लकड़बग्धा (को०) । ४. वह जंतु जिसके दात बड़े हों । बड़े दाँतोवाला जंतु (को०) ।

दंस पु
संज्ञा पुं० [सं० दंश] दे० 'दंश' ।

दंडवत पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दण्डवत] दे० 'दंडवत्' । उ०—पदुमावती के बरसन आसा । दँडवत कीन्ह मँडप चहँ पासा ।—जायसी ग्रं०, पृ० २३२ ।

दँतना †
क्रि० अ० [हिं० डटना] डटना । समीप होना । सटना ।

दँतिया
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्त, हिं० दाँत + इया (प्रत्य०)] छोटे छोटे दाँत । दूध के दाँत । उ०—अरुन अधर दँतियन की जोती । जपाकुसुम मघि जनु बिधि मोती ।—नंद० ग्रं०, पृ० २४३ ।

दँती पु
संज्ञा पुं० [सं० दन्ती] हाथी । दंती । उ०—तुट्टि तंतं अती, गज्जनीयं दँती ।—पृ० रा०, १ । ६५१ ।

दँतुरच्छद
संज्ञा पुं० [सं० दन्तुरच्छद] बिजौरा नीबू ।

दँतुरियाँ †, दँतुरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दाँत] बच्चों के छोटे छोटे दाँत ।

दँतुला
वि० [सं० दम्तुर] [वि० स्त्री० दँतुली] जिसके दाँत आपे निकले हों । बडे बड़े दाँतोवाला ।

दँतुली
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्त] बच्चे का छोड़ा दाँत । उ०—दाज- कृष्ण के छोटे छोटे नए दूध के दाँतों के लिये दूध की दँतुली का प्रयोग कितना सुंदर है ।—पोद्दार अभि०, ग्रं०, पृ० १७२ ।

दँब
संज्ञा पुं० [सं० दव] दव । अग्नि । आग । उ०—दँव दाधी मालित सुनत, अति आध्यो तिहिं ठाई ।—हिंदी प्रेमगाथा० पृ० २१५ ।

दँवरी
संज्ञा स्त्री० [सं० दमन, हिं० दाँवना] अनाज के सूखे डंठलों में से दाना झड़ने के लिये उसे बैचों से रौंदवाने का काम । क्रि० प्र०—नाधना ।

दँवारि पु †
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'दावाग्नि' ।

दँहगल
संज्ञा पुं० [देश०] एक छोटे आकार की गानेवाली चिड़ियाँ उ०—सबेरे सबेरे नहीं आती बुल—बुल, न श्यामा सुरीली, न फुदकी, न दँहगल ।—हरी घास०, पृ० ३९ ।

द (१)
वि० [सं०] १. उत्पन्न करनेवाला । २. देनेवाला । दाता । विशेष—इस अर्थ में इसका व्यवहार स्वतंत्र रूप से नहीं होता; बल्कि किसी शब्द के अंत में जोड़ने से होता है । जैसे, सुखद (सुख देनेवाला), जलद (जल देनेवाला, बादल) आदि ।

द (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. पर्वत । पहाड़ । २. दान । ३. दाता ।

द (३)
संज्ञा स्त्री० १. भार्या । कलत्र । स्त्री । २. रक्षा । ३. खंडन ।

दई पु †
संज्ञा पुं० [सं० दैव] दे० 'दैव' । उ०—बहए बुलिए बुलि भमरि करुनाकर आहा दइ आइ की भेल ।—विद्यापति, पृ० ११८ ।

दइअ †
संज्ञा पुं० [सं० शैव] दे० 'दैव' । उ०—आह दइअ मैं काह नसावा । करत नीक फलु अनइस पावा ।—मानस, २ । १६३ ।

दइउ †
संज्ञा पुं० [सं० दैव] दे० 'दैव' । उ०—धीरज धरति सगुन बल रहत सो नाहिन । बर किसोर धनु घोर दइस नहिं दाहिन ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ५४ ।

दइजरी †
वि० [हिं०] दे० 'दईजारी' ।

दइजा †
संज्ञा पुं० [सं० दाय] दे० 'दायजा' ।

दइत पु
संज्ञा पुं० [सं० दैत्य] दिति का पुत्र । दे० 'दैत्य' । उ०— नगर अजुध्या रामहिं राजा । खैहें दइत हाँद सब साजा ।— कबीर सा०, पृ० ८०४ ।

दइमारा
वि० [हिं०] [वि० स्त्री० दइमारी] दे० 'दईमारा' । उ०— (क) दूध दही नहिं लेव रौ कहि कहि पचिहारी । कहति सूर कोऊ घर नाहीं कहाँ गई दइमारी ।—सूर (शब्द०) । (ख) आखु धरन हित दृष्ट मँजारी । मो परि उचरि चरी दइमारी ।—नंद० ग्रं०, पृ० १४८ ।

दइया †
संज्ञा पुं० [सं० दैव] दे० 'दैव' । (स्त्रियों की बोलचाल में आश्चर्य एवं केद आदि का व्यंजक) । उ०—भोर के आए दोऊ भइया । कीनों नहिन कलेऊ दइया ।—नंव० ग्रं०, पृ० २५५ ।

दइव †
संज्ञा पुं० [सं० दैव, प्रा० दइव] दे० 'दैव' । उ०—बेरि एक दइव दहिन जञो होई, निरधन धन जके धरव मोञें गोए ।— विद्यापति, पृ० ३५४ ।

दई
संज्ञा पुं० [सं० दैव] १. ईश्वर । विधाता । उ०—गई करि जाहु दई के निहारे ।—दास (शब्द०) । यौ०—वईमारा । मुहा०—दई का घाला = ईश्वर का मारा हुआ । अभागा । कम- बख्त । उ०—जननी कहति, दई की घाली ! काहे के इत- राती ।—सूर (शब्द०) । दई का मारा = दे० 'दईमारा' । दई दई = हे दैव ! हे दैव । रक्षा के लिये ईश्वर के पुकार । उ०— (क) दई दई आलसी पुकारा ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) दीरघ साँस न लोहि दुख, सुख साँईहिं न भूल । दई दई क्यों करत है, दई दई सो कबूल ।—बिहारी (शब्द०) । २. दैव संयोग । अदृष्ट । प्रारब्ध ।

दईजार, दईजारा
वि० [हिं०] [वि० स्त्री० दईजारी] अभागा । दईमारा । (स्त्रियाँ) ।

दईत पु
संज्ञा पुं० [सं० दैत्य] दे० 'दैत्य । उ०—कीन्हेसि राकस भूत परीता । कीन्हेसि भोकस देव दईता ।—जायसी (शब्द०) ।

दईमारा
वि० [हिं० दई + मारना] [वि० स्त्री० दईमारी] ईश्वर का मारा हुआ । जिसपर ईश्वर का कोप हो । अभागा । मंदभाग्य । कमबख्त । उ०—फीहा फीहा करौ या पपीहा दईमारे को ।—श्रीपति (शब्द०) ।

दईमारो पु †
वि० [हिं०] दे० 'दईमारा' ।

दउढ †
वि० [सं० अधि + अर्ध] दे० 'डेढ़' । उ०—दउढ़ वरस री मारुवी, त्रिहुँ वरसाँरिउ कंत । उणरउ जोबन बहि गयउ, तूँ किउँ जोबनवंत ।—ढोला०, दू० ४५० ।

दउरना †
क्रि० अ० [हिं० दौड़ना] दे० 'दौड़ना' ।

दउरा †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'दौरा' ।

दक
संज्ञा पुं० [सं०] जल । पानी ।

दकन
संज्ञा पुं० [सं० दक्षिण, फा़० दकन] दक्षिण भारत । देश का दक्षिणी भाग । २. दक्षिण दिक् । दक्खिन ।

दकार
संज्ञा पुं० [सं०] तवर्ग का तीसरा अक्षर 'द' ।

दकार्गल
संज्ञा पुं० [सं०] बृहत्संहिता के अनुसार भूमि के नीचे जल का ज्ञान करानेवाली एक विद्या । वि० दे० 'दगार्गल' [को०] ।

दकियानूस
संज्ञा पुं० [यू० सं अ० दक्यानूस] रोम देश का एक अत्याचारी सम्राट् जो सन् ३४९ ई० में सिंहासन पर बैठा था ।

दकियानूसी
वि० [अ० दक्यानूसी] १. दकियानूस के समय का । पुराना । २. बहुत ही पुराना । रुढ़िग्रस्त । जर्जर । निकम्मा । उ०—हम आप क्या पुरातन दकियानूसी वृत्ति का परिचय देकर या अति प्रगतिवाद का बहाना करके इस जागरण का स्वागत न करेंगे?—कुंकुम (भू०), पृ० ११ ।

दकीक
वि० [अ० दकीक़] मुश्किल । कठिन । गूढ़ । उ०—दिस्या सख्त मुश्किल मश्क दकीक । था पानी का वाँ इक चश्मा अमीक ।—दक्खिनी०, पृ० ३४५ ।

दकीका
संज्ञा पुं [अ० दकीक़हु] १. कोई बारीक बात । २. युक्ति । उपाय । मुहा०—कोई दकीका बाकी न रहना = कोई उपाय बाकी न रखना । सभ उपाय कर चुकना । जैसे,—मुझे नुससान पहुँचाने में तुमने कोई दकीका बाकी नहीं रखा । ३. क्षण । लहजा ।

दक्काक
वि० [अ० दक्का़क़] १. कूटनेवाला । पीसनेवाल । महीन करनेवाला । १. गूढ़ या सूक्ष्म बातों को कहनेवाला ।

दक्खण †
वि० [सं० दक्षिण, प्रा० दक्खिण] दक्षिण दिशा में स्थित दक्षिणी । उ०—ओढी औरँग साह नूँ उर निस दिवस अधीर । मन लग्गौ दक्खण मुलक, सरक न सकौ सरीर ।—रा० रू०, पृ० १९९ ।

दक्खिन (१)
संज्ञा पुं० [सं० दक्षिण, प्रा० दक्खिण] [वि० दक्खिनी] १. वह दिशा जो सूर्य की और मुँह करके खड़े होने से दाहिने हाथ की ओफ पड़ती है । उत्तर के समाने की दिशा । जैसे,— जिधर तुम्हारा पैर है वह दक्खिण है । विशेष—यद्यपि संस्कृत 'दक्षिण' शब्द विशेषण है पर हिंदीशब्द दक्खिन विशेषण के रूप में नहीं आता । दक्खिन ओर, दक्खिन दिशा आदि वाक्यों में भी दक्खिन विशेषण नहीं है । २. दक्षिण दिशा में पड़नेवाला प्रदेश । ३. भारतवर्ष का वह भाग जो दक्षिण की ओर है । विंध्य और नर्मदा के आगे का देश ।

दक्खिन (२)
क्रि० वि० दक्खिन की ओर । दक्षिण दिशा में । जैसे,— उनका गाँव यहाँ से दक्खिन पड़ता है ।

दक्खिनी (१)
वि० [हिं० दक्खिन] १. दक्खिन का । जो दक्षिण दिशा में हो । जैसे, नदी का दक्खिनी किनारा । २. जो दक्षिण के देश का हो । दक्षिण देश में उत्पन्न । दक्षिण देश संबंधी । जैसे, दक्खिणी आदमी, दक्खिनी बोली, दक्खिनी सुपारी, दक्खिनी मिर्च ।

दक्खिनी (२)
संज्ञा पुं० दक्षिण देश का निवासी ।

दक्खिनी (३)
संज्ञा स्त्री० दक्षिण देश की भाषा ।

दक्ष (१)
वि० [सं०] १. जिसमें किसी काम को चटपट सुगमतापूर्वक करने की शक्ति हो । निपुण । कुशल । चतुर । होशियार । जैसे,—वह सितार बजाने में बड़ा दक्ष है । २. दक्षिण । दाहना । उ०—(क) दक्ष दिसि रुचिर वारीश कन्या ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) दक्ष भाग अनुराग सहित इंदिरा अधिक ललिताई ।—तुलसी (शब्द०) । ३. साधु । सच्चा । ईमानदार । सत्यवक्ता (को०) ।

दत्क्ष (२)
संज्ञा पुं० १. एक प्रजापति का नाम जिनसे देवता उत्पन्न हुए । विशेष—ऋग्वेद में दक्ष प्रजापति का नाम आया है और कहीं कहीं ज्योतिष्कगण के पिता कहकर उनकी स्तुति की गई है । दक्ष अदिति के पिता थे, इससे वे देवताओं के आदिपुरुष कहे जाते हैं । जहाँ ऋग्वेद में सृष्टि की उत्पत्ति का यह क्रम बतलाया गया है कि अब से पहले ब्रह्मणस्पति ने कर्मकार की तरह कार्य किया, असत् से सत् उत्पन्न हुआ, उत्तानपद से भू और भू से दिशाएँ हुई, वहीं यह भी लिखा है कि 'अदिति से दक्ष जन्मे और दक्ष में अदिति जन्मी' । इस विलक्षण वाक्य के संबंध में निरुक्त में लिखा है कि 'या तो दोनों ने समान जन्म- लाभ किया, अथवा देवधर्मानुसार दोनों की एक दूसरे से उत्पत्ति और प्रकृति हुई । शतपथ ब्राह्मण में दक्ष को सृष्टि का पालक और पोषक कहा गया है । हिरवंश में दक्ष को विष्णुस्वरूप कहा गया है । महाभारत और पुराणों में जो दक्ष के यज्ञ की कथा है उसका वर्णन वैदिक ग्रंथों में नहीं मिलता, हाँ, रुद्र के प्रभाव के प्रसंग में कुछ उसका आभास सा मिलता है । मत्स्यपुराण में लिखा है कि पहले मानस सृष्टि हुआ करती थी । दक्ष ने जब देखा कि मानस द्वारा प्रजावृद्धि नहीं होती है तब उन्होंने मैथुन द्वारा सृष्टि का विधान चलाया । गरुड़पुराण मे दक्ष की कथा इस प्रकार है—ब्रह्मा ने सृष्टि की कामना से धर्म, रुद्र, मनु, भृगु तथा सनकादि को मानस- पुत्र के रूप में उत्पन्न किया । फिर दाहिने अँगूठे से दक्ष को और बाएँ अँगूठे से दक्षपत्नी को उत्पन्न किया । इस पत्नी सेदक्ष को सोलह कन्याएँ उत्पन्न हुई—श्रद्धा, मैत्री, दया शांति तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, मूर्ति, तितिक्षा, ह्रो, स्वाहा, स्वधा और सती । दक्ष ने इन्हें ब्रह्मा के मानसपुत्रों में बाट दिया । रुद्र को दक्ष की सती नाम की कन्या प्राप्त हुई । एक बार दक्ष ने अश्वमेघ यज्ञ किया जिसमें उन्होंने अपने सारे जामाताओं को बुलाया पर रुद्र को नहीं बुलाया । सती बिना बुलाए ही अपने पिता का यज्ञ देखने गई । वहाँ पिता से अपमानित होने पर उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया । इसपर महादेव ने क्रुद्ध होकर दक्ष का यज्ञ विध्वंस कर दिया और दक्ष को शाप दिया कि तुम मनुष्य होकर ध्रुव के वंश में जन्म लोगे । ध्रुव के वशंज प्रचेतागण ने जब घोर तपस्या की तब उन्हें प्रजासृष्टि करने का वर मिला और उन्होंने कडुकलन्या मारिषा के गर्भ से दक्ष को उत्पन्न किया । दक्ष ने चतुविंध मानस सृष्टि की । पर जब मानस सृष्टि से प्रजावृद्धि न हुई तब उन्होंने वीरण प्रजापति की कन्या असिक्नी को ग्रहण किया और उससे सहस्र पुत्र और बहुत सी कन्याएँ उत्पन्न कीं । उन्हीं कन्याओं से कश्यप आदि ने सृष्टि चलाई । और पुराणों में भी इसी प्रकार की कथा कुछ हेर फेर के साथ है । २. अत्रि ऋषि । ३. महेश्वर । ४. शिव का बैल । ५. ताम्रचूड़ । मुरगा । ६. एक राजा जो उशीनर के पुत्र थे । ७. विष्णु । ८. बल । ९. वीर्य । १०. अग्नि (को०) । ११. नायक का एक भेद जो सभी प्रेयसियों में समान भाव रखता हो (को०) । १२. शक्ति । योग्यता । उपयुक्ताता (को०) । १३. खोटा या बुरा स्वभाव (को०) ।

दक्षकन्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सती । वि० दे० 'दक्ष' । २. अश्विनी आदि तारा ।

दक्षकतुध्वंसी
संज्ञा पुं० [सं० दक्षक्रतुध्वंसिन्] १. महादेव । २. महादेव के अंश से उत्पन्न वीरभद्र जिन्होंने दक्ष का यज्ञ विर्ध्वस किया था ।

दक्षजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दक्षकन्या' । यौ०—दक्षजापति = (१) शिव । महेश्वर । (२) चंद्रमा [को०] ।

दक्षण †
वि० [सं० दक्षिण] दे० 'दक्षिण' । उ०—दक्षण अयन सु सुरत ऋतु, उपजे गए न नरक ।—ह० रासो, पृ० ३० ।

दक्षतनया
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दक्षकन्या' [को०] ।

दक्षता
संज्ञा स्त्री० [सं०] निपुणता । योग्यता । कमाल ।

कक्षदिशा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दक्षिण दिक्षा ।

दक्षन पु †
वि० [सं० दक्षिण] दाहिना । दाहिनी ओर का । उ०— मेढ़ु हू के ऊपर दक्षन पाव अनिए ।—सुदंर० ग्रं०, भा० १, पृ० ४२ ।

दक्षनायन पु
वि० [सं० दक्षिणायन] दे० 'दक्षिणायन' । उ०—भावे दक्षनायन हू, भावे उत्तरायन हूँ, भावे देह सर्प सिंह बिज्जुली हनंत जू ।—सुंदर०, ग्रं०, भा० २, पृ० ६४२ ।

दक्षविहिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार का गीत ।

दक्षसावर्णि
संज्ञा पुं० [सं०] नवें मनु का नाम ।

दक्षसुत
संज्ञा पुं० [सं०] देवता । सुर ।

दक्षसुता
संज्ञा स्त्री० [सं० दक्ष + सुता] दे० 'दक्षकन्या' [को०] ।

दक्षांड
संज्ञा पुं० [सं० दक्षाण्ड] मुरगी का अंडा [को०] ।

दक्षा (१)
वि० स्त्री० [सं०] कुथला । निपुणा ।

दक्षा (२)
संज्ञा स्त्री० १. पृथ्वी । २. गंगा का एक नाम (को०) ।

दक्षाय्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. वैचतेय । अरुड़ । २. गीध । गृद्ध [को०] ।

दक्षिण (१)
वि्० [सं०] १. दहना । दाहना । बायाँ का उलटा । अप- सव्य । २. इस प्रकार प्रवृत्त जिससे किसी का कार्य सिद्ध हो । अनुकूल । ३. साधु । ईमानदार । सच्चा (को०) । ४. उस ओर का जिधर सूर्य की ओर मुँह करके खड़े होने से दाहिना हाथ पेड़ । उत्तर का उलटा । यौ०—दक्षिणापथ । दक्षिणायन । ५. निपुण । दक्ष । चतुर ।

दक्षिण (२)
संज्ञा पुं० १. दक्खिन की दशा । उत्तर के सामने की दिशा । २. काव्य या साहित्य में वह नायक जिसका अनुराग अपनी सब नायिकाओं पर समान हो । ३. प्रदक्षिण । ४. तंत्रोक्त एक आचार या मार्ग । विशेष—कुलार्णव तंत्र में लिखा है कि सबसे उत्तम तो वेदमार्ग है, वेद से अच्छा वैष्णाव मार्ग है, वैष्णव से अच्छा शैव मार्ग है, शेव से अच्छा दक्षिण मार्ग है, दक्षिण से अच्छा वाम मार्ग है और वाम मार्ग से भी अच्छा सिद्धांत मार्ग है । ५. विष्णु । ६. शिव का एक नाम (को०) । ७. दाहिना हाथ या पार्श्व (को०) । ८. दे० 'दक्षिणाग्नि' । ९. रथ कै दाहिनी ओर का अश्व (को०) । १०. दक्षिण का प्रदेश (को०) ।

दक्षिणकालिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. तंत्रसार के अनुसार तांत्रिकों की एक देवी । २. दुर्गा [को०] ।

दक्षिणगोल
संज्ञा पुं० [सं०] विषुवत् रेखा से दक्षिण पड़नेवाली राशियाँ, जो छह है—तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन ।

दक्षिणपवन
संज्ञा पुं० [सं०] मलयपवन । मलयानिल ।

दक्षिण मार्ग
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार की तांत्रिक साधना । २. पितृयान [को०] ।

दक्षिणस्थ
संज्ञा पुं० [सं०] रथवाह । रथ हाँकनेवाला [को०] ।

दक्षिणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दक्षिण दिशा । २. वह धन जो ब्राह्मणों या पुरोहितों को यज्ञादि कर्म कराने के पीछे दिया जाता है । वह दान जो किसी शुभ कार्य आदि के समय ब्राह्मणों को दिया जाय । क्रि० प्र०—देना ।—लेना । विशेष—पुराणो में दक्षिणो को यज्ञ की पत्नी बतलाय, है । ब्रह्मवैवर्त्त पुराण में लिखा हैं कि कार्तिकी पूर्णिमा की रात को जो एक बार रास महोत्सव हुआ उसी में श्रीकृष्ण के दक्षिणांश से दक्षिणा की उत्पत्ति हुई थी । ३. पुरस्कार । भेट । ४. वह नायिका जो नायक के अन्य स्त्रियों से संबंध करने पर भी उससे बराबर वेसी ही प्रीति रखती हो ।

दक्षिणाग्नि
संज्ञा स्त्री० [सं० दक्षिण + अग्नि] यज्ञ में गार्हपत्याग्नि से दक्षिण ओर स्थापित अग्नि ।

दक्षिणाग्र
वि० [सं०] जिसका अगला अंश दक्षिण की ओर हो । दक्षिणाभिमुख [को०] ।

दक्षिणाचल
संज्ञा पुं० [सं०] मलयगिरि पर्वत । मलयाचल ।

दक्षिणाचार
संज्ञा पुं० [सं०] १. सदाचार । शुद्ध और उत्तम आचरण । २. तांत्रकों में एक प्रकार का आचार जिसमें अपने आपको शिव मानकर पंचतत्व से शिव की पूजा की जाती है । यह आचार वामाचार से श्रेष्ठ और प्रायः वैदिक माना जाता है ।

दक्षिणाचारी
संज्ञा पुं० [सं० दक्षिणाचारिन्] १. विशुद्धाचारी । धर्मशील । सदाचारी । २. वह तांत्रिक जो दक्षिणचार में दीक्षित हो ।

दक्षिणापथ
संज्ञा पुं० [सं०] विध्यपर्वंत के दक्षिण ओर का वह प्रदेश जहाँ से दक्षिण भारत के लिये रास्ते जाते हैं ।

दक्षिणापरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] नैऋत कोण ।

दक्षिणाप्रवण
संज्ञा पुं० [सं०] वह स्थान जो उत्तर की अपेक्षा दक्षिण की ओर अधिक नीचा या ढालुआँ हो । विशेष—मनु के अनुसार श्राद्ध आदि के लिये ऐसा ही स्थान उपयुक्त होता है ।

दक्षिणामूर्ति
संज्ञा पुं० [सं०] तंत्र के अनुसार शिव की एक मूर्ति ।

दक्षिणाभिमुख
वि० [सं०] दक्षिण की ओर मुँह किए हुए । जिसका मुख दक्षिण दिशा की ओर हो ।

दक्षिणायन (१)
वि० [सं०] दक्षिण की ओर । भूमध्यरेखा से दक्षिण की ओर । जैसे, दक्षिणायन सूर्य ।

दक्षिणायन (२)
संज्ञा पुं० १. सूर्य की कर्क रेखा से दक्षिण मकर रेखा की ओर गति । २. वह छह महीने का समय जिसमें सूर्य कर्क रेखा से चलकर बराबर दक्षिण की ओर बढ़ता रहता है । विशेष—सूर्य २१ जून को कर्क रेखा अर्थात् उत्तरीय अयनसीमा पर पहुँचता है ओर फिर वहाँ से दक्षिण की ओर बढ़ने लगता है और प्रायः २२ दिसंबर तक दक्षिणी अयन सीमा मकर रेखा तक पहुँच जाता है । पुराणानुसार जिस समय सूर्य दक्षिणायन हों उस समय कुआँ, तालाब, मंदिर आदि न बनवाना चाहिए और न देवताओं की प्राणप्रतिष्ठा करनी चाहिए । तो भी भैरव, वराह, नृसिंह आदि की प्रतिष्ठा की जा सकती है ।

दक्षिणावर्त (१)
वि० [सं०] जिसका घुमाव दाहिनी ओर को हो । जो दाहिनी ओर घुमा हुआ हो ।

दक्षिणावर्त (२)
संज्ञा पुं० एक प्रकार का शंख जिसका घुमाव दाहिनी ओर को होता है ।

दक्षिणावर्त्तकी
संज्ञा स्त्री० [सं० दक्षिणावर्त्तकी] दे० 'दक्षिणा- वर्तवती' ।

दक्षिणावर्तवती
संज्ञा स्त्री० [सं०] वृश्चिकाली नाम का पौधा ।

दक्षिणावह
संज्ञा पुं० [सं०] दक्षिण से आनेवाली हवा ।

दत्क्षिणाशा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दक्षिण दिशा ।

दत्क्षिणाशापति
संज्ञा पुं [सं०] १. यम । २. मंगलग्रह ।

दत्क्षिणी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० दक्षिण + ई (प्रत्य०)] दक्षिण देश की भाषा ।

दत्क्षिणी (२)
संज्ञा पुं० दक्षिण देश का निवासी ।

दत्क्षिणी (३)
वि० दक्षिण देश का । दक्षिण देश संबंधी ।

दत्क्षिणीय
वि० [सं०] १ दक्षिण का । दक्षिण संबंधी । दक्षिण देश का । २. जो दक्षिणा का पात्र हो ।

दत्क्षिण्य
वि० [सं०] दे० 'दक्षिणीय' [को०] ।

दत्क्षिन
संज्ञा पुं० [सं० दक्षिण] दे० 'दक्षिण' ।

दत्क्षिना
संज्ञा स्त्री० [सं० दक्षिणा] दे० 'दक्षिणा' । उ०—ब्राह्मनन को दान दक्षिना दैं श्री गोकुल आए ।—दो सौ बावन, भा० १, पृ० १३६ ।

दत्क्षिनी
वि, संज्ञा पुं० [सं० दक्षिणी] दे० 'दक्षिणी' ।

दखन
संज्ञा पुं० [सं० दक्षिण; फा़० दकन] दे० 'दक्षिण' ।

दखमा
संज्ञा पुं० [फा़० दख्मह्] वह स्थान जहाँ पारसी अपने मुरदे रखते हैं । विशेष—पारसियों में यह प्रथा है कि वे शव को जलाते या गाड़ते नहीं हैं बल्कि उसे किसी विशिष्ट एकांत स्थान में रख देते हैं जहाँ चील कौए आदि उसका मांस खा जाते हैं । इस काम के लिये वे थोड़ा सा स्थान पचीस तीस फुट ऊँची दीवार से चारों ओर से घेर देते हैं, जिसके ऊपरी भाग में जँगला सा लगा रहता है । इसी जँगले पर शव रख दिया जाता हैं । जब उसका मांस चील कौए आदि खा लेते हैं तब हड्डियाँ जँगले में से नीचे गिर पड़ती हैं । नीचे एक मार्ग होता है जिससे ये हड्डियाँ निकाल ली जाती हैं । भारत में निवास करनेवाले पारसियों के लिये इस प्रकार की व्यवस्था बंबई, सूरत आदि कुछ नगरों में हैं ।

दखल
संज्ञा पुं० [अ० दखल] १. अधिकार । कब्जा । क्रि० प्र०—करना ।-में आना ।-में लाना ।-होना । यौ०—दखलदिहानी । दखलनामा । दखलकार । २. हस्तक्षेप । हाथ डालना । उ०—मूरख दखल देइँ बिन जाने । गहैं चपलता गुरु अस्थाने ।—विश्राम (शब्द०) । क्रि० प्र०—देना । ३. पहुँच । प्रवेश । जैसे,—आप अँगरेजी में भी कुछ दखल रखते हैं । क्रि० प्र०—रखना ।

दखलदिहानी
संज्ञा स्त्री० [अ० दखल + फा़० दिहानी] किसी वस्तु पर किसी को अधिकार दिला देना । कब्जा दिलवाना ।

दखलनामा
संज्ञा पुं० [अ० दखल + फा़० नामह्] वह पत्र विशेषतः सरकारी आज्ञापत्र जिसमें किसी व्यक्ति के लिये कीसी पदार्थ पर अधिकार कर लेने की आज्ञा हो ।

दखिणाध पु †
संज्ञा पुं० [सं० दक्षिणापथ, प्रा० दक्खिणावध, दक्खिणावह] दक्षिण देश । उ०—उत्तर आज न जाइयइ, ।जिहाँ स सीत अगाध । ता भइ सूरिज डरपतउ, ,ताकि चलइ दक्षिणाध ।—ढोला०, दू० ३०१ ।

दखिन पु
संज्ञा पुं० [सं० दक्षिण, प्रा० दक्खिण] दे० 'दक्षिण' । उ०—देखि दखिन दिसि हय हिहिनाहीं ।—तुलसी (शब्द०) ।

दखिनहरा †
संज्ञा पुं० [हिं० दखिन + हारा] दक्षिण से आनेवाली हवा । दक्षिण की ओर से आती हुई हवा ।

दखिनहा †
वि० [हिं० दखिन + हा (प्रत्य०)] दक्षिण का । दक्षिणी ।

दखिना †
संज्ञा पुं० [हिं० दखिन + आ (प्रत्य०)] दक्षिण से आनेवाली हवा ।

दखील
वि० [अ० दखील] अधिकार रखनेवाला । जिसका दखल या कब्जा हो ।

दखीलकार
संज्ञा पुं० [अ० दखील + फा़० कार] वह असामी जिसने किसी जमीदार के खेत या जमीन पर कम से कम बारह वर्ष तक अपना दखल रखा हो ।

दखीलकारी
संज्ञा स्त्री० [अ० दखील + फा़० कार] १. दखीलकार का पद या अवस्था । २. वह जमीन जिसपर दखीलकार का अधिकार हो ।

दख्ख †
संज्ञा पुं० [सं० द्राक्षा, प्रा० दक्खा, दक्ख] दे० 'दाख (१) ।— उ०—अहर पयोहर, दुइ नयण मीठा जेहा मख्ख । ढोला एही मारुई, जाणे मीठी दख्ख ।—ढोला०, दू० ४७० ।

दगंबरु †
संज्ञा पुं० [हिं० दिगबंर] दे० 'दिगंबर' । उ०—दया दगंबरु नामु एकु मनि एको आदि अनूप ।—प्राण०, पृ० २१२ ।

दगइल †
वि० [हिं० दगैल] दे० 'दगैल' ।

दगड़
संज्ञा पुं० [? सं० ढक्का+ हिं० ड़ (प्रत्य०)] लड़ाई में बजाया जानेवाला बड़ा ढोल । जंगी ढोल ।

दगड़ना
क्रि० अ० [?] सच्ची बात का विश्वास न करना ।

दगड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० दगड़] दे० 'दगड़' ।

दगदगा
संज्ञा पुं० [अ० दग्दगहु] १. डर । भय । २. संदेह । शक । ३. एक प्रकार की कंडील ।

दगदगाना (१)
क्रि० अ० [हिं० दगना] दमदमाना । चमकना । उ०— ज्यों ज्यों अति कृशता बढ़ति त्यौं त्यौं दुति सरसात । दगदगात त्यौं ही कनक ज्यौ ही दाहत जात ।—गुमान (शब्द०) ।

दगदगाना (२)
क्रि० स० चमकाना । चमक उत्पन्न करना ।

दगदगाहट
संज्ञा स्त्री० [हिं० दगदगाना + हट (प्रत्य०)] चमक । दमक ।

दगदगी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दगदगा] दे० 'दगदगा' ।

दगध (१)
संज्ञा पुं० [सं० दग्ध] दे० 'दाह' । उ०—पेम का लुबुध दगध पै साधा ।—जायसी ग्रं०, पृ० ६४ ।

दगध (२)
वि० दे० 'दग्ध' । उ०—ग्यान दगध जोगिंद कुलट कैरव भगि पान ।—पृ० रा०, ५५ ।१२१ ।

दगधना पु † (१)
क्रि० अ० [सं० दग्ध, हिं० दगध + ना (प्रत्य०)] जलना । उ०—बज्र अगनि बिरहिन हिय जारा । सुलग सुलग दगधि भइ छारा ।—जायसी (शब्द०) ।

दगधना (२)
क्रि० स० १. जलाना । १. बहुत दुःख देना । कष्ट पहुंचाना ।

दगना (१)
क्रि० अ० [सं० दग्ध, हिं० दगध + ना (प्रत्य०)] १. (बंदूक या तोप आदि का) छूटना । चलना । जैसे,—बंदूक आप ही आप दग गई । २. जलना । दग्ध होना । झुलम जाना । उ०—श्री हरिदास के स्वामी स्याना कुंजबिहारी की कटाछ कोटि काम दगे ।—स्वामी हरिदास (शब्द०) । ३. दागा जाना । दागना का अकर्मक रूप ।

दगना (२)
क्रि० स० दे० 'दागना' । उ०—(क) विषधर स्वास सरिस लगै तन सीतल बन बात । अनलहु सौं सरसै दगै हिमकर कर धन गात ।—शृं० सत (शब्द०) । (ख) जे तब होत दिखा- दिखी भई अमी इक आँक । दगै तिराछी दीठ अब ह्वै वीछी कौ डाँक ।—बिहारी (शब्द०) ।

दगना (३)
क्रि० अ० [अ० दाग] १. दागा जाना । अंकित होना । चिह्नित होना । २. प्रसिद्ध होना । मशहूर होना । उ०—लोक बेद हूँ लौं दगौ नाम भले को पोच । धर्मराज जस गाज पवि कहत सकोच न सोच ।—तुलसी (शब्द०) ।

दगर †
संज्ञा पुं० ['देर' से देश०] दे० 'दगरा' ।

दगरा †
संज्ञा पुं० [?] १. देर । विलंब । उ०—भरोहि ते कान्ह करत तोसों झगरो ।..... सब कोउ जात मधुपुरी बेचन कौने दियो दिखावहु कगरो । अंचल ऐंचि ऐंचि राखत हौ जान देहु अब होत है दगरो ।—सूर (शब्द०) । २. डगर । रास्ता । उ०—वह जो खंडित मेंड बनी दगरे के माहीं ।—श्रीधर पाठक (शब्द०) ।

दगरी
संज्ञा स्त्री० [देश०] वह दही जिसपर मलाई या साढ़ी न हो ।

दगल (१)
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'दगला' । उ०—सोंर सुपेती मंदिर राती । दगल चीर पहिरहिं बहु भाँती ।—जायसी (शब्द०) ।

दगल (२)
संज्ञा पुं० [अ० दगल] १. धोखा । फरेब । मक्कर । २. खोटा सोना या चाँदी [को०] ।

दगलफसल
संज्ञा पुं० [अ० दगल + अनु० फसल या हिं० फँसाना] धोखा । फरेब ।

दगला
संज्ञा पुं० [देश०] मोटे वस्त्र का बना हुआ या रुईदार अँगरखा । भारी लबादा ।

दगली
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'दगला' । उ०—मुई मेरी माई हौ खरा सुखाला । पहिरौ नहीं दरली लगै न पाला ।—कबीर ग्रं०, पृ० ३०९ ।

दगवाना
क्रि० स० [हिं० दागना का प्रे० रूप] दागने का काम दूसरे से कराना । दूसरे को दागने में प्रवृत्त कराना । उ०— उठि भोरहि तोपन दगवायो । दीनन को बहु द्रव्य लुटायो ।— रघुराज (शब्द०) ।

दगहा (१)
वि० [हिं० दाग + हा (प्रत्य०)] १. जिसके दाग लगा हो । दागवाला । २. जिसके सफेद दाग हों ।

दगहा (२)
वि० [हिं० दाग (= प्रेतकर्म) + हा (प्रत्य०)] जिसने प्रेत- क्रिया की हो । प्रेतकर्मकर्ता ।

दगहा (३)
वि० [हिं० दगना + हा (प्रत्य०)] जो दागा हुआ हो । जो दग्ध किया गया हो ।

दगा
संज्ञा स्त्री० [अ० दगा] छल । कपट । धोखा । क्रि० प्र०—करना ।—देना ।—खाना । यौ०—दगाबाज । दगादार ।

दगाती
वि० [फा़० दगा] दगाबाज । धोखेबाज । उ०—छल बल करि नहिं काहू पकरत दौरि दगाती ।—घनानंद०, पृ० ५६६ ।

दगादगी
संज्ञा स्त्री० [फा़० दगा] धोखेबाजी । उ०—सजनी निपट अचेत है दगादगी समुझै न । चित बित परकर देत है लगालगी करि नैन ।—स० सप्तक, पृ० २३४ ।

दगादार
वि० [फा़० दाग + दार] धोखेबाज । छली । उ०—(क) एरे दगादार मेरे पातक अपार तोहिं गंगा के कछार में पछार छार करिहौं ।—पद्माकर (शब्द०) । (ख) छबीले तेरे नैन बड़े हैं दगादार ।—गीत (शब्द०) ।

दगादारी
संज्ञा स्त्री० [फा़० दगादार + ई] दे० 'दगादगी' ।

दगावाज (१)
वि० [फा़० दगाबाज] छली । कपटी । धोखा देनेवाला । उ०—(क) कोऊ कहै करत कुसाज दगाबाज बड़ो कोऊ कहै राम को गुलाम खरो खूब है ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) नाम तुलसी पै भोंडे भाग ते भयौ है दास, किए अंगीकार एते बड़े दगाबाज को ।—तुलसी (शब्द०) ।

दगाबाज (२)
संज्ञा पुं० छली मनुष्य । धोखा देनेवाला आदमी ।

दगाबाजी
संज्ञा स्त्री० [फा़० दगाबाजी] छल । कपट । धोखा । उ०—सुहृद समाज दगाबाजी ही को सोदा सूत जब जाको काज तब मिलै पाय परि सो ।—तुलसी (शब्द०) ।

दगार्गल
संज्ञा पुं० [सं०] बृहत्संहिता के अनुसार एक प्रकार की विद्या, जिसके अनुसार किसी निर्जल स्थान कै ऊपरी लक्षण आदि देखकर, भूमि के नीचे पानी होने अथवा न होने का ज्ञान होता है । विशेष—बृहत्संहिता में लिखा है कि जिस प्रकार मनुष्य के शरीर में रक्तवाहिना शिराएँ होती है उसी प्रकार पृथ्वी में जलवाहिनी शिराएँ होती हैं और इन शिराओं के किसी स्थान पर होने अथवा न होने का ज्ञान वृक्षों आदि को देखकर हो सकता है । जैसे, यदि किसी निर्जल स्थान में जामुन का पेड़ हो तो समझना चाहिए कि उससे तीन हाथ की दूरी पर उत्तर की ओर दो पुरसे नीचे पूर्ववाहिनी शिरा है; यदि किसी निर्जन स्थान में गूलर का पेड़ हो तो उससे पश्चिम तीन हाथ की दूरी पर डेढ़ दो पुरसे नीचे अच्छे जल की शिरा होगी, इत्यादि ।

दगैल (१)
वि० [अ० दाग + एल (प्रत्य०)] १. दागदार । जिसमें दाग हो । २. जिसमें कुछ खोट वा दोष हो ।

दगैल (२)
संज्ञा पुं० [अ० दगा] दगाबाज । छली । उ०—सात कोस जौलों चलि आए । भए दगैलन के मन भाए ।—लाल (शब्द०) ।

दग्गना पु
क्रि० अ० [हिं० दगना] दे० 'दगना' । उ०—तोप तुपक चद्दर सब दग्गिय ।—ह० रासो, पृ० १४८ ।

दग्ध (१)
वि० [सं०] १. जल या जलाया हुआ । २. दुःखित । जिसे कष्ट पहुँचा हो । जैसे, दग्धहृदय । ३. कुम्हलाया हुआ । म्लान । जैसे, दग्ध आनन । ४. अशुभ । जैसे, दग्ध योग । ५. क्षुद्र । तुच्छ । विकृष्ट । जैसे, दग्धदेह, दग्धउदर, दग्धजठर । ६. शुष्क । नीरस । बेस्वाद (को०) । ७ बुभुक्षित । क्षुधाग्रस्त (को०) । ८. चतुर । चालाक । विदग्ध (को०) ।

दग्ध (२)
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार की घास जिसे कतृण भी कहते हैं ।

दग्धकाक
संज्ञा पुं० [सं०] डोम कौवा ।

दग्धमंत्र
संज्ञा पुं० [सं० दग्धमन्त्र] तंत्र के अनुसार वह मंत्र जिसके मूर्धा प्रदेश में वह्नि और वायुयुक्त वर्ण हों ।

दग्धरथ
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्र के सारथी चित्ररथ गंधर्व का एक नाम । विशेष—दे० 'चित्ररथ' ।

दग्धरुह
संज्ञा पुं० [सं०] तिलक वृक्ष ।

दग्धरुहा
संज्ञा स्त्री० [सं०] कुरुह नामक वृक्ष ।

दग्धवर्णक
संज्ञा पुं० [सं०] रोहिष नाम की घास ।

दग्धव्रण
संज्ञा पुं० [सं०] जलने का घाव [को०] ।

दग्धव्य
वि० [सं०] जलाने लायक । कष्ट देने योग्य [को०] ।

दग्धा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सूर्य के अस्त होने की दशा । पश्चिम । २. एक प्रकार का वृक्ष जिसे कुरु कहते हैं । ३. कुछ विशिष्ट राशियों से युक्त कुछ विशिष्ट तिथियाँ । जैसे—मीन औरप घन की अष्टमी । वृष और कुंभ की चौथ । मेष और कर्क की छठ । कन्या और मिथुन की नौमी । वृश्चिक और सिंह की दशमी । मकर और तुला की द्धादशी । विशेष—दग्धा तिथियों में वेदारंभ, विवाह, स्त्री प्रसंग, यात्रा या वाणिज्य आदि करना बहुत हानिकारक माना जाता है ।

दग्धा (२)
वि० [सं० दग्धृ] १. जलानेवाला । २. दुःख देनेवाला । [को०] ।

दग्धात्क्षर
संज्ञा पुं० [सं०] पिंगल के अनुसार झ, ह, र, भ और ष ये पाँचों अक्षर, जिनका छंद के आरंभ में रखना वर्जित हैं । उ०—दीजो भूल न छंद के आदि झ ह र म ष कोइ । दग्धाक्षर के दोष तें छंद दोषयुत होइ ।—(शब्द०) ।

दग्धाह्व
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का वृक्ष ।

दग्धिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दे० 'दग्धा' । २. जला हुआ अन्न या भात (को०) ।

दग्धित पु
वि० [सं० दग्ध + हिं० इत (प्रत्य०)] दे० 'दग्ध' । उ०—बोले गिरा मधुर शांति करी विचारी । होवे प्रबोध जिससे दुख दग्धितों का ।—प्रिय०, पृ० १६९ ।

दग्धेष्टका
संज्ञा स्त्री० [सं० दग्ध + इष्टका] जली और झुलसी हुई ईंट । झावाँ [को०] ।

दघ्न
वि० [सं०] [वि० स्त्री० दघ्नी] ... तक पहुँचने या जाननेवाला ... तक गहरा या ऊँचा । (समासांत में प्रयुक्त) । जैसे, उरुदध्न, जानुदघ्न, गुल्फदघ्न आदि ।

दचक
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. झटके या दबाव से लगी हुई चोट । २. धक्का । ठोकर । ३. दबाव ।

दचकना (१)
क्रि० अ० [अनु०] १. ठोकर या धक्का खाना । २. दब जाना । लचकना । ३. झटका खाना ।

दचकना (२)
क्रि० स० १. ठोकर या धक्का लगाना । २. दबाना । लचकाना । ३. झटका देना ।

दचका
संज्ञा पुं० [हिं० दचकना] धक्का । ठोकर । उ०—हलका सा दचका लगा तो गाड़ीवान की नींद खुल गई ।—रति०, पृ० ६२ ।

दवना
क्रि० अ० [देश०] गिरना । पड़ना । उ०—गगन उड़ाइ गयो ले श्यामहि आइ घरनि पर आप दच्यो री ।—सूर (शब्द०) ।

दच्चा
संज्ञा पुं० [देश०] ठोकर । धक्का । दचका । उ०—तजै बाल- बच्चे फिरैं खात दच्चे ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० ११ ।

दच्छ पु
वि० [सं० दक्ष] चतुर । निष्णात । कुशल । उ०—सापवस मुनिबधू मुक्तकृत विप्रहित यज्ञरच्छन दच्छ पच्छकर्ता ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ।

दच्छ
संज्ञा पुं० [सं० दक्ष, प्रा० दच्छ] दे० 'दक्ष' । उ०—जनमी प्रथम दच्छगृह जाई । मानस, १ । यौ०—दच्छकुमारी । दच्छसुत = दक्ष प्रजापति के पुत्र । उ०— दच्छसुतन्हि उपदेसेन्हि जाई ।—मानस, १ । दच्छसुता ।

दच्छकुमारी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दक्ष + कुमारी] दक्ष प्रजापति की कन्या, सती । उ०—मुनि सन विदा माँगि त्रिपुरारी । चले भवन सँग वच्छकुमारी ।—तुलसी (शब्द०) ।

दच्छना
संज्ञा स्त्री० [सं० दक्षिणा] दे० 'दक्षिणा' ।

दच्छसुता पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दक्षसुता] दक्ष की कन्या, सती ।

दच्छिन पु
संज्ञा पुं, क्रि० वि०, वि० [सं० दक्षिण] दे० 'दक्षिण' । उ०—दच्छिन पिय ह्वै वाम वस बिसराई तिय आन । एकै वासर के विरह लागे बरष बितान ।—बिहारी (शब्द०) ।

दच्छिननायक पु
संज्ञा पुं० [सं० दक्षिण + नायक] दे० 'दक्षिणनायक' ।

दच्छिना
संज्ञा स्त्री० [सं० दक्षिणा + नायक] दे० 'दक्षिणनायक' ।

दच्छिना
संज्ञा स्त्री० [सं० दक्षिणा] दे० 'दक्षिणा' । उ०—दच्छिना देत नंद पग लागत, आसिस देत गरग सब द्विजबर ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३७१ ।

दछना, दछिना पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दक्षिणा] दे० 'दक्षिणा' । उ०— (क) भोजन कर जिजमान जिमाये । दछना कारन जाय अड़े ।—संत तुरसी०, पृ० १८९ । (ख) तुमहि मिलैगो बीरा दछिना भरि भरि झोरी जू ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३३६ ।

दज्जाल
संज्ञा पुं० [अ० दज्जाल] झूठा । बेईमान । अत्याचारी ।

दझ्झना पु
क्रि० अ० [सं० दग्ध, प्रा० दभझ] दे० 'दहना' । उ०— दुज्जर काय सु कहत राज मन मांहिं समभझौं । कामज्वाल मों बढ़िय तुमहि तिन कै दुख दभझौं ।—पृ० रा०, १ ।४१६ ।

दट (१)
क्रि० अ० [सं० दष्ट, प्रा० दठ्ठ (= कटा हुआ)] दब जाना । हेठ पड़ना । उ०—तरह मदन रत तरणी, देख दिल दरप जाय दट ।—रघु० रू०, पृ० ३९ ।

दटना पु (२)
क्रि० अ० [हिं० डटना] दे० 'डटना' ।

दड़घल
संज्ञा पुं० [सं० दण्डोत्पल] सहदेई नाम का पौधा ।

दडक्का पु
संज्ञा पुं० [अनु०] दरेरा । उ०—इक इक्क हचक्कैं, देत दडक्कैं, सेल तटक्कैं श्रौन बहैं ।—सुजान०, पृ० ३१ ।

दडी
संज्ञा स्त्री० [देश०] कंदुक । गेंद । तड़ी । उ०—जोध पाँण दड़ी जेम आँणियो गिरंद एम । उठे अहीराव जाँण, नीद सूँ उलास ।—रघु० रू०, पृ० १९६ ।

दडूक
संज्ञा स्त्री० [अनु०] दहाड़ । गरज ।

दडूकना
क्रि० अ० [अनु०] दहाड़ना । गरजना ।

दडोकना
क्रि० अ० [अनु०] दहाड़ना । गरजना । बाघ, साँड़, आदि का बोलना ।

दड्ढ पु
वि० [सं० द्दढ, प्रा० दड्ढ] पक्का । मजबूत । दृढ़ । उ०— लरे राव कै रावंत जोर दड्ढं ।—ह० रासो, पृ० ६९ ।

दढ पु
वि० [सं० दृढ़, प्रा० दड्ढ] दे० 'दृढ़' । उ०—स्रपं ब्यूह आकार सज्जे सभारं । दढ़ँ फत्र पुंछँ रचे भ्रित सारं ।—पृ० रा०, १ ।६३३ ।

दढ़ियल
वि० [हि० दाढ़ी + इयल (प्रत्य०)] दाढ़ीवाला । जो दाढ़ी रखे हो ।

दणयर, दणियर पु †
संज्ञा पुं० [सं० दिनकर, प्रा० दिणयर] सूर्य । दिनकर । उ०—मारू सी देखी नहीं, अणमुख दोय नयणाँह । थोड़ो सो भोले पड़इ, दणयर उगहंताँह ।—ढोला०, दू० ४७८ ।

दत
संज्ञा पुं० [सं० दत्त (= दान)] दे० 'दान' उ०—देतौ अड़ब पसाव दत, बीर गोड़ वछराज ।—बाँकी० ग्रं०, भा० १, पृ० ७९ ।

दतना †
क्रि० अ० [हिं० डटना] दे० 'डटना' । उ०—केसव कैसहुँ देखन कौं तिन्हैं भोरहीं भोरी ह्वौ आनि दती हो । पान खवावत ही तिनसों तुम राति कहा सतराति हती हौं ।— केशव ग्रं०, भा० १, पृ० ७१ ।

दतवन
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'दतुवन' ।

दतारा
वि० [हिं० दाँत + आर (प्रत्य०)] १. दाँतवाला । जिसमें दाँत हों । दाँतदार । २. बड़े बड़े या द्दढ़ दाँतोंवाला (हाथी, शूकर आदि) ।

दतिया (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० दाँत + इया (प्रत्य०)] दाँत का स्त्रीलिंग और अल्पार्थक रूप । छोटा दाँत ।

दतिया (२)
संज्ञा पुं० [देश०] १. एक प्रकार का पहाड़ी तीतर जो बहुत सुंदर होता है । इसकी खाल अच्छे दामों पर बिकती है । नीलमोर । २. एक पुराना राज्य ।

दतिसुत
संज्ञा पुं० [सं० दितिसुत] दैत्य । राक्षस (डिं०) ।

दतुअन
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'दतुवन' ।

दतुइन †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'दतुवन' । उ०—दतुइन करी न जाय नहीं अब जाय नहाई ।—पलटू०, भा० १, पृ० ३२ ।

दतुवन
संज्ञा स्त्री० [हिं० दाँत + अवन (प्रत्य०) अथवा धावन] १. नीम या बबूल आदि की काटी हुई छोटी टहनी जिसके एक सिरे को दाँतों से कुचलकर कूँची की तरह बनाते और उससे दाँत साफ करते हैं । दातुन ।क्रि० प्र०—करना । २. दाँत साफ करने और मुँह धोने की क्रिया ।क्रि० प्र०—करना । यौ०—दतुवन कुल्ला = दाँत साफ करने और मुँह धोने की क्रिया ।

दतून
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'दतुवन' ।

दतौन
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'दतुवन' ।

दत्त (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. दत्तात्रेय । २. जैनियों के नौ वासुदेवों में से एक । ३. एक प्रकार के बंगाली कायस्थों की उपाधि । ४. दान । ५. दत्तक ।

दत्त (२)
वि० १. दिया हुआ । प्रदत्त । २. दान किया हुआ । ३. सुरक्षित । रक्षित (को०) ।

दत्तक
संज्ञा पुं० [सं०] शास्त्रविधि से बनाया हुआ पुत्र । वह जो वास्तव में पुत्र न हो, पर पुत्र मान लिया गया हो । गोद लिया हुआ लड़का । मुतबन्ना । विशेष—स्मृतियों में जो औरस और क्षेत्रज के अतिरिक्त दस प्रकार के पुत्र गिनाए गए हैं, उनमें दत्तक पुत्र भी है । इसमें से कलियुग में केवल दत्तक ही को ग्रहण करने की व्यवस्था हैं, पर मिथिला और उसके आसपास कृत्रिम पुत्र का भी ग्रहण अबतक होता है । पुत्र के बिना पितृऋण से उद्धार नहीं होता इससे शास्त्र पुत्र ग्रहण करने की आज्ञा देता है । पुत्र आदि होकर मर गया हो तो पितृऋण से तो उद्धार हो जाता है पर पिंडा पानी नहीं मिल सकता इससे उस अवस्था में भी पिंडा पानी देने और नाम चलाने के लिये पुत्र ग्रहण करना आवश्यक है । किंतु यदि मृत पुत्र का कोई पुत्र या पौत्र हो तो दत्तक नहीं लिया जा सकता । दत्तक के लिये आवश्यक यह है कि दत्तक लेनेवाले को पुत्र, पौत्र, प्रपौञ आदि न हो । दूसरी बात यह है कि आदान प्रदान की विधि पूरी हो अर्थात् लड़के का पिता यह कहकर अपने पुत्र को समर्पित करे कि मैं इसे देता हूँ और दत्तक लेनेवाला यह कहकर उसे ग्रहण करे 'धर्माय त्वां परिगृह्वामि, सन्तत्यै त्वां परिगृह्वामि । द्विजों के लिये हवन आदि भी आवश्यक है । वह पुत्र जिसपर उसका असली पिता भी अधिकार रखे और दत्तक लेनेवाला भी 'द्वामुष्यायण' कहलाता है । ऐसा लड़का दोनों की संपत्ति का उत्तराधिकारी होता है और दोनों के कुल में विवाह नहीं कर सकता है । दत्तक लेने का अधिकार पुरुष ही को है, अतः स्त्री यदि गोद ले सकती है तो पति की अनुमति से ही । विधवा यदि गोद लेना चाहे तो उसे पति की आज्ञा का प्रमाण देना होगा । वशिष्ठ का वचन है कि स्त्री पति की आज्ञा के बिना न पुत्र दे और न ले । नंद पंडित ने तो दत्तक मीमांसा में कहा है कि स्त्री को गोद लेने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि वह जाप होम आदि नहीं कर सकती । पर दत्तकचंद्रिका के अनुसार विधवा को यदि पति आज्ञा दे गया हो तो वह गोद ले सकती है । वंगदेश और काशी प्रदेश में स्त्री के लिये पति की अनुमति अनिवार्य है, और वह इस अनुमति के अनुसार पति के जीते जी या मरने पर गोद ले सकती है । महाराष्ट्र देश के पंडित वशिष्ठ के वचन का यह अभिप्राय निकालते है कि पति की अनुमति की आवश्यकता उस अवस्था में हैं जब दत्तक पति के सामने लिया जाय; पति के मरने पर विधवा पति के कुटुंबियों से अनुमति लेकर दत्तक ले सकती है । कैसा लड़का दत्तक लिया जा सकता है, स्मृतियों में इस संबंध में कई नियम मिलते है— (१) शौनक, वशिष्ठ आदि ने एकलौते या जेठे लड़के को गोद लेने का निषेध किया है । पर कलकत्ते को छोड़ और दूसरे हाइकोटों ने ऐसे लड़के का गोद लिया जाना स्वीकार किया है । (२) लड़का सजातीय हो, दूसरी जाति का न हो । यदि दूसरी जाति का होगा तो उसे केवल खाना कपड़ा मिलेगा । (३) सबसे पहले तो भतीजे या किसी एक ही गोत्र के सपिंड को लेना चाहिए, उसके अभाव में भिन्न गोत्र सपिंड, उसके अभाव में एक ही गोत्र का कोई दूरस्थ संबंधी जो समानोदकों के अंतर्गत हो उसके अभाव में कोई । सगोत्र । (४). द्वीजातियों में लड़की का लड़का, बहिन का लड़का, भाई, चाचा, मामा, मामी का लड़का गोद नहीं लिया जा साकता । नियम यह है कि गोद लेने के लिये जो लड़का हो वह 'पुत्र- च्छायावह' हो अर्थात् ऐसा हो जिसकी माता के साथ दत्तक लेनेवाले का नियोग या समागम हो सके । दत्तक विषय पर अनेक ग्रंथ संस्कृत में हैं जिनमें नंद पंडित की 'दत्तक मीमांसा' और देवानंद भट्ट तथा कुबेर कृत 'दत्तक- चंद्रिका' सबसे अधिक मान्य है । मुहा०—दत्तक लेना = किसी दूसरे के पुत्र को गोद लेकर अपना पुत्र बनना ।

दत्तचित्त
वि० [सं०] जिसने किसी काम में खूब जी लगया हो । जिसने खूव चित्त लगाया हो ।

दत्ततोर्थकृत्
संज्ञा पुं० [सं०] गत उत्सर्पिणी के आठवे अहंष (जैन) ।

दत्तद्दष्टि
वि० [सं०] जिसकी आँखे किसी वस्तु पर टिकी हों [को०] ।

दत्तशुल्का
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह लड़की जिसे प्राप्त करने के लिय़े शुल्क के रूप मे कोई द्रव्य दिया गया हो [को०] ।

दत्तस्यानपाकर्म
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य के अनुसार कोई चीज किसी को देकर फिर लौटाना । एक बार दान करके फिर वापस माँगना या लेना ।

दत्तहस्त
वि० [सं०] जिसे हाथ का सहारा दिया गया हो [को०] ।

दत्ता
संज्ञा पुं० [सं० दत्त] दे० 'दत्तत्रेय' ।

दत्तात्रेय
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रसिद्ब प्राचीन ऋषि जो पूराणानुसार विष्णु के चौबीस अवतारों में से एक माने जाते हैं । विशेष—मार्कड़ेय पुराण में इनकी उत्पत्ति के संबंध में जो कथा लिखी है वह इस प्रकार है—एक कोढी़ ब्रह्मण की स्त्री बड़ी पतिव्रता और स्वामिभक्त थी । एक बार वह ब्राह्मण एक वेश्या पर आसक्त हो गया । उसके आज्ञानुसार उसकी पतिव्रता स्त्री उसे अपने कंधे पर बैठा कर अँधेरी रात में उस वेशया के घर चली । रास्ते में मांडव्य ऋषि तपस्या कर रहे थे; अँधेरेमें कोढी़ ब्राह्मण का पैर उन्हें लग गया । उन्होंने शाप दिया कि जिसका पैर मुक्ते लगा है सूर्य निकलते निकलते वह मर जायगा । सती स्त्री ने अपने पति की रक्षा करने और वैधव्य से बचने के लिये कहा कि जाओ सूर्य उदय ही न होगा । जब सूर्य का उदय न हुआ और पृथ्वी के नाश की संभावना हुई तब सब देवता मिलकर ब्रह्मा के पास गए । ब्रह्मा ने उन्हे अत्रि मुनि की स्त्री अनसूया के पास जाने की संमति दी । देवताओं के प्रार्थना करने पर अनसूया ने जाकर ब्राह्मण पत्नी की समझाया और कहा कि तूम सूर्योदय होने दो तुम्हारे पति के मरते ही मैं उन्हें फिर सजीव कर दूँगी और उनका शरीर भी नीरोग हो जायगा । इसपर वह मान गई, तब सूर्य उदय हुआ और मृत ब्राह्मण को अनसूया ने फिर जीवित कर दिया । देवताओं ने प्रसन्न होकर अनसुया से वर माँगने के लिये कहा । अनसूया ने कहा—ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों मेरे गर्भ से जन्म ग्रहण करें । ब्रह्मा ने इसे स्वोकार किया; और तदनुसार ब्रह्मा ने सोम बनकर, विष्णु ने दत्तात्रेय बनकर, और महेश्वर ने दुर्वासा बनकर अनसूया के घर जन्म लिया । हैहयराज ने जब अत्रि को बहुत कष्ट पहुँचाया था तब दत्तात्रेय क्रुद्ध होकर सातवें ही दिन गर्भ से निकल आए थे । ये बड़े भारी योगी थे और सदा ऋषिकुमारों के साथ योगसाधन किया करते थे । एक बार ये अपने साथियों और संसार से छुटकारा पाने के लिये बहुत समय तक एक सरोवर में ही ड़ूबे रहे फिर भी ऋषिकुमारों ने उनका संग न छोड़ा वे सरोवर के किनारे उनके आसरे बैठे रहे । अंत में दत्तात्रेय उन्हें छलने के लिये एक सुंदरी को साथ लेकर सरोबर से निकले और मद्दापान करने लगे । पर ऋषिकुमारों ने यह समझकर तब भी उनका संग न छोड़ा कि ये पूर्ण योगीश्वर है, इनकी आसक्ति किसी विषय में नहीं है । भागवत के अनुसार हन्होंने चौबीस पदार्थो से अनेक शिक्षाएँ ग्रहण की थीं और उन्हीं चौबीस पदार्थो को ये अपना गुरु मानते थे । वे चौबीस पदार्थ ये हैं—पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चंद्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, सागर, पतंग, मधुकर (भौरा और मधुमक्खी), हाथी, मधुहारी (मधुसंग्रह करनेवाली), हरिन, मछली, पिंगला वेश्या, गिद्ध, बालक, कुमारी कन्या. बाण बनानेवाला, साँप, मकड़ी और तितली ।

दत्ताप्रदनिक
संज्ञा पुं० [सं०] व्यवहार में अट्ठारह प्रकार के विवाद पदों में से पाँचवाँ विवाद पद । किसी दान किए हुए पदार्थ को अन्यायपूर्वक फिर से प्राप्त करने का प्रयत्न ।

दत्तावधान
वि० [सं० दत्त + अवधान] दत्तचित्त । सावधान । उ०—भारत साम्राज्य को भी दत्तावधान होना पड़ा है...... । प्रेमधन०, भा० २. पृ० २२२ ।

दत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] दान [को०] ।

दत्ती
संज्ञा स्त्री० [सं०] सगाई का पक्का होना ।

दत्तेय
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्र ।

दत्तोपनिषद्
संज्ञा पुं० [सं०] एक उपनिषद् का नाम ।

द्त्तोलि
संज्ञा पुं० [सं०] पुलस्त्य मुनि का एक नाम ।

दत्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. धन । २. सोना ।

दत्त्रिम (१)
वि० [सं०] दान में पाप्त । दानस्वरूप मिला हुआ [को०] ।

दत्त्रिम (२)
संज्ञा पुं० [सं०] दत्तक पुत्र ।

दत्रेय पु †
संज्ञा पुं० [सं० दत्तात्रेय] दे० 'दत्तात्रेय' । उ०—व्यास जग्य दञेय बुद्ध नारद सुमुनीवर ।—सुजान०, पृ० ३ ।

ददन
संज्ञा पुं० [सं०] दान । देने की क्रिया ।

ददनी †
संज्ञा स्त्री० [सं० ददन + हिं० ई (प्रत्य०)] दान । उ०— हरिजन हरि चरचा नित बाँटहिं ज्ञान ध्यान की ददनी ।— भीखा० श०, पृ० ९ ।

ददमर
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का पेड़ ।

ददरा
संज्ञा पुं० [देश०] छानने का कपड़ा । छत्रा । साफी ।

ददरी
संज्ञा पुं० [देश०] १. पके हुए तमाखू के पत्ते पर का दाग । २. दे० 'अरबन' । ३. उत्तर प्रदेश का एक स्थान जहाँ पशुओं का मेला लगता है ।

ददा
संज्ञा पुं० [हिं० दादा] दे० 'दादा' । उ०—यह विनोद देखत धरनीधर मात पिता बलभद्र ददा रे ।—सूर (शब्द०) ।

ददिऔर, ददिऔरा †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'ददिहाल' ।

ददिता
वि०, संज्ञा पुं० [सं० ददितृ] देनेवाला । दान देनेवाला । दाता [को०] ।

ददियाल
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'ददिहाल' ।

ददिया ससुर
संज्ञा पुं० [हिं० दादा + ससुर] श्वसुर का पिता । ससुर का बाप ।

ददिया सास
संज्ञा स्त्री० [हिं० दादी + सास] सास की सास । ददिया ससुर की स्त्री ।

ददिहाल
संज्ञा पुं० [हिं० दादा + आलय] १. दादा का कुल । २. दादा का घर ।

ददोड़ा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'ददोरा' ।

ददोरा
संज्ञा पुं० [हिं० दाद] मच्छर, बर्रे आदि के काटने या खुजलाने आदि के कारण चमड़े के ऊपर थोड़े से घेरे के बीच में पड़ी हुई थोड़ी सी सूजन जो चकती की तरह दिखाई देती है । चकत्ता । चटखर । उ०—बसन फटे उपटे सुबुक चिबुक ददोरे हाय । चिहुँटन सुमन गुलाब को अब मम जाय बलाय ।—स० सप्तक, पृ० २६६ ।

दददुर
संज्ञा पुं० [सं० दर्दुर] दे० 'दादुर' । उ०—करैं सोर झिल्ली घनं ददुंदुरं गे । तहाँ बाल लीला करैं काँम संगे ।ह० रासो, पृ० २० ।

दद्रु
संज्ञा पुं० [सं०] १. दाद का रोग । २. कछुआ । यौ०—दद्रु विनाश ।

दद्रुक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दद्रु' [को०] ।

दद्रुध्न
संज्ञा पुं० [सं०] चक्रमर्द । चकवँड़ ।

दद्रुण
वि० [सं०] दद्रु रोग से पीड़ित [को०] ।

दद्रू
संज्ञा पुं० [सं०] दाद रोग ।

दद्रूण
वि० [सं०] दे० 'दद्रुण' [को०] ।

दध पु † (१)
संज्ञा पुं० [सं० दधि] दे० 'दधि' ।

दध (२)
वि० [सं०] धारण करनेवाला । ग्रहण करनेवाला [को०] ।

दध (३)
संज्ञा पुं० भाग । हिस्सा । अंश [को०] ।

दध पु (४)
संज्ञा पुं० [सं० उदधि, हिं० दधि] सागर । समुद्र । उ०—प्रभु चिरत सुण हुअ पराँ प्रफुलत, अखे अणसंका । दध बीच बाग असोक देखो, लछी गढ़ लंका ।—रघु० रू०, पृ० १६२ ।

दध पु (५)
वि० [सं० दग्ध] अशुभ । वर्जित । उ०—आदि चरण में दध अखर गण अणशुभ गुणगाथ ।—रघु० रू०, पृ० १२ ।

दधना पु
क्रि० अ० [सं० दहन] जलना । दहना ।

दधसार पु
संज्ञा पुं० [सं० दधिसार] दे० 'दधिसार' ।

दधि (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. दही । जमाया हुआ दूध । २. वस्त्र । कपड़ा ।

दधि (२)
पुं० [सं० उदधि] समुद्र । सागर । विशेष—इस अर्थ में दधि शब्द का प्रयोग सूरदास ने बहुत किया है ।

दधिकादो
संज्ञा पुं० [सं० दधि + कदर्म>हिं० काँदो (= कीचड़)] जन्माष्टमी के समय होनेवाला एव प्रकार का उत्सव, जिसमें लोग हलदी मिला हुआ वही एक दूसरे पर फेंकते हैं । उ०— यशुमति भाग सुहागिनी जिन जायो हरि सो पूत । करहु ललन की आरती री अरु दधिकादो सूत ।—सूर (शब्द०) । विशेष—कहते हैं, श्रीकृष्णजन्म के समय गोपों और गोपि- काओं ने आनंद में मग्न होकर हल्दी मिला दही एक दूसरे पर इतना अधिक फेंका था कि गोकुल की गलियों में दही का कीचड़ सा हो गया था ।

दधिक्रा, दधिक्राव्णा
संज्ञा पुं० [सं०] एक वैदिक देवता जो घोड़े के आकार के माने जाते हैं । २. घोड़ा । अश्व ।

दधिकूर्चिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] फटे हुए दूध का वह अंश जो पानी निकलने पर बच जाता है । छेना ।

दधिचार
संज्ञा पुं० [सं०] मथानी ।

दधिज
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दधिजात' ।

दधिजात (१)
संज्ञा पुं० [सं०] मक्खन । नवनीत ।

दधिजात (२)
संज्ञा पुं० [सं० उदधि + जात (= उत्पन्न)] चंद्रमा । उ०—देखो मैं दधिजात ।—सूर (शब्द०) ।

दधित्थ
संज्ञा पुं० [सं०] कपित्थ । कैथ ।

दधित्थाख्य
संज्ञा पुं० [सं०] लोबान ।

दधिदान
संज्ञा पुं० [सं० दधि + दान] दही का कर । दही पर लगनेवाला कर । उ०—कृष्ण के दधिदान माँगने पर गोपिर्यों को कृष्ण से उलझने, वाग्युद्ध करने, धमकी देने जौर बदले में धमकी पाने का अवसर मिलता है ।—पौद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ११३ ।

दधिदानी
वि० [सं० दधिदानिन्] दही का दान या कर लेनेवाला । उ०—कब को भयो रे ढोटा दधिदानी ।—अकबरी०, पृ० ४१ ।

दधिधेनु
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुराणानुसार दान के लिये कल्पित गौ जिसकी कल्पना दही के मटके में की जाती है ।

दधिधानी
संज्ञा पुं० [सं०] वह पात्र जिसमें दही रखा हो । दही रखने का बर्तन [को०] ।

दधिनामा
संज्ञा पुं० [सं० दधिनामन्] कैथ का पेड़ ।

दधिपुष्पिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] सफेद अपराजिता ।

दधिपुष्पी
संज्ञा स्त्री० [सं०] सेम ।

दधिपूप
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का पकवान जो दही में फेंटे हुए शालि धान के चूर्ण को घी में तलने से बनता है ।

दधिफल
संज्ञा पुं० [सं०] कैथ । कपित्थ ।

दधिमंड
संज्ञा पुं० [सं० दधिमण्ड] दही का पानी ।

दधिमंडोद
संज्ञा पुं० [सं० दधिमण्डोद] पुराणानुसार दही का समुद्र ।

दधिमंथन
संज्ञा पुं० [सं० दधिमन्थन] दही को मथने की क्रिया [को०] ।

दधिमंथान †
संज्ञा पुं० [सं० दधिमन्थन] दही बिलोने या मथने का काम । उ०—सो ता दिन में वह ब्रजबासिनी जब दधि- मथान को बैठती तब ही श्री गोबर्धननाथ जी वा पास आइ विराजते ।—दो सौ बावन०, भा० २, पृ० ६ ।

दधिमुख
संज्ञा पुं० [सं०] १. रामचंद्र जी की सेना का एक बंदर जो सुग्रीव का मामा और मधुवन का रक्षक था । रामायण के अनुसार यह सुग्रीव का ससुर था । २. फनवाले साँपों में श्रेष्ठ एक नाग का नाम (को०) ।

दधियार
संज्ञा पुं० [देश०] जीवंतिका की जाति की एक लता अर्कपुंष्पी । अंधाहुली । विशेष—इस लता के पत्ते लंभे और पान के आकार के होते हैं । इसकी डंठियों आदि में से दूध निकलता है और इसमें सूर्यमुखी की तरह के फूल लगते हैं । इसका व्यवहार औषध में होता हैं ।

दधिवक्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दधिमुख' [को०] ।

दधिशर
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दधिमंड' [को०] ।

दधिशोण
संज्ञा पुं० [सं०] बंदर । बानर [को०] ।

दधिषाय्य
संज्ञा पुं० [सं०] घृत । घी (को०) ।

दधिसंभव
संज्ञा पुं० [सं० दधि + सम्भव] मक्खन । नवनीत । नैंनू ।

दधिसागर
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार दही का समुद्र ।

दधिसार
संज्ञा पुं० [सं०] नवनीत । मक्खन ।

दधिसुत (१)
संज्ञा पुं० [सं० उदधि + सुत] १. कमल । उ०—देखो मैं दधिसुत में दधिजात । एक अचंभी देखि सखी री रिपु मैं रिपु जुसमात ।—सूर०, १० । १७२ २. मुक्ता । मोती । उ०—दधि- सुत जामे नंद दुवार । निरखि नैन अरुभयौ मनमोहन रटत देहु कर बारंबार ।—सूर०, १० ।१७३ । ३. उडुपति । चंद्रमा । उ०—(क) राधे दधिसुत क्थों न दुरावति । हौं जु कहति बृषभान नंदिनी काहै जीव सतावति ।—सूर०, १० ।१७१४ ।(ख) दधिसुत जात हौं उहिं देस । द्वारिका हैं स्याम सुंदर सकल भुवन नरेस ।—सूर०, १० ।४२६४ । यौ०—दधिसुत सुत = चंद्रमा का पुत्र, बुध, अर्थात् विद्वान् । पंडित । उ०—जिनके हरि वाहन नहीं दधिसुत सुत जेहि नाहिं । तुलसी ते नर तुच्छ है बिना समीर उड़ाहिं ।—स० सप्तक, पृ० २१ । ४. जालंधर दैत्य । उ०—विष्णु वचन चपला प्रतिहारा । तेहि ते आपुन दधिसुत मारा ।—विश्राम (शब्द०) । ५. विष । जहर उ०—नहिं विभूति दधिसुत न कंठ यह चंदन चरचित तन ।—सूर (शब्द०) ।

दधिसुत (२)
संज्ञा पुं० [सं०] मक्खन । नवनीत ।

दधिसुता
संज्ञा स्त्री० [सं० उदधिसुता] सीप । उ०—दधिसुता सुत अवलि ऊपर इंद्र आयुध जानि—सूर (शब्द०) । यौ०—दधिसुता सुत = सीप का पुत्र—मोती । मुक्ता ।

दधिस्नेह
संज्ञा पुं० [सं०] दही की मलाई ।

दधिस्वेद
संज्ञा पुं० [सं०] तक्र । छाछ । मट्ठा ।

दधी पु
संज्ञा पुं० [सं० उदधि] दे० 'उदधि' । उ०—रिछं बानरायं, भए सो सहायं । हनुम्मान तायं, दधी सीस आर्य ।—पृ० रा०, २ ।२४ ।

दधीच पु
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दधीचि' । उ०—जीत महीपति हाड़नहीं महँ जोत दधीच के हाड़न ही मैं ।—मति० ग्रं०, पृ० ३९२ । यौ०—दधीचास्थि = दे० 'दधीच्थस्थि' ।

दधीचि
संज्ञा पुं० [सं०] एक वैदिक ऋषि जो यास्क के मत से अथर्व के पुत्र थे और इसी लिये दधीचि कहलाते थे । किसी पुराण के मत से ये कर्दम ऋषि की कन्या और अथर्व की पत्नी शांति के गर्भ से उत्पन्न हुए थे और किसी पुराण के मत से ये शुक्राचार्य के पुत्र थे । विशेष—वेदों और पुराणों में इनके संबंध में अनेक कथाएँ हैं, जिनमें से विशेष प्रसिद्ध यह है कि इंद्र ने इन्हें मधुविद्या सिखाई थी और कहा था कि यदि तुम यह विद्या बतलाआगे तो हम तुम्हें मार डालेगे । इसपर अश्वियुगल ने दधीचि का सिर काटकर अलग रख दिया और तब उनसे धड़ पर घोडे़ का सिर लगा दिया और तब उनसे मधुविद्या सीखी । जब इंद्र को यह बात मालूम हुई तो उन्होंने आकर उनका घोड़ेवाला सिर काट डाला । इसपर अश्वियुगल ने उनके धड़ पर फिर वही मनुष्यवाला पहला सिर लगा दिया । एक बार वृत्रासुर के उपद्रव से बहुत दुःखित होकर सब देवता इंद्र के पास गए । उस समय निश्चित हुआ कि दधीचि कि हड्डियों के बने हुए अस्त्र के अतिरिक्त और किसी अस्त्र से वृत्रासुर मारा न जा सकेगा । इसलिये इंद्र ने दधीचि से उनकी हड्डियाँ माँगी । दधिचि ने अपने पुराने शत्रु और हत्याकारी इंद्र को भी विमुख लौटाना उचित न समझा और उनके लिये अपने प्राण त्याग दिए । तब उनकी हड्डियों से अस्त्र बनाकर वृत्रासुर मारा गया । तभी से दधीचि का बड़ा भारी दानी होना प्रसिद्ध है । महाभारपत में यह भी लिखा है कि जब दक्ष ने, हरिद्बार में बिना शिव जी के यज किया था, तब इन्होंने दक्ष को शिव जी के निमंत्रित करने के लिये बहुत समझाया था, पर उन्होंने नहीं माना, इसलिये ये यज्ञ छोड़कर चले गए थे । एक बार दधीचि बड़ी, कठिन तपस्या करने लगे । उस समय इंद्र ने डरकर इन्हें तप से भ्रष्ट करने के लिये अलंबुषा नामक अप्सरा भेजी । एक बार जब ये सरस्वती तीर्थ में तपस्या कर रहे, थे तब अंलबुषा उनके सामने पहुँची । उसें देखकर इनका वीर्य स्खलित हो गया जिससे एक पुत्र हुआ । इसी से उस पुत्र का नाम सारस्वता हुआ ।

दधीच्यास्थि
संज्ञा पुं० [सं० दधीचि + अस्थि] १. इंद्रास्त्र । वज्र । २. हीरा । हीरक ।

दघ्न
संज्ञा पुं० [सं०] चौदह यमों मे से एक यम ।

दध्यानी
संज्ञा पुं० [सं०] सुदर्शन वृक्ष । मदनमस्त ।

दुध्युत्तर
संज्ञा पुं० [सं०] दही की मलाई ।

दध्युत्तकर, दध्युत्तरग
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दध्युत्तर' [को०] ।

दन
संज्ञा पुं० [सं० दिन] दिवस । दिन [डिं०] ।

दनकर
संज्ञा पुं० [सं० दिनकर, प्रा० दिणयर, दणयर] दिनकर । सूर्य (डिं०) ।

दनगा
संज्ञा पुं० [देश०] खेत का छोटा टुकड़ा ।

दनदनाना
क्रि० अ० [अनु०] १. दनदन, शब्द करना । २. आनंद करना । खुशी मनाना ।

दनमणि
संज्ञा पुं० [सं० दिनमणि] द्युमणि । सूर्य (डिं०) ।

दनादन
क्रि० वि० [अनु०] दनदन शब्द के साथ । जैसे,—दनादन तोपें छूटने लगीं ।

दनु (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] दक्ष की एक कन्या जो कश्यप को ब्याही थी । विशेष—इसके चालीस पुत्र हुए थे जौ सब दानव कहलाते है । उनके नाय ये हैं—विप्रचित्त, शंबर, नमुचि, पुलोमा, असिलोमा, केशी, दुर्जय, अयःशिरी, अश्वशिरा, अश्वशंकु, गगनमूर्धा स्वर्भानु, अश्व, अश्वपति, घूपवर्वा, अजक, अश्वीग्रीव, सूक्ष्म, तुहुंड़ एकपद, एकचक्र, विरूपाक्ष, महोदर, निचंद्र, निकुंभ कुजट, कपट, शरभ शलभ सूर्य, चंद्र, एकाक्ष, अमृतप, प्रलब, नरक, वातापी शठ, गविष्ठ, वनायु और दीघजिह्व । इनमें जो चंद्र और सूर्य नाम आए हैं वै देवता चंद्र और सूर्य से भिन्न हैं ।

दन (२)
संज्ञा पुं० एक दानव का नास जो श्री दानव का लड़का था । विशेष—इंद्र द्बारा त्रस्त एवं पीडित, इस, राक्षस, को राम और लक्ष्मण ने मारा था, । शिरविहीन कबंध की आकृति का होने से इसका । एक नाम दनुकुबंध भी है ।

दनुज (२)
संज्ञा पुं० [सं०] दनु से उत्पन्न, असुर । राक्षस ।

दनुजदलनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दुर्गा ।

दनुजाद्बिट
संज्ञा पुं० [ दनुजद्विष] सूर । देवता [को०] ।

दनुजपुत्र
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दनुज' [को०] ।

दनुजराय
संज्ञा पुं० [सं० दनुज + हिं० राय] दानवों की राजा हिरण्यकशिपु ।

दनुजारि
संज्ञा पुं० [सं०] दानवों के शत्रु ।

दनुजारी
संज्ञा पुं० [सं० दनुजारि] दनुजों के शत्रु । विष्णु । उ०— बीचहि पंथ मिले दवुजारी ।—मानस, १ ।१३६ ।

दनुजेंद्र
संज्ञा पुं० [सं० दनुजेन्द्र] दानवों का राजा ।—रावण ।

दनुजेश
संज्ञा पुं० [सं०] १. हिरण्यकशिपु । २. रावण ।

दनुजंसंभव
संज्ञा पुं० [सं० दनु—सम्भव] दनु से उत्पन्न, दानव ।

दनुजसून
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दनुजसंभव' ।

दनू
संज्ञा स्त्री० [सं० दनु] दे० 'दनु' ।

दन्न
संज्ञा पुं० [अनु०] 'दन्न' शब्द जो तोप आदि के छूटने अथवा इसी प्रकार के और किसी कारण से होता है ।

दपट
संज्ञा स्त्री० [हिं० डाँट के साथ अनु०] धुडकी । डपट । डाँटने या डपटने की क्रिया ।

दपटना
क्रि० सं० [हिं० डाँटना के साथ अनु०] किसी को डराने के लिये बिगड़कर जोर से कोई बात कहना । डाँटना । घुड़कना ।

दपु पु
संज्ञा पुं० [सं० दर्प] दर्प । अहंकार । अभिमान । शेखी । घमंड । उ०—सात दिवस गोवर्धन । राख्यो इंद्र गयो दपु छोहि ।—सूर (शब्द०) ।

दपेट
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'दपट' ।

दपेटना
क्रि० सं० [हिं०] दे० 'दपटना' ।

दप्प पु
संज्ञा पुं० [सं० दर्प, प्रा० दप्प] दे० 'दप' ।

दफतर
संज्ञा पुं० [फा़० दफ्तर] दे० 'दफ्तर' ।

दफतरी
संज्ञा पुं० [फा़० दफ्तरी] दे० 'दफ्तरी' ।

दफतरीखाना
संज्ञा पुं० [फा़० दफ्तरीखानह] दे० 'दफ्तरीखाना' ।

दफती
संज्ञा स्ञी० [अ० दफ्तीन] कागज के कई तख्तों को एक में साट कर बनाया हुआ मत्ता जो प्रायः जिल्द बाँधने आदि के काम में आता है । गत्ता कुट । वसली ।

दफदर †
संज्ञा पुं० [हिं० दफतर] दे० 'दफ्तर' । उ०—तबलक तत्ते दया को दफदर, संत कबही भारी । धरनी० बानी, पृ० ३ ।

दफन
संज्ञा पुं० [अ० दफन] १. किसी चीज को जमीन में गाड़ने की क्रिया । २. मुरदे को जमीन में गाड़ने की क्रिया ।

दफनाना
क्रि० सं० [अ० दफन + आना] १. जमीन में दबाना । गाड़ना । २. (लाक्ष०) किसी दुर्व्यवहार, कटुता आदि को पूरी तरह भुला देना ।

दफरा
संज्ञा पुं० [देश०] काठ का वह टुकड़ा या इसी प्रकार का और कोई पदार्थ जों किसी नाव के दोनों और इसलिये लगा दिया जाता है कि जिसमें किसी दूसरो नाव की टक्कर से उसका कोई अंग टूट नं जाय । होस (लश०) ।

दफराना
क्रि० सं० [देश०] १. किसी नाव को किसी दूसरी नाव के साथ टक्कर लड़ने से बचाना । २. (पाल) खड़ा करना ।— (लश०) ३. बचाना । रक्षा कराना ।

दफला
संज्ञा पुं० [फा़० दफ या दफल] दे० 'डफ' । उ०—बैंड से लेकर दफले और नृसिंह तक सभी प्रकार के बाजे थे ।—कया०, पृ० ५७५ ।

दफा (१)
संज्ञा स्त्री० [अ० दफ़अह्] १. बार । बेर । जैसे,—(क) हम तुम्हारे यहाँ कल दो दफा गए थे । (ख) उसे कई दफा समझाया मगर उसने नहीं माना । २. किसी कानूनी किताब का वह एक अंश जिसमें किसी एक अपराध के संबंध में व्यवस्था हो । धारा । मुहा०—दफा लगाना = अभियुक्त पर किसी दफा के नियमों को घटाना । अपराध का लक्षण आरोपित करना । जैसे—फौज- दारी में आज उसपर चोरी की दफा लग गई । ३. दर्जा । क्लास । श्रेणी । कक्षा । उ०—किस दफे में पढ़ते हो भैया ?—रंगभूमि, भा० २, पृ० ४९६ ।

दफा (२)
वि० [अ० दफ़अह] दूर किया हुआ । हटाया हुआ । तिरस्कृत । जैसे,—किसी तरह इसे यहाँ से दफा करो । मुहा०—दफा दफान करना = तिरस्कृत करके दूर कराना या हटाना ।

दफादार
संज्ञा पुं० [अं० दफअह् (= समूह) + फा़० दार] फौज का वह कर्मचारी जिसकी अधीनता में कुछ सिपाही हों । विशेष—सेना में दफादार का पद प्रायः पुलिस के जमादार के पद के बराबर होता है ।

दफादारी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दफादार + ई (प्रत्य०)] १. दफादार का पद । २. दफादार का काम ।

दफीना
संज्ञा पुं० [अं० दफीना] गड़ा हुआ धन या खजाना ।

दफ्तर
संज्ञा पुं० [फा़० दफ्तर] १. स्थान जहाँ किसी कारखाने आदि के संबंध की कुल लिखा पढी़ और लेन देन आदि हो । आफिस । कार्यालय । २. बड़ा भारी पत्र । लंबी चाँड़ी चिट्टी । ३. सविस्तर वृत्तांत । चिट्ठा ।

दफ्तरी
संज्ञा पुं० [फा़० दफ्तर] १. किसी दाफ्तर का वह कर्मचारी जो वहाँ के कागज आदि दुरुस्त करता और रजिस्टरों आदि पर रूल खींचता अथवा इसी प्रकार के और काम करता हो । २. किताबों की जिल्द बाँधनेवाला । जिल्दसाज । जिल्दबंद । यौ०—दफ्तरीखाना ।

दफ्तरीखाना
संज्ञा पुं० [फा़० दफ्तरीखानह्] वह स्थान जहाँ किताबों की जिल्द बँधती हो अथवा दफ्तरी बैठकर अपना काम करते हों ।

दफ्ती
संज्ञा स्त्री० [अ० दफ्तीन] दे० 'दफती' ।

दफ्तीन
संज्ञा स्त्री० [अ०] दफ्ती [को०] ।

दबंग
वि० [हिं० दबाव या दबाना] प्रभावशाली । दबाववाला । जिसका लोगों पर रोबदाब हो । जैसे—वे बड़े दबंग आदमी हैं, किसी से नहीं डरते ।

दबंगपन
संज्ञा पुं० [हिं० दबंग + पन] दबदबा । रोबदाब । उ०— चाहिए कुछ दबंगपन रखना । दब बहुत दाब में न आएँ हम ।—चुभते०, पृ० ३६ ।

दब
संज्ञा स्त्री० [हिं० दबना] बड़ों के प्रति संकोच या भय । दे०'दाब' । उ०— कहा करौ कछु बनि नहिं आवै अति —गुरजन की दब री ।—घनानंद०, पृ० ५३३ । यौ०—दबगर ।

दबक
संज्ञा स्त्री० [हिं० दबकना] दबने या छिरने की क्रिया या भाव । २. सिकुड़न । शिकन । ३. धातु आदि को लंबा करने के लिये पीटने की क्रिया । यौ०—दबकगर ।

दबकगर
संज्ञा पुं० [हिं० दबक + गर (प्रत्य०)] दबका (तार) बनानेवाला ।

दबकना (१)
क्रि० अ० [हिं० दबना] १. भय के कारण किसी सँकरे स्थान में छिपना । डर के मारे छिपना । जैसे,—(क) कुत्ते को देखकर बिल्ली का बच्चा आलमारी के नीचे दबक रहा । (ख) सिपाही को देखकर चोर कोने में दबक रहा । २. लुकना । छिपना । जैसे,—शेर पहले से ही झाड़ी मे दबका बैठा था, हिरन के आते ही उसपर झपट पड़ा । क्रि० प्र०—जाना ।—रहना ।

दबकना (२)
क्रि० सं० किसी धातु को हथोंड़ी से चोट लगाकर बढा़ना या चौड़ा करना । पीटना ।

दबुकना (३)
क्रि० सं० [सं० दर्प?] डाँटना । डपटना । धुड़कना । उ०—दबकि दबोरे एक, वारिधि में बोरे एक, मगन मही में एक, गगन उड़ात हैँ ।—तुलसी (शब्द०) ।

दबकनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दबना] भाथी का वह हिस्सा जिसके द्बारा उसमें हवा धुसती है ।

दबकवाना
क्रि० सं० [हिं० दबकना का प्रे० रूप] दबकाने का काम किसी दूसरे से कराना । दूसरे को दबकाने मै प्रवृत्त करना ।

दबका
संज्ञा पुं० [हिं० दबकना (= तार आदि पीटना)] कामदानी का सुनहला या रुपहला चिपटा तार ।

दबकाना
क्रि० सं० [हिं० दबकना का सक० रूप] १.छिपाना । ढाँकना । आ़ड में करना । २. डाँटना ।—(क्व०) ।

दबकी (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] सुराही की तरह का मिट्टी का एक बर्तन जिसमें पानी रखकर चरवाहे और खोतिहर खत पर ले जाया करते हैं ।

दबकी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० दबकना] दबकने या छिपने की क्रिया या भाव । मुहा०—दबकी मारना = छिप जाना । अद्दश्य हो जाना ।

दबके का सलमा
संज्ञा पुं० [?] चमकीला सलमा । दबके का बना हुआ सलमा जो बहुत चमकीला होता है ।

दबकैया
संज्ञा पुं० [हिं० दबकना + ऐया (प्रत्य०)] सोने र्चादी के तारों को पीटक बढाने, चपटा और चौड़ा करनेवाला । दबकगर ।

दबगर (१)
संज्ञा पुं० [देश०] १.ढाल बनानेवाला । २. चमड़े के कुप्पे बनानेवाला ।

दबगर (२)
संज्ञा पुं० वि० [हिं० दब (= दाब) + गर] दाब या शासन में पड़ा हुआ । अधिकार माननेवाला ।

दबटना †
क्रि० अ० [हिं० दबाना] दबाना । अधिकार में करना । उ०—इत तुलसी छबि हुलसी छोड़ति परिमल लपटे । इत कमोद आमोद गोद भरि भरि सुख दबटै ।—नंद० ग्रं०, पृ० १२ ।

दबड़ घुसड़
वि० [हिं० दबाना + घुसना] डरपोक । सब से दबने और डरनेवाला ।

दबदबा
संज्ञा पुं० [अ०] रोबदाब । आतंक । प्रताप ।

दबना
क्रि० अ० [सं० दमन] १. भार के नीचे आना । बोझ के नीचे पड़ना । जैसे, आदमियों का मकान के नीचे दबना । २. ऐसी अवस्था में होना जिसमें किसी ओर से बहुत जोर पड़े । दाब में आना । ३. (किसी भारी शक्ति का सामना) होने अथवा दुर्बलता आदि के कारण) अपने स्थान पर न ठहर सकना । पीछे हटना । ४. किसी के प्रभाव या आतंक में आकर कुछ कह न सकना अथवा अपने इच्छानुसार आचरण न कर सकना । दबाव में पड़कर किसी के इच्छानुसार काम करने के लिये विवश होना । जैसे,—(क) कई कारणों से वे हमसे बहुत दबते हैं । (ख) आप तो उनसे कमजोर नहीं हैं, फिर क्यों दबते है । ५. अपने गुणों आदि की कमी के कारण किसी के मुकाबले में ठीक या अच्छा न जँचना । जैसे,—यह माला इस कंठे के सामने दब जाती है । ६. किसी बात का अधिक बढ़ या फैल न सकना । किसी बात का जहाँ का तहाँ रह जाना । जैसे, खबर दबना, मामला दबना । उ०— नाम सुनत ही ह्वै गयौ तब औरे मन और । दबै नहीं चित चढ़ि रह्वौ अबहुँ चढ़ाए त्यौर ।—बिहारी (शब्द०) । ७. उमड़ न सकना । शांत रहना । जैसे, बलवा दबना, क्रोध दबना । ८. अपनी चीज का अनुचित रूप से किसी दूसरे के अधिकार में चला जाना । जैसे,—हमारे सौ रुपए उनके यहाँ दबे हुए हैं । ९. ऐसी अवस्था में आ जाता जिसमें कुछ बस न चल सके । जैते,—वे आजकल रुपए की तंगी से दबे हुए हैं । संयो० क्रि०—जाना । १०. धीमा पड़ना । मंद पड़ना । मुहा०—दबी आवाज = धीमी आवाज = वह आवाज जिसमें कुछ जोर न हो । दबी जवान से कहना = अस्पष्ट रूप से कहना । किसी प्रकार के भय आदि के कारण साफ साफ न कहना । बल्कि इस प्रकार कहना जिससे केवल कुछ ध्वनि व्यक्ति हो । दबे दबाए रहना = शांतिपूर्वक या चुपचाप रहना । उपद्रव या कार्रवाई न करना । दबे पाँव या पैर (चलाना) = इस प्रकार (चलना) जिसमें किसी को कुछ आहट न लगे । ११. संकोच करना । झेंपना ।

दबंमो †
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का बकरा जो हिमालय में होता है ।

दबबाना
क्रि० स० [हिं० दबना का प्रे० रूप] दबाने का काम दूसरे से कराना । दूसरे को दबानें में प्रवृत्त कराना ।

दबस
संज्ञा पुं० [?] जहाज पर की रसद तथा दूसरा सामान । जहाजी गोदाम में का माल ।

दबा
वि० [हिं० दबना] दबाव में पड़ा हुआ । भार से दबा हुआ । विवश ।

दबाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० दबाना] अनाज निकालने के लिये बालों या डंठलों को बैलों के पैरों से रौंदवाले का काम ।

दबाऊ
वि० [हिं० दबाना] १. दबानेवाला । २. जिस (गाड़ी आदि) का अगला हिस्सा पिछले हिस्से की अपेक्षा आधिक बोझल हो । दब्ब ।

दबाना
क्रि० स० [सं० दमन] [संज्ञा, दाब, दबाव] १. ऊपर से भार रखना । बोझ के नीचे लाना (जिसमें कोई चीज नीचे की ओर दस जाय अथवा इधर उधर हट न सके) । जैसे, पत्थर के नीचे किताब या कपड़ा दबाना । २. किसी पदार्थ पर किसी ओर से बहुत जोर पहुँचाना । जैसे, उँगली से काग दबाना, रस निकालने के लिये नीबू के टुकड़े को दबाना, हाथ या पैर दबाना । ३. पीछे हटाना । जैसे,— राज्य की सेना शत्रुओं को बहुत दूर तक दबाती चली गई । ४. जमीन के नीचे गाड़ना । दफन करना । संयो० क्रि०—देना । ५. किसी मनुष्य पर इतना प्रभाव डालना या आतंक जमाना कि जिसमें वह कुछ कह न सके अथवा विपरीत आचरण न कर सके । अपनी इच्छा के अनुसार काम कराने के लिये दबाव डालना । जोर डालकर विवश करना । जैसे,—(क) कल बातों बातों में उन्होनें तुम्हें इतना दबाया कि तुम कुछ बोल ही न सके । (ख) उन्होनें दोनों आदमियों को दबाकर आपस में मेल करा दिया । ६. अपने गुण या महतत् की अधिकता के कारण दूसरे को मंद या मात कर देना । दूसरे के गुणों या महत्व का प्रकाश न होने देना । जैसे,—इस नई इमारत ने आपके मकान को दबा दिया । संयो० क्रि०—देना ।—रखना । ७. किसी बातद को उठने या फैलने न देना । जहाँ का तहाँ रहने देना । ८. उभड़ने से रोकना । दमन करना । शांत करना । जैसे, बलवा दबाना, क्रोध दबाना । संयो० क्रि०—देना ।—लेना । ९. किसी दूसरे की चीज पर अनुचित अधिकार करना । कोई काम निकालने के लिये अथवा बेईमानी से किसी की चीज अपने पास रखना । जैसे,—(क) उन्होंने हमारे सौ रुपए दबा लिए । (ख) आपने उनकी किताब दबा ली । संयो० क्रि०—बैठना ।—रखना ।—लेना । १०. झोंक के साथ बढ़कर किसी चीज को पकड़ लेना । संयो० क्रि०—लेना । ११. —ऐसी अवस्था में ले आना जिसमें मनुष्य असहाय, दीन या विवश हो जाय । जैसे,—आजकल रुपए की तंगी ने उन्हें दबा दिया ।

दबाबा
संज्ञा पुं० [देश०] युद्ध की सामग्री में लकड़ी का एक प्रकार का बहुत बड़ा संदूक जिसमें कुछ आदमियों को बैठाकर गुप्त रूप से सुरंग खोदने अथवा इसी प्रकार का और कोई उपद्रव करने के लिये शत्रु के किले में उतार देते हैँ ।

दबाव
संज्ञा पुं० [हिं० दबाना] १. दबाने की क्रिया । चाँप । क्रि० प्र०—डालना ।—में आना या पड़ना । २. दबाने का भाव । चाँप । ३. रोब । क्रि० प्र०—डालना ।—मानना ।—में आना या प़डना ।

दबिला
संज्ञा पुं० [देश०] खुरपी या खुर्चनी के आकार का लकड़ी का बना हुआ हलवाइयों का एक औजार जिससे वे बेसन आदि भूनते, खोवा बनाते या चीनी की चाशनी आदि फेटते हैं ।

दबीज
वि० [फा़० दबीज] जिसका दल मोटा हो । गाढ़ा । संगीन ।

दबीर
संज्ञा पुं० [फा़०] १. लिखनेवाला । मुंशी । २. एक प्रकार के महाराष्ट्र ब्राह्मणों को उपाधि ।

दबूचना †
क्रि० सं० [हिं० दबोचना] दे० 'दबोचना' । उ०— पंजे से दबूच चोंच से चमड़ो नीचकर— । प्रेमघना०, भा० २, पृ० २० ।

दबूसा
संज्ञा पुं० [देश०] १. जहाज का पिछला भाग । पिच्छल । २. बड़ी नाव का पिछला भाग जहाँ पतवार लगी रहती है । ३. जहाज का कमरा ।— (लश०) ।

दबेरना
क्रि० सं० [हिं० दबाना] दे० 'दबोरना' ।

दबेला
वि० [हिं० दबाना + एला (प्रत्य०)] १. दबा हुआ । जिसपर दबाव पड़ हो । २. जल्दी जल्दी होनेवाला (काम) । (लश०) ।

दबैल
वि० [हिं० दबना + ऐल (प्रत्य०)] दबनेवाला । दब्बू । दबैला । उ०— सूख सों लाज सिधारौ सुरग कों काहू की हौं न दबैल ।— भारतेदू ग्रं०, भा० २, पृ० ४०१ ।

दवैला
वि० [हिं० दबाना + एला (प्रत्य०)] १. जिसपर किसी का प्रभाव या दबाव हो । दबाव में पड़ा हुआ । किसी से दबनेवाला । दब्बू ।

दबोचना
क्रि० सं० [हिं० दबाना] १. किसी को सहसा पकड़कर दबा लेना । धर दबाना । जैसे—बिल्ली ने तोते को जा दबोचा । २. छिपाना । संयो० क्रि० —लेना ।

दबोरना पु †
क्रि० सं० [हिं० दबाना] अपने सामने ठहरने न देना । दबाना । उ०— दबकि दबोरे एक बारिधि में बोरे एक मगन मही मैं एक गगन उड़ात हैं ।— तुलसी (शब्द०) ।

दबोस
संज्ञा स्त्री० [देश०] चकमक पत्थर ।

दबोसना †
क्रि० स० [देश०] शराब पीना ।

दबौता
संज्ञा पुं० [हिं० दबाना + औत (प्रत्य०)] लकड़ी का वह कुंड़ा जिसे पानी में भिगाए हुए नील के डंठली आदि को दबाने के लिये ऊपर से रख देते हैं ।

दबौनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दबाना + औनी (प्रत्त०)] १. कसेरों का लोहे का औजार जिसे वे बरतनों पर फूल पत्ते आदिउभारते हैं । २. भँजनी के ऊपर की और लगी हुई लकड़ी (जोलाहे) ।

दब्ब पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० द्रव्य, प्रा० दव्व] द्रव्य । धन । संपत्ति । सामान । उ०— जो मिलंत मुहि आइ । देउँ घन अंबर दब्बू ।—पृ० रा०, १२ । ११७ ।

दब्बू † (२)
वि० [हिं० दबना + ऊ (प्रत्य०)] दबनेवाला । दबैला ।

दभ्र (१)
वि० [सं०] १. अल्प । थोड़ा । कम । २. कंद । अतीक्ष्ण ।

दभ्र (२)
संज्ञा पुं० सागर । समुद्र । उदधि [को०] ।

दमंगल
संज्ञा पुं० [फा़० दंगाल ? या ड़िं० दमगल] बखेड़ा । उपद्रव । युद्ध । उ०— विधि हते वीर महावलं गह वाल हूव दमंगलं । दिल अमय केकंधा दवारे, गजे सूर गहरं ।—रघु० रू०, पृ० १५२ ।

दमंकना पु
क्रि० अ० [हिं० दमकना] चमकना । उ०— बहु कृपान तरवारि चमंकहि । जनु दह दिसि दामिनी दर्मकहि ।—मानस, ६ । ८६ ।

दमंस †
संज्ञा पुं० [हिं० दाप + अंस] मौल ली हुई जायदाद ।

दम (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. दंड जो दमन करने के लिये दिया जाता है । सजा । २. ब्राह्मोद्रियों का दमन । इंद्रियों को वश में रखना और चित्त के बुरे कामों में प्रवृत्त न होने देना । ३. कीचड़ । ४. घर । ५. एक प्राचीन महर्षि जिनका उल्लेख महाभारत में हे । ६. पुराणानुसार मरुत राजा को पोत्र जो वभ्रु की कन्या इंद्रसेना के गर्भ से उत्पन्न हुए थे । विशेष— कहते हैं कि ये नो वर्ष तक माता के गर्भ में रहें थे । इनके पुरोहित ने समझा था कि जिसकी जननी को नौ बर्ष तक इस प्रकार इंद्रियदमन करना पड़ है वह बालक स्वयं भी बहुत हो दमनशील होगा । इसी लिये उसने इनका नाम दम रखा था । ये वेद वेदांगों के बहुत अच्छे ज्ञाता और धनुर्विद्या में बड़े प्रवीण थे । ७. बुद्ध का एक नाम । ८. भीम राजा के एक पुत्र और दमयंती के एक भाई का नाम । ९. बिष्णु । १०. दबाव ।

दम (२)
संज्ञा पुं० [फा़०] १. साँस । श्वस । क्रि० प्र०—आना ।—चलना ।—जाना ।—लेना । मुहा०—दम अटकना = साँस रुकना, विशेषतः मरने के समय साँस रुकना । दम उखड़ना = दे० 'दम अटकना' । दम उलटना = (१) व्याकुलता होना । घबराहट होना । जी घबराना । (२) दे० 'दम घुटना' । दम खाना = दे० 'दम लेना' । दम खिंचना = दे० 'दम अटकना' । दम खींचना' = (१) चुप रह जाना । न बोलना । (२) साँस खींचना । साँस ऊपर चढ़ाना । दम घुटना = हवा की कमी के कारण साँस रुकना । साँस न लिया जा सकता । दम घोंटना = (१) साँस न लेने देना । किसी को साँस लेने से रोकना । (२) बहुत कष्ट देना । दम घोंटकर मारना = (१) गला दबाकर मारना । (२) बहुत कष्ट देना । दम चढ़ना = दे० 'दम फूलना' । दम चुराना = जान बूझकर साँस रोकना । विशेष— यह क्रिया विशेषतः मक्कार जानवर करते हैं । बंदर मार खाने के समय इसलिये दम चुराता है कि जिसमें मारने वाला उसे मुरदा समझ ले । लोमड़ी कभी कभी अपने आप को मरी हुई जतलाने के लिय दम चुराती है । साज चढ़ाने के समय मक्कार घोड़े भी साँस रोककर पेट फुला लेते है जिसमें पेटी या बंद अच्छी तरह न कसा जा सके । दम टूटना = (१) साँस बंद हो जाना । प्राण निकलना । (२) दौड़ने या तैरने आदि के समय इतना अधिक हाँफने लगना कि जिसमें आगे दौड़ा या तैरा न जा सके । दम तोड़ना = मरतें समय झटके से साँस लेना । अंतिम साँस लेना । दम पचना = निरंतर परिश्रम के कारण ऐसा अभ्यास होना जिसमें साँस न फूले ।— (कुश्तीबाज) । दम फूलना = (१) अधिकर परिश्रम के कारण साँस का जल्दी जल्दी चलना । हाँफना । (२) दमे के रोग का दौरा होना । दम बंद करना = बलपूर्वक किसी को बोलने आदि से रोकना । दम बंद होना = भय या आंतक आदि के कारण बिलकुल चुप रह जाना । दम भरना = (१) किसी के प्रेम अथवा मित्रता आदि का पक्का भरोसा रखना और समय समय पर अभिमानपूर्वक उसका वर्णन करना । जैसे,—(क) वे उनकी मुहब्बत का दम भरते हैं । (ख) हम आपकी दोस्ती का दम भरते है । (२) परिश्रम या दौड़ने आदि के कारण साँस फूलने लगता और थकावट आ जाना । परिश्रम के कारण थक जाना । जैसे,— इतनी सीढ़ियाँ चढ़ने में हमारा दम भर गया । (३) भालू का हाथ या लकड़ी मुहँ पर रखकर साँस खींचना । इस क्रिया से उसका क्रोध शांत होता अथथा भोजन पचना है (कलंदर) । (४) किसी को कुश्ती लड़ाकर थकाना (पहल— वानों की परीक्षा) । दम मारना = (१) विश्राम करना । सुस्ताना । (२) बोलना । कुछ कहना । चूँ करना । जैसे,— आपकी क्या मजाल जो इस बात में दम भी मार सकें । (३) हस्तक्षेप करना । दखल देना । जैसे,— इस जगह कोई दम मारनेवाला भी नहीं हैं । दम लेना = विश्राम करना । ठहरना । सुस्ताना । दम साधाना = (१) श्वास की गति को रोकना । साँस रोकने का अभ्यास करना । जैसे, प्राणायाम करनेवालों का दम साधना, गोता लगनेवालों का दम साधना । (२) चुप होना । मौन रहना । जैसे—(क) इस मामले में अब हम भी दम साधेंगे । (ख) रुपयों का नाम सुनते ही आप दम साध गए । २. नशे आदि के लिये साँस के साथ धूआँ खींचने की क्रिया । क्रि० प्र०—खींचना । मुहा०— दम मारना = गाँजे या चरस आदि को चिलम पर रखकर उसका धूआँ खींचना । दम लगना = गाँजे या चरस का धूँआँ खींचना । दम लगाना = दे० 'दम मारना' । ३. साँस खींचकर जोर से बाहर फेँकने या फूँकने की क्रिया । मुहा०— दम मारना = मंत्र आदि की सहायता से झाड़ फूँक करना । दम फूँकना = किसी चीज में मुँह से हवा भरना । दम भरना = कबूतर के पोटे में हवा भरना ।४. उतता समंम जितना एक बार साँस लेने में लगता है । लमहा । पल । मुहा०— दम के दम = क्षण भर । थोड़ी देर । जैसे,—वे यहाँ दम के दम बैठे, फिर चले गए । दम पर दम = बहुत थोड़ी थोड़ी देर पर । हर दम । बराबर । जैसे,—दम पर दम उन्हें कै आ रही है । दम बदम = दे० 'दम पर दम' । ५. प्राण । जान । जी । मुहा०—दम उलझना = जी घबराना । व्याकुल होना । दम खाना = दिक करना । तंग करना । दम खुश्क होना = दे० 'दम सूखना' । दम पुराना = जी चुराना । जान बचाना । किसी बहाने से काम करने से अपने आपको बचाना । दम नाक में या नाक में दम आना = बहुत अधिक दुखी होना । बहुत तंग या परेशान होना । दम नाक में या नाक में दम करना अथवा लाना = बहुत कष्ट या दुःख देना । बहुत तंग या परेशान करना । दम निकलना = मृत्यु होना । मरना (किसी पर) दम निकलना = किसी पर इतना अधिक प्रेम होना कि उसके वियोग में प्राण निकलने का सा कष्ट हो । बहुत अधिक आसक्ति होना । जैसे,—उसी को देखकर जीने हैं जिसपर दम निकलना है । दम पर आ बनना = (१) जान पर आ बनना । प्राणभय होना । (२) आपत्ति आना । आफत आना । (३) हैरानी हीना । व्यग्रता होना । दम फड़क उठना या जाना = किसी चीज की सुंदरता या गुण आदि देखकर चित्त का बहुत प्रसन्न होना । जैसे,— उसकी कसरत देखकर दम फड़क गया । दम फड़कना = चित्त ता व्याकुल होना । बेचैनी होना । दम फना होना = दे० 'दम सूखना' । जैसे,— (क) देने के नाम तो उसका दम फना हो जाता है । दम में दम आना = घबराहट या भय का दूर होना । चित्ता स्थिर होना । दम में दम रहना या होना = प्राण रहना । जिंदगी रहना । दम सूखना = बहुत अधिक भय के कारण बिलकुल चुप हो जाना । बहुत डर के कारण साँस तक न लेना । प्राण सूखना । भय के मारे स्तब्ध होना । जैसे,— उन्हें देखते ही लड़के का दम सूख गाया । ६. वह शक्ति जिससे कोई पदार्थ अपना अस्तित्व बनाए रखता और काम देता है । जीवनी शक्ति । जैसे,— (क) इस छाते में अब बिल्कुल दम नहीं हैं । (ख) इस मकान में कुछ दम तो हैं ही नहीं, तुम इसे लेकर क्या करोगे । यौ०—दमदार = (१) जिसमें जीवनी शक्ति यथेष्ट हो ।(२) जमबूत । दृढ़ । ७. व्यक्तित्व । जैसे, आपके ही दम से ये सब बातें हैं । मुहा०— (किसी का) दम गनीमत होना = (किसी के) जीवित रहने के कारम कुछ न कुछ अच्छी बातों का होता रहना । गई बीती दशा में भी किसी के कार्यों का ऐसा होना जिसमें उसका आदर हो सके ।जैसे—इस शहर में अब तो और कोई पंड़ित नहीँ रहा, पर फिर भी आपका दम गनी मत है । ८. संगीत में किसी स्वर का देर तक उच्चारण । मुहा०— गम भरना = किसी स्वर का देर तक उच्चारण करते रहना । यौ०— दमसाज = वह आदमी जो किसी गवैए के गाने के समय उसकी सहायता के लिये स्वर भरता रहे । ९. पकाने की वह क्रिया जिसमें किसी खाद्य पदार्थ को बरतन में चढ़ाकर और उसका मुँह बंद करके आग पर चढ़ा देते हैं । इस प्रकार बरतन के अंदर की भाफ बाहर नहीं निकलने पाती और उस पदार्थ के पकने में भाफ से बहुत सहायता मिलती है । क्रि० प्र०—करना । देना । यौ०— दम चूल्हा । दम आलू । दम पुख्त । मुहा०— दम करना = किसी चीज को बरतन में रखकर और भाप रोकने के लिये उसका मुँह बंद करके आग पर चढ़ा देना । दम खाना = किसी पदार्थ का बंद मुँह के बरतन में भीतरी भाफ की सहायता से पकाया जाना । दम देना = किसी अधपकी चीज को पूरी तरह से पकाने के लिये उसे हलकी आँच पर रखकर उसका मुँह बंद कर देना जिसमें वह अच्छी तरह से पक जाय । दम पर आना = किसी पदार्थ के पकने में केवल इतनी कसर रह जाना कि थोड़ा दम देने से वह अच्छी तरह पक जाय । पक कर तैयारी पर आना । थोड़ी देर भाप बंद करके छोड़ देने की कसर रहना । दम होना = भाप से पकना । १०. धोखा । छल । फरेब । जैसे,—आप तो इसी तरह लोगों को दम देते हैं । यौ०— दम झाँसा = छल कपट । दम दिलासा = वह बात जो केवल फुसलाने के लिए कही जाय । झूठी आशा । दम पट्टी = (१) धोखा । फरेब । (२) दे० 'दम दिलासा' । दमबाज = (१) धोखा देनेवाला । (२) फुसलने या बहकानेवाला । मुहा०— दम देना = बहकाना । धोखा देना । फुसलाना । दम में आना = धोखे में पड़ना । फरेब में आना । जाल में फँसना । दम खाना = फरेब में आना । धोखे में पड़ना । दम में लाना = (१) बहकाना । फुसलना । (२) धोखा देना । झाँसा देना । ११. तलवार या छुरी आदि की बाढ़ । धार । यौ०—दमदार = चोखा । तेज । पैना । धारदार ।

दम (३)
संज्ञा पुं० [देश०] दरी बुननेबालों की एक प्रकार की तिकोनी कमाची जिसमें सवा गज की तीन लकड़ियाँ एक साथ बँधी रहती है । यै करघे में पड़ी रहती है और उसमें जीती बँधी रहती है जौ पैर के अँगूठे में बाँध दी जाती है । बुनने के समय इस पैर से नीचे दबाते हैं ।

दम (४)
संज्ञा पुं० [देश०] झोपड़ । छप्पर । ब०— ये अपनी बस्ती को विश् कहते थे और उनके भीतर इनके झोपड़े दम और पूः कहलाते थे ।— प्रा० भा० प०, पृ० ९६ ।

दमक (१)
संज्ञा पुं० [हिं० चमक का अनु०] चमक । चमचमाहट । द्युति । आभा ।

दमक (२)
संज्ञा पुं० [सं०] दमनकर्ता । दबाने, रोकने या शांत करनेवाला ।

दमकना
क्रि० अ० [हिं० चमकना का अनु०] १. चमकना । चम- चमाना ।— गजमोतिन से पूरे माँग । लाल हिरा पुनि दमके आँग ।—कबीर सा०, पृ० ४५८ । २. ज्वलित होना । सुलगना ।

दमकर्ता
संज्ञा पुं० [सं० दमकर्तृ] दमन करनेवाला । स्वामी । शासक [को०] ।

दमकल
संज्ञा स्त्री० [हिं० दम + कल] १. वह यंत्र जिसमें एक या अधिक ऐसे नल लगे हों, जिनके द्वारा कोई तरल पदार्थ हवा के दबाव से, ऊपर अथवा और किसी और झोंक से फेंका जा सकें । पँप विशेष—ऐसे यंत्रों में एक खजाना होता है जिसमें जल अथवा और कोई तरल पदार्थ भरा रहता है, और इसमें एक ओर पिचकारी और दूसरी और साधारण नल लगा रहता है । जब पितकारी चलाते हैं तब खजाने में का पदार्थ और से दूसरे नल के द्वारा बाहर निकलता है । २. उक्ति सिद्धांत पर बना हुआ वह यंत्र जिसकी सहायता से मकानों में लगी हुई आग बुझाई जाती है । पंप । ३. उक्त सिद्धांत पर बना हुआ वह यंत्र जिसकी सहायता सै कुएँ से पानी निकालते है । पंप । दे,० 'दमकला' ।

दमकला (१)
संज्ञा पुं० [हिं० + कल] १. दमकल के सिद्धांत पर बना हुआ वह बड़ा पात्र जिसमें लगी हुई पिचकारी के द्वारा बड़ी बड़ी महफिलों में लोगों पर गुलाबजल अथवा रंग आदि छिड़का जाता है । २. जहाज में वह यंत्र जिसकी सहायता से पाल खड़ा करते है । ३. दे० 'दमकल' ।

दमकला (२)
संज्ञा पुं० [हिं० दम] दे० 'दमचूल्हा' ।

दमखम
संज्ञा पुं० [फा़० दमखम] १. दृढ़ता । मजबूती । उ०— कवि दूसरे के सामने दमखम से उपस्थित होते थे ।—आचार्य०, पृ० २०३ । २. जीवनी शक्ति । प्राण । ३. तलवार की धार और उसका झुकाव ।

दमगाल †
संज्ञा पुं० [ड़ि०] लड़ाई । दमंगल । हलचल । युद्ध । उ०— सुर असुर दमयल लख सकल, थक प्रबल ऊथल पथल चल ।—रघु० रू०, पृ० २२१ ।

दमघोष
संज्ञा पुं० [सं०] चोदि देश के प्रसिद्ध राजा शिशुपाल के पिता का चाम जो दमयंती के भाई थे । इनका दूसरा नाम श्रुतश्रुवा भी है ।

दमचा
संज्ञा पुं० [देश०] खेत के कोने पर बनी हुई वह मघान जिसपर बैठकर खेतिहर अपने खेत की रखवाली करता है ।

दमचूल्हा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का लोहे का बना हुआ गोल चूल्हा जिसके नीच में एक जाली या झरना होता हैं । विशेष— इस जाली के नीचे एक और बड़ा छिद्र होता है । इसकी जाली पर कुछ कयले रखकर उसकी बीदार पर पकाने का बरतन रखते हैं और नीचे के छिद्र से उसमें हवा की जाती है जिससे आग सुलगती रहती है और जाली में से उसकी राख नीचे गिरती रहती हैं ।

दमजोड़ा
संज्ञा पुं० [?] तलवार ।— (डिं०) ।

दमड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० दाम + डा (प्रत्य०)] रुपया । धन । दाम ।—(बाजारु) । क्रि० प्र०—खर्चना । मुहा०— दमड़े करना = बेचकर दाम ख़ड़ा करना ।

दमड़ी
संज्ञा स्त्री० [सं० द्रविण (=धन) या दाम + ड़ी (प्रत्य०)]१. पैसे का आठवाँ भाग । विशेष— कहीं कहीं पैसे के चौथे भाग की भी दमड़ी कहते हैं । मुहा०—दमड़ी के तीन होना = बहुत सस्ता होना । कौड़ियों के मोल होना । दमड़ी की बुलबुल टका हसकाई = कम दाम की चीज पर अन्य खर्च अधिक पड़ जाना । उ०— तिनककर कह ऊइ । दमड़ी की बुलबुल टका हसकाई हम अपने आप पी लैंगे ।—फिसाना०, भा० ३, पृ० २२६ । २. चिलचिल पक्षी ।

दमथ
संज्ञा पुं० [सं०] १. आत्मानियंत्रण या दमन । दम । २. दंड । सजा [को०] ।

दमथु
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दमथ' ।

दमदमा (१)
संज्ञा पुं० [फा़० दमदमह्] १. वह किलेबंदी जो लड़ाई के समय थैलों या बोरों प्रें धूल या बालू भरकर की जाती है । मोरचा । धुस । क्रि० प्र०—बाँधना । २. धोखा । जाल । फरेब । दिखावा (को०) ।

दमदमा (२)
संज्ञा पुं० [फा़० दमामह्] नगाड़ा । धौंसा । उ०—उसके दहने दमदमा, बाएँ उसी के बंब है ।— संत तुरसी०, पृ० ४० ।

दमदार
वि० [फा़०] १. जिसमें जीवनी शक्ति यथेष्ट हो । जानदार । २. दृढ़ । मजबूत । ३. जिसमें दम या साँस अधिक समय तक रह सके । जैसे,—इस हारमोनियम की भाथी बहुत दमदार है । ४. जिसकी धार बहुत तेज हो । चोखा ।

दमन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. दबाने या रोकने की क्रिया । २. दंड जो किसी को दबाने के लिये दिया जाता है । ३. इंद्रियों की चंचलता को रोकना । निग्रह । दम । ४. विष्णु । ५. महादेव । शिव । ६. एक ऋषि का नाम । दमयंती इन्हीं के यहाँ उत्पन्न हुई थी । उ०— पटरानी सों के मता, लै परिजन कछु साथ । आश्रम गयो नरेश तब जहाँ दमन मुनिनाथ ।—गुमान (शब्द०) । ७. एक राक्षास का नाम । उ०— दमन नाम निश्चर अति घोरा । गर्जन भाषत बचन कठोरा ।—रामाश्व- मेध (शब्द०) । ८. दोना । ९. कुंद । १० योद्धा । युद्धकर्ता । सैनिक (को०) । १३. हरिभक्तिविलास में वर्णित एक पूजनोत्सव जिसमें चैत्र शुक्ल द्वादशी को विष्णु को दोना समर्पित क्रिया जाता है ।

दमन (२)
वि० १. दमन करनेवाला । दमनकर्ता । २. शांत [को०] ।

दमन पु (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० दमयन्ती] दे० 'दमयंती' । उ०— दमनदी नलहि जो हंस मेरावा । तुम्ह हिरामन नावँ कहावा ।—जायसी (शब्द०) ।

दमनक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक छंद का नाम जिसमें तीन नगण, एक लघु और एक गुरु होता है । २. दोना ।

दमनक (२)
वि० दमन करनेवाला । दमनशील ।

दमनशील
वि० [सं०] जिसकी प्रकृत्ति दमन करने की हो । दमन करनेवाला ।

दमना पु (१)
क्रि० अं० [फा़० दम] थकना । दम लेना । उ०— फिरता फिरता जी दमता है बाबा, कौन रखे तेरे तन कू जू ।— दक्खिनी०, पृ० १५ ।

दमना (२)
क्रि० सं० [सं० दमन] दमन करना । वश में लाना ।

दमना † (३)
संज्ञा पुं० [सं० दमनक] द्रोणलता । दौना । उ०— दमना क मज्जरी शलिक परिमल ।—वर्ण०, पृ० २० ।

दमनी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार का क्षुप, जिसे अग्निदमनी कहते हैं ।

दमनी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० दमन] संकोच । लज्जा । उ०—सील सनी सजनीन समीप गुलाब कछू दमनी गरसावै ।—गुलाब (शब्द०) ।

दमनीय
वि० [सं०] १. दमन होने के योग्य । जो दमन किया जा सके । २. जो दबाया जा सके । जो खंड़ित किया जा सके । जो दबाकर चढ़ाया जा सके । उ०— कुँवरि मनोहर विजय बड़ि कीरति आति कमनीय । पावनहार विरंचि जनु रचेउ न धनु दमनीय ।—तुलसी (शब्द०) ।

दमपुख्त
वि० [फा़० दमपुख्त] (वह खाद्य पदार्थ) जो दम देकर पकाया गया हो ।

दमबाज
वि० [फा़० दम + बाज़] दम देनेवाला । फुसलानेवाला । बहाना करनेवाला ।

दमबाजी
संज्ञा स्त्री० [फा़० दम + बाजी] बहानेबाजी । दम देने या फुसलाने का काम । धोखेबाजी ।

दमयंतिका
संज्ञा स्त्री० [सं० दमयन्तिका] मदनवान वृक्ष ।

दमयंती
संज्ञा स्त्री० [सं० दमयन्ती] १. राजा नल की स्त्री जो विदर्भ देश के राजा भीमसेन की कन्या थी । वि० दे 'नल' । २. एक प्रकार का बेला । मदनवान ।

दमयिता
संज्ञा पुं० [सं० दमयितृ] १. दमन करनेवाला । दमकर्ता । २. विष्णु । ३. शिव [को०] ।

दमरक
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'चमरक' ।

दमरख
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'चमरख' । उ०— कहिं बान अटेरन टाट गजी, कहिं दमरख चमरख तकला है ।—राम० धर्म०, पृ० ९२ ।

दमरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दमड़ी] दे० 'दमड़ी' । उ०— पैसा दमरी नाहिं हमारे । कोहि कारणै मोंहि राय हँकारे ।— कबीर सा०, पृ० ४८५ ।

दमवंती पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० दमयंती] दे० 'दमयंती' । उ०— सो उपकार करौ जिय माई । दमवंती ज्यों नलहि मिलाई ।— हिंदी प्रेम गाथा०, पृ० २२० ।

दमसाज
संज्ञा पुं० [फा़०] वह आदमी जो किसी गवैए के गाने के समय उसकी सहायाता के लिये केवल स्वर भरता है ।

दमा
संज्ञा पुं० [फा़० दमह्] । एक प्रसिद्ध रोग । श्वास । साँस । विशेष— इस रोग में श्वासवाहिनी नाली के अंतिम भाग में, जो फेफड़ों के पास होता है, आकुंचन और ऐंठन के कारण साँस लेने में बहुत कष्ट होता है, खाँसी आती है और कफ रुककर बड़ी कठिनता सा धीरे धीरे निकलता है । इस रोग के रोगी को प्रायः अत्यंत कष्ट होता है, और लोगों का विश्वास है कि यह रोग कभी अच्छा नहीं होता । इसी लिये इसके संबंध में एक कहावत बन गई है कि दमा दम के साथ जाता है ।

दमाग
संज्ञा पुं० [अ० दमाग] दे० 'दिमाग' [को०] ।

दमाद
संज्ञा पुं० [सं० जामातृ] कन्या का पति । जवाई । जामाता । उ०— ठाकुर कहत हम बैरी बेवकूफन के जालिम दमाद हैं अदनियाँ ससुर के ।— ठाकुर०, पृ० २६ ।

दमादम
क्रि० वि० [अनु०] १. दम दम शब्द के साथ । २. लगा— तार । बराबर ।

दमान
संज्ञा पुं० [देश०] दामन । पाल की चादर (लश०) ।

दमानक
संज्ञा स्त्री० [देश०] तोपों की बाढ़ । उ०— देव भूत पितर करम खल काल ग्रह मोहि पर दौरि दमानक सी दई है ।— तुलसी (शब्द०) । (ख) निज सुभट वीरन संग लै सु दमानकैं घाली भली ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० २३ ।

दमाम
संज्ञा पुं० [हिं० दमामा] दे० 'दमामा' । उ०— जीव जँजाले पड़ि रहा, जमहिं दमाम बजाय ।—कबीर सा०, सं०, पृ० ७४ ।

दमामा
संज्ञा पुं० [फा़० दमामहू] नगाड़ा । नक्कारा । डंका । धौंसा ।

दमारि पु †
संज्ञा पुं० [सं० दावानल] १. जंगल की आग । बन की आग । २. दमड़ी । उ०— अधरम आठों गाँठि न्याव बिनु घोगम सूदा । टकमि दमारि गुलाम आप को भयो असूदा ।— पलटू०, बानी, पृ० ११२२ ।

दमावति पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दमयन्ती] दे० 'दमयंती' । उ०— राजा नल कँह जैसे दमावति ।—जायसी (शब्द०) ।

दमावती पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'दमावति' ।

दमाह
संज्ञा पुं० [हिं० दमा] बैलों का एक रोग जिसमें वे हाँफने लगते हैं ।

दमित
वि० [सं०] १. जिसका दमन किया गया हो । उ०— कवि समाजिक प्रतिवंधों के विरुद्ध अपनी दमित वृत्तियों का प्रका- शन करता है ।—नया०, पृ० ३ । २. पराजित । पराभूत । विजित (को०) ।

दमी (१)
वि० [सं० दमिन्] दमनशील ।

दमी (२)
संज्ञा स्त्री० [फा़०] एक प्रकार का जेबी या सफरी नैचा । दम लगने का नेचा ।

दमी (३)
वि० [फा़० दम] १. दम लगानेवाला । कश खींचनेवाला ।२. गाँजा पीनेवाला । गँजेड़ी । जैसे,—दमी यार किसके । दम लगाके खिसके । (कहा०) ।

दमी (४)
वि० [हिं० दमा] जिसे दमे का रोग हो । दमे के रोगवाला ।

दमुना
संज्ञा पुं० [सं० दमुनस्] १. अग्नि । आग । २. शुक्र का एक नाम (को०) ।

दमौया पु †
वि० [हिं० दमन + ऐसा (प्रत्य०)] दमन करनेवाला । उ०— तुलसी तेहि काल कृपाल बिना दूजो कोन है दारुन दुःख दमैया ।—तुलसी (शब्द०) ।

दमोड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० दाम + ओड़ा (प्रत्य०)] दाम । मूल्य । कीमत । (दलाली) ।

दमोदर
संज्ञा पुं० [सं० दमोदर] दे० 'दामोदर' ।

दम्य (१)
वि० [सं०] १. दमन करने योग्य । जो दमन किया जा सके । २. बैल जो बधिया करने योग्य हो ।

दम्य (२)
संज्ञा पुं० बैल जो धुरा धारण कर सके । पुष्ट बैल [को०] ।

दयंत †
संज्ञा पुं० [सं० दैत्य] दे० 'दैत्य' । उ०— (क) देव दयंतहि भूतहि प्रेतहि कालहु सों कबहूँ न ड़रे जू ।—सूंदर० ग्रं०, भा० १, पृ० ३५ । (ख) कीन्हेसि राकस भूत परेता । कीन्हेसि भोकस देव दयंता ।—जायसी ग्रं० (गुप्त०), पृ० १२३ ।

दय
संज्ञा पुं० [सं०] दया । कृपा । करुणा ।

दयत पु (१)
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दैत्य' । उ०— मो नाम ढुंढ़ बीसल न्रपति साप देह लंभिय दयत । —पृ० रा०, १ । ५६१ ।

दयत (२)
संज्ञा पुं० [सं० दयित] दे० 'दयित' । उ०— सुहद दयत, बल्लभ, सखा प्रीतम परम सुजान ।—नंद० ग्रं०, पृ० ८९ ।

दयनीय
वि० [सं०] दया करने योग्य । कृपा करने योग्य ।

दयनीयता
संज्ञा स्त्री० [सं०] ऐसी दशा जिसे देखकर देखनेवाले के मन में दया उत्पन्न हो । उ०— ऐसी दयनीयता हुई है क्या । फूली है, भीतरी रुई है क्या ।—आराधना, पृ० १६ ।

दया
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मन का वह दुःखपूर्ण वेग जो दूसरे के कष्ट को दूर करने की प्रेरणा करता है । सहानुभूति का भाव । करुणा । रहम । क्रि० प्र०—आना ।—करना । यौ०—दया दृष्टि । विशेष— जिसके प्रति दया की जाती है उसके वाचक शब्द करे साथ 'पर' विभक्ति लगती है । जैसे, किसी पर दया आना, किसी पर (या किसी के ऊपर) दया करना । शिष्टाचार के रूप में भी इस शब्द का व्यवहार बहुत होता है । जैसे, किसी ने पूछा 'आप' अच्छी तरह' ? उत्तर मिलता है ।— 'आपकी दया से' । २. दक्ष प्रजापति की एक कन्या जो धर्म को ब्याही गई थी ।

दयाकर
वि० [सं०] दया करनेवाला । दयालु । कृपालु । उ०— सुनु सर्वज्ञ कृपा सिंधी । दीन दयाकर आरत बंधी ।— मानस, ७ । १८ ।

दयाकर (२)
संज्ञा पुं० शिव [को०] ।

दयाकूट
संज्ञा पुं० [सं०] बुद्धदेव ।

दयाकूर्च
संज्ञा पुं० [सं०] बुद्धदेव ।

दयादृष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] किसी के प्रति करुणा या अनुग्रह का भाव । रहम या मेहरबानी की नजर ।

दयानंद सरस्वती
संज्ञा पुं० [सं० दयानन्द सरस्वती] आर्यसमाज के संस्थापक जिनका समय सन् १८२४ से १८८३ तक है । वि० दे० 'आयँसमाज' ।

दयानत
संज्ञा स्त्री० [अ०] सत्यनिष्ठा । ईमान ।

दयानतदार
वि० [अ० दयानत + फा़० दार] ईमानदार । सच्चा ।

दयानतदारी
संज्ञा पुं० [अं० दयानत + फा़० दारी] ईमानदारी । सच्चाई ।

दयाना पु
क्रि० अ० [हिं० दया + ना (प्रत्य०)] दयालु होना । कृपालु होना । उ०— आगम कारण भूप तब मुनिसों कह्यो सुनाई । मुनिवर दई उपासना परम दयालु दयाई ।— गुमान (शब्द०) ।

दयानिधान
संज्ञा पुं० [सं०] दया का खजाना । वह जिसमें बहुत अधिक दया हो । बहुत दयालु परुष ।

दयनिधि
संज्ञा पुं० [सं०] दया का खजाना । वह जिसके चित्त में बहुत दया हो । बहुत दयालु पुरुष । २. ईश्वर का एक नाम । उ०— दयानिधि तेरी गति लखि न परै ।—सूर (शब्द०) ।

दयापात्र
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो दया के योग्य हो । वह जिसपर दया करना उचित हो ।

दयामण पु
वि० [सं० दयावत्, बहु व० दयावन्त, देशी दयावण, दयावन्न, हिं० दयावन] दया के योग्य । दयनीय । उ०— पहिली होय दयामणउ रवि आथमणउ जाइ ।— ढोला०, दू० ५४९ ।

दयामय (१)
वि० [सं०] १. दया से पूर्ण । दयालु ।

दयामय (२)
संज्ञा पुं० ईश्वर का एक नाम ।

दयार (१)
संज्ञा पुं० [सं० दवदार] देवदार का पेड़ ।

दयार (२)
संज्ञा पुं० [अ०] प्रांत । प्रदेश ।

दयार (३)
वि० [सं० दयालु, हिं० दयाल] दे० 'दयालु' । उ०— आवागवन नसावै हो, गुरु होवै दयार ।— पलटू०, भा० ३, पृ० ८० ।

दयार्द्र
वि० [सं०] दया से भोग हुआ । दयापूर्ण । दयालु ।

दयाल (१)
वि० [सं० दयालु] दे० 'दयालु' ।

दयाल (२)
संज्ञा पुं० [देश०] एक चिड़िय़ा जो बहुत बोलती है ।

दयाली †
संज्ञा स्त्री० [सं० दया] दे० 'दयालुता' । उ०— जिनपर संत दयाली कीन्हा । अगम बूझ कोई बिरले लोन्हा ।—घट०, पृ० २१८ ।

दयालु
वि० [सं०] जिसमें दया का भाव अधिक हो । बहुत दया करनेवाला । दयादान् ।

दयालुता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दवालु होने का भाव । दया करने की प्रवृति ।

दयावंत
वि० [सं० दयावन् का बहुव०] दयायुक्त । दयालु ।

दयावती (१)
वि० स्त्री [सं०] दया करनेवाली ।

दयावती (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] ऋषभ स्वर की तीन श्रुतियों में से पहली श्रुति ।

दयावना पु
वि० पुं० [हिं० दया + आवना] [वि० स्त्री० दयावनी] दया को योग्य । दया का पात्र । दीन । उ०— देवी देव दानव दयावने है जौरै हाथ, बापुरे बराँक और राजा राना राँक कौ ।— तुलसी (शब्द०) ।

दयावान्
वि० [सं० दयावत्] [वि० स्त्री० दयावती] जिसके चित में दया हो । दयालु ।

दयावीर
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो दया करने में वीर हो । वह जो दूसरे का दुःख दूर करने के लिये प्राण तक दे सकता हो । विशेष— साहित्य या काव्य में वीर रस के अंतर्गत युद्धवीर, दानवीर आदि जो चार वीर गिनाए गए हैं उनमें दयावीर भी है ।

दयाशील
वि० [सं०] दयालु । कृपालु ।

दयासागर
संज्ञा पुं० [सं०] जिसके चित्त से अगाध दया हो । अत्यंत दयालु मनुष्य ।

दयित (१)
वि० [सं०] १. प्यारा । प्रिय । उ०— दयित, देखते देव भक्ति को, निरखते नहीं नाथ व्यक्ति जो ।— साकेत, पृ० ३११ ।

दयित (२)
संज्ञा पुं० [सं०] पति । वल्लभ ।

दयिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रियतमा । पत्नी । स्त्री । उ०— इष्टा दयिता वल्लभा प्रिया प्रेयसी होइ ।—अनेक०, पृ० ५९ ।

दर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. शंख । २. गड्ढा । दरार । ३. गुफा । कंदरा । ४. फाड़ने की क्रिया । विदारण । जैसे, पुरंदर । ५. डर । भय । खौफ । उ०— (क) भववारिधि मंदर, परमं दर । बारय, तारय संसृति दुस्तर ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) दर जु कहत कवि शख कौ दर ईषत को नाम । दर डरते राखों कुँवर मोहन गिरधर श्याम ।—नंददास (शब्द०) । (ग) साघ्वस दर आतंक भय भीत भीर भी त्रास । डरत सहचरी सकुच तें गई कुँवरि के पास ।— नंददास (शब्द०) ।

दर (२)
संज्ञा पुं० [सं०दल] सेना । समूह । दल । उ०— (क) पलटा जनु वर्षा ऋतुराजा । जनु आसाढ़ आवै दर साजा ।— जायसी (शब्द०) । (ख) दूतन कहा आय जहाँ राजा । चढ़ा तुर्क आवै दर साजा ।— जायसी (शब्द०)

दर (३)
संज्ञा पुं० [फा़०] द्वार । दरवाजा । उ०— माया नटिन लकुटि कर लोने कोटिक नाच नचावै । दर दर लोभ लागि लै ड़ोलति नाना स्वाँग कराबै ।—सूर (शब्द०) । मुहा०— दर दर मारा मारा फिरना = कार्यसिद्धि या पेट पालने के लिये एक घर से दूसरे घर फिरना । दुर्दशाग्रस्त होकर घुमना ।

दर (४)
संज्ञा पुं० [सं० स्थल, हिं० थल, थर अथवा फा० दर] १. जगह । स्थान । २. वह स्थान जहाँ जुलाई ताने की डंडियाँ गाड़ते हैं ।

दर (५)
संज्ञा स्त्री० १. भाव । विर्ख । जैसे,— कामज की दर आजकले बहुत बढ़ गई है । २. प्रमाण । ठीक ठिकाना । जैसे,—उसकी बात की कोई दर नहीं । ३. कदर । प्रातिष्ठा । महत्व । महिमा । उ०— सिर केतु सुहावन फरहरैं जोहि लखि पर दल थरहरै । सुरराज केतु की दप हरै जादव जोधा डर हरै ।—गोपाल (शब्द०) ।

दर (६)
वि० [सं०] किंचित् । थोड़ा । जरा सा ।

दर † (७)
संज्ञा स्त्री० [सं० दारु (= लकड़ी)] ईख । इक्षु । ऊख । उ०— कारन ते कारज है नीका । जथा कंद ते दर रस फीका ।— विश्राम (शब्द०) ।

दरकंटिका
संज्ञा स्त्री० [दरकण्टिका] शतावरी । सतावर नामक ओषधि ।

दरक (१)
वि० [सं०] डरनेवाला । डरपोक । भीरु ।

दरक (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० दरकना] १. जोर या दाब पड़ने से पड़ा हुआ दरार । चीर । २. दरकने की क्रिया ।

दरकच
संज्ञा स्त्री० [हिं० दोरा + अनु० कच] १. वह चोट जो जोर से रगड़ या ठोकर खाने से लगे । २. वह चोट जो कुचल जाने से लगे । क्रि० प्र० —लगना ।

दरकचाना †
क्रि० सं० [हिं० दर + कचरना] थोड़ा कुचलना । इतना कुचलना जितने में कोई वस्तु कई खंड हो जाय पर चूर्ण न हो ।

दरकटो
संज्ञा स्त्री० [हिं० दर(=भाव) + कटना] पहले से किसी वस्तु की दर या निर्ख काट देने की क्रिया । दर की मुकरंरी । भाव का ठहराव ।

दरकना
क्रि० अ० [सं० दर (=फाड़ना)] दाब या जोर पड़ने से फटना । चिरना । विदीर्ण होना । जैसे, कपड़ा दरकना, छाती दरकना । उ०— क्यों धौ दान्यों लौं हियो दरकत नहिं नैदलाल ।—बिहारी (शब्द०) ।

दरका
संज्ञा स्त्री० [हिं० दरकना] १. शिगाफ । दरार फटने का चिह्न । २. वह चोट जिससे कोई वस्तु दरक या फट जाय । उ०— लखी वियोगिन दाड़िमन, कंटक अंग निदान । फुलत नविन वरको लगो शुकमुख किंशुकवान ।— गुलान (शब्द०) ।

दरकना (१)
क्रि० स० [हिं० दरकना] फाड़ना । उ०— ढीठ लँगर कन्हाई मोरी आंगी दरकाई रे ।— (गीत) ।

दरकना (२)
कि० अ० फटना । उ०— पुलकित अंग अँगिया दरकानी़ उर आनँद अंचल फहरात ।— सूर (शब्द०) ।

दरकार
वि० [फा़०] आवश्यक । अपोक्षिक । जरूरी ।

दरकिनार
क्रि० वि० [फा़०] अलग । अलहदा । एक और । दूर । मुहा०—...तो दर किनार = ....कुछ चर्चा नहीं । दूर की बात है । बहुत बड़ी बात है । जैसे,—उसे कुछ देना तो दरकिनार मैं उससे बात भी नहीं करना चाहता ।

दरकूच
क्रि० वि० [फ्रा०] बराबर यात्रा करता हुआ । मंजिल दरमंजिल । उ०— (क) रामचंद्र जी की चमु राज्यश्री विभीषण की, रावण की मीचु दरकुच चलि आई है ।—केशव । (शब्द०) । (ख) दस सहस बाजे दारब साजे अरु अराबो संग लै । दरकूच आवत है चली मन माँह जंग उमंग लै ।— सूदन (शब्द०) ।

दरक्क पु
संज्ञा पुं० [देश०] ऊँट । उ०— दिन लाख घटे हैंवर दरक्क । जवनान पड़ै निस दिवस जक्क ।—रा० रू०, पृ० ७६ ।

दरखत पु †
संज्ञा पुं० [फा़० दरख्त] दे० 'दरेख्त' ।

दरखास्त
संज्ञा स्त्री० [फा़० दरख्वास्त] १. निवेदन । किसी बात के लिये प्रार्थना । क्रि० प्र०—करना । २. प्रार्थनापत्र । निवेदनपत्र । वह लेख जिसमें किसी बात के लिये विनती की गई हो । मुहा०— दरखास्त गुजरना = दे० 'दरखास्त पड़ना' । दरखास्त देना = प्रार्थनापत्र उपस्थित करना । कोई ऐसा लेख भेजना या सामने रखना जिसमें किसी बात के लिये प्रार्थना की गई हो । दरखास्त पड़ना = प्रार्थनापत्र उपस्थित किया जाना । किसी के ऊपर दरखास्त पड़ना = किसी के विरुद्ध राजा या हाकिम के यहाँ आवेदनपत्र देना ।

दरख्त
संज्ञा पुं० [फा़० दरख्त] पेड़ । वृक्ष ।

दरगह पु
संज्ञा स्त्री० [फा़० दरगाह] दरबार । सभा । उ०— बाँदरा तणों वणियी बदन धर बीणा दरगह धसे ।— रधु० रू०, पृ० ४९ ।

दरगह
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. चौखट । देहरी । २. दरबार । कचहरी । उ०— चढ़ी मदन दरगाह में तेरे नाम कमान ।— रसनिधि (शब्द०) । ३. किसी सिद्ध पुरुष का समाधिस्थान । मकबरा । मजार । जैसे, पीर की दरगाह । ४. मठ । मंदीर । तीर्थस्थान ।

दरगुजर
वि० [फा़०दरगुजर] १. अलग । बाज । वंचित । क्रि० प्र०—होना । मुहा०— बरगुजर करना = टालना । हटाना । २. मुआफ । क्षमाप्राप्त । मुहा— दरगुजर करना = जाने देना । छोड़ देना । दंड़ आदि न देना । मुआफ करना ।

दरगुजरना
क्रि० अ० [फा़० दरगुजर + हिं० ना (प्रत्य०)] १. छोड़ना । त्यागना । बाज आना । २. जाने देना । दंड़ आदि न देना । क्षमा करना । मुआफ करना ।

दरग्गह पु
संज्ञा पुं० [फा़० दरगाह] दरबार । दरगाह । उ०— सहजादे निज अंग सनाहे माँगे दरग्गह माहे । —रा० रू०, पृ० ६५ ।

दरज
संज्ञा स्त्री० [सं० दर (=दरार)] दरार । शिगाफ । दराज । वह खाली जगह जो फटने या दरकने से पड़ जाय । उ०— घटहिं में दया के दरजी, तो दरज मिलावहि हो । —धरम०, पृ० ४८ । यौ०— दरजबंदी = दीवार की दरारों को चूना गारा भरकर बंद करने का काम ।

दरजन
संज्ञा पुं० [अं० डजन, हिं० दर्जन] दे० 'दर्जन' ।

दरजा (१)
संज्ञा पुं० [अं० दजँह, हिं० दरजा] दे० 'दर्जा' ।

दरजा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० दरजा] लोहा ढालने का एक औजार ।

दरजिन
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'दर्जिन' ।

दरजी
संज्ञा पुं० [फा़० दर्जी] दे० 'दर्जी' । उ०— दृग दरजी बरुनी सुई रेसम ड़ोर ललि ।—सं० सप्तक, पृ० १९२ ।

दरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. दलने या पीसने की क्रिया । २. ध्वंस । विनाश ।

दरणि
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रवाह । धारा । २. मोंर । आवर्त । ३. तरंग । लहर । ४. तोड़ना । खंडन [को०] ।

दरणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दरणि' ।

दरत्, दरद्
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पर्वत । पहाड़ । २. बंधा । बंध । बाँध । ३. प्रपात । भरना । ४. डर । भय । ५. हृदय । ६. म्लेच्छ जाति [को०] ।

दरथ
संज्ञा पुं० [सं०] १. कंदरा । गुफा । २. गर्त । गड्ढा । ३. चारे की तलाश करना । ४. पलायन (को०) ।

दरद (१)
संज्ञा पुं० [फा़० दर्द] १. पीड़ा । व्यथा । कष्ट । उ०— दरद दवा दोनों रहै पीतम पास तयार ।—रसनिधि (शब्द०) । २. दया । करुणा । तर्स । सहानुभूति । उ०— माई नेकहु न दरद करति हिलाकिन हरि रोवै ।— सूर (शब्द०) । विशेष— दे० 'दर्द' ।

दरद (२)
वि० [सं०] भयदायक । भयंकर ।

दरद (३)
संज्ञा पुं० १. काश्मीर और हिंदूकुश पर्वत के बीच के प्रदेश का प्राचीन नाम । विशेष— बृहत्संहिता में इस देश की स्थिति ईशान कोण में जललाई गई है । पर आजकल जो 'दरद' नाम की पहाड़ी जाति है लद्दाख, गिलगित, चित्राल, नागर हुँजा आदि स्थानों में ही पाई जाती है । प्राचीन यूनानी और रोमन लेखकों के अनुसार भी इस जाति का निवासस्थान हिंदूकुश पर्वत के आसपास ही निश्चित होता है । २. एक म्लेच्छ, जाति, जिसका उल्लेख मनुस्मृति, हरिवंश आदि में है । विशेष— मनुस्मृति में लिखा है कि पौंड्रक, ओड़्र, द्रविड़, कांबोज, यवन, शक, पारद, पह्लव, चीन, किरात, दरद और खस पहले क्षत्रिय थे, पीछे संस्कारविहीन हो जाने और ब्राह्मओं का दर्शन न पाने से शूद्रत्व को प्राप्त हो गए । आजकल जो दारर नाम की जाति है वह काश्मीर के आसपास लद्दाख से लेकर नागरहुँजा और चित्राल तक पाई जाती है । इस जाति के लोग अधिकांश मुसलमान हो गए हैं । पर इनकी भाषा और रीति नीति की और ध्यान देने से प्रकट होता है कि ये आर्यकुलोत्पन्न है । यद्यपि ये लिखने पढ़ने नें मुसल- मान हो जाने के कारण फारसी अक्षरों का व्यवहार करते हैं, तथापि इनकी भाषा काश्मीरी से बुहुत मिलती जुलती है । ३. इंगुर । सिंगरक । हिंगुल ।

दरदमंद
वि० [फा़० दर्दमंद] १. दुःखी । दर्दवाला । २. दयालु । जो दूसरे को दुःखी देखकर स्वयं दुःख का अनुभव करे । उ०— करन कुबेर कलि कीरति कमाल करि ताले बंद मरद दरदमंद दाना था ।— अकवरी०, पृ० १४४ ।

दरदर (१)
क्रि० वि० [फा़० दर दर] १. द्वार द्वार । दरवाजे दरवाजे । उ०— माया नटिन लकुटि कर लीन्हे कोटिक नाच नचावै । दर दर लोभ लागि लै डोलै नाना स्वाँग करावै ।—सूर (शब्द०) । २. स्थान स्थान पर । जगह जगह । उ०— दर दर देखो दरीखानन में दोरि दौरि दुरि दुरि दामिनी सी दमकिदमकि उठै ।— पद्माकर (शब्द०) ।

दरदर † (२)
वि० [हिं०] दे० 'दरदरा' ।

दरदरा
वि० [सं० दरण(=दलना)] [वि० स्त्री० दरदरी] जिसके कण स्थूल हों । जिसके रवे महीन न हों मोटे हों । जिसके कण टटोलने से मालूम हों । जो खूब बारीक न पिसा हो । जैसे, दरदार आटा, दरदरा चूर्ण ।

दरदराना
क्रि० स० [सं० दरण] १. किसी वस्तु को इस प्रकार हलके हाथ से पीसना या रगड़ना कि उसके मोटे मोटे रवे या टुकड़े हो जायँ । बहुत महीन न पीसना, थोड़ा पीसना । जैसे— मिर्च थोड़ा दरदार कर ले आओ, बहुत महीन पीसने का काम नहीं । † २. जोर से दाँस काटना ।

दरदरी (१)
वि० स्त्री० [हिं० दरदरा] मोटे रवे की । जिसके रवे मोटे हों ।

दरदरी पु (२)
संज्ञा [सं० धरित्री] पृथ्वी । जमीन । धरती (डिं०) ।

दरदवंत पु
वि० [फा़० दर्द + हिं० वंत (प्रत्य०)] १. कृपालु । दयालु । सहानुभूति । रखनैवाला । उ०— सज्जन हो या बात को करि देखी जिय गौर । बोलनि चितवानि चलनि वह दरदवंत की और ।—रसनिधि (शब्द०) । २. दुखी । जिसके पीड़ा हो । पीड़ित । उ०— लेउ न मजनू गोर ढिग कोऊ लैलै नाम । दरदवंत को नेक तो लेन देहु विश्राम ।—रस- निधि (शब्द०) ।

दरदवंद पु
वि० [फा़० दर्दमंद] १. व्यथित । पीड़ित । जिसके दर्द हो । २. दुःखी । खिन्न ।

दरदाई †पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दर्द से युक्ति होने का भाव । वेदना । दरद । उ०—पीकी मोहिं लहर उठत खुटत रैन नाहीं । कहा कहूँ करमन की रेख हिय की दरदाई ।—तुलसी० श०, पृ० ६ ।

दरदालान
संज्ञा पुं० [फ़०] दालान के बाहर का दालान ।

दरदी
वि० [फा़० दर्द, हिं० दरद + ई (प्रत्य०)] जिसे दुःख मिला हो । दुःखी । पीड़ित । उ०— मीरा कहती है मतवाली, दरदी को दरदी पहचाने । दरद और दरदी के रिश्तों को, पगली मोरा क्या जाने ।— हिमत०, पृ० ७६ ।

दरइ
संज्ञा पुं० [फा़० दर्द] दे० 'दरद' या 'दर्द' ।

दरद्नी
वि० [सं० दरिद्र] निर्धन । कंगाल । उ० बेहथ्थ दरद्री द्रव्य ज्यों अचल सचव सिर दिष्षइय । पंगार षेम षेमहकरनं । जित्ति कित्ति अभिलष्षई ।—पृ०, रा०, १२ । ९९ ।

दरन पु
संज्ञा पुं० [सं० दरण] दे० 'दरण' ।

दरना †
क्रि० सं० [सं० दरण] १. दलना । चूर्ण करना । पीसना । २. ध्वस्त करना । नष्ट करना ।

दरप पु †
संज्ञा पुं० [सं० दर्प] दे० 'दर्प' । उ०— तरह मदन रत तणी देखि दिल दरप जाथ दट ।—रधु रू०, पृ०

दरपक पु
संज्ञा पुं० [सं० दर्पक] दे० 'दर्पक' । उ०— तोहि पाड़ कान्ह प्यारी होइगी विराजमान ऐसे जैसे लीने संग दरपक रति है ।—कवित्त०, पृ० ५३ ।

दरपन
संज्ञा पुं० [सं० दर्पण] [स्त्री० अल्पा० दरपनी] मुँह देखने का शीशा । आईना । मुकुर । आरसी ।

दरपना पु
क्रि० अ० [सं० दर्पण] १. ताव में आना । क्रोध करना । २. गर्व या अहंकार करना । । घमंड करना ।

दरपनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दरपन] मुँह देखने का छोटा शीशा । छोटा आईना ।

दरपरदा
क्रि० वि० [फ़० दरपर्दह्] चुपके चुपके । आड़ में । छिपाकर ।

दरपित
वि० [सं० दर्पित] दे० 'दर्पित' ।

दरपेश
क्रि० वि० [फा़०] आगे । सामने । मुहा०— दरपेश होना = उपस्थित होना । सामने आना । जैसे, मामला दरपेश होना ।

दरबंद
संज्ञा पुं० [फा़०] १. दरवाजा । बड़ा दरवाजा । २. पर- कोटा । चारबीवारी । ३. वो राष्ट्रों के मध्य का अंतर [को०] ।

दरबंदी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. किसी चीज की दर या भाव निश्चित करने की क्रिया । २. लगान आदि की निश्चित की हुई दर । ३. अलग अलग दरुया विभाद आदि निश्चित करने की क्रिया ।

दरब
संज्ञा पुं० [सं० द्रव्य] १. धन । दौलत । २. धातु । ३. मोटी किनारदार चादर ।

दरबदर
कि० वि० [फा़०] द्वार द्वार । दर दर । उ०— उनकी असल जानै नहीं । दिल दर बदर ढूँढै कुफर ।—तुरसी श०, पृ० २७ ।

दरबर † (१)
वि० [सं० दरण] १. दरदरा । २. ऐसा रास्ता जिसमें ठीकरे पड़े हों (कहारों की बोली) ।

दरबर (२)
संज्ञा स्त्री० [देशी दडबड़ (=शीघ्र)] उतावली । हड़— बड़ी । जल्दबाजी । शीघ्रता । उ०— अहो हरि आए महा हरबर में, कहा वनि आवै टहल दरबर मैं । साधु सिरोमनि घर मैं साधन धोखे धसे परघर में ।— घनानंद, पृ० ४४० ।

दरबराना † (१)
क्रि० स० [हिं० दरदर] १. दरदरा करना । थोड़ा पीसना । २. किसी को इस प्रकार डरा देना कि वह किसी बात का खंडन न कर सके । घबरा देना । ३. दबाना । दबाव ड़ालना ।

दरबरना पु (२)
क्रि० अ० [देशी दडवड, हिं० दरबर] १. शीघ्रता करना । हड़बड़ी करना । २. छटपटाना । आकुलं होना (लाक्ष०) । उ०— देखन कौं दृग दरबरात, प्रान मिलन अरबरात सिथिल होति अंगति गतिमति तितहिं करति गवन ।—घनानंद०, पृ० ४२० ।

दरबहरा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का मद्य जो कुछ वनस्पपियों की सड़ाकर बनाया जाता है ।

दरबाँ
संज्ञा पुं० [फा़० दरवान] दे० 'दरबान' ।

दरबा
संज्ञा पुं० [फा़० दर] १. कबूतरों, मुरगियों आदि के रखने के लिये काठ का खानेदार संदूक, जिसके एक एक खाने में एक एक पक्षी रखा जाता है । २. दीवार, पेड़ आदि में वह खोंडरा या कोटर जिसमें कोई पक्षी या जीव रहता है ।

दरबान
संज्ञा पुं० [फा़० मि० सं० द्वारवान्] डयोंढ़ीदार । द्वारपाल ।

दरबानी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] दरबान का काम । द्वारपाल का कार्य ।

दरबार
संज्ञा पुं० [फा़०] [वि० दरबारी] १. वह स्थान जहाँ राजा या सरदार मुसाहलों के साथ बैठते हैं । २. राजसभा । कचहरी । उ०— करि मज्जर सरयू जल गए भूप दरबार ।—तुलसी (शब्द०) । यौ०— दरबारदार (१) दो० 'दरबारी' । (२) खुशामदी । चापलूस । दरबारदारी । दरबार आम । दरबार खास । दरबार वृत्ति । मुहा०— दरबार करना = राजसभा में बैठना । दरबार खुला = दरबार में जाने की आज्ञा मिलना । दरबार बंद होना = दरबार में जाने की रोक होना । दरबार बांधना = घूस बाँधना । रिश्वत मुकर्रर करना । मुँह भरना । दरबार लगाना = राजसभा के सभासदों का इकठ्ठा होना । ३. महाराज । राजा (रजवाडों में प्रयुक्त) । ४. अमृतसर में सिक्खों का मंदिर जिसमें 'ग्रंथ साहब' रखा हुआ है । ५. दरवाजा । द्वारा । उ०— तब बोलि उठयो दरबार विलासी । द्विजद्वार लसै जमुनातटवासी ।—केशव (शब्द०) ।

दरबारदारी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. दरबार में हाजरी । राजसभा में उपस्थिति । २. किसी के यहाँ बार बार जाकर बैठने और खुशामद करने का काम । क्रि० प्र०— करना ।

दरबारविलासी पु
संज्ञा पुं० [फा़० दरबार + सं० बिलासी] द्वारपाल । दरबान । उ०— तब बोलि उठयो दरबारविलासी । द्विजद्वार लसैं जमुनातटवासी ।—केशव (शब्द०) ।

दरबारवृत्ति
संज्ञा स्त्री० [फा़० दरबार + सं० वृ्त्ति] राजा द्वारा प्राप्त होनेवाली वृत्ति । राज्य द्वारा दी हुई जीविका । उ०— नित्य दरबारवृत्ति पानेवाले हिंदी कवियों के अतिरिक्त कुछ अन्य कवि भी अकबरी दरबार द्वारा संमानित कथा पुरस्कृत हुए थे ।— अकबरी, पृ० ३२ ।

दरबार साहब
संज्ञा पुं० [फा़० दरबार + अ० साहब] अमृतसर स्थित सिक्खों का प्रसिद्ध तीर्थस्थल गुरुद्वारा जहाँ उनका धर्म— ग्रंथ 'गुरुग्रंथ साहब' रखा हुआ है ।

दरबारी (१)
संज्ञा पुं० [फा़०] राजसभा का सभासद । दरबार में बैठनेवाला आदमी ।

दरबारी (२)
वि० दरवार का । दरबार के योग्य । दरबार से संबंध रखनेवाला । जैसे, दरबारी पोशाक ।

दरबारी कान्हड़ा
संज्ञा पुं० [फा़० दरबारी + हिं० कान्हड़ा] एक राग जिसमें शुद्ध ऋषभ के अतिरिक्त बाकी सब कोमल स्वर लगते हैं ।

दरबी
संज्ञा स्त्री० [सं० दर्वी] करछी । कलछी । करछुल ।

दरभ (१)
संज्ञा पुं० [सं० दर्भ] दे० 'दर्भ' ।

दरभ (२)
संज्ञा पुं० [?] बंदर । उ०— कपि शाखामृग बलीमुख कीश दरभ लंगूर । बानर मर्कट प्लवँग हरि तिन कहँ भजु मन- कूर ।—नंददास (शब्द०) ।

दरमंद
वि० [फा़० दरमांदह्] आजिज । दुखी । निःसहाय । बेकस । उ०— खालिक तो दरमंद जगाया बहुत उमेद जवाब न पाया ।—रै० बानी, पृ० ५५ ।

दरमन
संज्ञा पुं० [फा़०] इलाज । औषध । यौ०— दवादरमन = उपचार ।

दरमाँदा
वि० [फा० दरमान्दह] लाचार । असहाय । संकटग्रस्त । उ०— दरमाँदा ठाढो तुम दरबार । तुम बिन सुरत करे को मेरी दरसन दीजै खोल किवार ।— कबीर श०, भा० २, पृ० ९० ।

दरमा (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] बाँस की वह चटाई जो बंगाल में झोपड़ियों की दीवार बनाने में काम आती है ।

दरमा † (२)
संज्ञा पुं० [सं० दाडिम] अनार ।

दरमाहा
संज्ञा पुं० [फा़० दरमाह्] मासिक वेतन ।

दरमियान (१)
संज्ञा पुं० [फा़०] मध्य । बीच ।

दरमियान (२)
क्रि० वि० बीच में । मध्य में ।

दरमियानी (१)
वि० [फा़०] बीच का । मध्य का ।

दरमियानी (२)
संज्ञा पुं० [फा़०] १. मध्यस्थ । बीच में पड़नेवाला व्यक्ति । दो आदमियों के बीच के झगड़े का निबटेरा करनेवाला मनुष्य । २. दलाल ।

दरस्यान पु
संज्ञा पुं० [फा़० दरमियान] दे० 'दरमियान' । उ०— अव्वल देखो ये कथा, उसे नाम न था, नाम दरस्याने पैदा हुआ चल, चल, चल ।—दक्खिनी०, पृ० ५७ ।

दरया
संज्ञा पुं० [फा़० दर्या] दे० 'दरिया' ।

दरयाव
संज्ञा पुं० [फा़० दरयाव] दे० 'दरियाव' । उ०— ऐसे सब खलक तैं सकल सकिलि रही, राव मैं सरम जैसैं सलिल दरयाव मै ।—मति० ग्रं०, पृ० ३६८ ।

दररना (१)
क्रि० सं० [देश०] दे० 'दरना' ।

दररना (२)
क्रि० सं० [देश०] दे० 'दरेरना' ।

दरराना पु (१)
क्रि० स० [अनु०] हड़बड़ी या तेजी से आना ।

दरराना (२)
क्रि० सं० [हिं०] दे० 'दरदराना' ।

दरवाजा
संज्ञा पुं० [फा़० दरवाजह्] १. द्वारा । मुहाना । मुहा०— दरवाजे की मिट्टी खोद ड़ालना या ले ड़ालना = बार बार दरवाजे पर आना । दरवाजे पर इतनी बार जाना आना कि उसकी मिट्टी खुद जाय । २. किवाड़ । कपाट । क्रि० प्र०—खटखटाना ।—खोलना ।—बंद करना ।— भेढ़ना ।

दरवी
संज्ञा स्त्री० [सं० दर्वी] १. साँप का फन । यौ०— दरवीरकर = साँप । फनवाला साँप । २. करछुल । पौना । ३. सँड़सी । दस्तपनाह । दस्पना ।

दरवेश
संज्ञा पुं० [फा़०] [स्त्री० दरवेशी] फकीर । साधु ।

दरवेशी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] फकीरी । साधुता [को०] ।

दरश
संज्ञा पुं० [सं० दर्श] दे० 'दर्श' ।

दरशन
संज्ञा पुं० [सं० दर्शन] दे० 'दर्शन' ।

दरशना
क्रि० अ०, क्रि० सं० [सं० दर्शन] दे० 'दरसना' ।

दरशाना पु
क्रि० अ०, क्रि० स० [सं० दर्शन] दे० 'दरसाना' ।

दरस
संज्ञा पुं० [सं० दर्श] १. देखादेखी । दर्शन । दीदार । उ०— दरस परस मज्जन अरु पाना ।—तुलसी (शब्द०) । यौ०—दरस परस । २. भेट । मुलाकात । ३. रूप । छबि । सुंदरता ।

दरसन
संज्ञा पुं० [सं० दर्शन] दे० 'दर्शन' ।

दरसना पु (१)
क्रि० अ० [सं० दर्शन] दिखाई पड़ना । देख पड़ना । देखने में आना । दृष्टिगोचर होना । उ०—श्री नारद की दरसै मति सी । लोपै तमता अपकीरति सौ ।— केशव (शब्द०) ।

दरसना (२)
क्रि० सं० [सं० दर्शन] देखना । लखना । उ०—(क) बन राम शिला दरसी जबहीं ।— केशव । (शब्द०) । (ख) नर अंध भए दरसे तरु मोरे ।— केशव । (शब्द०) ।

दरसनिया पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दर्शन] विस्फोटक, महामारी आदि बिमारियों की शांति के लिये पूजा आदि करनेवाला । झड़ फूँक आदि करनेवाला ।

दरसनी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दर्शन] दर्पण । शीशा । आईना । उ०— नकुल सुदरसन दरसनी छेमकरी चकचाष । दस दिसि देखत सगुन सुभ पूजहि मन अभिलाष ।—तुलसी (शब्द०) ।

दरसनीय पु
वि० [सं० दर्शनीय] दे० 'दर्शनीय' ।

दरसनी हुंड़ी
संज्ञा स्त्री० [सं० दर्शन] १. वह हुंड़ी जिसके भुगतान की मिति को दस दिन या उससे कम दिन बाकी हों । (इस प्रकार की हुंड़ी बाजार में दरसनी हुंड़ी के नाम से बिकती थी । २. कोई ऐसी वस्तु जिसे दिखाते ही कोई वस्तु प्राप्त हो जाय ।

दरसाना
क्रि० सं० [सं० दर्शन] १. दिखलाना । दृष्टिगोचर करना । उ०— चकित जानि जननी जिय रघुपति वपु विराट दरसायो ।—रघुराज (शब्द०) । २. प्रकट करना । स्पष्ट करना । सम- झाना । उ०— रामायन भागवत सुनाई । दीन्ही भक्ति राह दरसाई ।— रघुराज (शब्द०)

दरसाना (२)
क्रि० अ० दिखाई पड़ाना । देखने में आना । दृष्टिगोचर होना । उ०— (क) ड़ाढी में अरु वदन में सेत बार दरसाहिं । रघुराज (शब्द०) । (ख) प्रमुदित करहिं परस्पर बाता । सखि तब अघर स्याम दरसाता ।— रघुराज (शब्द०) ।

दरसावना
क्रि० सं० [हिं० दरसाना] दे० 'दरसाना' ।

दरहाल
क्रि० वि० [फा़० दर + अ० हाल] अभी । इसी समय । उ०—दादू कारणि कंत के खरा दुखी बेहाल । मीरा मेरा मिहार करि, दे दरसन दरहाल ।—दादू०, पृ० ६२ ।

दराँती
संज्ञा स्त्री० [सं० दात्री] १. हँसिया । घास या फसल काटने का औजार । मुहा०—दराँती पड़ना = कटोनी पड़ना । कटाई प्रारंभ होना । २. दे० 'दरेंती' ।

दरा †
संज्ञा पुं० [फा़० दरेह्; तुल० सं० दरा (=गुफा)] दे० 'दर्रा' । उ०—खैवरा का दरा सों वार आँणी का इरादा ।— शिखर०, पृ० ५१ ।

दराई
संज्ञा स्त्री० [हिं०] १. दलने की मजदूरी । २. दलने का काम ।

दराज (१)
वि० [फा़० दराज] बड़ा । भारी । लंबा । दीर्घ ।

दराज (२)
क्रि० वि० [फा़०] बहुत । अधिक ।

दराज (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं० दरार] दरज । शिगाफ । दरार ।

दराज (४)
संज्ञा स्त्री० [अं० ड्राअर] मेज में लगा हुआ संदूकनुमा खाना जिसमें कुछ वस्तु रखकर ताला लगा सकते हैं ।

दरार
संज्ञा स्त्री० [सं० दर] वह खाली जगह जो किसी चीज के फटने पर लकीर के रूप में पड़ लाती है । शिगाफ । उ०— (क) अवहुँ अवनि विहरत दरार मिस को अवसर सुधि कीन्हें ।— तुलसी (शब्द०) । (ख) सुमिरि सुनेह सुमित्रा सुत को दरकि दरार न आई ।— तुलसी (शब्द०) ।

दरारना पु
क्रि० अ० [हिं० दरार + ना (प्रत्य०)] फटना । विदीर्ण होना । उ०— बाजहिं भेरि नफीर अपारा । सुनि कादर उर जाहिं दरारा ।— तुलसी (शब्द०) ।

दरारा
संज्ञा पुं० [हिं० दरना] दरेरा । धक्का । रगड़ा । उ०— दल के दरारे हुते कमठ करारे कूटे केरा कैसे पात बिहराने फन सेस के ।— भूषण (शब्द०) ।

दरिंदा
संज्ञा पुं० [फा़० दरिन्दह्] फाड़ खानेवाला जंतु । मांसभक्षक वनजंतु । जैसे, शेर, कुत्ता, आदि ।

दरि
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० ' दरी' [को०] ।

दरित
वि० [सं०] १. भयालु । डरपोक । भीत । २. विदीर्ण । फटा हुआ [को०] ।

दरिद †
संज्ञा पुं० [सं० दारिद्र] १. कंगाली । निर्धनता । गरीबी । २. कंगाल । निर्धन ।

दरिद्दर †
वि०, संज्ञा पुं० [सं० दरिद्र] दे० ' दरिद्र' ।

दरिद्र (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० दरिद्रा] जिसके पास निर्वाह के लिये यथेष्ट धन हो । निर्धन । कंगाल । यौ०— दरिद्र नारायण = कंगाल । भिक्षुक ।

दरिद्र (२)
संज्ञा पुं० १. निर्धन मनुष्य । कंगाल आदमी । †२. दारिद्रय । कंगाली ।

दरिद्रता
संज्ञा स्त्री० [सं०] कंगाली । निर्धनता ।

दरिद्राण
संज्ञा पुं० [सं०] गरीबी । धनहीनता [को०] ।

दरिद्रायक
वि० [सं०] धनहीन । कंगाल [को०] ।

दरिद्रात
वि० [सं०] दे० ' दरिद्रायक' ।

दरिद्री †
वि० [सं० दरिद्रित, सं० दरिद्र + हिं० ई (प्रत्य०)] दे० 'दरिद्र' ।

दरिया (१)
संज्ञा पुं० [फा़०] १. नदी । २. समुद्र । सिंधु । उ०— उ०— (क) तजि आस भी दास रघूपति को दसरथ्थ के दानि दया दरिया ।— तुलसी (शब्द०) । (ख) दरिया दधि किया मथन भोम फट्टिय खह तुट्टिय ।— पृ० रा०, १ । ६३९ । यौ०— दरियादिल = उदार ।

दरिया (२)
संज्ञा पुं० [हिं० दरना] दलिया ।

दरिया (३)
संज्ञा पुं० [देश०] निर्गुंण पंथी एक संत । यौ०— दरियादासी ।

दरियाई (१)
वि० [फा़०] १. नदी संबंधी । २. नदी में रहनेवाला । जैसे, दरियाई घोड़ा । ३. नदी के निकट का । ४. समुद्र संबंधी ।

दरियाई (२)
संज्ञा स्त्री० पतंग को दुर ले जाकर हवा में छोड़ने की क्रिया । झोली । छुडै़या । क्रि० प्र०—देना ।

दरियाई (३)
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० दाराई] एक प्रकार की रेशमी पतली साटन । उ०— सच है, और तुम्हारी कविता ऐसी है जैसे सफेद फर्श पर गोबर का चोंथ, सोने की सिकड़ी में लोहे की घंटी ग्र०, भा० १, पृ० ३७७ ।

दरियाई (४)
संज्ञा स्त्री० [फा़० दरिया] एक तरह की तलवार । उ०— दिपती दरियाई दोनौ आई भटनि चलाई अति उमही ।— पद्याकर ग्रं०, पृ० २८ ।

दरियाई घोड़ा
संज्ञा पुं० [फा़० दरियाई + हिं० घोड़ा] गैंडे की तरह का मोटी खाल का एक जानवर जो अफ्रिका में नदियों के किनारे की दलदलौ और झाड़ियों में रहता हैं । विशेष— इसके पैरों में खुर के आकार की चार चार उँगलिया होती हैं । मुँह के भीतर डाढ़ें और कँटीले दांत होते हैं । शरीर नाटा, मोटा, और बेढंगा होता हैं । चमडे़ पर बाला नहीं होते । नाक फूली और उभरी हुई तथा पूँछ ओर आँखे छोटी होती हैं । यह जानवर पौधों की जड़ों और कल्लौ को खाकर यरहता है । दिन भर तो यह झाड़ियों और दलदलों में छिपा रहता है, रात को खाने पीने की खोज में निकलता है और खेती आदि को हानि पहुँचाता है । पर यह नदी से बहुत दुर नहीं जाता और जरा सा खटका या भय होते ही नदी में जाकर गोता मार लेता है । यह देर तक पानी में नदीं रह सकता, साँस लेने के लिये सिर निका- लता है और फिर डूबता है । यह निर्जन स्थानों में गोल बाँधकर रहता है । कभी कभी लोग इसका शिकार गड़्ड़े खोदकर करते हैं । रात को जब यह जंतु गड़्ढों में गिरकर फंस जाता है तब लोग इसे मार ड़ालते हैं । इसके चमड़े से एक प्रकार का लचीला और मजबूत चाबुक बनता है जिसे 'करवस' कहते हैं । मिस्त्र देश में इस चाबुक का प्रचार है । वहाँ की प्रजा इसकी मार से बहुत डरती है । पहले नील नदी के किनारे दरियाई घोड़े बहुत मिलते थे, पर अब शिकार होने कारण बहुत कम हो चले हैं ।

दरियाई नरियल
संज्ञा पुं० [फा़० दरियाई + हिं० नारियल] एक प्रकार का नारियल जो अफ्रीका, अमेरिका आदि में समुद्र के किनारे किनारे होता है । विशेष— इसकी गिरी और छिलका सूखने पर पत्थर की तरह कड़ा हो जाता है । इसकी गिरी दवा के काम में आती है । खोपड़े का पात्र बनता है जिसे संन्यासी या फकीर अपने पास रखते हैं ।

दरियाउ पु
संज्ञा पुं० [फा़० दरियाब] दे० ' दरियाव' ।

दरियादासी
संज्ञा पुं० [हिं० दरियादास + ई] निगुर्ण उपासक साधुओं का एक संप्रदाय जिसे दरिया साहब नामक एक व्यक्ति ने चलाया था । कहते हैं, इस संप्रदाय के लोग आधे हिंदू आधे मुसलमान होते हैं । संत दरिया के संप्रदाय का अनुगामी ।

दरियादिल
वि० [फा़०] [स्त्री० दरियादिली] उदार । दानी । फैयाज ।

दरियादिली
संज्ञा स्त्री० [फा़०] उदारता ।

दरियाफ †
वि० [फा़० दरियाफ्त] दे० 'दरियाफ्त' । उ०— आपुको खूब दरियाफ कीजै ।— पलटू०, पृ० ५९ ।

दरियाफ्त
वि० [फ़० दरियाफ्त] ज्ञात । मालूम । जिसका पता लगा हो । क्रि० प्र०—करना ।—होना ।

दरियाय पु
संज्ञा पुं० [फा़० दरियाब] दे० 'दरियाव' । उ०— हिंद ते षेदि पठन षग्ग वर दल दलमलि दरियाय बहाऊँ ।— अकवरी०, पृ० ६७ ।

दरियाबरामद
संज्ञा पुं० [फा़०] दे० 'दरियाबरार' ।

दरियाबरार
संज्ञा पुं० [फा़०] वह भूमि जो किसी नदी की धारा । हट जाने से निकल आती है और जिसमें खेती होती है ।

दरियावार
वि० [फा़०] अत्यंत बरसनेवाला । उदार । बरसालू [को०] ।

दरियाबुर्द
संज्ञा पुं० [फा़०] वह भूमि जिसे कोई नदी काटकर खराब कर दे जिससे वह खेती के योग्य न रहे ।

दरियाव
संज्ञा पुं० [फा़० दरियाब] १. दे० 'दरिया' । उ०— तन समुद्र मन लहर है नैन कहर दरियाव । बेसर भुजा सिकंदरी कहत न आव, न आव ।— (प्रचलित) । २. समुद्र । सिंधु । उ०— पक्का मतो करिकै मलिच्छ मनसब छोड़ि मक्का ही मिस उतरत दरियाव हैं ।— भूषण (शब्द०) ।

दरी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. गुफा । खोह । २. पहाड़ के बीच वह खड़ुथा नीचा स्थान जहाँ कोई नदी बहती या गिरती हो । यौ०—दरीभृत् । दरीमुख ।

दरी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० स्तर, स्तरी (= फैलाने की वस्तु)] मोटे सूतों का बुना हुआ मोटे दल का बिछौना । शतरंजी ।

दरी (३)
वि० [सं० दरिन्] १. फाड़नेवाला । विदीर्ण करनेवाला । २. डरनेवाला । डरपोका । कादर ।

दरी (४)
संज्ञा स्त्री० [फा़०] फारसी भाष की एक शाखा का नाम [को०] ।

दरिखाना
संज्ञा पुं० [फा़० दर + खाना] वह घर जिसमें बहुत से द्वार हो । बारहदरी । उ०— दर दर देखो दरीखानन में दोरि दोरि दुरि दुरि दामिनी सी दमकि दमकि उठै ।— पद्माकर (सब्द०) ।

दरीगृह
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दरी' । उ०—...ये मंदिर पाषणखंडों को काट काटकर दरीगृहों के रूप में बने थे ।— आ० भा०, पृ० ५९३ ।

दरीचा
संज्ञा पुं० [फा़० दरीचह्] [स्त्री० दरीची] १. खिड़की । झरोखा । २. छोटा द्वार । चोर दरवाजा । उ०—दरीचा तूँ इस बाब का मुज को खोल । मिल उस यार सूँ क्यूँ गहूँ मुज कूँ बोल ।— दव्खिनी, पृ० ८४ । ३. खिड़की के पास बैठने की जगह ।

दरीची
संज्ञा स्त्री० [फा़० दरीचह्] १. झरोखा । खिड़की । २. खिड़की के पास बैठने की जगह । उ०— (क) मूँदि दरीचिन दै परदा सिदरीन झरोंखन रोंकि छपायो ।— गुमान (शब्द०) । (ख) तैसेई मरीचिका दरीचिन के देबे ही में छपा की छबीली छबि ठहरति ततकाल ।— द्विजदेव (शब्द०)

दरीबा
संज्ञा पुं० [?] १. पान दरीबा । पान की सट्टी । वह जगह जँहा बहुत से तँबोली बेचने के लिये पान लेकर बैठते हैं । २. बाजार । उ०— आसिक अमली साध सब, अलख दराबे जाइ । साहेब दर दीदार मैं, सब मिलि बैठे आई ।— दादू०, पृ० १३१ ।

दरीभृत
संज्ञा पुं० [सं० दरीभृत्] पर्वत । पहाड़ ।

दरीमुख
संज्ञा पुं० [सं०] १. गुफा का मुँह । २. राम की सेना का एक बंदर । ३. गुफा के समान मुखवाला (को०) ।

दरूदा
संज्ञा स्त्री० [फा़० दरूद] दुआ । शुभकामना । कृपा । उ०— बे बंदे को पैदा किय़ा दम का दिया दरूदा ।—कबीर सा०, पृ० ८८७ ।

दरून
संज्ञा पुं० [फा़०] आत्मा । हृदय । चित । कल्व [को०] ।

दरूना
संज्ञा पुं० [फा़० दरूना] वब फोड़ा या घाव जिसका मुँह भीतर हो । उ०— दादू हरदम माँहि दिवान कहूँ दरूने दरद सौं । दरद दखनै जाइ, जब देखौ दीदार कौ ।— दादू०, पृ० ५९ ।

दरूनी
वि० [फा़०] भीतरी । आंतरिक । उ०— बनरोनी सब तमाशा यह जो देखो । न जाने यह दरूनी खेल घट का ।— कहबीर मं०, पृ० ३७६ ।

दरेँती
संज्ञा स्त्री० [सं० दर + यन्त्र] अनाज दलने का छोटा यंत्र । चक्की ।

दरेंद्र
संज्ञा पुं० [सं छरेन्द्र] विष्णु का शंख । पांचयन्य [को०] ।

दरेक
संज्ञा पुं० [सं० द्रेक] बकाइन का वृक्ष ।

दरेग
संज्ञा पुं० [अ० दरेग] कमी । कसर । कोर कसर । जैसे— हां मैं इस काम के करने में दरेग न करूँगा ।

दरेर
संज्ञा पुं० [सं० दरण] दे० ' दरेरा' । उ०—दरिया जो कहे दरियान दरेर में तेरि जजीर के तानतु है । — सं० दरिया, पृ० ६५ ।

दरेरना
क्रि० स० [सं० दरण] १. रगड़ना । पीसना । २. रगड़ते हुए धक्का देना ।

दरेरा
संज्ञा पुं० [सं० दरण] १. रगड़ा । धक्का । उ०— तापर सहि न जाय करुणानिधि मन को दुसह दरेरो ।— तुलसी (शब्द०) । २. मेंह का झाला । ३. बहाव का जोर । तोड़ ।

दरेस (१)
संज्ञा स्त्री० [अं० ड़्रेस] एक प्रकार की छींट । फूलदार छपा हुआ एक महीन कपड़ा ।

दरेस (२)
वि० [अं० ड़्रेस] तैयार । बना बनाया । सजा सजाया ।

दरेस (३)
संज्ञा पुं० [सं० दर्शन] दे० ' दरस' । उ०—हंसा देस तहाँ जा पहुँचे देखे पुरुष दरेस ।— कबीर० श०, भा० ३, पृ० ४६ ।

दरेसी
संज्ञा स्त्री० [अं० ड़्रेस] दुरुस्ती । तैयारी । मरम्मत ।

दरैया †
संज्ञा पुं० [सं० दरण] १. दलनेवाला । वह जो दले । २. घातक । विनाशक । उ०— दशरत्थ को नंदन दुःख दरैया ।— (शब्द०) ।

दरोग
संज्ञा पुं० [अ० दरोग] झूठ । असत्य । गलत । मिथ्या । उ०— (क) हौं दरोग जौ कहौं सूर उग्गै पच्छिम दिसि । हौं दरोग जो कहौं ईद उग्गामै कुहुँ मिसि ।— पृ० रा०, ६४ । १३६ । (ख) मेरी बात जो कोई जाने दरोग । कमी फेर उसको न होवे फरोग ।— कबीर मं०, पृ० १३४ । यौ०—दरोग हलफी ।

दरोगहलफी
संज्ञा स्त्री० [अ० दरोगहलफी़] १. सच बोलने की कसम खाकर भी झूठ बोलना । २. झूठी गवाही देने का जुर्म ।

दरोगा †
संज्ञा पुं० [फा़० दारोगह्] दे० ' दारोगा' । उ०— सो वा परगने में एक म्लेच्छ दरोगा रहे ।— दो सो बावन० भा० १, पृ० २४२ ।

दरोदर
संज्ञा पुं० [सं०] दे० ' दुरोदर' [को०] ।

दर्कार
क्रि० वि० [फा़० दरकार] दे० ' दरकार' ।

दर्गाह
संज्ञा पुं० [फा़० दरगाह] दे० 'दरगाह' ।

दर्ज (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० दरज; तुल० फा़० दर्ज] दे० 'दरज' ।

दर्ज (२)
वि० [फा़०] लिखा हुआ । कागज पर चढ़ा हुआ । अंकित । क्रि० प्र०—करना ।—होना ।

दर्जन
संज्ञा पुं० [अं० डजन] बारह का समूह । इकट्ठी बारह वस्तुएं ।

दर्जा (१)
संज्ञा पुं० [अ० दर्जह्] १. ऊँचाई निचाई के क्रम केविचार से निश्चित स्थान । श्रेणी । कोटि । वर्ग । जैसे,— वह अव्वल दर्जे का पाजी है । २. पढाई के क्रम में ऊँचा नीचा स्थान । जैसे,— तुम किस दर्जे में पढ़ते हो । मुहा०—दर्जा उतारना = ऊँचे दर्जे से नीचे दर्जे में कर देना । दर्जा चढ़ना = नीचे दर्जे से ऊँचे दर्जे में जाना । दर्जा चढ़ाना= नीचे दर्ज ऊँचे दर्जे में करना । क्रि० प्र०—घटाना ।—बढ़ाना । ४. किसी वस्तु का विभाग जो ऊपर नीचे के क्रम से हो । खंड़ । जैसे, आलमारी के दर्जे । मकान के दर्जे ।

दर्जा (२)
क्रि० वि० गुणित । गुना । जैसे,— वह चीज उससे हजार दर्जे अच्छी है ।

दर्जिन
संज्ञा स्त्री० [फा़० दर्जा + हिं० इन (प्रत्य०)] १. दर्जी जाति की स्त्री । २. दर्जी की स्त्री । ३. सीने का व्यवसाय करनेवाली स्त्री ।

दर्जी
संज्ञा पुं० [फा़० दर्जी] १. कपड़ा सीनेवाला । वह जो कपड़े सीने का व्यवसाय करे । २. कपड़े सीनेवाली जाति का पुरुष । मुहा० दर्जी की सूई = हर काम का आदमी । ऐसा आदमी जो कई प्रकार के काम कर सके, या कई बातों में योग दे सके ।

दर्द
संज्ञा पुं० [फा़०] १. पीड़ा । व्यथा । क्रि० प्र० —होना । मुहा०—दर्द उठना = दर्द उत्पन्न होना । (किसी अंग का) दर्द करना = (किसी अंग का) पीड़त या व्यथित होना । दर्द खाना = कष्ट सहना । पीड़ा सहना । जैसे,— उसने दर्द खाकर नहीं जाना? दर्द लगाना = पीड़ा आरंभ होना । २. दुःख । तकलीफ । जैसे, दूसरे का दर्द समझना । मुहा०—दर्द आना = तकलाक मालूम होना । जैसे,— रुपया निकालते दर्द आता है । ३. सहानुभूति । करुणा । दया । तर्स । रहम । क्रि० प्र०—आना ।—लगना । महा० —दर्द खाना = तरस खाना । दया करना । ४. हानि का दुःख । खो जाने या हाथ से निकल जोने का कष्ट । जैसे,— उसे पैसे का दर्द नहीं । यौ०— दर्दनाक । दर्दमंद । दर्देजिगर = दर्ददिल । दर्ददिल । मन— स्ताप । मनोव्यथा । दर्देसर = (१) शिर पीड़ा । (२) झझट का काम । दर्दगम = पीड़ा आर दुःख । कष्टसमूह । उ०— मुझको शायर न कहो मीर कि साहब मैंने । दर्दोगम कितने किए जमा तो दीवान किया ।— कविता कौ०, भा० ४, पृ० १२२ ।

दर्दनाक
वि० [फा़०] कष्टजनक । दर्द पैदा करनेवाला [को०] ।

दर्दमंद
वि० [फा़०] [संज्ञा ददंमदी] १. जिसे दर्द हो । पीड़ित । दुःखी । २. जो दूसरे का ददं समझे । जिसे सहानुभूति हो । दयावान् ।

दर्दर (१)
वि० [सं०] टूटा हुआ । फटा हुआ ।

दर्दर (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. कुछ कुछ खंड़ित कलश । २. एक वाद्य । दर्दर । ३. दर्दर नामक पर्वत [को०] ।

दर्दराम्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक पेड़ का नाम । २. एक प्रकार का व्यंजन [को०] ।

दर्दरीक
संज्ञा पुं० [सं०] १. मेढक । दादुर । २. मेघ । बादल । ३. वाद्य । बाजा । ४. एक प्रकार का विशेष वाद्य । जैसे, वंशी [को०] ।

दर्दवंद पु
वि० [फा़० दर्दमंद] दे० 'दर्दमंद' । उ०— खड़े दर्दवंद दरवेस दरगाह में खैर औ मेहर मौजूद मक्का ।— कबीर० रे०, पृ० ४० ।

दर्दी
वि० [फा़० दर्द + हिं० ई (प्रत्य०)] १. दुःखी । पीड़ित । २. जो दूसरे का दर्द समझे । दयावान् । जैसे, बेदर्दी ।

दर्दु
संज्ञा पुं० [सं०] दाद । दद्रु [को०] ।

दर्दुर
संज्ञा पुं० [सं०] १. मेढक । यौ०— दर्दु रोदना = यमुना नदी । २. बादल । ३. अभ्रक । अबरक । ४. पश्चिमी घाट पर्वत का एक भाग । मलय पर्वत से लगा हुआ एक पर्वत । ५. उक्त पर्वत के निकट का देश । ६. प्राचीन काल का एक बाजा (को०) । ८. एक प्रकार का चावल (को०) । ९. घौंसे की ध्वनि । नगाड़े की आवाज (को०) । १०. राक्षस (को०) । ११. ग्राम जिला या प्रांतसमूह (को०) ।

दर्दुरक
संज्ञा पुं० [सं०] १. मेढक । दादुर । २. एक वाद्य । दुर्दर ।

ददुंरच्छदा
संज्ञा स्त्री० [सं०] ब्राह्मी बूटी ।

दर्दुरपुट
संज्ञा पुं० [सं०] वंशी आदि वाद्यों का मुख [को०] ।

दर्दुरा, दर्दुरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दुर्गा का एक नाम [को०] ।

दर्दु, दर्द्रू
संज्ञा पुं० [सं०] दाद का रोगी । जिसे दद्रु रोग हुआ हो [को०] ।

दर्प
संज्ञा पुं० [सं०] १. घमंड । अहंकार । अभिमान । गर्व । ताव । उ०— कंदपं दुर्गम दर्पं दवन उमारवन गुन भवन हर ।— तुलसी (शब्द०) । २. मन । अहंकार के लिये किसी के प्रति कोप । ३. अद्दंडता । अक्खड़पन । ४. दबाव । आतंक । रोब । ५. कस्तूरी । ६. ऊष्मा । ताप । गर्मी (को०) । ७. उमंग । उत्साह (को०) । यो०—दर्पकल = गर्व के कारण मुखर । गर्वभरी बात कहने— वाला । दर्पच्छिद = गर्व को नष्ट करनेवाला । दर्पद = विष्णु का एक नाम । दर्पहार = दे० 'दर्पच्छिद' । दर्पहा = विष्णु ।

दर्पक
संज्ञा पुं० [सं०] १. दर्प करनेवाला व्यक्ति । २. कामदेव । मनोज । ३. दर्प । अहंकार (को०) ।

दर्पण
संज्ञा पुं० [सं०] १. आईना । आरसी । मुहँ अपने का शीशा । वह काँच जो प्रतिबिंब के द्वार मुँह देखने के लिये सामने रखा जाता है । २. ताल के साठ मुख्य भेदों में से एक भदे । ३. चक्षु । आँख । ४. संदीपन । उद्दीपन । उभारने का कार्य । उत्तेजना । ५. एक पर्वत का नाम जो कुवेर का निवासस्थान माना जाता है (को०) ।

दर्पन
संज्ञा पुं० [सं० दर्पण] दे० 'दर्पण' ।

दर्पना पु
क्रि० अ० [सं० दर्पण] ताव में आना । दरपना । गर्वयुक्त होना । उ०— रन मद मत निसाचर दर्पा । विस्त्र ग्रसिहि जनु एहि विधि अर्पा ।— मानस, ६ । ६६ ।

दर्पमद्य क्रीड़ा
संज्ञा स्त्री० [सं०] रसिकता या रंगीलेपन के खेल । नाच रंग आदि ।

दर्पहा
संज्ञा पुं० [सं० दर्पहन्] विष्णु का एक नाम [को०] ।

दर्पित
वि० [सं०] गर्वत । अंहकार से भरा हुआ । उ०— रघुबीर बल दर्पित विभीषनु घालि नहिं ताकहु गने ।— मानस, ६ । ९३ ।

दर्पी
वि० [सं० दर्पिन्] [वि० स्त्री० दर्पिणी] घमंडी । अहंकारी ।

दर्ब पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० द्रव्य] १. द्रव्य । धन । उ०— कछुक दर्ब दै संघि कै, फेरि देह हिंदुवान ।— प० रासो, पृ० १०५ । २. धातु (सोना, चाँदी इत्यादि) ।

दर्बा †
संज्ञा पुं० [सं० द्रव्य] द्रव्य । धन । उ०— आसा पास न मनसा खाय । पर दर्वा न हरे न पर घरि जाय ।— प्राण०, पृ० १०१ ।

दर्बान
संज्ञा पुं० [फा़० दरवान] दे० 'दरबाना' ।

दर्बार
संज्ञा पुं० [फा़० दरबार] दे० 'दरबार' ।

दर्बारी
संज्ञा पुं० [फा़० दरबारी] दे० 'दरबारी' ।

दर्बि पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० द्रव्य] दे० 'दव्य' । उ०— हय गय मानिन दर्बि दिया, आदर बहु लुप किन्न ।— प० रासो, पृ० १३१ ।

दर्भ
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का कुश । डाभ । डाभुस । २. कुश । ३. कुश निर्मित आसन । कुशासन । उ०— अस कहि लवणासिंधु तट जाई । बैठे कपि सब दर्भ डसाई ।—तुलसी (शब्द०) । यौ०— दर्भकुसुम = दर्भपुष्प । एक कीट । दर्भचीर = कुश का परिधान । दर्भपत्र । दर्भपुष्प । दर्भलवण । दर्भसंस्तर । दर्भसूची = दर्माकुर ।

दुर्भकेतु
संज्ञा पुं० [सं०] कुशध्वज । राज जनक के भाई का नाम ।

दर्भट
संज्ञा [सं०] गुप्त गृह । भीतरी कोठरी ।

दर्भपत्र
संज्ञा पुं० [सं०] काँस ।

दर्भपुष्प
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का साँप ।

दर्भलवण
संज्ञा पुं० [सं०] कुश वा घास काटने का एक औजार [को०] ।

दर्भसंस्तर
संज्ञा पुं० [सं०] कुश का आसन या कुश का बिछौना [को०] ।

दर्भांकुर
संज्ञा पुं० [सं० दर्भाङ्कुर] डाभ का गोफा जो सुई की तरह नुकाल होता है [को०] ।

दर्भासन
संज्ञा पुं० [सं०] कुशासन । कुश का बना हुआ बिछावन ।

दर्भाह्वय
संज्ञा पुं० [सं०] मूँज ।

दर्भि
संज्ञा पुं० [सं०] एक ऋषि का नाम । विशेष—महाभारत के अनुसार इन्होंने ऋषि ब्राह्मणों के उपहार के लिये अर्धकील नामक एक तीर्थ स्थापित किया था । इनका एक नाम दर्भी भी है ।

दर्भ
संज्ञा पुं० [सं० दर्भिन्] दे० 'दर्भि' ।

दर्भषिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] कुश का निचला भाग या डंठल [को०] ।

दर्भियाँ
क्रि० वि० [फा़० दरिमियान] दे० 'दरमियान' । उ०—दहन पर हैं उनके गुमाँ कैसे कैसे । कलाम आते हैं दर्मियाँ कैसे कैसे । प्रेमघन०, भा० २, पृ० ४०७ ।

दर्मियान
संज्ञा पुं० [फा़० दरियान] दे० 'दरमियान' ।

दर्मियानी
वि०, संज्ञा पुं० [फा़० दरयामिनी] दे० 'दरमियानी' ।

दर्या
संज्ञा पुं० [फा़० दरिया] दे० 'दरिया' । उ०— एक मछली सारे दर्या को गंदा कर डालती है ।— श्रीनिवास ग्रं०, पृ० ११७ ।

दर्याउ पु
संज्ञा पुं० [हिं० दरियाव] दे० 'दरिया' ।— कूदहिं जहर कहर दर्याउ में ।— पद्माकर ग्रं० पृ० १४ ।

दर्यादिली
संज्ञा स्त्री० [फा़० दरियादिली] उदारता । हृदय की विशा- लता । उ०— और दर्यादिली खुदा के घर से इसी को मिली हैं ।— प्रेमघन०, भा० १, पृ० ८६ ।

दर्याफ्त
वि० [फा़० दरियाफ्त] ज्ञान । मालूम । दरियाफ्त । उ०— इस वक्त मुझसे यहाँ आने का सबब दर्याफ्त करेगा तो मैं इससे क्या जवाब दुँगा ।—श्रीनिवास ग्रं०, पृ० ३२ । क्रि० प्र०—करना ।—होना ।

दर्याव
संज्ञा पुं० [फा़० दरिया] दे० 'दरिया' ।

दर्रा (१)
संज्ञा पुं० [फा़०] १. पहाड़ी रास्ता । वह सँकरा मार्ग जो पहाड़ों के बीच से होकर जाता हो । घाटी । २. दरार । दरज ।

दर्रा (२)
संज्ञा पुं० [सं० दरना] १. मोटा आटा । २. कँकरीली मिट्टी जो सड़कों या बगीचों की रविशों पर डाली जाती है । ३. दरार । शिगाफ । दरज ।

दर्राज
संज्ञा स्त्री० [फा० दराज (= लंबा)] लकड़ी का एक औजार जिससे लकड़ी सीधी की जाती है ।

दर्राना
क्रि० अ० [अनु० दड़ दड़, धड़ धड़] धड़धड़ाना । बेधड़क चला जाना । विना रुकावट या डर के चला जाना । विशेष— इस क्रिया के उन्हीं रूपों का प्रयोग होता है जिनसे क्रि० वि० का भाव प्रकट होता है, जैसे, दर्राकर= धड़ धड़ाकर । बेधड़क । दर्राता हुआ = धड़धड़ता हुआ । बेधड़क उ०— वह दर्राता हुआ दरबार में जा पहुँचा । † दर्राना = धड़धड़ाता हुआ । बेधड़क । उ०— द्वारपालें की बात सुनी अनसुनी कर हरि सब समेत दर्राने वहाँ चले गए, जहाँ तीन ताड़ लंबा अति मोटा महादेव का धनुष धरा था ।— लल्लू (शब्द०) ।

दर्व पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० द्रव्य] द्रव्य धन । संपत्ति । उ०—सहस धेनु कंचन बहु हीरा । अगनित दर्व दियौ नृप वीरा ।— रसरतन, पृ० १९ ।

दर्व (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. हिंसा करनेवाला मनुष्य । २. राक्षस । ३. एक जाति जिसका नाम दरद, किरात आदि के साथ महाभारत में आया है । इस जाति का निवासस्थना पंजाब के उत्तर का प्रदेश था । ४. वह देश जहाँ उक्त जाति बसती थी । ५. सर्प का कण (को०) । ६. आघात । चोट । क्षति (को०) । ७. केरछुल । दर्वी [को०] ।

दर्वट
संज्ञा पुं० [सं०] १. गाँव का चौकीदार । गोड़इत । २. द्वार- रक्षक । द्वारापाल [को०] ।

दर्वरीक
संज्ञा पुं० [सं०] १. इंद्र । २. वायु । ३. एक प्रकार का बाजा ।

दर्वा
संज्ञा स्त्री० [सं०] उशीनर की पत्नी का नाम ।

दर्वि (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दर्वी' [को०] ।

दर्वि पु (२)
वि० [सं० दर्प] दपयुक्त । गरबीला । गर्वयुक्त । उ०— बहु दर्वि लरिव गुमान । सावंत लखि परिवान ।— प० रासो, पृ० ५२ ।

दर्विक
संज्ञा पुं० [सं०] डौआ । चमचा । कलछुल । दर्वी [को०] ।

दर्विका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आँख में लगाने का वह काजल जो घी से भरे दीये में बत्ती जलाकर जमाया या पारा जाता है । २. बनगोभी । गोजिया । ३. चमचा । डौआ (को०) ।

दर्वी
संज्ञा स्त्री० [सं०] करछी । चमचा । ड़ौआ ।२. साँप का फन । यौ०—दर्वीकर ।

दर्वीकर
संज्ञा पुं० [सं०] फनवाला साँप ।

दर्वेस †
संज्ञा पुं० [फा़० दरवेश] दे० 'दरवेश' । उ०— जोगी जंगी जंगम और संन्यासी, डीगंवर दर्वेस ।— कबीर० श०, भा० १, पृ० ६ ।

दर्श
संज्ञा पुं० [सं०] १. दर्शन । अवलोकन । २. सूर्य और चंद्रमा का संगम काल । अमावस्या तिथि । ३. द्वितीया तिथि । यौ०—दर्शपति । ३. वह यज्ञ या कृत्य जो अमावस्या के दिन किया जाय । यौ०—दर्शपौर्णमास । ४. प्रत्यक्ष प्रमाण । चाक्षुष प्रमाण (को०) । ५. दृश्य (को०) ।

दर्शक
वि०, संज्ञा पुं० [सं०] १. जो देखे । दर्शन करनेवाला । देखनेवाला । २. दिखानेवाला । लखानेवाला । बतानेवाला । जैसे, मार्गदर्शक । ३. द्वाररक्षक । द्वारपाल (जो लोगों को राजा के पास ले जाकर उसके दर्शन कराता है) । ४. निराक्षक । निगरानी रखनेवाला । प्रधान ।

दर्शन
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह बोध जो दृष्टि के द्वार हो । चाक्षुष ज्ञान । देखादेखी । साक्षात्कार । अवलोकन । क्रि० प्र०—करना ।—होना । मुहा०— दर्शन देना = देखने में आना । अपने को दिखाना । प्रत्यक्ष होना । दर्शन पाना = (किसी का) साक्षात्कार होना । विशेष— हिंन्दी काव्य में नायक नायिका का परस्पर दर्शन चार प्रकार का माना गया है— प्रत्यक्ष, चित्र, स्वप्न और श्रवण । २. भेंट । मुलाकात । जैसे,— चार महीने पीछे फिर आपके दर्शन करूँगा । विशेष— प्राय बड़ों के ही प्रति इस अर्थ में इस शब्द का प्रयोग होता है । ३. वह शास्त्र जिससे तत्वज्ञान हो । वह विद्या जिससे तत्वज्ञान हो । वह विद्या जिससे पदार्थों के धर्म, कार्य- कारण- संबंध आदि का बोध बोध हो । विशेष—प्रकृति, आत्मा, परमात्मा, जगत् के नियामक धर्म जीवन के अंतिम लक्ष्य इत्यादि का जिस शास्त्र में निरूपण हो उसे दर्शन कहते हैं । विशेष से सामान्य की ओर आंतरिक द्दष्टि को बराबर बढ़ाते हुए सृष्टि के अनेकानेक व्यापारों का कुछ तत्वों या नियमों में अंतर्भाव करना ही दर्शन है । आरंभ में अनेक प्रकार के देवताओं आदि को सृष्टि के विविध व्यापारों का कारण मानकर मनुष्य जाति बहुत काल तक संतुष्ट रही । पीछे अधिक व्यापक द्दष्टि प्राप्त हो जाने पर युक्ति और तर्क की सहायता से जब लोग संसार की उत्पत्ति, स्थिति आदि का विचार करने लगे तब दर्शन शास्ञ की उत्पत्ति, हुई । संसार की प्रत्येक सभ्य जाति के बीच इसी क्रम से इस शास्ञ का प्रादुर्भाव हुआ । पहले प्राचीन आर्य अनेक प्रकार के यज्ञ और कर्मकांड द्वारा इंद्र, वरुण, सविता इत्यादि देवताओं को प्रसन्न करके स्वर्गप्राप्ति आदि के प्रयत्न में लगे रहे, फिर सृष्टि की उत्पत्ति आदि के संबंध में उनके मन में प्रश्न उठने लगे । इस प्रकार के संशयपूर्ण प्रश्न कई वेदमंञों में पाए जाते हैं । उपनिषदों के समय में ब्रह्म, सृष्टि, मोक्ष, आत्मा, इंद्रिय, आदि विषयों की चर्चा बहुत बढी़ । गाथा और प्रश्नोत्तर के रूप में इन विषयों का प्रतिपादन विस्तार से हुआ । बड़े बड़े गूढ़ दार्शनिक सिद्धांतों का आभास उपनिषदों में पाया जाता है । 'सर्व खल्विदं ब्रह्म', 'तत्वमसि' आदि वेदांत के महावाक्य उपनिषदों के ही है । छांदोग्योपनिषद् के छठे प्रपाठक में उद्दालक ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को सृष्टि की उत्पत्ति समझाकर कहा है कि 'हे' श्वेतकेतो ! तू ही ब्रह्म है' । बृहदारण्यको- पनिषद् में मूर्त और अमूर्त, मर्त्य और अमृत ब्रह्म के दोहरे रूप बतलाए गए हैं । उपनिषदों के पीछे सूत्र रूप में इन तत्वों का ऋषियों ने स्वतंत्रतापूर्वक निरूपण किया और छह दर्शनों का प्रादुर्भाव हुआ जिनके नाम ये हैं—सांख्य, योग, वैशेषिक, न्याय मीमांसा (पूर्वमीमांसा), और वेदांत (उत्तर- मीमांसा) । इनमें से सांख्य में सृष्टि की उत्पत्ति के क्रम का विस्तार के साथ जितना विवेचन है उतना और किसी में नहीं है । सांख्य आत्मा को पुरुष कहता है और उसे अकर्ता, साक्षी और प्रकृति से भिन्न मानता है, पर आत्मा एक नहीं अनेक हैं, अतः सांख्य में किसी विशेष आत्मा अर्थात् परमात्मा या ईश्वर का प्रतिपादन नहीं है । जगत् के मूल में प्रकृति का मानकर उसके सत्व, रज औऱ तम इन तीम गुणों के अनुसार ही संसार के सब व्यापार माने गए हैं । सृष्टि को प्रकृति की परिणामपरंपरा मानने के कारण यह मत परिणामवाद कहलाता है । सृष्टि संबंधी सांख्य का यह मत इतिहास, पुराण आदि में सर्वत्र गृहीत हुआ है । योग में क्लेश, कर्म- विपाक और आशय से रहित एक पुरुषविशेष या ईश्वर माना गया है । सर्वसाधारण के बीच जिस प्रकार के ईशवर की भावना है वह यही योग का ईश्वर है । योग में किसी मत पर विशेष तर्क वितर्क या आग्रह नहीं है; मोक्षप्राप्ति के निमित्त यम, नियम, प्राणायाम, समाधि इत्यादि के अभ्यास द्वारा ध्यान की परमावस्था की प्राप्ति के साधनों का ही विस्तार के साथ वर्णन है । न्याय में युक्ति या तर्क करने कीप्रणाली बड़े विस्तार के साथ स्थिर की गई है, जिसका उपयोग पंडित लोग शास्त्रार्थ में बराबर करते हैं । खंडन मंडन के नियम इसी शास्त्र में मिलते हैं, जिनका मुख्य विषय प्रमाण और प्रमेय ही है । न्याय में ईश्वर नित्य, इच्छाज्ञानादि गुणयुक्त और कर्ता माना गया है । जीव कर्ता और भोक्ता दोनों माना गया है । वैशेषिक में द्रव्यों और उनके गुणों का विशेष रूप से निरूपण है । पृथ्वी, जल आदि के अतिरिक्त दिक्, काल, आत्मा और मन भी द्रव्य माने गए हैं । न्याय के समान वैशेषिक ने भी जगत् की उत्पत्ति परमाणुओं से बतालाई है । न्याय से इसमें बहुत कम भेद है । इसी से इसका मत भी न्याय का मत कहलाता है । ये दोनों सृष्टि का कर्ता मानते हैं इसी से इनका मत आरंभवाद कहलाता है । पूर्वमीमांसा में वैदिक कर्मसंबंधी वाक्यों के अर्थ निश्चित करने तथा विरोधों का समाधान करने के नियम निरूपित हुए हैं । इसका मुख्य विषय वैदिक कर्मकांड की व्याख्या है । उत्तरमीमांसा या वेदांत अत्यंत उच्च कोटि की विचार- पद्धति द्वारा एकमात्र ब्रह्म को जगत् का अभिन्न निमित्तोपादानकारण बतलाता है अर्थात् जगत् और ब्रह्म की एकता प्रतिपादित करता है । इसी से इसका मत विवतवाद और अद्वैतवाद कहलाता है । भाष्यकारों ने इसी सिद्धांत को लेकर आत्मा और परमात्मा की एकता सिद्ध की है । जितना यह मत विद्वानों को ग्राह्य हुआ, जितनी इसकी चर्चा संसार में हुई, जितने अनुयायी संप्रदाय इसके खड़े हुए उतने और किसी दार्शनिक मत से नहीं हुए । अरब, फारस आदि देशों में यह सूफी मत के नाम से प्रकट हुआ । आजकल योरप और अमेरिका आदि में भी इसकी ओर विशेष प्रवृत्ति है । भारतवर्ष के इन छह प्रधान दर्शनों के अतिरिक्त 'सवंदर्शनसग्रह' में चार्वाक, बौद्ध, आर्हत, नकुलीश, पाशुपत, शौव, पूर्णप्रज्ञ, रामानुज, पाणिनि और प्रत्याभिज्ञा दर्शन का भी उल्लेख है । यौरप मे यूनान या यवन देश ही इस शास्त्र के विवेचन में सबसे पहले अग्रसर हुआ । ईसा से पाँच छह सौं वर्ष पहले से वहाँ दर्शन का पता लगता है । सुकरात, प्लेटो, अरस्तू, इत्यादि बड़े बड़े दार्शनिक वहाँ हो गए हैं । आधुनिक काल में दर्शन की योरप में बड़ी उन्नति हुई है । प्रत्यक्ष ज्ञान का विशेष आश्रय लेकर दार्शनिक विचार की अत्यंत विशद प्रणाली वहाँ निकली है । ४. नेत्र । आँख । ५. स्वप्न । ६. बुद्धि । ७. धर्म । ८. दर्पण । ९. वर्ण । रंग । १०. यज्ञ । इज्या (को०) । ११. उपलब्धि (को०) । १२. शास्त्र (को०) । १३. परीक्षण । निरीक्षण (को०) । १४. प्रदर्शन । दिखावा (को०) । १५. उपस्थिति या विद्यामानता (न्यायालय मे) (को०) । १६. राय । सलाह । विचार (को०) । १७. नीयत (को०) ।

दर्शनगृह्
संज्ञा पुं० [सं०] १. सभाभवन । २. वह स्थान जहाँ लोग कुछ देखने या सुनने के लिये बैठें [को०] ।

दर्शनपथ
संज्ञा पुं० [सं०] द्दष्टि का पथ । जहाँ तक द्दष्टि जाय । क्षितिज [को०] ।

दर्शनप्रतिभू
संज्ञा पुं० [सं०] वह प्रतिभू या जामिन जो किसी को समय पर उपस्थित कर देने का भार अपने उपर ले । वह आदमी जो किसी को हाजिर कर देने का जिम्मा ले ।

दर्शनप्रतिभाव्य ऋण
संज्ञा पुं० [सं०] वह ऋण जो दर्शन प्रतिभू की साख पर लिया गया हो ।

दर्शनीय
वि० [सं०] १. देखने योग्य । देखने लायक । २. सुंदर । मनोहर । ३. न्यायालय में न्यायाधीश के समक्ष उपस्थिति योग्य (को०) ।

दर्शनी हुंडी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'दरसनी हुंडी' ।

दर्शयिता (१)
वि० [सं० दर्शयितृ] १. दिखानेवाला । प्रदर्शक । २. निर्देश करनेवाला । बतानेवाला । जैसे,पथदर्शयिता ।

दर्शयिता (२)
संज्ञा पुं० १. द्वाररक्षक । द्वारपाल । २. निर्देशक [को०] ।

दर्शाना
क्रि० स० [हिं०] दे० 'दरसाना' ।

दर्शित
वि० [सं०] १. दिखलाया हुआ । २. प्रकाशित । प्रकटित । ३. प्रमाणित ।

दर्शी
वि० [सं० दर्शिन्] १. देखनेवाला । २. विचार करनेवाला । ३. अनुभूत करनेवाला ।

दस
संज्ञा पुं० [अ०] शिक्षा । नसीहत । उपदेश । उ०—जो पड़ते दर्स जब थे खुर्द साल, मस्जिद दरमियान तख्ती कतें ले ।— दक्खिनी०, पृ०, ११५ ।

दर्सनीय पु
वि० [सं० दर्शनीय] देखने योग्य । दर्शनीय । उ०—रम्य सुपेसल भव्य पुनि दर्सनीय रमनीय ।—अनेकार्थ०, पृ० ९९ ।

दल
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी वस्तु के उन दो सम खंडों में से एक, जो एक दूसरे से स्वभावतः जुड़े हुए हों पर जरा सा दबाब पड़ने से अलग हो जायँ । जैसे चने, अरहर मूँग, उरद, मसूर, चिएँ इत्यादि के दो दल जो चक्की में दलने से अलग हो जाते हैं । २. पौधों का पत्ता । पत्र । जैसे, तुलसीदल । ३. तमाल- पत्र । ४. फूल की पंखड़ी । उ०—जय जय अमल कमलदल लोचन ।—हरिश्चंद्र (शब्द०) । ५. समूह । झुंड । गरोह । ६. गुट । चक्र । जैसे,—वह दूसरे के दल में है । ७. सेना । फौज जैसे, शत्रुदल । ८. मयूरपुच्छ । उ०—दल कहिए नृप को कटक, दल पत्रन को नाम, दल बरही के चंद सिर धरे स्याम अभिराम ।—अनेकार्थ०, पृ० १३५ । ९. पटरी के आकार की किसी वस्तु की मोटाई । परत की तरह फैली हुई किसी चीज की मोटाई । ९. अस्त्र के ऊपर का आच्छादन । कोष । म्यान । १०. धन । ११. जल में होनेवाला एक तृण । ११. अंश । टुकड़ा । खंड (को०) । १२. किसी का आधा अंश । अर्धांश (को०) । १३. वृक्षविशेष (को०) । १४. इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित राजा के एक पुत्र जिनकी माता मंडूकराज की कन्या थी (को०) ।

दलक (१)
संज्ञा स्त्री० [अ० दलक] गुदड़ी । उ०—बैठा है इस दलक बिच आपै आप छिपाय । साहब जा तन लख परे प्रगट सिफात दिखाय ।—रसनिधि (शब्द०) ।

दलक (२)
संज्ञा पुं० [हिं० दलकना] राजगीरों का एक औजार जिससेनक्काशी साफ की जाती है । यह छुरी के आकार का होता है परंतु सिरे पर चिपटा होता है ।

दलक (३)
संज्ञा पुं० [हिं० दलकना] १. वह कंप जो किसी प्रकार के आघात से उत्पन्न हो और कुछ देर तक बना रहे । थर- थराहट । धमका । जैसे, ढोलक की दलक । २. रह रहकर उठनेवाला दर्द । टीस । चमक ।

दराकन
संज्ञा स्त्री० [हिं० दलकना] १. दलकनी की क्रिया या भाव । दलक । २. झटका । आघात । उ०—मंद बिलंद अभेरा दलकन पाइय सुख झकझोरा रे ।—तुलसी (शब्द०) ।

दलकना (१)
क्रि० अ० [सं० दलन] १. फट जाना । दरार खाना । चिर जाना । उ०—तुलसी कुलिस की कठोरता तेहि दिन दलकि दली ।—तुलसी (शब्द०) । २. थर्राना । काँपना । उ०—महाबली बलि को दबतु दलकत भूमि तुलसी उछरि सिंधु मेरु मसकत है ।—तुलसी (शब्द०) । ३. चौंकना । उद्विग्न हो उठना । उ०—(क) दलिक उठेउ सुनि बचन कठोरू । जनु छुइ गयो पाक बरतोरू ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) कैकेई अपने करमन को सुमिरत हिय में दलकि उठी ।—देवस्वामी (शब्द०) ।

दलकना पु (२)
क्रि० स० [सं० दलन] डराना । भीत कर देना । भय से कँपा देना । उ०—सूरजदास सिंह बलि अपनी लीन्हीं दलकि श्रृगालहिं ।—सूर (शब्द०) ।

दलकपाट
संज्ञा पुं० [सं०] हरी पंखड़ियों का वह कोश जिसके भीतर कली रहती है ।

दलकोमल
संज्ञा पुं० [सं०] कमल । पंकज [को०] ।

दलकोश
संज्ञा पुं० [सं०] कुंद का पौधा ।

दलगंजन (१)
वि० [सं० दलगञ्जन] श्रेष्ठ वीर । सेना को मारनेवाला । भारी वीर ।

दलगंजन (२)
संज्ञा पुं० एक प्रकार का धान ।

दलगंध
संज्ञा पुं० [सं० दलगन्ध] सप्तपर्ण वृक्ष । छितवन । सतिंवन ।

दलगर्जंन पु
वि० [सं० दलगञ्जन] दे० 'दलगंजन' । उ०—अंग अंग लच्छन बसहिं जे बरनौ बत्तीस । दलगर्जन दुर्जन दलन दलपति पति दिल्लीस ।—रसरतन, पृ० ८ ।

दलघुसरा †
संज्ञा पुं० [हिं० दाल + घुसड़ना] एक प्रकार की रोटी, जिसमें पिसी हुई दाल नमक मसाले के साथ भरी रहती है ।

दलर्थभण
वि० [सं० दल + स्तम्भन] सेना को रोकनेवाला । बढ़ती हुई सेना को रोक देनावाला । दल का स्तंभन करनेवाला । उ०—दादू सूर सुभट दलर्थभण रोपि रह्यौ रन माहीं रे । जाकी साखि सकल जग बोलै टेक टली नाहीं रे ।—सुंदर ग्रं०, भा० २, पृ० ८७९ ।

दलथंभन
संज्ञा पुं० [हिं० दल + थामना] कमखाब बुननेवालों का औजार जो बाँस का होता है और जिसमें अँकुड़ा और नक्शा बँधा रहता है ।

दलद पु †
संज्ञा पुं० दे० [सं० दरिद्रय] 'दरिद्रय' । उ०—दीधो धन लीधो दलद, कीधो गात कुढंग । गनका सूँ राखै गुसट रसिया तोनूँ रंग ।—बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० १२ ।

दलदल
संज्ञा स्त्री० [सं० दलाढ्य (= नदीतट का कीचड़)] १. कीचड़ । पाँक । चहला । २. वह जमीन जो गईराई तक गीली हो और जिससें पैर नीचे को धँसता हो । विशेष—कहीं कहीं पूरब में यह शब्द पुं० भी बोला जाता है । मुहा०—दलदल में फँसना = (१) कीचड़ में फँसना । (२) ऐसी कठिनाई में फँस जाना जिससे निकलना दुस्तर हो । मुश्किल या दिक्कत में पड़ना । (३) जल्दी खतम या तै न होना । अनिर्णीत रहना । खटाई में पड़ना । उ०—दोनों दलों की दलादली में दलपति का चुनाव भी दलदल में फँसा रहा ।— बदरीनारायण चौधरी (शब्द०) । ४. बुड्ढी स्त्री (पालकी के कहार) ।

दलदला
वि० [हिं० दलदल] [वि० स्त्री० दलदली] जिसमें दलदल हो । दलदलवाला । जैसे, दलदला मैदान, दलदली धरती ।

दलदार
वि० [हिं० दल + फा़० दार] जिसका दल मोटा हो । जिसकी तह या परत मोटी हो । जैसे, दलदार गूदा । दलदार आम ।

दलन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० दलित] १. पीसकर टुकड़े टुकड़े करने की क्रिया । चूर चूर करने का काम । २. विनाश । संहार । ३. विदारण । उ०—या विधि वियोग ब्रज बावरो भयो है सब, बाढत उदेग महा अंतर दलन कौ ।—घना- नंद०, पृ० ५०३ ।

दलन (२)
वि० दलनेवाला । नष्ट करनेवाला । विनाशकारी । नाशक । उ०—साहिं का ललन दिली दल का दलन अफजल का मलन शिवराज आया सरजा ।—भूषण ग्रं०, पृ० ११९ ।

दलना
क्रि० स० [सं० दलन] १. रगड़ या पीसकर टुकड़े टुकड़े करना । मलकर चूर चूर करना । चूर्ण करना । खंड खंड करना । २. रौंदना । कुचलना । मलना । खूब दबाना । मसलना । मीड़ना । उ०—पर अकाज लगि तनु परिहरहीं । जिमि हिम उपल कृषि दलि गरहीं ।—मानस, १ ।४ । संयो० क्रि०—डालना ।—मारना । ३. चक्की में डालकर अनाज आदि के दानों को दलों या कई टुकड़ों में करना । जैसे, दाल दलना । ४. नष्ट करना । ध्वस्त करना । जीतना । उ०—केतिक देश दल्यो भुज के बल ।—भूषण (शब्द०) । यौ०—दलना मलना । उ०—भुजबल रिपुदल दलि मलि देखि दिवस कर अंत ।—तुलसी (शब्द०) ।—मलना दलना ५. तोड़ना । झटके से खंडित करना । उ०—दलि तृण प्राण निछावरि करि करि लैहैं मातु बलैया ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) साई हौं बूझत राजसभा धुनुकैं दल्यौ हौं दलिहौं बल ताको ।—तुलसी (शब्द०) ।

दलानि †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दलना] दलने की क्रिया या ढंग ।

दलनिर्मोक
संज्ञा पुं० [सं०] भोजपत्र का पेड़ ।

दलनिहार पु
वि० [सं० दलनि + हिं० हारा (प्रत्य०)] विध्वंस करनेवाला । नष्ट करनेवाला । मर्दित करनेवाला । उ०— कलि नाम कामतरु राम को । दलनिहार दारिद दुकाल दुख दोष घोर घन घाम को ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ५३७ ।

दलनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] कंकड़ । मिट्टी का टुकड़ा । ढेला [को०] ।

दलप
संज्ञा पुं० [सं०] १. दलपति । मंडली या सेना का नायक । २. सोना । स्वर्ण । ३. शस्त्र । आयुध (को०) । ४. शास्त्र (को०) ।

दलपति
संज्ञा पु० [सं०] १. किसी मंडली या समुदाय का प्रधान । मंडली का मुखिया । अगुवा । सरदार । २. सेनापति । उ०—दलगर्जन दुर्जदलन दलपतिपति दिल्लीस ।—रस- रतन, पृ० ८ । यौ०—दलपतिपति = सेनापतियों का अधीश्वर ।

दलपुष्पा
संज्ञा स्त्री० [सं०] केतकी जिसके फूल पत्ते के आकार के होते हैं । विशेष—केतकी या केवड़े की मंजरी बहुत कोमल पत्तों के कोश के भीतर रहती है । सुगंध के लिये इन्हीं पत्तों का व्यवहार होता है ।

दलबंदी
संज्ञा स्त्री० [सं० दल + हिं० बाँधना] गुटबाजी । दल या गुट बनाने का काम ।

दलबल
संज्ञा पुं० [सं०] लाव लश्कर । फौज । ड०—कछु मारे कछु घायल कछु गढ़ चले पराइ । गजंहिं भालु बलीमुख रिपु दलबल बिचलाइ ।—मानस, ६ ।४६ ।

दलबा
संज्ञा पुं० [हिं० दलना] तीतरबाजों, बटेरबाजों आदि का वह निर्बल पक्षी जिसे वे दूसरे पक्षियों से लड़ाकर और मार खिलाकर उन पक्षियों का साहस बढ़ाते हैं ।

दलबादल
संज्ञा पुं० [हिं० दल + बादल] १. बादलों का समूह । बादलों का झुंड़ । २. भारी सेना । ३. बहुत बड़ा शमि- याना । बड़ा भारी खेमा । मुहा०—दलबादल खड़ा होना = बड़ा भारी शामियाना या खेमा गड़ना ।

दलमलना
क्रि० स० [हिं० दलना + मलना] १. मसल डालना । भीड़ डालना । उ०—यौं दलमलियत निरदई दई कुसुम से गात । कर धर देखौ धरधरा अजौं न उर ते जात ।—बिहारी (शब्द०) । २. रौदना । कुचलना । उ०—रनमत्त रावन सकल सुभट प्रचंड भुजबल दलमले ।—मानस, ६ ।९४ । ३. विनष्ट कर देना । मार डालना ।

दलमलित
वि० [हिं० दलना + मलना] सताई हुई । कुचली हुई । पीड़ित । उ०—प्रजा दुखित दलमलित गएउ फटि फुटि पठान दल ।—अकबरी०, पृ० ६८ ।

दलराय पु
संज्ञा पुं० [सं० दल + राज, प्रा० राय] दे० 'दलपति' । उ०—दाबदार निरखि रिसानो दीह दलराय, जैसे गड़दार अड़दार गजराज को ।—भूषण ग्रं०, पृ० ६ ।

दलवाना
क्रि० स० [हिं० दलना का प्रे० रूप] १. दलने का काम करवाना । मोटा मोटा पिसवाना । जैसे, दाल दलवाना । २. रौंदवाना । ३. नष्ट कराना । ध्वस्त करा देना ।

दलवाल पु †
संज्ञा पुं० [सं० दलपाल] सेनापति । फौज का सरदार ।

दलवीटक
संज्ञा पुं० [सं०] कुट्टनीमतम् में वर्णित कान का एक आभू- षण । एक वर्णभूषण [को०] ।

दलवैया †
संज्ञा पुं० [हिं० दलना + वैया (प्रत्य०)] १. दलनेवाला । २. दलने मलनेवाला । जीतनेवाला ।

दलसायसी
संज्ञा स्त्री० [सं०] तुलसी । श्वेत तुलसी [को०] ।

दलसारिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] केमुआ । बंडा । कच्चु ।

दलसूचि
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह पौधा जिसके पत्तों में काँटे हों । जैसे, नागफनी । २. पत्तों का काँटा । ३. काँटा ।

दलसूसा †
संज्ञा स्त्री० [सं० दलश्रसा या दलस्नसा] दल की शिरा । पत्तों की नस ।

दलहन
संज्ञा पुं० [हिं० दाल + अन्न] वह अन्न जिसकी दाल बनाई जाती है जैसे, चना, अरहर मूँग, उरद, मसूर इत्यादि ।

दलहरा
संज्ञा पुं० [हिं० दाल + हारा (प्रत्य०)] दाल बेचनेवाला । वह जो दाल बेचने का रोजगार करता हो ।

दलहा †
संज्ञा पुं० [सं० स्थल, हिं० थाल्हा] थाला । आलबाल ।

दलाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० दलना] १. चक्की से दाल आदि दरने का काम । उ०—जब तक आँखें थीं, सिलाई करती रही । जब से आँखें गई दलाई करती हूँ ।—काया०, पृ० ५३९ । २. दलने की मजदूरी । दराई ।

दलाई लामा
संज्ञा पुं० [ति०] तिब्बत के सबसे बड़े लामा या धर्म- गुरु जो वहाँ के सर्वप्रभुतासंपन्न भी होते हैं ।

द्लाढक
संज्ञा पुं० [सं०] १. जंगली तिल । २. गेरू । ३. नामकेसर । ४. सिरिस । ५. कुंद । ६. गजकर्णी । एक प्रकार का पलाश । ७. गाज । फेन (को०) । ८. खाँई । परिखा (को०) । ९. तीव्र वायु । अंधवायु । बौंडर (को०) । १०. ग्राममुख्य । गाँव का प्रधान (को०) ।

दलाढय
संज्ञा पुं० [सं०] नदी तट का कीचड़ । पंक [को०] ।

दलादली
संज्ञा स्त्री० [सं० दलन का द्वित्वप्रयोग (मुष्टामुष्टि की भाँति)] भिड़ंत । संघर्ष । होड़ । उ०—उसे इस दोनों दलों की दलादली ने दल मलकर समाप्त कर डाला ।—प्रेमधन०, भा० २, पृ० ३०७ ।

दलान †
संज्ञा पुं० [हिं० दालान] दे० 'दालान' ।

दलाना
क्रि० स० [हिं० दलना] दे० 'दलवाना' ।

दलामल
संज्ञा पुं० [सं०] १. दौने का पौधा । २. मरुवे का पौधा । ३. मैनफल का पेड़ ।

दलाम्ल
संज्ञा पुं० [सं०] लोनिया साग । अमलोनी ।

दलारा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का झूलनेवाला बिस्तरा जिसका व्यवहार जहाज पर मल्लाह लोग करते हैं ।

दलाल
संज्ञा पुं० [अ०] [संज्ञा दलाली] १. वह व्यक्ति जो सौंदा मोल लेने या बेंचने में सहायता दे । बिचवई । मध्यस्थ । २.स्त्री पुरुष का अनुचित संयोग करानेवाला । कुटना । ३. जाटों की एक जाति ।

दलालत
संज्ञा स्त्री० [अ०] चिह्न । पता । लक्षण । उ०— दलालत यो सही कुरान सूँ है । कवी इस्लाम के ईमान सूँ है ।—दक्खिनी०, पृ० १६३ ।

दलाली
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. दलाल का काम । क्रि० प्र०—करना । २. वह द्रव्य जो दलाल को मिलता है । उ०—भक्ति हाट बैठि तू थिर ह्वै हरि नग निर्मल लेहि । काम क्रोध मद लोभ मोह तू सकल दलाली देहि ।—सूर (शब्द०) । क्रि० प्र०—देना ।—लेना ।

दलाह्यय
संज्ञा पुं० [सं०] तेजपत्ता ।

दलि
संज्ञा स्त्री० [सं०] मिट्टी का टुकड़ा । डेला [को०] ।

दलिक
संज्ञा पुं० [सं०] काठ । लकड़ी । [को०] ।

दलित
वि० [सं०] १. मीड़ा हुआ । मसला हुआ । मर्दित । २. रौंदा हुआ । कुचला हुआ । ३. खंडित । टुकड़े टुकड़े किया हुआ । ४. विनष्ट किया हुआ । ५. जो दबा रखा गया हो । दबाया हुआ । जैसे,—भारत की दलित जातियाँ भी अब उठ रही हैं ।

दलिहर
संज्ञा पुं० [सं० दारिद्रय दरिद्र] १. दरिद्रता । गरीबी । उ०—आप चाहें तो एक दिन में हमारा हलिद्दर दूर कर सकते हैं ।—श्रीनिवास ग्रं०, पृ० ३७ । २. कूड़ा करकट । गंदगी । ३. दरिद्र । गरीब । धनहीन ।

दलिद्र †
संज्ञा पुं० [सं० दरिद्र] दे० 'दरिद्र' ।

दलिया
संज्ञा पुं० [हिं० दलना । तुल० फा़० दलीदह्] दलकर कई टुकड़े किया हुआ अनाज । जैसे, गेहूँ का दलिया ।

दली
वि० [सं० दलिन्] १. जिसमें दल या मोटाई हो । २. जिसमें पत्ता हो । पत्तेवाला ।

दलीप †
संज्ञा पुं० [सं० दिलीप] दे० 'दिलीप' ।

दलील
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. तर्क । युक्ति । २. बहस । वाद- विवाद । क्रि० प्र०—करना ।—लाना ।

दलेगंधि
संज्ञा पुं० [सं० दलेगन्धि] सप्तपर्णी वृक्ष ।

दलेपंज
संज्ञा पुं० [हिं० ढलना + पंजा] १. वह घोड़ा जिसकी उमर ढल गई हो । वह घोड़ा जो जवान न रह गया हो । २. ढलती हुई उमर का आदमी ।

दलेल
संज्ञा स्त्री० [अं० ड्रिल] सिपाहियों का वह दंड जिसमें हथियार और कपड़ें आदि उनकी कमर में बाँधकर उन्हें टहलाते हैं । वह कवायद जो सजा की तरह पर ली जाय । उ०—दिल चले दम बनै रहेंगे ही, क्यों न हो दिल दलेल में मेरा ।—चौखे०, पृ० ६४ । मुहा०—दलेल बोलना = सजा की तरह पर कबायद देने की आज्ञा देना ।

दलै
क्रि० स० [देश०] मुँह बाओ । खाओ (हाथीवानों शी बोली) । यौ०—दलै छब दलै = पानी पीओ (हाथीवानों की बोली) ।

दलैया †
संज्ञा पुं० [हिं० दलना] १. दलने या पीसनेवाला । २. नाश करनेवाला । मारनेवाला । उ०—मंदर बिलंद मंदगति के चलैया, एक पल मै दलैया, पर दल बलकानि के ।—मति० ग्रं०, पृ० ३११ ।

दल्भ
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रतारण । धोखा । २. पाप । ३. चक्र ।

दल्मि
संज्ञा पुं० [सं०] १. इंद्र का वज्र । अशनि । २. शिव का एक नाम [को०] ।

दल्लाल
संज्ञा पुं० [अ०] दे० 'दलाल' । उ०—जिन्हें हम व्यापारी न कहकर दल्लाल कहेंगे ।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० २६३ ।

दल्लाला
संज्ञा स्त्री० [अ० दल्लालह्] कुटनी । दूती ।

दल्लाली
संज्ञा स्त्री० [अ०] दे० 'दलाली' ।

दवँगरा †
संज्ञा पुं० [सं० दव + अङ्गार] १. वर्षा ऋतु के आरंभ में होनेवाली झड़ी । उ०—बिहरत हिया करहु पिउ टेका । दीठि दवँगरा मेरवहु एका ।—जायसी । (शब्द०) । २. वर्षा के आरंभ में पानी का कहीं कही एकत्र होकर धीरे धीरे बहना । (बुंदेल०) ।

दवँरी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'दँवरी' ।

दव
संज्ञा पुं० [सं०] १. वन । जंगल । २. दवाग्नि । वह आग जो वन में आपसे आप लग जाती है । दवारि । दावा । उ०—गई सहमि सुनि वचन कठोरा । मृगी देखि जनु दव चहुँ ओऱा ।—तुलसी (शब्द०) । ३. अग्नि । आग । उ०—(क) आजु अयोध्या जल नहिं अचवों ना मुख देखौं माई । सूरदास राघव के बिछुरे मरौं भवन दव लाई ।—सूर (शब्द०) । (ख) राकापति षोडश उगै तारागण समुदाय । सकल गिरिन दव लाइए रवि बिनु राति न जाय ।—तुलसी (शब्द०) । यौ०—दवदग्धक = एक तृण । एक घास का नाम । दवदहन = दावाग्नि । वनाग्नि । ४. दे० 'दवथु' ।

दवथु
संज्ञा पुं० [सं०] १. दाह । जलन । २. संताप । परिताप । दुःख ।

दवदद्ध पु
वि० [सं० दव + दग्ध, प्रा० दद्ध] दावाग्नि में जला हुआ । उ०—तहाँ सु अँबतर रिष्ष इक, क्रस तन अंग सुरंग । दवदद्धौ जनु द्रुंग कोइ कै कोइ भूत भुअंग ।—पृ० रा०, ६ ।१७ ।

दवन पु (१)
वि, संज्ञा पुं० [सं० दमन, प्रा० दवण] दमन करनेवाला । नाश करनेवाला । उ०—प्राणनाथ सुंदर सुजानमनि दीनबंधु जन आरति दवन ।—तुलसी (शब्द०) ।

दवन (२)
संज्ञा पुं० [सं० दमनक] दौना नामक पौधा । उ०—गहब गुलाब, मंजु मोगरे, दवन फूले, बेले अलबेले खिले चंपक चमन में ।—भुवनेश (शब्द०) ।

दवनपापड़ा
संज्ञा पुं० [सं० दमनपपंट] पितपापड़ा ।

दवना पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० दमनक] दे० 'दौना' ।

दवना (२)
क्रि० स० [सं० दव] जलाना । उ०—ग्रीषम दवत दवरिया कुंज कुटीर । तिमि तिमि तकत तरुनिअहिं बाढ़ी पीर ।— रहीम (शब्द०) ।

दवनी
संज्ञा स्त्री० [सं० दवन] फसल के सूखे डंठलों को बैलों से रौंदवाकर दाना झाड़ने का काम । दँवरी । मिसाई । मँड़ाई ।

दवरिया †
संज्ञा स्त्री० [सं० दवाग्नि] दे० 'दवारि' । उ०—ग्रीषम दवत दवरिया कुंज कुटीर । तिमि तिमि तकत तरुनिअहिं बाढ़ी पीर ।—रहीम । (शब्द०) ।

दवरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दवारि] आग । अग्नि । ज्वाला । ताप । उ०—जो मन की दवरी बुझि आवै, तब घट में परचै कुछ पावै ।—दरिया सा०, पृ० ३५ ।

दवाँरि पु
संज्ञा पुं० [सं० दावाग्नि] दे० 'दावानल' । उ०—अतिथि पूज्य प्रियतम पुराणि के । कामद घन दारिद दवाँरि के ।— मानस०, १ ।३२ ।

दवा (१)
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. वह वस्तु जिससे कोई रोग या व्यथा दूर हो । औषध । ओखद । उ०—दरद दवा दोनों रहैं पीतम पास तयार ।—रसनिधि (शब्द०) । यौ०—दवाखाना । दवादारू । दवादर्पन । दवादरमन । मुहा०—दवा को न मिलना = थोड़ा सा भी न मिलना । अप्राप्त होना । दुर्लभ होना । दवा देना = दवा पिलाना । २. रोग दूर करने का उपाय । उपचार । चिकित्सा । जैसे,— अच्छे बैद्य की दवा करो । क्रि० प्र०—करना ।—होना । ३. दूर करने की युक्ति । मिटाने का उपाय । जैसे,—शक की कोई दवा नहीं । ४. अवरोध या प्रतिकार का उपाय । ठीक रखने की युक्ति । दुरुस्त करने की तदबीर । जैसे,—उसकी दवा यही है कि उसे दो चार खरी खोटी सुना दो ।

दवा पु † (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० दव] १. वनाग्नि । वन में लगनेवाली आग । उ०—कानन भूधर वारि बयारि महा विष व्याधि दवा अरि घेरे ।—तुलसी (शब्द०) । २. अग्नि । आग । उ०— (क) चल्यो दवा सो तप्त दवा दुति भूरिश्रवा भर ।—गोपाल (शब्द०) । (ख) तवा सो तपत धरामंडल अखंडल और मारतंड मंडल दवा सो होत भोर तें ।—बेनी (शब्द०) ।

दवाई †
संज्ञा स्त्री० [फा़० दवा + हिं० ई (प्रत्य०)] दे० 'दवा (१)' ।

दवाईखाना
संज्ञा पुं० [हिं० दवाई + फा़० खाना] दे० 'दवाखाना' ।

दवाखाना
संज्ञा पुं० [फा़०] १. वह जगह जहाँ दवा बिकती हो । २. औषधालय । चिकित्सालय ।

दवागनि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दवाग्नि] दे० 'दावाग्नि' । उ०—कहा दबागनि के पिएँ, कहा धरें गिरि धीर ।—मति० ग्रं०, पृ० ३४७ ।

दवागि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दवाग्नि] वनाग्नि । दावानल ।

दवागिन पु
संज्ञा स्त्री० [सं०दवाग्नि] दे० 'दावाग्नि' ।

दवाग्नि
संज्ञा स्त्री० [सं०] वन में लगनेवाली आग । दावानल ।

दवात (१)
संज्ञा स्त्री० [अ० दावात] लिखने की स्याही रखने का बरतन । मसिपात्र । मसिदानी ।

दवात पु † (२)
संज्ञा पुं० [फा़० दवा] औषध । उ०—रंचिक ताहि न भावै, कहैं कहानी जेत । परम दवात कहै जेत, दूखद होइ तेहि तेत ।—इंद्रा०, पृ० १३ ।

दवादर्पन
संज्ञा पुं० [फा़० दवा + सं० दर्पण] औषध । चिकित्सा । उ०—बिना दवा दर्पन के गृहनी स्वरग चली आँखें आतीं भर ।—ग्राम्या, पृ० २५ ।

दवादस पु
वि० [सं० द्वादश] दे० 'द्वादश' । उ०—गँधमादन आद दवादस गाजिय कीस, समाजिय क्रीतरा ।—रघु० रू०, पृ० १५८ ।

दवान पु
संज्ञा पुं० [देश०? या डिं०] एक प्रकार का अस्त्र । एक प्रकार की उत्तम कोटि की तलवार । उ०—(क) सज्जे हयंद जे भरे सान, गज्जे सुमट्ट लै लै दवान ।—सुजान०, पृ० १७ । (ख) चलै क्रवान वान असमान भू गरज्जियौ । धवान दै दवान की कृपान हिय सज्जियौ ।—सुजान०, पृ० ३० ।

दवानल
संज्ञा पुं० [सं०] दवाग्नि ।

दवाम (१)
क्रि० वि० [अ०] नित्य । हमेशा । सदा । उ०—एक शर्त उस संधि में यह भी थी कि झाँसी का राज्य रामचंद्र राव के कुटूंब में दवाम के लिये रहेगा, चाहे वारिस और संतान हों, चाहे गोत्रज हों अथवा गोद लिए हुए हों ।—झाँसी०, पृ० १० ।

दवाम (२)
संज्ञा पुं० [अ०] नित्यता । स्थायित्व । हमेशगी ।

दवामी
वि० [अ०] जो चिरकाल तक के लिये हो । स्थायी । जो सदा बना रहे । जैसे, दवामी बंदोबस्त ।

दवामी बंदोबस्त
संज्ञा पुं० [फा़०] जमीन का वह बंदोबस्त जिसमें सरकारी मालगुजारी सब दिन के लिये मुकर्रर कर दी जाय । भूमिकर का वह प्रबंध जिसमें कर सब दिन के लिये इस प्रकार नियत कर दिया जाय कि उसमें पीछे घटती बढ़ती न हो सके ।

दवार † (१)
संज्ञा पुं० [सं० द्वार] दे० 'द्वार' । उ०—पधरावियौ सुभ प्रात । छल हूँत मुरधर छात । दल कमँध साह दवार । अन रहे सांम उवार ।—रा० रू०, पृ० ३० ।

तवार (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'दवारि' ।

दवारि
संज्ञा स्त्री० [सं० दवाग्नि, हिं० दवागि] वनाग्नि । दावानल । उ०—हाय न कोऊ तलास करै ये पलासन कौने दवारि लगाई ।—नरेश (शब्द०) ।

दवाला पु †
संज्ञा पुं० [सं० द्विदल, राज० द्वाला (=दो चरणोंवाला)] छंद । उ०—विषम सम विषम सम दवालै वेद तुक, ठीक गुर अंत तुक वहस ठालां ।—रघु० रू०, पृ० ५० ।

दव्वार †
संज्ञा पुं० [सं० दावाग्नि, हिं० दवारि] [आग की लपट] आग का पुंज । उ०—आगै अग्नि का दव्वार । तपती भाय ताता सार ।—राम० धर्म०, पृ० १६८ ।

दश
वि० [सं०] दे० 'दस' ।

दशकंठ
संज्ञा पुं० [सं० दशकण्ठ] रावण (जिसके दस कंठ वा सिर थे) ।

दशकंठजहा
संज्ञा पुं० [सं० दशकण्ठजहा] रावण के संहारक, श्री रामचंद्र । उ०—आजु विराजत राज है दशकंठजहा को ।— तुलसी (शब्द०) ।

दशकंठजित्
संज्ञा पुं० [सं० दशकण्ठजित्] रावण को जितनेवाले, श्रीराम ।

दशकंठारि
संज्ञा पुं० [सं० दशकण्ठारि] (रावण के शत्रु) श्री रामचंद्र ।

दशकंध
संज्ञा पुं० [सं० दश + स्कन्ध, हिं० कंध] रावण ।

दशकंधर
संज्ञा पुं० [सं० दशकन्धर] रावण ।

दशक
संज्ञा पु० [सं०] १. दस का समूह । दस की ढेरी । २. दस वर्षों का समूह । दस साल का निर्धारित काल ।

दशकर्म
संज्ञा पुं० [सं० दशकर्मन्] गर्भाधान से लेकर विवाह तक के दस संस्कार, जिनके नाम ये हैं—गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन, जातकरण, निष्क्रामण, नामकरण, अन्नप्राशन, चूड़ाकरन, उपनयन और विवाह ।

दशकुमारचरित
संज्ञा पुं० [सं०] संस्कृत कवि दंडी का लिखा एक गद्यात्मक काव्य ।

दशकुलवृक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] तंत्र के अनुसार कुछ विशेष वृक्ष, जिनके नाम ये हैं—लिसोड़ा, करंज, बेल, पीपल, कदंब, नीम, बरगद, गूलर, आँवला और इमली ।

दशकोषी
संज्ञा स्त्री० [सं०] रुद्रताल के ग्यारह भेदों में से एक (संगीत) ।

दशक्षीर
संज्ञा पुं० [सं०] सुश्रुत के अनुसार इन दस जंतुओं का दूध—गाय, बकरी, ऊँटनी, भेंड़, भैंस, घोड़ी, स्त्री, हथनी, हिरनी और गदही ।

दशगात
संज्ञा [सं० दशगात्र] दे० 'दशगात्र' ।

दशगात्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. शरीर के दस प्रधान अंग । २. मृतक संबंधी एक कर्म जो उसके मरने के पीछे दस दिनों तक होता रहता है । विशेष—इसमें प्रतिदिन पिंडदान किया जाता है । पुराणों में लिखा है कि इसी पिंड के द्वारा क्रम क्रम से प्रेत का शरार बनता है और दशवें दिन पूरा हो जाता है ।जैसे, पहले पिंड से सिर, दूसरे से आँख, कान, नाक इत्यादि ।

दशग्रामपति
संज्ञा पुं० [सं०] जो राजा की ओर से दस ग्रामों का अधिपति या शासक बनाया गया हो । विशेष—मनुस्मृति में लिखा है कि राजा पहले प्रत्येक ग्राम का एक मुखिया या शासक नियुक्त करे, फिर उससे अधिक प्रतिष्ठा और योग्यता के किसी मनुष्य को दस ग्रामों का अधिपति नियत करे, इसी प्रकर बीस, शत, सहस्र आदि तक के ग्रामों के हाकिम नियुक्त करने का विधान लिखा है ।

दशग्रामिक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दशग्रामपति' [को०] ।

दशग्रामी
संज्ञा पुं० [सं० दशग्रामिन्] दे० 'दशग्रामपति' [को०] ।

दशग्रीव
संज्ञा पुं० [सं०] रावण ।

दशति
संज्ञा स्त्री० [सं०] सौ । शत ।

दशद्वार
संज्ञा पुं० [सं०] शरीर के दस छिद्र—२कान, २ आँख, २ नाक, १ मुख, १ गुद, १ लिंग और १ ब्रह्मांड ।

दशधर्म
संज्ञा पुं० [सं०] मनुस्पृति में निर्दिष्ट धर्म के दस लक्षण जो मानव मात्र के लिये करणीय हैं ।

दशधा (१)
वि० [सं०] १. दस प्रकार का । २. दस के स्थान का । दशम । दसवाँ । उ०—विश्वमंगल आधार सर्वानंद दशधा के आगार ।—भक्तमाल (श्री०), पृ० ४११ ।

दशधा (२)
क्रि० वि० दस प्रकार ।

दशन
संज्ञा पुं० [सं०] १. दाँत । २. दाँत से काटना । दाँतों से काटने की क्रिया । ३. कवच । वर्म । ४. शिखर । चोटी । यौ०—दशनच्छद । दशनवासस् = होंठ । दशनपद = दंत क्षत का स्थान अथवा जिह्न । दशनबीज ।

दशनच्छद
संज्ञा पुं० [सं०] होंठ । ओष्ठ ।

दशनबीज
संज्ञा पुं० [सं०] अनार ।

दशनांशु
संज्ञा पुं० [सं०] दाँतों की चमक । दाँतों की दमक [को०] ।

दशनाढय
संज्ञा स्त्री० [सं०] लोनिया शाक ।

दशनाम
संज्ञा पुं० [सं०] संन्यासियों के दस भेद जो ये हैं—१. तीर्थ, २. आश्रम, ३. वन, ४. अरणय, ५. गिरि, ६. पर्वत, ७. सागर, ८. सरस्वती, ९. भारती और १०. पुरी ।

दशनामी
संज्ञा पुं० [हिं० दश + नाम] संन्यासियों का एक वर्ग जो अद्वैतवादी शंकराचार्य के शिष्यों से चला है । विशेष—शंकराचार्य के चार प्रधान शिष्य थे—पद्यपाद, हस्ता- मलक, मंडन और तोटक । इनमें से पदमपाद के दो शिष्य थे—तीर्थ और आश्रम; हस्तामलक के दो शिष्य—वन और अरण्य, मंडन के तीन शिष्य—गिरि, पर्वत और सागर । इसी प्रकार तोटक के तीन शिष्य—सरस्वती, भारती और पुरी । इन्हीं दस शिष्यों के नाम से संन्यासियों के दस भेद चले । शंकराचार्यने चार मठ स्थापित किए थे, जिनमें इन दस प्रशिध्यों की शिष्यपरंपरा चली जाती है । पुरी, भारती और सरस्वती की शिष्य परंपरा शृंगेरी मठ के अंतर्गत है; तीर्थ और आश्रम शारदा मठ के अंतर्गत, वन और अरण्य गोवर्धन मठ के अंतर्गत तथा गिरि, पर्वत और सागर जोशी सठ के अंतर्गत हैं । प्रत्येक दशनामी संन्यासी इन्हीं चार मठों में से किसी न किसी के अंतर्गत होता है । यद्यपि दशनामी ब्रह्म या निर्गुण उपासक प्रसिद्ध हैं, तथापि इनमें से बहुतेरे शैवमंत्र की दीक्षा लेते हैं ।

दशनोच्छिष्ट
संज्ञा पुं० [सं०] १. आधर । ओष्ठ । २. अदरचुंबन । ३. निश्वास । श्वास । ४. दाँतों द्वारा स्पृष्ट कोई पदार्थ [को०] ।

दशपंचतपा
संज्ञा पुं० [पुं० दशपञ्चतपस] इंद्रियों का निग्रह करते हुए पंचाग्नि तपस्या करनेवाला तपस्वी [को०] ।

दशप
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दशग्रामपति' ।

दशपारमिताधर
संज्ञा पुं० [सं०] बुद्धदेव ।

दशपुर
संज्ञा पुं० [सं०] १. केवटी मोथा । २.मालवे का एक प्राचीनविभाग जिसके अंतर्गत दस नगर थे । इसका नाम मेघदूत में आया है ।

दशपेय
संज्ञा पुं० [सं०] आश्वलायन श्रौतसूत्र के अनुसार एक प्रकार का यज्ञ ।

दशबल
संज्ञा पुं० [सं०] बुद्धदेव । विशेष—बुद्ध को दस बल प्राप्त थे, जिनेक नाम ये हैं— दान, शील, क्षमा, वीर्य, ध्यान, प्रज्ञा, बल, उपाय, प्रणिधि और ज्ञान ।

दशबाहु
संज्ञा पुं० [सं०] शिव । महादेव । पंचमुख [को०] ।

दशभुजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दुर्गा का एक नाम ।

दशभूमिग
संज्ञा पुं० [सं०] (दान आदि दस भूमियों या बलों को प्राप्त करनेवाले) बुद्धदेव ।

दशंभूमीश
संज्ञा पुं० [सं०] बुद्धदेव ।

दशम
वि० [सं०] दसवाँ । यौ०—दशमदशा । दशमदार । दशमभाव । दशमलव ।

दशमदशा
संज्ञा स्त्री० [सं०] साहित्य के रसनिरूपण में वियोगी की वह दशा जिसमें वह प्राण त्याग देता है ।

दशमद्वार
संज्ञा पुं० [सं०] ब्रह्मरंध्र । उ०—दशमद्वार से प्राण को त्याग श्री रामधाम को प्राप्त हुए ।—भक्तमाल (श्री०), पृ० ४५५ ।

दशमभाव
संज्ञा पुं० [सं०] फलित ज्योतिष में एक जन्मलग्नांश । कुंडली में लग्न से दसवाँ घर । विशेष—इस घर से पिता, कर्म, ऐश्वर्य आदि का विचार किया जाता है ।

दशमलव
संज्ञा पुं० [सं०] वह भिन्न जिसके हर में दस या उसका कोई घात हो (गणित) ।

दशमहाविद्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'महाविद्या' [को०] ।

दशमांश
संज्ञा पुं० [सं०] दसवाँ हिस्सा । दसवाँ भाग ।

दशमाल
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्राचीन जनपद । एक प्रदेश का प्राचीन नाम ।

दशमालिक
संज्ञा पुं० [सं०] दशमाल देश ।

दशमास्य
वि० [सं०] माता के गर्भ में दस महीने तक रहनेवाला [को०] ।

दशमिकभग्नांश
संज्ञा पुं० [सं०] अंकगणित की एक क्रिया जिसके द्वारा प्रत्येक भिन्न या भग्नांश इस रूप में लाया जाता है कि उसका हर दस का कोई गुणित अंक हो जाता है । दशमलव ।

दशमी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. चांद्रमास के किसी पक्ष की दसवीं तिथि । २. विमुक्तावस्था । उ०—दशमी रानी है दिल दायक । सब रानी की सो है नायक ।—कबीर सा०, पृ० ५५० । ३. मरणावस्था ।

दशमी (२)
वि० [सं० दशमिन्] [वि० स्त्री० दशमिनी] बहुत वृद्ध । बहुत पुराना । शतायु की अवस्थावाला ।

दशमुख (१)
संज्ञा पुं० [सं०] रावण ।

यौ०—दशमुखांतक = राम ।

दशमुख (२)
संज्ञा पुं० [सं० दस + मुख] १. दसों दिशाएँ । २. त्रिदेव (ब्रह्मा के ४ मुख; विष्णु का १ और महेश के ५ मुख) । उ०—दशमुख मुख जोवैं गजमुख मुख को ।—राम चं०, पृ० १ ।

दशमूत्र
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दशमूत्रक' ।

दशमूत्रक
संज्ञा पुं० [सं०] इन दस जीवों का मूत्र जो वैद्यक में काम आता है—१. हाथी, २. भैंस, ३. ऊँट, ४. गाय, ५. बकरा, ६. मेढा, ७. घोड़ा, ८. गदहा, ९. पुरुष, और १०. स्त्री ।

दशमूल
संज्ञा पुं० [सं०] दस पेड़ों की छाल या जड़ जो दवा के काम आती है । विशेष—सरिवन (शालपर्णी), पिठवन (पृश्निपर्णी), छोटी कटाई, बड़ी कटाई, और गोखरू ये लघुमूल और बेल, सोना- पाठा (श्योनाक), गंभारी, गनियारी और पाठा बृहन्मूल कहलाते हैं । इन दोनों के योग को दशमूल कहते हैं । दशमूल काश, श्वास और सन्निपात ज्वर में उपकारी माना जाता है ।

दशमूलीसंग्रह
संज्ञा पुं० [सं० दशमूलीयसड्ग्रह] वे दस चीजें जो आग से बचने के लिये प्रत्येक व्यक्ति को घर में रखनी चाहिए । विशेष—चंद्रगुप्त मौर्य के समय में निम्नलिखित दस चीजों को घर में रखने के लिये प्रत्येक व्यक्ति राजनिमम के द्वारा वाध्य था,—पानी से भरे हुए पाँच घड़े, (२) पानी से भरा हुआ एक मटका, (३) सीढ़ी, (४) पानी से भरा हुआ बाँस का बरतन, (५) फरसा या कुल्हाड़ी, (६) सूप, (७) अंकुश, (८) खूँटा आदि उखाड़ने का औजार, (९) मशक और (१०) हलादि । इन दसों चीजों का नाम दशमूलीसंग्रह था । जो लोग इसके रखने में प्रमाद करते थे उनको १४ पण जुरमाना देना पड़ता था ।

दशमेश
संज्ञा पुं० [सं०] १.जन्मकुंडली में दशम भाव का अधिपति (ज्यौतिष) । २.सिख संप्रदाय के दसवें गुरु गोविंदसिंह ।

दशमौलि
संज्ञा पुं० [सं०] रावण ।

दशयोगभंग
संज्ञा पुं० [सं० दशयोगभङ्ग] फलित ज्यौतिष में एक नक्षत्रवेध जिसमें विवाह आदि शुभक्रम नहीं किए जाते । विशेष—जिश नक्षत्र में सूर्य हो और जिस नक्षत्र में कर्म होनेवाला हो, दोनों नक्षत्रों के जो स्थान गणनाक्रम मे हों उन्हैं जोड़ डाले । यदि जोड़ पंद्रह, चार, ग्यारह, उन्नीस, सत्ताइस, अठारह या बीस आवे तो दशयोगभंग होगा ।

दशरथ
संज्ञा पुं० [सं०] अयोध्या के इक्ष्वाकुवंशीय एक प्राचीन राजा जिनके पुत्र श्रीरामचंद्र थे । ये देवताओं की ओर से कई बार असुरों से लड़े थे और उन्हें परास्त किया था । विशेष—इस शब्द के आगे पुत्र वाचक शबद लगने से 'राम' अर्थ होता है ।

दशरथसुत
संज्ञा पुं० [सं०] श्रीरामचंद्र ।

दशरश्मिशत
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य । अंशुमाली [को०] ।

दशरात्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. दस रातें । २. एक यज्ञ जो दस रात्रियों में समाप्त होता था ।

दशरूपक
संज्ञा पुं० [सं०] संस्कृत में नाटयशास्त्र पर आचार्य धनंजय का लिखा हुआ लक्षण ग्रंथ ।

दशरूपभृत्
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु जिन्होंने दस अवतार धारण किया था [को०] ।

दशवकत्र
संज्ञा पुं० [सं० दशवक्त्र] दे० 'दशमुख' ।

दशवदन
संज्ञा पुं० [सं०] दशमुख ।

दशवाजी
संज्ञा पुं० [सं० दशवाजिन्] चंद्रमा ।

दशवाहु
संज्ञा पुं० [सं०] महादेव ।

दशवीर
संज्ञा पुं० [सं०] एक सत्र या यज्ञ का नाम ।

दशशिर
संज्ञा पुं० [सं० दश + शिरस्] रावण ।

दशशीर्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १. रावण । २. चलाए हुए अस्त्रों को निष्फल करने का एक अस्त्र ।

दशशीश पु
संज्ञा पुं० [सं० दशशीर्ष] दे० 'दशशीर्ष' ।

दशसीस पु
संज्ञा पुं० [सं० दशशीर्ष] रावण । दशमुख ।

दशस्यंदन पु
संज्ञा पुं० [सं० दशस्यन्दन] दशरथ नामक राजा ।

दशहरा (१)
संज्ञा पुं० [सं०] ज्येष्ठ शुक्ला दशमी तिथि जिसे गंगा दश- हरा भी कहते हैं । विशेष—इस तिथि को गंगा का जन्म हुआ था अर्थात् गंगा स्वर्ग से मर्त्यलोक में आई थीं । इसी से यह अत्यंत पुण्य तिथि मानी जाती है । कहते हैं, इस तिथि को गंगास्नान करने से दसों प्रकार के और जन्म जन्मांतर के पाप तूर होते हैं । यदि इस तिथि में हस्तनक्षत्र का योग हो या यह तिथि मंगलवार को पड़े तो यह और भी अधिक पुण्यजनक मानी जाती है । दश- हरे को लोग गंगा की प्रतिमा का पूजन करते हैं और सोने चाँदी के जलजंतु बनाकर भी गंगा में डालते हैं । २. विजयादशमी ।

दशहरा (२)
संज्ञा स्त्रि० [सं०] गंगा, जो दस प्रकार के पापों का हरण करती है [को०] ।

दशांग
संज्ञा पुं० [सं० दशाङ्ग] पूजन में सुगंध के निमित्त जलाने का एक धूप जो दस सुगंध द्रव्यों के मेल से बनता है । विशेष—यह धूप कई प्रकार से भिन्न भिन्न द्रव्यों के मेल से बनता है । एक रीति के अनुसार दस द्रव्य ये हैं—शिलारस, गुग्गुल, चंदन, जटामासी, लोबान, राल, खस, नख, भीमसेनी कपूर और कस्तूरी । दूसरी रीति के अनुसार मधु, नागरमोथा, घी, चंदन, गुग्गुल, अगर, शिलाजतु, सलई का धूप, गुड़ और पीली सरसों । तीसरी रीति गुग्गुल, गंधक, चंदन, जटामासी, सतावरि, सज्जी, खस, घी, कपूर और कस्तूरी ।

दशांग क्वाथ
संज्ञा पुं० [सं० दशाङ्गक्वाथ] दस ओषधियों का काढ़ा । विशेष—इस काढ़े में निम्नांकित १० ओषधियाँ प्रयुक्त होती हैं— (१) अडूसा, (२) गुर्च, (३) पितपापड़ा, (४) चिरायता, (५) नीम की छाल, (६) जलभंग, (७) हड़, (८) बहेड़ा, (९) आँवला, और (१०) कुलथी । इनके क्वाथ में मधु डाल— कर पिलाने से अम्लपित्त नष्ट होता है ।

दशांगुल (१)
संज्ञा पुं० [सं० दशाङ्गुल] खरबूजा । डँगरा ।

दशांगुल (२)
वि० जो लंबाई में दस अंगुल का हो । दस अंगुन के परिमाणवाला [को०] ।

दशांत
संज्ञा पुं० [सं० दशान्त] बुढ़ापा ।

दशांतर
संज्ञा पुं० [सं० दशान्तरा] शरीर अथवा जीव की विभिन्न दशा [को०] ।

दशा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अवस्था । स्थिति या प्रकार । हालत । जैस,—(क) रोगी की दशा अच्छो नहीं है । (ख) पहले मैंने इस मकान को अच्छी दशा में देखा था । २. मनुष्य के जीवन की अवस्था । विशेष—मानव जीवन की दस दशाएँ मान गई हैं—(१) गर्भवास, (२) जन्म, (३) बाल्य, (४) कौमार, (५) पोगंड, (६) यौवन, (७) स्थाविर्य, (८) जरा, (९) प्राणरोध और (१०) नाश । ३. साहित्य में रस के अंतर्गत विरही की अवस्था । विशेष—ये अवस्थाएँ दस हैं—(१) अभिलाष, (२) चिंता, (३) स्मरण, (४) गुणकथन, (५) उद्वेग, (६) प्रलाप, (७) उन्माद, (८) व्याधि, (९) जड़ता और (१०) मरण । ४. फलित ज्योतिष के अनुसार मनुष्य के जीवन में प्रत्येक ग्रह का नियत भोगकाल । विशेष—दशा निकालने में कोई मनुष्य की पूरी आयु १२० वर्ष की मानकर चलते हैं और कोई १०८ वर्ष की । पहली रीति के अनुसार निर्धारित दशा विंशोत्तरी और दूसरी के अनुनिर्धारित अष्टोत्तरी कहलाती है । आयु के पूरे काल में प्रत्येक ग्रह के भोग के लिये वर्षों की अलग अलग संख्या नियत है—जैसे, अष्टोत्तरी रीति के अनुसार सूर्य की दशा ६ वर्ष, चंद्रमा की १५ वर्ष, मंगल की ८ वर्ष, बुध की १७ वर्ष शनि की १० वर्ष, ब्रुहस्पति की १९ वर्ष, राहु की १२ वर्ष, और शुक्र की २१ वर्ष मानी नई है । दशा जन्मकाल के नक्षत्र के अनुसार मानी जाती है । जैसे, यदि जन्म कृत्तिका, रोहिणी या मृगशिरा नक्षत्र में होगा तो सूर्य की दशा होगी; भद्रा, पुनर्वसु, पुष्य या अश्लेखा नक्षत्र में होगा तो चंद्रमा की दशा; मघा, पूर्वाफाल्गुनी या उत्तराफाल्गुनी में होगा तो मंगल की दशा; हस्त, चित्रा, स्वाती या विशाखा में होगा तो बुध की दशा; अनुराधा, ज्येष्ठा या मूल नक्षत्र में होगा तो शनि की दशा; पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, अभिजित् या श्रवण नक्षत्र में होगा तो बृहस्पति की दशा; धनिष्ठा, शतभिषा या पूर्व भाद्रपद में होगा तो राहू की दशा और उत्तर भाद्रपद, रेवती, अस्विनी या भरणी नक्षत्र होगा तो शुक्र की दशा होगी । प्रत्येक ग्रह की दशा का फल अलग अलग निश्चित है—जैसे, सूर्य की दशा में चित्त को उद्वेग, धनहानि, क्लेश, विदेशगमन, बंधन, राजपीड़ा इत्यादि । चंद्रमा की दशा में ऐश्वर्य, राजसम्मान, रत्नवाहन की प्राप्ति इत्यादि । प्रत्येक ग्रह के नियत भोगकाल या दशा के अंतर्गत भी एक एक ग्रह का भोगकाल नियत है जिसे अंतर्दशा कहते हैं । रवि की दशा को लीजिए जो ६ वर्ष की है । अब इन ६ वर्षों के बीच सूर्य की अपनी दशा । ४. महीने की, चंद्रमा की १० महीने की, मंगल की ५ महीने की, बुध की ११ महीने २० दिन की, शनि की ६ महीने २० दिन की, बृहस्पति की १ वर्ष २० दिन की, राहु की ८ महीने की, शुक्र की १ वर्ष २ महीने की है । इन अंतर्दशाओं के फल भी अलग अलग निरूपित हैं—जैसे, सूर्य की दशा में सूर्य की अंतर्दशा का फल राजदंड, मनस्ताप, विदेशगमन इत्यादि; सूर्य की दशा में चंद्र की अंतदेशा का फल शत्रुनाश, रोगशांति, वित्तलाभ इत्यादि । उपर जो हिसाब बतलाया गया है वह नाक्षत्रिकी दशा का है । इसके अतिरिक्त योगिनी, वार्षिकी, लाग्निकी, मुकुंदा, पताकी, हरगौरी इत्यादि और भी दशाएँ हैं पर ऐसा लिखा है कि कलियुग में नाक्षत्रिकी दशा ही प्रधान है । ५. दीए की बत्ती । ६. चित्त । ७. कपड़े का छोर । वस्त्रांत ।

दशाकर्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १. कपड़े का छोर या अंचल । २. दीपक । चिराग ।

दशाकर्षी
संज्ञा पुं० [सं० दशाकर्षिन्] दे० 'दशाकर्ष' [को०] ।

दशाक्षर
संज्ञा पुं० [सं०] एक वर्णिक वृत्त [को०] ।

दशाधिपति
संज्ञा पुं० [सं०] १. फलित ज्योतिष में दशाओं के अधिपति ग्रह । २. दस सैनिकों या सिपाहियों का अफसर । जमादार । (महाभारत) ।

दशानन
संज्ञा पुं० [सं०] रावण ।

दशानिक
संज्ञा पुं० [सं०] जमालगोटा ।

दशापवित्र
संज्ञा पुं० [सं०] श्राद्ध आदि में दान किए जानेवाले वस्त्रखंड ।

दशापाक
संज्ञा पुं० [सं०] भाग्य का परिपाक । भाग्यफल का पूर्ण होना [को०] ।

दशामय
संज्ञा पुं० [सं०] रुद्र ।

दशारुहा
संज्ञा स्त्री० [सं० ] कैवर्तिका नाम की लता जो मालवा में होती है और जिससे कपड़े रँगे जाते हैं ।

दशार्ण
संज्ञा पुं० [सं०] १. विंध्य पर्वत के पूर्व दक्षिण की ओर स्थित उस प्रदेश का प्राचीन नाम जिससे होकर धसान नदी बहती है । विशेष—मेघदूत से पता चलता है कि विदिशा (आधुनिक भिलसा) इसी प्रदेश की राजधानी थी । टालमी ने इस प्रदेश का नाम दोसारन (dosaron) लिखा है । २. उक्त देश का निवासी या राजा । ३. तंत्र का एक दशाक्षर मंत्र । ३. जैन पुराण के अनुसार एक राजा । विशेष—इस राजा ने तीर्थकर के दर्शन के निमित्त जाकर अभिमान किया था । तीर्थंकर के प्रताप से उसे वहाँ १६, ७७, ७२, १६, ००० इंद्र और १३, ३७, ०५, ७२, ८०, ००, ००, ००० इंद्राणियाँ दिखाई पड़ी और उसका गर्व चूर्ण हो गया ।

दशार्णा
संज्ञा स्त्री० [सं०] धसान नदी जो विध्याचल से निकलकर बुंदेलखंड के कुछ भाग में बहती हुई कालपी के पास जमुना में मिल जाती है ।

दशार्द्ध, दशार्ध
संज्ञा पुं० [सं०] १. दस का आधा पाँच । २. बुद्धदेव । जो दशवली से युक्त हैं ।

दशार्ह
संज्ञा पुं० [सं०] १. कोष्ट्रवंशीय धृष्ट राजा का पुत्र । २. राजा वृष्णि का पौत्र । ३. वृष्णिवंशीय पुरुष । ४. वृष्णि- वंशियों का अधिकृत देश ।

दशावतार
संज्ञा पुं० [सं०] भगवान् विष्णु के दश अवतार जो इस प्रकार हैं,—(१) मत्स्य, (२) कच्छप, (३) वाराह, (४) नृसिंह, (५) वामन, (६) परशुराम, (७) राम, (८) कृष्ण (९) बुद्ध और (१०) कल्कि ।

दशावरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दस सभ्यों की शासक सभा । दस पंचों की राजसभा । विशेष—ऐसी सभा जो व्यवस्था दे, उसका पालन मनु ने आवश्यक लिखा है । गौतम ने दशावरा के दस सभ्यों का विभाग इस प्रकार बताया है कि चार तो भिन्न भिन्न वेदों के, तीन भिन्न भिन्न आश्रमों के और तीन भिन्न भिन्न धर्मो के प्रतिनिधि हों । बौद्धायन ने धर्मों के तीन ज्ञाताओं के स्थान पर मीमांसक, धर्मपाठक और ज्योतिषी रखे हैं ।

दशाविपाक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दशापाक' ।

दशाश्व
संज्ञा पुं० [सं०] चंद्रमा जिसके रथ में दस घोड़े लगते हैं ।

दशाश्वमेघ
संज्ञा पुं० [सं०] १. काशी के अंतर्गत एक तीर्थ । विशेष—काशीखंड में लिखा है कि राजर्षि दिवोदास की सहायता से ब्रह्मा ने इस स्थान पर दस अश्वमेघ यज्ञ किए थे । पहले यह तीर्थ रुद्रसरोवर के नाम से प्रसिद्ध था । ब्रह्मा के यज्ञ के पीछे दशाश्वमेध कहा जाने लगा । ब्रह्मा ने इस स्थान पर दशाश्वमेधेश्वर नामक शिवलिंग भी स्थापित किया था । जो लोग इस तीर्थ में स्नान करके उक्त शिवलिंग का दर्शन करते हैं उनके सब पाप छूट जाते हैं । २. प्रयाग के अंतर्गत त्रिवेणी के पास वह घाट या तीर्थस्थान जहाँ यात्री जल भरते हैं । लोगों का विश्वास है कि इस स्थान का जल बिगड़ता नहीं ।

दशास्य
संज्ञा पुं० [सं०] दशमुख । रावण ।

दशाह
संज्ञा पुं० [सं०] १. दस दिन । २. मृतक के कृत्य का दसवाँ दिन । विशेष—गृह्यसूत्रों में मृतक कर्म तीन ही दिनों का माना गया है । पहले दिन श्मशान कृत्य और अस्थिसंचय, दूसरे दिन रुद्रयाग, क्षौर आदि और तीसरे दिन सपिंडीकरण । स्मृतियों ने पहले दिन के कृत्य का दस दिनों तक विस्तार किया है जिनमें प्रत्येक दिन एक एक पिंड एक एक अंग की पूर्ति के लिये दिया जाता है । पर ग्यारहवें दिन के कृत्य में अब भी द्वितीयाह्न संकल्प का पाठ होता है ।

दशी
संज्ञा पुं० [सं० दशिन्] दस गाँवों का शासक । उ०—दश ग्रामों के शासक को 'दशी' कहा जाता था ।—आदि०, पृ० १११ ।

दशेधन
संज्ञा पुं० [सं० दशा(= दीप की बत्ती) + इन्धन] प्रदीप । दीपक । दीया [को०] ।

दशेर
संज्ञा पुं० [सं०] हिंसक जीव । हिंस्र प्राणी [को०] ।

दशेरक
संज्ञा पुं० [सं०] १. मरु प्रदेश । मरु देश । २. मरु देश का निवासी । ३. उष्ट्र । ऊँट । युवा ऊँट । ४. गर्दभ । गदहा [को०] ।

दशेरुक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दशेरक' [को०] ।

दशेश
संज्ञा पुं० [सं०] दस गावों का अधिपति । दशी [को०] ।

दश्त
संज्ञा पुं० [फा़०] जंगल । बियाबान । वन । उ०—फिरते ही फिरते दश्त दिवाने किधर गए । वे आशिकी के हाय जमाने किधर गए ।—कविता कौ०, भा० ४, पृ० १५ ।

दषिन पु
संज्ञा पुं० [ सं० दक्षिण] दे० 'दक्षिण' ।

दषिना पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दक्षिणा] दे० 'दक्षिणा' । उ०—पुनु विप्रहि दषिना करि दीन्हा । देषत ताहि नैन हरि लीन्हा— हिंदी प्रेमगाथा०, पृ० २१२ ।

दष्ट
वि० [सं०] जिसे किसे ने डसा हो या काट लिया हो । काटा हुआ । उ०—चेतनाहीन मन मानता स्वार्थ धन । दष्ट ज्यों हो सुमन छिद्र शत तनु पान ।—गीतिका, पृ० ५८ ।

दसँन पु †
संज्ञा पुं० [सं० दशन] दे० 'दशन' । उ०—परमानंद ठगी नँदनंदन, दसँन, कुंद मुसकावत ।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० २३५ ।

दस (१)
वि० [सं० दश] १. पाँच का दूना । जो गिनती में नौ से एक अधिक हो । २. कई । बहुत से । जैसे,—(क) दस आदमी जो कहें उसे मानना चाहिए । (ख) वहाँ दस तरह की चीजे देखने को मिलेंगी ।

दस (२)
संज्ञा पुं० १. पांच की दूनी संख्या । २. उक्त संख्या का सूचक अंक जो इस प्रकार लिखा जाता है—१० ।

दस † (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० दिश्, प्रा० दिस्, राज० दस] ओर । तरफ । दिशा । उ०—आज घरा दस ऊनम्यउ, काली धड़ सखराँह । उवा धण देसी ओलँबा, कर कर लाँबी बाँह ।—ढोला०, दू० २७१ ।

दसईं †
वि० [सं० दशम] दशम । दसवाँ । दस की संख्यावाला । उ०—दसई द्वार न खोलत कोई । तब खोलै जब मरमी होई ।—इंद्रा०, पृ० ४६ ।

दसकंध पु
संज्ञा पुं० [सं० दशस्कन्ध, हिं० दशकंध] रावण । उ०— मसकरूप दसकंधपुर निसि कपि घर घर देखि ।—तुलसी०, ग्रं० पृ० ८६ । यौ०—दसकंधपुर = लंका ।

दसखत †
संज्ञा पुं [फा़० दस्तखत] दे० 'दस्तखत' ।

दसगुना
वि० [सं० दशगुणित] किसी संख्या या परिमाण का दस प्रतिशत अधिक । उ०—होत दसगुनो अंकु है दिएँ एक जयों बिंदु । दिएँ दिठोना यों बढ़ी आनन आभा इंदु ।—मति० ग्रं०, पृ० ४५३ ।

दसगून पु
वि० [हिं० दसगुना] दे० 'दसगुना' । उ०—राम नाम को अंक है, सब साधन हैं सून । अंक गए कछु हाथ नहि अंक रहे दसगू ।—संतवाणी०, पृ० ७१ ।

दसठौन
संज्ञा पुं० [सं० दश + स्थान] बच्चा जनने के समय की एक रीति, जिसके अनुसार प्रसूता स्त्री दसवें दिन नहाकर सौरी के घर से दूसरे घर में जाती है ।

दसता †
संज्ञा पुं० [फा़० दस्तानह्] हाथ के पंजो की रक्षा के लिये बना हुआ लौह कवच । उ०—माथे टोप सनाह तन, कर दसता रिन काज । भावड़िया सोभै नहीं, सूरा हँदो साज ।— बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० २० ।

दसन पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० दशन] दे० 'दशन' । उ०—जो चित चढै नाममहिमा जिन गुनगन पावन पन के । तौ तुलसिहिं तारिहौ बिप्र ज्यों दसन तोरि जमगन के ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ५०७ । यौ०—दसनबसन = दातों का वस्त्र अर्थात् ओठ और अधर । उ०—नैननि कै तारनि में राखौ प्यारे पूतरी कै, मुरली ज्यों लाइ राखौ दसनबसन में ।—केशव० ग्रं०, भा० १, पृ० २८ ।

दसन (२)
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की छोटी झाड़ी पंजाब, सिंध, राजपूताने और मैसूर में पाई जाती है । इसकी छाल चमड़ा सिझाने के काम में आती है । दसरनी ।

दसन (३)
संज्ञा पुं० [सं०] १. विनशन । क्षय । नाश । २. हटा देना । बहिष्करण । निष्कासन । ३. क्षेपण । फेंकना [को०] ।

दसना (१)
क्रि० अ० [हिं० डासना] बिछना । बिछाया जाना । फैलाया जाना ।

दसना (२)
क्रि० स० बिछाना । बिस्तर फैलाना । उ०—विवेक सों अनेकधा दसे अनूप आसने । अनर्ध अधँ आदि दै विनय किए घने घने ।—केशव (शब्द०) ।

दसना (३)
संज्ञा पुं० [हिं०] बिछौना । बिस्तर ।

दसना (४)
क्रि० स० [सं० दंशन या दशन] दे० 'डसना' ।

दसनामी
संज्ञा पुं० [हिं० दशनाम] दे० 'दशनामी' । उ०—लेकिन दंडी पाखंडी नहीं निर्द्वद्व स्वच्छंद अवधूत सर्व वर्णसंगम गिरि, पुरी, भारती और दसनामी और उदासीन भी ।—किन्नर०, पृ० १०१ ।

दसनावलि
संज्ञा स्त्री० [सं० दशनावलि] दाँतों की पंक्ति । उ०—खिल उठी चल दसनावलि आज, कुंद कलियों में कोमल आभ ।—गुंजन, पृ० ४८ ।

दसमरिया
संज्ञा स्त्री० [हिं० दस + मडना] एक प्रकार की बर- साती बड़ी नाव जिसमें दस तरूते लंबाई के बल लगे होते हैं ।

दसमाथ पु
संज्ञा पुं० [हिं० दस + माथ] रावण । उ०—सुनु दसमाथ ! नाथ साथ के हमारे कपि हाथ लंका लाइहैं तौ रहैगी हथेरी सी ।—तुलसी (शब्द०) ।

दसमी
संज्ञा स्त्री० [सं० दशमी] दे० 'दशमी' ।

दसरंग
संज्ञा पुं० [हिं० दस + रंग] मलखंभ की एक कसरत । विशेष—इस कसरत में कमरपेटा करके जिधर का पैर मलखंभ को लपेटे रहता है उधर के हाथ को सीधी पकड़ से मलखंभ में लपेटकर और दूसरे हाथ को भी पीछे से फँसाकर सवारी बाँधते हैं तथा और अनेक प्रकार की मुद्राएँ करते हुए नीचे ऊपर खसकते हैं ।

दसरत्थ पु
संज्ञा पुं० [सं० दशरथ] दे० 'दशरथ' । उ०—क्यों न सँभारहि मोहिं, दयासिंधु दसरत्थ के ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ९० ।

दसरथ पु
संज्ञा पुं० [सं० दशरथ] दे० 'दशरथ' । यौ०—दसरथसुत = रामचंद्र । उ०—सोइ दसरथसुत भगत हित कोसल पति भगवान ।—मानस, १ ।११८ ।

दसरनी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की झाड़ी । वि० दे० 'दसन' ।

दसरान
संज्ञा पुं० [हिं० दस + रान?] कुश्ती का एक पेच ।

दसराहा
संज्ञा पुं० [सं० दशहरा] विजया दशमी उ०—ढोला रहिसि निवारियउ मिलिसि दई कइ लेखि । पूगल हुइस ज प्राहुणउ, दसराहा लग देखि ।—ढोला०, दू० २७३ ।

दसवाँ (१)
वि० [सं० दशम] जिसका स्थान नौ और वस्तुओं के उपरांत पड़ता हो । जो क्रम में नौ और वस्तुओं के पीछे हो । गिनती के क्रम में जिसका स्थान दस पर हो । जैसे, दसवाँ लड़का ।

दसवाँ
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'दशगात्र' ।

दसस्यंदन पु
संज्ञा पुं० [सं० दश + स्यन्दन] दशरथ । उ०— जनमे राम जहत के जीवन, धनि कौसिल्या धनि दसस्यंदन ।—घनानंद०, पृ० ५५१ ।

दसांग
संज्ञा पुं० [सं० दशाङ्ग] दे० 'दशांग' ।

दसा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० दशा] दे० 'दशा' ।

दसा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० दस] अगरवाल वैश्यों के दो प्रधान भेदों में से एक ।

दसारन
संज्ञा पुं० [सं० दशार्ण] एक देश । दे० 'दशार्ण' ।

दसारी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक चिड़िया जो पानी के किनारे रहती है ।

दसी
संज्ञा स्त्री० [सं० दशा] १. कपड़े के छोर पर का सूत । छोर । २. कपड़े का पल्ला । थान का आँचल । उ०—जाता है जिस जान दे, तेरी दसी न जाय ।—कबीर (शब्द०) । ३. बैलगाड़ी की पटरी । ४. चमड़ा छीलने का औजार । रापी । ५. पता । निशान । चिह्न ।

दसेंदू
संज्ञा पुं० [देश०] केंदू । तेंदू का पेड़ ।

दसेरक, दसेरुक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दशेरक' ।

दसै †
संज्ञा स्त्री० [सं० दसमी, हिं० दसई] दशमी तिथि ।

दसोतरा (१)
वि० [सं० दशोत्तर] दस ऊपर । दस अधिक ।—जैसे, दसोतरा सौ अर्थात् एक सौ दस ।

दसोतरा (२)
संज्ञा पुं० सौ में दस । सैकड़ा पीछे दस का भाग ।

दसौंधी
संज्ञा पुं० [सं० दास(= दानपत्र) + वन्धुक(= स्तुतिगायक, भाट)] बंदियों या चारणों की एक जाति जो अपने का ब्राह्मण कहती है । ब्रह्मभट्ट । भाट । राजाओं की वंशावला और प्रशंसा करनेवाला पुरुष । उ०—(क) राजा रहा दृष्टि करि आँधी । रहि न सका तब भाट दसौंधी ।—जायस (शब्द०) । (ख) देस देस तें ढाढ़ी आए मनवांछित फल पायो । को कहि सकै दसौंधी उनको भयो सबन मन भायो ।— सूर (शब्द०) ।

दस्तंदाज
वि० [फा़० दस्तंदाज] हस्तक्षेप करनेवाला । बाधा देनेवाला । छेड़छाड़ करनेवाला [को०] ।

दस्तंदाजी
संज्ञा स्त्री० [फा़० दस्तंदाजी] किसी काम में हाथ डालने की क्रिया । किसी होते हुए काम में छेड़छाड़ । हस्तक्षेप । दखल । क्रि० प्र०—करना ।—होना ।

दस्त (१)
वि० [सं०] छोडा़ हुआ । त्यक्त । बहिष्कृत । २. फेंका हुआ । क्षिप्त । ३. विनष्ट । क्षीण । नष्ट [को०] ।

दस्त (२)
संज्ञा पुं० [फा़०] १. पतला पायखाना । पानी ऐसा मल गिरने की क्रिया । विरेचन । क्रि० प्र०—आना ।—होना । मुहा०—दस्त लगना = मल निकलने का वेग जान पड़ना । पायखाना लगना । २. हाथ । उ०—सदगुरु नाथ अमल मस्त । उस अमल में साहेब दस्त ।—दक्खिनी०, पृ० १२५ । यौ०—दस्तकार । दस्तखत । दस्तगीर । दस्तराज । दस्तपनाह । दस्तबंद । दस्तबदस्त । दस्तबरदार । दस्तबस्ता । दस्तबुर्द । दस्तयाब ।

दस्त (३)
संज्ञा पुं० [फा़० दश्त] जंगल । बयावन । मरुस्थल । उ०— सीस दिहा तब अब क्या रोना मनी मान को खौवै हो । दम दम याद करै साहिब को नेकी दस्त में बोवै हो ।—पलटू०, पृ० ८३ ।

दस्तक (१)
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. हाथ मारकर खट खठ शब्द उत्पन्न करने की क्रिया । खटखटाने की क्रिया । २. बुलाने के लिये दरवाजे की कुंडी खटखटाने की क्रिया । घर के भीतर के लोगों को बुलाने के लिये बाहर से किवाड़ पर हाथ मारने की क्रिया । उ०—मनिया लजाती और मुसकाती हुई दरवाजे पर हलके दस्तक देती हुई स्कूली लड़कियों की तरह शिकायत भरे स्वर से कहने लगी ।—जिप्सी, पृ० १८९ । मुहा०—दस्तक देना = बुलाने के लिये किवाड़ खटखटाना । ३. किसी से देना या मालगुजारी वसूल करने के लिये निकाला हुआ हूक्मनामा । वह आज्ञापत्र जिसे लेकर कोई सिपाही देना या मालगुजारी वसूल करने के लिये आवे । गिरफ्तारी या वसूली का परवाना । क्रि० प्र०—आना । यौ०—दस्तक सिपाही = वह सिपाही जो किसी से मालगुजारी आदि वसूल करने या किसी को पकड़ने के लिये तैनात हो । ४. माल आदि ले जाने का परवाना । निकास की चिट्ठी । राह- दारी का परवाना । उ०—भक्ति अंग को छापि, अंक दस्तक लिखि दीन्हों ।—धरम०, पृ० ८१ । ५. कर । महसूल । टैक्स । धौंस । क्रि० प्र०—लगाना । मुहा०—दस्तक बाँधना या लगाना = व्यर्थ का व्यय ऊपर डालना । नाहक का खर्च जिम्मे करना ।

दस्तकार
संज्ञा पुं० [फा़०] हाथ का कारीगर । हाथ से कारीगरी का काम करनेवाला आदमी ।

दस्तकारी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] हाथ की कारीगरी । कला संबंधिनी वह सुंदर रचना जो हाथ से की जाय । जैसे, बेल बूटे काढ़ना, आदि ।

दस्तखत
संज्ञा पुं० [फा़० दस्तखत] अपने हाथ का लिखा हुआ नाम । हस्ताक्षर । जैसे,—उस दस्तावेज पर तुम कभी दस्तखत न करना । विशेष—जिस लेख के नीचे किसी का दस्तखत होता है वह उसी का लिखा हुआ समझा जाता है । अतः उस लेख में जो बातें होती हैं उन्हें स्वीकार करने या पूरी करने के लिये वह नियम के अनुसार बाध्य होता है । क्रि० प्र०—करना ।—होना । मुहा०—दस्तखत लेना = दस्तखत कराना । किसी का नाम उसके हाथ से लिखवा लेना ।

दस्तखती
वि० [फा़० दस्तखत] जिसपर दस्तखत हो । (लेख) जिसपर लिखने या लिखानेवाले का नाम उसी के हाथ का लिखा हो । जैसे, दस्तखती चिट्ठी ।

दस्तग
संज्ञा पुं० [फा़० दस्तक] दे० 'द्स्तक' । उ०—अहंकार अहल- मद करत ना खोट भली तृष्णा चपरासी की दस्तग नित जारी है ।—राम० धर्म०, पृ० ५७ ।

दस्तगीर
संज्ञा पुं० [फा़०] हाथ पकड़नेवाला । सहारा देनेवाला । सहायक । मददगार । उ०—दस्तगीर गाढे़ कर साथी ।— जायसी (शब्द०) ।

दस्तगीरी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] मदद । हिमायत । शरण । पनाह । उ०—यह दिल फकीरी दस्तगीरी गस्त गुंज सिनाल है ।— सुंदर० ग्रं०, भा० १, पृ० २९० ।

दस्तदराज
वि० [फा़० दस्तदराज] १. धृष्ट । ढीठ । निडर । २. मार बैठनेवाला । हथछुट । ३. अन्यायी [को०] ।

दस्तदराजी
संज्ञा स्त्री० [फा० दस्तदराजी] १. ढिठाई । २. मार बैठने की आदत । ३. अन्याय । अत्याचार ।

दस्तपनाह
संज्ञा पुं० [फा़०] चिमटा ।

दस्तबंद
संज्ञा पुं० [फा़०] १. कलाई पर पहनने का स्त्रियों का एक अलंकार । २. नृत्य का एक प्रकार [को०] ।

दस्त बदस्त
क्रि० वि० [फा़०] हाथों हाथ । उ०—ऐसी बे तुसाडे दरस भिखारी, होवे सौदा दस्तबदस्ती । —धनानंद, पृ० ५३४ ।

दस्तबरदार
वि० [फा़०] जो किसी काम से हाथ हटा ले । जो किसी वस्तु से अपना हाथ या अधिकार उठा ले । जो कोई वस्तु छोड़ दे या किसी बात से बाज रहे । मुहा०—दस्तबरदार होना = बाज आना ।किसी वस्तु पर का अपना अधिकार छोड देना । छोड देना । त्याग देना । जैसे,—अगर तुम मकान से द्स्तबरदार हो जाओ तो हम १०००) और दें ।

दस्तबरदारी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. त्याग । २.त्यागपत्र ।

दस्तबस्ता
क्रि० वि० [फा़० दस्तबस्तह्] हाथ जोडे हुए । नम्रता के साथ [को०] ।

दस्तबुर्द
संज्ञा स्त्री० [फा़०] अपहरण । छीन लेना । जबरदस्ती दूसरे की चीज अपने कब्जे में कर लेना [को०] ।

दस्तयाब
वि० [फा़०] हस्तगत । प्राप्त । क्रि० प्र०—करना ।—होना ।

दस्तरखान
संज्ञा पुं० [फा़० दस्तरखान] वह चादर जिसपर खाना रखा जाता है । चौकी पर की वह चादर जिसपर भोजन की प्याली रखते हैं (मुसलमान) । उ०—पहले वह दस दस दोस्तों के साथ, नवाबी दस्तरखान सजाकर बैठते ।— शराबी, पृ० १०४ ।

दस्ताँन पु
संज्ञा पुं० [फा़० दस्तानह्] दे० 'दस्ताना' । उ०—दस्ताँन रच्चि सु हथ्थ । करि चहै गथ्थ अकथ्थ ।—ह० रासो, पृ० १२३ ।

दस्ता (१)
संज्ञा पुं० [फा़० दस्तह्] १. वह जो हाथ में आवे या रहे । २. किसी औजार आदि का वह हिस्सा जो हाथ से पकडा़ जाता है । मूठ । बेंट । जैसे, छुरी का दस्ता । ३. फूलों का गुच्छा । गुलदस्ता । ४. एक प्रकार की घुंडी जो चोगे या कबा पर लगती है । ५. सिपाहियों का छोटा दल । गारद । ६. चपरास । संजाफ । ७. किसी वस्तु का उतना गड्ड या पूला जितना हाथ में आ सके । ८. कागज के चौबीस तावों की गड्डी । ९. सोंटा । डंडा । गदका । १०, खरल का मुँगरा । खरल का मुसला (को०) ।

दस्ता (२)
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का बगला । हरगिला ।

दस्ता (३)
संज्ञा पुं० [हिं० जस्ता] दे० 'जस्ता' ।

दस्ताना
संज्ञा पुं० [फा़० दस्तानह्] १. पंजे और हथेली में पहनने का बुना हुआ कपडा । हाथ का मोजा । २. वह लंबी किर्च या सीधी तलवार जिसकी मूठ के ऊपर कलाई तक पहूँचनेवाला लोहे का परदा लगा रहाता है । यह मुहर्रम में ताजिये के साथ प्रायः निकलता है । ३. हाथ की रक्षा के लिये बना लोहे का बख्तर । हस्तत्राण (को०) ।

दस्तार
संज्ञा स्त्री० [फा़०] पगडी़ । उष्णीष । अम्मामा । उ०— मीर साहब जमाना नाजुक है, दोनों हाथों से थामिए दस्तार ।—कविता कौ०, भा० ४, पृ० १७१ ।

दस्तारचा
संज्ञा पुं० [फा़० दस्तारचह्] छोटी पगडी़ [को०] ।

दस्तारबंद
वि० [फा़०] अरबी साहित्य का स्नातक [को०] । विशेष—जो व्यक्ति अरबी की पूरी शिक्षा प्राप्त कर लेता है, उसे उसके शिक्षक प्रमाण के रूप में पगडी़ बाँध देते हैं ।

दस्तावर
वि०[फा०] जिससे दस्त आँवे । विरेचक । जैसे,— दस्तावर दवा ।

दस्तावेज
संज्ञा स्त्री० [फा० दस्तावेज] वह कागज जिसमें दो या कई आदमियों के बीच के वप्यवहार की बात लिखी हो और जिसपर व्यवहार करनेवालों के दस्तखत हों । व्यवहार संबंधी लेख ।वह पत्र जिसे लिखकर किसी ने कोई प्रतिज्ञा की हो, किसी प्रकार का ऋण या देना स्वीकार किया हो अथवा द्रव्य संपत्ति आदि का लेनदेन किया हो । जैसे तमस्सुक, रेहननामा, किबाला इत्यादि । उ०— (क) जबतक रजिस्ट्री नहो जाय, सच्चे सके सच्चा दस्तावेज भी प्रामा— णिक नहीं मान जाता । — प्रंगघन०, भा०२, पृ० २७३ । (ख) कागज,पत्तर, दस्तावेज, तमस्सुक हिंदलोट वगैरह । जिस संदूक में रखे हैं, उसकी चाबियों का गुच्छा किसके जिम्मे है?— नई०, पृ० १६ । क्रि० प्र०—लिखना ।

दस्तावेजी
वि० [फा० दस्तावेज] दस्तावेज संबंधी । दस्तावेज का । जैसे, दस्तावेजी रुपया,दस्तावेजी कागज ।

दस्तास
संज्ञा स्त्री० [फा०] हाथ से चलाई जानेवाली चक्की [को०] ।

दस्ती (१)
वि० [फा० दस्त (= हाथ)] हाथ का । जैसे, दस्ती रुमाल ।

दस्ती (२)
संज्ञा स्त्री० १. हाथ में लेकर चलने की बत्ती । मशाल ।२. छोटी मूठ । छोटा बेंट । ३. छोटा कलमदान । ४. वह सौगात जिसे विजयादशमीके दिन राजा लोग अपने हाथ से सरदारों और अपसरों को बाँटते हैं । ५. कुश्ती का एक पेंच जिसमें पहलवान अपने जोड का दाहिना हाथ दाहिने हाथ से अथवा बाँया हाथ बाएँ हाथ से पकडकर अपनी ओर खींचता है और ढट पीछे जीकर झटके के द्वारा उसे पटक देता है ।

दस्तूर
संज्ञा पुं० [फा०] १. रीति । रस्म । रवाज । चाल । प्रथा । २.नियम । कायदा । विधि । ३. पारसियों का पुरोहित जो उनके धर्मग्रंथ के अनुसार कर्मकांड कराता है ।४. जहाज के वे छोटे पाल जो सबसे ऊपरवाले पबाल कै नीचे की पंक्ति में दोनों ओर होते हैं ।— (लश०) ।

दस्तूरी
संज्ञा स्त्री० [फा० दस्तूर] वह द्रव्य जो नौकरअपने मालिक का सौदा लेने में दूकान दारों से हक के तौर पर पाते हैं । दस्तूरी का कुछ बँधा हिसाब होता है जैसे, एक रुपए के सौदे में दो पैसे । उ०— मंगल के मुजरा मिले ओमें दस्तूरी काट ।— भारतेंदु ग्रं०, मा०१, पृ० ३३५ ।

दस्तोपा
संज्ञा पुं० [फा०दस्त ओ पा (= पैर)] १. हाथ पैर । २. परिश्रम । मिहनत । प्रयास [को०] ।

दस्पना
संज्ञा पुं० [फा० दस्तपनाह] चिमटा ।

दस्म (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. यज्ञकर्ता । यजमान । २. अग्नि । ३. तस्कर । चोर । ४. खल [को०] ।

दस्म (२)
वि० १. सौंदर्ययुक्त । सुंदर । २. सुंदर । २. दर्शनीय । आश्चर्य- जनक [को०] ।

दस्यु
संज्ञा पुं० [सं०] १. डाकू । चोर । २. रिपु । शत्रु । (को०) । ३. असुर । अनार्य । म्लेच्छ । दास । उ०—आशा की मारी देवी उस दस्यु देश में जीती थी ।—साकेत, पृ० ३८८ । विशेष—दस्युओं का वर्णन वेदों में बाहुत मिलता है । आर्यों के भारतवर्ष में चारों ओर फैलने के पहले ये छोटी छोटी बस्तियों में इधर उधर रहते थे और आर्यों को अनेक प्रकार के कष्ट पहुँचाते थे, उनके यज्ञों में विघ्न डानते थे, उनके चौपाए चुरा ले जाते थे तथा और भी अनेक प्रकार के उपद्रव करते थे । अनेक मंत्रों में इन य़ज्ञहीन, अमानुष दस्युओं का नाश करने की प्रार्थना इंद्र से की गई है । नमुचि, शंबर और धृत्र नामक दस्युपतियों के इंद्र के हाथ से मारे जाने का उल्लेख ऋग्वेद में कई स्थानों पर है । जैसे, 'हे इंद्र' तुमने दस्यु शंबर की सौ से अधिक पुरियों को नष्ट किया । 'हे इंद्राग्नि तुमने एक बार में ही दासों की नब्बे पुरियों को हिला डाला ।' 'हे इंद्र' तुमने कुलितर के पुत्र दास शंबर को ऊँचे पर्वत के ऊपर मुँह के बल गिराकर मार डाला । 'तुमने मनुष्यों कै सुख की इच्छा से दास नमुचि का सिर चूर्ण किया ।' वेदों में दस्युओं के लिये दास और असुर शब्द भी आए हैं । इन दस्युओं के 'पणि' आदि कई भेद थे । पीछे जब कुछ दस्यु सेवा आदि के लिये मिला लिए गए तब उलकी उत्पत्ति के संबंध में कुछ कथाएँ कल्पित की गई । ऐतरेय ब्राह्मण में वे विश्वा- मित्र द्वारा उत्पन्न और शाप द्वारा भ्रष्ट बतलाए गए हैं । मनुस्मृत्ति में लिखा है कि 'ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों में जो क्रियालुप्त और जाति बाहर हो गए हैं वे सब चाहे म्लेच्छभाषी हों चाहे आर्यभाषी, दस्यु कहलाते हैं' । महाभारत में लिखा हैं कि अर्जुन ने दरदों के सहित कांबोज तथा उत्तरपूर्व के जो दस्यु थे उन्हें भी परास्त किया । द्रोणपर्व में दाढी़वाले दस्युओं का भी उल्लेख हैं । इन दस्युओं के बीच निवास करना ब्राह्मण आदि के लिये निषिद्ध था ।

दस्युता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. लुटेरापन । डकैती । २. राक्षसपन । दुष्टता । क्रूर स्वभाव ।

दस्यवृत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १ डकैती । लुटेरापन । २. चोरी ।

दस्युहा
संज्ञा पुं० [सं० दस्युहन्] (असुरों को मारनेवाले) इंद्र ।

दस्र (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. शिशिर ऋतु । २. गदहा । ३. अश्विनी- कुमार । ४. दो का समूह । जोडा़ । ५. दस्यु । लुटेरा (को०) । ६. अश्विनी नक्षत्र (को०) । यौ०—दस्र देवता = अश्विनी नक्षत्र । दस्रसू = सूर्य की स्त्री ।

दस्र (२)
वि० १. दोहरा । २. हिंसा करनेवाला ।

दस्रसू
संज्ञा स्त्री० [सं०] सूर्य की पत्नी संज्ञा जो अश्विनीकुमार की माता थी [को०] ।

दहँसत †
संज्ञा स्त्री० [फा़० दहशत] दे० 'दहशत' । उ०—तल दिल में दहँसत अति जागी । मुरकि फौज खालिक की भागी ।—शुक्ल अभि० ग्रं० (इति०), पृ० ८४ ।

दह (१)
संज्ञा पुं० [सं० ह्यद (आद्यंत विपयंय), अथवा सं० द्रह, प्रा०दह] १.नदी में वह स्थान जहाँ पानी बहुत गहरा हो । नदी के भीतर का गड्ढा । पाल । उ०—ले वसुदेव घँसे दह सामुहिं तिहूँ लोक उजियारे हो ।—सूर (शब्द०) । यौ०—कालीदह । २. कुड । हौज । उ०—टोपन टूटि उठै असि सच्छी । दह में मनौ उच्छलै मच्छी ।—लाल (शब्द०) ।

दह (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० दहन] ज्वाला । लपट । लौ ।

दह (३)
वि० [फा़०] दस । उ०—(क) भादों घोर राति अँधियारी । द्वार कपाट कोट भट रोके दह दिसि कंत कंस भय भारी— सूर (शब्द०) । (ख) हाट बाट नहिं जाहिं निहारी । जनु पुर दह दिसि लागि दवारी ।—तुलसी (शब्द०) । यौ०—दहचंद = दसगुना । दहदिला = साहसी । वीर । दहदिसि = चारों ओर । दसो दिशाओं में । उ०—दहदिसि दीपक तेज के बिन बाती बिन तेल । चहुँ दिसि सूरज देखिए दादू आद्भुत खेल ।—दादू०, पृ० १०० । दहरोजा = चंद दिन का । कुछ दिनों का ।

दहक
संज्ञा स्त्री० [सं० दहन] १. आग दहकने की क्रिया । धधक । दाह । २. ज्वाला । लपट । † ३. शर्म । हया । लज्जा ।

दहकन
संज्ञा स्त्री० [हिं० दहकना] दहकने की क्रिया या भाव ।

दहकना
क्रि० अ० [सं० दहन] १. ऐसा जलना कि लपट ऊपर उठे । लौ के साथ बलना । धधकना । भड़कना । जैसे, आग दहकना, कोयला दहकना । उ०—अंग अंग आगि ऐसे केसर के नीर लागे, चीर लागे बरन, अबीर लागे दहकन ।— सेवक (शब्द०) । संयो० क्रि०—उठना ।—जाना । २. शरीर का गरम होना । तपना । धिकना । संयो० क्रि०—देना ।

दहकान
संज्ञा पुं० [फा़० देहका़न] गाँव का रहनेवाला । कृषक । किसान । देहाती । गँवार [को०] ।

दहकाना
क्रि० स० [हिं० दहकना] १. धधकाना । ऐसा जलाना कि लौ ऊपर उठे । संयो क्रि०—देना । २. भड़काना । क्रोध दिलाना । संयो० क्रि०—देना ।

दहकानियत
संज्ञा स्त्री० [फा़० देहकानियत] गँवारपन । भोदूपन । उजड्डपन [को०] ।

दहकानी
संज्ञा पुं० [फा़० देहकान] देहाती । गँवार । उ०—मैं तुम्हें समझता रहा म्लेच्छ, तुम मुझे वणिक या दहकानी । सदियों हम दोनों साथ रहे, यह बात न अब तक पहचानी ।— हंस०, पृ० १७ ।

दहकारना †
क्रि० स० [देश०] घूल आदि दबाने के लिये पानी का छिड़काव करना । सींचना ।

दहग्गी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दाह + आग] गरमी । ताप ।

दहचंद
वि० [फा़०] दसगुना [को०] ।

दहड़ दहड़
क्रि० वि० [सं० दहन या अनु०] लपट फेंकते हुए । घायँ घायँ । जैसे, दहड़ दहड़ जलना । उ०—इस बीच देखते क्या हैं कि वन चारों ओर से दहड़ दहड़ जलता चला आता है ।—लल्लू० (शब्द०) ।

दहणि †
संज्ञा स्त्री० [सं० दहन] दे० 'दहनि' । उ०—दादू छूटि खुदाई, कही को नाहीं, फिरिहौ पिरथी सारी । दूजी दहणि दूरि करि बोरै, साधु सब्द विचारी ।—दादू०, पृ० ३४२ ।

दहदल †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दलदल] दे० 'दलदल' ।

दहन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० दहनीय, दह्यमान] १. जलने की क्रिया या भाव । भस्म होने या करने की क्रिया । दाह । जैसे, लंकादहन । क्रि० प्र०—करना ।—होना । २. अग्नि । आग । ३. कृत्तिका नक्षत्र । ४. तीन की संख्या । ५. भिलावाँ । भल्लातक । ६. चित्रक । चीता । ७. दुष्ट या क्रोधी मनुष्य । ८. कबूतर । कपोत । ९. एक रुद्र का नाम । १०. ज्योतिष में एक योग जो पू्र् भाद्रपद उत्तराभाद्रपद और रेवती इन नक्षत्रों में शुक्र के होने पर होता है । ११. ज्योतिष में एक वीथी जो पूर्वाषाढ़ और उतराषाढ़ नक्षत्रों में शुक्र के होने पर होती है ।

दहन (२)
वि० १. जलानेवाला । दाहक । उ०—जय रघुवंस वनज वन भानू । गहन दनुज वन दहन कृमानू ।—मानस, १ । २. दाहयुक्त [को०] ।

दहन (३)
संज्ञा पुं० [फा़०] १. मुख । मुँह । उ०—दहन पा हैं उनके गुमाँ कैसे कैसे ।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० ४०७ । २. छिद्र । सूराख ।

दहन (४)
संज्ञा पुं० [देश०] कंजा नाम की कँटीली झाडी़ । वि० दे० 'कंजा' ।

दहनकेतन
संज्ञा पुं० [सं०] धूम । धूआँ ।

दहनप्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] आग्नि की पत्नी, स्वाहा [को०] ।

दहनर्क्ष
संज्ञा पुं० [सं०] कृत्तिका नक्षत्र ।

दहनशील
वि० [सं०] जलनेवाला ।

दहनसारथि
संज्ञा पुं० [सं०] पवन । वायु [को०] ।

दहना (१)
क्रि० अ० [सं० दहन] १. जलना । बलना । भस्म होना । उ०—जियरा उडयो सो डोलै, हियरा धक्योई करै, छाई पियराई, तन सियराई सों दहै ।—आनंदधन (शब्द०) २. क्रोध से संतप्त होना । कुढ़ना ।

दहना (२)
क्रि० स० १. जलना । भस्म करना । उ०—उलटी गाढ़ परी दुर्वासा दहत सुदर्सन जाको ।—सूर (शब्द०) । २. संतप्त करना । दुःखी करना । कष्ट पहुँचाना । उ०—ये घरहाई लुगाई सबै निसि द्योस निवाज हमें दहती हैं ।—निवाज (शब्द०) । ३. क्रोध दिनाला । कुढा़ना ।

दहना (३)
क्रि० अ० [हिं० दह] १. घँसना । नीचे बैठना । † २. पानी में डूब जाना ।

दहना (४)
वि० [सं० दक्षिण] दे० 'दहिना' ।

दहनागुरु
संज्ञा पुं० [सं०] जलाने का अगर । दाहागुरु [को०] ।

दहनाराति
संज्ञा पुं० [सं०] अग्नि का शत्रु जल जिससे आग बुझती है [को०] ।

दहनि †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दहना] जलने की क्रिया । जलन । उ०— अंतर उदेग दाह, आँखिन आँसू प्रवाह, देखो अटपटी चाह भीजनि । दहनि है ।—आनंदघन (शब्द०) ।

दहनीय
वि० [सं०] जलने या जलाए जाने योग्य ।

दहनोपल
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्यकांत मणि । सूर्यमुखी । आतशी शीशा ।

दहनोल्का
संज्ञा स्त्री० [सं०] आग की चिनगारी । लुक । लूका [को०] ।

दहपट
वि० [फा़० दह (= दस, दसो दिशा) + पट (= समतल), जैसे, चौपट] १. गिराकर जमीन के बराबर किया हुआ । ढाया हुआ । ध्वस्त । चौपट नष्ट । उ०—सूरदास प्रभु रघुपति आए दहपट भइ लंका ।—सूर (शब्द०) । २. रौंदा हुआ । कुचला हुआ । दलित । क्रि० प्र०—करना ।—होना ।

दहपटना
क्रि० स० [हिं० दहपट] १. ढाना । ध्वस्त करना । चौपट करना । नष्ट करना । २.रौंदना । कुचलना । दलित करना । उ०—बालिहू गर्व जिय माहिं ऐसी कियो; मारि दहपटि,दियो जम की घानी ।—तुलसी । (शब्द०) ।

दहपट्टना पु
क्रि० स० [हिं० दहपट] दे० 'दहपटना' । उ०—हाँकि हाँकि द्लनि दबाई दहपट्टि हते, बाजी औं बितुंड झुँड झूमत खऱे जे हैं ।—हम्मीर०, पृ० ५७ ।

दहबासी
संज्ञा पुं० [फा़० दह (= दस) + बासी (प्रत्य०)] दस सिपाहियों का सरदार ।

दहमर्द
वि० [फा़० दहमर्दह्] १.असत्यभाषी । झूठा । २. वाचाल । बड़बड़िया । बक्की ।

दहर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १.छोटा चूहा । चुहिया । २. छछूँदर । ३. भ्राता । भाई । ४. बालक । ५. नरक । ६. वरुण । ७. हृदय का गर्त या हृदय (को०) ।

दहर (२)
वि० १. स्वल्प । छोटा । २. सूक्ष्म । ३. दुर्बोध ।

दहर (३)
संज्ञा पुं० [सं० हृद (आद्यंत विपर्यय)] १. दह । नदी में गहरा स्थान । उ०—अति अचगरी करत मोहन फटकि गेंडुरी दहर ।—सूर (शब्द०) । २. कुंड । हौज । गड्ढा । पाल ।

दहर दहर
क्रि० वि० [अनु० या सं० दहन (= जलना)] लपट फेंकते हुए । धधकते हुए । धायँ धायँ । जैसे, दहर दहर जलना ।

दहरना पु (१)
क्रि० अ० [हिं० दहलना] दे० 'दहलना' ।

दहरना (२)
क्रि० स० दे० 'दहलाना' । उ०—सूर प्रभु आय गोकुल प्रगट भए संतन दै हरख, दुष्ट जन मन दहर के ।—सूर (शब्द०) ।

दहराकाश
संज्ञा पुं० [सं०] चिदाकाश । ईश्वर ।

दहरोजा
वि० [फा़० दहरोजह्] अस्थायी । न टिकनेवाला [को०] ।

दहरौरा
संज्ञा पुं० [हिं० दही + बडा़] [स्त्री० दहरौरी] १. दही में भिंगोया हुआ बडा़ । २.एक प्रकार का गुलगुला ।

दहल (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० दहलना] डर से एकबारगी काँप उठने की क्रिया । थरथराहट ।

दहल (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० हृद, हिं० दहर] कुंड । उ०—गोधन खरकि खेत अरु क्यार । गोरस दहल नाज अरु न्यार ।— घनानंद०, पृ० ३०२ ।

दहलना
क्रि० अ० [सं० दर (= डर) + हि० हलना(= हिलना)] डर से एकबारगी काँप उठना । डर के मारे जी धक से हो जाना । डर से चौंकना । भय से स्तेभित होना । जैसे,— वह राजा की चढ़ाई सुनते ही दहल उठा । संयो० क्रि०—उठना ।—जाना । मुहा०—जी या कलेजा दहलाना = डर से हृदय काँरना । डर के मारे छाती धक धक करना ।

दहला (१)
संज्ञा पुं० [फा़० दह(= दस) + ला (प्रत्य)] ताश या गंजीफे का वह पत्ता जिसमें दस बूटियाँ हों । दस चिह्नोंवाला ताश ।

दहला † (२)
संज्ञा पुं० [सं० स्थल] थाला । थावला । आलबाल । उ०—(क) कोऊ तुफंग मुहार कहै दहला कलपद्रुम भाखत अंग को ।—शंभु (शब्द०) । (ख) रोमलता को अहै दहला यह नाभि कों गाड़ कि संभु बखानै ।—शंभु (शब्द०) ।

दहलाना
क्रि० स० [हिं० दहलना] डर से कँपाना । भय से चौंकाना । संयो० क्रि०—देना ।

दहली †
संज्ञा स्त्री० [फा़० दहलीज] दे० 'देहरी' ।

दहलीज
संज्ञा स्त्री० [फा़० दहलीज] द्वार कै चौखट की नीचेवाली लकड़ी जो जमीन पर रहती है । देहली । डेहरी । मुहा०—दहलीज का कुत्ता = पिछलग्गू । दहलीज न झाँकना = दरवाजे पर न आना । दहलीज की मिट्टी ले डालना = फेरे पर फेरा करना । बार बार द्वार पर आना ।

दहलेज †
संज्ञा स्त्री० [फा़० दहलीज] दे० 'दहलीज' ।

दहवट्ट †
वि० [फा़० दह + पट] ध्वस्त । चौपट । दहपट । उ०— स्वामि ध्रम्म रत्ते सु मन जे ठेलै गजठट्ट । ढरै परब्वत सिबर डर करैं सत्रु दहवट्ट ।—पृ० रा०, ५ । ९ ।

दहवाट †
संज्ञा पुं० [सं० दश + वर्त्म; प्रा० दहवट्ट, दहवाट] विध्वंस । विनाश । उ०—तै दीधौ दसरथ तणा, दस सिर धर दहबाट ।—बाँकी० ग्रं०, भा० १, पृ० ६० ।

दहशत
संज्ञा स्त्री० [फा़०] डर । भय । खौफ ।

दहसत, दहसति पु
संज्ञा स्त्री० [फा़० दहशत] दे० 'दहशत' । उ०—(क) तिनकी दहसत क्यों नहिं माने ।—कबीर श०, भा० १, पृ० ३२ । (ख) दहसति नाहिं करै किसहू की, जिकिर अपानी खोलै हो । पलटू रोसन इहै कमाली, तनहा होइ जब डोलै हो ।—पलटू०, भा० ३, पृ० ८३ ।

दहसनी
संज्ञा स्त्री० [फा़ दह + सन] दस साल के खाते की बही ।

दहा
संज्ञा पुं० [फा़० दह] १. मुहर्रम का महीना । २. मुहर्रम की १ से १० तारीख तक का समय । ३. कजिया । क्रि० प्र०—उठना ।—निकलना ।

दहाई
संज्ञा स्त्री० [फा़० दह (= दस)] १. दस का मान वा भाव । २. अंकों के स्थानों की गिनती में दूसरा स्थान-जिसपर जो अंक लिखा होता है उससे उतने ही गुने दस का बोध होता है । जैसे, ८० में दहाई के स्थान पर ८ है जिसका मतलब है आठ गुना दस । विशेष—दे० 'एकाई' ।

दहाड़
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. किसी भयंकर जंतु का घोर शब्द । गरज । जैसे, शेर की दहाड़ । २. रोने का घोर शब्द । आर्तनाद । चिल्लाकर रोने की ध्वनि । मुहा०—दहाड़ मारना या दहाड़ मारकर रोना = चिल्ला चिल्लाकर रोना ।

दहाड़ना
क्रि० अ० [अनु०] १. किसी भयंकर जंतु का घोर शब्द करना । गरजना । गुर्राना । जैसे, शेर का दहाड़ना । २. जोर से चिल्लाकर रोना ।

दहान पु
संज्ञा [सं० दहन] अग्नि । उ०—तिनं लोमह लोमं प्रगही दहानं । मुषं पुछ् छ पछ्छार भानं ।—पृ० रा०, २ ।२४० ।

दहाना
संज्ञा पुं० [फा़० दहानह्] १. चौड़ा मुँह । द्वार । २. मुख । दहन । ३. मशक का मुँह । मुहा०—दहाना खोलना = (१) मशक का मुँह खोलना । पानी छोड़ना । (२) पेशाब करना (बाजारू) । वह स्थान जहाँ नदी दूसरी नदी या समुद्र में गिरती है । मुहाना । ५. मोरी । नाली । ६. लगाम जो घोड़े के मुँह में रहती है ।

दहार
संज्ञा पुं० [अ० दयार(= प्रदेश)] १. प्रांत । प्रदेश । २. आस पास का प्रदेश । ग्वैंड़ ।

दहिँगल
संज्ञा पुं० [देश०] कीड़े मकोड़े खानेवाली आठ अंगुल लंबी एक चिड़िया जिसके परों पर सफेद और काली लकीरें होती हैं । यह रह रहकर अपनी पूँछ ऊपर उठाया करती है ।

दहिऔरी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'दहरौरी' ।

दहिउ पु †
संज्ञा पुं० [सं० दधि] दे० 'दही' । उ०—भरें कलस तरुनी चलि आई । दहिउ लेहु ग्वालिनि गोहराई ।—जायसी ग्रं०, (गुप्त)' पृ० २११ ।

दहिजरवा †
वि० [हिं० दाढ़ी़जार] दे० 'दाढ़ीजार' । उ०—तोरी चुनर पर साहब रीझे, जम दहिजरवा फिर फिर जाय ।— कबीर शा०, भा० २, पृ० ९३ ।

दहिजार †
संज्ञा पुं० [हिं० ] दे० 'दाढ़ीजार' ।

दहिड़िया
संज्ञा स्त्री० [हिं० दहेड़ी + इया (प्रत्य०)] दे० 'दहेड़ी' । उ०—एक दहिड़िया दही जमायौ दुसरी परि गई साई रे । न्यूँति जिमाँऊँ अपनौं करहा, छार मुनिस की डारी रे ।— कबीर ग्रं०, पृ० ११२ ।

दहिन
वि० [सं० दक्षिण] अनुकूल । दक्षिण । उ०—बेरि एक दइय दहिन जञी होए, निरधन धन जके धरय मोञे गोए ।— विद्यापति, पृ० ३५४ ।

दहिना
वि० [सं० दक्षिण] [वि० स्त्री० दाहिनी] शरीर के दो पाश्वों में से उस पार्श्व का नाम जिधर के अंगों या पेशियों अधिक वल होता है । बायँ का उलटा । अपसव्य । जैसे, दहिना हाथ, दहिना पैर, दहिनी आँख । मुहा०—दहिना कमरपेंच = दाहिनी ओर मुंड़ने का शब्द । दाहिनी और घूमना है ।—(पालकी के कहार) ।

दहिनावर्त
वि० [सं० दक्षिणावर्त] दे० 'दक्षिणावर्त' । उ०—पुहमी वैव न दहिनावर्त । नाँगै पाऊँ फिरों न मरता ।—सुंदर० ग्रं०, भा० १, पृ० ३०५ ।

दहिने
क्रि० वि० [हिं० दहिना] दाहिनी ओर को । जैसे,—वह मकान तुम्हारे दहिने पड़ेगा । यौ०—दहिने होना = अनुकूल होना । प्रसन्न होना । दहिने बाएँ = इधर उधर । दोनों पार्श्व में । दोनों ओर ।

दहियक
संज्ञा पुं० [फा़० दह (= दस) दशमांश । दसवाँ हिस्सा ।

दहियल
संज्ञा पुं० [फा़० दह (= दस) + हिं० इयल (प्रत्य०)] दे० 'दहला' ।

दही
संज्ञा पुं० [सं० दधि] खटाई के द्वारा जमाया हुआ दूध । वह दूध जो खटाई पड़ जाने के कारण जमकर जमकर थक्के के रूप में हो गया हो । विशेष—मिट्टी के बरतन में रखे हुए गरम दूध में थोड़ा सा दही (या और कोई खट्टा पदार्थ) डाल देते हैं; जिससे थोड़ी देर में वह थक्के के रुप में जम जाता है । पाश्चात्य देशों की विधि के अनुसार दूध जमाने के लिये लैक्टिक एसिड का प्रयोग किया जाता है । दही दो प्रकार का होता है । एक सजाव या मीठा जिसका घी या मक्खन निकाला हुआ नहीं होता और जिसमें घी से युक्त मलाई की तह होती है । दूसरा छिनुवा या पनिया जो मक्खन निकाले हुए दूध को जमाने से बनता हे और घटिया होता है । घी दही को मथकर ही निकाला जाता है । हिंदुओं के यहाँ दही मंगल द्रब्यों में से है । वैद्यक में दही अग्निदीपक, स्निग्ध, गुरु, धारक, रक्तपित्तकारक, बलकारक, शुक्रवर्धक, कफवर्धक, तथा मूत्रकृच्छ, अरुचि, अतीसार, विषमज्वर इत्यादि की दूर करनेवाला माना जाता है । यूरप के बड़े बड़े डाक्टरों ने हाल में परीक्षा द्वारा सिद्ध किया है कि दही से बढ़कर और कोई आयुवर्धक पदार्थ मनुष्य के लिये नहीं है । उतरती अवस्था में इसका सेवन उन्होंने अत्यंत उपकारी बतलाया है । उनका कथन है कि दही से शरीर में ऐसे कीटाणु उत्पन्न हो जाते है जो रक्त क्षीण करनेवाले कीटाणुओं को खाते जाते हैं । मुहा०—दही का तोड़ = दही का पानी जो कपड़े में रखकर दही को निचोड़ने से निकलता है । (हाथ या मुँह में) दही जमा रहना = (१) किसी का तुरंत प्रतिकार न करना, चुप रह जाना । (२) किसी घटना या चर्चा के संबंध मे एकदम मौन हो जाना, कुछ भी न कहना । दही दही = दहिंगल नाम की चिड़िया की बोली । दही दही करना = किसी चीज को मोल लेने के लिये लोगों से कहते फिरना ।

दहीदही †
संज्ञा स्त्री० [अनु०] जहिंगल नाम की चिड़िया की वोली ।

दहीली
वि० स्त्री० [हिं० दाह + ईली (प्रत्य०) अथवा सं० दग्ध] जली हुई । दग्ध । उ०—नैकु नहीं पिय तैं कहुँ बिछुरति, तातै नाहिन काम दहीली । सूर सखी बूझै यह कैहौं, आजु गई यह भेट पहीली ।—सूर०, १० ।१७७२ ।

दहुँ पु
अव्य० [सं० अथवा] अथवा । या । किं वा । २. स्यात् । कदाचित् ।

दहुँवनि
वि० [देश०] दोनों । उ०—सुंदरि बिरहनि कै निकट आई बिरहनि कोइ । दुखिया ही दुखिया मिली दहुँवनि दीनी रोइ ।—सुंदर ग्रं०, भा० १, पृ० ६८२ ।

दहु पु
अध्य० [सं० अथवा] दे० 'धौं' । उ०—जनि अवहि सबहि दहु घास कहु, पकलि दोओ अललाण गइ ।—कीर्ति०, पृ० ६२ ।

दहेँगर
संज्ञा पुं० [हिं० दही + घड़ा] दही का घड़ा ।

दहेँड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दहीं + हंडी] दही रखने का मिट्टी का बरतन । उ०—अहिरिनि हाथ दहेंड़ि सगुन लेइ आवइ हो । तुलसी ग्रं०, पृ० ४ ।

दहेज
संज्ञा पुं० [अ० जहेज] वह धन और सामान जो विवाह के समय कन्या पक्ष की ओर से वर पक्ष को दिया जाता है । दायजा । यौतुक ।

दहेला पु (१)
वि० [हिं० दहला + एला (प्रत्य०)] [वि० स्त्री० दहिली, दहेली] १. जला हुआ । दग्ध । २. संतप्त । दुःखी । उ०— (क) सुनु सजनी मैं रही अकेली विरह दहेली इत गुरुजन झहरैं ।—(शब्द०) । (ख) कहाँ गए मनमोहन तजि के काहे बिरह दहेली है ।—(शब्द०) ।

दहेला (२)
वि [हिं० दहलना] [वि० स्त्री० दहेली] भीगा हुआ । ठिठुरा हुआ । उ०—गाहत सिध सयाननि के जिनकी मति की मति देह दहेली ।—केशव (शब्द०) ।

दहैँड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दही + हंडी] दही की हाँड़ी । उ०—ऐसो को है जो छुवै मेरी मटुकी, अछूती दहैंड़ी जमी ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३६१ ।

दहोतरसो
संज्ञा पुं० [सं० दशोत्तरशत] एत सौ दस ।

दह्ममान
वि० [सं०] जो जल रहा हो । जलनेवाला । उ०—तब क्यों दह्ममान यह जीवन, चढ़ न सका मंदिर में अब तक ।—सामधेनी, पू० ८ ।

दह्यो †
संज्ञा पुं० [हिं० दही] दे० 'दही' । उ०—औरन के दह्यो छिलछिलौ लागत, मौंने तो औटाइ जमायौ रुचि रुचि भरिकै तमी ।—नंद० ग्र०, पृ० ३६१ ।

दहृ (१)
वि० [सं०] सूक्ष्म । लघु । छोटा [को०] ।

दहृ (२)
संज्ञा पुं० १. हृदय रूपी । खान । हृदय रूपी गतं । हृदय । २. अग्नि । आग । ३. वनाग्नि । दावाग्नि । दावानल [को०] ।