विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/वो

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वोंट
संज्ञा पुं० [सं० वोण्ट] डंठल। वृंत [को०]।

वोंतिस †
वि० [सं० ऊनत्रिंश, प्रा० ओणतिस] दे० 'उनतिस' और 'ओनतिस'।—इंद्रा०, पृ० १६१।

वो
सर्व० [हिं०] दे० 'वह'। उ०—वो प्रभु अविगत अविनासी। दास कहाय प्रगट भे वासी।—कबीर सा०, पृ० ४०१।

बोइल †
संज्ञा पुं० [देश०] जमानत। जामिन। दे० 'ओल'। उ०— तुम प्रभु दीनदयाल रघुपति वोइल दिवाइय।—कबीर सा०, पृ० १९०।

वोई पु †
सर्व० [हिं० वह + ही]दे० 'वही'। उ०—फली वो बदी याँ वो तेरी अथी। हुआ वोई च हासिल जो पेरी अथी।— दक्खिनी०, पृ० ९०।

वोक † (१)
संज्ञा पुं० [सं० वर्कर, हिं० बकरा, बोकरा] बकरा। बोक। उ०—वोक निलज्ज चरत नित डोलै। बकरी संग कामरन बोलैं।—सुंदर० ग्रं०, भा० १, पृ० ३३४।

वोक पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० ओकस्-ओक] निवास। घर। ओक।

वोक्काण
संज्ञा पुं० [सं०] १. बृहत्संहिता के अनुसार एक देश का नाम। २. इस देश का निवासी। ३. इस देश का अश्व। ४. दे० 'बोक्काण'।

वोछा पु †
वि० [देश०] हलका। साधारण। दे० 'ओछा'।

वोज पु
संज्ञा पुं० [देश०]दे० 'बोज'। अश्वविशेष। उ०—लीले लक्खी लक्ख वोज बादामी चीनी।—सुजान०, पृ० ८।

वोट (१)
संज्ञा पुं० [अं०] वह संमति जो किसी सार्वजनिक पद पर किसी को निर्वाचित करने या न करने, अथवा सर्वसाधारण से संबंध रखनेवाले किसी नियम या कानून आदि के निर्धारित होने या न होने आदि के विषय में प्रकट की जाती है। किसी सार्वजनिक कार्य आदि के होने या न होने आदि के संबंध में दी हुई अलग अलग राय। छंद। विशेष—आजकल सभा समितियों में निर्वाचन के संबंध में या और किसी विषय में सभासदों अथवा उपस्थित लोगों की संमतियाँ ली जाती हैं। यह संमति या तो हाथ उठाकर या खड़े होकर या कागज आदि पर लिखकर प्रकट की जाती है। इसी संमति को वोट कहते हैं। आजकल प्रायः म्युनिसिपल और डिस्ट्रिक्ट बोर्डों तथा काउंसिलों (प्रांतीय विधानसभा, लोकसभा) आदि के चुनाव में कुछ विशिष्ट अधिकारप्राप्त लोगों से वोट लिया जाता है। भारतवर्ष में प्राचीन बौद्धकाल में और उसके पहले भी इससे मिलती जुलती संमति देने की प्रथा थी, जिसे छंदस् या छंद कहते थे। क्रि० प्र०—देना।—माँगना।

वोट (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० ओट] १. ओट। आड़। उ०—इक पट वोट वोरि सुख कीजै। आवहु वलि छिन छिन छबि छीजै।—नंद० ग्रं०, पृ० १६५। २. ओट करने का पट। दुपट्टा। चादर वा चूनरी आदि का वह अंश जिससे ओट या घूँघट किया जाता है। उ०—पहिरैं कनक कड़ा औ बागा। वोट गै पाट उपर मनि लागा।—इंद्रा०, पृ० ११४।

वोट आफ सेंसर
संज्ञा पुं० [अं०] निंदा का प्रस्ताव। निंदात्मक प्रस्ताव। जैसे,—परिषद् ने बहुमत से सरकार से विरुद्ध वोट आफ सेंसर पास किया।

वोटना पु †
क्रि० स० [हिं० ओट + करना] आड़ करना। उ०—इक पट वोट वटि सुख कीजै। आवहु बलि छिन छिन छबि छीजै।—नंद० ग्रं०, पृ० १६५।

वोटर
संज्ञा पुं० [अं०] वह जिसे वोट या संमति देने का अधिकार प्राप्त हो। वोट या संमति देनेवाला। यौ०—वोटर लिस्ट।

वोटर लिस्ट
संज्ञा स्त्री० [अं० वोटर + लिस्ट] वह सूची जिससे किसी विषय में वोट देने के अधिकारियों के नाम और पते आदि लिखे रहते हैं। वोट देनेवालों की सूची।

वोटा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दासी। मजदुरनी। दाई। पोटा।

वोटिंग
संज्ञा स्त्री० [अं०] मतदान की क्रिया। मत देने की क्रिया। चुनाव में अपना वोट देने का कार्य।

वोड
संज्ञा पुं० [सं०] सुपारी।

वोड़ना पु
क्रि० स० [हिं० ओढ़ना] १. विस्तार करना। फैलाना। २. रोकना। सहना।

वोड्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. गोह नामक जंतु। गोनस सर्प। ३. एक प्रकार की मछली।

वोड्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] पण का चतुर्थांश [को०]।

वोढ (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. बोढू ऋषि। २. कदम का पेड़। कदंब वृक्ष।

वोढ़ (२)
वि० विवाहित। जिसका उद्वाह हो चुका हो [को०]।

वोढ़ना †
क्रि० स० [सं० आवेष्ठन या उपवेष्ठन; प्रा० आवठ्ठण] दे० 'ओढ़ना'। उ०— लाल कमली वोढे़ पेनाए, बेसु हरि थे कैसे बनाए।—दक्खिनी०, पृ० १०३।

वोढ़नी पु †
संज्ञा पुं० [देशी ओड्ढण ओड्ढणिगा] ओढ़ने का वस्त्र। ओढ़ना। उ०—वोढ़नी है नरलज्जता की अपकीरति नूपुर के सुर गावत। लोभ को छोर धरे लटुवा मन रे नटुवा भयो भाव बतावत।—सातसतक, पृ० ४, छंद १८।

वोढव्य
वि० [सं०] १. वहन करने योग्य। बाह्य। २. परिणेतव्य। परिणय करने योग्य। ३. धारण या सहन करने योग्य। ४. खींचने या ले जाने योग्य। ५. पूर्ण करने योग्य [को०]।

वोढव्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह औऱत जो रखने या विवाह के योग्य हो अथवा जिसका विवाह होनोवाल हो [को०]।

वोढा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] ऋषभक नाम की ओषधि।

वोढा (२)
संज्ञा पुं० [सं० वोढृ] १. वहन करने, ढाने या ले जानेवाला। भारिक। भारवाहक। २. नेता। पथदर्शक। नायक। ३. पति। परिणेता। शौहर। ४. साँड़। वृषभ। ५. सूत। सारथि। ६. कर्षक अश्व। खींचनेवाला घो़ड़ा। ७. मूढ़ [को०]।

वोढा (३)
वि० वहन करने या धारण करनेवाला [को०]।

वोढ़ा पु (४)
वि० स्त्री० [सं० वोढृ] वहन या धारण करनेवाली। भरी हुई। निमग्न। उ०—यहि परकार कहै रस वोढा। सा स्वाधीन वल्लभा प्रौढा।—नंद० ग्रं०, पृ० १५।

वोढु
संज्ञा पुं० [सं०] वह बालक जो पिता के न रहने के कारण अपनी माता के साथ ननिहाल में रहता हो। पति के न रहने से मायके में रहनेवाली स्त्री का पुत्र [को०]।

वोढू
संज्ञा पुं० [सं० वोढु?] एक प्राचीन ऋषि जिनके नाम से तर्पण के समय जल दिया जाता है।

वोतप्रोत पु
वि० [सं० ओत प्रोत] एक में एक बुना हुआ। गुथा हुआ। इतना मिला हुआ कि अलग करना असंभव सा हो। अनुस्यूत। उ०—जैसे तंतुहि पट लै बाना। वोत प्रोत सो तंतु समाना।—सुंदर०, ग्रं०, भा० १, पृ० १११।

वोद
वि० [सं०] आर्द्र। गीला।

वोदर पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० उदर अथवा देश०] दे० 'उदर'। उ०— लौद लचीली लौं लचति घालत नहिं सकुचात। लगि जैहै वोदर लला वहै क्रसोदर गात।—स० सप्तक, पृ० २६१।

वोदार
संज्ञा पुं० [सं०] मुरदासिंगी। कंकुष्ठ।

वोदारना †
क्रि० स० [सं० अवदारण] ओदारना। फाड़ना। उ०— खंभ ते फारि वोदार दीन्हौ नख ते डारेव चीर।—संत० दरिया, पृ० ११९।

वोदाल
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार की मछली जिसे बोआरी कहते हैं।

घोद्र पु †
संज्ञा पुं० [सं० उदर] दे० 'उदर'।

वोधक
संज्ञा पुं० [सं०] कफ का एक भेद। उ०—कफ भी अवलुंपक, क्लेदक, वोधक, तर्षक और श्रोषक इन पाँच भेद से रहता है।—माधव०, पृ० ५८।

वोन ‡
संज्ञा स्त्री० [प्रा० वोड्डिया] कपर्दिका। कौड़ी। उ०—अवतंस इक स्रव स्रोन। दिसि कंक आसिय वोन।—पृ० रा०, ६१। १४८।

वोनतिस †
वि० [सं० ऊनत्रिंश, प्रा० ओणतिस] दे० 'उनतीस'। उ०—वोनतिस अक्षर तापर भेजा सिर्जनहार। तेह करता कहँ सुमिरहु मेरवै मित्र तोहार।—इंद्रा०, पृ० १६१।

वोपदेव
संज्ञा पुं० [सं०] संस्कृत के एक प्रसिद्ध विद्धान् जो व्याकरण के ज्ञाता एव ग्रंथनिर्माता थे। विशेष—इनका लिखा व्याकरण का प्रसिद्ध ग्रंथ मुग्धबोध है। कविकल्पद्रुम तथा और भी इनके लिखे अनेक ग्रंथ प्रसिद्घ हैं। ये 'हेमाद्रि' के समकालीन थे और देवगिरि के यादव राजा के दरबार के मान्य विद्धान् रहे। इनका समय तेरहवीं शती का पूर्वार्ध मान्य है।

वोपना †
क्रि० अ० [प्रा० ओप्या (= शाण), हिं० ओप] चमकना। दीप्त होना। ओपना। उ०—उबटन उबटि अँगन अन्हवाई। वोपी दामिनि लोपी माई।—नंद० ग्रं०, पृ० १२२।

वोबरा †
संज्ञा पुं० [सं० उपविवर, हिं० ओबरी अथवा सं० उपसगृह] छोटा घर। छोटा मकान। मकान का एक छोटा भाग। कोठरी। उ०—काल वोबरा महल अटारी। अइया मनुषहुँ बूझि तुम्हारी।—सुंदर०, ग्रं०, भा० १, पृ० ३२५।

वोम †
संज्ञा पुं० [सं० व्योम] आकाश। अंतरिक्ष। उ०—वोम अरावै गाजिऐ ढोल हुआ सब दौड़। आयौ रूपौ रामतण हाम वड़ी राठौड़।—रा० रू०, पृ० २४३।

वोरा † (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० अवार (= किनारा)] तरफ। दिशा। ओर। उ०—गैयाँ मिलवन मिस उठि भोर। गहगोरी गमनी उहि वोर।—नंद० ग्रं०, पृ० १७२।

वोर † (२)
संज्ञा पुं० ओर। अंत। पार। छोर। उ०—परकाला अरु गजी गनत कहुँ वोर न लहिए।—सुंदर० ग्रं०, भा० १, पृ० ७५।

वोरक
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो लिखता हो। लेखक। २. कलाकार। चित्रकार (को०)।

वोरट
संज्ञा पुं० [सं०] कुंद का फूल या पौधा।

वोरता †
संज्ञा पुं० [देश०] अश्वविशेष। दे० 'बोज'। उ०—नुकुरा और दुवाज वोरता है धबि दूती।—सुजान०, पृ० ८।

वोरपट्टी
संज्ञा स्त्री० [सं०] गद्दा। तोसक। आस्तरण [को०]।

वोरव
संज्ञा पुं० [सं०] बोरो धान।

वोरुखान
संज्ञा पुं० [सं] एक प्रकार का घोड़ा। संभवतः वोरता या वोज [को०]। विशेष—हेमचंद्र के अनुसार यह लाल रंग का या हलके भूरे रंग का होता था। इसे वोरता, बोज, वोर और वेरुहान भी कहते थे।

वोल
संज्ञा पुं० [सं०] रसगंध। एक गंध द्रव्य। दे० 'बोल' [को०]।

वोलक
संज्ञा पुं० [सं०] जलावर्त। जलगुल्म। भँवर [को०]।

वोल्लाह
संज्ञा पुं० [सं०] वह घोड़ा जिसकी दुम और अयाल के बाल पीले रंग के हों। बुलाह।

वोष्ठ †
संज्ञा पुं० [सं० ओष्ठ] दे० 'ओष्ठ'। यौ०—वोष्ठपुठ = ओष्ठपुट। उ०—सत सहस्त्र संहिता भारत व्यास जी के वोष्ठपुठन तें निकसो है।—पोद्दार अभि० ग्रंथ, पृ०, ४८४।

वोसूल †
संज्ञा पुं० [अ० वसूल] दे० 'वसूल'। उ०—पाप तहसील वोसूल होने लगी।—पलटू०, भा० २, पृ० ३३।

वोहि पु
सर्व० [हिं० वह] दे० 'वह'। उ०—साँवरो पीतम जहाँ बसै सो कित है वोहि गाँव री।—नंद० ग्रं०, पृ० ३५१।

वोहित्थ
संज्ञा पुं० [सं०] बड़ी नाव। जहाज।

वौकाना †
क्रि० स० [देश०] १. देना। प्रदान करना। हवाले करना। २. झुकाना। लचकाना। उ०—कोई न दिखा तब अपने कलेजे से पलाश की डार मय गुच्छे के मुझै हाथ से वौका दिया।—श्यामा० पृ० ८६।

वौद्ध
संज्ञा पुं० [सं०] बौद्ध [को०]।

वौषट्
संज्ञा पुं० [सं०] अंगन्यास तथा पितरों या देवो को आहुति देने के समय प्रयुक्त होनेवाला एक उदगार वा सांकेतिक मंत्र- विशेष [को०]।

वौसाउ पु †
संज्ञा पुं० [सं० व्यवसाय] व्यवसाय। व्यापार। उ०—कै काहू की इंछा पूरी। बल वौसाउ कीन्ह दुख दूरी।—चित्रा०, पृ० ३४।

व्यंकुश
वि० [सं० व्यङ्कुश] दे० 'निरंकुश'।

व्यंग (१)
संज्ञा पुं० [सं० व्यङ्ग] १. मंडूक। मेंढक। २. भावप्रकाश के अनुसार एक प्रकार का क्षुद्र रोग जिसमें क्रोध या परिश्रम आदि के कारण वायु कुपित होने से मुहँ पर छोटी छोटी काली फुंसियाँ या दाने निकल आते हैं। ३. वह जिसका कोई अंग टूटा हुआ या विकृत हो। लुंजा। विकलांग। ४. दे० 'व्यंग। मुहा०—व्यंग की बौछार = बहुत से व्यंगभरे वाक्य। व्यंग की बहुत सी बातें। उ०—किसी ओर से कहीं सभ्य व्यंग की बौछार आती।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० २९२। ५. एक रत्न लहसुनिया (को०) ६. लौह। इस्पात (को०)।

व्यंग (२)
वि० १. शरीररहित। २. जो व्यवस्थित न हो। अव्यवस्थित। ३. चक्रहीन। ४. लँगड़ा '[को०]।

व्यंगक
संज्ञा पुं० [सं० व्यङ्गक] पर्वत।

ब्यंगता
संज्ञा स्त्री० [सं० व्यङ्गता] व्यंग का भाव।

व्यंगत्व
संज्ञा पुं० [सं० व्यङ्गत्व] १. किसी अंग का न होना या खंडित होना। खंजता। २. दे० 'व्यंगता'।

व्यंगार
वि० [सं० व्यङ्गार] अंगारहीन। ज्वालारहित [को०]।

व्यंगार्थ
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'व्यंग्य'।

व्यंगिता
संज्ञा स्त्री० [सं० व्यङ्गिता] अंगहीनता। विकलांगता [को०]।

व्यंगी
वि० [सं० व्यङ्गिन्] अंगविशेष से रहित। अंगहीन [को०]।

व्यंगुल
संज्ञा पुं० [सं० व्यङ्गुल] एक अंगुल का साठवाँ भाग [को०]।

व्यंगुष्ठ
संज्ञा पुं० [सं० व्यङ्गुष्ठ] एक प्रकार का गुल्म।

व्यंग्य (१)
संज्ञा पुं० [सं० व्यङ्ग्य] १. शब्द का वह अर्थ जो उसकी व्यंजना वृत्ति के द्वारा प्रकट हो। व्यंजना शक्ति के कारण प्रकट होनेवाला साधारण से कुछ विशिष्ट अर्थ। गूढ़ और छिपा हुआ अर्थ। विशेष दे० 'व्यंजना'। २. वह लगती हुई बात जिसका कुछ गूढ़ अर्थ हो। ताना। बोली। चुटकी। क्रि० प्र०—कहना।—छोड़ना।—बोलना।—सुनना।

व्यंग्य (२)
संज्ञा १. व्यंजना वृत्ति द्वारा बोधित। परोक्ष संकेत द्वारा सूचित वा उपलक्षित [को०]।

व्यंग्यचित्र
संज्ञा पुं० [सं० व्यङ्ग्य + चित्र] वह चित्र जो किसी व्यक्ति का परिहास करने के लिये बिगाड़कर इस प्रकार बनाया जाता है जिसे देखकर दर्शक को स्वभावतः हँसी आ जाय। (अँ० कार्टून)।

व्यंग्यदाम
संज्ञा पुं० [सं० व्यङ्ग्यदामन्] व्यंग्य का बंधन। उ०— शवरी, गज गणिकादिक, हुए कृष्ट प्रासारिक। पारिक मैं सांसा- रिक अविधा हो व्यंग्यदाम।—आराधना, पृ० १४।

व्यंग्यरूपक
संज्ञा पुं० [सं० व्यङ्गयरूपक] वह रूपक जिसमें अप्रस्तुत योजना व्यक्त न होकर प्रच्छन्न हो। प्रच्छन्न रूपक। उ०— काव्य के वर्तमान समीक्षकों की द्दष्टि में दबी हुई या प्रच्छन्न अप्रस्तुत योजना, जिसे हमारे यहाँ व्यंग्यरूपक कहेंगे, बहुत उत्कृष्ट मानी जाती है।—चिंतामणि, भा० २, पृ० २२३।

व्यंग्योक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं० व्यङ्गय + उक्ति] परिहास वचन। चुभती हुई बात। व्यंग्यपूर्वक कही गई बात [को०]।

व्यंज
संज्ञा पुं० [सं० व्यञ्जन] १. परिचायक चिह्न। २. प्रकाशन। उ०—चंदबधू सिर व्यंज धरे वसुमत्ति सु रज्जिय।—पृ० रा०, २५।३५।

व्यंजक (१)
वि० [सं० व्यञ्जक] १. व्यंजित करनेवाला। २. प्रकाशक [को०]।

व्यंजक (२)
संज्ञा पुं० १. भावप्रकाशन की चेष्टा। २. वह शब्द जो गूढ़ार्थ को प्रकट करे। ३. संकेत। ४. अभिनय [को०]।

व्यंजन
संज्ञा पुं० [सं० व्यञ्जन] १. व्यक्त या प्रकट करने अथवा होने की क्रिया। २. शब्द की तीन शक्तियों में एक का नाम। विशेष दे० 'व्यंजना'। ३. चिह्न। निशान। रूप। ४. अवयव। अंग। ५. मूँछ। ६. दिन। ७. पेड़ू के नीचे का स्थान। उपस्थ। ८. तरकारी और साग आदि जो दाल, चावल, रोटी आदि के साथ खाए जाते हैं। ९. (साधारण बोलचाल में) पका हुआ भोजन। १०. वर्णमाला में का वह वर्ण जो बिना स्वर की सहायता से न बोला जा सकता हो। हिंदी वर्णमाला में 'क' से 'ह' तक के सब वर्ण व्यंजन हैं। ११. गुप्तचर या गुप्तचरों का मंडल। वयस्कता। १२. उ०—जब पूर्वोक्त प्राग्रूप प्रकट हो जाय तब उसको रूप ऐसे कहते हैं और संस्थान, व्यंजन, लिंग, लक्षण, चिह्न और आकृति यह छह शब्द रूप के पर्याय हैं।—माधव०, पृ० ५। १३. निदान। लक्षण (को०)। १४. लिंगद्योतक या स्मारक चिह्न। जैसे, मूँछ दाढ़ी, स्तन आदि (को०)। १५. स्मारक (को०)। १६. कपट वेश। छद्म वेश (को०)। १७. बलि पशु का संस्कार या पूजन (को०)। १८. पंखा। व्यंजन (को०)।

व्यंजनकार
संज्ञा पुं० [सं० व्यञ्जनकार] रसोइया। व्यंजन बनानेवाला व्यक्ति। सूपकार।

व्यंजनतालिका
संज्ञा स्त्री० [सं० व्यञ्जन + तालिका (= सूची)] विक्रे- तव्य भोज्य वस्तुओं की सूची। (अं०) मेनू। व्यंजनिका।

व्यंजनसंधि
संज्ञा स्त्री० [सं० व्यञ्जनसन्धि] व्याकरण के अनुसार व्यंजन वर्ण का व्यंजन वर्ण के साथ होनेवाला संबंध।

व्यंजनहारिका
संज्ञा स्त्री० [सं० व्यञ्जनहारिका] १. पुराणानुसार एक प्रकार की अमंगलकारिणी शक्ति जो विवाहिता लड़कियों के बनाए हुए खाद्य पदार्थ उठा ले जाती है। २. वह चुड़ैल जो स्त्रियों के भगस्थ बाल उड़ा ले जाती है।

व्यंजना
संज्ञा स्त्री० [सं० व्यञ्जना] १. प्रकट करने की क्रिया। २. शब्द की तीन प्रकार की शक्तियों या वृत्तियों में से एक प्रकार की शक्ति या वृत्ति। विशेष—व्यंजना शक्ति द्वारा शब्द या शब्दसमूह के वाच्यार्थ अथवा लक्ष्यार्थ से भिन्न किसी और ही अर्थ का बोध होता है। जैसे यदि कोई कहे कि 'तुम्हारे चेहरे' पर पाजीपन झलक रहा है'। दूसरा व्यक्ति कहे कि 'मुझे आज ही जान पड़ा है कि मेरे चेहरे में दर्पण का गुण है' तो इससे यह अर्थ निकलेगा कि तुमने मेरे दर्पण रूपी चेहेरे में अपना प्रतिबिंब देखकर उसमें पाजीपन की झलक पाई है। शब्दों की जिस शक्ति से यह अभिप्राय निकला, वही व्यंजना शक्ति है। इसके शाब्दी और आर्थी ये दो भेद माने गए हैं और इन दोनों भेदों के भी कई उपभेद किए गए हैं।

व्यंजनावृत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं० व्यञ्जनावृत्ति] १. व्यंजनाशक्ति। २. साहित्य शास्त्र तथा अन्य शास्त्रों में स्वीकृत शब्द शक्ति का एक प्रकार जिसका बोधक शब्द व्यंजक कहा जाता है तथा जिससे बोध्य अर्थ व्यंग्य कहा गया है। इसी शक्ति का एक रूप ध्वनि या ध्वनित अर्थ होता है। शृंगारादि रस ध्वन्यर्थ हैं। ३. व्यंग्यपूणँ लेखन वा कथन की शैली [को०]।

व्यंजनिका
संज्ञा स्त्री० [सं० व्यञ्जनिका] जिसमें व्यंजन हो। व्यंजन- तालिका।

व्यंजित
वि० [सं० व्यञ्जित] १. संकेतित। संकेत द्वारा कथित। २. चिह्नित। ३. व्यंजनावृत्ति द्वारा व्यक्त। व्यक्त [को०]।

व्यंजिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० व्यञ्जिनी] १. व्यंजनसमूह। २. वह जो व्यंजन करे।

व्यंझ पु †
संज्ञा पुं० [सं० विन्ध्य, प्रा० विझ]दे० 'विंध्य'। उ०— किस्न सकल चल अचल, अदिठ अलसंत चलंतइ। चंदन नभ वन भवन, अंब गिरि व्यंझ वसंतइ।—पृ० रा०, २१।१५।

व्यंत
वि० [सं० व्यन्त] दूर रहनेवाला। दूरस्थ [को०]।

व्यंतर
१. संज्ञा पुं० [सं० व्यन्तर] जैनों के अनुसार एक प्रकार के पिशाच और यक्ष। २. अंतर। अवकाश (को०)। ३. अंतर न होना (को०)।

व्यंदना पु
क्रि० स० [सं० विद्] जानना। जान पड़ना। ज्ञात होना। उ०—मृदु मृदंग धुनि संचरिय, अलि अलाप मुध व्यंद।—पृ० रा०, ६१।१७००।

व्यंश
देश० पुं० [सं०] पुराणानुसार विप्रचित्ति के पुत्र का नाम जो सिंहिका के गर्भ से उत्पन्न हुआ था।

व्यंशक
संज्ञा पुं० [सं०] पर्वत। पहाड़।

व्यंशुक
वि० [सं०] अंशुक या वस्त्रहीन। नग्न। निर्वस्त्र [को०]।

व्यंस (१)
संज्ञा पुं० [सं०] एक राक्षस का नाम।

व्यंस (२)
वि० विस्तृत अंसवाला। चौड़े कंधोंवाला [को०]।

व्यंसक
संज्ञा पुं० [सं०] १. धूर्त। चालबाज। चालाक। २. ऐंद्र- जालिक। बाजीगर (को०)।

व्यंसन
संज्ञा पुं० [सं०] १. ठगने या धोखा देने की क्रिया। २. बाँटने की क्रिया। वितरण (को०)।

व्यंसित
वि० [सं०] १. जो छला गया हो। वंचित। प्रतारित। २. पराजित। पराभूत। ३. प्रभावित [को०]।

व्य
संज्ञा पुं० [सं०] ढकने या आवरण करनेवाला। आच्छादक। परदा करनेवाला [को०]।

व्यक्त (१)
वि० [सं०] १. दिखाई देता या झलकता हुआ। प्रकट।जाहिर। २. साफ। स्पष्ट। ३. स्थूल। बड़ा। ४. दुष्ट। पाजी। ५. विकसित (को०)। ६. विशिष्ट। प्रसिद्ध। विख्यात (को०)। ७. एकाकी। अकेला (को०)। ८. बुद्धिमान। विद्वान् (को०)। ९. विभूषित। सुसज्जित (को०)। १०. उष्ण (को०)।

व्यक्त (२)
संज्ञा पुं० १. विष्णु। २. मनुष्य। आदमी। ३. कृत्य। कार्य। काम। ४. सांख्य के अनुसार प्रधान, अहंकार, इंद्रियाँ, तन्मात्र, महाभूत आदि चौबीस तत्व जो पुरुष से उद्भूत माने गए हैं। विशेष—सांख्य के मत से प्रकृति अव्यक्त और पुरुष व्यक्त है। ५. उष्णता (को०)। ६. सुशिक्षित वा विद्वान् व्यक्ति (को०)। ७. जैन मतानुसार ग्यारह गणाधिपों में से एक (को०)।

व्यक्तकृत्य
संज्ञा पुं० [सं०] लोककार्य [को०]।

व्यक्तगंधा
संज्ञा स्त्री० [सं० व्यक्तागन्धा] १. नीली अपराजिता। २. सानजुही। ३. पिप्पली। पीपल।

व्यक्तगणित
संज्ञा पुं० [सं०]दे० 'अंकगणित'।

व्यक्तता
संज्ञा स्त्री० [सं०] व्यक्त होने का भाव।

व्यक्ततारक
वि० [सं०] [वि० स्त्री० व्यक्ततारका] १. जिसमें तारे चमकते हों। जैसे, आकाश। २.चमकते तारों या पुत- लियोंवाला।

व्यक्तद्दष्टार्थ
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो देखी हुई बात कहे। चश्मदीद गवाह।

व्यक्तभुक्
संज्ञा पुं० [सं० व्यक्तभुज्] वह जो व्यक्त एवं द्दश्यमान् संसार को खाता हो। काल। समय [को०]।

व्यक्तभुज्
संज्ञा पुं० [सं०] समय। वक्त।

व्यक्तराशि
संज्ञा स्त्री० [सं०] अंकगणित में वह राशि या अंक जो व्यक्त किया या बतला दिया गया हो। ज्ञात राशि।

व्यक्तरूप
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु।

व्यक्तलक्ष्मा
वि० [सं० व्यक्तलक्ष्मन्] जिसके लक्षण प्रकट हों। व्यक्त या प्रकट चिह्नोंवाला [को०]।

व्यक्तलवण
वि० [सं०] जिसमें लवण व्यक्त हो अर्थात् मात्रा से अधिक हो [को०]।

व्यक्तवाक्, व्यक्तवाच्
संज्ञा पुं० [सं०] सुस्पष्ट कथन। स्पष्ट वाक्यावली।

व्यक्तविक्रम
वि० [सं०] जिसका पराक्रम सबको विदित हो [को०]।

व्यक्ताव्यक्त
वि० [सं० व्यक्त + अव्यक्त] प्रकट और अप्रकट। जो इंद्रियातीत हो। उ०—उपनिषदों में ब्रह्म के लिये व्यक्ताव्यक्त शब्द का प्रयोग किया गया है।—आचार्य०, पृ० ७६।

व्यक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. व्यक्त होने की क्रिया या भाव। प्रका- शित या द्दश्य होना। प्रकट होना। २. मनुष्य या किसी और शरीरधारी का सारा शरीर, जिसकी पृथक् सत्ता मानी जाती है और जो किसी समूह या समाज का अंग समझा जाता है। समष्टि का उलटा। व्यष्टि। ३. मनुष्य। आदमी। जैसे,—कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो सदा दूसरों का अपकार ही किया करते हैं। विशेष—यद्यपि यह शब्द संस्कृत में स्त्रीलिंग है तथापि हिंदी में मनुष्य या आदमी के अर्थ में यह प्रायः बोला और लिखा जाता है। ४. भूतमात्र। ५. वस्तु। पदार्थ। चीज। ६. प्रकाश। ७. भेद। विभेद (को०)। ८. वास्तविक रूप या प्रकृति (को०)। ९. व्याकरण में लिंग तथा विभक्ति में प्रयुक्त प्रत्यय (को०)।

व्यक्तिगत
वि० [सं०] १. स्वगत। २. निजी। एक व्यक्ति तक सीमित। उ०—इससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता कम होती है।— हिंदु० सभ्यता, पृ० ५५।

व्यक्तित्व
संज्ञा पुं० [सं०] १. व्यक्ति होने का भाव। २. व्यक्ति का असामान्य गुण वा असाधारण विशिष्टता। किसी में असामान्य वा असाधारण रूप से पाई जानेनाली विशेषता।

व्यक्तिमुखी
वि० स्त्री० [सं०] व्यक्तिविशेष की रुचि या भावना से संबद्ध। एक व्यक्ति तक ही केंद्रित रहनेवाली। उ०— यह प्रणाली समीक्षक की व्यक्तिगत भावना या प्रतिक्रिया को व्यक्त करने का लक्ष्य रखता है, अतएव इसे व्यक्तिमुखी, भावात्मक या प्रभावाभिव्यंजक शैली कहते हैं।—नया०, पृ० ३८।

व्यक्तीकरण
संज्ञा पुं० [सं०] प्रकाशन। प्रकटन। अभिव्यक्ति। उ०—साहित्य मनुष्य के विचारों, उसकी भावनाओं और कल्पनाओं का व्यक्तीकरण है।—पा० सा० सि०, पृ० १।

व्यक्तीकृत
वि० [सं०] जो व्यक्त किया गया हो। प्रकट किया हुआ।

व्यक्तीभूत
वि० [सं०] जो व्यक्त हुआ हो। प्रकट किया हुआ।

व्यग्र (१)
वि० [सं०] १. घबराया हुआ। व्याकुल। २. डरा हुआ। भयभीत। ३. काम में फँसा हुआ। ४. उद्यमी। उद्योगी। ५. आसक्त। उ०—मार्ग में मिसे से ठिठकती ठहरती सौ बार। गई व्यग्र शकुंतला नृप को निहार निहार।—शकुं०, पृ० ६। ७. आग्रही। ७. गातशील। जैसे चक्र (को०)।

व्यग्र (२)
संज्ञा पुं० विष्णु।

व्यग्रता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. व्यग्र होने का भाव। २. व्याकुलता।

व्यग्रमना
वि० [सं० व्यग्रमनस्] व्याकुल मनवाला [को०]।

व्यग्रहस्त
वि० [सं०] जिसके हाथ किसी काम में लहे हों। काम में फँसा हुआ [को०]।

ब्यज
संज्ञा पुं० [सं०] व्यजन। पंखा [को०]।

ब्यजन
संज्ञा पुं० [सं०] १. हवा करने का पंखा। उ०—कभी विपिन में हमें व्यजन का पड़ता नहीं प्रयोजन है।—पंचवटी, पृ० १। २. पंखे के काम में आनेवाला कोई वस्तु जिससे हवा की जा सके। ३. पंखा झलना (को०)।

ब्यजनक
संज्ञा पुं० [सं०]दे० 'व्यजन' [को०]।

व्यजनक्रिया
संज्ञा पुं० [सं०] पंखा झलने का कार्य।

ब्यजनचामर
संज्ञा पुं० [सं०] चमरी गाय की वह पूँछ जो पंखे की तरह झली जाती है। चँवर [को०]।

ब्यजनी
संज्ञा पुं० [सं० ब्यजानिन्] वह पशु जिसकी पूँछ के बालों से ब्यजन (चामर) बनता हो [को०]।

ब्यज्य (१)
वि० [सं०] जिसका बोध शब्द की व्यंजना शक्ति के द्वारा हो।

व्यज्य (२)
संज्ञा पुं० दे० 'व्यंग्य'।

व्यडंबक
संज्ञा पुं० [सं० व्यडम्बक] रेंड़ का पेड़। एरंड।

व्यडंबन
संज्ञा पुं० [सं० व्यडम्बन] र्रेड़ का पेड़।

व्यड़
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'व्याडि'।

व्यति
संज्ञा पुं० [सं०] घोड़ा।

व्यतिकर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. व्यसन। २. विनाश। बरबादी। ३. मिश्रण। मिलावट। ४. व्याप्ति। संबंध। लगाव। तअल्लुका। ६. समूह। झुंड। ७. रगड़। घर्षण (को०)। ८. अंतराय। विघ्न। रुकावट (को०)। ९. घटना। वृतांत (को०)। १०. सुअवसर। सुयोग (को०)। ११. विनिमय। परिवर्तन। अदल बदल (को०)। १२. क्षोभ (को०)। १३. ध्यानाकर्षण (को०)।

व्यतिकर (२)
वि० १. पारस्परिक। २. व्यापक विस्तारवाला। ३. निकट। समीप। आसन्न [को०]।

व्यतिकरित
वि० [सं०] १. व्यतिकर युक्त। २. मिश्रित। ३. आपूर्ण। अभिव्याप्त [को०]।

व्यतिकीर्ण
वि० [सं०] १. घुला मिला। मिश्रित। २. संयुक्त। एकीभूत (को०)। ३. प्रकोपित। संक्षुध्ब (को०)।

व्यतिकृत
वि० [सं०] परिव्याप्त [को०]।

व्यतिक्रम
संज्ञा पुं० [सं०] १. क्रम में होनेवाला विपर्यय। सिलसिले में होनेवाला उलटफेर। २. बाधा। विघ्न। ३. उल्लघन। अतिक्रमण (को०)। ४. उदासनिता। उपेक्षा। अवहेलना (को०)। ५. असंगति (को०)। ६. पाप। अपराध (को०)। ७. विपत्ति। दुर्भाग्य (को०)। ८. रातिभंग (को०)।

व्यतिक्रमण
संज्ञा पुं० [सं०] १. क्रम में विपर्यय करना। सिलसिले में उलट फेर करना। २. पाप या अपराध करना (को०)।

व्यतिक्रमी
वि० [सं० व्यतिक्रमिन्] व्यतिक्रम या राति भंग करनेवाला। अपराधा [को०]।

व्यतिक्रांत (१)
वि० [सं० व्यतिक्रान्त] १. जिसमें किसी प्रकार का विप- र्यय हुआ हो। २. बिताया हुआ (को०)।

ब्यतिक्रांत
संज्ञा पुं० १. उल्लंघन। २. पाप [को०]।

व्यतिक्राति
संज्ञा स्त्री० [सं० व्याप्तक्रान्ति] १. क्रम में होनेवाला विप- र्यय। व्यतिक्रम। २. बुराई (को०)।

व्यतिक्षेप
संज्ञा पुं० [सं०] १. कहासुना। वाद विवाद। २. अदल बदल विनिमय [को०]।

व्यतिगत
वि० [सं०] बीता हुआ। व्यतीत [को०]।

व्यतिचार
संज्ञा पुं० [सं०] १. पाप कर्म करना। पाप का आचरण करना। २. दोष। ऐब।

व्यतिपात
संज्ञा पुं० [सं०] १. बहुत बड़ा उत्पात। भारा उपद्रव या खराबी। २. ज्योतिष के अनुसार योगविशेष। दे० 'व्यतीपात'।

व्यतिभिन्न
वि० [सं०] जो अलग न हो सके। परस्पर मिला हुआ। पूणतः घुला मिला [को०]।

व्यतिभेद
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रवेश। व्याप्ति। २. एक साथ होने वाला। स्फोट [को०]।

व्यतिमूढ़
वि० [सं०] कर्तव्यमूढ़। अचकचाया हुआ [को०]।

व्यतियात
वि० [सं०] गत। गुजरा हुआ।

व्यतिरिक्त (१)
वि० [सं०] १. भिन्न। अलग। २. अधिक। अतिशय। बढ़ा हुआ। ३. रुद्ध। रोका हुआ (को०)। ४. मुक्त (को०)। ५. अपवादित। जिसका अपवाद किया गया हो (को०)।

व्यतिरिक्त (२)
क्रि० वि० अतिरिक्त। सिवा। अलावा।

व्यतिरिक्तक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार की उड़ान [को०]।

व्यतिरिक्तता
संज्ञा स्त्री० [सं०] व्यतिरिक्त होने का भाव या धर्म। विभिन्नता।

व्यतिरेक
संज्ञा पुं० [सं०] १. अभाव। २. भेद। अंतर। भिन्नता। वैषम्य। असमानता। ३. वृद्धि। बढ़ती। ४. अतिक्रम। ५. एक प्रकार का अर्थालंकार जिसमें उपमान की अपेक्षा उपमेय में कुछ और भी विशेषता या अधिकता का वर्णन होता है। उ०— (क) कहत सबै बेंदी दिए अंक दस गुनो होत। तिय लिलार बेंदी दिए अगनित बढ़त उदोत। (ख) निज परताप द्रवहिं नवनीता। पर दुख द्रवहिं सो संत पुनीता। ६. वियोग। राहित्य (को०)। ७. निष्कासन। अपवर्जन (को०)। ८. न्याय में असंबंधरूप पदार्थ। अन्वय का उलटा (को०)। ९. तुलना में वैपरीत्य दिखाना (को०)। १०. एक प्रकार की व्याप्ति (को०)।

व्यतिरेकी
संज्ञा पुं० [सं० व्यतिरेकिन्] १. वह जो किसी को अतिक्र- मण करके जाता हो। २. वह जो पदार्थों में विभिन्नता या विशेषता उत्पन्न करता हो। ३. अभावात्मक (को०)। ४. भिन्न। विपरीत (को०)।

व्यतिरेचन
संज्ञा पुं० [सं०] दो वस्तुओं या व्यक्तियों में अंतर दिखाने की क्रिया [को०]।

व्यतिरोपित
वि० [सं०] १. अधिकार रहित किया हुआ। २. निकाला हुआ [को०]।

व्यतिलंघी
वि० [सं० व्यतिलङ्घिन्] फिसलनेवाला [को०]।

व्यतिविद्ध
वि० [सं०] १. आलिंगित। गुंफित। २. विद्ध। छिद्रित [को०]।

व्यतिव्यस्त
संज्ञा वि० [सं०] उलझा हुआ। अत्यंत व्यस्त [को०]।

व्यतिषंग
संज्ञा पुं० [सं० व्यतिषङ्ग] [वि० व्यतिषक्त] १. मिलाना। २. विनिमय। बदला। ६. संयोग (को०)। ४. परस्पर बाँधना। एक साथ गूँथना (को०)। ५. परस्पर भिड़ना (को०)। ६. अभिशोषण। शोषण (को०)।

व्यतिषक्त
वि० [सं०] १. मिला हुआ। मिश्रित। २. आसक्त। ३. एकमेक। ओतप्रोत। अनुस्यूत (को०)। ४. जिनमें अंतर्विवाह हुआ हो (को०)।

व्यतिहार
संज्ञा पुं० [सं०] १. विनिमय। परिवर्तन। बदला। २. गाली गलौज। ३. मारपीट।

व्यतीकार
संज्ञा पुं० [सं०] १. व्यसन। २. विनाश। बरबादी। ३. मिश्रण। ४. लड़ना भिड़ना (को०)।

व्यतीत
वि० [सं०] १. बीता हुआ। गत। जैसे,—बहुत दिन व्यतीत हो गअए, वहाँ से कोई उत्तर नहीं आया। उ०—इसी प्रकारकभी व्यतीत वर्ष से लेकर।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० ३४१। २. मृत। मरा हुआ (को०)। ३. विसर्जित। परित्यक्त (को०)। ४. उपेक्षित। अवज्ञात (को०)। ५. लापरवाह। दीर्घसूत्री (को०)।

व्यतीतकाल
वि० [सं०] जिसका समय या अवसर बीत चुका हो। असामयिक [को०]।

व्यतीतना पु
क्रि० अ० [सं० व्यतीत + हिं० ना (प्रत्य०)] बीतना। गत होना। व्यतीत होना।

व्यतीपात
संज्ञा पुं० [सं०] १. बहुत बड़ा उत्पात। भारी उपद्रव। जैसे—भूकंप, उल्कापात आदि। २. अपमान। बेइज्जती। ज्योतिष में विष्कंभ आदि सत्ताइस योगों में से १७ वाँ और जिसमें यात्रा अथवा शुभ काम करने का निषेध है। ६. एक प्रकार का योग जो अमावास्या के दिन रविवार या श्रवण, धानष्ठा, आर्द्रा, अश्लेषा अथवा मृगशिरा नक्षत्र होने पर होता है। इस योग में गगास्नान का बहुत माहात्म्य है। ५. पूर्णतः विचलन या प्रयाण (को०)।

व्यतीहार
संज्ञा पुं० [सं०] १. विनिमय। परिवर्तन। बदला। २. आपस में गाला गलौज, मारपीट या इसी प्रकार का और काम करना।

व्यत्यय
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'व्यतिक्रम'।

व्यत्ययग
वि० [सं०] विपरीतगामी। उलटा चलनेवाला [को०]।

व्यत्यस्त
वि० [सं०] १. व्यतिक्रांत। २. असंगत। ३. विपरीत। विरोधी। ४. इस प्रकार रखी हुई दो वस्तुएँ जो एक दूसरो को काटती हों।

व्यत्यास
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'व्यतिक्रम'।

व्यथक
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो व्यथा उत्पन्न करता हो। पीड़ा देनेवाला।

व्यथन
संज्ञा पुं० [सं०] १. व्यथा। पीड़ा। तकलीफ। २. वह जो व्यथा उत्पन्न करता हो। पीड़ा देनेवाला। ३. कंपन (को०)। ४. स्वर का परिवर्तन (को०)। ५. छेदना (को०)।

व्यथयिता
वि० [सं० व्यथयितृ] १. पीड़ा देनेवाला। २. दंडित करनेवाला [को०]।

व्यथा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पीड़ा। वेदना। तकलीफ। २. दुःख। केल्श। ३. भय। डर। ४. विक्षोभ। अशांति (को०)। ५. रोग (को०)। ६. हानि। क्षाति (को०)।

व्यथातुर
वि० [सं०] पीड़ित।

व्यथान्वत
वि० [सं०] १. व्यथायुक्त। पीड़ायुक्त। २. भयग्रस्त। भीत। ३. क्षुब्ध। ४. दुःखित [को०]।

व्यथित
वि० [सं०] १. जिसे किसी प्रकार की व्यथा या तकलीफ हो। २. दुःखित। रंजीदा। ३. जिसे किसी प्रकार का शोक प्राप्त हुआ हो। ४. भीत। डरा हुआ।

व्यथी
वि० [सं० व्यथिन्] व्यथित [को०]।

व्यथ्य
वि० [सं०] १. व्यथा देने योग्य। २. भय उत्पन्न करनेवाला। भयानक।

व्यध
संज्ञा पुं० [सं०] १. चोट पहुँचाना। आहत करना। २. भेदन। छिद्र करना। ३. आघात [को०]।

व्यधन
संज्ञा पुं० [सं०] १. वेधने की क्रिया। विद्ध करना। बींधना। २. आखेट (को०)। ३. वह जो विद्ध करता हो। बेधक (को०)।

व्यधा
संज्ञा स्त्री० [सं०] रक्त का गिरना या बहना। रक्तस्राव [को०]।

व्यधिकरण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] भिन्न आधार पर होना।

व्यधिकरण (२)
वि० १. व्याकरण में अन्य कारक से संबद्ध। २. भिन्न आधारवाला [को०]।

व्यधिक्षेप
संज्ञा पुं० [सं०] निंदा। शिकायत।

व्यध्य (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रत्यंचा। २. लक्ष्य [को०]।

व्यध्य (२)
वि० बेधने योग्य। भेदन करने योग्य [को०]।

व्यध्व
संज्ञा पुं० [सं०] १. गलत रास्ता। बुरी राह। कुपथ। २. मार्ग का मध्य [को०]।

व्यनुनाद
संज्ञा पुं० [सं०] तीव्र प्रतिध्वनि। ऊँची गूँज [को०]।

व्यपकर्ष
संज्ञा पुं० [सं] निंदा। अपवाद [को०]।

व्यपकृष्ट
वि० [सं०] १. दूर हटाया हुआ। पृथक् किया हुआ। २. अपवादित जिसकी निंदा की गई हो [को०]।

व्यषगत
वि० [सं०] १. बीता हुआ। गया हुआ। २. रहित। वंचित। ३. गिराया हुआ। मुक्त। ४. हटाया हुआ। दूर किया हुआ।

व्यपगम
संज्ञा पुं० [सं०] १. बीतना। व्यतीत होना। ३. गमन। जाना। प्रस्थान [को०]।

व्यपञप
वि० [सं०] लज्जाहीन। बेहया [को०]।

व्यपदिष्ट
वि० [सं०] १. निंदित। तिरस्कृत। २. दिखाया हुआ। निर्दिष्ट। ३. बहाने या ब्याज के रूप में प्रतिपादित [को०]।

व्यपदेश
संज्ञा पुं० [सं०] १. निंदा। शिकायत। २. व्याख्या। विवरण। (जैन)। ३. सूचना। संदेश (को०)। ४. नामकरण। नाम रखना (को०)। ५. नाम। अल्ल। उपाधि (को०)। ६. परिवार। वंश (को०)। ७. ख्यात। यशी। प्रसिद्ध (को०)। ८. छल। कपटन। चाल (को०)। ९. जालसाजी। चालाकी (को०)। १०. संगुप्ति। संगोपन। छिपाव (को०)।

व्यपदेशक
वि० [सं०] व्यपदेश करनेवाला। नाम का निर्देश करनेवाला [को०]।

व्यपदेशी
वि० [सं० व्यपदेशिन्] १. सूचक। २. नाम वा उपाधिवाला। ३. सलाह या निर्देशानुसार चलनेवाला [को०]।

व्यपदेश्य
वि० [सं०] १. व्यपदेश या निंदा के लायक। निंद्य। २. जिसका निर्देश किया जाय [को०]।

व्यपदेष्टा
वि० [सं० व्यपदेष्ट्र] १. निर्देशक। निर्देश करनेवाला। २. छली। कपटी। वंचक [को०]।

व्यपनय
संज्ञा पुं० [सं०] १. विनाश। बरबादी। २. छोड़ देना। त्याग। ३. दुर्व्यवहार। अविनय (को०)। ४. हटाना। दूरीकरण (को०)।

व्यपनयन
संज्ञा पुं० [सं०] छोड़ देना। त्याग।

व्यपनीत
वि० [सं०] दूर हटाया हुआ। दूरीकृत [को०]।

व्यपनुति
संज्ञा स्त्री० [सं०] त्याग। दूर करना या हटाना [को०]।

व्यपमूर्धा
वि० [सं० व्यपमूर्धन्] भूर्धाहीन। शिरोरहित [को०]।

व्यपयान
संज्ञा पुं० [सं०] परावृत होना। भागना करना। पलायन। हवा होना [को०]।

व्यपरोपण
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० व्यपरोपित] १. झुकाना। २. काटना। ३. जड़ से काटना। ४. दूर करना। हटाना। ५. आघात पहुँचाना। पीड़ा पहुँचाना। (जैन)।

व्यपवर्ग
संज्ञा पुं० [सं०] १. अलग होना। विभाजन। विभाग। २. छोड़ना। त्याग। ३. पृथक्ता। अंतर।

व्यपवर्जन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० व्यपवर्जित] १. छोड़ना। त्याग। २. निवारण। ३. देना। दान।

व्यपवर्तन
संज्ञा पुं० [सं०] व्यावर्तन। लौटना [को०]।

व्यपवृक्त
वि० [सं०] १. अलग या पथक् किया हुआ। २. विभाजित। बाँटा हुआ [को०]।

व्यपसारण
संज्ञा पुं० [सं०] दूर करना। निकाल देना [को०]।

व्यपाकृत
वि० [सं०] वंचित। रहित [को०]।

व्यवाकृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दूर करना। निकालना। २. अपह्वव। गोपन। छिपाव। ३. अस्वीकृति। अस्वीकरण। इनकार करना [को०]।

व्यपाय
संज्ञा पुं० [सं०] १. अंत। लोप। समाप्ति। २. अनुपस्थिति। गमन [को०]।

व्यपाश्रय (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. आश्रयस्यान। २. आसन। ३. विराम। ४. प्रस्थान। ५. अनुक्रम। परंपरा। ६. शरण लेना। सहारा लेना। निर्भर होना। ७. आशा।

व्यपाश्रय (२)
वि० १. आश्रयहीन। २. अपना भरोसा रखनेवाला [को०]।

व्यपाश्रयणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] निवेदन। विनय [को०]।

व्यपाश्रित
वि० [सं०] जिसने आश्रय प्राप्त किया हो। जिसने सहारा पा लिया हो [को०]।

व्यपास्त
वि० [सं०] निष्कासित। बहिष्कृत [को०]।

व्यपेक्ष
वि० [सं०] १. अपेक्षा या आशा रखनेवाला। अपेक्षी। आकांक्षा। २. उत्सुक। लोलुप। लालस। सावधान। सचेत। ४. निरपेक्ष। निरभिलाष [को०]।

व्यपेक्षक
वि० [सं०] सावधान। अवहित। जागरूक [को०]।

व्यपेक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] आशा। अकांक्षा। उम्मीद [को०]।

व्यपेक्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आकांक्षा। इच्छा। चाह। २. अनुरोध। आग्रह। ३. पारस्परिक संबंध (को०)। ४. एक दूसरे का ध्यान। लिहाज। मुरव्वत। मुलाहिजा (को०)। ५. व्यवहार (को०)। ६. व्याकरण में दो नियमों का पारस्परिक प्रयोग (को०)।

व्यपेक्षित
वि० [सं०] १. जिसकी आशा या आकांक्षा की गई हो। २. जिसपर विशेष रूप से ध्यान दिया गया हो। ३. परस्पर संबद्ध। ४. प्रयुक्त। नियुक्त। व्यवहृत [को०]।

व्यपेत
वि० [सं०] १. मुक्त। अलग किया हुआ। २. गत। ३. नष्ट। ४. प्रतीप। विपरीत। आसाधु। दुष्ट [को०]। यौ०—व्यपेतकल्मष = जो दोष या पापमुक्त हो। व्यपेतघृण = दयारहित। व्यपेतधैर्य = धैर्यहीन। धीरतारहित। जिसे ढाढ़स न हो। व्यपेतभय = निर्भय। व्यपेतभी = निडर। निर्भय। व्यपेतमद = जिसका गर्व नष्ट हो गया हो। निरभिमान। व्यपेतहर्ष = हर्षरहित। विगतहर्ष।

व्यपोढ
वि० [सं०] १. दूरीकृत। दूर किया हुआ। २. प्रकटित। व्यक्त। दिखाया हुआ। ३. विपरीत। अननुकूल [को०]।

व्यपोह
संज्ञा पुं० [सं०] १. विनाश। बरबादी। २. दूर करना। निवारण [को०]। ३. प्रत्याख्यान। अस्वीकार (को०)। ४. समूह। निश्चय। चय (को०)।

व्यपोह्य
वि० [सं०] स्वीकार न करने योग्य [को०]।

व्यभिचरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. दे० 'व्यभिचार'। २. निश्चयहीनता। अनिश्चय। संदेह [को०]।

व्यभिचार
संज्ञा पुं० [सं०] १. बूरा या दूषित आचार। दुष्कर्म। कदाचार। बदचलनी। २. स्त्री का परपुरुष से अथवा पुरुष का परस्त्री से अनुचित संबंध। छिनाला। २. न्याय के अनुसार साध्य के न होने पर भी हेतु की उपस्थिति। साध्य- रहित हेतु (को०)। ४. अतिक्रमण। उल्लंघन (को०)। ५. अलग होने की शक्ति। विच्छेद्यता (को०)। ६. असंगति। अपवाद। ७. पाप। दोष (को०)।

व्यभिचारकृत्
वि० [सं०] परस्त्रीगामी। व्यभिचारी [को०]।

व्यभिचारिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दुराचार करनेवाली स्त्री। असती। कुलटा। पुंश्चली। २. अस्थिर बुद्धि। बुद्धि जो स्थिर न रहे [को०]।

व्यभिचारिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'व्यभिचार'।

व्यभिचारित्व
संज्ञा पुं० [सं०] व्यभिचारी होने का भाव। दे० 'व्यभिचार'।

व्यभिचारिभाव
संज्ञा पुं० [सं०] साहित्य में मुख्य भाव की पुष्टि करनेवाले वे भाव जो इसके उपयोगी होकर जल के तरंगों की भाँति उनमें संचरण करते हैं। इनकी संख्या ३३ है। दे० 'संचारी'।

व्यभिचारी
संज्ञा पुं० [सं० व्यभिचारिन्] [स्त्री० व्यभिचारिणी] १. वह जो अपने मार्ग से गिर गया हो। मार्गभ्रष्ट। उ०—हे प्रभु अविगति कला तुम्हारी। हम है कीट जीव व्यभिचारी।—कबीर सा०, पृ० ४३९। २. वह जिसकी चालचलन अच्छी न हो। बदचलन। ३. वह जो परस्त्रियों से संबंध रखता हो। पर- स्त्रीगामी। ४. दे० 'सचारी' या 'व्यभिचारिभाव'। ५. वह जो नियमविरुद्ध हो। असंगत (को०)। ६. असत्य। मिथ्या (को०)। ७. वह जो स्थिर न रहे। अस्थायी (को०)। ८. वह जो किसी व्यवस्था, नियम आदि का भंग या उल्लंघन करता हो (को०)। ९. वह शब्द जिसके कई गौण अर्थ हों।

ब्यभिहास
संज्ञा पुं० [सं०] उपहास। ठट्टा। मजाक।

व्यभीचार
संज्ञा पुं० [सं०] १. अतिक्रमण। उल्लंघन। २. कुकर्म। अनैतिक आचरण। ३. परिवर्तन। दे० 'व्यभिचार' [को०]।

व्यभीमान
संज्ञा पुं० [सं०] भ्रांत या गलत धारणा [को०]।

व्यभ्र
वि० [सं०] निर्मेष। निरभ्र। बिना बादल का [को०]।

व्यम्ल
वि० [सं०] अम्लरहित। जिसमें अम्लता न हो [को०]।

व्यय
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी पदार्थ का, विशेषतः धन आदि का, इस प्रकार काम में आना कि वह समाप्त हो जाय। किसी चीज का किसी काम में लगना। खर्च। सरफा। खफत। जैसे,—(क) उनका व्यय १००) मासिक है। (ख) व्यर्थ अपनी शक्ति व्यय मत करो। २. नाश। बरबादी। ३. दान। ४. छोड़ देना। परित्याग। ५. बृहस्पति के चार के एक वर्ष या संवत्सर का नाम। ६. महाभारत के अनुसार एक नाग का नाम। ७. रुकावट। अड़चन (को०)। ८. अपव्यय। फजूलखर्ची (को०)। ९. धन। संपत्ति। १०. जन्मकुंडली में लग्न से १२ वाँ स्थान (को०)। ११. व्याकरण में विभक्ति में प्रयुक्त प्रत्यय। शब्द- रूपांतर (को०)।

व्ययक
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो व्यय करता हो। व्यय करनेवाला।

व्ययकरण, व्ययकरणक
संज्ञा पुं० [सं०] वह कर्मचारी जो वेतन बाँटने का काम करे [को०]।

व्ययगत
वि० [सं०] सब कुछ व्यय कर डालनेवाला [को०]।

व्ययगामी
वि० [सं० व्ययगामिन्] ज्यौतिष शास्त्र के अनुसार लग्न से १२ वें स्थान में गमन करनेवाला। उ०—उनका सौम्य ग्रह बुध व्ययगामी होकर निर्बल हो गया हौ।—शुक्ल अभि० ग्रं०, पृ० ६८।

व्ययगुण
वि० [सं०] सब कुछ खर्च करनेवाला।

व्ययगृह
संज्ञा पुं० [सं०] ज्योतिष के अनुसार लग्न से बारहवाँ स्थान [को०]।

व्ययन
संज्ञा पुं० [सं०] खर्च करना। २. बर्बाद करना। नष्ट करना [को०]।

व्यपराडमुख
वि० [सं०] कृपण [को०]।

व्ययमान
वि० [सं०] अपव्यय करनेवाला [को०]।

व्ययशाली
वि० [सं० व्ययशालिन्] खर्च करनेवाला। शाहखर्च। अमितव्ययी [को०]।

व्ययशील
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो बहुत अधिक खर्च करता हो। खर्चीले स्वभाव का। शाहखर्च।

व्ययसह
वि० [सं०] (वह कोश या खजाना) जो रिक्त न हो [को०]।

व्ययसहिष्णु
वि० [सं०] धन की हानि या अधिक व्यय को बर्दाश्त करनेवाला [को०]।

व्ययित
वि० [सं०] १. खर्च किया हुआ। व्यय किया हुआ। २. बर्बाद। नष्ट [को०]।

व्ययी
संज्ञा पुं० [सं० व्ययिन्] वह जो बहुत व्यय करता हो। खूब खर्च करनेवाला। शाहखर्च।

व्यर्ण
वि० [सं०] १. जलरहित। जलहीन। २. सताया हुआ। उत्पीड़ित [को०]।

व्यर्थ (१)
वि० [सं०] १. जिसका कोई अर्थ या प्रयोजन न हो। बिना मतलब का। निरर्थक। २. जिसका कोई अर्थ या मतलब न हो। बिना माने का। अर्थरहित। ३. जिसमें किसी प्रकार लाभ न हो। ४. संपत्तिहीन। धनहीन (को०)। ५. असंगत (को०)।

व्यर्थ (२)
क्रि० वि० बिना किसी मतलब के। फजूल। यों ही। जैसे,— वह दिन भर व्यर्थ घूमा करता है।

व्यर्थक
वि० [सं०] व्यर्थ। निष्फल [को०]।

व्यर्थता
संज्ञा स्त्री० [सं०] व्यर्थ होने का भाव।

व्यर्थनामक
वि० [सं०] दे० 'व्यर्थनामा' [को०]।

व्यर्थनामा
वि० [सं० व्यर्थनामन्] जिसमें नाम के अनुरूप गुण न हो। जिसका नाम व्यर्थ हो [को०]।

व्यर्थयत्न
वि० [सं०] जिसके लिये प्रयत्न बेकार हो [को०]।

व्यलीक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह अपराध जो काम के आवेग के कारण किया जाय। अपराध। कसूर। ३. डाँट डपट। फटकार। ४. दुःख। कष्ट। तकलीफ। ५. पीठमर्द्द। विट। ६. विलक्षणता। अद्भूतता। ७. कपट। छल। उ०—भोर भयो जागहु रघुनंदन। गत व्यलीक भगतनि उर चंदन।—तुलसी (शब्द०)। ८. मिथ्यापन (को०)। १. व्युत्क्रम। वैपरीत्य (को०)। १०. कोई भी अप्रिय या असुखद वस्तु (को०)। ११. कामुक। रसिक नागर (को०)। १२. वह जो अप्राकृतिक मैथुन कराए। लौंडा (को०)। १३. दोष। पाप (को०)।

व्यलीक (२)
वि० १. जो अच्छा न हो। अप्रिय। २. दुःख देनेवाला। कष्टदायक। ३. बिना जान पहिचान का। अपरिचित। ४. विलक्षण। अद्भुत। अजीब। ५. मिथ्या। झूठा। असत्य (को०)। ६. जो असत्य या अलीक न हो (को०)। ७. अकरणीय (को०)।

व्यलीक निःश्वास
संज्ञा पुं० [सं०] शोक का उच्छावास। लंबी साँस [को०]।

व्यवकलन
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक अंक या रकम में से दूसरा अंक या रकम घटाना। बाकी निकालना। २. अलग करना। पृथक्ता। अलगाव (को०)।

व्यवकलित (१)
वि० [सं०] १. घटाया हुआ। बाकी निकाला हुआ। २. पृथक् किया हुआ। वियोजित [को०]।

व्यवकलित (२)
संज्ञा पुं० दे० 'व्यवकलन' [को०]।

व्यवकिरणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] घालमेल। मिश्रण [को०]।

व्यवकीर्ण
वि० [सं०] १. अलग किया हुआ। निकाला हुआ। जुदा किया हुआ। फैलाया हुआ। २. मिश्रित। पूरित। भरा हुआ [को०]।

व्यवक्रोशन
संज्ञा पुं० [सं०] १. निंदा। २. कहासुनी। गालीगलौज। तू तू मैं मै [को०]।

व्यवगाढ़
वि० [सं० व्यवगाढ़] डूबा हुआ। निमज्जित। निमग्न [को०]।

व्यवगृहीत
वि० [सं०] नम्रीकृत। विनत किया हुआ। झुकाया या नीचा किया हुआ [को०]।

व्यवच्छिन्न
वि० [सं०] १. अलग अलग। जुदा। २. विभाग करके अलग किया हुआ। विभक्त। ३. निर्धारण किया हुआ। निर्धारित। निश्चित। ४. अवरुद्ध। वाधित (को०)। ५. विशेषित। विशिष्ट। अंकित (को०)।

व्यवच्छेद
संज्ञा पुं० [सं०] १. पृथक्ता। पार्थक्य। अलगाव। २. विभाग। खंड। हिस्सा। ३. विराम। ठहरना। ४. निवृत्ति। छुटकारा। उ०—अपने को समझना चाहती हुँ, इससे अपना ही व्यवच्छेद करती चलूँगी।—सुखदा, पृ० १३। ५. (वाण आदि) छोड़ना। चलाना। नंखना (को०)। ६. नाश (को०)। ७. निर्धारण। निश्चयन (को०)। ८. ग्रंथादि का अध्याय, खंड या विभाग (को०)। ९. विशेष निर्देश। विशिष्टता निर्दै- शन (को०)। १०. (शब आदि का) काटना। चीरफाड़। अंग छेदन (को०)। ११. विशिष्टता। वैशिष्टय (को०)।

व्यवच्छेदक
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो व्यवच्छेद या अलग करता हो।

व्यच्छेदविद्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] शरीर विज्ञान। शरीर-रचना- विज्ञान [को०]।

व्यवदात
वि० [सं०] स्वच्छ। अवदात। निर्मल [को०]।

व्यवदान
संज्ञा पुं० [सं०] किसी पदार्थ को शुद्ध और साफ करने की क्रिया। संस्कार। सफाई।

व्यवदीर्ण
वि० [सं०] १. विदीर्ण। टुकड़े टुकड़े किया हुआ। छिन्न भिन्न। २. व्यग्र। विह्वल। विक्षिप्त। भ्रांत [को०]।

व्यवधा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. व्यवधान। परदा। २. वह जो बीच में आ पड़े (को०)। ३. छिपाव। गोपन। दुराव (को०)।

व्यवधाता
वि० [सं० व्यवधातृ] १. व्यवधान उपस्थित करनेवाला। २. अलग करनेवाला [को०]।

व्यवधान
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह चीज जो बीच में पड़कर आड़ करती हो। परदा। उ०—समाधि शरीर के व्यवधान को पार कर आत्मा से परमात्मा का संयोग कराने का साधन है।— ज्ञानदान, पृ० १७। २. भेद। विभाग। खंड। ३. विच्छेद। अलग होना। ४. खतम होना। समाप्ति। ५. बाधा (को०)। ६. अंतराल। अवकाश (को०)। ७. छिपाव। दुराव (को०)। ८. ढकना। आवरण (को०)। ९. व्याकरण में किसी मात्रा या अक्षर का बीच में आ पड़ना (को०)।

व्यवधायक
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो आड़ में जाता हो। छिपनेवाला। गायब होनेवाला। २. वह जो किसी को ढकता या छिपाता हो। आड़ करने या छिपानेवाला। ३. वह जो मध्य में स्थित हो। मध्यवर्ती।

व्यवधारण
संज्ञा पुं० [सं०] अच्छी तरह अवधारण या निश्चय करना।

व्यवधि
संज्ञा पुं० [सं०] व्यवधान। परदा। आड़। ओट।

व्यवधूत
वि० [सं०] वीतराग [को०]।

व्यवभासित
वि० [सं०] प्रकाशित किया हुआ [को०]।

ब्यवलोकित
वि० [सं०] देखा हुआ। द्दश्य [को०]।

१ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ ०

व्यवशाद
संज्ञा पुं० [सं०] १. छोड़ देना। २. त्याग। ३. पीछे की ओर गिरना या हटना।

व्यवसर्ग
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी पदार्थ का विभाग करने की क्रिया। बाँट। २. मुक्ति। छुटकारा। ३. देना (को०)। ४. त्याग। परित्याग (को०)।

व्यवसाय
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह कार्य जिसके द्वारा किसी की जीविका का निर्वाह होता हो। जीविका। जैसे,—दूसरों की सेवा करना ही उसका व्यवसाय है। २. रोजगार। व्यापार। जैसे०—आजकल कपड़े का व्यवसाय कुछ मंदा है। ३. कोई कार्य आरंभ करना। ४. निश्चय। ५. प्रयत्न। उद्योग। कोशिश। ६. उद्यम। काम धंधा। ७. इच्छा। विचार। कल्पना। ८. अभिप्राय। मतलब। ९. विष्णु का एक नाम। १०. शिव का एक नाम। ११. अवस्था। परिस्थिति (को०)। १२. आचरण। १३. कौशल। कूटयुक्ति (को०)। १४. डींग। शेखी (को०)। १५. प्रथम अनुभूति (को०)। १६. धर्म के एक पुत्र का नाम जो दक्ष की एक कन्या वपुसृ से उत्पन्न हुआ था (को०)।

व्यवसायबुद्धि
वि० [सं०] पक्के इरादावाला। द्दढ़निश्चयी [को०]।

व्यवसायवर्ती
वि० [सं० व्यसायवर्तिन्] पक्के इरादे से काम करनेवाला [को०]।

व्ययसायात्मक
वि० [सं०] १. संकल्पयुक्त। निश्चयात्मक। द्दढ़। २. उत्साहयुक्त [को०]।

व्यवसायात्मिका
वि० स्त्री० [सं०] संकल्पमय। द्दढ़ [को०]।

व्यवसायात्मिकाबुद्धि
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह बुद्धि जो निश्चयात्मक या द्दढ़ हो। निश्चयात्मिका बुद्धि [को०]।

व्यवसायी (१)
संज्ञा पुं० [सं० व्यवसायिन्] १. वह जो किसी प्रकार का व्यवसाय करता हो। व्यवसाय करनेवाला। २. रोजगार करनेवाला। रोजगारी। ३. वह जो किसी कार्य का अनुष्ठान करता हो।

व्यवसायी (२)
वि० १. उत्साही। उद्यमी। परिश्रमी। २. द्दढ़ संकल्पवाला। धैर्यशाली।३. किसी कार्य में संलग्न [को०]।

व्यवसित (१)
वि० [सं०] १. जिसका अनुष्ठान किया गया हो व्यवसाय किया हुआ। २. जो कोई काम करने के लिये तैयार हो। उद्यत। तत्पर। ३. जो निश्चय किया जा चुका हो। निश्चित। ५. धैर्यवान्। ६. ठगा हुआ। वंचित (को०)। ७. उत्तरदायित्व लेनेवाला (को०)।

व्यवसित (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. निश्चय। निर्धारण। २. छल। वंचना [को०]।

व्यवसिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. व्यवसाय। रोजगार। २. संकल्प। निश्चय (को०)। ३. प्रयास। प्रयत्न। उद्यम (को०)।

व्यवस्तक
संज्ञा पुं० [सं०] किसी उक्ति या रचना के क्रम को बदल देना। उ०—किसी अन्य कवि की उक्ती के पहले और पीछे आनेवाले क्रम को बदलकर ग्रहण करना व्यवस्तक है।—संपूर्णा०, अभि० ग्रं०, पृ० २६३।

व्यवस्था
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. किसी कार्य का वह विधान जो शास्त्रों आदि के द्वारा निश्चित या निर्धारित हुआ हो। मुहा०—व्यवस्था देना = पिंडितों आदि का यह बतलाना कि अमुक विषय में शास्त्रों का क्या मत अथवा आज्ञा है। किसी विषय में शास्त्रों का विधान बतलाना। २. चीजों को अलग अलग सजाकर या ठिकाने से रखना। ३. प्रबंध। इंतजाम। जैसे,—विवाह की सब व्यवस्था अपने ही हाथ में है। ४. स्थिर होने का भाव। स्थिरता। स्थिति। ५. कानून। जैसे—भारत सराकार के व्यवस्था सदस्य। ६. द्दढ़ता। द्दढ़ आधार (को०)। ७. सहमति (को०)। ८. अवस्था। दशा (को०)। ९. संबंध। स्थिति (को०)। १०. पृथक्ता। अलगाव (को०)। ११. निश्चित सीमा (को०)। १२. अध्यवसाय (को०)। १३. शर्त (को०)।

व्यवस्थाता
संज्ञा पुं० [सं० व्यवस्थातृ] १. वह जो व्यवस्था करता हो। व्यवस्था या इंतजाम करनेवाला। २. निश्चय करनेवाला। वह जो किसी व्यवस्था का निश्चय करे। ३. वह जो यह बतलाता हो कि अमुक विषय में शास्त्रों की क्या आज्ञा है। शास्त्रीय व्यवस्था देनेवाला।

व्यवस्थान
संज्ञा पुं० [सं०] १. उपस्थिति या अस्थिर होना। व्यवस्थिति। २. व्यवस्था। इंतजाम। प्रबंध। ३. विष्णु का एक नाम। ४. विधान (को०)। ५. द्दढ़ता (को०)। ६. अध्यवसाय (को०)। ७. पार्थक्य (को०)। ७. अवस्था (को०)।

व्यवस्थानप्रज्ञाप्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] बौद्धों के अनुसार एक बहुत बड़ी संख्या का नाम।

व्यवस्थापक
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो यह बतलाता हो कि अमुक विषय में शास्त्रों का क्या मत है। व्यवस्था देनेवाला। २. वह जो किसी कार्य आदि को नियमपूर्वक चलाता हो। ३. वह जो व्यवस्था या इंतजाम करता हो। प्रबंधकर्ता। इंतजामकर। मैनेजर (आधुनिक प्रयोग)। ४. व्यवस्थापिका सभा का सदस्य (को०)। ५. निश्चय करनेवाला (को०)।

व्यवस्थापक मंडल
संज्ञा पुं० [सं०] वह समाज या समूह जिसे कानून कायदे बनाने और रद्द करने का अधिकार प्राप्त हो।

व्यवस्थापक सभा
संज्ञा स्त्री० [सं०] विधान सभा। व्यवस्थापिका सभा। उ०—स्वयं, राज्य करने को अचांनक प्रस्तुत हो गई थी, या व्यवस्थापक सभाओं को तोड़ स्वयं, व्यवस्था करने को उठ खड़ी हुई थी।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० २७०।

व्यवस्थापत्र
संज्ञा पुं० [सं०] वह पत्र जिसमें किसी विषय की शास्त्रीय व्यवस्था या यह विधान लिखा हो कि अमुक विषय में शास्त्र की क्या आज्ञा या मत है।

व्यवस्थापन
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी विषय में शास्त्रीय व्यवस्था देना या बतलाना। यह बतलाना कि अमुक विषय में शास्त्रों को क्या आज्ञा अथवा मत है। २. किसी विषय में कुछ निश्चय, निर्धारण या निरूपण करना।

व्यवस्थापनीय
वि० [सं०] व्यवस्थापन करने के योग्य।

व्यवस्थापिका परिषद्
संज्ञा स्त्री० [सं०] अंग्रेजी शासनकाल की वह सभा या परिषद् जिसमें देश के लिये कानून कायदे आदि बनते थे। देश के लिये कानुन कायदे बनानेवाली सभा। बड़ी व्यवस्थापिका सभा। (अं०) 'लेजिस्लेटिव एसेंबली', 'लोअर चेंबर,'लोअर हाउस'। विशेष—ब्रिटिश भारत भर के लिये कानुन कायदे बनानेवाली सभा व्यवस्थापिका परिषद् या लेजिस्लेटिव कहलाती थी। इसके सदस्यों की संख्या १४३ होती थी, जिनमें से १०३ लोक निर्वाचित और ४० सरकार द्वारा मनोनीत (२४ सरकारी और १५ गैर सरकारी) सदस्य होते थे।

व्यवस्थापिका सभा
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह सभा जिसमें किसी प्रदेश- विशेष के लिये कानुन कायदे आदि बनते थे। कानुन कायदे बनानेवाली सभा। लेजिस्लेटिव कौंसिल।

व्यवस्थापित
वि० [सं०] १. जिसके संबंध में कुछ निश्चय या निरूपण किया गया हो। व्यवस्था किया हुआ। जो नियमपूर्वक लगाया, रखा या किया गया हो। ३. जो नियम के अनुसार हो। नियमित।

व्यवस्थाप्य
वि० [सं०] जो व्यवस्थापन करने के योग्य हो।

व्यवस्थावादी
वि० [सं० व्यवस्थावादिन्] व्यवस्था को माननेवाला। मर्यादावादी। उ०—तुलसी यदि ओर व्यवस्थावादी थे तो वह प्रेम को सारे नियमों के, समूची व्यवस्था के, ऊपर क्यों मानते हैं।—आचार्य०, पृ० १०६।

व्यवस्थित
वि० [सं०] १. जिसमें किसी प्रकार की व्यवस्था या नियम हो। जो ठीक नियम के अनुसार हो। कायदे का। जैसे,—वे सभी काम व्यवस्थित रूप से किया करते हैं। २. व्यूहबद्ध (को०)। ३. स्थिर (को०)। ४. अलग या एक ओर रखा हुआ। (को०)। ५. (रस आदि) निकाला हुआ (को०)। ६. आधारत। अवलबित (को०)।

व्यवस्थित विभाषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] व्याकरण शास्त्र के अनुसार निश्चित विकल्प [को०]।

व्यवस्थित विषय
वि० [सं०] सीमित क्षेत्रवाला [को०]।

व्यवस्थिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. उपस्थित या स्थिर होना। व्यवस्था। इंतजाम। ३. दे० व्यवस्थान (को०)।

व्यवहरण
संज्ञा पुं० [सं०] अभियोगों आदि का नियमानुसार विचार। मुकदमे की सुनाई या पेशी। व्यवहार।

व्यवहर्ता
संज्ञा पुं० [सं० व्यवहर्तृ] वह जो व्यवहार शास्त्र के अनुसार किसी अभियोग आदि का विचार करता हो। न्यायकर्ता।

व्यवहार
संज्ञा पुं० [सं०] १. क्रिया। कार्य। काम। २. आपस में एक दूसरे के साथ बरतना। बरताव। जैसे,—हमारा उनका इस तरह का व्यवहार नहीं है। ३. व्यापार। रोजगार।४. लेनदेन का काम। महाजनी। ५. झगड़ा। विवाद। ६. न्याय। ७. शर्त। पण। ८. स्थिति। ९. दो पक्षों में होनेवाला वह झगड़ा जिसका फैसला अदालत से हो। मुकदमा। १०. प्रयोग (को०)। ११. आचरण (को०)। १२. रीति। प्रथा। रिवाज (को०)। १३. पेशा। धंधा (को०)। १४. संबंध। मेलजोल (को०)। १५. कामधाम सम्हालने की योग्यता (को०)। १६. पद (को०)। १७. तलवार। खड्ग (को०)। १८. अभियोग या मामले की छानबीन (को०)। १९. दंड (को०)। २०. एक वृक्ष (को०)।

व्यवहारक
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जिसको जीविका व्यवहार से चलती हो। वह जो न्याय या वकालत आदि करता हो। २. वह जो वयस्क हो ग्या हो। बालिग।

व्यवहरजीवी
संज्ञा पुं० [सं० व्यवहारजीविन्] वह जो व्यवहार या वकालत आदि के द्वारा अपनी जीविका चलाता हो।

व्यवहारज्ञ
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो व्यवहार शास्त्र का ज्ञाता हो। २. व्यवहार या तौर तरीका जाननेवाला। ३. वह जो पूर्ण वयस्क हो गया हो। बालिग।

व्यवहार तंत्र
संज्ञा पुं० [सं० व्यवहार तन्त्र] आचार शास्त्र [को०]।

व्यवहारत्व
संज्ञा पुं० [सं०] व्यवहार का भाव या धर्म।

व्यवहारदर्शन
संज्ञा पुं० [सं०] किसी अभियोग में न्याय और अन्याय अथवा सत्य और मिथ्या का निर्णय करना।

व्यवहारद्रष्टा
संज्ञा पुं० [सं० व्यवहारद्रष्ट] न्यायाधीश [को०]।

व्यवहारपद
संज्ञा पुं० [सं०] विवाद का विषय। मुकदमे का मामला।

व्ववहारपाद
संज्ञा पुं० [सं०] १. व्यवहार के पूर्वपक्ष, उत्तर, क्रिया- पाद और निर्णय इन चारों का समूह। २. इन चारों में से कोई एक जो व्यवहार का एक पाद या अंश माना जाता है।

व्यवहारप्राप्त
वि० [सं०] बालिग। वयस्क [को०]।

व्यवहारमातृका
संज्ञा स्त्री० [सं०] वे क्रियाएँ जिनका व्यवहार में उपयोग होता है। व्यवहार शास्त्र के अनुसार होनेवाली कारर- वाइयाँ। जैसे,—मुकदमा दायर होना, पेश होना, गवाहों का बुलाया जाना, उनकी गवाही होना, जिरह और बहस होना, फैसला होना आदि। मिताक्षरा के अनुसार ऐसी क्रयाएँ संख्या में तीस हैं।

व्यवहारमार्ग
संज्ञा पुं० [सं०] मुकदमे का विषय।

व्यवहारमूल
संज्ञा पुं० [सं०] अकरकरा। अकरकरहा।

व्यवहार लक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] व्यवहार या मुकदमे की जाँच विषयक विशेषता [को०]।

व्यवहार विधि
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह शास्त्र जिसमें व्यवहार संबंधी बातों का उल्लेख हो। वह शास्त्र जिसमें व्यवहार या मुकदमों आदि का विधान हो। धर्मशास्त्र।

व्यवहार विषय
संज्ञा पुं० [सं०] मुकदमे की कार्यवाही का क्रम [को०]।

व्यवहारशास्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] वह शास्त्र जिसमें यह बतलाया गया हो कि वादी और प्रतिवादी के विवाद का किस प्रकार निर्णय करना चाहिए, अभियोग किस प्रकार सुनना चहिए और किस अपराध के लिये कितना दंड देना चाहिए। धर्मशास्त्र।

व्यवहारसंहिता
संज्ञा स्त्री० [सं० यौ०] व्यवहार संबंधी विधान।

व्यवहारसिद्धि
संज्ञा स्त्री० [सं०] व्यवहारशास्त्र के अनुसार अभि- योगों का निर्णय करना।

व्यवहारस्थान
संज्ञा पुं० [सं०] १. व्यवहार का विषय या पद। २. कौटिल्य अर्थाशास्त्र के अनुसार लेन देन, इकरारनामे आदि के संबंध में यह निर्णय कि वे उचेत रूप में हुए हैं या नहीं। विशेष—चंद्रगुप्त के समय में तीन धर्मस्थ और तीन अमात्य व्यव- हारों की निगरानी करते थे।

व्यवहारस्थिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] व्यवहार या मुकदमे से संबद्ध कार्य- वाही [को०]।

व्यवहारांग
संज्ञा पुं० [सं० व्यवहाराङ्ग] दीवानी और फौजदारी के कानुन [को०]।

व्यवहाराभिशस्त
वि० [सं०] प्रतिवादी। जिसके विरुद्ध मुकदमा चलाया गया हो [को०]।

व्यवहारार्थी
संज्ञा पुं० [सं० व्यवहारार्थिन] वादी। वह जो मुकदमा चलाए [को०]।

व्यवहारासन
संज्ञा पुं० [सं०] वह आसन जिसपर अभियोगों का विचार करते समय विचार करनेवाला बैठता है। विचारासन। न्यायासन।

व्यवहारास्पद
संज्ञा पुं० [सं०] वह निवेदन जो वादी अपनी अभि- योग के संबंध में राजा अथवा न्यायकर्ता के संमुख करता हो। नालिश। फरियाद।

व्यवहारिक
वि० [सं०] १. जो व्यवहार के लिये उपयुक्त या ठीक हो। व्यवहार योग्य। २. इंगुदी। हिंगोट। ३. कानून, विधान या व्यवसाय संबंधी। ४. मुकदमा लड़नेवाला (को०)। ५. व्यापार में लगा हुआ (को०)।

व्यवहारिकजीव
संज्ञा पुं० [सं०] वेदांत के अनुसार विज्ञानमय कोष जो ज्ञानेंद्रिय के साथ बुद्धि के संयुक्त होने से होता है।

व्यवहारिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. संसार में रहकर उसके सब व्यवहार या कार्य करना। २. इंगुदी का पेड़। ३. झाड़ू।

व्यवहारी
संज्ञा पुं० [सं० व्यवहारिन्] १. व्यवहार या वाद करनेवाला। २. वह जो व्यवहार व्यापार में लगा हुआ हो (को०)। ३. व्यवहार में प्रयुक्त (को०)।

व्यवहार्य (१)
वि० [सं०] १. जो व्यवहार करने के योग्य हो। २. काम में लाने लायक। ३. करणीय (को०)। ४. जो मुकदमे या वाद में लाया जा सके (को०)।

व्यवहार्य (२)
संज्ञा पुं० निधि। खजाना [को०]।

व्यवहित
वि० [सं०] १. जिसके आगे किसी प्रकार का व्यवधान या परदा पड़ गया हो। आड़ या ओट में गया हुआ। छिपा हुआ।२. बाधित। रोका हुआ (को०)। ३. जो पृथक् किया गया हो (को०)। ४. जिसके संबंध का कोई सिलसिला न हो (को०)। ५. जो पूर्ण कर दिया गया हो (को०)। ६. अंतर- युक्त। दूर का। दूरवर्ती (को०)। ७. जिसकी उपेक्षा की गई हो। जिसे छोड़ दिया गया हो। त्यक्त (को०)। ८. विरोध या शत्रुता करनेवाला (को०)। ९. जिसे नीचा दिखाया गया हो (को०)।

व्यवहृत (१)
वि० [सं०] १. जिसका आचरण या अनुष्ठान किया गया हो। २. जिसका व्यवहार शास्त्र के अनुसार विचार किया गया हो। ३. जो काम में लाया गया हो।

व्यवहृत (२)
संज्ञा पुं० १. व्यवहार। व्यापार। २. संपर्क। संबंध। लगाव [को०]।

व्यवहृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह लाभ जो व्यापार में होता है। रोजगार में होनेवाला नफा। २. वाणिज्य। व्यापार। रोज- गार। कुशलता। होशियारी। ४. वाद। व्यवहार (को०)। ५. बात। चर्चा। ६. क्रिया। चेष्टित। प्रवृत्ति (को०)।

व्यवाय
संज्ञा पुं० [सं०] १. तेज। प्रकाश। २. स्त्रीप्रसग। संभोग। मैथुन। ३. शुद्धि। ४. परिणाम। फल। नतीजा। ५. आड़। ओट। परदा। ६. विघ्न। वाधा। खलल। ७. अलगाव। पृथक्ता (को०)। ८. परिव्याप्ति। प्रवेशन (को०)। ९. अवकाश। अंतराल (को०)। १०. विलयन। लोप (को०)। ११. परिवर्तन (को०)। १२. बेवाई । चर्मविश्लेष से पैर फटना।

व्यवायशोष
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का राजयक्ष्मा या तपेदिक जो बहुत अधिक स्त्रीप्रसंग करने से होता है।

व्यवायी
संज्ञा पुं० [सं० व्यवायिन्] १. वह जिसे स्त्रीप्रसंग की बहुत अधिक कामना रहती हो। कामुक। २. वह जो बीच में किसी प्रकार का व्यवधान या परदा करता हो। आड़ या रोक करनेवाला। ३. वह ओषधि जो शरीर में पहुँचकर पहले सब नाड़ियों में फैल जाय और तब पचे। जैसे,—भाँग या अफीम। उ०—जो औषध पहले संपूर्ण शरीर में व्याप्त हो पोछे मदिरा के विष के समान पाक को प्राप्त होवे जिसको व्यवायी कहते हैं।—शाङ् र्गधर०, पृ० ४०। ४. कामोद्दीपक औषध (को०)। ५. जो विघटित या विगलित हो (को०)।

व्यवेत
वि० [सं०] १. पृथक्कृत। अलग किया हुआ। २. भिन्न [को०]।

व्यशन
वि० [सं०] जो विना अशन के हो। भोजन त्यागनेवाला [को०]।

व्यश्च
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्राचीन ऋषि का नाम जो ऋग्वेद के कई मंत्रों के द्रष्टा थे। २. एक प्राचीन राजा का नाम जिसका उल्लेख महाभारत में है।

व्यष्टक
संज्ञा पुं० [सं०] राई। काली छोटी सरसों [को०]।

व्यष्टका
संज्ञा स्त्री० [सं०] कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा।

व्यष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. समूह या समाज में से अलग किया हुआ प्रत्येक व्यक्ति या पदार्थ। वह जिसका विचार अकेले हो, औरों के साथ न हो। समष्टि का एक विशिष्ट और पृथक् अंश। समष्टि का उलटा। २. व्यापकता का अभाव। अव्यापकता (को०)। ३. प्राप्ति (को०)। ४. सफलता।

व्यष्टिवाद
संज्ञा पुं० [सं०] वह सिद्धांत जिसमें व्यक्ति की स्वतंत्र सत्ता तथा उसके अधिकार को मान्यता दी जाती है।

व्यष्ठ
संज्ञा पुं० [सं०] ताँबा [को०]।

व्यसन
संज्ञा पुं० [सं०] १. विपत्ति। आफत। २. दुःख। कष्ट। तकलीफ। ३. पतन। गिरना। ४. विनाश। नष्ट होना। ५. कोई बुरी या अमंगल बात। वह प्रयत्न जिसका कोई फल न हो। ६. व्यर्थ का उद्योग। ७. विषय वासना के प्रति होनेवाला अनुराग। विषयों के प्रति आसक्ति। ८. दुर्भाग्य। बदकिस्मती। ९. अयोग्य या असमर्थ होने का भाव। १०. वह दोष जो काम या क्रोध आदि विकारों से उत्पन्न हुआ हो। जैसे,—शिकार, जूआ, स्त्रीप्रसंग, नृत्य आदि देखना और गीत आदि सुनना। विशेष—मनु ने व्यसनों की संख्या १८ बतलाई है और उनमें से १० व्यसन कामज तथा ८ क्रोधज कहे हैं। मनु को यह भी आज्ञा है कि राजा को इन सब प्रकार के व्यसनों से बचना चाहिए। ११. किसी प्रकार का शौक। किसी विषय के प्रति विशेष रुचि या प्रवृत्ति। जैसे—उन्हें केवल लिखने पढ़ने का व्यसन है। १२. दूर करना। फेंकना (को०)। १३. विभाजन। पृथक्करण (को०)। १४. सूर्य का अस्त होना या नीचे जाना (को०)। १५. दंड (को०)। १६. वायु। हवा (को०)। १७. एकता। व्यष्टि (को०)। १८. कदाचार। दुराचार। पाप (को०)। १९. उल्लंधन। अतिक्रमण (को०)।

व्यसनकाल
संज्ञा पुं० [सं०] विपात का समय। दुर्दिन [को०]।

व्यसनपीड़ित
वि० [सं० व्यसनपीडित] व्यसन से आर्त। विपद् ग्रस्त।

व्यसनप्रहारी
वि० [सं० व्यसनप्रहारिन्] १. शत्रु के दुर्बल पक्ष पर प्रहार करनेवाला। २. कष्टदायक। दुःखद [को०]।

व्यसनप्रासि
संज्ञा स्त्री० [सं०] दुर्दिन आना। बुरे दिन आना। विपत्ति का आगमन [को०]।

व्यसनब्रह्मचारी
संज्ञा पुं० [सं० व्यसनब्रह्मचारिन्] साथ साथ समान रूप से कष्ट उठानेवाला। वह जो व्यसन या विपत्ति के दिनों का साथी हो [को०]।

व्यसनमहार्णव
संज्ञा पुं० [सं०] दुःखसागर [को०]।

व्यसनरक्षी
संज्ञा पुं० [सं० व्यसनरक्षिन्] विपत्ति से बचानेवाला। वह जो कष्टों से त्राण करे [को०]।

व्यसनवर्ग
संज्ञा पुं० [सं०] विपत्तिपुंज। दुःखों का समूह [को०]।

व्यसनवागुरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दुःख का बंधन। व्यसनों का जाल [को०]।

व्यसनसंस्थित
वि० [सं०] व्यसनों में लिप्त रहनेवाला [को०]।

व्यसनातिक्रांत
वि० [सं० व्यसनातिक्रान्त] विपद् ग्रस्त [को०]।

व्यसनातिभार
संज्ञा पुं० [सं०] १. भयंकर विपत्ति या बड़ी आफत। २. वह जो संकट से ग्रस्त हो [को०]।

व्यसनात्यय
संज्ञा पुं० [सं०] व्यसन वा विपत्ति का दूर होना [को०]।

व्यसनान्वित, व्यसनाप्लुत
वि० [सं०] विपत्तिग्रस्त। व्यसनयुक्त [को०]।

व्यसनार्त्त
वि० [सं०] जिसे किसी प्रकार को दैवी या मानुषी पीड़ा पहुँची हो।

व्यसनिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] व्यसनी होने का भाव या धर्म। व्यसनित्व।

व्यसनित्व
संज्ञा पुं० [सं०] व्यसनिता। व्यसनी होने का भाव।

व्यसनी (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जिसे किसी प्रकार का व्यसन या शौक हो। २. वेश्यागामी। रंडीबाज।

व्यसनी (२)
वि० १. विषयासक्त। लंपट। २. दुर्व्यसनग्रस्त। दुश्चरित्र। ३. किसी कार्य में अत्यंत संलग्न।४. अभागा। भाग्यहीन (को०)।

व्यसनोत्सव
संज्ञा पुं० [सं०] मधुपान का उत्सव [को०]।

व्यसनोदय
संज्ञा पुं० [सं०] १. विपत्ति का आना। २. अस्तोदय [को०]।

व्यसि
वि० [सं०] असिविहीन, तलवार से रहित [को०]।

व्यसु
वि० [सं०] मृत। जीवनरहित [को०]।

व्यस्त
वि० [सं०] १. घबराया हुआ। व्याकुल। २. काम में लगा या फँपा हुआ। उ०—व्यस्त रहेंगे, हम सबको भी मानो विवश बिसारेंगे।—पंचवटी, पृ० ७। ३. फैला या छाया हुआ। व्याप्त। ४. फेंका हुआ। ५. इधर उधर, आगे पीछे या ऊपर नीचे किया हुआ। तितर बितर किया हुआ। विपर्यस्त। क्रमहीन। ६. हर एक। अलग अलग। पृथक् (व्याकरण)। ७. वियुक्त। विभक्त। अलगाया हुआ (को०)। ८. सरल। समास रहित (को०)। ९. बहुत प्रकार का। बहुविध (को०)। १०. उलझा हुआ (को०)। ११. परिवर्तित (को०)। १२. विभिन्न (को०)।

व्यस्तक
वि० [सं०] जिसमें हड्डी न हो। बिना हड्डी का।

व्यस्तकेश
वि० [सं०] बिखरे हुए बालोंवाला [को०]।

व्यस्तन्यास
वि० [सं०] अस्तव्यस्त। सिकुड़ा हुआ (वस्त्रादि)। २. ऊबड़खाबड़। असमतल [को०]।

व्यस्तपद
संज्ञा पुं० [सं०] १. व्यवहारशास्त्र में नालिश होने पर ऋण न चुकाना, बल्कि कुछ उज्र करना। २. न्यायालय में दिया गया अव्यवस्थित बयान। ३. व्याकरण में वह पद जो समासरहित हो (को०)।

व्यस्तवृत्ति
वि० [सं०] १. बहुधधो। जो भो वृत्ति मिले उसे स्वीकार करनेवाला २. जिसका मूल अर्थ बदला हुआ हो। [को०]।

व्यस्तार
संज्ञा पुं० [सं०] हाथी के मस्तक से मद चूना। मदस्राव [को०]।

व्यस्थक
वि० [सं०] अस्थिहीन [को०]।

व्यह्व
संज्ञा पुं० [सं०] कल का बीता हुआ दिन।

व्याकरण
संज्ञा पुं० [सं०] वह विद्या या शास्त्र जिसमें किसी भाषा के शब्दों के शुद्ध रूपों और वाक्यों के प्रयोग के नियमों आदि क निरूपण होता है। भाषा का शुद्ध प्रयोग और नियम आदि बतलानेवाला शास्त्र। विशेष—व्याकरण में वर्णों, शब्दों और वाक्यों का विचार होता है; इसीलिये इसके वर्णविचार, शब्दसाधन और वाक्यविन्यास, ये तीन मुख्य विभाग होते हैं। व्याकरण के नियम प्रायः लिखी हुई और प्रचलित भाषा के आधार पर निश्चित किए जाते है; क्योंकि बोलने में लोग प्रायः प्रयागों की शुद्धता पर उतना अधिक ध्यान नहीं रखते। व्याकरण में शब्दों के अलग भेद कर लिए जाती हैं; जैसे, क्रिया, विशेषण, सर्वनाम आदि, और तब इस बात का विचार किया जाता है कि इन शब्दभेदों का ठीक ठीक और शुद्ध प्रयोग क्या है। हमारे यहाँ व्याकरण की गणना वेदांग में को गई है। २. विग्रह। विश्लेषण (को०)। ३. ब्याख्या। स्पष्ट करना। प्रकाशन (को०)। ४. अंतर। विभेद। भेद (को०)। ५. धनुष की टंकार (को०)। ६. भविष्यकथन। अनागत कथन (को०)। ७. विस्तार (को०)।

व्याकरणक
संज्ञा पुं० [सं०] हीन कोटि का व्याकरण [को०]।

व्याकरणप्रक्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] शब्द की व्युत्पत्ति [को०]।

व्याकरणसिद्ध
वि० [सं०] व्याकरण के नियमानुसार व्युत्पन्न [को०]।

व्याकरणोत्तर
संज्ञा पुं० [सं०] शिव [को०]।

व्याकर्त्ता
संज्ञा पुं० [सं० व्याकर्तृ] १. सृष्टि की रचना करनेवाला, परमेश्वर। २. व्याख्या या विश्लेषण करनेवाला।

व्याकर्षण
संज्ञा पुं० [सं०] विशेष रूप से अपनी ओर खींचना। आकृष्ट करना [को]।

व्याकार
संज्ञा पुं० [सं०] १. विकृत वा परिवर्तित आकार। किसी पदार्थ का बिगड़ा या बदला हुआ आकार। २. व्याख्या।

व्याकर्ण
वि० [सं०] १. जो चारों ओर अच्छी तरह फैलाया गया हो। २. विकीर्ण। अस्तव्यस्त (को०)। ३. क्षुब्ध। घबड़ाया हुआ। व्याकुल (को०)।

व्याकुंचित
वि० [सं० व्याकुञ्चित] १. मुड़ा हुआ। सिमटा हुआ। २. कुटिल। टेढ़ामेढ़ा। वक्र [को०]।

व्याकुल
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो भय या दुःख के कारण इतना घबरा गया हो कि कुछ समझ न सके। बहुत घबराया हुआ। विकल। २. जिसे किसी बात की बहुत अधिक उत्कंठा या कामना हो। ३. कातर। ४. वह जो इधर उधर चलता, दमकता या हिलता डुलता हो। (को०)। ५. वह जो किसी से आवृत वा पूरित हो (को०)। यौ०—व्याकुलचित=व्याकुलचेता। व्याकुलमना। व्याकुललोचन।

व्याकुलचेता
वि० [सं० व्याकुलचेतस्] व्याकुल चित्तवाला। घबराया हुआ [को०]।

व्याकुलता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. व्याकुल होने का भाव। विकलता। घबराहट। २. कातरता।

व्याकुलमना
वि० [सं० व्याकुलमनस्] व्यग्रचित्त। उद्विग्नहृदय [को०]।

व्याकुलमूर्धज
वि० [सं०] बिखरे हुए केशोंवाला [को०]।

व्याकुललोचन
वि० [सं०] मंद दृष्टिवाला [को०]।

व्याकुलात्मा
वि० [सं० व्यकुलात्मन्] उद्विग्न। चिंताकुल [को०]।

व्याकुलित
वि० [सं०] १. व्याकुल चित्तवाला। २. डरा हुआ [को०]। यौ०—व्याकुलितचित्त, व्याकुलितमना, व्याकुलितहृदय = (१) आक्रांत। अभिभूत। (२) भयभीत। (३) घबराया हुआ।

व्याकुलितंद्रिय
वि० [सं० व्याकुलितेन्द्रिय] व्यग्रचित्त [को०]।

व्याकुलेंद्रिय
वि० [सं० व्याकुलेन्द्रिय] दे० 'व्याकुलितेंद्रिय'।

व्याकूत
संज्ञा पुं० [सं०] चिंता। खेद [को०]।

व्याकूति
संज्ञा स्त्री० [सं०] छल। धाखा। फरेब।

व्याकृत
वि० [सं०] १. विश्लिष्ट। विग्रह किया हुआ। २. व्याख्या किया हुआ। व्याख्यात। ३. अभिव्यक्त। प्रकाशित। ४. परिवर्तित। बदला हुआ। विकृत। उ०—प्राज्ञा अभिमानी जु व्याकृत तम गुण रूपा। ईश्वर तहँ देवता भोग आनंद स्वरूपा।—सुंदर० ग्रं०, भा० १, पृ० ६८।

व्याकृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रकाश में लाने का काम। २. व्याख्या करने का काम। व्याख्यान। ३. व्याकरण (को०)। ४. रूप में परिवर्तन करने का काम।

व्याकोच
वि० [सं०] प्रफुल्लित। पूर्ण विकसित [को०]।

व्याकोप
संज्ञा पुं० [सं०] विरोध। प्रत्याख्यान [को०]।

व्याकोश, व्याकोष
संज्ञा पुं० [सं०] १. विकास। २. स्फुटित होना। खिलना।

व्याक्रंन पु †
संज्ञा पुं० [सं० व्याकरण, प्रा० वागरण अप० बागरण] दे० 'व्याकरण'। उ०—त कवि आय कवि पहि संपत्ते। गुरु व्याक्रन्न कहै मन मत्ते।—पृ० रा०, ६१।४९७।

व्याक्रन्न पु
संज्ञा पुं० [सं० व्याकरण] व्याकरण विद्या या शास्त्र। उ०—व्याक्रन्न कथा नाटक्क छंद।—पृ० रा०, १।७३६।

व्याक्रोश
संज्ञा पुं० [सं०] १. कीसी का तिरस्कार करते हुए कटाक्ष करना। २. चिल्लाना। चिल्लाहट।

व्याक्रोशी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'व्याक्रोश' [को०]।

व्याक्षिप्त
वि० [सं०] १. व्याकुल। हतबुद्धि। घबड़ाया हुआ। २. फैलाया हुआ। विकीर्ण। ३. भरा हुआ। आवृत [को०]।

व्याक्षेप
संज्ञा पुं० [सं०] १. बिलंब। देर। २. आकुल होने का भाव। घबराहट। ३. अवरोध। बाधा। रुकावट। विघ्न (को०)। ४. इतस्ततः क्षपण। जैसे, कटाक्षव्याक्षेप (को०)। ५. तरस्कार। भर्त्सना (को०)।

व्याक्षेपी
वि० [सं० व्याक्षेपिन्] हटानेवाला। दूर करनेवाला [को०]।

व्याक्षोभ
संज्ञा पुं० [सं०] क्षोभ। अशांति। मानसिक विक्षोभ [को०]।

व्याख्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह वाक्य आदि जो किसी जटिल पद या वाक्य आदि का अर्थ स्पष्ट करता हो। किसी बात को समझाने के लिये किया हुआ उसका विस्तृत और स्पष्ट अर्थ। टीका। व्याख्यान। विशेष—शास्त्रों या सूत्रों आदि की जो व्याख्या होती है, उसके वृत्ति, भाष्य, वार्तिक, टीका, टिप्पणी आदि अनेक भेद माने गए हैं। २. वह ग्रंथ जिसमें इस प्रकार अर्थविस्तार किया गाया हो। ३. कहना। वर्णन।

व्याख्यागम्य (१)
संज्ञा पुं० [सं०] व्यवहार शास्त्र के अनुसार वादी के अभियोग का ठीक ठीक उत्तर न देकर इधर उधर की बातें कहना।

व्याख्यागम्य (२)
वि० जो व्याख्या अथवा टीका आदि की सहायता से समझा जा सके।

व्याख्यात
वि० [सं०] १. जिसकी व्याख्या की गई हो। २. कथित। वर्णित (को०)। ३. आक्रांत। अभिभूत। आकुल (को०)। ४. पराजित। वशीकृत (को०)।

व्याख्यातव्य
वि० [सं०] जो व्याख्या करने के योग्य हो या जिसकी व्याख्या की गई हो।

व्याख्याता
संज्ञा पुं० [सं० व्याख्यातृ] १. वह जो किसी विषय की व्याख्या करता हो। व्याख्या करनेवाला। २. वह जो व्याख्यान देता हो। भाषण करनेवाला।

व्याख्यात्मक
वि० [सं०] व्याख्या विषयक। जिसमें मूल विषय को व्याख्या की गई हो। उ०—रचनात्मक और व्याख्यात्मक आलोचनाओं के प्रतिपादन में भी जो दूसरे और तीसरे प्रकरणों के विषय है, मैं बराबर उनकी तुलना निर्णयात्मक आलोचना से करता रहा हूँ।—पा० सा० सि०, पृ० ४।

व्याख्यान
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी विषय की व्याख्या या टीका करने अथवा विवरण बतलाने का काम। २. बोलकर कोई विषय समझाने का काम। भाषण। ३. वह जो कुछ व्याख्या रूप में या समझाने के लिये कहा जाय। भाषण। वक्तृता।

व्याख्यानशाला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह स्थान जहाँ किसी प्रकार का व्याख्यान आदि होता है। २. स्कूल या विद्यालय जहाँ विषय की व्याख्या करके समझाया जाता है (को०)।

व्याख्यास्थान
संज्ञा पुं० [सं०]दे० 'व्याख्यानशाला'।

व्याख्यास्वर
संज्ञा पुं० [सं०] वह स्वर जो न बहुत ऊँचा हो और न बहुत नीता। मध्यम स्वर।

व्याख्येय
वि० [सं०] जो व्याख्या करने के योग्य हो। वर्णन करने या संमझाने लायक।

व्याघट्टन
संज्ञा पुं० [सं०] १. अच्छी तरह रगड़ने का काम। संघर्षण। रगड़। २. मथना। बिलोना।

व्याघात
संज्ञा पुं० [सं०] १. विघ्न। खलबल। बाधा। क्रि० प्र०—पड़ना।—होना।२. आघात। प्रहार। मार। ३. ज्योतिष के विष्कंभ आदि सत्ता- इस योगों में से तेरहवाँ योग जिसमें किसी प्रकार का शुभ कार्य करना वर्जित है। विशेष—कुछ लोगों का मत है कि इसके पहले छहू दंड़ों को छोड़कर शेष समय में शुभ काम किए जा सकते हैं। कहते हैं, इस योग में जो बालक जन्म ग्रहण करता है, वह साधुओं के काम में विघ्न करनेवाला, कठोर, झूठा और निर्दय होता है। ४. काव्य में एक प्रकार का अलंकार जिसमें एक ही उपाय के द्वारा अथवा एक ही साधन के द्वारा दो विरोधी कार्यो के होने का वर्णन हाता है। उ०—(क) जासा काटत जगत के बंधन दीन दयाल। ता। चितवान सों तियन के मन बाँधे गोपाल। (ख) नाम प्रभाव जान शिव नीके। काककूट फल दीन अमी क। (ग) रण से हूबे को अमर भागत कादर कूर। यहै चाह चित करि नहीं बिचलत साचे सूर। (घ) मिलत एक दारुन दूख देहीं। बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। ५. विप्रतिषेध। वचनाविरोध। ६. विरोधी आचरण (को०)। ७. पराजय। हार (को०)। ८. क्षोभ (को०)।

व्याघातक
वि० [सं०] १. बाधक। विरोधी। २. आघात या प्रहार करनेवाला [को०]।

व्याघातिम
संज्ञा पुं० [सं०] आघात से होनेवाली तात्कालिक मृत्यु [को०]।

व्याघाती
वि० [सं० व्याघातिन्] दे० 'व्याघातक'।

व्याघारण
संज्ञा पुं० [सं०] छौंकना। छोंटा देना। बघारना [को०]।

व्याघारित
वि० [सं०] बघारा हुआ। तेल या घा को गरम करके उसस छौंका हुआ [को०]।

व्याघुटन
संज्ञा पुं० [सं०] परावर्तन। लौटना। वापस होना [को०]।

व्याघ्रुष्ट
वि० [सं०] ध्वनित। गूँजता हुआ। शाब्दत [को०]।

व्याघूर्णित
वि० [सं०] १. चक्कर खाया हुआ। २. गिरा हुआ [को०]।

व्याघ्र (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. बाघ या शेर नामक प्रसिद्ध हिंसक जंतु। विशेष दे० 'शेर'। २. लाल रेंड़। ३. करंज। ४. एक राक्षस का नाम (को०)।

व्याघ्र (२)
वि० सर्वोत्तम। श्रेष्ठ। प्रधान। विशेष—इसका प्रयोग समासांत में ही मिलता है; जैसे, नरव्याघ्र, पुरुषव्याघ्र।

व्याघ्रकड
संज्ञा पुं० [सं०] लाल रेंड़।

व्याघ्रखडूडा
संज्ञा पुं० [सं०] वाघ या शेर का नाखून जो प्रायः बालकों के गले में उन्हें नजर लगने से बचाने के लिये पहनाया जाता है।

व्याघ्रगिरि
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणवर्णित एक पर्वत का नाम [को०]।

व्याघ्रग्रीव
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार एक प्राचीन देश का नाम। २. इस देश का निवासी।

व्याघ्रघंटा
संज्ञा स्त्री० [सं० व्याघ्रघण्टा] किंकिणी या गोविंदी नाम की लता जो कोंकण प्रदेश में अधिकता से होती है। वैद्यक के अनुसार यह पित्तवर्धक, उष्ण, रुचिकर और विष तथा कफ की नाशक मानी गई है।

व्याघ्रघंटी
संज्ञा स्त्री० [सं० व्याघ्रघण्टी] दे० 'व्याघ्रघंटा'।

व्याघ्रचर्म
संज्ञा पुं० [सं० व्याघ्रचर्मन्] बाघ या शेर की खाल जिसपर प्रायः लोग बैठते हैं, या जो शोभा के लिये कमरों आदि में लटकाई जाती है।

व्याघ्रतरु
संज्ञा पुं० [सं०] लाल रेंड़।

व्याघ्रतल
संज्ञा पुं० [सं०] १. लाल रेंड। २. नखी या व्याघ्रनख नामक गंधद्रव्य।

व्याघ्रतला
संज्ञा स्त्री० [सं०] नख या व्याघ्रनख नामक गधद्रव्य। बगनहा।

व्याघ्रता
संज्ञा स्त्री० [सं०] व्याघ्र का भाव या धर्म।

व्याघ्रदंष्ट्र
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का गुल्म।

व्याघ्रदल
संज्ञा पुं० [सं०] १. नख या व्याघ्रनख नामक गंधद्रव्य। बगनहा। २. लाल रेंड़।

व्याघ्रदला
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'व्याघ्रदल'।

व्याघ्रनख
संज्ञा पुं० [सं०] १. बाघ या शेर का नाखून जो प्रायः बच्चों के गले में उन्हें नजर से बचाने के लिये पहनाया जाता है। २. नख या बगनहा नमक प्रसिद्ध गंधद्रव्य। विशेष दे० 'नख'। ३. थूहर। ४. बाघ के नख का आघात (को०)। ५. एक प्रकार का कंद। ६. † एक प्रकार का शस्त्र। बघनख।

व्याघ्रनखक
संज्ञा पुं० [सं०] १. व्याघ्रनख। २. नाखून के द्वारा लगी हुई चोट। एक प्रकार का नखक्षत।

व्याघ्रनखी
संज्ञा स्त्री० [सं०] नख या बगनहा नामक गंधद्रव्या। विशेष दे० 'नख'।

व्याघ्रनायक
संज्ञा पुं० [सं०] गीदड़।

व्याघ्रपद
संज्ञा पुं० [सं०] बृहत्संहिता में वर्णित एक प्रकार का पेड़।

व्याघ्रपद्
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का गुल्म। २. वशिष्ठ गोत्र के एक प्राचीन ऋषि का नाम जो ऋग्वेद के कई मंत्रों के द्रष्टा थे। ३. वह जिसके पैर व्याघ्रवत् हों। व्याघ्रपाद।

व्याघ्रपाद
संज्ञा पुं० [सं०] १. विकंकत या कंटाई नामक वृक्ष। २. एक प्राचीन ऋषि का नाम।

व्याघ्रपादपी
संज्ञा स्त्री० [सं०] विकंटक। गर्जाहुल।

व्याघ्रपाद्
संज्ञा पुं० [सं०] १. विकंकत या कटाई नामक वृक्ष। २. विकंटक। गर्जाहुल। ३. एक प्राचीन ऋषि का नाम। ४. वह जिसके पैर व्याघ्र से हों (को०)।

व्याघ्रपुच्छ, व्याघ्रपुच्छक
संज्ञा पुं० [सं०] १. रेंड़। २. बाघ की पूँछ (को०)।

व्याघ्रपुष्प
संज्ञा पुं० [सं०] नख या बगनहा नामक गंधद्रव्य।

व्याघ्रपुष्पि
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्राचीन गोत्रप्रवर्तक ऋषि का नाम।

व्याघ्रभट
संज्ञा पुं० [सं०] एक राक्षस का नाम।

व्याघ्रमुख
संज्ञा पुं० [सं०] १. बिल्ली। २. पुराणानुसार एक पर्वत का नाम। ३. बृहत्संहिता के अनुसार एक देश का नाम। ४. इस देश का निवासी। ५. वास्तुशास्त्र के अनुसार एक प्रकार का मकान जो अशुभ होता है ?

व्याघ्ररूपा
संज्ञा स्त्री० [सं०] बंध्या कर्कटी। बन ककोड़ा।

व्याघ्रलोम
संज्ञा पुं० [सं० व्याघ्रलोमन्] १. ऊपरी ओंठ पर के बाल। मूँछ। २. बाध के शरीर के रोएँ (को०)।

व्याघ्रवक्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. बिल्ली। २. शिव का एक नाम। ३. शिव के एक गण। दे० 'व्याघ्रमुख'।

व्याघ्रवक्ता
संज्ञा पुं० [सं० व्याघ्रवक्तृ] दे० 'व्याघ्रास्या'।

व्याघ्रश्वा
संज्ञा पुं० [सं० व्याघ्रश्वन्] बाघ जैसा कुत्ता [को०]।

व्याघ्रसेवक
संज्ञा पुं० [सं०] श्रृगाल। गीदड़।

व्याघ्रहस्त
संज्ञा पुं० [सं०] लाल रेंड़।

व्याघ्राक्ष (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. कार्तिकेय के एक अनुचर का नाम। २. पुराणानुसार एक राक्षस का नाम।

व्याघ्राक्ष (२)
वि० वाघ जैसी आँखोंवाला [को०]।

व्याघ्राजिन
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्राचीन ऋषि का नाम।

व्याघ्राट
संज्ञा पुं० [सं०] लवा नामक पक्षी। अगिन चिड़िया। विशेष दे० 'लवा'।

व्याघ्राण
संज्ञा पुं० [सं०] सूँघने की क्रिया [को०]।

व्याघ्रादनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] निसोथ।

व्याघ्रादिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] निसोथ। त्रिवृता [को०]।

व्याघ्रायुध
संज्ञा पुं० [सं०] नख नामक गंधद्रव्य।

व्याघ्रास्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. बाध का मुख (को०)। २. वह जिसका मुँह बाघ सदृश हो। ३. बिल्ली।

व्याघ्रास्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] बौद्धों की एक देवी [को०]।

व्याघ्रिस्त्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] बौद्धों की एक देवी का नाम।

व्याघ्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कंटकारी। छोटी कँटाई। २. एक प्रकार की कौड़ी। ३. नखो नामक गंधद्रव्य। ४. बाघिन (को०)। ५. एक बौद्ध देवी। व्याघ्रिस्त्री (को०)।

व्याघ्रीयुग
संज्ञा पुं० [सं०] बृहती या बनभंटा और कंटकारी, इन दोनों का समूह।

व्याज (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. मन में कोई और बात रखकर ऊपर से कुछ और करना या कहना। कपट। छल। धोखा। यौ०—व्याजनिंदा। व्याजस्तुति। व्याजोक्ति। २. बाधा। विघ्न। खलल। ३. विलंब। देर। ४. बहाना। व्यपदेश। उ०—जब तक वह अपने कुटीर में बैठता किसी न किसी व्याज से मैं उसे देख लेती।—श्यामा०, पृ० ५६। ५. कला। कौशल (को०)। ६. युक्ति। चाल। कूट- युक्ति (को०)।

व्याज (२)
संज्ञा पुं० दे० 'ब्याज'।

व्याजउकुति पु
संज्ञा स्त्री० [सं० व्याजोक्ति] एक अलंकार। दे० 'व्याजोक्ति'। उ०—व्याज उकुति तासों कहत, भूषन सुकवि अनूप।—भूषण ग्रं०, पृ० ७०।

व्याजखेद
संज्ञा पुं० [सं०] बनावटी खिन्नता [को०]।

व्याजगुरु
संज्ञा पुं० [सं०] बनावटी गुरु [को०]।

व्याजतपोधन
संज्ञा पुं० [सं०] नकली तपस्वी [को०]।

व्याजनिंदा
संज्ञा स्त्री० [सं० व्याजनिन्दा] १. वह निंदा जो व्याज अर्थात् छल या कपट से की जाय। निंदा जो ऊपर से देखने में स्पष्ट निंदा न जान पड़े। २. एक प्रकार का शब्दालंकार जिसमें इस प्रकार निंदा की जाती है।

व्याजव्यवहार
संज्ञा पुं० [सं०] कपटपूर्ण बर्ताव [को०]।

व्याजसुप्त
वि० [सं०] सोने का बहाना बनानेवाला [को०]।

व्याजस्तुति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह स्तुति जो व्याज अथवा किसी बहाने से की जाय और ऊपर से देखने में स्तुति न जान पड़े। २. एक प्रकार का शब्दालंकार जिसमें इस प्रकार स्तुति को जाती है, वह ऊपर से देखने में निंदा सी जान पड़ती है।

व्याजहत
वि० [सं०] छल द्वारा मारा हुआ [को०]।

व्याजोह्वय
संज्ञा पुं० [सं०] बनावटी नाम [को०]।

व्याजिह्म
वि० [सं०] कुटिल। टेढ़ा [को०]।

व्याजी
संज्ञा स्त्री० [सं०] विक्री में माप या तौल के ऊपर कुछ थोड़ा सा और देना। घाल। घलुवा।

व्याजीकरण
संज्ञा पुं० [सं०] धूर्तता। चालबाजी। प्रवंचना [को०]।

व्याजोक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह कथन जिसमें किसी प्रकार का छल हो। कपटभरी बात। २. एक प्रकार का अलंकार जिसमें किसी स्पष्ट या प्रकट को छिपानी लिये किसी प्रकार का बहाना किया जाता है। छेकापहनुति से इसमें यह अंतर है कि छेकाप- हूनुति में निषेधपूर्वक बात छिपाई जाती है और इसमें बिना निषेध किए ही छिपाई जाती है। उ०—(क) भूप प्रतापभानु अवनीसा। तासु सचिव मैं सनहु मुनीसा। (ख) बहुरि गौरि कर ध्यान करेहू। भूपकिशोर देखि किन लेहु।

व्याडंब
संज्ञा पुं० [सं० व्याडम्ब] लाल रेंड़।

व्याड (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. साँप। २. बाघ। शेर। ३. इंद्र का एक नाम। ४. शिकार करनेवाला और उसका मांस खानेवाला कोई पशु। जैसे, चीता, सिंह आदि (को०)।

व्याड (२)
वि० धूर्त। वंचक। २. दुष्ट। खल। निंदा या बुराई करनेवाला।

व्याडायुध
संज्ञा पुं० [सं०] नख नामक गंध द्रव्य।

व्याडि
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्राचीन ऋषि का नाम जिन्होंने एक व्याकरण बनाया था। विशेष—ये महाभाष्यकार पतंजलि के पूर्ववर्ती महावैयाकरण थे। परंपरागत मान्यतानुसार इन्होंने 'संग्रह' नामक महाग्रंथ लिखा था जो संभवतः लक्षश्लोकात्मक था और उसमें व्याकरण के दार्शनिक पक्ष का भी विस्तृत विवेचन था। २. एक कोशकार का नाम [को०]।

व्यात्त (१)
वि० [सं०] खुला हआ या फैलाया हुआ [को०]।

व्यात्त (२)
संज्ञा पुं० फैलाया हुआ मुख [को०]।

व्यात्तानन
संज्ञा पुं० [सं०] वह जिसका मुख खुला हो [को०]।

व्यात्तास्य
वि० [सं०] दे० 'व्यात्तानन' [को०]।

व्यात्युक्षी
संज्ञा स्त्री० [सं०] जलक्रीड़ा।

व्यादन
संज्ञा पुं० [सं० व्यादान] खोलना। उ०—वदन व्यादन पूर्वक प्रेतिनी। भय प्रदर्शन थी करती महा। निकलती जिससे अविराम थी। अनल की अति त्रासकरी शिखा।—प्रिय०, पृ० २३।

व्यादान
संज्ञा पुं० [सं०] १. फैलाव। विस्तार। २. उदघाटन। खोलना।

व्यादिश
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु का एक नाम।

व्यादिष्ट
वि० [सं०] १. जिसे आदेश दिया गया हो। २. पूर्वकथित। ३. निश्चित। ४. व्याख्यात [को०]।

व्यादीर्ण
वि० [सं०] खुला या फैलाया हुआ [को०]।

व्यादीर्णास्य
संज्ञा पुं० [सं०] सिंह [को०]।

व्यादेश
संज्ञा पुं० [सं०] विशेष आज्ञा [को०]।

व्याध (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो जंगली पशुओं आदि को मारकर अपना निर्वाह करता हो। शिकारी। २. प्राचीन काल की एक जाति जो जंगली पशुओं को मारकर अपना निर्वाह करती थी। ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसर इसकी उत्पत्ति सर्वस्वी माता और क्षत्रिय पिता से है। ३. प्राचीन काल की शबर नामक नीच जाति। ४. नीच या कमीना आदमी (को०)।

व्याध (२)
वि० दुष्ट। पाजी। लुच्चा।

व्याधक
संज्ञा पुं० [सं०] शिकारी। बहेलिया [को०]।

व्याधभीत
संज्ञा पुं० [सं०] मृग। हिरन।

व्याधाम
संज्ञा पुं० [सं०] वज्र।

व्याधाव
संज्ञा पुं० [सं०] वज्र (को०)।

व्याधि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. रोग। बीमारी। २. आफत। झंझट। ३. कुड़ या कटु नाम को ओषधि। ४. साहित्य में एक संचारी भाव। विरह या काम अदि के कारण शरीर में किसी प्रकार रोग होना। ५. कोढ़। कुष्ठ (को०)। ६. कष्ट पहुँचानेवाली वस्तु (को०)। ७. वह जो आधि वा मानसिक रोग से मुक्त हो (को०)।

व्याधिकर
वि० [सं०] रोग उपजानेवाला। बीमारी पैदा करनेवाला [को०]।

व्याधिखड्ग
संज्ञा पुं० [सं०] नख नामक गंधद्रव्य।

व्याधिग्रस्त
वि० [सं०] रोगी [को०]।

व्याधिधात
संज्ञा पुं० [सं०] १. अमलतास। २. बाराही कंद। गेंठी (को०)।

व्याधिघातक
संज्ञा पुं० [सं०] १. अमलतास वृक्ष। आरग्वध। २. वाराही कंद [को०]।

व्याधिघ्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जिससे किसी प्रकार की व्याधि का नाश होता हो। २. वाराही कंद। गेंठी (को०)। ३. अमलतास।

व्याधिजित्
संज्ञा पुं० [सं०] अमलतास।

व्याधित
संज्ञा पुं० [सं०] वह जिसे किसी प्रकार की व्याधि हुई हो। रोगी। बीमार।

व्याधिनाशन
संज्ञा पुं० [सं०] चोबचीनी।

व्याधिनिग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] रोग को दबाना। रोग की रोक थाम [को०]।

व्याधिनिर्जय
संज्ञा स्त्री० [सं०] रोग को वश में करना [को०]।

व्याधिबहुल
वि० [सं०] (स्थान, ग्राम आदि) जहाँ रोगों की अधिकता हो। [को०]।

व्याधिमंदिर
संज्ञा पुं० [सं०] तन। शरीर। जिस्म। देह, जो रोग का स्थान है [को०]।

व्याधिरिपु
संज्ञा पुं० [सं०] १. अमलतास। २. एक प्रकार क अमलतास जिसे कर्णिकर कहते हैं।

व्याधिविपरीत
संज्ञा पुं० [सं०] ऐसी ओषधि जो व्याधि के विपरीत गुण करनेवाली हो। जैसे,—दस्त लाने के समय कब्जियात करनेवाली दवा।

व्याधिसमुद्दे शीय
वि० [सं०] रोग का स्वरूप और लक्षण बतानेवाला [को०]।

व्याधिस्थान
संज्ञा पुं० [सं०] शरोर। बदन। जिस्म।

व्याधिहंता (१)
संज्ञा पुं० [सं० व्याधिहन्तृ] वाराही कंद। शूकर कंद। गेंठी।

व्याधिहंता (२)
वि० जिससे रोग का नाश हो। रोगनाशक।

व्याधिहर
वि० [सं०] व्याधि को दूर करनेवाला। जिससे रोग नष्ट होता हो।

व्याधी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० व्याधि] दे० 'व्याधि'।

व्याधी (२)
वि० [सं० व्याधिन्] १. आखेटकों से संबद्ध (स्थान)। २. रोगी। ३. भेदक। भेदन करनेवाला [को०]।

व्याधूत
वि० [सं०] काँपता हुआ। कंपित [को०]।

व्याध्मातक
संज्ञा पुं० [सं०] फूला हुआ शव [को०]।

व्याध्य (१)
संज्ञा पुं० [सं०] शिव का एक नाम।

व्याघ्य (२)
वि० १. व्याधि संबंधी। व्याधि का। २. (नस आदि) जिसका भेदन किया जाय (को०)।

व्याध्यार्त
वि० [सं०] रोगी। रोगग्रस्त। व्याधि पीड़ित।

व्याध्युपशन
संज्ञा पुं० [सं०] रोग का शांत होना।

व्याध्युपशमन
संज्ञा पुं० [सं०] रोग दूर करना। व्याधि को शांत करना।

व्यान
संज्ञा पुं० [सं०] शरीर में रहनेवाली पाँच वायुओं में से एक वायु जो सारे शरीर में संचार करनेवाली मानी जाती है। विशेष—कहते हैं, इसी के द्वारा शरीर की सब क्रियाएँ होती है; सारे शरीर में रस पहुँचता है, पसीना बहता है और खून चलता है, आदमी उठता, बैठता और चलता फिरता है और आँखें खोलता तथा बंद करता है । भावप्रकाश के मत से जबयह वायु कुपित होती है, तब प्रायः सारे शरीर में एक न एक रोग हो जाता है।

व्यानत (१)
संज्ञा पुं० [सं०] रतिबंध का एक प्रकार [को०]।

व्यानत (२)
वि० झुका हुआ। नत [को०]।

व्यानतकरण
संज्ञा पुं० [सं०] रतिबंध का एक भेद [को०]।

व्यानदा
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह शक्ति जो व्यान वायु प्रदान करती है।

व्यानभृत्
वि [सं०] व्यान वायु को भरनेवाला। जिससे उक्त वायु बनी रहे [को०]।

व्यापक (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० व्यापिका] १. जो बहुत दूर तक व्याप्त हो। चारों ओर फैला हुआ। जैसे,—यह एक सर्व- व्यापक सिद्धांत है। २. जो ऊपर या चारों ओर से घेरे हुए हो। घेरने या ढकनेवाला। आच्छादक। ३. किसी में हमेशा एक भाव से स्थित रहनेवाला (को०)। ४. वाद के समग्र विचारणीय विषयों से युक्त। जिसमें विवाद संबंधी सभी विचारणीय विषय आ गए हों (को०)। ५. तर्क शास्त्र के अनुसार व्याप्य से अधिक (को०)।

व्यापक (२)
संज्ञा पुं० १. पदार्थ में सर्वदा विद्यमान रहनेवाला गुण या धर्म। २. नित्य सहवर्ती [को०]।

व्यापकन्यास
संज्ञा पुं० [सं०] तांत्रिकों के अनुसार एक प्रकार का अगन्यास। इसमें किसी देवता का मूल मंत्र पढ़ते हुए सिर से पैर तक न्यास करते हैं।

व्यापत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मृत्यु। मौत। २. विपत्ति में पड़ना। संकट में पड़ना (को०)। ३. क्षति। हानि। ४. विनाश। बरबादी (को०)। ५. असफलता (को०)। ६. व्याकरण के अनुसार स्थानापन्नता। किसी वर्ण का लोप या उसके स्थान में दूसरे का आगम (को०)।

व्यापद्
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मृत्यु। मौत। विनाश। २. सकट। दुर्दिन। विपत्ति (को०)। ३. रोग। व्याधि (को०)। ४. चित्त- विक्षेप (को०)।

व्यापन
संज्ञा पुं० [सं०] १. फैलाव। विस्तार। २. दूर तक फैलना। विन्तृत होना। ३. चारों ओर से या ऊपर से घेरना या ढकना। आच्छादन करना।

व्यापना
क्रि० अ० [सं० व्यापन] किसी चीज के अंदर फैलना। व्याप्त होना। जैसे,—(क) तुम्हें भी इस समय मोह व्यापता है। (ख) ईश्वर घट घट में व्यापता है। (ग) उसके सारे शरीर में विष व्याप गया है। संयो० क्रि०—जाना।—रहना।

व्यापनीय
वि० [सं०] व्यापन करने या व्याप्त होने के योग्य।

व्यापन्न
वि० [सं०] १. जो किसी प्रकार की विपत्ति में पड़ा हुआ हो। आफत में फँसा हुआ। २. मरा हुआ। मृत। ३. विनष्ट। लुप्त (को०)। ४. स्वरादि के आगम के कारण परिवर्तित (को०)। ६. विफल (को०)। ७. घायल (को०)। ८. विक्षिप्त। विकृत (को०)।

व्यापाद
संज्ञा पुं० [सं०] १. मन में दूसरे के अपकार की भावना करना। किसी की बुराई सोचना। २. मार डालना। ३. नष्ट करना। बरबाद करना। ४. बौद्धमतानुसार दस पापों में से एक पाप (को०)।

व्यापादक
वि० पुं० [सं०] १. वह जो दूसरों की बुराई करने की इच्छा रखता हो। २. वह जो हत्या या विनाश करता हो। ३. वह (व्याधि) जो घातक हो।

व्यापादन
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी को कष्ट पहुँचाने का उपाय सोचना। २. मार डालना। वध। हत्या। ३. नष्ट करना। बरबाद करना।

व्यापादनीय
वि० [सं०] मार डालने या नष्ट करने योग्य।

व्यापादित
वि० [सं०] १. हत। २. अपकार बुद्धि से चिंतित। ३. विनष्ट। ध्वस्त [को०]।

व्यापाद्य
वि० [सं०] दे० 'व्यापादनीय'।

व्यापार
संज्ञा पुं० [सं०] १. कर्म। कार्य। काम। जैसे,—(क) संसार में दिन रात अनेक प्रकार के व्यापार होते रहते हैं। (ख) सोचना मस्तिष्क का व्यापार है। २. न्याय के अनुसार विषय के साथ होनेवाला इंद्रियों का संयोग। पदार्थें अथवा धन के बदले में पदार्थ लेना और देना। क्रय विक्रय का कार्य। रोजगार। व्यवसाय जैसे—(क) आजकल कपड़े का व्यापार बहुत चमक रहा है। (ख) वे रुइ, सोने, चाँदी आदि कई चीजों का व्यापार करते हैं। ४. सहायता। मदद। ५. कार्यपद्धति। प्रक्रिया (को०)। ६. उद्योग। प्रयत्न। चेष्टा (को०)। ७. प्रभाव। दखल (को०)। ८. अभ्यास। कौशल (को०)। कारबार। पेशा (को०)। ९. प्रयोग (को०)। यौ०—व्यापारचिह्न = निर्माताओं द्वारा अपने माल की पहिचान के लिये अंकित विशेष चिह्न जिसका प्रयोग अन्य निर्माता द्वारा करना अपराध है [अं० ट्रेड मार्क]। व्यापारमंडल = व्यापा- रियों का मंडल। व्यापारियों की संस्था। व्यवसायियों का प्रतिनिधित्व करनेवाली संस्था या समाज (अं० चेंबर आव कामर्स)।

व्यापारक
वि० [सं०] व्यवसाय करनेवाला [को०]।

व्यापारगर्त
संज्ञा पुं० [सं०] सांसारिक क्रियाकलापों या व्यापारों का झंझट या गड्ढा। दुनियाँ की झंझट। काम धंधा। उ०— इसम स्पष्ट है कि मनुष्य को उसके व्यापारगर्त से बाहर प्रकृति के विशाल और विस्तृत क्षेत्र में ले जाने की शाक्ति फारस की परिमित काव्यपद्धति में नहीं है—भारत और योरप की पद्धति में है।—चिंतामणि, भा० २, पृ० ८।

व्यापारण
संज्ञा पुं० [सं०] १. आज्ञा देना। २. किसी काम में नियुक्त करना।

व्यापारिक
वि० [सं०] व्यापार संबंधी। व्यावसायिक।

व्यापारित
वि० [सं०] १. किसी कार्य में नियोजित। २. किसी स्थान पर स्थापित [को०]।

व्यापारी (१)
संज्ञा पुं० [सं० व्यापारिन्] १. वह जो किसी प्रकार का व्यापार करता हो। २. व्यवसाय या रोजगार करनेवाला। व्यवसायी। रोजगारी। ३. अभ्यास करनेवाला (को०)।

व्यापारी (२)
वि० [सं० व्यापार + ई (प्रत्य०)] १. जो किसी प्रकार का व्यापार करता हो। २. व्यवसाय या रोजगार करनेवाला। व्यवसायी। रोजगारी।

व्यापारी (३)
वि० [सं० व्यापार + हिं० ई (प्रत्य०)] व्यापार संबंधी। व्यापार का। जैसे,—व्यापारी बोलचाल, व्यापारी भाव।

व्यापित
वि० [सं०] जो व्याप्त कराया गया हो [को०]।

व्यापी (१)
वि० [सं० व्यापिन्] [वि० स्त्री० व्यापिनी] १. चारों ओर फैलनेवाला। छा जानेवाला। २. व्याप्त करने या होनेवाला। ३. आच्छादन करनेवाला। आवृत करनेवाला [को०]।

व्यापी (२)
संज्ञा पुं० १. आवृत करने या व्याप्त होनेवाला पदार्थ। २. विष्णु का एक नाम [को०]।

व्यापीत
वि० [सं०] जो एकदम पीला हो। गहरे पीत वर्ण का [को०]।

व्यापृत (१)
वि० [सं०] १. किसी कर्य में लगा हुआ। संलग्न। २. स्थिर किया हुआ। स्थापित। जमाया हुआ [को०]।

व्यापृत (२)
संज्ञा पुं० वह कार्य करता हो। कर्मचारी। सचिव। मंत्री [को०]।

व्यापृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. व्यवसाय। व्यापार। २. जीविका। पेशा। ३. अभ्यास। ४. उद्योग। क्रिया।

व्याप्त
वि० [सं०] १. पूरित। भरा हुआ। २. ढका हुआ। आच्छा- दित। ३. सर्वत्र फैला हुआ या प्रसृत ४. परिवेष्ठित। ५. स्थापित। ६. प्राप्त अधिकृत। ७. संमिलित। ८. प्रसिद्ध। विख्यात। ९. अंतर्भूत। नितांत संसक्त। १०. फैलाया हुआ [को०]।

व्याप्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. व्याप्त होने की क्रिया या भाव। चारों ओर या सब जगह फैला हुआ होना। २. न्याय के अनुसार किसी एक पदार्थ में दूसरे पदार्थ का पूर्ण रूप से मिला या फैला हुआ होना। एक पदार्थ का दूसरे पदार्थ मे अथवा उसके साथ सदा पाया जाना। जैसे—आग में धूँए की या तिल में तेल की व्याप्ति है। यौ०—व्याप्तिज्ञान। ३. आठ प्रकार के ऐश्वर्यों में से एक प्रकार का ऐश्वर्य। विशेष—शेष सात ऐश्वर्यों के नाम ये हैं—अणिमा, लघिमा, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, वशित्व और कामावसायिता। ४. सार्वजनिक नियम। सर्वव्यापक नियम (को०)। ५. पूणता (को०)। ६. प्राप्ति (को०)।

व्याप्तिकर्मा
संज्ञा पुं० [सं० व्याप्तिकर्मन्] वह जिसका कर्म व्याप्ति विशिष्ट हो। वह जो व्यापन क्रिया से युक्त हो [को०]।

व्याप्तिग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] विशेष बातों के आधार पर लोकसामान्य नियमों का निर्धारण [को०]।

व्याप्तिज्ञान
संज्ञा पु० [सं०] न्याय के अनुसार वह ज्ञान जो साध्य को देखकर साध्यवान् के अस्तित्व के संबंध में अथवा साध्यवान् को देखकर साध्य के अस्तित्व के संबंध में होता है। जैसे, धूएँ को देखकर यह समझना कि यहाँ आग भी होगी।

व्याप्तित्व
संज्ञा पुं० [सं०] व्याप्ति का धर्म या भाव।

व्याप्तिनिश्र्चय
संज्ञा पुं० [सं०] सर्वतः व्याप्त पदार्थ का निश्चयन [को०]।

व्याप्तिलक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] नित्य सहचर भाव या प्रमाण [को०]।

व्याप्य (१)
वि० [सं०] व्याप्त करने योग्य। व्यापनीय।

व्याप्य (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. जिसके द्वारा कोई काम हो। साधन। हेतु। २. कुट या कुड़ नामक औषधि। ३. दे० 'व्याप्ति'।

व्याबाध
संज्ञा पुं० [सं०] बीमारी। रोग [को०]।

व्याभाषण
संज्ञा पुं० [सं०] बोलने या भाषण की शैली [को०]।

व्याभूग्न
वि० [सं०] झुका हुआ। टेढ़ा [को०]।

व्याभ्युक्षी
संज्ञा स्त्री० [सं०] जलक्रीड़ा। जलकेलि [को०]।

व्याम (१)
संज्ञा पुं० [सं०] लंबाई की एक नाप। विशेष—दोनों हाथों को जहाँ तक हो सके, दोनों बगल में फैलाने पर एक हाथ की उँगलियों के सिरे से दूसरे हाथ की उंगलियों के सिरे तक जितनी दूरी होती है, वह व्याम कहलाती है।

व्याम पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० व्यायाम] दे० 'व्यायाम'। उ०—व्याम करत पुहमी जो हली। पीठि न लाइ सकै कोउ बली।—चित्रा०, पृ, १२३।

व्यामन
संज्ञा पुं० [सं०]दे० 'व्याम'।

व्यामर्श
संज्ञा पुं० [सं०] १. धैर्यहीनता। औत्सुक्य। व्यग्रता। २. उच्छेद या मार्जन करना। रगड़कर साफ करना [को०]।

व्यामर्ष
संज्ञा पुं० [सं०]दे० 'व्यामर्श'।

व्यामिश्र (१)
संज्ञा पुं० [सं०] दो प्रकार के पदार्थों या कार्यों को एक में मिलाने की क्रिया।

व्यामिश्र (२)
वि० १. मिला हुआ। मिश्रित। २. विभिन्न प्रकार का। ३. संदेहास्पद (को०)। ४. अस्थिर। पीड़ित। क्षुब्ध (को०)।

व्यामिश्रक
संज्ञा पुं० [सं०] ग्रंथ, पुस्तक, आदि, सुख्यतः रूपक जिसमें विभिन्न भाषाओं का मिश्रण हो [को०]।

व्यामिश्रवान
संज्ञा पुं० [सं०] मोटा वस्त्र जिसमें सूत्र, ऊर्ण, तंतु आदि मिश्रित हों [को०]।

व्यामिश्रव्यूह
संज्ञा पुं० [सं०] मिला जुला व्यूह। वह व्यूह जिसमें पैदल के अतिरिक्त हाथी घोड़े और रथ भी संमिलित हों। विशेष—कौटिल्य ने इसके दो भेद कहे हैं—मध्यभेदी और अंतभेदी। मध्यभेदी वह है जिसके अंत में हाथी, इधर उधर घोड़े, मुख्य भाग या केंद्र में रथ तथा उरस्य में हाथी और रथ हों। इससे भिन्न अंतभेदी है।

व्यामिश्रसिद्धि
संज्ञा स्त्री० [सं०] कौटिल्य के अनुसार शत्रु और मित्र दोनों की स्थिति का अपने अनुकूल होना।

व्यामूढ
वि० [सं०] बहुत घबड़ाया हुआ [को०]।

व्यामृष्ट
वि० [सं०] रगड़कर मिटाया हुआ [को०]।

व्यामोक
संज्ञा पुं० [सं०] छुटकारा। मुक्ति [को०]।

व्यामोह
संज्ञा पुं० [सं०] १. मोह। २. अज्ञान। २. व्याकुलता। घबड़ाहट (को०)।

व्याय
संज्ञा पुं० [सं०] वाण चलाने के सभय धनुष की प्रत्यंचा को तानने की पद्धति वा क्रिया [को०]।

व्यायत
वि० [सं०] १. लंबा। फैला या फैलाया हुआ। २. खुला हुआ। ३. कार्य में लगा हुआ। व्यस्त। ४. कठोर। दृढ। ५. कृताभ्यास। जिसमे अभ्यास किया हो। अभ्यस्त। ६. प्रखर। प्रचंड। तीव्र। ७. शक्तिशाली। ८. गहरा। गंभीर [को०]।

व्यायतत्व
संज्ञा पुं० [सं०] व्यायत होने का भाव। शरीर की पेशियों का विकसन या फैलाव [को०]।

व्यायतपाती
वि० [सं० व्यायतपातिन्] दूर तक दौड़नेवाला। विस्तृत मार्ग को तय करनेवाला। जैसे, अश्व आदि [को०]।

व्यायाम
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह शरीरिक श्रम जो केवल शरीर का बल बढाने के उद्देश्य से किया जाता है। कसरत। जोर। जैसे,—डंड, बैठको करना या मुगदर, डंबल आदि हिलाना। २. पौरुष। ३. परिश्रम। मेहनत। ४. व्यापार। काम। ५. युद्ध की तैयारी। ६. सेना की कवायद आदि। ७. विस्तार करना। फैलाना (को०)। ८. आयास। प्रयत्न चेष्टा (को०)। ९. युद्ध। कलह। विवाद। संघर्ष (को०)। १०. कठिनाई। ११. लंबाई की एक माप। व्याम (को०)। १२. क्लांति। थकान (को०)। १३. अभ्यास। कौशल (को०)। १४. दुर्गम मार्ग। यौ०—व्यायामकर्शित=व्यायाम के कारण दुर्बल। व्यायामभूमि= व्यायाम करने की जगह। व्यायामयुद्ध। व्यायामयोग। व्यायामशाला = व्यायाम करने की जगह। व्यायामशील= कसरती। (२) परिश्रमी। [को०]। व्यायामशोषी।

व्यायामयुद्ध
संज्ञा पुं० [सं०] आमने सामने की लड़ाई। विशेष—अर्थशास्त्र में चाणक्य का मत है कि व्यायामयुद्ध अर्थात् आमने सामने की लड़ाई में दोनों ही पक्षों को बहुत हानि पहुँचनी है। जो राजा जीत भी जाता है, वह भी इतना कमजोर हो जाता है कि उसको एक प्रकार से पराजित ही समझना चहिए। (को०)।

व्यायामयोग
संज्ञा पुं० [सं०] शस्त्रास्त्रों के प्रयोग का अभ्यास।

व्यायामशोषी
वि० [सं० व्यायामशोषिन्] जो अत्यंत कसरत या श्रम करने से श्रीणकाय हो गया हो। उ०—व्यायामशोषी (अत्यंत दंड कसरत आदि से क्षीण) मनुष्य स्रस्तांगतादियुक्त होय है।—माधव०, पृ० ८६।

व्यायामिक
वि० [सं०] व्यायाम का। व्यायाम संबंधी।

व्यायामी
संज्ञा पुं० [सं० व्यायामिन्] १. वह जो व्यायाम करता हो। कसरत करनेवाला। कसरतो। २. वह जो बहुत परिश्रम करता हो। परिश्रमी। मेहनती।

व्यायुक
वि० [सं०] भाग। निकलनेवाला [को०]।

व्यायुक्त
वि० [सं०] १. अलग अलग किया हुआ। २. मिला जुला। उ०—लोहित, श्वेत (ओदात्त) या मिश्रित (न्यायुक्त) वर्णीं की वेशभुषा और साजसज्जा धारण करते थे। हिंदुं० सभ्यता, पृ०२०१।

व्यायुध
वि० [सं०] शास्त्ररहित। निःशस्त्र [को०]।

व्य़ायोग
संज्ञा पुं० [सं०] साहित्य में दस प्रकार के रूपकों में से एक प्रकार का रूपक या दृश्य काव्य। विशेष—इसकी कथावस्तु किसी ऐसे ग्रंथ से ली जानी चाहिए, जिससे सब लोग भली भाँति परिचित हों। इसके पात्रों में स्त्रियाँ कम और पुरुष अधिक होते हैं। व्यायोग में स्त्री के कारण युद्ध नहीं होता और इसमें गर्भ और विमर्ष संधि नहीं होती। इसमें एक ही अंक रहता है और कैशिकी वृत्ति का व्यवहार नहीं होता है। इसका नायक कोई प्रसिद्ब राजर्षि, दिव्य और धीरोदात्त होना चाहिए। इसमें शृंगार, हास्य और शांत के सिवा और सब रसों का वर्णन होता है। जैसे, भास कवि का मध्यम व्यायोग।

व्यायोजिम
वि [सं०] (बंधन या पट्टी) जो खुली हुई या ढ़ीली हो गई हो [को०]।

व्यारब्ध
वि० [सं०] समुचित ढ़ंग से रक्षित [को०]।

व्यारोष
संज्ञा पुं० [सं०] क्रोध। गुस्सा।

व्यार्त
वि० [सं०] विशेष रूप से आर्त या दुःखी। क्लेशग्रस्त [को०]।

व्यालंब
संज्ञा पुं० [सं०व्यालम्ब] लाल रेंड़।

व्यालंबी
वि० [सं०व्यालम्बिन्] जो लटक रहा हो। लटकता हुआ। अवलंबी [को०]।

व्याल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. साँप। २. दुष्ट या पाजी हाथी। ३. वाघ। शेर। ४. वह बाघ जो शिकार करने के लिय़े सधाया गया हो। ५. राजा। ६. विष्णु का एक नाम। ७. दंड़क छंद का एक भेद। ८. कोई हिसक जंतु। ९. चीता (को०)। १०. ठग। धूर्त (को०)। ११. आठ की संख्या (को०)।

व्याल (२)
वि० १. दूसरों का अपकार करनेवाला। २. दुष्ट। पाजी। ३. बुरा। पापिष्ठ (को०)। ४. क्रुर। भीषण (को०)।

व्यालक
संज्ञा पुं० [सं०] १. दुष्ट या पाजी हाथी। २. हिसक जंतु। ३. सर्प। व्याल (को०)।

व्यालकरज
संज्ञा पुं० [सं०] नख या बगनहा नामक गंधद्रव्य।

व्यालखड़ग
संज्ञा पुं० [सं०] नख या बगनहा नामक गंधद्रव्य।

व्यालगंधा
संज्ञा स्त्री० [सं०व्यालगन्धा] नाकुली नामक कंद।

व्यालग्राह
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो साँपों का पकड़ता हो। सँपेरा।

व्य़ालग्राही
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो साँप पकड़ने का काम करता हो। मदारी। सँपेरा।

व्यालग्रीव
संज्ञा पुं० [सं०] १. बृहस्पति के अनुसार एक देश का नाम। २. इस देश का निवासी।

व्यालजिह्वा
संज्ञा स्त्री० [सं०] कँगही का कंधी नामक पौधा। महासमंगा।

व्यालता
संज्ञा स्त्री० [सं०] व्याल का भाव या धर्म। व्यालत्व। व्यालपन।

व्यालत्व
संज्ञा पुं० [सं०] ब्य़ाल का भाव या धर्म। व्यालपन।

व्यालदंष्ट्र
संज्ञा पुं० [सं०] गोखरु का पौधा।

व्यालदंष्ट्रक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'व्यालदंष्ट्र' [को०]।

व्यालनख
संज्ञा पुं० [सं०] नख या बगनहा नामक गंधद्रव्य।

व्यालपत्र
संज्ञा पुं० [सं०] खेतपापड़ा।

व्यालपत्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] खेतपापड़ा।

व्य़ालपाणिज
संज्ञा पुं० [सं०] नख या बगनहा नामक गंधद्रव्य।

व्यालप्रहरण
संज्ञा पुं० [सं०] नख या बगनहा नामक गंधद्रव्य।

व्यालबल
संज्ञा पुं० [सं०] नख या बगनहा नामक गंधद्रव्य।

व्यालमृग
संज्ञा पुं० [सं०] १. बाघ। शेर।२. शिकारी चीता (को०)।३. जंगली जानवर (को०)।

व्यालरूप
संज्ञा पुं० [सं०] शिव [को०]।

व्यालवल
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'ब्यालबल'।

व्यालसूदन
संज्ञा पुं० [सं०] गरुड़। उ०—जयति भीमार्जुन व्यालसुदन गबंहर धनजंय रथत्रान केतु।— तुलसी (शब्द०)।

व्यालाद
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो सपाँ को खाता हो। गरुड़। २. मोर। मयुर [को०]।

व्यालायुध
संज्ञा पुं० [सं०] नख या बगनहा नामक गंधद्रव्य।

व्यालारि
संज्ञा पुं० [सं०] गरुड़। उ०— सुनु व्य़ालारि, कराल कलि, बिनु प्रयास निस्तार।—भक्तमाल (प्रि०) पृ०५७६।

व्यालि
संज्ञा पुं० [सं०] व्याड़ि नामक एक प्राचिन ऋषि जिन्होंने एक व्याकरण बनाया था।

व्यालिक
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो साँपों को पकड़कर अपने जिविका चलाता हो। संपेरा।

व्यालिनि पु
संज्ञा स्त्री० [सं०व्याली] सर्पिणी। साँपिनी। उ०— सरित की लहरे असु लोहिनी, लहरने खलु व्यालिनी सो लगों।—बी० श० महा०, पृ०२०१।

व्याली (१)
संज्ञा पुं० [सं०व्यालिन्] शिव [को०]।

व्याली (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०व्याल + ई] सर्पिणा। उ०— ओ चिंता की पहली रेखा, अरी विश्व वन का व्यालो।— कामायनी, पृ०५।

व्यालीढ़
संज्ञा पुं० [सं०] साप के काटने का एक प्रकार। साँप का वह काटना जिसमें केवल एक या दो दाँत लगे हों और घाव में से खुन न बहाँ हा।

व्यालीन
वि० [सं०] साँश्लष्ट। चिपका हुआ। घना [को०]।

व्यालुप्त
संज्ञा पुं० [सं०] साँप के काटने का एक प्रकार। साँप का वह काटना जिसमे दो दात भरपूर बैठे हों और धाव में स खून भी निकला हो।

व्यालू †
संज्ञा पुं० स्त्री० [सं०वेला] रात के समय का भोजन। रात का खाना। उ०—जो कुछ बन पड़ा व्यालु करकें लंबी तान अपने बिछौना मजा पड़ा।—श्यामा०, पृ०६।

व्यालून
वि० [सं०] छिन्न। कटा हुआ [को०]।

व्यालोक
संज्ञा पुं० [सं०] प्रकाश। उ०— अकस्मात उस खिड़की में सें एक सुंदर मुख निकला। व्य़ालाक ड़ालकर देखा कि रासय़ा एक पात्र हाथ में लिए है और कुछ कुछ कह रहा हा।—छाया, पृ०३८

व्यालोल
वि० [सं०] १. चंचल। २. परिक्रांत। चक्कर खाता हुआ। ३. अस्तव्यस्त। बिखरा हुआ। जैसे, व्यालोलकेश। ४. काँपता हुआ [को०]।

व्यालोलन
संज्ञा पुं० [सं०] इधर उधर हिलना। काँपना [को०]।

व्यावकलन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'व्यवकलन' [को०]।

व्यावक्रोशी
संज्ञा स्त्री० [सं०] कहा सुनी। वादविवाद। झगड़ा [को०]।

व्यावचर्ची
संज्ञा स्त्री० [सं०] आपस में कही हुई अथवा सामान्य बात, पुररुक्ति [को०]।

व्यावचोरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] आपस में होनेवालों चोरी [को०]।

व्यावभाषी
संज्ञा स्त्री० [सं०] आपस में अपशव्दों का व्यवहार। कहासुनी [को०]।

व्यावर †
वि० [हि० बिआना, बिआउर] व्यानेवाली। उत्पन्न करनेवाली। उ०— दादु कापा ब्यावर गुणमयी, मनमुख उपजै ज्ञान। चौरासी लख जीवकौ, इस माया का ध्यान।— दादु०, पृ०४१८।

व्यावर्ग
संज्ञा पुं० [सं०] १. विभाग करना। हिस्सा लगाना। विभक्त करना। बाँटना।२. हिस्सा। विभाग (को०)।

व्यावर्जित
वि० [सं०] आवर्जित। भुग्न। नत। झुका या लटका हुआ [को०]।

व्यावर्त
संज्ञा पुं० [सं०] १. चक़वड़। चक्रमर्द्द। २. घेरना। लपे- टना। परिवेष्टित करना (को०)। ३. चारों ओर भ्रमण करना। चक्कर खाना। (को०)।४. अलग करना। चुनना (को०)।५. आगे की ओर निकली हुई नाभि। नाभिकंटक।

व्यावर्तक
वि०, संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री०व्यावर्त्तिका] १. वह जो व्यावर्तन करता हो। चक्कर खानेवाला। पीछे की ओर लौटने वाला। २. दूर हटानेवाला। अलग करनेवाला (को०)। ३. भेदक। अंतर करनेवाला (को०)।

व्यावर्त्तन
संज्ञा पुं० [सं०] १. जो पराङ्मुख किया गया हो। २. पीछे की ओर लोटाया या मोड़ा हुआ। ३. सर्प की कुंड़ली (को०)। ४. घुमाव। मोड़। जैसे, पथ का व्यावर्तन (को०)। ५. परिवेष्टन (को०)।

व्यावर्तनीय़
वि० [सं०] जिसका व्यावर्तन किया जा सके। व्यावर्तन के योग्य़। [को०]।

व्यावर्तित
वि० [सं०] १. पराड़मुख किया हुआ। लौटाया हुआ। जिसे चक्कर दिया गया हो। २. परिवर्तित [को०]।

व्यावल्गित
वि० [सं०] तेजी या झटके से चलता हुआ [को०]।

व्यावहारिक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. व्यवहार। २. वह जो व्यवहार शास्त्र के अनुसार आभयोगी का विचार करता हो। ३. राजा का वह अमात्य या मंत्री जिसके अधिकार में भीतरी और बाहरा सब तरह के काम हों। ४. व्यापार। कारबार (को०)।

व्यावहारिक (२)
वि० १. व्यवहार संबंधी। व्यवहार या बरताव का। २. व्यवहार शास्त्र संबधी। व्यवहार शास्त्र का। ३. प्रचलित।४. व्यवहारपटु। मिलनसार।५. व्यापारिक। प्रातिभासिक। भ्रमात्मक (को०)।

व्यावहारिक ऋण
संज्ञा पुं० [सं०] वह ऋण जो किसी कारबार के संबंध में लिया गया हो।

व्यावहारी
संज्ञा स्त्री० [सं०] ब्यौहार संबंधी बंधन। आपपी व्यवहार- जन्य लेनदेन [को०]।

व्यावहार्य
वि० [सं०] १. व्यवहार में लाने योग्य।२. शक्त। क्षम। समर्थ [को०]।

व्यावहासी
संज्ञा स्त्री० [सं०] आपस में होनेवाली हँसी [को०]।

व्यावाध
संज्ञा पुं० [सं०] रोग। व्याधि [को०]।

व्याविद्ध
वि० [सं०] १. परस्पर विरूद्ध। २. प्रविष्ट या घुसा हुआ। बेधा हुआ। ३. फेंका हुआ। क्षिप्त। ४. घूर्णित। ५. बिगाडा हुआ [को०]।

व्याविध
वि० [सं०] तहर तरह का। अनेक प्रकार का [को०]।

व्यावृत्
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रधानता।२. विरमण। विराम। ३. अंतर। फर्क। भेद [को०]। यौ०—व्यावृत्काम = जो प्रधानता पाने की इच्छा रखता हो।

व्यावृत
वि० [सं०] १. जो आवृत न हो। खूला हुआ। दे० 'व्यावृत्त'। २. आच्छादित। आवृत। ३. हटाया या अलग किया हुआ। ४. अपवादित। अपवाद किया हुआ [को०]।

व्यावृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. चयन करना। छाँटना। चुनना। २. आवृत या आच्छादित करना। ३. अनवृत करना। अनाच्छादित करना [को०]।

व्यावृत्त
वि० [सं०] छुटा हुआ। मुक्त। निवृत्त। २. मना किया हुआ। निषिद्ब। ३. टुटा हुआ। खंड़ित। ४. अलग किया हुआ। विभक्त। ५. जो मन में पसंद किया गया हो। मनोनित। ६. चारों ओर से घेरा हुआ। ७. ऊपर से ढ़का हुआ। आच्छादित। ८. असंगत (को०)। ९. जो विद्यमान न हो (को०)। १०. लौटा हुआ (को०)। ११. चक्कर खाता हुआ (को०)।१२. जिसकी प्रशंसा या स्तुति की गई हो। यौ०—व्यावृत्तगति = मंद गति। धीमी चाल। व्यावृत्तचेता = जिसका मन किसी ओर से पराड़मुख हो। व्यावृत्त देह = पर्वत आदि जो फट गए हों।

व्यावृत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. खंड़न। २. आवृत्ति। ३. मन से चुनने या पसंद करने का काम।४. चारो ओर से फेरना। ५. स्तुति। प्रशंसा। तारीफ। ६. मनाही। निषेध। ७. बाधा। खलल। ८. निराकरण। निर्णय। मीमांसा। ९. नियोग। १०. एक प्रकार का यज्ञ (को०)। ११. पृथकता। भिन्नता (को०)। १२. स्पष्टता (को०)। १३. (नेत्रा द) धुमाना (को०)। १४. अविद्यमान होना (को०)। १४। घेरना (को०)। १६. ढ़कना (को०)।

व्याशा
संज्ञा स्त्री० [सं०] विदिशा। दिशाओँ का कोण या मध्यवर्तो भाग [को०]।

व्याश्रय
संज्ञा पुं० [सं०] १. सहारा। आश्रय। साहाय्य।२. वह जो दूसरे का सहारा लेता हो [को०]।

व्यासंग
संज्ञा पुं० [सं०व्यासङ्ग] १. भक्ति (को०)। २. बहुत अधिक आसाक्ति। ३. आसक्तपूर्ण अध्ययन (को०)। ४. पाथक्य। अलग होना (को०)। ५. योग (को०)। ६. घबड़ाने की स्थिति या भाव (को०)। ७. घनिष्ठ संबंध वा संपर्क (को०)। ८. मनोयोग।

व्यासंगी
वि० [सं० व्य सङ्रिन] १. विशेष रूप में आसक्त। २. जो मनोयोगपूर्वक संलग्न हो [को०]।

व्यास
संज्ञा पुं० [सं०] १. पराशर के पुत्र कृष्ण द्बैपायन जिन्होंने वेंदों का संग्रह, विभाग और संपादन किया था। कहा जाता है, अठारहों। पुराणों महाभारत, भागवत और वेदांत आदि की रचना भी इन्होने की थी। विशेष—इनके जन्म आदि की कथा महाभारत में बहुत विस्तार के साथ दी है। उसमे कहा गया है कि एक बार मत्सगंधा सत्यवती नाव खे रही थी। उसी समय पराशर मुनि वहाँ जा पहुँचे और उसे देखकर आसक्त हो गए। वे उससे बोले कि तुम मेरी कामना पूरू करो। सत्यवती ने कहा। —महाभारत नदी के दोनों ओर ऋषि, मुनि आदि बैठे हुए है और हम लोग को देख रहे है। मै कैसे आपकी कामना पूरी करूँ। इसपर पराशर मुनि के अपने तप के बल से कुहरा खड़ा कर दिया जिससे चारो और अँधेरा छा गया। उस समय सत्यवती ने फिर कहा महाराज, मै अभी कुमारी हूँ; और आपकी कामना पूरी करने से मेरा कौमार नष्ट हो जायगा। उस दशा में में किस प्रकार अपने घर में रह सकूँगी। पराशर ने उत्तर दिया नहीं, इससे तुम्हारा कौमार्थ नष्ट नहीं होगा। तूम मुझसे वर माँगो सत्यवती ने कहा कि मेरे शरीर से मछली की जो गंध आती है, वह न आवे। पराशर ने कहा कि ऐसा ही होगा। उसी समय से उसके शरीर से सुगंध निकलने लगी और तबसे उसका नाम गंधवती या योजनगंधा पड़ा। इसके उपरांत पराशर मुनि ने उसके साथ संभोग किया जिससे उसे गर्भ रह गया और उस गर्भ से इन्ही व्यासदेव की उत्पत्ति हुई। इनका जन्म नदी के बीच के एक टापू में हुआ था ओर इनका रंग बिलकुल काला था; इसीलये इनका नाम कृष्ण द्बैपायन पड़ा। इन्होने बचपन से ही तपस्या आरंभ की ओर बड़े हीन पर वेदों का संग्रह तथा विभाग किया; इसीलिये ये वेदव्यास कहलाए। पीछे से जब शांतनु से सत्ववती का विवाह हुआ, तब अपने पुत्र विचित्रवार्य के मरन पर सत्यवता ने इन्हें बुलाकर विचित्रवार्य का विधवा पात्नया (आंबिका और अंबालिका) के साथ नियोग करने की आज्ञा दी जिससे धुतराष्ट ओर पाड़ु का जन्म हुआ। विदुर भी इन्हीं के वीर्य से उत्पन्त्र हुए थे। ये पाराशर्य, कानीन, बादरायण, सत्यभारत, सत्य़व्रत और सत्य़रत भी कहलाते है।२. पुराणानुसार वे अट्ठाईस महर्षि, जिन्होंने भिन्त्र भिन्न कल्पों में जन्म ग्रहण करके वेदों का संग्रह और विभाग किय़ा हा। विशेष—ये सब ब्रह्मा और विष्णु के अवतार माने जाते है; और इनके नाम इस प्रकार है।—स्वयंभुव, प्रजापति या मनु, उशना, बृहस्पति, सविता, मृत्यु या यम, इंद्र, वसिष्ठ, सारस्वत, त्रिधाम, ऋषिभ य़ा त्रिवृष, सुतेजा या भारद्बाज, अंतरिक्ष या धिर्म, वपृवन् या सुचक्ष, त्रध्यारुणि, धनजय, कृतंजय, ऋतजय, भरद्बाज, गौतम, उत्तम या हर्यत्म, वाचश्रवा या नारायण (इन्हें वेण भी कहते हैं), सोममुख्यायन या तुणविदु, ऋक्ष या वाल्मिकि, शक्ति पराशर, जातुकर्ण और कृष्ण द्बैपायन। ३. वह ब्राह्मण जो रामायण महाभारत या पुराणों आदि की कथाए लोगों को सुनाता हो। कथावाचक। उ०— तो कभी व्यास बन पुरानी प्रयोजनीय वृत्तांतों की कथा कहा सुनाती है।— प्रेमघन०, भा०,२, पृ०३४१। ४. वह रेखा जो किसी बिल्कुल गोल रेखा या वृत्त के किसी एक विंदु से बिलकुल सीधी चलकर केंद्र से होती हुई दूसरे सिरे तक पहुँची हो। ५. विस्तार। प्रसार। फैलाव। ६. वितरण। विभाजन (को०)। ७. समासयुक्त पदों का विश्लेषण या विग्रह (को०)। ८. पृथक्ता। अलगाव (को०)। ९. चौडा़ई। १०. उच्चारण का एक दोष (को०)। ११. व्यव- स्थापक। संकलन करनेवाला। वह जो संकलन करता हो (को०)। १२. व्यवस्था। संकलन करने का काम (को०)। १३. विस्तारयुक्त विवरण। विस्तृत विवरण (को०)। १४. एक प्रकार का धनुष जिसकी तौल या वजन१००पल की हीती थी (को०)।

व्यासकूट
संज्ञा पुं० [सं०] १. महाभारत से आए हुए वेदव्यास के कूट श्लोक। २. वे कूट श्लोक जो सीताहरण होने पर रामचद्र जी ने माल्यवान् पर्वत पर कहे थे और जिनसे उन्हें कुछ शांति मिली थी।

व्यासक्त
वि० [सं०] १. जो आसक्त हुआ हो। जिसका मन बेतरह आ गया हो। २. संबद्ब। लगा हुआ। जुड़ा हुआ (को०)। ३. पृथक्कृत अलग किया हुआ। ४. व्याकुल। परेशान (को०)। ५. आलिगित। आलिंगनवद्ब (को०)। ६. अनासक्त (को०)।

व्यासगीता
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक उपनिषद का नाम।

व्यासता
संज्ञा स्त्री० [सं०] व्यास का भाव या धर्म। व्यासत्व।

व्यासतीर्थ
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार एक तीर्थ का नाम।

व्यासत्व
संज्ञा पुं० [सं०] व्यास का भाव या धर्म।

व्यासदेव
संज्ञा पुं० [सं०] कृष्णा द्बैपायन। वेदव्यास [को०]।

व्यासपीठ
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणों के व्याख्याता का आसन। व्यासा- सन [को०]।

व्यासपूजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आषाढ़ मास की पूर्णिमा को होनेवाली गुरू की पूजा जिसे व्यासपूजा भी कहते हैं।

व्यासमता
संज्ञा स्त्री० [सं० व्यासमातृ] व्यास की माता, सत्य- वती [को०]।

व्यासमूर्ति
संज्ञा पुं० [सं०] शिव का एक नाम।

व्यासयति
संज्ञा पुं० [सं०] एक तीर्थ का नाम जिसे व्यासतीर्थ भी कहते है [को०]।

व्यासराज
संज्ञा पुं० [सं०] एक तीर्थ [को०]।

व्यासवन
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत के अनुसार एक प्राचीन वन का नाम।

व्यास समास
संज्ञा पुं० [सं०] विस्तार और संक्षेप [को०]।

व्यास सरोवर
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत के अनुसार वह सरोवर जिसमें य़ुद्ब के अंत में दुर्याधन छिपा था [को०]।

व्य़ाससू
संज्ञा स्त्री० [सं०] सत्यवती [को०]।

व्याससुत्र
संज्ञा पुं० [सं०] वेदांतसूत्र।

व्यासस्थली
संज्ञा स्त्री० [सं०] महाभारत के अनुसार एक प्राचीन पवित्र तीर्थ का नाम

व्यासस्मृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक स्मृति का नाम [को०]।

व्यासारण्य
संज्ञा पुं० [सं०] व्यासवन नामक प्राचीन वन।

व्यासार्द्ध
संज्ञा पुं० [सं०] व्यास का आधा भाग। किसी वृत्त के केंद्र से उसके किसी छोर तक की रेखा।

व्यासासन
संज्ञा पुं० [सं०] वह आपन जिसपर का कहनेवाले व्यास बैठकर कथा कहते है। व्यासपीठ।

व्यासिद्ध
वि० [सं०] १. मना किया हुआ। वर्जित। निषिद्ध (माल आदि)। २. रूका हुआ। अवरूद्ध।

व्यासीय
वि० [सं०] व्यास संबंधो। व्यास का।

व्यासेध
संज्ञा पुं० [सं०] निषेध। वर्जन। प्रतिबंध [को०]।

व्याहंतव्य
वि० [सं०व्याहन्तव्य़] उल्लघन करने योग्य [को०]।

व्याहत
वि० [सं०] १. मना किया हुआ। निवारित। निषिद्ध। २. व्यथ। ३. हताश। निराश (को०)। ४. भ्रामंत। व्याकुल। चकराया हुआ (को०)। ५. जिसपर चाट का गई हो (को०)। ६. परस्पर विरुद्ध। परस्पर विरोधी (को०)। ७. रोका हुआ। बाधित। विफल या निष्फल किया हुआ। ८. भयभात। भयालु। भययुक्त (को०)।

व्याहतार्थता
संज्ञा स्त्री० [सं०] साहित्य के अनुसार एक रचनागत दोष जिसमें उत्तरवर्ती कथन से पूर्ववर्ता कथन की हीनता वा व्यर्थता व्यक्त हो। पहले कही हुई बात का आगे कही हुई बात से उत्कर्ष न रहना।

व्याहति
संज्ञा स्त्री० [सं०] खलल पहुँचाना। बाधा ड़ालना।२. न्य़ाय में परस्पर असंगति या वचन विरोध (को०)।

व्याहनस्य़
वि० [सं०] [वि० स्त्री०व्याहनस्या] अत्यंत अश्लोल [को०]।

व्याहरण
संज्ञा पु० [सं०] कथन। उक्ति। २. उच्चारण (को०)।

व्याहार
संज्ञा पुं० [सं०] १. वाक्य। जुमला। वचन। कथन। २. ध्वनि। स्वर। आवाज (को०)। ३. हास परिहास। मजाक। परिहास भरी उक्ति (को०)।४. पक्षियोँ का चहचहाना। कलरव (को०)।

व्याहाव
संज्ञा पुं० [सं०] व्यक्त वा परिस्फुट ध्वनि। स्पष्ट पुकार [को०]।

व्याहित
वि० [सं०] व्याधिग्रस्त। रोगयुक्त [को०]।

व्याहृत (१)
वि० [सं०] १. कहा हुआ। कथित। उक्त। २. खादित। भक्षित (को०)।३. जिसने कुछ कहा हो। जिसने ध्वनि की हो (को०)।

व्याहृत (२)
संज्ञा पुं० १. बोलना। कहना। वार्ता करना। २. अस्पष्ट कथन। कल कूजन। अस्फुट ध्वनि (विशेषतः पशुपक्षियों की)। ३. निर्देश। नियोग। बोधन। ख्यापन [को०]।

व्याहृत संदेश
संज्ञा पुं० [सं०व्याहृत सन्देश] वह जो सुचना या समाचार कहे। संदेशहारक। दूत [को०]।

व्याहृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कथन। उक्ति। २. उच्चारण। वचन (को०)। ३. भुः, भुवः, स्वः इन तीनों का मंत्र। विशेष—कहते हैं, जहाँ और कोई मंत्र न हो, वहाँ इसी व्याहृति मंत्र से काम लेना चाहिए। कुछ विद्बानों के मतानुसार व्याहृतियाँ सात है—भूः, भुवः, स्वः, महः जनः, तपः और सत्यम्। इनमें प्रारँभिक तीन महाव्याहृति कही गई है और ये सवितृ और पृश्नि की कन्या मानी जाती हैं।

व्युंदन
संज्ञा पुं० [सं०व्युन्दन] अच्छी तरह तर करना। आर्द्र करना। गीला करना। [को०]।

व्युच्चरण
संज्ञा पुं० [सं०] अत्यय। उल्लंघन। अतिक्रमण [को०]।

व्युच्छित्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] विनाश। बरबादी। उन्मूलन।

व्युछेत्ता
वि, संज्ञा पुं० [सं० व्युच्छेत्तृ] १. विनाश करनेवाला। बरबाद करनेवाला। २. (वह) जो काटा गया हो। (वह) जिसे उन्मूलित किया गय़ा हो (को०)।

व्युच्छेद
संज्ञा पुं० [सं०] विनाश। पूर्णतः उन्मुलन। व्युच्छित्ति [को०]।

व्युत
वि० [सं०] १. बुना हुआ। व्युत। गूँथा हुआ। २. जो समतल किया गया हो। जैसे, मार्ग (को०)।

व्युति
संज्ञा पुं० [सं०] १. दे० 'व्यूति'। २. बुनाई की मजदूरी। बुनाई। सिलाई [को०]।

व्युत्क्रम
संज्ञा पुं० [सं०] १. क्रम में उलटफेर होना। व्यतिक्रम। गड़बड़ी।२. निश्चित वा उचित का परित्याग करना (को०)। ३. अतिक्रमण। उल्लंघन (को०)।४. अस्तव्यस्त होना (को०)। ५. मृत्यु। मरण (को०)।

व्युत्क्रमण
संज्ञा पुं० [सं०] १. अलग होता। अलगाव।२. अतिक्र- मण। उल्लंघन [को०]।

व्युत्क्रांत
वि० [सं० व्युत्क्रान्त] १. लाँधा हुआ। लंघित। उल्लंधित। २. गत। गत हुआ। प्रस्थित।३. तिरस्कृत। निरादुत। उपेक्षित।४. विपरात दिशा में जानेवाला। प्रतिकूल पथगामी [को०]। यौ०—व्युत्क्रांत जावित = मृत। निर्जाव। गतप्राण। व्युक्त्रांवधर्म = कर्तव्य कर्म की उपेक्षा करनेवाला। धर्म का उल्लंघर करनेवाला। व्युत्क्रांतरजा। व्युक्रांतवर्त्मा।

व्युत्क्रांतरजा
वि० [सं० व्य़ुत्क्रान्तरजस्] १. रजोगुण से रहित। वासनाहीन। २. निष्पाप। अकलुष [को०]।

व्युत्क्रांतवर्त्मा
वि० [सं० व्युत्क्रान्तवर्त्मन्] सत्पथ से च्युत। विहित एवं उचित मार्ग का परित्याग करनेवाला [को०]।

व्युत्क्रांतसमापत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०व्युत्क्रान्त समापत्ति] १. बौद्ब मता- नुसार अनन्यमनस्कता की स्थिति। समाधि या एकाग्रता की अवस्था। २. एकीकरण वा एकत्र समाहरण की स्थिति [को०]।

व्युत्क्रांता
संज्ञा स्त्री० [सं०व्युत्क्रान्ता] एक प्रकार की प्रहेलिका। पहेली का एक भेद। पहेली।

व्युत्त
वि० [सं०] आर्द्र या तर किया हुआ। जिसका व्युंदन किया गया हो [को०]।

व्य़ुत्थान
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्वतंत्र या स्वाधीन होकर काम करना। २. किसी के विरुद्ध आचरण करना। खिलाफ चलना। ३. रूकावट ड़ालना। रोकना। ४. समाधि। ५. एक प्रकार का नृत्य। ६. योग के अनुसार चित्त की क्षिप्त, मूढ़ और विक्षिप्त ये तीन अवस्थाएँ या चित्तभूमियाँ जिनमें योग का साधन नहीं हो सकता। इन भूमियों में चित्त बहुत चंचल रहता है। ७. महत सक्रियता। सचेष्टता (को०)। ८. हाथी को उठने के लिये प्रेरित करना (को०)। ९. किसी से दबना या नीचा देखना (को०)। १०. खंड़न। विरोध (को०)।

व्युत्थापित
वि० [सं०] उठाया हुआ। जगाया हुआ। जिसे उठने या जगने के लिये प्रेरित किया गया हो [को०]।

व्युत्थित
वि० [सं०] १. कर्तव्य मार्ग से विचलित। उच्छास्त्रवर्त्ती। २. जिसकी बुद्बि स्थिर न हो। ३. जो बहुत क्षब्द हो [को०]।

व्युप्तत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. किसी पदार्थ आदि की विशिष्ट उत्पत्ति। किसी चीज का मूल उदगम या उत्पत्ति स्थान। २. शब्द का मूल रूप। वह शब्द जिससे कोई दूसरा शब्द निकला हो। ३. किसी विज्ञान या शास्त्र आदि का अच्छा ज्ञान वा प्रगाढ़ पांड़ित्य। जैसे,— दर्शन शास्त्र में उनकी अच्छी व्युत्पत्ति है। ४. विद्धात्ता। ज्ञान (को०)। ५. ध्वनि या उच्चारण की भिन्नता (को०)। ६. बाढ़। विकास (को०)।

व्युत्पन्न
वि० [सं०] १. जिसका संस्कार हो चुका हो। संस्कृत।२. जिसका किसी विज्ञान या शास्त्र में अच्छा प्रवेश हो। जो किसी शास्त्र आदि का अच्छा ज्ञाता हो। ३. उत्पादित। पैचा किया हुआ (को०)। ४. अव्युत्पन्न का विपरीतार्थबोधक। जिसकी व्युत्पत्ति की गई हो (को०)। ५. जो निरूक्ति या निर्वचन द्बारा निर्मित हो (को०)। ६. पूर्ण किया हुआ। संपन्न (को०)।

व्युत्पादक
वि० [सं०] १. व्युत्पत्ति या निर्वचन। करनेवाला। २. उत्पन्न करनेवाला।

व्युल्पादन
संज्ञा पुं० [सं०] १. व्युत्पत्ति। मूल रूप या शब्द का निर्वचन। २. निर्दशन। शिक्षण (को०)।

व्युत्पाद्य
वि० [सं०] जिसकी निरूक्ति की जा सके। व्युत्पत्ति के योग्य [को०]।

व्युत्सर्ग
संज्ञा पुं० [सं०] जैनों के अनुसार शरीर का मोह या चिंता का परित्य़ाग। उ०— दूसरे प्रकार के तप में प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्य़ (सेवा), स्वाध्याय, ध्यान और व्युत्सर्ग (शरीरत्याग) की गणना। होती है। आ०, भा०, पृ०,१४३। २. विरक्ति। त्याग (को०)।

व्युत्सेक
संज्ञा पुं० [सं०] चारों ओर छिड़कना या उड़ेलना [को०]।

व्युद, व्य़ुदक
वि० [सं०] उदकविहीन। जलरहीत [को०]।

व्युदस्त
वि० [सं०] १. फेका हुआ। दूर किया हुआ। क्षिप्त। २. अस्वीकृत किया हुआ। ३. विकीर्ण [को०]।

व्युदास
संज्ञा पुं० [सं०] १. हटाना। निकाल देना। निरसन। परित्याग। (व्याकरण)। २. हत्या। विनाश। वध। ३. प्रतिषेध। निषेध। ४. उदासीनता। उपेक्षा। ५. फेंकना। दूर करना। अस्वीकृत करना।६. अंत। समाप्ति। विराम [को०]।

व्युदित
वि० [सं०] जिसपर वाद विवाद किया गया हो [को०]।

व्युन्मिश्र
वि० [सं०] मिलाया हुआ। मिश्रित किया हुआ। संकीर्ण [को०]।

व्युप
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो अपने हाथों को स्वयं चबाता या खाता हो [को०]।

व्युपदेश
संज्ञा पुं० [सं०] ठगने या धोखा देने का काम। ठगी। व्यपदेश।

व्युपद्रव
वि० [सं०] जो भाग्य के फेर से या दुर्दिन से अशांत एवं क्षुब्ध न हो।

व्युपपत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] फिर से जन्म होना। पुनर्जन्म [को०]।

व्युपरत
वि० [सं०] शांत। निश्चल। रूद्ध [को०]।

व्य़ुपरम
संज्ञा पुं० [सं०] १. शांति। विराम। समाप्ति। २. छुटकारा। निवृत्ति। ३. स्थिति।

व्युपवीत
वि० [सं०] उपवीतरहित। यज्ञोपवीत विहीन [को०]।

व्युपशम
संज्ञा पुं० [सं०] १. अशांति। २. विराम का अभाव (को०)। ३. पूर्ण विराम, शांति या समाप्ति (को०)।

व्युप्त
वि० [सं०] १. विकीर्ण किया हुआ। बिखेरा हुआ। २. कटाया हुआ। क्षार किया हुआ। मुंड़ित [को०]।

व्युप्तकेश
संज्ञा पुं० [सं०] १. शिव की एक नाम। २. आग्नि। ३. वह जिसने क्षीर कराया हो। ४. वह जिसके बाल बिखरे हों। अस्तव्यस्त केशोंवाला [को०]।

व्युष
संज्ञा स्त्री० [सं०] सूर्य के उदय होने का समय़। भोरहरी प्रातः- काल। सबेरा।

व्युषित
वि० संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'व्युष्ट' [को०]।

व्युषिताश्व
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत के अनुसार एक राजा का नाम।

व्युष्ट (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रभात। तड़का। सबेरा।२. दिन। दिवस। ३. फाल। परिणाम। ४. कौटिल्य़ अर्थाशास्त्र के अनुसार श्रावण में नए वर्ष का प्रथम दिवस (को०)।

व्युष्ट (२)
वि० १. जला या झुलसा हुआ। २. द्योतित, प्रकाशयुक्त या जो स्पष्ट हो गया हो (को०)। ३. व्यतीत। बीता अथवा। गुजरा हुआ (को०)। ४. उषःकालीन प्रकाश से युक्त। प्राभातिक सूर्य किरणों से युक्त। प्रभातीभूत। ५. बिताया हुआ। गुजारा हुआ। रहा हुआ। निवास द्बारा गुजारा हुआ (को०)।

व्युष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. फल। नतीजा। परिणाम। २. समृद्धि। ३. स्तुति। प्रशंसा। ४. प्रकाश। उजाला। ५. प्रभात। तड़का। ६. दाह। जलन। ७. इच्छा। कामना। खाहिश। ८. सौदर्य। सूंदरता (को०)। ९. आठवें दिन भोजन करना (को०)।

व्युक
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्राचीन देश का नाम। २. इस देश का निवासी।

व्यूढ़ (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो व्यूह बनाकर खड़ा हो। २. वह जिसका विवाह हो चुका हो।

व्यूढ़ (२)
वि० १. स्थूल। मो़टा। २. उत्तम। बढ़िय़ा। ३. तुल्य। समान। ४. दृढ़। मजबूत। ५. क्रमबद्ब। व्यवस्थित। जैसे, सेना (को०)। ६. विवाहित। ७. अव्यवस्थित। क्रमहीन। ८. विकसित (को०)। ९. फैला हुआ। विशाल (को०)। यौ०—व्युढ़कंकट = वर्म आदि को धारण किए हुए। जिसने कवच आदि पहना हो।

व्युढ़ि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विन्यास। सजावट। २. स्थूलता। मोटाई। ३. सैन्यविन्यास। दे० 'व्यूह' (को०)।

व्यूढोरस्क
वि० [सं०] विशाल या चौड़ी छातीवाला [को०]।

व्यूत
वि० [सं०] १. बुता हुआ। २. समतल या बराबर किया हुआ (को०)।

व्युति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कपड़े आदि बुनने की क्रिया। बुनाई। २. बुनने की मजदूरी (को०)।

व्यूह
संज्ञा पुं० [सं०] १. समूह। जमघट। २. निर्माण। रचना। ३. तर्क। ४.शरीर। बदन। ५. सेना। फौज। ६. परिणाम। नतीजा। ७. युद्ब के समय की जानेवाली सेना की स्थापना। लड़ाई के समय की अलग उपय़ुक्त स्थानों पर की हई सेना के भिन्न भिन्न अंगों की नियुक्ति। सेना का विन्यास। बलविग्यास। विशेष—प्राचीन काल में युद्धक्षित्र में लड़ने के लिये पैदल, अश्वारोही, रथ और हाथी आदि कुछ खास ढ़ंग से और खास खास मौकों पर रखे जाते थे, और सेना का यही स्थापन व्युह कहलाता था। आकार आदि के विचार से ये व्यूह कई प्रकार के होते थे। जैसे,— दंड़ व्युह, शकटव्यूह, वराहव्यूह, मकरव्यूह, सूचीव्यूह, पद्यव्यूह, चक्रव्यूह, वज्रव्यूह, गरूड़व्यूह, श्येनव्युह, मंडलव्यूह धनुर्व्यूद, सर्वतोभद्रव्यूह आदि। राजा या सेना का प्रधान सेनापति प्रायः व्यूह के मध्य मे रहता था; और उसपर सहसा आक्रमण नहीं हो सकता था। जब इस प्रकार सेना के सबअंग स्थापित कर दिए जाते थे, तब शत्रु सहसा उन्हें छिन्न भिन्न नहीं कर सकते थे। ८. किसी प्रकार के आक्रमण या विपत्ति आदि से रक्षित रहने के लिये की हुई ऊपरा योजनाएँ। ९. उपशीर्ष। अध्याय। भाग। अँश (को०)। १०. अलग अलग करना। विभाग करना (को०)। ११. अस्तव्यस्त करना (को०)। १२. स्थान बदलना (को०)। १३. विस्तुत व्याख्या (को०)। १४. श्वास प्रश्वास (को०)। यौ०—व्यूहपाष्णि, व्यूहपृष्ठ = सेना का पिछला भाग। चंदावल। व्यूहभंग, व्यूहभेद = सैनिकों कि स्थिति का क्रम टूटना। सानिकों की व्यूहस्यिति का छिन्नभिन्न होना। व्यूहरचना, व्यह- राज, व्यूहविभाग = सेना की एक विशिष्ट एवं पृथक् पंक्ति।

व्यूहक
संज्ञा पुं० [सं०] आकार, रूप [को०]।

व्यूहन
संज्ञा पुं० [सं०] १. युद्ब के लिये भिन्न भिन्न स्थानों पर सैनिकों की नियुक्ति करना। सेना को स्थापित करना। व्यूह रचना। २. मिलाना। ३. शरीर के अंगों की बनाबट (को०)। ४. स्थानपरिवर्तन (को०)। ५. (भ्रूणका) विकास (को०)।

व्यूहमति
संज्ञा पुं० [सं०] ललिविस्तर के अनूसार एक देवपुत्र का नाम।

व्यूहरचना
संज्ञा स्त्री० [सं०] सैनिकों को योजनानुसार उपयुक्त स्थान पर खड़ा करना मोरचेबंदी [को०]।

व्यूहराज
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक बोधिसत्व का नाम। २. सर्वात्कृष्ट व्यूह। श्रेष्ठ व्यूह (को०)। ३. एक प्रकार को समाधि (को०)।

व्यूहित
वि० [सं०] १. समूहबद्ध। २. व्यूह के आकार में स्थित। व्यूहबद्ध [को०]।

व्यूद्ध
वि० [सं०] १. ऋद्धिहीन। समृद्धिरहित वा वंचित। दुर्भाग्य- ग्रस्त। बदकिस्मत। २. किसी वस्तु से पृथक् किया हुआ। पृथक्कृत या वंचित। ३. दोषयुक्त। सदोष। अपूर्ण। ४. विफल किया हुआ। विमलीकृत। ५. सापराध [को०]।

व्युद्धि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अभाग्य। बदकिस्मती। २. न्यूनता। दूर्लभता। अभाव [को०]।

व्येक
वि० [सं०] [वि० स्त्री० व्योका] जिसमें एक की कमी हो। एक से ऊन। ऐकोन [को०]।

व्येनस्
वि० [सं०] दोषरहित। अनपराध [को०]।

व्येनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह जिसमें अनेक रंग हों। उषा, जिसमें विविध वण होते हे [को०]।

व्योकस्
वि० [सं०] अलग रहनेवाला। जो संपृक्त न हो [को०]।

व्योकार
संज्ञा पुं० [सं०] लौहकार। लोहर [को०]।

व्योम
संज्ञा पुं० [सं०व्योमन्] १. आकाश। अंतरिक्ष। आसमान। २. मेघ। बादल। ३. जल। पानी। ४. अवकाश। अंतर (को०)। ५. सूर्य का मंदिर। सूर्यमंदिर (को०)। ६. अभ्रक (को०)। ७. शरीरस्थ वायु (को०)। ८. एक बड़ी संख्या का सूचक शब्द (को०)। ९. काल्याण। सुरक्षा (को०)। १०. हरि। विष्णु (को०)। ११. एक एकाह कृत्य (को०)। ११. वर्षदेवता अथवा प्रजापति का नाम (को०)। १३. हरिवंश पुराण में वर्णित दशाई के एक पुत्र का नाम (को०)।

व्योमक
संज्ञा पुं० [सं०] बौद्ध मतानुसार एक आभूषण [को०]।

व्योमकेश
संज्ञा पुं० [सं०] शिव का एक नाम।

व्योमकेशी
संज्ञा पुं० [सं० व्योमकेशन्] शिव का एक नाम।

व्योमगंगा
संज्ञा स्त्री० [सं० व्योमगङ्गा] आकाशगंगा।

व्योमग
वि० [सं०] आकाशचारी [को०]।

व्योमगमनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह धिद्या जिसके द्बारा मनुष्य आकाश में उड़ सकता हो। आसमान में उड़ने कि विद्या।

व्योमगमनीविद्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'व्योमगमनी'।

व्योमगामी
वि० [सं० व्योमगामिन्] आकाशचारी [को०]।

व्योमगुण
संज्ञा पुं० [सं०] शब्द [को०]।

व्योमचर
संज्ञा पुं० [सं०] वह दो आकाश में विचरण करता हो। आकाशचारी।

व्योमचारी
संज्ञा पुं० [सं० व्योमचारिन्] १. देवता। १. पक्षी चिड़िया। ३. वह जो आकाश में विचरण करता हो। ४. संत (को०)। आकाशीय पिंड़ (को०)। ६. ब्राह्मण (को०)।

व्योमदेव
संज्ञा पुं० [सं०] शिव [को०]।

व्योमधारण
संज्ञा पुं० [सं०] पारा [को०]।

व्योमधूम
संज्ञा पुं० [सं०] मेघ। बादल।

व्योमध्वनि
संज्ञा स्त्री० [सं०] आकाशवाणी [को०]।

व्योमनाशिका, व्योमनासिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] भारती नामक पक्षी।

व्योमपंचक
संज्ञा पुं० [सं० व्योमपञ्चक] शरीर में रहनेवाले पाँच छिद्र [को०]।

व्योमपाद
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु का एक नाम।

व्योमपुष्प
संज्ञा पुं० [सं०] असंभव पदार्थ। आकाशकुसुम [को०]।

व्योममंजर
संज्ञा पुं० [सं० व्योममञ्चर]दे० 'व्योममंड़ल' [को०]।

व्योममंड़ल
संज्ञा पुं० [सं० व्योममण्ड़ल] १. आकाश। आसमान। उ०—व्योममंड़ल में—जगतीतल में सोती शांत सरोवर पर उस अमल कमलिनी दल में।—अपरा, पृ० १४। २. पताका। ध्वजा। झंड़ा।

व्योममाय
वि० [सं०] आकाशुचंबी [को०]।

व्योममुदगर
संज्ञा पुं० [सं०] वह शब्द जो हवा के बहुत जोर से चलने से होता है। हुका।

व्योममृग
संज्ञा पुं० [सं०] चंद्रमा के दसवें घोड़े का नाम।

व्योमयान
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह यान या सवारी जिसपर चढ़कर मनुष्य आकाश में उड़ सकता। हो। विमान। १. हवाई जहाज।

व्योमत्न
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य।

व्योमवल्ली
संज्ञा स्त्री० [सं०] आकाशवल्ली या अमरबेल नाम की लता।

व्योमवृष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] अंतरिक्ष, आकाश से होनेवाली वर्षा। उ०—मंजरित प्रकृति, मुकुलित दिगंत, कूजन गुंजन की व्योम- वृष्टि।—युगांत, पृ० ९।

व्योमसंभवा
संज्ञा स्त्री० [सं० व्योमसम्भवा] विचित्रवर्ण की गो। चितकबरी गाय [को०]।

व्योमसद्
संज्ञा पुं० [सं०] १. देवता। सुर। १. एक देवयोनि। गधर्व। ३. भूत, प्रेत [को०]।

व्योमसरिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] आकाशगंगा [को०]।

व्योमसरिता
संज्ञा स्त्री० [सं० व्योमसरित्] आकाशंगंगा। मंदाकिनी।

व्योमस्थल
संज्ञा स्त्री० [सं०] आकाश। उ०—विद्यून्मयी घटा है धन की। छिपा रत्नादीपक अञ्चल में, शोभित है वह व्योमस्थल में, ज्योति झलकती है पल पल में, वर्षा ऋतु ने दिखलाई है ज्य़ोतिर्मणी विभूति गगन की।—प्रेमांजलि, पृ० ११९।

व्योमस्थली
संज्ञा स्त्री० [सं०] पृथ्वी। जमीन।

व्योमाख्या
संज्ञा पुं० [सं०] १. अबरक। अभ्रक। १. मूल या आदि कारण [को०]।

व्योमाधिप
संज्ञा पुं० [सं०] शिव [को०]।

व्योमाभ
संज्ञा पुं० [सं०] गोतम बुद्ध का एक नाम।

व्य़ोमारि
संज्ञा पुं० [सं०] विश्वेदेवता।

व्योमी
संज्ञा पुं० [सं० व्योमिन्] चंद्रमा के दस घोड़ों में से एक का नाम [को०]।

व्य़ोमोदक
संज्ञा पुं० [सं०] वर्षा का जल। बरसात का पानी।

व्योम्निक
वि० [सं०] व्योम संबंधी। व्योम या आकाश का।

व्योरना †
क्रि० सं० [हि० व्योरा] दे० 'ब्योरना'।

व्योरा पु
संज्ञा पुं० [सं० विवरण] दे० 'ब्योरा'। उ०— मै हूँ जीव मती का भोरा। कहुँ जानुँ चौका कै व्योरा। —कबीर सा०, पृ० ५४८।

व्योरेवार
अव्य० [हि० ब्योरा] तफमील के साथ। ब्योरेवार। सविस्तर। उ०— इन तमाम ग्रंथों की रचना काल का ठीक ठीक पता लग सकता तो हिदुस्तान का धार्मिक, सामाजिक, और आर्थिक इतिहास अमपूर्वक व्योरेवार लिखा जाता।—हिदुं सभ्यता, पृ० १४३।

व्योष
संज्ञा पुं० [सं०] सोंठ, पीपल और मिर्च इन तीनों का समूह। त्रिकटु।

व्योहरनी †
संज्ञा स्त्री० [सं० व्यवहारणीय] व्यवहार। बर्ताव। उ०— कहै मित्र की बात करै दुसमन का करनी, ना कीजै विस्वास करै कैसी व्योहरनी।—पलटूं० पृ० ६७।

व्योहार †
संज्ञा पुं० [सं० व्यवहार] दे० 'व्यवहार'। उ०— देष्या चाह जग व्यवहार।—रामानंद०, पृ० ४९।

व्यौपारी †
संज्ञा पुं० [सं० व्यापारिन्] दे० 'व्यापारी'। उ०—तब वह बैष्णवन वा व्यौपारी के साथ धर रह्यो।—दो सौ बावन०, भा० २ पृ० १०४।

व्यौरना †
क्रि० सं० [सं० विवरण]दे० 'ब्योरना'। उ०—आदित वार व्यौरि ले आप। आपा व्योरत पुंनि न पाप। गोरख०, पृ०२४४।

व्यौहार †
संज्ञा पुं० [सं०व्यवहार] दे० 'व्यवहार'। उ०— और माविक चंद सो प्रभु कहे, जो तुम व्यौहार करो।—दो सौ बावन०, भा०१, पृ०१६५।

व्रंद पु
संज्ञा पुं० [सं०वृन्द] दे० 'वृंद'। उ— भिक्षक व्रंद दान तिहि दिन्नव। प० रासो, पृ०१५६।

व्रच्छ
संज्ञा पुं० [सं० वृक्ष]दे० 'वृक्ष'। उ०— सावण आयउ साहिवा पगह विलंबी गार। व्रच्छ विलंबी बेलड़याँ, नरा विलंबी नार।—ढोला०, दू०,२६९।

व्रज
संज्ञा पुं० [सं०] १. जाना या चलना। व्रजन। गमन। २. समुह। झुड़। ३. मथुरा और वृदावन के आसपास का प्रांत जो भगवान् श्रीकृष्ण का लीलाक्षेत्र है और जौ इसी कारण बहुत पवित्र माना जाता है। पुराणों आदि के अनुसार मथुरा से चारों ओर८४-८४कोस तक की भूमि ब्रजभूमि कही गई है; और इसकी पदक्षिणा का बहुत अधिक माहात्म्य कहा गया है। ४. अहीरों का टोला य़ा बाड़ा। उ०— नयननि को फल लेति निराख खरा मृग सुरभी व्रजवधु अहीर।— तुलसी (शब्द०)। ५. गोष्ठ। गोकुल। गोशाला (को०)। ६. आवास। विश्राम करने की जगह (को०)। ७. पथ। सड़क। मार्ग (को०)। ८. बादल (को०)।

व्रजक
संज्ञा पुं० [सं०] भिक्षा के निमित्त भ्रमणशील संन्यासी [को०]।

व्रजकिशोर
संज्ञा पुं० [सं०] कृष्ण [को०]।

व्रजन
संज्ञा पुं० [सं०] १. चलना। जाना। गमन। २. निर्वासन। देशनिकाला (को०)। ३. मार्ग। सड़क (को०)। ४. आकाश (को०)। ५. अजामीढ़ के एक पुत्र का नाम (को०)।

व्रजनाथ
संज्ञा पुं० [सं०] श्रीकृष्ण।

व्रजपर्यग्र
संज्ञा पुं० [सं०] पशुओ की गणना। विशेष—चंद्रगुप्त के समय में अध्यक्ष को राजकीय पशुओँ की पूरे निशान आदि के साथ बही में गिनती रखनी पड़ती थी।

व्रजभाषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] मथुरा, आगारा, इटावा और इनके आसपास के प्रदेशों में बोली जानेवाली एक प्रसिद्ध भाषा, जिसकी उत्पत्ति शौरसेनी प्राकृत से हुई है। उक्त जिलों के पश्चिम या दक्षिया में यही राजस्थानी का रूप धारण कर लेती है। विशेष—इस भाषा का प्राचीन साहित्य बहुत उच्च और बड़ा है और इधर चार पाँच सौ वर्षो में उत्तर भारत के अधिकांश कवियों ने प्रायः इसी भाषा में कविताएँ की है, जिनमें से सूर, तुलसी, बिहारी आदि अनेक कवियों ने तो बहुत अधिक प्रसिद्धि प्राप्त की है। यह भाषा बहुत ही कर्णमधुर मानी जाती है। खड़ी बोली में दो सज्ञाएँ, विशेषण और भूतकृदंत आदि आका- रांत होते है, वे इस भाषा में प्रायः ओकारांत हो जाते हैं।और कारणचिह्न भी प्रायः ओकारांत ही होते हैं जैसे,— घोड़ो, चल्यों को सों, मों आदि। इसके कारकचिह्न निज के हैं, जो न खड़ी बोली में मिलते है और न अवधी में। भाषा- विज्ञान की द्दष्टि से य़ह भाषा अंतरंग समुदाय की सब भाषाओं में मुख्य मानी जाती है।

व्रजभू (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] व्रजमंड़ल की भुमि [को०]।

व्रजभू (१)
संज्ञा पुं० एक प्रकार का कदंब [को०]।

व्रजभू (३)
वि० व्रज में होनेवाला [को०]।

व्रजभूमिक
संज्ञा पुं० [सं०] प्राचीन भारत में धर्म महामात्र का एक पद। उ०—ये धर्म महामात्र कई प्रकार के थे, स्त्री-अध्यक्ष- महामात्र, व्रज्ञभूमिक, अंतमहामात्र आदि।—आ०, भा०, पृ०२५२।

व्रजमंड़ल
संज्ञा पुं० [सं०व्रजमण्ड़ल] व्रज और उसके आस पास का प्रदेश।

व्रजमोहन
संज्ञा पुं० [सं०] श्रीकृष्ण।

व्रजयुवती
संज्ञा स्त्री० [सं०] गोपिका [को०]।

व्रजराज
संज्ञा पुं० [सं०] १. श्रीकृष्ण। नंद। महर। २. नंदजी। उ०— कुंवर कन्हाई दृगनि सुखदाई नखसिख मनि गननि अलंकृत राजत श्री व्रजराज के निकट।—घनानंद, पृ०५५६।

व्रजरामा
संज्ञा स्त्री० [सं०] व्रज की गोपी [को०]।

व्रजलाल
संज्ञा पुं० [सं०] श्रीकृष्ण।

व्रजलीला
संज्ञा स्त्री० [सं०] कृष्णलीला। व्रज में की गई कृष्ण भग- वान् की लीला। उ०— सो इनकी जा प्रकार व्रजलीला में प्राप्ति भई सो ऊपर कहि आए है।—दो सो बावन०, भा०,२, पृ०८९।

व्रजवधू, व्रजवनिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] गोपी [को०]।

व्रजवर
संज्ञा पुं० [सं०] श्रीकृष्ण [को०]।

व्रजवल्लभ
संज्ञा पुं० [सं०] श्रीकृष्ण।

व्रजवीर पु
संज्ञा पुं० [सं०] श्रीकृष्ण।

व्रजसान
संज्ञा पुं० [सं०] मनुष्य [को०]।

व्रजसुंदरी
संज्ञा स्त्री० [सं०व्रजसुन्दरी] गोपी [को०]।

व्रजस्त्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] गोपी [को०]।

व्रजस्पति
संज्ञा पुं० [सं०] श्रीकृष्ण।

व्रजांगन
संज्ञा पुं० [सं० व्रजाङ्गन] गोशाला। गोष्ट [को०]।

व्रजागना
संज्ञा स्त्री० [सं०व्रजाङ्गना] गोपिका। ब्रजवनिता।

व्रजाजिर
संज्ञा पुं० [सं०] गोष्ठ। गोशाला [को०]।

व्रजावास
संज्ञा पुं० [सं०] गोपों की बस्ती। ग्वालों का गांव [को०]।

व्रजित (१)
संज्ञा पुं० [सं०] गमन। जाना। घूमना [को०]।

व्रजित (२)
वि० गत। प्रस्थित। गया हुआ [को०]।

व्रजी
वि० [सं० व्रजिन] समूह के रूप में एक्तत्र [को०]।

व्रजेंद्र
संज्ञा पुं० [सं० व्रजेन्द्र] १. नंदराय। २. श्रीकृष्ण।

व्रजेश
संज्ञा पुं० [सं०] श्रीकृष्ण। व्रजैद्र [को०]।

व्रजेश्वर
संज्ञा पुं० [सं०] श्रीकृष्ण।

व्रज्य़
वि० [सं०] गोशाला या गोष्ठ से सँबंधित [को०]।

व्रज्य़ा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. घूमना। फिरना। पयटन। प्रव्रजन। उ०— सुरलोक जहा नगण्य हे वह व्रज्या व्रत धन्य धन्य है।— साकेत, पृ०३५८। २. गमन। जाना। ३. आक्रमण। चढ़ाई। ४. एक हो तरह की बहुत सी चीजें एक जगह एकत्र करना। ५. दल।६. रंगभूमि। नाट्यशाला। ७. जात। वर्ग श्रणी (को०)।

व्रण
संज्ञा पुं० [सं०] १. शरीर में होनेवाला फोड़ा। २. घाव। जख्म। चाट (को०)। ३. आस्यमग (को०)। ४. दोष। छिद्र। रंध्र (को०)। यौ०— व्रणकृत। व्रणकेतुघ्नी = दुग्घफेनी नाम का पौधा। व्रणग्रंथि। व्रणचिंतक। व्रणजता। व्रणाद्बिट् = (१) ब्राह्मणयष्टिका नाम का क्षुप। (२) व्रण का शत्रु। जिससे घाव ठीक हो जाय। व्रणधूपन = चिकंत्सार्थ व्रण का भाप से उपचार व्रण का वाष्ष द्बारा उपचार करना। व्रणापट्ट, व्रणपट्टक, व्रण- पट्टिका = घाव बाँधन का चारा या पट्टी। व्रणभृत् = चाटैल। आहत। व्रणयुक्त = जिसे घाव लगा हो फोड़े आदि से युक्त। व्रणरोपण। व्रणवास्तु। व्रणाविरोपण = दे० 'ब्रणरोपण'। व्रणाशोधन। व्रणशोथ। व्रणाशाषी = घाव, फोड़ा आदि के कारण दुर्बल या क्षीण। होनेवाल। व्रणसंरोहण = दे० 'व्रणरोहण'। व्रणह। व्रणहा। व्रणाहृत्।

व्रणकृत् (१)
संज्ञा पुं० [सं०] भिलावाँ।

व्रणकृत् (२)
वि० १. घाव करनेवाला। २. खुरचनेवाला। धीरे धीरे क्षय करनेवाला [को०]।

व्रणग्रंथि
संज्ञा स्त्री० [सं० व्रणग्रन्थि] वह गांठ जो फाडे़ के ऊपर हो जाती है। बैद्यक में इसकी गणना रागा में होती है।

व्रणचितक
संज्ञा पुं० [सं० व्रणचिन्तक] शल्यक्रिया वा चोरफाड़ करनेवाला जरहि [को०]।

व्रणजिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] गोरखमुंड़ी।

व्रणन
संज्ञा पुं० [सं०] बैधुन। भेदना। व्रण करना [को०]।

व्रणरोपण
संज्ञा पुं० [सं०] १. वैद्यक के अनुसार फोड़े में से दुषित मास आदि निकल जान पर ऐसा क्रिया करना जिससे वह भर जाय। फाड़े का धाव भरने की क्रिया। २. वह औषाधि जिससे क्षित या फोड़ा ठिक हो जाय।

व्रणवास्तु
संज्ञा पुं० [सं०] वह स्थान जहाँ फोंड़ा हो [को०]।

व्रणशोधन
संज्ञा पुं० [सं०] कमीला।

व्रणशोष
संज्ञा पुं० [सं०] फाड़े य़ा घाव में होनेवाली वह सूजन जिसके साथ म पीड़ा भी ही।

व्रणह
संज्ञा पुं० [सं०] रेंड़ का वृक्ष।

व्रणहा
संज्ञा स्त्री० [सं०] गुड़च।

व्रणहृत्
संज्ञा पुं० [सं०] कलिहारी या कलियारी नामक पेड़।

व्रणायाम
संज्ञा पुं० [सं०] बैद्यक के अनुसार एक प्रकार का वातरोग जिसमें मर्मस्थान के फोड़ि से सारे शरीर की वायु एकत्र होकर व्याप्त हो जाती है। यह रोग असाध्य माना जाता है।

व्रणारि
संज्ञा पुं० [सं०] १. बाल नामक गंधद्रव्य। २. अगस्त नामक वृक्ष।

व्रणित
वि० [सं०] व्रणयुक्त। आहत। घायल [को०]।

व्रणिल
वि० [सं०] (वृक्ष) जिसे क्षति पहुँची हो। काटा हुआ। छिन्न [को०]।

व्रणी
संज्ञा पुं० [सं०व्रणिन्] वह जिसे व्रण हुआ हो। व्रण का रोगी।

व्रणीय
वि० [सं०] व्रण संबंधी। व्रण या फोड़े का।

व्रणय
वि० [सं०] फोड़े को अच्छा करनेवाला [को०]।

व्रत
संज्ञा पुं० [सं०] १. भोजन करना। भक्षण। खाना। २. किसी पुराय तिथि का अथवा पुण्य की प्राप्ति के विचार से नियमपूर्वक उपवास करना। विशेष—प्रायःहिदु लोग या तो व्रत के दिन कुछ नहीं खाते, या केवल फल खाते हैं और या केवल कोई एक विशिष्ट पदार्थ खाकर रहते हैं। साधारणतः प्रत्य़ेक एकादशी को जो व्रत किया जाता है, उसमें लोग केवल फल ही खाते है, पर प्रदोष आदि के व्रत में अन्न भी खाया करते हैं। कुछ विशिष्ट तिथियों के व्रत भी विशिष्ट हुआ करते हैं। जैसे— निर्जला एकादशी के व्रत में जल तक न ग्रहण करने का विधान है। कुछ विशिष्ट वारों को उनके देवताओँ के उद्देश्य से भी व्रत किया जाता है। कुछ व्रत ऐसे भी होते है जो कई कई दिनों बल्कि महीनों तक चलते है। जैस— वाद्रा- यण, चातुमोस्य व्रत आदि। कुछ बड़े बडे ऐसे भी व्रत होत है जिनके अंत अथवा दूसर दिन विशेष विधानपूर्वक पारण किया जाता है। कुछ व्रत ऐसे भी है जिनका विधान केवल स्त्रियो के लिय़े है। जैसे,—जावपुत्र (जावत्पुत्रिका) या हरितालका व्रत। व्रत के एक दिन पहले से ही लागा कुछ विशेष आचार- पूर्वक रहते है। क्रि० प्र०—करना।—रखना। ३. कोइ काम करने अथवा न करने का नियमपूर्वक दृढ़ निश्चय। किसी बात का पक्का संकल्प। जैसे,—ब्रह्मचय व्रत, पतिव्रता, पत्निव्रत। उ०—किस व्रत में है व्रता बार यह निद्रा का यो त्याग किए। —पंचवटी, पृ०६। ४. धार्मिक अनुष्ठान। धार्मिक नियम संयम आदि (को०)। ५. जावनचया। आचरण। चालचलन (को०)। ६. विधि। विधान। नियम (को०)। ७. यज्ञ (को०)। ८. कम। करतब (को०)। ९. याजना (को०)। १०. मानसिक स्फुर्ति (को०)। ११. कामाय। ब्रह्माचर्य (को०)। १२. एक हा प्रकार के मार्जन का अभ्यास (को०)। १३. दुग्धाहार (को०)।

व्रतग्रहण
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी धार्मिक अनुष्ठान का करन के लिये संकल्प लेना। २. संन्यास लेना [को०]।

व्रतचर्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] किसी प्रकार का व्रंत करने या रहने का काम।

व्रतचारिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] व्रतचारी होने का भाव या धर्म।

व्रतचारी
संज्ञा पुं० [सं० व्रतचारिन्] वह जो किसी प्रकार के। ताका आचरण या अनुष्ठान। करता हो। व्रत करनेवाला।

व्रतति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विस्तार। २. लता। उ०—डोलने लगी मधुर मधुवात, हिला तुण, व्रतर्ति कुंज, तरू पात। —गुंजन, पृ०४७। यौ०—व्रततिवलय = (१) लताओँ का कंकण। (२) लताओँ का घेरा वा आवेष्टन।

व्रतती
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विस्तार। फैलाव। २. लता।

व्रतदंड़ी
संज्ञा पुं० [सं० व्रतदणिड़न] वह जो दंड़धारण का द्रत पालन करता हो।

व्रतदान
संज्ञा पुं० [सं०] व्रत के निमित्त किया हुआ दान। वह दान जो व्रत सबंधी हो [को०]।

व्रतधर
संज्ञा पुं० [सं०] वह जिसने किसी प्रकार का व्रत धारण किया हो। व्रत करनेवाला।

व्रतधारण
संज्ञा पुं० [सं०] किसी धार्मिक अनुष्ठान को विधिवत् करना या विधिवत् व्रत रखना [को०]।

व्रतपक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १. भाद्रपद मास का शुक्लपक्ष। २. एक प्रकार का साम।

व्रतपारण
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री०व्रतपारणा] व्रत या उपवास की विधिवत् समाप्ति [को०]।

व्रतप्रतिष्ठा
संज्ञा स्त्री० [सं०] किसी व्रत की प्रतिष्ठा करना। व्रत का पालन करना [को०]।

व्रतबंध
संज्ञा पुं० [सं० व्रत + बन्ध] यज्ञोपवीत। जनेऊ। उ०— सुदिन सोधि मंगल किए, दिए भूप व्रतबंध।—तुलसी ग्रं० पृ०८२।

व्रतभंग
संज्ञा पुं० [सं० व्रतभड़्ग] व्रत, नियम वा प्रतिज्ञा का टुट जाना [को०]।

व्रतभिक्षा
संज्ञा पुं० [सं०] वह भिक्षा जो बालक को य़ज्ञोपवीत के समय माँगनी पड़ती है।

व्रतरूचि
वि० [सं०] व्रत में आनंद लेनेवाला [को०]।

व्रतलुप्त
वि० [सं०] अपना व्रत तोड़नेवाला [को०]।

व्रतलोपन
संज्ञा पुं० [सं०] व्रतभंग [को०]।

व्रतविसर्ग, व्रतविसर्जन
संज्ञा पुं० [सं०] व्रत की समप्ति।

व्रतवैकल्य
संज्ञा पुं० [सं०] व्रत पूरा न होना।

व्रतसंग्रह
संज्ञा पुं० [सं० व्रतसङ्ग्रह] वह दीक्षा जो यज्ञोपवीत के समय गुरू से ली जाती है।

ब्रतसंपादन
संज्ञा पुं० [सं०] व्रत पूरा करना [को०]।

व्रतसंरक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] व्रतपालन [को०]।

व्रतसमापन
संज्ञा पुं० [सं०] व्रत पूरा होना। व्रतसंपादन [को०]।

व्रतस्थ
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जिसने किसी प्रकार व्रत धारण किया हो। २. ब्रह्मचारी।

व्रतस्नात
वि० [सं०] व्रत पूरा करने के बाद स्नान करनेवाला [को०]।

व्रतस्नातक
संज्ञा पुं० [सं०] तीन प्रकार के ब्रह्मचारियों में से एक प्रकार का ब्रह्माचारी। वह ब्रह्माचारी जिसने गूरू के यहाँ रहकर व्रत को समाप्त कर लिया हो पर बिना वेद समाप्त किए ही घर लौट आया हो।

व्रतस्नान
संज्ञा पुं० [सं०] वह स्नान जो व्रतसामाप्ति के बाद किया जाता है [को०]।

व्रतहानि
संज्ञा स्त्री० [सं०] व्रत का त्याग करना। व्रत छोड़ देना [को०]।

व्रताचरण
संज्ञा पुं० [सं०] व्रत का पालन [को०]।

व्रताचारी
वि० [सं०व्रताचारिन्] व्रत का पालन करनेवाला [को०]।

व्रतादान
संज्ञा पुं० [सं०] कोई व्रत ग्रहण करना। व्रत लेना [को०]।

व्रतादेश
संज्ञा पुं० [सं०] उपनयन नामक संस्कार। यज्ञोपवीत।

व्रतादेशन
संज्ञा पुं० [सं०] वेदों का वह उपदेश जो उपनयन संस्कार के बाद ब्रह्माचारी को दिया जाता है।

व्रतापत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] व्रत छोड़ना। व्रत का त्यागना [को०]।

व्रतिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जिसने किसी प्रकार का व्रत धारण किया हो। व्रत का आचरण करनेवाला। २. ब्रह्माचारी (को०)। ३. संन्यासी (को०)। ४. यजमान (को०)।

व्रतिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] तपस्विनी [को०]।

व्रती
संज्ञा पुं० [सं०व्रतिन्] १. वह जिसने किसी प्रकार का व्रत धारण किया हो। व्रत का आचरण करनेवाला। २. वह जो यज्ञ आदि करता हो। यजमान। ३. ब्रह्माचारी। ४. एक प्राचीन ऋषि का नाम।५. संन्यासी (को०)।

व्रतेयु
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार रौद्राक्ष के एक पुत्र का नाम।

व्रतेश
संज्ञा पुं० [सं०] शिव का एक नाम।

व्रतोपनयन
संज्ञा पुं० [सं०] यज्ञोपवीत संस्कार [को०]।

व्रतोपवास
संज्ञा पुं० [सं०] व्रत के निमित किया जानेवाला उपवास। व्रत सबंधी उपवास [को०]।

व्रतोपायन
संज्ञा पुं० [सं०] व्रत का प्रांरभ [को०]।

व्रतोपोह
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का साम।

व्रत्तामन पु †
संज्ञा पुं० [सं० वंर्तमान] दे० 'वर्त्तमान'। उ०— भुतह भविष्य अरू व्रत्तमन इह अपुब में कथ सुनिय। पृ०, रा०, २४।४।

व्रत्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जिसने किसी प्रकार का व्रत धारण किया हो। २. ब्रह्माचारी। ३. व्रत के उपपुक्त आहार (को०)।

व्रध्न
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'ब्रध्य' [को०]।

व्रम्म पु †
संज्ञा पुं० [सं०ब्रह्मा, प्रा०, व्रम्म] दे० 'ब्रह्मा'। उ०—गंगा व्रम्म कमंड़ली, पावनता विणपार।—बाँकी० ग्रं०, भा०,२, पृ०११५।

व्रश्चन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सोना, चाँदी आदि काटने की छेनी। २. वह बुरादा जो लकड़ी आदि चीरने पर गिरता है। ३. कुल्हाड़ी। ४. छेदने या काटने की क्रिया। ५. छोटी आरी (को०)। ६. पेड़ में छेद करने से उसमें से निकलनेवाला निर्यास (को०)।

व्रच्शन (२)
वि० काटनेवाला। जिससे काटा जाय या जो काट सके।

व्रहासन पु
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्म, अप० व्रह (ब्रह्मा = अर्थात् देवता) + अशन(= भोजन) या सं० वर्ह(= श्रंष्ठ, अग्र) + अशन(= भोजऩ)] दे० 'अग्राशन'। उ०—किय भोजन सब सथ्य व्रहासन ग्रास दिय।—पृ० रा०,। ६१।१९३।

व्रह्म
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्मन्] दे० 'ब्रह्म'।

व्रह्मापुर
संज्ञा पुं० [सं०] बृहत्सांहिता के अनुसार एक देश का नाम।—बृहत्० पृ० ८६।

व्रह्ममणि
संज्ञा स्त्री० [सं०] बृहत्संहिता के अनुसार एक रत्न का नाम।—बृहत्०, पृ० ३७७।

ब्रह्मानंद
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्मानन्द]दे० 'ब्रह्मास्वाद'। उ०—इसका आस्वाद ब्रह्मानंद के समान होता है।—रस० क०, पृ० ३३।

व्रह्मास्वाद
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्मास्वाद] ब्रह्मसाक्षात्कार करने का आनंद।

व्राचट, व्राचड
संज्ञा स्त्री० [अप०] १. अपभ्रंश भाषा का एक भेद जिसका व्यवहार आठवीं से ग्यारहवीं शाताब्दी तक सिंध प्रांत में था। २. पैशाचिका भाषा का एक भेद।

व्राज
संज्ञा पुं० [सं०] १. कुत्ता। २. दल। समूह। ३. जाना। गमन। ४. कुक्कट। मुर्गा (को०)।

व्राजपति
संज्ञा पुं० [सं०] दल या समूह का नायक।

व्राजि
संज्ञा स्त्री० [सं०] बवंड़र। तूफान। आँधी [को०]।

व्राजिक
संज्ञा पुं० [सं०] संन्यासियों का एक व्रतोपवास जिसमें वे केवल दूध पीते है [को०]।

व्रात
संज्ञा पुं० [सं०] १. दल। समूह। २. मनुष्य। आदमी। ३. वह परिश्रम जो जाविका के लिये किया जाय। ४. वह जिसका कोई निश्चित वृत्ति न हो या जो चोरी, डाके से निर्वाह करता हो। जरायम पेशा। दुर्जीवी। ५. बराती (को०)। ६. दैनिक मजदूरी। ७. यदाकदा कार्य में नियुक्ति (को०)। ८. जातिच्युत ब्राह्मण को संतति (को०)।

व्रातजाति
संज्ञा स्त्री० [सं०] दल के रूप में इधर उधर रहनेवाली जाति [को०]।

व्रातजीवन
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो शारीरिक। परिश्रम करके अपना। निर्वाह करता हो।

व्रातपति
संज्ञा पुं० [सं०] किसी समूह या संघ का अध्यक्ष [को०]।

व्रातिक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का धार्मिक कृत्य [को०]।

व्रातीन
वि० [सं०] १. श्रमजीवी मजदूर। २. लूट मार करनेवाला। जो लूटमार द्बारा जाविकार्जन करता हो। ३. संघबद्ब होकर रोजी कमानेवाला [को०]।

व्रात्य (१)
वि० [सं०] व्रत संबंधी। ब्रत का।

व्रात्य (२)
संज्ञा पुं० १. वह जिसके दस संस्कार न हुए हों। संस्कार- हीन। उ०—अथर्ववेद में मगध के निवासियों को व्रात्य कहा गाय हो।—हिंदु० सभ्यता, पृ० ९६। २. वह जिसका उपनयन या यज्ञोपवीत संस्कार न हुआ हो। विशेष—ऐसा मनुष्य पतित और अनार्य समझा जाता है और उसे वैदिक कृत्य आदि करने का अधिकार नहीं होता। शास्त्रों में ऐसे व्यक्ति के लिये प्रायाश्चित्त का विधान किया गया है। प्राचीन वैदिक काल में 'व्रात्य' शब्द प्रायः परब्रह्म का वाचक माना जाता था; और अथर्ववेद में 'व्रात्य' की बहुत अधिक माहिमा कही गई है। उसमें वह वैदिक कार्यो का अधिकारी, देवप्रिय, ब्राह्मणों और क्षत्रियों का पूज्य, यहाँ तक की स्वयं देवाधिदेव कहा गया है। परंतु परवर्ती काल में यह शब्द संस्कारभ्रष्ट, पतित और निकृष्ट व्यक्ति का वाचक हो गया है। ३. नीच या बदमाश व्यक्ति। ४. वह मनुष्य जो अमवर्ण माता पिता से उत्पन्न हो। दोगला। वर्णसंकर। यौ०—व्रात्यगण = इधर उधर धूमनेवाली जाति या वर्ग। व्रात्यचर्या = नीचतापूर्ण आचार व्यवहार। व्रात्यों का सा रहन सहन। खानाबदोश व्यक्ति का आचार विचार। व्रात्यवुव = वह व्यक्ति जो अपने को व्रात्य कहना हो। व्रात्ययज्ञ = एक प्रकार का यज्ञ। व्रात्ययाजक। व्रात्यस्तोम।

व्रात्यता
संज्ञा स्त्री० [सं०] व्रात्य का भाव या धर्म। व्रात्यत्व।

व्रात्यत्व
संज्ञा पुं० [सं०] व्रात्य का भाव या धर्म। व्रात्यता।

व्रात्ययाजक
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो व्रात्यों का यज्ञ कराता हो।

व्रात्यस्तोम
संज्ञा पुं० [सं०] प्राचीन काल का एक प्रकार का यज्ञ जो व्रात्य या संस्कारहीन लोग किया करते थे।

व्रात्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] व्रात्य की कन्या। जातिच्युत व्याक्ति की कन्या [को०]।

व्रिद †
संज्ञा पुं० [सं० विरद] विरद। सुजस। उ०—मंछ कवि कहैं पुन सरन सधार व्रिद याही ते सरन लयो रावरे चरन को।—रघु० रू०, पृ० २८५।

व्राख †
संज्ञा पुं० [देश०] कदम। डग। उ०—भागां लार भरंतनह, व्रीखाँ बाकाड़याँह।—बाँकी० ग्रं०, भा० १, पृ० २८।

व्रीड़
संज्ञा पुं० [सं०] लज्जा। शरम।

व्रीड़न
संज्ञा पुं० [सं०] १. लज्जा। शर्म। हया। २. शिष्टता। विनम्रता। ३. निम्नता। अवनति। अपकष [को०]।

व्रीडा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. लज्जा। शरम। २. नम्रता। शिष्टता। संकोच (को०)। यौ०—व्रीडानत, व्रीड़ान्वित = (१) विनम्र। लज्जित। संकुचित। व्रीडादान = नम्रता के कारण। मिलनेवाला पुरस्कार।

व्रीध पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० वृद्धि] दे० 'वृद्धि'। उ०—बाँका हरष न व्रीध सूँहाण हुवाँ नँह सोक। हरि संतोष दिया हिए तिणनूँ दीध त्रिलोक।—बाँकी०, ग्रं०, भा० ३, पृ० ६३।

व्रीडित (१)
वि० [सं०] लज्जित। शर्मिंदा। २. विनीत। नम्र [को०]।

व्री़डित (२)
संज्ञा पुं० १. लज्जा। शर्म।२. विनय। नम्रता [को०]।

व्रील
संज्ञा पुं० [सं०] लज्जा। शरम [को०]।

व्रीलस
वि० [सं०] लज्जित [को०]।

व्रीहि
संज्ञा पुं० [सं०] १. धान। २. चावल। ३. अन्न (को०)। ४. धान का खेत (को०)। ५. चावल का बीज या दाना (को०)।

व्रीहिक
वि० [सं०] १. जिसके पास धान हो। २. धान रोपनेवाला [को०]।

व्रीहिकांचन
संज्ञा पुं० [सं० व्रीहिकाञ्चन] मसूर।

व्रीहितुंदिका
संज्ञा स्त्री० [सं० व्रीहितुन्दिका] देवधान्य।

व्रीहीद्रोण
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का गुल्म।

व्रीहिपार्णिका
संज्ञा संज्ञा० [सं०] शालिपर्णी।

व्रिहिपर्णी
संज्ञा स्त्री० [सं०] शलिपर्णी [को०]।

व्रीहिभेद
संज्ञा पुं० [सं०] चेना धान।

व्रीहिमय
संज्ञा पुं० [सं०] यज्ञ में आहुति के लिये निर्मित चावल का खीर। पुरीडीश [को०]।

व्रीहिमुख
संज्ञा पुं० [सं०] सुश्रुत के अनुसार प्राचीन काल का एक प्रकार का शस्त्र जिसका व्यवहार शस्त्रचिकित्सा में होता था।

व्रीहिराजिक
संज्ञा पुं० [सं०] चेना धान।

व्रीहिल
वि० [सं०] दे० 'व्रीहिक' [को०]।

व्राहीवाप
संज्ञा पुं० [सं०] धान की बुवाई। धान रोपना [को०]।

व्रीहिवापी
वि० [सं० व्रीहिवापिन्] धान रोपनेवाला। धान बोनेवाला [को०]।

व्रीहिश्रष्ठ
संज्ञा पुं० [सं०] शालि धान्य।

व्रीही (१)
संज्ञा पुं० [सं० व्राहिन्] वह खेत जिसमें धान बोया गया हो।

व्रीही (२)
संज्ञा पुं० दे० 'ब्राहि'।

व्रीह्यगार
संज्ञा पुं० [सं०] वह स्थान जहाँ पर बहुत सा धान रखा जाता हो। धान का गोदाम।

व्रीह्यपूप
संज्ञा पुं० [सं०] प्राचीन काल का एक प्रकार का पूआ जो चावल को पीसकर बनाया जाता था।

व्रीह्यागार
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'व्रीह्यगार'।

व्रीह्याग्रयण
संज्ञा पुं० [सं०] व्रीहि का अग्रभाग वा अँगौगा [को०]।

व्रीह्यर्वरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह खेत या भूमि जो धान से उर्वर हो। धान का खेत [को०]।

व्रृडित
वि० [सं०] १. डूबा हुआ। निमग्न।२. भूला वा भटका हुआ [को०]।

व्रैह
वि० [सं०] चावल का बना हुआ [को०]।

व्रैहिक
वि० [सं०] धान के साथ उत्पन्न किया हुआ [को०]।

व्रैहेय (१)
वि० [सं०] १. जो धान के साथ बोया गया हो। २. धान बोने योग्य [को०]।

व्रैहेय (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. धान का खेत। शालि का खेत। धान बोने योग्य भूमि [को०]।

व्लीन
वि० [सं०] १. सँभाला हुआ। सहारा वा भरोसा दिया हुआ। २. कुचला हुआ। पददलित। ३. गया हुआ। निर्गत। गत [को०]।

व्लेष्क
संज्ञा पुं० [सं०] जाल। फंदा [को०]। यौ०—व्लेष्कहत = जो फंदे द्बारा हत हो।

व्हाँ
क्रि० वि० [हिं० वहाँ] दे० 'वहाँ'। उ०—चले मजल दर मजल आया बेदर के मिसल। व्हाँ हुई वो नक्कल सो सकल तुम सुनो।—दक्खिनी०, पृ० ४५।

व्हाला †
संज्ञा पुं० [देश०] १. प्यारा। प्रिय।२. ज्वाला। ३. बर- साती नाला। उ०—झामकि पइठा झालि, सुंदरि दाँठा सासविण। जिमि व्हाला विच वाल, प्रिव जाई मारू नहीं।—ढ़ाला०, दु० ६०४।

व्हिस्की
संज्ञा स्त्री० [अं०] एक अंग्रेजी शराब। उ०— इसके बाद उसने मुझसे पूछा—'कहा' क्या पिओगे ? शेरा, शोपेन, व्हिस्की, ब्राँड़ी या ओर कोइ दूसरी'।—सन्यासी, पृ० २३९।

व्हे
सर्व [हिं० वह] दे० 'वह'। उ०—पेय असेदे पूगणा, अलगो घणा अकथ्य। व्हेविण जाण्या हालणा, सबल (जो) विण सथ्य।—बाँका० ग्रं०, भा० २, पृ० ४५।