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विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/प्रबंध

विक्षनरी से

प्रबंध
संज्ञा पुं० [सं० प्रबन्ध] १. प्रकृष्ट बंधन। बाँधने की डोरी आदि। २. बँधान। कई वस्तुओं या बातों का एक में ग्रंथन। योजना। ३. पूर्वापर संगति। बँधा हुआ सिलसिला। ४. एक दूसरे से संबंद्ध वाक्यरचना का विस्तार। लेख या अनेक संबंद्ध पद्यों में पूरा होनेवाला काव्य। निबंध। उ०—दुर- जोधन अवतार नृप सत साँवत सकबंध। भारथ सम किय भुवन मँह ताते चंद्र प्रबंध।—प० रासो, पृ० १। विशेष—फुटकर पद्यों को प्रबंध नहीं कहते, प्रकिर्णक कहते हैं। ५. आयोजन। उपाय। ६. व्यवस्था। बंदोबस्त। इंतजाम।उ०—इतै इंद्र अति कोह कै औरै किए प्रबंध। नँदनंदहु को लखत नहिं ऐसो मति को अंध।—व्यास (शब्द०)।

प्रबंधक
वि० संज्ञा पुं० [सं० प्रबन्धक] प्रबंधकर्ता। प्रबंध करनेवाला [को०]।

प्रबंधकल्पना
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रबन्धकल्पना] १. प्रबंधरचना। संदर्भरचना। २. ऐसा प्रबंध जिसमें थोड़ी सी सत्य कथा में बहुत सी बात ऊपर से मिलाई गई हो।

प्रबंधकाव्य
संज्ञा पुं० [सं० प्रबन्धकाव्य] काव्य का एक भेद जो मुक्तक काव्य के विपरीत है और जिसमें जीवन की घटनाओं का क्रमबद्ध उल्लेख किया जाता है, जैसे रामचरित- मानस। उ०—कहीं तो प्रबंधकाव्य और कहीं मुक्तककाव्य के कृत्रिम विभेद खडे़ कर सूरदास जी की हेठी दिखाई गई है।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० १०७।

प्रबंधन
संज्ञा पुं० [सं० प्रबन्धन] १. प्रकृष्ट बंधन। डोरी आदि बाँधने की वस्तु। २. बाँधने का कार्य। बाँधना [को०]।

प्रब प † (१)
संज्ञा पुं० [सं० प्रभु] प्रभु। स्वामी। मालिक। ईश्वर। उ०—साधु संग कबहूँ नहिं कीन्हा, नहिं को रति प्रब गाई। जन नानक में नहीं कोउ गुन, राखि लेहु सरनाई।—संत वाणि०, भा० २, पृ० ५०।

प्रब (२)
संज्ञा पुं० [सं० पर्व, पुं० हिं० प्रब्ब] दे० 'पर्ब'।

प्रबच्छति प्रेयसी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'प्रवत्स्यत्प्रेयसी'। उ०—कही प्रबच्छति प्रेयसी, आगतपतिका बाग।—मति० ग्रं०, पृ० २९४।

प्रबभ्र
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्र [को०]।

प्रबर्ह
वि० [सं०] सर्वोत्कृष्ट। सर्वश्रेष्ठ। सर्वप्रधान [को०]।

प्रबल (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० प्रबला] १. बलवान्। प्रचंड। २. जोर का। तेज। तुंद। उग्र। उ०—कबहुँ प्रबल चल मारुत जहँ जहँ मेघ बिलहिं।—तुलसी (शब्द०)। ३. कष्टकार। हानिकार। खतरनाक (को०)। ४. भारी। घोर। महान्। उ०—लपट झपट झहराने हहराने बात झहराने भट परयो प्रबल परावनो।—तुलसी (शब्द०)। ५. हानिकर। नुकसान- देह (को०)।

प्रबल (२)
संज्ञा पुं० १. एक दैत्य का नाम। २. पल्लव। कोयल [को०]।

प्रबला (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रसारिणी नाम की ओषधि।

प्रबला (२)
वि० स्त्री० १. बहुत बलवती। २. प्रचंडा।

प्रबह्लिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] पहेली। प्रहेलिका। बुझौवल [को०]।

प्रबाधक
वि० [सं०] १. विरोध करनेवाला। हटानेवाला। २. सतानेवाला। कष्टकर। ३. अलग रखने या रोकनेवाला। पीछे रखनेवाला। ४. अस्वीकार करनेवाला। न माननेवाला [को०]।

प्रबाधन
संज्ञा पुं० [सं०] १. कष्ट देना। सताना। २. अस्वीकार करना। न मानना। ३. अलग रखना। दूर रखना [को०]।

प्रबाधित
वि० [सं०] १. सताया हुआ। पीड़ित। २. बलपूर्वक आगे किया हुआ। आगे बढ़ाया हुआ [को०]।

प्रबाल
संज्ञा पुं० [सं०] १. पल्लव। कोपल। उ०—रसाल का वृक्ष अपने विशाल हाथों का पिप्पल के चंचल प्रबालों से मिलाता है।—श्यामा०, पृ० ४१। २. दे० 'प्रवाल'।

प्रबालक
संज्ञा पुं० [सं०] एक पक्ष।

प्रबालपद्म
संज्ञा पुं० [सं०] रक्त कमल। लाल कमल [को०]।

प्रबालफल
संज्ञा पुं० [सं०] लाल चंदन।

प्रबालभस्म
संज्ञा पुं० [सं० प्रबालभस्मन्] मूँगे का भस्म जो एक औषधि है [को०]।

प्रबालवर्ण
वि० [सं०] मूँगे के रंग का लाल [को०]।

प्रबालिक
संज्ञा पुं० [सं०] जीवशाक।

प्रबास पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रवास] दे० 'प्रवास'। उ०—कहि पूरब अनुराग अरु प्रबास विचारी। रस सिंगार बियोग के तीन भेद निरधारी।—मति० ग्रं०, पृ० ३५०।

प्रबाह पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रवाह] दे० 'प्रवाह'। उ०—कवि मति- राम जाकी चाह ब्रजनारिन को देह अँसुवान की प्रबाह भीजियतु है।—मति० ग्रं०, पृ० २८३। विशेष—यह शब्द पुलिंग है, पर उदाहरण में कवि ने स्त्रीलिंग प्रयोग किया है।

प्रबाहु
संज्ञा पुं० [सं०] हाथ का अगला भाग। पहुँचा।

प्रबाहुक
अव्य० [सं०] १. सीध में। एक लाइन में। २. समतल में। सतह के बराबर।

प्रबिसना पु
क्रि० अ० [सं० प्रविश्] दे० 'प्रविसना'। उ०— दधि दूब हरद भरि कनक थार। बहु गाँन करत प्रबिसंत बाल।—ह० रासो, पृ० ३२।

प्रबीन पु
वि० [सं० प्रवीण] दे० 'प्रवीण'। उ०—सोच करो जिन होहु सुखी मतिराम प्रबीन सबै नर नारी। मंजुल बंजुल कुंजन में घन, पुंज सखी ! ससुरारि तिहारी।—मति० ग्रं०, पृ० २९०।

प्रबीर पु
वि० [सं० प्रवीर] दे० 'प्रवीर'।

प्रबुद्ध (१)
वि० [सं०] १. प्रबाध युक्त। जागा हुआ। २. होश में आया हुआ। जिसे चेत हुआ हो। ३. पंडित। ज्ञानी। ४. विकसित। प्रफुल्ल। खिला हुआ। ५. सजीन (को०)।

प्रबुद्ध
संज्ञा पुं० १. नव योगेश्वरों में से एक योगेश्वर। २. ऋषभेदव के एक पुत्र जो भागवत के अनुसार परम भागवत थे।

प्रबुध
संज्ञा पुं० [सं०] महान् संत। श्रेष्ठ महात्मा [को०]।

प्रबोध
संज्ञा पुं० [सं०] १. जागना। नींद का हटना। २. यथार्थ ज्ञान। पूर्ण बोध। ३. सात्वंना। आश्वासन। ढाढ़स। तसल्ली। दिलासा। उ०—आनंदघन हित बरस दरस पद परस प्रबोध प्रसादहि दीजै।—घनानंद, तृ० ३४४। क्रि० प्र०—करना। ४. चेतावनी। क्रि० प्र०—देना।५. महायुद्ध की एक अवस्था। ६. विकाश। खिलना। ७. सुगंध को पुनःतेज करना। गंध दीप्त करना (को०)। ८. व्याख्या करना। सुस्पष्ट करना। विस्तृत करना (को०)।

प्रबोधक (१)
वि० [सं०] १. जगानेवाला। २. चेतानेवाला। ३. समझानेवाला। ज्ञानदाता। ४. सांत्वना देनेवाला। ढाढ़स बँधानेवाला।

प्रबोधक
संज्ञा पुं० वह व्यक्ति जिसका काम राजा को जगाना हो। राजा को जगानेवाला। स्तुतिपाठक [को०]।

प्रबोधन
संज्ञा पुं० [सं०] १. जागरण। जागना। २. जगाना। नींद से उठाना। ३. यथार्थ ज्ञान। बोध। चेत। ४. बोध कराना। जताना। ज्ञान देना। चेत कराना। समझाना बुझाना। ५. विकास या विकसित करने का कार्य। ६. सात्वंना या सात्वंना देने का कार्य। ७. गंध को दीप्त करना (को०)। क्रि० प्र०—करना।—होना।

प्रबोधनप्रणाली
संज्ञा पुं० [सं० प्रबोधन + प्रणाली] अध्यापन की एक विधि [को०]।

प्रबोधना पु
क्रि० स० [सं० प्रबोधन] १. जगाना। नींद से उठाना। २. सजग करना। सचेत करना। होशियार करना। जताना। ३. समझाना बुझाना। मन में बात बिठाना। उ०— (क) कहि प्रिय वचन विवेकमय कीन्ह मातु परितोष। लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगति बिपिन गुन दोष।—तुलसी (शब्द०)। (ख) प्रभु तब मोहिं बहु भाँति प्रबोधा।—तुलसी (शब्द०)। ४. सिखाना। पाठ पढ़ाना। पट्टी पढ़ाना। उ०— सखिन सिखावन दीन, सुनत मधु परिणाम हित। तेइ कछु कान न कीन, कुटिल प्रबोधी कूबरी।—तुलसी (शब्द०)। ५. ढाढ़स देना। तसल्ली देना। उ०—(क) कहि कहि कोटिक कपट कहानी। धीरज धरहु प्रबोधेसि रानी।— तुलसी (शब्द०)। (ख) जननी ब्याकुल देखि प्रबोधत धीरज करि नीके जदुराई। सूर श्याम को नेकु नहीं डर जनि रोवै, तू जसुमति माई।—सूर (शब्द०)।

प्रबोधनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] कार्तिक शुक्लपक्ष की एकादशी जिस दिन विष्णु भगवान् सोकर उठते हैं। देवोत्थान एकादशी। २. जवासा। धमासा।

प्रबोधित
वि० [सं०] [वि० स्त्री० प्रबोधिता] १. जो जगाया गया हो। जागा हुआ। २. जिसका प्रबोध किया गया हो। ३. ज्ञानप्रपाप्त। क्रि० प्र०—करना।—होना।

प्रबोधिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक वर्णवृत्त जिसके प्रत्येक चरण में (स ज स ज ग) सगण, जगण फिर सगण, जगण और अंत में गुरु होता है। इसे सुनदिनी और मंजुभाषिणी भी कहते हैं। दे० 'सुनंदिनी'।

प्रबोधिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कार्तिक शुक्ल एकादशी। पुराणा- नुसार इस दिन भगवान् विष्णु सोकर उठते हैं। २. जवासा।

प्रब्ब पु
संज्ञा पुं० [सं० पर्व] दे० 'पर्व'। उ०—फिर पूछी पृथि राज नृप, कहो चंद कबि सब्ब। होतु सुकातिक मास महिं, दीपमालिका प्रब्ब।—पृ० रा०, २३।१।

प्रब्बत पु
संज्ञा पुं० [सं० पर्वत] दे० 'पर्वत'। उ०—(क) धरि कच्छ रूप सरूपयं।...धरि मंद प्रब्बत पुठ्ठयं।—पृ० रा०, २।१०६। (ख) सिर नाइ धाइ नरनाह तब प्रब्बत सम प्रब्बत भिरे।—पृ० रा०, ७।८२।

प्रभंग
संज्ञा पुं० [सं० प्रभङ्ग] १. तोड़ना। विदलित करना। २. पूर्णतः पराजय। ३. वह जो तोडे़ फोडे़ या विदलित करे [को०]।

प्रभंजन (१)
संज्ञा पुं० [सं० प्रभञ्जन] १. तोड़ फोड़। उखाड़ पखाड़। नाश। उ०—त्रिविधि प्रभंजन चलि सुरभि करत प्रभंजन धीर। तन मन गंजन अलि प्रभुत बिन मनरंजन बीर।—स० सप्तक, पृ० २५०। २. प्रचंड वायु। महावात। आँधी। ३. हवा। वायु। उ०—त्रिविध प्रभंजन चलि सुरभि करत प्रभंजन धीर।—स० सप्तक, पृ० २५०। यौ०—प्रभंजनसुत = हनुमान। ४. मणिपुर का राजा (महाभारत)।

प्रभंजन (२)
वि० नष्ट करनेवाला। तोड़फोड़ करनेवाला [को०]।

प्रभ
वि० [सं०] प्रभायुक्त। प्रकाशमय। चमकदार (समासांत में प्रयुक्त) जैसे, नीलांजनप्रभ। उ०—जहाँ चहकते विहग, बदलते क्षण क्षण विद्युत्प्रभ घन।—ग्राम्या, पृ० १६।

प्रभग्न
वि० [सं०] १. तोडा़ हुआ। चूर चूर किया हुआ। २. पराजित [को०]।

प्रभत पु ‡
संज्ञा स्त्री० [/?//?/भ ] प्रभुत्व। प्रशंसा। श्रेष्ठता। शोभा। शाबाश/?/बस राखो जीभ कहै इम बाँको कड़वा बोल्याँ प्रभत किसी।—बाँकी ग्रं०, भा० ३, पृ० १०३।

प्रभद्र
संज्ञा पुं० [सं०] नीम।

प्रभ्रद्रक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] पंद्रह अक्षरों का एक वर्णवृत्त। दे० 'प्रभद्रिका'।

प्रभ्रदक (२)
वि० अत्यंत सुंदर। अतीव सलोना [को०]।

प्रभद्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रसारिणी लता।

प्रभद्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] पंद्रह अक्षरों की वर्णवृत्ति जिसके प्रत्येक चरण में लगण, भगण, फिर जगण और अंत में रगण होता है। जैसे,—निज भुज राघवेंद्र ढाइ हैं।

प्रभव
संज्ञा पुं० [सं०] १. उत्पत्ति का कारण। उत्पत्तिहेतु। २. उत्पत्तिस्थान। आकर। ३. जन्म। उत्पत्ति। ४. सृष्टि। संसार। ५. जल का निर्गम स्थान। वहाँ स्थान जहाँ से कोई नदि आदि निकले। उदगम। ६. प्रभाव। पराक्रम। ७. साठ संवत्सरों में एक संवत्सर। इस संवत्सर में वृष्टि अधिक होती है और प्रजा निरोग और सुखी रहती है। ८. विष्णु का एक नाम (को०)। मूल (को०)। १०. ऋद्धि। सौभाग्य। उदय। अभ्युदय (को०)।

प्रभवन
संज्ञा पुं० [सं०] १. उत्पत्ति। २. आकर। ३. मूल। ४. अधिष्ठान।

प्रभविता
संज्ञा पुं० [सं० प्रभवितृ] प्रभु। प्रधान शासक [को०]।

प्रभविष्णु (१)
वि० [सं०] १. प्रभावशील। अग्रगण्य। उ०—व्यक्ति को समाज में सफल, आनंदपूर्ण, प्रभविष्णु एवँ कलात्मक जीवन जीने की कला सीखना होगा।—स० दर्शन, पृ० ११०। २. शक्तियुक्त। ताकतवर। समर्थ। शक्त (को०)।

प्रभविष्णु (२)
संज्ञा पुं० १. प्रभु। स्वामी। अधीश्वर। २. विष्णु।

प्रभविष्णुता
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रभावित करने की शक्ति। प्रभावा- त्मकता। दूसरों पर असर डालने का साम्यर्थ। उ०—पूर्ण प्रभविष्णुता के लिये काव्य में हम भी सत्वगुण की सत्ता आवश्यक मानते हैं।—रस०, पृ० ६९।

प्रभांजन
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रभाञ्जन] शोभांजन। सहजन का पेड़।

प्रभा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दीप्ति। प्रकाश। आभा। चमक। २. किरण। रश्मि। ३. सूर्य का बिंब। ४. सूर्य की एक पत्नी। ५. एक अप्सरा का नाम। ६. एक द्वादशाक्षर वृत्ति जिसे मंदाकिनी भी कहते हैं। ७. दुर्गा (को०)। ८. कुबेर की पुरी। अलका (को०)। ९. एक गोपी का नाम (को०)। १०. स्वर्भानु की कन्या का नाम जो महुष की माता थी (को०)। यौ०—प्रभाकर। प्रभाकरी। प्रभाकीट। प्रभापल्लवित = प्रभा से व्याप्त। जिसपर प्रभा फैली हो। प्रभाप्रभु। प्रभाप्ररोह = प्रकाशरश्मि। प्रभाविद् = अत्यंत दीप्त। प्रभामंडल। प्रभालेपी।

प्रभाउ पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रभाव] दे० 'प्रभाव'। उ०—तिमिर ग्रसित सब लोक ओक लखि दुखित दयाकर। प्रगट कियो अदभुत प्रभाउ भागवत विभाकर।—नंद० ग्रं०, पृ० ४।

प्रभाकर
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य। २. चंद्रमा। ३. अग्नि। ४. मदार का पौधा। आक। ५. समुद्र। ६. एक नाग का नाम। ७. मार्कंडेय पुराण के अनुसार आठवें मन्वंतर के देवगण के एक देवता। ८. एक प्रसिद्ध मीमांसक। ९. कुशद्वीप के एक वर्ष का नाम। १०. शिव का एक नाम (को०)। ११. एक रत्न। पद्म राग (को०)।

प्रभाकरवर्द्धन
संज्ञा पुं० [सं०] स्थाण्वीश्वर (थानेसर) के एक राजा जो विक्रम सवंत् ६०० के पूर्व राज्य करते थे। विशेष—इन्हीं के पुत्र महाप्रतापी हर्षवर्द्धन हुए जिनकी राजधानी कान्यकुब्ज थी और जिनके सभाकवि वाणभट्ट थे। ये सूर्योपासक थे।

प्रभाकरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] बोधिसत्वों की तृतीय अवस्था जो प्रमुदिता और विमला के उपरांत प्राप्त होती है।

प्रभाकीट
संज्ञा पुं० [सं०] खद्योत। जुगुनू।

प्रभाग
संज्ञा पुं० [सं०] १. विभाग का विभाग। २. भिन्न का भिन्न। जैसे, २/३ का ३/५ इत्यादि।

प्रभात (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रातः काल। सबेरा। २. एक देवता जो सूर्य और प्रभा से उत्पन्न माना गया है। यौ०—प्रभातकरणीय = वे कार्य जिन्हें प्रातःकाल करना उचित हो। प्रातःकालीन कृत्य। प्रभातकल्प = प्रभात सा। सुबह की तरह। प्रभातकाल = सुबह। सबेरा। प्रभातप्राय = दे० 'प्रभातकल्प'।

प्रभात (२)
वि० जो स्पष्ट, साफ या घोतित होने लगा हो [को०]।

प्रभातफेरी
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रभात + हिं० फेरी] प्रातःकालीन सीमूहिक भ्रमण जो धार्मिक या किसी अन्य उत्सव को मनाने के उद्देश्य से किया जाता है। इस अवसर पर भजन, कीर्तन अथवा उद्देश्यवोधक नारै भी लगाते हैं।

प्रभाती
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रत्यूष और प्रभास नामक वस्तुओं की माता (महाभारत)। २. एक प्रकार का गीत जो प्रातः- काल गाया जाता है। ३. दतुअन। दातुन। दंतधावन।

प्रभान
संज्ञा पुं० [सं०] ज्योति। दीप्ति। प्रकाश।

प्रभापन
संज्ञा पुं० [सं०] प्रकाशयुक्त करना। प्रकाशित करना। दीप्तियुक्त करना [को०]।

प्रभापाल
संज्ञा पुं० [सं०] एक बोधिसत्व।

प्रभापूर्य
वि० [सं०] १. प्रभावपूर्ण। दीप्तिमान्। कांतियुक्त। २. ज्योतित या दीप्त करनेवाला। दीप्ति या प्रभा भरनेवाला। उ०—भारत के नभ का प्रभापूर्य। शीतलच्छाय सांस्कृतिक सूर्य।—तुलसी०, पृ० ३।

प्रभामंडल
संज्ञा पुं० [सं० प्रभामण्डल] प्रकाशचक्र। प्रकाश का घेरा [को०]।

प्रभाय पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रभाव, प्रा० पहाव, पहाय, प्यहाय] दे० 'प्रभाव'। उ०—श्रीपति कृपा प्रभाय, सुखी बहुदिवस निरंतर।—प्रेमघन०, भा० १, पृ० १।

प्रभारक
संज्ञा पुं० [सं०] एक नाग।

प्रभालेपी
वि० [सं० प्रभालेपिन्] १. प्रभामंडित। ज्योति से आवृत। २. जिससे ज्योति निकलती हो। जो चमक देता हो [को०]।

प्रभाव
संज्ञा पुं० [सं०] १. उद्भव। प्रादुर्भाव। २. सामर्थ्य। शक्ति। कोई बात पैदा कर देने की ताकत। असर। जैसे,— मंत्र का बडा़ प्रभाव है। उ०—सुखदेव कह्यो सुनो हो राव। जैसो है हरिभक्ति प्रभाव।—सूर (शब्द०)। ३.महिमा। माहात्म्य। ४. इतना मान या अधिकार कि जो बात चाहे कर या करा सके। साख या दबाव । जैसे,—राजा के दरबार में उसका बहुत कुछ प्रभाव है। ५. अंतःकरण को किसी ओर प्रवृत्त करने का गुण। ६. प्रवृत्ति पर होनेवाला फल या परिणाम। असर। जैसे,—उसपर शिक्षा का कुछ प्रभाव नहीं पडा़। क्रि० प्र०—डालना।—पड़ना।—जमना। ७. मार्कडेय पुराण में वर्णित स्वरोचिष मनु के एक पुत्र जो कलावती के गर्भ से उत्पन्न थे। ८. प्रभा के गर्भ से उत्पन्न सूर्य के एक पुत्र। ९. सुग्रीव के एक मंत्री का नाम। १०. कोष और दंड से उत्पन्न राजतेज। प्रताप (को०)। ११. विस्तार (को०)।

प्रभावक
वि० [सं०] प्रमुख। शक्तिशाली। प्रधान। प्रभाववाला [को०]।

प्रभावकर
वि० [सं०] प्रभाव डालनेवाला। प्रभावक।

प्रभावज (१)
वि० [सं०] प्रभाव से उत्पन्न। प्रभावजात।

प्रभावज (२)
संज्ञा पुं० १. एक प्रकार का रोग जो देवता, ऋषि, वृद्धादि के शाप या ग्रहादि की हेरफेर से उत्पन्न होता है। २. एक प्रकार की राजशक्ति जो कोष और दंड के रूप में व्यक्त होती है।

प्रभावती (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. महाभारत के अनुसार सूर्य की पत्नी का नाम। २. तेरह अक्षरों का एक छंद जिसे 'रुचिरा' कहते हैं। ३. शिव के एक गण की वीणा का नाम। ४. कुमार के एक अनुचर मातृगण का नाम। ५. महाभारत के अनुसार अंग देश के राजा चित्ररथ की रानी। ६. प्रभाती नाम का एक राग या गीत। ७. संगीत में एक श्रुति (को०)।

प्रभावती
वि० स्त्री० प्रभावाली। कांतिमती।

प्रभावन
वि० [सं०] १. प्रमुख। प्रधान। २. प्रभावशाली। प्रभावक। ३. रचनात्मक। ४. स्पष्ट करनेवाला। प्रगट करनेवाला [को०]।

प्रभाववाद
संज्ञा पुं० [सं० प्रभाव + वाद] काव्य का प्रधान गुण हृदय को प्रभावित करना है यह माननेवाला साहित्यिक मत या सिद्धांत। (अं० इम्प्रेशनिज्म)।

प्रभाववादी
संज्ञा पुं० [सं० प्रभाव + वादिन्] वह जो प्रभाववाद का सिद्धांत मानता हो। उ०—प्रभाववादियों के अनुसार किसी काव्य की ऐसी आलोचना कि 'यहाँ रूपक का निर्वाह बहुत अच्छा हुआ है, यहाँ यतिभंग है, यहाँ रसविरोध है, यहाँ पूर्णास है, यहाँ च्युतसंस्कृति या पतत्प्रकर्ष है', कोई आलोचना नहीं।—चिंतामणि, भा० २, पृ० ९२।

प्रभाववान्
वि० [सं० प्रभाववत्] १. शक्तिशाली। प्रतापी। २. असरदार। प्रभावित करनेवाला [को०]।

प्रभावन्
वि० [सं० प्रभावत्] प्रभायुक्त। दीप्तिमय [को०]।

प्रभावान्वित
वि० [सं०] १. प्रभावित। २. प्रभावमय। प्रभाव- युक्त [को०]।

प्रभावान्विति
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रभावित होने की स्थिति। प्रभाव की अन्विति। असर।

प्रभावित
वि० [सं०] जिसने प्रभाव ग्रहण किया हो। जिसपर प्रभाव पडा़ हो। उ०—है समाज सुख साधक दुख बाधक ए। देश प्रेम प्रासाद प्रभावित फरहरे।—परिजात, पृ० ७।

प्रभावी
वि० [सं० प्रभाविन्] [स्त्री० प्रभाविनी] प्रभावान्। शक्तिशाली। २. प्रभावित करनेवाला। असरदार [को०]।

प्रभावोत्पादक
वि० [सं० प्रभाव + उत्पादक] प्रभाव उत्पन्न करनेवाला। प्रभावशील। उ०—इन रचनाओं में उनकी शैली के अनुरुप ही उनके विचार भी अधिक स्पष्ट एवं प्रभावो- त्पादक हो गए हैं।—युगांत (भू०), पृ० 'ज'।

प्रभाष
संज्ञा पुं० [सं०] एक वसु का नाम।

प्रभास (१)
वि० [सं०] पूर्ण प्रभायुक्त।

प्रभास (२)
संज्ञा पुं० १. दीप्ति। ज्योति। २. एक प्राचीन तीर्थ जिसे सोम तीर्थ भी कहते हैं। गुजरात में सोमनाथ का मंदिर इसी तीर्थ के अंतर्गत था। ३. एक वसु। ४. कुमार का एक अनुचर गण। ५. अष्टम मन्वंतर का एक देवगण। ६. जैनों के एक गणधिप का नाम (को०)।

प्रभासन
संज्ञा पुं० [सं०] दीप्ति। ज्योति।

प्रभासन पु
क्रि० अ० [सं० प्रभासन] प्रकाशित होना। भासित होना। दिखाई पड़ना। उ०—जागृत में जु प्रपंच प्रभासत सो सब बुद्धि बिलास बन्यो है।—निश्चल (शब्द०)।

प्रभासी
वि० [सं० प्रभास] प्रकाशित या व्यक्त करनेवाला। उ०—भ्रगू लत्त गत्तं प्रभासी प्रभुत्त। मनी नीलसींत कटी पट्ट पीतं।—पृ० रा०, २।३९।

प्रभास्वर
वि० [सं०] अधिक दीप्तिमान्। अत्यंत चमकीला [को०]।

प्रभिन्न (१)
वि० [सं०] १. पूर्ण भेदयुक्त। २. बँटा हुआ। विभक्त। टुकडे़ टुकडे़ किया हुआ (को०)। ३. अलग किया हुआ। पृथक् किया हुआ (को०)। ४. विकसित। खिला हुआ (को०)। ५. बदला हुआ। परिवर्तित (को०)। ६. विकृत किया हुआ (को०)। ७. ढीला या शिथिल किया हुआ (को०)। ८. नशे में लाया हुआ। मदोन्मत्त (को०)।

प्रभिन्न (२)
संज्ञा पुं० मतवाला हाथी।

प्रभिन्नकरट
वि० [सं०] (हाथी) जिसके गंडस्थल से मद चू रहा हो [को०]।

प्रभिन्नांजन
संज्ञा पुं० [सं० प्रभिन्नाञ्जन] एक प्रकार का अंजन जो तेल में तैयार किया जाता है [को०]।

प्रभीत
वि० [सं०] अत्यंत भयभीत।

प्रभु (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो अनुग्रह या निग्रह करने में समर्थ हो। जिसके हाथ में रक्षा, दंड और पुरस्कार हो। अधिपति। नायक। २. जिसके आश्रय में जीवन निर्वाह होता हो। जो रोजी चलाता हो। स्वामी। मालिक। ३. ईश्वर। भगवान्। ४. श्रेष्ठ पुरुष का संबोधन। जैसे, प्रभो। अपराध क्षमा करो। ५. शब्द। ६. पारद। पारा। ७. बंबई प्रांत के कायस्थों की उपाधि। ८. विष्णु। उ०—प्रभुवन की मूरत दूध ना पीवत, सीर पछार नामा रोवत।—दक्खिनी०, पृ० १९। ९. शिव (को०)। १०. ब्रम्हा (को०)। ११. इंद्र (को०)। १२. सूर्य (को०)। १३.अग्नि (को०)।

प्रभु (२)
वि० १. शक्तिशाली। बलवान्। २. योग्य। समर्थ। पर्याप्त। ३. प्रतिस्पर्धा। बराबरीवाला। ४. स्थायी। शाश्वत [को०]।

प्रभुत पु †
संज्ञा पुं० [सं० प्रभुत्व ?] प्रभुत्व। प्रभाव। उ०—जगपत हित मुखदुत इण भति जिम, प्रभुत हुवत दिन रयणपत।— रघु० रू० पृ० १२१।

प्रभुता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बडा़ई। महत्व। उ०—प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू।—मानस, २।९। २. हुकूमत। शासनाधिकार। उ०—प्रभुता पाइ काहि मद नाहीं।—तुलसी (शब्द०)। ३. वैभव। ४.साहिबी। मालिकपन।

प्रभुताई
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रभुता + हिं० ई (प्रत्य०)] दे० 'प्रभुता'।उ०—अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जान नहिं पाई।—मानस, ३।२।

प्रभुत्त पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रभुत्व] दे० 'प्रभुत्व'। उ०—भ्रगू लत्त गत्त प्रभासी प्रभुत्त।—पृ० रा०, २।३९।

प्रभुत्व
संज्ञा पुं० [सं०] प्रभुता।

प्रभुभक्त (१)
वि० [सं०] स्वामी की सच्ची सेवा करनेवाला। नमक- हलाल।

प्रभुभक्त (२)
संज्ञा पुं० अच्छी नस्ल का घोडा़ [को०]।

प्रभुराई पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रभु + हिं० राय] ईश्वर। भगवान्। उ०—यह कहि गुप्त भए प्रभुराई।—कबीर सा०, पृ० ४५५।

प्रभुशक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] कोष औक सेना का बल।

प्रभुसत्ता
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रभु + सत्ता] राज्य या देश पर अखंड और अनुल्लंध्य शासन का अधिकार। पूर्ण अधिकार।

प्रभुसिद्धि
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह कार्य जो प्रभुशक्ति से सिद्ध हो।

प्रभू पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रभु] दे० 'प्रभु'। उ०—चल्यौ गयौ तह विप्र क्षिप्र कतहुं न अटक्यो। प्रभू जान बहमन्य, पौरिया पायनि लटक्यौ।—नंद ग्रं०, पृ० २०४।

प्रभूत (१)
वि० [सं०] १. जो अच्छी तरह हुआ हो। भूत। २. उदगत। निकला हुआ। उत्पन्न। ३. उन्नत। ४. प्रचुर। बहुत अधिक। बहुत ज्यादा।

प्रभूत (२)
संज्ञा पुं० पंचभूत। तत्व। उ०—राघव की चतुरंग चमू चपि धूरि उठी जल हू थल छाई। मानो प्रताप हुतासन धूम सो केसवदास अकास न माई। मेटि कै पंच प्रभूत किधौं बिधि रेनुमयी नव रीति चलाई। दुःख निवेदन को भव भार को भूमि किधौं सुरलोक सिधाई।—केशव (शब्द०)।

प्रभूतता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अधिकता। बहुतायत। २. राशि। अंबार। ढेर [को०]।

प्रभूतत्व
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रभूतता' [को०]।

प्रभूतांश
संज्ञा पुं० [सं० प्रभूत + अंश] अधिक अंश। अधिक मात्रा। उ०—'सवर्णी सा' कहने का स्पष्ट अभिप्राय यह है कि पूर्ण सवर्णी तो नहीं होता, किंतु प्रभूतांश में उससे मिलता जुलता है।—संपूर्णानंद अभि० ग्रं०, पृ० २०७।

प्रभूति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. उत्पत्ति। २. शक्ति। ३. प्रचुरता। अधिकता। ज्यादती।

प्रभूष्णु
वि० [सं०] योग्य। शक्तिशाली। क्षम [को०]।

प्रभृत पु
संज्ञा स्त्री० या पुं० [सं० परभृत] कोकिल। परभृत। उ०—त्रिबिध प्रभंजन चलि सुरभि करत प्रभंजन धीर। तन मन गंजन अलि प्रभृत बिन मनरंजन धरी।—स० सप्तक, पृ० २५०।

प्रभृति (१)
अव्य [सं०] इत्यादि। आदि। वगैरह।

प्रभृति (२)
संज्ञा स्त्री० आरंभ। शुरुआत। आदि। जैसे, इंद्रप्रभृति देवता। विशेष—अधिकतर बहुव्रीहि समास में इसका प्रयोग प्राप्त होता है।

प्रभेद
संज्ञा पुं० [सं०] १. भेद। विभिन्नता। २. स्फोटन। फोड़कर निकलना। ३. उदगम स्थान (को०)। ४. विभाग। अंतर (को०)।

प्रभेदक
वि० [सं०] १. फाड़नेवाला। टुकडे़ टुकडे़ करनेवाला। २. पृथक् करनेवाला। अलग करनेवाला [को०]।

प्रभेदन
वि० [सं०] दे० 'प्रभेदक' [को०]।

प्रभेदिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] बेधने या छेदने का एक अस्त्र।

प्रभेव पु
पुं० [सं० प्र + भेद, प्रा० भेव] प्रभेद। भेद। भिन्नता।

प्रभंश
संज्ञा पुं० [सं०] गिरना। पतन। पात [को०]।

प्रभ्रंशथु
संज्ञा पुं० [सं०] पीनस रोग।

प्रभ्रंशित
१. वि० [सं०] फेंका या गिराया हुआ। २. वंचित। विनाकृत। वियुक्त। ३. अलग किया हुआ। निकाला हुआ [को०]।

प्रभ्रंशी
वि० [सं० प्रभ्रंशिन्] गिरनेवाला। अलग होनेवाला [को०]।

प्रभ्रष्ट (१)
वि० [सं०] १. गिरा हुआ। २. टुटा हुआ।

प्रभ्रष्ट (२)
संज्ञा पुं० दे० 'प्रभ्रष्टक' [को०]।

प्रभ्रष्टक
संज्ञा पुं० [सं०] शिखावलंबिनी माला। सिर से लटकती हुई माला।

प्रमंडल
संज्ञा पुं० [सं०] पहिए का बाहरी हिस्सा या बाहरी हिस्से का खंड [को०]।

प्रमंथ
संज्ञा पुं० [सं० प्रमन्थ] लकडी़ जिससे अग्नि पैदा करते हैं [को०]।

प्रम †
वि० [सं० परम] १. श्रेष्ठ। प्रधान। उ०—इल रखवाल थयौ प्रम अंसी।—रा० रू०, पृ० १४। २. परम। अत्यंत। उ०—मथुर अजोध्या ओखा मंडल। एतां आद धांम प्रम उज्वल।—रा० रू०, पृ० ३६३।

प्रमग्न
वि० [सं०] डूबा हुआ। लीन। निमग्न [को०]।

प्रमणा
वि० [सं० प्रमणस्] दे० 'प्रमना' [को०]।

प्रमत
वि० [सं०] १. सोचा हुआ। विचारित। २. होशियार। चालाक। चतुर [को०]।

प्रमति
संज्ञा पुं० [सं०] १. च्यवन ऋषि के एक पुत्र का नाम। २. वह जिसकी बुद्धी उत्कृष्ट हो। प्रकृष्ट मतिवाला [को०]।

प्रमत्त
वि० [सं०] १. उन्मत्त। मतवाला। मस्त। नशे में चूर। उ०—पीछे पूर्वकथा प्रमत्त जन को है याद आती न ज्यों।—शकुं०, पृ० २१। २. पागल। विक्षिप्त। बावला। ३. जिसकी बुद्धी ठिकाने न हो। जो सावधान या सचेत न हो। जो खबरदार न हो। असावधान। ४. त्रुटि या भूल करनेवाला (को०)। ५. करणीय कार्य को न करनेवाला (को०)। यौ०—प्रमत्तगीत = प्रमाद या अनवधानता से गाया हुआ गीत। प्रमत्तचित्त = प्रमत्त चित्त का। प्रमादी। लापरवाह।

प्रमत्तता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मस्ती। २. पागलपन। ३. अनव- धानता। लापरवाही (को०)।

प्रमथ
संज्ञा पुं० [सं०] १. मथन या पीड़ित करनेवाला। २. वह जो मथन करे। २. शिव के एक प्रकार के गण या परिषद जिनकी संख्या ३६ करोड़ बताई गई है। विशेष—कालिका पुराण में लिखा है कि प्रमथों में से कुछ तो भोगविमुख, योगी और त्यागी हैं और कुछ कामुक, भोगपरायण और शिव की क्रीडा़ में सहायक हैं। प्रथम गण बडे़ मायावी कहे गए हैं। यौ०—प्रथमनाथ। प्रथमपति। प्रथमधिप। प्रथमेश्वर। ३. घोडा़। अश्व। ४. धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम।

प्रमथन
संज्ञा पुं० [सं०] १. मथना। २. पीड़ित करना। दुःख पहुँचाना। क्लेश देना। यंत्रणा देना। ३. नष्ट करना। क्षति पहुँचाना (को०)। ४. वध करना। नाश करना।

प्रथमनाथ
संज्ञा पुं० [सं०] महादेव। शिव।

प्रमथा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. हरीतकी। हड़। २. पीडा़।

प्रमथाधिप
संज्ञा पुं० [सं०] शिव। प्रमथनाथ।

प्रमथालय
संज्ञा पुं० [सं०] दुःख या यंत्रणा का स्थान। नरक।

प्रमाथित (१)
वि० [सं०] १. खूब मथा हुआ। २. पीड़ित किया हुआ (को०)। ३. कुचला, रौंदा या नष्ट किया हुआ (को०)। ४. जिसका वध किया गया हो। मारा हुआ (को०)।

प्रमथित (२)
संज्ञा पुं० मट्ठा, जिसमें ऊपर से पानी न मिला हो।

प्रमथी
वि० [सं० प्रमथिन्] नष्ट करनेवाला [को०]।

प्रमथेश्वर
संज्ञा पुं० [सं०] शिव।

प्रमद (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. मतवालापन। उ०—प्रमद आलस से मिला है।—अर्चना, पृ० १०९। २. धतूरे का फल। ३. हर्ष। आनंद। यौ०—प्रमदकानन। प्रमदवन। ४. एक प्रकार का दान। ५. वशिष्ठ के एक पुत्र का नाम।

प्रमद (२)
वि० मत्त। मतवाला।

प्रमदक
संज्ञा पुं० [सं०] १. परलोक को न माननेवाला। नास्तिक। २. वह जो कामी हो। कामुक। भोगी।

प्रमदकानन
संज्ञा पुं० [सं०] वह उपवन या वन जिसमें नरेश और रानियाँ आनंदोत्सव मनाती हैं। प्रमोदवन [को०]।

प्रमदन
संज्ञा पुं० [सं०] विषय की कामना। कामेच्छा [को०]।

प्रमदवन
संज्ञा पुं० [सं०] प्रमदकानन। क्रीडोद्यान।

प्रमदा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. युवती स्त्री। सुंदरी स्त्री। २. माल- कंगनी। प्रियंगु। ३. एक वृत्त। एक छंद (को०)। ४. कन्या राशि (को०)। यौ०—प्रमदाकानन, प्रमदावन = क्रीडो़द्यान। प्रमदवन। प्रम- दाजन = स्त्री। महिला। प्रमदा।

प्रमद्वर
वि० [सं०] प्रमदयुक्त। बेपरवाह। असावधान [को०]।

प्रमन
वि० [सं० प्रमनस्, प्रमना] १. हर्षयुक्त। प्रसन्न। उ०— कालाकाँकर का राजभवन सोया जल में निश्चिंत प्रमन।— गुंजन, पृ० ९४। २. सावधान। सजग। उ०—हैं वहीं मल्लपति, वानरेंद्र सुग्रीव प्रमन।—अपरा, पृ० ४४।

प्रमना
वि० [सं० प्रमनस्] हर्षयुक्त। प्रसन्न।

प्रमन्यु (१)
वि० [सं०] १. बहुत क्रुद्ध। २. दुखी। संत्रस्त (को०)।

प्रमन्यु (२)
संज्ञा पुं० अति क्रोध। अत्यंत कोप।

प्रमय
संज्ञा पुं० [सं०] १. मृत्यु। मौत। २. वध। घातन। हिंसन। ३. पतन। नाश। विनाश [को०]।

प्रमर्दन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. अच्छी तरह मर्दन। अच्छी तरह मलना दलना। २. खूब कुचलना। रौंदना। ३. दमन करना। नष्ट करना। ४. विष्णु।

प्रमर्दन (२)
वि० मर्दन करनेवाला।

प्रमर्दित
वि० [सं०] कुचला हुआ। रौंदा हुआ। दलित [को०]।

प्रमर्दिता
वि० [सं० प्रमदितृ] कुचलनेवाला। रौंदनेवाला। दलनेवाला [को०]।

प्रमर्दी
वि० [सं० प्रमर्दिन्] दे० 'प्रमर्दिता'।

प्रमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. चेतना। ज्ञान। बोध। २. शुद्ध बोध। यथार्थ ज्ञान। जहाँ जैसी बात है वहाँ वैसा अनुभव (न्याय)। ३. नींव। ४. माप।

प्रमाण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह कारण या मुख्य हेतु जिससे ज्ञान हो। वह बात जिससे किसी दूसरी बात का यथार्थ ज्ञान हो। वह बात जिससे कोई दूसरी बात सिद्ध हो। सबूत। विशेष—प्रमाण न्याय का मुख्य विषय है। गौतम ने चार प्रकार के प्रमाण माने हैं—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, और शब्द। इंद्रियों के साथ संबंध होने से किसी वस्तु का जो ज्ञान होता है वह प्रत्यक्ष है। लिंग (लक्षण) और लिंगी दोनों के प्रत्यक्ष ज्ञान से उत्पन्न ज्ञान को अनुमान कहते हैं। (दे० न्याय)। किसी जानी हुई वस्तु के सादृश्य द्वारा दूसरी वस्तु का ज्ञान जिस प्रमाण से होता है वह उपमान कहलाता है। जैसे, गाय के सदृश ही नील गाय होती है। आप्त या विश्वासपात्र पुरुष की बात को शब्द प्रमाण कहते हैं। इन चार प्रमाणों के अतिरिक्त मीमांसक, वेदांती और पौराणिक चार प्रकार के और प्रमाण मानते हैं—ऐतिह्य, अर्थापत्ति, संभव और अभाव। जो बात केवल परंपरा से प्रसिद्ध चली आती है वह जिस प्रमाण से मानी जाती है उसको ऐतिह्य प्रमाण कहते हैं। जिस बात से बिना किसी देखी या सुनी बात के अर्थ में आपत्ति आती हो उसके लिये अर्थापत्ति प्रमाण हैं। जैसे, मोटा देवदत्त दिन को नहीं खाता, यह जानकर यह मानना पड़ता है कि देवदत्त रात को खाता है क्योंकि बिना खाए कोई मोटा हो नहीं सकता। व्यापक के भीतर व्याप्य—अंगी के भीतर अंग—का होना जिस प्रमाण से सिद्ध होता है उसे संभव प्रमाण कहते हैं। जैसे, सेर के भीतर छटाँक का होना। किसी वस्तु का न होना जिससे सिद्ध होता है वह अभाव प्रमाण है। जैसे चूहे निकलकर बैठे हुए हैं इससे बिल्ली यहाँ नहीं है। पर नैयायिक इन चारों को अलग प्रमाण नहीं मानते, अपने चार प्रमाणों के अंतर्गत मानते हैं। और किन किन दर्शनों में कौन कौन प्रमाण गृहीत हुए हैं यह नीचे दिया जाता है।— चार्वाक—केवल प्रत्येक प्रमाण। बौद्ध—प्रत्यक्ष और अनुमान। सांख्य—प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम। पातंजल—प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम। वैशेषिक—प्रत्यक्ष और अनुमान। रामानुज पूर्णप्रज्ञ—प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम। धर्मशास्त्र में किसी व्यवहार या अभियोग के निर्णय में, चार प्रमाण माने गए हैं—लिखित (दस्तावेज), मुक्ति (कब्जा), साक्ष्य (गवाही) और दिव्य। प्रथम तीन प्रकार के प्रमाण मानुष कहलाते हैं। २. एक अलंकार जिसमें आठ प्रमाणों में से किसी एक का कथन होता है। जैसे अनुमान का उदाहरण—घन गर्जन दामिनि दमक धुरवागन धावंत। आयो बरषा काल अब ह्वै है बिरहिनि अंत। विशेष—प्रायः सब अलंकारवालों ने केवल अनुमान अलंकार ही माना है, प्रत्यक्ष आदि और प्रमाणों को अलंकार नहीं माना है। केवल भोज ने आठ प्रमाणों के अनुसार प्रमाणा- लंकार माना है जिनका अनुकरण अप्पय दीक्षित ने (कुवलयानंद में) किया है। काव्यप्रकाश आदि में प्रत्यक्ष आदि को लेकर प्रमाणालंकार नहीं निरूपित हुआ है। ३. सत्यता। सचाई। उ०—कान्ह जू कैसे दया के निधान हौ जानौ न काहू के प्रेम प्रमानहिं।—दास (शब्द०)। ४. निश्चय प्रतीति। दृढ़ धारणा। यकीन। उ०—अंतरजामी राम सिय तुम सर्वज्ञ सुजान। जौ फुर कहहुँ तो नाथ मम कीजिय वचन प्रमान।—तुलसी (शब्द०)। (ख) जौ तुम तजहु, भजहुँ न आन प्रभु यह प्रमान मन मोरे। मन, वच, कर्म नरक सुरपुर तहँ जहँ रघुबीर निहोरे।—तुलसी (शब्द०)। ५. मर्यादा। थाप। साख। मान। आदर। ठीक ठिकाना। उ०—बिनु पुरुषारथ जो बकै ताको कौन प्रमान। करनी जंबुक जून ज्यों गरजन सिंह समान।—दीनदयाल गिरि (शब्द०)। ६. प्रामाणिक बात या वस्तु। मानने की बात। आदर की चीज। उ०—रण मारि अक्षकुमार बहु बिधि इंद्रजित सों युद्ध कै। अति ब्रह्म शस्त्र प्रमाण मनि सो दृश्य मो मन युद्ध कै।—केशव (शब्द०)। ७. इयत्ता। हद। मान। निर्दिष्ट परिणाम, मात्रा या संख्या। अंदाज। जैसे,—इसका प्रमाण ही इतना, इतना बडा़ या यह होता है। उ०—(क) कौन है तू, कित जाति चली, बलि, बीती निसा अधिराति प्रमानै।—पद्माकर (शब्द०)। (ख) अतल, वितल अरु सुतल तलातल और महातल जान। पाताल और रसातल मिलि कै सातौ भुवन प्रमान।—सूर (शब्द०)। ८. शास्त्र। ९. मूलधन। १०. प्रमाणपत्र। आदेशपत्र। उ०—रामलखन जू सों बोलि कह्यो कुलपूज्य आयो है प्रमान हौं तो जनक पै जायहौ।—हनुमान (शब्द०)। ११. विष्णु का एक नाम (को०)। १२. संघटन। एका (को०)। १३. नियम (को०)।

प्रमाण (२)
वि० १. सत्य। प्रमाणित। चरितार्थ। ठीक घटता हुआ। उ०—(क) बरख चारिदस बिपिन बसि करि पितु वचन प्रमान। आइ पाय पुनि देखिहौ मन जनि करसि गलान।— तुलसी (शब्द०)। (ख) मिलहिं तुमहि जब सप्त ऋषीसा। तब जनेउ प्रमान बागीसा।—तुलसी (शब्द०)। २. मान्य। माना जानेवाला। स्वीकार योग्य। ठीक। उ०—(क) कहि न सकत रघुबीर डर लगे बचन जनु बान। नाई रामपद कमल सिर बोले गिरा प्रमान।—तुलसी (शब्द०)। (ख) कहि भेज्यों सु नवाब सो सब सुनीं सुजान। कही, कि कहो नवाब सों हमको सबै प्रमान।—सूदन (शब्द०)। ३. परिमाण में तुल्य। बड़ाई आदि में बराबर। उ०—पन्नग प्रचंड पति प्रभु की पनच पीन पर्वतारि पर्वत प्रमान पावई।— केशव (शब्द०)।

प्रमाण (३)
अव्य० अवधि या सीमासूचक शब्द। पर्यत। तक। उ०— (क) कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं। सत जोजन प्रमान लै धावै।—तुलसी (शब्द०)। (ख) धनु लीन मंडल कीन सबकी आँख तेहि छन ढँपि गई। तेहि तानि कान प्रमान शब्द महान धरनी कँपि गई।—गोपाल (शब्द०)।

प्रमाणक (१)
वि० [सं०] परिमाण, मान या विस्तार का (समासांत में प्रयुक्त)।

प्रमाणक (२)
संज्ञा पुं० दे० 'प्रमाण' [को०]।

प्रमाणकुशल
संज्ञा पुं० [सं०] अच्छा तर्क करनेवाला।

प्रमाण कोटि
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रमाण मानी जानेवाली बातों या वस्तुओं का घेरा। जैसे, आचारनिर्णय में तंत्र प्रमाणॉ कोटि में नहीं है।

प्रमाणज्ञ
संज्ञा पुं० [सं०] १. शिव। २. वह जो प्रमाण अप्रमाण का जानकार हो। प्रमाण को जाननेवाला [को०]।

प्रमाणतः
संज्ञा पुं० [सं० प्रमाणतस्] प्रमाणपूर्वक। प्रमाण के अनुकुल [को०]।

प्रमाणदृष्ट
वि० [सं०] प्रमाण के रुप में उपस्थित करने योग्य शास्त्रादि संमत। प्रमाण कोटि का [को०]।

प्रमाणना
क्रि० स० [सं० प्रमाण + हिं० ना (प्रत्य०)] दे० 'प्रमानना'।

प्रमाणपत्र
संज्ञा पुं० [सं०] वह लिखा हुआ कागज जिसपर का लेख किसी बात का प्रमाण हो। सार्टिफिकेट।

प्रमाणपुरुष
संज्ञा पुं० [सं०] वह जिसके निर्णय को मानने के लिये दोनों पक्ष के लोग तैयार हों।

प्रमाणप्रवीण
वि० [सं०] तर्क में कुशल [को०]।

प्रमाणभूत
वि० [सं०] प्रामाणिक। प्रमाण स्वरुप [को०]।

प्रमाणवचन, प्रमाणवाक्य
संज्ञा पुं० [सं०] प्रामाणिक कथन। प्रमाणभुत कथन। [को०]।

प्रमाणशास्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] तर्क शास्त्र [को०]।

प्रमाणसूत्र
संज्ञा पुं० [सं०] माप करने का सूत्र [को०]।

प्रमाणाधिक
वि० [सं०] अत्यंत अधिक। २. परिमारण से ज्यादा [को०]।

प्रमाणिक
वि० [सं०] दे० 'प्रामाणिक'।

प्रमाणिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] नगस्वरुपिणी वृत्त का दुसरा नाम। इस छद के प्रत्येक चरण में एक जगण, एक रगण, एक लघु और एक गुरु होते है। जैसे,—नमामि भक्त वत्सल। कृपालु शील कोमल। भजामि ते पदांबुजं। अकामिना स्वाधामद०।—तुलसी (शब्द०)।

प्रमाणित
वि० [सं०] प्रमाण द्धारा सिद्ध। साबित। निश्चित। सत्य ठहराया हुआ।

प्रमाणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रमाणिका या नगस्वरुपिणी छंद का नाम।

प्रमाणीक
वि० [सं० प्रामाणिका] दे० 'प्रामाणिक'। उ०—क्षमावंत भारी। दयावंत ऐसे, प्रमाणीक आगे भए संत जैसे।—सुंदर० ग्रं०, भा०१, पृ० २५६।

प्रमाणीकृत
वि० [सं०] प्रमाण रुप से जिसका स्वीकार किया गया हो। जो प्रमाण रुप से निश्चित हो।

प्रमातव्य
वि० [सं०] मारने योग्य। बध्य।

प्रमाता
संज्ञा पुं० [सं० प्रमातृ] १. वह जो पर्मा ज्ञान को प्राप्त करे। वहल जिसे प्रमा ज्ञान हो। प्रमाणों द्धारा प्रमेय के ज्ञान को प्राप्त करनेवाला। उ०—प्रमाता जीव भी प्रकृत है, क्योकि वह बी अपरी प्रकृत है।—कंकाल, पृ० १८। २. ज्ञान का कर्ता आत्मा या चेतन पुरुष। ३. विषय से भिन्न विषयी। द्रष्टा। साक्षी। ४. असैनिक न्यायाधीश। दीवानी मजिस्ट्रेट। व्यवहार या विधि के अनुसार दंड देनेवाला अधिकारी (को०)।

प्रमातामह
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० प्रमातामही] परनाना [को०]।

प्रमातामही
संज्ञा स्त्री० [सं०] परनानी।

प्रमातृत्व
संज्ञा पुं० [सं०] चेतनता। ज्ञेयता। प्रमाता होने की स्थिति, क्रिया या भाव। उ० परंतु उसके प्रमातृत्व का उपशम नहीं होता।—संपुर्णनंद अभि० ग्रहं०, पृ० १४८।

प्रमात्र
संज्ञा पुं० [सं०] निर्दिष्ट संख्या।

प्रमाथ
संज्ञा पुं० [सं०] १. मथन। २. दःख देना। पीड़न। ३. किसी स्त्री से उसकी इच्छा के विरुद्ध संभोग। ४. मर्दन। नाश करना। मारना। ५. प्रतिद्धद्धी को भुमि पर पटककर उसपर चढ़ बैठाना और घस्सा देना। ६. बलपूर्वक हरण। छीन सखोट। ७. महाभारत के अनुसार घृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम। ८. शिव के एक गण का नाम। ९. स्कंद के अनुचर का नाम।

प्रमाथिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक अप्सरा का नाम।

प्रमाथी (१)
वि० [सं० प्रमाबिन्] [वि० स्त्री० प्रमाथिनी] १. मथनेवाला। २. क्षुब्ध करनेवाला। दुःखदायी। ३. पीड़ित करनेवाला। नाश करनेवावाला। प्रमाथ करनेवाला।

प्रमाथी (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. रामायण के अनुसार एक राक्षस का का नाम। यह खर का साथी था। २. एक यूथपति बंदर जो रामचंद्र जी की सेना में था। ३. बृहत्संहिता के अनुसार बृहस्पति के ऐद्र नामक तीसरे युग का दूसरा संवत्सर। यह निकृष्ट माना गया है। ४. वह औषध जो मुख, आँख, कान आदि छिद्रों से कफादि के संचय को हटा दे। ५. धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम।

प्रमाद
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी कारण से कुछ को कुछ जानना और कुछ का कुछ करना। वह अनवधानता जो किसी कारण से हो। भूल। चूक। भ्रम। भ्रांति। २. अंतःकरण की दुर्बलता। ३. योगशास्त्रानुसार समाधि के साधनों की भावना न करना। या उन्हें ठीक न समझना। यह नौ प्रकार के अंतरायों में चौथा है। इससे साधक को चित्तविक्षेप होता है। ४. लापरवाही। भयंकर भूल (को०)। ५. मद। नशा। उन्माद (को०)। ६. विपत्ति। संकट (को०)।

प्रमादवान्
वि० [सं० प्रमादवत्] १. नशे में चूर। मदोन्मत्त। २. पागल। विक्षिप्त। ३. लापरवाह। असावधान [को०]।

प्रमादिक
वि० [सं०] प्रमादशील। भूलचूक करनेवाला।

प्रमादिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह कन्या जिसे किसी ने दूषित कर दिया हो। २. असावधान या लापरवाह महिला (को०)।

प्रमादित
वि० [सं०] जिसका उपहास हुआ हो। हेय। तिरस्कृत। उपेक्षित [को०]।

प्रमादिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] हिंडोल राग की एक सचहरी का नाम।

प्रमादी (१)
वि० [सं० प्रमादिन्] [वि० स्त्री० प्रमादिनी] १. प्रमादयुक्त। असावधान रहनेवाला। भूलचूक करनेवाला। २. मत्त। क्षीब। मतवाला (को०)। ३. पागल। विक्षिप्त (को०)।

प्रमादी (२)
संज्ञा पुं० १. बृहस्पति के शक्राग्निदैवत नामक दशम युग का दूसरा संवत्सर। इसमें लोग आलसी रहते हैं, क्रांतियाँ होती हैं और लाल फूल के पेंड़ों के बीज नष्ट हो जाते हैं। २. वह जो पागल या बावला हो।

प्रमादोन्मत्त
वि० [सं० प्रमाद + उन्मत्त] प्रमाद या अनवधानता। उ०—हमारे भाई मूर्खतांध और प्रमादोन्मत्त अचेत हो।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० ६६।

प्रमान पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रमाण] १. इयत्ता। सीमा। प्रमाण। उ०—(क) अपनी गाँठि को द्रव्य भेंट की जाकों जैसी सक्ति हती सो ता प्रमान काढ़त भए।—दो सौ बावन०, भा १, पृ० २२५। २. सबूत। उ०—प्रगटत है पूरब की करनी, तजु मन सोच अजान। सूरदास गुन कहँ लग बरनौं, बिधि के अंक प्रमान।—संतवाणी०, भा० २, पृ० ६७। विशेष—इस शब्द के अन्य अर्थ और उदाहरण 'प्रमाण (१)' में देखिए।

प्रमानना
क्रि० स० [सं० प्रमाण + हिं० ना (प्रत्य०)] १. प्रमाण मानना। सत्य मानना। ठीक समझना। उ०—(क)नंद गोप वृषभानु जसोदा सबहि गोप कुल जानो। करौ उपाय बचौ जौ चाहौ मेरो बचन प्रमानो।—सूर (शब्द०)। (ख) बोले बचन तबहि अकुलानो। सुनहु राम मन बचन प्रमानो।—पद्माकर (शब्द०)। २. प्रमाणित करना। साबित करना । सबूत देना। उ०—यहि अनुमान प्रमानियत तिय तन जोबन जोति। ज्यों मेहँदी के पात में अलख ललाई होति।—पद्माकर (शब्द०)। ३. स्थिर करना। ठहराना। निश्चित करना। करार देना। उ०—(क) जोगीश्वर वपु धरि हरि प्रगटे जोग समाधि प्रमान्यो।—सूर (शब्द०)। (ख) जासु सुता नृपतिहि छलि लीनी। यह अनीति जाके सँग कीनी। जाने तदपि बुरो नहिं मान्यो। ब्याह तुम्हारो शुद्ध प्रमानो।—लक्ष्मण (शब्द०)।

प्रमानी पु
वि० [सं० प्रमाणिक] मानने योग्य। प्रमाण योग्य माननीय। उ०—गुरु बोले शिष की सुनि बानी। शँकर को मत परम प्रमानी।—निश्चल (शब्द०)।

प्रमापक (१)
वि० [सं०] प्रमाणित करनेवाला।

प्रमापक (२)
संज्ञा पुं० दे० 'प्रमाण' [को०]।

प्रमापण
संज्ञा पुं० [सं०] मारण। नाश।

प्रमापयिता
वि० [सं० प्रमापयितृ] [वि० स्त्री० प्रमापयित्री] १. घातक। नाशकारक। २. अनिष्टकारक। हानि पहुँचानेवाला।

प्रमापित
वि० [सं०] ध्वस्त। नष्ट। हत [को०]।

प्रमापी
वि० [सं०] मारने या ध्वस्त करनेवाला [को०]।

प्रमायु
वि० [सं०] नाशशील। क्षर। ध्वंसशील।

प्रमायुक
वि० [सं०] दे० 'प्रमायु'।

प्रमार्जक
वि० [सं०] १. पोछनेवाला। साफ करनेवाला। २. हटानेवाला। दूर करनेवाला।

प्रमार्जन
संज्ञा पुं० [सं०] १. धोना। साफ करना। २. पोंछना। झाड़ना। ३. हटाना। दूर करना। निवृत्त करना।

प्रमित
वि० [सं०] १. परिमित। २. निश्चित। ३. अल्प। थोड़ा। ४. जिसका यथार्थ ज्ञान हुआ हो। प्रमाणों द्वारा जिसको प्रमा नामक ज्ञान प्राप्त हुआ हो। ५. ज्ञात। विदित। अवगत। ६. अवधारित। प्रमाणित।

प्रमिताक्षरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक द्वादशाक्षर वर्णवृत्त जिसके प्रत्येक चरण में सगण, जगण, और अंत मे दो सगण होते हैं। उ०—हरषाय जाय सिय पाँय परी। ऋषिनारि सूँघि सिर गोद धरी। बहु अंग राग अँग रये। बहु भाँति ताहि उपदेश दये।—केशव (शब्द०)।

प्रमिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह यथार्थ ज्ञान जो प्रमाण द्वारा प्राप्त हो। प्रमा।

प्रमीढ़
वि० [सं० प्रमोढ़] १. गाढ़ा। घना। २. मूत्र होकर निकला हुआ।

प्रमोत
वि० [सं०] १. मृत्त। मरा हुआ। २. यज्ञ के लिये मारा हुआ (पशु)। ३. नष्ट। विलीन। उ०—अपनी जर्जर—वीणा के उलझे से तारों का संगीत। जिसमें प्रतिदिन क्षणभंगुर लय बुदबुद होते रहे प्रमीत।—इत्यलम्, पृ० २५।

प्रमीति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. हमन। बध। २. मृत्यु।

प्रमीलन
संज्ञा पुं० [सं०] निमीलन। मूँदना।

प्रमीला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. तंद्रा। २. थकावट। शौथिल्य। ग्लानि। ३. मुद्रण। मूँदना। ४. अर्जुन की एक स्त्री का नाम जो एक स्त्रीराज्य की रानी थी (को०)।

प्रमोलिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] निद्रा। नींद [को०]।

प्रमोलित
वि० [सं०] जिसकी आँखें बंद हों [को०]।

प्रमीली (१)
वि० [सं० प्रमोलिन्] [वि० स्त्री० प्रमोलिनी] निमीलित करनेवाला। आँखें मुँदानेवाला।

प्रमीली (२)
संज्ञा पुं० [सं०] एक दैत्य।

प्रमुक्त
वि० [सं०] १. जो मुक्त कर दिया गया हो। जिसके बंधन ढीले कर दिए गए हों। उ०—सौरभ प्रमुक्त प्रेयसी के हृदय से ही तुम प्रति देश युक्त।—अनामिका, पृ० २१। २. स्वतंत्र। मुक्त (को०)। ३. त्यागा हुआ। परित्यक्त (को०)। ४. फेंका हुआ। प्रक्षिप्त (को०)।

प्रमुक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] मुक्तता। स्वतंत्रता [को०]।

प्रमुख (१)
क्रि० वि० [सं०] १. संमुख। सामने। आगे। २. उस समय। तत्काल।

प्रमुख (२)
वि० १. प्रथम। पहला। २. मुख्य। प्रधान। श्रेष्ठ। ३. मान्य। प्रतिष्ठित। अगुआ।

प्रमुख (३)
अव्य० इससे आरंभ करेक और और। इन मुख्यों के अतिरिक्त और और। इत्यादि। वगैरह। उ०—बंधुक सुमन अरुण पद पंकज अंकुश प्रमुख चिह्न धरि आए।—सूर (शब्द०)।

प्रमुख (४)
संज्ञा पुं० १. आदि। आरंभ। २. समूह। ३. पुन्नाग। ४. मुख (को०)। ५. सम्मानयुक्त व्यक्ति। आदरणीय व्यक्ति (को०)। ६. अध्याय, परिच्छेद आदि का आरंभ (को०)।

प्रमुग्ध
वि० [सं०] १. चेतानारहित। २. मूढ़। हतबुद्धि। ३. अत्यंत सुंदर। अतीव सलोना [को०]।

प्रमुच
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रमुचि'।

प्रमुचि
संज्ञा पुं० [सं०] एक ऋषि का नाम।

प्रमुचु
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रमुचि'।

प्रमुद
वि० [सं० प्रमुद] हृष्ट। आनंदित।

प्रमुदा पु
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रमदा] दे० 'प्रमदा'। उ०—प्रमुदा प्रान समान नहीं बिसरत्त एक छिन।—पृ० रा०, १।३७०।

प्रमुदित
वि० [सं०] हर्षित। आनंदित। प्रसन्न। उ०—(क) प्रमुदित पुर नर नारी सब सजहिं सुमंगल चार।—मानस, २।२३। (ख) तब मंत्रायन बिषै सुभट मंत्रिन नै जे वचन कहे ते रानी जसखान प्रमुदित हो कही कै थाँकौ छत्रिय धर्म सध्यौ छै।—प० रासो, पृ० ६६। यौ०—प्रमुदिरतवदन = प्रसन्नमुख। प्रमुदितहृदय = आंतरिक आनंदयुक्त। प्रसन्नचित्त।

प्रमुदितवदना
संज्ञा स्त्री० [सं०] बारह अक्षरों की एक वर्णवृत्ति जिसे मंदाकिनी भी कहते हैं। दे० 'मंदाकिनी'।

प्रमुषित
वि० [सं०] १. ले लेना। चुरा लेना। २. अचेत। मूढ़। हतबुद्धि [को०]।

प्रमुषिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की प्रहेलिका [को०]।

प्रमूकना पु
[सं० प्रमुञ्चन, प्रमोचन] छोड़ना। मुक्त करना। उ०—गात सँवारण में गमे, ऊमर काय अजाण। आखर प्राण प्रमूकओ, खाख हुसी मल खाँण।—बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० ४३।

प्रमूढ
वि० [सं०] १. अत्यंत मूर्ख। जड़। बेवकूफ। २. व्याकुलित। भ्रमित। चकराता हुआ [को०]।

प्रमूढता
संज्ञा स्त्री० [सं०] मिरगी आने के पूर्व का एक लक्षण जिसमें इंद्रियाँ शिथिल होने लगती हैं।—माधव०, पृ० १३०।

प्रमृत (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. मरण। मृत्यु। २. मनु के अनुसार हल जोतकर जीविका करने का काम। कृषि। विशेष—हल चलने में मिट्टी में रहनेवाले बहुत से जीव मर जाते हैं इससे उसे मृत कहते हैं।

प्रमृत (२)
वि० १. दृष्टि की सीमा से दूर। ओझल। २. मरा हुआ। मृत। निष्प्राण। ३. ढँका हुआ। आवृत [को०]।

प्रमृष्ट
वि० [सं०] १. निरस्त। २. मार्जित। चमकाया हुआ। माँजा धोया। पोंछा हुआ।

प्रमेय (१)
वि० [सं०] १. जो प्रमाण का विषय हो सके। वह जिसका बोध करा सकें। २. जिसका मान बताया जा सके। जिसका अंदाज करा सकें। ३. अवधार्य। अवधारण योग्य। जिसका निर्धारण कर सकें।

प्रमेय (२)
संज्ञा पुं० १. वह जो प्रमा या यथार्थ ज्ञान का विषय हो। वह जिसका बोध प्रमाण द्वारा करा सकें। वह वस्तु या बात जिसका यथार्थ ज्ञान हो सके। विशेष—ज्ञान का विषय बहुत सी वस्तुएँ हो सकती हैं पर न्याय दर्शन में गौतम ने उन्हीं वस्तुओं को प्रमेय के अंतर्गत लिया है जिनके ज्ञान से मोक्ष या अपवर्ग की प्राप्ति होती है। ये बारह हैं—आत्मा, शरीर, इंद्रिय, अर्थ, बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रेत्यभाव, फल, सुख और अपवर्ग। यद्यपि वैशेषिक के द्रव्य गुण, कर्म सामान्य, विशेष और समवाय सब पदार्थ ज्ञान के विषय हैं तथापि न्याय में गौतम ने बारह वस्तुओं का ही प्रमेय के अंतर्गत विचार किया है। २. परिच्छेद।

प्रमेसर पु †
संज्ञा पुं० [सं० परमेश्वर] दे० 'परमेश्वर'। उ०— पूरण पुरस प्रमाण प्रमेसर। सुकवि सधार वार अग्रेस्वर।— रा० रू०, पृ० ४।

प्रमेह
संज्ञा पुं० [सं०] एक रोग जिसमें मूत्रमार्ग से शुक्र तथा शरीर की औऱ धातुएँ निकला करती हैं। धातु गिरने का रोग। विशेष—सुश्रुत के अनुसार दिन को सोने, काम न करने, बरा- बर आलस्य में पड़े रहने, शीतल स्निग्ध वस्तुएँ और मीठी वस्तुएँ बहुत अधिक खाने से यह रोग हो जाता है। हाथ पैर में जलन, शरीर का भारी रहना, मूत्र श्वेत और मीठा लिए होना, आलस्य और प्यास, तालू, दाँत, जीभ आदि में मैल जमना, प्रमेह के पूर्वलक्षण हैं। वैद्यक में २० प्रकार के प्रमेह गिनाए गए हैं जिनमें से उदकमेह, इक्षुमेह, सोद्रमेह, सुरामेह, पिष्टमेह, शुक्रमेह, सिकतामेह, शीतमेह, शनैर्मेह और लालमेह तो कफज है; क्षारमेह, नीलमेह, कालमेह, हरिद्रामेह, मांजिष्ठमेह और रक्तमेह पित्तज हैं और वसामेह, मज्जामेह, क्षौद्रमेह और हस्तिमेह वातज हैं। सब प्रकार के प्रमेह चिकित्सा न होने पर मधुमेह हो जाते हैं जिसमें मिठास लिए मधु सा गाढ़ा मूत्र निकलता है। इस रोग में रोगी या तो बहुत दुर्बल हो जाता है या बहुत मोटा। इस प्रकार सूजाक और बहुमूत्र प्रमेह रोग के अंतर्गत ही आ जाते हैं यद्यपि डाक्टरी चिकित्सा में ये भिन्न भिन्न रोग माने गए हैं।

प्रमेही
वि० [सं० प्रमेहिन्] प्रमेह रोग युक्त।

प्रमोक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १. मुक्ति। मोक्ष। छुटकारा। २. त्याग। छोड़ना। फेंकना।

प्रमोक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] चंद्र या सूर्य ग्रहण की समाप्ति [को०]।

प्रमोचन
संज्ञा पुं० [सं०] १. अच्छी तरह मोचन। अच्छी तरह छुड़ाना। २. खूब हरण करना।

प्रमोचनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] गो़डुंबा। एक प्रकार की ककड़ी। गोमा ककड़ी।

प्रमोद
संज्ञा पुं० [सं०] १. हर्ष। आनंद। प्रसन्नता। उ०—चहूँ कोद बाढ़यौ प्रमोद आनंद पयोद बरसत दंपति सोभासंपति बिसतारी।—घनानंद, पृ० ४२६। २. सुख। ३. बृहस्पति के पहले युग के चौथे वर्ष का नाम। (यह शुभ माना जाता है)। ४. एक सिद्धि का नाम। दे० 'प्रमोदा'। ५. कुमार के एक अनुचर का नाम। ६. एक नाग का नाम। ७. उत्कृष्ट या तीव्र सुगंध (को०)। ८. एक प्रकार का चावल (को०)।

प्रमोदक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का जड़हन।

प्रमोदन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु का नाम।

प्रमोदन (२)
वि० हर्षकारक।

प्रमोदवन
संज्ञा पुं० [सं० प्रमोद + वन] आनंदवन। क्रीड़ास्थल। उ०—नए गाँव की तरफ से देखा प्रमोदवन।—कुकुर०, पृ० ५८।

प्रमोदसट्टक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार की औषध जो गाढ़े दही और चीनी में मिर्च, पीपल, लौंग, कपूर मलकर उसमें अनार के पके दाने डालकर बनती है। इससे दीपन होता है तथा थकावट और प्यास दूर होती है।

प्रमोदा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] सांख्य के अनुसार आठ प्रकार की सिद्धियों में से एक।विशेष—यह आधिवैदिक दुःखों के नष्ट होने पर प्राप्त होती है।

प्रमोदा (२)
वि० स्त्री० [सं० प्रमोद] प्रमुदिता। आनंदिता। उ०—छीनूँगी निधि नहीं किसी सौभागिनि, पुण्य प्रमोदा की। लाल वारना नहीं कहीं तू, गोद गरीब यशोदा की।—हिम०, पृ० ५६।

प्रमोदित (१)
वि० [सं०] प्रमोदयुक्त। आनंदित। हर्षित।

प्रमोदित (२)
संज्ञा पुं० कुबेर।

प्रमोदिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] जिंगिनी।

प्रमोदी
वि० [सं० प्रमोदिन्] १. हर्षजनक। २. हर्षयुक्त।

प्रमोघना पु
क्रि० स० [सं० प्रबोधन, हिं० प्रबोधना] समझाना। उ०—सतगुर बपुरा क्या करै, जे सिष ही माँहै चुक। भावै त्यूँ प्रमोधि लै, ज्यू बंसि बजाई फूक।—कबीर ग्रं०, पृ० ३।

प्रमोह
संज्ञा पुं० [सं०] १. मोह। २. मूर्छा।

प्रमोहन
संज्ञा पुं० [सं०] १. मोहित करना। २. वह अस्त्र जिसके प्रयोग से शत्रुदल में प्रमोह की उत्पत्ति हो।

प्रमोहित
वि० [सं०] १. मूढ़। मूर्ख। २. धबड़ाया हुआ। स्तब्ध [को०]।

प्रमोही
वि० [सं० प्रमोहिन्] मोहजनक।

प्रम्लान
वि० [सं०] १. मुरझाया हुआ। सूखा हुआ। जैसे, प्रम्लान कुसुम। २. मैला। गंदा [को०]।

प्रम्लोचा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक अप्सरा।

प्रयंक पु
संज्ञा पुं० [सं० पर्यङ्क] 'पर्यक'।

प्रयंत पु (१)
अव्य० [सं० पर्यन्त] दे० 'पर्यत'। उ०—काम काल कै लोक में मारै जान सुजान। सुंदर ब्रह्मा आदि है कीट प्रयंत बषान।—सुंदर० ग्रं०, भा० २, पृ० ७०६।

प्रयंत (२)
वि० [सं०] १. पवित्र। संयत। उ०—नहीं जानती थी माँ ! तेरी प्रयत प्रभा की प्रथन किरन। मुझको इतना गौरव देगी छूकर मेरा म्लान वदन।—वीणा, पृ० ५१। २. नम्र। दीन। ३. प्रयत्नशील। ४. वशी। इंद्रियों को वश में करनेवाला (को०)।

प्रयतात्मा
वि० [सं० प्रयतात्मन्] संयत आत्मावाला। जितेंद्रिय। संयमी।

प्रयति
संज्ञा स्त्री० [सं०] संयम।

प्रयत्न
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह क्रिया जो किसी कार्य को, विशेषतः कुछ कठिन कार्य को, पूरा करने के लिये की जाय। किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये की जानेवाली क्रिया। विशेष यत्न। प्रयास। अव्यवसाय। चेष्टा। कोशिश। जैसे,—बिना प्रयत्न के कुछ भी नहीं प्राप्त हो सकता। २. न्यायसूत्र के अनुसार आत्मा के छह गुणों अथवा साधनचिह्नों में से एक। प्राणियों की क्रिया। जीवों का व्यापार। विशेष—नैयायिकों के अनुसार प्रयत्न तीन प्रकार के होते हैं— प्रवृत्ति निवृत्ति, और जीवनयोनि। ग्रहण का व्यापार प्रवृत्ति है, त्याग का व्यापार निवृत्ति। ये दोनों इच्छा और द्वेषपूर्वक होते हैं। श्वास प्रश्वास आदि व्यापार जो इच्छा और द्वेषपूर्वक नहीं होते जीवनयोनि प्रयत्न कहलाते हैं। ३. वर्णों के उच्चारण में होनेवाली क्रिया। विशेष—उच्चारण प्रयत्न दो प्रकार का होता है—आभ्यंतर और बाह्य। ध्वनि उत्पन्न होने के पहले वागिंद्रिय की क्रिया को आभ्यंतर प्रयत्न कहते हैं और ध्वनि के अंत की क्रिया को बाह्य प्रयत्न कहते हैं। आभ्यंतर प्रयत्न के अनुसार वर्णों के चार भेद हैं—(१) विवृत—जिनके उच्चारण में वगिंद्रिय खुली रहती है, जैसे, स्वर। (२) स्पृष्ट—जिनके उच्चारण में वागिंद्रिय का द्वार बंद रहता है, जैसे, 'क' से 'म' तक २५ व्यंजन। (३) ईषत् विवृत—जिनके उच्चारण में वागिंद्रिय कुछ खुली रहती है, जैसे य र ल व। (४) ईषत् स्पृष्ट—श ष स ह। ब्राह्य प्रयत्न के अनुसार दो भेद हैं अघोष और घोष। अघोष वर्णों के उच्चारण में केवल श्वास का उपयोग होता है। कोई नाद नहीं होता, जैसे— क ख, च छ, ट ढ त, थ, प, फ, श, ष और स। घोष वर्णों के उच्चारण में केवल नाँद का उपयोग होता है—शेष व्यंजन और सब स्वर।

प्रयत्नपक्ष
संज्ञा पुं० [सं० प्रयत्न + पक्ष] प्रयत्न या उद्योग का पहलू। लोकरंजन के लिये की जानेवाली क्रियाओं का कलाप। उ०—साधनावस्था या प्रयत्न पक्ष को ग्रहण करनेवाले कुछ ऐसे कवि भी होते हैं जिनका मन सिद्धावस्था या उपयोग पक्ष की ओर नहीं जाता, जैसे भूषण।—रस०, पृ० ५६।

प्रयत्नवान्
वि० [सं० प्रत्यत्नवत्] [वि० स्त्री० प्रतत्नवती] प्रयत्न में लगा हुआ।

प्रयत्नशील
वि० [सं०] प्रयत्न में लगा हुआ। प्रयत्नवान्।

प्रयत्नशैथिल्य
संज्ञा पुं० [सं०] साधारण लोग जिस प्रकार आसन मारकर बैठते हैं उसे शिथिल अर्थात् दूर करके योग में कही हुई रीतियों के अनुसार आसन पर जप करना। (योग)।

प्रयसा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक राक्षसी जिसे रावण ने सीता को समझाने के लिये नियत किया था।

प्रयस्त
वि० [सं०] १. पकाया हुआ। सिझाया हुआ। २. मसालेदार। जिसमें मसाले पड़े हों। ३. उत्सुक। जिज्ञासु। ४. बिखरा हुआ [को०]।

प्रयाग
संज्ञा पुं० [सं०] १. बहुत से यज्ञों का स्थान। २. एक प्रसिद्ध तीर्थ जो गंगा यमुना के संगम पर है। विशेष—जान पड़ता है जिस प्रकार सरस्वती नदी के तट पर प्राचीन काल में बहुत से यज्ञादि होते थे उसी प्रकार आगे चलकर गंगा जमुना के संगम पर भी हुए थे। इसी लिये प्रयाग नाम पड़ा। यह तीर्थ बहुत प्राचीन काल से प्रसिद्ध है और यहाँ के जल से प्राचीन राजाओं का अभिषेक होता था।इस बात का उल्लेख वाल्मीकि रामायण में है। वन जाते समय श्रीरामचंद्र प्रयोग में भारद्वाज ऋषि के आश्रम पर होते हुए गए थे। प्रयोग बहुत दिनों तक कोशल राज्य के अंतर्गत था। अशोक आदि बौद्ध राजाओं के समय यहाँ बौद्धों के अनेक मठ और विहार थे। अशोक का स्तंभ अबतक किले के भीतर खड़ा है जिसमें समुद्रगुप्त की प्रशस्ति खुदी हुई है। फाहियान नामक चीनी यात्री सन् ४१४ ई० में आया था। उस समय प्रयाग कोशल राज्य में ही लगता था। प्रयाग के उस पार ही प्रतिष्ठान नामक प्रसिद्ध दुर्ग था जिसे समुद्रगुप्त ने बहुत द्दढ़ किया था। प्रयाग का अक्षयवट बहुत प्राचीन काल से प्रसिद्ध चला आता है। चीनी यात्री हुएन्सांग ईसा की सातवीं शताब्दी में भारतवर्ष में आया था। उसने अक्षयवट को देखा था। आज भी लाखों यात्री प्रयाग आकर इस वट का दर्शन करते है जो सृष्टि के आदि से माना जाता है। वर्तमान रूप में जो पुराण में मिलते हैं उनमें मत्स्यपुराण बहुत प्राचीन और प्रामाणिक माना जाता है। इस पुराण के १०२ अध्याय से लेकर १०७ अध्याय तक में इस तीर्थ के माहात्म्य का वर्णन है। उसमें लिखा है कि प्रयाग प्रजापति का क्षेञ है जहाँ गंगा और यमुना बहती हैं। साठ सहस्त्र वीर गंगा की और स्वयं सूर्य जमुना की रक्षा करते हैं। यहाँ जो वट है उसकी रक्षा स्वयं शूलपाणि करते हैं। पाँच कुंड हैं जिनमें से होकर जाह्नवी बहती है। माघ महीने में यहाँ सब तीर्थ आकर वास करते हैं। इससे उस महीने में इस तीर्थवास का बहुत फल है। संगम पर जो लोग अग्नि द्वारा देह विसर्जित करेत हैं वे जितने रोम हैं उतने सहस्र वर्ष स्वर्ग लोक में वास करते हैं। मत्स्य पुराण के उक्त वर्णन में ध्यान देने की बात यह है कि उसमें सरस्वती का कहीं उल्लेख नहीं है जिसे पीछे से लोगों नेट त्रिवेणी के भ्रम में मिलाया है। वास्तव में गंगा और जमुना की दो ओर से आई हुई धाराओं और एक दोनों की संमिलित धारा से ही त्रिवेणी हो जाती है। ३. यज्ञ (को०)। ४. इंद्र (को०)। ५. घोड़ा (को०)।

प्रयागमय
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्र [को०]।

प्रयागवाल
संज्ञा पुं० [सं० प्रयाग + वाला (प्रत्य०)] प्रयाग तीर्थ का पंडा।

प्रयाचन
संज्ञा पुं० [सं०] १. भिक्षा माँगना। २. प्रार्थना करना। गिड़गिड़ाना [को०]।

प्रयाज
संज्ञा पुं० [सं०] दर्शपौर्णमास यज्ञ के अंतर्गत एक अंग यज्ञ।

प्रयाण
संज्ञा पुं० [सं०] १. गमन। प्रस्थान। जाना। यात्रा। कूच। रवानगी। उ०—जैसी आज्ञा उठा विभीषण, यह कह उसने किया प्रयाण। जँचा इसी में तात, मुझे, भी निज पुलस्त्य कुल का कल्याण।—साकेत, पृ० ३९१। २. युद्धयात्रा। चढ़ाई। ३. आरंभ। किसी काम का छिड़ना। ४. संसार से बिदाई। मृत्यु (को०)। ५. घोड़े की पीठ (को०)। ६. किसी जानवर का पिछला भाग (को०)।

प्रयाणक
संज्ञा पुं० [सं०] १. यात्रा। प्रस्थान। प्रयाण। २. गमन। गतिशीलता [को०]।

प्रयाणकाल
संज्ञा पुं० [सं०] १. जाने का समय यात्रा का समय। २. इस लोक से प्रस्थान का समय। मृत्यु का समय।

प्रयाणपटह
संज्ञा पुं० [सं०] युद्धयात्रा में प्रस्थानकाल के समय बजनेवाला नगाड़ा। धोंसा [को०]।

प्रयाणपुरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दक्षिण में कावेरी नदी के तट पर एक प्राचीन तीर्थ जिसका माहात्म्य स्कदपुराण में वर्णित है।

प्रयाणभंग
संज्ञा पुं० [सं० प्रयाणभङ्ग] यात्राभंग। यात्रा करते समय बीच में रुकना [को०]।

प्रयाणसमय
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रयाणकाल'।

प्रयात (१)
वि० [सं०] १. गत। गया हुआ। २. मृत। मरा हुआ। ३. सोया हुआ।

प्रयात (२)
संज्ञा पुं० १. खुब चलने या जानेवाला। २. वह जो खुब चले अथवा जाय। २. ऊँचा किनारा जिसपर से गिरने से कोई वस्तु एकदम नीचे चली जाय। करार। भृगु। ३. रात्रियुद्ध (को०)।

प्रयान पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रयाण] दे० 'प्रयाण'। उ०—विचारी वियोगिनी वनिताओं के प्रान प्रयान करने लगे। —प्रेमघन०, भा० २, पृ० १०।

प्रयापण
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० प्रयापणीय, प्रयापित, प्रयाप्य] १. प्रस्थान कराना। भागाना। चलता करना। २. आगे जाना।

प्रयापन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रयापण' [को०]।

प्रयापित
वि० [सं०] १. आगे बढ़ाया हुआ। आगे किया हुआ। २. भेजा हुआ। प्रेरित किया हुआ [को०]।

प्रयान
संज्ञा पुं० [सं०] १. देश या काल संबंधी दीर्घता। लंबाई। २. संयम। बँघा हुआ आचरण। ३. अभाव। दुष्काल। दष्प्राप्यता। महँगी। किसी वस्तु के अभाव के कारण ग्राह कों की होड़। ४. कदर।

प्रयाल पु
संज्ञा पुं० [? देश०] म्यान। कोश। उ०—जीभ भली तालू के तरें। खरग भली प्रयाल में धरें। —इंद्रा०, पृ० ८२।

प्रयाला
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रियाला] दाख। उ०—गुडा, प्रयाला, गोस्तनी, चारुफला पुनि सोइ। —नंद० ग्रं०, पृ० ४।

प्रयास
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रयत्न। उद्योग। कोशिश। २. श्रम। मेहनत। उ०—बिनु प्रयास रघुनाथ ढहाए। —तुलसी (शब्द०)। ३. इच्छा।

प्रयासी
वि० [सं० प्रयास+ ई (प्रत्य०)] १. प्रयास करनेवाले। श्रमी। उद्योगी। २. काव्यप्रतिमा रहित। कला विरहित। (लाक्ष०)। उ०—ये ऊहा के बल पर कारीगरी के मजभुन बाँधने के प्रयासी कवि न थे। —आचार्य०, पृ० १३३।

प्रयुक्त (१)
वि० [सं०] १. अच्छी तरह जोड़ा हुआ। पूर्ण रुप से युक्त। २. अच्छी तरह मिला हुआ। संमिलित। ३. जिसकाखूब प्रयोग किया गया हो। जो खूब काम में लाया गया हो। व्यवहार में आया हुआ। ४. जो किसी काम में लगाया गया हो। प्रेरित। ५. प्रकृष्ट रामाधिस्थ (को०)। ६. निंदायुक्त। अत्यंत निंदित (को०)। ७. सुद पर दिया हुआ। (धन) जो ब्याज पर दिया गया हो (को०)। ८. चलाया या फेंका हुआ। प्रेरित। जैसे, मंत्र, शास्त्र, आदि। ९. निकाला हुआ। खींचकर बाहर किया हुआ। जैसे म्यान से असि आदि (को०)। यौ०—प्रयुक्तसंस्कार =चमकता हुआ। साफ किया हुआ (रत्नादि)।

प्रयुक्त (२)
संज्ञा पुं० कारण। हेतु [को०]।

प्रयुक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रयोजन। लक्ष्य। उद्देश्य। २. प्रयोग। ३. प्रेरणा। ४. परिणाम। फल (को०)। ५. उद्योग। चेष्टा। प्रयत्न (को०)।

प्रयुत (१)
वि० [सं०] १. खूब मिला हुआ। २. मिला जुला। गड़बड़। अस्पष्ट। ३. सहित। समेत। ४. दस लाख।

प्रयुत (२)
संज्ञा पुं० दस लाख की संख्या।

प्रयुतेश्वर
संज्ञा पुं० [सं०] स्कंदपुराण में वर्णित एक तीर्थ।

प्रयुत्सु
संज्ञा पुं० [सं०] १. योद्धा। २. मेढ़ा। ३. संन्यासी। ४. इंद्र। ५. वायु।

प्रयुद्ध
संज्ञा पुं० [सं०] १. युद्ध। संग्राम। २. वह जो प्रचंड युद्धकारी हो [को०]।

प्रयोक्ता
संज्ञा पुं० [सं० प्रयोक्तृ] १. प्रयोगकर्ता। जैसे, शब्द- प्रयोक्ता। उ०—बिना प्रयोक्ता के हुए, यहाँ भोग भी रोग।—साकेत, पृ० २५२। २. नियोजित करनेवाला। ३. ऋण देनेवाला। उत्तमर्ण। महाजन। ४. प्रधान अभिनय करनेवाला। सूत्रधार। ५. वाण चलानेवाला। कमनैत (को०)। ६. प्रेरक। प्रेरणा प्रदान करनेवाला (को०)। ७. माध्यम। वाहक (को०)।

प्रयोग
संज्ञा पुं० [सं०] १. आयोजन। अनुष्ठान। साधन। किसी कार्य में योग। किसी काम में लगना। २. किसी काम में लाया जाना। व्यवहार। इस्तेमाल। बरता जाना। जैसे, बल का प्रयोग करना, बिजली का प्रयोग करना, जल का प्रयोग करना, शब्द का प्रयोग करना। उ०—रस है बहुत परंतु सखि, विष है विषम प्रयोग। —साकेत, पृ० २५२। ३. प्रक्रिया। अमल। क्रिया का साधन। विधान। जैसे,— (क) उस वैज्ञानिक ने रसायन के बहुत से प्रयोग दिखाए। (ख) केवल पुस्तक पढ़ने से व्यवहार ज्ञान न होगा, प्रयोग देखो। यौ०—प्रयोगज्ञ। प्रयोगचतुर। प्रयोगनिपुण। प्रयोगविधि = प्रयोग बतानेवाली पद्धति या प्रयोग करने की विधि। प्रयोगवीर्य = प्रयोग की शक्ति। प्रयोगशाला। प्रयोग- शास्त्र =कल्पसुत्र। ४. तात्रिक उपचार या साधन जो बारह कहे जाते है—मारण, मोहन, उच्चाटन, कीलन, विद्धेषण, कामनाशान, स्तभन, वशीकरण, आकर्षण, बंदिमोचन, कामपूरण और वाकप्रसारण। ५. अभिनय। नाटक का खेल। स्वाँग भरना। ६. रोगी के दोषों तथा देश, काल और अग्नि का विचारकर औषध की व्यवस्था। उपचार। ७. यज्ञादि कर्मों के अनुष्ठान का बोध करनेवाली विधि। पद्धति। ८. द्दष्टांत। निदर्शन। ९. साम, दंड आदि उपायों का अवलंबन। १०. धन की वृद्धि के लिये ऋणदान। रुपया बढ़ने के लिये सुद पर दिया जाना। ११. घोड़ा। १२. अनुमान के पाँचों अवयवों का उच्चारण। १३. प्रक्षेपण। फेंकना (को०)। १४. प्रांरभ। शुरुआत (को०)। १५. परिणाम। फल (को०)। १६. संमिश्रण। संबद्धता (को०)।

प्रयोगज्ञ
वि० [सं०] दे० 'प्रयोगनिपुण'।

प्रयोगतः
अव्य० [सं० प्रयोगतस्] १. प्रयोग की द्दष्टि से। २. परिणामतः। ३. कार्य की द्दष्टि से। कार्यतः। ४. प्रयोगा- नुसार [को०]।

प्रयोगनिपुण
वि० [सं०] कुशल अभ्यासी [को०]।

प्रयोगवाद
संज्ञा पुं० [सं० प्रयोग+वाद] आधुनिक काव्य की एक विशिष्ट धारा। विशेष—प्रयोगवाद अंग्रेजी शब्द एकसपेरिमेंटलिज्म की छाया है जिसमें नए मार्गों का अन्वेषण तथा शिल्प और विषय दोनों को नवीनता प्राप्त होती है। यह वाद मुख्यतः प्राचीन काव्यधारा की परंपरा—छंद, भाव, विषय, भाषा आदि का विरोध करता है। विषय और शिल्प दोनों क्षेत्रों में विदेशी कवियों का प्रभाव प्रयोगवाद पर बहुत अधिक है। विषय की द्दष्टि से प्रयोगवादी कवि किसी एक सिद्घांत के अनुवर्ती नहीं हैं।

प्रयोगातिशय
संज्ञा पुं० [सं०] नाटक में प्रस्तावना का एक भेद जिसमें प्रयोग करते करते घुणाक्षर न्याय से (आपसे आप) दुसरे ही प्रकार का प्रयोग कौशल से हो जाता हुआ दिखाया जाय और उसी प्रयोग का आश्रय करके पात्र प्रवेश करें। जैसे, कुंदमाला नाम के संस्कृत नायक में सुत्रधार ने नृत्य के लिये अपनी भार्या को बुलाने के प्रयोग द्धारा सीता और लक्ष्मण का प्रयोग सूचित किया और उस प्रयोग का अवलंबन करके सीता और लक्ष्मण ने प्रवेश किया।

प्रयोगार्थ
संज्ञा पुं० [सं०] वह गौण कार्य जिससे मुख्य कार्य की सिदि्ध हो। प्रत्युत्क्रम।

प्रयोगार्ह
वि० [सं०] जिसका प्रयोग किया जाय। प्रयोग के योग्य।

प्रयोगार्हता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रयोग की उपयोगिता या व्यावहारिकता। २. प्रयोग में आने की योग्यता या शक्ति।

प्रयोगी (१)
संज्ञा पुं० [सं० प्रयोगिन्] प्रयोग करनेवाला व्यक्ति। व्यवहार में लानेवाला। अनुष्ठानकर्ता।

प्रयोगी (२)
वि० १. प्रयोक्ता। जो प्रयोग करे। २. प्रेरक। ३. लक्ष्य वा उद्देश्यवाला। उद्देश्ययुक्त [को०]।

प्रयोग्य
संज्ञा पुं० [सं०] सवारी में जोता जानेवाला घोड़ा या कोई अन्य जानवर। सवारी खींचनेवाला पशु [को०]।

प्रयोजक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रयोगकर्ता। अनुष्ठान करनेवाला। २. काम में लगानेवाला। प्रोत्साहक। प्रेरक। ३. नियंता। व्यवस्था रखनेवाला। इंतजाम रखनेवाला। ४. वह जिसके सामने किसी के पास धन जमा किया जाय या जो अपने सामने किसी से किसी के यहाँ धन जमा करावे। ५. कार्य रुप में करके दिखानेवाला। प्रदर्शन करनेवाला (नाटक)। ६. ग्रंथादि का लेखक। लेखक (को०)। ७. आरंभक। संस्थापक। प्रवर्तक (को०)। ८. शास्ता। व्यवस्थाकार (को०)।

प्रयोजक
वि० १. काम में नियुक्त करनेवाला। २. प्रेरक। ३. प्रभावशाली (को०)। ४. कारणभुत [को०]।

प्रयोजन
संज्ञा पुं० [सं०] १. कार्य। काम। अर्थ। जैसे,—तुम्हारा यहाँ क्या प्रयोजन है? २. उद्देश्य। अभिप्राय। मतलब। गरज। आशय। विशेष—न्याय में जो सोलह पदार्थ माने गए हैं उनमें 'प्रयोजन' चौथा है। जिस उद्देश्य से प्रवृत्ति होती है उसका नाम है प्रयोजन। तत्वद्दष्टि से आत्यंतिक दुःखनिवृत्ति ही संसार में मुख्य प्रयोजन है, शेष सब गौण प्रयोजन है। जैसे, भोजन के लिये हम रसोई पका रहे है, इससे भोजन करना एक प्रयोजन है, रसोई पकाने के लिये ईधन आदि इकट्ठा करते हैं इनसे रसोई बनाना भी प्रयोजन हुआ। पर जब हम इस बात का विचार करते हैं कि भोजन क्यों करते हैं तो क्षुधा के दुःख की निवृत्ति मुख्य प्रयोजन ठहरती है और शेष प्रयोजन गौण हो जाते हैं। इसी प्रकार संसार में जितने प्रयोजन हैं सांसारिक निवृत्ति के आगे वे गौण ठहरते हैं। ३. उपयोग। व्यवहार। उ०—यह वस्तु तुम्हारे किस प्रयोजन की है। ४. लाभ। फायदा (को०)।

प्रयोजनवती लक्षणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह लक्षणा जो प्रयोजन द्धारा वाच्यार्थ से भिन्न अर्थ प्रकट करे। विशेष—लक्षणा दो प्रकार की होती है, प्रयोजनवती और रुढि। 'बहुत सी तलवारें मैदान में आ गई' इस वाक्य में यदि हम तलवार का अर्थ तलवार ही करके रह जाते हैं तो अर्थ में बाधा पड़ती है। इससे प्रयोजनवश हमें तलवार का अर्थ तलवारबंद सिपाही लेना पड़ता है। अतः जिस लक्षणा द्धारा यह अर्थ लिया वह प्रयोजनवती हुई। पर कुछ लक्ष्यार्थ रुढ़ हो गए हैं। जैसे 'कार्य में कुशल'। कुशल का शब्दार्थ कुश इकट्ठा करनेवाला होता है, पर यह शब्द दक्ष या निपुण के अर्थ में रुढ़ हो गया है। इस प्रकार का अर्थ रुढि लक्षण द्धारा प्रकट होता है।

प्रयोजनवान्
वि० [सं० प्रयोजनवत्] [वि० स्त्री० प्रयोजनवती] १. प्रयोजन रखनेवाला। मतलब रखनेवाला। २. मतलबी। स्वार्थी (को०)। ३. उपयोगी। हितकर। उपयुक्त (को०)।

प्रयोजनीय
वि० [सं०] [संज्ञा स्त्री० प्रयोजनीयता, प्रयोज्यता] काम का। मतलब का। प्रयोग के लायक।

प्रयोजनीयता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'प्रयोज्यता'।

प्रयोज्य (१)
वि० [सं०] १. प्रयोग के योग्य। काम में लाने लायक। बरतने लायक। २. काम में लगाए जाने योग्य। नियुक्त करने योग्य। प्रेरित करने योग्य। ३. आचरण योग्य। कर्तव्य।

प्रयोज्य (२)
संज्ञा पुं० १. प्रेष्य भृत्य। २. वह धन जो किसी काम में लगाया जाय।

प्रयोज्यता
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रयोजनीयता। व्यावहारिकता।

प्ररक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] रक्षण। रक्षा [को०]।

प्ररुदित
वि० [सं०] बहुत अधिक रोता हुआ [को०]।

प्ररुह्
संज्ञा पुं० [सं०] ऊपर को बढ़नेवाला (अंकुर, कल्ला, पौधा आदि।)

प्ररुढ़
वि० [सं० प्ररुढ] १. पूरी तरह उगा हुआ। पूर्ण विकसित। २. अंकुरित। उत्पन्न। ३. जिसकी जड़ गहरी हो। बद्धमुल। ४. लंबा उगा हुआ, जैसे केश [को०]।

प्ररुढ़ि
वि० [सं० प्ररुढि] बढ़ना। बढ़ाब। बाढ़। वृद्धि [को०]।

प्ररुपण
संज्ञा पुं० [सं०] [संज्ञा स्त्री० प्ररुपणा] १. आज्ञापन (जैन)। २. समझना (को०)।

प्ररोचन
संज्ञा पुं० [सं०] १. रुचि संपादन। रुचि दिलाना। चाह पैदा करना। शौक पैदा करना। २. मोहित करना। ३. उत्तेजित करना। ४. दे० 'प्ररोचना'।

प्ररोचना
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. रुचि संपादन। चाह या रुचि उत्पन्न करने की क्रिया। २. उत्तेजना। बढ़ावा। ३. नाटक के अभिनय में प्रस्तावना के बीच, सुत्रधार, नट, नटी आदि का नाटक और नाटककार की प्रशंसा में कुछ कहना जिससे दर्शकों को रुचि उत्पन्न हो। ४. अभिनय के बीच आगे आनेवाली बात का रुचिकर रुप में कथन।

प्ररोधन
संज्ञा पुं० [सं०] चढ़ाना। ऊपर उठाना।

प्ररोह
संज्ञा पुं० [सं०] १. आरोह। चढ़ाव। २. ऊपर की ओर निकलना। उगना। जमना। ३. उत्पति। ४. अंकुर। अँखुआ। कल्ला। ४. नंदीवृक्ष। तुन का पेड़। ६. प्रकाश किरण (को०)। ७. संतान। संतति (को०)। ८. गंड। अर्बुद (को०)।

प्ररोहण
संज्ञा पुं० [सं०] १. आरोह। चढ़ाव। २. भुमि से निकलना। उगना। जमना। ३. उत्पत्ति। ४. अँखुवा। अंकुर (को०)।

प्ररोहभुमि
संज्ञा स्त्री० [सं०] उर्वरा भुमि। उपजाऊ जमीन। वह भुमि जहाँ घास पौधे उगें।

प्रोहशाखी
संज्ञा पुं० [सं०] वे वृक्ष जिनकी कलम लगाने से लग जाय।

प्ररोही
वि० [सं० प्ररोहिन्] १. उगने या जमनेवाला। उत्पन्न होनेवाला। २. अभिवर्धनशील। बढ़नेवाला [को०]।

प्रलंफन
संज्ञा पुं० [सं० प्रलम्फन] १. कुदना। २. कुदने की क्रिया या भाव [को०]।

प्रलंब (१)
वि० [सं० प्रलम्ब] १. नीचे की ओर दुर तक लटकता हुआ। उ०—अतिहि लचीली अति प्रलंब बिन रोग। — प्रेमघन०, भा०१, पृ० ७१। २. लंबा। अधिक लंबा। उ०—कुंद इंदुबर गौर सरीरा। भुज प्रलंब परिधन मुनि चीरा। —मानस, १।१०६। ३. टँगा हुआ। टिका हुआ। ४. निकला हुआ। किसी ओर की बढ़ा हुआ। ५. काम में ढीला। शिथिल। सुस्त।

प्रलंब (२)
संज्ञा पुं० १. लटकाव। झुलाव। २. शाखा। डाल। टहनी। ३. लतांकुर। टुनगा। ४. खीरा। ५. राँगा। ६. काम में शिथिलता या टालटुल। व्यर्थ का विलब। ७. पयोधर। स्तन। ८. एक प्रकार का हार। ९. गाथा (को०)। १०. एक दानव जिसे बलराम ने मारा था। उ०—जय जय जय बलभद्र बीर धरी गंभौर अविलंब प्रलंब हारी । —घनानंद, पृ० ५५०। विशेष—श्रीमदभागवत् में कथा है कि एक बार कृष्ण बलराम गोपों के बालकों के साथ खेल रहे थे। प्रलंबासुर भी गोपवेष में उनके साथ मिलकर खेलने लगा। लड़के यह कहकर कुश्ती लड़ने लगे कि जो हारे वह जीतनेवाले को कंधे पर बिठाकर चले। प्रलंब हारा और बलराम को कंधे पर लेकर भागने लगा। पर बलराम का भार इतना अधिक हो गया कि वह आगे न चल सका। अंत में उसने अपना रुप प्रकट किया और थोड़ी देर युद्ध करके बलराम के हाथ से मारा गया। यौ०—प्रलंबघ्न =प्रलंबमनथन। प्रलंबभुज =प्रलंबबाहु। प्रलबहा = बलराम।

प्रलंबक
संज्ञा पुं० [सं० प्रलम्बक] सुगंध तृण।

प्रलंबन
संज्ञा पुं० [सं० प्रलम्बन] अवलंबन। सहारा लेना। लटकना।

प्रलंबबाहु
वि० [सं० प्रलम्बबाहु] जिसकी भुजाएँ लंबी हों। लंबी बाहोंवाला। आजानुबाहु।

प्रलंबमथन
संज्ञा पुं० [सं० प्रलम्बमथन] बलराम।

प्रलंबहा
संज्ञा पुं० [सं० प्रलम्बहन्] बलराम [को०]।

प्रलंबांड
वि० [प्रलम्बाण्ड] जिसका अंडकोष लटकता हुआ हो। बड़े अंडकोषवाला [को०]।

प्रलंबित
वि० [सं० प्रलम्बित] खुब नीचे तक लटकाया हुआ।

प्रलंबी
वि० [सं० प्रलम्बिन्] [वि० स्त्री० प्रलबिनी] १. दूर तक लटकनेवाला। लंबा। २. अवलंबन करनेवाला। सहारा लेनेवाला।

प्रलंभ
संज्ञा पुं० [सं० प्रलम्ब] १. लाभ। प्राप्ति। मिलना। २. छल। धोखा।

प्रलंभन
संज्ञा पुं० [सं० प्रलभ्भन] [वि० प्रलब्ध] १. लाभ होना। प्राप्ति होना। २. छल। धोखा।

प्रलकाल पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रलयकाल] दे० 'प्रलयकाल'। उ०— जगे प्रलकाल भयानक भुत। इसे दुइ दंति भिरे अदभुत। — पृ० रा०,६।१५८।

प्रलपन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० प्रलपित] १. कहना। कथन। २. बकवाद करना। प्रलाप। बकना। ३. विलपन। दुखड़ा रोना। विलाप (को०)।

प्रलपित (१)
वि० [सं०] कहा हुआ। कथित [को०]।

प्रलपित (२)
संज्ञा पुं० वार्ता। बात। प्रलपन [को०]।

प्रलब्ध
वि० [सं०] १. जिसे धोखा दिया गया हो। जो छला गया हो। २. पकड़ा हुआ। लिया हुआ [को०]।

प्रलयंकर
वि० [सं० प्रलयङ्कर] [वि० स्त्री० प्रलंकरी] प्रलयकारी। सर्वनाशकारी।

प्रलय
संज्ञा पुं० [सं०] १. लय को प्राप्त होना। विलीन होना। न रह जाना। २. भु आदि लोकों का न रह जाना। संसार का तिरोभाव। जगत् के नाना रुपों का प्रकृति में लीन होकर मिट जाना। विशेष—पुराणों में संसार के नाश का वर्णन कई प्रकार से आया है। कुर्म पुराण के अनुसार प्रलय चार प्रकार का होता है—नित्य, नैमित्तिक, प्राकृत और आत्यंतिक। लोक में जो बराबर क्षय हुआ करता है वह 'नित्य प्रलय' है। कल्प के अंत में तीनों लोकों का जो क्षय होता है वह नैमित्तिक या 'ब्राह्य प्रलय' कहलाता है। जिस समय प्रकृति के महदादि विशेष तक विलीन हो जाते हैं उस समय 'प्राकृतिक प्रलय' होता है। ज्ञान की पूर्णवस्था प्राप्त होने पर ब्रह्म या चित् में लीन हो जाने का नाम 'आत्यंतिक प्रलय' है। विष्णु पुराण में 'नित्य प्रलय' का उल्लेख नहीं है। ब्रह्म और प्राकृत प्रलयों के वर्णन पुराणों में एक ही प्रकार के हैं। अनावृष्टि द्धारा चराचर का नाश, बारह सूर्यं के प्रचंड ताप से जल का शोषण और सब कुछ भस्म होना, फिर लगातार घोर वृष्टि होना और सब जलमय हो जाना, केवल प्रजापति का या विष्णु का रह जाना वर्णित है। एक हजार चतुर्युग का ब्रह्मा का एक दिन और उतने ही की एक रात होती है इसी रात में वह प्रलय होता है जिसे ब्रह्या प्रलय कहते हैं। प्राकृतिक प्रलय में, पहले जल पृथ्वी के गंधगुण को विलनी करता है जिससे पृथ्वी नहीं रह जाती, जल रह जाता है। फिर जल का गुण जो रस है उसे अग्नि विलीन कर लेती है जिससे जल नहीं रह जाता, अग्नि वायु ही रह जाती है; फिर वायु का गुण जो स्पर्श है उसे आकाश विलीन कर लेता है और केवल आकाश ही रह जाता है जिसका गुण शब्द है। फिर यह शब्द भी अहंकार तत्व में और अहकार तत्व महत्तत्व में और अंत में महत्तत्व भी प्रकृति में लीन हो जाता है। नौयायिक दो प्रकार के प्रलय मानते है—खंडप्रलय और महाप्रलय। पर नष्य न्यायवाले महाप्रलय नहीं मानते। सांख्य के अनुसार सृष्टि और प्रलय दोनों प्रकृति के परिणाम है। प्रकृति का परिणाम दो प्रकार का होता है—स्वरुप परिणाम और विरुप परिणाम। प्राकृति के उत्तरोत्तर विकार द्धारा जो विरुप परिणाम होता है उससे सृष्टि होती है और सृष्टि का जो फिर उलटा परिणाम प्रकृति के स्वरुप की ओर होने लगता है उससे प्रलय होता है। जब सत्व सत्व में, रजस् रजस् में, तमस् तमस् में मिल जाता है तब प्रलय होता है। स्वरुप परिणाम जब होने लगता है उस समय पहले महाभुत पंचतन्मात्र में विलीन होते हैं, फिर पंचतन्मात्र और एकादस इंद्रियाँ अहंकार तत्व में, फिर यह अहंकार महत्तत्व में और अंत में महत्तत्व भी प्रकृति में लीन हो जाता है। उस समय एकमात्र प्रकृति ही रह जाती है। इस प्रकार संसार अपने मुल कारण प्रकृति में लय को प्राप्त हो जाता है। ३. साहित्य में एक सात्विक भाव जिससे किसी वस्तु में तन्मय होने से पूर्व स्मृति का लोप हो जाता है। ४. मुर्छा। बेहोशी। ५. मृत्यु। नाश (को०)। ६. ओंकार (को०)। ७. व्यापक संहार या विनाश (को०)।

प्रलयकर
वि० [सं०] दे० 'प्रलयंकर'।

प्रलयकारी
वि० [सं० प्रलयकारिन्] दे० 'प्रलयंकर'।

प्रलयकाल
संज्ञा पुं० [सं०] प्रलय का समय। वह समय जब समस्त संसार का नाश हो।

प्रलयजलधर
संज्ञा पुं० [सं०] प्रलय काल के मेघ। प्रलय के समय के बादल [को०]।

प्रलयपयोधि
संज्ञा पुं० [सं०] प्रलय के समय का समुद्र।

प्रलयागिनि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रलय+अग्नि] प्रलयंकर आग। अत्यंत भयंकर और विनाशकारी अग्नि। उ०—दहकत ज्वाला सो महि कैसी। अति दुस्सह प्रलायगिनि जैसे। —कबीर सा०। पृ० ४३६।

प्रललाट
वि० [सं०] जिसका ललाट चौड़ा हो। प्रशस्त ललाटवाला [को०]।

प्रलव
संज्ञा पुं० [सं०] १. अच्छी तरह काटना। पूर्ण रुप से छेदन। २. टुकड़ा। धज्जी। ३. लेश। लव।

प्रलवित्र
संज्ञा पुं० [सं०] काटने का औजार [को०]।

प्रलाप
संज्ञा पुं० [सं०] १. कहना। बकना। कथन। २. दुःखपूर्ण रुदन। दुखड़ा रोना (को०)। ३. निरर्थक वाक्य। व्यर्थ की बकवाद। अनाप शनाप बात। पागलों की सी बड़बड़। विशेष—ज्वर आदि के वेग में लोग कभी कभी प्रलाप करते है। वियोगियों की दस दशाओं में एक प्रलाप भी है।

प्रलापक
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का सन्निपात जिसमें रोगी अनाप शनाप बकता है, उसके शरीर में पीड़ा और कप होता है। उसका चित्त ठिकाने नहीं रहता। २. प्रलाप करनेवाला। बकवादी (को०)।

प्रलापहा
संज्ञा पुं० [सं० प्रलापहन्] कुलत्यांजन। एक प्रकार का अंजन।

प्रलापी
वि० [सं० प्रलापिन्] [वि० स्त्री० प्रलापिनी] प्रलाप करनेवाला। व्यर्थ बकनेवाला। अंड बंड बकनेवाला। उ०— सुनेहि न स्रवन अलीक प्रलापी। —मानस, ६।२५।

प्रलापु पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रलाप] दे० 'प्रलाप'। उ०—सुर समर करनी करहिं, कहि न जनावहिं आपु। विद्यमान रन पाय रिपु, कायर करहिं प्रलापु। —मानस, १।२७४।

प्रलिप्त
वि० [सं०] लिप्त। लिपा हुआ। लगा हुआ [को०]।

प्रलीन
वि० [सं०] १. समाया हुआ। तिरोहित। २. विनष्ट। नष्ट। प्रलयप्राप्त (को०)। ३. छिपा हुआ। लीन। निमग्न। (को०)। ४. चेष्टाशून्य। जड़वत।

प्रलीनता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रलय। नाश। विलीनता। तिरोभाव। २. चेष्टानाश। जड़त्व।

प्रलीनेंद्रिय
वि० [सं० प्रलीनेन्द्रिय] जिसकी इंद्रियाँ चेष्टारहकि हों। शिथिल इंद्रियोंवाला [को०]।

प्रलुठित
वि० [सं०] १. भुमि पर पतित। गिरा हुआ। २. उछलता कुदता हुआ (को०)।

प्रलुप्त
वि० [सं०] जो लुप्त किया गया हो [को०]।

प्रलुब्ध
वि० [सं०] लूब्ध। लालच में पड़ा हुआ [को०]।

प्रलुब्धा
वि० स्त्री० [सं०] वह (स्त्री) जो अनुचित रुप से प्रेम करती हो [को०]।

प्रलुन
वि० [सं०] काटा हुआ। कर्तिंत।

प्रलेप
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी गीली दवा को पीडित अंग पर चढ़ाने की क्रिया। अंग पर कोई गीली दवा छोपना या रखना। २. लेप। पुल्टिस।

प्रलेपक
संज्ञा पुं० [सं०] १. लेप करनेवाला। २. एक प्रकार का जीर्ण ज्वर। विशेष—यह ज्वर वात, कफ से उत्पन्न होता है। इसमें पसीने के संसर्ग से चमड़ा लिपा हुआ अर्थात् भीगा सा रहता है और ज्वर बहुत थोड़ा थोड़ा रहता है। यह ज्वर अत्यंत कष्ट- साध्य है।

प्रलेपन
संज्ञा पुं० [सं०] लेप करने की क्रिया। पोतने का काम।

प्रलेप्य (१)
वि० [सं०] लेप करने योग्य।

प्रलेप्य (२)
संज्ञा पुं० कुंचित केश। घुँघराले बाल।

प्रलेह
संज्ञा पुं० [सं०] मांस का एक व्यंजन जो मांस के छोटे छोटे खंड काटकर घी में तलकर बनाया जाता है। कोरमा।

प्रलेहन
संज्ञा पुं० [सं०] चाटना।

प्रलै पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रलय] दे० 'प्रलय'। उ०—मेरे जाँन मेरी जान लेन पाछें आवति है सुल लिएँ कोप भरी प्रलै कपाली सी। —पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ४९१।

प्रलोक
संज्ञा पुं० [सं० परलोक] दे० 'परलोक'। उ०—लोक प्रलोक सबै मिलै देव इंद्र हु होइ। सुंदर दुरलभ संत जन क्यों करि- पावै कोई। —सुंदर० ग्रं०, भा०२, पृ० ७४४।

प्रलोठन
संज्ञा पुं० [सं०] १. भूमि पर लुढ़कना। २. उछलना। कूदना [को०]।

प्रलोप
संज्ञा पुं० [सं०] ध्वंस। नाश।

प्रलोभ
संज्ञा पुं० [सं०] लालच। अत्यंत लोभ।

प्रलोभक
संज्ञा पुं० [सं०] प्रलोभन देनेवाला। लालच देनेवाला।

प्रलोभन
संज्ञा पुं० [सं०] १. लोभ दिखाना। लालच दिखाना। किसी को किसी ओर प्रवृत्त करने के लिये उसे लाभ की आशा देने का काम। जैसे,—तुम उसके प्रलोभन में मत आना। २. वह वस्तु जिससे लालच उत्पन्न हो। ललचानेवाली वस्तु (को०)।

प्रलोभनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] रेत। बालु [को०]।

प्रलोभित
वि० [सं०] प्रलोभ में आया हुआ। ललचाया हुआ। मुग्ध। मोहित।

प्रलोभी
वि० [सं० प्रलोभिन्] प्रलोभ में फँसनेवाला। लुब्ध।

प्रलोल
वि० [सं०] १. अत्यंत चंचल। २. उत्तेजित। अत्यंत कंपित। क्षुब्ध [को०]।

प्रलौ पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रलय प्रा० पलव] दे० 'प्रलय'। उ०— चपै न सीम साहाब सक, धक धकि धर करिहौ प्रलौ। पृ० रा०, १३।३१।

प्रवंग, प्रवंगम
संज्ञा पुं० [सं० प्रवङ्ग, प्रवङ्गम] १. बंदर। २. पक्षी [को०]।

प्रवंचक
संज्ञा पुं० [सं० प्रवञ्चक] वंचन करनेवाला। भारी ठग। धोखेबाज। बारी धुर्त। उ०—तोड़ा गया पुल प्रत्यावक्तन के पथ में अपने प्रवंचकों से। —लहर, पृ० ५९।

प्रवंचन
संज्ञा पुं० [सं० प्रवञ्चन] धोखा देना। ठगना। वंचना (को०)।

प्रवंचना
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रवञ्चना] छल। ठगपना। धुर्तता।

प्रवंचित
वि० [सं० प्रवञ्चित] जो ठगा गया हो। जिसने धोखा खाया हो।

प्रवंद पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रबन्ध] दे० 'प्रबंध'। निबंध। उ०— कथिमथि कहेव सो छंद प्रवंदे अविगति जेहि पहिचानी। — सं० दरिया, पृ० १३९।

प्रवक्ता
संज्ञा पुं० [सं० प्रवक्तृ] १. अच्छी तरह बोलने या कहनेवाला। २. वेदादि का उपदेश देनेवाला। अच्छी तरह समझाकर कहनेवाला।

प्रवग
संज्ञा पुं० [सं०] पक्षी।

प्रवचन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० प्रवचनीय] १. अच्छी तरह समझाकर कहना। अर्थ खोलकर बताना। २. व्याख्या। ३. वेदांग।

प्रवचनपटु
वि० [सं०] सुवक्ता। बातचीत में कुशल [को०]।

प्रवचनीय (१)
वि० [सं०] बताने या समझाकर कहने योग्य।

प्रवचनीय (२)
संज्ञा पुं० प्रवक्ता। अच्छी तरह समझाकर कहनेवाला।

प्रवच्छतिप्रेयसी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रवत्स्यत्प्रेयसी] दे० 'प्रवत्स्य- त्पतिका'। उ०—होनहार पिय के बिरह, बिकल होय जो बाल। ताहिं प्रवच्छतिप्रेयसी बरनत बुद्धि बिसाल। —मति० ग्रं०, पृ० ३१५।

प्रवज्यावसित
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रवज्यावसित'।

प्रवट
संज्ञा पुं० [सं०] गोधूम। गेहूँ।

प्रवण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. क्रमशः नीची होती हुई भूमी। ढाल। उतार। २. पहाड का किनारा। ३. चौराहा। ४. उदर। पेट। ५. क्षण। ६. आहुती।

प्रवण (२)
वि० १.ढालुवाँ। जो क्रमशः नीचा होता गया हो। २. झुका हुआ। नत। ३. किसी बात की ओर ढला हुआ। प्रवृत्त। रत। ४. नम्र। विनीत। ५. व्यवहार में खरा। जो कुटिल न हो। सीधा हिसाब रखनेवाला। ६.उदार। दूसरे की बात सुनने और माननेवाला। ७. अनुकूल। मुवाफिक। ८. स्निग्ध। ९. लंबा। १०. निपुण। ११. वक्र। टेढा। तिर्यक् (को०)। १२. सीधा खडा। जिससे गिरने पर कहीं टिकान न मिले। जैसे, पहाड का खडा किनारा (को०)।

प्रवणता
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रवण होने का भाव।

प्रवत्स्यत्
वि० [सं०] [वि० स्त्री० प्रवत्स्यती, प्रवत्म्यंती] जो परदेस जानेवाला हो। जो यात्रा पर जानेवाला हो [को०]।

प्रवत्स्यत्पतिका
[सं०] वह नायिका जिसका पति विदेश जानेवाला हो। विशेष—मुग्धा, मध्या और स्वकीया, परकीया आदि भेदों से इसके भी कई भेद हो जाते हैं।

प्रवत्स्यत्प्रेयसी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'प्रवत्स्यत्पिका'।

प्रवत्स्यद्भतृर्का
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रवत्स्पत्पतिका।

प्रवदन
संज्ञा पुं० [सं०] घोषणा।

प्रवप
वि० [सं०] बहुत मोटा। स्थूलकाय [को०]।

प्रवपण
संज्ञा पुं० [सं०] मुंडन संस्कार। मुंडन क्रिया [को०]।

प्रवयण
संज्ञा पुं० [सं०] १. बुने हुए कपडे का ऊपरी भाग। २. कशा। कोडा। चाबुक [को०]।

प्रवया
वि० [सं० प्रवयस्] १. वृद्ध। बूढा। २.पुराना [को०]।

प्रवर (१)
वि० [सं०] १. श्रेष्ठ। बडा। मुख्य। प्रधान। जैसे, वीर- प्रवर। उ०—देखें वे हँसते हुए प्रवर, जो रहे देखते सदा समर।—अनामिका, पृ० ११९। २. सर्वप्रधान। सबसे ज्येष्ठ (को०)। यौ०—प्रवर समिति।

प्रवर (२)
संज्ञा पुं० १. किसी गोत्र के अंतर्गत विशेष प्रवर्तक मुनि। जैसे, जमदग्नि गोत्र के प्रवर्तक ऋषि जमदग्नि, और्व और वशिष्ठ; गर्ग गोत्र के गार्ग्य, कौस्तुभ और मांडव्य इत्यादि। २. संतति। ३. अगर की लकडी। ४. आवरण। आच्छादन (को०)। ५. शऱीर का ऊपरी वस्त्र। उपरना। दुपट्टा (को०)। ६. आवाहन। पुकार (को०)। ७. यज्ञ के समय अग्नि का आवाहन (को०)।

प्रवरगिरि
संज्ञा पुं० [सं०] मगध देश के एक पर्वत का प्राचीन नाम। इसे आजकल 'बराबर पहाड' कहते हैं।

प्रवरजन
संज्ञा पुं० [सं०] गुणी व्यक्ति। अच्छे गुणवाला व्यक्ति [को०]।

प्रवरकल्याण
[सं०] अत्यंत सुंदर। बहुत खूबसूरत [को०]।

प्रवरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. देवताओं का आवाहन। २. वर्षा ऋतु के अंत में होनेवाला बौद्धों का एक उत्सव।

प्रवरललिता
संज्ञा स्त्री० [सं०प्रवरललित] एक वर्णवृत्त जिसके प्रत्येक चरण में यगण, मगण, नगण, सगण, रगण और एक गुरु होता है। जैसे,—यमी नासै रागादिक सकल जंजाल भाई। यहाँ ते घेरे ना प्रवरललिता ताहि जाई। अहो, मेरे मीता यदि चहहु संसार जीता। तजो सारे रागा भजहु भव- हा राम सीता।

प्रवरवाहन
संज्ञा पुं० [सं०] अश्विनीकुमार।

प्रवरसमिति
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रवर=समिति] किसी विशेष विषय पर गंभीर विचार के बाद सुनिश्चित मत व्यक्त करने के लिये बनाई हुई समिति।

प्रवरा
संज्ञा पुं० [सं०] १. होमाग्नी। हवन करने की अग्नि। २. विष्णु का एक नाम (को०)। २. सोम याग संबंधी एक उत्सव (को०)।

प्रवर्त
संज्ञा पुं० [सं०] १. कार्यारंभ। ठानना। उ०—जब रन होत प्रवर्त रचत अरि हृदय गर्त नव।—गोपाल (शब्द०)। २. एक प्रकार का मेघ। ३. गोल आकार का एक प्राचीन आभूषण (अथर्व०)।

प्रवर्तक
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी काम को चलानेवाला। संचालक। कोई बात ठानने या उठानेवाला। २. आरंभ करनेवाला। चलानेवाला। अनुष्ठान या प्रचार करनेवाला। जारी करनेवाला। जैसे, मतप्रवर्तक, धर्मप्रवर्तक। उ०—किसी उक्ति की तह में उसके प्रवर्तक के रूप में यदि कोई भाव या मार्मिक अंतर्वृत्ति छिपी है तो काव्य की समरसता पाई जायगी।— रस०, पृ० ३६। ३. काम में लगानेवाला। प्रवृत्त करेनेवाला। प्रेरित करनेवाला। ४. उभारनेवाला। उकसानेवाला। ५. गति देनेवाला। ६. निकालनेवाला। ईजाद करनेवाला। ७. नाटक में प्रस्तावना का वह भेद जिसमें सूत्रधार वर्तमान समय का वर्णन करता हो और उसी का संबंध लिए पात्र का प्रवेश हो। ८. न्याय करनेवाला। विचार करनेवाला। पंच।

प्रवर्तन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० प्रवर्तित, प्रव्त्नीय, प्रवर्त्य] १. कार्य आरंभ करना। ठानना। २. कार्य का संचालन। काम को चलाना। ३. प्रचार करना। जारी करना। ४. उत्तेजना। प्रेरणा। उकसाना। उभारना। ५. प्रवृत्ति। उ०—विघ्न और बाधा की दशा में प्रेम काम करता हुआ नहीं दिखाई देता, एक और करुणा और दूसरी और क्रोध का प्रवर्तन ही देखा जाता है।—रस०, पृ० ७७।

प्रवर्तना
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रवृत्तिदान। प्रवृत्त करने की क्रिया। उत्तेजना। प्रेरणा। २. किसी काम में लगाना या नियुक्त करने की क्रिया। नियोजन।

प्रवर्तयिता
वि० [सं० प्रवर्तयितृ] प्रवर्तन करनेवाला [को०]।

प्रवर्तित
वि० [सं०] १. ठाना हुआ। आरब्ध। २. चलाया हुआ। ३. निकाला हुआ। ४. उत्पन्न। पैदा। ईजाद किया हुआ। ५. उभारा हुआ। उत्तेजित। प्रेरित। ६. ज्वलित। जलाया हुआ। प्रज्वलित (को०)। ७. सूचित (को०)। ८. शुद्ध किया हुआ। पवित्र (को०)।

प्रवर्ती
वि० [सं० पर+वर्तिन] बाद का। परवर्ति। उ०—इतना कहने के बाद मैं इस अध्याय के प्रवर्ती भाग पर आता हूँ। शुक्ल अभि० ग्रं०, पृ० ७२।

प्रवर्ती (२)
वि० [सं० प्रवर्तिन्] प्रवर्तन करनेवाला [को०]।

प्रवर्द्धक
वि० [सं०] बढानेवाला। वृद्धिकारक। उ०—प्रबल भाव सदैब ही प्रतिपक्ष का। है प्रवर्द्धक वीर जन के वक्ष का।—शकुं०, पृ० ४३।

प्रवर्द्धन
संज्ञा पुं० [सं०] विवर्धन। बढ़ती। वृद्धि।

प्रवर्ष
संज्ञा पुं० [सं०] घनघोर वर्षा। जोर का वर्षा [को०]।

प्रवर्षण
संज्ञा पुं० [सं०] १. वर्षा। बारिश। उ०—जिस प्रवर्षण भूमि उर्वर, जिस तपन मरु धूम धूसर, जिस पवन लहरा दिगंतर, ज्ञान तेरा ही वहाँ है।—आराधना, पृ० ३५। २. बरसात की पहली वर्षा (को०)। ३. किष्किंघा के समीप का एक पर्वत जिसपर श्रीराम और लक्ष्मण ने निवास किया था।

प्रवर्षी
वि० [सं० प्रवर्षिन्] [वि० स्त्री० प्रवर्षिणी] १. वृष्टि करनेवाला। वर्षा करनेवाला। २. बौछार करनेवाला। जैसे, बाणों की [को०]।

प्रवर्ह
वि० [सं०] प्रधान। श्रेष्ठ।

प्रवलाकी
संज्ञा पुं० [सं० प्रवलाकिन्] १. मोर। मयूर। २. साँप। सर्प।

प्रवसथ
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रस्थान। २. प्रवास।

प्रवसन
संज्ञा पुं० [सं०] १. विदेश में जाना या रहना। बाहर जाना। २. मृत्यु (को०)।

प्रवह
संज्ञा पुं० [सं०] १. खूब बहाव। २. कुंड जिसमें नाली द्वारा जल जाय। ३. सात वायुओं में से एक वायु। विशेष—यह वायु आवह वायु के ऊपर है और इसी के द्वारा ज्योतिष्क पिंड आकाश में स्थित हैं। ४. वायु। पवन (को०)। ५. अग्नि की सात जिह्वाओं में से एक। ६. घर, नगर आदि से बाहर निकलना।

प्रवहण
संज्ञा पुं० [सं०] १. ले जाना। २. कन्या को ब्याह देना। ३. छोटा परदेदार रथ। बहली। ४. डोली। ५. नाव। पोत।

प्रवहणीनिकाय
संज्ञा पुं० [सं०] कामगर लोगों का संस्थान [को०]।

प्रवहमान
वि० [सं०] [वि० स्त्री० प्रवहमाना] प्रवाहयुक्त। बहता हुआ। प्रवाहित। उ०—(क) प्रवहमान थे निम्न देश में, शीतल शत शत निर्झर ऐसे।—कामायनी, पृ० २५८। (ख) प्रवहमान पार्वत्य नदियों का मार्ग भिन्न किया था।—प्रा० भा० प०, पृ० ५८।

प्रवहमानता
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रवाहित होने का भाव। प्रवाह- शीलता।

प्रवल्हि, प्रवल्हिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] पहेली।

प्रवल्ही, प्रवल्हीका
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रहेलिका [को०]।

प्रवाँण पु †
संज्ञा पुं० [सं० प्रमाण] इयत्ता। सीमा। अवधि। दे० 'प्रमाण'। उ०—राजा सोभंत जल प्रवाँणीं, यूँ सिधा सोभंत सुधि बुधि की वाँणीं।—गोरख०, पृ० २४।

प्रवाँन पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रमाण] दे० 'प्रमाण—१' उ०—भक्ति योग अब सुनहु सयाना। बुद्धि प्रवाँन जु करौं बखाना।—सुंदर ग्रं०, भा०१, पृ० ९५।

प्रवाँनना पु
क्रि० स० [सं० प्रमायन, पुहिं० प्रमानना] दे० 'प्रमानना'। उ०—अज्ञान अपेक्षा ज्ञान बंध की अपेक्षा मोक्ष, द्वैत की अपेक्षा सु तौ अद्धैत प्रवाँनिए।—सुंदर०, ग्रं०, भा० २, पृ० ६२५।

प्रवाक
संज्ञा पुं० [सं०] घोषणा करनेवाला।

प्रवाच
वि० [सं०] १. बहुत बोलनेवाला। इधर उधर की हाँकनेवाला। २. शेखी बघारनेवाला। ३. युक्तिपटु। अच्छी बहस करनेवाला।

प्रवाचक
वि० [सं०] १. अच्छा वक्ता। वाग्मी। वाक्पटु। २. अर्थव्यंजक। अरथवाचक।

प्रवाचन
संज्ञा पुं० [सं०] १. अच्छी तरह कहना। घोषणा। २. नाम। अभिधान। उपाधि (को०)।

प्रवाच्य (१)
वि० [सं०] १. अच्छी तरह कहने योग्य। २. निंदनीय।

प्रवाच्य (२)
संज्ञा पुं० साहित्यिक कृति या रचना [को०]।

प्रवाडा़ पु
संज्ञा पुं० [सं०प्रवाद, हिं० पँवाडा, पवाडा, पवारा] दे० 'पवाडा'। उ०—(क) पढै सु कवि जो वंश प्रवाडा। हुअ वतीत आव दीहाडा।—रा० रू०, पृ० १२। (ख) दीसै नाहर देखियाँ सह प्रवाडा साच।—बाँकी० ग्रं०, भा० १, पृ० २६।

प्रवाण
संज्ञा पुं० [सं०] वस्त्र का अंचल बनाना या सज्जित करना [को०]।

प्रवाणि, प्रवाणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] जुलाहों की ढरकी या भरनी [को०]।

प्रवात (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १.हवा का झोंका। तेज हवा। उ०— पर अंत को अकाल ही के मेघ तो थे क्षण में प्रवात से विथुर गए आकाश खुल गया।—श्यामा०, पृ० ७। २. स्वच्छ या ताजा वायु (को०)। ३. वह स्थान जहाँ खूब हवा हो। ४. ढाल। उतार। प्रवण।

प्रवात (२)
वि० हवा से हिलता हुआ। झोंके खाता हुआ। जिसमें तीव्र वायु लगती हो।

प्रवातसार
संज्ञा पुं० [सं०] बुद्ध।

प्रवाद
संज्ञा पुं० [सं०] १. परस्पर वाक्य। बातचीत। २. कहना। बोलना। व्यक्त करना (को०)। ३. चुनौती। ललकार (को०)। ४. वह बात जो लोगों के बीच फैली हुई हो पर जिसके ठीक होने का निश्चय न हो। जनश्रुति। जनरव। ५.झूठी बदनामी। अपवाद।

प्रवादक
वि० [सं०] बाजा बजानेवाला [को०]।

प्रवादी
वि० पुं० [सं० प्रवादिन्] प्रवाद करनेवाला [को०]।

प्रवान पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रमाण] दे० 'प्रमाण'। उ०—(क) सो भुज कंठ कि तन असि घोरा, सुनु सठ असि प्रवान पन मोरा।—तुलसी (शब्द०)। (ख) मुकुत न भए भगवाना। तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना।—मानस, १।१२३।

प्रवार
संज्ञा पुं० [सं०] १.प्रवर। २. वस्त्र। आच्छादान। ३. उत्तरीय वस्त्र। चादर या दुपट्टा।

प्रवारण
संज्ञा पुं० [सं०] १. निषेध। २. काम्यदान। वह दान जो किसी कामना से किया जाय। ३. कमनीय वस्तुओं का दान। उत्तम वस्तुओं का दान (को०)। ४. इच्छापूर्ति। कामना पूरी करना (को०)। ५. महादान (को०)। ६. आच्छादान। प्रवार (को०)। ७. वर्षा ऋतु बीतने पर होनेवाला बौद्धों का एक उत्सव।

प्रवाल
संज्ञा पुं० [सं०] १. मूँगा। विद्रुम। २. किशलय। कोंपल। कोमल पत्ता। ३. वीणादंड। सितार या तँबूरे की लकडी।

प्रवास
संज्ञा पुं० [सं०] १. अपना घर या देश छोड़कर दूसरे देश में रहना। विदेश में रहना। परदेश का निवास। २. विदेश। यौ०—प्रवासगत =विदेश गया हुआ। प्रवासपर = प्रवास में आसक्त। प्रवासस्थ, प्रवासस्थित =प्रवास पर गया हुआ।

प्रवासन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० प्रवासित, प्रवास्य] १. देश या पुर से बाहर निकालना। देशनिकाला। २. वध। ३. प्रवास। बाहर रहना (को०)।

प्रवासित
वि० [सं०] १. देश से निकाला हुआ। २. हत। मारा हुआ।

प्रवासी
वि० [सं० प्रवासिन्] [वि० स्त्री० प्रवासिनी] विदेश में निवास करनेवाला। परदेस में रहनेवाला।

प्रवास्य
वि० [सं०] जो देश से निकाले जाने के योग्य हो। जिसे देशनिकाला देना उचित हो।

प्रवाह
संज्ञा पुं० [सं०] १. जल। स्रोत। पानी की गति। बहाव। २. बहता हुआ पानी। धारा। ३. कार्य का बराबर चला चलना। काम का जारी रहना। ४. चलता हुआ काम। व्यवहार। ५. झुकाव। प्रवृत्ति। ६. अच्छा वाहन या घोडा़। ७. चलता हुआ क्रम। तार। सिलसिला। जैसे, वाणी का प्रवाह। ८. तालाब। झील (को०)। ९.उत्तम घोडा़ (को०)।

प्रवाहक
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो अच्छी तरह वहन करे। अच्छी तरह वहन करनेवाला। २. राक्षस।

प्रवाहण
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० प्रवाहित] १. ढोया जाना। २. बहाया जाना।

प्रवाहणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] मलद्वार में सबसे ऊपर की कुँडली जो मल को बाहर फेंकती है।

प्रवाहिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बहानेवाली। २. अतीसार या ग्रहणी रोग का एक भेद। ३. बहनेवाली अर्थात् नदी। सरिता जिसमें प्रवाह रहता है। उ०—

प्रवाहित
वि० [सं०] १. जो बहाया गया हो। २. जो ढोया गया हो।

प्रवाहिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] नदी [को०]।

प्रवाही (१)
वि० [सं० प्रवाहिन्] [वि० स्त्री० प्रवाहिनी] १. बहानेवाला। २. प्रवाहवाला। बहनेवाला। ३. तरल। द्रव।

प्रवाही (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] बालुका। बालू। रेत।

प्रविकट
वि० [सं०] अत्यंत विस्तृत। विशाल [को०]।

प्रविकर्षण
संज्ञा पुं० [सं०] खींचना। आकर्षण। तानना [को०]।

प्रविकीर्ण
वि० [सं०] १. बिखरा हुआ। छितरा हुआ। २. अलग अलग। विघटित [को०]। यौ०—प्रविकीर्णकामा =वह औरत जिसके अनेक प्रेमी हों।

प्रविख्यात
वि० [सं०] १. प्रसिद्ध। विख्यात। मशहूर। २. आदृत। आदरणीय। संमानित [को०]।

प्रविख्याति
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रसिद्धि। ख्याति।

प्रविग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] संधिभंग।

प्रविचय
संज्ञा पुं० [सं०] १. अनुसंधान। खोज। २. परीक्षण। परीक्षा।

प्रविचर
संज्ञा पुं० [सं०] विवेक। विचारणा। विवेचन [को०]।

प्रविचित
वि० [सं०] सिद्ध। परीक्षित [को०]।

प्रविचेतन
संज्ञा पुं० [सं०] बोध। समझ। ज्ञान [को०]।

प्रवितत
वि० १. फैला हुआ। अत्यंत विस्तृत। २. बिखरा हुआ। अस्तव्यस्त। जैसे, बाल [को०]।

प्रविदार
संज्ञा पुं० [सं०] खुलना। स्फोट [को०]।

प्रविदारण
संज्ञा पुं० [सं०] १.पूर्ण रूप से विदारण। २. युद्ध। ३. भीड़भाड़। जनसंमर्द (को०)। ४. स्फुटन। खिलना। खुलना। (को०)।

प्रविद्ध
वि० [सं०] फेंका हुआ। क्षिप्त। अपाकृत [को०]।

पविद्रुत
वि० [सं०] अस्तव्यस्त या तितर बितर किया हुआ। भगाया हुआ [को०]।

प्रविधान
संज्ञा पुं० [सं०] १. विचार करना। २. कार्य रूप में परिणत करना। २. वह साधन जो काम में लाया गया हो [को०]।

प्रविधि
संज्ञा स्त्री० [सं०] विधि। ढंग। तरीका।

प्रविध्वस्त
वि० [सं०] १.फेंका हुआ। उत्क्षिप्त। २. कंपित। क्षुब्ध [को०]।

प्रविपल
संज्ञा पुं० [सं०] विपल का लघुतम अंश [को०]।

प्रविर
संज्ञा पुं० [सं०] पीतकाष्ठ। एक प्रकार का चंदन्।

प्रविरत
वि० [सं०] हटा हुआ। विरत [को०]।

प्रविरल
वि० [सं०] १. जो बहुत बडे अंतराल के कारण अलग हो गया हो। अलग। पृथक्। २. बहुत कम। अत्यल्प।

प्रविलय, प्रविलयन
संज्ञा पुं० [सं०] १.पिघलना। २. पूर्णतः लय या समाप्त हो जाना [को०]।

प्रविवर
संज्ञा पुं० [सं०] पदमकाठ या पदम वृक्ष। पदमख। विशेष—दे०'पदम'।

प्रविविक्त
वि० [सं०] १. पूर्णतः निर्जन। पूर्णतः एकाकी। २.निश्चित। तीक्ष्ण। तीव्र। तिग्म। (को०)। ३. अलग। विच्छिन्न। पृथक् (को०)।

प्रविवेक
संज्ञा पुं० [सं०] पूर्णतः निर्जन स्थान। पूरी तौर से निर्जनता [को०]।

प्रविश्लेष
संज्ञा पुं० [सं०] अलगाव। विभक्तता [को०]।

प्रविषण्ण
वि० [सं०] निराश। खिन्न [को०]।

प्रविषय
संज्ञा पुं० [सं०] क्षेत्र। प्रसर [को०]।

प्रविषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] अतीस। अतिविषा।

प्रविष्ट
वि० [सं०] घुसा हुआ। पैठा हुआ। भीतर पहुँचा हुआ। उ०—प्रिय, प्रविष्ट हो, द्वार मुक्त है, मिलन योग तो नित्य युक्त है।—साकेत, पृ० ३११।

प्रविसना पु
क्रि० अ० [सं० प्रविश्] घुसना। पैठना। उ०— प्रविसि नगर कीजै सब काजा। —तुलसी (शब्द०)।

प्रविसृत
वि० [सं०] १. दौडा़ हुआ। प्रपलायित। २. साहसी। हिम्मतवर। उग्र [को०]।

प्रविस्तर, प्रविस्तार
संज्ञा पुं० [सं०] फैलाव। घेरा [को०]।

प्रवीण
वि० [सं०] १. अच्छा गाने, बजाने या बोलनेवाला। २. निपुण। कुशल। दक्ष। होशियार।

प्रवीणता
संज्ञा स्त्री० [सं०] निपुणता। चतुराई। कुशलता।

प्रवीत पु
वि० [सं० पवित्र ?] पवित्र। उ०—याँ महाराँणी उच्चरै, सुहडाँ तजौ सचीत। परवाहौ खग धार दे, जमणा धार प्रवित।—रा० रू०, पृ० ३०।

प्रवीन पु (१)
वि० [सं० प्रवीण] दे० 'प्रवीण'।

प्रवीन पु (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० प्र+वीणा] अच्छी वीणा। सुंदर वीणा।

प्रवीर (१)
वि० [सं०] सुभट। श्रेष्ठ वीर। भारी योद्धा। बहादुर। उ०—शेर पंचनंद का प्रवीर रणजीत सिंह आज मरता है देखो।—लहर, पृ० ६१। २. उत्तम। श्रेष्ठ।

प्रवीर (२)
संज्ञा पुं० १. भौत्य मनु के एक पुत्र। २. वह जो सर्वश्रेष्ठवीर हो (को०)। ३. महिष्मती के राजा नीलध्वज के पुत्र जो ज्वाला के गर्भ से उत्पन्न थे। विशेष—इनकी कथा जैमिनी भारत में इस प्रकार। जब युधिष्ठिर का अश्वमेध का घोडा़ महिष्मती में पहुंचा तब राजकुमार प्रवीर बहुत सी स्त्रियों को लिए एक उपवन में क्रीडा़ कर रहे थे। अपनी प्रेयसी मदनमंजरी के कहने से राजकुमार घोडे़ को पकड़ लाए। घोर युद्ध हुआ जिसमें नालध्वज हारने लगे। सूर्य नीलध्वज के जामाता थे और वर देने के कारण उन्हीं के घर रहते थे। सूर्य के समझाने पर नीलध्वज ने घोडे़ को अर्जुन को लौटाना चाहा। पर उनकी स्त्री उन्हें धिक्कारने लगी और उसने युद्ध करने के लिये उत्तेजित किया। युद्ध में प्रवीर तथा और बहुत से राजवंश के लोग मारे गए। तब नीलध्वज ने घोडे़ को वापस कर दिया। इसपर ज्वाला क्रुद्ध होकर अपने भाई के पास चली गई और उसे अर्जुन से युद्ध करने के लिये उभारने लगी। जब भाई ने भी उसे अपने यहाँ से भगा दिया तब वह नौका पर चढ कर गंगा पार कर रही थी। गंगा देवी को उसने बहुत फटकारा की तुमने सात पुत्रों को डुबो दिया और तुम्हारे आठवें पुत्र भीष्म की यह गति हुई की अर्जुन ने शिखंडी को सामने करके उसे मार डाला। इसपर गंगादेवी ने क्रुद्ध होकर शाप दिया की ६ महीने में अर्जुन का सिर कटकर गिर पडेगा। यह सुनकर ज्वाला प्रसन्न होकर आग में कूद पडी और अर्जुन की वध की इच्छा से तीक्ष्ण बाण होकर वभ्रुवाहन के तूणीर में जा विराजी। यह कथा महाभारत में नहीं है।

प्रवृत
वि० [सं०] चुना हुआ। चयन किया हुआ [को०]।

प्रवृत्त (१)
वि० [सं०] १. प्रवृत्तिविशिष्ट। किसी बात की ओर झुका हुआ। रत। तत्पर। लगा हुआ। जैसे, किसी कार्य में प्रवृत्त होना। २. प्रस्तुत। उद्यत। तैयार। ३. जिसकी उत्पत्ती या आरंभ हुआ हो। उत्पन्न। आरब्ध। ४. लगाया हुआ। नियुक्त। ५. निश्चित (को०)। ६. बाधा रहित। निर्बोध (को०)। ७. निर्विवाद (को०)। ८. वर्तुलाकार (को०)। ९. बहता हुआ। प्रवाहित (को०)।

प्रवृत्त (२)
संज्ञा पुं० १. एक गोलाकार आभूषण। २. क्रिया। व्यापार। कार्य [को०]।

प्रवृत्तक
संज्ञा पुं [सं०] १. रंगमंच पर प्रवेश करना। २. एक मात्रावृत्त [को०]।

प्रवृत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रवाह। बहाव। २. झुकाव। मन का किसी विषय की ओर लगाव। लगन। जैसे,—उसकी प्रवृत्ति व्यापार की ओरक नहीं है। ३. वार्ता। वृतांत। हाल। बात। ४. यज्ञादि व्यापार। ५. न्याय में एक यत्न विशेष। विशेष—वाणी, बुद्धि और शरीर से कार्य के आरंभ को प्रवृत्ति कहते हैं। राग द्वेष भले बुरे कामों में प्रवृत्त कराते हैं। इष्टसाधनता ज्ञान प्रवृत्ति का ओर द्विष्टसाधनता ज्ञान निवृत्ति का कारण होता है। ६. प्रवर्तन। काम का चलना। ७. सांसरिक विषयों का ग्रहण। संसार के कामों में लगाव। दुनिया के धंधे में लीन होना। प्रकृति का उलटा। ८. उत्पत्ति। आरंभ। ९. शब्दार्थ- बोधक शक्ति (को०)। १०. भाग्य। किस्मत। (को०)। ११. उज्जयिनी का एक नाम (को०) १२. (गणित में) गुणक। गुणक अंक (को०)। १३. हाथी का मद। यौ०—प्रवृत्तिज्ञ। प्रवृत्तिनिमित्त =प्रवृत्ति का कारण। किसी विशिष्ट अर्थ में शब्दप्रयोग का कारण। प्रवृत्तिपराङमुख = जिसकी समाचार देने में रुचि न हो। प्रवृत्तिपुरुष =गुप्तचर। प्रवृत्तिमार्ग =भौतिक जीवन के कार्यव्यापारों में आसक्ति। प्रवृत्तिलेख =मार्गदर्शन करनेवाला। आलेख। प्रवृत्तिविज्ञान।

प्रवृत्तिज्ञ
संज्ञा पुं० [सं०] जासूस। खुफिया [को०]।

प्रवृत्तिविज्ञान
संज्ञा पुं० [सं०] बाह्य पदार्थों से प्राप्त ज्ञान। (बौद्ध दर्शन)।

प्रवृद्ध (१)
वि० [सं०] १. वृद्धियुक्त। खूब बढा़ हुआ। २.प्रौढ। खूब पक्का। ३. विस्तृत। खूब फैला हुआ। विशाल। ४. उग्र। घमंडी। गर्विष्ठ (को०)।

प्रवृद्ध (२)
संज्ञा पुं० १. तलवार के ३२ हाथों में से एक जिसे प्रसृत भी कहते हैं। इनमें तलवार की नोक से शत्रु का शरीर छू भर जाता है। २. अयोध्या के राजा रघु का एक पुत्र जो गुरु के शाप से १२ वर्ष के लिये राक्षस हो गया था।

प्रवेक
वि० [सं०] उत्तम। प्रधान।

प्रवेग
संज्ञा पुं० [सं०] प्रकृष्ट वेग। तीव्र गति [को०]।

प्रवेट
संज्ञा पुं० [सं०] यव। जौ।

प्रवेण
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का बकरा। (वाल्मीकि रामायण)।

प्रवेणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वेणी। केशविन्यास। २. हाथी की पीठ पर का रंगबिरंगा झूल। ३. एक नदी। (महाभारत)। ४. धारा का प्रवाह। जलादि का बहाव (को०)।

प्रवेता
संज्ञा पुं० [सं० प्रवेतृ] सारथी। रथवान।

प्रवेदन
संज्ञा पुं० [सं०] ज्ञात कराना, व्यक्त या जाहिर करना [को०]।

प्रवेध
संज्ञा पुं० [सं०] १. बाण का छोडा़ जाना। २. एक विशेष प्रकार की माप [को०]।

प्रवेप, प्रवेपक, प्रवेपथु, प्रवेपन
संज्ञा पुं० [सं०] कंपन। काँपना। हिलना डोलना [को०]।

प्रवेरति
वि० [सं०] इधर उधर फेंका हुआ। इतस्ततः क्षिप्त या विकीर्ण [को०]।

प्रबेल
संज्ञा पुं० [सं०] पीली मूँग।

प्रवेश
संज्ञा पुं० [सं०] १. अंतर्निवेश। भीतर जाना। घुसना। पैठना। दखल। २. गति। पहुँच। रसाई। जैसे,—वहाँ तक उनका प्रवेश नहीं है। ३. किसी विषय की जानकारी। जैसे—न्यायशास्त्र में उनका ऐसा प्रवेश नहीं है। ४. द्वार।५. नाटक में किसी पात्र का रंगमंच में प्रवेश (को०)। ६. उद्देश्योन्मुखता (को०)। ७. किसी लग्न या राशि में सूर्य का गमन (को०)। ८. आना। उपस्थित होना जैसे रात। (को०)। १०.व्यवहार। उपयोग (को०)। ११. पद्घति। ढंग (को०)। १२. आय। आगम (को०)।

प्रवेशक
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रवेश करनेवाला। २. नाटक के अभिनय में वह स्थल जहाँ कोई पात्र दो अंकों के बीच की घटना का (जो दिखाई न गई हो) परिचय अपने वार्तालाप द्वारा देता है।

प्रवेशद्वार
संज्ञा पुं० [सं०] प्रवेश करने का मार्ग [को०]।

प्रवेशन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० प्रविष्ट, प्रवेशनीय, प्रवेशित, प्रवेश्य] १. भीतर जाना। घुमना। पैठना। २. सिंहद्वार। ३. ले जाना। प्रवेश कराना। पहुँचाना (को०)। ४. स्त्री- प्रसंग। रतिक्रिया। संभोग (को०)।

प्रवेशनिषेध
संज्ञा पुं० [सं०] किसी के आने वा प्रवेश को निषिद्ध ठहराने का आदेश।

प्रवेशना पु
क्रि० अ०, क्रि० स० [सं० प्रवेशन] दे० 'प्रवेसना'।

प्रवेशपत्र
संज्ञा पुं० [प्रवेश+पत्र] १. वह प्रमाणपत्र जिसके आधार पर संबद्ध स्थान या कार्यक्रम में भाग लिया जा सकता है। टिकट। २. वह प्रमाणपत्र जिसके आधार पर विदेशयात्रा की जाती है और जो विदेश में प्रवेश करते समय अधिकारियों को दिखाया जाता है।

प्रवेशशुल्क
संज्ञा पुं० [सं०] वह द्रव्य जो किसी स्थान या संस्था में प्रवेश का अधिकार पाने के लिये दिया जाय।

प्रवेशिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह पत्र, चिट्ठी या चिन्ह जिसे दिखाकर कहीं प्रवेश करने पाएँ। २. प्रवेश के लिये दिया जानेवाला धन। दाखिला।

प्रवेशित
वि० [सं०] १. प्रवेश कराया हुआ। घुसाया या पैठाया हुआ। २. पहुँचाया हुआ [को०]।

प्रवेश्य (१)
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य अर्थशास्त्रनुसार देश के भीतर आनेवाला माल। आयात।

प्रवेश्य (२)
वि० [सं०] प्रवेश के योग्य। जिसमें प्रवेश हो सके। २. जिसका प्रवेश कराया जाय। ३. जो बजाया जाय, जैसे वाद्य आदि [को०]।

प्रवेश्यशुल्क
संज्ञा पुं० [सं०] देश के भीतर आनेवाला माल का महसूल। आयात कर।

प्रवेष पु
संज्ञा पुं० [सं० परिवेश] परिधि। मंडल। घेरा।

प्रवेष्ट
संज्ञा पुं० [सं०] १. बाहु। २. बाहु का निचला भाग। पहुँचा। ३. हाथी के दाँत पर का मांस। हाथी का मसूडा़। ४. हाथी की पीठ का मांसल भाग जिसपर सवारी होती है। ५. हाथी की झूल (को०)।

प्रवेष्टक
संज्ञा पुं० [सं०] दाहिना हाथ।

प्रवेष्टा
संज्ञा पुं० [सं० प्रवेष्ट्टा] १. प्रवेश करनेवाला। २. प्रवेश करानेवाला (को०)।

प्रवेसना पु (१)
क्रि० अ० [सं० प्रवेश] प्रवेश करना। घुसना। पैठनी। उ०—सो सिय मम हित लागि दिनेसा। घोर बननि महँ कीन्ह प्रवेसा।—रामाश्वमेघ (शब्द०)।

प्रवेसना (२)
क्रि० स० प्रविष्ट करना। घुसाना।

प्रव्यक्त
वि० [सं०] स्फुट। ब्यक्त। प्रकट [को०]।

प्रव्यक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] आविष्कारण। प्रकाशन। व्यक्ति [को०]।

प्रव्याहरण
संज्ञा पुं० [सं०] बोलने, भाषण करने वा वाद करने का स्थान [को०]।

प्रव्याहार
संज्ञा पुं० [सं०] १. भाषण। कथन। उक्ति। २. वाद का बढ़ना। कथन या भाषण का जारी रहना। ३. ध्वनी। आवाज। शब्द। रव [को०]।

प्रव्याहृत
वि० [सं०] १. भविष्य के रूप में कथित। २. उक्त। कथित [को०]।

प्रव्रजन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० प्रवजित] १. घर बार छोड़कर प्रव्रज्या या संन्यास लेना। २. बाहर जाना। परदेश जाना (को०)।

प्रव्रजित (१)
वि० [सं०] १. संन्यासी। २. गृहत्यागी।

प्रव्रजित (२)
संज्ञा पुं० १. सन्यासी। वह व्यक्ति जिसनें चतुर्थ आश्रम ग्रहण कर लिया हो। २. बोद्ध या जैन भिक्षु का एक शिष्य। ३. संन्यास आश्रम। चतुर्थ आश्रम [को०]।

प्रव्रजिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जटामासी। २. गोरखमुंडी। ३. तपस्विनी। तापसी (को०)।

प्रव्रज्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. संन्यास। भिक्षाश्रम। २. जाना। बाहर जाना। विदेशगमन (को०)। ३. तृतीय आश्रम। वानप्रस्थ (को०)। क्रि० प्र—ग्रहण करना।—लेना।

प्रव्रज्यावसित
संज्ञा पुं० [सं०] जो संन्यास ग्रहण करके उससे च्युत हो गया हो। विशेष—प्रव्रज्याभ्रष्ट व्यक्ति को प्रायश्चित करना होता है। पर प्रायश्चित्त करने पर भी उसके साथ खानपान का व्यवहार नहीं रखना चाहिए।

प्रव्रज्याव्रत
संज्ञा पुं० [सं०] नैपाली बौद्धों के यहाँ का एक संस्कार जो हिंदुओं के यज्ञोपवीत के ढग पर होता है।

प्रव्रश्चन
संज्ञा पुं० [सं०] खुखडी़ जिससे लकडी़ काटी जाय। काठ काटने की कुल्हाडी़ [को०]।

प्रव्राज्
संज्ञा पुं० [सं०] १. बहुत नीची जमीन। २. संन्यास।

प्रव्राजक
संज्ञा पुं० [सं०] [ स्त्री० प्रव्राजिका] संन्यासी [को०]।

प्रव्राजन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रव्रजन'।

प्रशस पु (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रशंसा] दे० 'प्रशंसा'

प्रशंस (२)
वि० [सं० प्रशंस्य] प्रशंसा के योग्य। उ०—(क) गए जहाँ हंस संत बानो सो प्रशंस देखि जानि के बँधाए राजा पासलैकै आए हैं।—प्रियादास (शब्द०)। (ख) मंत्री प्रसिद्ध प्रशंस तू।—पूर्ण (शब्द०)।

प्रशसक
वि० [सं०] १. प्रशंसा करनेवाला। स्तुति करनेवाला। २. खुशामदी। चाटुकार।

प्रशसन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० प्रशंसनीय, प्रशंसित, प्रशंस्य] १. गुणकीर्तन। गुणों का वर्णन करते हुए स्तुति करना। सराहना। तारीफ करना। २. धन्यवाद। साधुवाद।

प्रशंसना पु (१)
क्रि० स० [सं० प्रशंसन] सराहना। गुणानुवाद करना। बखानना। तारीफ करना। उ०—(क)रचि लक्ष्य विविध प्रकार मुनिवर तिन्हें भेदन को कहैं। अरु हस्त- लाघव देखि सुतन प्रशंसि उर आनँद गहैं।—लवकुशचरित्र (शब्द०)। (ख) ताके पुत्र अनूपम आहो। वेद पुराण प्रशंसत जाही।—सबलसिंह (शब्द०)।

प्रशंसना (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रशंसा। प्रशसन।

प्रशंसनीय
वि० [सं०] सराहने योग्य। स्तुत्य [को०]।

प्रशंसा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. गुणवर्णन। स्तुति। बडा़ई। श्लाघा। तारीफ। २. कीर्ति। ख्याति। प्रसिद्धि (को०)। क्रि० प्र०—करना।—होना। यौ०—प्रशसालाप = प्रशंसा। श्लाघा। प्रशंसामुखर = उच्च स्वर से गुण वर्णन करनेवाला। प्रशंसोपमा।

प्रशंसित
वि० [सं०] जिसकी प्रशंसा हुई हो। प्रशंसायुक्त। सराहा हुआ।

प्रशंसी
वि० [सं० प्रशंसिन्] दे० 'प्रशंसक' [को०]।

प्रशंसोपमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] उपमालंकार का एक भेद जिसमें उपमेय की अधिक प्रशंसा करके उपमान की प्रशंसा द्योतित की जाती है। जैसे,—जो शशि शिव सिर धरत है सो तव बदन समान।

प्रशंस्य
वि० [सं०] प्रशंसा करने योग्य। प्रशंसनीय।

प्रशक्य
वि० [सं०] १. शक्ति भर करनेवाला। २. किया जाने योग्य। जो किया जा सके।

प्रशत्त्वरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] नदी। सरिता [को०]।

प्रशत्त्वा, प्रशवा
संज्ञा पुं० [सं० प्रशत्त्वन्, प्रशत्वन्] समुद्र।

प्रशम
संज्ञा पुं० [सं०] १. शमन। उपशम। शांति। २. निवृत्ति। नाश। ध्वंस। भागवत के अनुसार रंतिदेव के पुत्र का नाम।

प्रशमन
संज्ञा पुं० [सं०] १. शमन। शांति। २. नाशन। ध्वंस करना। ३. मारण। वध। ४. प्रतिपादन। ५. दान (को०)। ६. दबाना। वश में करना। स्थित करना। ७. सत्राजित के भाई का नाम। ८. अस्त्रप्रहार।

प्रशमित
वि० [सं०] जो शांत हो। जो नीरव हो। उ०—प्रशमित है वातावरण, नमितमुख सांध्यकमल।—अपरा, पृ० ३८।

प्रशल
संज्ञा पुं० [सं०] हेमंत ऋतु। दे०'प्रसल' [को०]।

प्रशस्त (१)
वि० [सं०] १. प्रशंसनीय। सुंदर। २. जिसकी प्रशंसा की गई हो (को०)। ३. श्रेष्ठ। उत्तम। भव्य। ४. विस्तृत। व्यापक। उ०—अकबर कालीन कवियों के लिये काव्य का मार्ग प्रशस्त कर दिया था।—अकबरी०, पृ० ७। ५. स्वच्छ साफ। चौडा़। जैसे, प्रशस्त ललाट (को०)।

प्रशस्त (२)
संज्ञा पुं० संज्ञा स्त्री० करजोडी़ नाम की जडी़। हत्थाजोडी़।

प्रशस्तपाद
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्राचीन आचार्य जिनका वैशेषिक़ दर्शन पर 'पदार्थधर्मसंग्रह' नामक ग्रंथ अबतक मिलता है। इसे कुछ लोग वैशेषिक का भाष्य मानते हैं।

प्रशस्ताद्रि
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक देश का नाम। बृहत्संहिता के मत से यह देश ज्येष्ठा, पूर्वा, मूल और शतभिष के अधिकार में हैं। २. एक पर्वत (को०)।

प्रशस्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रशंसा। स्तुति। २. वह प्रशंसा- सूचक वाक्य जो किसी को पत्र लिखते समय पत्र के आदि में लिखा जाता है। सरनामा। ३. किसी की प्रशंसा में लिखी गई कविता (को०)। ४. राजा की ओर से एक प्रकार के आज्ञापत्र जो पत्थरों की चट्टानों या ताम्रपत्रादि पर खोदे जाते थे और जिनमें राजवंश और कीर्ति आदि का वर्णन होता था। ५. वर्णन। विवरण (को०)। ६. प्राचीन पुस्तकों के आदि और अंत की कुछ पंक्तियाँ जिनसे पुस्तक के कर्ता, विषय, कालादि का परिचय मिलता हो।

प्रशस्य
वि० [सं०] १. प्रंशसा के योग्य। प्रशंसनीय। २. श्रेष्ठ। उत्तम।

प्रशांत (१)
वि० [सं० प्रशान्त] १. चंचलतारहित। स्थिर। २. शांत। निश्चल वृत्तिवाला। ३. मृत। मरा हुआ (को०)। ४. वशीकृत वश में लाया हुआ। सधाया हुआ (को०)। यौ०—प्रशांतकाम = जिसकी कामनाएँ पूरी हो गई हों। संतुष्ट। प्रशांतचित्त = जिसका चित्त शांत हो। शांतचित्त। प्रशांतचेष्ट = जिसने प्रयत्न करना छोड़ दिया हो। जिसकी चेष्टा शांत हो गई हो। प्रशातबाध = जिसकी सब बाधाएँ दूर हो गई हों।

प्रशांत (२)
संज्ञा पुं० एक महासागर जो एशिया के पूर्व एशिया और अमरीका के बीच में है। (आधुनिक भूगोल)।

प्रशांतात्मा
वि० [सं० प्रशान्तात्मन्] जिसका चित्त शांत हो। प्रशांतचित्त [को०]।

प्रशांतोर्ज
वि० [सं० प्रशान्तोर्ज] जिसकी शक्ति शांत या क्षीण हो गई हो [को०]।

प्रशांति
संज्ञा० स्ञी० [सं० प्रशान्ति] १. शांति। २. स्थिरता। ३. शमन (को०)।

प्रशाख
वि० [सं०] १. जिसकी कई शाखाएँ हों। जिसकी फैली हुई शाखाएँ हों। २. (वह भ्रूण) जिसके निर्माण का पाँचवाँ महीना हो। तबतक भ्रूण में हाथ और पैर बन जाते हैं [को०]।

प्रशाखा
संज्ञा पुं० [सं०] शाखा की शाखा। टहनी। पतली शाखा।

प्रशाखिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] छोटी टहनी।

प्रशासक
संज्ञा पुं० [सं०] १. शासन करनेवाला। शास्ता। उ०— ऐसे वयोवृद्ध विद्वान् अनथक कार्यकर्ता और अनुभवी प्रशासक के आदरार्थ जो प्रयास मध्यप्रदेश साहित्य संमेलन द्वारा किया जा रहा है, उसका मैं स्वागत करता हूँ।—शुक्ल अभि० ग्रं० (संदेश), पृ० १। २. आचार्य। उपदेष्टा।

प्रशासकीय
वि० [सं०] प्रशासन से संबंधित। प्रशासन का।

प्रशासन
संज्ञा पुं० [सं०] १. कर्तव्य की शिक्षा जो शिष्य आदि को दी जाय। २. शासन।

प्रशासित
वि० [सं०] १. जिसका अच्छा शासन किया गया हो। २. शिक्षित। ३. आज्ञप्त। आदिष्ट (को०)।

प्रशासिता
संज्ञा पुं० वि० [सं० प्रशासितृ] १. शासनकर्ता। शासक। २. सलाह देनेवाला। परामर्शदाता (को०)।

प्रशास्ता
संज्ञा पुं० [सं० प्रशास्तृ] १. होता का सहकारी एक ऋत्विक् जिसे मैत्रावरुण भी कहते हैं। २. ऋत्विक्। ३. मित्र। ४. शासनकर्ता। राजा। शासक।

प्रशास्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक याग का नाम। २. प्रशास्ता का कर्म। ३. प्रशास्ता के सोमपान करने का पात्र।

प्रशिक्षण
संज्ञा पुं० [सं० प्र(उप०) + शिक्षण] किसी कार्य को कुशलतापूर्वक करने के लिये दी जानेवाली शिक्षा। शिक्षण। शिक्षा।

प्रशिथिल
वि० [सं०] १. अत्यंत ढीला। २. अत्यंत दुर्बल या पतला। अत्यंत सूक्ष्म या कृश [को०]।

प्रशिष्ट
वि० [सं०] दे० 'प्रशासित' [को०]।

प्रशिष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अनुशासन। शिक्षा। उपदेश। २. आदेश। आज्ञा।

प्रशिष्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. शिष्य का शिष्य। २. परंपरागत शिष्य।

प्रशिस्
संज्ञा स्त्री० [सं०] आज्ञा। अनुशासन।

प्रशीत
वि० [सं०] शीत से जमा हुआ [को०]।

प्रशुद्धि
संज्ञा स्त्री० [सं०] पवित्रता। शुद्धता। स्वच्छता [को०]।

प्रशुश्रुक्
संज्ञा पुं० [सं०] वाल्मीकीय रामायण के अनुसार मरु देश के एक राजा का नाम।

प्रशून
वि० [सं०] सूजा हुआ [को०]।

प्रशोचन
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्यक की एक क्रिया का नाम जिसमें रोगी के व्रणादि को जला देते हैं। दागना।

प्रशोष
संज्ञा पुं० [सं०] सूखना। शुष्कता। खुश्की [को०]।

प्रशोषण
संज्ञा पुं० [सं०] १. सोखना। सुखाना। २. एक राक्षस जो बच्चों में सुखंडी रोग फैलाता है।

प्रश्चोतन, प्रश्च्योतन
संज्ञा पुं० [सं०] चना। टपकना। रिसना। मंदस्राव [को०]।

प्रश्न
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी के प्रति ऐसे वाक्य का कथन जिससे कोई बात जानने की इच्छा सूचित हो। पूछताछ। जिज्ञासा। सवाल। जैसे,—पहले मेरे प्रश्न का उत्तर दीजिए तब कुछ कहिए। क्रि० प्र०—करना।—होना। २. वह वाक्य जिससे कोई बात जानने की इच्छा प्रकट हो। सवाल। पूछने की बात। ३. विचारणीय विषय। ४. एक उफनिषद। विशेष—यह अथर्ववेदीय उपनिषद मानी जाती है। इसमें ६ प्रश्न हैं और प्रत्येक प्रश्न के सात से सोलह तक मंत्र हैं। सब मिलाकर ६७ मंत्र हैं। इसमें से प्रजापति से सृष्टि की उत्पत्ति का विषय अलंकारों द्वारा बताया गया है और अद्वैत मत निरुपित हुआ है। प्रथम प्रश्न कात्यायन जी करते हैं कि यह प्रजा कहाँ से उत्पन्न हुई। इसका उत्तर विस्तार से दिया गया है। दूसरा प्रश्न भार्गव वैदर्भी का है कि कौन देवता प्रजा का पालन करते हैं और कौन अपना बल दिखाते हैं। इसके उत्तर में प्राण नाम का देवता बडा बताया गया है क्योंकि उसके बल से सब इंद्रियाँ अपना अपना कार्य करती हैं। तीसरा प्रश्न अश्वलायन जी करते हैं कि प्राण किस प्रकार बडा है और किस प्रकार उसका संबंध बाह्य और अंतरात्मा से है। चौथा प्रश्न सौभाग्यी याग्या ने किया है कि पुरुषों में कौन सोता है, कौन जागता है, कौन स्वप्न देखता है, कौन सुख भोगता है। उत्तर में पुरुष की तीनों अवस्थाएँ दिखाकर आत्मा सिद्ध की गई है। पाँचवाँ प्रश्न शैव सत्यकामा ने ओंकार के अर्थ और उपासना के संबंध में किया है। छठा प्रश्न सुकेशा भरद्वाज का है कि सोलह कलाओंवाला पुरुष कौन है। ५. भविष्य की जिज्ञासा। ६. किसी ग्रंथादि का कोई छोटा अंश (को०)। ७. दे० 'वैदल'।

प्रश्नकथा
संज्ञा स्त्री० [ सं० ] ऐसी कहानी जिसमें प्रश्न हो [को०]।

प्रश्नदूती
संज्ञा स्त्री० [ सं० ] पहेली। बुझौवल।

प्रश्नपत्र
संज्ञा पुं० [ सं० प्रश्न+पत्र] वह पत्र जिसपर परीक्षार्थियों से पूछे जानेवाले प्रश्न अंकित रहते हैं। परचा।

प्रश्नवादी
संज्ञा पुं० [ सं० प्रश्नवादिन्] ज्योतिषी [को०]।

प्रश्नविवाक
संज्ञा पुं० [ सं० ] १. शुक्ल यजुर्वेदसंहिता के अनुसार प्रचिन काल के विद्वानों का एक भेद जो भावी घटनाओं के विषय में प्रश्नों का उत्तर दिया करते थे। २. पंच। सरपंच।

प्रश्नव्याकरण
संज्ञा पुं० [ सं० ] जैनियों के एक शास्त्र का नाम।

प्रश्नातीत
वि० [ सं० प्रश्न+अतीत] जिससे प्रश्न न किया जा सके। जिसके पास प्रश्न न पहुँच सके।—उ०—आज तुम नरराज प्रश्नातीत।—साकेत० पृ० १९९।

प्रश्नि
संज्ञा पुं० [ सं० ] १. जलकुंभी। २. महाभारत के अनुसार एक ऋषि।

प्रश्नी
वि० [सं० प्रश्निन्] प्रश्न पूछनेवाला। जिज्ञासु [को०]।

प्रश्नोत्तर
संज्ञा पुं० [ सं० ] १. सवाल जवाब। प्रश्न और उत्तर। संवाद। २. पुछताछ। ३. वह काव्यालंकार जिसमें प्रश्न और उत्तर रहते हैं।

प्रश्नोपनिषद्
संज्ञा स्त्री० [ सं० ] एक उपनिषद्। विशेष दे० 'प्रश्न'—४।

प्रश्रब्धि
संज्ञा स्त्री० [ सं० ] विश्वास। भरोसा [को०]।

प्रश्रय (१)
संज्ञा पुं० [ सं० ] शिथिलता। ढिलाई। ढिलापन [को०]।

प्रश्रय (२)
संज्ञा पुं० [ सं० ] १. आश्रयस्थान। २. टेक। सहारा। आधार। ३. विनय। नम्रता। शिष्टता। ४. स्नेह। प्रणय। अनुराग (को०)। ५. महाभारत में वर्णित धर्म से उत्पन्न एक देवता।

प्रश्रयणा
संज्ञा पुं० [ सं० ] सौजन्य। शिष्टाचरण। विनय। नम्रता। दे० 'प्रश्रय'।

प्रश्रयो
वि० [सं० प्रश्रयिन्] १. शिष्ट। सुजन। भलामानुस। २. शांत। नम्र। विनीत।

प्रश्रवण
संज्ञा पुं० [ सं० ] रामायण के अनुसार एक पर्वत।

प्रश्रित
वि० [सं०] विनीत।

प्रश्लथ
वि० [सं०] १. ढीलाढाला। शिथिल। २. शक्तिहीन। क्लांत [को०]।

प्रश्लिष्ट
वि० [सं०] १. मिलाजुला। २.संधिप्राप्त। ३. विचारयुक्त। युक्तियुक्त। संयुक्तिक (को०)।

प्रश्लेष
संज्ञा पुं० [ सं० ] घनिष्ठ संबंध। २. संधि होने में स्वरों का परस्पर मिल जाना।

प्रश्वास
संज्ञा पुं० [ सं० ] १. वह वायु जो नथने से बाहर निकलती है। बाहर आती हुई साँस। २. वायु के नथने से बाहर निकलने की क्रिया।

प्रष्टव्य
वि० [सं०] १. पूछने योग्य। २. पूछने का। जिसे पूछना हो। जैसे, प्रष्टव्य बात।

प्रष्टा
वि० [सं० प्रष्ट्ट] पूछनेवाला। प्रश्नकर्ता।

प्रष्टि (१)
संज्ञा पुं० [ सं० ] १. वह घोडा या बैल जो तीन घोडों के रथ या तीन बैलों की गाडी में आगे जोता जाता है। २. दाहिनी ओर का घोडा या बैल। ३. तिपाई।

प्रष्टि (२)
वि० पास खडा हुआ। पास का। पार्श्वस्थ।

प्रष्ठ (१)
वि० [सं०] १. अग्रगामी। अगुवा। २.आगे की ओर स्थित (को०)। ३. प्रधान। प्रमुख। श्रेष्ठ (को०)। यौ०—प्रष्ठवाह=कृषि कर्म में शिक्षित युवा बैल।

प्रष्ठ (२)
अव्य० [ सं० पृष्ठ ] पीछे। उ०—श्री गुरु मेरे इष्ट प्रष्ठ औरै पहिचानूँ।—नट०, पृ० १०।

प्रष्ठौही
संज्ञा स्त्री० [ सं०] वह गाय जो पहलेपहल गाभिन हुई हो।

प्रसख्या
संज्ञा स्त्री० [ सं० प्रसड्ख्या] १. सब संख्याओं का योग। जोड। कुल। मीजान। टोटल। २. चिंता। मनन।

प्रसंख्यान
संज्ञा पुं० [ सं० प्रसङ्ख्यान ] १. सम्यक् ज्ञान। सत्य ज्ञान। २. आत्मानुसंधान। ध्यान। ३. गणना (को०)। ४. प्रसिद्धि। ख्याति(को०)। ५. प्राप्ति। उफलब्धि। अदा- यगी (को०)।

प्रसंग
संज्ञा पुं० [सं० प्रसङ्ग] १. मेल। संबंध। लगाव। संगति। २. बातों का परस्पर संबंध। विषय का लगाव। अर्थ की संगति। जैसे,—शब्दार्थ पूरा न जानकर भी वे प्रसंग से अर्थ लगा लेते हैं। ३. व्याप्तिरूप संबंध। ४. स्त्री-पुरुष- संयोग। जैसे, स्त्रीप्रसंग। क्रि० प्र०—करना।—होना। ५. अनुरक्ति। लगन । ६. बात। वार्ता। विषय। उ०—(क) अवध सरिस प्रिय मोहिं न सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ।—तुलसी (शब्द०)। (ख) जस मानस जेहि विधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु। अब सोइ कहौं प्रसंग सब सुमिरि उभा वृषकेतु।—तुलसी (शब्द०)। ७. उपयुक्त संयोग। अवसर। मौका। उ०—तब तें सुधि कछु नाहीं पाई। बिनु प्रसँग तहँ गयो न जाई।—सूर (शब्द०) ८. हेतु। कारण। उ०— करिहहिं विप्र होम मख सेवा। तेहि प्रसंग सहजहि बस देवा।—तुलसी (शब्द०)। ९. विषयानुक्रम। प्रस्ताव। प्रकरण। १०. विस्तार। फैलाव। उ०—कर सर धनु, कटि रुचिर निषंग। प्रिया प्रीति प्रेरित वन बीथिन विचरत कपट कनकमृग संग। भुज विशाल, कमनीय कंध उर श्रमसीकर सोहै साँवरे अंग। मनु मुकुतामणि मरकत गिरि पर लसत ललित रवि किरन प्रसंग।—तुलसी (शब्द०)। ११. अनुचित संबंध (को०)। १२. सारांश (को०)। १३. प्राप्ति। उपलब्धि (को०)।

प्रसंगयान
संज्ञा पुं० [सं० प्रसङ्गयान] कामंदकीय नीति के अनुसार किसी स्थान पर चढा़ई करने की बात प्रसिद्ध कर किसी दूसरे स्थान पर चढा़ई कर देना।

प्रसंगप्राप्त
वि० [सं० प्रसङ्ग + प्राप्त] वह जिसकी चर्चा आ गई हो। वह जिसका जिक्र हो रहा हो। प्रासंगिक। उ०— प्रसंगप्राप्त साधारण सभी वस्तुओं का वर्णन कवि का कर्तव्य है।—रस०, पृ० १०३।

प्रसंगविध्वस
संज्ञा पुं० [सं० प्रसङ्गविध्वंस] मानमोचन के छह उपायों में से एक। झूठा भय दिखाकर मानिनी के चित्त में भ्रम उपजाकर उसका मान छुडा़ना। प्रसंगविभ्रंश।

प्रसंगविभ्रंश
संज्ञा पुं० [सं० प्रसङ्गविभ्रंश] मानमोचन के छह उपायों में अंतिम। प्रसंगविध्वंस।

प्रसंगसम
संज्ञा पुं० [सं० प्रसङ्गसम] न्याय में जाति के अंतर्गत एक प्रकार का प्रतिषेध जो प्रतिवादी की ओर से होता है। इसमें प्रतिवादी कहता है कि साधन का भी साधन कहो और इस प्रकार वादी को उलझन में डालना चाहता है। जैसे, वादी ने कहा— प्रतिज्ञा—शब्द अनित्य है। हेतु—क्योंकि वह उत्पन्न होता है। उदाहरण—जैसे घट। इसपर प्रतिवादी कहता है कि यदि घट के उदाहरण से शब्द अनित्य ठहराते हो तो यह भी साबित करो कि घट अनित्य है। फिर जब वादी घट की अनित्यता का हेतु देता है तब प्रतिवादी कहता है कि उस हेतु का भी हेतु दो। इस प्रकार का प्रतिषेध 'प्रसंगसम' कहलाता है।

प्रसंगासन
संज्ञा पुं० [सं० प्रसङ्गासन] कामंदकीय नीति के अनुसार किसी दूसरे पर चढा़ई करने के गुप्त उद्देश्य से प्राप्त शत्रु के साथ संधि करके चुपचाप बैठना।

प्रसंगी
वि० [सं० प्रसङ्गिन्] १. प्रसंगयुक्त। २. अनुरक्त। ३. आकस्मिक (को०)। ४. गौण। अमुख्य (को०)। ६. सहवास करनेवाला (को०)।

प्रसंघ (१)
वि० [सं० प्रसङ्घ] श्रेणीबद्ध।

प्रसंघ (२)
संज्ञा पुं० १. भारी भीड़। बहुत बडा़ समूह [को०]।

प्रसंजन
संज्ञा पुं० [सं० प्रसञ्जन] १. युक्त करना। लगाना। मिलाना। २. काम में लाना। उपयोग में लाना [को०]।

प्रसंघ पु
संज्ञा पुं० [सं० प्र + सन्धि] शरीर के संधिस्थल। शरीर के अवयवों का जोड़। उ०—क्रत जुगल सुंदर चमर करि है शोभा रुचिर प्रसंध है।—रा० रू०, पृ० ३६८।

प्रसंधान
संज्ञा पुं० [सं० प्रसन्धान] संधि। योग।

प्रसंन
वि० [सं० प्रसन्न] दे० 'प्रसन्न'। उ०—छमेहु सकल अपराध अव होइ प्रसंन दर देहु।—मानस १।१०१।

प्रसस पु
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रशसा] दे० 'प्रशंसा'। उ०—अरु जदु धर्मसील कौ बंस। सो पुनि तुम करि भले प्रसंस।—नंद० ग्रं०, पृ० २१८।

प्रसंसक पु
वि० [सं० प्रशंसक] प्रशंसा करनेवाला। स्तुति करनेवाला। उ०—बंस प्रसंसक बिरिद सुनावहि।—मानस, १।३१६।

प्रसंसना पु
क्रि० स० [सं० प्रशंसन] प्रशंसा करना। बडा़ई करना। दे० 'प्रशंसना'। उ०—बहु बिधि उमहिं प्रसंसि पुनि बोले कृपानिधान।—मानस, १।१२०।

प्रसंसा पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रशंसा] दे० 'प्रशंसा'। उ०—दुख सुख सरिस प्रसंसा गारि।—मानस, २।१३०।

प्रस पु †
संज्ञा पुं० [सं० स्पर्श, हिं० परस] दे० 'स्पर्श'। उ०— कूच विहांणे ऊगणे, सोच घणे गढ़ कोट। उरै समंदा देस प्रस, जथा गिरंदा ओट।—रा० रू०, पृ० १५६।

प्रसक्त
वि० [सं०] १. संश्लिष्ट। लगा हुआ। २. जो बराबर लगा रहे। न छोड़नेवाला। सदा का। ३. संबद्ध। आसक्त। ४. प्रस्तावित। ५. स्थायी। नित्य (को०)। ६. प्राप्त। मिला हुआ (को०)। ७. खुला हुआ। व्यक्त। स्फुटित (को०)। ८. दे० 'प्रयुक्त' (को०)।

प्रसक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रसंग। संपर्क। २. अनुमिति। ३. आपत्ति। ४. व्याप्ति। ५. प्राप्ति। उपलाब्ध (को०) ६. अध्यवसाय। प्रयत्न। चेष्टा (को०)।

प्रसज्य
वि० [सं०] १. जो संबद्ध किया जाय। २. संभव। मुमकिन। ३. जिसे प्रयोग में लाया जाय। जो प्रयुक्त किया जाय [को०]।

प्रसज्यप्रतिषेध
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का निषेध जिसमें विधि की अप्रधानता और निषेध की प्रधानती होती है। जैसे, अतिरात्र यज्ञ में षोड़शी नामक सोमरसपूर्ण पात्र को ग्रहण न करे।

प्रसतान पु †
संज्ञा पुं० [सं० प्रस्थान] दे० 'प्रस्थान'। उ०— तम मन जाणियो प्रसतान मृत दसशिर तणों।—रघु रू०, पृ० १२९।

प्रसताव पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रस्ताव] दे० 'प्रस्ताव'। उ०—प्रसताव भाव तिन कहि उचार। जोगिनिय बोल आदीतबार। पहराइ वेस बदलाय भेस। इम कियो राजद्वारह प्रवेस।—पृ० रा०, १।३७३।

प्रसति पु
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रसुति] प्रसृति। प्रसार। फैलाव। उ०—प्रति कूच कूचनि प्रसति, चाहुआंन न करै विषम।— पृ० रा०, १९।१५९।

प्रसत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रसन्नता। २. निर्मलता। शुद्धि।

प्रसत्वरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रतिपत्ति। प्राप्ति।

प्रसत्वा
संज्ञा पुं० [सं० प्रसत्वन्] १. धर्म। २. प्रजापति।

प्रसद्द पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रति + शब्द, प्रशब्द] प्रतिध्वनि। जोर की आवाज। उ०—सुनिब सूर नर हक्क धक्क बज्जी चावदि्दसि। नरन सद्द कानन प्रसद्द (सिंह) किन्नो सु क्रोध ग्रसि।—पृ० रा०, १७।६।

प्रसन पु
वि० [सं० प्रसन्न] दे० 'प्रसन्न'। उ०—(क) प्रसन भयो किधौ सुंदर स्यामा, सदा बसौ वृंदावन धामा।—नंद० ग्रं०, पृ० १६२। (ख) सब कारज सिधि लहै, प्रसन जासों जग बंदन।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ४२७।

प्रसन्न (१)
वि० [सं०] १. संतुष्ट। तुष्ट। २. खुश। हर्षित। प्रफुल्ल ३. अनुकूल। उचित। ४. निर्मल। स्वच्छ। ५. शांत (को०)। ६. कृपालु (को०)। यौ०—प्रसन्नकल्प। प्रसन्नजल = प्रसन्नसलिल। प्रसन्नमुख = प्रसन्नवदन। प्रसन्नवदन। प्रसन्नसलिल।

प्रसन्न (२)
संज्ञा पुं० महादेव।

प्रसन्न † (३)
वि० [फा़० पसंद] मनोनीत। पसंद। उ०—(क) उनके इस कर्म को विद्वान लोग प्रसन्न नहीं करते।—दयानंद (शब्द०)। (ख) मैं इस बात को मानता हूँ पर यह पूछता हूँ कि क्या कोई जो अँगरेजी जानता हो इस बात को प्रसन्न करेगा कि केवल एक लिपि प्रचलित होवे ? कभी नहीं।— सरस्वती (शब्द०)।

प्रसन्नकल्प
वि० [सं०] १. प्रसन्न के तुल्य या समान। शांत तुल्य २. सत्यप्राय [को०]।

प्रसन्नता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. तुष्टि। संतोष। २. प्रफुल्लता। हर्ष। आनंद। ३. अनुग्रह। कृपा। प्रसाद। ४. स्वच्छता। निर्मलता। शुद्धि। ५. सुस्पष्टता। व्यक्तता (को०)।

प्रसन्नवदन
वि० [सं०] जिसका मुख प्रसन्न हो। जिसके चेहरे से प्रसन्नता टपकती हो। उ०—हे सखा, विभीषण बोले आज प्रसन्नवदन।—अपरा, पृ० ४४।

प्रसन्नसलिल
वि० [सं०] जिसका जल निर्मल या स्वच्छ हो [को०]।

प्रसन्नाध
संज्ञा पुं० [सं० प्रसन्नान्ध] घोडे़ का एक रोग जिसमें उसकी आँख देखने में तो ज्यों की त्यों रहती है पर उसे दिखाई नहीं पड़ता। यह असाध्य रोग है और अच्छा नहीं होता।

प्रसन्ना
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह मद्य जो खींचने में पहले उतरता है। वैद्यक में इसे गुल्म वात, अर्श, शूल और कफनाशक माना है। २. प्रसन्न करना (को०)।

प्रसन्नात्मा (१)
वि० [सं० प्रसन्नात्मन्] जो सदा प्रसन्न रहे। प्रसन्नांतःकरण। आनंदी।

प्रसन्नात्मा (२)
संज्ञा पुं० विष्णु।

प्रसन्नित पु †
वि० [सं० प्रसन्न + हिं० इत (प्रत्य०)] आनंदित। हर्षित। खुश। उ०—निशि दिन करेहु नयन लखि काजा। जाते रहै प्रसन्नित राजा।—जायसी (शब्द०)।

प्रसन्नेरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की मदिरा।

प्रसभ (१)
संज्ञा पुं० [सं०] जबर्दस्ती। बलाक्तार [को०]।

प्रसभ (२)
क्रि० वि० १. बलपूर्वक। हठात्। २. अत्याधिक। ३. साग्रह। पुनः पुनः। सनिर्बंध [को०]।

प्रसभदमन
संज्ञा पुं० [सं०] बलपूर्वक दमन करना। बलात् वशवर्ती कर लेना [को०]।

प्रसभहरण
संज्ञा पुं० [सं०] जबर्दस्ती छीन लेना या हर लेना [को०]।

प्रसयन
संज्ञा पुं० [सं०] १. बाँधने की रज्जु। २. जाल। फंद [को०]।

प्रसर
संज्ञा पुं० [सं०] १. आगे बढ़ना। बढ़ना। विस्तार। २. फैलना। फैलाव। प्रसार। ३. दृष्टि का फैलाव। आँख की पहुँच। ४. वेग। तेजी। ५. समूह। राशि। ६. वैद्यक शास्त्रा- नुसार वात पित्तादि प्रकृतियों का संचार या घटाव बढा़व। ७. व्याप्ति। ८. प्रकर्ष। प्रधानता। प्रभाव। ९. युद्ध। १०. नाराच नामक अस्त्र। ११. प्रलय। विनाश (को०)। १२. वीरता। साहस। १३. बाढ़। बढ़िया। १४. एक प्रकार का पौधा जो भूमि के ऊपर फैलता है। १५. अवकाश। अवसर (को०)। १६. एक प्रकार का नृत्य (को०)।

प्रसरण
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० प्रसरणीय, प्रसरित] १. आगे बढ़ना। २. खिसकना। सरकना। फैलना। फैलने की क्रिया या भाव। फैलाव। ४. व्याप्ति। ५. विस्तार। ६. उत्पत्ति। ७. अपने काम में प्रवृत्त होना। ८. स्वभाव की मधुरता (को०)। ९. सेना का लूठपाट के लिये इधर उधर फैलना।

प्रसरणशील
वि० [सं० प्रसरण + शील] [वि० स्त्री० प्रसरण- शीला] जो फैल सके। फैलनेवाला। उ०—जिसकी प्रसरण- शीला प्रतिभा विभूति से विवर्तमान।—संपूर्णानंद अभि० ग्रं०, पृ० ११२।

प्रसरणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रसरण। फैलाव। पसार। २. शत्रु को चारों ओर से घेरना [को०]।

प्रसरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रसारिणी लता। गंधाली। परसन।

प्रसरित
वि० [सं०] १. फैला हुआ। पसरा हुआ। २. विस्तृत। ३. आगे को बढ़ा हुआ। स्थान से आगे को खसका हुआ।

प्रसर्ग
संज्ञा पुं० [सं०] १. निक्षेपण। किसी चीच को ऊपर से छोड़ना। गिराना। २. वर्षण। बरसाना।

प्रसर्जन
संज्ञा पुं० [सं०] १. निक्षेप। गिराना। डालना। २. वर्षण। बरसाना।

प्रसर्प
संज्ञा पुं० [सं०] १. गमन। २. यज्ञार्थ 'सदस' में जाना (को०)। ३. एक प्रकार का सामगान।

प्रसर्पक
संज्ञा पुं० [सं०] १. सहकारी ऋत्विज्। २. वह दर्शक जो यज्ञ में बिना बुलाए आया हो।

प्रसर्पण
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रसरण। गमन। जाना। २. खिसकना। ३. घुसना। पैठना। ४. सेना का चारों ओर फैलना। ५. शरण का स्थान। रक्षास्थान। ६. गति। चलने का भाव या कार्य। ७. यज्ञार्थ 'सदस' में जाना। (को०)।

प्रसर्पणी
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रसरणी'—२ [को०]।

प्रसर्पी
वि० [सं० प्रसर्पिन्] १. रेंगनेवाला। २. गतिशील। ३. यज्ञ की सभा में जानेवाला।

प्रसल
संज्ञा पुं० [सं०] हेमंत ऋतु।

प्रसवती
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रसवन्ती] वह स्त्री जिसे प्रसववेदना हो। प्रसवपीड़ाग्रस्त स्त्री [को०]।

प्रसव
संज्ञा पुं० [सं०] १. बच्चा जनने की क्रिया। जनन। प्रसूति। २. जन्म। उत्पत्ति। ३. अपत्य। बच्चा। संतान। ४. फल। ५. फूल। ६. वृद्धि। बढ़ती। ७. निकास। ८. आदेश। आज्ञा (को०)। यौ०—प्रसवकाल। प्रसवगृह = प्रसूतिगृह। सौरी। प्रसवधमी। प्रसवपीडा = प्रसव की व्यथा। प्रसवबंधन। प्रसववेदना। प्रसवव्यथा = प्रसव के समय स्त्री को होनेवाली पीर वा पीड़ा। प्रसवस्थली। प्रसवस्थान।

प्रसवक
संज्ञा पुं० [सं०] पियार का वृक्ष। चिरौंजी का पेड़।

प्रसवकाल
संज्ञा पुं० [सं०] उत्पत्ति का समय। जनन का अवसर।

प्रसवधर्मी
वि० [सं० प्रसवधर्मिन्] १. प्रसव करनेवाला। पैदा करनेवाला। २. उपजाऊ। फलप्रद [को०]।

प्रसवन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० प्रसवनीय] बच्चा जनना। बच्चा पैदा करना।

प्रसवना पु (१)
क्रि० अ० [सं० प्रसवन] पैदा होना। उत्पन्न होना।

प्रसवना पु (२)
क्रि० स० उत्पन्न करना। पैदा करना।

प्रसवबंधन
संज्ञा पुं० [सं० प्रसवबन्धन] वह पतला सींका जिसके सिरे पर पत्ता या फूल लगता है। नाल।

प्रसवस्थली
संज्ञा स्त्री० [सं०] माँ [को०]।

प्रसवस्थान
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह स्थान जहाँ प्रसव कराया जाता है। प्रसूतिगृह। २. घोंसला। नीड [को०]।

प्रसविता (१)
वि० [सं० प्रसवितृ] [वि० स्त्री० पसवित्री] जन्म देनेवाला उत्पादक। उत्पन्न करनेवाला।

प्रसविता (२)
संज्ञा पुं० पिता। जनक। बाप।

प्रसवित्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] माता [को०]।

प्रसविनी
वि० स्त्री० [सं०] उत्पन्न करनेवाली। जननेवाली। उ०—वीर कन्यका, वीर प्रसविनी, वीरबधू जग जानी। हरिश्चंद्र (शब्द०)।

प्रसवी
वि० [सं० प्रसविन्] [वि० स्त्री० प्रसविनी] १. प्रसवशील। २. उत्पादक। प्रसव करनेवाला। जन्म देनेवाला। उत्पन्न करनेवाला।

प्रसव्य (१)
संज्ञा पुं० [सं०] बाई ओर से परिक्रमा करना। प्रदक्षिण का उलटा।

प्रसव्य (२)
वि० १. प्रतिकूल। २. वामवर्ती। बायाँ। बाम भाग में स्थित (को०)। ३. प्रसवनीय। ४. अनुकूल (को०)।

प्रसह्
संज्ञा [सं०] दे० 'प्रसाह्' [को०]।

प्रसह
संज्ञा पुं० [सं०] १. पक्षियों का एक भेद। वे पक्षी जो झपाटा मारकर अपना भक्ष्य या शिकार पकड़ते है। शिकारी चिड़िया। जैसे, कौआ, गीध, बाज, उल्लू, चील, नीलकंठ इत्यादि। विशेष—वैद्यक में इन पक्षियों का मांस उष्णवीर्य बताया गया है और कहा गया है कि जो इसका मांस खाते हैं उन्हें शोष, भस्मक और शुक्रक्षय रोग हो जाता है। २. अमलतास का पेड़। ३. विरोध। प्रतिरोध [को०]।

प्रसहन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. हिंसक पशु। २. आलिंगन। ३. सहन। क्षमा। सहनशीलता। ४. पराभव करना। पराभूत करना (को०)। ५. प्रतिरोध। अवरोध (को०)।

प्रसहन (२)
वि० सहनशील।

प्रसहा
संज्ञा स्त्री० [सं०] कटाई। बृहती।

प्रसह्य
क्रि० वि० [सं०] हठात्। बलपूर्वक [को०]।

प्रसह्यचौर
संज्ञा पुं० [सं०] जबरदस्ती माल छीननेवाला।

प्रसह्यहरण
संज्ञा पुं० [सं०] जबरदस्ती हर ले जाना। जैसे क्षत्रिय कन्याओं का हरण करते थे।

प्रसातिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] अणुव्रीहि। सावाँ।

प्रसाद (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रसन्नता। २. अनुग्रह। कृपा। मिहर- बानी। ३. निर्मलता। स्वच्छता। सफाई। ४. स्वास्थ्य। ५. वह वस्तु जो देवता को चढ़ाई जाय। ६. वह पदार्थ जिसे देवता या बड़े लोग प्रसन्न होकर अपने भक्तों या सेवकों को दें। देवता या बड़े की देन। जैसे,—यह सब आप ही का प्रसाद है। उ०—यह मैं तोही मैं लखी भक्ति अपूरब बाल। लहि प्रसाद माला जु भी तन कदंब की माल।—बिहारी (शब्द०)। ७. देवता, गुरुजन आदि को देने पर बची हुई वस्तु जो काम में लाई जाय। ८. भोजन। (भक्त और साधु)। मुहा०—प्रसाद पाना = खाना। भोजन करना। उ०—तृण शय्या औ अल्प रसोई पाओ स्वल्प प्रसाद। पैर पसार चलो निद्रा लो मेरा आशीर्वाद—श्रीधर (शब्द०)। ९. काव्य का एक गुण। जिसकी भाषा स्वच्छ और साधु हो, जिसमें समस्त पद काम हों, और जटिल ग्रामीण शब्दन आए हों और सुनने के साथ ही जिसका भाव श्रोता की समझ में आ जाय। १०. शब्दालंकार के अंतर्गत एक वृत्ति। कोमला वृत्ति। ११. धर्म की पत्नी मूर्ति से उत्पन्न एक पुत्र। यौ०—प्रसादपट्ट = सम्मानार्थ राजा द्वारा प्रदत्त शिरोवस्त्र। प्रसादपट्टक = राजा की कृपा को द्योतित करनेवाला शासन- पत्र। प्रसादपराङमुख। प्रसादपात्र = अनुग्रह का पात्र। कृपापात्र। प्रसादस्थ।

प्रसाद पु (२)
संज्ञा पुं० [हिं० प्रसाद] दे० 'प्रसाद'। उ०—ग्रह प्रसाद (तोरन) ऊतंग छत्र जंत्रह सकटावै।—पृ० रा०, ७।१७१।

प्रसादक (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० प्रसादिका] १. अनुग्रहकारक। २. निर्मल। ३. प्रसन्न करनेवाला। ४. प्रीतिकर।

प्रसादक (२)
संज्ञा पुं० १. प्रसाद। २. देवधन। ३. बथुए का साग। ४. कौटिल्य के अनुसार देश या धन आदि का अधार्मिक के हाथ से निकलकर किसी धार्मिक के पास जाना। धार्मिक पुरुष का लाभ जिससे जनता को प्रसन्नता होती है।

प्रसादन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रसन्न करना। २. निर्मल करना। स्वच्छ करना (को०)। ३. राजकीय शिविर। राजा का खेमा (को०)। ४. अन्न।

प्रसादन (२)
वि० प्रसन्न करनेवाला। प्रसन्नता देनेवाला। स्वच्छ, निर्मल या शुद्ध करनेवाला।

प्रसादना (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सेवा। परिचर्या। २. स्वच्छ, निर्मल या प्रसन्न करना (को०)।

प्रसादना पु (२)
क्रि० स० [सं० प्रसादन] प्रसन्न करना। उ०— बहु भाँति बगारे जो या ब्रज में अति आनन ओप अनूप कला। द्विजदेव जू चंद्रिका की छबि जाकी प्रसादि रही सिगरी अचला। निरख्यो जब तें इन नैनचकोरन बीतत ज्यों जुग एक पला। चहुँघा, सखि, चाँदनी चौक में डोलत चंद अमंद सों नंदलला।—द्विजदेव (शब्द०)।

प्रसादनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'प्रसादना' (१)।

प्रसादनीय पु
वि० [सं०] प्रसन्न करने योग्य।

प्रसादपराङमुख
वि० [सं०] १. जो किसी का कृपा की परवाह न करे। २. जो किसी का पक्ष लेने से विमुख हो गया हो (को०)।

प्रसादपात्र
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो कृपा पाता हो। कृपापात्र।

प्रसादस्थ
वि० [सं०] १. अनुकूल। कृपालु। दयालु। २. प्रसन्न। हृष्ट (को०)।

प्रसादांत
वि० [सं० प्रसाद + अन्त, तुल अं० कामेडी] जिसका अंत हर्षकारी हो। हास्यप्रधान। प्रहसनात्मक। उ०—हमनेनाटक के तीन वर्ग किए हैं दुःखात, सुखांत और प्रसादांत।— हिं० ना०, पृ० २१।

प्रसादिनी
वि० [सं० प्रसाद + हिं० इनि (प्रत्य०)] प्रसन्न करनेवाली। अनुग्रह करनेवाली। उ०—विचर रही निर्मम अबाध तुम विश्वाविषादिनि, लोकप्रसादिनि।—रजत०, पृ० ७९।

प्रसादी (१)
वि० [सं० प्रसादिन्] १. प्रसन्न करनेवाला। २. प्रीति करनेवाला। प्रीतिकर। ३. शांत। ४. अनुग्रह करनेवाला। कृपा करनेवाला। ५. निर्मल। स्वच्छ।

प्रसादो (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० प्रसाद + ई] १. देवाताओं को चढ़ाया हुआ पदार्थ। २. नैवेद्य। ३. वह पदार्थ जो पूज्य और बड़े लोग छोटों को दें। बड़ों की देन। उ०—तब श्री गुसाई जी अपने प्रसादी उपरेना उढ़ायो।-दो सौ बावन०, भा० २, पृ० १११। ४. देवता को बलि चढ़ाए हुए पशु का मांस।

प्रसाधक (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० प्रसाधिका] १. भूषक। अलंकृत करनेवाला। २. संपादक। निर्वाह करनेवाला। संपादन करनेवाला। ३. राजाओं को वस्त्र आभूषणादि पहनानेवाला।

प्रसाधक (२)
संज्ञा पुं० वह सेवक जो राजा या स्वामी को वस्त्रा- भूषणादि पहनाने के कार्य पर नियुक्त हो [को०]।

प्रसाधन
संज्ञा पुं० [सं०] १. वेष। २. अलंकार। शृंगार। ३. कंघी। ४. संपादन। ५. महाबला लता।

प्रसाधनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] कंधी। दंतपत्रिका।

प्रसाधिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. निवार धान। २. प्रसाधन करनेवाली स्त्री (को०)।

प्रसाधित
वि० [सं०] १. सँवारा हुआ। सजाया हुआ। २. सुसं- पादित। ३. सिद्ध। प्रमाणित (को०)।

प्रसार
संज्ञा पुं० [सं०] १. विस्तार। फैलाव। पसार। २. संचार। ३. गगन। ४. निर्गम। निकास। ५. इधर उधर जाना। फिरना। ६. कौटिल्य अर्थशास्त्रानुसार युद्ध के समय वह सहायता जो जंगल आदि पड़ने से प्राप्त हो जाय। ७. खोलना। जैसे, मुख प्रसार (को०)। ८. फेंकना। उत्क्षेपण। जैसे, धूलि प्रसार (को०)। ९. क्रय विक्रय की दूकान। व्यापारी की दूकान। बनिए की दूकान (को०)।

प्रसारक
वि० [सं०] फैलानेवाला। विस्तृत करनेवाला।

प्रसारण
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० प्रसारित, प्रसार्य्य] १. फैलाना। पसारना। विस्तृत करना। विशेष—वैशेषिक में जो पाँच प्रकार के कर्म कहे गए हैं उनमें एक कर्म यह भी है। २. बढ़ाना ३. शत्रु को चारों ओऱ से घेरना (को०)। ४. खोलना। प्रदर्शित करना (को०)। ५. संप्रसारण। व्याकरण में य् व् र् ल् का इ उ ऋ एवं लृ में बदलना (को०)।

प्रसारणो
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. गंधप्रासरिणी नाम की लता। २. दे० 'प्रसारिणी'—५ [को०]।

प्रसारिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. गंधप्रसारिणी लता। २. लजालू। लाजवंती। ३. (संगीत में) मध्यम स्वर की चार श्रुतियों में दूसरी श्रुति। ४. देवधान्य। ५. शत्रु को चारों ओर से घेरना [को०]।

प्रसारित
वि० [सं०] १. फैलाया हुआ। पसारा हुआ। २. बेंचने के लिये प्रदर्शित या रखा हुआ (को०)।

प्रसारी
वि० [सं० प्रसारिन्] [वि० स्त्री० प्रसारिणी] १. फैलनेवाला। २. फैलानेवाला (को०)।

प्रसा्र्य, प्रसार्य्य
वि० [सं०] फैलाने योग्य। प्रसारणीय।

प्रसाह्
संज्ञा पुं० [सं०] १. शौर्य। शक्ति। २. इंद्र का एक नाम [को०]।

प्रसाह
संज्ञा पुं० [सं०] १. आत्मशासन। २. वश में करना [को०]।

प्रसित (१)
संज्ञा पुं० [सं०] पीब। मवाद।

प्रर्सित (२)
वि० १. बँधा हुआ। आबद्ध। २. लगा हुआ। आसक्त। ३. अतीव स्पष्ट। अत्यंत साफ [को०]।

प्रसिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. रस्सी। २. रश्मि। ३. ज्वाला। लपट। ४. जाल (को०)। ५. आक्रमण। हमला (को०)। ६. पहुँच। सीमा (को०)। ७. श्रेणी। क्रम। सिलसिला (को०)। ८. शक्ति। प्रभाव। ९. पथ। मार्ग (को०)। १०. उत्क्षेपण। फेंकना [को०]।

प्रसिद्ध
वि० [सं०] १. भूषित। अलंकृत। २. ख्यात। विख्यात। मशहूर।

प्रसिद्धक
संज्ञा पुं० [सं०] एक वेदेहवंशी राजा जो मऊ का पुत्र था।

प्रसिद्धता
संज्ञा स्त्री० [सं०] ख्याति।

प्रसिद्धि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. ख्याति। २. भूषा। बनाव सिंगार। ३. सफलना। सिद्धि (को०)।

प्रसिध पु
वि० [सं० प्रसिद्ध] दे० 'प्रसिद्ध'। उ०—दिष्षेसु नयन पुहकरि प्रसिध कियो पाय इन ध्रूव करि।—पृ० रा० १।५८२।

प्रसीदिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] छोटा उपवन। छोटी वाटिका [को०]।

प्रसुत (१)
वि० [सं०] दबाकर निचोड़ा हुआ।

प्रसुत (२)
संज्ञा पुं० एक संख्या का नाम।

प्रसुप्त (१)
वि० [सं०] १. सोया हुआ। निद्रित। २. खूब सोया हुआ। ३. अक्रिय। निष्क्रिय (को०)। ४. जिसमें संज्ञा न हो। संज्ञा- हीन (को०)। ५. मुँदा हुआ। सपुटित (पुष्प आदि)।

प्रसुप्त (२)
संज्ञा पुं० [सं०] योग में अस्मिता, राग, द्वेष और अभि- निवेश इन चारों क्लेशों का एक भेद या अवस्था जिसमें किसी क्लेश की चित्त में सूक्ष्म रूप से अवस्थिति तो रहती हैं, पर उसमें कोई कार्य करने की शक्ति नहीं रहती।

प्रसुप्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. गाढ़ी नींद। नींद। उ०—इस प्रसुप्ति से जगा रही जो बता, प्रिया सी है वह कौन ?—अपरा, पृ० ११०। २. संज्ञाहीनता। संवेदनहीनता [को०]। ३. निष्क्रिय। निश्चेष्टता (को०)।

प्रसू (१)
वि० स्त्री० [सं०] जननेवाली। उत्पन्न करनेवाली। जैसे, वीर- प्रस = वीर (पुत्र) पैदा करनेवाली।

प्रसू (२)
संज्ञा स्त्री० १. माता। जननी। २. घोड़ी। ३. लता। वल्ली (को०)। ४. नरम घास। अंकुर। ५. कुश। ६. केला।

प्रसूका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अश्वगंधा। असगंध। २. घोड़ी (को०)।

प्रसूत (१)
वि० [सं०] [स्त्री० प्रसूता] १. उत्पन्न। संजात। पैदा। २. प्रसव किया हुआ। पैदा किया हुआ (को०)। ३. उत्पादक।

प्रसूत (२)
संज्ञा पुं० १. कुसुम। फूल। २. चाक्षुष मन्वंतर के देबगण का नाम। ३. एक रोग का नाम जो स्त्रियों को प्रसव के पीछे होता है। इसमें प्रसूता को ज्वर होता है और दस्त आते हैं।

प्रसूत † (३)
संज्ञा पुं० [सं० प्रस्वेद] एक रोग का नाम जिसमें रोगी के हाथ और पैर से पसीना छूटा करता है।

प्रसूता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बच्चा जननेवाली स्त्री। वह जिसने बच्चा जना हो। जच्चा। २. घोड़ी।

प्रसूति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रसव। जनन। २. उद्भव। उ०— तुलसी सूधो सकल विधि रघुबर प्रेम प्रसूति।—तुलसी ग्रं०, पृ० ९७। ३. कारण। प्रकृति। ४. उत्पत्तिस्थान। ५. संतति। अपत्य। ६. जिस स्त्री ने प्रसव किया हो। प्रसूता। ७. दक्ष प्रजापति की स्त्री का नाम जिनसे सती का जन्म हुआ था। यौ०—प्रसूतिगृह। प्रसूतिज। प्रसूतिज्वर। प्रसूतिवायु।

प्रसूतिका (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्त्री जिस को बच्चा हुआ हो। प्रसूता।

प्रसूतिका (२)
संज्ञा पुं० [सं०] दुःख।

प्रसूतिगृह
संज्ञा पुं० [सं०] वह स्थान जहाँ बच्चे का जन्म हो। सौरी।

प्रसूतिज
संज्ञा पुं० [सं०] प्रसव से उत्पन्न होनेवाली पीड़ा। प्रसववेदना [को०]।

प्रसूतिज्वर
संज्ञा पुं० [सं०] वह ज्वर जो प्रसव के बाद स्त्री को आने लगता है। दे० 'प्रसूत' (२)—३।

प्रसूतिवायु
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह वायु जो प्रसववेदना के समय गर्भ में उत्पन्न होती है [को०]।

प्रसून (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुष्प। फूल। उ०—बाल गुलाब प्रसून कों अब न चलावै फेरि। परी लाल के गात मैं खरी खरोटै हेरि।—स० सप्तक, पृ० २४०। यौ०—प्रसूनवाण, प्रसूनशर = कामदेव। प्रसूनरसंभवा = फूलों की शर्करा। चीनी जो पुष्प से बनाई गई हो। २. फल।

प्रसून (२)
वि० उत्पन्न। जात। पैदा।

प्रसूनक
संज्ञा पुं० [सं०] १. फूल। मुकुल। २. कली। ३. एक प्रकार का कदंब (को०)।

प्रसूनांजलि
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रसूनाञ्जलि] दे० 'पुष्पांजलि'।

प्रसूनेषु
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव [को०]।

प्रसृत (१)
वि० [सं०] १. फैला हुआ। २. प्रवृद्ध। बढ़ा हुआ। ३. विनीत। ४. भेजा हुआ। गया हुआ। प्रेरित। ५. लगा हुआ। लीन। तत्पर। नियुक्त। ६. प्रचलित। ६. इंद्रियलोलुप। लंपट। ८. तीव्र। तेज (को०)। ९. पका हुआ। पक्व (को०)। १०. प्रदर्शित। व्यक्त किया हुआ (को०)। ११. उपयुक्त अर्थ जाननेवाला। सूक्ष्मार्थगामी (को०)। १२. लंबा [को०]।

प्रसृत (२)
संज्ञा पुं० १. गहरी की हुई हथेली। अर्धाजलि। २. हथेली भर का मान। पसर। दो पल का मान।

प्रसृतज
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत के अनुसार एक प्रकार का पुत्र जो व्यभिचार से उत्पन्न हो। जैसे, कुड और गोलक।

प्रसृता
संज्ञा स्त्री० [सं०] जाँघ [को०]।

प्रसृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. फैलाव। विस्तार। २. संतति। संतान। ३. अर्धांजलि। गहरी की हुई हथेली। ४. सोलह तोले के बराबर का एक मान। पसर। ५. आगे बढ़ना। अग्रगामिता (को०)।

प्रसृत्वर
वि० [सं०] चारों ओर फैलनेवाला या फैला हुआ [को०]।

प्रसृष्ट
वि० [सं०] १. उत्पन्न। २. त्यक्त। परित्यक्त। ३. निर्बंध। स्वच्छ। प्रतिबंधहीन (को०)।

प्रसृष्टा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. युद्ध का एक दाँव। २. अंगुलियाँ जो फैलाई गई हों। फैलाई हुई उँगलियाँ (को०)।

प्रसेक
संज्ञा पुं० [सं०] १. सेचन। सींचना। २. निचोड़। निसोथ। ३. छिड़काव। ४. द्रव पदार्थ का वह अंश जो रस रसकर निचुड़े़ या टपके। पसेव। ५. एक असाध्य रोग। पेशाब के साथ मनी आने का रोग। जिरियान। (सुश्रुत)। चरक के अनुसार मुँह से पानी छूटना और नाक से श्लेष्मा गिरना। ७. वमन। कै (को०)। ८. स्रुवा या चमचा का अग्रभाग वा कटोरी (को०)।

प्रसेकी
संज्ञा पुं० [सं० प्रसेकिन्] सुश्रुत के अनुसार एक रोग का व्रण जिसमें से पीप निकलता रहे [को०]।

प्रसेद पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रस्वेद] पसीना। उ०—(क) हरि हित मेरो कन्हैया। देहरी चढ़त परत गिरि गिरि करपल्लव जो गहत है री मैया। भक्ति हेतु यशुदा के आए चरण धरणि पर धरैया। जिनहि चरण छलिबो बलि राजा नखप्रसेद गंगा जो बहैया।—सूर (शब्द०)। (ख) देखत तेरे लेत है तन प्रसेद सो बोर। या में तेरी खोर कहु या कछु मेरी खोर ?— रसनिधि (शब्द०)।

प्रसेदिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] छोटी वाटिका। प्रसीदिका [को०]।

प्रसेन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रसेनजित'।

प्रसेनजित
संज्ञा पुं० [सं०] भागवत् के अनुसार सत्यभामा के पिता सत्राजित् के एक भाई का नाम। विशेष—प्रसेनजित के पास एक मणि 'स्यमतक' नाम की थी (विशेष देखिए स्यमंतक शब्द)। जिसे पहनकर वह एक दिन शिकार खेलने गया। वहाँ एक सिंह उसे मार मणि लेकर चला। मार्ग में जांबवान् ने सिंह को मार मणि छीन ली। सत्राजित् ने प्रसेनजित् के न आने पर कृष्णचंद्र पर यह अपवाद लगाया कि उन्होंने प्रसेन को मणि के लोभ से मारडाला। कृष्णचंद्र इस अपवाद को मिटाने के लिये जंगल में गए। उन्होंने मार्ग में प्रसेन और उसके घोड़े को मरा पाया। आगे चलने पर सिंह भी मरा हुआ मिला। ढूँढ़ते हुए वे आगे बढ़े और एक गुफा में उन्हें जांबवान् मिला। उसने अपनी कन्या जांबवती को मणि के साथ कृष्णचंद्र को अर्पित किया। कृष्णचंद्र मणि और जांबवती को लेकर आए और उन्होंने सत्राजित को मणि देकर अपना कलंक मिटाया।

प्रसेव
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रसेवक'।

प्रसेवक
संज्ञा पुं० [सं०] १. बीन की तूँबी। २. सूत की थैली। थैला। ३. थैली बनानेवाला पुरुष। ४. चमड़े का थैला या कुप्पी (को०)।

प्रस्कंदन
संज्ञा पुं० [सं० प्रस्कन्दन] १. झपट। फलाँग। २. वह जगह जहाँ से फलाँग ली जाय (को०)। ३. शिव। महादेव। ४. विरेचन। जुलाब। ५. अतीसार।

प्रस्कंदिका
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रस्कन्दिका] १. अतीसार। २. विरे- चन। जुलाब [को०]।

प्रस्कण्व
संज्ञा पुं० [सं०] वैदिक संध्योपासना में प्रयुक्त सूर्योपस्थान मंत्र के एक ऋषि का नाम।

प्रस्कन्न (१)
वि० [सं०] १. पतित। समाज का नियम भंग करनेवाला। २. गिरा हुआ। ३. कूदा हुआ (को०)। ४. पराभूत। पराजित। हारा हुआ (को०)।

प्रस्कन्न (२)
संज्ञा पुं० १. घोड़े के एक रोग का नाम। विशेष—इस रोग से घोड़े की छाती भारी हो जाती, शरीर स्तब्ध हो जाता है और वह चलते समय कुबड़े की तरह हाथ पैर बटौरकर चलता है। २. जातिच्युति व्यक्ति (को०)। ३. वह जो पाप करता हो। पापी आदमी (को०)।

प्रस्कुंद
संज्ञा पुं० [सं० प्रस्कुन्द] १. सहायता। सहारा। अवलंब। २. गोल आकृति की वेदी [को०]।

प्रस्खलन
संज्ञा पुं० [सं०] स्खलन। पतन।

प्रस्तर
संज्ञा पुं० [सं०] १. पत्थर। २. डाभ या कुश का पूला। ३. पत्ते आदि का बिछावन। ४. बिछावन। ५. चौड़ी सतह। सम तल। ६. चमड़े की थैली। ७. मणि। रत्न (को०)। ८. प्रस्तार। ९. एक ताल का नाम। १०. ग्रंथ आदि का परिच्छेद (को०)।

प्रस्तरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. बिछाना। फैलाना। २. बिछावन। बिछौना। ३. आसन। पीठ (को०)।

प्रस्तरणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आसन। पीठिका। २. शय्या [को०]।

प्रस्तरभेद
संज्ञा पुं० [सं०] पखान भेद।

प्रस्तरयुग
संज्ञा पुं० [सं० प्रस्तर + युग] ऐतिहासिक क्रम में वह समय जब मानव ने पत्थरों के औजार तथा अन्य सामान बनाकर उनका उपयोग करना सीखा था। उ०—उन युग- स्थितियों का आज द्दश्यपट परिवर्तित। प्रस्तरयुग की सभ्यता हो रही अब अवसित।—ग्राम्या, पृ० ९०।

प्रस्तरिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. श्वेत दूर्वा। २. गोजिह्वा।

प्रस्तरोपल
संज्ञा पुं० [सं०] चंद्रक्रांत मणि।

प्रस्तव
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्तुति या प्रार्थनापरक गीत। ३. अनुकूल अवसर [को०]।

प्रस्तवन
संज्ञा पुं० [सं० प्रस्ताव] प्रस्तुतीकरण। उपस्थित करने का भाव।

प्रस्तार
संज्ञा पुं० [सं०] १. फैलाव। विस्तार। २. आधिक्य। वृद्धि। ३. घास या पत्तियों का बिछौना। ४. परत। पटल। तह। ५. सीढ़ी। ६. समतल। चौड़ी सतह। ७. घास का जंगल। ८. छंदशास्त्र के अनुसार नौ प्रत्ययों में पहला जिससे छंदों के भेद की संख्या और रूपों का ज्ञान होता है। यह दो प्रकार का होता है, वर्णप्रस्तार और मात्राप्रस्तार। ९. शय्या। बिछावन (को०)। १०. फैलाना। आवृत करना। ढकना (को०)।

प्रतारपक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रस्तारपङि्क्त] एक वैदिक छंद जो पंक्ति छंद का एक भेद है। इसके पहले और दूसरे चरणों में बारह अक्षर और चौथे में आठ अक्षर होते हैं।

प्रस्तारी (१)
वि० [सं० प्रस्तारिन्] फैलानेवाला। प्रस्तारकर्ता [को०]।

प्रस्तारी (२)
संज्ञा पुं० नेत्र का एक रोग [को०]।

प्रस्तार्यम
संज्ञा पुं० [सं० प्रस्तार्यमन्] आँख का एक रोग जिसमें आँख के डेले पर चारों ओर लाल या काले रंग का मांस बढ़ आता है। वैद्यक में इसकी उत्पत्ति सन्निपात के प्रकोप से मानी गई है।

प्रस्ताव
संज्ञा पुं० [सं०] १. अवसर। २. प्रसंग। छिड़ी हुई बात। ३. प्रकरण। विषय। ४. अवसर पर कही हुई बात। जिक्र। चर्चा। उ०—जीवन नाटक का अंत कठिन है मेरा, प्रस्ताव मात्रा में जहाँ अधैर्य अँधेरा।—साकेत, पृ० २३५। ५. सभा या समाज में उठाई हुई बात। सभा के सामने उपस्थित मंतव्य (आधुनिक)। क्रि० प्र०—करना।—पास करना।—होना।—पारित करना।—पारित होना। ६. प्रकृष्ट स्तवन (को०)। ७. कथा या विषय के पूर्व का वक्तव्य प्राक्कथन। भूमिका। विषयपरिचय। ८. सामवेद का एक अंश जो प्रस्तोता नामक ऋत्विक् द्वारा प्रथम गाया जाता है।

प्रस्तावक
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो किसी विषय को किसी सभा में संमति या स्वीकृति के लिये उपस्थित करे। प्रस्ताव उपस्थित करनेवाला। जैसे,—प्रस्तावक ने ही अपना प्रस्ताव उठा लिया।

प्रस्तावन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० प्रस्तावित] १. प्रस्ताव करने की क्रिया। २. प्रस्ताव करने का भाव।

प्रस्तावना
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आरंभ। २. किसी विषय या कथा को आरंभ करने के पूर्व का वक्तव्य। प्राक्कथन। भूमिका। उपोदघात। जैसे, पुस्तक की प्रस्तावना। ३. नाटक में आख्यान या वस्तु के अभिनय के पूर्व विषय का परिचय देने, इतिवृत्त सूचित करने आदि के लिये उठाया हुआ प्रसंग।विशेष—सूत्रधार, नट, नटी, विदूषक, परिपार्श्विक के परस्पर कथोपकथन के रूप में प्रस्तावना होती है, जिसमें कभी कभी कवि का परिचय, सभा की प्रशंसा आदि भी रहती है। भरत मुनि के अनुसार प्रस्तावना पाँच प्रकार की कही गई है—उदघातक, कथोदघात, प्रयोगातिशय, प्रवर्तक और अवगलित।

प्रस्तावित
वि० [सं०] १. जिसके लिये प्रस्ताव हुआ हो। जिसके लिये प्रस्ताव किया गया हो। २. आरंभ किया हुआ। जो शुरू किया गया हो। आरब्ध (को०)। ३. वर्णित। उक्त। जो कहा गया हो। कथित (को०)।

प्रस्ताव्य
वि० [सं०] प्रस्ताव करने योग्य।

प्रस्तिर
संज्ञा पुं० [सं०] तृण या पंत्ते की शय्या। घास पत्तो आदि का बिछावन।

प्रस्तीत, प्रस्तीम
वि० [सं०] १. ध्वनि या आवाज करता हुआ। ध्वनित। २. एकत्रित। संहत [को०]।

प्रस्तुत (१)
वि० [सं०] १. जिसकी स्तुति या प्रशंसा की गई हो। २. जो कहा गया हो। उक्त। कथित। ३. जिसकी चर्चा छेड़ी गई हो। जिसकी बात उठाई गई हो। प्रसंगप्राप्त। प्रासंगिक। उ०—पर मै उन्हें प्रस्तुत विषय मानता हूँ; जिनपर अप्रस्तुत विषयों का उत्प्रेक्षा आदि द्वारा आरोप हो सकता है।— रस० पृ० ११२। ४. प्रतिपन्न। प्राप्त। उपस्थित। सामने आया हुआ। जो सामने हो। ५. उद्यत। तैयार। ६. निष्पन्न। जो किया गया हो। संपादित। ७. उपयुक्त।

प्रस्तुत (१)
संज्ञा पुं० १. विचाराधीन प्रसंग। वह विषय जो विचारा- धीन हो। २. उपमेय [को०]।

प्रस्तुतांकुर
संज्ञा पुं० [सं० प्रस्तुताङ्कुर] एक काव्यालंकार। प्रस्तुता- लंकार।

प्रस्तुतालंकार
संज्ञा पुं० [सं० प्रस्तुतालङ्कार] एक अलंकार जिसमें एक प्रस्तुत के संबंध में कोई बात कहकर उसका अभिप्राय दूसरे प्रस्तुत के प्रति घटाया जाता है। जैसे, 'क्यों अलि ! मालित छाँड़ि गयो कटीली केतकी' में प्रस्तुत भौंरे को सामने रखकर प्रस्तुत नायक के प्रति उपालंभ किया गया है।

प्रस्तुति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रशंसा। स्मृति उ०—प्रस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू। प्रगटेउ विषमवान झषकेतू।—मानस, १।८३। २. प्रस्तावना। ३. उपस्थिति। ४. निष्पत्ति। तैयारी।

प्रस्तुतोकरण
संज्ञा पुं० [सं० प्रस्तुत + करण] प्रस्तुत करने का भाव उपस्थित करना। उ०—पौराणिक कथाओं का प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण और मनुजता की अलौकिकता के ऊपर स्थापना आदि अनेक तत्व हिंदी कवियों के नवीन प्रयोगों के परिचायक है।—हिं० का० प्र०, पृ० १०८।

प्रस्तोक
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का सामगान। २. संजय के पुत्र का नाम।

प्रस्तोता
संज्ञा पुं० [सं० प्रस्तोतृ] १. एक सामवेदी ऋत्विक् जो यज्ञों में पहले सामगान का प्रारंभ करता है। २. वह जो स्तवन करे। प्रस्तवन करनेवावा व्यक्ति। ३. प्रस्ताव करनेवाला। प्रस्तुत करनेवाला। रजिस्ट्रार। जैसे, संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रस्तोता।

प्रस्तोभ
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का साम।

प्रस्थंपच
वि० [सं० प्रस्थम्पच] माप या तौल में एक प्रस्थ पकानेवाला [को०]।

प्रस्थ (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. पहाड़ के ऊपर की चौरस भूमि। अधि- त्यका। टेबुललैंड। २. वह मैदान जो बराबर या समतल हो। ३. प्राचीन काल का एक मान। विशेष—यह दो प्रकार का होता था, एक तौलने का, दूसरा मापने का। इसके मान में मतभेद है, कोई चार कुडव का प्रस्थ मानते हैं कोई दो शराब का। बहुतों के मत से एक आढ़क का चतुर्थांश प्रस्थ होता है। वमन, विरेचन और शोणितमोक्षण में साढ़े तेरह पल का प्रस्थ माना जाता है। कुछ लोग इसे छह पल का और कुछ लोग द्रोण का षोडशांश मानते हैं। ४. पहाड़ों का ऊँचा किनारा। ५. वह भाग जो ऊपर बहुत उठा हो। ६. विस्तार। ७. कोई जो एक जो एक प्रस्थ मान की हो [को०]।

प्रस्थ (२)
वि० १. जानेवाला। यात्रा करनेवाला। २. फैलानेवाला। ३. प्रकृष्ट रूप से स्थित। दृढ़ (को०)।

प्रस्थकुसुम
संज्ञा पुं० [सं०] मरुवा।

प्रस्थपुष्प
संज्ञा पुं० [सं०] १. मरुवे का पौधा। २. छोटे पत्तों की तुलसी। ३. जंबीरी नीबू।

प्रस्थभुक्
वि० [सं०] एक प्रस्थ अन्न खानेवाला [को०]।

प्रस्थल
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत के अनुसार एक देश जो उस समय सुशर्मा नामक राजा के अधिकार में था।

प्रस्थान
संज्ञा पुं० [सं०] १. गमन। यात्रा। रवानगी। २. विजय के लिये सेना या राजा की यात्रा। कूच। ३. पहनने के कपड़ें आदि जिसे लोग यात्रा के मुहूत पर घर से निकालकर यात्रा की दिशा में कहीं पर रखवा देते हैं। उ०—तिथी नखत्त गुरुवार कहीजै। सुदिन साधि प्रस्थान धरीजै।—जायसी (शब्द०)। विशेष—यह ऐसी दशा में किया जाता है जब कोई ठीक मुहूर्त पर यात्रा नहीं कर सकता। क्रि० प्र०—धरना।—रखना। करना। ४. मार्ग। ५. उपदेश की पद्धति या उपाय। ६. बैखरी बानी के भेद जो अठारह हैं, यथा—४ वेद, ४उपवेद, ६वेदांग, पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्र। ७. मरण। मृत्यु (को०)। ८. प्रेषण। भेजना (को०)। ९. विधि। ढंग। तरीका (को०)। १०. निम्न श्रेणी का नाटक (को०)। ११. धार्मिक निकाय। धार्मिक संप्रदाय (को०)। १२. आगमन। आना (को०)।

प्रस्थानत्रय
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रस्थानत्रयी' [को०]।

प्रस्थानत्रयी
संज्ञा स्त्री० [सं०] भगवदगीता, उनिषद् और ब्रह्मासूत्र। [को०]।

प्रस्थानदुंदुभि
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रस्थानदुन्दुभि] कूच का डंका [को०]।

प्रस्थानी
वि० [हिं० प्रस्थान + ई] जानेवाला। प्रस्थान करनेवाला। उ०—उठे सुनत हरि उद्धव बानी। भे पुनि शुक्रप्रस्थ प्रस्थानी।—सबलसिंह (शब्द०)।

प्रस्थानीय
वि० [सं०] प्रस्थान योग्य।

प्रस्थापन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० प्रस्थापित, प्रस्थापी, प्रस्थाप्य] १. प्रस्थान कराना। भेजना। २. प्रेरणा। दूतादि के काम में नियुक्त करना। ३. स्थापन। ४. सिद्ध करना। प्रमाणित करना। (को०)। ६. व्यवहार में लाना। काम में लाना (को०)। ७. जानवरों को चुरा ले जाना (को०)।

प्रस्थापना
संज्ञा स्त्री० [सं०] भेजना। रवाना करना। प्रेषण [को०]।

प्रस्थापित
वि० [सं०] १. अच्छी तरह स्थापित। २. प्रेषित। भेजा हुआ। ३. आगे की ओर किया या बढ़ाया हुआ। ४. अनुष्ठित। जैसे, कोई उत्सव आदि (को०)।

प्रस्थायी
वि० [सं० प्रस्थायिन्] जो भविष्य में प्रस्थान करनेवाला हो।

प्रस्थावा पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रस्थान] चलना। गमन। उ०—भएउ इंद्र कर आयेसु प्रस्थावा यह सोइ। कबहुँ काहु कै प्रभुता कबहुँ काहु कै होइ।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० ३५२।

प्रस्थिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आमड़ा। २. पुदीना।

प्रस्थित
वि० [सं०] १. ठहरा हुआ। टिका हुआ। स्थिर। २. द्दढ़। ३. जो गया हो। गत। ४. जो जाने को तैयार हो। गमनोद्यत।

प्रस्थिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रस्थान। यात्रा। २. विशेष स्थिति।

प्रस्न (१)
संज्ञा पुं० [सं०] स्नानपात्र।

प्रस्न पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० प्रस्न] दे० 'प्रश्न'। उ०—ऐसिअ प्रस्न बिहंगपति कीन्हि काग सन जाइ।—मानस ७।५५।

प्रस्नव
संज्ञा पुं० [सं०] १. बहना। प्रवाह। प्रस्राव। २. धारा। जैसे दूध की। ३. अश्रु। आँसू। ४. मूत्र [को०]।

प्रस्निग्ध
वि० [सं०] १. जिसमें बहुत अधिक चिकनाई हो। २. बहुत अधिक कोमल [को०]।

प्रस्नुत
वि० [सं०] बहनेवाला। टपकनेवाला। क्षरणशील। प्रस्रवित होनेवाला [को०]। यौ०—प्रस्नुतस्तनी = वह स्त्री जिसके स्तनों से वात्सल्य के कारण दुग्धस्त्राव हो।

प्रस्नुषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] नतोहू। पोते की स्त्री।

प्रस्नेय
वि० [सं०] (जल आदि) जो स्नान के योग्य हो।

प्रस्पंदन
संज्ञा पुं० [सं० प्रस्पन्दन] फड़कना। कंपन [को०]।

प्रस्पर्धा
वि० [सं० प्रस्पर्धिन्] प्रतिद्वंद्वी। प्रतिस्पर्धी [को०]।

प्रस्फुट
वि० [सं०] १. विकसित। खिला हुआ। २. प्रकट। स्पष्ट। साफ। ज्ञात।

प्रस्फुटन
संज्ञा पुं० [सं०] १. खिलना। विकसित होना। २. प्रकट होना। स्पष्ट होना। अभिव्यक्त होना। उ०—बहुधा देखा जाता है कि विरुद्ध संसर्ग से ही किसी अनुकूल भाव का प्रस्फुटन होता है।—पोद्दार अभि ग्रं०, पृ० १०२।

प्रस्फुटित
वि० [सं०] विकसित। प्रस्फुट।

प्रस्फुरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. निकलना। २. प्रकाशित होना। ३. कंपन। फड़कना (को०)। ४. स्पष्ट या व्यक्त होना (को०)।

प्रस्फुरित
वि० [सं०] कंपित। फड़कता हुआ। हिलता हुआ। यौ०—प्रस्फुरिताधर = जिसके होठ हिल रहे हों। कुछ कहने के लिये जिसका अधर फड़क रहा हो।

प्रस्फोटन
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी वस्तु का इस प्रकार एकबारगी खुलना या फूटना कि उसके भीतर के पदार्थ वेग से बाहर निकल पड़े। जैसे, ज्वालामुखी का प्रस्फोटन। २. फोड़ निकालना। ३. विकसित होना या करना। खिलना या खिलाना। ४. पीटना। ठोंकना। ताड़न। ५. फटकना (अन्न आदि)। ६. सूप।

प्रस्मृत
वि० [सं०] विस्मृत। भूला हुआ [को०]।

प्रस्मृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] विस्मृत करना। भूल जाना [को०]।

प्रस्यद
संज्ञा पुं० [सं० प्रस्यन्द] टपकना। चूना। बहना। द्रवित होना।

प्रस्यंदन
संज्ञा पुं० [सं० प्रस्यन्दन] दे० 'प्रस्यंद' [को०]।

प्रस्यंदी
संज्ञा पुं० [सं० प्रस्यन्दिन्] वर्षा की झड़ी। वर्षा की फुहार [को०]।

प्रस्रंस
संज्ञा पुं० [सं०] (गर्भ का) पतन। भ्रंश। गिरना।

प्रस्रंसन
संज्ञा पुं० [सं०] द्रवणशील वस्तु। द्रावक वस्तु [को०]।

प्रस्रंसिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार का योनिरोग जिसमें प्रसंग के समय रगड़ से योनि बाहर निकल आती है और गर्भ नहीं ठहरता।

प्रस्रंसी
संज्ञा पुं० [सं० प्रस्रंसिन्] [स्त्री० प्रस्रंसिनी] १. पतनशील। गिरनेवाला। २. अकाल ही में गिरनेवाला (जैसे, गर्भ)।

प्रस्रव
संज्ञा पुं० [सं०] चूना। टपकना। २. प्रवाह। धारा। ३. स्तनों से बहता हुआ दूध। ४. मूत्र। ५. पकते हुए चावल का बलकर बहनेवाला माँड़। ६. छलकते वा गिरते हुए आँसू [को०]।

प्रस्रवण
संज्ञा पुं० [सं०] १. जल आदि (द्रव पदार्थों) का टपक टपककर या गिर गिरकर बहना। २. किसी स्थान से निकल निकलकर बहता हुआ पानी। सोता। ३. किसी स्थान से गिरकर बहता हुआ पानी। प्रपात। झरना। निर्झर। ४. पसीना। ५. स्तनों से टपकता हुआ दूध। ६. माल्यवान् पर्वत। ७. पेशाब करना (को०)। ८. झरने के जल से बना हुआ कुंड (को०)।

प्रस्रवणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] वैद्यक के अनुसार बीस प्रकार की योनियों में एक। विशेष—इसे दुष्प्रजाविनी भी कहते हैं। इसमें से पानी सा निकलता रहता है। इस योनिवाली स्त्री की संतान होने में बड़ा कष्ट होता है।

प्रसवी
वि० [सं० प्रस्रविन्] [स्त्री० प्रस्रविणी] १. स्रवित होता हुआ। चूनेवाला। २. दूध देनेवाला। ३. जिसमें अधिक दूध हो [को०]।

प्रस्राव
संज्ञा पुं० [सं०] १. क्षरण। झरना। बहना। २. बहाव। ३. प्रस्रवण। ४. पेशाब। मूत्र। ५. पकते हुए चावल का उबरकर बहनेवाला माँड़ (को०)।

प्रस्तुत
वि० [सं०] झड़ा हुआ। गिरा हुआ।

प्रस्तुति
संज्ञा स्त्री० [सं०] झरना। गिरना [को०]।

प्रस्वन, प्रस्वान
संज्ञा पुं० [सं०] जोर का शब्द। ऊँचा स्वर।

प्रस्वाप
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह वस्तु जिसके प्रयोग से निद्रा आवे। २. सोना। शयन करना (को०)। ३. स्वप्न। सपना (को०)। ४. एक अस्त्र का नाम जिसके प्रयोग से, शत्रु को युद्धस्थल में निद्रा आ जाती है।

प्रस्वापक
वि० [सं०] १. सुलानेवाला। नींद लानेवाला। २. मारक। मृत्यु देनेवाला [को०]।

प्रस्वापन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रस्वाप'।

प्रस्वापिनी
संज्ञा पुं० [सं०] हरिवंश के अनुसार कृष्णचंद्र की एक स्त्री का नाम।

प्रस्वार
संज्ञा पुं० [सं०] ओंकार। ॐ।

प्रस्विन्न
वि० [सं०] जिसे पसीना आ गया हो। प्रस्वेदयुक्त [को०]।

प्रस्वीकरण
संज्ञा पुं० [सं० (उप०) प्र + स्वीकरण] स्वीकारना। स्वीकृति देना।

प्रस्वेद
संज्ञा पुं० [सं०] पसीना।

प्रस्वेदित (१)
वि० [सं०] १. जिसे पसीना आ गया हो। २. प्रस्वेद- युक्त। २. पसीना लानेवाला। गर्भ [को०]।

प्रस्वेदित (२)
वि० [सं०] पसीने से तर। प्रस्वेद से आर्द्र [को०]।

प्रहंतव्य
वि० [सं० प्रहन्तव्य] वध करने योग्य। बध्य [को०]।

प्रह पु
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रभ] १. प्रभा। चमक। दीप्ति। उ०— पहु विन पुकार पहु उप्परिग। सुप्रह पहक फट्टी फहन।— पृ० रा०, ६१।१६५८। २. पौ। उ०—प्रह फूटी दिस पुंडरी, हणहणिया हय थट्ट।—ढोला०, दू० ६०२।

प्रहणन
संज्ञा पुं० [सं०] मारना। वध। हनन [को०]।

प्रहणेमि
संज्ञा पुं० [सं०] प्रहनेमि। चंद्रमा।

प्रहत (१)
वि० [सं०] १. हत। निहत। मारा हुआ। २. प्रताड़ित। पीटा हुआ। ३. फैलाया हुआ। प्रसारित। उ०—बहता है साथ गत गौरव की दीर्घकाल प्रहत तरंग कर ललित तरल ताल।—अनामिका, पृ० १८६। ४. आघातित। (नगाड़ा आदि) जिसपर आघात किया गया हो (को०)। ५. पराजित हारा हुआ (को०)। ६. शिक्षित। पठित (को०)।

प्रहत (२)
संज्ञा पुं० १. पासे आदि का फेंकना। २. वार। ठोकर। प्रहार।

प्रहति
संज्ञा स्त्री० [सं०] धक्का। आघात [को०]।

प्रहनेमि
संज्ञा पुं० [सं०] चंद्रमा।

प्रहर
संज्ञा पुं० [सं०] पहर। दिन रात के आठ सम भागों में से एक भाग। पहरा। उ०—इस स्वप्न में भी तार प्रहर के चार स्वप्न हैं।—श्यामा०, पृ० ३।

प्रहरक
संज्ञा पुं० [सं०] वह मनुष्य जो पहरे पर हो और घंटा बजाता हो। घड़ियाली।

प्रहरकुटुबी
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रहर कुटुम्बी] अर्कपुष्पी।

प्रहरखना पु
क्रि० अ० [सं० प्रहर्षण] हर्षित होना। आनंदित होना। उ०—जनकसुता समेत रघुराई। पेखि प्रहरखे मुनि समुदाई।—तुलसी (शब्द०)।

प्रहरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. हरना। हरण करना। छीनना। २. अस्त्र। उ०—और प्रहरणों से प्रभुवर के रण में रिपु गण मरते थे।—साकेत, पृ० ३७९। ३. युद्ध। ४. प्रहार। वार। ५. मारना। आघात पहुँचाना। ६. फेकना। ७. हटाना। दूर करना। ८. स्त्रियों की सवारी के लिये एक प्रकार का परदेवाला रथ। बहली। ९. गाड़ी में बैठने की जगह। १०. मृदंग के बारह प्रबंधों में एक।

प्रहरणकलिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] चौदह अक्षरों की एक वर्णवृत्ति जिसके प्रत्येक चरण में दो नगण, एक भगण, फिर एक नगण और अंत में लघु गुरु होते हैं। जैसे,—महि हरि जनमे खलन दलन को प्रहरण कलि काटन दुख जन को।

प्रहरणकलिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'प्रहरणकलिका'।

प्रहरणीय (१)
वि० [सं०] १. प्रहरण के योग्य। २. आक्रमण या प्रहार करने योग्य। ३. क्षेपणीय [को०]।

प्रहरणीय (२)
संज्ञा पुं० अस्त्र। आयुध [को०]।

प्रहरत्
संज्ञा पुं० [सं०] यौद्धा। वीर [को०]।

प्रहरषन पु
संज्ञा पुं० [हिं०] एक अलंकार। दे० 'प्रहर्षण-२।'

प्रहरी
वि० [सं० प्रहरिन्] १. पहप पहर पर घंटा बजानेवाला। घड़ियाली। २. पहलेवाला। पहरुवा। पहरा देनेवाला। उ०—बना हुआ है प्रहरी जिसका उश कुटीर में क्या धन हैं, जिसकी रक्षी में रत इसका तन हैं, मन है, जीवन है।— पंचवटी, पृ० ६।

प्रहर्ता
वि० [सं० प्रहर्तृ] [वि० स्त्री० प्रहर्त्री] १. प्रहार करनेवाला। २. योद्धा।

प्रहर्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १. हर्ष। आनंद। २. पुरुषेंद्रिय का उत्तेजित होना (को०)।

प्रहर्षण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. आनंद। २. एक अलंकार जिसमें कवि बिना उद्योग के अनायास किसी के वांछित पदार्थ की प्राप्ति का वर्णन करता है। जैसे,—प्राण पियारो मिल्यो सपने में भई तब नेसुक नींद निहोरे। कंत को आयबों त्योंहीं जगाय सखी कह्यो बोलि पियूष निचोरे। यों मतिराम बढ़यो उर में सुख बाल के बालम सों द्दग जोरे। ज्यों पट में अति ही चट- कीलो चढ़ै रँग तीसरी बार के बोरे।—मतिराम (शब्द०)। ३. बुध नामक ग्रह। ४. मनोवांछित वस्तु की प्राप्ति (को०)।

प्रहर्षण (२)
वि० आनंदित करनेवाला। हर्षप्रद [को०]।

प्रहर्षणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. हरिद्रा। हलदी। २. तेरह अक्षरों की एक वर्णवृत्ति जिसके प्रत्येक चरण में मगण फिर नगण, फिर जगण, रगण और अंत में एक गुरु होता है। (म न ज र ग)। तीसरे और दसवें वर्ण पर यति होती है। जैसे,— वैसो ही विरचहु रास हे कन्हाई, सरद प्रहर्षिणी जुन्हाई।

प्रहर्षिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'प्रहर्षणी'।

प्रहर्षित
वि० [सं०] १. प्रसन्न। हर्षित। आनंदित। २. कठोर या कड़ा। अकड़ा हुआ; जैसे बेंत (को०)। ३. संभोग के लिये उत्तेजित किया हुआ (को०)।

प्रहर्षुल
संज्ञा पुं० [सं०] बुध ग्रह [को०]।

प्रहल्लाद पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रह्लाद] दे० 'प्रह्लाद- (३)'। उ०— प्रहल्लाद उद्धार कियो पूरन पद जान्हव।—पृ० रा०, २।२१३।

प्रहसंती
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रहसन्ती] १. जूही। २. वासंती। ३. प्रकृष्ट अंगारधानी। अच्छी अँगेठी। ४. वह जो हँस रही हो या प्रफुल्ल हो।

प्रहसन
संज्ञा पुं० [सं०] १. हँसी। दिल्लगी। परिहास। चुहल। खिल्ली। ३. उपहास या साधिक्षेप रचना (को०)। ४. एक प्रकार का काव्यमिअ नाट्य। विशेष—यह रूपक के दस भेदों में है। इस खेल में नायक कोई राजा, धनी, ब्राह्मण या धूर्त होता है और अनेक पात्र रहते हैं। खेल भर में हास्यरस प्रधान रहता है। पहले के प्रहसनों में एक ही अंक होता था पर अब लोग कई अंकों का प्रहसन लिखते हैं। जैसे, वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति और अंधेर नगरी आदि। इस प्रकार कै नाटक प्रायः कुरीतिसंशोधन के लिये बनाए और खेले जाते हैं।

प्रहसित (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक बुद्ध का नाम। २. हास्य।

प्रहसित (२)
वि० हँसता हुआ [को०]।

प्रहस्त
संज्ञा पुं० [सं०] १. चपत। थप्पड़। हत्थल। उँगलियों सहित फैलाई हुई हथेली। २. रामायण के अनुसार रावण के एक सेनापति का नाम।

प्रहाण
संज्ञा पुं० [सं०] १. परित्याग। २. चित्त की एकाग्रता। ध्यान। ३. प्रयत्न। उद्योग। प्रयास [को०]।

प्रहाणि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. परित्याग। २. हानि। नाश। ३. कमी। घाटा। हानि।

प्रहान पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रहान] दे० 'प्रहाण'।

प्रहानि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रहाणि] दे० 'प्रहाणि'।

प्रहाय्य
संज्ञा पुं० [सं०] संदेशवाहक। दुत [को०]।

प्रहार
संज्ञा पुं० [सं०] १. आघात। वार। चोट। मार। २. वध। हत्या। हनन। मारण (को०)। ३. युद्ध। रण (को०)। ४. गले का हार (को०)। क्रि० प्र०—करना।—होना।

प्रहारक
वि० [सं०] प्रहार करनेवाला। मारनेवाला।

प्रहारण
संज्ञा पुं० [सं०] काम्य दान। मनचाहा दान।

प्रहारना पु
क्रि० अ० [सं० प्रहार] १. मारना। आघात पहुँचाना। आघात करना। उ०—(क) मन नहिं मारा मनकरी, सका न पाँच प्रहारि। सील साँच सरधा नहीं अजहूँ इंद्रि उघारि।—कबीर (शब्द०)। (ख) दीन्हों डारि शैल तें भू पर पुनि भीतर डारयो। डारि अगिन में शस्त्रन मारयो नाना भाँति जल प्रहारयो।—सूर (शब्द०)। २. मारने के लिये चलाना। फेंकना। उ०—(क) वृत्रासुर पर वज प्रहारयो। तिन तिरसूल इंद्र पर मारयो।—सूर (शब्द०)। (ख) तब दुहुँ भाइन बजू प्रहारा। करि तापर पुनि लातन मारा।— पद्माकर (शब्द०)। (ग) आजु राम श्याम को प्रहारि बान मारिहौं। उग्रसेन सीस काटि भूमि बीप डारिहौं।—गोपाल (शब्द०)।

प्रहारवल्ली
संज्ञा स्त्री० [सं०] मांसरोहिणी लता।

प्रहारार्त (१)
वि० [सं०] जो आघात से घायल हो गया हो।

प्रहारार्त (२)
संज्ञा पुं० घाव से उत्पन्न तीव्र पीड़ा [को०]।

प्रहारित पु †
वि० [सं० प्रहार] जिसपर प्रहार हो। प्रताड़ित। विशेष—मनुष्य के शरीर में मुष्टिप्रहार आदि से प्रहारित स्थान का मांस दूषित होकर शोथ उत्पन्न करता हैं।

प्रहारी (१)
वि० [सं० प्रहारिन्] [वि० स्त्री० प्रहारिणी] १. मारनेवाला। प्रहार करनेवाला। २. चलानेवाला। मारनेवाला। छोड़नेवाला। ३. नष्ट करनेवाला। दूर करनेवाला। भंजन करनेवाला। जैसे, गर्वप्रहारी।

प्रहारी (२)
संज्ञा पुं० सर्वश्रेष्ठ योद्धा। प्रधान योद्धा [को०]।

प्रहारुक
वि० [सं०] बलपूर्वक हरण करनेवाला। जबरदस्ती छीननेवाला।

प्रहार्य
वि० [सं०] १. प्रहार करने योग्य। २. हरण योग्य।

प्रहास
संज्ञा पुं० [सं०] १. अट्टहास। जोर की हँसी। ठहाका। गहरी हँसी। २. नट। ३. शिव। ४. कार्तिकेय का एक अनुचर। ५. उपेक्षा। तिरस्कार (को०)। ६. व्यंग्य कथन। कटूक्ति ७. रंगों की चमक (को०)। ८. सोमतीर्थ का एक नाम। दे० 'प्रभास'—२। विशेष—इस अर्थ में यह शब्द 'प्रभास' का प्राकृत रूप जान पड़ता है ।

प्रहासक
वि, संज्ञा पुं० [सं०] वह व्यक्ति या वस्तु जो हँसाए [को०]।

प्रहासी (१)
वि० [सं० प्रहासिन्] १. खूब हँसानेवाला। २. खूब हँसनेवाला। ३. चमकीला। द्योतित। चमकनेवाला [को०]।

प्रहासी (२)
संज्ञा पुं० विदूषक। मसखरा [को०]।

प्रहि
संज्ञा पुं० [सं०] कूप। कूँआ [को०]।

प्रहित (१)
वि० [सं०] १. प्रेरित। २. फेंका हुआ। क्षिप्त। ३. फटका हुआ। निष्कासित। ४. उपयुक्त। ठीक (को०)। नियुक्त (को०)।

प्रहित (२)
संज्ञा पुं० १. एक प्रकार का साम। २. सूप। पकी हुई दाल।

प्रहीण (१)
वि० [सं०] १. परित्यक्त। २. प्रक्षिप्त। फका हुआ (को०)। ३. समाप्त। नष्ट (को०)।

प्रहीण (२)
संज्ञा पुं० विनाश। हानि [को०]। यौ०—प्रहीणजीवित = मृत। मरा हुआ। प्रहीणदोष।

प्रहीणदोष
वि० [सं०] निष्पाप। पापरहित [को०]।

प्रहुत
संज्ञा पुं० [सं०] बलिवैश्वदेव। भूतयज्ञ।

प्रहुति
संज्ञा स्त्री० [सं०] आहुति। उत्तम आहुति।

प्रहृत (१)
वि० [सं०] १. फेंका हुआ। चलाया हुआ। २. पसारा हुआ। फैलाया हुआ। उठाया हुआ। ३. मरा हुआ। प्रताड़ित। ४. पीटा हुआ। ठोंका हुआ।

प्रहृत (२)
संज्ञा पुं० १. प्रहार। चोट। आघात। २. एक गोत्रकार ऋषि का नाम।

प्रहृष्ट
वि० [सं०] १. अत्यंत प्रसन्न। आह् लादित। २. उठा हुआ। खड़ा। जैसे, रोम। यौ०—प्रहष्टाचित्त, प्रहृष्टमना = आनंदित। प्रफुल्ल। प्रह्वृष्टमुख = प्रहृष्टवदन। प्रहृष्टरूप = जिसे देखने से प्रसन्नता हो। जो प्रसन्न दिखाई दे। प्रहृष्टरोमा = जिसके बाल, रोएँ आदि खड़े हों।

प्रहृष्टक
संज्ञा पुं० [सं०] कौआ। काक [को०]।

प्रहृष्टात्मा
वि० [सं० प्रहृष्टात्मन्] प्रसन्नाचित्त। आनंदित [को०]।

प्रहेणक
संज्ञा पुं० [सं०] लपसी। प्रहेलक।

प्रहेति
संज्ञा पुं० [सं०] रामायण के अनुसार एक राक्षस का नाम। यह हेति का भाई था।

प्रहेलक
संज्ञा पुं० [सं०] १. लपसी। प्रहेणक। २. पहेली। प्रेहे- लिका (को०)। ३. वह मिष्ठान्न जो उत्सवादि में वितरित किया जाय (को०)।

प्रहेला
संज्ञा स्त्री० [सं०] आनंदपूर्ण क्रीड़ा। स्वच्छंद विलास [को०]।

प्रहेलि
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'प्रहेलिका' [को०]।

प्रहेलिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] पहेली। बुझौवल।

प्रह्लत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रीति।

प्रह्लाद
संज्ञा पुं० [सं०] १. दे० 'प्रह्लाद'। २. एक नाग का नाम।

प्रह्लास
संज्ञा पुं० [सं०] क्षीण होना। क्षय [को०]।

प्रह्ल
वि० [सं०] प्रसन्न। आनंदित।

प्रह्लत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रीति। आनंद। प्रसन्नता [को०]।

प्रह्लन्न
वि० [सं०] प्रसन्न। खुश [को०]।

प्रह्लन्नि
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'प्रह्लात्ति'।

प्रह्लाद
संज्ञा पुं० [सं०] १. आमोद। आनंद। २. एक दैत्य जो राजा हिरण्यकशिपु का पुत्र था। विशेष—यह बचपन ही से बड़ा भगवदभक्त था। हिरण्य- कशिपु ने प्रह्लाद को ईश्वर की भक्ति से विचलित करने के लिये अनेक प्रयत्न किए और बहुत कष्ट पहुँचाया पर वह विचलित न हुआ। अंत में भगवान ने नरसिंह रूप धारण कर प्रह्लाद की रक्षा की और हिरण्यकशिपु को मारा डाला। प्रह्लाद का पुत्र विरोचन और पौत्र बलि था। ३. एक देश का नाम। ४. एक नाग का नाम। ५. ध्वनि। आवाज (को०)। ६. चावल की एक जाति।

प्रह् लादक
वि० [सं०] [वि० स्त्री० प्रह्लादिका] आह्लादित करनेवाला। अनँदित करनेवाला [को०]।

प्रह् लादन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] आह्लादित करना। प्रसन्न करना।

प्रह् लादन (२)
वि० आनंददायक। आह्लादक।

प्रह् लादित
वि० [सं०] आनंदित। हर्षित। प्रफुल्लित।

प्रह् लादी
वि० [सं० प्रह्लादिन्] आनंदित होनेवाला। प्रसन्न होनेवाला [को०]।

प्रह्ल
वि० [सं०] १. विनीत। नम्र। २. झुका हुआ। ढालुआँ। ३. आसक्त।

प्रह्लण
संज्ञा पुं० [सं०] प्रदर्शन के लिये झुकना। सम्मानार्थ नम्र होना [को०]।

प्रह्लल
संज्ञा पुं० [सं०] सौंदर्ययुक्त देह। सुंदर शरीर।

प्रह्ललिका, प्रह्ललीका
संज्ञा स्त्री० [सं०] पहेली।

प्रह्लांजलि
वि० [सं० प्रह्लाञ्जलि] हाथ जोड़कर सिर झुकाए हुए [को०]।

प्रह्लाण
वि० [सं०] नम्र। झुका हुआ [को०]।

प्रह्लाय
संज्ञा पुं० [सं०] आह् वान। अभिनिमंत्रण। आवाहन [को०]।