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विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/रत

विक्षनरी से

रत (१)
संज्ञा पुं० [पुं०] १. मैथुन। प्रसंग। उ०—प्रिया को है बिंबाधर मृदुल ज्यों पल्लव नयो। लियो धीरें धीरें रहसि रस मैने रत समै।—लक्ष्मण (शब्द०)। २. योनि। ३. लिंग। ४. प्रेम। प्रीति।

रत (२)
वि० १. प्रेम में पड़ा हुआ। अनुरक्त। आसक्त। २. (कार्य आदि में) लगा हुआ। लिप्त। लीन। तत्पर।

रत पु (३)
संज्ञा पुं० [सं० रक्त, प्रा० रत्त] रक्त। खून। लहू। (डिं०)।

रत पु (४)
संज्ञा स्त्री० [सं० ऋतु] दे० 'ऋतु'। उ०—आवी सब रत आमली त्रिया करइ सिणगार।—ढोला०, दू० ३०३।

रतकील
संज्ञा पुं० [सं०] १. कुत्ता। २. पूरुष की जननेंद्रिय। लिंग [को०]।

रतकूजित
संज्ञा पुं० [सं०] संभोग के समय की जानेवाली अस्फुट ध्वनि। कामुकतापूर्ण कुंथन। संभोग या प्रसंगकालीन सीत्कार। [को०]।

रतगिरा
संज्ञा स्त्री० [हिं० रत्ती] गुंजा। घुघची।

रतगुरु
संज्ञा पुं० [सं०] पति। खसम। शौहर।

रतगृह
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'रतिगृह' [को०]।

रतजगा
संज्ञा पुं० [हिं० रात + जागना] १. किसी उत्सव या विहार आदि के लिये सारी रात जागकर बिता देना। २.वह आनंदोत्सव जो रात भर होता रहे। ३. एक त्योहर जो पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार आदि में भाद्रपद कृष्ण द्वितीया की रात को होता है। इसमें प्रायः स्त्रियाँ रात भर कजली आदि गाया करती हैं।

रतज्वर
संज्ञा पुं० [सं०] कौआ। काक [को०]।

रतताली (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] कुटनी।

रतताली (२)
संज्ञा पुं० [सं० रततालिन्] विषयी। कामाचारी। लंपट [को०]।

रतन
संज्ञा पुं० [सं० रत्न] दे० 'रत्न'।

रतनजोत
संज्ञा स्त्री० [सं० रत्न + ज्योति] १. एक प्रकार की मणि। २. एक प्रकार का बहुत छोटा क्षुप जो कश्मीर और कुमाऊँ में अधिकता से होता है। विशेष—इसके डंठल प्रायः डेढ़ बालिशत तक लंबे होते हैं, जिनमें काहू के पत्तों के से, प्रायः चार अंगुल तक लंबे और कुछ अनीदार पत्ते और छोटे छोटे फूलों तथा फलों के गुच्छे लगते हैं। इसकी जड़ लाल रंग की होती है, जिससे लाल रंग निकाला जाता है और तेल आदि रँगे जाते हैं। वैद्यक में यह गरम, रुक्ष, पित्तज, त्रिदोपनाशक तथा जीर्णज्वर, प्लीहा, शोथ आदि को दूर करनेवाली कही गई है। इसके कई भेद होते हैं, जिनमें से एक के डंठल और पत्ते अपेक्षाकृत बड़े होते हैं; और एक छत्ते के आकार की होती है जिसकी पत्तियाँ बहुत छोटी होती हैं। वैद्यक के अनुसार इन सबके गुण भी भिन्न भिन्न होते हैं; और इनका व्यवहार औषध रूप में होता है। ३. वृहद्दंती। बड़ी दंती। वि० दे० 'दंती'।

रतनपटोरा पु
संज्ञा पुं० [हिं० रतन + पटोरा] रत्न जड़े हुए वस्त्र। जड़ाऊ वस्त्र। उ०—रतन पटोरा डारि पाँवड़ा सन्मुख जाउँ हो।—धरम०, पृ० ५४।

रतनपुरुष
संज्ञा पुं० [?] एक प्रकार की छोटी झाड़ी जो दिल्ली, आगरा, बुंदेलखंड और बंगाल में पाई जाती है। इसकी जड़ और पत्तियाँ ओषधि के रूप में काम में आती हैं।

रतनाकर पु
संज्ञा पुं० [सं० रत्नाकर] १. दे० 'रत्नाकर'। २. दे० 'रतनजोत'।

रतनागर पु
संज्ञा पुं० [सं० रत्नाकर] समुद्र। उ०—जनमि जगत जसु प्रगटिहु मातु पिताकर। तीयरतन तुम उपजिहु भव रतनागर।—तुलसी (शब्द०)।

रतनगरभ
संज्ञा स्त्री० [सं० रत्नगर्भा] पृथ्वी। भूमि। (डिं०)।

रतनार
वि० [हिं०] दे० 'रतनारा'।

रतनारा
वि० [सं० रक्त, प्रा० रत्त, रत + नाल (= पीला सूरमा) अथवा सं० रत्न (= मानिक) + हिं० आर (प्रत्य०)] कुछ लाल। सुर्खी लिए हुए। उ०—दुलरी कंठ नयन रतनारे मो मन चितै हरौरी।—सूर (शब्द०)। विशेष—इस शब्द का प्रयोग अधिकतर आँखों के लिये ही होता है।

रतनाराच
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'रतनारीच' [को०]।

रतनारी (१)
संज्ञा पुं० [हिं० रतनार + ई (प्रत्य०)] १. एक प्रकार का धान। उ०—कपूर काट कजरी रतनारी। मधुकर डेला जीरा सारी।—जायसी (शब्द०)।

रतनारी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० रक्त (= रत + नार)] लाली। लालिमा। सुर्खी।

रतनारी (३)
वि० दे० 'रतनारा'।

रतनारीच
संज्ञा पुं० [सं०] १. कामदेव। मदन। २. कुत्ता। क्ष्वान। ३. आवारा। लंपट। बदचलन। ४. रतकूजित। संभोगानंदजन्य सीत्कार (को०)।

रतनालिया पु †
वि० [हिं० रतनारा + इया (प्रत्य०)] दे० 'रतनारा'। उ०—आँखड़िया रतनालिया चेला करैं प्रताल। मैं तोहिं बूझौं माछली तूँ क्यों बंधी जाल।—कबीर (शब्द०)।

रतनावली
संज्ञा स्त्री० [सं० रत्नावली] दे० 'रत्नावली'।

रतनिधि
संज्ञा पुं० [सं०] खंजन पक्षी। ममोला।

रतबंध
संज्ञा पुं० [सं० रतबन्ध] दे० 'रतिबंध'।

रतमानस
वि० [सं०] खुशदिल। प्रसन्नचित्त [को०]।

रतमुहाँ पु † (१)
वि० [हिं० रत (= लाल) + मुँह] [वि० स्त्री० रतमुहीं] लाल मुँहवाला। उ०—रायमुनी तुम्ह औ रतमुहीं। अलिमुख लाग भई फुल जुही।—जायसी (शब्द०)।

रतमुहाँ (२)
संज्ञा पुं० बंदर।

रतवाँस †
संज्ञा पुं० [हिं० रात + वाँस (प्रत्य०)] हाथियों और घोड़ों का वह चारा जो उन्हें रात के समय दिया जाता है।

रतवा
संज्ञा पुं० [देश०] खर नाम की घास जो घोड़ों के लिये बहुत अच्छी समझी जाती है।

रतवाई †
संज्ञा स्त्री० [देश०] पहले दिन कोल्हू चलने पर उसका रस लोगों में बाँटने की प्रथा।

रतवाह पु
संज्ञा पुं० [हिं० रात + वाह ?] रात की लड़ाई। रात्रि को होनेवाला युद्ध।

रतव्रण
संज्ञा पुं० [सं०] कुत्ता।

रतशायी
संज्ञा पुं० [सं० रतशायिन्] कुत्ता।

रतहिंडक
संज्ञा पुं० [सं० रतहिण्डक] १. वह जो स्त्रियों को चुराता हो। २. लंपट। आवारा। बदचलन।

रतांजली
संज्ञा स्त्री० [सं० रताञ्जली] रक्तचंदन। लाल चंदन।

रतांदुक
संज्ञा पुं० [सं० रतान्दुक] कुत्ता।

रता †
संज्ञा स्त्री० [देश०] भुकड़ी, जो अनेक वस्तुओं पर प्रायः बरसात के दिनों में या सीड़ की जगह में लग जाती है।

रताना पु † (१)
क्रि० अ० [सं० रत + हिं० आना (प्रत्य०)] रत होना। उ०—कीधौ श्याम हटकि है राख्यौ कीधौ आपु रतान्यौ।— सूर (शब्द०)।

रताना पु † (२)
क्रि० स० किसी को अपनी ओर रत करना।

रतामर्द (२)
संज्ञा पुं० [सं०] कुता [को०]।

रतायनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] वेश्या। रंडी।

रतार्थी
वि० [सं० रतार्थिन्] [वि० स्त्री० रतार्थिनी] संभोग चाहनेवाला। कामुक [को०]।

रतालू
संज्ञा पुं० [सं० रत्तालु] १. पिंडालू नामक कंद जिसका व्यवहार तरकारी बनाने में होता है। २. वाराहीकंद। गेंठी।

रति (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कामदेव की पत्नी जो दक्ष प्रजापति की कन्या मानी जाती है। विशेष दे० 'कामदेव'। उ०—राधा हरि केरी प्रीति सब तें अधिक जानि रति रतिनाथ हूँ देखो रति थोरी सी।—केशव (शब्द०)। विशेष—कहते हैं, दक्ष ने अपने शरीर के पसीने से इसे उत्पन्न करके कामदेव को अर्पित किया था। यह संसार की सबसे अधिक रूपवती, सौंदर्य की साक्षात् मूर्त्ति मानी जाती है। इसे देखकर सभी देवताओं के मन में अनुराग उत्पन्न हुआ था; इसलिये इनका नाम रति पड़ा था। जिस समय शिव जी ने कामदेव को अपने तीसरे नेत्र से भस्म कर दिया था; उस समय इसने बहुत अधिक विलाप करके शिव जी से यह वरदान प्राप्त किया था कि अब से कामदेव बिना शरीर के या अनंग होकर सदा बना रहेगा। यह भी माना जाता है कि यह सदा कामदेव के साथ रहती है। २. कामक्रिड़ा। संभोग। मैथुन। उ०—(क) रति जय लिखिबे की लेखनी सुरेख किधौं मीनरथ सारथी के नोदन नवीने हैं।—केशव (शब्द०)। (ख) लाज गरब आरस उमंग भरे नैन मुसकात। राति रमी रति देत कहि औरे प्रभा प्रभात।—बिहारी (शब्द०)। ३. प्रीती। प्रेम। अनुराग। मुहब्बत। क्रि० प्र०—करना।—जोड़ना।—लगाना।—होना। ४. शोभा। छबि। उ०—चोटी में लपेटी एक मणि ही सुकाढ़ि दीन्ही दीजो राम हाथ जो बढ़ैया तेरी रति को।—ह्वदयराम (शब्द०)। ५. सौभाग्य। खुशकिस्मती। ६. साहित्य में शृंगार रस का स्थायी भाव। नायक नायिका की परस्पर प्रीति या प्रेम। ७. वह कर्म जिसका उदय होने से किसी रमणीक वस्तु से मन प्रसन्न होता है। (जैन)। ८. गुप्त भेद। रहस्य। ९. चंद्रमा की छठी कला (को०)।

रति पु (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'रत्ती'।

रति (३)
क्रि० वि० दे० 'रती'। उ०—कत सकुचत निधरक फिरौ रतियौ खोरि तुम्हैं न। कहा करौ जो जाहिं ये लगैं लगौहैं नैन।—बिहारी (शब्द०)।

रति पु (४)
संज्ञा स्त्री० [हिं० रात] रात। रात्ति। रैन। उ०—सही रँगीले रति जगे जगी पगी सुख चैन। अलसौहै सौहै किए कहैं हँसौंहैं नैन।—बिहारी (शब्द०)। विशेष—केवल समस्त पदों ही इस शब्द का इस रूप में व्यवहार होता है। जैसे, रतिवाह।

रतिकंत पु
संज्ञा पुं० [सं० रतिकान्त] दे० 'रतिकांत'। उ०—नव रसाल के पौन लगि डोलत डारन मौर। जनु बसंत रतिकंत पर झुकि झुकि ढारत चौर।—स० सप्तक, पृ० ३६५।

रतिक पु †
क्रि० वि० [हिं० रत्ती + क (प्रत्य०)] रत्ती भर। बहुत थोड़ा। जरा सा। उ०—नेरे चलि आय छलि मेरे मुख पंकज को परसै निसंक नहि संक करै रतिको।—दीनदयाल (शब्द०)।

रतिकर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. कामी। २. एक प्रकार की समाधि।

रतिकर (२)
वि० १. जिसमें आनंद को वृद्धि हो। २. जिससे प्रेम की वृद्धि हो।

रतिकर्म
संज्ञा पुं० [सं० रतिकर्मन्] संभोग। मैथुन [को०]।

रतिकलह
संज्ञा पुं० [सं०] १. मैथुन। संभोग। विलास। २. रति- कालीन मान मनौवल।

रतिकांत
संज्ञा पुं० [सं० रतिकान्त] कामदेव।

रतिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] ऋपभ स्वर की तीन श्रुतियों में से अंतिम श्रुति। (संगीत)।

रतिकहर
संज्ञा पुं० [सं०] योनि। भग।

रतिकेलि
संज्ञा स्त्री० [सं०] भोगविलास। संभोग। रतिक्रीड़ा।

रतिक्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] मैथुन। संभोग।

रतिक्रिड़ा
संज्ञा स्त्री० [सं० रतिक्रीडा] दे० 'रतिकेलि'।

रतिखेद
संज्ञा पुं० [सं०] संभोगजनित अवसाद या क्लांति [को०]।

रतिगर †
क्रि० वि० [हिं० रात + गर ?] प्रातःकाल। बड़े तड़के। सबेरे।

रतिगृह
संज्ञा पुं० [सं०] १. योनि। भग। २. वेश्यालय। चकला- खाना (को०)। ३. रातभवन। केलिगृह (को०)।

रतिज्ञ
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो रतिक्रिया में चतुर हो। २. वह जो किसी स्त्री के मन में अपने प्रति प्रेम उत्पन्न करने में निपुण हो।

रतितस्कर
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो स्त्रियों को अपने साथ व्यभिचार करने में प्रवृत्त करता हो।

रतिताल
संज्ञा पुं० [सं०] संगीत में ताल के साठ मुख्य भेदों में से एक भेद।

रतिदान
संज्ञा पुं० [सं०] संभोग। मैथुन। उ०—रघुनाथ ऐसो भेस धरे प्रानप्यारो आयो प्रात कहुं बसी राति दीन्हे रतिदान को।—रघुनाथ (शब्द०)।

रतिदेव
संज्ञा पुं० [सं०] १. विष्णु। २. एक चंद्रवंशीय राजा का नाम जो सांकृति के पुत्र थे। ३. कुत्ता। श्वान।

रतिधन
संज्ञा पुं० [सं०] वह अस्त्र जिससे दूसरे अस्त्रों का नाश होता हो।

रतिनाग
संज्ञा पुं० [सं०] कामशास्त्र के अनुसार सोलह प्रकार के रतिबंधा में से एक प्रकार का रतिबंध।

रतिनाथ
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव।

रतिनायक
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव। उ०—(क) न डगैं न भगैं जिय जानि सिलीमुख पंच धरे रतिनायक है।—तुलसी (शब्द०)।(ख) काहे दुरवाति है सजनी रतिनायक सायक एही कहे हैं।— मन्नालाल (शब्द०)।

रतिनाह पु
संज्ञा पुं० [सं० रतिनाथ] कामदेव।

रतिपति
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव।

रतिपद
संज्ञा पुं० [सं०] एक वृत्त का नाम जिसके प्रत्येक चरण में दो नगण और एक सगण (/?//?//?/) होता है। जैसे— न निसि घर तजि घरी। कबहुँ जग कुल नारी। धरति पद पर धरा। सुमतियुत सतिवरा।

रतिपाश
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'रतिपाशक'।

रतिपाशक
संज्ञा पुं० [सं०] कामशास्त्र के अनुसार एक प्रकार का रतिबंध जिसे रातनाग भी कहते हैं।

रतिप्रिय (१)
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव।

रतिप्रिय (२)
वि० जिसे मैथुन बहुत प्रिय हो।

पतिप्रिया (१)
वि० [सं०] (स्त्री) जिसे मैथुन बहुत प्रिय हो।

रतिप्रिया (२)
संज्ञा स्त्री० १. तांत्रिकों के अनुसार शक्ति की एक मूर्ति का वाग। २. दाक्षायिणी का एक नाम।

रतिप्रीता
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह नायिका जिसका रति में प्रेम हो। मैथुन से प्रसन्न होनेवाली स्त्री। कामिनी।

रतिफल
वि० [सं०] जिससे रति में आनंद मिले। जिससे रति की जा सके। कामोतेजक। (ओषधि आदि)।

रतिबंध
संज्ञा पुं० [सं० रतिबन्ध] मैथुन या संभोग करने का ढंग या प्रकार, जिसे आसन भी कहते है।

रतिबाह पु
संज्ञा पुं० [सं० रात्रि + वाह] रात की लड़ाई रात्रियुद्ध। उ०—बर बीरह रघुवंस राम रतिबाह उचारिय।—पृ० रा०, ६६।४८३।

रतिबंधु
संज्ञा पुं० [सं० रतिबन्धु] १. प्रेमी। २. पति [को०]।

रतिभवन
संज्ञा पुं० [सं०] १. योनि। भग। २. वह स्थान जहाँ प्रेमी और प्रेमिका मिलकर रतिक्रीड़ा करते हों। ३. वेश्यागार (को०)।

रतिभाव
संज्ञा पुं० [सं०] १. नायक नायिका का परस्पर प्रेम। दांपत्य भाव। (यह शृंगार रस का स्थायी भाव है)। २. प्रीति। प्रेम। मुहब्बत। स्नेह।

रतिभौन पु
संज्ञा पुं० [सं० रतिभवन] १. रतिक्रीड़ा करने का स्थान। उ०—सपनहू न लख्या निसि में रतिभौन ते गौन कहूँ निज पी को।—पद्माकर (शब्द०)। २. दे० 'रतिभवन'।

रतिमंदिर
संज्ञा पुं० [सं० रतिमन्दिर] १. योनि। भग। २. मैथुन गृह। वेश्यालय (को०)। ३. दे० 'रातभवन'। उ०—रतिमांदर के मनि पुंजाने मैं प्रतिविबाने आपने हेरी करै।—मन्नालाल (शब्द०)।

रतिमदा
संज्ञा स्त्री० [सं०] अप्सरा।

रतिमित्र
संज्ञा पुं० [सं०] कामशास्त्र के अनुसार एक प्रकार का रतिबंध या आसन।

रतियाना पु †
क्रि० अ० [हिं० रति (= प्रीति) + आना (प्रत्य०)] प्रीति करना। रत होना। प्रेम करना। अनुरक्त होना। उ०—राम नाम अनुराग ही जो रतियाती। स्वारथ परमारथ पथी तोहि सब परियाती।—तुलसी (शब्द०)।

रतिरमण
संज्ञा पुं० [सं०] १. कामदेव। २. मैथुन। उ०—करै और सों रतिरमण इक धन ही के हेत। गणिका ताहि बखानिहहीं जे कवि सुमति निकेत।—पद्माकर (शब्द०)।

रतिरस
संज्ञा पुं० [सं०] संभोगजन्य आनंद। मैथुन का आनंद विषयःनद [को०]।

रतिराई पु
संज्ञा पुं० [सं० रतिराज, प्रा० रति + राइ] कामदेव।

रतिरांज
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव।

रतिलंपट
वि० [सं० रतिलम्पट] कामुक। कामी [को०]।

रतिलक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] मैथुन। प्रसंग [को०]।

रतिलील
संज्ञा पुं० [सं०] संगीत में ताल के साठ मुख्य भेदों में से एक।

रतिलोल
संज्ञा पुं० [सं०] एक राक्षस का नाम।

रतिवंत पु
वि० [सं० रति +हिं० वंत (प्रत्य०)] सुंदर। खूबसूरत। उ०—कोदंडग्राही सुभट को, को कुमार रतिवंत। को कहिए शशि ते दुखी कोमल मन को संत।—केशव (शब्द०)।

रतिवर
संज्ञा पुं० [सं०] १. कामदेव। २. वह भेंट जो किसी स्त्री को उससे रति करने के अभिप्राय से दी जाय।

रतिवर्द्धन
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जिससे कामशक्ति बढ़ती हो। २. वैद्यक में एक प्रकार का मोदक जो गोखरू, असगंध, शतमूली, तालमूली और जेठी मधु आदि के योग से बनता है और पुष्टिकारक माना जाता है।

रतिवल्ली
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रेम। प्रीति। मुहब्बत।

रतिवाह पु †
संज्ञा पुं० [सं० रात्रि, हिं० रात + वाह] रात्रियुदध। रात की लड़ाई। रात्रिसंग्राम। उ०—म्हें गामी गुज्जर गल्हियाँ इंसाई हंसाइयाँ। रतिवाह देहु सुरतान दल रखि राजन लगि पाइयाँ।—पृ० रा०, ६६।४८७।

रतिवाही
संज्ञा पुं० [सं० रतिवाहिन्] एक प्रकार का राग जिसका गान समय रात को १६ दंड से २० दंड तक है। यह संपूर्ण जाति का राग है और इसमें सब शुद्ध स्वर लगते हैं।

रतिशक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] कामशक्ति। संभोग की क्षमता [को०]।

रतिशास्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] वह शास्त्र जिसमें रति की क्रियाओं का विवेचन हो। कोकशास्त्र। कामशास्त्र।

रतिशूर
संज्ञा पुं० [सं०] संभोगक्षम व्यक्ति। संभोग में अत्यधिक समर्थ व्यक्ति [को०]।

रतिसंयोग
संज्ञा पुं० [सं०] संभोग। प्रसंग [को०]।

रतिसंहित
वि० [सं०] प्रणययुक्त। प्रीति युक्त। प्रणय की अधिकता से युक्त [को०]।

रतिसत्वरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्पृक्का। असबरग।

रतिसमर
संज्ञा पुं० [सं०] संभाग। मैथुन।

रतिसर्वस्व
संज्ञा पुं० [सं०] रतिजन्य उत्कृष्टतम आनंद।

रतिसाधन
संज्ञा पुं० [सं०] पुरुष की मूर्त्रद्रिय। लिंग। शिश्न।

रतिसुंदर
संज्ञा पुं० [सं० रतिसुन्दर] कामशास्त्र के अनुसार एक प्रकार का रतिबंध।

रती पु † (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० रति] १. कामदेव की पत्नी। रति। उ०—बात की बानी माँह भाव सो भवानी माँह केशोदास रति में रती की ज्योति जानवी।—केशव (शब्द०)। २. सौंदर्य। शोभा। उ०—कहै पदमाकर पताका प्रेम पूरण की प्रगट पतिव्रत की सौगुनी रती भई।—पद्माकर (शब्द०)। ३. मैथुन। संभोग। उ०—दर्भ धरे तनया कर साथ विदर्भ पती। अर्पन तू करिहै जबहीं तब होय रती।—गोपाल। ४. दे० 'रति'। ५. तेज। कांति। उ०—बेद लोक सब साखी काहू की रती न राखी रावन की बंदि लागे अमर मरन।—तुलसी (शब्द०)।

रती पु † (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० रत्ती] १. घुर्घची। गुंजा। २. ढाई जौ या आठ चावल का मान। वि० दे० 'रत्ती'।

रती (३)
वि० थोडा़। कम। अल्प।

रती (४)
क्रि० वि० जरा सा। रत्ती भर। किंचित्। उ०—नाम प्रताप हंस पर छाजै। हंसहिं भार रती नहिं लागै।—कबीर (शब्द०)।

रतीक पु
क्रि० वि० [हिं० रतिक] जरा सा भी। रत्ती भर भी। तिल भर भी।

रतीश
संज्ञा पुं० [सं०] रति के देवता। कामदेव [को०]।

रतुआ †
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की घास जो बरसात के दिनों या ठंढी जगहों में अधिकता से होती है।

रतू (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. द्युलोक की नदी। दिव्य नदी। २. सत्य कथन। तथ्यपूर्ण उक्ति [को०]।

रतू (२)
वि० [सं०] सत्यवक्ता। ऋतवक्ता [को०]।

रतून †
संज्ञा पुं० [देश०] पेड़ी की ईख या गन्ना, जो एक बार काट लेने पर फिर उसी जड़ से निकलता है।

रतोपल पु † (१)
संज्ञा पुं० [सं० रक्तोत्पल] लाल कमल। उ०—कहि कंकण नेक भए दृग शीतल संपत देख रतीपल को।—हृदयराम (शब्द०)।

रतोपल (२)
संज्ञा पुं० [सं० रक्तोपल] १. लाल सुरमा। २. लाल खड़िया। ३. गेरू। गैरिक।

रतौंधी
संज्ञा स्त्री० [सं० राञ्यन्धता ? वा हिं० रात + औंधी (= अंधता)] एक प्रकार का रोग जिसमें रोगी को सध्या होने के उपरांत, अर्थात् रात के समय, बिलकुल दिखाई नहीं देता। उ०—पौरिए रतौंधी आवै सखो सबै सोय रहीं जागत न कोऊ परदेस मेरो बर है।—प्रतापनारायण (शब्द०)।

रतौहाँ पु
वि० [हिं० रत + औहाँ (प्रत्य०)] रक्तिम। लालिमायुक्त। रागयुक्त। जैसे, रतौहें नैन।

रत्त पु
संज्ञा पुं० [सं० रक्त, प्रा०, रत्त] दे० 'रक्त'।

रत्तक
संज्ञा पुं० [सं० रक्तक, प्रा० रत्त] ग्वालियर में होनेवाला एक प्रकारर का पत्थर जो कुछ लाल रंग का होता है।

रत्ती (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० रक्ति द्दा, प्रा० रत्तीश्र] १. एक प्रकार का बहुत छोटा मान, जिसका व्यवहार सोने या ओधिषयों आदि के तौलने में होता है। यह आठ चावल या ढाई जौ के बराबर होता है और प्रायः र्घुघची के दाने से तौला जाता है। यह एक माशे का आठवाँ भाग होता है। २. वह बाट जो तौल में इतने मान का हो। ३. र्घुघची का दाना। गुंजा।

रत्ति पु (२)
वि० बहुत थोड़ा। किंचित्। मुहा०—रत्तीभर = बहुत थोड़ा सा। जरा सा।

रत्ति पु (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० रति] शोभा। छवि। उ०—बत्ती बटि कसी पाग कत्ती सिर टेढ़ी लसै बढ़ी मुख रत्ती जैसे पत्ती जदुपति के।—गोपाल (शब्द०)।

रत्थी
संज्ञा स्त्री० [सं० रथ] लकड़ी या बाँस का वह ढाँचा या संदूक आदि जिसमें शव को रखकर अंतिम संस्कार के लिये ले जाते हैं। टिकठी। विमान। अरथी।

रत्न
संज्ञा पुं० [सं०] १. कुछ विशिष्ट छोटे, चमकीले, बहुमूल्य पदार्थ, विशेषतः खनिज पदार्थ या पत्थर, जिनका व्यवहार आभूषणों आदि में जड़ने के लिये होता है। मणि। जवाहिर। नगीना। जैसे,—हीरा, लाल, पन्ना, मानिक, मोती आदि। विशेष—हमारे यहाँ हीरा, पन्ना, पुखराज, मानिक, नीलम, गोमेद, लहसुनियाँ, मोती, और मूँगा ये नौरत्न माने गए हैं। कहीं इनकी संख्या पाँच और कहीं चौदह भी कहीं गई है। जैसे, पंचरत्न, नवरत्न, समुद्रमंथनोदुभूत चतुर्दश रत्न। इसके अतिरिक्त पुराणों आदि में भी अनेक रत्न गिनाए गए है, जिनमें से कुछ वास्तविक और कुछ कल्पित हैं। जैसे—गंधशस्य, सूर्यकांत, चंद्रकांत, स्फटिक, ज्योतिरस, राजपट्ट, शंख, सीसा, भुजंग, उत्पल आदि। रत्न धारण करना हमारे यहाँ बहुत पुण्यजनक कहा गया है। ग्रहों आदि का उप्तात होने पर रत्न पहनने और दान करने का विधान है। वैद्यक में इन रत्नों से भी भस्म बनाई जाती है, और अलग अलग रत्नों की भस्म का अलग अलग गुण माना जाता है। २. माणिक्य। मानिक। लाल। विशेष—कविता में कभी कभी रत्न शब्द से मानिक का हीं ग्रहण होता है। ३. वह जो अपने वर्ग या जाति में सबसे उत्तम हो। सर्वश्रेष्ठ। जैसे, नररत्न, ग्रंथरत्न आदि। ४. जैनों के अनुसार सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र। ५. पानी। जल (को०)। ६. अयस्कांत चुंबक (को०)।

रत्नकंदल
संज्ञा पुं० [सं० रत्नकन्दल] प्रवाल। मूँगा।

रत्नकर
संज्ञा पुं० [सं०] कुबेर का एक नाम।

रत्नकणिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्राचीन काल का कान में पहनने का एक प्रकार का जड़ाऊ गहना।

रत्नकार
संज्ञा पुं० [सं० रत्न] जौहरी। रत्नों का पारखी।

रत्नकीर्ति
संज्ञा पुं० [सं०] एक बुद्ध का नाम।

रत्नकुंभ
संज्ञा पुं० [सं० रत्नकुम्भ] रत्नों से निर्मित घड़ा [को०]।

रत्नकूट
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक पर्वत का नाम। २. एक बोधिसत्व का नाम।

रत्नकेतु
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक बुद्ध का नाम। २. एक बोधिसत्व का नाम।

रत्नखचित
वि० [सं०] जो रत्ननिर्मित हो। रत्नजटित। जिसमें रत्न जड़े हों [को०]।

रत्नगर्भ
संज्ञा पुं० [सं०] १. कुबेर का एक नाम। २. समुद्र। ३. एक बुद्ध का नाम।

रत्नगर्भा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पृथ्वी। भूमि। वसुंधरा।

रत्नगिरि
संज्ञा पुं० [सं०] १. बिहार के एक पहाड़ का प्राचीन नाम, जिस पर मगध देश की पुरानी राजधानी राजगृह बसी हुई थी। २. वैद्यक में एक प्रकार का रस जो अभ्रक, सोने, ताँबे, गंधक और लोहे आदि से तैयार किया जाता है और जो ज्वर के लिये बहुत उपकारी माना गया है।

रत्नगृह
संज्ञा पुं० [सं०] बौद्ध स्तूप की वह बीच की कोठरी जिसमें धातु आदि रक्षित रहती थी।

रत्नचंद्र
संज्ञा पुं० [सं० रत्नचंद्र] १. एक देवता जो रत्नों के अधिष्ठाता माने जाते हैं। २. एक बोधिसत्व का नाम।

रत्नचूड़
संज्ञा पुं० [सं० रत्नचूड़] एक बोधिसत्व।

रत्नच्छाया
संज्ञा स्त्री० [सं०] रत्नों की चमक दमक [को०]।

रत्नतल्प
संज्ञा पुं० [सं०] रत्नखचित शख्या। वह पलंग जिसमें रत्न जड़े हों [को०]।

रत्नत्रय
संज्ञा पुं० [सं०] १. जैनों के अनुसार सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र, इन तीनो का समूह जो मनुष्य को उत्कृष्ठ बनानें का साधन समझा जाता है। २. बौद्धों के अनुसार बुद्ध, धर्म तथा संघ, (को०)।

रत्नदर्पण
संज्ञा पुं० [सं०] जड़ाऊ आईना [को०]।

रत्नदामा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. रत्नों को माला। २. गर्गसंहिता के अनुसार सीता की माता और राजा जनक की स्त्री का नाम।

रत्नदीप
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक कल्पित रत्न का नाम। कहते हैं, पाताल में इसी के प्रकाश से उजाला रहता है। २. रत्न का दीपक।

रत्नद्रुम
संज्ञा पुं० [सं०] मूँगा।

रत्नद्वीप
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुराणानुसार एक द्वीप का नाम। २. रत्नों का द्बीप। प्रवाल द्वीप।

रत्नधर
संज्ञा पुं० [सं०] धनवान्। अमीर।

रत्नधार
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार एक पर्वत का नाम।

रत्नधारा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुराणानुसार एक नदी का नाम।

रत्नधेनु
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुराणानुसार रत्नों की बनाई हुई वह गाय जो दान की जाती है। विशेष—इस दान की गणना महादानों में की जाती है और इस प्रकार का दान करनेवाला गोलोक का अधिकारी समझा जाता है।

रत्नध्वज
संज्ञा पुं० [सं०] एक बोधिसत्व का नाम।

रत्ननख
संज्ञा पुं० [सं०] वह कृपाण या छुरी या कटार जिसकी मूठ में रत्न जड़े हों [को०]।

रत्ननाभ
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु।

रत्ननायक
संज्ञा पुं० [सं०] १. खंजन पक्षी। ममोला। २. समुद्र। ३. मेरु पर्वत। ४. विष्णु।

रत्ननिधि
संज्ञा पुं० [सं०] माणिक्य। लाल [को०]।

रत्नपंचक
संज्ञा स्त्री० [सं० रत्नपञ्चक] पाँच प्रकार के रत्नों का समुच्चय जिसमें सोना, चाँदी, मोती, राजावर्त और मूँगा आते हैं।

रत्नपरीक्षक
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो रत्नों को परखना जानता हो। जौहरी।

रत्नपर्वत
संज्ञा पुं० [सं०] सुमेरु पर्वत का एक नाम।

रत्नपाणि
संज्ञा पुं० [सं०] एक बोधिसत्व का नाम।

रत्नपारखी पु
संज्ञा पुं० [हिं० रत्न + पारखी] रत्नों के पहचाननेवाला। जौहरी।

रत्नपारायण
संज्ञा पुं० [सं०] रत्नों से परिपूरित स्थान। रत्नों की खान [को०]।

रत्नपीठ
संज्ञा पुं० [सं०] तांत्रिकों के अनुसार एक तीर्थ का नाम।

रत्नप्रदीप
संज्ञा पुं० [सं०] ऐसा रत्न जो दीपक के समान प्रकाश- मान हो।

रत्नप्रभ
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का देवता।

रत्नप्रभा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पृथ्वी। २. जैनों के अनुसार एक नरक का नाम।

रत्नबाहु
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु।

रत्नमाला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. राजा बलि की कन्या। विशेष—वामन भगवान् को देखकर इसके मन में यह कामना हुई थी कि ऐसे बालक को मैं दूध पिलाऊँ। इसीलिये यह कृष्णा- वतार में पूतना हुई थी। २. मणियों की माला या हार।

रत्नमाली
संज्ञा पुं० [सं० रत्नमालिन्] पुराणानुसार एक प्रकार के देवता।

रत्नमुकट
संज्ञा पुं० [सं०] एक बोधिसत्व का नाम।

रत्नमुख्य
संज्ञा पुं० [सं०] वज्र। हीरा [को०]।

रत्नराज
संज्ञा पुं० [सं०] माणिक्य [को०]।

रत्नराशि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. हीरा जवाहरातों का ढेर। २. सागर। समुद्र [को०]।

रत्नवती
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पृथ्वी। भूमि। २. राजा वीरकेतु की कन्या का नाम।

रत्नवर
संज्ञा पुं० [सं०] स्वर्ण। सोना [को०]।

रत्नवर्षुक
संज्ञा पुं० [सं०] पुष्पक विमान [को०]।

रत्नशाला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. रत्नों के रखने का स्थान। २. जड़ाऊ महल, जिसकी दीवारों में रत्न जड़े हों।

रत्नषष्ठी
संज्ञा स्त्री० [सं०] ग्रीष्म ऋतु की एक छठ जिस दिन व्रत रहते हैं [को०]।

रत्नसंभव
संज्ञा पुं० [सं० रत्नसम्भव] १. एक ध्यानी बुदध का नाम। २. एक बोधिसत्व का नाम।

रत्नसागर
संज्ञा पुं० [सं०] समुद्र का वह भाग जहाँ से प्रायः रत्न निकलते हों।

रत्नसानु
संज्ञा पुं० [सं०] सूमेरु पर्वत का एक नाम।

रत्नसू, रत्नसूति
संज्ञा स्त्री० [सं०] पृथ्वी।

रत्ना
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुराणानुसार एक नदी का नाम।

रत्नाक
संज्ञा पुं० [सं० रत्नाङ्क] विष्णु [को०]।

रत्नांग
संज्ञा पुं० [सं०] रत्नकंदल। प्रवाल [को०]।

रत्नाकर
संज्ञा पुं० [सं०] १. समुद्र। २. मणियों के निकलने का स्थान। खान। ३. रत्नों का समूह। उ०—रत्नाकर के हैं दोऊ केशव प्रकाशकर अंबर विलास कुवलय हित मानिए।—केशव (शब्द०)। ४. वाल्मीकि मुनि का पहले का नाम। ५. भगवान् बुदुध का एक नाम। ६. एक बोधिसत्व का नाम।

रत्नागिरि
संज्ञा पुं० [सं० रत्नगिरि] दे० 'रत्नगिरि'।

रत्नाचल
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार रत्नों का वह ढेर जो पहाड़ के रूप में लगाकर दान किया जाता है और जिसका दान करने से दाता स्वर्ग का अधिकारी समझा जाता है।

रत्नाद्रि
संज्ञा पुं० [सं०] एक पर्वत का नाम।

रत्नाधिपति
संज्ञा पुं० [सं०] कुबेर।

रत्नाभूषण
संज्ञा पुं० [सं०] वह आभूषण या गहना जिसमें रत्न जड़े हों। जड़ाऊ गहना।

रत्नावली
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मणियों की श्रेणी या माला। २. एक रागिनी जा शास्त्रों में दीपक राग की पुत्रवधू कही गइ है। ३. एक अर्थालंकार जिसमें प्रस्तुत अर्थ निकलने के अतिरिक्त ठीक क्रम से कुछ आर वस्तुसमूह के नाम भी निकलते हैं। जैसे—आदित सोम कहौ कबहूँ, कबहूँ कहौ मंगल औ बुध होते। ४. एक प्रकार का हार। मोतियों का हार। ५. श्राहर्ष रचित एक नाटिका।

रत्नोत्तमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] तांत्रिको की एक देवी का नाम।

रत्नाल्का
संज्ञा स्त्री० [सं०] तांत्रिको के अनुसार एक देवी का नाम।

रत्यंग
संज्ञा पुं० [सं० रत्यङ्ग] योनि। भग [को०]।

रथंकर
संज्ञा पुं० [सं० रथङ्कर] १. एक कल्प का नाम। २. एक प्रकार का साम। ३. एक प्रकार की अग्नि।

रथ
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्राचीन काल की एक प्रकार की सवारी जिसमें चार या दो पहिए हुआ करते थे और जिसका व्यवहार युद्ध, यात्रा, विहार आदि के लिये हुआ करता था। शतांग। स्यंदन। गाड़ी। बहल। २. शरीर, जो आत्मा की सवारी माना जाता है। ३. चरण। पैर। ४. तिनिस का पेड़। ५. विहार करने का स्थान। क्रीडा़स्थल। ६. शतरंज का वह मोहरा जिसे आजकल ऊँट कहते हैं। उ०—राजा कील देइ शह माँगा। शह देइ चाह भरे रथ खाँगा।—जायसी (शब्द०)। विशेष—जब चतुरंग का पुराना खेल भारत से फारस और अरब गया, तब वहाँ रथ के स्थान पर ऊँट हो गया। ७. बेत। बेतस् (को०)। ८. आनंद (को०)। ९. हिस्सा। भाग। अंग (को०)। १०. वीर। रथी (को०)।

रथकट्या, रथवड्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] रथों का जमादार [को०]।

रथकल्पक
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्राचीन काल का वह अधिकारी जिसकी अधीनात में राजाओं के रथ आदि रहते थे। २. प्राचीन काल के धनवानों का वह प्रधान अधिकारी जो उनके घर आदि सजाता है और उनके पहनने के वस्त्र आदि रखता है।

रथकार, रथकारक
संज्ञा पुं० [सं०] रथ बनानेवाला। खाती। बढ़ई। २. एक जाति जिसकी उत्पत्ति माहिष्य (क्षत्री से वैश्या से उत्पन्न) पिता और करिणी (वैश्य से शूद्रा में उत्पन्न) माता से मानी गई है। इसमें जनेऊ आदि संस्कार होते हैं।

रथकुटुंब
संज्ञा पुं० [सं० रथकुटुम्ब] दे० 'रथकुटुंबिक'।

रथकुटुंबिक
संज्ञा पुं० [सं० रथकुटुम्बिक] वह जो रथ चलाता हो। रथवान। सारथी।

रथकुटुंबी
संज्ञा पुं० [सं० रथकुटुम्बिन्] दे० 'रथकुटुंबिक'।

रथक्रांत
संज्ञा पुं० [सं० रथक्रान्त] संगीत में एक प्रकार का ताल।

रथक्रांता
संज्ञा स्त्री० [सं० रथक्रान्ता] एक प्राचीन जनपद का नाम।

रथगर्भक
संज्ञा पुं० [सं०] रथ के आकार की वह सवारी जिसे मनुष्य कंधे पर उठाकर ले चलते हों। जैसे, पालकी, नालकी आदि।

रथगुप्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] रथ के किनारे लगा हुआ लकड़ी या लोहे का वह ढाँचा जो शस्त्र आदि से रक्षा के लिये होता था।

रथचरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. चक्रवाक। चकवा। २. रथ का चक्का (को०)। ३. विष्णु का चक्र। सुदर्शन चक्र (को०)। ४. लाल कलहंस (को०)। ५. रथ द्वारा यात्रा करना।

रथचर्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] रथ से यात्रा करना। रथ से यात्रा करने का अभ्यास करना [को०]।

रथचर्यासंचार
संज्ञा पुं० [सं० रथचर्यासञ्चार] रथों के चलने की पक्की सड़क। विशेष—यह खजूर की लकड़ी या पत्थर की बनाई जाती थी। चंद्रगुप्त के समय में इसका विशेष रूप से प्रचार था।

रथचित्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्राचीन नदी का नाम।

रथज्वर
संज्ञा पुं० [सं०] कौआ। काक [को०]।

रथद्रु
संज्ञा पुं० [सं०] १. तिनिश का पेड़। २. बेंत।

रथनीड़
संज्ञा पुं० [सं० रथनीड] रथ के भीतर बैठने की जगह [को०]।

रथपति
संज्ञा पुं० [सं०] रथ का नायक। रथी।

रथपर्याय
संज्ञा पुं० [सं०] १. तिनिश का पेड़। २. बेंत।

रथपाद
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'रथचरण'।

रथपुंगव
संज्ञा पुं० [सं० रथपुङ्गव] उत्कृष्ट योद्धा [को०]।

रथप्सा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्राचीन नदी का नाम।

रथबंध
संज्ञा पुं० [सं० रथबन्ध] १. रथ के उपकरण। घोड़े का साज समान। २. वीरों का संघटन [को०]।

रथमहोत्सव
संज्ञा पुं० [सं०] रथयात्रा नामक उत्सव। विशेष दे० 'रथयात्रा'।

रथमुख
संज्ञा पुं० [सं०] रथ का अग्रभाग वा अगला हिस्सा [को०]।

रथयात्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] हिंदुओं का एक पर्व या उत्सव जो आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को होता है। विशेष—इसमें लोग प्रायः जगन्नाथ, बलराम और सुभद्राजी की मूतियाँ रथ पर चढ़ाकर निकालते हैं। यह उत्सव बहुत प्राचीन काल से होता है; और पुरी में बहुत धुमधाम से होता है। बौद्ध और जैन लोगों में भी रथयात्रा का उत्सव होता है, जिसमें जिन या बुद्ध सवारी निकाली जाती है।

रथयुद्ध
संज्ञा पुं० [सं०] रथ पर सवार होकर किया जानेवाला संग्राम।

रथयोजक
संज्ञा पुं० [सं०] रथ जोतने या सज्जित करनेवाला व्यक्ति। सारथि [को०]।

रथवर्त्म
संज्ञा पुं० [सं० रथवर्त्मन्] राजपथ। मुख्य सड़क। राजमार्ग [को०]।

रथवान्
संज्ञा पुं० [सं०] रथ हाँकनेवाला। सारथी।

रथवाह
संज्ञा पुं० [सं० रथवाह] १. रथ चलानेवाला। सारथी। २. घोड़ा। उ०—राज तुरगम बरनौ काहा। आने छोरि इंद्र रथवाहा।—जायसी (शब्द०)।

रथवाहन
संज्ञा पुं० [सं०] रथ में का वह चौकोर ऊपरी ढाँचा जो पहियों के ऊपर जड़ा होता है।

रथवीथि
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'रथवर्त्म'।

रथशाला
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्थान जहाँ रथ रखे जाते हों। गाड़ीखाना। अस्तबल।

रथशास्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] रथ हाँकने की कला [को०]।

रथशिक्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'रथशास्त्र'।

रथसप्तमी
संज्ञा स्त्री० [सं०] माध शुक्ला सप्तमी। विशेष—कहते हैं, सूर्य इसी दिन रथ पर सवार होते हैं; इसी लिये इसका यह नाम पड़ा है।

रथसूत
संज्ञा पुं० [सं०] रथ हाँकनेवाला। सारथी।

रथांग
संज्ञा पुं० [सं० रथाङ्ग] १. रथ का पहिया। उ०—पारथ की कानि गनि भीषम भहारथ कीं, मानि जब बिरथ रथांग धरि धाए हैं।—रत्नाकर, भाग १. पृ०। २. चक्र नामक अस्त्र। ३. चक्रवाक पक्षी। चकवा। उ०—पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर।—मानस, २।८३।

रथांगधर
संज्ञा पुं० [सं० रथाङ्गधर] १. श्रीकृष्ण। २. विष्णु।

रथांगपाणि
संज्ञा पुं० [सं० रथाङ्गपाणि] विष्णु।

रथांगवर्ती
संज्ञा पुं० [सं० रथाङ्गवर्तिन्] चक्रवर्ती सम्राट्।

रथांगी
संज्ञा स्त्री० [सं० रथाङ्गी] ऋद्धि नामक ओषधि।

रथाक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक का पहिया या धुरा। २. प्राचीन काल का एक परिमाण जो एक सौ चार अंगुल का होता था। ३. कार्तिकेय के एक अनुचर का नाम।

रथाग्र
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो बहुत बड़ा योद्धा हो।

रथाभ्र
संज्ञा पुं० [सं०] बेंत।

रथावर्त्त
संज्ञा पुं० [सं०] एक तीर्थ का नाम।

रथिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो रथ पर सवार हो। रथी। २. तिनिश का पेड़।

रथी (१)
संज्ञा पुं० [सं० रथिन्] १. वह जो रथ पर चढ़कर चलता हो। २. रथ पर चढ़कर लड़नेवाला। रथवाला योद्धा। यौ०—महारथी। अतिरथी। ३. एक हजार योद्धओं से अकेला युद्ध करनेवाला योद्धा। उ०— पूरण प्रकृति सात धीर हैं विख्यात रथी महारथी अतिरथी रणसजि के।—रघुराज (शब्द०)। ४. क्षत्रिय जाति का मनुष्य (को०)। ५. सारथी (को०)।

रथी (२)
वि० रथ पर सवार। रथ पर चढ़ा हुआ। उ०—रावन रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा।—तुलसी (शब्द०)।

रथी (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० रथ] वह ढाँचा जिसपर मुरदों को रखकर अंत्येष्टि क्रिया के लिये ले जाते हैं। अरथी। टिकठी। ताबूत।

रथोत्सव
संज्ञा पुं० [सं०] रथयात्रा नामक उत्सव।

रथोद्धता
संज्ञा स्त्री० [सं०] ग्यारह अक्षरों का एक वर्णवृत्त जिसका पहला, तीसरा, सातवाँ, नवाँ, और ग्यारहवाँ वर्ण गुरु और बाकी वर्ण लघु होते हैं। अर्थात् इसके प्रत्येक चरण में र, न, र, ल, ग, (/?//?//?/) होता है। उ०—रानि ! री लगत राम को पता। हाय ना कहहिं नाहिं आरता। धन्य जो लहत भाग शुद्धता। धूरि हू अति शुची रथोद्धता।—छंदः- प्रभाकर (शब्द०)।

रथोरग
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्राचीन जाति का नाम जिसका उल्लेख महाभारत में है।

रथोष्मा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुराणानुसार एक नदी का नाम।

रथ्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह घोड़ा जो रथ में जोता जाता हों। २. वह जो रथ चलाता हों। ३. चक्र। चाका। पहिया।

रथ्या
संज्ञा स्त्री० [स्त्री०] १. रथों का समूह। २. रथ का मार्ग या लकीर। ३. रास्ता। सड़क। ४. चौक। आँगन। ५. नाली। नाबदान। उ०—कहाँ देवसरि कलुष बिनासी। कहँ रथ्या जल अति मल रासी।—द्विज (शब्द०)। ६. सड़कों का एक भेद जिसकी चौड़ाई २० या २१ हात होती थी।

रद (१)
संज्ञा पुं० [सं०] दंत। दाँत। उ०—अधर अरुन रद सुंदर नासा।—मानस, १।१४७।

रद (२)
वि० [अ०] १. नष्ट। खराब। रद्दी। २. तुच्छ या निरर्थक। ३. फोका। मात। उ०—सोहत धोती सेत में कनक बसन तन बाल। सारद बारद बीजु/?/भा रद कीजत लाल।—बिहारी (शब्द०)।

रदच्छद
संज्ञा पुं० [सं०] ओठ। ओष्ठ।

रदछद पु (१)
संज्ञा पुं० [रदच्छद] ओठ। ओष्ठ। उ०—लोचन लोल कपोल ललित अति नासिक को मुक्ता रदछद पर।—सूर (शब्द०)।

रदछद पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० रदक्षत] रति आदि के समय दाँतों के लगने का चिह्न। उ०—पट की ढिग कत ढाँपियत सोभित सुभग सुबेख। हद रदछद छबि देखियत सद रदछद को रेख।— बिहारी (शब्द०)।

रददान
संज्ञा पुं० [सं० रद + दान] (रति के समय) दाँतों से ऐसा दबाव कि चिह्न पड़ जाय। विशेष—यह सात प्रकार की बाह्मा रतियों में से एक है। उ०— आलिंगन चुंबन परस मर्दन नख रददान। अधरपान सो जानिए बहिरति सात सुजान।—केशव (शब्द०)।

रदन
संज्ञा पुं० [सं०] दशन। दाँत। दंत।

रदनच्छद
संज्ञा पुं० [सं०] ओष्ठ। अधर। होंठ।

रदनी (१)
वि० [सं० रदनिन्] दाँतवाला। उ०—चिवुक मध्य मेचक रुचि राजत बिंदु कुंद रदनी।—तुलसी (शब्द०)।

रदनी (२)
संज्ञा पुं० हाथी।

रदपट
संज्ञा पुं० [सं०] ओष्ठ। ओंठ। अधर। उ०—माखे लखन कुटिल भइँ भौहैं। रदपट फरकत नयन रिसौहैं।—तुलसी (शब्द०)।

रदबदल
क्रि० वि० [फ़ा० रद + बदल] परिवर्तन। उलट पलट। हेर फेर। अदल बदल।

रदी
संज्ञा पुं० [सं० रदिन्] हाथी। गज।

रदीफ
संज्ञा स्त्री० [अ० रदीफ़] १. वह व्यक्ति जो घोड़े पर सवार के पीछे बैठता है। २. वह शब्द जो गजलों आदि में प्रत्येक काफिए या अंत्यानुप्रास के बाद बार बार आता है। जैसे,— 'मुझको गले लगा के यह उसका सवाल था। क्यों जी इसी के वास्ते इतना मलाल था'। इसमें सवाल तो काफिया है; और गजल भर में इसी का अनुप्रास मिलाया जायगा; पर 'था' रदीफ है और यह प्रत्येक युग्म पद अथवा शेर के अंत में रहेगा। ३. पीछे की ओर रहनेवाली सेना।

रदीफवार
क्रि० वि० [अं० रदीफ़ + फ़ा० वार] वर्णमाला के क्रम से। अक्षरक्रम से।

रद्द (१)
वि० [अ०] १. जो काट या छाँट दिया गया हो। २. जो तोड़ या बदल दिया गया हो। यौ०—रद्दबदल = परिवर्तन। फेरफार। ३. जो खराब या निकम्मा हो गया हो।

रद्द (२)
संज्ञा स्त्री० कै। वमन।

रद्दा (१)
संज्ञा पुं० [देश०] १. दीवार की पूरी लंबाई में एक बार रखी हुई एक ईंट की जोड़ाई। इँटों की बड़ी बल की एक पंक्ति जो दिवार पर चुनी जाती है। २. मिट्टी की दीवार उठाने में उतना अंश, जितना चारों ओर एक बार में उठाया जाता है और जो कुछ समय तक सूखने कि लिये छोड़ दिया जाता है। इसकी ऊँचाई प्रायः एक हाथ हुआ करती है। क्रि० प्र०—उठाना।—रखना।—होना। ३. थाली में मिठाइयों का चुनाव, जो स्तरों के रूप में नीचे ऊपर होता है। ४. नीचे ऊपर रखी हुई वस्तुओं की एक तह या खंड। क्रि० प्र०—चुनना। ५. कुश्ती में अपने प्रतिपक्षी को नीचे लाकर उसकी गरदन पर कुहनी और कलाई के बीच की हड्डी से रगड़ते हुए आघात करना। (पहलवान)। क्रि० प्र०—जमाना। देना। लगाना। ६. चमड़े की मोहरी जो भालुओं के मुँह पर बाँधी जाती है। (कलंदर)।

रददी (१)
वि [फ़ा० रद] जो बिलकुल खराब हो गया हो। काम में न आने योग्य। निकम्मा। निष्प्रयोजन। बेकार।

रददी (२)
संज्ञा स्त्री० वे कागज आदि जो काम के न होने के कारण फेंक दिए गए हों। जैसे,—यह किताब मैं रद्दी के ढेर में से निकाल लाया हूँ।

रद्दीखाना
संज्ञा [हिं० रद्दी + फ़ा० खानह्] वह स्थान जहाँ खराब और निकम्मी चोजें रखी वा फेंकी जायँ।

रधार †
संज्ञा स्त्री० [देश०] ओढ़ने का दोहरा वस्त्र। दोहर।

रधेरा जाल
संज्ञा पुं० [सं० रन्ध्र (= छेद) + हिं० एरा (प्रत्य०) + जाल] मछली फँसाने के लिये छोटे छेदों का जाल।

रन पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० रण] युद्घ। लड़ाई। संग्राम। उ०—रन चढ़ि करिअ कपट चतुराई।—मानस, ३।१३।

रन पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० अरणय, प्रा० रन्न] जंगल। वन। उ०— बरुनि बान अस ओपहं बेधे रन बन ढाँख।—जायसी (शब्द०)।

रन (३)
संज्ञा पुं० [अं०] १. झोल। ताल। २. समुद्र का छोटा खंड। जैसे, कच्छ का रन। ३. क्रिकेट के बल्लेबाज का एक विकेट से दूसरे विकेट तक की दौड़। दौड़ान।

रनकना पु †
क्रि० अ० [देश० या सं०, रणन (= शब्द करना)] घुँघरू आदि का मंद मंद शब्द होना।

रनछोर
संज्ञा पुं० [हिं० रन + छोड़ना] दे० 'रणछोड़'।

रनजीता पु
वि० [सं० रणजित्] रण जीतनेवाला। विजय प्राप्त करनेवाला। उ०—नवो अंग के साधते उपजै प्रेम अनूप। रनजीता यौ जानिए सब धर्मन का भूप।—चरण० बानी।

रनधीर पु
वि० [सं० रणधीर] रणक्षेत्र में धैर्य धारण करनेवाला। धीर योद्धा। उ०—महाबीर रनधीर तिहिं, जानत सकल जहान।—हम्मीर०, पृ० १।

रनना पु
क्रि० अ० [सं० रणन (= शब्द करना)] बजना। शब्द करना। शब्द होना। झनकार होना। उ०—नयन दहनवत् रनत समद तन लखत अपर जम।—गोपाल (शब्द०)।

रनबंका पु
वि० [सं० रण + हिं० बाँका] शूरवीर। बहादुर।

रनबरिया †
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की भेड़ जो नेपाल के जंगलों में पाई जाती है।

रनबाँकुरा
संज्ञा पुं० [सं० रण + हिं० बंकट, बंक, बाँका] शूर वीर। योद्धा। उ०—(क) जीति को सक संग्राम, दसरथ के रन- बाँकुरे।—तुलसी (शब्द०)। (ख) रनबाँकुरा बालिसुत बंका।—मानस, ६।१८।

रनलंपिका
संज्ञा स्त्री० [डिं०] गाय। गौ।

रनवादी पु
संज्ञा पुं० [सं० रण + वादी] शूर। लड़ाका। योद्धा। उ०—मात न जानसि बालक आदी। हौं बादला सिंह रनवादी।—जायसी (शब्द०)।

रनवास
संज्ञा पुं० [हिं० रानी + वास] १. रानियों के रहने का महल। अंतःपुर। २. जनानखाना।

रनवासन
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की फली।

रनसेर पु
सं पुं० [हिं० रन + सीर] युद्धभूमि। लड़ाई का मैदान।—उ०—खैंचि समसेर तब पैठु रनसेर में।—पलटू० पृ० १४।

रनित पु
वि० [सं० रणित] बजता हुआ। झनकार करता हुआ। उ०—रनित भृंग घंटावली झरित दान मधु नीरु। मंद मंद्र आवत चल्यो कुंजरु कुंज समीरु।—बिहारी। र०, दो० ३८८।

रनिवास
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'रनवास'। उ०—सब रनिवास विथकि लखि रहेऊ। तब धरि धीर सुमित्रा कहऊ।— मानस, २।२८३।

रनी पु
संज्ञा पुं० [सं० रण + ई (प्रत्य०)] वीर। योद्धा। रण करनेवाला। उ०—कलुष कलंक कलेस कोस भयो जो पदु पाय रावन रनी। सोइ पदु पाय विभीषन भी भवभूषन दलि दूषन अनी।—तूलसी (शब्द०)।

रनेत
संज्ञा पुं० [सं० रण + हिं० एत (प्रत्य०)] भाला। (डिं०)।

रपट (१)
संज्ञा स्त्री० [अ० रव्त] अभ्यास। आदत। टेव। क्रि० प्र०—करना।—डालना।—पड़ना।—होना।

रपट (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० रपटना] १. रपटने की क्रिया या भाव। फिसलाहट। २. दौड़। ३. उतार, जिसपर से उतरते समय पैर न जम सकता हो। ढाल।

रपट (३)
संज्ञा स्त्री० [अं० रिपोर्ट] सूचना। इत्तला। उ०—आप केवल इतनी ही कृपा करैं कि मेरे घड़ी जाने की रपट कोतवाली में लिखाते जायँ।—परीक्षागुरु (शब्द०)।

रपटन †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] फिसलन। बिछलन।

रपटना पु † (१)
क्रि० अ० [सं० रफन (= सरकना), मि० फ़ा० रफ़तन्] १. नीचे या आगे की ओर फिसलना। जम न सकने के कारण किसी ओर सरकना। जैसे,—गीली मिट्टी में पैर रपटना। उ०—(क) बाहाँ जोरी निकसे कुज ते रीझि रीझि कहैं बात। कुंडल झलमलात झलकत विवि गात, चकाचौंध सी लागति मेरे इन नैननि आली रपटत पग नहिं ठहरात। राधा- मोहन बने घन चपला ज्यों चमकि मेरी पूतरीन में समात। सूरदास प्रभु के वै वचन सुनहु मधुर मधु अब मोहिं भूली पाँच औ सात।—सूर (शब्द०)। (ख) दै पिचकी भजी भीजी तहाँ पर पीछे गुपाल गुलाल उलीचैं। एक ही संग यहाँ रपटे सखि ये भए ऊपर वे भईँ नीचे।—पद्माकर (शब्द०)। (ग) हौं अलि आजु गई तरके वाँ महेस जू कालिंदी नीर के कारन। ज्यों पग एक बढ़ायो चहों रपट्यो पग दूसरी लागी पुकारन।— महेश (शब्द०)। २. शीघ्रता से और बिना ठहरे हुए चलना। बहुत जल्दी जल्दी चलना। झपटना। उ०—(क) प्रबल पावक बढ़यौ जहाँ काढ़यौ तहाँ डाढ़यौ रपटि लपट भरे भवन—भँहारहौं। तुलसी (शब्द०)। (ख) रपटत मृगन सरन मारे। हरित बसन सुंदर तनु धारे।—रघुराज (शब्द०)। (ग) अनेक अग्ग बाहहीं कितेक मार छाँहहीं। किते परे कराहहीं हँकार सौं रपट्टहीं।—सूदन (शब्द०)।

रपटना (२)
क्रि० स० १. किसी काम को शीघ्रता से करना। कोई काम चटपट पूरा करना। जैसे,—थोड़ा सा काम और रह गया है; दो दिन में रपट डालेंगे। संयो० क्रि०—डालना।—देना। २. मैथुन करना। प्रसंग करना। (बाजारू)।

रपटाना
क्रि० स० [हिं० रपटना] १. फिसलाना। सरकाना। २. चटपट पूरा करना। ३. रपटने का काम दूसरे से कराना।

रपटीला
वि० [हिं० रपट + ईला (प्रत्य०)] [वि० स्त्री० रपटीली] फिसलनवाली। पैर न टिक सकनेवाली। उ०—ऊँची गैल राह रपटीली, पाँव नहीं ठहराय।—संतबाणी, भा० २, पृ० ११।

रपट्टा †
संज्ञा पुं० [हिं० रपटना] १. फिसलने की क्रिया। फिसलाव। मुहा०—रपट्टा मारना = फिसलना। २. दौड़ धूप। झपट्टा। मुहा०—रपट्टा लगाना या मारना = दौड़ना। झपटना। लपकना। ३. झपट्टा। चपेट। उ०—अरे जो मैं एक संग प्रान छोड़ कै नभाजतो, तौ उनके रपट्टा में कब की आय जाती।—हरिश्चंद्र (शब्द०)।

रपाती
संज्ञा स्त्री० [सं० √ रफू (= वध करना या चोट पहुँचाना)] तलवार। (डिं०)।

रपुर
संज्ञा पुं० [सं० हरिपुर] स्वर्ग। (डिं०)।

रपोट
संज्ञा स्त्री० [अं० रिपोर्ट] दे० 'रपट'। उ०—उन्होंने कहा, कहीं इतनी भी लकड़ी तो पकड़ाई होती। रपोट करनेवाला कौन हौ ? हमने कौन सी खता की ?—काले०, पृ० ४०।

रफ
वि० [अं०] १. जो साफ और ठीक न हुआ हो; बल्कि किया जाने को हो। नमूने के तौर पर बना हुआ। २. जो चिकना न हो। खुरदुरा।

रफत पु
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० रफ्तह्] गति। मुक्ति। उ०—कह गुलाल हरिनाम रफत तब पाइया।—गुलाल०, पृ० ६०।

रफते रफते
क्रि० वि० [फ़ा० रफ्त़ह्] दे० 'रफ्ता रपता'।

रफल (१)
संज्ञा स्त्री० [अं० राइफल] विलायती ढंग की एक प्रकार की बंदूक। विशेष—यह दो तरह की होती है। एक तो टोपीदार जिसमें बारूद उसके मुँह की ओर से भरी जाती है? और टोपी चढ़ाकर घोड़े से दागी जाती है। दूसरी ब्रिजलोटन कहलाती है और इसमें बीच में से कारतूस भरा जाता है।

रफल (२)
संज्ञा पुं० [अं० रैपर] जाड़े में ओढ़ने की मोटी चादर जो प्रायःऊनी होती है। गरम चादर।

रफा
वि० [अ० रफ़अ] १. दूर किया हुआ। मिटाया हुआ। समाप्त या पूरा किया हुआ। उ०—पर इस जरूरत को रफा करने के लिये कभी कभी ऐसे पुरुष भी अपनी कमर कस बैठते हैं, जो इस काम के सर्वथा अयोग्य हैं।—द्बिवेदी (शब्द०)। २. निवृत्त। शांत। निवारित। दबाया हुआ। जैसे,—झगड़ा रफा करना। उ०—एक औरिउ है नफा हम सफा कीन बिचार। रफा संगहिं होय सब महिपाल को रन प्यार।—गोपाल (शब्द०)। यौ०—रफा दफा।

रफा दफा
वि० [अ० रफ़अ] १. मिटाया हुआ। दूर किया हुआ। २. शांत। निवृत्त। जैसे,—मामला रफा दफा करना, झगड़ा रफा दफा करना।

रफीअ
वि० [अ० रफ़िअ] उत्तुँग। ऊँचा। बुलंद। उच्च (को०)।

रफीक
संज्ञा पुं० [अ० रफ़ीक] [स्त्री० रफीका] मित्र। सखा। सहचर [को०]।

रफीदा
संज्ञा पुं० [फ़ा० रफ़ीदह्] १. वह गद्दी जिसके ऊपर जीन कसा जाता है। २. वह गद्दी जिसे लगाकर नानाबाई तंदूर में रोटी चिपकाते हैं। काबृक। ३. कथरी या गद्दीनुमा सिले पुराने वस्त्र। ४. गोल पगड़ी। विशेष—इस अर्थ में इस शब्द का प्रयोग विशेषतः अवज्ञा या अनादर प्रकट करने के लिये ही हीता है।

रफू
संज्ञा पुं० [अं० रफू़] फटे हुए कपड़े के छेद में तागे भरकर उसे बराबर करना। क्रि० प्र०—करना।—बनाना।—होना। मुहा०—रफु करना =कही हुई दो असेवद्ध या विपरीत बातों में सामंजत्व त्थापित करना। बात बनाना।

रफुगर
संज्ञा पुं० [फा़० रफु़गर] रफु करने का व्यवसाय करनेवाला रफु बाननेवाला।

रफुगरी
संज्ञा स्त्री० [फा़० रफु़गरी] रफु करने का काम। रफुगरों का काम।

रफुचक्कर
वि० [अ० रफु़ + हि० चक्कर] चंपत। गायब। मुहा०—रफुचक्कर बनना या होना = भाग जाना। चलता बनना। गायव हो जाना। जैसे; —वह देखते देखते रफुचक्कर हो गया।

रफ्त
संज्ञा स्त्री० [फा़० रफतह का समासगत रूप] प्रस्थान। जाना। गमन। रवानगी [को०]।

रफतनी
संज्ञा स्त्री० [फा़० रफ़तनी] १. जाने की क्रिया या भाव। २. माल का बाहर भेजा जाना। माल को निकासी।

रफ्तार
संज्ञा स्त्री० [फा़० रफ्तार] चलने का ढंग या भाव। चाल। गति।

रफ्ता रफ्ता
क्रि० वि० [फा़० रफतह् रफतह] घोरे घोरे। क्रम क्रम से। उ०—अवल मुझे बड़गुजरै ताखत करना जानि। रफते रगते और भी मुखालिक मान।—सूदन (शब्द०)।

रब
संज्ञा पुं० [अ०] ईश्वर। परमेश्वर। उ०—(क) पीरा पैगंबर दिगंबरा देखाई देत, सिद्ध की सिधाई गई रही बात रब की।— भूषण (शब्द०)। (ख) अरुन अन्यारे जे भरे अति ही मदन मजेज। देखे तुव द्दग वार बे रब सुकराना भेज। रसनिधि (शब्द०)।

रबकना पु
क्रि० अ० [फा़० रौ?] उत्साहित होना। उमंग में होना जोश में आना। उ०—(क) रबकि कै रंचक बदन पसारयौ पकरि कै चंचु फारि ही डा़रयौ। —नंद ० ग्रं०, पृ० २५०। (ख) रबयकि चत्तो भभकत भई, सबतन आगि दिपाइ।—व्रज० ग्रं० पृ० ४७।

रबड़ (१)
संज्ञा पुं० [अं० रबर] १. एक प्रसिद्ध लचीला पदार्थ जिसका व्यवहार गेंद फोता, पट्टी, बेलन आदि बहुत से पदार्थ बनाने में होता है। विशेष—यह एक प्रकार के वुक्ष के ऐसे दुव से बनता है, जो पेड़ से निकलने पर जम जाता है। यह चिमड़ा और लचीला होता है। इसमे रासायनिक अंश कार्बन और हाइड्रोजन के होते है। यह २४८? को आँच पाकर पिघल जाता है और ६००? की आँच में भाप के रूप में उड़ने लगाता है। आग पाने से यह भक से जलने लगता है। इसकी लौ चमकीली होती है और इसमें से धूआँ अधिक निकलता है। जब इसमें गंधक का फूल (बारीक चुर्ण) या उडाई हुई गंधक मिलाकर इसे घीमी आँच में पिघलाकर २५०? से लेकर ३००? की भाप में सिद्घ करते हैं, तब इससे अनेक प्रकार की चीजें जैसे,—खिलौने, बटन, कंधी आदि बनाई जाती है, जो देखने में सींग या हड्डी की जान पड़ती है। इसपर सब प्रकार के रंग भी चढ़ाए जाते हैं। रबड़ अफ्रीका, अमेरिका और एशिया के प्रदेशों में भिन्न भिन्न विशेष पेड़ों के दुध से बनाया जाता है और वहाँ इससे अनेक प्रकार के उपयोगी पदार्थ बनाए जाते है। अब इसे रासायनिक ढ़ंग से कृत्रिम भी बनाया जाता है। २. एक वृक्ष का नाम जो वट वर्ग के अंतर्गत है। विशेष—यह भारतवर्ष में आसाम, लखीमपुर आदि हिमालय के आस पास के प्रदेशों तथा बरमा आदि में होता है। इसकी पत्तियाँ चौड़ी और बड़ी बड़ी होती है तथा इसका पेड़ ऊँचा और दीर्धाकार होता है। इसकी लकडी़ मजबूत और भूरे रंग की होती है। इसी के दुघ से उपर्युक्त पदार्थ बनता है।

रबड़ (२)
संज्ञा स्त्री० [हि० रगड़ा] १. व्यर्थ का श्रम। फजूल हैरानी। २. गहरा श्रम। रगड़। क्रि० प्र०—खाना।—पड़ना। ३. तै करने के लिये अधिक दूरी। घुमाव। चक्कर। फेर। जैसे,— उधर से जाने मे बड़ी रबड़ पड़ेगी।

रबड़ना (१)
क्रि० सं० [हि० रपटना या सं० वर्तन, प्रा० बट्टन] १. घुमाना। चलाना। २. किसी तरल पदार्थ में कोई वस्तु (करछी आदि) डालकर चारों और फेरना। फेंटना।

रबड़ना (२)
क्रि० अ० घुमना। फिरना।

रबड़ी
संज्ञा स्त्री० [हि० रबड़ना] आँटाकर गाढ़ा और लच्छेदार किया हुआ दूघ जिसमें चीनो भी मिलाई जाती है। बसौंधी।

रबदा
संज्ञा पुं [हि० रबड़ना] १. वह श्रम जो कहीं बार बार गमनागमन या पदसंचालन से होता है। २. कीचड़। कदेम। मुहा०—रबदा पड़ना =खूब पानी बरसना। वृष्टि होना। उ०—जेहि चलते रबदे पड़ा धरती होइ बिहार। सो सावज घामै जरै पंडित करौ विचार।—कबीर (शूब्द०)।

रबर
संज्ञा पुं० [अं०] दे० 'रबड़'।

रबरी †
संज्ञा स्त्री० [हि रबड़ी] दे० 'रबड़ी'।

रबाना
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का छोटा डफ जिसमें मँजीरे भो लगे होते है और जिसे प्रायः कहार आदि बजाते हैं।

रबानी
वि० [देश रबाना + ई] रवाना नामक डफ बजानेवाला उ०—कहाँ है रबानी मृदंगी सितारी। कहाँ हैं गवैये कहाँ नृत्यकारी।—भारतेंदु० ग्र०, भा० २, पृ० ७०२।

रवाब
संज्ञा पुं० [अ०] सारंगी को तरह का एक प्रकार का तंत्र- बाद्य जिसमे बजाने के लिये तार लगे होते है। उ०—(क) सब रग ताँत रबाब तन बिरह बजाबै नित्त। और न कोई सुनि सकै कै साई कै चित्त।—कबीर (शब्द०)। (ख) बाजत बीन रबाब किन्नरी अमृत कुंडली यंत्र। सुरसर मंडल जल तरंग मिलि करत मोहनी मंत्र।—सूर (शब्द०) । (ग) अरे बजावत कौन ढिग छित रबाब के तार। जुरो जात है आइ कै बिरहिन को दरबार।—रसनिधि (शब्द०)।

रबीबिया
संज्ञा पुं० [हि० रबाब + इया (प्रत्य०)] वह जो रबाब बजाता हो। रबाब बजानेवाला।

रबाबी पु
संज्ञा स्त्री० [अं० रबाब] दे० 'रबाब'। उ०—फील रबाबी बलदु पखावज कौआ ताल बजावै।—कबीर, ग्रं०, पृ० ३०७।

रबी
संज्ञा स्त्री० [अं० रबीअ] १. वसंत ऋतु। २. वह फसल जो वसंत ऋतु में काटी जाती है। जैसे,—गोहुं, चना, मटर आदि। उ०—जहाँ जायँ कदम शरीफ। न रहे रबी, न रहे खरीफ। (कहावत)।

रबील
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का पक्षी जो पंद्रह सोलह अंगुल लंबा होता है। विशेष—इसके डैने भूरे, सिर और छाती सफेद, चोंच काली और पैर खाकी रंग के होते है। यह हिमालय के किनारे गढ़वाल से आसाम तक पाया जाता है। यह झाड़ियों में घोंसला बनाता और अप्रैल से जून तक दो से पाँच तक अंडे देता है।

रब्त
संज्ञा पुं० [अं०] १. अभयास। मश्क। मुहावरा। रपट। क्रि० प्र०—पड़ना।—होना। २. संबंघ। मेल। यौ०—रब्त जब्त = मेल जोल। घनिष्ठता। जैसे,—उनसे कुछ रब्त जब्त पैदा करो तो तुम्हारा काम हो जायगा।

रब्ध
वि० [सं०] [वि० स्त्री० रब्धा] आरब्ध। आरंभ किया हुआ। शूरू किया हुआ।

रब्ब
संज्ञा पुं० [अं०] दे० 'रब'।

रब्बा †
संज्ञा पुं० [फा़० अराबा] १. वह गाड़ी जिसपर तोप लादी जाती है। तोपखाने की गाड़ी। २. वह गाड़ी या रथ जिसे बैल खींचते है।

रब्बाब
संज्ञा पुं० [अं० रबाब] दे० 'रबाब'।

रभ पु
संज्ञा पुं० [सं० रभस्] दे० 'रभस'। उ—सहसा, सत्वर रभ, तुरा, तुरभ वेग के साज। नंद० ग्रं०, पृ० १०७।

रभस (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वेग। २. हर्ष। ३. प्रोत्साहन। ४. उत्सुकता। औत्सुक्य। ५. पूर्वापर या कारण कार्य का विचार। ६. संभ्रम। ७. पछतावा। रंज। ८. बाल्मीकि रामायण के अनुसार अस्त्रों का एक संहार, अर्थात् शत्रु के चलाए हुए अस्त्र निष्फल करने की विधि जो विश्वामित्र ने रामचंद्र को सिखलाई थी। ९. रामायण के अनुसार एक राक्षस का नाम। १०. विष। जहर (को०)। २१. कोप। क्रोध (को०)।

रभस (१)
वि० १. वेगवाला। २. प्रबल। तीव्र। मजबुत। द्दढ़। ३. प्रसन्न। आनंदपूर्ण [को०]।

रभू
संज्ञा पुं० [सं०] दूत। चर [को०]।

रभेणक
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत के अनुसार एक राक्षस का नाम। विशेष—कहते है, यह राक्षस साँप के रूप में रहता है।

रम (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. कामदेव। २. लाल अशोक। ३. प्रेमी। ४. पति। ५. आनंद। हर्ष (को०)।

रम (२)
वि० १. प्रिय। २. सुंदर। ३. आनंददायक। हर्षोत्पादक। ४. जिससे मन प्रसन्न हो।

रम (३)
संज्ञा पुं० [अं०] एक प्रकार की विलायती शराब जो जौ से बनाई जाती है।

रमक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रेमपात्र। प्रिय। कांत। प्रेमी। २. उपपति। जार।

रमक (२)
वि० विनोदशील। आनंदवाला [को०]।

रमक (३)
संज्ञा स्त्री० [हि० रमना] १. झूले की पेंग। २. तरंग। झकोरा। उ०—खेलत फाग भरी अनुराग सुहाग सनी सुख का रमकै। —(शब्द०)।

रमक
संज्ञा स्त्री० [अ० रमक] १. थोड़ी सी साँस जो मरते समय निकलने को शेष रह गई हो। अंतिम श्वास। २. हलका प्रभाव। ३. स्वल्प भाग। बहुत थोड़ा अंश। ४. नशे का थोड़ा असर जैसे,—जरा सी रमक मालूम हो रही है।

रमक (१)
वि० जरा सा। बहुत थोड़ा।

रमकजरा
संज्ञा पुं० [हि० राम + काजल] एक प्रकार का धान। विशेष—यह भादों में पकता है। पकने पर काले रंग का होता है और मोटा धान माना जाता है। नैपाल की तराई में यह अधिकता से होता है। बगरी या बक्की से इसके चावल कुछ लंबे होते है और कूटने पर सफेद रंग के निकलते है।

रमकना
क्रि० अ० [हि० रमना] १. हिंडोले पर झुलना। हिंडोले पर पेंग मारना। उ०—कबहुँक् निकट देखि बर्षा ऋतु झुलत सुरँग हिंडोरे। रमकत झमकत जनकसुता संग हाव भाव चित चोरे।—सुर (शब्द०)। २. झुमते हुए चलना। इतराते हुए चलना।

रमक्कना पु
क्रि० अ० [हि० रमकना] झुमते हुए या मस्ती से चलना। उत्साह वा जोश में भरकर आगे बढ़ना। उ०—लय खग्ग रमक्किय प्रेत दिस।—पृ० रा०, १। ५३०।

रमचकरा †
संज्ञा पुं० [हि० राम + चक्र] बेसन की मोटी रोटी।

रमचा †
संज्ञा पुं० [हि० चमचा] छोटी करछी। चमचा।

रमजान
संज्ञा पुं० [अ० रमजा़न] एक अरबी महीने का नाम। इस महीने में मुसलमान रोजा रहते है।

रमजानी
वि० [अ० रमजान + हि० ई (प्रत्य०)] रमजान मास का। रमजान के महीने से संबद्ध [को०]।

रमझोल †
संज्ञा पुं० [हि०] दे० 'रमझोला'।

रमझोला
संज्ञा पुं० [डिं०] पैर में पहनने के धुँधुरु। नूपुर।

रमठ
संज्ञा पुं० [सं०] १. हींग। २. एक प्राचीन देश का नाम। ३. इस देश का निवासी।

रमठध्वनि
संज्ञा स्त्री० [सं०] हींग। हिंगु [को०]।

रमण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] आनंदोत्पादक क्रिया। विलास। क्रिड़ा। कोलि। २. मैथुन। ३. गमन। घूमना। विचरण। ४. पति ५. कामदेव। ६. जधन। ७. गधा। ८. अंडकोश। ९. सूर्य का अरुण नामक सारथी। १०. एक वन का नाम। ११. एक वर्णिक छंद का नाम। इसके प्रत्येक चरण में तीन अक्षर होते है; जिनमें दो लघु और एक गूरु होता है। जैस,—दुख क्यों। टरि है। हरि जू। हरि हैं। १२. परवल की जड़ (को०)।

रमण (२)
वि० [स्त्री० रमणी] १.मनोहर। सुंदर। २. जिसके मिलने से आनंद उत्पन हो। प्रिय। ३. रमनेवाला।

रमणाक
संज्ञा पुं० [सं०] जंबूद्धीप के अंर्तगत एक वर्ष या खंड का नाम। इसे रम्यक भी कहते हैं। विशेष दे० 'रम्यक'। २. बीत- होत्र के पुत्र का नाम।

रमणागमना
संज्ञा स्त्री० [सं०] साहित्य मे एक प्रकार की नायिका जो यह समझकर दुःखी होती है कि संकेत स्थान पर नायक आया होगा, ओर में वहाँ उपस्थित न थी। जैसे,—छरी सपल्लव लालकर लखि तमाल की हाल। कुंभिलानी उर साल धरि फूल माल ज्यों बाल।—बिहारी (शब्द०)।

रमणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक शक्ति का नाम जो रामतीर्थ में है। २. पत्नी (को०)। ३. सुंदरी स्त्री (को०)।

रमणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. नारी। स्त्री। २. सूंदर स्त्री। ३. बाला या सुंगधवाला नामक गंधद्रव्य। ४. पत्नी [को०]।

रमणीक
वि० [सं० रमणीय] सुंदर। मनोहर। उ०—अति रमणीक कदंब छाँह रुचि परम सुहाई। राजत मोहन मध्य अवलि बालक की पाई।—सूर (शब्द०)।

रमणीय
वि० [सं०] सुंदर। रूचिर। मनोहर। रम्य।

रमणियता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सुंदरता। २. साहित्यदर्पण के अनुसार वह माधुर्य जो सब अवस्थाओं में बना रहे या क्षण क्षण में नवीन रूप धारण किया करे।

रमणया
संज्ञा स्त्री० [सं०] नारी। स्त्री। औरत [को०]।

रमता
वि० [हि० रमना(=घूमाना फिरना)] एक जगह जमकर न रहनेवाला। घूमता फिरता। जैसे,—रमता जोगी बहता पानी इनका कहीं ठिकाना नाहिं।

रमति
संज्ञा पुं० [सं०] १. नायक। २. स्वर्ग। ३. कौवा। ४. काल। ५. कामदेव।

रमद
संज्ञा पुं० [अं०] आँख की एक बीमारी। आँखो का लाल हो जाना ओर उससे पानी गिरने का रोग [को०]।

रमदी †
संज्ञा पुं० [हि० राम + सं० आद्य] एक प्रकरा का जड़हन धान जो अगहन के महीने में पकता है। इसका चावल सालों तक रह सकता है।

रमन पु
संज्ञा पुं० वि० [सं० रमण] दे० 'रमण'।

रमनक
संज्ञा पुं० [सं० रमणक] दे० 'रमणक'।

रमनता पु
संज्ञा स्त्री० [सं० रमण + ता (प्रत्य०)] दे० 'रमणीयता'। उ०—दुति लावन्य रूप मघुराई। कांति रमनता सुंदरताई।— नंद० ग्रं०, पृ० १२४।

रमनसोरा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की मछली जिसे कैवलसोरा भी कहते है।

रमना (१)
क्रि० अ० [सं० रमण] १. भोग विलास या सुखप्राप्ति के लिये कहों रहना या ठहरना। मन लगने के कारण कहीं रहना। उ०—(क) रमि रैन सबै अनतै बितई सो कियो इत आवन भोर ही की।—केशव (शब्द०)। २. भोग विलास या रति- क्रिडा़ करना। उ०—(क) अधिवरणा अरू अंग घटि अंत्यज जनि की नारि। तजि विधवा अरु पूजिता रमियहु रसिक बिचारि।—केशव (शब्द०)। (ख) राति कहुँ रमि आयो घरै उर मानै नहीं अपराध किए की।—पद्माकर (शब्द०)। ३. आनंद करना। चैन करना। मजा उड़ाना। उ०—चहुँ भाग वाग तड़ाग। अव देखिए बड़े भाग। फल फूल सो संयुक्त। अलि यों रमै जनु मुक्त।—केशव (शब्द०)। ४. चारों ओर भरपूर होकर रहना। व्याप्त होना। भीनना। उ०—(क) आघ्यात्मिक होइ आत्मा रमत या सों यह बलराम पुनि।— गोपाल (शब्द०)। (ख) पाइ पूरण रूप को रभि भूमि केशव- दास।—केशव (शब्द०)। (ग) मैं सिरजा मैं मारहूँ मैं जारौं मैं खाउँ। जलथल मैं ही रमि रह्वौ मोर निरजन नाउँ।—कबीर (शब्द०)। ५. अनुरक्त होना। लग जाना। उ०—महादेव अवगुन भवन विष्णु सकल गुणघाम। जेहि कर मन रम जाहि सन तेहि तेही सन काम।—तुलसी (शब्द०)। ६. किसी के आस पास फिरना। घुमना। उ०—(क) कोई परै भैवर जल माँहाँ। फिरत रमहि कोइ देइ न बाँहाँ।—जायसी (शब्द०)। (ख) लसत केतकि के कुल फूल सों। रमत भौर भरे रसमूल सों।—गुमान (शब्द०)। ७. चलता होना। चल देना। गायब हो जाना। उ०—झाल उठी झोली जली खपरा फूटम फूट। जोगी था सो रम गया, आसन रही भभूत।—कबीर (शब्द०)। संयो० क्रि०—देना।—जाना। ८. आनंदपूर्वक इधर उधर फिरना। विहार करना। मनमाना घुमना। विचरना। उ०—(क) जे पद पद्म रमत वृंदावन अहि सिर धरि अगनित रिपु मारी।—सूर (शब्द०)। (ख) गोपिन संग निसि सरद का रमत रसिक रस रासि। लहाछह अति गतिन की सबन लखे सब पास।—बिहारी (शब्द०)।

रमना (२)
संज्ञा पुं० [सं० आराम या रमण] १. वह हरा भरा स्थान जहाँ पशु चरने के लिय़े छोड़ दिए जाते है। चराग्रह। उ०— इत जमना रमना उतै बीच जहानावाद। तामें बसने की करौ करौ न बाद विवाद।—रसनिधि (शब्द०)। २. वह सुरक्षित स्थान या घेरा, जहाँ पशु शिकार के लिये या पालने के लिये छोड़ दिए जाते है और जहाँ वे स्वच्छंदतापूर्वक रहते हैं। ३. घेरा। हाता। ४. बाग। ५. कोई सुंदर और रमणीक स्थान।

रमनी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० रमणी] दे० 'रमणी'। उ०—नव रमन रामि राज।—पृ० रा०, ६१। २५५२।

रमनीक पु
वि० [सं० रमणीय, हि० रमणीक] दे० 'रमणीक'। उ०—रमनीक ठाम वाचिष्ठ राज, तह बसहि देवदेवह विराज।—पृ० रा०, १। १८१।

रमनीय पु
वि० [सं० रमणीय] दे० 'रमणीय'। उ०—महा कमनीय रमनीय रमनीय हू रमावै नर मन ह्वै कै रूप रज रेई कै।—देव (शब्द०)।

रमरमी †
संज्ञा स्त्री० [हि० राम राम] दे० 'राम राम'। उ०— भाई मेरे, सगु भेयँन कूँ रमरमी, भैया कू सात सलाँम।— पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ९७३।

रमल
संज्ञा पुं० [अ०] एक प्रकार का फलित ज्योतिष जिसमें पासे फेंककर उसके विदुओं के अनुसार शुभाशुभ फल का अनुमान किया जाता है। विशेष—यह शास्त्र पहले अरबी भाषा में था और मुसलमानों के साथ साथ भारतवर्ष में आया था। संस्कृत में भी पंडितों ने रमल विषयक अनेक ग्रंथ रचे है।

रमसरा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का पौधा जो ईख के खेत में अपने आप उत्पन्न होता है। इसे रउता भी कहते है।

रमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १.लक्ष्मी। २. पत्नी। स्त्री (को०)। ३. सौभाग्य (को०)। ४. संपत्ति। धन दौलत (को)। ५. श्री। शोभा (को०)। ६. कार्तिक कृष्ण एकादशी (को०)। विशेष—इस शब्द में कांत, पति, रमण आदि अथवा इनके वाची शब्द लगाने से विष्णु का अर्थ होता है। जैसे,—रमाकांत, रमापति, रमारमण।

रमाकांत
संज्ञा पुं० [सं० रमाकान्त] विष्णु।

रमाधव
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु।

रमानरेश पु
संज्ञा पुं० [हि० रमा + नरेश(=पति)] विष्णु। उ०—जय जय करत सकल सुर नर मुनि जल में कियो प्रवेश। जाय पताल बाट गहि लीन्ही धरणी रमानरेश।—सुर (शब्द०)।

रमाना
क्रि सं० [हि० रमाना का सक० रूप] १. अनुरंजित करना। अनुरक्त बनाना। मोहित करना। लूभाना। उ०—(क) अति पतिहिं रमावै चित्त प्रभावै सौतिन प्रेम बढ़ावै।—केशव (शब्द०)। (ख) गोरस मथत नाद इक उपजत किंकिन धुनि मुनि श्रवण रमावति। सूर श्याम अँचरा धरि ठाढ़े काम कसौटी करि देखरावति।—सुर (शब्द०)। २. अपने मनोनुकूल। बनाना। उ०—जैसे माया मन रमै तैस राम रमाय। तारा मंडल छाड़ि कै जहँ केशव तहँ जाय।—कबीर (शब्द०)। ३. ठहराना। रोक रखना। ४. संयुक्त करना। लगाना। जोड़ना। मुहा०—रास रमाना = रास जोड़ना। रास रचाना। उ०— जाकी महिमा कहत न आवै। सो गोपिन सँग राम रमावै।— सूर (शब्द०)। विभूति वा भभूत रमाना = शरीर में भभूत लगाना। भभूत पोतना। उ०—प्रेसुअन की सेली गल में लगत सुहाई। तन धूर जमी सोइ अंग भसूत रमाई।—हरिश्चंद्र (शब्द०)। मन रमाना = दूखी या चिंतित मन को किसी प्रकार प्रसन्न करना। मन बहलाना।

रमानिवास
संज्ञा पुं० [हि० रमा + निवास] लक्ष्मीपति, विष्णु। उ०—सो राम रमानिवास संतत दास बस त्रिभुवन धनी। मम उर बसउ सो समन संसृति जासु कीरति पावनी।—तुलसी (शब्द०)।

रमारमण
संज्ञा पुं० [सं०] रमापति। लक्ष्मीपति। विष्णु।

रमारमन पु
संज्ञा पुं० [सं० रमारमण] दे० 'रमारमण'। उ०— रमारमन पद बंदि बहोरी।—मानस, २। २७२।

रमाली
संज्ञा संज्ञा पुं० [फा़० रूमाली] एक प्रकार का बारीक और स्वादिष्ट चावल जो करनाल में होता है।

रमावीज
संज्ञा पुं० [सं०] एक तांत्रिक मंत्र जिसे लक्ष्मीवीज भी कहते हैं। श्रीं।

रमावेष
संज्ञा पुं० [सं०] श्रीवास चंदन जिससे ताड़पीन नामक तेल निकलता है।

रमास
संज्ञा पुं० [हि०] दे० 'रवाँस'।

रमित पु
वि० [हि० रमना] लुभाया हुआ। मुग्ध। उ०—आवैं सुरतिय करि शृंगारा। रमित रहै नृप करैं बिहारा।—सबल (शब्द०)।

रमी
संज्ञा स्त्री० [मलाय०] एक प्रकार की घास जो सुमात्रा आदि द्धीपों में होती है। विशेष—यह रीहा के समान कागज और रस्सी आदि बनाने के काम में आती है। सुमात्रा वाले इसे 'कलुई' कहते है। पहले इसे कुछ लोग भ्रमवश रीहा ही समझते थे।

रमूज
संज्ञा स्त्री० [अ० रम्ज़ का बहुव० रमूज़] १. कटाक्ष। २. सैन। इशारा। ३. पहेली। गूढ़ा़र्थ वाक्य। ४. श्लेष। ५. गुप्त बात। रहस्य। उ०—यों कहि मग्नि भए अज नंदन कैकय राज रमूज सी पाई।—हनुमान (शब्द०)।

रमेश
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु।

रमेश्वर
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु।

रमैती
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. किसानों की एक रीति जिसमें एक कृषक आवश्वकता पड़ने पर दूसरे कृषक के खेत में काम करता है और उसके बदले में वह भी उसकी खेत में काम कर देता है। विशेष—इसमें मजदूरी बच जाती है और काम के बदले में दूसरों के खेतों में काम कर देना होता है। इसे पूर्व में 'पैठ' और अवध के उत्तरीय भागों में 'हुँड़' कहते हैं। २. वह नफरी या काम का दिन जो इस प्रकार कार्य करने में लगे। क्रि० प्र०—करना।—देना।—लगाना।

रमैनी
संज्ञा स्त्री० [हि० रामायण] कबीरदास के बीजक का एक भाग जिसमें दोहे और चौपाइयाँ है।

रमैयार पु ‡
संज्ञा पुं० [हिं० राम + ऐसा (प्रत्य०)] १. राम। उ०—वहाँ सव संकट दुर्धट सोच तहाँ मेरी साहेब राखै रमैया।—तुलसी (शब्द०)। २. ईश्वर। उ०—रमैया की दुलहिन लूटी बजार।

रम्माल
संज्ञा पुं० [अ०] रमल फेंकनेवाला। पासा फेंककर फलित कहनेवाला।

रम्य (१)
वि० [सं] [स्त्री० रम्या] १. मनोहर। सुंदर। २. मनोरम। रमणीय। उ०—परम रम्य उत्तम यह घरनी।—मानस, ६।२।

रम्य (२)
संज्ञा पुं० १. चंपा का पेड़। २. बक का पेड़। अगस्त। ३. परवल की जड़। ४. वीर्य। ५. अग्निघ्र के एक पुत्र का नाम। ६. वायु के सात भेदों में एक जो घंटे में चार से सात कोस तक चलती है।

रम्यक
संज्ञा पुं० [सं०] १. जंबु द्बीप के नौ खँडों या वर्षो में से एक। यह मेरू के दक्षिण और श्वेत पर्वत के उत्तर वायव्य कोण में माना गया है। विशेष—कहते है, यहाँ वट की जाति का एक वृक्ष होता है, जिसे खाकर यहाँ के लोग कई दिन तक रह सकते है। इसे रोहित भी कहते है। २. महानिंब। बकायन। ३. परवल की जड़ [को०]।

रम्यकक्षीर
संज्ञा पुं० [सं०] महानिंब। बकायन।

रम्यग्राम
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत के अनुसार एक गाँव का नाम।

रम्यपुष्प
संज्ञा पुं० [सं०] सेमल का पेड़।

रम्यफल
संज्ञा पुं० [सं०] कुचिला।

रम्यश्री
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु।

रम्यसानु
संज्ञा पुं० [सं०] पहाड़ के शिखर पर की समतल भूमि। प्रस्थ।

रम्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. रात। २. गंगा नदी। ३. स्थल पद्मिनी। ४. महेंद्रवारूणी। इंद्रायन। ५. लक्षणा कंद। ६. मेरू की कन्या का नाम जो रम्य से ब्याही थी। ७. धैवत स्वर की तीन श्रुतियों में से अंतिम श्रुती का नाम। ८. एक रागिनी का नाम।

रम्याक्षि
संज्ञा पुं० [सं०] एक ऋषि का नाम।

रम्यामली
संज्ञा स्त्री० [सं०] भूइँ आँवला।

रम्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. पिशंग वर्ण। कपिल वर्ण। २. सौंदर्य। शोभा [को०]।

रम्हाना
क्रि० अ० [सं० रम्भण] गाय का बोलना। रँभाना। उ०— (क) तौ लगि गाय रम्हाय उठी कवि देव बवूनि मथ्यो दघि को घट।—देव (शब्द०)। (ख) धौरिहुँ कोरिये आइ गई सू रम्हाइ के धाइ के लागी चुखावन।—देव (शब्द०)।

रय पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० रज] रज। घूल। गर्द। उ०—ठाकुर विराजै जहाँ खेलै सूत औरन के डारें ईट खोवा रयो प्रभु पर खीजियो।—प्रियादास (शब्द०)।

रय (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वेग। तेजी। उ०—यहु जानत है के सब गुण रथ के यासों रहत चुपाइ।—गुमान (शब्द०)। २. प्रवाह। नदी की धारा। ३. ऐल के छह पुत्रों में से चौथे पुत्र का नाम। ४. उत्साह (को०)।

रयणपत
संज्ञा पुं० [सं० रजनीपति] चंद्रमा। (डिं०)।

रयन पु †
संज्ञा पुं० [सं० रजनी] दे० 'रयनि'।

रयना पु † (१)
क्रि० अ० [सं० रञ्जन] १. रंग से भिगोना। तरावोर करना। उ०—भरहि अबीर अरगजा छिरकहि सकल लोक एक रंग रये।—तुलसी (शब्द०)। २. किसी के प्रेम में मग्न होना। अनुरक्त होना। ३. संयुक्त होना। मिलना। उ०—(क) करिए युत भूषण रूप रयी। मिथिलेश सुता इक स्वर्णमयी।—केशव (शब्द०)। (ख) ओंठ रचि रेख सविशेप शुभ श्री रये।—केशव (शब्द०)।

रयना पु (२)
क्रि० अ० [सं० रव] उच्चारित करना। रव करना। बोलना। उ०—आकाश विमान अमान छये। हा हा सब ही वह शब्द रये।—केशव (शब्द०)।

रयनि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० रजनी, प्रा० रजणी] रात्रि। निशा। रात।

रयासत
संज्ञा स्त्री० [अं० रियासत] दे० 'रियासत'।

रयि
संज्ञा पुं० [सं०] १. जल। पानी। २. वैभव। संपत्ति। ३. भोजन। भोजन के पदार्थ [को०]।

रयिष्ठ
संज्ञा पुं० [सं०] १. कुबेर का एक नाम। २. अग्नि। ३. एक प्रकार का साम। ४. ब्राह्मण (को०)।

रय्यत, रय्यति पु
संज्ञा स्त्री० [अं० रअय्यत] प्रजा। रिआया। रैयत। उ—सुनि शत्रु मित्र की नृप चरित्र की रय्यति रावत बात।—केशव (शब्द०)।

ररंकार
संज्ञा पुं० [सं० रकार] रकार की घ्वनि। उ०—रग रग बोलै राम जो रोम रोम ररंकार।—कबीर (शब्द०)।

रर पु † (१)
संज्ञा स्त्री० [हि० ररना] रटना। रट। उ०—(क) धन सारस होइ रर मुई आप सु मेटही पंख।—जायसी (शब्द०)। (ख) झरिया सार तिहिं पर अपार मुख मारू मारू रर।—सूदन (शब्द०)।

रर † (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] वह दीवार जो एक पर एक यों ही बड़े बड़े पत्थर रखकर उठाई गई हो और जिसके पत्थर चूने, गारे आदि से न जोड़े गए हों। (बुंदेल०)।

ररक †
संज्ञा स्त्री० [अनु०] ररकने का भाव। कसक। साल। टीस।

ररकना †
क्रि० अ० [अनु०] कसकना। किरकिराना। सालना। पीड़ा देना। टीसना। उ०—सपने कि सौति करयौ सोवत कि जागत ही जानी न परति रोम रोम ररकत है।—देव (शब्द०)।

ररना पु (१)
क्रि० अ० [हि० रलना वा सं० ललन] दे० 'रलना'। उ०—जीवन अधार प्यारे आँखिन में आय छाय हाय हाय अंग अंग संग रंग ररे हौ।—धनानंद, पृ० १३७।

ररना † (२)
क्रि० अ० [सं० रटना, प्रा० रडना] लगातार एक ही बात कहना। बार बार कहना। रटना। उ०—(क) पिय पिय चातक जों, ररी मरै सेवात पियास।—जायसी (शब्द०)। (ख) हरि हरि हौं हा हा ररौ हरे हरे हरि रारि।—केशव (शब्द०)। (ग) बदन उधारत ही मदन सुयोधन ही द्रौपदी ज्यों नाउँ मुख तेरोई ररति है।—केशव (शब्द०)।

रराट
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० रराटी] ललाट [को०]।

ररिहा पु †
संज्ञा पुं० [हि० ररना + हा (प्रत्य०)] १. ररनेवाला। २. रटुया या रूरुआ नामक पक्षी जो उल्लू की जाति का है। ३. बार बार गिड़गिड़ाकर माँगनेवाला। माँगने की धुन लगानेवाला। भारी मंगन। उ०—द्रारे हौं भोर ही को आजु। रटत ररिहा आरि और न कौरही तें काजु।—तुलसी (शब्द०)।

रर्रा (१)
वि० [हि० रार(=झगडा़)] रार करनेवाला। झगड़ालू।

रर्रा (२)
वि० [हि० ररना] १. बहुत गिड़गि़डा़कर माँगनेवाला। भारी मंगन। २. अधम। नीच। उ०—काम पड़ने पर अपने एक भाई को कह डालें कि तुम नीच हो, जाति में हेठे हो, रर्रा हो, षटकुल में नहीं हो।—बालकृष्ण भट्ट (शब्द०)।

रलक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्राचीन देश का नाम।

रलना पु
क्रि० अ० [सं० ललन(=लुब्ध होना)] एक में मिलना। सम्मिलित होना। उ०—(क) माल लसै धवली गर मैं कर दीन दयाल रली मुरली है।—दीनदयाल (शब्द०)। (ख) चली पीठ दै द्दष्टि फिरावति अँग आनंद रली।—सूर (शब्द०)। (ग) कुंज ते कुंज रली रस पुंज मै गुंजति डोलति भौरी भई है।—सुंदर (शब्द०)। यौ०—रलना मिलना =धुलना मिलना। मिलना जुलना। एक हो जाना।

रलाना पु
क्रि० स० [हि० रलना का सक० रूप] एक में मिलाना। संमिलित करना।

रली (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० लज़न(=केलि, क्रिड़ा)] १. बिहार। क्रिड़ा। उ०—खरी पातरी कान की कौन बहाऊँ बानि। आक कली न रली करै अली अली जिय जानि।—बिहारी (शब्द०)। २. आनंद। प्रसन्नता। उ०—विविधि कियो ब्याह विधि वसुदेव मन उपजी रली। सूर (शब्द०)। यौ०—रंगरली। रंगरलियाँ।

रली (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] चेना नामक अन्न।

रल्ल पु †
संज्ञा पुं० [हि० रेला] रेला। हल्ला। उ०—(क) दल दक्खिनी करि रल्ल। मिलि गए लै भुज भल्ल।—सूदन (शब्द०)। (ख) धरि धरि आयुघ हथ्थ गथ्थ के गथ्य उछल्लिय। दै दै दिग्घ निसान करत आपुस मैं रल्लिय।—सूदन (शब्द०)।

रल्लक
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का मृग। २. ऊनी कंबल। ऊर्णवस्त्र (को०)। ३. बरौनी। पक्ष्म (को०)।

रव (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १.गुंजार। ध्वनि। नाद। उ०—(क) कूजत कल रव हंस गन गुंजत मंजुल भृंग।—तुलसी (शब्द०)। (ख) कलहंस पिक सुक सरक रव करि गान नाचहिं अपसरा।— तुलसी (शब्द०)। २. आवाज। शब्द। ३. शोर। गुल।

रव पु† (२);
संज्ञा पुं० [सं० रवि] सूर्य। उ०—पावते मरम तौ नआवते जनक धाम जानहौं रूप देख वरहै रव के।—ह्वदयराम (शब्द०)।

रव (३)
संज्ञा पुं० [देश०] जहाज की चाल या गति। रूम। (लश०)।

रवक (१)
संज्ञा पुं० [देश०] रेंड़ नामक वृक्ष।

रवक (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वे मोती जो एक धरण (परिमाण) में ३० चढ़ते हों। २. तीस मोतियों का लच्छा जो तौल में बत्तीस रत्ती का हो।

रवकना
क्रि० अ० [हि० रमना (=चलना)] १. जल्दी से आगे बढ़ना। दौड़ना। लपकना। उ०—(क) सेमर खजूर जाय पूर रही शूर मग ताही के तुरंग तहाँ देख रवकत है।—ह्वदयराम (शब्द०)। (ख) नैन मीन सरवर आनन मै चंचल करत विहार। मानो कर्णफूल चारा को रवकत वारंबार।—सूर (शब्द०)। (ग) लीने बसन देखि उँचे द्रुम रवकि चढ़नि बलबीर की।— सूर (शब्द०)। (घ) परम सनेह बढ़ावत मातनि रवकि रवकि हरि बैठत गोद।—सूर (शब्द०)। २. उमगना। उछलना। उ०—यह अति प्रबल स्याम अति कोमल रवकि रवकि उर परते।—सूर (शब्द०)।

रवण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. काँसा नामक धातु। २. रव। शब्द। ३. कोयल। ४. उँट। ५. विदुषक या भाँड़।

रवण (२)
वि० १. शब्द करता हुआ। २. गरम। तप्त। ३. अस्थिर। चंचल।

रवण
वि० [संज्ञा पुं० (सं० रमण)] दे० 'रमन'।

रवणरेती
संज्ञा स्त्री० [हि० रमण + रेती] गोकुल के समीप यमुना किनारे की रेतीली भूमि, जहाँ श्रीकृष्ण ग्वालों के साथ खेला करते थे।

रवताई पु
संज्ञा स्त्री० [हि० रावत + आई (प्रत्य०)] १. राजा या रावत होने का भाव। २. प्रभुत्व। स्वामित्व। उ०—धन सा खेल खेल सह पेमा। रवताई औ कूस खेमा।—जायसी (शब्द०)।

रवथ
संज्ञा पुं० [सं०] कोयल।

रवन पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० रमण] पति। स्वामी। उ०—पिय निठुर बचन कहे कारन कबन। जानत हौ सबके मन को गाते मृदु चित परम कृपाल रवन।—तुलसी (शब्द०)।

रवन (२)
वि० रमण करनेवाला। क्रीड़ा करनेवाला। उ०—(क) राग रवन भाजन भवन शोभन श्रवण पवित्र।—केशव (शब्द०)। (ख) मन मन मनहुँ मिलिंद, रहत पास तब चरन के। करहु कृपा गोविंद, राधारवन कृपायतन।—गोपाल (शब्द०)।

रवना (१)
कि० अ० [सं० रमण] क्रीड़ा करना। रमण करना। उ०—जैसी रवै जयश्री करवालहि। ज्यों अलिनी जलजात रसालहिं।—केशव (शब्द०)।

रवना (२)
क्रि अ० [हि० रव(=शब्द०) ] शब्द करना। बोलना।

रवना ‡ (३)
संज्ञा पुं० [सं० रावण] दे० रावण। उ०—बहुतहिं असगढ़ कीन्हेस जोवना। अंत भई लंकापति रवना।—जायसी (शब्द०)।

रवनि, रवनी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० रमणी] १. स्त्री। भार्या। पत्नी। उ०—(क) राज रवनि गावत हरि को यश। रुदन करत सुत को समुझावति राखति श्रवणनि प्याइ सुघारस।—सुर (शब्द०)। (ख) गर्भस्त्रवहि अवनी रवनि सुनि कुठार गति घोर। परसु अछत देखउँ जियत बैरी भूप किशोर।—तुलसी (शब्द०)। २. रमणी। सुंदरी।

रवन्ना (१)
संज्ञा पुं० [फा़० रवाना] १. वह नौकर जो स्त्रियों के काम काज करने वा सौदा सुलफ लाने को ड्योढी़ पर रहता है। (मुसल०)। २. वह कागज जिसपर रवाना किए हुए माल का व्योरा होता है। ३. चुंगी आदि की वह रसीद या इसी प्रकार का कोई प्रमाणपत्र जो किसी जानेवाली चीज के साथ रहता है। राहदारी का परवाना।

रवन्ना (२)
वि० [फा़० रवनह्] दे० 'रवाना'।

रवाँ
वि० [फा़०] बहता हुआ। प्रवाहित। २. जारी। चलता हुआ। ३. मश्क किया हुआ। घोटा हुआ। अभ्यस्त। ४. पैंना। तेज। चोखा। (शस्त्र आदि)। ५. दे० 'रवाना'।

रवाँस
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का बोडा़ या लोबिया जिसकी तरकारी बनती है।

रवा (१)
संज्ञा पुं० [सं० रज, प्रा० रअ (=घुल)] १. किसी चीज का बहुत छोटा टुकड़ा। कण। दाना। रेजा। जैसे,—चाँदी का रवा; मिस्त्री का रवा। मुहा०—रवा भर =बहुत थोड़ा। जरा सा। २. सूजी। ३. बारूद का दाना। ४. घुघरूओं में शब्द करने के लिये डालने के छरें।

रवा (२)
वि० [फा़०] १. उचित। ठीक। वाजिब। २. प्रचलित। चलनसार।

रवाज
संज्ञा स्त्री० [फा़०] वह बात या कार्य जो किसी वंश, समाज या नगर आदि में बहुत दिनों से बराबर होता चला आया हो। परिपाटी। चाल। प्रथा। रस्म। चलन। रीति। क्रि० प्र०—चलना।—पाना।—होना। मुहा०—रवाज देना =प्रचलित करना। जारी करना। रवाज पकड़ना =धीरे धीरे प्रचार पा जाना। प्रचलित होना। जारी होना ।

रवादक
संज्ञा पुं० [सं०] वह मनुष्य जिसमें गिरवी रखे हुए धन को हजम कर लिया हो।

रवादार (१)
वि० [फा़० रवा + दार (प्रत्य०)] १. संबंध रखनेवाला। लगाव रखनेवाला। २. शुभचिंतक। हितैषी।

रवादार (२)
वि० [हि० रवा + फा़० दार] जिसमें कण या दाने हों। दानेदार। रवेवाला।

रवानगी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] रवाना होने की क्रिया या भाव। प्रस्थान। चाला।

रवाना
वि० [फा़० रवानह्] १. जिसने कहीं से प्रस्थान किया हो।जो कहीं से चल पड़ा हो। जो विदा या रुखसत हुआ हो। प्रस्थित। २. भेजा हुआ।

रवानी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. रवाँ होने का भाव। बहाव। प्रवाह। २. तीक्ष्णाता। घार। तेजी (को०)। ३. बिदाई। रुखसती। (को०)।

रवाब
संज्ञा पुं० [अं० रबाब] दे० 'रबाब'।

रवाबिया (१)
संज्ञा पुं० [देश०] लाल बलुआ पत्थर।

रवबिया (२)
संज्ञा पुं० [अं० रबाबिया] दे० 'रवाबिया'।

रवायत
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. कहानी। किस्सा। २. कहावत।

रवारवी
संज्ञा स्त्री० [फा़० रवा + अनु० रवी] १. जल्दी। शीघ्रता। २. भागाभाग। दौड़ादौड़।

रवासन
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का वृक्ष जिसके बीज और पत्ते ओषधि के रूप में काम में आते हैं।

रवि
संज्ञा पुं० [सं०] १.सूर्य। २. मदार का पेड़। आक। ३. अग्नि। उ०—बोले रवि नृप हवि यह लीजै। यथायोग्य निज रानिन दीजै।—विश्राम (शब्द०)। ४. नायक सरदार। ५. लाल अशोक का वृक्ष। ६. पुराणानुसार एक आदित्य का नाम। ७. एक पर्वत का नाम। ८. महाभारत के अनुसार धृतराष्ट्र के पुत्र का नाम। ९. बारह की संख्या (को०)।

रविकर
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य की किरण।

रविकांतमणी
संज्ञा पुं० [सं० रविकान्तमणि] सूर्यकांत नामक मणि। विशेष दे० 'सूर्यकांत'।

रविकुल
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्यवंश। विशेष—इस शब्द के अंत में रवि, मणि आदि शब्द लगने से उसका अर्थ 'रामचंद्र' होता है। जैसे,—रविकुल रवि, रवि- कुल माणि।

रविग्रह, रविग्रहण
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्यग्रहण [को०]।

रविग्रावा
संज्ञा पुं० [सं० रविग्रावन्] सूर्यकांत मणि [को०]।

रविचंचल
संज्ञा पुं० [सं० रविचञ्चल] लोलार्क नामक तीर्थस्थल जो काशी में है। उ०—रविचंचल अरू ब्रह्मद्रव बीच सुबास बिचारि तुलसीदास आसन करे अवनिसुता उर धारि।—सूधाकर (शब्द०)।

रविचक्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य का मंडल। २. सूर्य के रथ का पहिया। ३. फलित ज्योतिष में एक प्रकार का चक्र जो मनुष्य के शरीर के आकार का होता है और जिसमें यथास्थान नक्षत्र आदि रखकर बालक के जीवन की शुभ और अशुभ बातें जानी जाती है।

राविज
संज्ञा पुं० [सं०] शनैश्चर, जिनकी उत्पत्ति रवि या सूर्य से मानी जाती है। दे०'रवितनय'।

रविजकेतु
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार के केतु या पुच्छल तारे जिनकी उत्पत्ति सूर्य से मानी गई है। विशेष—कहते है, इनका आकार प्रायः हार के समान और वर्ण सोने के समान होता है और ये पूर्व या पश्चिम दिशा में दिखाई देते हैं।

रविजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] यमुना। कालिंदी।

रविजात
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य की किरण।

रविजेंद्र
संज्ञा पुं० [सं० रविजेन्द्र] जैनों के एक आचार्य का नाम।

रवितनय
संज्ञा पुं० [सं०] १. यमराज। २. सावर्णि। मन। ३. वैवस्वत मनु। ४. शनैश्वर। ५. सुग्रीव। ६. कर्ण। ७. अश्विनीकुमार। ८. बाली का एक नाम (को०)।

रवितनया
संज्ञा स्त्री० [सं०] सूर्य की कन्या, यमुना। उ०—(क) गए श्याम रवितनया के तट अंग लसति चंदन की खोरी।— सूर (शब्द०)। (ख) जमुना जल बिहरत नँदनंदन संग मिली सुकुमारि। सूर धन्य धरनी वृंदाबन रवितनया सुखकारि।— सूर (शब्द०)।

रवितनुजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] यमुना।

रवितीर्थ
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार एक प्राचीन तीर्थ का नाम।

रविदिन
संज्ञा पुं० [सं०] रविवार। एतवार।

रविध्वज
संज्ञा पुं० [सं०] दिन। दिवस [को०]।

रविनंद, विनंदन
संज्ञा पुं० [सं० रविनन्द, रविनन्दन] १. कर्ण। उ०—गुरूहि नाइ सिर भेंटि पुनि अति हित द्रोण कुमार। मग महँ मिलि रविनंदनाहि जात भए आगार।—सबल (शब्द०)। २.सुग्रीव। उ०—रविनंदन जब मिले राम को अरू भेंटे हनुमान। अपनी बात कही उन हरि सों बालि बड़ो बलवान।—सूर (शब्द०)। ३. सावर्णि मनु। ४. वैवस्वत मनु। ५. शनि। ६. यम। उ०—काहे को सोच करे रसखानि कहा करिहै रविनंद विचारी। ७. अश्विनीकुमार।

रविनंदिनि पु, रविनंदिनी
संज्ञा स्त्री० [रविनन्दिनी] .यमुना। उ०—बिधि निषेधमय कलिमल हरनी। कर्मकथा रविनंदिनि बरनी।—तुलसी (शब्द०)।

रविनाथ
संज्ञा पुं० [सं०] १. पद्म। कमल। २. दुपहरिया का फूल। बंघुजीव। बंघूक (को०)।

रविनेत्र
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु [को०]।

रविपुत्र
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'रविनंदन'।

रविपुत पु
संज्ञा पुं० [सं० रवि + हि० पूत] दे० 'रविनंदन'।

रविप्रिय
संज्ञा पुं० [सं०] १. लाल कमल। २. ताँबा। ३. लाल कनेर। ४. मदार। आक। ५. लकुच या लकुट नामक फल या उसका वृक्ष।

रविप्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुराणानुसार देवी की एक मुर्ति।

रविबिंब
संज्ञा पुं० [सं० रविबिम्ब] १. सूर्य का मंडल। २. माणिक्य। मानिक।

रविमंडल
संज्ञा पुं० [सं० रविमण्डल] वह लाल मंडल या गोला जो सूर्य के चारों ओर दिखाई देता है। रविबिंब। उ०—(क) जयति वात संजात जयति रविमंडल ग्रासक।—विश्राम(शब्द०)। (ख) रविमंडल जनु जाल काटि विधि धरे नखत गन।— गिरधर (शब्द०)।

रविमणि
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्यकांत मणि।

रविरत्न
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्यकांत नामक मणि।

रविरत्नक
[सं०] माणिक्य। मानिक।

रविलोचन
संज्ञा पुं० [सं०] १.विष्णु। २. शिव (को०)।

रविलौह
संज्ञा पुं० [सं०] ताँबा।

रविवंश
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्यकुल।

रविवंशी
संज्ञा पुं० [सं० रविवंशिन्] सूर्यकुल में उत्पन्न। सूयवंशी।

रविवाण
संज्ञा पुं० [सं०] वह वाण जिसके चलाने से सूर्य का सा प्रकाश उत्पन्न हो। उ०—खग शायक पिप्पील प्रमाणा। अंधकार औरहु रविवाणा।—सवल (शब्द०)।

रविवार
संज्ञा पुं० [सं०] सप्ताह के सात दिनों या वारों में से एक जो सूर्य का वार माना जाता है और जो शनिवार के बाद तथा सोमवार के पहले पड़ता है। श्रादित्यवार। एतवार। उ०— फागुन बदी चौदस शुभ दिन और रविवार सुहायो।—सूर (शब्द०)।

रविवासर
संज्ञा पुं० [सं०] रविवार। एतवार।

रविश
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. गति। चाल। २. तौर। तरीका। ढंग। ३. क्यारियों के बीच में चलने के लिये बना हुआ छोटा मार्ग। क्रि० प्र०—कटना।—काटना।

रविसंक्राति
संज्ञा स्त्री० [सं० रविसङ्क्रान्ति] सूर्य का एक राशि में से दूसरी राशी में जाना। सूर्यसंक्रमण। विशेष दे० 'संक्रांति'।

रविसंज्ञक
संज्ञा पुं० [सं०] ताँबा।

रविसारथि
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य के सारथि। अरूण। २. अरूणोदय। उषःकाल (को०)।

रविसुंदर
संज्ञा पुं० [सं० रविसुन्दर] बैद्यक में एक प्रकार का रस जो भगंदर के लिये बहुत उपकारी माना जाता है।

रविसुअन पु
संज्ञा पुं० [सं० रविसूनु] १. सूर्य के पुत्र, अश्विनी- कुमार। उ०—किधौं रविसुअन मदन ऋतुपति किधौं हरिहर वेष बनाए।—तुलसी (शब्द०)। २. दे० 'रविनंदन'।

रविसुत
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'रविनंदन'।

रविसूनु
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'रविनंदन'।

रवीषु
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव।

रवैया ‡
संज्ञा पुं० [फा़० रविश या रवाँ + ऐया (प्रत्य०)] १. चलन चाल चलन। २. तौर तरीका। ढंग। यौ०— रंग रवैया = रंग ढंग। तौर तरीका।

रशना
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जीभ। २. रस्सी। ३. करधनी तागड़ी। ४. लगाम। वल्गा (को०)।

रशनाकलाप
संज्ञा पुं० [सं०] धागे आदि के बनी हुई एक प्रकार की करधनी जो प्राचीन काल में स्त्रियाँ कमर में पहनती थीं।

रशनागुण
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'रशनाकलाप'।

रशनोपमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] रसनोपमा नामक अंलकार। विशेष दे० 'रसनोपमा'।

रशक
संज्ञा पुं० [फा०] १ किसी दूसरे को अच्छी दशा में देखकर होनेवाली जलन या कुढ़न। ईर्ष्या। डाह। २. लज्जा। शरम। (क्व०)।

रश्मि
संज्ञा पुं० [सं०] १. किरण। २. पलक के रोएँ। बरौनी। ३. घोड़े की लगाम। बाग। ४. रज्जु। रस्सी (को०)। ५. चाबुक। अंकुश (को०)। ६. नापने की रस्सी (को०)।

रश्मिकलाप
संज्ञा पुं० [सं०] मोतियों का वह हार जिसमें ६४ या ५४ लड़ियाँ हों।

रश्मिकेतु
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक राक्षस का नाम। २. वह केतु या पुच्छल तारा जो कृत्तिका नक्षत्र में स्थिर होकर उदित हो। कहते है, इसकी चोटी में धुआँ रहता है और इसका फल सातवें केतु के समान होता है।

रश्मिक्रीड़
संज्ञा पुं० [सं० राशमक्रिड] रामायण के अनुसार एक राक्षस का नाम।

रश्मिग्राह
संज्ञा पुं० [सं०] सारथी [को०]।

रश्मिपति
संज्ञा पुं० [सं०] एक क्षुप। आदित्यपत्र [को०]।

रश्मिप्रभास
संज्ञा पुं० [सं०] एक वृद्ध का नाम।

रश्मिमाली
संज्ञा पुं० [सं० रशिममालिन्] सूर्य [को०]।

रश्मिमुच
संज्ञा पुं० [सं० रशिममुच्] सूर्य [को०]।

रस
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह अनुभव जो मुँह में डाले हुए पदार्थों का रसना या जीभ के द्बारा होता है। खाने की चीज का स्वाद। रसनेंद्रिय का संवेदन या ज्ञान। विशेष—हमारे यहाँ वैद्यक में मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय ये छह रस माने गए है और इसकी उत्पत्ति भूमि, आकाश, वायु और अग्नि आदि के संयोग से जल में मानी गई है। जैसे—पृथ्वी ओर जल के गुण की अधिकता से मधुर रस, पृथ्वी और अग्नि के गुण की अधिकता से अम्ल रस, जल और अग्नि के गुण की अधिकता से तिक्त रस और पृथ्वी तथा वायु की अधिकता से कषाय रस उत्पन्न होता है। इन छहों रसों के मिश्रण से और छत्तीस प्रकार के रस उत्पन्न होते है। जैसे,—मधुराम्ल, मधुरतिक्त, अम्ललवण, अम्लकटु, लवणकटु, लवणतिक्त, कटुतिक्त, तिक्तकषाय आदि। भिन्न भिन्न रसों के भिन्न भिन्न गुण कहे गए हैं। जैसें,—मधुर रस के सेवन से रक्त, मांस, मेद, अस्थि और शुक्र आदि की वृद्धि होती है; अम्ल रस जारक और पाचक माना गया है; लवण रस पाचक और संशोधक माना गया है; कटु रस पाचक, रेचक, अग्नि दीपक और संशोधक माना गया है; तिक्त रस रूचिकर और दिप्तिवर्धक माना गया है; ओर कपाय रस संग्राहक और मल, मूत्र तथा श्लेष्मा आदि को रोकनेवाला माना गया है। न्याय दर्शन के अनुसार रस नित्य और अनित्य दो प्रकार काहोता है। परमाणु रूप रस नित्य और रसना द्बारा गृहीत होनेवाला रस अनित्य कहा गया है। २.छह की संख्या। ३. वैद्यक के अनुसार शरीर के अंदर की सात धातुओं में से पहली धातु। विशेष— सुश्रुत के अनुसार मनु्ष्य जो पदार्थ खाता है, उससे पहले द्रव स्वरूप एक सूक्ष्म सार बनता है, जो रस कहलाता है। इसका स्थान ह्वदय कहा गया है। जहाँ से यह घमनियों द्बारा सारे शरीर में फैलता है। यही रस तेज के साथ मिलकर पहले रक्त का रूप धारण करता है और तब उससे मांस, मेद, अस्थि, शुक्र आदि शेष धातुएँ बनती है। यदि यह रस किसी अस्थि अम्ल या कटु हो जाता है, तो शरीर में अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न करता है। इसके दूषित होने से अरूचि, ज्वर शरीर का भारीपन, कृशता, शिथिलता, द्दष्टिहीनता आदि अनेक विकार उत्पन्न होती है। पर्या०—रसिका। स्वेदमाता। चर्माभ्ल। चर्मसार। रक्तसार। ४. किसी पदार्थ का सार। तत्व। ५. साहित्य में वह आनंदात्मक चित्तवृत्ति या अनुभव विभाव, अनुभाव और संचारी से युक्त किसी स्थायी भाव के व्यंजित होने से उत्पन्न होता है। मन में उत्पन्न होनेवाला वह भाव या आनंद जो काव्य पढने अथवा अभिनय देखने से उत्पन्न होता है। विशेष— हमारे यहाँ आचार्यों में इस विषय में बहुत मतभेद है कि रस किसमें तथा कैसे अभिव्यक्त होता है। कुछ लोगोँ का मत है कि स्थायी भावों की वस्ताविक अभिव्यक्त मुख्य रूप से उन लोगों में होती है, जिनके कार्यों का अभिनय किया जाता है। (जैसे,—राम, कृष्ण, हरिश्चंद्र आदि) और गौण रूप से अभिनय करनेवाला नटों, में होता है। अतः इन्हीं में ये लोग रस की स्थिति मानते है। ऐसे आचार्यों का मत है कि अभिनय देखनेवालों या काव्य पढनेवालों के साथ रस का कोई संबंध नहीं है। इसके विपरीत अधिक लोगों का यह मत है कि अभिनय देखनेवालों तथा काव्य पढनेवालों में ही रस की अभिव्यक्ति होती है। ऐसे लोगों का कथन है कि मनुष्य के अंतःकरण में भाव पहले से ही विद्यमान रहते है; और काव्य पढने अथवा नाटक देखने के समय वही भाव उद्दीप्त होकर रस का रूप धारण कर लेते है। और यही मत ठीक माना जाता है। तात्पर्य यह कि पाठकों या दर्शकों को काव्यों अथवा अभिनयों से जो अनिर्वचनीय और लोकोत्तर आनंद प्राप्त होता है, साहित्य शास्त्र के अनुसार वही रस कहलाता है। हमारे यहा रति, हास, शोक, उत्साह, भय, जुगुप्सा, आश्चर्य और निर्वेद इन नौ स्थायी भावों के अनुसार नौ रस माने गए है; जिनके नाम इस प्रकार है।—शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अदभुत और शांत। द्दश्य काव्य के आचार्य शांत को रस नहीं मानते। वे कहते है कि यह तो मन की स्वाभाविक भावशून्य अवस्था है। निर्वेद मन का कोई विकार नहीं है। अतःवे रसों की संख्या आठ ही मानते है। और कुछ लोग इन नौ रसों के सिवा एक और दसवाँ रस 'वात्सल्य' भी मानते है। ६. नौ की संख्या। ७. सुख का अनुभव। आनंद। मजा। उ०— (क) यह जानिए वर दीन। पितु ब्रह्म के रसलीन।—केशव (शब्द०)। (ख) जेहि किए जीव निकाम वस रस हीन दिन दिन अति नई।—तुलसी (शब्द०)। (ग) ओठ खंडिए कौ अरयौ मुख सुवास रस मत्त। स्याम रूप नँदलाल अलि नहिं अलि अलि उन्मत।—मतिराम (शब्द०)। मुहा०—रस भीजना या भीनना =(१) किसी पदार्थ का ऐसा समय आना जब उसके द्बारा आनंद उत्पन्न हो। मजे का वक्त आना। (२) तरूणाई प्रकट होना। यौवन का आंरभ या संचार होना। उ०—ह्याँ इनके रस भीजत त्यों द्दग ह्याँ उनके मसि भीजत आवै।—पद्माकर (शब्द०)। ८. प्रेम। प्रिति। मुहब्बत। यौ०—रस रंग =(१) प्रेम के द्बारा उत्पन्न होनेवाला आनंद। मुहब्बत का मजा। (२) प्रेमक्रीड़ा। कोलि। रस रीति =प्रेम के व्यवहार। मुहब्बत का बरताव। उ०—(क) प्रीति की वधिक रसरीति को अधिक नीति निपुन विवेक है निदेस देसकाल को।—तुलसी (शब्द०)। (ख) इष्ट मिलै और मन मिलै मिलै सकल रस रीति।—कबीर (शब्द०)। रस की रीति = रसरिति। उ०—और को जानै रस की रीति। कहाँ हौं दीन कहाँ त्रिभुवनपति मिले पुरातन प्रीति। चतुरानन तन निमिष न चितवत इती राज की नीति।—सूर (शब्द०)। ९. कामक्रीड़ा। केलि। बिहार। उ०—दलित कपोल रद दलित अधर रुचि रसना रसनि रस रस में रिसाति है।—केशव (शब्द०)। १०. उमंग। जोश। वेग। उ०—(क) आजान- बाहु परकाज रत स्वामिभक्त रस रंग नय।—गुमान (शब्द०)। (ख) जल कारन प्रन किए करत रस रत ललकारन। श्याम अनुज बल धाम बने सँग सुभट हजारन।—गोपाल (शब्द०)। ११. गुण। सिफत। उ०—(क) सम रस समर सकोच बस बिबस न ठिकु ठहराय। फिरि फिरि उझकति फिरि दुरति दुरि दुरि उझकति जाय।—बिहारी (शब्द०)। (ख) तिहुँ देवन की द्युति सी दरसै गति सोषै त्रिदोषन के रस की।—केशव (शब्द०)। १२. किसी विषय का आनंद। उ०— जो जो जेहि जेहि रस मह, तहँ सो मुदित मन मानि।—तुलसी (शब्द०)। १३. कोई तरल या द्रव पदार्थ। १४. जल। पानी। १५. वनस्पतियों या फलों आदि में का वह जलीय अंश जो उन्हें कूटने, दबाने या निचोंड़ने आदि से निकलता है। जैसे,—ऊख का रस, आम का रस, तुलसी का रस अदरक का रस। १६. शोरबा। जूस। रसा। १७. वह पानी जिसमें मीठा या चीनी घुली हुई हो। शरबत १८. वृक्ष का निर्यास। जैसे,—गोंद, दुघ, मद आदि। १९. लासा। लूआब। २०. घोडो़ और हाथियों का एक रोग जिसमें उनके पैरों में से जहरीला पानी बहता है। २१. वीर्य।२२. राग। २३. विष। जहर। २४. पारा। २७. हिंगुल शिंगरफ। २८. वैद्यक में घातुओं को फूँककर तैयार किया हुआ भस्म, जिसका व्यवहार औषध के रूप में होता है। जैसे,—रससिंदुर। २९. पहले खिंचाव का शोरा जो बहुत तेज और अच्छा होता है। ३०. आनंदस्वरूप व्रह्म। (उपनिपद्)। ३१. केशव के अनुसार रगण और सगण। उ०—मगन नगन को मित्र गनि यगन भगन को दास। उदासीन जन जानिए रस रिपू केशव दास।—केशव (शब्द०)। ३२. बोल नामक गंघद्रव्य। ३३. एक प्रकार की भेड़ जो गिलगित (गिलगिट) से उत्तर और पमीर मे पाई जाती है। ३४. भाँति। तरह। प्रकार। रूप। उ०—एक ही रस दुनी न हरष सोक साँसति सहति।—तुलसी (शब्द०)। ३५. मन की तरंग। मौज इच्छा। उ०—तिनका बयारि के बस। ज्यों भावे त्यों उड़ाइ लै जाइ अपने रस।—स्वामी हरिदास (शब्द०)। ३६. सोना (को०)। ३७. दुध। जैसे—गोरस (को०)।

रसक
संज्ञा पुं० [सं०] १. फिटकिरी। २. खपरिया। संगे बसरी। ३. मास का रसा। शोरवा (को०)।

रसककार वेल्लक
संज्ञा पुं० [सं०] पतला खपरिया। संगे बसरी।

रसक दर्दुर
संज्ञा पुं० [सं०] दलदार मोटा खपरिया या संगे बसरी।

रसकपुर
संज्ञा पुं० [सं० रसकर्पूर] सफेद रंग की एक प्रकार की प्रसिद्ध उपघातु जिसका व्यवहार औषध में होता है। विशेष—यह प्रायः ईगुर के समान होता है, इसीलिये इसे कुछ लोग सफेद शिंगरफ भी कहते हैं। एक और प्रकार का रसकपूर होता है, जो वास्तव में पारे की सफेद भस्म होती है। इसका व्यवहार प्रायः यूनानी चिकित्सा में होता है और यह खुजली, उपदंश आदि में उपयोगी माना जाता है।

रसकर्म
संज्ञा पुं० [सं० रसकर्मन्] पारे की सहायता से रस आदि तैयार करने की क्रिया (वैद्यक)।

रसका
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार का क्षुद्र कुष्ट रोग।

रसकुल्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुराणानुसार कुशद्धीप की एक नदी का नाम।

रसकेलि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बिहार। क्रिड़ा। २. हँसी। ठट्ठा। दिल्लगी। मजाक।

रसकेसर
संज्ञा पुं० [सं०] कपूर।

रसकेसरी
संज्ञा पुं० [सं० रसकेशरिन्] एक प्रकार को रसौषध जो पारे, गंधक और लौंग आदि के मेल से तैयार की जाती हैं और अरुचि, अग्निमांद्य, आमवात, विसूचिका, आदि रोगों में उपयोगी मानी जाती है (वैद्यक)।

रसकोरा
संज्ञा पुं० [हि० रस + कौर] रसगुल्ला नाम की मिठाई। उ०—हरिवल्लभ अरू रमा। विलासे। रसकोरे बोरे रस खासे।—रघुराज (शब्द०)।

रसखर्पर
संज्ञा पुं० [सं०] खपरिया। संगबसरी।

रसखान (१)
वि० [हिं०] रसयुक्त। रसावाला। प्रेमी। उ०— क्या वताऊँ क्यो नहों आए सजन रसखान? रे कवि लिख विरह के गान।— क्वासि पृ० ५।

रसखान (२)
संज्ञा पुं० [हिं० रस+खान] एक भक्ति कवि जो गोस्वामी विट्ठलनाथ जी के शिष्य और उनके २५२ मुख्य शिष्यों में थे। इनका समय संवत् १६४० से १६८५ मान्य है।

रसखोर
संज्ञा स्त्री० [हिं० रस+खोर] चानी के शर्बत अथवा ऊख के रस में पकाए हुए चावल। मीठा भात।

रसगंध
संज्ञा पुं० [सं० रसगन्ध] दे० 'रसगंधक'।

रसगंधक
संज्ञा पुं० [सं० रसगन्धक] १. गंधक। २. बोल नामक गंध द्रव्य। ३. रसौत। रसांजन। ४. हिगुल। शिगरफ। ईगुर।

रसगत ज्वर
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्यक के अनुसार शरीर की रसधातु में समाया हुआ ज्वर। विशेष— कहते है कि ज्वर अधिक दिनों का हो जाने से शरीर के रस तक में पहुँच जाता है और उससे ग्लानि, वमन और अरुचि आदि होती है।

रसगर्भ
संज्ञा पुं० [सं०] १. रसौत। रसाजंन। २. शिगरफ। हिगुल। ईगुर।

रसगुनी †
संज्ञा स्त्री० [सं० रस+गुणी] काव्य या संगीत, शास्त्र का ज्ञाता। उ०— श्री हरिदास के स्वामी स्यामाँ को मेरु सरस भयो और रसगुनी परे फीके —हरिदास (शब्द०)।

रसुगुल्ला
संज्ञा पुं० [हिं० रस+गोला] एक प्रकार की छेने की मिठाई जो गुलाब जामुन के समान गोल होती है और शीरे में पगी हुई होती है।

रसग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] जीभ।

रसघन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] आनंदधन, श्रीकृष्म चंद्र।

रसघन (२)
वि० जो बहुत अधिक स्वादिष्ट हो।

रसघ्न
संज्ञा पुं० [सं०] सुहागा।

रसछन्ना †
संज्ञा पुं० [हिं० रस+छन्ना(=छानने की चीज)] [स्त्री० अल्पा०, रसछन्नी] ऊख का रस छानने की चलनी।

रसज
संज्ञा पुं० [सं०] १. गुड़। २. रसौत। रसांजन। ३. शराब की तलछट। सुरावीज।

रसजात
संज्ञा पुं० [सं०] रसौत। रसांजन।

रसज्ञ
वि० [सं०] [वि० स्त्री० रसज्ञा] १. वह जो रस का ज्ञाता हो। रस जाननेवाला। २. काव्यमर्मज्ञ। साहित्य के मर्म का जानकार। ३. रसायनी। ४. निपुण। कुशल। जानकार।

रसज्ञता
संज्ञा स्त्री० [सं०] रसज्ञ होने का भाव।

रसज्ञा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. गंगा। २. जीभ।

रसज्ञा (२)
वि० स्त्री० [सं०] दे० 'रसज्ञ'।

रसज्येष्ठ
संज्ञा पुं० [सं०] १. मधुर या मीठा रस। २. शृंगार रस जो साहित्य में नौ रसों में प्रधान है।

रसड़ली
संज्ञा स्त्री० [हिं० रस+ड़ली] एक प्रकार का गन्ना जिसका रंग पीलापन लिए हरा होता है और जो प्रायः बीजापुर ओक उसके आस, पास बहुत होता है। रसवली।

रसड़ी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० रसरी] दे० 'रसरी'। उ०— प्रेम रसड़ी बाँधी गले। खैचे चले उधर चले।— दक्खिनी० पृ० १००।

रसणा पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० रसना] दे० 'रसना'। उ०— दान सदा वितासारूं, दैवै, नित, रसण लेवै हरिनाम। —रघु० रू०, पृ० २४।

रसतन्मात्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पाँच तन्मात्राओँ या महत्तत्वों में से चौथे तत्व की तन्मात्र। (साख्य)। विशेष दे० 'तन्मात्र'।

रसता
संज्ञा स्त्री० [सं०] रस का भाव या धर्म। रसत्व।

रसतालेश्वर
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्यक में एक प्रकार का रस।> विशेष— इसका व्यवहार कुष्ट रोग में होता है। यह शंख, करंज, हलदी, मिलावा, घोकुआर, गदहपूरना, गंधक, पारे और विड़ग आदि के योग से बनाया जाता है।

रसतेज
संज्ञा पुं० [सं० रसतेजस] रक्त। लहु। खून।

रसत्याग
संज्ञा पुं० [सं०] दूध, दही, घी, तेल, मीठा, पकवान आदि स्वादिष्ट पदार्थो का त्याग करना, जो एक प्रकार का नियम या आचार माना जाता है (जैन)।

रसत्व
संज्ञा पुं० [सं०] रस का भाव या धर्म। रसता।

रसद (१)
वि० [सं०] १. आनंददायक। सुखद। उ०—(क) रसद बिहारी वंदे वल्लभा राधिका निसदिन रंग रंगी। —स्वा० हरिदास (शब्द०)। (ख) रसग श्री हरिदास बिहारी अंग अंग मिलत अतन करत सुरति आरभटी।— हरिदास, (शब्द०)। २. स्वादिष्ट। मजेदार। जायकेदार।

रसद (२)
संज्ञा पुं० चिकित्सा करनेवाला। इलाज करनेवाला व्यक्ति।

रसद (३)
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. वह जो बँटने पर हिस्से के अनुसार मिले। बाँट। बखऱा। मुहा०— हिस्सा रसद=बँटने पर अपने अपने हिस्से के अनुसार लाभ। २. कच्चा अनाज जो पकाया न गाया हो। भोजन बनाने के लिये अन्न आदि। गल्ला। ३. सेना का वह खाद्य पदार्थ जो उसके साथ रहता है।

रसदा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सफेद निर्गुड़ी। सँभालू। सिंधुआर।

रसदार
वि० [हिं० रस+दार (प्रत्य०)] १. जिसमें किसी प्रकार का रस हो। रसवाला। जैसे,— रसदार आम, रसदार नींबू। २. स्वादिष्ठ। मजेदार। ३. झोलदार। शोरबेदार रसवाला।

रसदालिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] पौढ़ा। गन्ना।

रसद्रावी
संज्ञा पुं० [सं० रसद्राविन्] मीठा जैवीरी। नीबू।

रसधातु
संज्ञा पुं० [सं०] १. पारा। २. शरीर की सात धातुओं में से रस नामक धातु। विशेष दे० 'रस'।

रसधेनु
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुराणानुसार गुड़ आदि की बनाई हुई वह गौ जो दान की जाती है।

रसन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्वाद लेना। चखना। २. ध्वनि। ३. जीभ। जबान। ४. कफ का एक नाम।

रसन (२)
वि० पसीना लानेवाला (औषध आदि)।

रसन (३)
संज्ञा पुं० [सं० रशना या अं० लासन] रस्सा। (लश)।

रसना (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जिह्वा। जीभ। जवान। यौ०— रसनामल=जीभ की मैल। रसनामूल=जीभ का मूल भाग। रसानारद=दे० 'रसानारव'। रसनालिह=श्वान। कुत्ता। मुहा०— रसना खोलना=बोलना आरंभ करना। उ०— हीरामन रसना रस खोला। दै असीस करि अस्तुति बोला।— जायसी (शब्द०)। रसना तालू (तारू) से लगाना=बोलना बंद करना। चुप होना। उ०— रसना तारू सो नहि लावत पीवै पीव पुकारत।—सूर (शब्द०)। २. न्याय के अनुसार रस या स्वाद, जिसका अनुसार रसना या जीभ से किया जाता है। ३. रास्ना या नागदौनी नाम की ओषधि। ४. गंधभद्रा नाम की लता। ५. करधनी। मेखला। ६. रस्सी। रज्जु। ७. लगाम। ८. चंद्राहार।

रसना (२)
क्रि० अ० [हिं० रस+ना (प्रत्य०)] १. धीरे धीरे बहना या टपकना। जैसे,— छत में से पानी रसना। २. गीला होकर या पानी से भरकर धीरे धीरे जल यौ और कोई द्रव पदार्थ छोड़ना या टपकाना। जैसे,— चंद्रकांत मणि चंद्रमा को देखकर रसने लगती है। मुहा०— रस रस या रसे रसे=धीरे धीरे। आहिस्ते आहिस्ते। शनैः शनैः । उ०—(क) रस रस सूख सरित सर पानी। ममता ज्ञान करहिं जिमि ज्ञानी।—तुलसी (शब्द०)। (ख) चंचलता अपनी तजिकै रस ही सों रस सुंदर पीजियो।— परताप (शब्द०)। ३. रस में मग्न होना। रस से पूर्ण होना। प्रफुल्लित होना। उ०— सूर प्रभु नागरी हँसति मन मन रसति बसत मन श्याम बंड़े भागे।—सूर (शब्द०)। ४. तन्मय होना। परिपूर्ण होना। उ०— (क) चंपकली दल हूँ ते भली पद अँगुलि बाल की रूप रसे है। —केशव (शब्द०)। (ख) बाँक विभूषण प्रेम ते जहाँ होहिं विपरीत। दर्शन रस तन मन रसत गनि विभ्रम के गीत। —केशव (शब्द०)। ५. रसपान करना। रस लेना। उ०— शिवपूजन हित कनक के कुसूम रसत अलिजाला। मयन नृपति जग जीत की बजी मनौ करनाल।—गुमान (शब्द०)। ६. प्रेम में अनुरक्त होना। मुहब्बत में पड़ना। उ०— (क) किन सँग रसलु किन सँग बसलू किन सँग रचलू धमार।— कबीर (शब्द०)। (ख) तब गोपी रस रसी राम किरपा द्विज- राजी।— सुधाकर (शब्द०)।

रसनाथ
संज्ञा पुं० [सं०] पारा।

रसनापद
संज्ञा पुं० [सं०] नितंब। चूतड़।

रसनाभ
संज्ञा पुं० [सं०] रसांजन। रसौत।

रसनायक
संज्ञा पुं० [सं०] १. शिव का एक नाम। २. पारद। पारा।

रसनारव
संज्ञा पुं० [सं०] पक्षी, जिन्हें बोलने के लिये केवल जीभ हो होती है, दाँत नहीं होते।

रसनि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० रसन] स्वाद। चाट। उ०—जवनि रसनि लागी तुमहीं काँ तौनिउ रसनि मिटावहु।— जग०, बानी, पृ० २३।

रसनिर्यास
संज्ञा पुं० [सं०] शाल का वृक्ष।

रसनीय
वि० [सं०] १. स्वाद लेने योग्य। चखने लायक। २. स्वा- दिष्ठ। मजेदार।

रसनेंद्रिय
संज्ञा स्त्री० [सं० रसनेन्द्रिय] रसना, जिससे स्वाद या रस लिया जाता है। जीभ।

रसनेत्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] मैनसिल।

रसनेष्ट
संज्ञा पुं० [सं०] ऊख। गन्ना।

रसनोपमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की उपमा जिसमें उपमात्रों की एक शृंखला बँधी होती है और पहले कहा हुआ उपमेय आगे चलकर उपमान होता जाता है। यह 'उपमा' और 'एकावली' को मिलाकर बनाया गया है। इसे गमनोपमा भी कहते है। जैसे; बंस सम बखत, बखत सम ऊँची मन, मन सम कर, कर सम करी दान के।

रसपति
संज्ञा पुं० [सं०] १. चंद्रमा। उ०— राजपति रामापति रमापति राधापति रसपति रासपति रसापति रामपति। —केशव (शब्द०)। २. पृथ्वीपति। राजा। ३. पारा। ४. रसराज। शृंगार रस। ५. धरती। पृथ्वी।

रस परित्याग
संज्ञा पुं० [सं०] जैनों के अनुसार दुध, दही, चीनी नमक या इसी प्रकार का और कोई पदार्थ विल्कुल छोड़ देना और कभी ग्रहण न करना।

रसपपटी
संज्ञा स्त्री० [सं०] वैद्यक में एक प्रकार का रस जो पारे की शोधकर बनाया जाता है और जिसका व्यवहार संग्रहणी, बवासीर, ज्वर, गुल्म, जलोदर आदि में होता है।

रसपाकज
संज्ञा पुं० [सं०] १. गुड़। २. चीनी।

रसपाचक
संज्ञा पुं० [सं०] भोजन बनानेवाला। रसोइया।

रसपुष्प
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्दाक में एक प्रकार की दवा जो गंधक, पारे और नमक से बनाई जाती।

रसपूर्तिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मालकंगनी। २. शातावर।

रसप्रबंध
संज्ञा पुं० [सं० रसप्रबन्ध] १. नाटक। २. वह कविता या काव्य जिसमें एक ही विषय बहुत से परस्सर संबद्ध पद्यों में कहा गया हो। प्रबंध काव्य।

रसकल
संज्ञा पुं० [सं०] १. नारियल का वृक्ष। २. आँवला।

रसबंधकर
संज्ञा पुं० [सं० रसबन्धकर] सोम लता।

रसबंधन
संज्ञा पुं० [सं० रसबन्धन] शरीर के अंतर्गत नाड़ी के एक अंश का नाम। (वैद्यक)।

रसबत्ती
संज्ञा स्त्री [सं० रस+हिं० बत्ती] एक प्रकार का पलीता जिसका व्यवहार पुराने ढ़ंग की तोपें और बंदूकें चलानें में होता था।

रसबरी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'रसभरी'।

रसबेद पु
संज्ञा पुं० [सं० रस+वेद] कामशास्त्र। उ०— मदनाकुंस रसवेद मत, षट अंगुल परिमान। इह परकीरति जो पुरुष, सोई ससा बखान। —चित्रा० पृ० २१३।

रसभरी
संज्ञा स्त्री० [अं० रैस्पबेरी] एक प्रकार का स्वादिष्ठ फल। विशेष— पकने पर इसका रंग पीलापन लिए लाल हो जाता है। यह जाड़े के अंत में प्रायः बाजारों में मिलता है।

रसभव
संज्ञा पुं० [सं०] रक्त। खून। लहु।

रसभस्म
संज्ञा पुं० [सं०] भस्म किया हुआ पारा। पारे का भस्म।

रसभीना
वि० [हिं० रस+भीवना] [वि० स्त्री० रसभीनी] १. आनंद में मग्न। २. आर्द्र। तर। गीला। उ०— शोभा सर लीन कुवलय रसभीन नलिन नवीन किधों नैन बहु रंग है।— केशव (शब्द०)। ३. मादकता से पूर्ण। मस्ती देनेवाला। मस्त करनेवाला। रस से सरावोर करनेवाला।

रसभेद
संज्ञा पुं० [सं०] १. वैद्यके में एक प्रकार की औषध जो पारे से तैयार की जाती है। २. साहित्य शास्त्र में रसों का भेदोपभेद।— उ०— भावभेद रसभेद अपारा। कबित दोष गुन बिबिध प्रकार। —मानस, १। ९।

रसभेदी
संज्ञा पुं० [सं० रसभेदिन्] वह पका हुआ फल जो रस आदि की अधिकता से फट जाय और जिसमें से रस बहने लगे।

रसमंडूर
संज्ञा पुं० [सं० रसमण्डूर] वैद्यक में एक प्रकार की रसौषध जो ह़ड़ के योग से गंधक और मंडूर से बनाई जाती है और जिसका व्यवहार शूल रोग में होता है।

रसम
संज्ञा स्त्री० [अं० रस्म] दे० 'रस्म'। यौ०— रसमरिवाज।

रसमर्दन
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्यक में पारे की भस्म करने या मारने की क्रिया।

रसमल
संज्ञा पुं० [सं०] शरीर से निकलनेवाला किसी प्रकार का मल। जैसे,— विष्ठा, मुत्र, पसीना, थूक आदि।

रसमसा पु
वि० [हिं० रस+मस (अनु०)] [वि० स्त्री० रसमसी] १. रंग से मस्त। आनंदमग्न। अनुरक्त। उ०— खेलत अति रसमसे लाल रँग भीने हो। अतिरस केलि विशाल लाल रँगभीने हो।— सूर (शब्द०)। २. तर। गीला। उ०— दलदल जो हो रही है हरेक जा पै रसमसी। रस मर मिटा है मर्द तो औरत कहीं फँसी।— —नजीर (शब्द०)। ३. पसीने से भरा। आंत।

रसमसाना पु
क्रि० अ० [हिं० रसमस] रंग वा आनंद में मग्न होना। रस बरसना।

रसमाणिक्य
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्यक में एक प्रकार की औषध जो हरताल से बनाई जाती है और जौ कुष्ठ आदि रोगों में उपकारी मानी जाती है।

रसमाता पु (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० रसमातृका] जीभ। रसना। जवान। (डि०)।

रसमाता (२)
वि० [सं० रसमत्त] आनंद वा मद के कारण मत्त।

रसमातृका
संज्ञा स्त्री० [सं०] जीभ। जवान।

रसमारण
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्यक में वह क्रिया जिससे पारा मारा या शुद्ध किया जाता है।

रसमाला
संज्ञा स्त्री० [सं०] शिलारस नामक सुगंधित द्रव्य।

रसमि
संज्ञा स्त्री० [सं० रश्मि] १. किरण। उ०—तो जू मान तजहुगी भामिनि रवि की रसमि काम फल फीको। कीजे कहा समय बिनु सुंदरि भोजन पीछे अँचवन घी को। —सूर (शब्द०)। २. आभा। प्रकाश। चमक। उ०— वसन सपेद स्वच्छ पेन्हे आभुषण सब हीरन को मोतिन को रसमि अछेव को।— रघुनाथ (शब्द०)।

रसमुंड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० रस+मुंड़ी?] एक प्रकार की बँगला मिठाई।

रसमैत्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दो ऐसे रसों का मिलना जिनके मिलने से स्वाद में वृद्धि हो। दो रसों का उपयुक्त मेल। जैसे,— कड़ुआ और तीता; तीता और नमकीन; नमकीन और खट्टा आदि। २. साहित्य में रसों का उपयुक्त मेल।

रसयोग
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्यक में एक प्रकार का औषध।

रसरस
क्रि० वि० [हिं० रसना] धीरे धीरे।—शनैःशनैः। उ०— रस रस सूख सरित सर पानी। ममता त्याग करहि जिमि ज्ञानी।— मानस, ४। १६।

रसरा †
संज्ञा पुं० [हिं०] [स्त्री० अल्पा० रसरी] दे० 'रस्सा'।

रसराज
संज्ञा पुं० [सं०] १. पारद। पारा। उ०— रावन सो रसराज सुभट रस रहित लंक खल दलती। —तुलसी (शब्द०)। २. रसों का राजा, शृंगार रस। उ०— जनु विधुमुख छबि अमिय को रछक रख्यो रसराज। —तुलसी (शब्द०)। ३. वैद्यक में एक प्रकरा की औषधि जो तांबे के भस्म, गंधक और पारे को मिलाकर बनाई जाती है और जिसका व्यवहार तिल्ली और बरवट आदि में होता है। ४. रसांजन। रसौत।

रसराय पु
संज्ञा पुं० [सं० रसराज] शृंगार रस दे० 'रसराज'।

रसरी †
संज्ञा स्त्री० [सं० रसना, प्रा० रसणा] रस्सी। ड़ोरी।

रसल
वि० [सं० रस+ल (प्रत्य०)] जिसमें रस हो। रसवाला उ०— विमल रसल रसखानि मिलि भइ सकल रसखानि। सोई नव रसखानि को चित चातक रसखानि।— रसखान। (शब्द०)।

रसलह
संज्ञा पुं० [सं०] पारा।

रसवंत (१)
संज्ञा पुं० [सं० रसवत्] रसिया। प्रेमी। रसज्ञ। उ०— (क) रसवंत कबित्तन की रस ज्यों अखरन के ऊपर ह्वँ झलकै।— मन्नालंल (शब्द०)। (ख) सुजा के दिवान भगवंत रसवंत भए वृंदावनवासिनि की सेवा ऐसी करी है।—नाभादास (शब्द०)।

रसवंत (२)
वि० जिसमें रस हो। रसभरा। रसीला।

रसवंती
संज्ञा स्त्री० [सं० रसवती] रसौत। रसांजन। उ०— रूमी रतनजोति रसवंती। रारे रंगमाटी रुदवंती।— सूदन (शब्द०)।

रसवट
संज्ञा पुं० [हिं० रसना(=पानी आना)] वह मसाला जो नाव के छेदों में इसलिये भरा जाता है कि उनमें से पानी अंदर न आवे। रसवर।

रसवत् (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० रसवती] १. जिसमें रस हो। रसवाला। २. स्वादिष्ट (को०)। ३. क्लिन्न (को०)। ४. आकर्षण। मोहक। (को०)। ५. प्रेमभाव पूर्ण। प्रेमपूर्ण (को०)। ६. रसिक। परिहासक (को०)।

रसवत् (२)
संज्ञा पुं० वह काव्यालंकार जिसमे एक रस किसी दूसरे रस अथवा भाव का अंग होकर आवे। जैसे,— युद्ध में पड़े हुए वीर पति के लिये इस विलाप में— 'हाँ', यह वही हाथ है जो प्रेम से आलिंगन करना था। यहाँ शृंगार केवल करूण रस का अंग है।

रसवत
संज्ञा स्त्री० [हिं०] १. दे० 'रसौत'। २. दे० 'दारूहल्दी'।

रसवती
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. संपूर्ण जाति की एक रागिनी। जिसमें सब शुद्ध स्वर लगते है। २. रसोईघर। ३. अशन। आहार (को०)।

रसवती (२)
वि० रसीली। रसपूर्ण। रसभरी।

रसवत्ता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. रसयुक्त होने का भाव या धर्म। रसीलापन। २. मिठास। माधुर्य। ३. सुंदरता। सूबसूरती।

रसवर †
संज्ञा पुं० [हिं० रसना(=चुना, टपकना)] दे० 'रसवट'।

रसवर्णक
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्यक के अनुसार अनार का फूल, ढाक का फूल, कुसुम का फूल, लाख, हलदी, मजीठ आदि कुछ विशिष्ट द्रव्य जिनसे रंग निकलता है।

रसवली
संज्ञा स्त्री० [सं० रस+वली] एक प्रकार का गन्ना, जिसे रसड़ली भी कहते हैं। दे० 'रसड़ली'।

रसवाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० रस+वाई (प्रत्य०)] पहले पहल ऊख पेरने के समय होनेवाली कुछ विशिष्ट रीतियाँ या व्य़वहार।

रसवाद
संज्ञा पुं० [सं०] १. रस की बात। प्रेम या आनंद की बाततचीत। रसीकता की बातचीत। उ०—(क) करति हौ परिहास हमसों तजौ यह रसावाद।— सूर (शब्द०)। (ख) केशव औरनि सार सरासरि सो रसवाद सवै हमसों।— केशव (शब्द०)। २. मनोरंजन के लिये कहासुनी। छेहछाड़। झगड़ा। उ०— तुमही मिलि रसवाद बढ़ायो। उरहन दै दै मूँड़ पिरायो।— सूर (शब्द०)। ३. बकवाद। उ०—सोवन।दीजै न दीजै हमैं दुख योंही कहा रसवाद बढ़ायो।— मतिराम (शब्द०)।

रसवान्
संज्ञा पुं० [सं०] वह पदार्थ जिसमें ऐसा गुण या शक्ति हो कि जब उस पदार्थ के कण रसना से संयुक्त हों, उस समय किसी प्रतिबंधक हेतु के न रहने से विशेष प्रकार का अनुभव हो।

रसवास
संज्ञा पुं० [सं०] ढगण के पहले भेद (/?/) की संज्ञा।

रसवाहिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] वैद्यक के अनुसार खाए हुए भोजन से बने सार पदार्थ को फैलानेवाली नाड़ी।

रसविक्रियी
संज्ञा पुं० [सं० रसविक्रयिन्] वह जो मदिरा बेचता हो। शराब बेचनेवाला।

रसविरोध
संज्ञा पुं० [सं०] १. सुश्रुत के अनुसार कुछ रसों का ठीक मेल न होना। जैसे,— तीते और मीठे में, नमकीन और मीठे में, कड़ुए और मीठे में रसविरोध है। २. साहित्य में एक ही पद्य में दो प्रतिकूल रसों की स्थिति। जैसे,— शृंगार और रौद्र की हास्य और भयानक की शृंगार और वीभत्स की।

रसवेधक
संज्ञा पुं० [सं०] सोना।

रसशार्दुल
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्यक में एक प्रकार का रस। विशेष— यह अभ्रक, ताँबे, लोहे मैनसिल, पारे , गंधक, सोहागे, जवाखार, हड़, और बहेड़े आदि के योग से बनता है और उपदंश आदि रोगों के लिये उपकारी माना जाता है।

रसशास्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. रसायन शास्त्र। २. साहित्य़ में शृंगार, वीर आदि नव रसों पर विवेचनात्मक ग्रंथ।

रसशेखर
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्यक के अनुसार एक प्रकार का रस जो पारे और अफीम के योग से बनता है और जो उपदंश आदि रोगों के लिये उपकारी माना जाता है।

रसशोधन
संज्ञा पुं० [सं०] १. पारे का शुद्ध करने की क्रिया। २. सुहागा।

रससंभव
संज्ञा पुं० [सं० रससम्भव] रक्त। लहु। खून।

रससंरक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] पारे का शुद्ध करना, मूर्छित करना, बाँधना और भस्म करना ये चारों क्रियाएँ।

रससंस्कार
संज्ञा पुं० [सं०] पारे के मुर्च्छन, बंधन, मारण आदि अठारह प्रकार के संस्कार। (वैद्यक)।

रससागर
संज्ञा पुं [सं०] पुराणानुसार सात समुद्रों में से एक। विशेष— कहते है कि यह प्लक्ष द्वीप में है और ऊख के रस से भरा है।

रससाम्य
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्यक में रोगी की चिकित्ना करने के पहले यंह देखना कि शरीर में कौन सा रंस अधिक और कौन सा कम है।

रससार
संज्ञा पुं० [सं०] १. मधु। शहद। २. जहर। (डि०)।

रससिंदूर
संज्ञा पुं० [सं० रससिन्दुर] वैद्यक में एक प्रकार का रस जो पारे और गंधक के योग से बनता है। इसे 'हरगौरी रस' भी कहते है।

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रससिद्ध
वि० [सं०] १. रसाभिव्यक्ति करने में कुशल वा निष्णात। २. रत सिद्ध करने में कुशल [को०]।

रसस्थान
संज्ञा पुं० [सं०] शिंगरफ। हिंगुल। ईगुर।

रसस्राव
संज्ञा पुं० [सं०] अम्लवेत। अमलवेद।

रसांगक
संज्ञा पुं० [सं० रसाङ्गक] धूप। सरल का वृक्ष। श्रीवेष्ठ।

रसांजन
संज्ञा पुं० [सं० रसाञ्जन] रसौत। रसवत।

रसाँ
वि० [फा़०] पहुंचानेवाला। देनेवाला। जैसे, रोजीरसाँ, चिट्ठी- रसाँ [को०]।

रसा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पृथ्वी। जमीन। २. रासना। ३. पाठा। पाढा। ४. शल्लकी। सलई। ५. कँगनी नाम का मोटा अन्न। ६. दाख। द्राक्षा। अंगुर। ७. मेदा। ८. शिलारस। लोहवान। ९. आम। १०. काकोली। ११. नदी। १२. रसातल। १३. जीभ। रसना। जबान।

रसा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० रस] तरकारी आदि का झोल। शोरबा। यौ०— रसेदार=जिसमें रसा या शोरबा हो। शोरबेदार।

रसा (३)
वि० [फा़०] पहुँचानेवाला। जिसकी किसी जगह पहुँच हो [को०]।

रसाइन
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'रसायन'।

रसाइनी पु
संज्ञा पुं० [हिं० रसायन+ई (प्रत्य०)] १. रसायन विद्या का जाननेवाला। २. रसायन बनानेवाला। कीमियागर।

रसाई
संज्ञा स्त्री० [फा़०] पहुँचने की क्रिया या भाव। पहुँच। जैसे,— आपकी रसाई बहुत दूर दूर तक है।

रसाखन
संज्ञा पुं० [सं०] मुरगा।

रसाग्रज
संज्ञा पुं० [सं०] रसांजन। रसौत।

रसाग्रय
संज्ञा पुं० [सं०] १. पारा। २. रसांजन। रसौत।

रसाज्ञान
संज्ञा पुं० [सं०] भोजन करने पर भी उसके रस का अनुभाव न करना। जैसे,— खट्टा या मीठा पदार्थ खाकर भी उसकी खटास या मिठास का अनुभव न करना (वैद्यक)।

रसाढ़्य (१)
संज्ञा पुं० [सं०] अमड़ा। आम्रातक।

रसाढ़्य (२)
वि० रसपूर्ण। रसार्द्र।

रसाढ्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] रास्ता।

रसातल
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार पृथ्वी के नीचे के सात लोकों में से छठा लोक। विशेष— संज्ञा पुं० [सं०] कहते है, इसकी भूमि पथरीली है और इसमें दैत्य, दानव तथा पणि या पाणि नाम के असूर, इंद्र के ड़र से, निवास करते है। विशेष दे० 'पाताल'। मुहा०— रसातल में पहुँचाना=मटियामेट कर देना। मिटटी में मिला देना। बरवाद कर देना।

रसात्मक
वि० [सं०] १. सरस। रसयुक्त। २. सुंदर। खूबसूरत। ३. सुस्वादु। जायकेदार। ४. तरल। पानीदार। जलवाला। ५. अमृततुल्य। अमृतमय [को०]।

रसात्मकता
संज्ञा स्त्री० [सं० रसात्मक+ता (प्रत्य०)] रसमयता। रसपूर्णिता। रसयुक्त होने का भाव। उ०— यदि किसी उक्ति में रसात्मकता और चमत्कार दोनों हों तो प्रधानता का विचार करके सुक्ति या काव्य का निर्णय हो सकता है।— रस०, पृ० ३७।

रसादार
वि० [हिं० रसा+फा़० दार (प्रत्य०)] जिसमें झोल या शोरबा हो। शोरबेदार। (प्रायः तरकारी आदि के संबंध में बोलते है।)

रसाधार
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य।

रसाधिक
संज्ञा पुं० [सं०] सुहागा।

रसाधिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] किशमिश।

रसाध्यक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] प्राचीन काल फा एक राजकर्मचारी जो मादक द्रव्यों की जाँच पड़ताल और उनकी विक्री आदि की व्यवस्था करता था।

रसाना पु (१)
क्रि० अ० [सं० रस] आनंदयुक्त होना। आनंद प्राप्त करना। रसयुक्त या अनुकूल होना।— उ०— भूखे अघाने रिसाने रसाने हितु अहितुनि सों स्वच्छ मने है। —भिखारी०, ग्रं०, भा०, २, पृ० ३५।

रसाना पु (२)
क्रि० सं० आनंद देना। आनंदित करना।

रसाना † (३)
क्रि० अ० [हिं० रसना] स्त्रवित होना। चूना।

रसाना † (४)
क्रि० सं० दूर करना। टपकाना। बहाना। उ०— रिस रसाइ सरसाइ रस बतिया कहत बनाइ।— भिखारी ग्रं०, भा०, १. पृ० २३।

रसापति
संज्ञा पुं० [सं०] पृथ्वीपति। राजा।

रसापायी
संज्ञा पुं० [सं० रसापयिन्] १. वह जो जीभ से पानी पीता हो। २. कुत्ता। श्वान।

रसापुष्प
संज्ञा पुं० [सं०] भ्रमर। अलि [को०]।

रसाभास
संज्ञा पुं० [सं०] १. साहित्य में किसी रस की ऐसे स्थान में अवतारणा करना जो उचित या उपयुक्त न हो। किसी रस का अनुचित विषय में अथवा अनुपयुक्त स्थान पर वर्णन। जैसे,— गुरू पर किए हुए क्रोध या गुरूपत्नी से किए हुए प्रेम को लेकर यदि रौद्र या शृंगार रस का वर्णान हो, तो वह विभाव, अनुभाव आदि सामग्रियों से पूर्ण होने पर भी अनौचित्य के कारण रसाभास ही होगा। २. एक प्रकार का अलंकार जिसमें उक्त ढ़ंग का वर्णन होता है।

रसामग्न
संज्ञा पुं० [सं०] बोल नामक गंधद्रव्य।

रसामृत
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्यक में एक प्रकार का रस। विशेष— यह पारे गंधक, शिलाजीत, चंदन, गुड़ुच, धनिया, इंद्रजौ, मुलेठी आदि के प्रयोग से बनाया जाता है और रक्तपित्त तथा ज्वर आदि में उपकारी माना जाता है।

रसाम्ल
संज्ञा पुं० [सं०] १. अम्लेवेतस्। अमलेवेद। २. चुक या चुक्र नाम की खटाई। ३. विषाविल। वृक्षाम्ल।

रसाम्लक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार की घास।

रसाम्ला
संज्ञा स्त्री० [सं०] पलाशी नाम की लता।

रसायक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार की घास।

रसायन
संज्ञा पुं० [सं०] १. तक्र। मठा। २. कटि। कमर। ३. विष। जहर। ४. वैद्यक के अनुसार वह औषध जो जरा और व्याधि का नाश करनेवाली हो। वह दवा जिसके खाने से आदमी बुड़ढ़ा या बीमार न हो। विशेष— ऐसी औषधों से शरीर का बल, आँखों की ज्योति और वीर्य आदि बढ़ता है। इनके खाने का विधान युवावस्था के आरंभ और अंत में है। कुछ प्रसिद्ध सरायनों के नाम इस प्रकार है।— विड़ग रसायन, ब्राह्मी रसायन, हरीतकी रसायन, नागवला रसायन, आमलक रसायन आदि। प्रत्येक रसायन में काई एक मुख्य ओषधि होता है; और उसके साथ दूसरी अनेक ओषधियाँ मिली हुई होती हैं। ५. गरुड़। ६. बायबिड़िग। ७. विड़ंग पदार्थों के तत्वों का ज्ञान। विशेष दे० 'रसायन शास्त्र'। ८. वह कल्पित योग जिसके द्बारा ताँवे से सोना बनना माना जाता है। ९. धातु विद्या, जिसमें धातुओं के भस्म करने या एक धातु की दूसरी धातु में बदल देने आदि की क्रीया का वर्णन रहता है।

रसायनज्ञ
संज्ञा पुं० [सं०] रसायन क्रिया का जाननेवाला। वह जो रसायन विद्या जानता हो।

रसायनफला
संज्ञा स्त्री० [सं०] हरें। हड़। हरीतकी।

रसायनवर
संज्ञा पुं० [सं०] लहसुन।

रसायनवरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कंगनी। २. काकजंघा।

रसायनविज्ञान
संज्ञा पुं० [सं० रसायन+विज्ञान] दे० 'रसायन'।

रसायन शास्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] वह शास्त्र जिसमें इस बात का विवेचन हो कि पादर्थों में कौन कौन से तत्व होते है और उन तत्वों के परमाणुओं में परिवर्तन होने पर पदार्थौं में किस प्रकार का परिवर्तन होता है। विशेष— इस शास्त्र का मुख्य सिद्धांत यह है कि संसार के सव पदार्थ कुछ भूल द्रव्यों के परमाणुओं से बने हैं। वैज्ञानिकों ने ९४ मूल द्रव्य या मूलभूत माने है, जिनमें से धातुएँ (जैसे,— सोना, चाँदी, ताँबा, लोहा, सीसा, राँगा, पारा आदि) है; कुछ दूसरे खनिज (जैसे—गंधक संखिया, सुरमा आदि) है और कुछ वायव्य द्रव्य (जैसे— आक्सिजन, हाडड्रीजन, नाइट्रोजन आदि) है। इस शास्त्र के अनुसार यही ९४ मूल द्रव्य सब पदार्थो के मूल उपादान है, जिनके परमाणुओं के योग से संसार के सब पदार्थ बने हैँ। प्रत्येक मूल द्रव्य मे एक ही प्रकार के परमाणु होते है; और जब किसी एक प्रकार के परमाणुओं के साथ किसी दुसरे प्रकार के परमाणु मिल जाते है, तब उनसे एक नया और तीसरा ही द्रव्य तैयार हो जाता है। जो शास्त्र हमें यह बतलाता है कि कौन चीज किन तत्वों से बनी है और उन तत्वों में परिवर्तन होने का क्या परिणाम होता है, वही रसायन शास्त्र कहलाता है।

रसायनश्रेष्ठ
संज्ञा पुं० [सं०] पारा।

रसायनिक
वि० [सं० रासायानिक] दे० 'रासायनिक'।

रसायनी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह औपध जो बुढ़ापे को रोकती या दूर करती हो। २. गुड़ुच। ३. मकोय। काकमाचा। ४. महाकंरज। ५. अमृत संजीवनी। गोरखदुद्धी। ३. मांस- रोहिणी। ७. मजीठ। ८. कनफोड़ा नाम को लता। ९. कौछ। १०. सफेद निसोथ। ११. शंखपूष्पी। शंखाहुली। १२. कंद गिलोय। १३. नाडी़।

रसायनी (२)
संज्ञा पुं० [सं० रसायन] रसाहनी। रसायन शास्त्र का जाननेवाला। उ०— राम की रजाय तें रसायनी समीर- सूनु, उतरि पयोधिपार सोधि सरवाक सों।— तुलसी ग्रं, पृ० १४९।

रसार पु
संज्ञा पुं०, वि० [सं० रसाल] दे० 'रसाल'।

रसाल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. आम। २. ऊख। गन्ना। ३. कचहल। ४. कुंदुर तृण। ५. गोधूम। गेहुँ। ६. अम्लवेत। ७. शिलारस। लोवान। ८. बोल नामक गंधद्रव्य। ९. एक प्रकार का मूसा (को०)।

रसाल (२)
वि० [वि० स्त्री० रसाला] १. मधुर, मीठा। २. रसीला। ३. सुंदर। मनोहर। ४. स्वादिष्ठ। ५. मार्जित। शुद्ध।६. रसिया। रसिक। उ०— तासों मुदिता कहत हैं, कवि मतिराम रसाल।— मतिराम (शब्द०)।

रसाल (३)
संज्ञा पुं० [अं० इरसाल] कर। राजस्व। खिराज। उ०— श्रीनगर नैपाल जुमिला के छितिपाल भेजन रसाल चौर गढ़ कुही बाज की। —भूषण (शब्द०)। दे० 'रिसाल'।

रसालय
संज्ञा पुं० [सं०] १. आम का पेड़। २. वह स्थान जहाँ आमोद प्रमोद किया जाय। ३. वह स्थान जहाँ अनेक प्रकार के रस आदि बनते हों। रसशाला।

रसालशकरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] गन्ने या ऊख के रस से बनाई हुई चीनी।

रसालस
संज्ञा पुं० [हि० रसाल] कौतुक। उ०—समुझहि सुमति रसाल रसालस रमा रमन के। हरि प्रेरित वह आप आप नाचत बन के।— तुलसी सुधाकर (शब्द०)।

रसालसा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पौढ़ा। गन्ना। २. गोहुँ। ३. कुंदुर नाम की घास। ४. शिरा धमना (को०)।

रसाला (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दही का बना हुआ। शरबत। सिखरन। श्रीखंड़। २. दही मिला हुआ सत्तु। ३. प्राचीन काल की एक प्रकार की चटनी, जो दही ,घी, मिर्च, शहद आदि को मिलाकर बनाई जाती थी। ४. दूव। ५. बिदारीकंद। ६. दाख। ७. पौढा़। ८. जीभ।

रसाला (२)
संज्ञा पुं० [अं० रिसालह] दे० 'रिसाला'।

रसाला (३)
वि० [सं० रसाल] रसपूर्ण। मधुर। उ०— लगे कहन हरि कथा रसाला।— मानस, १।६०।

रसालाम्र
संज्ञा पुं० [सं०] बढिया कलमो आम।

रसालिका (१)
वि० स्त्री० [सं० रसालक] १. मधुर। मृदु। २. सरस। उ०— उर लसी सुतुलसी मालिका। हुलसी सुमति रसालिका।—गिरधर (शब्द०)।

रसालिका (२)
संज्ञा स्त्री० १. छोटा आम। अँविया। २. सप्तला सातला।

रसालिया †
वि० [हिं० रसाल+इया] १. रसिक। रसमर्मी। रसभरा। २. दे० 'चूतिया' (लाक्ष०)।

रसालिहा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पिठवन।

रसाली (१)
संज्ञा पुं० [सं० रसालिन्] १. पौड़ा। गन्ना। २. चना।

रसाली (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] पौढा़। गन्ना।

रसोलेक्षु
संज्ञा पुं० [सं०] पौढा़। गन्ना।

रसावर, रसावल
संज्ञा पुं० [हिं० रसियाउर] दे० 'रसौर'। उ०— जीवन सुरति बटोरि प्रभु नाम रसावर। निरमल करु द्विजराज जीवनहि एहि तनु ड़ाबर।—तुलसी सुधाकर (शब्द०)।

रसाव
संज्ञा पुं० [हिं० रसना] १. खेत को जोतकर और पाटे से बराबर करके कई दिनों तक यों ही छोड़ देना। २. रसने की क्रिया या भाव।

रसावला
संज्ञा पुं० [हिं०] एक मात्रिक छंद जिसमें दो रगण होता है और दस मात्राएँ (/?/) होती है। जैसे—(क) रोस रांज भरी। चित्र कोटे सुरी। हर्थ्थ बर्थ्थ जुरी। जुट्टि सोहै पुरी। —पृ० रा०, २४। ७७ (ख) रार काहे करो। धीर ऱाधे धरो। देवि मोहा तजौ। कंज देहाँ सजौ।—छंद०, पृ०,१३४। विशेष—इसे जोहा, विजोहा, विज्जोहा, विमाहा आदि भी कहते है।

रसावा
संज्ञा पुं० [हिं०रस+आवा (प्रत्य०)] ऊख का कच्चा रस रखने का मिट्टी का बर्तन।

रसावेष्ट
संज्ञा पुं० [सं०] गंधाबिरोजा।

रसाश
संज्ञा पुं० [सं०] मद्य पीने की क्रिया। शराब पीना।

रसाशी
संज्ञा पुं० [सं० रसाशिन्] वह जो मद्य पीता हो। शराबी।

रसाश्वासा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पलाशी नाम की लता।

रसाष्टक
संज्ञा पुं० [सं०] पारा, ईगुर, कांतिसार, लोहा, सोनामक्खी, ऱूपामक्खी, वैक्रांत मणि और शंख इन आठ महारसों का समुह।

रसास्वादी (१)
वि० [सं० रसास्वादिन्] [वि० स्त्री० रसास्वादिनी] १. रस चखनेवाला। स्वाद लेनेवाला। २. आनंद या मजा लेनेवाला।

रसास्वादी (२)
संज्ञा पुं० भौरा। भ्रमर।

रसाह्व
संज्ञा पुं० [सं०] गंधाबिरोजा।

रसाह्वा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सतावर। २. रास्सा।

रसिआउर †
संज्ञा पुं० [हि० रस+चाउर(=चावल)] १. ऊख के रस या गुड़ के शर्बत में पका हुआ चावल। २. एक प्रकार का गीत जो विवाह की एक रीति में गाया जाता है। जब नई बहु ब्याह कर आती है, तब वह ऊख के रस या गुड़ के शर्बत में चावल पकाकार अपने पति तथा ससुराल के लोगों को परोसकर खिलाती है। उस समय स्त्रियाँ जा गीत गाती है, उसे भी'रसिआउर' कहते हैं। उ०— गावहि रसिआउर सब नारी। बजै मृदंग वीर। तमहारी।— रघुराज (शब्द०)।

रसिआवर, रसिआवला
संज्ञा पुं० [हिं० रसिआउर] दे० 'रसि- आउर'।

रसिक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० रसिका; हि,० स्त्री० रसिकिनी] १. वह जो रस या स्वाद लेता हो। रस लेनेवाला। २. वह जिसे रस संबंधी बातों मं विशेष आनंद आता हो। काव्यमर्मज्ञ। सह्नदय। ३. क्रिड़ा आदि का प्रेमी। आनंदी। रसिया। उ०— सूरदास प्रभु रसिक सिरोमनि तुमरी लीला को कहै गाइ— सूर०, १०। २२९८। ४. वह जो किसी विषय का अच्छा ज्ञाता हो। मर्मज्ञ। ५. प्रेमी। भक्त। भावुक। सह्नदय। ३. सारस पक्षी। ७. घोडा़। ८. हाथी। ९. एक प्रकार का छंद

रसिक (२)
वि० १. रस लेनेवाला। सह्वदय। २. आनंदी। ३. प्रेमी। ४. मर्मज्ञ [को०]।

रसिकई पु
संज्ञा स्त्री० [सं० रसिक+हिं० ई (प्रत्य०)] दे० 'रसि- कता'। उ० रसिक रसिकई जानि परी। नैननि तै अब न्यारै हूजै तवही तै अति रिसनि भरी।—सूर० १०। २५४१।

रसिकता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. रसिक होने का भाव या धर्म। २. परिहास। हँसी। ठट्टा

रसिकत्व
संज्ञा पुं० [सं०] रसिक होने का भाव या धर्म। रसिकई रसिकता [को०]।

रसिकविहारी
संज्ञा पुं० [सं०] श्रीकृष्ण का एक नाम।

रसिकसिरोमनि पु
संज्ञा पुं० [सं० रसिक+शिरोमणि] रसिकों में सिरमौर, श्रीकृष्ण।

रसिका (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दही का शरबत। सिखरन। २. ईख का रस। ३. जीभ। जबान। ४. शरीर में की धातु। रस। ५. मैना पक्षी। ६. करवनी। तागड़ी (को०)।

रसिका (२)
वि० स्त्री० [सं०] दे० 'रसिक (२)'।

रसिकाई पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'रसिकता'।

रसिकाना पु
क्रि० अ० [सं० रसिक+आना(प्रत्य०)] आनंद वा मस्ती से भरा होना। रसिया होना। रसीला होना। उ०— होरे में का बरजोरी करोगे क्यों इतने इतराए। रूप गरब फागुन मदमाते ताहु पै अति रसिकाए।— भारतेंदु ग्रं०, भा०, २. पृ० ३७८।

रसिकिनी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० रसिक+हिं० इनी] रसिक का स्त्री- लिंग। रसिका। दे० 'रसिक—३'। उ०— सूरदास रास रसिक विनु रास रसिकिनी बिरह विकल करि भई हैं मगन।— सूर (शब्द०)।

रसिकेश्वर
संज्ञा पुं० [सं०] श्रीकृष्ण का एक नाम।

रसित (१)
वि० [सं०] १. ध्वनि करता हुआ। बोलता हुआ। बजता हुआ। २. बहता हुआ। रसता हुआ। थोड़ा थोड़ा टपकता हुआ। ३. रसयुक्त। ४. जिसके ऊपर मुलम्मा चढ़ा हो।

रसित (२)
संज्ञा पुं० १. ध्वनि। शब्द। उ०— लपि नव नील पयोद रसित सुनि रूचिर मोर जोरी जनु नाचति।— तुलसी (शब्द०)। २. अंगूर की शराब। द्राक्षासव।

रसिया
संज्ञा पुं० [सं० रसिक, यारस+इया (हिं० प्रत्य०)] १. रस लेनेवाला। रसिक। २. एक प्रकार का गाना जो फागुन के मौसिम में व्रज और वुदेलखंड़ आदि में गाया जाता है।

रसियाव
संज्ञा पुं० [हिं० रस+इयाव(प्रत्य०)] रसिआउर। गन्ने के रस मे पका हुआ चावल। बखीर।

रसि रसि पु
क्रि० वि० [हिं० रस रस] दे० 'रस रस'। उ०— रसि रसि संचे ब्रह्म कियारी।— प्राणा०, पृ० ४।

रसी (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की सज्जी जो विहार और संयुक्त प्रांत में बनती है।

रसी पु ‡ (२)
संज्ञा [हिं० रस+ई(प्रत्य०)] दे० 'रसिक'।

रसी पु (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं० रस्सी] दे० 'रस्सी'। उ०— गिरधरदास पास भागीरथी सोभा देत जाकी धार तोरै आसु कर्म रूप रसी है।— भारतेदुं ग्रं०, भा०, १। पृ० २८१।

रसी (४)
वि० [सं० रसिन्] [वि० स्त्री० रसिनी] १. रसयुक्त। रसदार। २. रागान्वित। अनुरक्त। सह्वदय। ३. सरस। स्वादु। रूचिकर [को०]।

रसीद
संज्ञा स्त्री० [फा़० अं० रिसीट] १. किसी चीज के पहुँचने य़ा प्राप्त होने की क्रिया। प्राप्ति। पहुँच। जैस। —पारसल भेजा है; उसकी रसीद की इत्तला दीजिएगा। मुहा०— रसीद करना=(१) लगना। (थप्पड़, मुक्का आदि)। जड़ना। मारना। जैसे, —थप्पड़ रसीद करूँगा, सीधा हो जाएगा। २. प्रविष्ट करना। घुसेड़ना। (बाजारु)। २. वह जिसपर ब्योरेवार यह लिखा हो कि अमुक वस्तु या द्रव्य़ अमुक व्यक्ति से अमुक कार्य के लिये अमुक समय पर आया। किसी चीज के पहुँचने या मिलने के प्रमाण रूप में लिखा हुआ पत्र। प्राप्ति का प्रमाणापत्र। विशेष— प्रायः जब किसी को कोई चीज या धन ऋण के रूप में, ऋण चुकाने के लिये अथवा और किसी मामले के संबंध में दिया जाता है, तव पानेवाला एक प्रमाणपत्र लिखकर देनेवाले को देता है, जिसमें यदि पानेवाला कभी उस चीज या धन की प्राप्ति से इनकार करे, तो उसके विरुद्ध प्रमाण के रूप में वही रसीग उपस्थित की जाय। मुहा०— रसीद काटना=किसी को रसीद लिखकर देना। क्रि० प्र०—देना।—पाना।—लिखना।—लिखाना, आदि। ३. पता। खबर। (क्व०)। जैसे —तुम तो किसी बात की रसीद ही नहीं देते।

रसीदा
वि० [फा़०रसीदह्] पहुँचा हुआ।

रसील
वि० [हिं० रसोला] दे० 'रसीला'। उ०—मन रसील के सुधा स्वरूपा। आमय पीन हीन रस भूपा।— रघुराज (शब्द०)।

रसीला
वि० [हिं० रस+ईला(प्रत्य०)] [वि० स्त्री० रसोली] १. रस में भरा हुआ। रसयुक्त। २. स्वादिष्ट। मजेदार। ३. रस लेनेवाला। आनंद लेनेवाला। ४. भोग विलास का प्रेमी। व्यसनी। ५. बाँका। छबीला। सुंदर।

रसीलापन
संज्ञा पुं० [हि० रसोला+पन(प्रत्य०)] रसोला होने का भाव या धर्म।

रसुन
संज्ञा पुं० [सं० रसोन] लहुसुन। लशुन।

रसूख
संज्ञा पुं० [अं० रूसूख] १. प्रवेश। पहुँच। रसाई। २. दक्षता। कुशालता। ३. प्रेमव्यवहार। मेलजोल। उ०— रामलाल, शंकर खत्री और हमारे अपने लाला जी का उनसे रसुख था।— अभिशप्त० पृ० १०२।

रसूम
संज्ञा पुं० [अं०] १. रस्स का बहुवचन। २. नियम। कानुन। ३. वह धन जो किसी को किसी प्रचलित प्रथा के अनुसार दिया जाता हो। नेग। लाग। ४. वह धन जो राज्य को कोई काम करने के बदले में राजकिया नियमों के अनुसार दिया जाता हो। यौ०—रसुम अदालत। ५. वह धन जो जमीदार की किसानों की ओर से नजराने या भेट आदि के रूप में दिया जाता है।

रसूमअदालत
संज्ञा पुं० [अं०] वह धन जो अदालत में कोई मुकदमा आदि दायर करने के समय़ कानून के अनुसार सहकारी व्य़य के रूप में दिया जाता है। कोर्ट फीस। स्टाप। विशेष— भिन्न भिन्न कामों या मुकदमों की मालियत के लिये धन की संख्या कानून के द्बरा निर्धारित होती है; और मुकदमा दायर करनेवाले को उतने धन का सहकारी कागज या स्टांप खरीदना पड़ता है तथा उसी कागज पर अपना दावा दायर करना होता है। बँनामा या दानपत्र आदि लिखने के लिये भी इसी प्रकार रसुम अदालत लगता है।

रसूल
संज्ञा पुं० [अं०] वह जो अपने आपको ईश्वर का दूत कहता हो और सर्वसाधारण मे माना जाता हो। पैगंबर। जैसे— मुहम्मद साहब खुदा के रसुल थे।

रसुली (१)
संज्ञा स्त्री० [अं० रसुल+ई (प्रत्य०)] १. एक प्रकार का गेहुँ। २. एक प्रकार का जौ। ३. एक प्रकार की काली मिट्टी।

रसुली (२)
वि० रसुल संबंधी। रसुल का।

रसेंद्र
संज्ञा पुं० [सं० रसेन्द्र] १. पारद। पारा। २. राजमाष। लोविया। ३. एक प्रकार की रसौषध जो जीरा, धनियाँ, पीपल, शहद, त्रिकुट और रससिंदर के योग से बनती है। ४. चिंता- मणि। स्पर्शमणि। पारस पत्थर जिसके स्पर्श से लोहा सोने में परिवर्तित हो जाता है। यौ०— रसेंद्रवेधज, रसेंद्रसंजात=दे० 'रर्सेद्रवेधक'।

रसेद्रवेधक
संज्ञा पुं० [सं० रसेन्द्रवेधक] सोना।

रसेश्वर
संज्ञा पुं० [सं०] १. पारा। १. एक दर्शन का नाम जो छह दर्शनों में नहीं है। विशेष— इस दर्शन में पारे को शिव का वीर्य ओर गंधक को पार्वती का रज माना है। इनके १८ संस्कार लिखे है और इनके उपयोग से व्याधिनाश, जीवनदान और खेचरत्वादि माना है। इनके दर्शन और स्पर्श में महापुण्य वतलाया है ओर कहा गया है कि शरीर का आरोग्य होना परमावश्यक है, क्योंकि शरीर के बिना पुरुषार्थ नही हो सकता; और पुरुषार्थ के बिना मोक्ष की प्राप्ति असंभव है। ३. एक रसौषध जो पारे, गंधक, हरताल, और सोने आदि के योग से तैयार होती है।

रसेस पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० रसेश] १. रसिक शिरोमणि, श्रीकृष्ण। २. नमक। लवण। उ०— रूचिर रूप जल सों रसेस है मिलि न फिरन की बात चलाई।—तुलसी (शब्द०)।

रसस पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० रसेश्वर, रसेश] पारा।

रसोइया
संज्ञा पुं० [हिं० रसोई+इया (प्रत्य०)] रसोई बनानेवाला। भोजन बनानेवाला। रसोईदार। सूपकार।

रसोई, रसोई
संज्ञा स्त्री० [हिं० रस+औई (प्रत्य०)] १. पका हुआ खाद्य पदार्थ। बना हुआ भोजन। यौ०— कच्ची रसोई=दाल, भात, रोटी आदि भोजन जो घी या दुध में नहीं पकते और जो हिंदु लोग चौके के बाहार या किसी दुसरे के हाथ की बनी हुई नहीं खाते। सखरी। पक्की रसांई=पूरी, पकवान, खीर आदि घी या दुध में पकी चोजें जो चौके के बाहर और अन्य़ द्विजों के हाथ की भी खाई जा सकती है। निखरी। मुहा०— रसोई चढ़ना=भोजन पकना। खाना बनना। रसोई तपना=भोजन पकाना। खाना बनाना। उ०— (क) जो पूरूषा- पथ ते कहुँ संषति मिलति रहिम। पेट लागि बैराट घर तपत रसोई भीम।— रहीम (शब्द०)। उ०—कह गिरधर कविराय आपकी तपै रसोई।— गिरधर (शब्द०)। क्रि० प्र०—करना। जीमना।—पकाना।—बनाना। आदि। २. वह स्थान जहाँ भोजन बनता हो। चौका। पाकशाला। उ०— जसुमति तली रसोई भीतर तबहि ग्वलि इक छोंकी।—सूर (शब्द०)।

रसोईखाना
संज्ञा पुं० [हिं० रसोई+फा० खानह्] 'रसोईघर'।

रसोईघर
संज्ञा पुं० [हिं० रसोई+घर] वह स्थान जहाँ भोजन पकाया जाता हो। खाना। बनाने की जगह। पाकशाला चौका।

रसोईदार
संज्ञा पुं० [हिं० रसोई+फा़० दार (प्रत्य०)] [स्त्री० रसोईदारिन] वह जो रसोई बनाने के काम पर नियुक्त हो। भोजन बनानेवाला। रसोइया।

रसोइंदारी
संज्ञा स्त्री० [हिं० रसोईदार+ई (प्रत्य०)] १. रसोई करने का काम। भोजन बनाने का काम। २. रसाईदार का पद।

रसोईबरदार
संज्ञा पुं० [हिं० रसोई+फा़० बरदार] भोजन ले जानेवाला। भोजनवाहक।

रसोत पु (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० रसवत्ता] रसमयता। रस उक्तता।

रसोत (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'रसौत'।

रसोत्तम
संज्ञा पुं० [सं०] १. दुध। २. दुग्ध। २. पारा। पारद ३. मुदग। मूँग [को०]।

रसादर
संज्ञा पुं० [सं०] हिगुल। शिंगरफ।

रसोद्भव
संज्ञा पुं० [सं०] १. शिंगरफ। ईगुर। एक औषध २. रसौत। ३. मुक्ता। माती (को०)।

रसोद्भूत
संज्ञा पुं० [सं०] रसौत।

रसोन
संज्ञा पुं० [सं०] लहसुन।

रसोपल
संज्ञा पुं० [सं०] मोती।

रसाय †
संज्ञा स्त्री० [हिं० रसाई] रसोई। भोजन। उ०— आयसु अस राज घर बेगहि करा रसोय।— जायसी (शब्द०)।

रसौंत
संज्ञा स्त्री० [हिं० रसौत] दे० 'रसौत'।

रसौत
संज्ञा स्त्री० [सं० रसोदुभूत] एक प्रकार का प्रसिद्ध औषध विशेष— यह दारुहल्दी का जड़ और लकड़ी को पानी में औटाक/?/और उसमें से निकले हुए रस की गाढ़ा करके तैयार की जाती है। इसके लिये पहले दारूहल्दी का काढा तैयार करते है। तब उसमें उसके बराबर हो गौ या बकरी का दूध ड़ालव/?/दोनो को पकाकर बहुत गाढ़ा अवलंह तैयार करते है।/?/अवलेह जमकर बाजारों में रसौत के नाम से बिकता है। रसौत कालापन लिए भूरे रंग होती है और पानी/?/सहज में घुल जाती है। इसका स्वाद कड़ुवा होता है अ/?/इसमे से एक विलक्षण गंध निकलतों है, जो अफीम की/?/से कुछ मिलती जुलती हाती है। इसका व्यवहार प्रायः ओ/?/पर लगाने औक घावों का विकार दूर करने में हता है। वैद्यक में यह चरपरी, गरम, रसायन, कड़वी, शीतल, तीक्ष्य शुक्रजनक, नेत्रो के लिये अत्यंत हितकारी तथा कफ, वि/?/रक्तपित्त, वमन, हिचका, श्वास ओर मुवरोग का दूर करनेवाली मानी गई। पर्या०—रसगर्भ। तीर्क्ष्यशील। रसोदुभूत। रसाग्रज। कृतक/?/बालभैपज्य रसराज। अग्निसार। रसनाभि।

रसौता
संज्ञा पुं० [सं० रसौती] दे० 'रसौती'।

रसौती
संज्ञा स्त्री० [देश०] धान की वह बोआई जिसमें खेत जोत/?/वर्षा होने से पहले ही बीज ड़ाल दिया जाता है।

रसौर
संज्ञा पुं० [हिं० रस+और < आवर (प्रत्य०)] रसिआउर ऊख के रस में पके हूए चावल।

रसौल
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की बहुत कँटाली लता। एला विशेष— यह खीरी और बहराइच के जंगलों में बहुत अधिकता होती है और दक्षिण भारत, बंगल, तथा बरमा में भी प/?/जाती है। यह गरमी के दिनों में फूलती और जाड़े में फलती/?/इसकी पत्तियाँ और कलियाँ ओषधि रूप में भी काम आती/?/और उनसे चमड़ा भी सिझाया जाता है। इसकी पतियाँ ख/?/होती है, इसलिये उनको चटनी भी बनाई जाती है।

रसौली
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का रोग जिसमें आँख के ऊपर भँवों के पास बड़ी गिलटी निकल आती है।

रसौहाँ पु †
वि० [रस+आँहाँ (प्रत्य०)] रसीला। रसयुक्त। रसपूर्ण। उ०— भोहै करि सूधी विहसौहै, कै कपोल नैक सौहै करि लोचन रसौह नंगलाल सौ।— मर्ति०, ग्रं० पृ० ३५२।

रस्तगार
वि० [फा़०] बंधनमुक्त। रिहा। उ०— आओ अगर जमी पे यहाँ भी वही बहार। दुख सुख में बंद सारे नही कोई रस्त- गार।— कबीर मं०, पृ० २२३।

रस्तगारी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] मुक्ति। छुटकारा। रिहाई। उ०— रस्तगारी की राह न पाया था।— कबीर मं०, पृ० ३७४।

रस्ता
संज्ञा पुं० [फा० रास्तह्] दे० 'रास्ता'।

रस्तोगी
संज्ञा पुं० [देश०] वैश्यों की एक जाति।

रस्न
संज्ञा पुं० [सं०] १. अश्व। २. द्रव्य। वस्तु। पदार्थ [को०]।

रस्ना
संज्ञा स्त्री० [अं० या सं० रसना] जिह्मा। जीभ [को०]।

रस्म
संज्ञा स्त्री० [अं०] १. मेलजोल। बरताव। यौ०— राह रस्म=भेलजोल। व्यवहार। घनिष्ठता। २. रिवाज। पारपाटी। चाल। प्रथा। ३. संस्कार (को०)।

रस्मि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० रश्मि] दे० 'रश्मि'।

रस्मी
वि० [अ० रस्म+ई] रस्न रिवाज संबंधी। रीति वा चलन के अनुसार।

रस्य (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. रक्त। खून। लहुं। २. शरीर में की मांस। ३. एक प्रकार का नमकीन खाद्य (को०)।

रस्य (१)
वि० रसपूर्ण। सूस्वादु। मधुर।

रस्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. रास्ना। २. पाठा। पाढी़।

रस्सा
संज्ञा पुं० [सं० रश्मि प्रा० रस्मी हिं० रस्म से पुं० रूप रस्सा] [स्त्री० अल्पा०, रस्सी] १. बहुत मोटी रस्सी जो कई मोटे तागों को एक में बटकर बनाई जाती है। विशेष— आजकल प्रायः जहाजों आदि के लिये तया और बड़े बड़े कामों के लिये लोहे के तारों के भी रस्से बनने लगे है। २. जमीन की एक नाप जो ७५ हाथ लंबी और ७५ हाथ चौड़ी होती है। इसी को बोधा कहते है। ३. घोड़ों के पैर को एक बीमारी।

रस्सी
संज्ञा स्त्री० [हिं० रस्सा] १. रुई सन या इसी प्रकार के और रेशों के सूता या ड़ोरों के एक में बटकर बनाया हुआ लंबा खंड जिसका व्यवहार चीजों को बाँधने, कूएँ से पानी खींचने आदि में होता हौ। ड़ोरी। गुण। रज्जु। २. एक प्रकार की सज्जी।

रस्सीबाट
संज्ञा पुं० [हिं० रसी+बटना] रस्सी बटनेवाला। ड़ोरी बनानेवाला।

रहँकला
संज्ञा पुं० [हिं० रथ+कल] १. एक प्रकार की हलकी गाड़ी। २. तोप लादने को गाड़ी। उ०— बान रहँकला तोप जैजालै। सहसनि सुतरनाल हथनालै।— लाल (शब्द०)। ३. रहँकले पर लदी हुई छोटी तोप। तिमि घरनाल और करनालै सुतुरनाल जंजालै। गुरगुराब रहँकले भले तहँ लागे विपुल, वयालै।— रघुराज (शब्द०)।

रहँचटा पु
संज्ञा पुं० [हिं० रस+चाट वा रँहचटा] प्रिति की चाह। मनोरथसिद्धि की अभिलाषा। चसका। लिप्सा। दे० 'रँहचटा'। उ०— बनक मढ़े कोठ चढ़े छैल छबीले स्याम। खरी चौहटे में अरी चढी रहँचटे वाम। —रामसहाय (शब्द०)।

रहँट
संज्ञा पुं० [सं० अरघट्ट, प्रा० अरहट्ट] कूएँ से पानी निकालने का एक प्रकार का यंत्र। उ०— विरह विष वेलि बढो उर तेइ सुख सकल सुभाय दहे री। सोइ सीचिबे लागि मनसिज के रहँट नैन नित रहत नहे री।— तुलसी (शब्द०)। विशेष— इसमें कूएँ के ऊपर एक ढांचा रहता है। जिसमें बीचो बीच पहिए के आकार का एक गोल चरखा लगा होता है। जो कुएँ के ठिक बीच में रहता है। इस चरखे पर घड़ों आदि को एक बहुत लंबी माला, जिये 'माल' कहते है, टंगी रहती है। यह माला नीचे कूएँ के पानी तक लटकती रहती है और इसमें बहुत सी हाड़ियाँ या बाल्टियाँ बंधी रहती है। जब बैलों के चक्कर देने से चरखा घुमता है, तब जल से भरी हुई हाँडियाँ या बाल्टियाँ ऊपर आकर उलटती है, जिससे उनका पानी एक नाली के द्बारा खोतों में चला जाता है, और खाली हाँड़ियाँ यो वाल्टियाँ नीचे कूएँ के पानी में चली जाती और फिर भरकर ऊपर आती है। इस प्रकार थोड़े परिश्रम से अधिक पानी निकलता है। पश्चिम में इसकी बहुत चाल है।

रहँटा
संज्ञा पुं० [हिं० रहँठ] सूत कातने का चर्खा। उ०— कहै कबीर सूत भल काता। रहँटा न होय, मुक्ति को दाता।—कबीर (शब्द०)।

रहँटी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० रहँटा] १. कपास ओटने की चरखी। २. २. रूपया उधार देने का एक ढंग, जिसमें प्रति मास कुछ रूपया वसुल किया जाता है। इसे संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) में हुंड़ी कहते है।

रहंट्ट
संज्ञा पुं० [सं० अरघटु प्रा० अरहट्ट] दे० 'रहँट'। उ०— लागी घरी रहटु की सीचहि अमृत बेलि। —(शब्द०)।

रह (१)
संज्ञा स्त्री० [फा़० राह] मार्ग। रास्ता। राह। राह का लघु रूप। जैसे,— रहजनी, रहनुमा आदि।

रह पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० रथ, प्रा० रह] दे० 'रथ'।

रहकला पु
संज्ञा पुं० [हिं० रहँकला] दे० 'रहँकला'। उ०— गुरज सपीलन तोप धरि और रहकला बान। सहर कोट के रक्ष कह, लघु सूत कीन्ह पयान।— प० रासी, पृ० १३७।

रहचटा
संज्ञा पुं० [हिं० रँहचटा] दे० 'रँहचटा'।

रहचह पु
संज्ञा स्त्री० [अनु०] चिड़ियों का बोलना। चहचहाहट। उ०— सारौ सुआ ,सो रहचह करहो। कुरहि परेवा औ करबर- ही।— जायसी (शब्द०)।

रहजन
संज्ञा पुं० [फा़० रहजन] ड़ाकु। वटमार [को०]।

रहजनी
संज्ञा स्त्री० [फा़० रहजनी] ड़ाकु का कार्य। ड़ंकैती। बटमारी [को०]।

रहठा
संज्ञा पुं० [हिं० रहर+काठ] अरहर के पौधे के सूखे ड़ंठल। कड़िया।

रहठानि पु
संज्ञा पुं० [देश० या हिं० रह (=रहन, रहना) +सं० स्थान, प्रा० ठाण] रहने का स्थान। उ०—होनि सों मढ़्यौ पै अनहोनि जाके बीच भरी, जामें चलि जाइबे बनाई रहठानि है।—घनानंद, पृ० १२७।

रहन
संज्ञा स्त्री० [हिं० रहना] १. रहने की क्रिया या भाव। यौ०—रहन गहन= दे० 'रहन सहन'। उ—रहन गहन उनहूँ नहि पाई। अरथ सुनै सब जग अरुझाई।—कबीर मं०, पृ० ४७०। रहन सहन=चाल ढाल। तौर तरीका। २. रहने का ढंग। व्यवहार। आचार। उ०—जाकी रहनि कहनि अनमिल, सखि, कहत समुझि अति थोरे।—सूर (शब्द०)।

रहन सहन
संज्ञा स्त्री० [हिं० रहंना+सहना] जीवन निर्वाह का ढंग। गुजर बसर का तरीका। तौर। चाल ढाल।

रहना
क्रि० अ० [सं० राज (=विराजना, सुशोभित होना), पुं० हिं० राजना] १. स्थित होना। अवस्थान करना। ठहरना। जैसे,—अगर कोई यहाँ रहे, तो मैं वहाँ से हो आऊँ। २. स्थान न छोडना। प्रस्थान न करना। न जाना। रुकना। थमना। मुहा०—रह चलना या जाना=प्रस्थान करने का विचार छोड़ देना। रुक जाना। ठहर जाना। उ०—रहि चलिए सुंदर रघुनायक। जो सुत तात बचन पालन रत जननिउ तीत मानिबे लायक।—तुलसी (शब्द०)। ३. बिना किसी परिवर्तन या गति के एक ही स्थिति में अवस्थान करना। उ०—नीके है छोंके छुए ऐसे ही रह नारि।— बिहारी (शब्द०)। मुहा०—रहने देना=(१) जिस अवस्था में हो, उसी में छोड़ देना। हस्तक्षेप न करना। (२) जाने देना। कुछ ध्यान न देना। रहा जाना=शांति या स्थिरतापूर्वक अवस्थान करने में समर्थ होना। संतुष्ट होना। उ०—(क) वृषभ उदर व्रत रहा न जाई।—रघुराज (शब्द०)। (ख) अब तो चपला से न रहा गया, वह केतकी का झोंटा पकड़ने को दौड़ी।—देवकी- नंदन (शब्द०)। (ग) पिता को आते देख राजकुमार से न राहा गया। वे तुरंत आगे बढे़ और निकट पहुँचकर सादर प्रणाम किया।—देवकीनंदन (शब्द०)। विशेप—इस अर्थ में अधिकतर प्रयोग 'नहीं' के साथ होता है। ४. निवास करना। बसना। जैसे,—आप कई पीढियों से कलकत्ते में रहते हैं। ५. कुछ दिनों के लिये ठहरना या टिकना। अस्थायी रूप से निवास करना। उ०—एहि नैहर रहना दिन चारी।—जायसी (शब्द०)। ६. किसी काम में ठहरना। कोई काम करना बंद करना। थमना। उ०—रहो रहो, मेरे लिये क्यों परिश्रम करती हो।—लक्ष्मण (शब्द०)। ७. चलना बंद करना। रुकना। उ०—हाँ, डर ही से तो सिमट समट चलता है रह रहकर।—प्रतापनारायण (शब्द०)। ८. विद्य- मान होना। उपस्थित होना। जैसे,—हमारे रहते कोई ऐसा नहीं कर सकता।मुहा०—किसी के रहते=किसी की विद्यमानता में। मोजूदगी में। ९. चुपचाप समय बिताना। कुछ न करना। उ०—(ख) स्याही बारन तें गई मन तें भई न दूर। समुझि चतुर चित बात यह रहत बिसूर बिसूर।—रसनिधि (शब्द०)। (ख) धरम बिचारि समुझि कुल रहई। सो निकिष्ट तिय स्त्रुति अस कहई।— तुलसी (शब्द०)। मुहा०—रह जाना=(१) कुछ कार्रवाई न करना। जैसे,—तुम्हारे ख्याल से हम रह गए, नहीं तो एक चपत देते। (२) सफल न होना। लाभ न उठा सकना। जैसे,—सब पा गए, तुम रह गए। १०. नौकरी करना। काम काज करना। उ०—उसने जवाब दिया—मैं मालिन हूँ; यह नहीं कह सकती कि किसके यहाँ रहती हूँ और ये फूल के गहने किसके वास्ते लिए जाती हूँ।—देवकीनंदन (शब्द०)। ११. स्थित होना। स्थापित होना। जैसे,—दूसरे ही महीने उसे पेट रहा। १२. समागम करना। मैथुन करना। १३. जीवत रहना। जीना। उ०—रहते कौन अधार दुसह दुर्ग पिय विरह भौ। कर न राखते त्यार ध्यान जखीरा नैन जौ।—रसनिधि (शब्द०)। १४. रखेली के रूप में रहना। किसी की रखेली होकर दिन बिताना। १५. बतना। छूट जाना। अवशिष्ट होना। उ०—(क) कीन्हेसि जियन सदा सब चहा। कीन्हेसि मीचु न कोई रहा।—जायसी (शब्द०)। (ख) ओर जो बातें भगमानी से कहने को रह गई थीं, उनको भी उसी भँति धीरे धीरे उसने उससे कहा।—अयोध्या (शब्द०)। यौ०—रहा सहा = बचा बचाया। अवशिष्ट। थोड़ा जो बाकी था। जैसे,—तुम्हारे चले जाने से उनका रहा सहा उत्साह भी जाता रहा। मुहा०—(अंग आदि का) रह जाना = थक जाना। शिथल हो जाना। जेसे,—(क) लिखते लिखते हाथ रह गया। (ख) चलते चलते पैर रह गए। रह जाना= (१) पीछे छूट जाना। जैसे,— मेरी छड़ी वहीं रह गई है। (२)अवशिष्ट होना। खर्च या व्यवहार से बचना। जैसे,—मेरे पास यही पुस्तक रह गई है। विशेष—अवस्थानसूचक आस क्रिया का प्रयोग बहुत व्यापक है। प्रधान क्रिया के अतिरिक्त यह ओर क्रियाओं के साथ संयुक्त होकर भी आती है। जैसे,—आ रहा है; जा रहते हैं।

रहना
संज्ञा पुं० शेर, बाघ आदि के रहने का स्थान। वन का वह विभाग जहाँ शेर, चीते आदि के रहने की माँदें हों। इसे 'रमना' भी कहते हैं।

रहनि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० रहना] १. आचरण। चाल ढाल। रहन। उ०—सोइ बिवेक सोइ रहनि प्रभु हमहिं कृपा करि देहु।—तुलसी (शब्द)। २. प्रेम। प्रीति। लगन। उ०— जौ पै रहनि राम र्सो नाहीं। तै नर खर कूकर मूकर सम जाय जियत जग माही।—तुलसी (शब्द०)।

रहनी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० रहनि] दे० 'रहनि'। यौ०—रहनी गहनी=दे० 'रहन के साथ यौ० में'। उ०—रहनी गहना विधि सहित जाके आठो आँग।—अष्टांग०, पृ० ५७।

रहनुमा
संज्ञा पुं० [फा०] १. पथप्रदर्शक। मार्गदर्शक। २. नेता। अगुवा।

रहनुमाई
संज्ञा स्त्री० [फा०] राह दिखाने का काम। पथप्रदर्शन।

रहपट †
संज्ञा पुं० [?] झापड़। थापड़। उ०—बाम पच्छ नव कंचन मई। रहण्ट एक जु ताकौ दई।— नंद० ग्रं०, पृ० २८३।

रहबर
संज्ञा पुं० [फा०] मार्ग दिखानेवाला व्यक्ति। पथप्रदर्शक। उ०—रहवर मिलैं तौ पहुँचै जई। जिन्हि देखा सो देहि देखाई।—पंत० दरिया, पृ० ३१।

रहबरी
संज्ञा स्त्री० [फा०] पथप्रदर्शक का कार्य। मार्गदर्शन।

रहम (१)
संज्ञा पुं० [अ०] १. करुणा। दया। २. अनुकंपा। अनुग्रह। यौ०—रहम दिल =दयालु। कृपालु।

रहम
संज्ञा पुं० [अ० रह्म] गर्भाशय।

रहमत
संज्ञा स्त्री० [अ०] कृपा। दया। मेहरबानी।

रहमान (१)
क्रि० [अ०] बड़ा दयालु।

रहमान (२)
संज्ञा पुं० परमात्मा का एक नाम। (मुसल०)।

रहर, रहरि, रहरी †
संज्ञा स्त्री० [हि० अरहर] दे० 'अरहर'।

रहरू †
संज्ञा स्त्री० [प० हिं रिढ़ना(=घसिटन)] छोटी देहाती गाड़ी, जिसमें किसान लोग पाँस या खाद ढोते हैं।

रहरूढ़भाव
संज्ञा पुं० [सं० रहरूढभाव] १. संसार के झगड़ों के छोड़कर एकांत स्थान में निवास करना। २. वह जो इस प्रकार संसार को छोड़कर एकांत में निवास करना हो।

रहरेठा †
संज्ञा पुं० [सं० अरहर] अरहर के सूखे डंठल। कड़िया। रहठा।

रहल
संज्ञा स्त्री० [अ०] एक विशेष प्रकार की छोटी चौको जिसपर पढ़ने के समय पुस्तक रखी जाती है। उ०—रघूनाथ भावते को पानदान भरि धर्यो, धरी पोथी आप ल्याय कोक की रहल मैं।—रघुनाय (शब्द०)। विशेष—इसमें दो छोटी पटरिवाँ बीच में दूसरी को काटती हुई लगी रहती हैं ओर इच्छानुसार खोली या बंद की जा सकती हैं। खुलने पर इसका आकार x हो जाता हे।

रहलू पु †
संज्ञा स्त्री० [हि० रहरू] दे० 'रहरू'।

रहवाल (१)
संज्ञा स्त्री० [फा० रहवार] घोडे़ की एक चाल।

रहवाल (२)
वि० [हि० रहना+वाल (प्रत्य०)] रहनेवाला। निवास करनेवाला।

रहस्
संज्ञा पुं० [सं०] १. गुप्त भेद। छिपी बात। २. आनंदमय लोला। क्रीड़ा। खेल। ३. आनंद। सुख। ४. योग, तंत्र या ओर किसी संप्रदाय की गुप्त बात। गूढ तत्व। मर्म। ५. एकांतता। एकांत स्थान। ६. सत्य (को०)। ७. शोघ्रता। द्रुतता (को०)।

रहस (१)
संज्ञा पुं० [सं० रहस् (=क्रिड़ा)] आनंद। आमोद प्रमोद। उ०—(क) मिले रहस भा चाहिय दूना। कित रोइस जौं मिलै बिछूना।—जायसी (शब्द०)। (ख) जुलति जूय रनिवास रहस बस यहि बिधि। देखि देखि सियराम सकल मंगल निधि।—तुलसी (शब्द०)।

रहस (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. समुद्र। २. स्वर्ग।

रहसना
क्ति० अ० [हि० रहस+ना (प्रत्य०)] आनंदित होना। प्रसन्न होना। उ०—(क) एहि अवसर मंगलु परस सुनि रहसेउ रनिवास।—तुलसी (शब्द०)। (ख) एहि बिधि रहसत दपति होतु हिए नहि थारे।—सूर (शब्द०)। (ग) रहसत आय पपीहा मिला।—जायसी (शब्द)।

रहसबधाव
संज्ञा पुं० [हि० रहस+बधाई] विवाह की एक रीति जिसमें नवविवाहिता वधू को वर अपने साथ जनवासे में लाता है। वहाँ सब गुरुजन उस वधू का मुख देखते हैं और उसे वस्त्र, भूषणादि उपहार देते हैं।

रहसाना
कि० अ० [हि० रहस+ना (प्रत्य०)] आनंदित होना। रहसना। उ०—भोग करत बिहसैं रहसाई।—जायसी (शब्द०)।

रहसि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० रहस्] गुप्त स्थान। एकांत स्थान। उ०— सुनि वल मोहन बैठ रहसि में कीनहों कछू विचार।—सूर (शब्द०)।

रहसू
संज्ञा स्त्री० [सं०] व्यभिचारिणी। पुंश्चली। बदचलन औरत।

रहस्य (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह बात जो सबको बतलाई न जा सकती हो। गुप्त भेद। गोप्य विषय। २. भीतर की छिपी हुई बात। मर्म या भेद की बात। ३. वह जिसका तत्व सहज में या सब की समझ में न आ सके। उ०—यह रहस्य काहू नहिं जाना। दिनमनि चले करत गुन गान।—तुलसी (सब्द०)। क्रि० प्र०—खुलना। ४. एकांत में घटित वृत्त, घटना या वार्ता। ५. हँसी ठट्ठा। मजाक। ६. एक उपनिषद् (को०)।

रहस्य
वि० १. सबको न बताने योग्य। गोपनीय। २. जो एकांत में हुआ हो। जो छिपाकर हुआ हो।

रहस्यत्रय
संज्ञा पुं० [सं०] रामानुज संप्रदाय की तीन कोटियाँ जिन्हें ईश्वर, चित् ओर अचित् कहते हैं।

रहस्यवाद
संज्ञा पुं० [सं०] अव्यक्त के प्रति आत्मनिवेदन का वाद या सिद्वांत।

रहस्यवादी
वि० [रहस्यवादिन्] १. रहस्यवाद को माननेवाला। २. रहस्यवाद से संबंधित वा युक्त।

रहस्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. महाभारत के अनुसार एक प्रचीन नदी का नाम। २. रास्ना। ३. पाठा। पाढी।

रहाइश
संज्ञा स्त्री० [हि० रहना] १. दे० 'रहाई'। २. गुंजाइश। समाई।

रहाई
संज्ञा स्त्री० [हि० रहना] १. रहने को क्रिया या भाव। २. कल। चैन। आराम। उ०—सीस ते पूँछि लौं गात गर् यो पै डसे विन ताहि परै न रहाई।—(शब्द०)।

रहाऊ †
संज्ञा स्त्री० [देश०] गीत का पहला पद। टेक। स्थायी। विशेष—यह शब्द अधिकतर पंजाब में बोला जाता है।

रहाट
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो किसी प्रकार की सलाह देता हो। २. मंत्री। अमात्य। ३. प्रेतात्मा।

रहाना पु
क्रि० अ० [हि० रहना] १. होना। उ०—(क) भोजन मोर कपोत रहायो। ताको तै क्यों गोद छिपायो।—विश्राम (शब्द०)। (ख) मंदिर तिनकर जहाँ रहावा। तोह द्रुम तरे बधिक जव आवा।—विश्राम (शब्द०)। २. रहना। उ०— नीम करुवापन ना तजै जल में संदा रहाय।—कबीर (शब्द०)।

रहावन †
संज्ञा स्त्री० [हि० रहना+आवन (प्रत्य०)] वह स्थान जहाँ गाँव भर के सब पशु एकत्र होकर खडे़ हों। रहुनिया। उ०—कान्ह कुँवर सव सखन संग मिलां ठाढे जुरे रहावन। देखी तौ लौ कुंबरि लाचिली अरु सखियन की आवन।— हंसराज (शब्द०)।

रहासहा
वि० [हि० रहना+अनु० सहा] [वि स्त्री० रहीसही] बचा- खुचा। बचा बचाया। जो थोड़ा सा बच रहा हो। उ०—(क) हिंदुओं का दिल रहासहा ओर भी टूट गया।—शीवप्रसाद (शब्द०)। (ख) उसी प्रतापी ब्रिटिश राज्य के अधीन रहकर भारत रहीसही हैसियत भी खो दे।—बालमुकुंद गुप्त (शब्द०)।

रहित
वि० [सं०] बिना। बगैर। हीन। जैसे,—(क) आपकी बातें प्रायः अर्थरहित हुआ करती हैं। (ख) वे इन सब दीपों से रहित हैं। (ग) पुरुषार्थ रहित होकर जीवन नहीं बिताना चाहिए।

रहिला
संज्ञा पुं० [देश०] चना। उ०—रहिमन रहिला की भली जो परसै मन लाय। परमत मन मैला करै ऊ मैदा बहि जाय।— रहिमन (शब्द०)।

रहीम (१)
वि० [अ०] रहम करनेवाला। कृपालु। दयालु।

रहीम (२)
संज्ञा पुं० [अ०] १. अब्दुल रहीम खाँ खानखानाँ का उपनाम जो वे अपनी कविता में रखते थे। २. ईश्वर का एक नाम। (मुसलमान)।

रहुनिया †
संज्ञा स्त्री० [हिं० रहना + इया (प्रत्य०)] दे० 'रहावन'।

रहुवा †
संज्ञा पुं० [हिं० रहना] किसी दूसरे के यहाँ केवल रोटियों पर रहनेवाला मनुष्य। टुकड़हा। रोटीतोड़। उ०—कह गिरधर कविराय कहत साहेब से रहुवा। तुम नीचे फल वेलि वृक्ष हम ऊँचे महुवा।—गिरधर (शब्द०)।

रहूगण
संज्ञा पुं० [सं०] १. अंगिरस् गोत्र के अंतर्गत एक शाखा या गण। गौतम ऋषि इसी वंश के थे। २. इस वंश का मनुष्य।