विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/चि

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चिंकारा
संज्ञा पुं० [हिं० चिकार] दे० 'चिकारा' ।

चिंगट
संज्ञा पुं० [सं०चिङ्गट] [स्त्री० अल्पा चिंगटी] एक प्रकार की मछली । झिंगवा । झिंगा । विशेष—यह मछली केंकडे़ जाति के अंतर्गत है । दे० 'झिंगा' ।

चिंगड़
संज्ञा पुं० [सं० चिङ्गड] झींगा मछली [को०] ।

चिंगड़ा
संज्ञा पुं० [सं० चिङ्गडा] झींगा मछली ।

चिंगड़ा
संज्ञा पुं० [देश०] १. किसी पक्षी, विशेषतः मुर्गी का छोटा बच्चा । २. किसी जानवर का बच्चा । ३. बच्चा । छोटा बालक ।

चिंगारी
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिनगारी] दे० 'चिनगारी' ।

चिंघाड़
संज्ञा स्त्री० [सं० चीत्कार अथवा अनु०] १. चीख मारने का शब्द । चिल्लाहट । २. किसी जंतु का घोर शब्द । ३. हाथी की बोली । चिग्घाड़ । क्रि० प्र०—मारना ।

चिंघाड़ना
क्रि० अ० [सं० चीत्कार] १. चीखना । चिल्लाना । २. हाथी का चिल्लाना । ३. गरजना ।

चिंचन्न पु
संज्ञा स्त्री० [सं० चिञ्चिनी] इमली का पेड़ । उ०—कहूँ दाडिमी चूव चिंचन्न चंपी । मनो लाल मानिक्क पीरोज थप्पी ।—पृ० रा०, २ । ४७० ।

चिंचा
संज्ञा स्त्री० [सं० चिञ्चा] १. इमली । २. इमली का फल या बीज । चिआँ । ३. गुंजा (को०) ।

चिंचाटक
संज्ञा स्त्री० [सं० चिञ्चाटक] चेंच साग ।

चिंचाम्ल
संज्ञा पुं० [सं० चिञ्चाम्ल] १. चूका या चूकनाम का साग । २. एक प्रकार का फेनक जो इमला से बनता था (को०) ।

चिंचिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० चिञ्चिनी, या सं० तिन्तिड़ी] १. इमली का पेड़ । २. इमली का फल । उ०—तेरी महिमा तें चले चिचिनी—चियाँ रे ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ४७१ ।

चिंची
संज्ञा स्त्री० [सं० चिञ्ची] गुंजा । घुँघवी ।

चिंचोटक
संज्ञा पुं० [सं० चिञ्चोटक] चेंच साग ।

चिजा पु †
संज्ञा पुं० [सं० चिरञ्जीवी] [स्त्री० चिंजी] लड़का । पुत्र । बेटा । उ०—गिरत गब्भ को है गरब्भ चिंजी चिंजा डर । भूषण (शब्द०) ।

चिंजी पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिंजा] लड़की । कन्या ।

चिंड
संज्ञा पुं० [सं० चिण्डी] नृत्य का एक भेद । नाच का एक भेद । नाच का एक ढंग । उ०—उलथा टेंकी आलम सदिंड । पद पलटि हुरमयो निंशक चिंड ।—केशव (शब्द०) ।

चिंगुला
संज्ञा पुं० [हिं० चिंगुला] दे० 'चिंगुला' ।

चिंचिका
संज्ञा स्त्री० [सं० चिञ्चिका] गुंजा । घुँघची [को०] ।

चिंचिड़
संज्ञा पुं० [सं० चिञ्चिड] परवल [को०] ।

चिंत पु
संज्ञा स्त्री० [सं० चिन्ता] । चिंतना । चिंता । ध्यान । याद ।सोच । फिक्र । उ०—सो करिअ चघारी चिंत हमारी जानिअ भगति न पूजा ।—मानस, १ । १८६ ।

चिंतक (१)
वि० [सं० चिन्तक] १. चिंतन करनेवाला । ध्यान रखनेवाला । उ०— (क) जे रघुबीर चरन चिंतक तिन्हकी गति प्रकट दिखाई । अविरल अमल अनूप भगति दृढ़ तुलसिदास तब पाई ।—तुलसी ग्रं०, पृ० २६४ । (ख) सिय पद चिंतक जे जग माहीं । साधु सिद्धि पावहिं सक नाहीं ।—रामाश्वमेध (शब्द०) । २. सोचनेवाला । विचार करनेवाला । ध्यान करनेवाला । यौ०—शुभचिंतक । हितचिंतक = खैरख्वाह । विशेष—इस शब्द का प्रयोग समास में अधिक होता है ।

चिंतक (२)
संज्ञा पुं० मनन या चिंतन करनेवाला व्यक्ति । दार्शनिक । विचारक ।

चिंतन
संज्ञा पुं० [सं० चिन्तन] [वि० चिंतनीय, चिंतित, चिंत्य] ध्यान । बार बार स्मरण । किसी बात को बार बार मन में लाने की क्रिया । उ०—श्री रघुबीर चरन चिंतन तजि नाहीं ठौर कहूँ ।—तुलसी (शब्द०) । २. विचार । विवेचन । यौ०—चिंतनशील = विचारक ।

चिंतना पु (१)
क्रि० स० [सं० चिन्तन] १. चिंतन करना । ध्यान करना । स्मरण करना । उ०—सनक शंकर ध्यान ध्यावत निगम अवरन वरन । शेष शारद ऋषि सुनारद संत चिंतत चरन ।—सूर (शब्द०) । २. सोचनी । समझना । गौर करना । विचारना ।

चिंतना (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० चिन्तना] १. ध्यान । स्मरण । भावना । २. चिंता । सोच । ३. गंभीर विचार । मनन । चिंतन (को०) ।

चितनीय
वि० [सं० चिन्तनीय] १. चिंतन करने योग्य । ध्यान करने योग्य । भावनीय । २. चिंता करने योग्य । जिसकी फिक्र उचित हो । ३. विचार करने योग्य । सोचने समझने योग्य । विचारणीय ।

चिंतवन पु
संज्ञा पुं० [सं० चिन्तन] दे० 'चिंतन' ।

चिता
संज्ञा स्त्री० [सं० चिन्ता] १. ध्यान । भावना । २. वह भावना । जो किसी प्राप्त दुःख या दुःख की आशंका आदि से हो । सोच । फिक्र । खटका । उ०—चिंता ज्वाल शरीर वन, दावा लगि लगि जाय । प्रगट धुवाँ नहिं देखिए, उर अंतर धुँधुआय ।—गिरधर (शब्द०) । क्रि० प्र०—करना ।—होना । मुहा०—चिंता लगना = चिंता का बराबर बना रहना । जैसे,— मुझे दिन रात इसी की चिंता लगी रहती है । कुछ चिंता नहीं = कुछ परवाह नहीं । कोई खटके की बात नहीं । विशेष—साहित्य में चिंता करुण रस का व्यभिचारी भाव माना जाता है, अतः वियोग की दस दशाओं में से चिंता दूसरी दशा मानी गई है । ३. मनन । चिंतन । गंभीर विचार । यौ०—चिंताधारा—विचार की दिशा ।

चिंताकुल
वि० [सं० चिंन्ताकुल] चिंता से व्यग्र ।

चिंतापर
वि० [सं० चिंन्तापर] चिंतामग्न । चिंतन में रत । उ०— हैं झाँक रहे नीरव नभ पर, अनिमेष, अटल, कुछ चिंतापर ।—पल्लव, पृ० ८ ।

चिंतातुर
वि० [सं० चिन्तातुर] चिंता से घबराया हुआ ।

चिंतामग्न
वि० [सं० चितामग्न] गहरे विचार में लीन [को०] ।

चिंतामणि
संज्ञा पुं० [सं० चिन्तामणि] १. कल्पित रत्न जिसके विषय में प्रसिद्ध है कि उससे जो अभिलाषा की जाय वह पूर्ण कर देता है । उ०—रामचरित चिंतामणि चारू । संत सुमत तिय सुभग सिंगारू ।—तुलसी (शब्द०) । २. ब्रह्मा । ३. परमेश्वर । ४. एक बुद्ध का नाम । ५. घोड़े के गले की एक शुभ भौंरी । ६. वह घोड़ा जिसके कंठ में उक्त भौंरी हो । ७. स्कंदपुराण (गणपतिकल्प) के अनुसार एक गणेश जिन्होंने कपिल के यहाँ जन्म लेकर महाबाहु नामक दैत्य से उस चिंता- मणि का उद्धार किया था जिसे उसने कपिल से छीन लिया था । ८. यात्रा का एक योग । ९. वैद्यक में एक योग जो पारा, गंधक, अभ्रक और जयपाल के योग से बनता है । १०. सरस्वती देवी का मंत्र जिसे लोग बालक की जीभ पर विद्या आने के लिये लिखते हैं ।

चिंतामनि पु
संज्ञा पुं० [सं० चिन्तामणि] दे० 'चिंतामणि' ।

चिंतावेश्म
संज्ञा पुं० [सं० चिन्तावेश्मन] सलाह करने का घर या स्थान । मंत्रणागृह । गोष्ठीगृह ।

चिंति
संज्ञा पुं० [सं० चिन्ति] १. एक देश । २. इस देश का निवासी ।

चिंतिड़ी
संज्ञा स्त्री० [सं० चिन्तिडी] इमली ।

चिंतित
वि० [सं० चिन्तित] जिसे चिंता हो । चिंतायुक्त । फिक्रमद ।

चिंतिति
संज्ञा स्त्री० [सं० चिन्तिति] चिंता [को०] ।

चिंतिया पु
संज्ञा स्त्री० [सं० चिन्तित] दे० चिंतित [को०] ।

चिंत्य
वि० [सं० चिन्त्य] भावनीय । विचारणीय । विचार करने योग्य ।

चिंदी
संज्ञा स्त्री० [देश०] टुकड़ा । मुहा०—चिंदी चिंदी करना = किसी वस्तु को ऐसा तोड़ना कि उसके छोटे छोटे टुकड़े हो जाँय । हिंदी की चिंदी निकालना = अत्यंत तुच्छ भूल निकालना । कुतर्क करना ।

चिधी
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिंदी] दे० 'चिंदी' । उ०—फटी चिन्धियाँ पहने, भूखे भिखारी, फकत जानते हैं तेरी इंतजारी ।—हिम० त०, पृ० ४८ ।

चिंपा
संज्ञा पुं० [देश०] एक गहरे काले रंग का कीड़ा जो ज्वार, बाजरे, अरहर और तमाखू को खा ड़ालता है ।

चिंपाजी
संज्ञा पुं० [अं० शिंपैजी] अफ्रीका का एक बनमानुस जिसकी आकृति मनुष्य से बहुत कुछ मिलती जुलती है । विशेष—इसका सिर ऊपर चिपटा, माथा दबा हुआ, मुँह बहुत चौड़ा, कान बड़े और उभड़े हुए, नाक चिपटी तथाशरीर के बाल काले और मोटे होते हैं । इसके सिर, कंधे और पीठ पर बाल घने और पेट तथा छाती पर कम होते हैं । इसका मुख बिना रोएँ का और रंग गहरा ऊदा होता है । दोनों ओर के गुलमुच्छे काले होते हैं । इसका कद भी मनुष्य के बराबर होता है । चिंपाँजी जुंड़ में रहते हैं ।

चिँआँ
संज्ञा पुं० [सं० चिञ्चा (= इमली)] इमली का बीज । उ०— तोरी महिमा ते चलैं चिंचिनी चिंआँ रे ।—तुलसी (शब्द०) । मुहा०—चिंआँ सी = छोटी । बहुत छोटी । जैसे,—चिंआँ सी आँख ।

चिँउँटा
संज्ञा पुं० [हिं० चिमटा] एक कीड़ा जो मीठे के पास बहुत जाता है और जिस चीज के चिमटता है उसे जल्दी छोड़ता नहीं । चींटा । मुहा०—गुड़चिंउँटा होना = एक दुसरे से गुँथ जाना । चिमट जाना । गुत्थमगुत्था होना । चिंउँटे के पर निकलना = ऐसा काम करना जिससे मृत्यु हो । मरने पर होना । चिउँटों को जब पर निकलते हैं तब वे हवा में उड़ते हैं और गिर पड़कर मर जाते हैं ।

चिँउँटिया रेंगान
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिंउँटा + रेंगना] १. बहुत धीमी चाल । बहुत सुस्त चाल । अत्यंत मंद गमन । हौले हौले चलना । २. सिर के बालों की बड़ी बारीक कटाई जिसमें चिंउँटी रेगती हुई देख पड़े । (नाई) ।

चिँउँटी
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिमटना] एक बहुत छोटा कीड़ा जो मीठे के पास बहुत जाता है और अपने नुकीले मुँह से काटता और चिमटता है । चींटी । पिपीलिका । विशेष—चिंउँटियो के मुँह के दोनों किनारों पर दो निकली हुई नोकें होती हैं, जिनसे वे काटती या चिमटती हैं । इनकी जीभ एक नली के रूप में होती है जिससे वे रसीली चीजें चूसती हैं । चिँउँटी की अनेक जातियाँ होती हैं । मधुमक्खियों के समान चींटियों में भी नर, मादा के अतिरिक्त क्लीव होते हैं जो केवल कार्य करते है, संतानोत्पत्ति नहीं करते । चिँउँटियाँ झुंड़ में पहती हैं । इनके झुंड़ में व्यवस्था और नियम का अद्भुत पालन होता है । समुदाय के लिये भोजन संचित करके रखना, स्थान के रक्षित बनाना आदि कार्य बड़ी तत्परता के साथ किए जाते हैं । इसका श्रम और अध्यवसाय प्रसिद्ध है । मुहा०—चिँउँटी की चाल = बहुत सुरत चाल । मंद गति ।

चिँगना पु †
संज्ञा पुं० [देश०] बच्चा । उ०—अपने सुत कै मूँड़न करावैं छूरा लगन न पावै । अजया कै चिँगना धर मारै तनिको दया न आवै ।—कबीर श०, भाग० २, पृ० ४१ ।

चिँगुरना †
क्रि० अ० [अनुकरणमूलक देश०, अथवा हिं० चंग] १. बहुत देर तक एक स्थिति में रहने के कारण किसी अंग का जल्दी न फैलना । नसों का इस प्रकार संकुचित होना कि हाथ पैर जल्दी फैलाते न बने । २. सिंकुड़ना । पूरे फैलाव में बल पड़ने से कमी आना । जैसे,—कपड़े, कागज आदि का चिंगुरना । संयो० क्रि०—उठना ।—जाना ।

चिँगुरा (१)
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का बगुला ।

चिँगुरा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० चिँगुरना] बहुत देर तक एक में रहने के कारण किसी अंग का ऐसा संकोच कि वह फैलाने से जल्दी न फैले । क्रि० प्र०—धरना ।—पकड़ना ।—लगाना ।

चिँगुला †
संज्ञा पुं० [देश०] १. बच्चा । बालक । २. किसी पक्षी का छोटा बच्चा ।

चिँहार पु †
संज्ञा पुं० [हिं० चिन्हार] दे० 'चिन्हार' । उ०— और चिहार प्रीतम को लीजै । जो सिखवै सो कारज कीजै ।—इंद्रा०, पृ० ५१ ।

चिउड़ा
संज्ञा पुं० [सं० चिविट, प्रा० चिबिड़] एक प्रकार का चर्वण जो हरे, भिगोए या उबाले हुए धान को कूटने से बनता हैं । चिड़वा । चूरा ।

चिउरा (१) †
संज्ञा पुं० [हिं० चिउड़ा] दे० 'चिउड़ा' । उ०—दधि चिउरा उपहार अपार । भरि भरि कावरि चले कहार ।— मानस, १ । ३०५ ।

चिउरा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० चावल, चाउर] दे० 'चावल' । उ०—लै चिउरा निधि दई सुदामहि जद्यपि बाल मिताईज्ञ ।—तुलसी (शब्द०) । २. चिउली ।

चिउली (१)
संज्ञा पुं० [देश०] १. महुए का जाति का एक जंगली पेड़ जो हिमालय के आसपास भूटन तक होता है । विशेष—इसका पतझड़ होता है । इसमें से एक प्रकार का तेल निकलता है जे मक्खन की तरह जम जाता है । इस तेल के जमे हुए कतरों को चिउरा या चिउली का पानी या पुलवा भी कहते हैं । नेपाल आदि में इसे घी में मिलाते हैं । २. एक प्रकार का रंगीन रेशमी कपड़ा । प्रर्या०—चिउरा । फुलवारा । चार चूरी ।

चिउली (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० चिपिट, प्रा० चिविड़, चिविल] चिकनी सुपारी ।

चिक
संज्ञा स्त्री० [तु० चिक] १. बाँस या सरकंडे की तीलियों का बना हुआ झँझरीदार परदा । चिलमन । २. पशुओं को मारकर उनका माँस बेचनेवाला । बूचर । बकर कसाई (बूचरों की दुकान पर चिक टँगी रहती है इसी से यह शब्द बना है) । उ०—जाट जुलाह जुरे दरजी पै चढे़ चिक चोर चमारे ।—(शब्द०) ।

चिक (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] कमरका वह दर्द जो एकबारगी अधिक बल पड़ने के कारण होता है । चमक । चिलक । झटका । लचक ।

चिक (३)
संज्ञा स्त्री० [अं० चेक] किसी बंक या महाजन के नाम वह कागज जिसमें अपने खाते से रूपया देने का आदेश रहता है । हुंडी ।

चिकट (१)
वि० [सं० चिक्लद चक्कण (भेद नि०)] १. चिकना और मैल से गंदा । जिस पर मैल जमा हो । मैल कुचैला । २. लसीला । चिपचिपा ।

चिकट (२)
संज्ञा पुं० [देश०] १. एक प्रकार का रेशमी या टसर का कपड़ा । २. वे कपड़े जिन्हें भाई अपनी बहन को उस समय देता है जब बहिन की संतान का विवाह होता है ।

चिकटना
क्रि० अ० [हिं० चिकट या चिक्कट से नामिक धातु] जमी हुई मैल के कारण चिपचिपा होना ।

चिकटा
वि० [हिं० चिकट] दे० 'चिकट' । उ०—गुरु गुरु अंतर जानौ भाई । गुरु चिकटा गुरु चोख जनाई ।—तुरसी सा०, पृ० ३११ ।

चिकड़ी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक छोटा पेड़ जो हिमालय पर ८,००० फूट की ऊँचाई तक मिलता है । विशेष—इसकी लकड़ी बहुत मजबूत और पीलापन लिए होता है । अमृतसर में इनकी कंघियाँ बहुत अच्छी बनती हैं । कठौत आदि बनाने के काम में भी यह लकड़ी आती है । इसके पत्तों की खाद बनती है । फूलों में मीठी सुगंध होती है ।

चिकन (१) †
[सं० चिक्कन] दे० 'चिकना' । यौ०—चिकनमुहाँ = (१) भलमुहाँ बननेवाला । चिकनी चुपड़ी बात करनेवाला । (२) आच्छी सूरतवाला ।

चिकन (२)
संज्ञा पुं० [फ़ा०] एक प्रकार का महीन सूती कपड़ा जिसपर उभड़े हुए बेल या बूटे बने रहते हैं । कसीदा काढ़ा हुआ कपड़ा । सूजनकारी का कपड़ा । यौ०—चिकनकारी । चिकनगर ।

चिकनई
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिकनई] दे० 'चिकनाई' । उ०—पत बचाती है उसी की चिकनई । गाल का तिल क्यों न हो बेतेल ही ।—चोखे०, पृ० ७२ ।

चिकनकारी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] चिकन बनाने का काम ।

चिकनगर, चिकनदोज
संज्ञा पुं० [फ़ा० चिकनगर, चिकनदोज] चिकन काढ़नेवाला । चिकन का काम करनेवाला ।

चिकना
वि० [सं० चिक्कण] [वि० स्त्री० चिकनी] १. जो छूने में खुरदार न हो । जो ऊबड़ खाबड़ न हो । जिसपर उँगली फेरने से कहीं उभाड़ आदि न मालूम हो । जो साफ और बराबर हो । जैसे,—चिकनी चौकी, चिकनी मेज । २. जिसपर सरकने में कुछ रुकावट न जान पड़े । जैसे,—यहाँ की मिट्टी बड़ी चिकनी है, पैर फिसल जायगा । मुहा०—चिकना देख फिसल पड़ना—केवल सौंदर्य या धन देखकर रीझ जाना । धन या रूप पर लुभा जाना । ३. जिसमें रुखाई न हो । जिसमें तेल आदि का गीलापन हो । जिसमें तेल लगा हो । स्निग्ध । तेलिया । तलौंस । मुहा०—चिकना घड़ा = (१) वह जिसपर अच्छी बातों का कुछ असर म पड़े । ओछा । निर्लज्ज । बेहया । (२) जिसके पेट में कोई बात न पचे । क्षुद्र स्वभाव का । चिकने घड़ पर पानी पड़ना = किसी पर अच्छी बात का प्रभाव न पड़ना । ४. साफ सुथरा । संवारा हुआ । जैसे,—तुम्हारा चिकना मुहँ देखकर कोई रुपया नहीं दिए देता । मुहा०—चिकना चुपड़ा = बना ठना । छैल चिकनियाँ । सँवार सिंगार किए हुए । चिकनी चुपड़ी = दे० 'चिकनी चुपड़ी बातें' । चिकनी चुपड़ी बातें = मीठी बातें जो किसी के प्रसन्न करने, बहकाने या धोखा देने के लिये कही जायँ । बनावटी स्नेह से भरी बातें । कृक्त्रिम मधुर भाषण । जैसे,—उनकी चिकनी चुपड़ी बातों में मत आना । चिकना मुँह = सुंदर और सँवारा हुआ चेहरा । चिकने मुँह का ठग = ऐसा धूर्त जो देखने में और बातचीत से भलामानुस जान पड़ता हो । वंचक । ५. चिकनी चुपड़ी बातें कहनेवाला । केवल दूसरों को प्रसन्न करने के लिये मीठी बातें कहनेवाला । लप्पो चप्पो करनेवाला । चाटुकार । खुशामदी । ६. स्नेह । अनुरागी । प्रेमी । उ०— जे नर रूखे विषय रस, चिकने राम सनेह । तुलसी ते प्रिय राम को कानन बसहिं कि गेह ।—तुलसी ग्रं०, पृ० १०८ ।

चिकना (२)
संज्ञा पुं० तेल, घी, चरबी आदि चिकने पदार्थ । जैसे, इसमें चिकना कम देना ।

चिकनाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिकना + ई (प्रत्य०)] १. चिकना होने का भाव । चिकनापन । चिकनाहट । २. स्निग्धता । सरसता । ३. घी, तेल, चरबी आदि चिकने पदार्थ ।

चिकनाना (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिकना + ना (प्रत्य०)] १. चिकना करना । खुरदुरा न रहने देना । बराबर करके साफ करना । २. रूखा न रहने देना । तेलौंस करना । स्निग्ध करना । ३. मैल आदि साफ करके निखारना । साफ सुथरा करना । सँवारना । संयो० क्रि०—देना । लेना ।

चिकनाना (२)
क्रि० अ० १. चिकना होना । २. स्निग्ध होना । ३. चरबी से युक्त होना । हृष्ट पुष्ट होना । मोटाना । जैसे,— देखो ये जब से यहाँ रहने लगे हैं, कैसे चिकना आए हैं । ४. स्नेहयुक्त होना । अनुरक्त होना । प्रेमपूर्ण होना । उ०—नहिं नचाइ चितवति दृगनु, नहिं बोलति मुसकाइ । ज्यौं ज्यौं रूखी रुख करति, त्यौं त्यौं चितु चिकनाइ ।—बिहारी र०, दो० ३६४ ।

चिकनापन
संज्ञा पुं० [हिं० चिकना + पन (प्रत्य०)] चिकना होने का भाव । चिकनाई । चिकनाहट ।

चिकनारा
वि० [हिं० चिकना + आरा (प्रत्य०)] दे० 'चिकना' । उ०—केस सुदेस चमक चिक कारे कारे अति सटकारे । भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ४१७ ।

चिकनावट
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिकना+ वट (प्रत्य०)] दे० 'चिकनाहट' ।

चिकनाहट
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिकना + हट (प्रत्य०)] चिकना होने का भाव । चिक्कणता । चिकनापन ।

चिकनियाँ
वि० [हिं० चिकना + इयाँ (प्रत्य०)] दे० 'चिकनिया' । उ० (क) सूरदास प्रभु वाके बस परि अब हरि भए चिकनियाँ ।—सूर (शब्द०) । (ख) या माया रघुनाथ की बौरी खेलन चली अहेरा हो । चतुर चिकनियाँ चुनि चुनि मारै काहु न राखै नेरा हो ।—कबीर (शब्द०) ।

चिकनिया
वि० [हिं० चिकना] छैल । शौकीन । बाँका । बना ठना । उ०—सबही ब्रज के लोक चिकनिया मेरे भाएँ घास । अब तौ इहै बसी री माई नहिं मानौंगी त्रास । सूर (शब्द०) । यौ०—छैल चिकनियाँ ।

चिकनी (१)
वि० स्त्री० [हिं०] दे० 'चिकना' ।

चिकनी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'चिकनी सुपारी' ।

चिकनी मिट्टी
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिकनी + मिट्टी] १. काले रंग कीलसदार मिट्टी जो सिर मलने आदि के काम में आती है । करैली मिट्टी । काली मिट्टी । विशेष—चना, अलसी, जो आदि इस मिट्टी में बहुत अधिक होते हैं । २. पीले या सफेद रंग की साफ लसीली मिट्टी जो बड़ी नदियों के ऊँचे करारों में होती है और लीपने पोतन के काम में आती है ।

चिकनी सुपारी
संज्ञा स्त्री० [सं० चिक्कणी] एक प्रकार की उबाली हुई सुपारी जो चिपटी होती है । चिकनी डली । विशेष—दक्षिण के कनारा नामक प्रदेश में यह सुपारी उबालकर बनाई जाती है, इसी से इसे दक्खिनी सुपारी भी कहते हैं ।

चिमर †
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का रेशमी कपड़ा । चिकट ।

चिकरना
क्रि० अ० [सं० चीत्कार, प्रा० चीत्कार, चिक्कार] चीत्कार करना । जोर से चिल्लाना । चिंघाड़ना । चीखना ।

चिकवा (१)
संज्ञा पुं० [तु० चिक + हिं० वा (प्रत्य०)] बकर कसाब । मांस बेचनेवाला । बूचड़ । चिक ।

चिकवा (२)
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का रेशमी या टसर का कपड़ा । चिकट । उ०—चिकवा चीर मघौना लोने । मोति लगा औ छापे सोने ।—जायसी (शब्द०) ।

चिकार
संज्ञा पुं० [सं० चीकार, प्रा० चिक्कार] चीत्कार । चिल्लाहट । चिंघाड़ । उ०—परेउ भूमि करि घोर चिकारा ।— तुलसी (शब्द०) । क्रि० प्र०—करना ।—मचना ।—मचाना ।—होना ।

चिकारना
क्रि० अ० [हिं० चिकार के नामिक धातु] चीत्कार करना । चिंघाड़ना ।

चिकारा
संज्ञा पुं० [हिं० चिकार] [स्त्री० अल्पा चिकारी] १. सारंग की तरह का एक बाजा । विशेष—इस बाजे में जिसमें नीचे की ओर चमड़े से मढ़ा कटोरा रहता है और ऊपर ड़ाँड़ी निकली रहती है । चमड़े के ऊपर से गए हुए तारों या घोड़े के बालों को कमानी से रेतने से शब्द निकलता है । २. हिरन कौ जाति का एक जंगली जानवर जो बहुत फुरतीला होता है । इसे छिकरा भी कहते हैं ।

चिकारी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिकारा] छोटा चिकारा ।

चिकारी (२) †
संज्ञा स्त्री० [देश०] मच्छड़ की तरह का एक छोटा कीड़ा ।

चिकित
संज्ञा पुं० [सं०] एक ऋषि का नाम ।

चिकितान
संज्ञा पुं० [सं०] एक ऋषि का नाम ।

चिकितायन
संज्ञा पुं० [सं०] चिकित ऋषि के वंशज ।

चिकित्सक
संज्ञा पुं० [सं०] रोग दूर करने का उपाय करने— वाला । वैद्य ।

चिकित्सन
संज्ञा पुं० [सं०] चिकित्सा करना [को०] ।

चिकित्सा
संज्ञा स्त्री० [सं०] [वि० चिकित्सित, चिकित्स्य] १. रोग दूर करने की युक्ति या क्रिया । शरीर स्वस्थ या नीरोग करने का उपाय । रोगशांति का उपाय । रोगप्रतीकार । इलाज । क्रि० प्र०—करना ।—होना । विशेष—आयुर्वेद के दो विभाग हैं, एक तो निदान जिसमें पह- चान के लिये रोगों के लक्षण आदि का वर्णन रहता है और दूसरा चिकित्सा जिसमें भिन्न भिन्न रोगों के लिये भिन्न भिन्न औषधों की व्यवस्था रहती है । चिकित्सा तीन प्रकार की मानी गई है-दैवी, आसुरी और मानुषी । जिसमें पारे की प्रधानता हो वह दैवी, जो छह रसों के द्वारा की जाय वह मानुषी और जो अस्त्र प्रयोग या चीर फाड़ के द्वारा हो वह आसुरी कहलाती है । २. वैद्य का व्यवसाय या काम । बैदगी ।

चिकित्सालय
संज्ञा पुं० [सं०] वह स्थान जहाँ रोगियों के आरोग्य का प्रयत्न किया जाता है । शफाखाना । अस्पताल ।

चिकित्सावकाश
संज्ञा पुं० [सं०] वह अवकाश जो किसी कर्मचारी को बीमारी के इलाज आदि के लिये चिकित्सक के पत्र के आधार पर दिया जाता है ।

चिकित्साव्यवसाय
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्य एवं चिकित्सक का व्यवसाय या पेशा ।

चिकित्साशास्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] वह शास्त्र जिसमें रोग के लक्षण, और उपचार आदि की विवेचना रहती है ।

चिकित्सित (१)
वि० [सं०] जिसकी चिकित्सा हो गई हो । जिसकी दवा हुई हो ।

चिकित्सित (२)
संज्ञा पुं० एक ऋषि का नाम ।

चिकित्स्य
वि० [सं०] जो चिकित्सा के योग्य हो । साध्य ।

चिकिन (१)
वि० [सं०] चिपटी नाकवाला [को०] ।

चिकिन † (२)
संज्ञा पुं० [हिं० चिकिन] दे० 'चिकन' ।

चिकिल
संज्ञा पुं० [सं०] कीचड़ । पंक ।

चिकीर्षक
वि० [सं०] कार्य करने की इच्छा करनेवाला [को०] ।

चिकीर्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] [वि० चिकीर्षित, चिकीर्ष्य] करने की इच्छा । जैसे,—नाश—कर्म—चिकीर्षा ।

चिकीर्षित (१)
वि० [सं०] करने के लिये इच्छित ।

चिकीर्षित (२)
संज्ञा पुं० इच्छा । मनोरथ । तात्पर्य ।

चिकुटी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'चिकोटी', 'चुटकी' । उ०—भृकुटी नचाइ भाल त्रिकुटी उचाई कर चिकुटी रचाइ चित चायन चुनति फिरै ।—देव (शब्द०) ।

चिकुर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सिर के बाल । केश । २. पर्वत । ३. साँप आदि रेंगनेवाले जंतु । सरीसृप । ४. एक पेड़ का नाम । ५. एक पक्षी का नाम । ६. एक सर्प का नाम । ७. छछूँदर । गिलहरी । चिखुरा । यौ०—चिकुरकलाप । चिकुरनिकर । चिकुरपक्ष । चिकुरपाश । चिकुर भार । चिकुर हस्त = केशों की लट । बालों की सजावट जुल्फ ।

चिकुर (२)
वि० चंचल । चपल ।

चिकुला
संज्ञा पुं० [सं० चिकुर] चिड़िया का बच्चा ।

चिकूर
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'चिकुर' ।

चिकोटी †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'चुटकी', 'चिमटी' । क्रि० प्र०—काटना ।

चिक्क (१)
वि० [सं०] चिपटी नाकवाला ।

चिक्क (२)
संज्ञा पुं० छछूँदर ।

चिक्कट (१)
संज्ञा पुं० [सं० चिक्कण (भेद नि०) अथवा हिं० चिकना + कीट या काट] गर्द, तेल आदि की मैल जो कहीं जम गई हो । कीट ।

चिक्कट (२)
वि० जिसपर मैल जमी हो । मैल कुचैला । गंदा ।

चिक्कण (१)
वि० [सं०] चिकना ।

चिक्कण (२)
संज्ञा पुं० १. सुपारी का पेड़ या फल । २. हड़ । हर्रे । ३. आयुर्वेद में पाक या आँच की तीन अवस्थाओं में से एक । कुछ तेज आँच ।

चिक्कणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सुपारी ।

चिक्कणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सुपारी । २. हड़ ।

चिक्कदेव
संज्ञा पुं० [सं०] मैसूर के एक यादववंशी राजा का नाम जिसने ई० सन् १६७२ से लेकर १७०४ तक राज्य किया था ।

चिक्कन †
वि० [सं० चिक्कण] दे० 'चिकना', 'चिक्कणा' ।

चिक्करना
क्रि० अ० [सं० चीत्कार] चीत्कार करना । चिघाड़ना । चीखना । जोर से चिल्लाना । उ०—चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरम कलमले ।—मानस, १ । २६१ ।

चिक्कस (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. जौ का आटा । २. हल्दी और तेल में मिला हुआ जौ का आटा जो जनेऊ या ब्याह में उबटन की तरह मला जाता है ।

चिक्कस (२)
संज्ञा पुं० [देश०] लोहे, पीतल आदि के छड़ का बना हुआ वह अड्डा जिसपर बुलबुल, तोते आदि बैठाए जाते हैं ।

चिक्का (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सुपारी । २. चूहा (को०) । ३. हाथी के शरीर का मध्यवर्ती भागविशेष । मातंग (को०) ।

चिक्का (२) †
संज्ञा पुं० [देश० अथवा सं० चक्रक] १. दे० 'चक्का' । २. ढेला । ३. एक खेल ।

चिक्कार
संज्ञा पुं० [सं० चीत्कार] दे० 'चिकार' ।

चिक्कारना पु
क्रि० अ० [सं० चित्कार, हिं० चिक्कार + ना (प्रत्य०)] चिग्घाड़ना ।

चिक्कारा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'चिकारा' ।

चिक्कारी
संज्ञा स्त्री० [सं० चित्कार] चिक्कार । चिकारना । उ०— चटकत गायक मानहु बिज्जु पतन चिक्कारी ।—प्रेमघन०, भा० १, पृ० २७ ।

चिक्किण
वि० [सं०] दे० 'चिक्कण' [को०] ।

चिक्किर
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का चूहा जिसके काटने से सूजन और सिर में पीड़ा आदि होती है । २. चिखुरा । गिलहरी ।

चिक्लिद
संज्ञा पुं० [सं०] १. नमी । आर्द्रता । २. चंद्रमा [को०] ।

चिखर †
संज्ञा पुं० [देश०] चने का छिलका । चने की भूसी । चने की कराई ।

चिखल्ल
संज्ञा पुं० [सं०] १. कीचड़ । २. दलदल [को०] ।

चिखुर
संज्ञा पुं० [सं० चिक्कर, हिं० चिखुरा] [स्त्री० चिखुरी] चिखुरा । गिलहरी । उ०—कीचस आगे चिखुर बियानी भालु भई है भक्ता ।—संत०, दरिया, पृ० १२७ ।

चिखुरन
संज्ञा स्त्री० [देश० अथवा हिं०] 'खुरचन' का वर्ण विप- र्यय । वह घास जो खेत को निराकर निकाली जाती है ।

चिखुरना
क्रि० स० [देश०] जोते हुए खेत में से खाद निकालकर बाहार करना ।

चिखुरा †
संज्ञा पुं० [सं० चिक्किर या चिकुर] [स्त्री० चिखुरी] गिलहरी ।

चिखुराई
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिखुरना] १. चिखुरने का काम या भाव । २. चिखुरने की मजदूरी ।

चिखुरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिखुरा] गिलहरी ।

चिखौनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० चीखना] १. चीखने या चखने की क्रिया । स्वाद लेने या देने की क्रिया । २. चखने की वस्तु । स्वाद लेने की वस्तु । चटपटे स्वाद की थोड़ी सी वस्तु ।

चिगछ पु
संज्ञा स्त्री० [सं० चिकित्सा, प्रा० चिगिच्छा] चिकित्सा । दवा । रोगप्रतीकार । इलाज । उ०—गज चिगछ इक्छ जानंत सब्ब । नाटिक निवास सम सेस कब्ब ।—पृ० रा०, ६ । ९ ।

यौ०
चिगछग्गुन [बिं० चिगछ + गुन] चिकित्सा की विद्या । उ०—मुनिवर तब तहँ आय के गज चिगछग्गुन कौन । उ०— रा० २७ । ७ ।

चिगता †
संज्ञा पुं० [तु० चगत्ता] चगताई वंश का मुसलमान । उ०— चिगतां उखेल पखरे चरित, रक्खे मेल अमेल रुख ।—रा० रू० — पृ० ९९ ।

चिगवा
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'चिनगी' । उ०—चंद सूर दोइ भाठी कीन्हीं सुषमनि चिगवा लागी रे ।—कबीर ग्रं० पृ० ११० ।

चिगना, चिगाना
क्रि० स० [देश०] दे० 'चिनना' । उ०—दोइ पुड जोड़ि चिगाई भाठी, चुया महारस भारी । काम क्रोध दोइ किया बलीता खुटि गई संसारी ।—कबीर ग्रं०, पृ० ११० ।

चिग्ग
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिक] दे० 'चिक' ।

चिघरना †
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'चिंघाडना' । उ०—मंदिर में बंदी हैं चारण, चिधर रहें हैं वन में वारण ।—अर्चना, पृ० ५१ ।

चिग्घाड़
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'चिंघाड़' ।

चिघाड़
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'चिंघाड़' ।

चिग्घाड़ना
क्रि० अ० [हिं० चिग्घाड़ +ना (प्रत्य०)] दे० 'चिंघाड़ना' ।

चिघ्घार
संज्ञा स्त्री० [हिं०चिग्घाढ़] दे० 'चिंघाड़' । र०—सुनि रोदन चिघ्घार दयावंश बढ़ो पंडित ।—प्रेमघन, भा० १, पृ० २१ ।

चिचटक †
वि० [हिं० चीचट] मैला । गंदा ।

चिचड़ा
संज्ञा पुं० [देश०] १. डेढ़ दो हाथ ऊँचा एक पौधा । अपामार्ग । विशेष—इसमें थोड़ी थोड़ी दूर पर गाँठें होती हैं । गाठों के दोनों ओर पतली टहनियाँ या पत्तियाँ लगी होती हैं । पत्तियाँ दो तीन अंगुली लंबी, नसदार और गोल होती हैं । फूल और बीज लंबी लंबी सींकों में गुछे होते हैं । बीज जीर के आकार के होते हैं और कुछ नुकीले तथा रोएँदार होने के कारण कपड़ों से कभी कभी लिपट जाते हैं । इस पौधे की जड़ मूसला होती है । इसकी जड़, पत्ती आदि सब दवा के काम में आती है । ऋषिपंचमी का व्रत रहनेवाले इसकी दतुवन करते हैं । कर्मकांडी इसे बहुत पवित्र मानते हैं । श्रावणी उपाकर्म केगणस्नान के अनंतर इससे मार्जन करने का विधान है । यह पौधा बरसात में अन्य घासों के साथ उगता है और बहुत दिनों तक रहता है । पर्या०—अपमार्ग । ओंगा । अंझाझार । लटजीरा । २. किलनी या किल्ली नाम का कीड़ा जो पशुओं के शरीर में चिमटकर उनका रक्त पीता है ।

चिचड़ी
संज्ञा स्त्री० [?] एक कीड़ा जो चौपायों या कुतों बिल्लियों के शरीर से चिमटा रहता है और उनका खून पिया करता है । किलनी । किल्ली । मुहा०—चिचड़ी सा चमटना = पीछ न छोड़ना । साथ में बना रहना । पिंड न छोड़ना ।

चिचान पु
संज्ञा पुं० [सं० सिञ्चा] बाज पक्षी । उ०—आज कालि पल छिनक में मारग मेला हिए । काल चिचाना नर चिड़ा औजड़ औ औचिंत । कबीर (शब्द०) ।

चिचावना
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'चिचियाना' । उ०—काल चिचावत है खड़ा तू जाग पियारे मिंत ।—कबीर सा० सं०, पृ० ७८ ।

चिचिंगा
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'चचींडा' ।

चिचिंड
संज्ञा पुं० [सं० चिचिण्ड] चचींड़ा । चिचिंडा ।

चिचिंडा
संज्ञा पुं० [सं० चिचिण्ड] दे० 'चचींड़ा' ।

चिचियाना †
क्रि अ० [अनु० चीं चीं] चिल्लाना । चीखना । हल्ला करना । उ०—नंदराय थे भौन में खडे़ करत सब गाज । जय जय करि चिचियाइए तबै मिलत ब्रजराज ।—सुकवि (शब्द०) । (ख) चंगुल तर चिचियैही हो, तब मिलिहैं मिजाज ।—पलटू०, भा० ३, पृ० १६ ।

चिचियाहट
संज्ञा संज्ञा [हिं० चिचियाना] चिल्लाहट ।

चिचुकना
क्रि अ० [अनु० या देश०] दे० 'चुचुकना' ।

चिचेडा
संज्ञा पुं० [हिं० चचींडा] दे० 'चचींडा' ।

चिचोड़ना †
क्रि० स० [अनु० या देश०] दे० 'चचोड़ना' ।

चिचोड़वान
क्रि० स० [हिं० चिचोड़ना का प्रे० रूप] दे० 'चचोड़वाना' ।

चिच्चिटिग
संज्ञा पुं० [सं० चिच्चिटिङ्ग] एक विषैल कीड़ा [को०] ।

चिच्छक्तिं
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह शक्ति जिसका नाम चित् है । चित् शक्ति । परमात्मा ।

चिच्छल
संज्ञा पुं० [सं०] १. महाभारत के अनुसार एक देश का नाम । २. इस देश का निवासी ।

चिच्याना पु
क्रि० अ० [अनु०] दे० 'चिचियाना' । उ०—चिच्याइ मरै चुप साधै की चातक स्वाति समें ही सबै सु बिसेख्यौ ।— केशव ग्रं०, भा० १, पृ० ७१ ।

चिजारा
संज्ञा पुं० [हिं० चिनना ?] कारीगर । मेमार । उ०—(क) कबिरा देवल ढहि परा भई ईट संहार । कोई चिजारा चूनिया, मिला न दूजी बार ।—कबीर (शब्द०) । (ख) करी चिजारा प्रीतड़ी ज्यों ढहै न दूजी बार ।—(शब्द०) ।

चिज्जड़
वि० [सं० चिज्जड़] जो जड़ एवं चेतन दोनों हो [को०] ।

चिट
संज्ञा स्त्री० [हिं० चीड़ना] १. कागज का टुकड़ा । २. पुरजा । एक्का । छोटा पत्र । ३. कपडे़ आदि का छोटा टुकड़ा । क्रि० प्र०—निकलना । फटना ।

चिटक
वि० [अनु०] चिक्कर । मैला । गंदा ।

चिटकना
क्रि० अ० [अनु०] १. सूखकर जगह जगह पर फटना । खरा होकर दरकना । रुखाई के कारण ऊपरी सतह में दराज पड़ना । जैसे,—चौकी धूप में मत रखो, चिटक जायगी । २. गठीली लकड़ी आदि का जलते समय 'चिट चिट' शब्द करना । ३. चिढना । चिड़चिड़ाना । बिगड़ना । जैसे, तुम्हें तो मैं कुछ कहता नहीं, तुम क्यों चिटकते हो ? ४. शीशे आदि का फूटना ५. शुष्क होना । सूखना । उ०—सूखे ओठ गला, चिटका, मुख लटका प्राण पियासे ।—क्वासि, पृ० ७१ ।

चिटका
संज्ञा पुं० [हिं० चिंता] चिंता ।

चिटकाना
क्रि० स० [अनु०] १. किसी सूखी हुई चीज को तोड़ना या तड़काना । २. गठीली लकड़ी आदि को जलाकर उसमें से 'चट चट' शब्द उत्पन्न करना । ३. खिझाना । ऐसी बात कहना जिससे कोई चिढे़ । ४. ज्यादा आँच या ताप देकर शीशे को टूटने देना ।

चिटकी
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिटुकी] दे० 'चिटुकी' । उ०—चिटकी देइ बजावै तारी । अइया मनसहुँ बूझि तुम्हारी ।—सुंदर ग्रं०, भा० १, पृ० ३२५ ।

चिटखनी
संज्ञा स्त्री० [अनु० या हिं० सिटकिनी] दे० 'सिटकिनी' । उ०—पर भीतर से चिटखनी लगी हुई थी और किवाड़ नहीं खुला ।—सन्यासी, पृ० ४६४ ।

चिटनवीस
संज्ञा पुं० [हिं० चिट+ फा० नवीस] चिट्ठीपत्री, हिसाब किताब आदि लिखनेवाला । लेखक । मुहर्रिर । कारिंदा ।

चिटनीस
संज्ञा पुं० [मरा० चिटणोसी, हिं० चिटनवीस] लेखक । उ०—उसको त्वरा से लिखी जाने योग्य बनाने के विचार से शिवाजी के चिटनीस (मंत्री, सरिश्तेदार) बालाजी अवाजी ने इसके अक्षरों को मोड़ (तोड़ मरोड़) कर नई लिपि तैयार की जिससे इसको मोड़ी कहते हैं ।—भा० प्रा० लि०, पृ० १३२ ।

चिटी
संज्ञा स्त्री० [सं०] तंत्रशास्त्र के अनुसार चांडाल वेशधारिणी योगिनी जिसकी उपासना वशीकरण के लिये की जाती है ।

चिटुकी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० चुटकी] 'चुटकी' ।

चिट्ट
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिट] दे० 'चिट' ।

चिट्टा (१)
वि० [सं० सित प्रा० चित] [वि० स्त्री० चिट्टी] १. सफेद । धवल । श्वेत । २. गोरा । जैसे, गोरा चिट्टा ।

चिट्टा (२)
संज्ञा पुं० कुछ विशेष प्रकार की मछलियों के ऊपर का सीप के आकार का सफेद छिलका या पपड़ी । यह दुअन्नी से लेकर रुपए तक के बराबर होता है और इसमें रेशम के लिये माँड़ी तैयार की जाती है ।

चिट्टा (३)
संज्ञा पुं० [देश०] रुपया ।—(दलाल) ।

चिट्टा (४)
संज्ञा पुं० [हिं० चिटकना] वह उत्तेजना जो किसी को कोई ऐसा काम करने के लिये दी जाय जिसमें उसकी हानि या हँसी हो । झुठा बढ़ावा । क्रि० प्र०—देना । मुहा०—चिट्टा देना, चिट्टा लड़ाना—झूठा बढ़ावा देना ।

चिट्ठा †
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिट] दे० 'चिट' ।

चिट्ठा
संज्ञा पुं० [हिं० चिट] १. हिसाब की बही । खाता । लेखा । जमाखर्च या लेनदेन की किताब । मुहा०—चिट्ठा बाँधना=लेखा तैयार करना । २. वह कागज जिसपर वर्ष भर का हिसाब जाँचकर नफा नुकसान दिखाया जाता है । फर्द । ३. किसी रकम की सिलसिलेवार फिहरिस्त । सूची । टिक्की । जैसे, चंदे का चिट्ठा । उ०— चिट्ठा सकल नरेसन केरे । आवहिं चले दुशासन नेरे ।— सबल (शब्द०) । ४. वह रुपया जो प्रतिदिन, प्रति सप्ताह या प्रति मास मजदूरी या तनखाह के रूप में बाँटा जाय । उ०—दिय चिट्ठा चाकरी चुकाई । बसे सबै सेवा मन लाई ।—कबीर (शब्द०) । क्रि० प्र०—चुकाना ।—बाँटना ।—बाँटना । ५. खर्च की फिहरिस्त । उन वस्तुओं की मूल्य सहित सूची जो किसी कार्य के लिये आवश्यक हों । लगनेवाला खर्च का व्योरा । जैरे,—इस मकान में तुम्हारा अधिक नहीं लगेगा, बस २०० का चिट्ठा है । ६. ब्योरा । विवरण । मुहा०—कच्चा चिट्ठा=पूरा और ठीक ठीक वृतांत । ऐसा सविस्तर वृतांत जिसमें कोई बात छिपाई न गई हो । कच्चा चिट्ठा खोलना=गुप्त बातों को पूरे ब्यौरे के साथ प्रकट करना । गुप्त वृत्तांत कहना । रहस्य उदघाटित करना । ७. सीधा जो बाँटा जाय । रसद । क्रि० प्र०—देना ।—पाना ।—बँटना ।—बाँटना ।—मिलना ।—खोलना ।

चिट्ठी
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिट] १. वह कागज जिसपर एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने से लिये किसी प्रकार का समाचार आदि लिखा हो । पत्र । खत । क्रि० प्र०—देना ।—भेजना ।—मँगाना ।—पढ़ना, आदि । यौ०—चिट्ठीरसाँ । चिट्ठी पत्री । २. वह छोटा पुरजा जो किसी माल विशेषतः कपड़े आदि के साथ रहता है और जिसपर उस माल का दाम लिखा रहता है । ३. वह छोटा पुरजा या कागज जिसपर कुछ लिखा हो । ४. एक क्रिया जिसके द्वारा यह निश्चय किया जाता है कि कोई माल पाने या कोई काम करने का अधिकारी कौन बनाया जाय । विशेष—जितने आदमी अधिकारी बनने योग्य होते हैं उन सब के नाम या संकेत अलग अलग कागज के छोटे टुकड़ों पर लिखकर उनकी गोलियाँ एक में मिलाकर उनमें से कोई एक गोली उठा ली जाती है । जिसेके नाम की गोली निकलती है वह उसी माल के पाने या काम करने का अधिकारी समझा जाता है । इस क्रिया से लोग प्रायः यह भी निश्चय किया करते हैं कि कोई काम (जैसे, विवाह आदि) करना चाहिए या नहीं । क्रि० प्र०—उठाना ।—डालना ।—पड़ना । ५. किसी बात का आज्ञपात्र । मुहा०—चिट्ठी करना = किसी के नाम हुंडी करना । किसी को रुपए दे देने की लिखित आज्ञा देना । चिट्ठी डालना = लाटरी डालना । ६. किसी प्रकार का निमंत्रणपत्र । क्रि० प्र०—बँटना ।

चिट्ठीपत्री
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिट्ठी + पत्री] १. पत्र । खत । जैसे,— वहाँ से कोई चिट्ठीपत्री आती है । २. पत्रव्यवहार । खत किताबत । जैसे,— आपसे उनसे चिट्ठीपत्री है । क्रि० प्र०—होना ।

चिट्ठीरसाँ
संज्ञा पुं० [हिं० चिट्ठी + फ़ा० रसाँ] चिट्ठी बाँटनेवाला । डाकिया । हरकारा । पोस्टमैन ।

चिड़ †
संज्ञा स्त्री० [सं० चटक या देश०] चिड़िया ।

चिड़चिड़ा (१)
संज्ञा पुं० [सं० चिचिण्ड़ अथवा अनुकरणामक देश०] दे० 'चिचड़ा' ।

चिड़चिड़ा (२)
संज्ञा पुं० [अनु०] एक छोटी पक्षी जिसका रंग भूरा होता है ।

चिड़चिड़ा (३)
वि० [हिं० चिड़चिड़ाना ] शीघ्र चढ़नेवाला । थोड़ी सी बात पर अप्रसन्न होनेवाला । तुनकमिजाज ।—जैसे,— चिड़चिड़ा आदमी, चिड़चिड़ा स्वभाव ।

चिड़चिड़ाना
क्रि० अ० [अनु०] १. गठीली लकड़ी, पानी मिले हुए तेल आदि के जलने में चिड़चिड़ शब्द होना । २. सूखकर जगह जगह से फटना । खरा होकर दरकना । रुखाई के कारण ऊपरी सतह का पपड़ी की तरह हो जाना । जैसे,—जाड़े का हवा ले ओंठ चिड़चिड़ाना, रुखाई में बदन चिड़चिड़ाना । संयो० क्र०—जाना । ३. चिढ़ना । बिगड़ना । क्रोध लिये हुए बोलना । झुँझलाना । संयो० क्रि०—उठना ।

चिड़चिड़ाहट
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिड़चिड़ाना + हट (प्रत्य०)] १. चिड़चिड़ाने का भाव । २. चिढ़ने का भाव ।

चिड़वा
संज्ञा पुं० [हिं० चिविट] हरे, भिगोए या कुछ उबाले हुए धान को भाड़ में भूनकर और कूटकर बनाया हुआ चिपटा दाना । चिउड़ा (बहु० में 'चिड़वे' अधिक बोलते हैं) । विशेष—इसे लोग सूखा तथा दूध दही में भिगोकर भी खाते हैं ।

चिड़ा
संज्ञा पुं० [सं० चटक] गौरा पक्षी । गोरैया का नर ।

चिड़ाना
क्रि० स० [हिं० चिढाना] दे० 'चिढ़ाना' ।

चिड़ारा
संज्ञा पुं० [देश०] नीची जमीन का खेत जिसमें जड़हन बोया जाता है । डबरी ।

चिड़िया
संज्ञा स्त्री० [सं० चटक हिं० चिड़ा] आकाश में उड़नेवाला जीव । वह प्राणी जिसके ऊपर उड़ने के लिये पर हों । पक्षी । पखेरू । पंछी । यौ०—चिड़याखाना । चिड़याघर । चिड़िया चुनमुन=चि़ड़िया तथा उसी तरह के छोटे पक्षी । चिड़ियानोचन = चारों ओर का तकाजा । चारों ओर की माँग । बहुत से लोगों का किसी बात के लिये अनुरोध या दबाव । जैसे,—घर से रुपया आ जाता तो हम इस चिड़ियानोचन से छुट्टी पाते । सोने कीचिड़िया = (१) खूब धन देनेवाला असामी । (२) अत्यंत सुंदर व्यक्ति । (३) रमणीक स्थान । मुहा०—अप्राप्य वस्तु । अलभ्य वस्तु । ऐसी वस्तु जिसका होना असंभव हो । चिड़िया के छिनाले में पकड़ा जाना = व्यर्थ की आपत्ति में फँसना । नाहक झंझट में पड़ना चिड़ीया का खेत खाना = असावधानी के कारण अवसर निकल जाने से हानि उठाना । उ०—घर रखवाला बाहरा, चिड़िया खाया खेत । आधा परधा ऊबरै, चेत सकै तो चेत ।—कबीर सा० सं० पृ० ६५ । चिड़िया फँसाना = (१) किसी स्त्री को बहकाकर सहवास के लिये राजी करना (अशिष्ट) । (२) किसी देनेवाला धनी आदमी को अनुकूल करना । किसी मालदार को दाँव पर चढ़ाना । २. अँगियों का वह सीवन जिससे कटोरियाँ मिली रहती हैं । ३. चिड़िया के आकार का गढ़ा हुआ काठ का टुकड़ा जो टेक देने के लिये कहारों की लकड़ी, लँगड़ों की बैसाखी, मकानों के खंभो आदि पर लगा रहता है । आड़ा लगा हुआ काठ का टुकड़ा जिसका एक सिरा ऊपर की ओर चिड़िया की गरदन की तरह उठा हो । ४. पायजामे या लहँगे का नली की तरह का वह पोला भाग जिसमें इजाराबंद या नाला पड़ा रहता है । ५. ताश का एक रंग जिसमें तीन गोल पँखड़ियों की बूटी बनी होती है । चिड़ी । ६. लोहे का टेढ़ा अँकुड़ा जो तराजू की डाँड़ी में लगा रहता है । ७. गाड़ी में लगा हुआ लोहे का टेढ़ा कोढ़ा या अँकुड़ा जिसमें रस्सी लगाकर पैंजनी बाँटते हैं । ८. एक प्रकार का सिलाई जिसमें पहले कपड़े आदि के दोनों सिरों को अलग अलग उन्हीं पल्लों पर उलटकर इस प्रकार बखिया कर देते हैं कि उसमें एक प्रकार की बेल सी बन जाती है ।

चिड़ियाखाना
संज्ञा पुं० [हिं० चिड़िया+फा० खानह्] वह स्थान या घर जिसमें अनेक प्रकार के पक्षी या पशु आदि देखने के लिये रखे जाते हैं । पक्षिशाला ।

चिड़ियाघर
संज्ञा पुं० [हिं० चिड़िया + घर] दे० 'चिड़िया— खाना' ।

चिड़ियावाला
संज्ञा पुं० [हिं० चिड़िया + वाला ] उल्लू । गावदी । सुर्ख । जड़ (बाजारू) ।

चिड़िहार † पु
संज्ञा पुं० [हिं०चिड़िया + हार(प्रत्य०)] चिड़ीमार । बहेलिया । चिड़िया पकड़नेवाला । व्याध ।

चिड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिड़ा] १. दे० 'चिड़िया' । २. ताश का एक रंग जिसमें तीन गोल पंखड़ियों की काली बूटी बनी रहती है ।

चिड़ीखाना
संज्ञा पुं० [हिं० चिड़ी+फा० खानह्] चिड़ियाखाना । पक्षिशाला । उ०—एते द्विज आने रंग रंगने बखाने, देश देशन ते आने चिड़ीखाने हरिनाथ के ।—अकबरी०,पृ० ६१ ।

चिड़ीमार
संज्ञा पुं० [हिं० चिड़ी+मारना] बहेलिया । चिड़िया पकड़नेवाला । व्याध ।

चिढ़
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिढ़ना] चिढ़ने का भाव । क्रोध लिये हुए घृणा । विरक्ति । अप्रसन्नता । कुढ़न । खिजलाहट । नफरत । जैसे,—मुझे ऐसी बातों से बड़ी चिढ़ है । मुहा०—चिढ़ निकलना = ढूँढकर ऐसी बात कहना जिससे कोई चिढ़े । चिढ़ाने की युक्ति निकालना । छेड़ने का ढंग निकालना । कुढाना । खिझाना । जैसे,—इस बात से यदि इतना चिढ़ोगे ते लड़के चिढ़ निकाल लेगे ।

चिढ़कना
क्रि० अ० [हिं० चिढ़ना] दे० 'चिढ़ना' ।

चिढ़काना
क्रि० स० [हिं० चिढ़ाना] दे० 'चिढ़ाना' ।

चिढ़ना
क्रि० अ० [हिं० चिड़चिड़ाना] १. अप्रसन्न होना । विरक्त होना । खिन्न होना । नाराज होना । बिगड़ना । कुढना । खीजना । झल्लाना । जैसे,—तुम थोड़ी सी बात पर भी क्यों चिढ़ जाते हो । संयो० क्रि०—उठना ।—जाना । २. द्वेष रखना । बुरा मानना । जैसे,—न जाने क्यों मुझसे वह बहुत चिढ़ता है ।

चिढ़वाना
क्रि० स० [हिं० चिढ़ाना का प्रे० रूप] दूसरे से चिढ़ाने का काम करना ।

चिढ़ान †
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिढ़ना] १. चिढ़ानेवाली बात या वजह । २. चिढ़ने का भाव या स्थिति ।

चिढ़ाना
क्रि० स० [हिं० चिढ़ना] १. अप्रसन्न करना । नाराज करना । चिढ़ाना । खिझाना । कुढ़ाना । कुपित और खिन्न करना । जैसे,—ऐसी बात कहकर मुझे बार बार क्यों चिढ़ाते हो ? संयो० क्रि०—देना । २. किसी को कुढ़ाने के लिये मुँह बनाना, हाथ चमकाना या किसी प्रकार की और चेष्टा करना । खिझाने के लिये किसी की आकृति, चेष्टा या ढंग की नकल करना । मुहा०—मुँह चिढ़ाना = किसी को छेड़ने या खिजाने के लिये विलक्षण आकृति बनाना । बिराना । ३. कोई ऐसा प्रसंग छेड़ना जिसे सुनकर कोई लज्जित हो । कोई ऐसी बात कहना या ऐसा काम करना जिससे किसी को अपनी विफलता, अपमान आदि का स्मरण हो । उपहास करना । ठट्ठा करना ।

चिढ़ौनी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिढ़ + औनी (प्रत्य०) ] वह बात जिसके कहने से कोई चिढ़ जाय ।

चित् (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. चैतन्य । चेतना । ज्ञान । यौ०—चिदाकाश । चिदानंद । चिन्मय ।

चित् (२)
संज्ञा पुं० १. चुननेवाला । बीननेवाला । इकट्ठा करनेवाला । २. अग्नि । ३. रामानुजाचार्य के अनुसार तीन पदार्थों में से एक जो जीव-पद-वाच्य, भोक्ता, अपरिच्छिन्न, निर्मल-ज्ञान- स्वरूप और नित्य कहा गया है । (शेष दो पदार्थ अचित् और ईश्वर हैं) ।

चित् (३)
प्रत्य० संस्कृत का एक अनिश्चयवाची प्रत्यय जो कः, किम् आदि सर्वनाम शब्दों में लगता है । जैसे; कश्चित, किंचित् ।

चित (१)
वि० [सं०] १. चुनकर इकट्ठा किया हुआ । २. ढका हुआ । आच्छादित । ३. संचित । जमा किया हुआ (को०) ।

चित (२)
संज्ञा पुं० [सं० चित] चित्त । मन । उ०—अब चिंत चेति चित्रकूटहि चलु ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ४६६ । विशेष— दे० 'चित्त' । मुहा०— दे० 'चित्त' के मुहावरे ।

चित्त (३)पु
संज्ञा पुं० [हिं० चित्तवन] चित्तवन । दृष्टि । नजर । उ०— चित जानकी अध को कियो । हरि तीन द्वै अवलोकियो ।— केशव (शब्द०) ।

चित (४)
वि० [सं० चित (= ढेर किया हुआ)] इस प्रकार पड़ा हुआ मुँह, पेट आदि शरीर का अगला भाग उपर की ओर हो और पीठ, चूतड़ आदि पीछे का भाग नीचे की ओर किसी आधार से लगा हो । पीठ के बल पड़ा हुआ । 'पट' या 'औंधा' का उलटा । जैसे, चित कौड़ी । यौ०—चित भी मेरी पट भी मेरी = (१) हर हालात में अपने आप को बढ़ा चढ़ाकर दिखाना । (२) पासे या कौड़ी खेलने में बेईमानी करना । क्रि० प्र०—करना ।—होना । यौ०—चितपट । मुहा०—चित करना = कुश्ती में पछाड़ना । कुश्ती में पटकना । चारो खाने (या शाने) चित = (१) हाथ पैर फैलाए बिलकुल पीठ के बल पड़ा हुआ । (२) हक्का बक्का । स्तभित । ठक । जड़ीभूत । चित होना = बेसुध होकर पड़ जाना । बेहोश होना जैसे,—इतनी भाँग में तो तुम चित हो जाओगे ।

चित (५)
क्रि० वि० पीठ के बल । जैसे,—चित गिरना, चित पड़ना, चित लेटना ।

चितउन पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० चितवन] दे० 'चितवन' ।

चितउर पु
संज्ञा पुं० [हिं० चितौर] दे० 'चित्तोर' । उ०—देहि असीम सबै मिलि तुम्ह माथें निति छात । राजकरहु गढ चित- उर राखहु पिय अहिवात ।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० २०९ ।

चितकबरा (१)
वि० [सं० चित्र + कर्बुर] [स्त्री० चितकबरा] सफेद रंग पर काले, लाल या पिले दागवाला । काले पीले या और किसी रंग पर सफेद दागवाला । रंगबिरंगा । कबरा । चितला । शवल । वि० दे० 'कबरा' ।

चितकबरा (२)
संज्ञा पुं० चितकबरा रंग ।

चितकबर †
वि० [हिं० चितकबरा] दे० 'चितकबरा' ।

चितकूट पु
संज्ञा पुं० [सं० चित्रकूट] दे० 'चित्रकूट' ।

चितगरी पु
वि० [सं० चित + गर(प्रत्य०)] चेतवाली । होशि- यार । उ०— भई जो सयान भई चितगरी । पढि विद्या भइ, वीद्याधरी ।—इंद्रा०, पृ० १७ ।

चितगुपति पु
संज्ञा पुं० [सं० चित्रगुप्त] दे० 'चित्रगुप्त' ।

चितचोर
संज्ञा पुं० [हिं० चित + चोर] चित्त को चुरानेवाला । जी को लुभावनेवाला । मनोहर । मनभावना । मन को आक- र्षित करनेवाला । प्यारा । प्रिय ।

चितपट
संज्ञा पुं० [हिं० चित + पट] १. एक प्रकार का खेल या बाजी जिसमें किसी फेंकी हुई वस्तु के चित या पट पड़ने पर हार जीत का निर्णय होता है । (लोग प्रायः कौड़ी, पैसा, जूता आदि फेंकते हैं) । २. कुश्ती । मल्लयुद्ध ।

चितबाहु
संज्ञा पुं० [हिं० चित + सं० बाहु] तलवार के ३२ हाथों में से एक । उ०—आविद्ध निर्मयार्द कुल चितबाहु निस्सृत रिपु दुखै ।—रघुराज (शब्द०) ।

चितभंग
संज्ञा पुं० [सं० चित्त + भंग] १. ध्यान न लगाना । उचाट । उदासी । उ०—(क) मेरो मन हरि चितवन समझानो । यह रसमगन रहति निसि बासर हार जीत नहिं जानो । सूरदास चितभंग होत क्यो जो जेहि रूप समानो ।—सूर (शब्द०) । (ख) कमल, खंजन, मीन मधुकर होत है चितभंग ।—सूर (शब्द०) । (ग) देव मान मन भंग चितभंग मद क्रोध लोभादि पर्वत दुर्ग भुवन भर्ता ।—तुलसी (शब्द०) । २. बुद्धि का लोप । होश का ठिकाने न रहना । मतिभ्रम । भौचक्का- पन । चकपकाहट ।

चितरकना पु
संज्ञा पुं० [सं० चित्रक + हिं० ना प्रत्य०] दे० 'चित्रक' । उ०—अजमोंदा चितकरना, पतरज बायभिरंग । सेंधा सोंध त्राफला नासहिं मारुत अग ।—इंद्रा०, पृ० १५१ ।

चितरकारी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० चित्रकारी] दे० 'चित्रकारी' उ०—पलंग को छोड़ खाली गोद से उठ गै सजन मीता । चितरकारी लगे खाने हमन को घर हुआ रीता ।—कविता कौ०, भा० ४, पृ० १२ ।

चितरन पु
संज्ञा पुं० [सं०चित्रण] दे० 'चित्रण' । यौ०—चितरनहार = चित्रण करनेवाला ।

चितरना पु
क्रि० स० [सं० चित्र] चित्रित करना । चित्र बनाना । नक्काशी करना । बेल बूटे बनाना ।

चितरवा
वि० पुं० [सं० चित्रक] एक प्रकार की चिड़िया जिसका रंग ईंट का सा लाल होता है । इसके डैनों पर काली चित्तियाँ पड़ी होती हैं और आँखें अनारदाने के समान सफेद और लाल होती हैं ।

चितरा
संज्ञा पुं० [सं० चित्र] दे० 'चीतल' ।

चितराला
संज्ञा पुं० [सं० चित्र] एक प्रकार का झुंड़ों में रहनेवाला जंतु, जो पेड़ों पर चढ़कर गिलहरियों आदि को खा जाता है ।

चितरोख पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० चित्रक] एक प्रकार की चिड़िया । चितरवा । उ०— धौरी पांड़क कहि पिय ठाऊँ । जो चितरोखन दूसर नाऊँ ।—जायसी (शब्द०) ।

चितला (१)
वि० [सं० चित्रल] कबरा । चितकबरा । रंगबिरंगा ।

चितला (२)
संज्ञा पुं० १. लखनऊ का एक प्रकार का खरबूजा जिसपर चित्तियाँ पड़ी होती हैं । २. एक प्रकार की बड़ी मछली जो लंबाई में तीन चार हाथ और तौल में ड़ेढ दो मन होती है । विशेष—इसकी पीठ बहुत उठी हुई होती है और उसपर पूँछ के पास पर होते हैं । इसमें कटे बहुत होते हैं । गले से लेकर पेट के नीचे तक ५१ काँटो की पंक्ति होती है । इस मछली की पीठ का रंग कुछ मटमैला और तामड़ा तथा बगल का चाँदी की तरह सफेद होता है । यह मछली बंगाल, उड़ीसा और सिंध में होती है । इसमें से तेल बहुत निकलता है जो खाने जलाने के काम में आता है ।

चितवन
संज्ञा स्त्री० [हिं० चेतना] ताकने का काम भाव या ढंग । अवलोकन । दृष्टि । कटाक्ष । नजर । निगाह । उ०—सलज्ज लोचनों की मनोहारी चितवन ।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० १२५ । मुहा०—चितवन चढ़ाना = त्योरी चढ़ाना । भौं चढ़ाना । कुपित दृष्टि करना । क्रोध की दृष्टि से देखना ।

चितवना पु †
क्रि० स० [हिं० चेतना] देखना । ताकना । निगाह करना । अवलोकन करना । दृष्टि डालना । उ०—चितवति चकित चहूँ दिसि सीता ।—मानस, १ । २३२ । (ख) सरद ससिहि जनु चितव चकोरी । मानस, १ । २३२ । संयो० क्रि०—देना ।—लेना ।

चितवनि †पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०चितवन] दे० 'चितवन' । उ०— (क) चितवनि चारू भृकुटि बर बाँकी । तिलक रेख शोभा जनु चाँकी । तुलसी (शब्द०) । (ख) तुलसीदास पुनि भरेइ देखियत राम कृपा चितवनि चितए—तुलसी (शब्द०) । (ग) अनियारे दीरघ दृगनु किती न तरुनि समान । वह चितवनि औरै कछू, जिहिं बस होत सुजान ।—बिहारी र०, दो० ५८८ ।

चितवाना †पु
क्रि० स० [हिं० चितवना का प्रे० रूप] दिखाना । तकाना । उ०—चितवो चितवाए हँसाए हँसो औ बोलाए से बोलो रहै मति मौने ।—केशव (शब्द०) ।

चितविलास पु
संज्ञा पुं० [हिं०] एक प्रकार का ड़िंगल गीत । उ०—ड़ण पर दुहो अरटिया वालो फिर तुक आदि तिका अंत फालो । धुरेतिका मोहरा तुध धारो, चितविलास सो गीत उचारो ।—रघु० रू, पृ० १०५ ।

चितसरिया पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० चित्रसारी] दे० 'चित्रसारी' । उ०— चित चितसरिया मैं लिहलौं लिखाई ।—धरनी०, पृ० १ ।

चितहिलोल पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] एक प्रकार का ड़िंगल गीत । उ०—प्रौढ़ गीतरै उपरै तबै उलालो तोल । कहै मंद तिणनू सुकवि, आखै चितहिलोल ।—रघु० रू०, पृ० १६३ ।

चिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. चनकर रखी हुई लकड़ियों का ढेर जिसपर रखकर मुरदा जलाया जाता है । मृतक से शवदाह के लिये बिछाई हुई लकड़ियों का राशी । क्रि० प्र०—बनाना ।—लगाना । पर्या०—चित्या । चिति । चैत्य । काष्ठमठी । यौ०—चितापिंड़ = वह पिंड़दान जो शवदाह के उपरांत होता है । चिताभस्म = चिता की राख । मुहा०—चिता चुनना = शवदाह के लिये लकड़ियों को नीचे ऊपर क्रम से रखना । चिता साजना । चिता तैयार करना । चिता पर चढ़ना = मरना । चिता में बैठना = सति होने के लिये विधवा का मृत पति की चिता में बैठना । मृत पति के शरीर के साथ जलना । सती होना । चिता साजना = दे० 'चिता चुनना' । २. श्मशान । मरघट । उ०—भीख माँगि भव खाहिं चिता नित सोवहिं । नाचहिं नगन पिशाच, पिसाचिन जोवहिं ।—तुलसी (शब्द०) ।

चिताउनी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० चेतावनी] दे० 'चेतावनी' । उ०— चलन न देतो देव चंचल अचल करि, चाबुक चिताउनीन मारि मुँह मोरतो ।—पोद्यार अभि० ग्रं०, पृ० १६५ ।

चिताना
क्रि० स० [हिं० चेताना] १. सचेत करना । सावधान करना । होशीयार करना । खबरदार करना । किसी आव- श्यक विषय की ओर ध्यान दिलाना । संयो० क्रि०—देना । ३. आत्मोबोध करना । ज्ञानोपदेश करना । ४. (आग) जगाना । सुलगना । जलाना ।—(साधु) ।

चिताप्रताप
संज्ञा पुं० [सं०] जीते ही चिता पर जला देने की दंड । विशेष—जो स्त्री पुरुष का खून कर देती थी उसे चंद्रगुप्त के समय जीते जी जला दिया जाता था ।—(को०) ।

चितापिंड
संज्ञा पुं० [सं० चितापिण्ड] श्मशान में शवदाह के पूर्व किया जानेवाला पिंडदान ।

चिताभूमि
संज्ञा स्त्री० [सं०] श्मशान ।

चितार पु
वि० [सं० चित्रल] रंग बिरंगा । उ०—है यह हीरन सों जड़ी रंगन तापै करी कछु चित्र चितार सी । देखो जू लालन कैसी बनी है नई यह सुंदर कंचन आरसी ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० १४७ ।

चितारना पु
क्रि० स० [हिं० चित + आर (प्रत्य०) से नाम०] स्मरण करना । याद में लाना । उ०—औरंग सा पातसाह आलम कूँ चितारै । अकबर के त्रास की चिंताना विचारे ।— रा० रू०, पृ० १०१ ।

चितारी †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'चितेरा' ।

चितारोहण
संज्ञा पुं० [सं०] विधवा के सती होने के लिये चिता पर जाना ।

चितावनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिताना] चिताने की क्रिया । सतर्क या सावधान करने की क्रिया । वह सूचना जो किसी को किसी आवश्यक विषय की ओर ध्यान देने के लिये दी जाय । सावधान रहने की पूर्वसूचना । चेतावनी । क्रि० प्र०—देना ।

चितासाधन
संज्ञा पुं० [सं०] तंत्रसार के अनुसार चिता या श्मशान के ऊपर बैठकर इष्टमंत्र का अनुष्ठान जो चतुर्दशी या अष्टमी को डेढ़ पहर रात गए किया जाता है ।

चिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. चिता । २. समूह ढेर । ३. चुनने या इकट्ठा करने की क्रिया । चुनाई । ४. शतपथ ब्राह्मण के अनुसार अग्नि का एक संस्कार । ५. यज्ञ में ईंटो एक संस्कार । इष्ट संस्कार । ६. दीवार में ईंटो की चुनाई । ईंटो की जोड़ाई । ७. चैतन्य । ८. दुर्गा । ९. दे० 'चित्ती' । १०. समझ । बोध (को०) ।

चितिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. करधनी । मेखला । २. दे० 'चिति' ।

चितिया
वि० [हिं० चिती + इया (प्रत्य०)] जिसपर दाग या चित्ती पड़ी हो । दागवाला ।

चितिया गुड़
संज्ञा पुं० [देश०] खजूर की चीनी की जूसी से जमाया हुआ गुड़ ।

चितिव्यवहार
संज्ञा पुं० [सं०] गणित की वह क्रिया जिसके द्वारा किसी दीवार या मकान में लगनेवाली ईंटो और पटियों की संख्या और नाप आदि का निश्चय होता है । विशेष—लीलावती के अनुसार दीवार का क्षेत्रफल निकालकर उसमें ईंटो के क्षेत्रफल का भाग देने से जो फल होगा वही ईंटो की संख्या होगी । इसी प्रकार की और और क्रियाएँ स्तर आदि निकालने के लिये हैं ।

चितु †पु
संज्ञा पुं० [सं० चित हिं० चित्त] दे० 'चित्त' । उ०— फिरि फिरि चितु उत हीं रहतु, टुटी लाज की लाव ।— बिहारी र०, दो० १० ।

चितेरा
संज्ञा पुं० [सं० चित्रकार या हिं० चित (= सं० चित्र) + एरा (प्रत्य०)] [स्त्री० चितेरिन] चित्रकार । चित्र बनानेवाला । तसवीर खींचनेवाला । मुसौबर । कमंगर । उ०—चकित भई देखैं ढिग ठाढी । मनी चितेरे लिखि लिखि काढ़ी ।—सूर (शब्द०) ।

चितेरिन
संज्ञा स्त्री० [हिं० चितेरा] १. चित्र बनानेवाली स्त्री । २. चित्रकार की स्त्री ।

चितेरी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'चितेरिन' ।

चितेला †
संज्ञा पुं० [हिं० चितेरा] दे० 'चितेरा' ।

चितौन
संज्ञा स्त्री० [हिं० चितवन] दे० 'चितवन' ।

चितौना
क्रि० स० [हिं० चितवना] दे० 'चितवना' ।

चितौनि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० चितवन] दे० 'चितवन' । उ०—तिरछी चितौनि मैन बरछी सी कौन ।—मति० ग्र०, पृ० ३४५ ।

चितौनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० चितावनी] दे० 'चितावनी' ।

चित्कार
संज्ञा पुं० [सं०चीत्कार] दे० 'चीत्कार' ।

चित्त (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. अंतःकरण का एक भेद । अंतःकरण की एक वृत्ति । विशेष—वेदांतसार के अनुसार अंतःकरण की चार वृत्तियाँ है— मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार । संकल्प विकल्पात्मक वृत्ति को मन, निश्चयात्मक वृत्ति को बुद्धि और इन्हीं दोनों के अंतर्गत अनुसंधानात्मक वृत्ति को चित्त औऱ अभिमानात्मक वृत्ति को अंहकार कहते हैं । पंचदशी में इंद्रियो के नियंता मन ही को अंतःकरण माना है । आंतरिक व्यापार में मन स्वतंत्र है, पर बाह्य व्यापार में इंद्रियाँ परतंत्र हैं । पंचभूतों की गुणसमष्टि से अंतःकरण उत्पन्न होता है जिसकी दो वृत्तियाँ हैं मन और बुद्धि । मन संशायात्मक और बुद्धि निश्चयात्मक है । वेदांत में प्राण को मन का प्राण कहा है । मृत्यु होने पर मन इसी प्राण में लय हो जाता है । इसपर शंकराचार्य कहते हैं कि प्राण में मन की वृत्ति लय हो जाती है, उसका स्वरूप नहीं । क्षणिकवादी बौद्ध चित्त ही को आत्मा मानते हैं । वे कहते हैं कि जिस प्रकार अग्नि अपने को प्रकाशित करके दूसरी वस्तु को भी प्रकाशित करती है, उसी प्रकार चित्त भी करता है । बौद्ध लोग चित्त के चार भेद करते हैं—कामावचर रूपावचर, अरूपावचर औऱ लोकोत्तर । चार्वाक के मत से मन ही आत्मा है । योग के आचार्य पंचजलिचित्त को स्वप्रकाश नहीं स्वीकार करते । वे चित्त को दृश्य और जड़ पदार्थ मानकर सका एक अलग प्रकाशक मानते हैं जिसे आत्मा कहते हैं । उनके विचार में प्रकाश्य और प्रकाशक के संयोग से प्रकाश होता है, अतः कोई वस्तु अपने ही साथ संयोग नहीं कर सकती । योगसूत्र के अनुसार चित्तवृत्ति पाँच प्रकार की है—प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति । प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्दप्रमाण; एक में दूसरे का भ्रम—विपर्यय; स्वरूपज्ञान के बिना कल्पना— विकल्प; सब विषयों के अभाव का बोध—निद्रा और कालांतर में पूर्व अनुभव का आरोप स्मृति कहलाता है । पच- दशी तथा और दार्शनिक ग्रंथों में मन या चित्त का स्थान हृदय या हृत्पझगोलक लिखा है । पर आधुनिक पाश्चात्य विज्ञान अंतःकरण के सारे व्यापारों का स्थान मस्तिष्क में मानता है जो सब ज्ञानतंतुओं का केंद्रस्थान है । खोपड़ी के अंदर जो टेढ़ी मेढ़ी गुरियों की सी बनावट होती है, वही अंतःकरण है । उसी के सूक्ष्म मज्जा-तंतु-जाल और कोशों की क्रिया द्वारा सारे मानसिक व्यापारी होते हैं । भूतवादी वैज्ञानिकों के मत से चित्त, मन या आत्मा कोई पृथक् वस्तु नहीं है, केवल व्यापार- विशेष का नाम है, जो छोटे जीवों में बहुत ही अल्प परिमाण में होता है और बड़े जीवों में क्रमशःबढ़ता जाता है । इस व्यापार का प्राणरस (प्रोटोप्लाज्म) के कुछ विकारों के साथ नित्य संबंध है । प्राणरस के ये विकार अत्यंत निम्न श्रेणी के जीवों में प्रायः शरीर भर में होते हैं; पर उच्च प्राणियों में क्रमशः इन विकारों के लिये विशेष स्थान नियत होते जाते हैं और उनसे इंद्रियों तथा मस्तिष्क को सृष्टि होती है । २. वह मानसिक शक्ति जिससे धारणा, भावना आदि की जाती हैं । अंतःकरण । जी । मन । दिल । मुहा०—चित्त उचटना = जी न लगना । विरक्ति होना । चित्त करना = इच्छा करना । जी चाहना । जैसे, ऐसा चित्त करता है कि यहाँ से चल दें । चित्त चढ़ना = दे० 'चित्त पर चढ़ना' । उ०—तब चिंत चढ़ेउ जो शंकर कहेऊ ।—मानस, १ । ६३ । चित्त विहुँटना = (१) चित्त में पीड़ा होना । (२) चित्त के लिये आकर्षक होना । चित्त चुराना = मन मोहना । मोहित करना । चित्त आकर्षित करना । उ०—नैन सैन दै चितहिं चुरावति यहै मंत्र टोना सिर डारि ।—सूर (शब्द०) । चित्त देना = ध्यान देना । मन लगाना । गौर करना । उ०—चित्त दै सुनो हमारी बात ।—सूर (शब्द०) । चित्त धरना = (१) ध्यान देना । मन लगाना । उ०—कहौं सो कथा सुनौ चित धार । कहै सुनै सो लहै सुख सार ।—सूर (शब्द०) । (२) मन में लाना । उ०—हमारे प्रभु अवगुन चित न धरौ ।—सूर (शब्द०) । चित्त पर चढ़ना = (१) ध्यान पर चढ़ना । मन में बसना । बार बार ध्यान में आना । जैसे,—तुम्हारे तो वही चित्त पर चढ़ा हुआ है । (२) ध्यान में आना । स्मरण होना । याद पड़ना । चित्त बँटना = चित्त एकाग्र न रहना । ध्यान दो ओर हो जाना । एक विषय की ओर ध्यान स्थिर न रहना । ध्यान इधर उधर होना । चित्त बँटाना = ध्यान इधर उधर करना । ध्यान एक ओर न रहने देना । चित्त में धँसना या जमना = दे० 'चित्त में बैठना' । चित्त मेंबैठना = जी में जमना । हृदय में दृढ़ होना । मन में धँसना । हृदयंगम होना । उ०—अब हमरे चित बैठयो यह पद होनी होउ सो होउ ।—सूर (शब्द०) । चित्त में होना या चित्त होना =इच्छा होना । जी चाहना । उ०—यह चित्त होत जाउँ मैं अबहीं यहाँ नहीं मन लागत ।—सूर (शब्द०) । चित्त लगना = मन लगना । जी न घबराना । जी न ऊबना । मन की प्रवृत्ति स्थिर रहना । जैसे,— (क) काम में तुम्हारा चित्त नहीं लगता । (ख) अब यहाँ हमारा चित्त नहीं लगता । चित्त लेना = इच्छा होना । जी चाहना । जैसे—अपना चित्त ले चले जाओ । चित्त से उतरना = (१) ध्यान में न रहना । भूल जाना । उ०— सूर श्याम चित तें नहिं उतरत वह बन कुंज थली ।—सूर (शब्द०) । (२) दृष्टि से गिरना । प्रिय या आदरणीय न रह जाना । विरक्तिभाजन होना । चित्त से न टलना = ध्यान में बराबर बना रहना । न भूलना । उ०—सूर चित तें टरति नाहीं राधिका की प्रीति ।—सूर (शब्द०) । ३. नृत्य में एक प्रकार की दृष्टि जिसका व्यवहार शृंगार में प्रसन्नता प्रकट करने के लिये होता है । विशेष—दे० 'चित्त' ।

चित्त (२)
वि० १. विचार किया हुआ । विचारित । २. अनुभूत या अनुभव किया हुआ । ३. इच्छित । चाहा हुआ । ४. इंद्रिय- गम्य । गोचर [को०] ।

चित्तक पु
संज्ञा पुं० [सं० चित्रक] दे० 'चित्रक' ।

चित्तकलित
वि० [सं०] चित्त में या चित्त द्वारा जिसका कलन किया गया हो । अनुमति । अपेक्षित । अवकलित [को०] ।

चित्तखेद
संज्ञा पुं० [सं०] शोक । दुःख [को०] ।

चित्तगर्भ
वि० [सं०] मनोहर । सुंदर ।

चित्तचारी
वि० [चित्तचारिन] दूसरे के इच्छानुसार आचरण करनेवाला [को०] ।

चित्तचौर
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'चित्तचोर' [को०] ।

चित्तज
संज्ञा पुं० [सं०] चित्त से उत्पन्न, कामदेव ।

चित्तजन्मा
संज्ञा पुं० [सं० चित्तजन्मन्] कामदेव [को०] ।

चित्तज्ञ
वि० [सं०] दूसरे की इच्छा या चित्त को जाननेवाला [को०] ।

चित्तधारा
संज्ञा स्त्री० [सं०] विचारधारा [को०] ।

चित्तनाथ
संज्ञा पुं० [सं०] स्वामी [को०] ।

चित्तनाश
संज्ञा पुं० [सं०] विवेक या चेतना का नाश [को०] ।

चित्तनिर्वृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रसाद । हर्ष । प्रसन्नता । शांति [को०] ।

चित्तप्रसादन
संज्ञा पुं० [सं०] योग में चित्त का संस्कार जो मैत्री, करुणा, हर्ष, उपेक्षा आदि के उपयुक्त व्यवहार द्वारा होता है । जैसे, किसी को सुखी देख उससे मित्रभाव रखना, दुखी के प्रति करुणा दिखाना, पुण्यवान् को देख प्रसन्न होना, पापी के प्रति उपेक्षा रखना । इस प्रकार के साधन से चित्त में राजस और तामस की निवृत्ति होकर केवल सात्विक धर्म का प्रादुर्भाव होता है ।

चित्तप्रमाथी
वि० [सं० चित्तप्रमाथिन्] उत्तेजना पैदा करनेवाला । हृदय को मथनेवाला [को०] ।

चित्तभंग
संज्ञा पुं० [सं० चित्तभङ्ग] बदरिकाश्रम के एक पर्वत का नाम ।

चित्तभ †
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव ।

चित्तभूपि
संज्ञा पुं० [सं०] योग में चित्त की अवस्थाएँ । विशेष—व्यास के अनुसार ये अवस्थाएँ पाँच हैं-क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त एकाग्र और निरुद्ध । क्षिप्त अवस्था वह है चिसमें चित्त रजो- गुण के द्वारा सदा अस्थिर रहे; मृढ़ वह है जिसमें चित्त तमो गुण के कारण निद्रायुक्त या स्तब्ध हो, विक्षिप्त वह है जिसमें चित्त स्थिर रहे, पर कभी कभी स्थीर भी हो जाय, एकाग्र वह है जिसमें चित्त किसी एक विषय की ओर लगा हो, और निरुद्ध वह है जिसमें सब वृत्तियों का निरोध हो जाय, संस्कार मात्र रह जाय । इनमें से पहली तीन अवस्थाएँ योग के अनुकूल नहीं है । पिछली दो योग या समाधि के उपयुक्त हैं । समाधि की भी चार भूमियाँ हैं—मधुमती, मधुप्रतीका, विशोका और ऋतंभरा, जिनके लिये दे० 'समाधि' ।

चित्तभेद
संज्ञा पुं० [सं०] १. विचारसंबंधी भेद । २. चंचलता । अस्थिरता [को०] ।

चित्तभ्रम
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का सन्निपात जिसमें संताप, मोह, विकलता, हँसना, गाना, नाचना, धतूरा खाए जैसी अवस्था आदि उपद्रव होते हैं ।

चित्तभ्रांति
संज्ञा स्त्री० [सं० चित्तभ्रान्ति] दे० 'चित्तभ्रम' [को०] ।

चित्तयोनि
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव [को०] ।

चित्तर पु
संज्ञा पुं० [सं० चित्र] 'चित्र' ।

चित्तरसारी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० चित्रसारी] दे० 'चित्रसारी' । उ०—जहै सोनो कै चित्तरसारी । बैठि बरात जानु फुलवारी । जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० ३१२ ।

चित्तराग
संज्ञा पुं० [सं०] कामना । अनुराग [को०] ।

चित्तल
संज्ञा पुं० [सं० या सं० चित्रल] एक प्रकार का मृग । चीतल ।

चित्तवान्
वि० [सं०] [वि० स्त्री० चित्तवती] उदार चित्त का ।

चित्तविकार
संज्ञा पुं० [सं०] विचार या भाव का परिवर्तन [को०] ।

चित्तविक्षेप
संज्ञा पुं० [सं०] चित्त की चंचलता या अस्थिरता जो योग में बाधक है । विशेष—इसके नौ भेद हैं—व्याधि, स्त्यान (अकर्मण्यता), संशय, प्रमाद (त्रुटि), आलस्य, अविरति (वैराग्य का अभाव), भ्रांतिदर्शन (मिथ्या अनुभव), अलब्धभूमिकत्व (समाधि की अप्राप्ति), और अनवस्थित्व (चित्त का न टिकना) ।

चित्तविद्
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो चित्त की बात जाने । २. बौद्ध दर्शन के अनुसार चित के भेदों और रहस्यों को जाननेवाला पुरुष ।

चित्तविप्लव
संज्ञा पुं० [सं०] उन्माद ।

चित्तविभ्रंश
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'चित्तविभ्रम' [को०] ।

चित्तविभ्रम
संज्ञा पुं० [सं०] १. भ्राति । भ्रम । भौचक्कापन । २. उन्माद ।

चित्तविश्लेष
संज्ञा पुं० [सं०] चित्त फटना । विराग [को०] ।

चित्तविश्लेषण
संज्ञा पुं० [सं०] मैत्रीभंग । मनमुटाव [को०] ।

चित्तवृत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. चित्त की गति । चित्त की अवस्था । विशेष—योग में चित्तवृत्ति पाँच प्रकार की मानी गई है— प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति । इन सबके भी क्लिष्ट और अक्लिष्ट दो भेद हैं । अविधा आदिक्लेशहेतुक वृत्ति क्लिष्ट और उससे भिन्न अक्लिष्ट हैं । २. विचार । ३. मनःस्थिति । भाव ।

चित्तवेदना
संज्ञा स्त्री० [सं०] चित्त की वेदना [को०] ।

चित्तवैकल्प
संज्ञा पुं० [सं०] चित्त की विकलता [को०] ।

चित्तशुद्धि
संज्ञा स्त्री० [सं०] विकाररहित चित्त । निर्विकार चित्त [को०] ।

चित्तसारी पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० चित्रसारी] दे० 'चित्रसारी' ।

चित्तहारी
वि० [सं० चित्तहारिन्] मन को लुभानेवाला [को०] ।

चित्ताकर्षक
वि० [सं०] मनमोहक । चित्त को आकर्षित करनेवाला । उ०—कई मंत्रों में पति पत्नी के प्रेम का चित्ताकर्षक चित्र खींचा है ।—हिंदु० सभ्यता, पृ० ११० ।

चित्तापहारक
वि० [सं०] मनोहर । सुंदर ।

चित्ताभोग
संज्ञा पुं० [सं०] १. आसक्ति । २. पूरी चेतनता [को०] ।

चित्तारना पु
क्रि० स० [हिं० चितारना] दे० 'चितारना' । उ०—चुगइ चितारइ भी चुगइ, चुगि चुगि चित्तारेह । कुरझी बच्चा मेल्हि कइ, दूरि थकाँ पालेह ।—ढोला०, दू० २०२ ।

चित्तासंग
संज्ञा पुं० [सं० चित्तासङ्ग] प्रेम । अनुराग [को०] ।

चित्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बुद्धिवृत्ति । प्रज्ञा । चिंतन । २. ख्याति । ३. कर्म । ४. अर्थव ऋषि की पत्नी का नाम ।

चित्ती (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० चित्रिका, प्रा० चित्त हिं० चित(= सफेद दाग अथवा सं० श्वित्रिक)] १. छोटा दाग या चिन्ह । छोटा धब्बा । बुँदकी । उ०—पीले मीठे अमरूदों में अब लाल लाल चित्तियाँ पड़ीं ।—ग्राम्या, पृ० ३६ । यौ०—चित्तीदार = जिसपर दाग या धब्बा हो । क्रि० प्र०—पड़ना । मुहा०—चित्ती पड़ना = बहुत खरी सेंकने के कारण रोटी में स्थान स्थान पर जलने का काला दाग पड़ना । २. कुम्हार के चाक के किनारे पर का वह गड्ढा जिसमें डंडा डालकर चाक घुमाया जाता है । ३. मादा लाल । मुनिया । ४. अजगर की जाति का एक मोटा साँप जिसके शरीर पर चित्तियाँ होती हैं । चीतल । ५. एक ओर कुछ रगड़ा हुआ इमली का चिआँ जिससे छोटे लड़के जूआ खेलते हैं । विशेष—इमली के चीएँ को लड़के एक ओर इतना रगड़ते हैं कि उसके ऊपर का काला छिलका बिलकुल निकल जाता है और उसके अंदरसे सफेद भाग निकल आता है । दो तीन लड़के मिलकर अपनी अपनी चित्ती एक में मिलाकर फेंकते हैं और दाँव पर चिएँ लगाते हैं । फेंकने पर जिस लड़के के चिएँ का सफेद भाग ऊपर पड़ता है, वह और लड़कों के दाँव पर लगाए हुए चीएँ जीत लेता है ।

चित्ती (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० चित(=पेट के बल पड़ा हुआ)] वह कौड़ी जिसकी चिपटी और खुरदरी पीठ प्रायः नीचे होती है और ऊपर चित रहती है । टैयाँ । उ०—अंतर्यामी यहौ न जानत जो मो उरहि बिती । ज्यों जुआरि रस बीधि हारि गथ सोचत पटकि चिती (शब्द०) । विशेष—यह फेंकने पर चित अधिक पड़ती है, इसी से इसे चित्ती कहते हैं । जुआरी इससे जुए का दाँव फेंकते हैं ।

चित्तोद्रेक
संज्ञा पुं० [सं०] घमंड । अहंकार [को०] ।

चित्तौड़ पु
संज्ञा पुं० [हिं० चित्तौर] दे० 'चित्तौर' ।

चित्तौर
संज्ञा पुं० [सं० चित्रकूट प्रा० चितउड़, चितऊड़ हिं० चितउर] एक इतिहासप्रसिद्ध प्राचीन नगर जो उदयपुर के महाराणाओं की प्राचीन राजधानी थी । विशेष—अलाउद्दीन के समय में प्रसिद्ध महारानी पद्मावती या पद्मिनी यहीं कई सहस्र क्षत्रणियों के साथ चिता में भस्म हुई थीं । ऐसा प्रसिद्ध है कि राणाओं के पूर्वपुरुष बाप्पा रावल ने ही ईसवी सन् ७२८ में चितौर का गढ़ बनवाया और नगर बसाया था । सन् १५६८ तक तो मेवाड़ के राणाओं की राजधानी चित्तौर ही रही; उसके पीछे जब अकबर ने चित्तौर का किला ले लिया, तब महाराणा उदयसिंह ने उदयपुर नामक नगर बसाया । चित्तौर का गढ़ एक ऊँची पहाड़ी पर है जिसके चारों ओर प्राचिन नगर के खंडहर दिखाई पड़ते हैं । हिंदुकाल के बहुत से भवन अभी यहाँ टूटे फूटे खड़े हैं । किले के अंदर भी बहुत से देवमंदिर, कीर्तिस्तंभ, खवासिनस्तंभ सिंगारचौरी आदि प्रसिद्ध हैं । राणा कुंभ ने संवत् १५०५ में गुजरात और मालवा के सुलतान को परास्त करके यह कीर्तिस्तंभ स्मारक स्वरूप बनवाया था । यह १२२ फुट ऊँचा और नौ खंडों का है ।

चित्य (१)
वि० [सं०] १. चुनने या इकट्ठा करने योग्य । २. चिता संबंधी ।

चित्य (२)
संज्ञा पुं० १.चिता । २. अग्नि ।

चित्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. चुनने का कार्य । एकत्र करना । २. बनाना । ३. चिता [को०] ।

चित्र (१)
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० चित्रित] १. चंदन आदि से माथे पर बनाया हुआ चिह्न । तिलक । २. विविध रंगो के मेल से बनी हुई नाना वस्तुओं की आकृति । किसी वस्तु का स्वरूप या आकार जो कागज, कपड़े, पत्थर लकड़ी , शीशे आदि पर तूलिका अथवा कलम और रंग आदि के द्वारा बनाया गया हो । तसवीर । उ०—चित्रलिखित कपि देखि डेराती ।—तुलसी (शब्द०) । यौ०—चित्रकला । चित्रविद्या । क्रि० प्र०पु—उरेहना ।—खींचना ।—बनाना ।—लिखना । करना—अचरज करना । आरंभ करना । उ०—अहो मित्र कछु चित्र न कीजै । हरि की महिमा मैं मनु दीजै ।—नंद० ग्रं०, पृ० २६२ ।मुहा०—चित्र उतारना = (१) चित्र बनाना । तसवीर खींचना । (२) वर्णन आदि के द्वारा ठीक ठीक दृश्य सामने उपस्थित कर देना । ३. काव्य के तिन अंगो में से एक जिसमें व्यंग्य की प्रधानता नहीं रहती । अलंकार । ४. काव्य में एक प्रकार का अलंकार जिसमें पद्यों के अक्षर इस क्रम से लिखे जाते हैं कि हाथी, घोड़े, खङ्ग, रथ, कमल आदि के आकार के बन जाते है । ५. एक प्रकार का वर्णवृत्त जो समानिका वृत्ति के दो चरणों को मिलाने से बनता है । ६. आकाश । ७. एक प्रकार का कोढ़ जिसमें शरीर में सफेद चित्तियाँ या दाग पड़ जाते हैं । ८. एक यम का नाम । ९. चित्रगुप्त । १०. रेंड़ का पेड़ । ११.अशोक का पेड़ । १२. चीते का पेड़ । चित्रक । १३. धृतराष्ट्र के चौदह पुत्रों में से एक ।

चित्र (२)
वि० १.अदभुत । विचित्र । आश्चर्यजनक । विस्मयकारी । उ०—हे नृप, हयाँ कछु चित्र न मानि । ते सब हरहि मिलेई जानि ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३१८ । २. चितकबरा । कबरा । ३. रंगबिरंगा । कई रंगों का । ४. अनेक प्रकार का । कई तरह का । ५. चित्र के समान ठीक । दुरुस्त । उ०—बाँके पर सुठि बाँक करेहीं । रातिहि कोट चित्र कै लेहीं ।—जायसी (शब्द०) ।

चित्र (३) पु
संज्ञा स्त्री० [सं० चित्रिणी] दे० 'चित्रिणी' । उ०—चारि जाति है त्रीय तन पदमिनि हस्तिनि चित्र । फुनि संषिनिय प्रमान इह मन नह रंजिय मित्त पृ० रा० २५ । ११९ ।

चित्रकंठ
संज्ञा पुं० [सं० चित्रकण्ठ] कबूतर । कपोत । परेवा ।

चित्रकंबल
संज्ञा पुं० [सं० चित्रकम्बल] १. कालीन । २. हाथि की झूल जिसपर चित्र बने रहते हैं [को०] ।

चित्रक
संज्ञा पुं० [सं०] १. तिलक । २. चीते का पेड़ । चित्त । ३. चीता । बाघ । ४. शूर । बलवान् । ५. रेंड़ का पेड़ । ६. चिरायता । ७. मुचकुंद का पेड़ । ८. चित्रकार ।

चित्रकर
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. चित्र बनानेवाला । चित्रकार । २. ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार एक सकर जाति जिसकी उत्पत्ति विश्वकर्मा पुरुष और शूद्रा स्त्री से कही गई है । ३. तिनिश का पेड़ । ४. अभिनेता [को०] ।

चित्रकर्म
संज्ञा पुं० [सं० चित्रकर्मन] १. चित्र बनाना । २. विचित्र कार्य करना । ३. आलेखन । ४. इंद्रजाल । [को०] ।

चित्रकर्मी
संज्ञा पुं० [सं० चित्रकर्मिन्] १. चित्रकार । मुसौवर । कमंगर । २. विचित्र कार्य करनेवाला । ३. तिमिश वृक्ष ।

चित्रकला
संज्ञा स्त्री० [सं०] चित्र बनाने की विद्या । तस्वीर बनाने का हुनर । विशेष—चित्रकला का प्रचार चीन, मिस्र, भारत आदि देशों में अत्यंत प्राचिन काल से है । मिस्र से ही चित्रकला यूनान में गई, जहाँ उसने बहुत उन्नति की । ईसा से १४०० वर्ष पहले मिस्र देश में चित्रों का अच्छा प्रचार था । लंदन के ब्रिटिश म्युजियम में ३००० वर्ष तक के पुराने मिस्री चित्र हैं । भारतवर्ष में भी अत्यंत प्राचीन काल से यह विधा प्रचलित थी, इसके अनेक प्रमाण मिलते हैं । रामायण में चित्रों, चित्रकारों और चित्रशालाओं का वर्णन बराबर आया है । विश्वकर्मीय शिल्पशास्त्र में लिखा है कि स्थापक, तक्षक, शिल्पी आदि में से शिल्पी को ही चित्र बनाना चाहिए । प्रकृतिक दृश्यों को अंकित करने में प्रचीन भारतीय चित्रकार कितने निपुण होते थे, इसका कुछ आभास भवभूति के उत्तररामचरित के देखने से मिलता है, जिसमें अपने सामने लाए हुए वनवास के चित्रों को देख सीता चकित हो जाती हैं । यद्यपि आजकल कोऊ ग्रंथ चित्रकला पर नहीं मिलता है, तथापि प्राचीन काल में ऐसे ग्रंथ अवश्य थे । काश्मीर के राजा जयादित्य की सभा के कवि दोमोदर गुप्त आज से ११०० वर्ष पहले अपने कुट्टनीमत नामक ग्रंथ में चित्रविद्या के 'चित्रसूत्र' नामक एक ग्रंथ का अल्लेख किया है । अजंता गुफा के चित्रों में प्रचीन भारतवासियों की चित्रनिपुणता देख चकित रह जाना पड़ता है । बड़े बड़े विज्ञ युरोपियनों ने इन चित्रों की प्रशंसा की है । उन गुफाओं में चित्रों का बनाना ईसा से दो सौ वर्ष पूर्व से आरंभ हुआ ता औरक आठवीं शताब्दी तक कुछ न कुछ गुफाएँ नई खुदती रहीं । अतः डेढ़ दो हजार वर्ष के प्रत्यक्ष प्रमाण तो ये चित्र अवश्य हैं । चित्रविद्या सीखने के लिये पहले प्रत्येक प्रकार की सीधी टेढ़ी, वक्र आदि रेखाएँ खींचने का अभ्यास करना चाहिए । इसके उपरांत रेखाओं के ही द्वारा वस्तुओं के स्थूल ढाँचे बनाने चाहिए । इस विद्या में दूरि आदि के सिद्धांत का पूरा अनुशीलन किए बिना निपूणता नहीं प्राप्त हो सकती । दृष्टि के समानांतर या ऊपर नीचे के विस्तार का अंकन तो सहज है, पर आँखों के ठीक सामने दूर तक गया हुआ विस्तार अंकित करना कठिन विषय है । इस प्रकार की दूरी का विस्तार प्रदर्शित करने की क्रिया को 'पर्सपेक्टिव' (Perspective) कहते हैं । किसी नगर की दूर तक सामने गई हुई सड़क, सामने को बही हुई नदी आदि के दृश्य बिना इसके सिद्धांतों को जाने नहीं दिखाए जा सकते । किस प्रकार निकट के पदार्थ बड़े और साफ दिखाई पड़ते हैं, और दूर के पदार्थ क्रमशः छोटे और धुँधले होते जाते हैं, ये सब बातें अंकित करनी पड़ती हैं । देखें चित्र उदाहरण के लिये दूर पर रखा हुआ एक चौखूँटा संदूकलीजिए । मान लीजिए कि आप उसे एक ऐसे किनारे से देख रहे हैं जहाँ से उसके दो पार्श्व या तीन कोण दिखाई पड़ते हैं । अब चित्र बनाने के निमित्त हम एक पेंसिल आँखों के समानांतर लेकर एक आँख दबाकर देखेंगे तो संदूक की सबके निकटस्थ खड़ी कोणरेखा ऊँचाई) सबसे बड़ी दिखाई देगी; जो पार्श्व अधिक सामने रहेगा, उसके दूसरे ओर की कोणरेखा उससे छोटी और जो पार्श्व कम दिखाई देगा, उसके दूसरे ओर की कोणरेखा सबसे छोटी दिखाई पड़ेगी । अर्थात् निकटस्थ कोण रेखा से लगा हुआ उस पार्श्व का कोण जो कम दिखाई देता है, अधिक दिखाई पड़नेवाले पार्श्व के कोण से छोटा होगा । दूसरा सिद्धांत आलोक और छाया का है जिसके बिना सजीवता नहीं आ सकती । पदार्थ का जो अंश निकट और सामने रहेगा वह खुलता (आलोकित) और स्पष्ट होगा; और जो दूर या बगल में पड़ेगा, वह स्पष्ट ओर कालिमा लिए होगा । पदार्थोंका उभार और गहराई आदि भी इसी आलोक और छाया के नियमानुसार दिकाई जाती है । जो अश उठा या उभरा होगा,/?/वह अधिक खुलता होगा, और जो धँसा या गहरा होगा वह कुछ स्याही लिए होगा । इन्हीं सिद्धांतों को न जानने के कारण बाजारू चित्रकार शीशे आदि पर जो चित्र बनाते हैं वे खेलवाड़ से जान पड़ते हैं । चित्रों में रंग एक प्रकार की कूँची से भरा जाता है जिसे चित्रकार कलम कहते हैं । पहले यहाँ गिलहरी की पूँछ के बालों की कलम बनती थी । अब विलायती ब्रुश काम में आते हैं ।

चित्रकाय
संज्ञा पुं० [सं०] १—चीता । २—तेंदुआ (को०) ।

चित्रकार
संज्ञा पुं० [सं०] चित्र बनानेवाला । चितेरा ।

चित्रकारी
संज्ञा स्त्री० [हिं० चित्रकार + ई (प्रत्य०)] १. चित्रविद्या । चित्र बनाने की कला । २चित्रकार का काम । चित्र बनाने का व्यवसाय ।

चित्रकाव्य
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का काव्य जिसके अक्षरों को विशेष क्रम से लिखने से कोई विशेष चित्र बन जाता है । ऐसा काव्य अधम समझा जाता है ।

चित्रकुंडल
संज्ञा पुं० [सं० चित्रकुण्डल] धुतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम ।

चित्रकुष्ट
संज्ञा पुं० [सं०] सफेद कोढ़ । श्वेत कुष्ठ [को०] ।

चित्रकूट
संज्ञा पुं० [सं०] १एक प्रसिद्ध रमणीक पर्वत जहाँ वनवास के समय राम और सीता ने बहुत दिनें तक निवास किया था । विशेष—यह तीर्थ स्थान बाँदा जिले में है और प्रयाग से २७. कोस दक्षिण में पड़ता है । इस पहाड़ के नीचे पयोष्णी नदी बहती है जिसमें मंदाकिनी नाम की एक और छोटी नदी मिलती है । रामनवमी और दीवाली के अवसर पर यहाँ बहुत दूर दूर से तीर्थ यात्री आते हैं । वाल्मीकि ने रामायण में इस स्थान को भार- द्वाज के आश्रम से साढ़े तीन योजन दक्षिण की ओर लिखा है । २. चित्तौर (शिलालेखों में चित्तौर का यही नाम आता है) । ३. हिमवत् खंड के अनुसार हिमालय के एक शृंग का नाम ।

चित्रकृत् (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. चिनिश का पेड़ । २. चित्रकार (को०) ।

चित्रकृत् (२)
वि० अदभुत । विचित्र [को०] ।

चित्रकेतु
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जिसके पास चित्रित पताका हो । २. भागवत के अनुसार लक्ष्मण के एक पुत्र का नाम । ३. गरुड के एक पुत्र का नाम । ४. वशिष्ठ के एक पुत्र का नाम । ५. कंसा के गर्भ से उत्पन्न देवभाग यादव का एक पुत्र । ६. भागवत के अनुसार शूरसेन देश का एक राजा जिसे पुत्रशोक से संतप्त देख नारद ने मंत्रोपदेश दिया था ।

चित्रकोट
संज्ञा पुं० [सं० चित्रकूट] चित्तौर । उ०—डगरावत आसखांन आसमांन सा है । उदैसिंघ चित्रकोट कियौ सौ निवा है ।—रा० रू०, पृ० १२२ ।

चित्रकोण
संज्ञा पुं० [सं०] १. कुटकी । २. काली कपास ।

चित्रकोल
संज्ञा पुं० [सं०] छिपकली [को०] ।

चित्रगंध
संज्ञा पुं० [सं० चित्रगन्ध] हरताल ।

चित्रगढ़ पु
संज्ञा पुं० [हिं० चित्र + गढ़] दे० 'चित्रकोट' । राजनबर रष्पिय प्रसन करिय सब्न सामंत । उ०—माल मुत्ति दिय चंद कवि चल्यौ चित्र गढ़ मंति ।—पृ० रा०, २४ । ४८१ ।

चित्रगत
वि० [सं०] चित्रित [को०] ।

चित्रगुप्त
संज्ञा पुं० [सं०] चौदह यमराजों में से एक जो प्राणियों के पाप और पुण्य का लेखा रखते हैं । विशेष—चित्रगुप्त के संबंध में पद्मपुराण, गुरुणपुराण, भविष्यपुराण आदि पुराणों में कथाएँ मिलती हैं । स्कंदपुराण के प्रभासखंड में लिखा है कि चित्र नाम के कोई राजा थे, जो हिसाब किताब रखने में बड़े दक्ष थे । यमराज ने चाहा कि इन्हें अपने यहाँ लेखा रखने के लिये ले जाँय । अतः एक दिन जब राजा नदी में स्नान करने गए, तब यमराज ने उन्हें उठा मँगाया और अपना सहायक बनाया । इसपर राजा की एक बहिन अत्यंत दुखी हुई और चित्रपथा नाम की नदी होकर चित्र को ढूँढ़ने समुद्र की ओर गई । भविष्यपुराण में लिखा है कि जब ब्रह्मा सृष्टि बनाकर ध्यान में मग्न हुए तब उनके शरीर से एक विचित्रवर्ण पुरुष कलम दवात हाथ में लिए उत्पन्न हुआ । जब ब्रह्मा का ध्यान भंग हुआ तब उस पुरुष ने हाथ जोड़कर कहा—'महाराज ! मेरा नाम और काम बताइए' ! ब्रह्मा जी ने संतुष्ट होकर कहा—'तुम हमारे शरीर से उत्पन्न हुए हो; इसलिये तुम कायस्थ हुए और तुम्हारा नाम चित्रगुप्त हुआ । तुम प्रणियों के पाप पुण्य का लेखा रखने के लिये यमराज के यहाँ रहो' । भट्ट, नागर, सेनक, गौड़, श्रीवास्तव, माथुर, अहिष्ठान, शैकसेना और अंबष्ठ ये चित्रगुप्त के पुत्र हुए । यह कथा पीछे की गढ़ी हुई जान पड़ती है; क्योंकि ऊपर जो नाम दिए है, वे प्रायः देशभेद सूचक हैं । गरुडपुराण के चित्रकल्प में तो लिखा है कि यमपुर के पास ही एक चित्रगुप्तपुर है, जहाँ चित्रगुप्त के अधीनस्थ कायस्थ लोग बराबर काम किया करतेहैं । बिहार, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश के सब कायस्थ अपने को चित्रगुप्त के वंशज बतलाते हैं । यमद्वितीया के दिन कायस्थ लोग चित्रगुप्त और कलम दावात की पूजा करते हैं ।

चित्रगृह
संज्ञा पुं० [सं०] चित्रशाला [को०] ।

चित्रघंटा
संज्ञा स्त्री० [ चित्रघण्टा ] एक देवी जो नौ दुर्गाओं में तृतीय मानी जाती हैं ।

चित्रचाप
संज्ञा पुं० [सं०] धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम ।

चित्रजल्प
संज्ञा पुं० [सं०] साहित्य में रस के अतर्गत एक वाक्यभेद । वह भावपूर्ण और अभिप्रायगर्भित वाक्य जो नायक और नायिका रूठकर एक दूसरे के प्रति कहते हैं । विशेष—चित्रजल्प के दस भेद किए गए हैं, यथा—प्रजल्प, परिजल्पित, विजल्प, उज्जल्प, संजल्प, अवजल्प, अभिजल्पित, आजल्प, प्रतिजल्प और सुजल्प ।

चित्रजात
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'चित्रयोग' ।

चित्रण
संज्ञा पुं० [सं०] चित्रमय वर्णन । शब्दों द्वारा ऐसा वर्णन करना जिससे वर्ण्य का मानसिक चित्र उपस्थित हो जाय । संश्लिष्ट रूपयोजना । उ०—स्थलवर्णन में तो वस्तुवर्णन की सूक्ष्मता कुछ दिनों तक वैसी ही बनी रही पर ऋतुवर्णन में चित्रण उतना आवश्यक नहीं समझा गया जितना कुछ इनी गिनी वस्तुओं का कतन मात्र करके भावों के उद्दीपन का वर्णन ।—चिंतामणि, भा० १, पृ० १९ ।

चित्रता
संज्ञा स्त्री० [सं०] विचित्रता । उ०—धीर गति से वह बदलता जा रहा नित खेल के पट । चित्रता पर उस चतुर की आजतक यक साँ रही है ।—चिंता, पृ० ७८ ।

चित्रतंडुल
संज्ञा पुं० [सं० चित्रतण्डुल] बायविड़ग ।

चित्रताल
संज्ञा पुं० [सं०] संगीत में एक प्रकार का चौताला ताल जिसमें दो द्रुत, एक प्लुत, और तब फिर एक द्रुत होता है । इसका बोल यह है,—डुगु० डुगु० धुमि धुमि थरिथा तक तक/?/थों ।

चित्रतैल
संज्ञा पुं० [सं०] रेंड़ी या अंडी का तेल ।

चित्रत्वक्
संज्ञा पुं० [सं०] भोजपत्र ।

चित्रत्वच्
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'चित्रत्वक्' ।

चित्रदंडक
संज्ञा पुं० [सं० चित्रदण्डक] १. सूरन । २. कपास (को०) ।

चित्रदीप
संज्ञा पुं० [सं०] पंचदशी नामक वेदांत ग्रंथ के अनुसार एक दीप । पट के ऊपर बने हुए चित्र के समान जगत् के विविध रूपों का आभास जिसे मायामय और मिथ्या समझना चाहिए ।

चित्रदेव
संज्ञा पुं० [सं०] कार्तिकेय का अनुचर ।

चित्रदेवी
संज्ञा पुं० [सं०] महेंद्रवारुणी लता । २. शक्ति या देवी का एक भेद ।

चित्रधर्मा
संज्ञा पुं० [सं० चित्रधर्मन्] एक दैत्य का नाम जिसका उल्लेख महाभारत में है ।

चित्रधाम
संज्ञा पुं० [सं०] यज्ञादि में पृथ्वी पर बनाया हुआ एक चौखूँटा चक्र जो चारखाने की तरह होता था और जिसके खानों को भिन्न भिन्न रंगों से भरते थे । सर्वतोभद्र मंडल ।

चित्रना पु
क्रि० स० [सं० चित्र + ना(प्रत्य०)] १. चित्रित करना । चित्रबनाना चितरना । उ०— चित्री बहु चित्रनि परम विचित्रनि केशवदास निहारि । जनु विश्वरूप की अमल आरसी रची विरंचि विचारि ।—केशव (शब्द०) । २. रंग भरना । चित्रित करना ।

चित्रनेत्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सारिका । मैना ।

चित्रपक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] तित्तिर पक्षी । तीतर ।

चित्रपट
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह कपड़ा, कागज या पटरी जिसपर चित्र बनाया जाय या बना हो । चित्राधार । २. वह वस्त्र जिसपर चित्र बने हों । छीट । ३. चित्र । तसवीर (को०) । ४ . सिनेमा कि फिल्म । सिनेमा ।

चित्रपटी
संज्ञा स्त्री० [सं०] छोटा चित्रपट । उ०—प्राणों की चित्र- पटी में आँकी सी करुण कथाएँ ।—यामा, पृ० २७ ।

चित्रपट्ट
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'चित्रपट' [को०] ।

चित्रपत्र (१)
संज्ञा पुं० [सं०] आँख की पुतली के पीछे का भाग जिसपर किरण पड़ने से पदार्थों के रूप दिखाई पड़ते हैं ।

चित्रपत्र (२)
वि० विचित्र पक्ष युक्त । रंग बिरंगे परवाला (पक्षी) ।

चित्रपत्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कपित्थपर्णी वृक्ष । २. द्रोण- पुष्पी । गूमा ।

चित्रपत्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] जलपिप्पली ।

चित्रपथा
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रभास तीर्थ के अंतर्गत ब्रह्मकुंड के पास की एक छोटी नदी जो अब सूख गई है; कोवल बरसात में कुछ बहती है । वि० दे० 'चित्रगुप्त' ।

चित्रपदा
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का छंद जिसके प्रत्येक चरण में २ भगण और २ गुरु होते हैं । जैसे,—रूपहिं देखत मोहैं । ईश कहौ नर को हैं । संभ्रम चित्त अरूझै । रामहिं यों सब बूझै ।—केशव (शब्द०) । २. मैना चिड़िया । सारिका । ३. लजालू नाम की लता । छुईमुई लजाधुर ।

चित्रपर्णी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मजीठ । २. कर्णस्फोट लता । कनफोड़ा । ३. जलपिप्पली । ४. द्रोणपुष्पी । गूमा ।

चित्रपादा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सारिका । मैना ।

चित्रपिच्छक
संज्ञा पुं० [सं०] मयूर । मोर ।

चित्रपुंख
संज्ञा पुं० [दे० चित्रपुङ्ख] बाण । तीर ।

चित्रपुट
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का छह ताला ताल जिसमें दो लघु, दो द्रुत, एक लघु, और एक प्लुत होता है । इसका बोल यह है—दिगिदाँ । धिमितक । दा० दा० तक थों । किट थरि धिधिगन थों/?/।

चित्रपुत्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] गुड़िया [को०] ।

चित्रपुष्प
संज्ञा पुं० [सं०] रामसर नाम की शर जाति की घास ।

चित्रपुष्पी
संज्ञा स्त्री० [सं०] आमड़ा ।

चित्रपृष्ठ
संज्ञा पुं० [सं०] गौरा पक्षी । गौरैया ।

चित्रफल
संज्ञा पुं० [सं०] १. चितला मछली । २. तरबूज ।

चित्रफलक
संज्ञा पुं० [सं०] हाथीदाँत, पत्थर, काठ, कागज आदि का तख्ता जिसपर चित्र बनाया जाता है ।

चित्रफला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. किकड़ी । २. बैगन । ३. कंटकारि । भटकटैया । ४. लिगिनी लता । ५. महेंद्रवारुणी ।६. फलुई मछली ।

चित्रबह
संज्ञा पुं० [सं०] १. मोर । मयूर । २. गरुड़ के एक पुत्र का नाम ।

चित्रभानु
संज्ञा पुं० [सं०] १. अग्नि । २. सूर्य । ३. चित्रक । चीते का पेड़ । ४. अर्क । मदार । ५. भैरव । ६. अश्विनीकुमार । ७. साठ संवत्सरों के बारह युगों में से चौथे युग के पहले वर्ष का नाम । ८. मणिपुर के राजा जो अर्जुन की पत्नी चित्रागदा के पिता थे ।

चित्रभाषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] ऐसी भाषा जिसमें विचारों को इस भाँति प्रस्तुत किया जाय कि उनकी कल्पना साकार हो ।

चित्रभाषावाद
संज्ञा पुं० [सं०] चित्रभाषा का सिद्धांत या मत ।

चित्रभाष्य
संज्ञा पुं० [सं०] कूटनीतिक भाषा या व्यंजना [को०] ।

चित्रभूठू
वि० [सं०] दे० 'चित्रगत' [को०] ।

चित्रभेषजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] कठगूलर । कठूमल ।

चित्रभोग
संज्ञा पुं० [सं०] राजा का वह सहायक या खैरख्वाह जो ग्राम, बाजार, वन आदि में मिलनेवाले पदार्थो तथा गाड़ी, घोड़े आदि से समय पर सहायता करे ।

चित्रमंच
संज्ञा पुं० [सं० चित्रमञ्च] एक प्रकार का ताल (को०) ।

चित्रमंडप
संज्ञा पुं० [सं० चित्रमणडप] १. अर्जुन की पत्नी चित्रांगदा के पिता का नाम । ३. अश्विनीकुमार [को०] ।

चित्रमंडल
संज्ञा पुं० [सं० चित्रमणडल] एक प्रकार का सर्प [को०] ।

चित्रमति
वि० [सं० चित्र + मति] विचित्र बुद्धिवाला । जिसकी बुद्धि विलक्षण हो । उ०—विश्वामित्र पवित्र चित्रमति बामदेव पुनि । केशर (शब्द०) ।

चित्रमद
संज्ञा पुं० [सं०] नाटक आदि में किसी स्त्री का अपने पति या प्रेमी का चित्र देखकर विरहसूचक भाव दिखलाना ।

चित्रश्रृग
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का हिरन जिसकी पीठ पर सफेद सफेद चित्तियाँ होती हैं । चीतल ।

चित्रमेखल
संज्ञा पुं० [सं०] मयूर । मोर ।

चित्रयोग
संज्ञा पु० [सं०] चौंसठ कलाओं में से एक अर्थात् बूढ़े को जवान और जवान को बूढ़ा बना देने की विद्या । वि० दे० 'कला' ।

चित्रयोधी (१)
वि० [सं० चित्रयोधिन्] विचित्र युद्ध करनेवाला । भारी योद्धा ।

चित्रयोधी (२)
संज्ञा पुं० १. अर्जुन । २. अर्जुन का पेड़ ।

चित्ररथ (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य । २. एक गंधर्व का नाम जो कश्यप और दक्ष कन्या मुनि के पुत्र थे । विशेष—चित्ररथ कुबेर के सखा माने जाते हैं । ये गंधर्वराज, अगारपर्ण, दग्धरथ और कुबेरसख भी कहलाते हैं । ३. श्रीकृष्ण के पुत्र गद के एक पुत्र का नाम । ४. महाभारत के अनुसार अग देश के एक राजा का नाम । ५. एक यदुवंशी राजा जो विष्णु पुराण के अनुसार रुषद्रु और भागवत के अनुसार विशदगुरु के पुत्र थे । ६. महाभारत के अनुसार ऋषदगुरु नामक राजा के एक पुत्र ।

चित्ररथ (२)
वि० विचित्र रथवाला ।

चित्ररथा
संज्ञा स्त्री० [सं०] महाभारत भीष्मपर्व में वर्णित एक नदी ।

चित्ररश्मि
संज्ञा पुं० [सं०] मरुतों में से एक ।

चित्ररेखा
संज्ञा स्त्री० [सं०] बाणासुर की कन्या ऊषा की एक सहेली । वि० दे० 'चित्रलेखा' ।

चित्ररेफ
संज्ञा पुं० [सं०] १. भागवत के अनुसार शाकद्वीप के राजा प्रियव्रत के पुत्र मेधातिथि के सात पुत्रों में से एक । विशेष—मेधातिथि ने अपने सात पुत्रों के सात वर्ष बाँट दिए थे जिनके नामों के अनुसार ही उन वर्षों के नाम पड़े । २. एक वर्ष या भूविभाग का नाम ।

चित्रल
वि० [सं०] चितकबरा । रंगबिरंगा । चितला ।

चित्रलता
संज्ञा स्त्री० [सं०] मँजीठ ।

चित्रला
संज्ञा स्त्री० [सं०] गोरखा इमली ।

चित्रलिखन
संज्ञा पुं० [सं०] १. सुंदर लिखावट । खुशखती ।— (मनु०) २. चित्र बनाने का काम ।

चित्रलिपि
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की लिपि, जिसमें संकेतों के व्यंजक चित्रों द्वारा अभिप्राय या आशय का बोध कराया जाता है । लिपिविकास की वह अवस्था जिसमें चित्रात्मक रेखाप्रतीकों से भाषा का लेखन किया जाता था । चित्रात्मक लिपि । (अं० पिक्टोग्राफिक लिपि) ।

चित्रलेखक
संज्ञा पु० [सं०] चित्रकार [को०] ।

चित्रलेखन
संज्ञा पुं० [सं०] १. सुंदर अक्षर लिखना । २. चित्र बनाना [को०] ।

चित्रलेखनिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] तूलिका (को०) ।

चित्रलेखनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] तसवीर बनाने की कलम । कूँची ।

चित्रलेखा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक वर्णवृत्त जिसके प्रत्येक चरण में १ मगण १ भगण, १ नगण और तीन यगण होते हैं । जैसे,—मै भीनी यों गुणनि सुनु यथा कामरी पाइ बारी । बोलो ना आलि ! कहत तुमसों दिन ह्वै बारि बारी । २. बाणासुर की एक कन्या ऊषा की एक सखी जो कूष्मांड की लड़की थी । यह जित्रकला में बड़ी निपुण थी । ३. एक अप्सरा का नाम । ४. चित्र बनाने की कलम । तसवीर बनाने की कूची ।

चित्रलोचना
संज्ञा स्त्री० [सं०] सारिका । मैना ।

चित्रवदाल
संज्ञा पुं० [सं०] पाठीन मत्स्य । पहिना मछली ।

चित्रवन
संज्ञा पुं० [सं०] गंडकी के किनारे का पुराणप्रसिद्ध एक वन ।

चित्रवर्मा
संज्ञा पुं० [सं०] १. धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम । २. मुद्राराक्षस के अनुसार कुलूत देश के एक राजा का नाम ।

चित्रवल्ली
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विचित्र लता । २. महेंद्रवारुणी ।

चित्रवहा
संज्ञा स्त्री० [सं०] महाभारत के अनुसार एक नदी ।

चित्रवाज
संज्ञा पुं० [सं०] कुक्कुट । मुर्गा [को०] ।

चित्रवाण
संज्ञा पुं० [सं०] धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम ।

चित्रवाहन
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत । में वर्णित मणिपुर के एक नाग राजा ।

चित्रविचित्र
वि० [सं०] १. रंग बिरंगा । कई रंगों का ।२. बेल- बूटेदार । नक्काशीदार ।

चित्रविद्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] चित्र बनाने की वद्या । विशेष—दे० 'चित्रकला' ।

चित्रविन्यास
संज्ञा पुं० [सं०] आलेखन । चित्रकर्म । चित्र बनाना [को०] ।

चित्रवीर्य (१)
वि० [सं०] विचित्र बली ।

चित्रवीर्य (२)
संज्ञा पुं० लाल रेंड । रक्त एरंड ।

चित्रवेगिक
संज्ञा पुं० [सं०] एक नाग का नाम ।

चित्रशार्दूल
संज्ञा पुं० [सं०] चीता [को०] ।

चित्रशाला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह घर जहाँ चित्र बनते हों या विक्रयार्थ रखे जाते हों । २. वह घर जहाँ चित्र हों । वह घर जिसमें बहुत सी तसवीरें टँगी हों । ३. वह स्थान जहाँ चित्रकारी सिखाई जाती हो । ४. वह घर या भवन जहाँ भिति पर चित्र बने हों (को०) ।

चित्रिशिखंडज
संज्ञा स्त्री० [सं० चित्रशिखणिडज] बृहस्पति ।

चित्रशिखंडो
संज्ञा स्त्री० [सं० चित्रशिखणिडन्] सप्त ऋषि । मरीचि, अगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ—ये सात ऋषि ।

चित्रशिर
संज्ञा स्त्री० [सं० चित्रशिरस्] १. एक गंधर्व का नाम । २. सुश्रुत के अनुसार मल मूत्र से उत्पन्न एक विष । गंदगी का जहर ।

चित्रशिल्पी
संज्ञा पुं० [सं० चित्र + शिल्पिन्] चित्रकार [को०] ।

चित्रशीर्षक
संज्ञा पुं० [सं०] एक विषैला कीड़ा [को०] ।

चित्रश्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] अतिशय या अदभुत सुंदरता [को०] ।

चित्रसंग
संज्ञा पुं० [सं० चित्रसङ्ग] १६ अक्षरों का एक वर्णवृत ।

चित्रसंस्थ
वि० [सं०] चित्रित । आलेखित [को०] ।

चित्रसभा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'चित्रशाला' [को०] ।

चित्रसर्प
संज्ञा पुं० [सं०] चीतल साँप ।

चित्रसार पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० चित्रसारी] दे० 'चित्रसारी' । उ०— चित्रसार पर तक्षक आया । रानी केर तहँ पलंग रहाया ।— कबीर सा०, पृ० ७२ ।

चित्रसारी
संज्ञा स्त्री [सं० चित्र+शाला] १. वह घर जहाँ चित्र टँगे हों या दिवार पर बने हों । २. सजा हुआ सोने का कमरा । विलासभवन । रंगमहल ।

चित्रसाल
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'चित्रशाला' । उ०—अति चित्रसाल बनी निज महली हरिजन तहँ उरझाने ।—प्राण०, पृ० ६४ ।

चित्रसेन
संज्ञा पुं० [सं०] १. धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम । २. एक गंधर्व का नाम । ३. एक पुरुवंशी राजा जो परीक्षित के पुत्रों में से थे । ४. शंबरासुर के एक पुत्र का नाम (हरिवंश) । ५. चित्तौर का एक राजा (पद्मावत) ।

चित्रस्थ
वि० [सं० ] चित्रित । अंकित । उ०—कहा मांडवी ने उलूक भी लगता है चित्रस्थ भला ।—साकेत, पृ० ३९४ ।

चित्रहस्त
संज्ञा पुं० [सं०] वार का एक हाथ । हथियार चलाने का एक हाथ (महाभारत) ।

चित्रांकन
संज्ञा पुं० [सं० चित्राङ्कन] १. चित्र अंकित करना ।२. आलेखन कर्म [को०] ।

चित्रांग (१)
वि० [सं० चित्राङ्ग] [वि स्त्री० चित्रांगी] जिसका अंग विचित्र हो । जिसके अंग पर चित्तियाँ, धारियाँ हों ।

चित्रांग (२)
संज्ञा पुं० १. चित्रक । चीता । २. एक प्रकार का सप । चीतल । ३. चीतर मृग । ३. ईंगुर । ५. हरताल ।

चित्रांगद
संज्ञा पुं० [सं० चित्राङ्गद] १. सत्यवती के गर्भ से उत्पन्न राजा शांतनु के एक पुत्र जो विचित्रवीर्य के छोटे भाई थे । २. देवी भागवत के अनुसार एक गंधर्व का नाम । ३. महाभारत, अश्वमेध पर्व में वर्णित दशार्ण देश के एक प्राचीन राजा ।

चित्रांगदा
संज्ञा स्त्री० [सं० चित्राङ्गदा] १. मणिपुर के राजा चित्रवाहन की कन्या जो अर्जुन को व्याही थी । २. रावण की एक स्त्री जो वीरबाहु की माता थी ।

चित्रांगी
संज्ञा स्त्री० [सं० चित्राङ्गी] १. मजीठ । २. कनसलाई नाम का एक कीड़ा । कनखजूरा ।

चित्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सत्ताईस नक्षत्रों में से चौदहवाँ नक्षत्र । विशेष—इसकी तारा संख्या एक मानी गई है, पर यह योगतारा भी दिखाई देता है । इसकी कला ४० और विक्षेप दो कला है । इसका कलांश तेरह है; अर्थात् यह सूर्य कक्षा के तेरहवें अंश के बीच अस्त और तेरहवें अंश पर उदय होता है । यह पूर्व दिशा में उदय होता है और पश्चिम में अस्त होता है (सूर्यसिद्धांत) । शतपथ ब्राह्मण के अनुसार सुंदर और चित्र विचित्र होने के कारण ही इसे चित्रा कहते हैं । फलित में यह पार्श्वमुख नक्षत्र माना गया है । इसमें गृहारंभ, गृहप्रवेश, हाथी, रथ, नौका, घोड़े आदि का व्यवहार शुभ है । इस नक्षत्र में जिसका जन्म होता है वह राक्षसगण में माना जाता है; विवाह की गणना में उसका मेल मनुष्यगण के साथ नहीं होता । रात्रिमान को १५ भागों में बाँट देने से मुहूर्त निकल आता है । इनमें से चौदहवें मुहूर्त को चित्रा का मुहूर्त मान लेना चाहिए, चाहे और कोई दूसरा नक्षत्र भी हो । जो जो कार्य चित्रा नक्षत्र में हो सकते हैं, वे सब चित्रा मुहूर्त में भी हो सकते हैं । २. मूषिकपर्णी । ३. ककड़ी या खीरा । ४. दंती वृक्ष । ५. गंड दूर्वा । ६. मजीठ । ७. बायबिडंग । ८. मूसाकानी । आखुकर्णी । ९. आजवाइन । १०. सुभद्रा । ११. एक सर्प का नाम । १२. एक नदी का नाम । १३. एक अप्सरा का नाम । १४. एक रागिनी जो भैरव राग की पाँच स्त्रियों में मानी जाती है । १५. संगीत में एक मूर्छना का नाम । १६. पंद्रह अक्षरों को एक वर्णवृति जिसमें पहले तीन नगण, फीर दो यगण होते हैं । जैसे,—मो मो माया याही जानो याहि छाड़े बिना ना । पावै कोउ प्यारे भौ सिंधू कबौं पार जाना । १७. एक छंद जिसमें प्रत्येक चरम में सोलह मात्राएँ होता हैं और अत में एक गुरु होता है । इसकी पाँचवीं, आठवीं और नवीं मात्रा लघु होती है । यह चौपाई का एक भेद है । जैसे—इतनहि कहि निज सदनै आई ।—(शब्द०) । १८. प्राचीन काल का एक बाजा जिसमें तार लगे होते थे । १९. चित- कबरी गाय ।

चित्राक्ष (१)
संज्ञा पुं० [सं०] धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम ।

चित्राक्ष (२)
वि० [वि० स्त्री० चित्राक्षी] विचित्र या सुंदर नेत्रवाला ।

चित्राक्षी
संज्ञा स्त्री० [सं०] सारिका । मैना ।

चित्राटीर
संज्ञा पुं० [सं०] १. चंद्रमा । २. शिव का अनुचर घंटाकर्ण । ३. बलि दिए हुए बकरे के रक्त से रंजित ललाट या मस्तक [को०] ।

चित्रादित्य
संज्ञा पुं० [ सं०] स्कंद पुराण के प्रभास खंड में वर्णित प्रभास क्षेत्र में शिव की स्थापित सूर्य मूर्ति ।

चित्राधार
संज्ञा पुं० [सं०] १. चित्रपट । २. चित्र रखने का स्थान ।

चित्रान्न
संज्ञा पुं० [सं०] बकरी के दूध में पकाया और बकरी के कान के रक्त में रँगा हुआ जौ और चावल ।

चित्रापूप
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का पूआ [को०] ।

चित्राम पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० चित्रा + म (प्रत्य०)] चित्रकारी । उ०— कोरिकिए चित्रामबहु एक शिला के माहिं । यौं सुंदर सब ब्रह्म- मयब्रह्म बिना कछू नाहिं ।—सुंदर० ग्रं०, भा० २, पृ० ८०२ ।

चित्रायस
संज्ञा पुं० [सं०] इस्पात । लोहा ।

चित्रायुध (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. विलक्षण अस्त्र । २. धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम ।

चित्रायुध (२)
वि० विलक्षण अस्त्रयुक्त ।

चित्रार पु
संज्ञा पुं० [सं० चित्रकार ] चित्रकार ।

चित्राल
संज्ञा पुं० [सं० चित्रालय] काश्मीर के पश्चिम का एक पहाड़ी प्रदेश ।

चित्रालय
संज्ञा पुं० [सं०] चित्रशाला [को०] ।

चित्रावसु
संज्ञा स्त्री० [सं०] नक्षत्रों से मंडित रात्रि ।

चित्राश्व
संज्ञा पुं० [सं०] सत्यवान का एक नाम ।

चित्रास
संज्ञा पुं० [सं० चित्र] चित्रों का समूह । चित्रशाला । उ०—सुंदर जागत भींत महिं लिष्यौ जगत चित्रास ।— सुंदर० ग्रं०, भा० २, पृ० ७८३ ।

चित्रिक
संज्ञा पुं० [सं०] चैत का महीना ।

चित्रिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] पद्मिनी आदि स्त्रियों के चार भेदों में से एक । विशेष—डिलडौल न बहुत भारी न बहुत छोटा, नाक तिल के फूल की सी, नेत्र कमलदल के समान, मुँह तिल, बिंदी आदि से सँवारा हुआ, यही सब इसके लक्षण हैं । यह विविध कलाओं तथा शृंगारचोष्टा में निपुण होती है । इस जाति की स्त्री के साथ मृग जाति के पुरुष का जोड़ उपयुक्त होता है ।

चित्रित
वि० [सं०] १. चित्र में खींचा हुआ । चित्र द्वारा दिखाया हुआ । जिसका रंग रूप चित्र में दिखाया गया हो । जैसे,— उसमें एक व्याघ्र चित्रित है । २. जिसपर चित्र बने हों । जिसपर नक्काशी हो । ३. जिसपर चित्तियाँ या रंग की धारियाँ हों ।

चित्री
वि० [सं० चित्रिन्] १. चित्रयुक्त । चित्रित । उ०— ऊँचा मंदर धौलहर माटी चित्री पौलि ।—कबीर ग्रं०, पृ० ७४ । २. चितकबरा । कबरा ।

चित्रीकरण, चित्रीकार
संज्ञा पुं० [सं०] १. अनेक वर्णों से रँगना । २. चित्रांकन । ३. अलंकरण । सजाना । ४. आश्चर्य [को०] ।

चित्रीकृत
वि० [सं०] १. चित्र रूप में प्रस्तुत किया गया । उ०— मेरा मेरा मैं, जिस शब्द योजना से चित्रीकृत भावराशि की अनुभूति प्राप्त कर रहा है, उसका उपादान सामजिक है, वैयक्तिक नहीं । काव्यशास्त्र, पृ० ६६ । २. सजाया हुआ ।

चित्रेश
संज्ञा पु० [सं०] चित्रा नक्षत्र के पति चंद्रमा ।

चित्रोक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आकाश । २. अलंकृत भाषा में कथन । ३. प्रिय और सुंदर उक्ति या भाषण (को०) ।

चित्रोत्तर
संज्ञा पुं० [सं०] वह काव्यालंकार जिसमें प्रश्न ही के शब्दों में उत्तर हो या कई प्रश्नों का एक ही उत्तर हो । जैसे,— (क) कोकहिये जल सो सुखी काकहिये पर श्याम । काकहिये जे रसबिना कोक हिये सुख बाम । इसमें 'कोक' 'काक' 'पाम' आदि उत्तर दोहे के शब्दों ही में निकल आते हैं ।(ख) गाउ पीठ पर लेहु अंग राग अरु हार करु । गृह प्रकाश कर देहु कान्ह कह्यो 'सारंग नहीं' । यहाँ 'सारंग नहीं' से सब प्रश्नों का उत्तर हो गया । (ग) को शुभ अक्षर ? कौन युवति जो धन वश कीनी ? विजय सिद्धि संग्राम राम कहँ कौने दिनी? कंसराज यदुवंश बसत कैसे केशवपुर ? बट सों कहिए कहा ? नाम जानहु अपने उर । कहिं कौन युपति जग जनन किय कमलनयन सूक्षम बरणि ? सुन वेद पुराणन में कहीं सनका- दिक 'शंकरतरुणि' । इसे 'प्रश्नोत्तर' भी कहते हैं ।

चित्रोत्पला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. उड़ीसा की एक नदी जिसे आज कल 'चितरतला' कहते हैं । २. मत्स्य, मारकंडेय और वामन पुराण के अनुसार एक नदी जो ऋक्षपाद पर्वत से निकली है ।

चित्रोपला
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक नदी जिसका उल्लेख महाभारत में है ।

चित्र्य
वि० [सं०] १. पूज्य । २. चुनने या इकट्ठा करने योग्य ।

चिथड़ा
संज्ञा पुं० [सं० चीर्ण = फटा हुआ या चीर अथवा चीवर अथवा देश०)] फटा पुराना कपड़ा । कपड़े की धज्जी । लत्ता । लुगरा । यौ०—चिथड़ा गुदड़ा = फटे पुराने कपड़े । मुहा०—चिथड़ा लपेटना = फटे पुराने कपड़े पहनना ।

चिथाड़ना
क्रि० स० [सं० चीर्ण] १. चीरना । फाड़ना । कपड़े, चमड़े, कागज आदि चद्दर के रूप की वस्तुओं को फाड़कर टुकड़े टुकड़े करना । धज्जी धज्जी करना । २. धज्जियाँ उड़ाना । अपमानित । लज्जित करना । नीचा दिखाना । जलील करना ।

चिथरा पु
संज्ञा पुं० [हिं० चिथड़ा ] दे० 'चिथरा' । उ०—चिथरा पहिरि लँगोटी साका कै गया ।—पलटू०, भा० २, पृ० ७९ ।

चिद्
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'चित्' [को०] ।

चिदाकाश
संज्ञा पुं० [सं०] आकाश के समान निर्लिप्त और सबका आधारभूत ब्रह्म । परब्रह्म ।

चिदात्मक
वि० [सं०] चेतना से युक्त [को०] ।

चिदात्मा
संज्ञा पुं० [सं० चिदात्मन्] चैतन्य स्वरूप परब्रह्म ।

चिदानंद
संज्ञा पुं० [सं० चिदानन्द] चैतन्य और आनंदमय परब्रह्म ।

चिदाभास
संज्ञा पुं० [सं०] चैतन्य स्वरूप परब्रह्म का आभास या प्रतिबिंब जो महत्तत्व या अंतःकरण पर पड़ता है । २. जिवात्मा । विशेष—अद्वैतवादियों के मत से अंतःकरण में ब्रह्म का आभास पड़ने से ही ज्ञान होता है । माया के संयोग से यह ज्ञान अनेक रूप विशिष्ट दिखाई पड़ता है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार स्फटिक पर जिस रंग की आभा पड़ती है, वह उसी रंग का दिखाई पड़ता है ।

चिदालोक
संज्ञा पुं० [सं०] सदैव बना रहनेवाला आत्मप्रकाश [को०] ।

चिद्धन (१)
वि० [सं०] जिसमें चेतना हो । चेतनायुक्त [को०] ।

चिद्धन (२)
संज्ञा पुं० ब्रह्मा [को०] ।

चिद्रप
संज्ञा पुं० [सं०] चैतन्य स्वरूप ब्रह्म । ज्ञानमय परमात्मा ।

चिद्विलास
संज्ञा पुं० [सं० चित् + विलास] १. चैतन्य स्वरूप ईश्वर की माया । उ०—तुलसिदास कह चिद्विलास जग बूझत बूझत बूझे ।—तुलसी (शब्द०) । २. शंकराचार्य के एक शिष्य । विशेष— बहुतों का विश्वास है कि शंकरविजय नामक ग्रंथ इन्हीं का लिखा है, जिसमें चिद्विलास वक्ता और विज्ञ निकद श्रोता हैं ।

चिन
संज्ञा पुं० [देश०] १. एक बहुत बड़ा सदाबहार पेड़ जो हिमालय पर शिमले के आसपास बहुत होता है । विशेष—इसकी लकड़ी बहुत मजबूत होती है और इमारतों में लगती है । २. एक घास जिसे चौपाए बड़ी रुचि से खाते हैं । विशेष—यह घास खेतों के किनारे होती है । इसे सुखाकर भी रख सकते हैं ।

चिनक
संज्ञा पुं० [हिं० चिनगी] १. जलन लिए हुए पीड़ा । चुनचु- नाहट । २. मूत्रनाली की जलन या पीड़ा जो सुजाक में होती है । क्रि० प्र०—उठना ।— होना ।

चिनग (१) †
संज्ञा पुं० [हिं० चिनक] दे० 'चिनक' ।

चिनग (२)पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिनगी] दे० 'चिनगी' । उ०—पट- बिजना तहँ आधिक सतावै । छटनि ते उछटि चिनग जनु आवै ।—नंद० ग्रं०, पृ० १३२ ।

चिनगटा पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] चिथड़ा ।

चिनगारी
संज्ञा स्त्री० [सं० चूर्ण, हिं० चुन + अंगार ?] १. जलती हुई आग का छोटा कण या टुकड़ा । जैसे,—एक चिनगारी आग इसपर रख दो । २. दहकती हुई आग में से फूट फूटकर उड़नेवाला कण । अग्निकण । स्फूलिंग । क्रि० प्र०—उडना ।—छूटना ।—फूटना । मुहा०—आँखो से चिनगारी छूटना = क्रोध से आँखें लाल लाल होना । चिनगारी छोड़ना = धीरे से ऐसी बात कर बैठना जिससे किसी प्रकार का उपद्रव खड़ा हो जाय । कोई ऐसी बात कह देना जिससे लोगों में लड़ाई झगड़ा हो जाय । ऐसी चाल चलना जिससे एक नई बात खड़ी हो जाय । चिनगारी डालना = (१) आग लगाना । (२) दे० 'चिनगारी छोड़ना' ।

चिनगी
संज्ञा स्त्री० [सं० चूर्ण, हिं० चून + अग्नि, प्रा० आगि] १. अग्निकण । दे० 'चिनगारीं' । २. चुस्त और चालाक लड़का । ३. वह लड़का जो नटों के साथ रहता है (नट) ।

चिनत्ती †
संज्ञा स्त्री० [हिं० चेना] चेना की रोटी ।

चिनना
संज्ञा पुं० [सं० चिनोति से √ चि + नु (विकरण), हिं० चुगना] दे० 'चुनना' ।

चिनवाना
क्रि० स० [हिं० चिनना] दे० 'चुनवाना' ।उ०—जिवित मनुष्य को अग्नि में जला देना अथवा दीवार में चिनवा देना इन शासकों के लिये साधारण कार्य था ।—हिंदी काव्य०, पृ० ९६ ।

चिनाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिनना ] चिनने, चुनने या जोड़ाई करने का कार्य अथवा उस कार्य की मजदूरी ।

चिनाई दौड़
संज्ञा स्त्री० [छीननी + दौड़] जहाज की घूमाव फिराव की चाल । जहाज का चक्कर ।—(लश०) ।

चिनाना †पु
क्रि० स० [सं० चयन] १. चुनवाना । बिनवाना । २. ईंट आदि की जोड़ाई करना । दीवार या घर उठवाना ।

चिनाब
संज्ञा पुं० [चन्द्रभागा] पंजाब की एक नदी । चंद्रभागा ।

चिनार
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का बृहद् वृक्ष जो काश्मीर में होता है । इसकी पत्तियाँ हाथ के समान होती हैं ।

चिनिग
संज्ञा पुं० [देश०] बटेर जाति का एक पक्षी जो घाघरा से छोटा, किंतु उसी जाति का होता है ।

चिनिया
वि० [हिं० चीनी] १. चीनी के रंग का । सफेद । २. चीन देश का । चीनी ।

चिनिया केला
संज्ञा पुं० [हिं० चिनिया + केला] छोटी जाति का एक केला जो बंगाल में होता है । यह खाने में बहुत मीठा होता है ।

चिनिया घोड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० चीन या चीनी] वह घोड़ा जिसके चारों पैर सफेद हों और सारे बदन में लाला और कुछ सफेद खिचड़ी बाल हों ।

चिनियापोत
संज्ञा पुं० [हिं० चिनिया + पोत] एक प्रकार का सिल्क का वस्त्र । नकली रेशमी कपड़ा । उ०—काशी के बहुमूल्य बसन बहु विधि बहुरंगी । अतलस चिनियापोत बासकट तास ताफता ।—रत्नाकर, भा० १. पृ० १०९ ।

चिनियाबत
संज्ञा पुं० [हिं० चिनिया + बत] बत्तक की तरह एक चिड़िया ।

चिनियाबदाम
संज्ञा पुं० [हिं० चिन + बादाम] मूँगफली ।

चिनियारी
संज्ञा स्त्री० [सं० चुचु ?] सुसना का साग ।

चिनोती
संज्ञा स्त्री० [हिं० चुनौती] दे० 'चुनौती' । उ०—यह तो मुझे चिनौती देता है, अरे मरी लोथ के खानेवाले खड़ा रह ।—शकुंतला, पृ० १२७ ।

चिनौटिया
वि० [हिं० चिनना] चुना हुआ । चुन्ननवाला ।

चिनौती
संज्ञा स्त्री० [हिं० चुनौती] दे० 'चुनौती' । उ०—मनू के ओठ किकुड़े । चिनौती सी देती हुई बोली, मेरे भाग्य में एक नहीं दस हाथी लिखे हैं ।—झाँसी०, पृ० ३२ ।

चिन्न
संज्ञा पुं० [सं०] चना ।

चिन्मय (१)
वि [सं०] ज्ञानमय ।

चिन्मय (२)
संज्ञा पुं० परमेश्वर ।

चिन्ह
संज्ञा पुं० [सं० चिह्न] दे० 'चिह्न' ।

चिन्हवाना
क्रि० स० [हिं० 'चीन्हना' का प्रे० रूप] पहचनवाना । परिचित करना । ठिक लक्षण बता देना । पहचान करा देना ।

चिन्हाटी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिन्ह + आटी(प्रत्य०) ] दे० 'चिन्हानी' ।

चिन्हाना †
क्रि० स० [हिं० चीन्हना का प्रे० रूप] पहचनवाना । परिचित कराना ।

चिन्हानी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिन्ह ] १. चीन्हने की वस्तु । पहचान । लक्षण । २. ऐसी वस्तु जिससे किसी वात या मनुष्य का स्मरण हो । स्मारक । यादगार । चिह्न । रेखा । धारी । लकीर । क्रि० प्र०—खींचना ।—पारना ।

चिन्हार
वि० [हिं० चिन्ह] जानपहचान का । जिससे जान परिचय हो । परिचित ।

चिन्हारी †
वि० [हिं० चिन्ह] जानपहचान । भेंट मुलाकात । परिचय । उ०—कुसमय जानि न कीन्हि चिन्हारि ।—मानस, १ । ५० ।

चिन्हित पु
वि० [सं० चिह्नित] दे० 'चिह्नित' ।

चिन्हौटी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिन्ह + औटी (प्रत्य०) ] दे० 'चिन्हानी' ।

चिपकना
क्रि० अ० [अनुकरणात्मक देश०] १. बीच में किसी लसीली वस्तु के कारण दो वस्तुओं का इस प्रकार जुड़ना कि जल्दी अलग न हो सकें । सटना । चिमटना । श्लिष्ट होना । जैसे,—इस पुस्तक के पन्ने चिपक गए हैं । क्रि० प्र०—जाना । २. प्रगाढ़रूप से संयुक्त होना । लिपटना । ३. स्त्री पुरुष का संयोग होना । स्त्री पुरुष का परस्पर प्रेम में फँसना । ४. रोजगार से लगना । किसी काम में लगना ।

चिपकाना
क्रि० स० [हिं० चिपकना] १. किसी लसीली वस्तु को बीच में देकर दो वस्तुओं को परस्पर इस प्रकार जोड़ना कि वे जल्दी अलग न हो सकें । चिमटना । श्लिष्ट करना । चस्पाँ करना । जैसे,—इस कागज पर टिकट चिपका दो ।

चिमटवाना
क्रि० स० [हिं० चिमटना का प्रे० रूप] दूसरे से चिम- टाने का काम करना ।

चिमटा
संज्ञा पुं० [हिं० चिमटना] [स्त्री० अल्पा० चिमटी] लोहे, पीतल आदि की दो लंबी और लचीली फट्ठियों का बना हुआ एक औजार जिससे उस स्थान पर की वस्तुओं को पकड़कर उठाते हैं, जहाँ हाथ नहीं ले जा सकते । दस्तपनाह ।

चिमटाना
क्रि० स० [हिं० चिमटना] १. चिपकाना । सटाना । लसना । २. लिपटाना । आलिंगन करना ।

चिमटी
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिमटा] १. छोटा चिमटा । २. सोनारों का एक औजार जिससे तार आदि मोड़ने और महीन रवे उठाने का काम लिया जाता है । विशेष—और भी कई पेशेवाले इस नाम के औजार का प्रयोग करते हैं । इसे चिमोटी या चिकोटी भी कहते हैं ।

चिमडा़
वि० [हिं०] दे० 'चीमड़' ।

चिमन पु
संज्ञा पुं० [हिं० चमन] दे० 'चमन' ।

चिमनी
संज्ञा स्त्री० [अं०] १. ऊपर उठी हुई शीशे की वह नली जिससे लंप का धुँआ बाहर निकलता और प्रकाश फैलता है । २. किसी मकान, कारखाने, या भट्ठी के ऊपर लोहे या ईटों का बना वह लंबा छेद जिससे धूआँ बाहर निकलता है । विशेष—चिमनी कई प्रकार की बनाई जाती हैं । रहने के मकानों में जो चिमनी बनती है, वह बहुत ऊपर उठी हुई नहीं होती पर कल कारखानों (जैसे, पुतलीघर) में जो चिमनियाँ होती है वे बहुत ऊँची उठाई जाती है जिसमें धूआँ बहुत ऊपर जाकर आकाश में फैल जाय ।

चिमि
संज्ञा पुं० [सं०] तोता [को०] ।

चिमिक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'चिमि' [को०] ।

चिमीट †
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिमटना] १. चिमटने की क्रिया या भाव । २. चिमटने के कारण पड़नेवाला दबाव या भार ।

चिमोटा
संज्ञा पुं० [हिं० चमोटा] दे० 'चमोटा' ।

चिमोटी
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिमटी] दे० 'चिमटी' ।

चियारना †
क्रि० स० [देश०] बाना । फैलाना । खोलना । जैसे,— दाँत चियारना ।

चिरंजीव (१)
वि० [सं० चिरञ्जी] चिरजीवी । विशेष—इस शब्द से दिर्घायु होने का आशीर्वाद दिया जाता है । यह शब्द पुत्रवाचक भी है ।

चिरंजीव (२)
संज्ञा पुं० बेटा । जैसे, आपके चिरंजीव ने एसा कहा है ।

चिरंजीव (३)
अव्य० एक आशीर्वादात्मक शब्द अर्थात् बहुत दिन तक जिओ [को०] ।

चिरंजीवी
वि० [सं० चिरञ्जिविन्] दे० 'चिरजीवी' ।

चिरंटी
संज्ञा स्त्री० [सं० चिरण्टी] १. सयानी लड़की जो पिता के घर रहे । २. युवती ।

चिरंतन
वि० [सं० चिरन्तन] बहुत दिनों का । पुरातन । पुराना ।

चिरंभ
संज्ञा पुं० [सं० चिरम्भ] चील ।

चिरंभण
संज्ञा पुं० [सं० चिरम्भण] दे० 'चिरंभ' ।

चिर (१)
वि० [सं०] बहुत दिनों का । दीर्घकालवर्ती । जैसे,—चिर- काल, चिरायु । उ०—हो एहु सतंत पियहिं पियारी । चिर अहिवात असीस हमारी ।—तुलसी (शब्द०) । यौ०—चिरकमनीय चिरकुमार = ब्रह्मचारी । आजीवन अवि- वाहित । उ०—चिरकुमार भीष्म की पताका ब्रह्मचर्य दीप्त ।—अनामिका, पृ० ५८ । चिरनवीन = सदा नया रहनेवाला । उ०—उज्ज्वल, अधीर और चिरनवीन । —अनामिका, पृ० ५८ । चिरपोषित = जिसका पोषण, रक्षण बहुत काल तक किया गया हो । चिरकाल से रक्षित अथवा पालित । उ०—अपनी ही भावना की छायाएँ चिरपोषित ।—अनामिका, पृ० ७० । चिरप्रतीक्षित = जिसकी प्रतीक्षा बहुत दिनों से की जा रही हो । उ०—उसके बाद चिरप्रतीक्षित औ चिरकमनीय, उसके स्वप्न और जागरण की आराध्य देवी ।—वो दुनिया, पृ० १२ । चिरसमाधि = (१) सदा से समाधिस्थ । बहुत काल से प्रसुप्त । उ०—चिरसमाधि में अचिर प्रकृति जब तुम अनादि तब केवल तम ।—अनामिका, पृ० ३१ । (२) मृत्यु ।

चिर (२)
क्रि० वि० बहुत दिन । अधिक समय तक । दीर्घकाल तक । जैसे, चिरस्थायी । चिरजीवी । उ०—चिर जीवहु सुत चारि चक्रवर्ती दशरत्थ के ।—तुलसी (शब्द०) । यौ०—चिरायु । चिरकाल । चिरकारी । चिरक्रिय । चिरजात । चिरजीवी । चिररोगी । चिरलब्ध । चिरशांति । चिरसंगी ।

चिर (३)
संज्ञा स्त्री० तीन मात्राओं का गण जिसका प्रथम वर्ण लघु हो ।

चिरई †
संज्ञा स्त्री० [सं० चटक] चिड़िया । पक्षी ।

चिरउँजी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिरौंजी] दे० 'चिरौंजी' । उ०—राय करौदा बैरि चिरउँजी ।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० ३४ ।

चिरक
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिरकना] बहुत जोर लगाने पर होनेवाला थोडा़ सा पाखाना ।

चिरकट
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'चिरकुट' । उ०—केचित् चिरकट बीनहिं पंथा । निर्गुन रूप दिखाबैं कंथा ।—सुंदर० ग्रं०, भा० १, पृ० ९२ ।

चिरकढाँस
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिरकना+ढाँसना] १. एक न एक रोग का नित्य बना रहना । कभी कुछ रोग कभी कुछ । सदा बनी रहनेवाली अवस्थता । २. नित्य का झगडा़ । रगडा़ ।

चिरकना
क्रि० अ० [अनु०] थोडा़ थोडा़ मल निकालना । थोडा़ थोडा़ हगना ।

चिरकमनीय
संज्ञा स्त्री० [सं०] जो स्थायी रूप से सुंदर हो । वह जिसका सौंदर्य स्थायी हो । उ०—चिरप्रतीक्षित और चिर- कमनीय उसेक स्वप्न और जागरण की आराध्य देवी ।—वो दुनिया, पृ० १२ ।

चिरकार
वि० [सं०] दे० 'चिरकारिक' [को०] ।

चिरकारिक
वि० [सं०] दीर्घसूत्री । चिरकारी ।

चिरकारी
वि० [सं० चिरकारिन्] [वि० स्त्री० चिरकारिणी] काम में देर लगानेवाला । दीर्घसूत्री ।

चिरकाल
संज्ञा पुं० [सं०] दीर्घकाल । बहुत समय । जैसे—चिरकाल से यह प्रथा चली आई है ।

चिरकीन (१)
वि० [फा़०] मैला । गंदा (लश०) । उ०—माया की चिरकीन लखौ तुम देखि कै मूँदौ नाक ।—पलटू०, भा० ३, पृ० १० । २. चिरकनेवाला ।

चिरकीन (२)
संज्ञा पुं० उर्दू भाषा के एक बीभत्स रस के कवि ।

चिरकुट
संज्ञा पुं० [सं० चिर + कुट्ट(=काटना)] फटा पुराना कपडा़ । चिथडा़ । गूदड़ । उ०—काढ़हु कंथा चिरकुट लावा । पहिरहु राते दगल सुहावा ।—जायसी (शब्द०) ।

चिरक्रिय
वि० [सं०] काम में देर लगानेवाला । दीर्घसूत्री ।

चिरक्रियता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दीर्घसूत्रता ।

चिरगह पु
संज्ञा पुं० [हिं० चीर + गह] दे० 'चिरकुट' । उ०— चिरगट फारि चटारा लै गयौ तरी तागरी छूटी ।—कबीर ग्रं०, पृ० २७७ ।

चिरचना पु
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'चिड़चिडा़ना' ।

चिरचिटा
संज्ञा पुं० [देश०] १. चिचडा़ । अपामार्ग । २. एक ऊँची घास जो बाजरे के पौधे के आकार की होती है । इसे चौपाए खाते हैं ।

चिरचिरा † (१)
वि० [हिं० चिड़चिडा़] दे० 'चिड़चिडा़' ।

चिरचिरा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० चिचडा़] दे० 'चिचडा़' ।

चिरचिराहट
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिड़चिडा़ना] दे० 'चिड़चिडा़हट' ।

चिरजीवक
संज्ञा पुं० [सं०] जीवक नाम का वृक्ष ।

चिरजीवन
संज्ञा पुं० [सं०] अमर जीवन [को०] ।

चिरजीवी (१)
वि० [सं० चिरजीविन्] १. बहुत दिनों तक जीनेवाला । दीर्घजीवी । २. सब दिन जीवित रहनेवाला । अमर ।

चिरजीवी (२)
संज्ञा पुं० १.विष्णु । २. कौवा । ३. जीवक वृक्ष । ४. सेमर का पेड़ । ५. मार्कंडेय ऋषि । ६. अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभिषण, कृपाचार्य और परशुराम जो चिरजीवी माने गए हैं ।

चिरत पु †
संज्ञा पुं० [सं०चिरत] दे० 'चरित' । उ०—कोट सत चिरत रघुनाथ कियो ।—रघु० रू०, पृ० ५७ ।

चिरताल पु †
वि० [हिं० चिरत + आल (प्रत्य०)] १. चरित्रवाला । चिट्टेवाज । २. नखरेबाज । उ०—सूँसकरै गालाँ सहै, चुगन बडो़ चिरताल ।—बाँकी ग्रं०, भा० २, पृ० ५६ ।

चिरतिक्त
संज्ञा पुं० [सं०] चिरायता ।

चिरतुषाररेखा
संज्ञा पुं० [सं०] पर्वत आदि की वह ऊँचाई जहाँ सर्वदा बर्फ जमी रहती है ।

चिरत्न
वि० [सं०] [वि० स्त्री० चिरत्नी] पुरातन । पुराना ।

चिरत्व
संज्ञा पुं० [सं०] स्थायित्व । चिरजीवन का भाव । दीर्घत्व । उ०—फिर आओगे निश्चय । निज चिरत्व से पत्तों ।—ग्राम्या, पृ० ९८ ।

चिरना (१)
क्रि० अ० [सं० चीणै, हिं० चीरना या अनुकरणात्मक] १. फटना । सीध में कटना । जैसे,—कपडा़ चिरना, लकडी़ चिरना । २. लकीर के रूप में घाव होना । सीधा क्षत होना । जैसे, फट्टी मत छुओ, उँगली चिर जायगी ।

चिरना (२)
संज्ञा पुं० १. चीरने का औजार । २. सोनारों का एक औजार । ३. कुम्हारों का वह धारदार लोहा जिससे वे नरिया चीरते हैं । ४. कसेरों का एक औजार जिससे वे थाली के बीच में ठप्पा या गोल लकीर बनाते हैं ।

चिरनिद्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] मृत्यु [को०] ।

चिरपरिचित
वि० [सं०] पुराना परिचित । जिससे सदा से जान पहचान हो ।

चिरप्रवृत्त
वि० [सं०] १. बहुत दिनों तक टिकनेवाला । २. दीर्घकाल से किसी कार्य में लगा हुआ [को०] ।

चिरप्रसूता
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह गाय जिसे बच्चा दिए बहुत दिन हो गया हो [को०] ।

चिरपाकी
संज्ञा पुं० [सं० चिरपाकिन्] कैथ । कपित्थ ।

चिरपुष्प
संज्ञा पुं० [सं०] बकुल । मौलसिरी ।

चिरबत्ती
वि० [हिं० चिरना + बत्ती] चिथडा़ चिथडा़ । टुकडा़ टुकडा़ । पुरजा पुरजा । मुहा०—चिरबत्ती कर डालना = चिथडे़ चिथडे़ कर डालना । फाड़ कर टुकडे़ टुकडे़ करना (कागज, कपडा़ आदि) ।

विरबिल्व
संज्ञा पुं० [सं०] करंज वृक्ष । कंजा ।

चिरम
संज्ञा स्त्री० [देश०] गुंजा । घुँघची । उ०—पाइ तरुनिकुच उच्च पद चिरम ठग्यौ सबु गाउँ । छुटै ठौरु रहिहै वहै जुहो मोलु छबि नाउँ ।—बिहारी र०, दो० २३७ ।

चिरमिटी
संज्ञा स्त्री० [देश०] गुंजा । घुँघची ।

चिरमी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'चिरम' [को०] ।

चिरमेही
संज्ञा पुं० [सं० चिरमेहिन] देर तक मूतनेवाला अर्थात् गधा [को०] ।

चिरला
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की छोटी झाडी़ । विशेष—यह पंजाब, अफगनिस्तान, बिलोचिस्तान और फारस में होती है । यह महीनों तक बिना पत्तियों के ही रहती है । इसमें काले रंग के मीठे फल लगते हैं जिनका व्यवहार औषध में होता है ।

चिरवल
संज्ञा पुं० [सं० चिरबिल्व या चिरबल्ली] एक पौधा जो बंगाल और उडी़सा से लेकर मदरास और सिंहल तक होता है । विशेष—यह पौधा छह महीने तक रहता है । इसकी जड़ की छाल से एक प्रकार का सुंदर रंग निकलता है जिससे मछली- पट्ठन, नेलोर आदि स्थानों में कपडे़ रँगे जाते हैं । इन स्थानों में इस पौधे की खेती होती है । असाढ़ में इसके बाज बोए जाते हैं । इस पौधे को सुरबुली भी कहती हैं ।

चिरवाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिरवाना] १. चिरवाने का भाव या कार्य । २. चिरवाने का मजदूरी । †३. पानी बरसने पर खेतों की पहली जोताई ।

चिरवाना
क्रि० स० [हिं० चीरना का प्रे० रूप] चीरने का काम कराना । फड़वाना ।

चिरविस्मृत
वि० [सं०] जो बहुत दिनों से भुलाया जा चुका हो ।

चीरवीर्य
संज्ञा पुं० [सं०] लाल रेंड़ का वृक्ष ।

चीरस्थ
वि० [सं०] दे० 'चिरस्थायी' [को०] ।

चिरस्थायी
वि० [सं० चिरस्थायिन्] बहुत दिनों तक रहनेवाला ।

चिरस्नेह
संज्ञा पुं० [सं०] बहुत समय से मिलनेवाला प्यार । उ०— उसके प्रति अपनी चिरस्नेह तपस्या का रहस्योदघाटन किया ।—वो दुनिया, पृ० १२ ।

चिरस्मरणीय
वि० [सं०] बहुत दिनों स्मरण रखने योग्य । २. पूजनीय । प्रशंसनीय ।

चिरहँटा †
संज्ञा पुं० [हिं० चिडी़+हंता] चिडी़मार । बहेलिया । ब्याध । उ०—कतहुँ चिरहँटा पंखा लावा । कतहुँ पखंडी काठ नचावा ।—जायसी (शब्द०) ।

चिरहुला
संज्ञा पुं० [?] [स्त्री० चिरहुली] १. चीडा़ । २. पक्षी ।

चिरांदा
वि० [अनु० चिरचिर (= लकडी़ आदि के जलने का शब्द)] थोडी़ थोडी़ बात पर बिगड़नेवाला । चिड़चिडा़ ।

चिराइता
संज्ञा पुं० [हिं० चिरायता] दे० 'चिरायता' ।

चिराइन †
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिरायँध] दे० 'चिरायँध' ।

चिराई
संज्ञा स्त्री० [हिं० चीरना] १. चीरने का भाव या क्रिया । २. चीरने की मजदूरी ।

चिराक †
संज्ञा पुं० [फा़० चराग] दे० 'चिराग' । उ०—(क) सोहत चंद्र चिराक बीजना करत दसौं दिसि ।—जयसिंह (शब्द०) । (ख) गुलगुली गिलमैं गलीचा है, गुनीजन हैं चाँदनी है चिकैं है चिराकन की माला है ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० १६५ ।

चिराकी पु
सं० स्त्री० [हिं० चिरागी] दे० 'चिरागी' । उ०— चंद चिराकी चहुं दिसा सब सीतल जानै । सूरज भी सेव करै, जैसे भल मानै ।—दादू०, पृ० ६२५ ।

चिराग
संज्ञा पुं० [फा़० चिराग, चराग] दीपक । दीआ । क्रि० प्र०—गुल करना ।—जलना ।—जलाना ।—बुझना ।— बुझाना ।—बढा़ना । यौ०—चिराग गुल पगडी़ गायब = मौका मिलते ही धन का उडा़ दिया जाना । चिराग जले = अँधेरा होने पर । संध्या समय । चिराग बत्ती का वक्त = संध्या के समय । चिराग सहरी, चिराग सुबह = (१) वह दिया जो बुझने बुझने को हो । (२) वह व्यक्ति जिसके जीवन के अंतिम दिन करीब हों । मरणासन्न । चिराग का गुल = दिए या चिराग का फुचडा़ जो रोशनी तेज करने के लिये झाड़ दिया जाता है । मुहा—चिराग का हँसना = चिराग से फूल झड़ना । चिराग को हाथ देना = चिराग बुझाना । चिराग गुल करना = (१) दीआ बुझाना । (२) किसी के वंश का विनाश करना । (३)रोनक मिटाना । चिराग गुल होना = (१) दीए का बुझ जाना । (२) रौनक मिटना । उदासी छाना । (३) किसी वंश का विनाश होना । चिराग ठंढा करना = चिराग बुझाना । चिराग तले अँधेरा होना = (१) किसी ऐसे स्थान पर बुराई होना जहाँ उसके रोकने का प्रबंध हो । जैसे, हकिम के सामने अत्याचार होना, पुलिस के सामने चोरी होना, किसी उदार धनी के किसी संबंधी का भूखों मरना, इत्यादी इत्यादी । (२) किसी ऐसे मनुष्य द्वारा कोई बुराई होना जिससे उसकी संभावना न हो । जैसे, किसी विद्वान् द्वारा कोई कुकर्म होना, इत्यादि । चिराग दिखाना = रोशनी दिखाना । सामने उजाला करना । चिराग बढा़ना = रोशनी बुझाना । चिराग बत्ती करना = दीआ जलाना । दीआ जलाने की तैयारी करना । चिराग लेकर ढूँढना = बडी़ छानबीन के साथ ढूँढ़ना । चारों और हैरान होकर ढूँढ़ना । परस्पर लाभ पहुँचना । चिराग से फूल झड़ना = चिराग की जली हुई बत्ती में गोल गोल फुचडे़ निकलना या गिरना । चिराग से गुल झड़ना । चिराग से चिराग जलना = एक दूसरे से लाभान्वित होना । चिराग से फूल झड़ना = चिराग का गुल झड़ना ।

चिरागदान
संज्ञा पुं० [फा़० चिराग+दान] दीअट । फतीलसोज । शमादान ।

चिरागी
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. चिराग जलाने का खर्च । किसी स्थान पर दीआ बत्ती करते रहने का खर्च या मजदूरी । २. जुआरियों के अड्डे पर चिराग जलानेवाले की मजदूरी जो बहुधा दाँव जीतनेवाला खिलाडी़ प्रत्येक दाव जीतने पर देता है । ३. वह भेंट जो किसी मजार पर चढा़ई जाती है । क्रि० प्र०—चढा़ना ।—देना ।

चिराटिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सफेद पुनर्नवा । २. चिरायता । उ०— हम तो तबही तें जोग लियो । पहिरि मेखलन चीर चिरातन पुनि पुनि फेरि सिआए ।—सूर (शब्द०) ।

चिरातिक्त
संज्ञा पुं० [सं०चिरतिक्त] दे० 'चिरतिक्त' ।

चिराद
संज्ञा पुं० [सं०] गरुड़ ।

चिराद
संज्ञा पुं० [सं० चिराद] बत्तक की जाती की एक प्रकार की बडी़ चिड़िया जिसका मांस स्वादिष्ट होता है ।

चिरान †
वि० [हिं० चिराना] बहुत पुराना । अधिक दिनों का । यौ०—पुरान चिरान = बहुत पुराना । अधिक दिनों का ।

चिराना (१)
क्रि० स० [हिं० चीराना] चीरने का काम कराना । फड़वाना । जैसे,—फोडा़ चिराना, लकडी़ चिराना ।

चिराना (२)
वि० [सं० चिरन्तन] १. पुराना । पुरातन । उ०—भरेउ सुमानस सुथल थिराना । सुखद सीत रुचि चारु चिराना ।—मानस, १ ।३६ । २. जीर्ण । यौ०—पुराना चिराना ।

चिरायँध
संज्ञा स्त्री० [सं० चर्म + गंध] वह दुर्गंध जो चरबी, चमडे़, बाल, मांस आदि जीवों के अंगों के अंशों के जलने से फैलती है । क्रि० प्र०—उड़ना ।—उठना ।—फैलना ।—निकलना । मुहा०—चिरायँध फैलना = बदनामी फैलना ।

चिरायता
संज्ञा पुं० [सं०चिरतिक्त या चिरात्] दो ढाई हाथ ऊँचा एक पौधा जो हिमालय के किनारे कम ठंडे स्थानों में काश्मीर से भूटान तक होता है । खसिया की पहाड़ियों पर भी यह पौधा मिलता है । विशेष—इसकी पत्तियाँ छोटी छोटी और तुलसी की पत्तियों के बराबर होती है । जाडे़ के दिनों में इसके फूल लगते हैं । सूखा पौधा (जड़, डंठल, फूल, सब) औषध के काम में आता है । फूल लगने के समय पौधा उखाडा़ जाता है और दबाकर बाहर भेजा जाता है । नैपाल के मोरंग नामक स्थान से चिरायता बहुत आता है । चिरायते का सर्वाग कड़वा होता है; इसी से यह ज्वर में बहुत दिया जाता है । वैद्यक में यह दस्तावर, शीतल तथा ज्वर, कफ, पित्त, सूजन, सन्निपात, खुजली, कोढ़ आदि को दूर करनेवाला माना जाता है । इसकी गणना रक्तशोधक औषधियों में है । डाक्टरी में भी इसका व्यवहार होता है । चिरायते की बहुत सी जातियाँ होती है । एक प्रकार का छोटा चिरायता दक्षिण में बहुत है । एक चिरायता कल्पनाथ के नाम से प्रसिद्ध है जो सबसे अधिक कड़ुआ होता है । गीमा नाम का एक पौधा भी चिरायते ही की जाति का है जो सारे भारत में जलाशयों के किनारे होता है । दक्षिण देश के वैद्य और हकीम हिमालय के चिरायते की अपेक्षा शिलारस या शिलाजीत नाम का चिरायता अधिक काम में लाते हैं जो मदरास प्रांत के कई स्थानों में होता है । पर्या०—भूनिंब । अनार्यतिक्त । कैरात । कांडतिक्तक । किरातक । किरातिक्त । चिरतिक्त । रामसेवक । सुतिक्तक । चिराटिका । काटुतिक्ता ।

चिरायु (१)
वि० [सं० चिरायुस्] चिरंजीवी । बडी़ उम्रवाला । बहुत दिनों तक जीनेवाला । दीर्घायु ।

चिरायु (२)
संज्ञा पुं० देवता ।

चिरारी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० चार] चिरौंजी । उ०—खरिक दाख अरु गरीं चिरारी । पीड़ बदाम लेत बनवारी ।—सूर (शब्द०) ।

चिराव
संज्ञा पुं० [हिं० चिरना] १. चीरने का भाव या क्रिया । २. घाव जो चीरने से हो ।

चिरिंटिका, चिरिंटी
संज्ञा स्त्री० [सं० चिरिण्टिका, चिरिण्टी] दे० 'चिरंटी' ।

चिरि (१)
संज्ञा पुं० [सं०] तोता [को०] ।

चिरि पु (२)
संज्ञा स्ञी० [ हिं० चिरी ] दे० 'चिरी' ।

चिरिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार का पुराना अस्त्र [को०] ।

चिरिया †पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'चिड़िया' । उ०—चिरिया सी जागी चिंता जनक के जियरे ।—इतिहास, पृ० २८७ ।

चिरिहार पु †
संज्ञा पुं० [ हिं० चिरी + हार (= वाला) (प्रत्य०)] पक्षी फँसानेवाला । बहेलिया । उ०— जौं न होत चारा कैआसा । किन चिरिहार ढुकत लेई लासा ।—जायसी (शब्द०) ।

चिरी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिड़िया] दे० 'चिड़िया' । उ०—चिरी- को मरन बालकन को खेल है ।—श्यामा०, पृ० १५ ।

चिरु
संज्ञा पुं० [सं०] कंधे और बाँह का जोड । मोढा़ ।

चिरैता †
संज्ञा पुं० [हिं० चिरायता] दे० 'चिरायता' ।

चिरैया
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिड़िया] १. दे०'चिड़िया' । २. वर्षा का पुष्य नक्षत्र । उ०—अद्रा धान पुनर्वसु पैया । गया किसान जो बोवै चिरैया ।—घाघ०, पृ० ७३ । ३. परिहत का सिरा जिसे जोतनेवाला पकड़ता है ।

चीरौंजी
संज्ञा स्त्री० [सं० चार + बीज] पियार या पियाल वृक्ष के फलों के बीज की गिरी । पियार के बीज की गिरी जो खाने में बडी़ स्वादिष्ट होती है और मेवों में समझी जाती है । यह किशमिश, बादाम के साथ पकवानों और मिठाइयों में भी पड़ती है । इसे पियार मेवा भी कहते हैं । दे०'पियार' ।

चिरौटा
संज्ञा पुं० [हिं० चिडा़ + औटा (प्रत्य०)] १. चीडा़ । गौरा पक्षी । २. चिड़िया का छोटा बच्चा ।

चिरौरी
संज्ञा पुं० [देश०] प्रार्थना । उ०—और कर्मचारियों का बहुत सा समय चिरौरी बिनती करने में कट जाता था ।—काया०, पृ० १७१ ।

चिर्क
संज्ञा पुं० [फा़०] १. गंदगी । मैल । २. मल । टट्टी । पाखाना । ३. मवाद । पीब ।

चिर्भटी
संज्ञा स्त्री० [सं०] ककडी़ ।

चिर्म
संज्ञा पुं० [फा़०, तुलनीय सं० चर्म] चमडा़ ।

चिर्मिठी
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिरमिटी] दे० 'चिरमिटी' । उ०—क्या मैं सोने के सुहावने दाने को काले मुँह की चिर्मिठी के साथ तोल दूँ ?—श्रीनिवास ग्रं०, पृ० ११५ ।

चिर्राहिन
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिरायँध] दे० 'चिराइन' । उ०—माँस का चटचटाकर जलना और उसमें से चिर्राहिन की दुर्गंध निकलना ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २. पृ० ८१ ।

चिर्री
संज्ञा स्त्री० [सं० चिरिका (= एक अस्त्र का नाम)] बिजली । वज्र । क्रि० प्र०—गिरना ।—पड़ना ।—मारना = बिजली गिरना । स्त्रियाँ शाप में कहती हैं, तुम्हें चिर्री मारे ।

चिलक (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिलकना] १. आभा । कांति । द्युति । चमक । झलक । उ०—(क) कहै रघुनाथ वाके मुख की लुनाई आगै चिलक जुन्हाइन की चंद सरसानो है ।—रघुनाथ (शब्द०) (ख) जब वाके रद की चिलक चमचमाती चहु कोनि । मंद होति दुति चंद की चपति चंचला जोती ।—शृंगार सत (शब्द०) । (ग) चिलक तिहारी चाही के सूधो तिलक लगै न ।—शृंगार सत० (शब्द०) । २. रह रहकर उठनेवाला दर्द । टीस । चमक । ३. एकबारगी पीडा़ होकर बंद हो जानेवाला दर्द । जैसे,—उठते बैठते कमर में चिलक होती है । क्रि० प्र०—उठना ।—होना ।

चिलका † (२)
संज्ञा पुं० [हिं०] तिलक नामक पौधा ।

चिलकना
क्रि० अ० [हिं० चिल्ली (= बिजली) या अनु०] २. रह रहकर चमकना । चमचमाना । झलकना । २. दर्द का रह रहकर उठना । ३. एकबारगी पीडा़ होकर बंद हो जाना । चमकना । क्रि० प्र०—उठना ।—होना ।

चिलका (१)
संज्ञा पुं० [हिं० चिलक] चमकता हुआ चाँदी का सिक्का रुपया ।

चिलका (२)
वि० [हिं० चिलक (=चमक) चमका । चौधा । उ०— यह सब माया मृगजल, झूठा झिलिमिलि होइ । दादू चिलका देखि करि सत करि जाना सोइ ।—दादू०, पृ० २१९ ।

चिलका (३)
संज्ञा स्त्री० [देश०] उड़ीसा की एक बडी़ झील ।

चिलका † (४)
संज्ञा पुं० [देश०] नवजात शिशु ।

चिलकाना †
क्रि० स० [हिं० चिलक] १. चमकाना । झलकना । २. किसी वस्तु को इतना माँजना कि वह चमकने लगे । उज्वल करना ।

चिलकी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिलकना] १. चाँदी का रुपया । २. एक प्रकार का रेशमी वस्त्र ।

चिलकी (२)
वि० स्त्री० चमकीली ।

चिलगोजा
संज्ञा पुं० [फा़० चिलगोजह्] एक प्रकार का मेवा । चीड़ या सनोवर का फल । विशेष—दे० 'चीड़' ।

चिलचिल
संज्ञा पुं० [हिं० चिलकना] अभ्रक । अबरक । भोंड़ल ।

चिलचिलाना (१)
क्रि० अ० [हिं० चिलकना] बहुत तेज चमकना । कडी़ धूप होना । जैसे, चिलचिलाती धूप ।

चिलचिलाना (२)
क्रि० स० चमकना ।

चिलडा़
संज्ञा पुं० [देश०] उलटा नाम का पकवान ।

चिलता
संज्ञा पुं० [फा़० चिलतह्] एक प्रकार का जिरहबकतर । एक प्रकार का कवच ।

चिलपों
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिल्ल + पों] दे० 'चिल्लपों' । उ०— कहीं किसी पर मार पड़ती थी, कहीं कोई अपना चीजें लिए भाग जाता था । चिलपों मची हुई थी ।—रंगभूमि, भा० २, पृ० ८०२ ।

चिलबिल
संज्ञा पुं० [सं० चिरबिल्व] १. एक बडा़ जंगली पेड़ जिसकी लकडी़ बहुत मजबूत होती है और खेती के औजार बनाने के काम में आती है । इसकी पत्तियाँ जामुन की पत्तियों की सी होती हैं । २. एक बडा़ पौधा जिसकी पत्तियाँ इमली की पत्तियों से मिलती जुलती होती है और पेडी़ डाल आदि बहुत हल्की और हरे रंग की होती है । विशेष—यह बरसात में उगता है और चार पाँच हथ तक ऊँचा होता है । यह पौधा तालों में भी होता है जहाँ उसके पानी के भीतर का भाग फूलकर खूब मोटा हो जाता है । इस भाग को खुखडी़ कहते हैं जिससे माली ब्याह के मौर, झालर, तोरण आदि बनाते हैं ।

चिलबिला, चिबिल्ला
वि० [सं० चल+बल] [वि० स्त्री०चिलबिल्ली] चंचल । चपल । शोख । नटखट । जैसे,—यह बडा़ चिलबिला लड़का है ।

चिलम
संज्ञा स्त्री० [फा़०] कटोरी के आकार का मिट्टी का एक बरतन जिसका निचला भाग चौडी़ नली के रूप में होता है । विशेष—इसपर तमाकू और आग रखकर तमाकू पीते हैं । साधारणतः चिलम को हुक्के की नली के उपर बैठाकर तमाकू पीते हैं । पर कभी कभी चिलम की नली को हाथ में लेकर भी पीते हैं । तमाकू के अतिरिक्त गाँजा, चरस आदि भी इस पर रखकर पिए जाते हैं । यौ०—चिलमचट । चिलमबरदार । मुहा०—चिलम चढा़ना = (१) चिलम पर तमाकू, गाँजा आदि, और आग रखकर उसे पीने के लिये तैयार करना । (२) गुलामी करना । चिलम पीना = चिलम पर रखे हुए तमाकू का धूआँ पीना । चिलम चाटना या चिलम चाटते फिरना = चिलम (गाँजे या तमाकू) को पीने के लिये अड्डे से अड्डे पर जाना । चिलम भरना = दे० 'चिलम चढा़ना' ।

चिलमगर्दा
संज्ञा स्त्री० [फा़० चिलमगर्दह्] हुक्के में हाथ भर की या इससे अधिक लंबी बाँस की नली जो चूल और जामिन से मिली होती है । इसपर चिलम रखी जाती है । नैचाबंद ।

चिलमचट
वि० [फा़० चिलम + हिं० चाटना] १. बहुत अधिक चिलम पीनेवाला । वह जो चिलम पीने का बहुत आदी हो । २. इस प्रकार खींचकर चिलम पीनेवाला कि वह चिलम दूसरे के पीने योग्य न रहे ।

चिलमची
संज्ञा स्त्री० [फा़०] देग के आकार का बरतन जिसके किनारे चारों ओर थाली की तरह दूर तक फैले होते हैं । इसमें लोग हाथ धोते और कुल्ली आदि करते हैं । यौ०—चिलमची बरदार = हाथ मुँह धुलानेवाला नौकर ।

चिलमन
संज्ञा स्त्री० [फा़०] बाँस की फट्ठियों का परदा । चिक । क्रि० प्र०—डालना ।—बाँधना ।—लटकाना ।

चिलमपोश
संज्ञा पुं० [फा़०] धातु का एक झंझरीदार ढक्कन जिससे चिलम ढँक देने से चिनगारी नहीं उ़डती ।

चिलमबरदार
संज्ञा पुं० [फा़०] हुक्का पिलानेवाला खिदमतगार ।

चिलमिलिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जुगनू । खद्योत । २. बीजली । ३. एक प्रकार का कंठी ।

चिलमीलिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. गले में पहनने की एक प्रकार की माला । २. जुगनू । ३. बिजली ।

चिलवन पु
संज्ञा पुं० [फा़० चिलमन] दे० 'चिलमन' । उ०—बैठि लखत ऋतु शोभा सुमुखि सदा चिलवन विन ।—प्रेमघन०, भा० १, पृ० ९ ।

चिलवाँस
पुं० [?] एक प्रकार का फंदा जिससे चिड़ियाँ फँसाई जाती हैं ।

चिलवा
संज्ञा पुं० [हिं० चीलर] दे० 'चिल्लड़' । उ०—इसकी परवा न रही कि ताजा हवा मिलती है या नहीं, भोजन कैसा मिलता है, कपडे़ कितने मैले हैं, उनमे कितने चिलवे पडे़ हुए हैं कि खुजाते खुजाते देह में दिदोरे पड़ जाते हैं ।—काया०, पृ० २८२ ।

चिलसी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का तमाकू जो काश्मीर में होता है । यह श्रीनगर के आसपास बहुत होता है और अप्रैल में बोया जाता है ।

चिलहुल
संज्ञा पुं० [सं०चिल्ल] एक प्रकार की छोटी मछली जो डेढ़ बालिश्त के लगभग होती है । यह सिंध, पंजाब, उत्तर प्रदेश और बंगाल की नदियों में पाई जाती है ।

चिला
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिल्ला] दे० 'चिल्ला (३)० । उ०—चंद चिलो गहि मारो बान ।—कबीर श०, पृ० २० ।

चिलिम †
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिलम] दे० 'चिलम' ।

चिलिया
संज्ञा स्त्री० [सं०चिल] चिलहुल मछली ।

चिलुआ
संज्ञा स्त्री० [हिं० चेल्हवा] दे० 'चेल्हवा' ।

चिल्काउर
संज्ञा स्त्री० [?] प्रसूता स्त्री । जच्चा ।

चिल्ल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० चिल्ला] १. चील । २. दुखती हुई आँख [को०] ।

चिल्ल (२)
वि० दुखती आँखवाला । कीचड़ भरी आँखवाला [को०] ।

चिल्लका
संज्ञा स्त्री० [सं०] झींगुर [को०] ।

चिल्लड़
संज्ञा पुं० [सं० चिल(= वस्त्र)] जूँ की तरह का एक बहुत छोटा सफेद रंग का कीडा़ जो मैले कपड़ों में पड़ जाता है । इस कीडे़ के काटने से शरीर में बडी़ खुजली होती है और छोटे छोटे दाने पड़ जाते हैं । क्रि० प्र०—पड़ना ।—बीनना ।

चिल्लपो
संज्ञा स्ञी० [हिं० चिल्लाना+अनु० पों] चिल्लाना । शोर- गुल । पुकार । दोहाई । क्रि० प्र०—करना ।—मचना ।—मचाना ।

चिल्लभक्ष्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] नख या नखी नामक गंधद्रव्य ।

चिल्लवाँस
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिल्लाना] बच्चों का चिल्लाना जो जमुवा के रोग में होता है ।

चिल्लवाना
क्रि० स० [हिं० चिल्लाना का प्रे० रूप] चिल्लाने का काम दूसरे से कराना । चिल्लाने में प्रवृत्त करना ।

चिल्ला (१)
संज्ञा पुं० [फा़०] १. चालीस दिन का समय । यौ०—चिल्ले का जाडा़= बहुत कडी़ सरदी । विशेष—धन के पंद्रह, मकर पचीस । जाडा़ जानो दिन चालीस । इन्हीं चालीस दिनों के जाडे़ को चिल्ले का जाडा़ कहते हैं । २. चालीस दिन का व्रत । चालीस दिन का बंधेज या किसी पुण्यकार्य का नियम (मुसल०) । क्रि प्र०—खींचना ।

चिल्ला (२)
संज्ञा पुं० [देश०] १. एक जंगली पेड़ । २. उर्द, मूँग या रौंदे के मैदे की परौंठी या घी चुपड़कर सेंकी हुई रोटी । चीला । उलटा ।

चिल्ला (३)
संज्ञा पुं० [फा़० चिल्लह्] धनुष की डोरी । पतंचिका । उ०— कई प्रकार के गुण जानती थी जिनमें से धनुष काचिल्ला बनाना, चौगान खेलना, तीर चलाना, और कई बाजे बजाना था । —हुमायूँ०, पृ० ४८ । क्रि० प्र०—चढा़ना । उतारना ।

चिल्ला (४)
संज्ञा पुं० [देश०] पगडी़ का छोर जिसमें कलाबतून का काम बना रहता है । तिल्ला ।

चिल्ला (५)
संज्ञा पुं० [फा़०] मुसलिम विचारों के अनुसार एक साधना जिससे द्वारा अस्वाभाविक शक्ति वश में की जाती है ।

चिल्लाना
क्रि० अ० किसी प्राणी का जोर से बोलना । मुँह से ऊँचा स्वर निकलना । शोर करना । हल्ला करना । संयो० क्रि०—उठना ।—पड़ना ।

चिल्लाभ
संज्ञा पुं० [सं०] छोटी छोटी चोरी करनेवाला । गिरहकट । चाँई [को०] ।

चिल्लाहट
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिल्लाना] १. चिल्लाने का भाव । २. हल्ला । शोर । गुल । संयो० क्रि०—उठना ।—पड़ना ।

चिल्लिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दोनों भौहौं के बीच का स्थान । २. एक प्रकार का बथुवा साग जिसकी पत्तियाँ छोटी होती हैं । ३. झिल्ली नामक कीडा़ । झिल्लिका । झींगुर (को०) । ४. बिजली । वज्र (को०) । यौ० पु—चिल्लका लता = (१) भौं । भ्रू । (२) पु वज्र । बिजली ।

चिल्ली (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] झिल्ली नाम का कीडा़ ।

चिल्ली (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० चिरिका(=एक अस्त्र का नाम)] बिजली । बज्र । चिर्री । उ०— चक्रहू ते, चिल्लिन तें, प्रलै की बिजुल्लिन तें जमतुल्य जिल्लिन तें जगत उजेरो ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० ३०५ । (ख) चिल्लिन को चाचा औ बिजुल्लिन को बाप बडो़ बाँकुरो बबा है बड़वानल अजब को ।—पद्माकर (शब्द०) । क्रि० प्र०—गिरना ।—पड़ना ।

चिल्ली (३)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. लोध । २. बथुआ साग ।

चिल्लो (४)
संज्ञा स्त्री० [हिं० चित्त ?] एक प्रकार का छोटा वृक्ष जिसकी छाल गहरे खाकी रंग की होती है और जिसपर सफेद चित्तियाँ होती है । विशेष—यह देहरादून, रुहेलखंड, अवध और गोरखपुर के जंगलों में पाया जाता है । इसकी पत्तियाँ एक बालिश्त से कुछ कम लंबी होती हैं और गर्मी कि दिनों में यह फलता है । इसके फळ मछलियों के लिये जहर होते हैं ।

चिल्ह पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० चिल्ल] दे० 'चील' और 'चील्ह' । उ०—करषि मुट्ठि कम्मान तानि क्रन बान छनं किय । मनहु चिलह दिसि सदल भोंर बासं नमनं किय ।—पृ० रा०, १ ।६३१ ।

चिल्हवाँस
संज्ञा पुं० [हिं० चिलवास] दे० 'चिलबाँस' । उ०—भई पुछारि लीन्ह बनवासू । बैरिनि सवति दीन्ह चिल्हवाँसू ।— जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० ३६३ ।

चिल्हवाडा़
संज्ञा पुं० [हिं० चील] एक खेल जिसे लड़के पेड़ों पर चढ़कर खेलते हैं । गिल्हर । गिलहर ।

चिल्ही पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० चिल्ल] चील नाम की चिड़िया । उ०—चिकारी चहूँ ओर ते चार चिल्हीं ।—सूदन (शब्द०) ।

चिल्होर †
संज्ञा स्त्री० [सं० चिल्ह, हिं० चील्ह + और (प्रत्य०)] दे० 'चिल्ही' ।

चिवि
संज्ञा स्त्री० [सं०] चिबुक । ठोढी़ ।

चिविट
संज्ञा पुं० [सं०] चिउडा़ । चिड़वा ।

चिविल्लिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की झाडी़ [को०] ।

चिवुक
संज्ञा पुं० [सं०] १. ठुड्ढी । ठोढी़ । २. मुचकुंद वृक्ष ।

चिहर पु †
वि० [देश०] चित्र विचित्र । अदभुत । उ०—बाजी चिहर रचाइ करि, रह्या अपरछन होइ । माया पट पड़दा दिया, ताथै लखै न कोइ ।—दादू०, पृ० २३४ ।

चिहराना †
क्रि० अ० [देश०] चिटकना । दरार पड़ना । उ०— मीन लिया कोउ मार ठाँव ढेला । चिहराना । पलटू०, भा० १. पृ० २५ ।

चिहाना †
क्रि० अ० [हिं०] चिल्लाना । शेर करना ।

चिहार पु
संज्ञा पुं० [सं०चीत्कार, हिं० चिग्घाड़] चीत्कार । चिल्लाहट । चिंघाड़ । दे० 'चिकार' । उ०—मिले सेन पंमार चालुक्क एतं । फुहू रैन जुट्ठै मनौं प्रेत हेतं । झरं सीस तुट्टै बिछुट्टै विहारं । करैं गल्ल ग्रजैं पिसाचं चिहारं । पृ० रा०, १२ ।१०४ ।

चिहारना पु †
क्रि अ० [हिं० 'चिहार' से नामिक धातु] चिग्घाड़ना चिल्लाना ।

चिहारि पु
संज्ञा स्त्री [हिं० चिहार] दे० 'चिहार' । उ०—गाढे़ गहो गहिर गुहारियौ चिहारि कियौ एही दीनबंधु अब दीन कहू दलि गो ।—गंग०, पृ० १ ।

चिहुँकना †पु
क्रि० अ० [सं० चमत्कृ, प्रा० चवँक्कि] चौंकना ।

चिहुँटना पु
क्रि० स० [सं० चिपिट, हिं० चिमटना अथवा हिं० चमोटना (= चमडे़ सहित अंग का कोई भाग पकड़ना)] १. चुटकी काटना । चुटकी से शरीर का माँस इस प्रकार पकड़ना जिसमें कुछ पीडा़ हो । मुहा०—चित्त चिहुँटना = चित्त में संवेदना उत्पन्न करना । मर्म स्पर्श करना । चित्त में चुभना । उ०—लै चुभकी निकसै धँसै बिहंसै अंग दिखाय । तकि तकि चित चिहुँटै ऐड भरी अँगिराय ।—शृंगार सत० (शब्द०) । २. चिपटना । लिपटना । उ०—बाल को लाल लई चिहुँटी रिस के मिस लाल सों बाल चिहुँटी ।—देव (शब्द०) ।

चिहुटनी †
संज्ञा स्त्री० [देश०] गुंजा । घुँघची । चिरमिटी ।

चिहुँटी
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिहुँटना] चुटकी । चिकोटी । उ०— बाल को लाल लई चिहुँटी रिस के मिस लाल सो बाल चिहूँटी ।—देव (शब्द०) ।

चिहु (१)पु
संज्ञा पुं० [प्रा० चीअ = चिता] दे० 'चिता' । उ०—दोनों बध कीने मैं आई । चिहु रचि अग्नि जरौ मैं जाई ।—आलम ।—हिं० क० का० पृ० २१६ ।

चिहु पु (२)
वि० [हिं० चहुँ] दे० 'चहुँ' । उ०—लगन तिद्धिअनु जासु नाम चिहु चक्क चलाइय ।—पृ० रा० (उ०), प्र० २१ ।

चिहुर पु
संज्ञा पुं० [सं० चिकुर या चिहुर] सिर के बाल । केश । उ०—छूटे चिहुर बदन कु म्हिलाने ज्यों नलिनी हिमकर की मारी ।—सूर (शब्द०) ।

चिहुरार पु
संज्ञा पुं० [सं० चिकुर या चिहुर+भार] केशभार चिकुरमार ।

चिह्न
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० चिह्नित] १. वह लक्षण जिससे किसी चीज की पहचान हो । निशान । २. पताका । झंडी । ३. किसी प्रकार का दाग या धब्बा । ४. छाप (पैरों का निशान) (को०) । ५. रेखा । लकीर (को०) । ६. पद आदि की सूचक चीज (को०) । ७. लक्ष्य (को०) । ८. स्मृति दिलानेवाला वस्तु (को०) ।

चिह्नकारी
वि० [सं० चिन्हकारिन्] १. चिन्ह बनानेवाला । २. घाव करनेवाला । घायल करनेवाला । ३. मार डालनेवाला । ४. भयानक (को०) ।

चिह्नधारिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] श्याम नाम की लता । कालीसर ।

चिह्नित
वि० [सं०] चिन्ह किया हुआ । जिसपर चिह्न हो ।

चीं, चींचीं
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. पक्षियों अथवा छोटे बच्चों का बहुत महीन शब्द । २. पक्षियों अथवा बच्चों का बहुत महीन स्वर में बोलना या शोर करना । मुहा०—चीं बोलना = अयोग्यता, अकर्मण्यता या अधीनता स्वीकार करना । दबैल होना । यौ०—चींचपड़ ।

चींचख
संज्ञा स्त्री० [अनु०] चिल्लाहट । रोना ।

चींचपड़
संज्ञा स्त्री० [अनु०] वह शब्द या कार्य जो किसी बडे़ या सबल के सामने प्रतिकार या विरोध के लिये किया जाय । जैसे,—अगर जरा भी चींच पड़ करोगे तो हाथ पैर तोड़कर रख दूँगा ।

चींटवा
संज्ञा पुं० [हिं० चींटी] दे० 'चींटा' या 'च्यूँटा' । उ०— राम मरै तो हम मरैं नातर मरै बलाय । अबिनासी का चींटवा, मरै न मारा जाय—कबीर (शब्द०) ।

चींटा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'चिउँटा' ।

चींटी
संज्ञा स्त्री० [हिं० चींटी] दे० 'चिंउँटी' ।

चींतना (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० चीतना] दे० 'चीतना' ।

चींतना (२)पु
क्रि० स० [हिं० चिंतना] १. चिंता करना । २. चेतना ।

चींता गोला
संज्ञा पुं० [हिं० छींटा+गोला] दे० 'छींटा गोला' ।

चींथना
क्रिं स० [हिं० चीथना] दे० 'चीथना' ।

चींथरा पु
संज्ञा पुं० [हिं० चिथडा़] दे० 'चिथडा़' । उ०—बोले हम यौं भयो चींथरा बदन तुम्हारो ।—प्रेमघन०, भा० १, पृ० ५ ।

चीक (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० चीत्कार] पीडा़ या कष्ट आदि के कारण बहुत जोर से चिल्लाने का शब्द । चिल्लाहट ।

चीक (२) †
संज्ञा पुं० [हिं० चिक] मांस बेचनेवाला । कसाई । बूचर । विशेष—प्रायः बूचरों की दूकानों पर आड़ के लिये चिकें टँगी रहती है, इसी से उन्हें चीक कहते हैं ।

चीक (३)
संज्ञा पुं० [सं० चिकिल] दे० 'कीच' या 'कीचड़' ।

चीकट (१)
संज्ञा पुं० [हिं० कीचड़] १. तेल की मैल । तलछट । २. मटियारा । लसार मिट्टी ।

चीकट (२)
संज्ञा पुं० [देश०] १. चिकट नाम का रेशमी कपडा़ । †२. वह कपडे़ या जेवर आदि जो कोई मनुष्य अपने भांजे या भांजी के विवाह में अपनी बहन को देता है ।

चीकट (३)
वि० बहुत मैला या गंदा ।

चीकड़ †
संज्ञा पुं० [सं० चिकिल या चिखाल्ल] दे० 'कीचड़' ।

चीकन †
वि० [सं० चिक्कण] दे० 'चिकना' ।

चीकना (१)
क्रि० अ० [सं० चीत्कार] १. पीडा़ या कष्ट आदि के कारण जोर से चिल्लाना । संयो० क्रि०—उठना ।—पड़ना । २. बहुत जोर से चिल्लाना । बहुत ऊँचे स्वर से बात करना ।

चीकना पु (२)
वि० [हिं० चिकना] [वि० स्त्री० चीकनी] दे० 'चिकना' । उ०—अलकावलि काली चीकनी घुँघुराली ।—प्रेमघन०, भा० १, पृ० १३० ।

चीकर †
संज्ञा पुं० [देश०] कुएँ के ऊपर बना हुआ वह स्थान जिससे मोट या चरस आदि से निकला हुआ पानी गिराया जाता है और जहाँ से पानी नालियों द्वारा होकर खेतों में पहुँचता है ।

चीख
संज्ञा स्त्री० [फा़० चीख] दे० 'चीक' । यौ०—चीख पुकार = कष्ट के समय चिल्लाहट ।

चीखना (१)
क्रि स० [सं० चषण] किसी चीज को उसका स्वाद जानने के लिये, थोडी़ मात्रा में खाना या पीना ।

चीखना (२) †
संज्ञा पुं० [हिं० चिखना या चिखना] भोजन में स्वाद- वृद्धि लाने के लिये थोडी़ मात्रा में खाया जानेवाला पदार्थ । जैसे, चटनी, तरकारी आदि ।

चीखना (३)
क्रि० अ० [हिं० चीकना] दे० 'चीकना' ।

चीखर, चीखल
संज्ञा पुं० [सं० चिकिल या चिखल्ल] १. कीच । कीचड़ । उ०—दल दाभ्या चीखल जला, विरहा लागी आगि । तिनका बपुरा ऊबरा, गल पूरा के लागि ।—कबीर (शब्द०) । २. गारा ।

चीखुर
संज्ञा पुं० [हिं० चिखुरा] गिलहरी ।

चीज
संज्ञा स्त्री० [फा़० चीज] वह जिसकी वास्तविक, काल्पनिक अथवा संभावित परंतु दूसरों से पृथक् सत्ता हो । सतात्मक वस्तु । पदार्थ । वस्तु । द्रव्य । जैसे,—(क) बहुत भूख लगी है, कोई चीज (खाद्य पदार्थ) हो तो लाओ । (ख) मेरे पास ओढ़ने के लिये कोई चीज (रजाई, दोहर या कोई कपडा़) नहीं हैं । (ग) उनकी सब चीजें (लोटा, थाली, कपडा़, किताबें आदि) हमारे यहाँ रखीं हुई हैं । यौ०—चीज वस्तु = सामान । असबाब ।२. आभूषण । गहना । जैसे,—(क) वह चीज रखकर रुपए लाए हैं । (ख) लड़की के हाथ पैर नंगे हैं, इसे कोई चीज बनवा दो । यौ०—चीज वस्तु = जेवर आदि । ३. गाने की चीज । राग । गीत । जैसे,—(क) कोई अच्छी चीज सुनाओ । (ख) उसने दो चीजें बहुत अच्छी सुनाई थी । ४. विलक्षण वस्तु । विलक्षण जीव । जैसे, (क) क्या कहें मेरी अँगूठी गिर गई, वह एक चीज थी । (ख) आप भी तो एक चीज हैं । ५. महत्व की वस्तु । गिनती करने योग्य वस्तु । जैसे,—(क) काशी के आगे मथुरा क्या चीज है । (ख) उनके सामने ये क्या चीज है ।

चीठ
संज्ञा स्त्री० [हिं० चीकड़(= कीचड़)] मैल । उ०—कीडे़ काठ जु खाइया, खाया किनहूँ दीठ । होत उपाई देखिया भीतर जाम्या चीठ ।—कबीर (शब्द०) ।

चीठा †
संज्ञा पुं० [हिं० चिट्ठा] दे० 'चिट्ठा' । उ०—नाम की लाज राम करुन कर, केहि न दिए कर चीठे ।—तुलसी (शब्द०) ।

चीठी †
संज्ञा स्ञी० [हिं० चिट्ठी] दे० 'चिट्ठी ।

चीड़ (१)
संज्ञा पुं० [देश०] १. एक प्रकार का देशी लोहा । २. जूते के लिये चमडा़ साफ करने की क्रिया (मोचियों की परिभाषा) । ३. दे० 'चीढ़' ।

चीडा़
संज्ञा स्त्री० सं०] चीड़ नाम का पेड़ ।

चीढ़
संज्ञा पुं० [सं० सरल, प्रा० सरड़, चड्ड़, चीड़ अथवा सं० चीडा़ या क्षीर (= चीढ़) ? ] १. एक प्रकार का बहुत ऊँचा पेड़ जो भूटान से काश्मीर और अफगनिस्तान में बहुत अधिकता से होता है । विशेष—इसके पत्ते सुंदर होते हैं और लकडी़ अंदर से नरम और चिकनी होती हैं जो प्रायः इमारत और सजावट के सामान बनाने के काम में आती है । पानी पड़ने से यह लकडी़ बहुत जल्दी खराब हो जाती है । इस लककडी़ में तेल अधिक होता है; इसलिये पहाडी़ लोग इसके टुकड़ों को जलाकर उनसे मशाल का काम लेते हैं । इसकी लकडी़ औषध के काम में भी आती है । इसके गोंद को गंधाबिरोजा कहते हैं । ताड़- पीन (तेल) भी इसी वृक्ष से निकलता है । कुछ लोग चिलगोजे को इसी का फल बताते हैं; पर चिलगोजा इसी जाति के दूसरे पेड़ का फल है । प्राचीन भारतीयों ने इसकी गणना गंधद्रव्य में की है और वैद्यक में इसे गरम, कासनाशक, चरपरा और कफनाशक कहा है । इसके अधिक सेवन से पित्त और कफ का दूर होना भी कहा है । इसे चील या सरल भी कहते हैं । २. चीड नाम का देशी लोहा ।

चीणौ पु
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का रंग । उ०—रोहड़ भड़ वंकडै सेल्ह पदधर कर तोले । अस चीणी औरियो, रुद्र जाडा धमरोले ।—रा० रू०, पृ० ८७ ।

चीत पु † (१)
संज्ञा पुं० [सं० चित] १. चित्त । मन । दिल । उ०— ढोला आमण दूमणउ नखती खूदइ भीति । हमथी कुण छइ आगली बसी तुहारइ चीति ।—ढोला०, दू० १३७ । २. इच्छा । विचार । उ०—कै खाना कै सोवना, और न कोई । संयो० क्रि०—देना । २. प्रगाढ़ आलिंगन करना । लिपटाना । संयो० क्रि०—लेना । ३. नौकरी लगाना । किसी काम धंधे में लगाना ।

चिपचिप
संज्ञा पुं० [अनु०] वह शब्द या अनुभव जो किसी लसदार वस्तु को छूने से होता है । क्रि० प्र०—करना ।

चिपचिपा
वि० [अनु० चिपचिपा या हिं० चिपकना] जिसे छूने से हाथ चिपकता हुआ जान पड़े । लसदार । लसीला । जैसे,—चोटा, शहद, चाशनी आदि वस्तु ।

चिपचिपाना
क्रि० अ० [हिं० चिपचिप] छूने से चिपाचिपा जान पड़ना । लसदार मालूम होना । जैसे,—स्याही में गोंद अधिक है, इसी से चिपचिपाती है ।

चिपचिपाहट
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिपचिपा] चिपचिपाने का भाव । लसीलापन । लस । लसी ।

चिपट (१)
वि० [सं०] चिपटी नाकवाला [को०] ।

चिपट (२)
संज्ञा पुं० चिड़वा [को०] ।

चिपटना
क्रि० अ० [सं० चिपिट (= चिपटा)] १. इस प्रकार जुड़ना कि जल्दी अलग न हो सके । चिपकना । सटना । चिमटना । २. दे० 'चिपकना' ।

चिपटा
वि० [सं० चिपिट] [स्त्री० चिपटी] जो कहीं से उठा या उभड़ा हुआ न हो । जिसकी सतह दबी और बराबर फैली हुई हो । जैसे,—(क) चिपटी नाक, चिपटा दाना, चिपटे बीज । उ०—पेड़ पर से गिरकर फल चिपटा हो गया ।

चिपटाना
क्रि० स० [हिं० चिपटना] १. चिपकाना । सटाना । २. लिपटाना । आलिंगन करना ।

चिपटी (१)
वि० स्त्री० [हिं० चिपटा] दे० 'चिपटा' ।

चिपटी (२)
संज्ञा स्त्री० १. कान में पहनने की एक प्रकार की बाली जिसे नैपाली स्त्रियाँ पहनती हैं । २. भग । योनि । मुहा०—चिपटी खेलना = दो स्त्रियों का कामवश परस्पर योनि से योनि घिसना । उ०—आओ पड़ोसिन चिपटी खैलौं, बैठ से बेगार भली ।—(शब्द०) । चिपटी लड़ाना = दे० 'चिपटी खेलना' ।

चिपड़ा †
वि० [हिं० चीपड़] जिसकी आँख में अधिक चीपड़ रहता हो । जिसकी आँख से अधिक चीपड़ निकलता हो ।

चिपड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिप्पड़] गोबर के पाथे हुए चिपटे टुकड़े । उपली । गोहँठी । क्रि० प्र०—पाथना ।

चिपरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिपड़ी] दे० 'चिपड़ी' ।

चिपिट (१)
वि० [सं०] चिपटा ।

चिपिट (२)
संज्ञा पुं० १. चिउड़ा । चिड़वा । २. चिपटी नाकवाला । मनुष्य जिसका दर्शन अशुभ माना जाता है । ३. दृष्टि की चकपकाहट जो आँखों को उँगली आदि से दबाने से हो । विशेष—इस प्रकार की चकपकाहट से कभी एक के दो या तीन पदार्थ दिखाई देते हैं, कभी पदार्थ नीचे या ऊपर हटे हुए दिखाई पड़ते हैं ।

चिपिटक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'चिपीटक' [को०] ।

चिपिटग्रीव
वि० [सं०] छोटी गरदनवाला [को०] ।

चिपिटनासिक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. बृहत्संहिता के अनुसार एक देश जो कैलास पर्वत के उत्तर पड़ता है । तातार या मंगोल देश जहाँ के निवासियों की नाक चपटी होती है । २. उस देश के निवासी, तातार या मंगोल ।

चिपिटनासिक (२)
वि० चिपटी नाकवाला ।

चिपीटक
संज्ञा पुं० [सं०] चिउड़ा । चिड़वा ।

चिपुआ †
संज्ञा पुं० [देश०] चेल्हवा मछली ।

चिपुट
संज्ञा पुं० [सं०] चिउड़ा [को०] ।

चिप्प
संज्ञा पुं० [सं०] नख का एक रोग जिसमें नाखून के नीचे र्मास में जलन और पीड़ा होती है और कभी कभी नाखून पक भी जाता है ।

चिप्पख
[हिं० चिपकना] १. चिपका या दबका हुआ ।

चिप्पड़
संज्ञा पुं० [सं० चिपिट] १. छोटा चिपटा टुकड़ा । जैसे,— इसके ऊपर कागज का एक चिप्पड़लगा दो । २. सुखी लकड़ी आदि के ऊपर की छूटी हुई छाल का टुकड़ा । पपड़ी । ३. किसी वस्तु के ऊपर से छीलकर निकाला हुआ टुकड़ा ।

चिप्पिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बृहत्संहिता के अनुसार एक रात्रि— चर जंतु । २. एक चिड़िया का नाम । उ०—बाँसा, बटेर, लव औ सिचान । धूती रु चिप्पिका चटक भान ।—सूर (शब्द०) ।

चिप्पी
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिप्पड़] १. छोटा । चिप्पड़ । २. उपली । गोहँठी । ३. वह बटखरा जिससे सीधा तौला जाता है । ४. सीधा । जिंस (साधु) । ५. फटे बर्तन पर लगाया जानेवाला धातु का टुकड़ा । ६. पतली, छोटी और चिपटी लकड़ी का टुकड़ा जिसे जोड़ को कसने के लिये लगाते हैं । पच्चर । ७. कागज का छोटा टुकड़ा जो कहीं चिपकाया जाय ।

चिबि
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'चिवि' [को०] ।

चिबिल्ला †
वि० [हिं०] दे० 'चिलबिला' ।

चिबु
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'चिबुक' [को०] ।

चिबुक
संज्ञा पुं० [सं०] ठुड्ढी । ठोड़ी । यौ०—चिबुककप् = ठोड़ी का गड्ढा । उ०—चिबुककूप छवि उझकै जोई । जगत कूप पुनि परै न सोई । नंद० ग्रं०, पृ० १२३ ।

चिमगादड़ †
संज्ञा पुं० [हिं० चमगादड़] दे० 'चमगादड़' ।

चिमटना
क्रि० अ० [हिं० चिपटना] १. चिपकना । सटना । लस जाना । २. प्रगाढ़ आलिंगन करना । लिपटना । जैसे,—वह अपने भाई को देखते ही उससे चिमटकर रोने लगा । ३. हाथ पैर आदि सब अंगों को लगाकर दृढ़ता से पकड़ना । कई स्थानों पर कसकर पकड़ना । गुथना । जैसे, चींटों का चिमटना । जैसे,—शेर को देखते ही वह एक पेड़ की डाल से चिमट गया । ४. पीछे पड़ जाना । पीछा न छोड़ना । पिंड न छोड़ना । चीत । सतगुरु सब्द बिसारिया, आदि अंत का मीत ।—कबीर सा० सं०, पृ० ६२ ।

चीत (२)पु
संज्ञा पुं० [सं० चित्रा] चित्रा नक्षत्र । उ०—तोही देखे पिउ पलुहै काया । उतरा चीत बहुरि करु माया ।—जायसी (शब्द०) ।

चीत (३)
संज्ञा पुं० [सं०] सीसा नामक धातु ।

चीतकार (१)पु †
संज्ञा पुं० [सं० चीत्कार] दे० 'चीत्कार' ।

चातकार (२)पु
संज्ञा पुं० [सं० चित्रकार] दे० 'चित्रकार' ।

चीतना (१)
क्रि० स० [सं० चेत] [वि० चीता] १. सोचना । विचा- रना । भावना करना । २. चैतन्य होना । होश में आना । ३. स्मरण करना । याद करना ।

चीतना
क्रि० स० [सं० चित्र] चित्रित करना । तसवीर या बेल बूटे बनाना । उ०—द्वार बुहारत फिरत अष्ट सिधि । कौरेन साथिया चीतत नव निधि ।—सूर (शब्द०) ।

चीतर † (१)
संज्ञा पुं० [हिं० चीतल] दे० 'चीतल' ।

चीतर † (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० चित्र] एक प्रकार का साँप जो छोटे आकार का, लगभग एक हाथ लंबा, होता है और जिसकी पूँछ की मोटाई बराबर होती है ।

चीतल
संज्ञा पुं० [सं० चित्ती (= लंबी धारी या दाग)] १. एक प्रकार का हिरन जिसके शरीर पर सफेद रंग की चित्तियाँ या बुँदकियाँ होती हैं । विशेष—यह मझोले कद का होता है और सारे भारत में प्रायः जल के किनारे झुंडों में पाया जाता है । इसके अयाल नहीं होती है । इसकी मादा गर्भ धारण के आठ महीने बाद बच्चा देती है । २. अजगर की जाती का पर उससे छोटा एक प्रकार का साँप । विशेष—इसके शरीर पर छोटी छोटी चित्तियाँ होती हैं । इसके आगे का भाग पतला और मध्य का बहुत भारी होता है । यह खरगोश, बिल्ली या बकरे के छोटे बच्चों को निगल जाता है । ३. एक प्रकार का सिक्का ।

चीता (१)
संज्ञा पुं० [सं० चित्रक] १. बिल्ली की जाति का एक प्रकार का बहुत बडा़ हिंसक पशु । विशेष—यह प्रायः दक्षिणी एशिया और विशेषतः भारत के जंगलो में पाया जाता है । यह आकार में बाघ से छोटा होता है और इसकी गरदन पर अयाल नहीं होती । इसकी कमर बहुत पतली होती है और इसके शरीर पर लंबी, काली और पीली धारियाँ होती हैं जो देखने में बहुत सुंदर होती हैं । यह बहुत तेजी से चौकडी़ भरता है और इसी प्रकार प्रायः हिरनों को पकड़ लेता है । यह साधारणतः बहुत हिंसक होता है और प्रायः पेट भरे रहने पर भी शिकार करता है । संध्या समय यह जलाशयों के किनारे छिपा रहता है और पानी पीनेवाले जानवरों को उठा ले जाता है । चीता मनुष्यों पर जल्दी आक्रमण नहीं करता; पर एकबार जब इसका मुँह में आदमीका खून लग जाता है, तो फिर वह प्रायः गावों में उसी के लिये घुस जाता है और मनु्ष्यों के बालकों को उठा ले जाता है । यह पेड़ पर नहीं चढ़ सकता, पर पानी में बहुत तेजी से तैर सकता है । इसकी मादा एक बार में ३-४ तक बच्चे देती है । भारत में इसका शिकार किया जाता है । कहीं कहीं बडे़ आदमी इसे दूसरे जानवरों का शिकार करने के लिये भी पालते हैं । इसका बच्चा पकड़कर पाला भी जा सकता है । २. एक प्रकार का बहुत बडा़ क्षुप जिसकी पत्तियाँ जामुन की पत्तियों से मिलती जुलती होती हैं । विशेष—इसकी कई जातियाँ है जिनमें अलग अलग सफेद, लाल, काले या पीले फूल लगते हैं । पर सफेद फूलवाले चीते के सिवा और रंग के फूलवाले चीते बहुत कम देखने में आते हैं । इसके फूल बहुत सुगंधित और जूही के फूलों से मिलते जुलते होते हैं और गुच्छों में लगते हैं । इसकी छाल और जड़ ओषधि के काम में आती है । यह बहुत पाचक होता है । वैद्यक में इसे चरपरा हलका, अग्निदीपक, भूख बढा़नेवाला, रूखा, गरम और संग्रहणी, कोढ़, सूजन, बवासीर, खाँसी और यकृत् दोष आदि को दूर करनेवाला तथा त्रिदोषनाशक माना है । कहते हैं, लाल फूलेवाले चीते की जड़ के सेवन से स्थूल हो जाता है और काले फूल के चीते की जड़ के सेवन से बाल काले हो जाते हैं । पर्या०—चित्रक । अनल । वह्नि । विभाकर । शिखावान् । शुष्मा । पावक । दारण । शंबर । शिखी । हुतभुक् । पाची । इसके अतिरिक्त अग्नि के प्रायः सभी पर्याय इसके लिये व्यवहृत होते हैं ।

चीता (२) †
संज्ञा पुं० [सं० चित्त] चित्त । हृदय । दिल । उ०—अति अनंद गति इंद्री जीता । जाको हरि बिन कबहुँ न चीता ।— तुलसी ग्रं० पृ० १० ।

चीता (३)
संज्ञा पुं० [सं०चेत] संज्ञा । होश हवास । उ०—तिन को कहा परेखो कीजे कुबजा के मीता को । चढ़ि चढ़ि सेज सातहुँ सिंधू बिसरी जो चीता को ।—सूर (शब्द०) ।

चीता (४)
वि० [हिं० चेतना या चीतना] [वि० स्त्री० चीती] सोचा हुआ । विचारा हुआ । जैसे,—अब तो तुम्हारा चीता हुआ । यौ०—मनचीता । मनचीती ।

चीतावती पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० चेत्] यादगार । स्मारक चिह्न ।

चीतार पु
संज्ञा पुं० [सं० चित्रकार, प्रा० चित्त + आर(प्रत्य०)] चितेरा । वह व्यक्ति जो चित्र बनाता हो । उ०—षोडस गज उरद्ध, राज ऊभौ गवष्ष तस । संझ समय चीतार, पत्र कीनौ पैसकस ।—पृ० रा०, ३ ।५६ ।

चीतारना (१)
क्रि० स० [हिं० चीता] याद करना । उ०—चीतारंती चुगतियाँ कुंझी रोवहियाँह । दूराहुंता तउ पलइ जऊ न मेल्ह हियाँह ।—ढोला०, दू० २०३ ।

चीतारना (२)
क्रि० स० [सं० चित्रण] चित्रित करना । उच्चारण करना । वर्णन करना । उ०—ओअंकार बीरज संसारे । ओअंकार गुरमुख चीतारै ।—प्रा० पृ० २ ।

चीति पु
संज्ञा पुं० [सं० चित्र] दे० 'चित्र' ।

चीतोड †
संज्ञा पुं० [हिं० चितौर] दे० 'चित्तौर' । उ०— पाई कंकण सिर बंधीयो मोड । प्रथम पयाणउँ दूरग चीतोड ।— वी० रासो, पृ० १२ ।

चीत्कार
संज्ञा पुं० [ सं०] चिल्लाहट । हल्ला । शोर । गुल । चिल्लाने का शब्द ।

चीथडा
संज्ञा पुं० [हिं० चीथना] फटे पुराने कपडे का छोटा रद्दी टुकडा । क्रि० प्र०—जोडना ।—पहनना ।—बनना ।—होना । मुहा०—चीथडा लपेटना = फटा पुराना और रद्दी कपडा पहनना । चीथडों लगना = बहुत दरिद्र होना । इतना दरिद्र होना कि पहनने को केवल चीथडे ही मिलें ।

चीथना
क्रि० स० [सं० चीर्ण] टुकडें टुकडें करना । चोंथना । फाडना (विशेषतः कपडे के लिये) ।

चीथरा
संज्ञा पुं० [हिं० चीथडा] दे० 'चीथडा' ।

चीदह्
वि० [फा० चीदह या चिद?] चुना हुआ । छाँटा हुआ (क्व०) ।

चीदा
वि० [फा० चीदह् ] दे० 'चीदह्' ।

चीन
संज्ञा पुं० [सं०] १. झंडी । पताका । २. सीसा नामक धातु । नाग । ३. तागा । सूत । ४. एक प्रकार का रेशमी कपडा । ५. एक प्रकार का हिरन । ६. एक प्रकार की ईख । ७. एक प्रकार का साँवाँ अन्न । दे० वि० 'चेना' । ८. एक प्रसिद्ध पहाडी देश जो एशिया के दक्षिण—पूर्व में है । इसकी राजधानी पेकिंग है । विशेष— यहाँ के अधिकांश निवासी प्रायः बोद्ध हैं । चीन के निवासी अपनी भाषा में अपने देश को 'चंगक्यूह' कहते हैं । कदाचित् इसीलिये भारत तथा फारस के प्राचीन निवासियों ने इस देश का नाम अपने यहाँ 'चीन' रख लिया था । चीन देश का उल्लेख महाभारत, मनुस्मृति, ललितविस्तार आदि ग्रंथों में बराबर मिलता है । यहाँ के रेशमी कपडे भारत में चीनांशुक नाम से इतने प्रसिद्ध थे कि रेशमी कपडे का नाम ही 'चीनांशुक' पड गया है । चीन में बहुत प्राचीन काल का क्रम- बद्ध इतिहास सुरक्षित है । ईसा से २९५० वर्ष पूर्व तक के राजवंश का पता चलता है । चीन की सभ्यता बहुत प्राचीन है, यहाँ तक कि युरोप की सभ्यता का बहुत कुछ अंश — जैसे, पहनावा, बैठने और खाने पीने आदि का ढंग, पुस्तक छापने की कला आदि — चीन से लिया गया है । यहाँ ईसा के २१७ वर्ष पूर्व से बौद्ध धर्म का संचार हो गया था पर ईसवीं सन् ६१ में मिंगती राजा के शासनकाल में जब भारतवर्ष से ग्रंथ और मूर्तियाँ गई, लोग बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित होने लगे । सन् ६७ में कश्यप मतंग नामक एक बौद्ध पंडित चीन में गए और उन्होंने ' द्वाचत्वारिंशत् सूत्र ' का चीनी भाषा में अनुवाद किया । तबसे बराबर चीन में बौद्ध धर्म का प्रचार बढता गया । चीन से झंड के झुंड यात्री विद्याध्ययन के लिये भारत वर्ष में आते थे । चीन में अबतक ऐसे कई स्तूप पाए जाते हैं जिनके विषय में चीनियों का कथन है कि वे सम्राट अशोक के बनवाए हैं ।यौ०— चीन की दीवार = एक प्रसिद्ध दीवार जिसे ईसा से प्रायः दो सौ वर्ष पूर्व एक चीनी सम्राट ने उत्तरीय जातियों के आक्रमण से अपने देश की रक्षा करने के लिये बनवाया था । यह दीवार प्रायः १५०० मील लंबी है औऱ बहुत ऊँची, चौडी और दृढ बनी है । इसका कुछ अंश मंगोलिया और चीन देश की विभाजक सीमा है । इसकी गणना संसार के सात सबसे अधिक आश्चर्यजनक पदार्थों (सप्ताश्चर्य) में की जाती है । मुहा०— चीन का, या चीनी का बरतन या खिलौना आदि = दे० चीनी 'मिट्टी' । ९. उक्त देश का निवासी ।

चीन (२) †
संज्ञा पुं० [हिं० चीन्ह]दे० 'चिन्ह' ।

चीन (३) †
संज्ञा पुं० [सं० चयन] दे० 'चुनन' ।

चीनक
संज्ञा पुं० [सं०] १. चेना नामक अन्न । २. कँगनी नामक अन्न । ३. चीनी कपूर ।

चीनकर्पूर
संज्ञा पुं० [सं०] चीनी कपूर ।

चीनज
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का इस्पात लोहा जो चीन से आता है ।

चीनना †
क्रि० स० [हिं० चीन्हना] दे० 'चीह्नना' । उ०— द्वादश धनुष द्वादशै विष्का मनमोहन षट चिबुक चिन्ह चित चीन ।—सूर (शब्द०) ।

चीनपिष्ट
संज्ञा पुं० [सं०] १. सिंदूर । सेंदूर । २. इस्पात लोहा ।

चीनवंग
संज्ञा पुं० [सं०] सीसा नामक धातु ।

चीनांशुक
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार की लाल बनात जो पहले चीन से आती थी । २. चीन से आनेवाला एक प्रकार का कपडा । ३. रेशमी वस्त्र । उ०—शुचिते, पहनाकर चीनांशुक रख सका न तुझे अतः दधि मुख ।—अपरा, पृ० १६९ ।

चीना (१)
संज्ञा पुं० [हिं० चीन] १. चीन देशवासी । २. एक तरह का साँवाँ । वि० दे० 'चेना' । ३. चीन देश का एक सुकुमार वृक्ष । उ०— मृदुलता सिरिस मुकुल सुकुमार, विपुल पुलकावलि चीना डाल ।—गुंजन, पृ० ५० ।

चीना (२)
वि० चीन देश संबंधी । चीन देश का । जैसे,— चीना बादाम ।

चीना (३)
संज्ञा पुं० [सं० चिन्ह] एक प्रकार का सफेद कबूतर जिसके शरीर पर लाल या काली चित्तियाँ होती है ।

चीना (४)
संज्ञा पुं० [सं० चीनाक] चीनी कपूर ।

चीनाक
संज्ञा पुं० [सं०] चीनी कपूर ।

चीना ककडी
संज्ञा स्त्री० [सं० चीना+कर्कटी] एक प्रकार की छोटी ककडी । विशेष— वैद्यक में इसे शीतल, मधुर, रुचिकारक, भारी, वात- वर्द्धक, पित्तरोग नाशक और दाह, शोथ आदि को हरनेवाली कहा है ।

चीनाचंदन
संज्ञा पुं० [हिं० चीना+चंदन] एक प्रकार का पक्षी जो दक्षिण भारत में पाया जाता है । विशेष— इसके पीले शरीर पर काली धारियाँ होती है और इसका स्वर मनोहर होता है । मधुरभाषी होने के कारण यह पाला जाता है ।

चीनाबादाम
संज्ञा पुं० [हिं० चीन+फा० बादाम] मूँगफली ।

चीनिया
वि० [देश०] चीन देश का । चीन देश संबंधी । यौ०—चीनिया केला = एक प्रकार का दोशी केला । वि० दे० 'चीनी चंपा' । ' चीनिया बादाम' ।

चीनी (१)
संज्ञा स्त्री० [ हिं० चीन(देश) + ई (प्रत्य०)सं० अथवा सिता] या दानेदार सफेद रंग का एक प्रसिद्ध मीठा पदार्थ जो चूर्ण रुप में होता है औऱ ईख के रस, चुकंदर, खजूर आदि पदार्थों से बनाया जाता है । विशेष—चीनी का व्यवहार प्रायःमिठाईयाँ बनाने और पीने के दूध या पानी आदि को मिठा करने के लिये होता है । तरल पदार्थ में यह बहुत सरलता से घुल जाती है । भारतवर्ष में चीनी केबल ईख के रस से ही उसके बार बार उबाल और साफ करके बनाई जाती है । पर संसार के अन्य भागों में यह और भी बहुत से पौधों के मीठे रस और विशेषतः चुकंदर के रस से बनाई जाती है । जिस देशी चीनी में मैल अधिक हो उसे 'कच्ची चीनी' और जिसमें मैल कम हो उसे पक्की चिनी कहते हैं । अब भारतवर्ष में दानेदार चीनी (जिसे प्रारंभ में लोग विलायती कहा करते थे क्योंकि पहले ऐसी चीनी विदेश से ही आती थी) भी तैयार होने लगी है । प्रारंभ में लोग इसका प्रयोग अधार्मिक समझते थे परंतु अब इसका प्रयोग बिना किसी हिचक के होता है । चीनी की खपत भारतवर्ष में अपेक्षाकृत अधिक होती है । खाँड, राब, गुड आदि इसी के पूर्ण और अपरिष्कृत रुप है । प्राचिन भारतीयों ने इनकी गणना मंगलद्रव्यों में की बै । सुश्रुत के अनुसार ईख का रस उबालकर बनाए हुए पदार्थ ज्यों ज्यों साफ होकर राब, गुड, चीनी, मिस्री आदि बनते हैं, त्यों त्यों वे उत्तरोत्तर शीतल, स्निग्ध, भारी, मधुर और तृष्णा शांत करनेवाले होते जाते हैं ।

चीनी (२)
वि० चीन देश संबंधी । चीन देश का । जैसे, चीनी मिट्टी, कबाब चीनी, चीनी भाषा ।

चीनी (३)
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का छोटा पौधा जो पंजाब और पश्चिम हिमालय में पाया जाता है । इसकी पत्तियाँ प्रायः चारे के काम में आती हैं ।

चीनी कपुर
संज्ञा पुं० [हिं० चीनी+सं० कपूर] एक प्रकार का कपूर ।

चीनी कबाब
संज्ञा पुं० [हिं० चीनी+कबाब]दे० 'कबाब चीनी' ।

चीनी चंपा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का बहुत उत्तम केला जो आकार में छोटा होता है । इसी को 'चीनिया केला' चीनिया केला भी कहते हैं ।

चीनीदानी
संज्ञा स्त्री० [हिं० चीनी+फा० दान+ई (प्रत्य०)] वह पात्र जिसमें चीनी रखी जाती है । उ०—चीनी के लिये चीनीदानी आगे कर दी ।—वो दुनिया, पृ० २२ ।

चीनी मिट्टी
संज्ञा स्त्री० [हिं० चीनी (वि०)+मिट्टी] एक प्रकार की मिट्टी जो पहले पहल चीन के किंग वि० चिन् नामक पहाडसे निकली थी ओर अब अन्य देशों में भी कहीं कहीं पाई जाती है । विशेष—इसके ऊपर पुलिस बहुत अच्छी होती है और इससे तरह तरह के खिलौने, गुलदान और छोटे बडे बरतन बनाए जाते हैं जो 'चीन के' या 'चीनी क,' कहलाते हैं । आजकल इस प्रकार की मिट्टी मध्यप्रदेश तथा बंगाल के कुछ जिलों में भी पाई जाती है ।

चीनी मोर
संज्ञा पुं० [हिं० चीनी+मोर] सोहन चिडिया की जाति का एक पक्षी । विशेष—यह पक्षी संयुक्त प्रांत, बंगाल और आसाम में अधिकता से होता है । इसका माँस बहुत स्वादिष्ट होता है, इसलिये शिकारी प्रायः इसका शिकार करते हैं ।

चीन्ह †
संज्ञा पुं० [सं० चिह्न] दे० 'चिह्न' ।

चीन्हना
क्रि० स० [हिं० चीन्ह से नामिक धातु] पहचानना । यौ०—चीन्हा परिचय = जान पहचान ।

चीन्हा (१)
संज्ञा पुं० [सं० चिह्न] १. दे० 'चिह्न' । २. परिचय ।

चीप (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. चार अंगुल की एक लकडी जो जूते के कलबूत में सबसे पीछे भरी या चढाई जाती है (चमारों की परि०) । २. जमीन में से निकली हुई मिट्टी का वह अंश जो एक बार फावडा चलाने से खुदकर निकल आए । ३. दे० 'चेप' ।

चीप (२)
संज्ञा पुं० १. वृक्ष, पेड । २. मुर्दा जलाने के लिये एकत्र लकडियों का ढेर । उ०—तब आयस नरपति कियौ कोय न बालै दीप । आज्ञा भंग जो को करै, ताहि बँधाऊ चीप ।—पृ० रा०, २३ । २५ पृ० ६७८ ।

चीप (३)
वि० [अ०] सस्ता । कम दाम का ।

चीपड
संज्ञा पुं० [हिं० कीचड] वह सफेद लसदार पदार्थ जो आँख के कोनों से निकलता है । आँख का कीचड ।

चीपी पु
संज्ञा स्त्री० [देश०] दरियाई नारियल का कमंडल । उ०—चित्त चीपी ज्ञान डीबी ध्यान ईधन लावन ।—पलटू० भा०३, पृ० ६६ ।

चीफ (१)
संज्ञा पुं० [अं० चीफ] बडा सरदार या राजा, विशेषतः किसी जाति या प्रांत का अधिकारप्राप्त प्रधान । यौ०—रूलिंग चीफ = (भारतवर्ष में स्वतंत्रता के पूर्व का) वह राजा जिसे अपने राज्य के आंतरिक कार्यों के संबंध में पूर्ण अधिकार होता था । चीफ एक्जिक्यूटिव अफसर = मुख्य प्रबंध अधिकारी । उ०— अभी हिमाचल सरकार ने अस्थायी तौर से रियासत को सँभालने के लिये मुख्य प्रबंधाधिकारी चीफ एक्जिक्यूटिव अफसर भेजा है ।—किन्नर०, पृ० ७ ।

चीफ (२)
वि० प्रधान । श्रेष्ठ । मुख्य । बडा । कैसे, चीफ एडीटर = प्रधान संपादक ।

चीफ कमिश्नर
संज्ञा पुं० [अं० चीफ कमिश्नर] १. वह प्रधान अधिकारी जिसको किसी कार्य को करने का अधिकारपत्र मिला हो । २. किसी छोटे प्रदेश का प्रधान अधिकारी । विशेष—स्वतंत्रता के पूर्व चिफ कमिश्नर का पद लेफ्टिनेंट गवर्नर (छोटे लाट) के पद से कुछ छोटा समझा जाता था और उसके अधिकार में स्वतंत्र प्रांत होता था । इसकी नियुक्ति स्वयं गवर्नर जनरल इन कौंसिल के द्वारा होती थी और वह गवर्नर जनरल का विशिष्ट अधिकारप्राप्त प्रतिनिधि होता था । सीमांप्रांत तथा मध्यप्रदेश आदि प्रांत चीफ कमिश्नर के अधीन थे ।

चीफ कोर्ट
संज्ञा पुं० [अं० चीफ कोर्ट] ब्रिटिश व्यवस्था के अनुसार किसी छोटे प्रांत के प्रधान न्यायालय । विशेष—भारतवर्ष के पंजाब, अवध तथा दक्षिणी बरमा की सबसे बडी अदालत 'चीफकोर्ट' कहलाती थी । इसके चीफ जज और जजों की नियुक्ति गवर्नर जेनरल इन कौंसील द्वारा होती थी ।

चीफ जज
संज्ञा पुं० [अं० चीफ+जज] हाई कोर्ट के जजों में प्रधान । हाईकोर्ट का प्रधान जज ।

चीफ जस्टिस
संज्ञा पुं० [अं० चीफ+जस्टिस] हाई कोर्ट का प्रधान जज ।

चीफ मिनिस्टर
संज्ञा पुं० [अं० चीफ+मिनिस्टर] प्रांतीय विधान सभा के बहुमत दल का नेता । मुख्यमंत्री ।

चीमड (१)
वि० [हिं० चमडा] जो खींचने, मोडने या झुकाने आदि से न फटे या न टूटे । जैसे,—चीमड कपडा, चीमड कागज, चीमड लकडी आदि । विशेष—यह विशेषण केवल उन्ही पदार्थों के लिये व्यवहृत होता है, जो खींचने से बढ या मोडने अथवा झुकाने से टूट सकते हैं ।

चीमड (२)
संज्ञा पुं० [फा० चश्मक] अमलतास की जाति का, पर बहुत छोटा एक प्रकार का पौधा । विशेष—इसके बीज दस्तावर होते हैं; और आँख आने पर पीसकर आँखों में डाले जाते हैं । इसे चाकसू या बनार भी कहते हैं ।

चीमर †
संज्ञा पुं०, वि० [हिं० चीमड] दे० 'चीमड' ।

चीयाँ †
संज्ञा पुं० [हिं० चियाँ] दे० 'चियाँ' ।

चीर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वस्त्र । कपडा । उ०— (क) प्रातकाल असनान करन को यमुना गोपि सिधारी । लै कै चीर कदंब चढै हरि बिनवत हैं ब्रजनारी ।—सूर (शब्द०) । (ख) कीर के कागज ज्यौं नृप चीर विभूषन, उप्पम अंगनि पाई ।— तुलसी ग्रं०, पृ० १६१ । २. वृक्ष की छाल । ३. पुराने कपडे का टुकडा । चिथडा । लता । ४. गौ का थन । ५. चार लडियों वाली मोतियों की माला । ६. मुनियों, विशेषतः बौद्ध भिक्षुओं के पहनने की कपडा । ७. एक ब़डा पक्षी जो प्रायः तीन फुट लंबा होता है और जिसका शिकार किया जाता है । विशेष—यह कुमाऊँ, गढवाल तथा अन्य पहाडी जिलों में पाया जाता है । इसकी दुम बहुत लंबी और खूबसूरत होती है । यह 'चीर चीर ' का शब्द कहता है, इसी से इसे चीर कहते हैं । ८. धूप का पेड । वि० दे०'चीड' । ९. छप्पर का मँगरा । मथौथ । १०. सीसा नामक धातु ।

चीर (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० चीरना] १. चीरने का भाव या क्रिया ।यौ०—चीर फाड = चीरने या फाडने का भाव या क्रिया । २. चीरकर बनाया हुआ शिगाफ या दरार । क्रि० प्र०—डालना ।—पडना । ३. कुश्ती का एक पेंच । विशेष—यह उस समय किया जाता है जब जोड (विपक्षी) पीछे से कमर पकडे होता है । इसमें दाहिनें हाथ से जोड का दाहिना हाथ और बाएँ से बाँया हाथ पकडकर पहलवान उसके दोनों हाथों को अलग करता हुआ निकल आता है ।

चीरक
संज्ञा पुं० [सं०] लिखित प्रमाणों के दो भेदों में से एक जिसे विकृत लेख कहते हैं ।

चीरचरम पु †
संज्ञा पुं० [सं० चीरचर्म] बाघंबर । मृगचर्म । मृगछाला ।

चीरचोर
संज्ञा पुं० [सं० चीर+चोर] चीर हरण करनेवाले श्रीकृष्ण । उ०— चीरचोर चितचोर और को सरबसु दै अपनायौं ।—घनानंद०, पृ० ४११ ।

चीरना
क्रि० स० [सं० चीर्ण(=चीरा हुआ अथवा; अनुरणानात्मक)] [संज्ञा चीरा] किसी पदार्थ को एक स्थान से दूसरे स्थान तक एक सिधे में यों ही अथवा किसी धारदार या दूसरी चीज से धँसा या फाडकर खंड या फाँक करना । विदीर्ण करना । फाडना । जैसे,—आरी से लकडी चीरना, नश्तर से घाव चीरना, नाव की पानी चीरना, दोनों हाथों से भीड चीरना आदि । यौ०—चीर ना फाडना । मुहा०—माल (या रुपया आदि) चीरना = किसी प्रकार, विशेषतः कुछ अनुचित रुप से, बहुत धन कमाना ।

चीरनिवसन
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुराणानुसार एक देश का नाम जो कूर्म विभाग के ईशान कोण में बतलाया जाता है । २.उक्त देश का निकासी ।

चीरपत्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] चेंच नाम का साग ।

चीरपरिग्रह
वि० संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'चीरवासा' [को०] ।

चीरपर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] साल का पेड ।

चीर फाड
संज्ञा स्त्री० [हिं० चीर+फाड] १. चीरने फाडने का काम । २. चीरने फाडने का भाव ।

चीरल्लि (१)
संज्ञा पुं० [सं०] सुश्रुत के अनुसार एक मत्स्य ।

चीरवासा (१)
संज्ञा पुं० [सं० चीर वासस्] १. शिव । महादेव । २. यक्ष ।

चीरवासा (२)
वि० १. छाल या वल्कल पहननेवाला । २. चिथडे पहननेवाला [को०] ।

चीरहरण
संज्ञा पुं० [सं०] श्रीकृष्ण की एक लीला जिसमें वे गोपियों का वस्त्र लेकर उस समय वृक्ष पर चढ गए थे, जब वे नंगी होकर यमुना में स्नान कर रही थी ।

चीरा
संज्ञा पुं० [हिं० चीरना] १. एक प्रकार की लहरिएदार रंगीन कपडा जो पगडी बनाने के काम में आता है । क्रि० प्र०—बाँधना ।—बनाना । यौ०—चीराबंद । २. गाँव की सीमा पर गाडा हुआ पत्थर या खंभा आदि । ३. चीरकर बनाया हुआ क्षत या घाव । क्रि० प्र०—देना ।—मिलना ।—लगाना । मुहा०—चीरा उतारना या तोडना = (किसी पुरूष का स्त्री के साथ) प्रथम समागम करना । कुमारी का कौमार्य नष्ट करना । यौ०—चीराबंद ।

चीराबंद (१)
संज्ञा पुं० [हिं० चीरा = कपडा+फा० बंद] चीरा बाँधनेवाला । वह जो लोगों के लिये चीरे बाँधकर तैयार करता है ।

चीराबंद (२)
वि० स्त्री० [हिं० चीरा (क्षत)+फा० बंद] जिसने पुरूष के साथ समागम न किया हो । कुमारी (बाजारू) ।

चीराबंदी
संज्ञा स्त्री० [हिं० चीरा (=पगडी का कपडा)+फा० बदी] एक प्रकार की बुनावट जो पगडी बनाने के लिये ताश के कपडे पर कारचोबी के साथ की जाती है । इस बुनावट की पगडी कुछ जातियों में विवाह के समय वर को पहनाई जाती है ।

चीरि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आँख पर बाँधी जोनेवाली पट्टी । २. धोती, साडी आदि की लाँग । ३. झींगुर [को०] ।

चीरिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] झिंगुर । झिल्ली ।

चिरिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] बदरीनारायण के निकट की एक प्राचीन नदी का नाम । विशेष—जिसके पास वैवस्वतु मनु ने तपस्या की थी । इसका नाम महाभारत में आया है ।

चीरितच्छया
संज्ञा स्त्री० [सं०] पालक का साग ।

चीरी † (१)
संज्ञा पुं० [सं० चीरिन्] १. झीगुर । झिल्ली । २. एक प्रकार की छोटी मछली ।

चीरी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिडी या चिडिया] चिडिया । पक्षी । उ०—सासति सहत दास कीजे पेखि परिहास चीरी को मरन खेलु बालकनि को सो है ।—तुलसी (शब्द०) ।

चीरी (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं० चीड या चीढ] दे० 'चीढ' ।

चीरी (४) †
संज्ञा स्त्री० [हिं० चिट या चिट्ठी] चिट्ठी । उ०—सात बरस पेहलो रहयो चीरी जगह न मोकल्यो कोई ।—वी० रासो, पृ० ४४ ।

चीरीवाक
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का कीडा । मनु के मत से नमक चुरानेवाला मनुष्य दूसरे जन्म में इसी योनि में जन्म लेता है ।

चीरू पु
संज्ञा पुं० [सं० चीर]दे० 'चीर' ।

चीरूक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का फल जिसे वैद्यक में रूचिकर, दाहजनक और कफ-पित-वर्धक माना है ।

चीरूका
संज्ञा स्त्री० [सं०] झींगुर [को०] ।

चीरू †
संज्ञा पुं० [सं० चीर] लाल रंग का चीर जो विदेश सो आता है ।

चीर्ण
वि० [सं०] फटा हुआ । चीरा या चीरा हुआ ।

चीर्णपण
संज्ञा पुं० [सं०] १. नीम का पेड । २. खजुर का पेड ।

चील
संज्ञा स्त्री० [सं० चिल्ल] गिद्ध और बाज आदि की जाति की पर उनसे कुछ दुर्बल एक प्रसिद्ध चिडिया ।विशेष—यह संसार के प्रायः सभी गरम देशों में पाई जाती है, और कई प्रकार के रंगों की होती है । बहुत तेज उडती है और आसमान में बहुत ऊँचाई पर प्रायः बिना पर हिलाए चक्कर लगाया करती है । यह कीडे मकोडे, चूहे, मछलियाँ, गिरगिट और छोटे छोटे पक्षी खाती है । यह अपने शिकार को देखकर तिरछे उतरती है और बिना ठहरे हुए झपट्टा मारकर उसे लेती हुई आकाश की ओर निकल जाती है । बाजारों में मछली और मांस की दूकानों के आसपास प्रायः बहुत सी चीलै बैठी रहती हैं और रास्ता चलते लोगों के हाथों से झपट्टा मारकर खाद्यपदार्थ ले जाती हैं । यह ऊँचे ऊँचे वृक्षों पर अपना घोसला बनाती है और पूस माघ में तीन चार अंडे दाती है । अपने बच्चों को यह दूसरे पक्षियों के बच्चे लाकर खिलाती है । यह बहुत जोर से ची, ची करती है इसी से इसका नाम चिल या चील पडा है । हिंदू लोग अपने मकानों पर इसका बैठना अशुभ समझते हैं और बैठते ही इसे तुरंत उडा दैतै हैं । पर्या०—आतापी । शकुनि । खभ्रांत । कंठनीडक । चिलंतन । यौ० चील झपट्टा = (१) किसी चीज को औचक में झपट्टा मारकर लेने की क्रिया । (२) लडकों के एक खेल जिसमें वे एक दूसरे के सिर पर, उसकी टोपी उतारकर धोल लगाते हैं । मुहा०—चील का मूत = वह चीज जिसका मिलना बहुत कठिन, प्रायः असंभव हो ।

चीलड
संज्ञा पुं० [हिं० चीलर] दे० 'चीलर' ।

चीलमण पु
संज्ञा पुं० [देश०] सर्प की मणि । उ०—चाल करा गज चीलमण निजकर माँहि लियंत । मोताहल मय कुंभरै ऊपर वार दियंत ।—बाँकी० ग्रं०, भा० ३, पृ० ७० ।

चीलर
संज्ञा पुं० [देश०] जूँ की तरह का सफेद रंग का एक छोटा कीडा जो मैले कपडों में पड जाता है । विशेष—दे० 'चिल्लड' । क्रि० प्र०—पडना ।

चीलवा †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० चिलडा नाम का पकवान । विशेष—दे० 'उलटा' ।

चीला
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'चिलडा' या 'चिल्ला' ।

चीलिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] झिल्ली । झींगुर ।

चीलू
संज्ञा पुं० [सं०] आडू की तरह का एक प्रकार का पहाडी मेवा ।

चील्लक
संज्ञा पुं० [सं०] झिल्ली । झींगुर ।

चील्ह
संज्ञा स्त्री० [सं० चिल्ल] दे० 'चील' (पक्षी) ।

चील्हड, चील्हर
संज्ञा पुं० [हिं० चीलर] दे० 'चीलर' ।

चील्हाराव पु
संज्ञा पुं० [हिं० चील्ह+राज] शेषनाग । उलचे चील्हाराव सीस हजारू ढालवा लागा दीगीस ठालवा लागा दिसावा दुझाल ।—रघु० रू०, पृ० २०१ ।

चील्ही †
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का तंत्रोपचार जिसे बालकों के कल्याणर्थ स्त्रियाँ करती हैं । उ०—भनै रघुराज मुख चूमति चरण चापि चील्ही करवाय लोन उतरायो है ।—रघुराज(शब्द०) ।

चीवर
संज्ञा पुं० [सं०] १. योगियों, संन्यासियों या भिक्षुओं का फटा पुराना कपडा । १. बौद्ध संन्यासियों के पहनने के वस्त्र का ऊपरी भाग । विशेष—बौद्ध संन्यासियों के पहनने का वस्त्र दो भागों में होता है । ऊपरी भाग को चीवर और नीचे के बाग की निवास कहते हैं ।

चीवरी
संज्ञा पुं० [सं० चीवरिन्] १. बौद्ध भिक्षुक । २. भिखमंगा ।

चीस (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० टीस] दे० 'टीस' ।

चीस (२)पु †
संज्ञा स्त्री० [गुज०] किलकार । चिटकार । चिचिया- हट । कूक । उ०—धरे गैन सीसं चले । रंबेद रीसं । गदा मुदग- दंत पारंत चीसं ।—पृ० रा०, २ । ९६ ।

चीसका पु
संज्ञा पुं० [हिं० चसका] दे० 'चसका' । उ०— अलग बाँका बडा छुटै ना चीसका जीव के संग जब मुहें लागै ।— पलटू०, भा० २, पृ० ३९ ।

चीसना
क्रि० अ० [हिं० पीस] दे० 'चीखना' ।

चीसाँ पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० चींस] दे० 'चिंघाड' । २. चीखन । घ०—भाग्यो हस्ती चीसाँ मारी, वा मूरति की मैं बलि- हारी ।—कबीर ग्रं०, पृ० २१० ।

चीह †
संज्ञा स्त्री० [फा० चीख] चिल्लाहट । चीत्कार ।