विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/हे

विक्षनरी से
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हेँ पु
क्रि० अ० सत्तार्थक क्रिया 'होना' का वर्तमान रूप है का बहुवचन। दे० 'हैँ'। उ०—चलै जु चपल नयन छबि बढ़े। चंदनि मनहुँ मीन हेँ चढे़।—नंद० ग्रं०, पृ० २३४।

हेँ हेँ
संज्ञा पुं० [अनु०] १. धीरे से हँसने का शब्द। उ०— खीस बाकर केवल हेँ हेँ की हिनहिनाहट।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० २६४। २. दीनतासूचक शब्द। गिड़गिड़ाने का शब्द। मुहा०—हेँ हेँ करना = (१) गिड़गिड़ाना। दीनता दिखाना। (२) खुशामद करना। जी हुजूरी करना।

हेँगा †
संज्ञा पुं० [सं० अभ्यङ्ग (= पोतना)] जुते हुए खेत की मिट्टी बराबर करने का पाटा। मैड़ा। पहटा।

हेँगाना † (१)
कि० अ० [हिं० हेँगा + ना (प्रत्य०)] जुते हुए खेत की मिट्टी को पाटे से बराबर करना।

हेँगाना † (२)
संज्ञा पुं० जुते हुए खेत की मिट्टी को बराबर करने का काम।

हेँवर पु
संज्ञा पुं० [सं० हयवर] दे० 'हैबर'। उ०—फिरि राय आय हेँवर चढयौ पहरत मोजे पगडस्यौ। भवितव्य बात आघात गति इतनी कहि राजन हस्यौ। —पृ० रा०, १।५०९।

हे (१)
अव्य० [सं०] संबोधन शब्द। पुकारने में नाम लेने के पहले कहा जानेवाला शब्द।

हे पु † (२)
क्रि० अ० ब्रज 'हो' (= था) का बहुवचन। थे। उ०— जहँ के सहज विनोद हे मोहन मन के।—प्रेमघन०, भा० १, पृ० ३।

हेउँती
संज्ञा स्त्री० [देश०] देसावरी रूई। (धुनिया)।

हेक †
वि० [सं० एक] दे० 'एक'। उ०—हेक प्राण दुय देह, प्रीत अणरेह परसपर।—रा० रू०, पृ० ३९।

हेकड़
वि० [हिं० हिया + कड़ा] १. हृष्ट पुष्ट। मजबूत। कड़े बदन का। मोटा ताजा। २. जबरदस्त। प्रबल। प्रचंड। बली। ३. अक्खड़। उजड्ड। ४. तौल में पूरा। जो वजन में दबता न हो। जैसे—उसकी तौल हेकड़ है।

हेकड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० हेकड़] १. अधिकार या बल दिखाने कौ क्रिया या भाव। अक्खड़पन। उग्रता। जैसे —हेकड़ी मत दिखाओ, सीधे से बात करो। २. हुड़दंगई। जबरदस्ती। बलात्कार। जैसे,—अपनी हेकड़ी से वह दूसरों की चीजें ले लेता है। मुहा०—हेकड़ी लेना = डींग हाँकना। बढ़ चढ़कर बातें करना। उ०—चुप रह। बड़ी हेकड़ी की लेता है। चल उधर हट। फिसाना०, भा० ३, पृ० २२४।

हेकमत पु †
वि० [सं० एकमत] एक विचार अथवा एक मत का। उ०—तीनों ही देवा तने देवी आदर दीध। सरब सयाणाँ हेकमत कहवत साँचो कीध। —बाँकी० ग्रं०, भाग २, पृ० ११४।

हेकर पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० हेकड़ी] लड़ाई। उ०—चढ़इ तुरंग होइ अनुरागी। कै अहेर कै हेकर लागी।—चित्रा०, पृ० ६।

हेकली पु †
वि० [हिं० हेक] अकेली। उ०—अवही मेली हेकली करही करइ कलाप। कहियउँ लोपाँ सामिकउ सुंदरि लहाँ सराप।—ढोला०, दू० ३२३।

हेक्का
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'हिक्का' [को०]।

हेगल पु †
संज्ञा स्त्री० [अ० हैकल] एक आभूषण। हार। दे० 'हैकल'। उ०—दाउदी के तुर्रां और मुकुट हजारा कौ हेगल हमेल इश्कपेच मन भायो है।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ४३१।

हेच
वि० [फ़ा०] १. तुच्छ। नाचीज। किसी गिनती में नहीं। उ०—नसा सुलफे का और सब हेच।—भस्मावृत०, पृ० २२। २. जिसमें कुछ तत्व न हो। निःसार। पोच। ३. निकम्मा। बेकार। फजूल। उ०—पावै नहीं अध्यातम पेच। मानै बाहिज किरिआ हेच।—अर्ध०, पृ० ५४।

हेचकस
वि० [फ़ा०] अधम। नीच। कमीना [को०]।

हेचपोच (१)
वि० [फ़ा०] १. अदना। तुच्छ। मामूली। २. निकम्मा। बेकार। बेफायदा। व्यर्थ।

हेचपोच (२)
संज्ञा पुं० १. साधारण व्यक्ति। तुच्छ व्यक्ति। २. मामूली चीज। साधारण वस्तु [को०]।

हेचमदानी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] कुछ न जानना। अज्ञता। मूर्खता [को०]।

हेचमर्द
वि० [फ़ा०] दीन। दुखी। (आदमी)।

हेजम
संज्ञा पुं० [फ़ा०] द्बारपाल दरवान। प्रतिहार। उ०—रुकि कविंद हेजम बुल्लिय हँसि। कोन थान बर चलिय कोंन दिसि।—पृ० रा०, ६१।४६६। (ख) सुनत हेत हेजम उडिग दिति चंद बरदाइ।—पृ० रा०, ६१।४७८।

हेजैँ †
संज्ञा पुं० [पुं० हिं० अजौँ, मि० गुज० हजु, कुमा० आजि (= अभी तक)] अभी तक। उ०—जियरा चेति रे, जनि जारै, हेजैँ हरि सौं प्रीति न कीन्ही।—दादू०, पृ० ४७७।

हेट पु
संज्ञा पुं० [हिं० सहेट] संकेतस्थल जहाँ नायक नायिका परस्पर मिलते हैं। सहेट स्थान। उ०—या विधि की अनेक बिधि हेटैँ। छली छैल को पेठै पेटैँ।—घनानंद०, पृ० २९२।

हेठ † (१)
वि० [सं० अधःस्थ, प्रा० अहठ्ट] १. नीचा। जो नीचे हो। २. घटकर। कम।

हेठ पु (२)
क्रि० वि० नीचे। उ०—(क) परे भूमि जिमि नभ ते भूधर। हेठ दाबि कपि भालू निसाचर।—मानस, ६।७०। (ख) पर्वत हेठ अहा देवहरा। रहौं तहाँ निसि जौ एक सरा।— चित्रा०, पृ० २७।

हेठ (३)
संज्ञा पुं० [सं०] १. विघ्न। बाधा। २. क्षति। हानि। ३. आघात। चोट।

हेठा
वि० [हिं० हेठ] १. नीचा। जो नीचे हो। २. प्रतिष्ठा या बड़ाई में घटकर। कम। ३. तुच्छ। नीच।

हेठाई
संज्ञा पुं० [हिं० हेठ] दे० 'हेठापन'। उ०—जिनकी समझ में वाइसराय का हिंदुस्तानी तरह पर सलाम करना बड़े हेठाई और लज्जा की बात थी।—भारतेंदु ग्रं०, भा० ३, पृ० १९१।

हेठापन
संज्ञा पुं० [हिं० हेठ० + पन (प्रत्य०)] तुच्छता। नीचता। क्षुद्रता।

हेठी
संज्ञा स्त्री० [हिं० हेठा] १. प्रतिष्ठा में कमी। मानहानि। गौरव का नाश। हीनता। तौहीनी। क्रि० प्र०—करना।—होना। २. जहाज में पाल का पाया। (लश०)।

हेड (१)
संज्ञा पुं० [सं०] तिरस्कार। उपेक्षा। [को०]।

हेड (२)
संज्ञा पुं० [अं०] १. प्रमुख अधिकारी। ऊँचा अफसर। प्रधान या मुखिया। जैसे—हेडमास्टर। हेड कांस्टेबुल। २. सिर। शीर्ष। ३. सिरनामा। खाता या मद। यौ०—हेडटेल = सिर और दुम। किसी भी सिक्का या अन्य वस्तु का अगला और पिछला हिस्सा।

हेडआफिस
संज्ञा पुं० [अं०] प्रधान कार्यालय।

हेडक्वार्टर
संज्ञा पुं० [अं०] १. वह स्थान या मुकाम जहाँ सेना का या किसी विभाग का प्रधान अधिकारी और उसका कार्यालय रहता हो। जैसे—सेना का हेडक्वार्टर शिमला में है। २. किसी सरकार या अधिकारी का प्रधान स्थान। जैसे—जाड़े में भारत सरकार का हेड्क्वार्टर दिल्ली में रहता है। ३. वह स्थान जहाँ कोई मुख्यतः रहता या कारोबार करता हो। सदर। सदर मुकाम। केंद्र। जैसे,—वे अभी हेडक्वार्टर से लौटे नहीं हैं।

हेडज
संज्ञा पुं० [सं०] १. नाखुशी। नाराजी। अप्रसन्नता। २. कोप। क्रोध [को०]।

हेडमास्टर
संज्ञा पुं० [अं०] किसी विद्यालय का सबसे बड़ा अध्या- पक। प्रधानाध्यापक।

हेडा़
संज्ञा पुं० [देश०] मांस। गोश्त।

हेड़ाउँ पु †
संज्ञा पुं० [देश० तुल० सं० हेडावुक्क (—घोड़ों का सौदागर)] भाड़ा। किराया। उ०—हेड़ाउँ का तुरीयं ज्युँ। तुये दिन दिन हाथ फेरनइ सौ बार।—बी० रासो, पृ० ४६।

हेड़ाऊ पु †
संज्ञा पुं० [देश०] द्रव्य प्राप्त करके यात्रा पर जानेवाला व्यक्ति। दूत। उ०—चीरी लिखी धन आयणइ हाथ। जणह चलायो हेड़ाऊ के साथ।—बी० रासो, पृ० ७४।

हेडाबुक्क, हेडावुक्क
संज्ञा पुं० [सं०] अश्व का व्यापार करनेवाला व्वक्ति। घोड़ों का सौदागर [को०]।

हेडिंग
संज्ञा स्त्री० [अं०] वह शब्द या वाक्य जो विषय के परिचय के लिये किसी समाचार, लेख या प्रबंध के ऊपर दिया जाय। शीर्षक। जैसे,—अखबारों में महत्व के समाचार बड़ी बड़ी हेडिंग देकर छापे जाते हैं।

हेड़ी † (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० लेहँड़ी] चौपायों का समूह जिसे बनजारे बिक्री के लिये लेकर चलते हैं।

हेड़ी (२)
संज्ञा पुं० [हिं० अहेरी] अहेर करनेवाला व्यक्ति। शिकारी। व्याध।

हेत पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० हेतु] कारण। प्रयोजन। दे० 'हेतु'। उ०— कामिनि मुद्रा काम की सकल अर्थ कौ हेत। मूरख याको तजत हैं झूठे फल कौ हेत।—ब्रज० ग्रं०, पृ० ९६।

हेत पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० हित] १. प्रेमसंबंध। अनुराग। प्रीति। प्रेम। उ०—(क) देखौ करनी कमल की (रे) कीन्हौँ रबि सौँ हेत। प्रान तज्यौ प्रेम न तज्यौ (रे) सूख्यौ सलिल समेत।—सूर०, १।३२५। (ख) इहिँ बिधि रहसत बिलसत दंपति हेत हियैँ नहिँ थोरे। सूर उमगि आनंद सुधानिधि मनु बेला फल फोरै। सूर०, १०।७३२। २. श्रद्धाभाव। अनुराग। उ०—जज्ञभाग नहिँ लियौ हेत सौँ रिषिपति पतित बिचारे। भिल्लिनि के फल खाए भाव सौँ खाटे मीठे खारे।—सूर०, १।२५।

हेति (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वज्र। भाला। २. अस्त्र। ३. घाव। जख्म। ४. आघात। चोट। ५. आग की लपट। लौ। ६. सूर्य की किरन। ७. धनुष की टंकार। ८. औजार। यंत्र। ९. ज्योति। प्रकाश। तेज। दीप्ति। १०. अंकुर। अँखुवा।

हेति (२)
संज्ञा पुं० १. प्रथम राक्षस राजा जो मधुमास या चैत्र में सूर्य के रथ पर रहता है। यह प्रहेति का भाई और विद्युत्केश का पिता कहा गया है। (वैदिक)। २. भागवत में वर्णित एक असुर का नाम।

हेती
संज्ञा पुं० [हिं० हेत] १. वह जिससे प्रेम हो। प्रेमी। २. रिश्तेदार। संबंधी।

हेतु (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह बात जिसे ध्यान में रखकर कोई दूसरी बात की जाय। प्रेरक भाव। अभिप्राय। लक्ष्य। उद्देश्य। जैसे,—(क) उसके आने का हेतु क्या है ? (ख) तुम किस हेतु वहाँ जाते हो ? २. वह बात जिसके होने से ही कोई दूसरी बात हो। कारक या उत्पादक विषय। कारण। वजह। सबब। जैसे,—दूध बिगड़ने का हेतु यही है। उ०—(क) कौन हेतु वन बिचरहु स्वामी ? —तुलसी (शब्द०)। (ख) केहि हेतु रानि रिसाति परसत पानि पतिहि निवारई।—तुलसी (शब्द०)। ३. वह व्यक्ति या वस्तु जिसके होने से कोई बात हो। कारक व्यक्ति या वस्तु। उत्पन्न करनेवाला व्यक्ति या वस्तु। उ०—महों सकल अनरथ कर हेतू।—तुलसी (शब्द०)। ४. वह बात जिसके होने से कोई दूसरी बात सिद्ध हो। प्रमाणित करनेवाली बात। ज्ञापक विषय। जैसे,—जो हेतु तुमने दिया, उससे यह सिद्ध नहीं होता। विशेष—न्याय में तर्क के पाँच अवयवों में से 'हेतु' दूसरा अवयव है, जिसका लक्षण है—उदाहरण के साधर्म्य या वैधर्म्य से साध्य के धर्म का साधन। जैसे,—प्रतिज्ञा—यह पर्वत वह्निमान् है। हेतु—क्योंकि वह धूमवान् है। उ०—जो धूमवान् होता है, वह वह्निमान् होता है; जैसे,—रसोईंघर। ५. तर्क। दलील। यौ०—हेतुविद्या, हेतुशास्त्र, हेतुवाद। ६. मूल कारण। (बौद्ध)। विशेष—बौद्ध दर्शन में मूल कारण के 'हेतु' तथा अन्य कारणों को प्रत्यय कहते हैं। ७. बाह्म संसार और उसका विषय। बाह्य जगत् और चेतना (को०)। ८. मूल्य। दाम। अर्घ (को०)। ९. एक अर्थालंकार जिसमें हेतु और हेतुमान् का अभेद से कथन होता है, अर्थात् कारण ही कार्य कह दिया जाता है। जैसे,—घृत ही बल है। उ०—मो संपति जदुपति सदा बिपति बिदारनहार। (शब्द०)। विशेष—ऊपर दिया हुआ लक्षण रुद्रट का है, जिसे साहित्य- दर्पणकार ने भी माना है। कुछ आचार्यों ने किसी चमत्कार- पूर्ण हेतु के कथन को ही 'हेतु' अलंकार माना है और किसी किसी ने उसको काव्यलिंग भी कहा है।

हेतु (२)
संज्ञा पुं० [सं० हित] १. लगाव। प्रेम संबंध। २. प्रेम। प्रीति। अनुराग। उ०—पति हिय हेतु अधिक अनुमानी। बिहँसि उमा बोली प्रिय बानी।—तुलसी (शब्द०)।

हेतुक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. शिव का एक गण। २. एक बुद्ध। ३. कारण। हेतु। ४. तार्किक। तर्कशास्त्री [को०]।

हेतुक (२)
वि० जो कारणभूत हो। जो कारणरूप हो। कारणरूप होनेवाला या उत्पन्न करनेवाला।

हेतुता
संज्ञा स्त्री० [सं०] कारण या हेतु होना। कारणत्व [को०]।

हेतुत्व
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'हेतुता'।

हेतुदुष्ट
वि० [सं०] जो तर्कसंगत न हो। जो अयुक्त हो [को०]।

हेतुदृष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] संदेह। कारण की परीक्षा। अविश्वास। अविश्वस्तता [को०]।

हेतुबलिक
वि० [सं०] जिसकी युक्ति या तर्क पुष्ट हो। जो तर्क प्रबल हो [को०]।

हेतुभेद
संज्ञा पुं० [सं०] बुहत्संहिता के अनुसार ज्योतिष में ग्रहयुद्ध का एक भेद। उ०—मुनियों से आनेवाले क्रमयोग के हेतुभेद आदि चार प्रकार के ग्रहयुद्ध होते हैं।—बृहत्संहिता, पृ० ९७।

हेतुमात्रता
संज्ञा स्त्री० [सं०] सिर्फ बहाना या हीला। हेतु मात्र होना। हेतु का पुष्ट न होना [को०]।

हेतुमान् (१)
वि० [सं० हेतुमत्] [वि० स्त्री० हेतुमती] १. जिसका कुछ हेतु या कारण हो। २. जो तर्फयुक्त हो। तर्कसंगत। ३. आधारयुक्त। जो निराधार न हो (को०)।

हेतुमान् (२)
संज्ञा पुं० वह जिसका कुछ कारण हो। कार्य।

हेतुमाला
संज्ञा स्त्री० [सं०] काव्य में एक अलंकार। दे० 'कारणमाला' -२। उ०—उत्तर उत्तर हेतु जहँ, पूरब पूरब काज। इहौ हेतुमाला कहत कबिजन बुद्धि जहाज।—मति० ग्रं०, पृ० ४१३।

हेतुयुक्त
वि० [सं०] जिसका कुछ कारण या आधार हो। हेतु से युक्त। सहेतुक। सकारण [को०]।

हेतुरहित
वि० [सं०] हेतु से रहित। बिना कारण के। अकारण। अहेतुक। उ०—हेतुरहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी।—मानस, ७।४७।

हेतुरूपक
संज्ञा पुं० [सं०] रूपक अलंकार का एक भेद जो हेतुयुवत होता है।

हेतुलक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] हेतु का लक्षण। हेतु की विशेषता।

हेतुवचन
संज्ञा पुं० [सं०] वह वचन जो हेतु से युक्त हो। हेतुयुक्त बात। तर्कयुक्त कथन।

हेतुवाद
संज्ञा पुं० [सं०] १. सब बातों का हेतु ढूँढ़ना या सबके विषय में तर्क करना। तर्कविद्या। २. कुतर्क। नास्तिकता। उ०—(क) आयु ही विचारिए निहारिए सभा की गति, वेद मरजाद मानौ हेतुवाद हई है।—तुलसी ग्रं०, पृ० ३१३। (ख) राज समाज कुसाज कोटि कटु कल्पत कलुष कुचाल नई है। नीति प्रतीति प्रीति परिमिति पति हेतुवाद हठि हेरि हई है।—तुलसी (शब्द०)।

हेतुवादी
वि० [सं० हेतुवादिन्] [वि० स्त्री० हेतुवादिनी] १. तार्किक। दलील करनेवाला। २. कुतर्कीं। नास्तिक।

हेतुविद्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] तर्कशास्त्र।

हेतुविशेषोक्ति
संज्ञा पुं० [सं०] एक अलंकार जिसमें तर्क द्बारा दो पदार्थों का अंतर बताया जाय।

हेतुव्यत्यय
संज्ञा पुं० [सं०] कारण उलट देना। हेतु का परिवर्तन। उ०—किसी उक्ति के कारण को बदल देना हेतुव्यत्यय है।—संपूर्णानंद अभि० ग्रं०, पृ० २६३।

हेतुशास्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] तर्कशास्त्र। हेतुविद्या।

हेतुशून्य
वि० [सं०] अकारण। जो कारण या हेतु से रहित हो। अहैतुक।

हेतुहानि
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह जिसमें या जिसका तर्क न दिया जाय। हेंतु के कारण का न दिया जाना।

हेतुहिल
संज्ञा पुं० [सं०] एक बहुत बड़ी संख्या। (बौद्ध)।

हेतुहेतुमद्भाव
संज्ञा पुं० [सं०] कार्य-कारण-भाव। कारण और कार्य का संबंध।

हेतुहेतुमद् भूतकाल
संज्ञा पुं० [सं०] व्याकरण में क्रिया के भूतकाल का वह भेद जिसमें ऐसी दो बातों का होना सूचित होता है जिनमें दूसरी पहली पर निर्भर होती है। जैसे,—यदि तुम मुझसे माँगते तो मैं अवश्य देता।

हेतूत्प्रेक्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] अर्थालंकार में उत्प्रेक्षा का एक भेद जिसमें जिस वस्तु का जो हेतु नहीं है उसको उस वस्तु का हेतु मानकर उत्प्रेक्षा करते हैं। विशेष दे० 'उत्प्रेक्षा' -२।

हेतूपक्षेप
संज्ञा पुं० [सं०] कारण को उपस्थित करना। तर्क प्रस्तुत करना [को०]।

हेतूपन्यास
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'हेतूपक्षेप' [को०]।

हेतूपमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह उपमा जो तर्क या हेतु से युक्त हो। विशेष दे० 'उत्प्रेक्षा- २'।

हेत्वपदेश
संज्ञा पुं० [सं०] न्याय में हेतु का अपदेश या निर्देश करना। तर्क में हेतु का उल्लेख करना [को०]।

हेत्वपह्नुति
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह अपह्नुति अलंकार जिसमें प्रकृति के निषेध का कुछ कारण भी दिया जाय। विशेष दे० 'अपह्नुति'।

हेत्ववधारण
संज्ञा पुं० [सं०] हेतु का अवधारण करना या तर्क कारण (नाटक)।

हेत्वाक्षेप
संज्ञा पुं० [सं०] काव्यगत एक अलंकार। वह आक्षेप जो कारण या हेतु के साथ किया जाय।

हेत्वाभास
संज्ञा पुं० [सं०] न्याय में किसी बात को सिद्ध करने के लिये उपस्थित किया हुआ वह कारण जो कारण सा प्रतीत होता हुआ भी ठीक कारण न हो। असत् हेतु। उ०— जब जग हेत्वाभास मात्र है, तब फिर मेरा सपना। क्यों न रहे मेरे जीवन में होकर मेरा अपना।—अपलक, पृ० ३९। विशेष—सव्यभिचार, विरुद्ध, प्रकरणसम, साध्यसम और काला- तीत भेद से हेत्वाभास पाँच प्रकार का कहा गया है—(१) जो हेतु और दूसरी बात भी उसी प्रकार सिद्ध करे अर्थात् ऐकांतिक न हो, वह 'सव्यभिचार' कहलाता है। जैसे,—शब्द नित्य है क्योंकि वह अमूर्त है; जैसे,—परमाणु। यहाँ अमूर्त होना जो भेद दिया गया है, वह बुद्धि का उदाहरण लेनेसे शब्द को अनित्य भी सिद्ध करता है। (२) जो हेतु प्रतिज्ञा के ही विरुद्ध पड़े वह 'विरुद्ध' कहलाता है। जैसे,— घट उत्पत्ति धर्मवाला है, क्योंकि वह नित्य है। (३) जिस हेतु में जिज्ञास्य विषय (प्रश्न) ज्यों का त्यों बना रहता है, वह 'प्रकरणसम' कहलाता है। जैसे,—शब्द अनित्य है; उसमें नित्यता नहीं है। (४) जिस हेतु को साध्य के समान ही सिद्ध करने की आवश्यकता हो, उसे 'साध्यसम' कहते हैं। जैसे,—छाया द्रव्य है क्योंकि उसमें गति है। यहाँ छाया में स्वतः गति है, इसे साबित करने की आवश्यकता है। (५) यदि हेतु ऐसा दिया जाय जो कालक्रम के विचार से साध्य पर न घटे, तो वह 'कालातीत' कहलाता है। जैसे,—शब्द नित्य है, क्योंकि उसकी अभिव्यक्ति संयोग से होती है। जैसे,— घट के रूप की। यहाँ घट का रूप दीपक के संयोग के पहले भी था, पर ढोल का शब्द लकड़ी के संयोग के पहले नहीं था।

हेना
संज्ञा पुं० [अ० हिना] मेंहँदी। मेंधिका। हिनका [को०]।

हेमंत
संज्ञा पुं० [सं० हेमन्त] छह ऋतुओं में से पाँचवीं ऋतु जिसमें अगहन और पूस के महीने पड़ते हैं। जाड़े का मौसिम। शीतकाल।

हेमंतकाल
संज्ञा पुं० [सं० हेमन्तकाल] हेमंत ऋतु। जाड़े का मौसिम।

हेमंतनाथ
संज्ञा पुं० [सं० हेमन्तनाथ] कपित्थ। कैथ।

हेमंतमेघ
संज्ञा पुं० [सं० हेमन्तमेघ] हेमंत ऋतु के मेघ। जाड़े का बादल [को०]।

हेमंतसमय
संज्ञा पुं० [सं० हेमन्तसमय] हेमंत ऋतु। शीतकाल।

हेम (१)
संज्ञा पुं० [सं० हेमन्] १. हिम। पाला। बर्फ। उ०—ऊधो अब यह समुझि भई ‍! नँदनंदन के अंग अंग प्रति उपमा न्याय दई। आनन इंदु बरन संमुख तजि करषे तें न नई। निरमोही नहिं नेह, कुमुदिनी अंतहि हेम हई।—सूर (शब्द०)। २. स्वर्णखंड। सोने का टुकड़ा। ३. सोना। सुवर्ण। स्वर्ण। ४. कपित्थ। कैथ। ५. नागकेसर। ६. एक मासे की तौल। ७. बादामी रंग का घोड़ा। ८. जल। पानी। सलिल [को०]। ९. बुध ग्रह का एक नाम।

हेम (२) पु
संज्ञा पुं० [सं० हेमन् (हिम = बर्फ)] दे० 'हिमालय'। उ०—हेम सेत औ गौर गाजन वंश तिलंग सब लेत। सातौ दीप नवौ खँड जुरे आइ एक खेत।—पदमावत, पृ० ५२४।

हेमकंदल
संज्ञा पुं० [सं० हेमकन्दल] मूँगा।

हेमक
संज्ञा पुं० [सं०] १. हिरण्य। २. सोने का टुकड़ा। हेमखंड। ३. इस नाम का एक राक्षस। ४. एक वन का नाम [को०]।

हेमकक्ष (१)
संज्ञा पुं० [सं०] स्वर्णनिर्मित मेखला।

हेमकक्ष (२)
वि० जिसकी भित्ति स्वर्णिम या स्वर्णयुक्त हो [को०]।

हेमकर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] शिव।

हेमकर (२)
संज्ञा पुं० स्वर्णकार [को०]।

हेमकरक
संज्ञा पुं० [सं०] सोने का कमंडल या करवा। स्वर्णपात्र [को०]।

हेमकर्ता
संज्ञा पुं० [सं० हेमकर्तृ] सुनार। स्वर्णकार [को०]।

हेमकलश
संज्ञा पुं० [सं०] मंदिर या गुंबद पर लगाने का सोने का बना हुआ शिखर या कलश [को०]।

हेमकाति (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० हेमकान्ति] १. बनहलदी। २. आँबा हलदी।

हेमकांति (२)
वि० हेमप्रभ। सोने की तरह दीप्त।

हेमकार
संज्ञा पुं० [सं०] स्वर्णकार। सुनार [को०]।

हेमकारक
संज्ञा पुं० [सं०] सुनार।

हेमकारिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक क्षुप का नाम।

हेमकिंजल्क
संज्ञा पुं० [सं० हेमकिञ्जल्क] नागकेसर का पुष्प [को०]।

हेमकुंट पु
संज्ञा पुं० [सं० हेमकूट] हिमालय के उत्तर का पर्वत। हेमकूट। उ०—हेमकुंट की आहैं दूजा। —प्राण०, पृ० ४७।

हेमकुंभ
संज्ञा पुं० [सं० हेमकुम्भ] सोने का घड़ा। स्वर्णघट [को०]।

हेमकूट
संज्ञा पुं० [सं०] हिमालय के उत्तर का एक पर्वत जो पुराणानुसार किंपुरुष का वर्ष और भारत की सीमा पर स्थित है।

हेमकेतकी
संज्ञा स्त्री० [सं०] केतक वृक्ष जिसके पुष्प पीतवर्ण के होते हैं। स्वर्णक्षीरी [को०]।

हेमकेलि
संज्ञा पुं० [सं०] १. चित्रक नाम का पौधा। २. अग्नि का एक नाम [को०]।

हेमकेश
संज्ञा पुं० [सं०] शिव का एक नाम।

हेमक्षीरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्वर्णक्षीरी जिसका निर्यास या दुग्ध स्वर्ण के वर्ण का होता है [को०]।

हेमखेम †
संज्ञा पुं० [अनु० हेम+सं० क्षेम] १. कुशल प्रश्न। कुशल क्षेम। उ०—पढ़न लगे वाराणसी लिखी आठ दस पाँति। हेमखेम ताके तले समाचार इस भाँति। —अर्ध०, पृ० ४३। २. परस्पर संबंध। लगाव। मैत्री।

हेमगंधिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० हेमगन्धिनी] रेणुका नामक गंधद्रव्य।

हेमगर्भ (१)
संज्ञा पुं० [सं०] वाल्मीकि रामायण में वर्णित उत्तर दिशा का एक पर्वत।

हेमगर्भ (२)
वि० जिसके भीतर स्वर्ण हो। हिरण्यगर्भ [को०]।

हेमगिरि
संज्ञा पुं० [सं०] सुमेरु नाम का एक पर्वत जो सोने का कहा गया है।

हेमगुह
संज्ञा पुं० [सं०] एक नागासुर का नाम (को०)।

हेमगौर
संज्ञा पुं० [सं०] १. किंकिरात वृक्ष। कटसरैया। २. अशोक का वृक्ष (को०)।

हेमगौरांग
वि० [सं० हेमगौराङ्ग] जिसका अंग हेम की दीप्ति से युक्त हो [को०]।

हेमघ्न
संज्ञा पुं० [सं०] सीसा धातु।

हेमघ्नी
संज्ञा स्त्री० [सं०] हलदी।

हेमचंद्र (१)
संज्ञा पुं० [सं० हेमचन्द्र] १. इक्ष्वाकुवंशी एक राजा जो विशाल का पुत्र था। २. एक प्रसिद्ध जैन आचार्य। विशेष—इनका समय ईसवी सन् १०८९ और ११७३ के बीच माना जाता है। ये देवचंद्र सूरि के शिष्य थे और गुजरात के राजा कुमारपाल के गुरु थे। इनका एक नाम हेम सूरि भी था। इन्होंने व्याकरण और कोश के कई ग्रंथ लिखे हैं। जैसे,—अनेकार्थकोश, अभिधानचितामणि, संस्कृत और प्राकृत का व्याकरण, देशी नाममाला, उणदिसुत्रवृत्ति इत्यादि।

हेमचंद्र (२)
वि० (रथ आदि) जो स्वर्णनिर्मित चंद्रमा से भूषित हो [को०]।

हेमचक्र
वि० [सं०] जिसका चक्का या पहिया सोने का हो [को०]।

हेमचूर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] सोने का चूरा। स्वर्णधूलि [को०]।

हेमचूली
वि० [सं० हेमचूलिन्] जिसका शिखर या चूड़ा स्वर्णनिर्मित हो। सोने के शिखरवाला [को०]।

हेमछन्न (१)
वि० [सं०] हेम से ढका हुआ। स्वर्ण से आच्छादित। सोने के आत्छादनवाला।

हेमछन्न (२)
संज्ञा पुं० स्वर्णिम आच्छादन। सोने का आवरण [को०]।

हेमछरी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० हेम+हिं० छड़ी] स्वर्णछड़ी। कनक छड़ी। उ०—अँग अँग प्रेम उमँग अस सोहै। हेमछरी जराय जरि को है। —नंद०, ग्रं०, पृ० १३१।

हेमज
संज्ञा पुं० [सं०] राँगा।

हेमजट
संज्ञा पुं० [सं०] किरातों का एक वर्ग या जाति [को०]।

हेमजीवंती
संज्ञा स्त्री० [सं० हेमजीवन्ती] स्वर्ण जीवंती। पीतवर्ण की जीवंती [को०]।

हेमज्वाल
संज्ञा पुं० [सं०] वह जिसकी ज्वाला स्वर्ण की तरह दीप्त हो। अग्नि [को०]।

हेमतरु
संज्ञा पुं० [सं०] पीत वर्ण का धतूरा।

हेमतार
संज्ञा पुं० [सं०] नीला थोथा। तूतिया।

हेमताल
संज्ञा पुं० [सं०] उत्तराखंड का एक पहाड़ी देश।

हेमतुला
संज्ञा स्त्री० [सं०] तौल में किसी के बराबर सोने का दान। सोने का तुलादान।

हेमदंत
वि० [सं० हेमदन्त] जिसके दाँत सोने से मढ़े हों।

हेमदंता
संज्ञा स्त्री० [सं० हेमदन्ता] हरिवंश पुराण के अनुसार एक अप्सरा।

हेमदीनार
संज्ञा पुं० [सं०] सोने का एक पुराना सिक्का जिसे दीनार कहते थे [को०]।

हेमदुग्ध
संज्ञा पुं० [सं०] गूलर। अमर।

हेमदुग्धक
संज्ञा पुं० [सं०] गूलर [को०]।

हेमदुग्धा
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्वर्णक्षीरी [को०]।

हेमदुग्धी (१)
संज्ञा पुं० [सं० हेमदुग्धिन्] गूलर। उदुंबर [को०]।

हेमदुग्धी (२)
संज्ञा स्त्री० स्वर्णक्षीरी [को०]।

हेमधन्वा
संज्ञा पुं० [सं० हेमधन्वन्] ११ वें मनु के एक पुत्र का नाम।

हेमधान्य
संज्ञा पुं० [सं०] तिल [को०]।

हेमधान्यक
संज्ञा पुं० [सं०] एक तौल जो डेढ़ माशे के बरा- बर होती थी [को०]।

हेमधारण
संज्ञा पुं० [सं०] आठ पल के बराबर सोने की एक तौल [को०]।

हेमनाभि
संज्ञा पुं० [सं०] १. सोने की नाभि, पिंडिका या मध्यवर्ती भाग। २. वह जिसका मध्यवर्ती भाग, नाभि या पिंडिका सोने की हो [को०]।

हेमनेत्र
संज्ञा पुं० [सं०] एक यक्ष का नाम [को०]।

हेमपर्वत
संज्ञा पुं० [सं०] १. सुमेरु पर्वत जो सोने का माना जाता है। २. दान के लिये सोने की राशि। विशेष—यह महादानों में है।

हेमपुष्प
संज्ञा पुं० [सं०] १. सोनजुही। २. गुड़हर। ३. अशोक का वृक्ष [को०]। ४. लोध्र का वृक्ष (को०)। ५. चंपा का वृक्ष या पुष्प। उ०—चंपक चंपक सुरभि पुनि हेमपुष्प सुकुमार। —अनेकार्थ०, पृ० ३१। ६. अशोक पुष्प (को०)। ७. नागकेसर (को०)।

हेमपुष्पक
संज्ञा पुं० [सं०] १. चंपा का वृक्ष या पुष्प। लोध्र का वृक्ष। दे० 'हेमपुष्प' [को०]।

हेमपुष्पिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] सोनजुही। स्वर्णयूथिका [को०]।

हेमपुष्पी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मंजिष्ठा। मजीठ। २. मूसलीकंद। ३. कंटकारी। ४. स्वर्णयुथिका। पीली जूही (को०)। ५. स्वर्ण- पुष्पा। स्वर्णली (को०)। ६. इंद्रवारुणी। इंद्रायण (को०)।

हेमपृष्ठ
वि० [सं०] जो स्वर्ण से मंडित या रंजित हो। सोने का मुल- म्मा किया हुआ (को०)।

हेमप्रतिभ
वि० [सं०] स्वर्णदीप्त। हेमप्रभ।

हेमप्रतिमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सोने की प्रतिमा या मूर्ति।

हेमप्रभ
वि० [सं०] जिसकी कांति या प्रभा सोने की तरह दीप्त हो।

हेमफरद पु
संज्ञा पुं० [सं० हेम+फ़ा० फ़र्द] स्वर्णिम चादर अथवा स्वर्णिम कागज का एक टुकड़ा। उ०—कहै पदमाकर त्यों किधौँ काम कारीगर नुकता दियो है हेमफरद सुहाई मेँ। —पद्माकर ग्रं,० पृ० ३१३।

हेमफला
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार का केला। स्वर्णकदली।

हेमबल
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'हेमवल' [को०]।

हेमभस्त्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सोने की भस्ता अर्थात् थैली [को०]।

हेममय
वि० [सं०] सुनहरा।

हेममाला
संज्ञा स्त्री० [सं०] यम की पत्नी का नाम।

हेममाक्षिक
संज्ञा पुं० [सं०] एक खनिज द्रव्य। सोनामाखी। स्वर्ण- माक्षिक, जिसका प्रयोग ओषधि में भी होता है। इसे उपधातु माना गया है (को०)।

हेममालिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] सोने की माला। सोने की सिकड़ी [को०]।

हेममाली (१)
संज्ञा पुं० [सं० हेममालिन्] १. सूर्य। २. एक राक्षस जो खर का सेनापति था।

हेममाली (२)
वि० १. जो स्वर्णाभूषण से अलंकृत हो। २. जो धारण किए हुए हो। सोने की माला पहननेवाला [को०]।

हेममुद्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सोने का सिक्का [को०]।

हेममृग
संज्ञा पुं० [सं०] सोने का मृग। सोने का हरिण। स्वर्णमृग। विशेष—वाल्मीकि रामायण में इसका वर्णन सीताहरण के प्रसंग में मिलता है। यह मायामृग कहा गया है, जो मारीच नाम का राक्षस था।

हेमयूथिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्वर्णयूथिका। सोनजुही।

हेमरागिणी, हेमरागिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] हरिद्रा। हलदी।

हेमरेण
संज्ञा पुं० [सं०] त्रसरेणु।

हेमलंबँ
संज्ञा पुं० [सं० हेमलम्ब] बृहस्पति के साठ संवत्सरों में से ३१ वाँ संवत्सर। उ०—बृहस्पति की गति के वश से सप्तम (पितृ) युग का प्रथम वर्ष हेमलंब है। —बृहत्०, पृ० ५२।

हेमलंबक
संज्ञा पुं० [सं० हेमलम्बक] दे० 'हेमलंब'।

हेमल
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्वर्णकार। सोनार। २. कषपट्टिका। कसौटी। ३. कृकलास। गिरगिट। ४. गृहगोधिका। छिपकली।

हेमलता
संज्ञा स्त्री० [सं०] सोने के वर्ण की लता। स्वर्णजीवंती [को०]।

हेमवंत पु
संज्ञा पुं० [सं० हेमन्त या हेम+वन्त < वत्] दे० 'हेमंत'। उ०—ससिर बाल तप करहि कमल दझझय सु बदन अलि। हेमवंत बन दहिग दझ्झि जल सुष्ष सुष्ष मिलि। —पृ० रा०, २। ३०७।

हेमवती
वि० [सं० हेमवत्] हेमाभ। स्वर्णिम। सुनहला। उ० — आलोकमयी स्मित चेतनता आई यह हेमवती छाया। तंद्रा के स्वप्न तिरोहित थे बिखरी केवल उजली माया। —कामायनी, पृ० १६९।

हेमवत्
वि० [सं०] स्वर्णाम। सर्णिम। सोने की तरह कांतियुक्त [को०]।

हेमवर्ण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक बुद्ध। २. गरुड़ के एक पुत्र का नाम [को०]।

हेमवर्ण (२)
वि० सोने के सदूश रंगवाला। स्वर्णाभ। स्वर्णिम [को०]।

हेमवल
संज्ञा पुं० [सं०] मोती। मुक्ता। विशेष—इस अर्थ में 'हिमवल' शब्द अधिक उपयुक्त है पर राज- निघंटु आदि में 'हेमबल' या 'हेमवल' ही मान्य है।

हेमव्याकरण
संज्ञा पुं० [सं०] हेमचंद्र द्वारा निर्मित व्याकरण का ग्रंथ। विशेषदे०'हेमचंद्र'।

हेमशंख
संज्ञा पुं० [सं० हेमशङ्ख] विष्णु का एक नाम [को०]।

हेमशिखा
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्वर्णक्षीरी का पौधा।

हेमशीत
संज्ञा पुं० [सं०] स्वर्णक्षीरी (को०)।

हेमशृंग
संज्ञा पुं० [सं० हेमश्रृङ्ग] १. सोने का शृंग या शिखर। सोने की सींग। २. सोने की चोटी से युक्त एक पर्वत। वह पर्वत जिसकी चोटी सोने की हो। सुमेरु या मेरु नाम का पर्वत [को०]।

हेमशैल
संज्ञा पुं० [सं०] एक पर्वत का नाम। (संभवतः मेरु पर्वत) [को०]।

हेमसागर
संज्ञा पुं० [सं०] एक पौधा जो सुंदरता और ओषधि के लिये बगीचों में लगाया जाता है। विशेष—यह पौधा पंजाब के पहाड़ों में आपसे आप उगता है और बगीचों में इसे लगाया भी जाता है। इसे 'जख्म हयात' भी कहते हैं।

हेमसार
संज्ञा पुं० [सं०] नीलाथोथा। तूतिया।

हेमसुता
संज्ञा स्त्री० [सं०] हिमशैलसुता। पार्वती। दुर्गा।

हेमसूत्र
संज्ञा पुं० [सं०] सोने का सूत या तार। एक प्रकार का हार [को०]।

हेमसूत्रक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'हेमसूत्र'।

हेमहस्तिरथ
संज्ञा पुं० [सं०] सोने का हस्तिरथ जो १६ महदानों में विशेष माना गया है। सोने के हस्तिरथ का दान [को०]।

हेमांक
वि० [सं० हेमाङ्क] सोने से भूषित। दे० 'हेमांग' [को०]।

हेमांग (१)
संज्ञा पुं० [सं० हेमाङ्ग] १. चंपा जिसके फूल सुनहले होते हैं। २. सिंह। ३. मेरु पर्वत जो सोने का माना जाता है। ४. ब्रह्मा। ५. विष्णु। ६. गरुड़।

हेमांग (२)
वि० स्वर्णिम। स्वर्णाभ। सुनहला [को०]।

हेमांगद
संज्ञा पुं० [सं० हेमाङ्गद] १. सोने का विजायठ। २. वह जो सोने का विजायठ पहने हो। ३. वसुदेव के एक पुत्र का नाम। ४. एक गंधर्व का नाम [को०]। ५. कलिंग देश के एक राजा का नाम।

हेमांगा
संज्ञा स्त्री० [सं० हेमाङ्गा] एक लता। स्वर्णक्षीरी [को०]।

हेमांड
संज्ञा पुं० [सं० हेमाण्ड] १. पुराणवर्णित हेममय अंड। २. ब्रह्मांड [को०]।

हेमांडक
संज्ञा पुं० [सं० हेमाण्डक] दे० 'हेमांड'।

हेमांबु
संज्ञा पुं० [सं० हेमाम्बु] द्रवीभूत स्वर्ण। सोने का तरल रूप। सोने का पानी [को०]।

हेमांबुज
संज्ञा पुं० [सं० हेमाम्बुज] दे० 'हेमांभोज' [को०]।

हेमांभोज
संज्ञा पुं० [सं० हेमाम्भोज] पीतकमल। स्वर्णाभ कमल पुष्प [को०]।

हेमांगिर पु †
संज्ञा पुं० [सं० हेमगिरि] हिमालय। उ०—सखिएसाहिब आविया, दाँह की हुँती चाइ। हियड़उ हेमाँगिर भयउ तन पंजरे न माइ। —ढोला०, दू० ५२९।

हेमा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. माधवी लता। २. पृथ्वी। ३. सुंदरी स्त्री। ४. एक अप्सरा का नाम जिससे मंदोदरी उत्पन्न हुई थी।

हेमा (२)
संज्ञा पुं० [सं० हेमन्] बुध नामक ग्रह [को०]।

हेमाचल
संज्ञा पुं० [सं०] सुमेरु पर्वत। उ०—हेमाचल उपकंठ एक वट वृष्ष उसंगं। सौ जोजन परिमान साष तस भंजि मतंगं।—पृ० रा०, २७।५।

हेमाढ्य
वि० जो सोने से परिपुर्ण हो। स्वर्ण से पूर्ण।

हेमाद्रि
संज्ञा पुं० [सं०] १. सुमेरु पर्वत। २. एक प्रसिद्ध ग्रंथकार। विशेष—यह ईसा की १३वीं शताब्दी में विद्यमान थे और इन्होंने पाँच खंडों में, जिनके नाम क्रमशः दान, व्रत, तीर्थ, मोक्ष और परिशेष हैं, चतुर्वर्गचिंतामणि नामक एक बड़ा ग्रंथ लिखा है जो अपने विषय का प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है।

हेमाद्रिका
संज्ञा स्त्री० [पुं०] स्वर्णक्षीरी नाम का पौधा।

हेमाद्रिजरण
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्वर्णक्षीरी। हेमाद्रिका [को०]।

हेमाभ
वि० [सं०] स्वर्णिम। सोने की कांतिवाला। सुनहला। हेमवत्। उ०—उस लता कुंज की झिलमिल से हेमाभ रश्मि थी खेल रही। कामायनी, पृ० ७८।

हेमाभा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सुनहरा प्रकाश। स्वर्णिम दीप्ति। सुनहली प्रभा। उ०—उत्तरकूल उदयोन्मुख सूर्य की हेमाभा से रंजित होकर सागर की लहरों में प्रतिफलित हो रहा था।—प्रतिमा, पृ० ९।

हेमाल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] एक राग जो दीपक राग का पुत्र कहा जाता है।

हेमाल पु † (२)
संज्ञा पुं० [सं० हिमालय] हिमालय पर्वत। उ०—ढोला सायधण माँणने झीणी याँ सलियाँह। कइ लाभे हर पूजियाँ, हेमाले गलियाँह। —ढोला० दू० ४७७।

हेमालय
संज्ञा पुं० [सं० हेमालय] वह जो स्वर्ण की कांति से युक्त हो। स्वर्ण का आलय। सोने का गृह। हेमाचल। हेमगिरि। उ०—अरुण अधखुली आँखें मलकर जब तुम उठते हो छविमय। रंगरहित को रंजित करते बना हिमालय हेमालय। वीणा०, पृ० २०।

हेमाह्व
संज्ञा पुं० [सं०] १. पीतवर्ण का धतूरा। कनक। धतूरा। २. वनचंपा [को०]।

हेमाह्वा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पीतवर्ण की जीवंती नाम की एक लता। २. स्वर्णक्षीरी। सत्यानाशी [को०]।

हेमिया
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० हेमियह्] जलाने की लकड़ी। जलावन। ईंधन [को०]।

हेमियानी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] रुपया पैसा रखने की जालीदार लंबी थैली जो कमर में बाँधी जाती है। तोड़ा।

हेम्न
संज्ञा पुं० [सं०] मंगल ग्रह।

हेम्ना
संज्ञा स्त्री० [सं०] संकीर्ण राग का एक भेद।

हेय
वि० [सं०] १. छोड़ने योग्य। न ग्रहण करने योग्य। त्याज्य। २. बुरा। खराब। निकृष्ट। उपादेय का उलटा। ३. जानेवाला। जाने देने योग्य।

हेयता
संज्ञा स्त्री० [सं०] हेय या निकृष्ट होने का भाव। क्षुद्र या निम्न होने की अवस्था।

हेयत्व
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'हेयता'।

हेयदृष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] बुरी निगाह। खराब नजर।

हेरंब
संज्ञा पुं० [सं० हेरम्ब] गणपति। गणेश। २. महिष। भैँसा। ३. नायक के चार प्रकारों में एक। धीरोद्धत नायक। ४. एक बुद्ध का नाम। ५. वज्रदंती वृक्ष। विशेष—यह कफनाशक और वातघ्न कहा गया है। इसकी जड़ वमनकारक होती है। इसका वृक्ष बड़ा होता है और पत्ते बेरी के समान होते हैं। इसकी दतुवन अच्छी होती है।

हेरंबक
संज्ञा पुं० [सं० हेरम्बक] एक जातिविशेष [को०]।

हेरंबजननी
संज्ञा स्त्री० [सं० हेरम्बजननी] गणेश की माता पार्वती का एक नाम [को०]।

हेरंबमंत्र
संज्ञा पुं० [सं० हेरम्बमन्त्र] गणेश की आराधना का एक विशेष मंत्र।

हेरंबमाता
संज्ञा स्त्री० [सं० हेरम्बमातृ] हेरंबजननी। पार्वती।

हेरंबहट्ट
संज्ञा पुं० [सं० हेरम्बहट्ट] एक प्राचीन भूभाग जो दक्षिण में माना गया है [को०]।

हेर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. किरीट। २. हलदी। ३. आसुरी माया।

हेर पु † (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० हेरना] ढूँढ़ना। तलाश। खोज।

हेर (३)
संज्ञा पुं० [हिं० अहेर] आखेट। दे०'अहेर'।

हेरक
संज्ञा पुं० [सं०] १. शिव के एक गण का नाम। २. गूढ़चर। गुप्तचर। भेदिया।दे०'हेरिक' [को०]।

हेरना पु †
क्रि० स० [सं० आखेट, हिं० अहेर] १. ढूँढ़ना। खोजना। तलाश करना। पता लगाना। उ०—लागी सब मिलि हेरै, बूड़ि बुड़ि एक साथ। कोइ उठी मोती लेइ, काहू घोँघा हाथ।— जायसी (शब्द०)। (स) बहु प्रकार गिरि कानन हेरहिं। कोउ पुनि मिलै ताहि सब घेरहिं। —तुलसी (शब्द०)। २. देखना। ताकना। अवलोकन करना। उ०—(क) जड़ चेतन मग जीव घनेरे। जे चितए प्रभु, जिन्ह प्रभु हेरे। ते सब भए परमपद जोगू। —तुलसी (शब्द०)। (ख) अलि ! एकंत पाय पायँन परे हैं आय, हौं न तब हेरी या गुमान बजमारे सोँ। पद्माकर (शब्द०)। (ग) क्यों हँसि हेरि हरय़ो हियरा। —घनानंद (शब्द०)। ३. जाँचना। परखना। विचारना। उ०—हरषेहेतु हेरि हर ही को। किय भूषन तियभूषन तिय को। —तुलसी (शब्द०)। ४. ध्यान देना। मन में लाना। खयाल करना। उ०—पुत्र अन्याइ करै बहुतेरै। पिता एक अवगुन नहिँ हेरै।—सूर० ५।४।

हेरना फेरना
क्रि० स० [हेरना, अनु० हिं० फेरना] १. इधर उधर करना। २. अदल बदल करना। बदलना। परिवर्तन करना। मुहा०—हेर फेरकर=घूम फिरकर। इधर उधर होते हुए।

हेरनि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० हेरना] अवलोकन करने या ताकने की क्रिया। देखने का कार्य। उ०—आनँदघन सम सुंदर हेरनि। इत उत वह हेरनि पट फेरनि। —नंद०, ग्रं०, पृ० २७६।

हेर फेर
संज्ञा पुं० [हिं० हेरना+फेरना] १. घुमाव। चक्कर। २. वचन की वक्रता। बात का आडंबर। जैसे,—हमें हेर फेर की बात नहीं आती। ३. कुटिल युक्ति। दावँ पेच। चाल। ४. अदल बदल। उलट पलट। इधर का उधर और उधर का इधर होना। क्रमविपर्यय। जैसे,—अक्षरों का हेर फेर हो गया। ५. अंतर। फर्क। जैसे,—दोनों के दाम में पाँच रूपए का हेर फेर है। ६. अदला बदला। विनिमय। लेन देन या खरीद फरोख्त का व्यवहार। जैसे,—वहाँ नित्य लाखों का हेर फेर होता है। उ०—वह अपने व्यवसाय को लेकर मस्त रहता था। लाखों का हेर फेर करने में उसे उतना ही सुख मिलता था जितना किसी विलासी को विलास में। —कंकाल, पृ० १६३।

हेरवा †
संज्ञा पुं० [हिं० हेरना] तलाश। ढूँढ़। खोज। क्रि० प्र०—पड़ना।

हेरवाना † (१)
क्रि० स० [हिं० हेरना का प्रे० रूप] ढुँढ़वाना। तलाश कराना।

हेरवाना † (२)
क्रि० स० [हिं० हेराना] खोना। गँवा देना।

हेरा †
संज्ञा स्त्री० [हिं० हेरना] १. खबर। समाचार। उ०—(क) हिव सूँमर हेरा हुवइ, मारू झूँवणहार। पिंगल वोलावा दिया, सोहड़ सो असवार। —ढोला०, दू० ५९७। २. चर। दूत। भेदिया। उ०—हेरा गया ऊमर कन्हइ कहिजइ एही बात। ढोलउ मारू एकला लहिस न एही घास। —ढोला०, दू० ६२६।

हेराना † (१)
क्रि० अ० [सं० हरण] १. खो जाना। असावधानी के कारण पास से निकल जाना। न जाने क्या हो जाना। न जाने कहाँ चला जाना य न रह जाना। उ०—हेरि रही कब तें यहि ठाँ मुँदरी को हेरानो कहूँ नग मेरो। —शंभु० (शब्द०)। संयो० क्रि०—जाना। २. न रह जाना। कहीं न मिलना। अभाव हो जाना। उ०—गुन न हेरानी, गुनगाहक हेरानो है। —(शब्द०)। ३. लुप्त हो जाना। नष्ट हो जाना। तिरोहित हो जाना। लापता होना। उ०—रहा जो रावन केर बसेरा। गा हेराय, कहुँ मिलै न हेरा। —जायसी (शब्द०)। ४. फीका पड़ जाना। मंद पड़ा जाना। कांतिहीन होना। उ०—आनन के ढिग होत सखी अरविंदन की दुतिहू है हेरानी। ५. आत्मविस्मृत होना। अपनी सुध बुध भूलना। लीन होना। तन्मय होना। उ०— सासु को रोस मनैबे की लाज लगी पग नूपुर पाटी बजावन। सो छबि हेरि हेराय रहे हरि, कौन को रूसिबो काको मनावन- अज्ञात (शब्द०)।

हेराना (२)
क्रि० स० [हिं० हेरना का प्रे०] खोजवाना। ढुँढ़वाना। तलाश कराना। उ०—हार गँवाइ सो ऐसै रोवा, हेरि हेराइ लेइ जौ खोवा। —जायसी (शब्द०)।

हेराफेरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० हेरना+फेरना] १. हेरफेर। अदल बदल। २. यहाँ की चीज वहाँ और वहाँ की चीज यहाँ होना। इधऱ का उधर होना या करना। जैसे,—चोर चोरी से गया तो क्या हेराफेरी से भी गया ?

हेरिंब
संज्ञा पुं० [देशी] गणेश। दे०'हेरंब' [को०]।

हेरिक
संज्ञा पुं० [सं०] भेद लेनेवाला दूत। गुप्तचर।

हेरिया †
वि० [हिं०] हेरनेवाला। खोजने या ढूँढ़नेवाला। तलाश करनेवाला।

हेरियाना
क्रि० अ० [देश०] जहाज के अगले पालों की रस्सियाँ तानकर बाँधना। हेरिया मारना। (लश०)।

हेरी पु †
संज्ञा स्त्री० [संबोधन हे+री] पुकार। टेर। मुहा०—हेरी देना=चिल्लाकर नाम लेना। पुकारना। आवाज देना। टेरना। उ०—हेरी देत सखा सब आए चले चरावन गैयाँ। —सूर (शब्द०)।

हेरुक
संज्ञा पुं० [सं०] १. गणेश का एक नाम। २. महाकाल शिव का एक गण। ३. एक बोधिसत्व का नाम। चक्रसंबर। ४. एक प्रकार के नास्तिक।

हेरु †
वि० [हिं० हेरना] हेरनेवाला। देखनेवाला। खोजनेवाला। उ०—प्रातः काल संगवाले हेरू इक्ट्टे हुए। —राम० धर्म०, पृ० २९२।

हेलंचा
संज्ञा स्त्री० [सं० हेलञ्चा] दे० 'हिलमोचिका'।

हेलंची
संज्ञा स्त्री० [सं० हेलञ्ची] हिलमोचिका नाम का साग [को०]।

हेल (१)
संज्ञा पुं० [हिं० हिलना] घनिष्ठता। मेलजोल। विशेष—यह शब्द अकेले नहीं आता, 'मेल' के साथ आता है। यौ०—हेलमेल।

हेल (२)
संज्ञा पुं० [हिं० हील] १. कीचड़, गोबर इत्यादि। २. गोबर का खेप। जैसे,—दो हेल गोबर डाल जा। ३. मैला। गलीज। ४. घृणा। घिन।

हेलक
संज्ञा पुं० [सं०] प्राचीन काल की एक तौल।

हेलन
संज्ञा पुं० [सं०] १. तुच्छ समझना। परवा न करना।तिरस्कार करना। अवज्ञा करना। २. क्रीड़ा करना। केलि करना। किलोल करना। ३. अपराध। कसूर। दोष।

हेलना पु (१)
क्रि० अ० [सं० हेलन] १. क्रीड़ा करना। केलि करना। २. विनोद करना। हँसी ठट्ठा करना। ठिठोली करना। उ०—मोहिं न भावत ऐसी हँसी 'द्विजदेव' सबै तुम नाहक हेलति। द्विजदेव (शब्द०)। ३. खेल समझना। परवा न करना। उ०—को तुम अस बन फिरहु अकेले, सुंदर जुवा जीव पर हेले। —तुलसी (शब्द०)।

हेलना (२)
क्रि० स० १. तुच्छ समझना। अवज्ञा करना। तिरस्कार करना। २. ध्यान न देना। परवा न करना।

हेलना † (३)
क्रि० अ० [हिं० हिलना, हलना] १. प्रवेश करना। पैठना। घुसना। दाखिल होना। (विशेषतः पानी में)। २. तैरना।

हेलना
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'हेलन' [को०]।

हेलनीय
वि० [सं०] अवहेलना या हेला के योग्य [को०]।

हेलमेल
संज्ञा पुं० [हिं० हेलमेल] १. मिलने जुलने, आने जाने, साथ उठने बैठने आदि का संबंध। घनिष्ठता। मित्रता। रब्त जब्त। जैसे,—दस बड़े आदमियों से उनका हेलमेल है। २. संग। साथ। सुहबत। ३. परिचय। जान पहचान। क्रि० प्र०—करना।—बढ़ाना।—होना।

हेलया
क्रि० वि० [सं०] १. खेल ही खेल में। २. सहज में। ३. अवमानना या तुच्छता के साथ।

हेला (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. तुच्छ समझना। अवज्ञा। तिरस्कार। २. ध्यान न देना। बेपरवाई। ३. खेल। खेलवाड़। क्रीड़ा। ४. बहुत सहज बात। बहुत आसान काम। ५. शृंगार- चेष्टा। प्रेम की क्रीड़ा। केलि। ६. साहित्य में अनुभावांत- र्गत एक प्रकार का हाव अर्थात् संयोग समय में स्त्रियों की मनोहर चेष्टा। नायक से मिलने के समय नायिका की विविध विलास या विनोदसूचक मुद्रा। उ०—छीनि पितंवर कम्मर तें सु विदा दई मीड़ि कपोलन रोरी। नैन नचाय कही मुसुकाय 'लला फिर आइयो खेलन होरी।' —पद्माकर (शब्द०)। विशेष—संस्कृत के आचार्यें ने 'हेला' को नायिका के अट्ठाइस सात्विक अलंकारों में गिना है और उसे अति स्फुटता से लक्षित संभोगाभिलाष का भाव कहा है। ७. स्त्रीसंभोग की प्रबल आकांक्षा [को०]। ८. चाँदनी। चंद्रिका [को०]। ९. संगीत में एक मूर्छना या स्वरकंपन [को०]।

हेला (२)
संज्ञा पुं० [हिं० हल्ला] १. पुकार। चिल्लाहट। हाँक। हल्ला। उ०—सज्जणियाँ बउलाइ कइ मंदिर बइठी आइ। मंदिर कालउ नाग जिमि हेलउ दे दे खाइ। —ढोला०, दू० ३७१। क्रि० प्र०—मारना।—देना=आवाज देना। हल्ला मचाना। उ०—आठ पहर अमला रा माँता हेलौ देता डोलौ। आनँदघन झूम्याई आवौ कोई गाली देलौ। —घनानंद, पृ० ४४५। —पाड़ना † = दे० 'हेला देना'। उ०—इजत किण विध आण सो पूछूँ हेला पाड़।—बाँकी० ग्रं० भा० ३, पृ० २६। २. धावा। आक्रमण। चढ़ाई।

हेला (३)
संज्ञा पुं० [हिं० रेलना (= ठेलना)] ठेलने की क्रिया या भाव। किसी भारी वस्तु को खिसकाने या हटाने के लिये लगाया हुआ जोर। धक्का। क्रि० प्र०—मारना।—देना।

हेला (४)
संज्ञा पुं० [हिं० हेल, हील (= गलीज)] [स्त्री० हेलिन] गलीज उठानेवाला। मैला साफ करनेवाला। हलालखोर। मेहतर। डोम। उ०—(क) बीछी साप आनि तहँ मेला। बाँका आइ छुवावहि हेला।—जायसी ग्रं०, पृ० २६३। (ख) बाँका आनि छुवावहि हेले।—पदमावत, पृ० ६३१।

हेला (५)
संज्ञा पुं० [हिं० हेल (= खेप)] १. उतना बोझ जितना एक बार टोकरे या नाव, गाड़ी आदि में ले जा सकें। खेप। खेवा। २. बारी। पारी। मुहा०—अब के हेले = इस बार। इस दफा।

हेला (६)
संज्ञा स्त्री० [फा़० हलैलह् का लघुरूप हेलह्] हर्रे। हरीतकी। हड़ [को०]।

हेला (७)
संज्ञा स्त्री० [देशी] क्षिप्रता। शीघ्रता [को०]।

हेलान
संज्ञा पुं० [देश०] डाँड़े को नाव पर रखना। (लश०)।

हेलाल
संज्ञा पुं० [अ० हिलाल] १. दूज का चाँद। २. बँधी हूई पगड़ी की वह उठी ऐंठन जो सामने माथे के ऊपर पड़ती है। बत्तीसी।

हेलावत्
वि० [सं०] प्रमत्त। प्रमादी। लापरवाह [को०]।

हेलावुक्क
संज्ञा पुं० [सं०] घोड़ों का सौदागर [को०]।

हेलि (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जाती हुई बारात। २. विलासयुक्त क्रीड़ा। कामचेष्टा (को०)। ३. परिरंभन। आलिंगन [को०]।

हेलि (२)
संज्ञा पुं० दिनकर। सूर्य।

हेलिक
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य। आदित्य। सविता [को०]।

हेलिन
संज्ञा स्त्री० [हिं० हेला] गलीज उठानेवाली। हलालखोरिन। मेहतरानी।

हेलिनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० हेला + इनी (प्रत्य०)]दे० 'हेलिन'।

हेलिहिल
वि० [सं०] क्रीड़ाशील। कामुक प्रकृति का। विलासी [को०]।

हेली पु (१)
अव्य० [सं० हला; अप० हेल्लि, हिं० संबो० हे + अली] हे सखी। उ०—(क) अति ही अधीर भई पीर भीर घरि लई, हेली मनभावन अकेली मोहिं कै चले।—घनानंद०, पृ० ५९। (ख) दीपक जोय कहा करूँ हेली पिय परदेस रहावे। सूनी सेज जहर ज्यूँ लागे सुसक सुसक जिय जावे।—संतवाणी०, पृ० ७३।

हेली (२)
संज्ञा स्त्री० सहेली। सखी। उ०—भार ही के डरन उतारि देत आभूषन हीरन के हार देति हेलिन हितै हितै। —पद्माकर ग्रं०, पृ० १९१।

हेली मेली
संज्ञा पुं० [हिं० हिलना + मिलना] मित्र। दोस्त।

हेलुआ ‡
संज्ञा पुं० [अ० हल्वह्] एक मीठा खाद्य पदार्थ। दे० 'हलवा'। उ०—हेलुआ जूती एक नाहिं आवै दिलगीरी। रूखा सूखा खाउ मिलै जो गम काटुकड़ा।-पलटू०, पृ० ६४।

हेलुक्का
संज्ञा स्त्री० [देशी] छिक्का। छींक [को०]।

हेलुग
संज्ञा पुं० [सं०] एक बड़ी संख्या [को०]।

हेलुवा
संज्ञा पुं० [हिं० हेलना] पानी में खड़े होकर एक दूसरे के ऊपर पानी का हिलोरा या छींटा मारने का खेल।

हेल्थ
संज्ञा पुं० [अं०] स्वास्थ्य। तंदुरुस्ती। जैसे,—हेल्थ आफिसर। हेल्थ डिपार्टमेंट।

हेवंत पु
संज्ञा पुं० [सं० हेमन्त] छह ऋतुओं में एक। दे० 'हेमंत'। उ०—नहिं पावस ओहि देसरा नहिं हेवंत बसंत। ना कोकिल न पपीहरा जेहि सुनि आवै कंत।-जायसी ग्रं०, पृ० १५८।

हेवँ पु
संज्ञा पुं० [सं० हिम या हेम] हिम। बर्फ। उ०—कीन्हेसि हेवँ, समुंद्र अपारा। कीन्हेसि मेरु खिखिंद पहारा।—पदमावत, पृ० २।

हेवँत पु
संज्ञा पुं० [सं० हेमन्त] एक ऋतु। दे० 'हेमंत'। उ०—रितु हेवँत सँग पीउ न पाला।—पदमावत, पृ० ३३९।

हेव ‡
वि० [देश०] दो की संख्या का वाचक। दो। उ०—हेवै दला अमंगल हूवौ। मुवौ सेख मिरजौ पण मूवौ।—रा० रू०, पृ० २८६।

हेवज्र
संज्ञा पुं० [सं०] बौद्धों के एक देवता [को०]।

हेवर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] एक बड़ी संख्या। [बौद्ध]।

हेवर पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० हय + वर]दे० 'हैवर'। उ०—सुभ सिंघ हेवर लीन। अचलेश कारन दीन।—प० रासो, पृ० ५७।

हेवर पु † (३)
संज्ञा पुं० [सं० हृत्पट, हिं० हिय + वर] छाती। उ०— सौँरत रोमावली सोहाई। हेवर जाय दरलिसी खाई।—चित्रा०, पृ० ७५।

हेवाँय †
संज्ञा पुं० [सं० हिमालि] हिम। बर्फ। पाला।

हेवाक
संज्ञा पुं० [सं०] उत्कट इच्छा। तीव्र स्पृहा। अत्यंत प्रबल कामना। कामाचार [को०]। विशेष—'लडभ' शब्द की तरह आधुनिक प्रयोग होने के करण आधुनिक कोशकार इसे अरबी या फारसी से गृहीत मानते हैं और संस्कृत के 'हेवाकस्र' शब्द से इसे अलग कहते हैं। मराठी के शब्द 'हेवा' से भी, जो लोभ, ईर्ष्या, डाह आदि का वाचक है, इसका यह रूप माना गया है। कल्हण, विल्हण आदि के द्वारा इसका प्रयोग किया गया है।

हेवाकस
वि० [सं०] अत्यंत तीव्र। उत्कट। प्रचंड [को०]।

हेवाकी
वि० [सं० हेवाकिन्] जो अत्यंत इच्छुक हो। तीव्र लालसा से युक्त [को०]।

हेवान † (१)
संज्ञा पुं० [अ० हैवान] पशु। जानवर।

हेवान पु (२)
वि० जो पशु या जानवर के तुत्य हो। उ०—आएहु कौल करि भूलेहु सुख माँ, काहे भयहु हेवान।—जग० बानी, पृ० ४०।

हेवै पु
संज्ञा पुं० [सं० हयदल] अश्वरोही। घुड़सवार। हय दल। उ०—दस सहस्स सज्जी न्रप हेवै।—पृ० रा० २५/१७०।

हेष
संज्ञा पुं० [सं०] घोड़े की हिनहिनाहट [को०]।

हेषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] घोड़े की हिनहिनहाट। उ०—ताल ताल पर नागों का वृहण, अश्वों की हेषा भर भर।—अपरा०, पृ० २११।

हेषित
संज्ञा पुं० [सं०] घोड़े की बोली। हिनहिनाहट [को०]।

हेषी
संज्ञा पुं० [सं० हेषिन्] घोड़ा। अश्व [को०]।

हेस पु
संज्ञा पुं० [सं० हेषिन्] अश्व। घोड़ा। उ०—चढ़न कहिय राजन सो हेसं। उडि्ड चलौ दक्षिण तुम देस। सुनत श्रवन चढय़ौ नृपराजं। कहि कहि दूत दुजन सिरताजं।—पृ० रा०, १६९/२४।

हेसमा †, हेसमि पु ‡
संज्ञा स्त्री० [?] एक प्रकार की मिठाई जो गेंहूँ के आँट से तैयार होती है। यह आयताकार होती है। इसे 'नाकसेप' या 'हेसपा' भी कहते हैं। उ०—अरु हेसमि सरस सँवारी। अति स्वाद परम सुखकारी।—सूर०, १०/८०१।

है (१)
अव्य० १. एक आश्चर्यसूचक शब्द। जैसे,—हैं ! यह क्या हुआ ? २. एक निषेध या असहमतिसूचक शब्द। जैसे,—हैं ! यह क्या करते हो ? यौ०—हैं हैं।

हैं (२)
क्रि० अ० सत्तार्थक क्रिया 'होना' के वर्तमान रूप 'है' का बहुवचन।

हैंगर
संज्ञा पुं० [अं०] १. वह वस्तु जिसपर या जिसके सहारे कोई वस्तु लटकाई जाय। रस्सी, अरगनी, खूँटी आदि। २. विमानगृह। वायुयानधारक। वायुयानशाला [को०]।

हैंगिंग
वि० [अं०] लटकने या झूलनेवाला। यौ०—हैंगिंग गार्डेन = झूला बाग या तल्लेदार बगीचा। हैंगिंग ब्रिज = झूलनेवाला पुल।

हैंगिंग लैंप
संज्ञा पुं० [अं०] छत में लटकाने का लंप।

हैंगुल
वि० [सं० हैङ्गल] १. हिंगुल संबंधी। ईंगुर का। २. हिंगुल या ईंगुर के सदृश रंगवाला [को०]।

हैंज्जम पु †
संज्ञा पुं० [देश० या अ० हुजूम] सेना का समूह। सैन्य- दल। उ०—ले बनवास हराय महालछ कप हैंज्जम अणपार कस।—रघु० रू०, पृ० ९८।

हैंड
संज्ञा पुं० [अं०] हाथ। कर। हस्त।

हैंडबिल
संज्ञा पुं० [अं०] नोटिस। इश्तहार। पर्चा।

हैंडबैग
संज्ञा पुं० [अं०] चमड़े का छोटा बक्स या लंबोतरा थैला जिसमें पढ़ने लिखने आदि के आवश्यक सामान रखते हैं या जिसमें अत्यावश्यक सामान रखकर सफर में अपने साथ लिए रहते हैं।

हैंडिल
संज्ञा पुं० [अं०] मुठिया। दस्ता।

हैंडी
वि० [अ०] जिसे हाथ में रखा या ले जाया जा सके।

हैस
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक छोटा पौधा जिसकी जड़ जहरीले फोड़ों पर जलाने के लेये घिसकर लगाई जाती हैं।

है पु ‡ (१)
क्रि० अ० हिं० क्रि० 'होना' का वर्तमानकालिक एकवचन रूप।

है पु ‡ (२)
संज्ञा पुं० [सं० हय]दे० 'हय'। उ०—दिष्ष फौज सुरतान की बंधव मोकलि भट्ट। तुम उप्पर गोरी सुबर है गै सज्जे थट्ट।—पृ० रा०, ५८।१९६। यौ०—हैवर। हैकल। हैगल।

हैकड़ †
वि० [देश० या हिं० हिया + कड़ा]दे० 'हेकड़'। उ०—मोटाई हैकड़ भया थूला।—पलटू०, ४८।

हैकल (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० हय + गल] एक गहना जो घोड़ों के गले में पहनाया जाता है। उ०—सारस पेसबंद अरु पूजी। हीरन जटित हैकलैँ दूजी।—हम्मीर० पृ० ३।

हैकल (२)
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. गोल, चौकोर या पान के से दानों की गले में पहनने की एक प्रकार की माला, जिसे हुमेल भी कहते हैं। २. बड़ी इमारत। प्रासाद। भवन (को०)। ३. कवच। ताबीज [को०]।

हैज
संज्ञा पुं० [अ० हैज] आर्तव। स्त्रियों का मासिक रजःस्राव [को०]।

हैजम
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. सेना की पंक्ति। सैन्यदल। २. तलवार। (डिं०)। ३. राजद्वार पर पहरा देनेवालों का सरदार। उ०—(क) पुच्छत चंद गयौ दरबारह। जहँ हैजम रघुवंश कुमारह।—पृ० रा०, पृ० ६१। ४६४।(ख) हैजम गय पहु पंग दै स्वामि आय कवि चंद।—पृ० रा०, ६१। ४७९।

हैजा
संज्ञा पुं० [अ० हैंजह्] दस्त और कै की बीमारी जो मरी या संक्रामक रूप में फैलती है। विशूचिका। २. समर। युद्ध। जंग। लड़ाई [को०]।

हैट
संज्ञा पुं० [अं०] छज्जेदार अँगरेजी टोपी जिससे धूप का बचाव होता है।

हैटा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का अंगूर।

है़डिंब
संज्ञा पुं० [सं० हैडिम्ब] १. हिडिंबा का पुत्र घटोत्कच। २ हिडिंब राक्षस संबंधी [को०]।

है़डिंबि
संज्ञा पुं० [सं० हैडिम्बि] हिडिंबा का पुत्र घटोत्कच [को०]।

हैतुक (१)
वि० [सं०] १. जिसका कोई हेतु हो। जो किसी हेतु या उद्देश्य से किया जाय। सकारण। सहेतु। २. तर्क का विवेकमूलक। तर्क या विवेक संबंधी। ३. अवलंबित। निर्भर।

हैतुक (२)
संज्ञा पुं० १. तार्किक। तर्क करनेवाला। हेतुवादी। २. कुतर्की। ३. संशयवादी। नास्तिक। ४. मीमांसा का मत माननेवाला। मीमांसक। ५. एक बुद्ध का नाम (को०)। ६. वह व्यक्ति जो धार्मिक विषयों में उदार हो [को०]। ७. शिव के एक गण का नाम [को०]।

हैदर
संज्ञा पुं० [अ०] सिंह। शेर [को०]।

हैदर अली
संज्ञा पुं० [अ०] दक्षिण भारत का एक शसक जो टीपू सुलतान का पिता था।

हैन
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की घास। तकड़ी।

हैफ (१)
अव्य० [अ० हैफ़] खेद या शोकसूचक शब्द। अफसोस। हाय। हा।

हैफ (२)
संज्ञा पुं० शोक। चिंता। खेद। अफसोस। उ०—हरौ हरौ रँग देखि कै भूलत है मन हैफ। नीम पतौवन में मिलै कहूँ भाँग को कैफ। —स० सप्तक, पृ० २२३।

हैबत
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. भय। त्रास। दहशत। उ०—किया उस उपर यक जलाली नजर। जो हैबत सूँ पानी हुआ सरबसर।—दक्खिनी०, पृ० ११७। २. आतंक। धाक। रोब (को०)। ३. एकबाल। प्रताप।

हैबतजदा
वि० [अ० हैबत + फ़ा० ज़दह्] डरा हुआ। त्रस्त। भय- भीत [को०]।

हैबतनाक
वि० [अ०] भयानक। डरावना।

हैबर पु
संज्ञा पुं० [सं० हयवर] अच्छा घोड़ा। उ०—हैबर हरट्ट साजि गैबर गरट्ट सबै, पैदर के ठट्ट फौज जुरी तुरकाने की।—भूषण ग्रं०, पृ० १०७।

हैमंत (१)
वि० [सं० हैमन्त] १. हेमंत संबंधी। २. जो हेमंत ऋतु के उपयुक्त हो। हेमंत ऋतु के उपयुक्त। ३. शीत ऋतु में होनेवाला [को०]।

हैमंत (२)
संज्ञा पुं० हेमंत ऋतु [को०]।

हैमंतिक (१)
संज्ञा पुं० [सं० हैमन्तिक] हेमंत ऋतु में होनेवाला धान। शालिधान्य। विशेष दे० 'जड़हन', 'शाली' तथा 'शालिधान'।

हैमंतिक (२)
वि० १. हेमंत संबंधी। शीतल। ठंढा। २. हेमंत ऋतु में जात या उत्पन्न [को०]।

हैमँत पु
संज्ञा स्त्री० [सं० हय + मत्त] मतवाला घोड़ा। मत्त अश्व। उ०—जुध सूर धीर हैमँत जिसां, बोल सही मत बक्कियौ। ऊपड़ै वहै नह ऊगतां, आलमसाह अटक्कियौ।—रा० रू० पृ० १५७।

हैम (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० हैमी] १. सोने का। स्वर्णमय। सोने का बना हुआ। २. सुनहरे रंग का। यौ०—हैममुद्रा। हैममुद्रिका।

हैम (२)
संज्ञा पुं० १. शिव का एक नाम। २. चिरायता।

हैम (३)
वि० [सं०] हिम संबंधी। पाले का। बर्फ का। २. जाड़े का। जाड़े में होनेवाला। ३. बर्फ में होनेवाला।

हैम (४)
संज्ञा पुं० १. तुषार। पाला। २. ओस।

हैमन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. अगहन का महीना। मार्गशीर्ष मास। २. हेमंत। शीत ऋतु। ३. अगहनी धान [को०]।

हैमन (२)
वि० १. स्वर्णनिर्मित। २. शीत ऋतु संबंधी। ३. शीत काल में होनेवाला। ४. हेमंत ऋतु के उपयुक्त [को०]।

हैमना (१)
वि० [सं०] जाड़े का। शीतकाल का।

हैमना (२)
संज्ञा पुं० १. पूस का महीना। २. साठी धान।

हैममुद्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सोने का सिक्का। स्वर्णमुद्रा [को०]।

हैममुद्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सोने का सिक्का। २. स्वर्णनिर्मित अँगूठी [को०]।

हैमल
संज्ञा पुं० [सं०] हेमंत ऋतु [को०]।

हैमवत (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० हैमवती] १. हिमालय का। हिमालय संबंधी। २. हिमालय पर होनेवाला। हिमालय से उत्पन्न। ३. हिम या बर्फ से युक्त। बर्फीला। हिम से भरा हुआ।

हैमवत (२)
संज्ञा पुं० १. वह जो हिमालय पर रहता हो। हिमालय का निवासी। २. एक प्रकार का विष। ३. एक राक्षस का नाम। ४. एक संप्रदाय का नाम। बौद्धों का एक भेद। ५. मुक्ता। मोती। ६. पुराणनुसार पृथ्वी के एक वर्ष या खंड का नाम। भारतवर्ष।

हैमवतिक
संज्ञा पुं० [सं०] वे लोग जो हिमालय पर्वत पर रहते हों। हिमालय पर्वत के निवासीजन [को०]।

हैमवती
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. उमा। पार्वती। २. गंगा। ३. सफेद फूल की वच। ४. हरीतकी। हड़। ५. अलसी। अतसी। तोसी। ६. रेणुका नामक गंधद्रव्य। ७. स्वर्णक्षीरी। सत्यानासी (को०)। ८. कौशिक ऋषि की भार्या का नाम। ९. एक प्रकार का अंगूर। कपिल वर्ण की द्राक्षा [को०]।

हैमा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सोनजुही। २. जर्दचमेली।

हैमा (२)
संज्ञा पु० [अ०] बिना पानी का जंगल। बियावान [को०]।

हैमी (१)
वि० स्त्री० [सं०] सोने की। सोने की बनी हुई।

हैमी (२)
संज्ञा स्त्री० १. केतकी। २. सोनजुही।

हैयंगवीन
संज्ञा पुं० [सं० हैयङ्गवीन] १. एक दिन पहले के दूध के मक्खन से बनाया हुआ घी। ताजे मक्खन का घी। २. एक दिन पूर्व के दूध का बनाया हुआ मक्खन। ताजा मक्खन (को०)।

हैया (१)
संज्ञा पुं० [अनुध्व०] दे० 'हौआ'।

हैया (२)
संज्ञा पुं० [अ०हैयह्] अहि। सर्प। साँप [को०]।

हैरंब (१)
वि० [सं० हैरम्ब] १. गणेश संबंधी। २. गणेश का।

हैरंब (२)
संज्ञा पुं० गणेश का उपासक संप्रदाय। गाणपत्य।

हैरण्य
वि० [सं०] १. हिरण्य संबंधी। २. सोने का बना हुआ। सोने का। ३. स्वर्ण वहन करनेवाला या सोना उत्पन्न करनेवाला। ४. सोना देनेवाला। स्वर्ण प्रदान करनेवाला। यो०—हैरण्यवास।

हैरण्यक
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्वर्णनिधि का निरीक्षण करनेवाला अधिकारी। २. सोनार। स्वर्णकार। ३. एक भूखंड या वर्ष का नाम (को०)।

हैरण्यगर्भ
वि० [सं०] जो हिरण्यगर्भ संबंधी हो [को०]।

हैरण्यवत
संज्ञा पुं० [सं०] जैनों के अनुसार जंबू द्वीप के छठे खंड का नाम।

हैरण्यवासा
वि० [सं०] जिसमे स्वर्णिम पंख लगे हों। जिसका पंख सुनहला हो। जैसे, बाण आदि [को०]।

हैरण्यिक
संज्ञा पुं० [सं०] स्वर्णकार। सुनार [को०]।

हैरत
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. आश्चर्य। अचरज। अचंभा। तअज्जुब। उ०—तो उसकी तेग को हम आह किस हैरत से तकते हैं।— भारतेंदु ग्रं०, पृ० ८४७। २. एक मुकाम या फारसी राग का पुत्र।

हैरतअंगेंज
वि० [अ० हैरत + फा़० अंगेज] आश्चर्यजनक। अजीबो- गरीब। अजूबा [को०]।

हैरतकदा
संज्ञा पुं० [अ० हैरत + फा़० कदह] वह स्थान जहाँ हर बात आश्चर्यजनक हो [को०]।

हैरतजदा
वि० [अ० हैरत + फा़० जदह्] १. चक्ति। विस्मित। निस्तब्ध। २. हतबुद्धि। भौचक्का [को०]।

हैरतनाक
वि० [अ० हैरत + फा़० नाक]दे० 'हैरतअंगेज'।

हैरती
वि० [अ०] आश्चर्य में पड़ा हुआ। चकित। निस्तब्ध [को०]।

हैराँ
वि० [अ० हैरान]दे० 'हैरान'। उ०—मिली कहाँ से अक्ल बशर को अक्ल सरका यह है हैराँ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २ पृ० ५६६।

हैराज पु
संज्ञा पुं० [सं० हयराज] उत्तम अश्व। श्रेष्ठ घोड़ा। उ०— सत्त हेम हैराज इक दिय पातुर प्रतिदान।—पृ० रा०, ६०। ६।

हैरान
वि० [अ०] १. आश्चर्य। स्तब्ध। चकित। दंग। भौचक्का। जैसे,—(क) मैं उसे एकबारगी यहाँ देखकर हैरान हो गया। (ख) ताज की कारीगरी देख लोग हैरान हो जाते हैं। (२) श्रम, कष्ट या झंझट से व्याकुल। विकल। ३. परेशान। व्यग्र। तंग। जैसे,—तुमने मुझे नाहक धूप में हैरान किया। क्रि० प्र०—करना।—होना।

हैरानी
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. विस्मय। हैरत। आश्चर्य। २. व्यग्रता। परेशानी [को०]।

हैरिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. भेदिया। गूढ़चर। गुप्तचर। २. चोर। तस्कर [को०]।

हैल
संज्ञा स्त्री० [अ०] ताकत। जोर। बल। शक्ति [को०]।

हैली पु
अव्य० [संबो० हे + अली]दे० 'हेली' (१)। उ०—हैली तीरथ जाय बुलाए रे हरदम परबे नहाए।—कबीर मं०, पृ० १७४।

हैवत
संज्ञा स्त्री० [अ० हैबत]दे० 'हैबत'। उ०—हैवत से तेरी चर्ख यह दौवार झूका।—कबीर मं०, पृ० ४६८।

हैवर पु
संज्ञा पुं० [सं० हय + वर] सुंदर घोड़ा। उ० —कबीर गरबु न कीजिए चाम लपेटे हाड़। हैवर ऊपर छत्र तर ते फुन धरनी गाड़।—कबीर ग्रं०, पृ० २५२।

हैवानात
संज्ञा पुं० [अं०] हैवान का बहुवचन। जानवरों का समूह। पशुओं का झुंड [को०]।

हैवान
संज्ञा पुं० [अ०] १. पशु। जानवर। 'इंसान' का उलटा। २. वनपशु। जंगली जानवर (को०)। ३. प्राणयुक्त। जीव- धारी। प्राणी (को०)। ४. जड़ मनुष्य। बेवकूफ या गँबारआदमी। उजड्ड आदमी। उ०—बुद्धिहीनं सुद्धिहीनं हौं अजान हैवान।—जग० बानी, पृ० ५।

हैवानियत
संज्ञा स्त्री० [अ० हैवानीयत] जड़ता। बेवकूफी। मूर्खता। पशुता। उ०—कुछ भी हिंद की हैवानियत अब हममें नहीं रही।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० ८८।

हैवानी
वि० [अ० हैवान] १. पशु का। पशु संबंधी। पशुतापूर्ण। उ०—गुस्सा हैवानी दूरि कर छाड़ि दे अभिमान। दुई दरोगाँ नाहिँ खुसियाँ दादू लेहु पिछान।—दादू०, पृ० ६००। २. पशु के करने योग्य। जैसे,—हैवानी काम।

हैस † (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०]दे० 'हैंस'। उ०—बैर करवँदे हैस सिहोर अनास।—प्रेमघन०, भा० १, पृ० ७५।

हैस (२)
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. कलह। युद्ध। लड़ाई। २. बुरे रास्ते लगना। कुमार्ग गति। बेराही [को०]।

हैस बैस
संज्ञा पुं० [अ०] १. बहस मुबाहिसा। विवाद। २. उधेड़- बुन। उलझन। उ०—इसी हैस बैस में रात कट गई। रंग- भूमि, पृ० ४६८।

हैसियत
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. योग्यता। सामर्थ्य। शाक्ति। २. वित्त। धनबल। समाई बिसात। आर्थिक दशा। जैसे,—उनकी हैसियत ऐसी नहीं है कि गाड़ी घोड़ा रख सकें। ३. मूल्य। ४. श्रेणी। दरजा। जैसे,—इस मकान की हैसियत के हिसाब से ४,०००) दाम बहुत है। ५. मान मर्यादा। प्रतिष्ठा। ६. तौर। ढंग। तरीका। ७. धन दौलत। जायदाद। जैसे,—उसने अच्छी हैसियत पैदा की है।

हैसियतदार
वि० [अ० हैसियत + फा़० दार (प्रत्य०)] १. हैसियतवाला। प्रतिष्ठित। इज्जतदार। २. मालदार। धनवान। संपन्न [को०]।

हैसियतमंद
वि० [अ० हैसियत + फ़ा० मंद]दे० 'हैसियतदार'।

हैहय
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक क्षत्रिय वंश जो यदु से उत्पन्न कहा गया है। विशेष—पुराणों में इस वंश की पाँच शाखाएँ कही गई हैं —ताल- जंघ, वीतिहोत्र, आवंत्य, तुंडिकेर और जात। लिखा है कि हैहयों ने शकों के साथ साथ भारत के अनेक देशों के जीता था। प्राचीन काल का इस वंश का सबसे प्रसिद्ध राजा कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन हुआ था जिसे सहस्त्र भुजाएँ थीं। इसने परशुराम के पिता जमदग्नि को मारकर उनकी गायों का हरण कर लिया जिससे क्रुद्ध हो परशुराम ने इसे मारा था। इतिहास में हैहय वंश कलचुरि के नाम से प्रसिद्ध है। विक्रम संवत् ५५० और ७९० के बीच हैहयों का राज्य चेदि देश और गुजरात में था। है हयों ने एक संवत् भी चलाया था जो कलचुरि संवत् कहलाता था और विक्रम संवत् ३०६ से आरंभ होकर १४ वीं शताब्दी तक इधर उधर चलता रहा। हैहयों का शृंखलाबद्ध इतिहास विक्रम संवत् ९२० के आसपास मिलता है, इसके पूर्व चालुक्यों आदि के प्रसंग में इधर उधर हैहयों का उल्लेख मिलता है। कोकल्लदेव (वि० सं० ९२०- ९६०) मु्ग्धतुंग, बालहर्ष, केयूरवर्ष (वि० सं० ९९० के लगभग); शंकरगण युवराजदेव (वि० सं० १०५० के लगभग), गागेयदेव, कर्णदेव आदि बहुत से हैहय राजाओं के नाम शिला- लेखों में मिलते हैं। २. हैहयवंशी कार्तवीर्य सहस्रार्जुन। ३. एक देश का नाम जहाँ हैहय जाति का निवास था। ४. बृहत्संहिता के अनुसार पश्चिम दिशा का एक पर्वत।

हैहयराज
संज्ञा पुं० [सं०] हैहयवंशी कार्तवीर्य सहस्रार्जुन। उ०— जब हन्यौ हैहयराज इन बिनु छत्र छितिमंडल करय़ो।— केशव (शब्द०)।

हैहयाधिराज
संज्ञा पुं० [सं०] सहस्रार्जुन। उ०—प्रचंड हैहयाधिराज दंडमान जानिये।—केशव (शब्द)।

हैहात
अव्य० [अ] हा हंत। हाय। दे० 'है है' [को०]।

हैहेय
संज्ञा पुं० [सं०] कार्तवीर्य सहस्रार्जुन [को०]।

है है
अव्य० [हा हा] शोक, खेद या दुःखसूचक शब्द। हाय। अफसोस। हा हंत।

होँ
क्रि० अ० [सं० √ भू; प्रा० हव] सत्तार्थक क्रिया 'होना' का बहुवचन संभाव्य काल का रूप। जैसे,—(क) शायद वे वहाँ होँ। (ख) यदि वे वहाँ होँ तो यह कह देना।

होँकारना पु
क्रि० सं० [अनु० सं० हुङ्करण] बुलाना। आह्वान करना। उ०—जब साहब होँकारिया ले चल अपने धाम। मुझि सँदेश सुनाइहौँ मैं आयोँ यहि काम।—कबीर ग्रं०, पृ० ५९४।

होँठ
संज्ञा पुं० [सं० ओष्ठ; प्रा० होट्ठ; पु० हिं० ओठ] प्राणियों के मुखविवर का उभरा हुआ किनारा जिससे दाँत ढँके रहते हैं। ओष्ठ। रदनच्छद। मुहा०—होँठ काटना या चबाना = भीतरी क्रोध या क्षोभ प्रकट करना। होँठ चाटना = किसी बहुत स्वादिष्ट वस्तु को खाकर अतृप्ति प्रकट करते हुए और खाने की इच्छा या लालच करना। जैसे,—हलवा ऐसा बना था कि लोग होँठ चाटते रह गए। होँठ चिपकना = मीठी वस्तु का नाम सुनकर लालच होना। होँठ चूसना = होठों का चुंबन करना। होँठ मिलाना = चुंबन करना। दे० 'होंठ चूसना'। होँठ सी लेना = किसी बात पर एकदम चुप हो जाना। कुछ भी न कहना। मौन हो जाना। होँठ हिलाना = बोलने के लिये मुँह खोलना। बोलना।

होँठल
वि० [हिं० होंठ + ल (प्रत्य०)] जिसके ओष्ठ स्थूल हों। मोटे होँठोंवाला।

होँठी
संज्ञा स्त्री० [हिं० होँठ] १. बारी। किनारा। औंठ। २. छोटा टुकड़ा।

हो (१)
संज्ञा पुं० [सं०] पुकारने का शब्द या संबोधन।

हो (२)
क्रि० अ० [सं० √ भू; प्रा० हव, हो] १. सत्तार्थक क्रिया 'होना' के अन्य पुरुष संभाव्य काल तथा मध्यम पुरुष बहुवचन के वर्तमान काल का रूप। जैसे,—(क) शायद वह हो। (ख) तुमवहाँ हो। उ०—तू मेरो बालक हो नँदनंदन तोहि बिसंभर राखें।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० २३४।

हो पु † (३)
ब्रज की वर्तमानकालिक क्रिया 'है' का सामान्य भूत का रूप। था। उ०—(क) पहिले हौँ ही हो तब एक। अमल, अकल, अज,भेद विवर्जिति सुनि बिधि बिमल बिवेक।—सूर०, २।३८। (ख) दोउ सीँग बिच ह्वै हौँ आयौ जहाँ न कोऊ हो रखवैया।—सूर०, १०।३३५।

होई †
संज्ञा स्त्री० [हिं० होना] एक पूजन या त्यौहार जो दीवाली के आठ दिन पहले होता है। दे०'अहोई' (१)। विशेष—इस पूजन को अहोई अष्टमी भी कहते हैं। यह संतान- प्राप्ति की कामना से की जाती है। इसमें ऐसी दो स्त्रियों की कथा कही जाती है जिनमें एक को संतान होती ही नहीं थी तथा दूसरी की संतान होकर मर जाती थी।

होगला पु †
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का नरसल या नरकट।

होज
वि० [फ़ा० होज] १. चकित। हैरान। आश्चर्य में पड़ा हुआ। २. त्रस्त। भयभीत। डरा हुआ [को०]।

होजन
संज्ञा पुं० [फा़० होजाँ (= नरगिस का फूल)] एक प्रकार का हाशिया या किनारा जो कपड़ों में बनाया जाता है।

होटल
संज्ञा पुं० [अं०] वह स्थान जहाँ मूल्य लेकर लोगों को भोजन कराने या भोजन और ठहरने दोनों का प्रबंध रहता है।

होठ
संज्ञा पुं० [सं० ओष्ठ, प्रा०, होट्ठ] दे० 'होँठ'। उ०—भूषन उतारे साज मंडन के दूर डारे कंकन ही एक हाथ बाएँ राखि लीनी है। ताती ताती श्वासन बिनास्यो रूप होठन कौ नीको लाल रंग मारि फीको पारि दीनी है।—शकुंतला, पृ० १०९।

होड़ (१)
संज्ञा स्त्री० [देशी हुड्ड, होड्ड, हिं० होड़ या सं० हार (= लड़ाई, विवाद)] १. दूसरे के साथ ऐसी प्रतिज्ञा कि कोई बात यदि हमारे कथन के अनुसार न हो, तो हम हार मानें और कुछ दें। शर्त। बाजी। क्रि० प्र०—बदना।—लगाना। २. एक दूसरे से बढ़ जाने का प्रयत्न। किसी बात में दूसरे से अधिक होने का प्रयास। स्पर्धा। ३. यह प्रयत्न कि जो दूसरा करता है, हम भी करेंगे। समान होने का प्रयास। बराबरी। उ०—होड़ सी परी है मानो घन घनश्याम जू सों दामिनी को कामिनी को दोऊ अंक में भरैं।—तोष (शब्द)। क्रि० प्र०—पड़ना। ४. हठ। अड़। जिद।

होड़ (२)
संज्ञा पुं० [सं० होड] तरेँदा। नाव। बेड़ा।

होड़ा
संज्ञा पुं० [सं० होड़] लुटेरा। चोर। डाकू [को०]।

होड़ा
संज्ञा पुं० [देशी० हुड्ड, होड्ड]दे० 'होड़' (१)। उ०—प्राननाथ से होड़ा लागल ब्रह्म पदारथ पाई री।—गुलाल बा०, पृ० ९५।

होड़ाबादी
संज्ञा स्त्री० [हिं० होड + बदना] होड़ा होड़ी।

होड़ाहोड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० होड़] १. दूसरे के बराबर होने या दूसरे से बढ़ जाने का प्रयत्न। लागडाँट। चढा़ऊपरी। उ०— अर तै टरत न बर परे दई मरक मनु मैन। होड़ा होड़ी बढ़ि चले चितु चतुराई नैन।—बिहारी र०, पृ० ४। २. शर्त। बाजी।

होढ़ (१)
वि० [स०] चुराया हुआ। चोरी का।

होढ़ (२)
संज्ञा पुं० चुराई हुई वस्तु। चोरी का माल [को०]।

होत †
संज्ञा स्त्री० [हिं० होना या भूति] १. पास में धन होने की दशा। आढ्यता। संपन्नता। उ०—(क) होत की जोत है। (ख) होत का बाप अनहोत की माँ। २. वित्त। सामर्थ्य। धन की योग्यता। मकदूर। समाई।

होतब पु †
संज्ञा पुं० [सं० भवितव्य] वह जो होने को हो। होनेवाला। होनहार। उ०—कहाँ जैत कहँ सूर प्रथि, जिन गहे गौरी साह। होतब मिटै न जगत मैं, किज्जिय चिंता काह।—ह० रासो, पृ० ११९।

होतब्य
संज्ञा पुं० [सं० भवितव्य] दे० 'होतब'।

होतब्यता पु
संज्ञा स्त्री० [सं० भवितव्यता] होनेवाली बात। वह बात जिसका होना ध्रुव हो। होनहार। उ०—जैसी हो होतव्यता, वैसी उपजै बुद्धि।

होतर
वि० [सं० भवितव्य] होने लायक। होने के योग्य। उ०— ये रसवाद भले न भावते करियै वही होइ जो होतर।—आनँदघन प्रिय नई घमँड सो देत दरबरयो डोलत अजौँ अजोनर।—घनानंद०, पृ० ३९०।

होतव्य
वि० [सं०] जो हवन करने योग्य हो। हवनीय [को०]।

होता
संज्ञा पुं० [सं० होतृ] [स्त्री० होत्री] यज्ञ में आहुति देनेवाला। मंत्र पढ़कर यज्ञकुंड में हवन की सामग्री डालनेवाला। विशेष—यह चार प्रधान ऋत्विजों में है जो ऋग्वेद के मंत्र पढ़ता और देवताओं का आह्वान करता है। इसके तीन पुरुष या सहायक मैत्रावरुण, अच्छावाक् और ग्रावस्तुत्। २. यज्ञकर्ता। यज्ञ करनेवाला [को०]। ३. अग्नि का एक नाम (को०)। ४. शिव। शंकर (को०)।

होतृक
संज्ञा पुं० [सं०] यज्ञ में होता की सहायता करनेवाला व्यक्ति। होता का सहायक।

होतृकर्म
संज्ञा पुं० [सं० होतृकर्मन्] यज्ञ में होता का कार्य [को०]।

हेतृचमस्
संज्ञा पुं० [सं०] स्रुवा आदि पात्र जिनका प्रयोग होता यज्ञ के समय करता है [को०]।

होतृप्रवर
संज्ञा पुं० [सं०] होता का वरण। होता का चुनाव [को०]।

होतृषदन
संज्ञा पुं० [सं०] होता का आसन। होता के बैठने का स्थान [को०]।

होतृसदन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'होतृषदन' [को०]।

होत्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह वस्तु जो यज्ञ में हवन करने के उपयुक्त हो। जैसे, घृतादि। २. होम की सामग्री। हवि। ३. यज्ञ। हवन [को०]।

होत्रक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'होतृक' [को०]।

होत्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. स्तवन। स्तुति। २. यज्ञ में आहूत देवता। ३. यज्ञ। ४. आह्वान। पुकार। बुलाना। ५। होता के सहायक का स्थान [को०]। यौ०—होत्राचामस् = दे० 'होतृचमस्'। होत्राशासी = होता का सहायक। होतृक।

होत्रिय (१)
संज्ञा पुं० [सं०] होता के सहायक का कार्य या स्थान। दे० 'होत्रीय' [को०]।

होत्रिय (२)
वि० दे० 'होत्रीय' (२)।

होत्री (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] यजमान रूप में शिव की मूर्ति। शिव की आठ मूर्तियों में एक। उ०—जिसको कर्ता ने सृष्टि के आदि में रचा अर्थात् जल, और जो विधिपूर्वक दिए हव्य को लेता है अर्थात् अग्नि, और जो यज्ञ करता है अर्थात् होत्री इन आठ मूर्तियों में जो ईश प्रत्यक्ष है अर्थात् महादेव जी सोई रक्षा करें।—शकुंतला, पृ० ३।

होत्री (२)
संज्ञा पुं० [सं० होत्रिन्] हवन करनेवाला [को०]।

होत्रीय (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. होता जो हवन करता है। २. देवताओं के उद्देश्य से हवन करनेवाला ऋत्विक्। ३. यज्ञ स्थल। यज्ञ मंडप [को०]।

होत्रीय (२)
वि० होता से संबंध रखनेवाला। होता संबंधी।

होत्वा
संज्ञा पुं० [सं० होत्वन्] यज्ञ करनेवाला व्यक्ति। यज्ञकर्त्ता [को०]।

होनहार (१)
वि० [हिं० होना + हारा (प्रत्य०)] १. जो होनेवाला है। जो अवश्य होगा। जो होने को है। भावी। २. जिसके बढ़ने या श्रेष्ठ होने की आशा हो अच्छे लक्षणोंवाला। जिसमें भावी उन्नति के विह्न हों। जैसे,—होनहार लड़का। उ०—होनहार बिरवान के होत चीकने पात।

होनहार (२)
संज्ञा पुं०, स्त्री० वह बात जो होने की हो। वह बात जो अवश्य हो। वह बात जिसका होना दैवी विधान में निश्चित हो। होनी। भवितव्यता। उ०—हमपर कीजत रोख काल- गति जानि न जाई। होनहार ह्वै रहै मिटै मेटी न मिटाई। होनहार ह्वै रहै मोह मद सबको छूटै। होय तिनूका बज्र, बज्र तिनका ह्वै टूटै।—केशव (शब्द०)।

होना
क्रि० अ० [सं० √ भू > भवन; प्रा० होण] १. प्रधान सत्तार्थक क्रिया। आस्तित्व रखना। कहीं विद्यमान रहना। 'उपस्थित या मौजूद रहना। जैसे,—उसका होना न होना बराबर है। (ख) संसार में ऐसा कोई नहीं है। उ०—गगन हुती, नहिं महि हुती, हुते चंद नहीं सूर।—जायसी (शब्द०)। विशेष—शुद्ध सत्ता के अर्थ में इस क्रिया का प्रयोग साधारण रूप 'होना' के अतिरिक्त केवल सामान्य कालों में ही होता है। जैसे,— वह है, मैं था, वे होंगे। और कालों में प्रयुक्त होने पर यह क्रिया विकार,निर्माण, घटना, अनुष्ठान आदि का अर्थ देती है। हिंदी में यह क्रिया बड़े महत्व की है, क्योंकि खड़ी बोली में सब क्रियाओं के अधिकतर 'काल' इसी क्रिया की सहायता से बनते हैं। कालनिर्माण में यह सहायक क्रिया का काम देती है। जैसे,—वह चलता है, वह चलता था, वह चलता होगा, वह चला है, इत्यादि। इस क्रिया के कालसूचक रूप अनियमित या रूढ़ होते हैं जैसे,—है, था, होगा। सामान्य वर्तमान के दो रूप होते हैं—एक तो 'है' जो शुद्ध सत्ताबोधक है; दूसरा 'होता है' जो प्रसंग के अनुसार सत्ता और विकार दोनों सूचित करता है; जैसे,—(क) जो क्रूर होता है, वह दया नहीं करता। (ख) देखो अभी यह काले से सफेद होता है। मुहा०—किसी का होना = (१) किसी के अधिकार में, अधीन या आज्ञावर्ती होना। दास होना। सेवक होना। उ०—तुलसी तिहारो, तुम हो तें तुलसी को हित राखि कहौं जौ पै तौ ह्वैहौं माखी घीप की।—तुलसी (शब्द०)। (२) किसी का प्रेमी या प्रेमपात्र होना। उ०—(क) सब भाँति सों कान्ह तिहारे भए सखि औ तुम हू भइ कान्हर केरी।—कोई कवि (शब्द०)। (ख) अब तौ कान्ह भए कुबजा के क्यों करिहैं ब्रज फेरो।—सूर (शब्द०)। (३) किसी का आत्मीय, कुटुंबी या संबंधी होना। सगा होना। जैसे,—जो तुम्हारा हो, उससे या सुनो, मुझसे मतलब। देस में रहैंगे, परदेस में रहैंगे, काहू भेस में रहैंगे तऊ रावरे कहावैंगे।—अनीस (शब्द०)। कहीं का हो रहना = (कहीं से) न लौटना। कहीं रह जाना। अधिक बिलंब लगा देना। बहुत रुक या ठहर जाना। जैसे,—यह बड़ा सुस्त है, जहाँ जाता है वहीं का हो रहता है। (कहीं से) होकर या होते हुए = (१) गुजरते हुए। बीच से। मध्य से। जैसे,—इस रास्ते या महल्ले से होकर मत जाना। (२) बीच में ठहरते हुए। बीच में रुककर कुछ बातचीत या काम करते हुए। जैसे,—चौक जा रहे हो तो उनके यहाँ से होते जाना। (३) पहुँचना। जाना। मिलना। जैसे,—जब उधर जा ही रहे हो तो उनके यहाँ भी होते आना। हो आना = भेंट करने के लिये जाना। मिल आना। जैसे,—बहुत दिनों से नहीं गए हो, जरा उनके यहाँ हो आओ। होते पर = पास में धन होने की दशा में। संपन्नता में। जैसे,—ये सब होते पर की बातें हैं। होता सोता = जो अपना होता हो। आत्मीय। कुटुंबी। संबंधी। जैसे,—अपने होते सोतों को कोसो। (स्त्रि०) कौन होता है ? = संबंध में क्या है। कौन संबंधी है। कौन लगता है। जैसे,—वे तुम्हारे कौन होते हैं ? (शब्द०)। २. विकारसूचक क्रिया। एक रूप से दूसरे रूप में आना। अन्य दशा, स्वरूप या गुण प्राप्त करना। सूरत या हालत बदलना। जैसे,—(क) तुम क्या से क्या हो गए ? (ख) कुसंग में पड़कर यह लड़का खराब हो गया। (ग) तुम्हारे कहने से पीतल सोना हो जायगा। संयो० क्रि०—जाना। मुहा०—हो बैठना = (१) बन जाना। अपने को समझने लगना या प्रकट करने लगना। लगाने लगना। जैसे,—देखते देखते वह कवि हो बैठा। (२) मासिक धर्म से होना। रजस्वला होना। (३) किया जाना। भुगतना। सरना। जैसे,—(क) काम हो रहा है। (ख) छपाई कब होगी ?संयो० क्रि०—जाना। यौ०—होना जाना, होना हवाना। जैसे,—यह सब होता जाता रहेगा, तुग उधर का काम देखो। मुहा०—हो जाना या हो चुकना = समाप्ति पर पहुँचना। पूरा होना। खतम होना। करने को न रह जाना। सिद्ध होना। हो चुकना = (१) मर जाना। जैसे,—वैद्य के पहुँचते पहुँचते तो वह हो चुका। २. न रह जाना। लुप्त होना। जैसे,—यदि ऐसे ही उपदेशक हैं तो हिंदू धर्म हो चुका। बस हो चुका = कुछ न होगा। कुछ भी काम न बनेगा। काम न पूरा होगा। (नैराश्य- सूचक)। तो फिर क्या है ? = फिर तो कुछ करने को रह ही न जायगा। तब तो सब काम सिद्ध समझो। ४. बनना। निर्माण किया जाना। तैयार होने की हालत में रहना। प्रस्तुत किया जाना। जैसे,—(क) खाना होना, रसोई होना, दाल होना। (ख) अभी कोट हो रहा है, कुरते में पीछे हाथ लगेगा। विशेष—मकान आदि बड़ी वस्तुओं के बनने के अर्थ में इस क्रिया का व्यवहार नहीं होता। ५. घटनासूचक क्रिया। किसी घटना या व्यवहार का प्रस्तुत रूप में आना। घटित किया जाना। कोई बात या संयोग आ पड़ना। जैसे,—(क) अंधेर होना, गजब होना, वाकया होना। (ख) कोई ऐसी वैसी बात हो जायगी तो कौन जिम्मेदार होगा ? मुहा०—होकर रहना = अवश्य घटित होना। न टलना। जरूर होना। जैसे,—जो होनेवाला रहता है, वह होकर रहता है। तो क्या हुआ ? = तो कोई हर्ज नहीं। तो कुछ बुराई या दोष नहीं। जैसे,—टूटा है तो क्या हुआ, काम तो देगा। हुआ हुआ = (१) बस रहने दो, तुमसे न करते बनेगा या न पूरा होगा। (२) बहुत कह चुके, अब चुप रहो; और बोलने की जरूरत वहीं। हो न हो = अवश्य। निश्चय। जरूर। निस्सं- देह। जैसे,—हो न हो, यह उसी की कार्रवाई है। जो हुआ सो हुआ = (१) बीती बात जाने दो। गुजरी बात की ओर ध्यान न दो या परवा न करो। (२) जो हुआ वह अब और न होगा। उ०—जाहु लला ‍! जो भई सो भई अब नेह की बात चालाइए ना।—कोई कवि (शब्द०)। हो पड़ना = बन पड़ना। जान या अनजान में कोई दोष या भूल हो जाना। ६. किसी रोग, व्याधि, अस्वस्थता, प्रेतबाधा आदि का आना। किसी मर्ज या बीमारी का घेरना। जैसे,—(क) उसको क्या हुआ है ? (ख) फोड़ा होना, रोग होना इत्यादि। ७. बीतना। गुजरना। जैसे,—दस दिन हो गए, वह न लौटा। ८. परिणाम निकलना। किसी कारण से कार्य का विकास पाना। फल देखने में आना। जैसे,—(क) समझाने से क्या होगा। (ख) मारने पीटने से कुछ न होगा। मुहा०—होता रहेगा = फल मिलता जायगा। परिणाम अच्छा न होगा। (शाप)। ९. असर देखने में आना। प्रभाव या गुण दिखाई पड़ना। जैसे,— इस दवा से कुछ न होगा। १०. जनमना। जन्म लेना। उद्भव पाना। जैसे,—उस स्त्री को एक लड़की हुई है। ११. काम निकलना। प्रयोजन या कार्य सधना। जैसे,—१०) से क्या होगा ? और लाओ। यौ०—होना जाना। १२. काम बिगड़ना। हानि पहुँचना। क्षति आना ? जैसे,— नाराज होने से हमारा क्या हो जाएगा ? यौ०—होना जाना।

होनिहार † (१)
संज्ञा पुं० [हिं० होना + हार] दे० 'होनहार'।

होनिहार पु (२)
वि० होनेवाला। होनहार भावी। उ०—(क) होनि- हार का करतार को रखवार जग खरभरु परा।—मानस, १।८४। (ख) हम कहँ दुर्लभ दरस तुम्हारा। जानत हौं कछु भल होनिहारा।—मानस, १।१५९।

होनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० होना] १. उत्पत्ति। पैदाइश। २. वह बात जो हो गई हो। हाल। वृत्तांत। ३. होनेवाली बात या घटना। वह बात जिसका होना ध्रुव हो। वह बात जिसका होना दैवी विधान में निशिचित हो। भावी। भवितव्यता। उ०—ह्वै रहै होनी प्रयास बिना, अनहोनी न ह्वै सकै कोटि उपाई।—पद्माकर (शब्द०)। ४. हो सकनेवाली बात। वह बात जिसका होना संभव हो। मुहा०—होनी होय सो होय = होनेवाली बात तो होगी ही, उसके लिये चिंता क्या ? उ०—पलंटू वरिहौ नाम कौ होनी होय सो होय। लोक लाज नहीं मानिहौ तन मन लज्जा खोय।—पलटू०, पृ० ६१।

होबाब पु
संज्ञा पुं० [अ० हुबाब] पानी का बुलबुला। दे० 'बुदबुद'। उ०—यह तो एक होबाब है जी, साकिन दरियाव के बीच सदा।—कबीर० दे०, पृ० ३८।

होबार (१)
संज्ञा पुं० [देश०] सोहन चिड़िया का एक भेद। तिल्लर।

होवार (२)
संज्ञा पुं० अश्व। घोड़ा। (डिं०)।

होम
संज्ञा पुं० [सं०] १. ब्राह्मणों द्वारा नित्य करणीय पंचमहायज्ञों में एक यज्ञ जिसे देवयज्ञ कहते हैं। २. देवताओं के उद्देश्य से अग्नि में घृत, जौ आदि डालना। हवन। यज्ञ। आहुति देने का कर्म। क्रि० प्र०—करना।—होना। मुहा०—होम करते हाथ जलना = सत्कार्य करने के फलस्वरूप कष्ट उठाना। अच्छा काम करते हुए बुरा बनना। होम कर देना। (१) जला डालना। भस्म कर देना। (२) नष्ट करना। बरबाद करना। (३) उत्सर्ग करना। छोड़ देना।

होमक
संज्ञा पुं० [सं०] १. यज्ञ में आहुति देनेवाला। मंत्र पढ़कर यज्ञ- कुंड में हवन की सामग्री डालनेवाला। विशेष दे० 'होता'। होता का सहायक। होतृक [को०]।

होमकर्म
संज्ञा पुं० [सं० होमकर्मन्] होम संबंधी कार्य। हवन की विधियाँ। यज्ञकार्य [को०]।

होमकल्प
संज्ञा पुं० [सं०] हवन करने की विधि [को०]।

होमकाल
संज्ञा पुं० [सं०] हवन करने की निर्धारित समय [को०]।

होमकाष्ठी
संज्ञा स्त्री० [सं०] यज्ञ की अग्नि दहकाने की फुँकनी।

होमकुंड
संज्ञा पुं० [सं० होमकुण्ड] हवन की अग्नि को स्थापित करने के लिये बना हुआ कुंड। होम की अग्नि रखने का गड्ढा।

होम डिपार्टमेंट
संज्ञा पुं० [अं०] दे० 'स्वराष्ट्र विभाग'।

होमना
क्रि० स० [सं० होम + हिं० ना (प्रत्य०)] १. देवता के उद्देश्य से अग्नि में डालना। हवन करना। आहुति देना। संयो० क्रि० + देना। २. उत्सर्ग करना। छोड़ देना। उ०—नंदलाल के हेतु आपुनी सुख वै होमति।—सुकवि (शब्द०)। ३. नष्ट करना। बरबाद करना।

होम मिनिस्टर
संज्ञा पुं० [अं०]दे० 'स्वराष्ट्र मंत्री'।

होम मेंबंर
संज्ञा पुं० [अं०] दे० 'स्वराष्ट्र मंत्री'।

होम सेक्रेटरी
संज्ञा पुं० [अं०]दे० 'स्वराष्ट्र मंत्री'।

होमाग्नि
संज्ञा स्त्री० [सं०] हवनकुंड की अग्नि [को०]।

होमार्जुनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] होमधेनु [को०]।

होमि
संज्ञा पुं० [सं०] १. अग्नि। २. चित्रक नाम का एक वृक्ष। चीते का पेड़ (को०)। ३. तपाया हुआ मक्खन का घी। घृत। ४. जल। पानी।

होमियोपैथिक
वि० [अं०] १. चिकित्सा की होमियोपैथी नामक पद्धति के अनुसार। २. होमियोपैथी के अनुसार चिकित्सा करनेवाला।

होमियोपैथी
संज्ञा स्त्री० [अं०] थोड़े दिनों से निकला हुआ पाश्चात्य चिकित्सा का एक सिद्धांत या विधान। वह चिकित्सापद्धति जिसे डाक्टर हैनिमैन ने जर्मनी में आविष्कृत किया था। रोग के समान लक्षण उत्पन्न करनेवाले द्रव्यों द्वारा रोगनि- वारण की पद्धति। विशेष—इसका सिद्धांत है कि जो वस्तु अधिक मात्रा में कोई रोग उत्पन्न करती है वही वस्तु सूक्ष्ममात्रा में उस रोग का विनाश भी करती है। इस सिद्धांत के अनुसार कोई रोग उसी द्रव्य से दूर होता है जिसके खाने से स्वस्थ मनुष्य में उस रोग के समान लक्षण प्रकट होते हैं। इस पद्धति में रोग के लक्षण तथा रोगी की मानसिक अवस्था के अनुसार दवा दी जाती है। मुख्यतः इस प्रणाली में रोगी की मन स्थिति पर विचार करके दवा होती है। इसमें वैज्ञानिक विधि द्वारा विभिन्न ओषधियों और संखिया, कुचला आदि अनेक विषों को स्पिरिट में डालकर उनकी मात्रा को निरंतर हलकी करते जाते हैं और इस प्रकार विषों की अल्प से अल्प मात्रा द्वारा रोग दूर किए जाते हैं।

होमी
संज्ञा पुं० [सं० होमिन्] हवन करनेवाला या आहुति देनेवाला व्यक्ति [को०]।

होमीय
वि० [सं०] १. होम संबंधी। होम का। जैसे,—हेमीय द्रव्य। २. हवन कार्य में उपयुक्त। हवन के योग्य। यौ०—होमीय द्रव्य = होम के काम में उपयुक्त होनेवाले द्रव्य, जैसे, घी, साकल्य आदि।

होमेंधन
संज्ञा पुं० [सं० हेंमेन्धन] होम कार्य में प्रयुक्त इंधन। यज्ञकाष्ठ [को०]।

होम्य (१)
वि० [सं०] होम संबंधी। होम का। होमीय।

होम्य (२)
संज्ञा पुं० १. घृत। घी। २. हवन में प्रयुक्त पदार्थ। होम द्रव्य (को०)।

होर (१)
वि० [अनु०] ठहरा हुआ। चलने से रुका हुआ। क्रि० प्र०—करना।—होना।

होर (२)
संज्ञा पुं० [पं०] ओर। मार्ग। राह। उ०—असाँनूँ चेटक लाइ गया की कराँ कुछ होर न सुझदा।—घनानंद०, पृ० ३४०।

होर (३)
संज्ञा पुं० [फ़ा०] रवि। सूरज। सूर्य [को०]।

होरख्श
संज्ञा पुं० [फ़ा० होरख्श] सूर्य।

होरमा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की घास या चार। साँवक।

होरमुज्द
संज्ञा पुं० [फ़ा० होरमुज्द] एक ग्रह। बृहस्पति। मुश्तरी [को०]।

होरस
संज्ञा पुं० [यू०] यूनान के एक प्राचीन देवता का नाम। उ०— होरस देवता भी गृद्धमुख है।—प्रा० भा०, प०, पृ० ८३।

होरसा
संज्ञा पुं० [सं० घर्ष(= घिसना)] पत्थर की गोल छोटी चौकी जिसपर चंदन घिसते या रोटी बेलते हैं। चौका।

होरहा पु
संज्ञा पुं० [सं० होलक] १. चने का छोटा पौधा जो प्रायः ज़ड़ से उखाड़कर बाजारों में बेचा जाता है और जिसमें से चने के ताजे दाने निकलते हैं। २. चना, यव आदि को जड़ से उखाड़कर अग्नि में भूने हुए ताजे दाने। उ०—होरहा कोऊ जलाय खात कच्चा रस पीवत।—प्रेमघन०, भा० १, पृ० ४४।

होरा (१)
संज्ञा पुं० [सं० होला] दे० 'होला'।

होरा (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० यूनानी भाषा से गृहीत] १. एक अहोरात्र का २४ वाँ भाग। घंटा। ढाई घड़ी का समय। २. एक राशि या लग्न का आधा भाग। ३. ज्योतिषशास्ञ में एक लग्न। ४. रेखा। चिह्न। लकीर [को०]। ५. जन्मकुंडली। ६. जन्मकुंडली के अनुसार फलाफल निर्णय की विद्या। जातक शास्त्र।

होराविद्
संज्ञा पुं० [सं०] जन्मकुंडली देखने में कुशल व्यक्ति। होराशास्त्र का ज्ञाता। ज्योतिषी [को०]।

होराशास्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] फलाफल निर्णय की विद्या। जातक शास्त्र। फलित ज्यौतिष [को०]।

होरिल †
संज्ञा पुं० [देश०] नवजात बालक। नया पैदा लड़का। (गीत)।

होरिलवा, होरिला †
संज्ञा पुं० [देश०]दे० 'होरिल'।

होरिहार पु †
संज्ञा पुं० [हिं० होरी] होली खेलनेवाला। उ०—होन लग्यो ब्रज गलिन में होरिहारन को घोष।—पद्माकर (शब्द०)।

होरी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० होली] दे० 'होली'। उ०—अति रस बाढचौ री बाढचौ पिय प्यारी कौ होरी ठानत।—घनानंद०, पृ० ४४५।

होरी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० होर (= ठहरा हुआ)] एक प्रकार की बड़ी नाव जो जहाजों पर का माल लादने और उतारने के काम में आती है।

होल
संज्ञा पुं० [देश०] पश्चिमी एशिया से आया हुआ एक पौधा जो घोड़ों और चौपायों के चारे के लिये लगाया जाता है।

होलक
संज्ञा पुं० [सं०] आग में भुनी हुई चने, मटर आदि की हरी फलियाँ। होला। होरा। होरहा।

होलडाल
संज्ञा पुं० [अं०] यात्रा में बिस्तर आदि बाँधकर रखने के काम आनेवाला लंबा चौड़ा एक प्रकार का थैला जो बिस्तर की तरह फैलाया जा सकता है। बिस्तरबंद। उ०—मैंने अपनी सभी छोटी मोटी चीजें और कपड़े लत्ते बक्स में सँभालकर रखे और बिस्तर होलडाल में बाँधा।—संन्यासी, पृ० १२३।

होला (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] होली का त्यौहार। यौ०—होला क्रीडन, होला खेलन=होली खेलना। फाग केंलना। होलाष्टक।

होला (२)
संज्ञा पुं० सिक्खों की होली जो होली के दूसरे दिन होती है।

होला (३)
संज्ञा पुं० [सं० होलक] १. आग में भूनी हुई हरे चने या मटर की फलियाँ। २. चने का हरा दाना। होरा। होरहा।

होलाक
संज्ञा पुं० [सं०] आग की गरमी पहुँचाकर पसीना लाने की आयुर्वेदोक्त एक क्रिया। एक प्रकार की स्वेदन विधि।

होलाका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बसंत ऋतु आने पर मनाया जानेवाला। एक उत्सव। होली का त्योहार। २. फाल्गुन मास की पूर्णिमा (को०)।

होलाष्टक
संज्ञा पुं० [सं०] होली के पहले के आठ दिन जिनमें विवाह कृत्य नहीं किया जाता। जरता बरता।

होलिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. होली का त्योहार। २. लकड़ी, घास फूस आदि का वह ढेर जो होली के दिन जलाया जाता है। उ०—गोपद प्योधि करि होलिका ज्यों लाय लंक, निपट निसंक परपुर गलबल भो।—तुलसी ग्रं०, पृ० २४७। यौ०—होलिकादहन, होलिकादाह=होली जलाना। ३. एक राक्षसी का नाम जो हिरण्यकशिपु की बहिन थी। विशेष दे० 'ढुंढा'१।

होलिकानल
संज्ञा पुं० [सं० होलिका+अनल] होलिका को अग्नि। होली की आग। उ०—संसार का कूड़ा करकट समझ होलिकानल में झोंक देना।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० २५२।

होली (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. हिंदुओं का एक बड़ा त्योहार जो फाल्गुन के अंत में बसंत ऋतु के आरंभ पर चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को मनाया जाता है और जिसमें लोग एक दूसरी पर रंग, अबीर आदि डालते तथा अनेक प्रकार के विनोद करते हैं। उ०— लगे गुलशन पे अजबस गम के होल्याँ। हुए पुरखून कुल मेंहदी के फूलाँ।— दक्खिनी०, पृ० १९१। विशेष—प्राचीन काल में जो मदनोत्सव या वसंतोत्सव होता था, उसी की यह परंपरा है। इसकी साथ होलिका राक्षसी की शांति का कृत्य भी मिला हुआ है। वसंत पंचमी के दिन से लकड़ियों आदि का ढेर एक मैदान में इकट्ठा किया जाता है जो वर्ष के अंतिम दिन फाल्गुन की पूर्णिमा को जलाया जाता है। इसी को 'होली जलाना' या 'संवत् जलाना' कहते हैं। बीते हुए वर्ष का अंतिम दिन और आनेवाले वर्ष का प्रथम दिन दोनों इस उत्सव में संमिलित रहते हैं। मुहा०—होली खेलना = होली का उत्सव मनाना। एक दूसरे पर रंग, अबीर आदि डालना। उ०—थे कैयाँ होली खेलौ भोरा कान्ह जी। औराँ काँ धोखा सू म्हारी आँख्याँ बूकौ मेलौ।—घनानंद०, पृ० ४४५। होली का भँड़वा = बेढंगा पुतला जो विनोद के लिये खड़ा किया जाता है। २. लकड़ी, घास फूस आदि का ढेर जो होली के दिन जलाया जाता है। उ०—त्रिबिध सूल होलिय जरै खेलिय अस फागु। जो जिय चहसि परम सुख तो यहि मारग लागु।—तुलसी ग्रं०, पृ० ५६१। ३. एक प्रकार का गीत जो होली के उत्सव में गाया जाता है।

होली (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक कँटीला झाड़ या पौधा।

होलू पु
संज्ञा पुं० [हिं० होला] भुने या उबाले हुए चने। (खोंचेवाला)।

होल्डर
संज्ञा पुं० [अं०] १. अँगरेजी कलम का वह हिस्सा जो हाथ से पकड़ा जाता है और जिसमें लिखने की निब या जीभ खोँसी जाती है। २. किसी वस्तु को पकड़ने का साधन। ३. बिजली के लट्टू को लटकाने का साधान जो तार में लगा रहता है।

होल्डाल
संज्ञा पुं० [अं०] दे० 'होलडाल'।

होल्दना †
क्रि० स० [देश०] धान के खेत में घास पात दूर करने के लिये हल चलाना। (पंजाब)।

होवनिहार
संज्ञा पुं० [हिं० होना + हार (प्रत्य०)] दे० 'होनहार'।

होवनिहारी पु
वि०, संज्ञा स्त्री० [हिं० होना] दे० 'होनहार'। उ०— दीखति है कछु होवनिहारी। सो काहू पै जाति न टारी।— सूर०, ४।५।

होश
संज्ञा पुं० [फ़ा०] १. बोध या ज्ञान की वृत्ति। संज्ञा। चेतना। चेत। जैसे, वह होश में नहीं है। क्रि० प्र०—करना।—होना। यौ०—होश व हवास, होशोहवास = चेतना और बुद्धि। सुध बुध। मुहा०—होश उड़ना या जाता रहना = भय या आशंका से चित्त व्याकुल होना। चित स्तब्ध होना। सुध बुध भूल जाना। तन मन की सँभाल न रहना। जैसे,—बंदूक देखते ही उसके होश उड़ गये। होश करना = सचेत होना। बुद्धि ठीक करना। होश दंग होना = चित्त चकित होना। आश्चर्य से स्तब्ध होना। मन में अत्यंत आश्चर्य उत्पन्न होना। होश पकड़ना = आपे में होना।चेतना प्राप्त करना। होश सँभालना = अवस्था बढ़ने पर सब बातें समझने बूझने लगना। सयाना होना। अनजान बालक न रहना। जैसे, मैंने तो जब से होश सँभाला, तब से इसे ऐसा ही देखता हूँ। होश में आना = चेतना प्राप्त करना। बोध या ज्ञान की वृत्ति फिर लाभ करना। बेसुध न रहना। मूर्छित या संज्ञाशून्य न रहना। होश की दवा करो = बुद्धि ठीक करो। समझ बुझकर बोला। होश ठिकाने होना = (१) बुद्धि ठीक होना। भ्रांति या मोह दूर होना। (२) चित्त स्वस्थ होना। थकावट, घबराहट, डर या व्याकुलता दूर होना। चित्त की अधीरता या व्याकुलता मिटना। (३) अहंकार या गर्व मिटना। दंड पाकर भूल का पछतावा होना। जैसे, वह मार खायगा तब उसके होश ठिकाने होंगे। होश की दवा करना = समझदारी प्राप्त करना। उ०—अक्ल के नाखून लो। होश की दवा करो।—फिसाना०, भा० ३, पृ० १३७। होश फाख्ता हो जाना = होश उड़ जाना। उ०—पहलवान के होश फाख्ता हो गए। झूठी जूड़ो चौगुनी बढ़ी।—काले०, पृ० ५६। होश हवा होना या होश हिरन होना = दे० 'होश उड़ना'। २. स्मरण। सुध। याद। स्मृति। क्रि० प्र०—करना।—होना। मुहा०—होश आना = (१) दे० 'होश में आना'। (२) स्मरण होना। याद आना। होश दिलाना = सुध कराना। स्मरण कराना। याद दिलाना। ३. बुद्धि। समझ। अक्ल। यौ०—होशमंद। ४. नशे के उतार की अवस्था (को०)।

होशमंद
वि० [फ़ा०] समझदार। बुद्धिमान्।

होशमंदी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] समझदारी। अक्लमंदी। होशियारी [को०]।

होशयार
वि० [फ़ा०] दे० 'होशियार'। उ०—लाला ब्रजकिशोर बातें बनाने में बड़े होशयार हैं।—श्रीनिवास ग्रं०, पृ० २०२।

होशियार
वि० [फ़ा०] १. चतुर। समझदार। बुद्धिमान्। २. दक्ष। निपुण। कुशल। जैसे,—वह इस काम में बड़ा होशियार है। ३. सचेत। सावधान। खबरदार। जैसे,—इतना खोकर अब से होशियार हो जाओ। मुहा०—होशियार रहना = चौकसी करते रहना। किसी अनिष्ट से बचने का बराबर ध्यान रखना। ४. जिसने होश सँभाला हो। जो अनजान बालक न हो। सयाना। ५. चालाक। धूर्त।

होशियारी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] १. समझदारी। बुद्धिमानी। चतुराई। २. दक्षता। निपुणता। ३. कौशल। युक्ति। सावधानी। जैसे,—इसे होशियारी से पकड़ना नहीं तो टूट जायगा।

होश्यार †
वि० [फ़ा० होशयार, होशियार] दे० 'होशियार'। उ०— अछो होश्यार तुम सारे सारे के अब तक। मेरा भी है तुम्हारे सूँ सुखन यक। दक्खिनी०, पृ० १९७।

होस पु † (१)
संज्ञा पुं० [फा़० होश]दे० 'होश'।

होस (२)
संज्ञा पुं० [अ० हवस]दे० 'हौस'।

होसलेमंद
वि० [अ० हौसलह् + फ़ा० मंद] दे० 'हौसलामंद'। उ०— मिस्टर रसल नील का एक होसलेमंद सोदागर है।—श्रीनिवास ग्रं०, पृ० १६४।

होसाजासी †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] किसी कार्य का स्मरण रहने पर भी आजकल करते हुए रहना।

होसा होसी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] लाग डाँट। स्पर्धा। होड़ा होड़ी।

होसी पु
क्रि० अ० [राज०] 'होना' क्रिया का भविष्यत् काल का एकवचनांत रूप। होगा। उ०—परा रहौ जी इसौ कूँड छै थाँसू होसी भेलौ।—घनानंद०, पृ० ४४५।

होस्टल
संज्ञा पुं० [अं० होस्टेल] १. छात्रावास। २. निवासस्थान।

होस्टेल
संज्ञा पुं० [अं०] १. स्कूल या कालेज से संबद्ध छात्रों के रहने का स्थान। छात्रावास। २. रहने का स्थान।

होहल्ला
संज्ञा पुं० [हिं०] शोरगुल। चिल्लपों। हुल्लड़।

हौँ पु † (१)
सर्व० [सं० अहम्] ब्रजभाषा का उत्तम पुरुष एकवचन सर्वनाम। मैं। उ०—(क) हौँ इक बात नई सुनि आई।— सूर०, १०।२०। (ख) हौँ मारिहौं भूप द्वौ भाई।—मानस, ६।७८।

हौँ (२)
क्रि० अ० 'होना' क्रिया का वर्तमानकालिक उत्तम पुरुष एकवचन रूप। हूँ।

हौँकना पु †
क्रि० अ० [हिं० हुंकार] १. गस्जना। हुंकार करना। २. हाँफना।

हौँनी पु
वि० [हिं० होना] होनेवाली। उ०—नंददास प्रभु बेगि चलौ किन, भई कहा औ आगैं हौँनी।—नंद० ग्रं०, पृ० ३७३।

हौँस
संज्ञा स्त्री० [अ० हवस] दे० 'हौस'।

हौ पु (१)
अव्य० [हिं० हाँ] स्वीकृतिसूचक शब्द। हाँ। (मध्यप्रदेश)।

हौ (२)
क्रि० अ० १. होना क्रिया का मध्यम पुरुष एकवचन का वर्तमान- कालिक रूप। हो। २. होना का भूतकाल। था। दे० 'हो'।

हौआ (१)
संज्ञा पुं० [अनु० हौ, हाऊ] लड़कों को डराने के लिये एक कल्पित भयानक वस्तु का नाम। हाऊ। भकाऊँ।

हौआ (२)
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० हौवा]दे० 'हौवा'।

हौका
संज्ञा पुं० [अनु० हाव (= मुँह बाने का शब्द)] १. मरभुखापन। खाने का गहरा लालच। २. प्रबल लोभ। तृष्णा। ३. हड़बड़ी या घबराहट। हौलदिली। उ०—रुस्तम अली की अम्मा अपने जी के हौके में मरी जा रही थी।—शतरंज०, पृ० १६।

हौज (१)
संज्ञा पुं० [अ० हौज] १. पानी जमा रहने का चहबच्चा। कुंड हौद। उ०—अठएँ लोक के पार भरा इक हौज है।—पलटू०, पृ० ९५। २. कटोरे के आकार का मिट्टी का बहुत बड़ा बरतन। नाँद।

हौज (२)
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. अज्ञता। नासमझी। २. अधीरता। आतुरता [को०]।

हौजा (१)
संज्ञा पुं० [फ़ा० हौजा] हाथी की अम्मारी। हौदा [को०]।

हौजा (२)
संज्ञा पुं० [अ० हौजह्] १. छोटा हौद। २. औरतों की मूत्रेंद्रिय। भग। ३. राज्य का केंद्रस्थान। राजधानी। ४. तट। किनारा [को०]।

हौड़ पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० होड़] लागडाट। दे० 'होड़'।

हौतभुज (१)
संज्ञा पुं० [सं०] कृत्तिका नामक तृतीय नक्षत्र [को०]।

हौतभुज (२)
वि० हुतभुज् या अग्निसंबंधी [को०]।

हौताशन
वि० [सं०] अग्नि संबंधी। हुताशन संबंधी।

हौताशनकोण
संज्ञा पुं० [सं०] पूर्व दक्षिण का कोना। अग्नि कोण। [को०]।

हौताशनलोक
संज्ञा पुं० [सं०] अग्नि का लोक [को०]।

हौताशनि
संज्ञा पुं० [सं०] १. कार्तिकेय। स्कंद। २. रामायण में वर्णित नील नाम का बंदर [को०]।

हौतृक (१)
वि० [सं०] होता संबंधी। होता से संबद्ध [को०]।

हौतृक (२)
संज्ञा पुं० होता का सहायक या सहयोगी।

हौत्र
वि० संज्ञा पुं० [सं०]दे० 'हौतृक' [को०]।

हौत्रिक
वि० [सं०] होता के कार्य से संबंध रखनेवाला। होता संबंधी।

हौद
संज्ञा पुं० [अ० हौज] १. बँधा हुआ बहुत छोटा जलाशय। कुंड। उ०—(क) हौद भरा जहाँ प्रेम का, तहाँ लेत हिलोरा दास।— दरिया०, पृ० १४। (ख) कहर को क्रोध किधौँ कालिका को कोलाहल हलाहल हौद लहरात लबालब को।—पद्माकर ग्रं०, पृ० ३०५। २. कटोरे के आकार का मिट्टी का बहुत बड़ा बरतन जिसमें चौपाए खाते पीते हैं तथा रँगरेज, धीबी आदि कपड़े डुबाते हैं। नाँद।

हौदा (१)
संज्ञा पुं० [फ़ा० हौजह्] हाथी की पीठ पर कसा जानेवाला आसन जिसके चारों ओर रोक रहती है और पीठ टिकाने के लिये गद्दी रहती है। उ०—(क) हाथिन के हौदा उकसाने कुंभ कुंजर के, भौन को भजाने अलि छूटे लट केस के।—भूषण ग्रं०, पृ० १२७। (ख) वह हौदन सों सब छन कस्यो नृप गजगन अवरेखिए।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० २३३। क्रि० प्र०—कसना।

हौदा (२)
संज्ञा पुं० [अ० हौजा, हिं० हौद] [अल्पा० स्त्री० हौदी] कटोरे के आकार का मिट्टी, पत्थर आदि का बहुत बड़ा बरतन जिसमें चौपायों को चारा दिया जाता है। नाँद।

हौन पु †
संज्ञा पुं० [देश०] अपनत्व। आत्मीयता। अपनापन।

हौमीय
वि० [सं०] होम संबंधी या हवन के उपयुक्त [को०]।

हौम्य
संज्ञा पुं० [सं०] घृत। घी। दे० 'होम्य' [को०]।

हौम्यधान्य
संज्ञा पुं० [सं०] हवन का अन्न। दे० 'होमधान्य' [को०]।

हौर †
अव्य० [देश०]दे० 'और'। उ०—न माने प्यास हौर भूख नाले के सुख दुःख।—दक्खिनी०, पृ० ५२।

हौरा † (१)
संज्ञा पुं० [अनु० हाव हाव] शोर गुल। हल्ला। कोलाहल। उ०—सुनि सर्वञ सब हौरा किरना।—कबीर सा०, पृ० ४४०।

क्रि० प्र०—करना।—मचना।—होना।

हौरा (२)
संज्ञा स्त्री० [अं०] गौर वर्ण की वह स्त्री जिसके बाल और आँखे घने श्याम वर्ण की हों [को०]।

हौरा हौरा, हौरे हौरे †
क्रि० वि० [देश०]दे० 'हैले हैले'।

हौल
संज्ञा पुं० [अ०] डर। भय। दहशत। खौफ। यौ०—हौलदिल। हौलनाक। मुहा०—हौल पैठना या बैठना = जी मेंडर समाना। हृदय में भय उत्पन्न होना।

हौल अंगेज
वि० [फ़ा०] खौफनाक। भयदायक।

हौल खौल
संज्ञा स्त्री० [अनुध्व०]दे० 'हौल जौल'।

हौलजदा
वि० [फ़ा० हौलजदह्] भयभीत। त्रस्त। डरा हुआ।

हौल जौल
संज्ञा स्त्री० [अ० हौल + जौल (अनु०)] १. जल्दी। शीघ्रता। २. जल्दी के कारण होनेवाली घबराहट। क्रि० प्र०—करना।—मचाना।

हौलदिल (१)
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] १. कलेजा धड़कना। दिल की धड़कन। २. दिल धड़कने का रोग।

हौलदिल (२)
वि० १. जिसका दिल धड़कता हो। २. दहशत में पड़ा हुआ। डरा हुआ। ३. घबराया हुआ। व्याकुल। जिसका जी ठिकाने न हो।

हौलदिला
वि [फ़ा० हौलदिल] [वि० स्त्री० हौलदिली] डरपोक। बुजदिल।

हौलनाक
वि० [अ० हौल + फ़ा० नाक] डरावना। भयानक। भयंकर।

हौला जौली
संज्ञा स्त्री० [अ० हौल + अनु० जौल]दे० 'हौल जौल'।

हौली
संज्ञा स्त्री० [सं० हाला(= मद्य)] वह स्थान जहाँ मद्य उतरता और बिकता है। आबकारी। कलवरिया।

हौली हौली
क्रि० वि० [हिं० हौले हौले] धीरे धीरे। उ०—हौली हौली बढ़ गई धेनु, चोली हमजोली की मसकी।—आराधना, पृ० २५।

हौलू पु
वि० [अ० हौल + हिं० ऊ (प्रत्य०) या हिं० हौल] जिसके मन में जल्दी हौल होता हो। शीघ्र भयभीत होने या घबरानेवाला।

हौले हौले
क्रि० वि० [हिं० हरुआ] १. धीरे धीरे। आहिस्ता। मंद गति से। क्षिप्रता के साथ नहीं। जैसे,—हौले हौले चलना। २. हलके हाथ से। जोर से नहीं। जैसे,—हौले हौले मारना।

हौवा (१)
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] पैगंबरी मतों के अनुसार सब से पहली स्त्री जो पृथ्वी पर आदम के साथ उत्पन्न की गई और जो मनुष्य जाति की आदि माता मानी जाती है। हव्वा।

हौवा (२)
संज्ञा पुं० [अनु० हौ]दे० 'हौआ (१)'।

हौश
संज्ञा पुं० [अ०, तुल० अं० हाउस] १. मकान। घर। गृह। भवन। २. स्थान। जगह [को०]।

हौस
संज्ञा स्त्री० [अ० हवस] १. चाह। प्रबल इच्छा। लालसा। कामना। उ०—(क) सजै विभूषन बसन सब पिया मिलन की हौस।—पद्माकर।—(शब्द०)। (ख) हौस मरै सिगरी सजनी कबहूँ हरि सों हँसि बात कहौगी।—केशव (शब्द०)। २. उमंग। हर्षोत्कंठा। उ०—रति विपरीत की पुनीत परिपाटी मनौ हौसन हिंडोरे की सुपाटी में पढ़ति है।— पद्माकर (शब्द०)। ३. हौसला। उत्साह। साहसपूर्ण इच्छा।

हौसला
संज्ञा पुं० [अ० हौसलह्] १. किसी काम को करने की आनंदपूर्ण इच्छा। उत्कंठा। लालसा। जैसे,—उसे अपने बेटे का व्याह देखने का हौसला है। मुहा०—हौसला निकलना = इच्छा पूरी होना। अरमान निकलना। २. उत्साह। आनंदपूर्ण साहस। जोश और हिम्मत। जैसे,—फिर कभी मुझसे लड़ने का हौसला न करना। मुहा०—हौसला पस्त होना = उत्साह न रह जाना। जोश ठंढा पड़ना। हिम्मत न रहना। हौसलों के पुतले बनना = अत्यधिक उत्साही होना। उ०—हौसलों के बने रहें पुतले। हार हिम्मत कभी न हम हारें।—चुभते०, पृ० ५३। ३. प्रफृल्लता। उमंग। बढ़ी हुई तबीयत। जैसे,—उसने बड़े हौसले से बेटे का ब्याह किया है। ४. उद्दंडता। गुस्ताखी। धृष्टता [को०]। ५. आवेग। जोश [को०]।

हौसलामंद
वि० [फा़०] १. लालसा रखनेवाला। २. बढ़ी हुई तबीयत का। उमंगवाला। ३. उत्साही। साहसी।

हौसु पु
संज्ञा स्त्री० [अ० हवस] दे० 'हौस'। उ०—दोस लगावत दीनदयालहिं हौसु हिये हरि भाँतिन स्यौ है।—ठाकुर०, पृ० १२।

हौसुर पु
क्रि० वि० [देश०] उच्च स्वर से। उ०—कंठ लागि सो हौसुर रोई। अधिक मोह जो मिलै बिछोई।—पदमावत०, पृ० १६८।

ह्नव
संज्ञा पुं० [सं०] गोपन। छिपावा।

ह्नवन
संज्ञा पुं० [सं०] गोपन। छिपाना [को०]।

ह्नुत
वि० [सं०] गोपन किया हुआ। छिपाया हुआ [को०]।

ह्नुति
संज्ञा स्त्री० [सं०] छिपाव। गोपन। दुराव। २. प्रत्याख्यान। अस्वीकृति [को०]।

ह्यः
अव्य० [सं० ह्मस्] गत कल। पिछला दिन [को०]।

ह्यस्कृत
वि [सं०] जो कल किया गया हो। जो बीते हुए दिन अर्थात् कल को घटित हुआ हो [को०]।

ह्यस्तन
वि [सं०] गत कल संबंधी [को०]। यौ०—ह्मस्तनदिन, ह्मस्तनदिवस = गत दिन। बीता हुआ पिछला दिन।

ह्यस्त्य
वि० [सं०] जो एक दिन पहले का हो [को०]।

ह्याँ पु †
अव्य० [हिं० यहाँ > हियाँ †]दे० 'यहाँ'।

ह्यो पु ‡
संज्ञा पुं० [हिं० हिय]दे० 'हियो', 'हिया'। उ०—(क) लक्ष्मण के पुरिखान कियो पुरुषारथ से न कह्मो परई। वेष बनाय कियो बनितान को देखत केशव ह्यो हरई।—केशव (शब्द०)। (ख) कहै पदमाकर त्यों बाँधनू बसनवारी, वा व्रज बसनवारी ह्यो हरनहारी है।—पद्माकर (शब्द०)।

ह्योभव
वि० [सं०] जो कल हुआ हो [को०]।

ह्यौ पु
संज्ञा पुं० [हिं० हिय] 'हियो', 'हिया' और 'हिय'।

ह्रणिया, ह्रणीया
संज्ञा स्त्री० [सं०] १, लज्जा। ब्रीड़ा। २. कृपा। ३. निंदा [को०]।

ह्लद
संज्ञा पुं० [सं०] १. बड़ा ताल। झील। २. सरोवर। तालाब। ३. नाद। ध्वनि। आवाज। ४. किरण। ५. मेढ़ा। मेष। यौ०—ह्नदग्रह = नक्र। घड़ियाल। कुंभीर।

ह्रदिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. नदी। २. बिजली। विद्युत् [को०]।

ह्लद्रोग
संज्ञा पुं० [सं०] राशि-चक्र-गत ११ वीं राशि। कुंभ राशि [को०]। विशेष—संस्कृत में यह शब्द ग्रीक भाषा से आगत एवं प्रयुक्त है।

ह्रसित
वि० [सं०] १. छोटा किया हुआ। कम किया हुआ। घटा हुआ। जिसका ह्रास हुआ हो। २. जो ध्वनि के रूप में व्यक्त हो। जिसकी ध्वनि हुई हो। ध्वनित। शब्दित [को०]।

ह्रसिमा
संज्ञा स्त्री० [सं० ह्रसिमन्] १. लघुता। छोटापन। २. कम होने का भाव। न्यूनता। स्वल्पता [को०]।

ह्रसिष्ठा
वि० [सं०] अत्यंत लघु या न्यून। लघुतम [को०]।

ह्नसीयस्
वि० [सं०] लघुतर। स्वल्पतर [को०]।

हृस्व (१)
वि० [सं०] १. छोटा। जो बड़ा न हो। २. नाटा। छोटे आकार का। ३. कम। थोड़ा। ४. नीचा। जैसे,—ह्रस्व द्वार। ५. तुच्छ। नाचीज। ६. जो दीर्घ न हो। लघु। जैसे—स्वर। विशेष—वर्णमाला में दीर्घ की अपेक्षा कम खींचकर बोले जानेवाले स्वर अथवा स्वरयुक्त व्यंजन 'ह्रस्व' कहलाते हैं। जैसे अ, इ, क, कि, कु, ह्रस्व वर्ण हैं और आ, ई, ऊ, का, की, कू, दीर्घ।

ह्रस्व (२)
संज्ञा पुं० १. वामन। बौना। २. दीर्ध की अपेक्षा कम खींचकर बोले जानेवाले स्वर। एक मात्रा का स्वर। जैसे,— अ, इ, उ। ३. एक प्रकार का कसीस। हीरा कसीस। पुष्पकसीस। विशेष दे० 'हीरा कसीस'। ४. यम का एक नाम [को०]।

ह्लस्वक
वि० [सं०] अत्यंत छोटा या लघु। दे० 'ह्लस्व' (१) [को०]।

ह्रस्वकर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] एक राक्षस का नाम [को०]।

ह्रस्वकुश
संज्ञा पुं० [सं०] श्वेत कुश [को०]।

ह्रस्वगर्भ
संज्ञा पुं० [सं०] कुश [को०]।

ह्रस्वगवेधुका
संज्ञा स्त्री० [सं०] नागबला। नागवल्ली। गागेरुकी [को०]।

ह्रस्वजंबु
संज्ञा पुं० [सं० ह्रस्वजम्बु] छोटी जामुन। कठजामुन [को०]।

ह्रस्वजात रोग
संज्ञा पुं० [सं०] एक रोग जिसमें दिन के समय वस्तुएँ बहुत छोटी दिखाई पड़ती हैं।

ह्रस्वजात्य
वि० [सं०] छोटी जाति या किस्म का [को०]।

ह्रस्वतंडुल
संज्ञा पुं० [सं० ह्रस्वतण्डुल] धान की एक किस्म। राजान्न [को०]।

ह्रस्वता
संज्ञा स्त्री० [सं०] छोटाई। छोटापन। अल्पता। लघुता।

ह्रस्वत्व
संज्ञा पुं० [सं०]दे० 'ह्रस्वता' [को०]।

ह्रस्वदर्भ
संज्ञा पुं० [सं०] श्वेतकुश। ह्रस्व कुश [को०]।

ह्रस्वदा
संज्ञा स्त्री० [सं०] शल्लकी। सल्लकी का वृक्ष। सलई [को०]।

ह्रस्वनिर्वंशक
संज्ञा पुं० [सं०] छोटी असि। छोटी तलवार [को०]।

ह्रस्वपत्रक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का महुआ। जंगली मधूक।

ह्रस्वपत्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'अश्वत्यी'। छोटा पीपल [को०]।

ह्रस्वपर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] पक्कड़। पाकर का पेड़।

ह्रस्वप्रवासी
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य के मतानुसार वह व्यक्ति जो कुछ काल के लिये परदेश गया हो। थोड़े समय के लिये बाहर गया हुआ मनुष्य।—उ०—ह्रस्वप्रवासी शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय, ब्राह्मणों की भार्यायें एक बरस काल तक प्रतीक्षा करें यदि उनको संतान न हुई हो; संतान हुई हो, तो बरष से अधिक।—भा० इ० रू०, पृ० ५६१। विशेष—ऐसे प्रवासियों की स्त्रियों के लिये कुछ अवधि नियत थी कि वे कितने दिनों तक पति की प्रतीक्षा करें। उस काल के पहले वे दूसरा विवाह नहीं कर सकती थीं।

ह्रस्वप्लक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] पक्कड़ वृक्ष। ह्रस्वपर्ण [को०]। विशेष—राजनिघंटु के अनुसार यह शीतल है और मूर्छा भ्रम, प्रलाप रोग और रक्तदोष को दूर करनेवाला है।

ह्रस्वफल
संज्ञा पुं० [सं०] खजूर या छुहारा।

ह्रस्वफला
संज्ञा स्त्री० [सं०] छोटी जाति की जामुन जो नदियों के किनारे होती है। भूमिजंबु।

ह्रस्वबाहु (१)
संज्ञा पुं० [सं०] निषधनरेश नल का एक नाम [को०]।

ह्रस्वबाहु (२)
वि० जिसकी बाँहें छोटी हों [को०]।

ह्रस्वबाहुक
संज्ञा पुं० वि० [सं०]दे० 'ह्रस्वबाहु' [को०]।

ह्रस्वमूर्ति
वि० [सं०] छोटे आकार या कद का। ठिँगना। नाटा [को०]।

ह्रस्वमूल
संज्ञा पुं० [सं०] लाल गन्ना।

ह्रस्वशाखाशिफ
संज्ञा पुं० [सं०] क्षुप। गुल्म। झाड़ी [को०]।

ह्रस्वसभा
संज्ञा स्त्री० [सं०] छोटी और तंग कोठरी या दालान जहाँ कुछ ही लोग बैठ सकें [को०]।

ह्रस्वांग (१)
वि० [सं०] नाटा। ठिगना। बौना।

ह्रास्वांग (२)
संज्ञा पुं० जीवक नाम का पौधा।

ह्रस्वाग्नि
संज्ञा पुं० [सं०] आक का पौधा। मदार। अर्क।

ह्राद
संज्ञा पुं० [सं०] १. ध्वनि। शब्द। आवाज। २. बादल की गरज। मेघगर्जन। ३. शब्दस्फोट। ४. एक नाग का नाम। ५. हिरण्यकशिपु के एक पुत्र का नाम।

ह्रादिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. नदी। २. वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक नदी का नाम जिसे 'ह्रादिनी' और 'दूरपारा' भी कहते थे। ३. शल्लकी वृक्ष। सलई का पेड़ (को०)। ४. बिजली। वज्र।

ह्रादी
वि० [सं० ह्रादिन्] [वि० स्त्री० ह्रादिनी] शब्द करनेवाला। गर्जन करनेवाला।

ह्रादुनि, ह्रादुनी
संज्ञा पुं० [सं०] एक नरक का नाम [को०]।

ह्रास
संज्ञा पुं० [सं०] १. पहले से छोटा या कम हो जाने की क्रिया या भाव। कमी। घटती। घटाव। छीज। क्षीणता। अवनति। २. शक्ति, वैभव, गुण आदि की कमी। ३. छोटी संख्या (को०)। ४. ध्वनि। आवाज।

ह्रासक
वि० [सं०] ह्रास करनेवाला [को०]।

ह्रासन
संज्ञा पुं० [सं०] १. क्षय करना। क्षीण करना। २. कम करना। घटाना। ३. आठ दिग्गजों में से एक का नाम [को०]।

ह्रासनीय
वि० [सं०] कम करने योग्य। घटाने लायक [को०]।

ह्रिणिया, ह्रिणीया
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'हृणिया', 'हणिया' [को०]।

ह्रित (१)
वि० [सं०] १. शर्मिंदा। लज्जित। २. ले आया हुआ। लाया हुआ। नीत। ३. अपहरण किया हुआ। छीना हुआ। दे० 'हृत'। विभक्त। विभाजित। अलग किया हुआ। [को०]।

ह्रित (२)
संज्ञा पुं० विभाग। अंश।

ह्रिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] हरण। हृति [को०]।

ह्रीं
संज्ञा पुं० [सं०] बीजमंत्र।

ह्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. लज्जा। व्रीड़ा। शर्मं। हया। संकोच। २. लज्जायुक्त होने का भाव। शर्मिंदगी (को०)। ३. दक्ष प्रजापति की कन्या जो धर्म की पत्नी मानी जाती है। ४. जैनों के अनुसार महामद्म नामक सरोबर की देवी का नाम।

ह्रीक
संज्ञा पुं० [सं०] १. पिता। जनक। २. नेवला।

ह्रीका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. लज्जा। लज्जाशीलता। हया। २. भय। डर। भीरुता (को०)।

ह्रीकु (१)
वि० [सं०] १. लजीला। लज्जाशील। शर्मीला। २. भयभीत। भीरु [को०]।

ह्रीकु (२)
संज्ञा पुं० १. बिल्ली। २. लाख। ३. राँगा।

ह्रीजित
वि० [सं०] अत्यंत लजीला। अत्यंत लज्जाशील [को०]।

ह्रीण
वि० [सं०] लंज्जित। शरमिंदा। जैसे,—ह्रीणमुख।

ह्रीत
वि० [सं०] लज्जित। लजाया हुआ। जैसे,—ह्रीतमुख।

ह्रीति
संज्ञा स्त्री० [सं०] लज्जा। शर्म। हया। संकोच।

ह्रीदेव
संज्ञा पुं० [सं०] बौद्धों के एक देवता [को०]।

ह्रीधारी
वि० [सं० ह्रीधारिन्] [वि० स्त्री० ह्रीधारिणी] लजीला। संकोची [को०]।

ह्रीनिरास
संज्ञा पुं० [सं०] निर्लज्जता। बेहयापन [को०]।

ह्रीनिषेव
वि० [सं०] विनम्र। विनयी [को०]।

ह्रीपद
संज्ञा पुं० [सं०] लज्जा या ब्रीड़ा का कारण [को०]।

ह्रीबल
वि० [सं०] अत्यंत विनयी [को०]।

ह्रीभय
संज्ञा पुं० [सं०] लज्जा का भय। लाज का डर (को०)।

ह्रीमान् (१)
वि० [सं० ह्रीमत्] [वि० स्त्री० ह्रीमती] लज्जाशील। हयादार। शर्मदार।

ह्रीमान् (२)
संज्ञा पुं० विश्वेदेवा में से एक।

ह्रीमूढ़
वि० [सं० ह्रीमूढ] लज्जा से घबराया हुआ। लज्जा के कारण निश्चेष्ट। लाज से दबा हुआ।

ह्रीयंत्रणा
संज्ञा स्त्री० [सं० ह्रीयन्त्रणा] लाज की पीड़ा (को०)।

ह्रीवेर
संज्ञा पुं० [सं०] सुगंधबाला।

ह्रीवेल, ह्रीवेलक
संज्ञा पुं० [सं०] सुगंधबाला। ह्रीवेर।

ह्रेपण
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी के लज्जित करना। अतिक्रांत या अतिशर्मित करना। २. व्याकुलता। व्यग्रता। संभ्रम [को०]।

ह्रेपित
वि० [सं०] १. लज्जित। शरमिंदा। २. अतिक्रमित। अतिक्रांत [को०]।

ह्रषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] घोड़े की हिनहिनाहट [को०]।

ह्रषित (१)
वि० [सं०] हिनहिनाया हुआ (घोड़ा) या जो हीँस रहा हो [को०]।

ह्रषित (२)
संज्ञा पुं० हिनहिनाहट। हीँसने की क्रिया [को०]।

ह्रषी
वि० [सं० ह्रेषिन्] हीँसने या हिनहिनानेवाला [को०]।

ह्रषुक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार की कुदाल [को०]।

ह्लत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] आह्लाद। खुशी। प्रसन्नता [को०]।

ह्लन्न
वि० [सं०] आनंदित। खुश। प्रसन्न [को०]।

ह्लाद
संज्ञा पुं० [सं०] १. आनंद। खुशी। प्रफुल्लता। २. नवता। ताजगी (को०)। ३. हिरण्यकशिपु के एक पुत्र का नाम।

ह्लादक
संज्ञा पुं० [सं०]दे० 'ह्लाद'।

ह्लादन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० ह्लादनीय, ह्लादित] आनंदित करना। खुश करना।

ह्लादन (२)
वि० आनंदित। खुश। प्रसन्न [को०]।

ह्लादिका
संज्ञा स्त्री० [सं०]दे० 'ह्लाद'।

ह्लादित
वि० [सं०] आनंदित [को०]।

ह्लादिनी (१)
वि० स्त्री० [सं०] आनंदित करनेवाली।

ह्लादिनी (२)
संज्ञा स्त्री० १. बिजली। वज्र। २. धूप का पौधा। ३. एक शाक्ति या देवी का नाम। ४. एक नदी का नाम। दे० 'ह्रादिनी'।

ह्लादी
वि० [सं० ह्लादिन्] १. आनंदयुक्त। आनंदी। २. प्रसन्न करनेवाला। ३. निनाद करनेवाला [को०]।

ह्लीका
संज्ञा स्त्री० [सं०] लज्जा। शर्म।

ह्लीकु (१)
वि० [सं०] १. लज्जाशील। २. भयभीत। भयालु।

ह्लीकु (२)
संज्ञा पुं० दे० 'ह्रीकु' (२) [को०]।

ह्लेषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'ह्रेषा' [को०]।

ह्वईं पु †
अव्य० [हिं० वहाँ + ही] दे० 'वहीं'। उ०—जहाँ भूप जा जा करि मरत, तिनके हाड़ ह्वई जा गिरते।—चरण०, पृ० २०८।

ह्वलन
संज्ञा पुं० [सं०] इधर उधर झुकना या गिरना पड़ना। लड़खड़ाना। थहराना।

ह्वला
संज्ञा स्त्री० [सं०] विपथगामी होने की स्थिति। पथभ्रष्टता। विमार्गगामिता (को०)।

ह्वाँ †
अव्य० [हिं० वहाँ]दे० 'वहाँ'। उ०—ना इततें कोउ जाय न ह्वातें आवई। सुंदर विरहिनि दुःखन रैनि बिहावई।—सुंदर० ग्रं०, भा० १, पृ० ३६४।

ह्वा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जिह्वा। २. तरुणी। ३. सरिता। नदी [को०]। विशेष—सौभरिकृत 'द्वयक्षर' नाममाला में ये अर्थ प्राप्त होते हैं।

ह्वा (२)
संज्ञा पुं० अभिधान। नाम। आख्या। आह्वा।

ह्वातव्य
वि० [सं०] १. जिसे पुकारा जाय। जो पुकारा जाय। २. पुकारनेवाला [को०]।

ह्वान
संज्ञा पुं० [सं०] १. बुलाना। पुकारना। २. चिल्लाहट। शोरगुल। ३. युद्ध के आह्वान। युद्धाह्वान। ललकार [को०]।

ह्वायक
वि० [सं०] पुकारनेवाला। आह्वान करनेवाला [को०]।

ह्वायि
वि० [सं० ह्वायिन्] १. पुकारनेवाला। बुलानेवाला। २. युद्धार्थ आह्वान करनेवाला। ललकारनेवाला [को०]।

ह्वार्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. सर्पं। साँप। २. अश्व। घोड़ा [को०]।

ह्वाल पु †
संज्ञा पुं० [अ० हाल] दशा। अवस्था। दे० 'हवाल'। उ०—चाँवल खाय चंगा माल। साँई बिना भूँडो ह्नाल।—राम०, धर्म०, पृ० १६६।

ह्विप
संज्ञा पुं० [अं०] १. पार्लमेंट या व्यवस्थापिका सभा का वह सदस्य जो अपनी पार्टी या दल के सदस्यों को किसी महत्व के प्रश्न पर वोट या मत लिए जाने के समय सभा में अधिकाधिक संख्या में उपस्थित करता है। दलदूत। जैसे,—इस बार परिषद् के स्वराजी दल के ह्विप के उद्योग से दल के समस्त सदस्य १२ ता० को अधिवेशन में उपस्थित हुए थे।—(शब्द०)। विशेष—ह्विप का काम है, अपने दल के प्रत्येक सदस्य को सूचित करना कि अनुक समय पर अमुक महत्व के विषय पर वोट या मत लिए जायँगे, और इस बात का ध्यान रखना कि वोट लिए जाने के पहले सभा से दल का कोई सदस्य बाहर न जाने पावे (अर्थात् उन सबको सभा में रोक रखना); अपने दल के सदस्यों को बताना कि किस प्रकार वोट देना चाहिए; वोट लिएजाने के समय प्रत्येक दल के सदस्यों की गणना करना; अपने दल के सदस्यों से मिलते जुलते रहना और किसी विषय पर उनका क्या निश्चित मत है, यह अपने दल के नेता को विदित करना, जिसमें वह निश्चय कर सके कि कहाँ तक हमें इस विषय में अपने दल का सहारा मिलेगा। सारंश यह कि ह्विप का काम दल के स्वार्थ या हित का देखना है। २. चाबुक। ३. सारथी। कोचवान।

ह्विस्की
संज्ञा स्त्री० [अं०] एक प्रकार की अँगरेजी शराब।

ह्वेल
संज्ञा पुं० [अं०] एक बहुत बड़ा समुद्री जंतु जो आज कल पाए जानेवाले पृथ्वी पर के सब जीवों से बड़ा होता है। विशेष—ह्वेल ८० या ९० फुट तक लंबे होते हैं। इसकी खाल के नीचे चरबी की एक बड़ी मोटी तह होती है। आगे की ओर दो पर होते हैं; जिनसे यह पानी ठेलता और अपनी रक्षा करता है। किसी किसी जाति के ह्वेल की दुम के पास भी एक पर सा होता है। पूँछ के बल ये जंतु पानी के बाहर कूदकर आते हैं। मछली के समान ह्वेल अंडज जीव नहीं है, पिंडज है। मादा बच्चे देती है और अपने दो थनों से दूध पिलाती है। बहुत छोटे छोटे कान भी ह्वेल को होते हैं। यह जंतु छोटी छोटी मछलियाँ खाकर रहता है। यह बहुत देर तक पानी में डूबा नहीं रह सकता। फेफड़े या गलफड़े के अतिरिक्त दो छेद इसके सिर में होते हैं जिनसे यह साँस भी लेता है और पानी का फुहारा भी छोड़ता है। इसकी आँखें बहुत छोटी होती हैं। पृथ्वी के उत्तरी भाग के समुद्रों में ह्वेल बहुत पाए जाते हैं और उनका शिकार होता है। ह्वेल की हड्डियों से हाथीदाँत की तरह अनेक प्रकार के सामान बनते हैं। इसकी अँताड़ियों में एक प्रकार का सुगंधित द्रव्य जमा हुआ मिलता है जो 'अंबर' के नाम से प्रसिद्ध है और जो भारतवर्ष, अफ्रिका और दक्षिण अमेरिका के समुद्रतट पर बहता हुआ पाया जाता है। प्राणिविज्ञानवेत्ताओं का कहना है कि ह्वेल पूर्व कल्प में स्थलचारी जंतु था और पानी के किनारे दलदलों में रहा करता था। क्रमशः पृथ्वी पर ऐसी अवस्था आती गई जिससे उसका जमीन पर रहना कठिन होता गया और स्थितिपरिवर्तन के अनुसार इसके अवयवों में फेरफार होता गया; यहाँ तक कि लाखो वर्ष अनंतर ह्वेलों में जल मे रहने के उपयुक्त अवयवों का विधान हो गया; जैसे, उनके अगले पैर मछली के डैने के रूप में हो गए, यद्यपि उनमें हड्डियाँ वे ही बनी रहीं जो घोड़े, गधे आदि के अगले पैरों में होती हैं। हमारे यहाँ के प्राचीन ग्रंथों में 'तिमिंगिल' नामक एक बड़े भारी मत्स्य या जलजंतु का उल्लेख मिलता है जो संभव है, ह्वेल हो हो।