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मिंगनी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'मँगनी'।

मिंगी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'मींगी'। उ०—स्त्रिंगी की मिंगी करि डारी पारासर के उदक बिदार।—कबीर श०, भा० ४, पृ० २२।

मिंजारी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० मार्जारी] बिल्ली। उ०—मूसै मिंजारी वशि कीनी। नानक गुर मिलि उलटी चीनी।—प्राण०, पृ० १३९।

मिंट (१)
संज्ञा पुं० [अं०] १. वह स्थान जहाँ सिक्के ढलते हों। टकसाल। २. एक प्रकार का बढ़िया सोना। टकसाली सोना।

मिंट † (२)
संज्ञा स्त्री० [अं० मिनट] दे० 'मिनट'।

मिँडवारी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० मेड़] दे० 'मेंड़'। उ०—इंद्र के बरषत जल भरि भारी। टूरि फूरि गई सब मिंडवारी।— नंद० ग्रं०, पृ० २९०।

मिँड़ाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० मींड़ना] १. मींडने या मींजने की क्रिया या भाव। २. मींडने की मजदूरी। ३. देशी छींट की छपाई में एक क्रिया जो कपड़े को छापने के उपरांत और धोने से पहली होती है। विशेष—इसके लिये पानी से भरी एक नाँद में कुछ रेंड़ी का तेल और बकरी की मेंगनी तथा दो एक और मसाले डाले जाते हैं; और उसमें छापा हुआ कपड़ा तीन चार दिन तक भिगोया जाता है। आवश्यकता पड़ने पर यह क्रिया दो तीन बार भी की जाती है। नाँद में से निकालकर कपड़ा धोबी के यहाँ भेजा जाता है। इससे छींट का रंग पक्का और चमकदार हो जाता है। इसे तेल चलाई भी कहते हैं।

मिंत पु †
संज्ञा पुं० [सं० मित्र] दे० 'मित्र'। उ०—(क) आली औरे मिंत को मेरी मिट्यो मिलाप।—मतिराम (शब्द०)। (ख) तू हेरे भीतर सों मिंता। सोई करै जेहि लहै न चिंता।—जायसी (शब्द०)।

मिंदर पु †
संज्ञा पुं० [सं० मन्दिर] दे० 'मंदिर'। उ०—त्रुगुटी मिंदर बैठा साधो वहाँ जाय दरमन कीजै।—रामानंद, पृ० २८।

मिंबर
संज्ञा पुं० [अ० मेंबर] दे० 'मेंबर'। उ०— राजा करो, राय- बहादुर को, कौंसिल का मिंबर करो हम तुमको प्रणाम करते हैं।—भारतेंदु ग्रं०, भा० ३, पृ० ८५७।

मिंमिण
संज्ञा पुं० [सं० मिणमिण] एक प्रकार का रोग। नकियाकर बोलना। उ०—मिंमिण कहिए, गिनगिनाय कर नाक से बोले। यह भी रोग है।—माधव०, पृ० १४४।

मिँहदी
संज्ञा स्त्री० [सं० मेन्धिका] दे० 'मेहँदी'।

मिआद
संज्ञा स्त्री० [अ० मीआद] दे० 'मीआद'।

मिआदी
वि०[हिं०] दे० 'मीआदी'।

मिआन (१)
वि०[हिं० मियाना] दे० 'मियाना (१)'।

मिआन (२)
संज्ञा पुं० दे० 'मियाना (२)'।

मिकद
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० मिकअद] मलद्वार। गुदा।

मिकदार
संज्ञा स्त्री० [अ० मिक़दार] परिमाण। मात्रा। मान। जैसे,—यह दवा ज्यादा मिकदार में नहीं खानी चाहिए।

मिकनातीस
संज्ञा पुं० [फ़ा०] चुंबक पत्थर।

मिकराज
संज्ञा स्त्री० [अ० मिक़राज़, मिक्रा़ज़] कर्तनी। कतरनी। कैंची [को०]।

मिकराजा
संज्ञा पुं० [अ० मिक़राज़ह्] १. वह तीर जिसके फल में दो गाँसे हों। २. एक प्रकार की मिठाई। ३. कुश्ती का एक दाँव। कैंची।

मिकाडो
संज्ञा पुं० [जा०] जापान के सम्राट् की उपाधि।

मिक्सचर
संज्ञा पुं० [अं०] ऐसी तरल औषध जिसमें कई ओषधियाँ मिली हों। मिश्रित औषध। जैसे, किनाइन मिक्सचर।

मिग पु
संज्ञा पुं० [सं० मृग, प्रा० मिग] मृग। हिरन।

मिगस्सर पु †
संज्ञा पुं० [सं० मृगशीर्ष] दे० 'मार्गशीर्ष'। उ०— मास मिगस्सर् द्वादशी, इल पुड़ पख आँधियार।—रा० रू०, पृ० २२८।

मिचकना †
क्रि० अ० [हिं० मिचना] १. (आँखों का) बार बार खुलना और बंद होना। २. (पलकों का) झपकना या बंद होना।

मिचकाना †
क्रि० स० [हिं० मिचना] १. बार बार (आँखें) खोलना और बंद करना। २. (पलक) झपकाना या बंद करके दबाना। जैसे, आँखें मिचकाना। संयो० क्रि०—देना। लेना।

मिचकी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० मिचना] पलकों की झपकी। पलकों का मिचना। उ०—मधुर मिसमिसी सों मिचकी दै, जाहि हिलावन।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ८९५।

मिचना
क्रि० अ० [हिं० मीचना का अक० रूप] (आँखों का) बंद होना। जैसे,—मारे नींद के आँखे मिची जाती हैं।

मिचराना (१)
क्रि० अ० [मिचर, चाबने के शब्द से अनु०] बिना मूख के खाना। इच्छा न होने पर भी भोजन करना। विशेष—बहुत धीरे धीरे खाने पर विशेषतः बालकों के संबंध में बोलते हैं।

मिचराना † (२)
क्रि० अ० [हिं० मिचलाना] दे० 'मिचलाना'। उ०— जाइ मो मैं डारत ही मो चिपचिपावे लगो और जी मिचराइ कै उल्टी आइ गई।—श्रीनिवास ग्रं०, पृ० ४२।

मिचलाना
क्रि० अ० [हिं० मथना, मतलाना] कै आने को होना। उबकाई आना। मतली आना।

मिचली
संज्ञा स्त्री० [हिं० मिचलाना] जी मिचलाने की क्रिया या भाव। कै होने की इच्छा।

मिचवाना
क्रि० स० [हिं० मीचना का प्रे० रूप] मीचने का काम दूसरे से कराना। दूसरे को मीचने में प्रवृत करना। दूसरे से आँखे बंद कराना।

मिचिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्राचीन नदी का नाम।

मिचु †
संज्ञा स्त्री० [सं० मृत्यु, प्रा० मिच्चु] मृत्यु। मौत।

मिचौनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० मीचना] १. (आँख) १. मीचने की क्रिया। २. दे० 'आँखमिचौली'। उ०—हुई बहुत दिन खेल मिचौनी।—निशा०, पृ० ६९।

मीचौलना
क्रि० स० [हिं०] दे० 'मीचना'।

मीचौली
संज्ञा स्त्री० [हिं० मींचना] दे० 'आँखमिचौली'।

मिचौहाँ पु
वि० [हिं० मीचना] आधा मुँदा हुआ। अधमुँदा। उ०—झपकोहैं पल देखियतु कहत हँसौहै वैन। अलसौंहें सौ गात कत करत मिचौहें नैन।—स० सप्तक, पृ० ३८७।

मिच्छक
संज्ञा पुं० [सं०] एक बौद्ध स्थविर का नाम।

मिछ पु
संज्ञा पुं० [सं० म्लेच्छ] दे० 'म्लेच्छ'। उ०—कहै दूत प्रथिराज सम मिछ सेना बरजोर। सहर निकसि बाहर भए बंब बज्जि घनघोर।—पृ० रा०, १३।२६।

मिछा पु †
वि० [सं० मृपा] दे० 'मिथ्या'।

मिजमानी पु
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० मेज़बान] महमानदारी। मेजबानी। उ०—रानिय आई मल्हन दे, बहु मिजमानिय कीन।—प० रासो, पृ० ६८।

मिजराब
संज्ञा स्त्री० [अ० मिज़राब] तार का बना हुआ एक प्रकार का छल्ला जिसमें मुड़े तार की एक नोक आगे निकली रहती है और जिससे सितार आदि के तार पर आघात करके बजाते हैं। डंका। कोण। नाखुना।

मिजवानी
संज्ञा स्त्री० [हिं० मेजबानी] दे० 'मेजबानी'।

मिजाज
संज्ञा पुं० [अ० मिज़ाज] १. किसी पदार्थ का वह मूल गुण जो सदा बना रहे। तासीर। २. प्राणी की प्रधान प्रवृत्ति। स्वभाव। प्रकृति। जैसे,—उनका मिजाज बहुत सख्त है; वेबात बात पर बिगड़ जाते हैं। ३. शरीर या मन की दशा। तबीयत। दिल। यौ०—मिजाज आली। मिजाज शरीर। मिजाज पुरसी। मुहा०—मिजाज खराब होना = (१) मन में किसी प्रकार का अप्रसन्नता आदि उत्पन्न होना। ग्लानि आदि होना। (२) अस्वस्थता होना। मिजाज बिगड़ना = दे० 'मिजाज खराब होना'। मिजाज बिगाड़ना = किसी के मन में क्रोध, अभिमान आदि मनोबिकार उत्पन्न करना। मिजाज पाना = (१) किसी के स्वभाव से परिचित होना। (२) किसी को अनुकूल या प्रसन्न देखना। मिजाज पूछना = (१) तबीयत का हाल पूछना। यह पूछना कि आपका शरीर तो अच्छा है। (२) अच्छी तरह खबर लेना। दंड देना। मिजाज में आना = ध्यान में आना। समझ में आना। जैसे,—अगर आपके मिजाज में आवे तो आप भी वहाँ चलिए। मिजाज सीधा होना = अनुकूल या प्रसन्न होना। तबीयत ठिकाने होना। ४. अभिमान। घमंड। शेखी। मुहा०—मिजाज आना = अभिमान करना। घमंड होना। मिजाज में आना = अभिमान करना। घमंड करना। जैसे,— इस वक्त कुछ न पूछो, आप मिजाज में आ गए हैं। मिजाज मिलना = घमंड दूर होना। वशवर्ती होना। उ०—चंगुल तर चिचियैही हो, तब मिलिहैं मिजाज।—पलटू०, भा० ३, पृ० १६। मिजाज न मिलना = अभीमान के कारण किसी का अलग रहना। घमंड के कारण बात न करना। जैसे,— आजकल तो आपके मिजाज नहीं मिलते। (विशेष—इस अर्थ में इस शब्द का प्रयोग वहुधा बहुवचन में होता है।) मिजाज सातवें आसमान पर होना = घमंड का बहुत अधिक बढ़ जाना। मिजाज होना = घमंड में होना। घमंड में आना। यौ०—मिजाजदाँ। मिजाजदार। मिजाजवाला = मिजाजदार। मिजाजशनास = मिजाजदाँ। मिजाजशनासी = स्वभाव जानना।

मिजाज आली?
[अ० मिजाज आली] एक वाक्यांश जिसका व्यवहार किसी का शारीरिक कुशल मंगल पूछने के समय होता है। आप अच्छे तो हैं ?

मिजाजदाँ
वि० [अ० मिज़ाज + फ़ा० दा (प्रत्य०)] मिजाज पहचानेवाला। स्वभाव से परिचीत [को०]।

मिजाजदार
वि० [अ० मिज़ाज + फ़ा० दार (प्रत्य०)] जिसे बहुत अभिमान हो। घमंडी।

मिजाजपीटा
वि० [अ० मीज़ाज + हिं० पीटना] [ वि० स्त्री० मिजाजपीटी] जिसे बहुत अधिक घमंड हो। अभिमानी घमंडी। (स्त्री०)।

मिजाजपुरसी
संज्ञा स्त्री० [अ० मिज़ाज + फ़ा० पुरसी] किसी से यह पूछना कि आपका मिजाज तो अच्छा है। तबीयत का हाल पूछना। शारीरिक कुशल मंगल पूछना।

मिजाज शरीफ?
[अ० मिज़ाज शरीफ] एक वाक्यांश जिसका व्यवहार किसी का शारीरिक कुशल मंगल पूछने के लिये होता है। आप अच्छे तो हैं ? आप सकुशल तो हैं ?

मिजाजी
वि० [अ० मिज़ाज + ई (प्रत्य०)] बहुत अधिक मिजाज करने या रखनेवाला। अभिमानी। घमंडी।

मिजाजो †
वि० स्त्री० [अ० मिज़ाज + ओ (प्रत्य०)] घमंडी। अभिमानी।

मिजालू पु
संज्ञा स्त्री० [सं० मज्जा] मज्जा। चर्बी। उ०—चांम ही चांम घसंतां गुरदेव दिन दिन छीजे काया। होठ कंठ तालुका सोषी काढ़ि मिजालू खाया।—गोरख०, पृ० १४५।

गिझमाण पु †
संज्ञा पुं० [हिं० मेहमान] दे० 'मेहमान'। उ०— मोहन उदमाद्या जी म्हाँरे आया छै मिझमान।—ब्रज ग्रं०, पृ० १६५।

मिझमानी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० मेहमानी] दे० 'मेहमानी'। उ०— ठानी मिझमानी जब दुर्योधन माधव की, बाजी गजराज निजराने को बने रहे।—राम० धर्म, पृ० २७१।

मिझोना †
संज्ञा पुं० [सं० मध्य, पु० हिं० माँझ] वह खूँटी जो हल में बेड़े बल में लगी हुई लकड़ी के बीच में रहती है। (बुंदेल०)।

मिटका
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'मटका'।

मिटना
क्रि० अ० [सं० मृष्ट, प्रा० मिठ्ठ] १. किसी अंकित चिह्न आदि का न रह जाना। जैसे,—इस पन्ने के कई अक्षर मिट गए हैं। २. नष्ट हो जाना। न रह जाना। ३. खराब होना। बरबाद होना। जैसे, घर मिटना। ४. रद्द होना। जैसे, विधाता का लेख मिटना। संयों० क्रि०—जाना।

मिटाना
क्रि० स० [हिं० मिटना का सक० रूप] १. रेखा, दाग, चिह्न आदि का दूर करना। उ०—कर्म रेख नहि मिटे मिटाई।— कबीर सा०, पृ० ९६०। २. नष्ट करना। न रहने देना। दूर करना। उ०—ताकर तोहि भेद समझाऊँ, मनोकामना सकल मिटाऊँ।—कबीर सा०, पृ० १००९। ३. खराब करना। चौपट करना। बरबाद करना। ४. रद्द करना। संयो० क्रि०—जाना।—देना।

मिटिया † (१)
संज्ञा० स्त्री० [हिं० मेटा + इया (प्रत्य०)] मिट्टी का छोटा बरतन जिसमें प्रायः दूध आदि रखा जाता है। मटकी।

मिटिया (२)
वि० [हिं० मिट्टी + इया (प्रत्य०)] मिट्टी का।

मिटियाना
क्रि० स० [हिं० मिट्टी + आना(प्रत्य०)] मिट्टी लगाकर साफ करना, रगड़ना या चिकना करना। जैसे, लोटा मिटियाना।

मिटियाफ़ूस
वि० [हिं० मिटिया + फूस] जो कुछ हढ़ न हो। बहुत ही कमजोर।

मिटियामहल
संज्ञा पुं० [हिं० मिटिया + फ़ा० महल] मिट्टी का मकान। झोपड़ी। (व्यंग्य)।

मिटियासाँप
संज्ञा पुं० [हिं० मिटिया + साँप] मटमैले रंग का एक प्रकार का साँप जिसके ऊपर काले रंग की चित्तियाँ होती हैं।

मिटिहा पु
वि० [हिं० मिट्टी + हा (प्रत्य०)] मिट्टी का। मिट्टीवाला। उ०—कची दिवाल मिटिहा मंदिर कंचन कलई लागा। खोदत खाक जाक सब भूलेव पाक भया नहिं कागा।—संत० दरिया, पृ० १२३।

मिट्टना पु
क्रि० अ०, स० [हिं० मिटना] दे० 'मिटना'। उ०— (क) वह कह करि द्विजराज चलि फेरि रोकि कहि नारि। म्हाँ कलंक को मिट्टइय उड़पति कहहु विचारि।—प० रासो, पृ० १०। २. दे० 'मिटना'। उ०—तिहिं परसी ताप मिट्टत सरीर।—ह० रासो, पृ० १९।

मिट्टी
संज्ञा स्त्री० [सं० मृत्तिका, प्रा० मिट्टिआ] १. पृथ्वी। भूमि। जमीन। जैसे,—जो चीज मिट्टी से बनती हैं, वह मिट्टी में ही मिल जाती है। मुहा०—मिट्टी पकड़ना = जमीन पर दृढ़तापूर्वक जम जाना। २. वह भुरसुरा पदार्थ जो पृथ्वी के ठोस विभाग अथवा स्थल में साधारणतः सब जगह पाया जाता है और जो ऊपरी तल की प्रधान वस्तु है खाक। धूल। मुहा०—मिट्टी करना = नष्ट करना। खराब करना, चौपट करना। जैसे, रुपया मिट्टी करना, इज्जत मिट्टी करना, शरीर मिट्टी करना, कपड़े मिट्टी करना। मिट्टी के मोल = बहुत सस्ता। बहुत ही थोड़े मूल्य पर। जैसे—वह मकान तो मिट्टी के मोल बिक रहा है। मिट्टी डालना = (१) किसी बात को जाने देना। छोड़ देना। (२) किसी के दोष छिपाना। परदा डालना। (३) एक प्रकार का प्रयोग जिसमें किसी की कोई छोटी मोटी चीज, विशेषतः गहना आदि, खो जाने पर सब लोग एक स्थान पर जाकर थोड़ी थोड़ी मिट्टी डाल आते हैं। इस प्रकार कभी कभी चुरानेवाला भी भयवश अथवा और किसी कारण से चुराई हुई चीज उसी मिट्टी के साथ वहाँ रख आता है, जिससे मालिक को चीज तो मिल जाती है और यह नहीं प्रकट होने पाता कि कौन चोर है। मिट्टी डलवाना = चोरी गई हुई चीज का पता लगाने के लिये लोगों से किसी स्थान पर मिट्टी डालने के लिये कहना। विशेष दे० 'मिट्टी डालना'। मिट्टी देना = (१) मुसलमानों में किसी के मरने पर सब लोगों का उसकी कब्र में तीन तीन मुठ्ठी मिट्टी डालना जो पुण्य कार्य समझा जाता है। (२) कब्र में गाड़ना। (मुसल०)। मिट्टी पकड़े या छूए सोना होना = भाग्य का प्रवल होना। सितारा चमकना। साधारण कान में भी विशेष लाभ होना। मिट्टी में मिलना = (१) नष्ट होना। चौपट होना। खराब होना। (२) मरना। मिट्टी में मिलाना = नष्ट करना। चौपट करना। बरबाद करना मिट्टी हाना = (१) नष्ट होना। खराब होना। (२) गंदा या मैला कुचैला होना। यौ०—मिट्टी का पुतला = मानव शरीर। मिट्टी की सूरत = मानव शरीर। मिट्टी के माधव = मूर्ख बेवकूफ। भांदू। मिट्टी खराबी = (१) दुर्दशा। (२) बरबादी। नाश। ३. किसी चीज को जलाकर तैयार की हुई राख। भस्म। जैसे, पारे की मिट्टी। सोने की मिट्टी। ४. कुछ विशेष प्रकार की अथवा साफ की हुई मिट्टी जो भिन्न भिन्न कामों में आती है। जैसे, मुलतानी मिट्टी, पीली मिट्टी। ५. शरीर। जिस्म। बदन। मुहा०—किसी की मिट्टी पलीद या बरबाद करना = दुर्दशा करना। खराबी करना। (इस अर्थ में मुहावरा अर्थ सं० ६ के साथ भी लगता है। मिट्टी खराब करना = बर्बाद करना। रूप बिगाड़ना। उ०—लोग कजली की मिट्टी खराब कर रहे हैं।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० ३४४। ६. शव। लाश। मुहा०—मिट्टी उठना = शव की अंत्येष्टि के लिये ले जाना। जनाजा उठना। मिट्टी ठिकाने लगना = शव की उचित अंत्येष्टि क्रिया होना। मिट्टी ठिकाने लगाना = शव की उचित अंत्येष्टि क्रिया करना। ७. खाने का गोश्त। मांस। कलिया। (क्व०)। ८. शारीरिक गठन। बदन की बनावट। जैसे,—उसकी मिट्टी बहुत अच्छी है, साठ वर्ष का होने पर भी जवान जान पड़ता है। मुहा०—मिट्टी ढह जाना = शरीर में बुढ़ापे के चिह्न दिखाई देना। ९. चंदन की जमीन जो इत्र में दी जाती है।

मिट्टी का तेल
संज्ञा पुं० [हिं० मिट्टी + का + तेल] एक प्रसिद्ध ज्वलनशील, खनिज, तरल पदार्थ जिसका व्यवहार प्रायः सारे संसार में दीपक आदि जलाने और प्रकाश करने के लिये होता है। विशेष—यह संसार के भिन्न भिन्न भागों में जमीन के अंदर पाया जाता है। कभी कभी तो जमीन में आपसे आप दरारें पड़ जाती हैं जिनमें से यह तेल निकलने लगता है, और इस प्रकार वहाँ इसके चश्मे बन जाते हैं। पर प्रायः यह जमीन में बड़े बड़े सूराख या छिद्र करके पिचकारी की तरह बडे़ बड़े यंत्रों की सहायता से ही निकाला जाता है। कभी कभी यह जमीन के अंदर गैसों के जोर करने के कारण भी अपने आप फूट पड़ता है। कुछ लोग कहते है, जमीन के अंदर जो लौह मिश्रित बहुत गरम कारवाइड होता है, उसपर जल पड़ने से यह तैयार होता है, और कुछ लोगों का मत है, कि जमीन के अंदर अनेक प्रकार के जीवों के मृतक शरीरों के सड़ने से यह तैयार होता है। एक मत यह भी है कि इसको उत्पति का संबंध नमक की उत्पत्ति से है क्योंकि अनेक स्थानों में यह नमक की खान के पास ही पाय जाता है। इसी प्रकार इसकी उत्पत्ति के संबंध में और भी अनेक मत हैं। अमेरिका के संयुक्त राज्यों तथा रूम में इसकी खानें बहुत अधिक हैं और इन्हीं दोनों देशों में सबसे अधिक मिट्टी का तेल निकलता है। भारत में इसकी खानें या तो पंजाब और बलोचिस्तान की ओर हैं या आसाम और बरमा की ओर। परंतु पश्चिमी प्रांतों से अभी तक बहुत थोड़ा तेल निकाल जाता है और पूर्वी प्रांतों से अपेक्षाकृत अधिक। इधर गुजरात तथा कच्छ आदि में भी इसकी प्राप्ति हो रही है। अरब देशों में यह रेगिस्तान के नीचे मिला है और समुद्र तल के नीचे भी यह प्राप्त हुआ है। बहुत बढ़िया तेल का रंगसफेद और स्वच्छ जल के समान होता है, पर साधारण तेल का रंग कुछ लाली या नीलापन लिए और घटिया तेल का रंग प्रायः काला होता है। बढ़िया साफ किया हुआ तेल पतला और घटिया तेल गाढ़ा होता है। प्रकाश करने के अतिरिक्त इसका उपयोग छोटे इंजन चलाने, गैस तैयार करने, अनेक प्रकार के तेलों और वारनिशों आदि को गलाने और मोमबत्तियाँ आदि बनाने में होता है। इसमें एक प्रकार की उग्र और अप्रिय गंध होती है। थोड़ी मात्रा में जबान पर लगने या गले के निचे उतरने पर यह कै लाता है; और अधिक मात्रा में भीषण विप का काम करता है। मोटरों आदि में जो पेट्रोलियम जलाया जाता है, वह भी इसी का एक भेद है।

मिट्टी का फूल
संज्ञा पुं० [हिं० मिट्टी + फूल] मिट्टी या जमीन के ऊपर जम आनेवाला एक प्रकार का छार जिसका व्यवहार कपड़ा धोने और शीशा बनाने में होता है। रेह।

मिट्टी खरिया
संज्ञा स्त्री० [हिं० मिट्टी + खड़िया] दे० 'खड़िया'।

मिट्ठा †
वि० संज्ञा पुं० [सं० मिष्ट] दे० 'मीठा'। उ०—देसिल वअना सब जन मिठ्ठा। तं तैसन जंपओं अवहट्ठा।—कीर्ति०, पृ० ६।

मिट्ठी
संज्ञा स्त्री० [हिं० मीठा] चुंबन। चूमा। (इस शब्द का व्यवहार स्त्रियाँ प्रायः छोटे बालकों के साथ करती हैं)। क्रि० प्र०—देना।—लेना।

मिठ्ठू (१)
संज्ञा पुं० [हिं० मीठा + ऊ (प्रत्य०)] १. मधुरभाषी। मीठा बोलनेवाला। २. तोता। मुहा०—अपने मुँह आप मियाँ मिट्ठू बनना = अपनी प्रशंसा आप करना। अपने मुँह से अपनी बड़ाई करना।

मिठ्ठू (२)
वि० १. चूप रहनेवाला। न बोलनेवाला। २. प्रिय बोलनेवाला। मधुरभाषी।

मिठ्ठू (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'मिट्टी'।

मिट्ठा
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'मिट्टी'।

मिठ
वि० [हिं० मीठा] मीठा का संक्षिप्त रूप जिसका व्यवहार प्रायः यौगिक बनाने के लिये होता है और जो किसी शब्द के पहले जोड़ा जाता है। जैसे, मिठलोना, मिठबोला।

मिठबोलना
संज्ञा पुं० [हिं० मीठा + बोलना] दे० 'मिठबोला'।

मिठबोला
संज्ञा पुं० [हिं० मीठा + बोलना] १. वह जो मीठी मीठी बातें करता हो। मधुरभाषी। उ०—रामेसरी का घरवाला अच्छा पंडित था, नेकनीयत और मिठबोला।—नई०, पृ० २३ २. वह जो मन में कपट रखकर मीठी बातें करता हो।

मिठरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'मठरी'।

मिठलोना
संज्ञा पुं० [हिं० मीठा (= कम) + लोन (= नोन)] वह जिसमें बहुत ही कम नमक हो। थोड़े नमकवाला।

मिठहा
वि० [हिं० मीठा + हा(प्रत्य०)] अधिक मीठा खानेवाला।

मिठाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० मीठा + आई (प्रत्य०)] १. मीठा होने का भाव। मिठास। माधुरी। २. कोई खाने की मीठी चीज। जैसे लड्डू, पेड़ा, बरफी, जलेबी आदि। मुहा—मिठाई चढ़ना = मनोवांछित कार्य पूरा होने पर पहले से संकल्पित मिठाई किसी देवता को अप्रित करना। मिठाई बाँटना = मनोवांछित कार्य पूरा होने पर प्रसन्नतास्वरूप मिठाई बाँटना। अधिक मिठाई में कीड़े पड़ते है = आवश्यकता से अधिक प्रेम होने पर उस प्रेम में बाधाएँ आती हैं। जो प्रेम आवश्यकता से अधिक होता है, वही खराब होता है। गई नारि जो खाई मिठाई = यदि स्त्री मिठबोली और उदार स्वभाव की है, तो उसके सतीत्व खो बैठने या हानि उठाने की संभावना रहती है। (लोकोक्ति)। ३. कोई अच्छा पदार्थ या बात।

मिठाना
क्रि० अ० [हिं० मीठा + आना (प्रत्य०)] मीठा होना। मधुर होना। उ०—मारयौ मनुहारिन भरी, गारयौ खरी मिठाहि। बाकौ अति अनखाहटौ, मुसकाहट बिनु नाहिं।—बिहारी (शब्द०)।

मिठास
संज्ञा स्त्री० [हिं० मीठा + आस (प्रतय०)] मीठा होने का भाव। मीठापन। माधुर्य। जैसे,—इसकी मिठास तो बिलकुल मिसरी के समान है।

मिठौरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० मीठा + बरी] पीसे हुए उड़द या चने की बनी हुई बरी।

मिडना पु
क्रि० अ० [हिं० मींड़ना] १. मला जाना। मसला जाना। उ०—सुमन सेज में लगी रहै सुंदरि तेरे गात। सुरभित हू मिडि के भए मृदुलनाल जलजात।—शकुंतला, पृ० ५४। २. चिपकना। लग जाना। उ०—धनआनंद एंड़िनि आनि मिडै तरवानि तरे तें भरै न डगै।—घनानंद, पृ० १४।

मिड़ाई
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'मिड़ाई'।

मिडिल (१)
वि० [अं०] किसी पदार्थ का मध्य। बीच।

मिडिल (२)
संज्ञा पुं० शिक्षाक्रम में एक छोटी कक्षा या दरजा जो स्कूल के अंतिम दर्जे इंट्रेंस से छोटा होता था। विशेष—अब यह नाम प्रचलित नहीं है। मिडिल स्कूलों को अब जूनियर हाई स्कूलों में बदल दिया गया है।

मिडिलची
संज्ञा पुं० [हिं० मिडिल + ची (प्रत्य०)] वह जो मिडिल परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ हो। मिडिल पास (उपेक्षा०)।

मिडिल स्कूल
संज्ञा पुं० [अं०] वह स्कूल या विद्यालय जिसमें केवल मिडिल तक की पढ़ाई होती हो।

मिढुलिया †
संज्ञा स्त्री० [हिं० मढ़ी] मढ़ी। कुटी। मढ़िया।

मिण पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'मणि'। उ०—सिर राखै मिण, सांमध्रम, रीझै सिंधू राग।—बाँकी० ग्रं०, भा० १, पृ० ७। यौ०—मिणधारी = मणि को धारण करनेवाला। मुख्य। उ०— मांगलियौ सुंदर मिणधारी।—रा० रू०, पृ० १४०। मिणियड़ = मनियर। मणिवाला। प्रधान। मुख्य। उ०— मिणियड़ दल मेले धर मंगल—रा० रू०, पृ० ३१४ ।

मितंग पु
संज्ञा पुं० [सं० मितङ्गम] हाथी।

मितंगम (१)
वि० धीरे धीरे चलनेवाला। मंदगामी।

मितंगम (२)
संज्ञा पुं० हाथी [को०]।

मितंपच
वि० [सं० मितम्पच] १. नपा तुला पकानेवाला। थोड़ी मात्रा में अन्न पकानेवाला। २. लघु या छोटे आकार का (वर्तन)। ३. मितव्ययी। अल्प व्यय करनेवाला [को०]।

मित (१)
वि० [सं०] १. जो सीमा के अंदर हो। नपातुला। परिमित। २. थोड़ा। कम। जैसे,—मितव्ययी, मितभाषी। ३. फेंका हुआ। क्षिप्त।

मित पु
संज्ञा स्त्री० परिमाण। सीमा।

मितऊ पु
संज्ञा पुं० [सं० मिन्न] मीत। साजन। प्रियतम। उ०— मितऊ मड़ैया सूनी करि गैलो।—धरम० श०, पृ० १२।

मितद्र
संज्ञा पुं० [सं०] समुद्र। सागर।

मितन्नी
संज्ञा स्त्री० [?] प्रागैतिहासिक आर्य जाति जो मध्य एशिया में थी। उ०—हाल में ही पच्छिम एशिया के बोगजक्वाई नामक स्थान पर मितन्नी लेख मिले है जो ई० पू० १४०० के हैं और जिनमें वैदिक देवताओं का उल्लेख है।—हिंदु० सभ्यता, पृ० २७।

मितपन पु
संज्ञा पुं० [निं० मीत + पन (प्रतय०)] मित्रता। स्नेह। प्रेम। उ०—मोहन लाल कहत राधा सों मेरें तो तुम ही सों मितपन।—छीत०, पृ० ६२।

मितभाषिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] संयमित होकर बोलना। समझ बूझ के साथ थोड़ा बोलने की क्रिया। उ०—शिष्टता, नम्रता, सरलता, मितभाषिता, अतिथिप्रियता आदि उसके गुणों की ख्याति भारत में ही नही, प्रत्युत इंग्लिस्तान आदि सुदूरवर्ती देशों तक फैली हुई है।—राज० इति०, पृ० ११७०।

मितभाषी पु
संज्ञा पुं० [सं० मितभाषिन्] [स्त्री० मितभाषिणी] १. वह जो बहुत कम बोलता हो। थोड़ा बोलनेवाला। २. समझ बूझकर बात कहनेवाला।

मितभुक्त
वि० [सं०] दे० 'मितभोजी'।

मितभोजी
वि० [सं० मितभोजिन्] कम खानेवाला। अल्प आहार करनेवाला [को०]।

मितमति पु
संज्ञा पुं० [सं०] वह जिसमे बहुत कम बुद्धि हो। थोड़ी बुद्धिवाला।

मितराई पु
संज्ञा स्त्री० [सं० मित्र + हिं० आई (प्रत्य०)] मित्रता। मिताई। उ०—झूठी बात करे लबराई। तासों हेतु करै मितराई।—कबीर सा०, पृ० ५४३।

मितविक्रय
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिलीय अर्थशास्त्र के अनुसार माप कर पदार्थ बेचना।

मितली
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'मिचली'। उ०—उसके मन में मितली भी होने लगी।—सुनीता, पृ० ६३।

मितव्यय
संज्ञा पुं० [सं०] कम खर्च करना। किफायत।

मितव्ययिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] कम खर्च करने का भाव। उ०— रूप चयन, अवयव संयोजन, शक्ति व्यंजना इंगित, सूक्ष्म मितव्ययिता करते अद्भुत प्रभाव संवर्धन।—अतिमा, पृ० १०३।

मितव्ययी
संज्ञा पुं० [सं० मितव्ययिन्] वह जो कम खर्च करता हो। किफायत करनेवाला।

मिताइया †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'मिताई'। उ०—पाहन ह्वै ह्वै सब गए, विनि भितियन के चित्र। जासो कियो मिताइया, सो धन भया न हित्र।—कबीर बी० (शिशु०), पृ० २१५।

मिताई पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० मित्र, हिं० मीत + आई (प्रत्य०)] मित्रता। दोस्ती। उ०—मन मतंग मारि दे तैं, तोरि दे मिताई।—जग० श०, पृ० १२२।

मिताक्षरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] याज्ञवल्क्य स्मृति की विज्ञानेश्वर कृत टिका।

मितार्थ (१)
संज्ञा पुं० [सं०] साहित्य में तीन प्रकार के दूतों में से एक प्रकार का दूत। वह दूत जो बुद्धिमत्तापूर्वक थोड़ी बातें कहकर अपना काम पूरा करे।

मितार्थ (२)
वि० नपे तुले अर्थवाला। परिमित अर्थवाला [को०]।

मितार्थक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'मितार्थ' [को०]।

मिताशन
संज्ञा पुं० [सं०] कम भोजन करना। थोड़ा खाना।

मिताशी
संज्ञा पुं० [सं० मिताशिन्] [स्त्री० मिताशिनी] वह जो बहुत थोड़ा खाता हो। कम भोजन करनेवाला।

मिताहार (१)
वि० [सं०] परिमित आहार करनेवाला। कम खानेवाला। मितभोजी।

मिताहार (२)
संज्ञा पुं० स्वल्पाहार। कम खाना। अल्पाहार [को०]।

मिताहारी
वि० [सं० मिताहार + ई (प्रत्य०)] दे० 'मिताहार'। उ०—हम ऐसे फलाहारी और मिताहारी नहीं हैं।—सुनीता, पृ० ८९।

मिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मान। परिमाण। उ०—गारुड़िय ग्रह्मौ अंमृत मितिय विषम विष्ष मल उत्तरै।—पृ० रा०, ६१। १५५८। २. सीमा। हद। मान मानतिति। उ०—रामकथा कै मिति जग नाहीं। असि प्रतीति तिन्हके मन माहीं।—मानस, १।३३। ३. काल की अवधि। दिया हुआ वक्त। मुहा०—मिति पूजना = आयु के दिन पूरा होना। दे० 'मिती'।

मिती
संज्ञा स्त्री० [सं० मिति] १. देशी महीने की तिथि या तारीख। जैसे,—मिती आषाढ़ सुदि ४ सं० १९८१ की चिट्ठी मिली। मुहा०—मिती चढ़ाना = तिथि लिखना। तिथि डालना। मिती उगना या पूजना = हुंडी का नियत समय पूरा होना। हुंडी के भुगतान का दिन आना। जैसे,—इस हुंडी की मितो पूजे दो दिन हो गए, पर रुपया नहीं आया। २. दिन। दिवस। जैसे—उसके यहाँ अभी तीन मिती का व्याजऔर बाकी है। ३. वह तिथि जब तक का व्याज देना हो। जैसे,—इस हुंडी का मिती में अभी चार दिन बाकी हैं। (महाजन)। मुहा०—मिती काटना = सूद काटना।

मितीकाटा
संज्ञा पुं० [हिं० मिती + काटना] १. वह हिसाब जिसके अनुसार सरफि लोग हुंडी की मुद्दत तथा व्याज लेते हैं। २. सूद लगाने का वह् ढंग जिसमें प्रत्येक रकम का सूद उसकी अलग अलग मिती से जोड़ा जाता है।

मित्त पु
संज्ञा पुं० [सं० मित्र, प्रा० मित्त] दे० 'मित्र'। उ०—पत्र परन औ पत्र सर, वाहुन पत्र सुचित। पत्र पंख विधि ना दिए, जिन उड़ि मिलते मित्त।—नंद ग्रं०, पृ० ५०।

मित्तर †
संज्ञा पुं० [सं० मित्र] १. वह लड़का जो किसी खेल में और सब लड़कों का प्रधान या अगुआ होता है। २. मित्र। दोस्त।

मित्ती पु
संज्ञा स्त्री० [सं० मिति] मान। मिति। उ०—कलिकाल कित्ति मित्तिय इतिय।—पृ० रा०, १२।६।

मित्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो सब बातों में अपना साथी सहायक, समर्थक और शुभचिंतक हो। सब प्रकार से अपने अनुरूप रहनेवाला और अपना हित चाहनेवाला। शत्रु या विरोधी का उलटा। बंधु। सखा। सुहृद। दोस्त। २. अतिविषा नाम की लता। अतीस। ३. सूर्य का एक नाम। उ०— अंधकार में मलिन मित्र की धुँधली आभा लीन हुई।— कामायनी, पृ० १४। ४. बारह आदित्यों में से पहले आदित्य का नाम। ५. पुराणानुसार मरुदुगण में से पहले मरुत् का नाम। ६. वशिष्ट के एक पुत्र का नाम जो ऊर्जा के गर्भ से उत्पन्न हुआ था। ७. आर्यों के एक प्राचीन देवता का नाम। विशेष—ऋक्संहिता में लिखा है कि मनु से अदिति को जो आठ पुत्र हुए थे, उनमें से सात को अपने साथ लेकर आदिति देवलोक को चली गई थी; केवल मार्तंड नामक पुत्र को फेंक दिया था। ये आठ पुत्र मित्र, वरुण, धाता, अर्यमा, अंश, भग, विवस्वान् और आदित्य या मार्तंड थे। इनमें से पहले सातों की गिनती आदित्यों में होती है परंतु महाभारत और पुराणों में द्वादश आदित्य का वर्णन है, जिनमें से एक मित्र भी हैं, वेदों में मित्र ही सर्वप्रधान आदित्य माने गए है, परंतु पुराणों आदि में उनका स्थान गौण है। वेदों में मित्र और वरुण की बहुत अधिक स्तुति की गई है, जिससे जान पड़ता है कि ये दोनों वैदिक ऋषियों के प्रधान देवता थे। वेदों में यह भी लिखा है कि मित्र के द्वारा दिन और वरुण के द्वारा रात होती है। यद्यपि पीछे से मित्र का महत्व घटने लगा था, तथापि पहले किसी समय सभी आर्य मित्र की पूजा करते थे। पारसियों में इनकी पूजा 'मिथ्र' के नाम से होती थी। मित्र की पत्नी 'मित्रा' भी उनकी पूजनीय थी और अग्नि की आधिष्ठात्री देवी मानी जाती थी। कदाचित् असीरियावालों की 'माहलेता' तथा अरववालों की 'आलिता देवी' भी यही मित्रा थी। ८.भारतवर्ष में एक प्रसिद्ध प्राचीन राजवंश का नाम जिसका राज्य उदुंवर और पांचाल आदि स्थानों में था। विशेष—कुछ लोग इसे शुंग वंश की एक शाखा बतलाते हैं, तथा कुछ लोग इस वंशवालों को शाकद्वीपी ब्राह्मण और कुछ शक क्षत्रिय मानते हैं। ईसवी पहली और दूसरी शताब्दी में इसका बहुत जोर था। भानुमित्र, सूर्यमित्र अग्निमित्र, ज्यमित्र, इंद्रमित्र, आदि इस वंश के प्रधान राजा थे। इनके जो सिक्के पाए गए हैं उनमे से कुछ में शैवों के, कुछ में वैष्णवों के और कुछ में सौरों के चिह्न पाए जाते हैं।

मित्रकर्म
संज्ञा पुं० [सं० मित्रकर्मन्] मित्रोचित काम। मित्र के योग्य कार्य [को०]।

मित्रकृत्
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार बारहवें मनु के एक पुत्र का नाम।

मित्रकृत्य
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'मित्रकर्म'।

मित्रघ्न
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो मित्र की हत्या करनेवाला हो। २. विश्वासघातक। ३. एक राक्षस का नाम।

मित्रघ्ना
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक नदी का नाम।

मित्रज्ञ
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो मित्र को जानता हो। अपने दोस्त मित्र को जानने पहचानने और उचित समादर करनेवाला व्यक्ति। २. एक राक्षस का नाम जो यज्ञ की सामग्री आदि छीन ले जाया करता था।

मित्रता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मित्र होने का धर्म या भाव। २. मित्र का धर्म।

मित्रत्व
संज्ञा पुं० [सं०] १. मित्र होने का धर्म या भाव। २. दोस्ती। मित्रता।

मित्रदेव
संज्ञा पुं० [सं०] १. बारहवें मनु के एक पुत्र का नाम। २. महाभारत के अनुसार एक राजा का नाम। ३. मित्र नाम के आदित्य। विशेष दे० 'मित्र'।

मित्रद्रोह
संज्ञा पुं० [सं०] मित्र का अनिष्ट करना।

मित्रद्रोही
वि० [सं० मित्रद्रोहिन्] मित्र का द्रोह करनेवाला। मित्र को धोखा देनेवाला। मित्र का अहित करनेवाला।

मित्रपंचक
संज्ञा पुं० [सं० मित्रपञ्चक] वैद्यक के अनुसार घी, शहद, गुंजा, सुहागा और गुग्गुल इन पाँचों का समूह।

मित्रपद
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार एक प्राचीन तीर्थ का नाम।

मित्रप्रकृति
संज्ञा पुं० [सं०] विजेता के चारों ओर रहनेवाले मित्र- राष्ट्र या राजा।

मित्रप्रवर
संज्ञा पुं० [सं० मित्र + प्रवर] मित्रों में श्रेष्ट मित्र। आदरणीय मित्र। उ०—विश्राम के लिये मित्र प्रवर, बैठे थे ज्यों, बैठे पथ पर। —तुलसी०, पृ० २४।

मित्रबाहु
संज्ञा पुं० [सं०] १. बारहवें मनु के एक पुत्र का नाम। २. श्रीकृष्ण के एक पुत्र का नाम।

मित्रभ
संज्ञा पुं० [सं०] अनुराधा नक्षत्र का नाम [को०]।

मित्रभानु
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत के अनुसार एक राजकुमार का नाम।

मित्रभाव
संज्ञा पुं० [सं०] मित्रता। दोस्ती [को०]।

मित्रभेद
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो दो मित्रों में लड़ाई कराता हो। मित्रों में झगड़ा करानेवाला। २. मित्रता में बाधा पैदा होना। मित्रता भंग होना। ३. यंत्र तंत्र का एक तंत्र।

मित्रयु
संज्ञा पुं० [सं०] १. मित्र। दोस्त। २. वह व्यक्ति जो लोगों को अपना मित्र बना ले [को०]।

मित्रयुद्ध
संज्ञा पुं० [सं०] मित्रों में झगड़ा हो जाना [को०]।

मित्रलाभ
संज्ञा पुं० [सं०] १. मित्रों को प्राप्त करना। मित्रप्राप्ति। २. हितोपदेश के पहले अध्याय का नाम।

मित्रवती
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुराणानुसार श्रीकृष्ण की एक कन्या का नाम।

मित्रवत्सल
वि० [सं०] मित्रों के प्रति उदार। अपने मित्रों को चाहनेवाला [को०]।

मित्रवन
संज्ञा पुं० [सं०] पंजाब के मुलतान नामक नगर का एक प्राचीन नाम।

मित्रवर्द्धन
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत के अनुसार एक राजा का नाम।

मित्रवान् (१)
वि० [सं० मित्रवत्] [वि० स्त्री० मित्रवती] जिसे मित्र हो। मित्रोंवाला।

मित्रवान् (२)
संज्ञा पुं० १. एक असुर का नाम। २. बारहवें मनु के एक पुत्र का नाम। ३. पुराणानुसार श्रीकृषण के एक पुत्र का नाम।

मित्रवाह
संज्ञा पुं० [सं०] बारहवें मनु के एक पुत्र का नाम।

मित्रविंद
संज्ञा पुं० [सं० मित्रविन्द] १. अग्नि। २. बारहवें मनु के एक पुत्र का नाम। ३. पुराणानुसार श्रीकृष्ण के एक पुत्र का नाम।

मित्रविंदा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुराणानुसार श्रीकृष्ण की एक पत्नी का नाम।

मित्रविश्रिप्त
वि० [सं०] मित्र देश में पड़ी हुई (सेना)।

मित्रविदु
संज्ञा पुं० [सं०] गुप्तचर। जासूस।

मित्रविषय
संज्ञा पुं० [सं०] दोस्ती। मित्रता [को०]।

मित्रवैर
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो मित्र से बैर या द्वेष करता हो।

मित्रसप्तमी
संज्ञा स्त्री० [सं०] मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी। विशेष—कहते हैं, इसी दिन कश्यपं के वीर्य से अदिति के गर्भ से मित्र नामक दिवाकर की उत्पत्ति हुई थी, इसी से इसका यह नाम पड़ा।

मित्रसह
संज्ञा पुं० [सं०] कल्माषपाद राजा का एक नाम।

मित्रसाहसा
संज्ञा स्त्री० [सं०] महाभारत के अनुसार स्वर्ग में रहनेवाली एक देवी का नाम।

मित्रसेन
संज्ञा पुं० [सं०] १. बारहवें मनु के एक पुत्र का नाम। २. श्रीकृष्ण के एक पुत्र का नाम। ३. एक बुद्ध का नाम।

मित्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मित्र नामक देवता की स्त्री का नाम। विशेष दे० 'मित्र-७'। २. शत्रुध्न की माता। सुमित्रा। ३. महाभारत के अनुसार एक अप्सरा का नाम। ४. पराशर के शिष्य मैत्रेयी की माता का नाम।

मित्राई पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० मित्र + हिं० आई(प्रत्य०)] मित्रता। दोस्ती।

मित्राक्षर
संज्ञा पुं० [सं०] छंद के रूप में बना हुआ तुकांत पद। अमित्राक्षर का उलटा।

मित्रायु
संज्ञा पुं० [सं०] राजा दिवोदास के एक पुत्र का नाम।

मित्रावरुण
संज्ञा पुं० [सं०] मित्र और वरुण नामक देवता।

मित्रावसु
संज्ञा० पुं० [सं०] विश्वावसु के एक पुत्र का नाम।

मित्रो (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] दशरथ की पत्नी सुमित्रा जो लक्ष्मण और शत्रुघ्न की माता थी। सुमित्रा।

मित्री पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० मित्र] दे० 'मित्र'। उ०—मात पिता बंधू तिय पुत्र सुवेष।—नट०, पृ० ११७।

मित्रेयु
संज्ञा पुं० [सं०] राजा दिवोदास के पुत्र का नाम।

मिथः
अव्य [सं० मिथस्] परस्पर। आपस में। अन्यीन्य [को०]।

मिथ
संज्ञा पुं० [अं०] पुराणकथा। पुरावृत। पौराणिक आख्यान।

मिथन पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'मिथुन'—२। उ०—गृह कुटंब महि पलचिआ मोह मिथन दुर्गंध।—प्राण०, पृ० २४३।

मिथनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] मेथी।

मिथा पु †
वि० [सं० मिथ्या] दे० 'मिथ्या'। उ०—मिथा बूज कर चुप यह झूठा जमाना। अरे मन नको रे नकी हो दिवाना।— दक्खिनी०, पृ० २५४।

मिथि
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार राजा निमि के पुत्र जनक का एक नाम। विशेष—कहते हैं, राजा निमि को कोई पुत्र नहीं था। मुनिय़ों को यह भय हुआ कि निमि के मरने के उपरांत कहीं अराजकता न उत्पन्न हो, इसलिये उन लोगों ने निमि के शरीर को अरणी से मथा जिससे जनक की उत्पत्ति हुई। ये मथन से उत्पन्न हुए थे, इसलिये इनका एक नाम मिथि भी था। इन्हें उदावसु नामक एक पुत्र हुआ था।

मिथिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] मेथी।

मिथिल
संज्ञा पुं० [सं०] राजा जनक का एक नाम।

मिथिला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वर्तमान तिरहुत का प्राचीन नाम। राजा जनक इसी प्रदेश के राजा थे। उ०—मिथिला नगरी रहत हैं, रच्यो स्वयंवर राय।—कबीर सा०, पृ० ३६। २. इस प्रांत की प्राचीन राजधानी। यौ०—मिथिलापति = राजा जनक।

मिथु (१)
संज्ञा पुं० [सं०] असत्य। मिथ्या। झूठ।

मिथु (२)
अव्य० १. झूठमूठ। २. यथाक्रम। ३. साथ साथ [को०]।

मिथुन
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्त्री और पुरुष का युग्म। मर्द औरऔरत का जोडा़। २. संयोग। समागम। ३. मेष आदि राशियों में से तीसरी राशि। विशेष—इस राशि में मृगशिरा नक्षत्र के अंतिम दो पाद, पूरा आर्द्रां और पुनर्वसु के आरंभिक तीन पाद हैं। इसके अधिष्ठाता देवता गदाधारी पुरुष और वीणाधारिणी स्त्री मानी गई है। इसका दूसरा नाम जितुम है। ४. ज्योतिष में मेष आदि लग्नों में से तीतरा लग्न। विशेष— कहते हैं, इस लग्न में जन्म लेनेवाला प्रियभाषी, द्विमात्रिक, शत्रुओं का नाश करनेवाला, गुणी, धार्मिक, कार्यकुशल और प्रायःरोगी रहनेवाला होता है, और उसकी मृत्यु मनुष्य, साँप, जहर या पानी आदि के द्वारा होती है। यौ०—मिथुनभाव = (१) जोड़ा बनाना। जोडा़ बनाने का भाव। (२) मैथुन। मिथुनयमक = धमक अलंकार का एक भेद। मिथुनविवाह = प्रचलित विवाह प्रथा। वह विवाह प्रथा जो आजकल चंल रही है। मिथुनव्रती = संयोगरत। संयोगस्थ।

मिथुनत्व
संज्ञा पुं० [सं०] मिथुन का भाव या धर्म।

मिथुनी
संज्ञा पुं० [सं० मिथुनिन्] खंजन पक्षी [को०]।

मिथुनीकरण
संज्ञा पुं० [सं०] जोड़ा वनाना। नर मादा को परस्पर मिलाना [को०]।

मिथुनीभाव
संज्ञा पुं० [सं०] संभोग। मैथुन [को०]।

मिथुनेचर
संज्ञा पुं० [सं०] चक्रवाक [को०]।

मिथ्या
वि० [सं०] १. असत्य। झूठ। २. बेकार। व्यर्थ। यौ०—मिध्याकोप = बनावट क्रोध। मिथ्याग्रह = निरर्थक हठ। दुराग्रह। मिथ्याचर्या। मिथ्याजलिप्त = झूठ कथन। असत्य भाषण। मिध्याज्ञान = भूल। गलती। भ्रम। मिध्याद्यष्टि। मिथ्यापंडित। मिथ्याभाषी = असत्यावक्ता। झूठ बोलनेवाला। मिथ्यावचन = असत्य कथन। झूठी बात। मिथ्यावाद। मिथ्यासाक्षी।

मिथ्याचर्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] झूठा या कपटपूर्ण व्यवहार।

मिथ्याचार
संज्ञा पुं० [सं०] १. कपटपूर्ण आचरण। २. वह जो कपटपूर्ण आचरण करता हो।

मिथ्यात पु
संज्ञा पुं० [सं० मिथ्यात्व] झूठापन। असत्यता। उ०— मिथ्यात ममता कुमति कुदया चारि डाँडी आहिं।—सुंदर० ग्रं०, भा० २, पृ० ९१६।

मिथ्यात्व
संज्ञा पुं० [सं०] १. मिथ्या होने का भाव। २. माया। ३. जैनों के अनुसार अठारह दोषों में से एक।

मिथ्यादृष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] नास्तिकता।

मिथ्याध्यवसिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक अर्थालंकार जिसमें कोई एक असंभव या मिथ्या बात निश्चित करके तब कोई दूसरी बात कही जाती है; और इस प्रकार वह दूसरी बात भी मिथ्या ही होती है। जैसे,—जो आँजै नभ कुसुम रस, लखै सो अहि के कान।

मिथ्यानिरसन
संज्ञा पुं० [सं०] शपथपूर्वक किसी सच्ची बात का अस्वीकार करना।

मिथ्यापंडित
संज्ञा पुं० [सं० मिथ्यापण्डित] वह जो कुछ न जानता हो और झूठमूठ पंडित बनता हो।

मिथ्यापन
संज्ञा पुं० [सं० मिथ्या + हिं० पन (प्रत्य०)] असत्यता। मिथ्यात्व। उ०—मिथ्या ही बतला देती, मिथ्या का रे मिथ्यापन।—गुंजन, पृ० १६।

मिथ्यापर
वि० [सं० मिथ्या + पर (प्रत्य०)] मिथ्यापरायण। असत्य का अनुयायी। उ०—मधु मुख, गरलहृदय, निजतारत मिथ्यापर देगा संसार जगह तुम्हें तब। - अनामिका, पृ० १६६।

मिथ्यापवाद
संज्ञा पुं० [सं०] झूठा अभियोग। झूठा दोष। कलंक।

मिथ्यापुरुष
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'छायापुरुष'।

मिथ्याप्रतिज्ञ
वि० [सं०] झूठी प्रतिज्ञा करनेवाला। वचन का पालन न करनेवाला [को०]।

मिथ्याभियोग
संज्ञा पुं० [सं०] किसी पर झूठमूठ अभियोग लगाना। अभ्याख्यान।

मिथ्याभिशंसन
संज्ञा पुं० [सं०] किसी पर झूठमूठ कलंक लगाना।

मिथ्यामति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. भ्रांति। धोखा, २. भूल। गलती।

मिथ्यायोग
संज्ञा पुं० [सं०] चरक के अनुसार वह कार्य जो रूप, रस या प्रकृति आदि के विरुद्ध हो। जैसे, मल मूत्र आदि का वेग रोकना शरीर का मिथ्यायोग है, कठोर वचन आदि कहना वाणी का मिथ्यायोग है; तीव्र गंध आदि का सूँघना और भीषण शब्द आदि सुनना घ्राण और श्रवण का मिथ्यायोग है। उ०— पुरुष का इष्ट नाशादि सुनना मिथ्यायोग है।—माधव०, पृ० १२९।

मिथ्यावद
संज्ञा पुं० [सं०] मिथ्या वचन। झूठी बात। झूठ [को०]।

मिथ्यावादी
संज्ञा पुं० [सं० मिथ्यावांदन्] [ वि० स्त्री० मिथ्यावादिनी] वह जो झूठ बोलता हो। असत्यवादी। झूठा।

मिथ्याविहार
संज्ञा पुं० [सं०] देह पुरुषार्थ से विशेष कामना करना। शरीर की शक्ति से अधिक कार्य करना।

मिथ्य़ाव्यय
संज्ञा पुं० [सं० मिध्या + व्यय] अपव्यय। दिखावे के लिये या अनुचित ढंग से खर्च करना। उ०—बारात बुलाकर मिथ्या- व्यय मैं करूँ, नहीं ऐसा सुसमय।—अनामिका, पृ० १३१।

मिथ्याव्यवहार
संज्ञा पुं० [सं०] किसी विषय को न जानते हुए भी उसमें दखल देना। अनधिकार चर्चा।

मिथ्यासाक्षी
संज्ञा पुं० [सं० मिथ्यासाक्षिन्] वह जो झूठी गवाही देता हो। झूठा गवाह।

मिथ्याहार
संज्ञा पुं० [सं०] अनुचित या प्रकृति के विरुद्ध भोजन करना। जैसे, मछली के साथ दूध।

मिथ्योत्तर
संज्ञा पुं० [सं०] याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार व्यवहारमें चार प्रकार के उत्तरों में से एक प्रकार का उत्तर। अभियुक्त का अपना अपराध छिपाने के लिये झूठ बोलना।

मिथ्योपचार
संज्ञा पुं० [सं०] १. झूठी दया या सेवा। २. दिखावे की प्रशंसा। खुशामद। ३. असत्प चिकित्सा। झूठा इलाज [को०]।

मिधि पु
अव्य० [सं० मध्य] दे० 'मध्य'। उ०—बस गुन ही गुन निरखत तिहिं मिधि सरल प्रकृति को प्रेरौ।—पौद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ८९३।

मिन पु
संज्ञा पुं० [सं० मीन] मछली। मीन। उ०—मलेछ सोई मिन मास जो खावै। मलेछ साई जोहि ज्ञान न भावै।—संत० दरिया, पृ० ६।

मिनकना
क्रि० अ० [अनु०] १. धीरे से बोलना। कुछ कहना। २. हूँ हाँ करना। सुगवुगाना। उ०—दरजी खर्राटें ले रहा था मिनका तक नहीं।—फिसाना०, भा० ३, पृ० ८८। ३. भय के साथ बोलना।

मिनकार †
संज्ञा पुं० [अनु०?] जिससे मिन् मिन् किया जाय अर्थात् मुख या चोंच। उ०—अधिक तेज काँटे ते वी सख्त बोल। लग्या बोलने तांई मिनकार खोल। †दक्खिनी०, पृ० ९०।

मिनकी पु
संज्ञा स्त्री० [देश०] बिल्ली। उ०—मूसा इत उत फिरै ताकि रही मिनकी।—सुंदर० ग्रं०, भा० २, पृ० ३९८।

मिनखा पु †
संज्ञा पुं० [सं० मनुष्य] दे० 'मानुष'। उ०—यो मिनखा तन पाइकै भज्यो नहीं भगवान। जन हरिया तब मानखो मिलै नही आसान—राम० धर्म०, पृ० ६९।

मिनखी पु †
संज्ञा स्त्री० [देश०] बिल्ली। मिनकी। उ०—मावड़ियो बन माँझली सो नहँ जाय सिकार। डोला मिनखी सूँ डरै मूसा ज्यों मुरदार।—बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० १९।

मिनट
संज्ञा पुं० [अं०] एक घंटे का साठवाँ भाग। साठ सेकेंड का समय। मुहा०—मिनटों में = बात की बात में। जैसे,—वह यह काम मिनटों में कर डालेगा। मिनट भर = अत्यल्प समय। बहुत थोड़ा समय। जैसे,—वे मिनट भर पहले गए हैं।

मिनती (१) †
संज्ञा स्त्री० [सं० विनति] प्रार्थना। विनती।

मिनती (२)
संज्ञा पुं० [अनु० मक्खी के शब्द से] मक्खी की बोली के समान, धीमा, कुछ नाक से निकला स्वर।

मिनमिन (१)
क्रि० वि० [सं०] मक्खी की भनभनाहट के रूप में। धीमे दबे हुए स्वर में। कुछ नाक से निकले धीमे स्वर में। जैसे,—वह मिनमिन बोलता है; इसी से उसे सीधा समझते हो।

मिनमिन (२)
वि० नकियाकर बोलनेवाला। मिनमिन बोलनेवाला।

मिनमिन
संज्ञा स्त्री० मिनभिन की आवाज। अस्पष्ट ध्वनि।

मिनमिना
वि० [हिं० मिनमिन] १. मिनमिन शब्द करनेवाला। नाक से स्वर निकलकर धीमे बोलनेवाला। २. थोड़ी सी बात पर कुढ़नेवाला। ३. सुस्त। मट्ठर।

मिनमिनाना
क्रि० अ० [हिं० मिनमिन] १. मिन् मिन् शब्द करना। नाक से बोलना। नकियाना। २. कोई काम बहुत धीरे धीरे करना। बहुत सुस्ती से काम करना।

मिनमिनाहट
संज्ञा स्त्री० [अनु०] मिनमिन् की ध्वनि या आवाज।

मिनवाल
संज्ञा पुं० [अ०] करघे में का वह का वह बेलन जिसपर बुना हुआ कपड़ा लपेटा जाता है और जो बुनेवाजे के ठीक आगे रहता है।

मिनहा
वि० [अ०] जो काट या घटा लिया गया हो। मुजरा किया हुआ। जैसे,— अभी इसमें दो तीन रकमें मिनहा होने को हैं।

मिनहाई †
संज्ञा स्त्री० [अ० मिनहा] कटौती।

मिनाक पु
संज्ञा पुं० [सं० मैनाक] दे० 'मैनाक'। उ०—पूजा पाइ मिनाक पहिं, सुरसा कपि संबादु। मारग अगम सहाय सुभ, होइहि राम प्रसादु।—तुलसी ग्रं०, पृ० ८६।

मिनारा †
संज्ञा पुं० [अ० मनार] दे० 'मीनार'।

मिनिट
संज्ञा पुं० [अं०] दे० 'मिनट'।

मिनिटबुक
संज्ञा स्त्री० [अं०] वह वही या किताब जिसमें किसी सभा, समिति के अधिवेशनों में संपन्न हुए कार्यों का विस्तृत विवरण लिखा जाता है।

मिनिस्टर
संज्ञा पुं० [अं०] १. मंत्री। सचिव। दीवान। वजीर। २. राजदूत। एलची। ३. धर्मोपदेष्टा। धर्माचार्य। पादरी। (ईसाई)।

मिनिस्ट्री
संज्ञा स्त्री० [अं०] १. मंत्रिमंडल। शासन। हुकूमत। ३. मंत्रित्व। मंत्रिपद। उ०—आज काउंसिल की मिनिस्ट्री पाकर भई शायद उतना आनंद न होता।—मान०, भा० ५, पृ० ११०।

मिन्
प्रत्य० [अ०] से।

मिनजानिब
क्रि० वि० [अ०] ओर से। तरफ से। (कचहरी०)।

मिनजुमला
क्रि० वि० [अ०] सब में से। कुल में से।

मिन्नत
संज्ञा स्त्री० [अ०, मि० सं० विनति, हिं० मिनती] १. प्रार्थना। निवेदन। २. दीनता। दैन्य। यौ०—मिन्नत खुशामद = दीनतापूर्वक की हुई प्रार्थना। मिन्नत समाजत = विनय। प्रार्थना। उ०—यों तो मैं विनय की मिन्नत समाजत करूँ, तो वह रियासत से चले जाने पर राजी हो जायँगे।—रंगभूमि, भा० २, पृ० ४७८। ३. एहसान। कृतज्ञता। (क्व०)। क्रि० प्र०—उठाना।—करना।

मिन्मिन, मिन्मिल (१)
वि० [सं०] नाक के स्वर में बोलनेवाला। नकियाकर बोलनेवाला।

मिन्मिन, मिन्मिल (२)
संज्ञा पुं० नकियाकर बोलना जो एक रोग है [को०]।

मिमत
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्राचीन ऋषि का नाम।

मिमांसा पु
संज्ञा स्त्री० [सं० मीमांसा] दे० 'मीमांसा'। उ०— करम ईसर मिमांसा में वरन ब्राह्मन सुनाते हैं।—तुरसी० श०, पृ० ३४।

मिमियाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० मिमियाना + ई (प्रत्य०)] बकरी।

मिमियाना
क्रि० अं० [मिन् मिन् से अनु०] बकरी या भेंड़ का 'मि मि' शब्द करना। भैंड़ या बकरी का बोलना।

मियाँ
संज्ञा पुं० [फ़ा०] १. स्वामी। मालिक। २. पति। खसम। जैसे,—मियाँ के मियाँ गए, बुरे बुरे सपने आए। यौ०—मियाँ बीबी। ३. बड़ों के लिये एक प्रकार का संबोधन। महाशय़। (मुसल०)। ४. बच्चों के लिये एक प्रकार का संबोधन। ५. शिक्षक। उस्ताद। यौ०—मियाँगरी, मियाँगीरी = शिक्षक का कार्य। अध्यापन। मियाँ जी = शिक्षक। ६. पहाड़ी राजपूतों की एक उपाधि। जैसे, मियाँ रमासिंह। ७. मुसलमान। जैसे,—वे सब मियाँ ठहरे एक ही में खा पका लेंगे। ८. चर। कासिद। दूत (को०) ९. कुटना। चुगलखोरं (को०)। †१० गायक। पक्की चीजें गानेवाला। उस्ताद।

मियाँ ठाकुर †
संज्ञा पुं० [फ़ा० मियाँ + हिं० ठाकुर] एक जाति जो अपने को न हिंदू मानती है और न मुसलमान, वरन् उभय मानती है। उ०—ये मिया 'ठाकुर कहलाना' , कहलाना पसंद करते है। ये मानते हैं कि ये न तो हिंदू है और न मुसलमान, बल्कि उभय हैं।—संत० दरिया, पृ० ११

मियाँ मिट्ठू
संज्ञा पुं० [हिं० मियाँ मिट्ठू] १. मीठी बोली बोलनेवाला। मधुरभाषी। मुहा०—अपने सुँह मियाँ मिट्ठू बनना = पने मुँह से अपनी प्रशंसा करना। बिना कुछ समझाए याद कराना। २. तोता। मुहा०—मियाँ मिट्ठू बनाना = तोते की तरह रटाना। बिना समझाए पढ़ाना। ३. मूर्ख। वेवकूफ। मुहा०—मियाँ की जूती मियाँ का सिर = जिसकी चीज हो, उसका उसी के विरुद्ध व्यवहार करना। वेवकूफ बनाना।

मियान (१)
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० म्यान] दे० 'म्यान'।

मियान (२)
संज्ञा पुं० [फ़ा०] मध्य भाग। बीच का हिस्सा। यौ०—दरमियान = मध्य में। बीच में।

मियानतह
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० मियान (= मध्य) + हिं० तह] वह साधारण कपड़ा जो किसी अच्छे कपड़े के नीचे उसकी रक्षा आदि के लिये दिया जाता है। जैसे, रजाई की मियानतह।

मीयानतही
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० मियातिही] १. वह बिस्तर जिसके दोनों पल्लों के बीच रुई न हो। २. दे० 'मियानतह'।

मियानबाला
वि० [फ़ा०] सामान्य कद का। साधारण आकार का। न ठिगना, न लंबा [को०]।

मियाना (१)
वि० [फ़ा० मियानह्] न बहुत बड़ा और न बहुत छोटा। मध्यम आकार का।

मियाना (२)
संज्ञा पुं० १. वे खेत जो किसी गाँव के बीच में हों। २. एक प्रकार की पालकी। ३. गाड़ी में आगे की ओर बीच में लगा हुआ वह बाँस जिसके दोनों ओर घोड़े जोते जाते हैं। बम। बल्ली। ४. वह घोड़ा जो मझोले कद का हो (को०)। ५. वह बड़ा मोती जो हार के बीच में हो (को०)। यौ०—मियाना कद = मझोले आकार का। न लंबा न ठिगना। मियाना रवी = मध्यम मार्ग। सरलाचार। मियाना रौ = मध्यममार्गी। सरलाचारी।

मियानी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० मियान + ई(प्रत्य०)] पायजामे में वह कपड़ा जो दोनों पायंचों के बीच में पड़ता है। विशेष—इसे कहीं कहीं रूमाल भी कहते हैं।

मियार †
संज्ञा पुं० [हिं० मँझार ? ] वह लकड़ी जो कूएँ के ऊपर दो खंभों पर लगी होती है और जिसमें गराड़ी पड़ी रहती है।

मियाल †
संज्ञा पुं० [हिं० मँझार ? ] दे० 'मियार'।

मियेध
संज्ञा पुं० [सं०] १. पशु। २. यज्ञ।

मिरंगा
संज्ञा पुं० [फ़ा०] प्रवाल। मूँगा।

मिरकी †
संज्ञा स्त्री० [देश०] चौपायों को होनेवाली मुँह की एक बीमारी। (अवध)।

मिरखंभ
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'मिरखम'।

मिरखम
संज्ञा पुं० [सं० मेरुस्तम्भ, प्रा० मेरुखंभ] कोल्हू में वह लकड़ी जो बैठकर हाँकने की जगह खड़े बल में लगी रहती है।

मिरग पु †
संज्ञा पुं० [सं० मृग] मृग। हरिन।

मिरगचि़डा़
संज्ञा पुं० [हिं० मिरग + चिडा़] एक प्रकार का छोटा पक्षी।

मिरगछाला ‡
संज्ञा स्त्री० [सं० मृग + हिं० छाल] दे० 'मृगछाला'।

मिरगनी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० मिरग] दे० 'मृगी'। उ०—पाँच मिरग पच्चीस मिरगनी तिन में तीन चितारे।—कबीर श०, भा० २, पृ० ३५।

मिरगमद पु
संज्ञा पुं० [सं० मृगमद] दे० 'मृगमद'। उ०—गौलोचन गोसीस मिरगमद नाभि नें जानौं। भिन्न भिन्न गुन होय नीर एक हि पहिचानौ।—पलटू०, पृ० ६६।

मिरगला पु
संज्ञा पुं० [हिं० मिरग + ला (प्रत्य०)] दे० 'मृग'। उ०—यहु बन हरिया देखि करि, फूल्यौ फिरै गँवार। दादू यहु मम (?) मिरगला, काल अहेड़ी लार।—संतवाणी०, पृ० ८०।

मिरगा †
संज्ञा पुं० [हिं० मृगा] दे० 'मृग'। उ०—जैसे मिरगा शब्द सनेही शब्द सुनन को जाई।—कबीर श०, भा० १, पृ० ३५।

मिरगानी पु
संज्ञा पुं० [सं० मृग] मृगचर्म की आसनी। मृगछाला। उ०—कवनु मुंद्रा कवनु मिरगानी।—प्राण०, पृ० ७९।

मिरगारन पु
संज्ञा पुं० [सं० मृगारण्य] जंगली जानवरों का वन। मृगारण्य।

मिरगिया
संज्ञा पुं० [सं० मिरगी + इया (प्रत्य०)] वह जिसे मिरगी का रोग हो।

मिरगिसिरा पु
संज्ञा पुं० [सं० मृगशिरस्] दे० 'मृगशिरा'। उ०—तपनि मिरगिसिरा जे सहहिं अद्रा ते पलुहंत।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० ३५४।

मिरगी
संज्ञा स्त्री० [सं० मृगी] एक प्रसिद्ध मानसिक रोग। अपस्मार। विशेष—इस रोग का बीच बीच में दौरा हुआ करता है और इसमें रोगी प्रायः मूर्छिंत होकर गिर पड़ता है, उसके हाथ पैर ऐंठने लगते हैं और उसके मुँह से झाग निकलने लगता है। कभी कभी रोगी के केवल हाथ पैर ही ऐंठते हैं और उसे मूर्छा नहीं आती। यह रोग वातज, पित्तज,कफज और सन्निपातज भेद से चार प्रकार का कहा गया है। विशेष दे० 'अपस्मार'। क्रि० प्र०—आना।—होना।

मिरगु पु †
संज्ञा पुं० [सं० मृग] दे० 'मृग'।

मिरघ
संज्ञा पुं० [सं०] बौद्धों के अनुसार एक बहुत बड़ी संख्या।

मिरचा
संज्ञा पुं० [सं० मरिच] लाल मिर्च।

मिरचाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० मिरचा + ई (प्रत्य०)] १. दे० 'मिर्च'। २. दे० 'काला दाना'।

मिरचियागंध
संज्ञा पुं० [हिं० मिर्च + गंध] रूसा घास।

मिरची
संज्ञा स्त्री० [हिं० मिर्च] छोटी, पर बहुत तेज लाल मिर्च।

मिरजई
संज्ञा स्त्री० [फ़ा मिरजा] एक प्रकार का बंददार अंगा जो कमर तक और प्रायः पूरी बाँह का होता है।

मिरजा (१)
संज्ञा पुं० [फ़ा मिरजा, मीरजा] १.मीर या अमीर का लड़का। मीरजाया। अमीरजादा। २. राजकुमार कुँवर। ३. मुगलों की एक उपाधि। ४. तैमूर वंश के 'शाहजादों की उपाधि।

मिरजा (२)
वि० कोमल। नाजुक। (व्यक्ति)।

मिरजाई
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] १. मिरजा का भाव या पद। २. सरदारी। नेतृत्व। ३. अभिमान। घमंड। ४. दे० 'मिरजई'।

मिरजान
संज्ञा पुं० [फ़ा०] प्रवाल। मूँगा।

मिरजानी
वि० [फ़ा०] मूँगे का [को०]।

मिरजा मिजाज
वि० [फ़ा० मिरजा + मिजाज] नाजुक दिमाग का।

मिरत ‡
संज्ञा स्त्री० [सं० मृत्यु] दे० 'मृत्यु'। यौ०—मिरतलोक पु = दे० 'मृत्युलोक'। उ०—मिरतलोक से हंसा आए, पुहप दीप चल जाई।—कबीर श०, भा० १, पृ० ६३।

मिरतक †
संज्ञा पुं० [सं० मृतक] दे० 'मृतक'। उ०—मिरतक बाँधि कूप में डारे, भाभी सोच मरे।—घट०, पृ० २६५।

मिरथा पु †
वि० [सं० वृथा (= व्यर्क)] निरर्थक। बेकार। उ०— बिनु गुरु ज्ञान नाम ना पैहो, मिरथा जनम गँवाई हो।—कबीर श०, भा० ३, पृ० २४।

मिरदंग
संज्ञा पुं० [सं० मृदङ्ग] दे० 'मृदंग'।

मिरदंगी
संज्ञा पुं० [हिं० मिरदंग + ई (प्रत्य०)] वह जो मृदंग बजाता हो। पखावजी। उ०—बीली नाचे मुस मिरदंगी खरहा ताल बजावै।—संत० दरिया० पृ० १२६।

मिरनाल पु
संज्ञा पुं० [सं० मृणाल] दे० 'मृणाल'। उ०—शोभित कर मिरनाल सरोजा।—कबीर सा०, पृ० ९९।

मिरवना पु †
क्रि० स० [हिं० मिलाना] दे० 'मिलाना'।

मीरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मूर्वा। २. मदिरा। शराव।

मिरास
संज्ञा पुं० [अ० मीरास] दे० 'मीरास'। उ०—इन सबों के लेये हिंदी अपने पितृपुरुषों से प्राप्त मिरास या रिक्थ है।— पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ७५।

मीरासी
संज्ञा पुं० [अ० मीरासी] दे० 'मीरासी'।

मीरिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की लता।

मिरिग पु
संज्ञा पुं० [सं० मृग] दे० 'मृग'। उ०—नैन कँवल जानहुँ धनि फूले। चितवनि मिरिग सोवत जसु भूले।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० ३३९।

मिरिगारन पु
संज्ञा पुं० [ सं० मृगारण्य] जंगल जिनमें पशु रहते हैं। मिरगारन। उ० - मिरिगारन महँ भएउ बसेरा।—जायसी ग्रं०, पृ० ५८।

मिरिच
संज्ञा स्त्री० [सं० मरिच] दे० 'मिर्च'।

मिरिचियाकंदक
संज्ञा पुं० [हिं० मिरिच + गंध] रोहिस घास।

मिरियास, मिरियासि पु †
संज्ञा स्त्री० [अ० मीरास] किसी के मरने पर उसके उत्तराधिकारी को मिलनेवाली संपत्ति। मीरास। उ०—नाहीं मानस हंस यह नहिं मोतिन की रासि। ये तो संबुक मलिन सर करटन की मिरियासि।—दीन० ग्रं०, पृ० १०१।

मिरोरना पु
क्रि० स० [हिं०] दे० 'मरोड़ना'। उ०—ताकै नैन मिरोरि नहीं चित अंतै टारै।—पलटू०, पृ० ५१।

मिर्ग पु
संज्ञा पुं० [सं० मृग] दे० 'मृग'। उ०—मिर्ग की नाभ कस्तूरी।—तुरसी० श०, पृ० ३१।

मिर्गी
संज्ञा स्त्री० [सं० मृगी] दे० 'मिरगी'।

मिर्च
संज्ञा स्त्री० [सं० मरिच] १. कुछ प्रसिद्ध तिक्त फलों और फलियों का एक वर्ग जिसके अंतर्गत काली मिर्च, लाल मिर्च और उनकी कई जातियाँ हैं। २. इस वर्ग की एक प्रसिद्ध तिक्त फली जिसका व्यवहार प्रायः स्रे संसार में व्यंजनों में मसाले के रूप में होता है और जिसे प्रायः लाल मिर्च और कहीं कहीं मिरचा, मरिचा या मिरचाई भी कहते हैं। विशेष—इस फली का क्षुप मकोय के क्षुप के समान, पर देखने में उसके अधिक झड़दार होता है, और प्रायः सारे भारत में इसी फली के लिये उसकी खेती की जाती है। इसके पत्तें पीछे की ओर चौड़े और आगे की ओर अनीदार होते हैं। इसके लिये काली चिकनी मिट्टी की अथवा बाँगर मिट्टी की जमीन अच्छी होती है। दुभ्मट जमीन में भी यह क्षुप होता है, पर कड़ी और अधिक बालूवाली मिट्टी इसके लिये उपयुक्त नहीं होती। इसकी वोआई असाढ़ से कार्तिक तक होती है। जाड़े में इसमें पहले सफेद रंग के फूल आते हैं तव फलियाँ लगती हैं। ये फलियाँ आकार में छोटी, बड़ी, लंबी, गोल अनेक प्रकार की होती हैं। कहीं कहीं इनका आकार नारंगी के समान गोल और कहीं कहीं गाजर के समान भी होता है पर साधारणतः यह उंगली के बराबर लंबी और उतनी ही मोटी होती है। इन फलियों का रंग हरा, पीला, काला, नारंगी या लाल होता है और ये कई महीनों तक लगातार फलती रहती हैं। प्रायः कच्ची दशा में इनका रंग हरा और पकने पर लाल हो जाता है। मसाले में कच्ची फलियाँ भी काम आती हैं और पकी तथा सुखाई हुई फलियाँ भी कुछ जाति की फलियाँ बहुत अधिक तिक्त तथा कुछ बहुत कम तिक्त होती है। अचार आदि में तो ये फलियाँ और मसालों के साथ डाली ही जाती हैं, पर स्वयं इन फलियों का भी अचार पड़ता है। इसके पत्तों की तरकारी भी बनाई जाती है। इसका स्वाद तिक्त होने के कारण तथा इसके गरम होने के कारण कुछ लोग इसका बहुत कम व्यवहार करते हैं अथवा बिलकुल ही नहीं करते। वैद्यक में यह तिक्त, अग्निदीपक, दाहजनक तथा कफ, अरुचि, विशूचिका, व्रण, आर्द्रता, तंद्रा, मोह, प्रलाप और स्वरभेद आदि की दूर करनेवाली मानी गई है। त्वचा पर इसका रस लगने से जलन होती है; और यदि इसका लेप किया जाय तो तुरंत छाले पड़ जाते हैं। इसके सेवन से हृदय, त्वचा, वृक्क और जननेंद्रिय में अधिक उतेजना होती है। पर यदि इसका बहुत अधिक सेवन किया जाय तो बल और वीर्य की हानि होती है। वैद्यक, हिकमत और डाक्टरी सभी में इसका व्यवहार ओषधि रूप में होता है। पर्या०—कटुबीरा। रक्त मारिच। कुमारिच। तीक्ष्ण। उज्वला। तीघ्रशक्ति। अजड़ा। मुहा०—मिर्च लगना = असह्य होना। उत्तर मे कही गई बात बहुत बुरी लगना। २. एक प्रकार का प्रसिद्ध काला छोटा दाना जिसे काली मिर्च या गोल मिर्च भी कहते हैं और जिसका व्यवहार व्यंजनों में मसाले के रूप में होता है। विशेष—यह दाना एक लता का फल होता है। इस लता की खेती पूर्वभारत में आसाम में, तथा दक्षिणभारत में मलाबार कोचीन, ट्रावनकोर आदि प्रदेशों में अधिकता से होती है। देहरादून और सहारनपुर आदि कुछ स्थानों में भी इसकी बहुत खेती होती है। यह लता प्रायः दूसरे वृक्षों पर चढ़ती और उन्हीं के सहारे फैलती है। यह लता बहुत द्दढ़ होती है और इसके पत्ते पीपल के पत्तों के समान और ५-७इंच लंबे तथा ३-४ इंच चौड़े होते हैं। इसकी लंबी डंडियों में गुच्छों में फूल और फल लगते हैं। प्रायः वर्षा ऋतु में पान की वेल की तरह इस लता के भी छोटे छोटे टुकड़े करके बड़े बड़े वृक्षों की जडों के पास गाड़ दिए जाते हैं जो थोड़े दिनों में लता के रूप में बढ़कर उन वृक्षों पर फैलने लगते है। नारियल, कटहल और आम के वृक्षों पर यह लता बहुत अच्छी तरह फैलती है। तीसरे या चौथे वर्ष इन लताओं में फल लगते है और प्राय़ः बीस वर्ष तक लगते रहते हैं। कच्ची दशा में ये फल लाल रंग के होते हैं, पर पकने और सूखने पर काले रंग के हो जाते हैं। और प्रायः इसी रूप में बाजारों में मिलते है। कभी कभी इन सूखे फलों को पानि में भिगोकर उनका ऊपरी छिलका अलग कर लिया जाता है। जिससे अंदर से सफेद या मटमैले रंग के फल निकल आते हैं और जो बाजारों में 'सफेद मिर्च' के नाम से बिकते है। इस दशा में उनका तीतापन भी कुछ कम हो जाता है। भारतवर्ष में इसका व्यवहार और उपज बहुत प्राचीन काल से होती आई है और यहाँ से बहुत अधिक मात्रा में यह विदेश भेजी जाती रही है। वैद्यक में यह कड़वी, चरपरी, हलकी, गरम, रूखी, तीक्ष्ण, अवृष्य, छेदक, शोषक, पित्तकारी, अग्नि- प्रदीपक, रुचिकारी, तथा कफ, वात, श्वास, शूल, कृमि, खाँसी, हृदयरोग और प्रमेह तथा बवासीर का नाश करनेवाली मानी गई है। साधारणतः इसका व्यवहार मसाले के रूप में ही होता है, पर हिकमत और डाक्टरी में यह ओषधि के रूप में भी काम आती है। जिन लोगों को लाल मिर्च अप्रिय या हानिकारक होती है वे प्रायः इसी का व्यवहार करते है; क्योंकि यह उससे कम तिक्त भी होती है और उत्तेजक तथा दाहजनक भी कम होती है। पर्या०—मरिच। वेणुज। यनवप्रिय। वल्लीज। कोल। कृष्ण। शुद्ध। कोलक। धमपत्तन। ऊषण। वरिष्ट। कटुक। वेणुक। शिरोवृत्त। वार आदि।

मिर्च (१)
वि० जिसका स्वभाव बहुत ही उग्र, तीव्र या कटु हो। (क्व०)।

मिर्चन †
संज्ञा स्त्री० [हिं० मिर्च + न (प्रत्य०)] झड़वेरी के फलों का चूर्ण जो नमक मिर्च मिलाकर चाट के रूप में बेचा जाता है।

मिर्चिया
संज्ञा स्त्री० [हिं० मिर्च] रोहिस घास।

मिर्त पु †
संज्ञा पुं० [सं० मत्य वा मृत्यु] मृत्युलोक। नरलोक। उ०—सुर्ग मिर्त पाताल कहा, कहा तीन लोक बिस्तार।— दरिया० बानो, पृ० ५।

मिर्तक पु
संज्ञा पुं० [सं० मृतक] दे० 'मृतक'। उ०—(क) मिर्तक परा वैद कह करई।—हिंदी प्रेमगाथा०, पृ० २१८। (ख) तुम तन मिर्तक देखि कै कियों वैद कर वेस।—हिं० क० का०, पृ० २१९।

मिल
संज्ञा स्त्री० [अं० मिल्स] १. कपड़ा बुनने का कारखाना। पुतलीघर। उ०—मिल बनती या भाड़ में जाती।—रंगभूमि, भा० २, पृ० ६२९। २. आटा आदि पीसने, लकड़ी काटने या चीरने तथा चीनी आदि वनाने का कल या कारखाना। यौ०—मिल मजदूर = मिल में काम करनेवाला मजूरा। मिल मालिक = मिल या कारखाने का मालिक।

मिलक †
संज्ञा स्त्री ० [अ० मिल्क] १. जमीन जायादाद। जमींदारी। मिलकियत। २. जागीर। उ०—ब्रज की भूमि इंद्र ते मानों मदन मिलक करि पाई।—सूर (शब्द०)।

मिलकाना †
क्रि० अ० [देश०] दीप का जलना या प्रकाशित होना।

मिलकाना ‡ (१);
क्रि० स० [हिं० मिलकना] दीया जलाना या बालना। दिप जलाना।

मिलकाना (२)
क्रि० स० [हिं०] दे० 'मलकाना' वा 'मुलकाना'। जैसे, आँखें मिलकाना।

मिलकी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० मिलक + ई(प्रत्य०)] १. वह जिसके पास जमीन जायादाद हो। जमीदार। २. वह जिसके पास धन संपत्ति हो। दैलतमंद। अमीर।

मिलन
संज्ञा पुं० [सं०] मिलने की क्रिया या भाव। मिलाप। भेंट। समागम। योग। २. मिश्रण। मिलावट। ३. एकत्र होना। इकट्ठा होना।

मिलनसार
वि० [हिं० मिलन + सार (प्रत्य०)] जो सबसे प्रेम- पूर्वक मिलता हो। सबसे हेलमेल रखनेवाला। सुशील और सद्व्यवहार रखनेवाला।

मिलनसारी
संज्ञा स्त्री० [हिं० मिलनसार + ई (प्रत्य०)] सबसे प्रेमपूर्वक मिलने का गुण। सबसे हेलमेल रखना। सद्व्यवहार और मुशीलता।

मिलना (१)
क्रि० अ० [सं० मिलन] १. एक पदार्थ का दूसरे में पड़ना। संमिलित होना। मिश्रित होना। जैसे, दाल में नमक मिलना। २. दो भिन्न भिन्न पदार्थों का एक होना। बीच में का अंतर मिटना। जैसे,—अब ये दोनों मकान मिलकर एक हो गए हैं। ३. संमिलित होना। समूह या समुदाय के भीतर होना। जैसे; —(क) हमारी किताबें भी इन्हीं में मिल गई हैं। (ख) अब वह भी जात में मिल गए हैं। यौ०—मिलाजुला = (१) संमिलित। (२) मिश्रित। मुह०—मिलीमार = ऊपर से मिला रहना और भीतर से हानि पहुँचाने की कोशिश करना। उ०—मानी मार की मिली मार कर कुतूहल दिखला रही है।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० १२५। ४. सटना। जुड़ना। चिपकना। ५. आकृति, गुण आदि में समान होना, बिलकुल या बहुत कुछ बराबर होना। जैसे,—(क) इन दोनों पुस्तकों का विषय बहुत कुछ मिलता है। (ख) इन दोनों का स्वभाव बहुत कुछ मिलता है। यौ०—मिलता जुलता = एक सा। समान। तुल्य। ६. भेंट होना। मुलाकात होना। देखादेखी होना। जैसे,—वह मुझसे रोज मिलते हैं। यौ०—मिलनातुर = मिलने के लिये व्यग्र। ७. विरोध या द्वेष दूर होना। मेल मिलाप होना। ८. संभोग करना। मैथुन करना। ९. किसी के पक्ष में हो जाना। जैसे,— अब तो आप भी उधर ही जा मिले। १०. लाभ होना। नफा होना। फायदा होना। जैसे,—इस सौदे में आपको भी कुछ मिलकर ही रहेगा। ११. प्रत्यक्ष होना। सामने आना। पता तगना। जैसे, रास्ता मिलना। संयो० क्रि०—जाना। १२. बजने से पहले बाजों का सुरा या आवाज ठीक होना। जैसे, तबला मिलना, सारंगी मिलना। १३. प्राप्त होना। उपलब्ध होना। जैसे,—यह पुस्तक बाजार में मिलती है। १४. मूल्य पर प्राप्त होना। जैसे,—गेहूँ एक रुपए का सवा सेर मिलता है। १५. मुलाकात करना। भेंटना। १३. आलिंगन करना। छाती से लगाना। गले लगाना। भेंटना। जैसे, राम और भरत का मिलना। मुहा०—मिल जुलकर = एक होकर। संघटित होकर। मिलना जुलना = अन्य लोगों से भेंट मुलाकात करना। परस्पर संवंध रखना। मिल बाँटकर खाना = समान भाव से किसी वस्तु का उपयोग करना। बराबर हिस्सा लगाकर किसी वस्तु को लेना।

मिलना पु (१)
क्रि० स० [ ? ] गौ आदि का दूध दुहना।

मिलनि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० मिलना] दे० 'मिलन'। उ०—(क) मिलनि बिलोकि भरत रघुवर को।—मानस, २।२४०। (ख) घुमड़नि मिलानि देखि डर आवे।—नंद० ग्रं०, पृ० १३२।

मिलनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० मिलना + ई (प्रत्य०)] १. विवाह की एक रस्म जो कहीं तो कन्यादान हो चुकने के उपरांत और कहीं उससे पहले होती है। इसमें कन्यापक्ष के लोग वरपक्ष के लोगों से गले मिलते और उन्हें कुछ नकद देते हैं। कहीं कहीं यह रस्म स्त्रियों में भी होती है। २. दे० 'मिलन'।

मिलपत्र
संज्ञा पुं० [सं०] अश्मंतक वृक्ष। बहेड़े का पेड़।

मिलवन पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० मिलावना] मिलाने पहुँचाने या झुंड में करने की क्रिया या भाव। उ०—गैया मिलवन मिस उठि भोर। गहगोरी गवनी उहि वोर।—नंद० ग्रं०, पृ० १७२।

मिलवना पु
क्रि० स० [हिं० मिलाना] दे० 'मिलाना'। उ०— उन हटकी हँसि के इतै इन सौंपी मुसकाइ। नैन मिलै मन मिलि गए दोऊ मिलवत गाइ।—बिहारी (शब्द०)।

मिलवाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० मिलवाना + ई (प्रत्य०)] १. मिलवाने को क्रिया या भाव। २. वह धन या पुरस्कार जो मिलवाने के बदले में दिया जाय।

मिलवाना
क्रि० स० [हिं० मिलाना का प्रे० रूप] १. मिलने का काम दूसरे से कराना। दूसरे को मिलने में प्रवृत करना। २. भेंट या परिचय कराना। ३. मेल कराना। ४. संभोग कराना।

मिलाँण पु
संज्ञा पुं० [हिं० मिलान] डेरा। शिविर। उ०— अमली समली आरती। जाई बगैरइ दियो मिलान।— वी० रासी, पृ० १२।

मिलाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० मिलाना + ई (प्रत्य०)] १. मिलाने की क्रिया या भाव। २. मिलाने की मजदूरी। ३. विवाह की मिलनी नामक रस्म। विशेष दे० 'मिलनी'। ४. जाति से निकाले हुए आदमी को फिर से जाति में मिलाने का काम।

मिलान
संज्ञा पुं० [हिं० मिलाना] १. मिलाने की क्रिया या भाव। २. तुलना। मुकाबला। ३. ठीक होने की जाँच। ४. मेल। भेंट। ५. मिलने का स्थान। डेरा। शिबिर। पड़ाव। उ० समाचार वसुदेव जु पाए। सखहि मिलान मिलानहि आए।—नंद० ग्रं०, पृ० २३५। क्रि० प्र०—करना।—मिलना।—होना।

मिलाना
क्रि० सं० [ सं० मिलन। हिं० मिलना का सक० रूप] १. एक पदार्थ में दूसरा पदार्थ डालना। मिश्रण करना। जैसे, दूध में पानी मिलाना। २. दो भिन्न भिन्न पदार्थों को एक करना। बीच में अंतर न रहने देना। जैसे,—दोनों दीवारें मिला दी गई। ३. संमिलित करना। एक करना। जैसे,—यह रकम भी उसी में मिला दो गई है । संयो० क्रि०—डालना।—देना। ४. सटाना जोड़ना। चिपकाना। ५. दो पदार्थों को तुलना करना। मुकाबिला करना। जैसे,—दोनों कपड़े मिलाकर देख लीजिए। ६. यह देखना कि प्रतिलिपि आदि मूल के अनुसार है या नहीं ठीक होने की जाँच करना। जैये,—नकल तो पूरी हो चुकी है पर मिलाना अभी बाकी है। संयो० क्रि०—लेना। ७. भेंट या परिचय कराना। ८. दो व्यक्तियों का विरोध या द्वेष दूर करके उनमें मेल कराना। सुलह या संधि कराना। ९. स्त्री और पुरुष का संयोग कराना। संभोग या संबंध कराना। संयो० क्रि०—देना। १०. किसी को अपने पक्ष में करना। अपना भेदिया या साथी बनाना। साँटना। जैसे,—हम उन्हें अपनी ओर मिला लेंगे। संयो० क्रि०—लेना। यौ०—मिलाना जुलाना। ११. बजाने से पहले बाजों का सुर या आवाज ठीक करना। जैसे, पखावज मिलाना, सारंगी मिलाना।

मिलाप
संज्ञा पुं० [हिं० मिलना + आप (प्रत्य०)] १. मिलने की क्रिया या भाव। २. मेल या सदभाव होना। मित्रता। यौ०—मेल मिलाप। ३. भेंट। मुलाकात। ४. एक साथ बजनेवाले बाजों का एक सुर में होना। ५. संभोग। संयोग। ६. 'मिलाई'। विशेष—इस शब्द का प्रयोग अधिकतर मनुष्यों या प्राणियों के संबंध में होता है, वस्तुओं के मिश्रण के लिये नहीं। मुहा०—मिलाप का पुतला = मेल मिलाप का प्रेमी या समर्थक। उ०—आइए ऐ मिलाप के पुतले। हम पलक पाँवड़े बिछा देंगे।—चुभते०, पृ० ६।

मिलाव
संज्ञा पुं० [हिं० मिलाना + आव (प्रत्य०)] १. मिलाने की क्रिया या भाव। मिलावट। २. दे० 'मिलाप'।

मिलावट
संज्ञा स्त्री० [हिं० मिलाना + आवट (प्रत्य०)] १. मिलाए जाने का भाव। किसी अच्छी या बढ़िया चीज में किसी घटिया चीज का मेल। खोट। जैसे,—यह सोना ठीक नहीं है; इसमें कुछ मिलावट है। विशेष—इस शब्द का प्रयोग केवल वस्तुओं के मिश्रण के लिये होता है प्राणियों के संयोग के लिये नहीं।

मिलावनो पु
संज्ञा पुं० [हिं० मिलाना] मिलाने कार्य। ताल। थपक। उ०—योंद थलकि बर चाल; मनो मृदंग मिलावनो।— नंद० ग्रं०, पृ० ३३४।

मलिंद पु
संज्ञा पुं० [सं० मिलिन्द] भौंरा। भ्रमर। उ० - मदरस मत्त मिलिंद गन, गान मुदित गननाथ।—मतिराम (शब्द०)।

मिलिंदक
संज्ञा पुं० [सं० मिलिन्दक] एक प्रकार का साँप।

मिलिक पु †
संज्ञा स्त्री० [अ० मिल्क] १. जमींदारी। मिल्कियत। २. जागीर। उ०—ब्रज की भूमि इंद्र तें मानो मदन मिलिक करि पाई।—सूर (शब्द०)।

मिलिटरी (१)
वि० [अं०] १. सेना या सैनिक संबंधी। फौजी। जैसे,— मिलिटरी डिपार्टमेंट। २. युद्ध संबंधी। सामरिक। जंगी। ३. लड़ाका। योद्धा। जैसे,—यह मिलिटरी आदमी है।

मिलिटरी (२)
संज्ञा स्त्री० [अं०] सैन्य दल। पलटन। फौज। जैसे, दंगे के दिनों में नगर में मिलिटरी का पहरा था।

मिलित
वि० [सं०] मिला हुआ। संगमित। युक्त।

मिलिशा
संज्ञा स्त्री० [अं०] ऐसे जवानों का दल जिन्हें किसी सीमा या स्थान की रक्षा के लिये शिक्षा दी गई हो और जिनसे समय समय पर रक्षा का काम लिया जाता हो। खड़ी पल्टन। इसका संघटन स्थायी नहीं होता। जैसे, वजीरिस्तान मिलिशा।

मिलिशिया
संज्ञा स्त्री० [अं० मिलिशा] दे० 'मिलिशा'।

मिलेठी †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'मुलेठी'।

मिलोना † (१)
क्रि० स० [हिं० √ मिल + औना (प्रत्य०)] १. दे० 'मिलाना'। २. गौ का दूध दूहना।

मिलोना (२)
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार की बढ़िया जमिन जिसमें कुछ बालू भी मिली होती है।

मिलौअल
संज्ञा स्त्री० [हिं० √ मिल + औअल (प्रत्य०)] १. परस्पर मिलने की क्रीया या भाव। २. भेंटना। गले लगाना। उ०—किसी से गले मिलौअल, किसी से झुक झुककर आदाब।—प्रेमधन०, भा० २, पृ० १४९।

मिलौनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० मिलना + औनी (प्रत्य०)] १. मुसलमानों में विवाह की एक रस्म जिसमें बरातियों आदि को कुछ नकद या वस्तुएँ भेंट की जाती हैं। मिलाई। दे० 'मिलनी'। २. किसी अच्छी चीज में कोई खराब चीज मिलाना। ३. दे० 'मिलाई'। ४. मिलने की क्रिया या भाव। मिलावट। ५. मिलाने के बदले में मिला हुआ धन।

मिल्क
संज्ञा पुं० [अ०] १. जमींदारी। २. जागीर। मुआफी। ३. जमीन की एक प्रकार की मिलकियत या मालिकाना। हक।विशेष—यह हक जिसे प्राप्त होता है, वह जमीदार को किसी प्रकार का लगान आदि नहीं देता। इस प्रकार की मिलकियत जमींदारी और काश्तकारी के बीच की होती है और मुरादाबाद आदि कुछ पश्चिमी जिलों में ही पाई जाती है। ४. धन। संपत्ति। उ०—काम ना आता दिसे ये मुल्कों माल, देव मुझे या रब तूँ मिल्के बेजबाल।—दक्खिनी०, पृ० १८५। ५. अधिकार। मिल्कियत।

मिल्कियत
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. जमींदारी। २. जागीर। माफी। ३. धनसंपत्ति। जायदाद। ४. वह पदार्थ या धनसंपत्ति जिसपर नियमानुसार अपना स्वामित्व हो सकता हो या अधिकार पहुँच सकता हो। जिसपर मालिकों का सा हक हो। जैसे,— वह सब तो हमारी मिल्कयत ठहरी, हम छोड़ कैसे सकते है।

मिल्की
संज्ञा पुं० [अ०] १. मिल्क का स्वामी या अधिकारी। जमींदार। २. जागीरदार। माफोदार।

मिल्कीयत
संज्ञा स्त्री० [अ० मिल्कियत] दे० 'मिल्कियत'।

मिल्लत (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० मिलन + त (प्रत्य०)] १. मेल जोल। घनिष्ठता। मिलाप। जैसे,—उनमें मिल्लत बहुत है। मुहा०—मिल्लत का = जिसमें मिलनसारी हो। मिलनसार। जैसे,—वह बहुत मिल्लत का आदमी है। ३. समूह। मडली। जत्था। (क्व०)।

मिल्लत (२)
संज्ञा स्त्री० [अ०] मजहब। संप्रदाय। पंथ। मत। जैसे,— हर मिल्लत के आदमी से वह अच्छा व्यवहार करता है। उ०— जर मजहबो मिल्लत मेरा, बंदी हूँ मैं जर की। जर ही मेरा अल्लाह है जर राम है मेरा।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ७९१।

मिशन
संज्ञा पुं० [अं०] १. वह व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह जो किसी विशेष कार्य या उद्देश्य से कहीं भेजा जाय। विशिष्ट कार्य के लिये भेजे हुए आदमी या मंडल। २. उद्देश्य। महान् लक्ष्य। ३. वह संस्था, विशेषतः ईसाइयों की संस्था जो संघ टत रूप से ईसाई धर्म के प्रचार का उद्दोग और लोगों को ईसाई धर्म में दिक्षत करती है। ४. ऐसी संस्था का केंद्र या कार्यालय आदि। ५. राजनीतिक उद्देश्य से भेजा हुआ दूत- मंडल।

मिशनरी
संज्ञा पुं० [अं०] वह ईसाई पादरी जो किसी मिशन का सदस्य होता है और अनेक स्थानों में ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिये जाता है। २. ईसाईयों का कोई धर्मपुरोहित। पादरी।

मिशि
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'मिशी'।

मिशी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जटामासी। २. मधुरिका। सोआ। ३. सौंफ। ४. मेथी। ५. दाभ। बड़ी डाभी।

मिश्की
वि० [फ़ा० मिश्कीं] १. कस्तूरी की सुगंध से पूरित। जैसे, मिश्की काकुलें। २. कस्तूरी की तरह काला या स्याह। उ०— अब वह मिश्की जुल्फों की बनावट।— प्रेमघन०, भा० २, पृ० २५८।

मिश्र (१)
वि० [सं०] १. मीला या मिलाया हुआ। मिश्रित। संयुक्त। जैसे, मिक्ष धातु। २. श्रेष्ठ। बड़ा। ३. जिसमें कई भिन्न भिन्न प्रकार की रकमा (जैसे, रुपया, आना, पाई, मन, सेर छटांक) की संख्या हो। जैसे, मिश्र भाग, मिश्र गुणा। (गणित)।

मिक्ष (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. हाथियों की चार जातियों में से एक जाति। २. सीनपात। ३. रक्त। लहू। ४. मूली। ५. ज्योतिष के अनुसार उग्र आदि सात प्रकार के गणो में से आंतिम या सातवाँ गण जा कृत्तिका और विशाखा नक्षत्र के योग में होता है। ६. सरयूपारीण, कान्यकुज्ज, सारस्वत, मैथिल और शाक- द्वीपीय, ब्राह्मणो के एक वर्ग की उपाधि। ७. श्रेष्ठ व्यक्ति। संमानित जन। जैसे, आर्य मिश्र (को०)। ८. ताल (संगीत में) ९. मूल और व्याज (धन के साथ प्रयोक्त)।

मिश्रक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. खारी नमक। २. वैद्यक में एक प्रकार का वंग या राँगा जिसे खुरा राँगा भी कहते हैं। ३. देवताओं का उद्यान। नंदन वन। ४. एक तीर्थ का नाम। ५. जस्ता। ६. मूली।

मिश्रक (२)
वि० १. मिलानेवाला। मिश्रण करनेवाला। २. मूलक।

मिश्रकस्नेह
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्यक में एक प्रकार की औषध जो त्रिफला, दशमूल और दंती की जड़ आदि से बनाई जाती है और जिसका व्यवहार गुल्म आदि रोगों में होता है।

मिश्रकावण
संज्ञा पुं० [सं०] देवताओं का उद्यान। नंदन। इंद्रवन।

मिश्रकेशी
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक अप्सरा का नाम जो मेनका की सखी थी।

मिश्रज
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो दो भिन्न जातियों के मिश्रण से बना या उत्पन्न हुआ हो। खच्चर।

मिश्रजाति
वि० [सं०] जो दो जातियों के मिश्रण से उत्पन्न हुआ हो। वर्णसंकर। दोगला।

मिश्रण
संज्ञा पुं० [सं०] [सं० मिश्रणीय, मिश्रित] १. दो या अधिक पदार्थों की एक में मिलाने की क्रिया। मेल। मिलावट। २. जोड़ लगाने की क्रिया। जोड़ना (गणित)।

मिश्रणीय
वि० [सं०] जो मिश्रण करने योग्य हो। मिलाने योग्य।

मिश्रता
संज्ञा स्त्री० [सं०] मिश्रित होने का भाव। मिलने या मिलाने का भाव।

मिश्रधान्य
संज्ञा पुं० [सं०] एक में मिलाए हुए कई प्रकार के धान्य।

मिश्रपुष्पा
संज्ञा स्त्री० [सं०] मेथी।

मिश्रवन
संज्ञा पुं० [सं०] भंटा।

मिश्रवर्ण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. काला अगरु। २. गन्ना। पौढ़ा।

मिश्रवर्ण (२)
वि० मिले जुले रंगों का। अनेक रंगों का [को०]।

मिश्रवर्णफला
संज्ञा स्त्री० [सं०] भंटा [को०]।

मिश्रव्यवहार
संज्ञा पुं० [सं०] गणित की एक क्रिया।

मिश्रशब्द
संज्ञा पुं० [सं०] खच्चर।

मिश्रि †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'मिश्री'। उ०—ताके लिये मेवाँ मिश्रि डारि के लडुआ किए।—दो सौ बावन०, भा० १, पृ० २८७।

मिश्रित
वि० [सं०] १. एक में मिलाया हुआ। मिश्रण किया हुआ। २. मिला हुआ।

मिश्रिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] मंदा आदि सप्त प्रकार की संक्रांतियों में से एक प्रकार की संक्रांति। वह सूर्यसंक्रमण जो कृत्तिका और विशाखा नक्षत्र के समय हो।

मिश्री (१)
संज्ञा पुं० [सं० मिश्रिन्] १. मिलानेवाला। मिश्रण करनेवाला। २. एक नाग का नाम।

मिश्री (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'मिसरी'।

मिश्रीकरण
संज्ञा पुं० [सं०] मिलाने की क्रिया। मिश्रण करना।

मिश्रीतुत्थ
संज्ञा पुं० [सं०] खपरिया। खर्पर। संग वसरी।

मिश्रेया
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मधुरिका। मोरी। २. एक प्रकार का साग। ३. शतपुष्पा। तालपर्ण।

मिश्रोदन
संज्ञा पुं० [सं०] खिचडी़।

मिष
संज्ञा पुं० [सं०] १. छल। कपट। २. बहाना। हीला। मिस। उ०—सीखने सी वह लगी भय मिष भृकुटि संचार।—शकुं०, पृ० ८। ३. ईर्ष्या। डाह। ४. स्पर्धा। होड़। ५. दर्शन। ६. सेवन। सींचना।

मिषि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जटामासी। २. सोआ। ३. सौफ। ४. अजमोदा। ५. खस। उशीर।

मिषिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सोआ। २. सौंफ। ३. जटामासी। बालछड़।

मिषी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'मिषि'।

मिष्ट (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. मीठा रस। २. मिष्टान्न। मिठाई (को०)। ३. स्वादिष्ट भोजन (को०)।

मिष्ट (२)
वि० १. मीठा। मधुर। २. सिक्त। तर (को०)। ३. सेंका, भूना या पकाया हुआ।

मिष्टकर्ता
संज्ञा पुं० [सं०मिष्टकर्तृ] मिष्टान्न तैयार करनेवाला, हलवाई [को०]।

मिष्टत पु
वि० [सं० मिष्ट हिं० + त (प्रत्य० स्वार्थि०)] मीठा। मधुर। उ०—चाढ़ कदम्म बुल्ले सुप्रभु मधुरित मिष्टत बानि।—पृ० रा०, २।३७९।

मिष्टनिंब
संज्ञा पुं० [सं० मिष्टानिम्ब] मीठी नीम।

मिष्टनिंबु
संज्ञा पुं० [सं० मिष्टनिम्बु] मीठा नीबू। जमोरी नीबू।

मिष्टपाक
संज्ञा पुं० [सं०] मुरब्बा।

मिष्टपाचक
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो बहुत अच्छा भोजन बनाता हो। जिसका बनाया भोजन बहुत स्वादिष्ट होता हो।

मिष्टभाषी
संज्ञा पुं० [सं० मिष्टभाषिन्] वह जो मीठा बोलता हो। मधुरभाषी।

मिष्टवाताद
संज्ञा पुं० [सं०] मीठा बादाम।

मिष्टाई पु
संज्ञा स्त्री० [सं० मिष्ट] दे० 'मिठाई'। उ०—मिष्टाइ विवह विचित्र। मिष्टाइ रूप पावित्र।—पृ० रा०, ६१।७५९।

मिष्टान पु
संज्ञा पुं० [सं० मिष्टान्न] दे० 'मिष्टान्न'। उ०—दस सहस्त्र सँग हेमरा मिष्टान महारे।—प० रासो, पृ० १७९।

मिष्टान्न
संज्ञा पुं० [सं०] मिठाई।

मिस (१)
संज्ञा पुं० [सं० मिष] १. बहाना। हीला। जैसे,—उन्होंने उपदेश के मिस ही उन्हें बहुत कुछ खरी खोटी कह सुनाई। २. नकल। पापंड। उ०—भाँड़ पुकारै पीर वस, मिस समुझै। सव कोय।—वृंद (शब्द०)।

मिस (२)
संज्ञा पुं० [फा़०] ताँबा। यौ०—मिसगर = ताँबे का काम करनेवाला। तमेरा।

मिस (३)
संज्ञा स्त्री० [अं०] कुँआरी लड़की। कुमारी।

मिस पु (४)
संज्ञा स्त्री० [सं० श्मश्रु] दे० 'मस'। उ०—मिस भीने सुमयंक मुख निपट बिराजत नूर। मनौ बीर उर काम के उगे आनि अंकूर। पृ० रा०, १।७५५।

मिसकाली
संज्ञा पुं० [अ० मिस्काल (= चार माशे की तौल ? ] एक प्रकार का पुराना सिक्का। उ०—बादशाह ने उस बाग के स्वामियों को जो उसके संबंधी थे एक सहस्त्र सिक्का मिसकाली दिया।—हुमायूँ०, पृ० ६।

मिसकीन
वि० [अ० मिस्कीन] १. जिसमें कुछ भी सामर्थ्य या बल न हो। बेचारा। दीन। २. नम्र। विनम्र। खाकसार। उ०—शाह सिकंदर देखकर, बहुत गए मिसकीन।—कबीर मं०, पृ० ११४। ३. गरीब। निर्धन। ४. सीधा सादा।

मिसकीनता पु
संज्ञा स्त्री० [अ० मिसकीन + हिं० ता (प्रत्य०)] १. दीनता। गरीबी। २. नम्रता। उ०—एही दरबार है गरब तें सरब हानि, लाभ जोग छेम को गरीबी मिसकोनता।— तुलसी (शब्द०)।

मिसकीनी
संज्ञा स्त्री० [अ०] मिसकीन होने का भाव। दीन या दरिद्र होने का भाव।

मिसकौट
संज्ञा पुं० [हिं० मिस्कोट] गुप्त मंत्रणा। दे० 'मिस्कोट'। उ०—इधर तो यह मिसकोट हो रही थी।—रंगभूमि, भा० २, पृ० ५८६।

मिसटाँन, मिसठाँण पु †
संज्ञा पुं० [सं० मिष्टान्न] दे० 'मिष्टान्न'। उ०—(क) साँपहि पैपान मिसटाँन महा अंमृत कै, उगलत कालकूट ह्वै मै अभिमान कै।—सुंदर० ग्रं० (जी०), पृ० १०४। (ख) अदताराँ घर ऊखरस, नँह कारण मिस- ठाँण। मन कारण मिसठाँणरो, जठै भूख रस जाण।— बाँकी० ग्रं०, भा० ३, पृ० ८१।

मिसन
संज्ञा स्त्री० [हिं० मिसना (= मिलना)] ऐसी भूमि जिसको मिट्टी में बालू भी मीली हो। वालू मीली हुई मिट्टी की जमीन।

मिसना पु (१)
क्रि० अ० [सं० मिश्रण] मिश्रित होना। मिलना।

मिसना (२)
क्रि० अ० [हिं० 'मीसना' का अक० रूप] मींजा या मला जाना। मीसा जाना।

मिसमार
वि० [अ० मिस्मार] नष्ट। समाप्त। ध्वस्त। उ०—एक साल और निकला था, शहर भर के मकानों की मिसमार कर दिया।—फसाना०, भा० ३, पृ० ५०८।

मिसमुपी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० मसि + हिं० मुख + ई (प्रत्य०)] मसिमुखी। लेखनी। उ०—लेखन रदनी मिसमुपी कंठी कलम कहायो—अनेकार्थ०, पृ० ११२।

मिसर (१)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'मिस्त्र'।

मिसर (२)
संज्ञा पुं० [हिं०] श्रेष्ट व्यक्ति। विद्वान्। पंडित। दे० 'मिश्र'। उ०—वेद पढ़ंता ब्राह्मण मारा सेवा करताँ स्वामी। अरथ करंतां मिसर पछाडया, तूंर फिरै मैमंती।—कबीर ग्रं०, पृ० १५१।

मिसरा
संज्ञा पुं० [अ० मिसरअ] कविता, विशेषतः उर्दू या फारसी आदि की कविता का एक चरण। पद। मुहा०—मिसरा लगाना = किसी एक मिसरे में अपनी ओर से रचना करके दूसरा मिसरा जोड़ना। यौ०—मिसरा तर = सुंदर और उपयुक्त मिसरा। मिसरा तरह। मिसरये सानी = दूसरा मिसरा।

मिसरातरह
संज्ञा पुं० [अ० मिसरा + फ़ा० तरह] वह दिया हुआ मिसरा जिसके आधार पर उसी तरह को गजल कही जाती है। पूर्ति के लेये दी हुई (उर्दू या फारसी कविता की) समस्या।

मिसरी (१)
संज्ञा पुं० [अ० मिस्त्री] १. मिश्र देश का निवासी। मिश्र नामक राष्ट्र का नागरिक।

मिसरी (२)
संज्ञा स्त्री० १. मिस्ञ में बोली जानेवाली भाषा। मिस्त्र देश की भाषा। २. दोबारा बहुत साफ करके कूजे या थाल में जमाई हुऊ दानेदार या रवेदार चीनी। उ०—कहँ मिसरी कँह ऊँख रस नहीं पियूस समान। कलाकंद कतरा कहा तुव अधरा रस पान।—स० सप्तक, पृ० ३४९। विशेष—प्रायः यह कूजे या कतरे रूप में बाजारों में बिकती हैं। यह वैद्यक में स्निग्ध, धातुवर्धक, मुखप्रिय, बलकारक, दस्तावर, हलकी, तृप्तिकारी, सब प्रकार के रोगों को शांत करनेवाली और रक्तपित को दूर करनेवाली मानी गई है। मुहा०—मिसरी की डली = बहुत ही मीठा या मधुर पदार्थ।

मिसरी (३)
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की शहद की मक्खी।

मिसरोटी
संज्ञा स्त्री० [हिं० मिस्सा + रोटी] १. मिस्से आटे की बनी हुई रोटी। विशेष दे० 'मिस्सा'। २. कंडे आदि पर सेंककर बनाई हुऊ बाटी। अंगाकड़ी।

मिसल
संज्ञा स्त्री० [अ० मिसिल] १. सिक्खों के वे अनेक समूह जो अलग अलग नायकों की अधीनता में स्वतंत्र हो गए थे। विशेष—गुरु नानक के बंदा नामक शिष्य की देखादेखी और भी अनेक सिख सरदारों ने अपने अपने समूह स्थापित कर लिए थे, जिन्हें वे मिसल कहते थे। जैसे, भंगियों की मिसल, रामगढ़िया मिसल, अहलूवालिया मिसल आदि। २. समूह। झुंड। पंक्ति। श्रेणी। दल। उ०— देखि कुसंग पाँव नहिं दीजै जहाँ न हरि की गल रे। जो ना मोक्ष मुक्ति कूँ चाहै संता बैसि मिसल रे।— राम० धर्म० पृ० १४५। ज— गेर मिसल ठाढ़ों किया, अंतरजामी नाम।— शिखर, पृ०, ३१०। मुहा०—मिसल बिगाड़ना=मुकदमे के सिलसिलेवार कागजात इधर उधर कर देना। उ०— क्रोध कोतवाल लोभ नाजर की मिसलत ज्ञान मुद्दई की जिन मिसल विगारी है।— राम० धर्म०, पृ० ५७। मिसल बैठाना=सिलसिला या क्रम ठीक करना। उ०— इस पेचदार बात की मिसल बैठाने के वास्ते मैं अपनी प्यारी मनमोहनी को बुलाता हूँ।— श्रीनिवास ग्रं०, पृ० ३४।

मिसलत, मिसलति पु
संज्ञा स्त्री० [अ० मसलहत] दे० 'मसलहत'। उ०— (क) क्रोध कोतवाल लोभ नाजर की मिसलत ज्ञान मुद्दई की जिन मिसल बिगारी है।— राम० धर्म०, पृ० ५७। (ख) करि मिसलति कौं सलि जुरी, सब भर सरस सुदेस।—ह० रासो, पृ० ५०।

मिसहा
वि० [हिं० मिस(=बहाना)+हा (प्रत्य०)] बहाना करनेवाला। छल करनेवाला। उ०— मै मिसहा सोयौ समुझि, मुँह चूम्यौ ढिग जाइ। हँस्यौ खिसानी गल गह्यौ रही गरैं लपटाइ।— बिहारी (शब्द०)।

मिसाना पु
क्रि० स० [हिं० मीसना का प्रे० रूप] मीसने के लिये दूसरे को प्रेरित करना। मिसवाना। २. हटाना। दूर कराना। उ०— मन का मैल लेइ मिसाय। तव तिरबेनी घाट नहाय।— जग० बानी, पृ० ११८।

मिसाल
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. उपमा। सादृश्य; जैसे,— लोग आँखो की मिसाल बादाम से देते हैं। २. उदाहरण। नमूना। नजीर। जैसे,—यों ही कहने से काम न चलेगा, कोई मिसाल भी दीजिए। क्रि० प्र०—देना। ३. कहावत। लोकोक्ति। मसल। ४. चित्र। तसवीर (को०)। ५. परवाना। आदेशपत्र (को०)। ६. स्वप्नलोक जो स्थूल जगत् का ही एक रूप है।

मिसालन
अव्य० [अ०] मिसाल के तौर पर। उदाहरण- स्वरूप [को०]।

मिसाली
वि० [अ०] उदाहरणरूप। मिसाल रूप में। नमूने का [को०]।

मिसि (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जटामासी। वालछड़। २. सौंफ। ३. सोआ। ४. अजमोदा। ५. खस।

मिसि पु (२)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'मिस'। उ०— संजोगी साधन मिसि अति सचु पायौ।— नंद० ग्रं०, पृ० ३७३।

मिसिमिल पु
संज्ञा पुं० [अ० बिसमिल्लाह] दे० 'बिसमिल्लाह'। उ०— कतहु बाँग कतहु बेद, कतहु मिसिमिल कतहु छेद। कीर्ति०, पृ० ४२।

मिमिरी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'मिसरी'।

मिसिल (१)
वि० [अ०] समान। तुल्य। वरावर। दे० 'मिस्ल'।

मिसिल (२)
संज्ञा स्त्री० १. किसी एक मुकदमे या विषय से संबंध रखनेवाले कुल कागज पत्रों आदि का समूह। २. किसी पुस्तक के अलग अलग छपे फार्म जो सिलाई आदि के काम के लिये क्रम से लगाकर रखे जाते हैं। ३. दे० 'मिसल'। मुहा०—मिसल उठाना= पुस्तक के अलग अलग फार्मों को सोने के लिये पहले एक क्रम से लगाना। (दफ्तरी)।

मिसिली
वि० [हिं० मिसिल+ई (प्रत्य०)] १. जिसके संबंध में अदालत में कोई मिसिल बन चुकी हो। २. जिसे न्यायालय में दंड मिल चुका हो। सजावाफ्ता। मुहा०—मिसिलचोर या बदमाश= बहुत बड़ा चोर या बदमाश जिसके अपराध अदालत की मिसिलों तक से प्रमाणित होते हों।

मिसी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० मिसि, मिषि, मिशी] १. दे० 'मिशी'। २. दे० 'मिसि'।

मिसी (२)
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] स्त्रियों का एक दंतमंजन। दे० 'मिस्सी' [को०]।

मिसीन ‡
संज्ञा स्त्री० [अं० मशीन] दे० 'मशीन'।

मिसु पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'मिस'। उ०— होइहि एहि मिसु दिस्टि मेरावा।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० २३०।

मिस्कला
संज्ञा पुं० [अ० मिस्कलह्] सिकली करनेवालों का वह औजार जिसकी सहायता से वे सिकली करते हैं।

मिस्काल
संज्ञा पुं० [अ० मिस्काल] साढ़े चार मासे की या चार मासे और साढ़े तीन रत्ती की एक तौल। उ०— दूसरी मूर्ति में एक माणिक था जो पानी से भी ज्यादा साफ था और शीशे से भी ज्यादा चमकदार था, तौल में ४५० मिस्काल था।—हिं० पृ० रा०, पृ० ५५०।

मिस्कीन
संज्ञा पुं० [अ०] १. दीन। बेचारा। उ०— कोई भी मिस्कीन मुसाफिर या मुहताज।— प्रेमघन०, भा० २, पृ० ८५। २. दरिद्र। गरीब। ३. भूखा नंगा। कंगाल। ४. सीधा सादा। सुशील। यौ०—मिस्कीनसुरत।

मिस्कीनसूरत
वि० [अ० मिस्कींन+फ़ा० सूरत] जो देखने में सीधा सादा या दीन, पर वास्तव में दुष्ट या पाजी हो।

मिस्कीनी
संज्ञा स्त्री० [अ० मिस्कीन+ई (प्रत्य०)] १. दीनता। २. गरीबी। ३. मुशीलता।

मिस्कीट
संज्ञा पुं० [अं० मेस(=भोज)] १. भोजन। खाना। २. एक साथ बैठकर खाने पीने वालों का समूह। ३. गुप्त परामर्श।

मिस्टर
संज्ञा पुं० [अं०] महाशय। महोदय। विशेष— इस शब्द का व्यवहार प्रायः अँगरेजों में अथवा अँगरेजी ढँग से रहनेवाले लोगों के नाम के साथ होता है। जैसे, मिस्टर जॉन, मिस्टर गुप्त।

मिस्तर (१)
संज्ञा पुं० [हिं० मिस्तरी?] १. काठ का वह औजार जिससे राज लोग छत या पलस्तर आदि पीटते हैं। पिटना। २. वह कल जिससे नील की टिकियाँ बनाई जाती हैं।

मिस्तर (२)
संज्ञा पुं० [अ०] दफ्ती का वह बड़ा टुकड़ा जिसपर समानांतर पर डोरे लपेट या सी लेते हैं और जो लिखने के समय लकीरें सीधी रखने के लिये लिखे जानेवाले कागज के नीचे रख लिया जाता है, अथवा जिसपर रखकर कागज दबा लिया जाता है।

मिस्तर (३)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'मेहतर'।

मिस्तरी
संज्ञा पुं० [अं० मास्टर(=उस्ताद)] वह जो हाथ का बहुत अच्छा कारीगर हो। चतुर शिल्पकार। विशेष— इस शब्द का प्रयोग बहुधा लोहारों, बढ़इयों, राजगीरों और कल पेंच आदि का काम करनेवालों के लिये ही होता है।

मिस्तरीखाना
संज्ञा पुं० [हिं० मिस्तरी+फ़ा० खाना] वह स्थान जहाँ लोहार, बढ़ई या कल पेंच आदि का काम जाननेवाले बैठकर काम करते हैं।

मिस्ता †
संज्ञा पुं० [देश०] १. वह मैदान जिसमें किसी प्रकार की हरियाली न हो। बंजर। २. अनांज दाँने के लिये तैयार की हुई सम भूमि।

मिस्त्री
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'मिस्तरी'। उ०— ग्राप अपने मिस्त्री- खाने जाकर मिस्त्री को समझा रहे हैं।— प्रेमघन०, भा० २, पृ० ४२। यौ०—मिस्त्रीखाना= दे० 'मिस्तरीखाना'।

मिस्मार
वि० [अ०] ध्वस्त। नष्ट। उ०— बहिर घाव दीखै नहीं भीतर भया मिस्मार।—दरिया०, पृ० १०।

मिस्त्र
संज्ञा पुं० [अ०] एक प्रसिद्ध देश जो अफ्रिका के उत्तर पूर्वी भाग में समुद्र के तट पर है और जो बहुत प्राचीन काल में अपनी सभ्यता और उन्नति के लिये बहुत विख्यात था। विशेष—इसके उत्तर में भूमध्यसागर, पूर्व में स्वेज की खाड़ी और पश्चिम में सहारा का रेगिस्तान है। दक्षिण में यह नील नदी के उद्गम तक चला गया है। नील नदी में प्रतिवर्ष बहुत बड़ी बाढ़ आती है जिसके कारण उसके आस पास का प्रदेश बहुत अधिक उपजाऊ है। इसके अंतर्गत चौदह प्रांत हैं। इसकी राजनगरी वा राजधानी काहिरा है और इसका सबसे बड़ा बंदरगाह अस्कंदरिया है। इधर बहुत दिनों से यह देश तुर्की के अधीन था और वहीं का राजप्रतिनिधि इसका शासन करता था; पर अब इसे अंगरेजों ने अपने संरक्षण में ले लिया। इस देश के विशुद्ध प्राचीन निवासी अब यहाँ नहीं रह गए हैं और उनकी वर्णसंकर संतान बची हैं, जिसका धर्म प्रायः इस्लाम और भाषा अरबी से उत्पन्न है। किसी समय में इस देश के निवासी उन्नति और सभ्यता की चरम सीमा पर पहुँच गए थे; और यह देश रोम, भारत, चीन आदि का समकक्ष माना जाता था; पर अब इसका पतन हो गया है। कहते हैं कि नूह के पुत्र मिस्तर ने अपने नाम पर एक नगर बसाया था, जिसके नाम पर इस देश का नाम पड़ा। बड़े बड़े भवनों औरइमारतों के जितने प्राचीन खँडहर इस देश में मिलते हैं, उतने और कहीं नहीं पाए जाते। पिरामिडों के लिये भी यह देश अत्यंत प्रसिद्ध हे। अंग्रेजों का संरक्षण और उनकी इजारेदारी कर्नल नासिर के नेतृत्व में समाप्त करने के बाद अब मिस्त एक स्वतंत्र देश है।

मिस्त्रा
संज्ञा पुं० [अ०] दे० 'मिसरा'।

मिस्त्री
संज्ञा स्त्री० [हिं०] १. दे० 'मिसरी'।

मिस्ल
वि० [अ०] समान। तुल्य। बराबर। जेसे,— यह घोड़ा मिस्र तीर के जाता है।

मिस्सर पु
संज्ञा पुं० [सं० मिश्र] पूज्य। आदरणीय। उ०— पाँधे मिस्सर अंधुले, काजी मुल्लाँ कोरु। तिनाँ पास न भिटीयै जो सबदे दे चोरु। - संतवाणी०, पृ० ७०।

मिस्सा
संज्ञा पुं० [सं० मिश्रण, हिं० मिसना(=मिलना)या मीसना(=मलना)] १. मूँग, मोठ आदि का भूसा जो भेड़ों और ऊँटों के लिये बहुत अच्छा समझा जाता है। २. कई तरह की दालों आदि को पीसकर तैयार किया हुआ आटा जिसकी रोटी गरीब लोग बनाकर खाया करते हैं। ३. किसी प्रकार की दाल को पीसकर तैयार किया हुआ मोटा आटा जिसकी रोटी बनाकर गरीब लोग खाते हैं। यौ०—मिस्सा कुस्सा=(१)बहुत ही मोटा अनाज या उसका बना खाद्यपदार्थ। (२) मोटा अन्न। कदन्न।

मिस्सी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० मिसी(=ताँबे का)] १. एक प्रकार का प्रसिद्ध मंजन जो माजूफल, लोहचून और तूतिए आदि से तैयार किया जाता है और जिसे सधवा स्त्रियाँ दाँतों में लगाती हैं। इससे दाँत काले हो जाते और सुंदर जान पड़ते हैं। उ०— पान भी खाया है मिस्सी भी जमाई हैगी।— भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ७९०। क्रि० प्र०—मलना।—लगाना। मुहा०—मिस्सी काजल करना=स्त्रियों का बनाव सिंगार करना। मिस्सी और काजल आदि लगाना। यौ०—मिस्सीदान या मिस्सीदानी=मिस्सी रखने का पात्र या डिबिया। २. किसी वेश्या का पहले पहले किसी पुरुष से समागम होना, जिसके उपलक्ष में प्रायः कुछ गाना बजाना और जलसा भी होता है। सिर ढकाई (मुसलमान वेश्या)।

मिहंताना †
संज्ञा पुं०[ हिं०] दे० 'मेहनताना'। उ०— बहुत अधिक मिहंताना लेकर।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० ७५।

मिहँदी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० मेन्धिका] दे० 'मेहँदी'। उ०—विरी अधर, अंजन नयन, मिहँदी पग अरु पानि। -मति० ग्रं०, पृ० ३४९।

मिह
संज्ञा पुं० [सं०] बरसता हुआ बादल। मेह।

मिहचना †
क्रि० स० [हिं० मीचना] दे० 'मीचना'। उ०—प्रीतम दृग मिहचत प्रिया पानि परस सुखु पाइ। जानि पिछानि अजान लौं नैकुँ न होति जनाइ।— बिहारी (शब्द०)।

मिहतर
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'मेहतर'।

मिहदार
संज्ञा पुं० [फ़ा० मिह(=मिहनत)+दार (प्रत्य०)] वह मजदूर जिसे नकद मजदूरी दी जाती हो, अन्न आदि के रूप में न दी जाती हो। (रुहेल०)।

मिहदी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० मेन्धिका] दे० 'मेहँदी'। उ०— बदन पर अकसर गहने, भौं मिहदी से रँगते हैं।— भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० २४।

मिहनत
संज्ञा स्त्री० [अ०] दे० 'मेहनत'।

मिहनताना
संज्ञा पुं० [अ० मिहनत] दे० 'मेहनताना'।

मिहनती
वि० [हिं० मिहनत+ई] दे० 'मेहनती'।

मिहना
संज्ञा स्त्री० [सं० मेहना] दे० 'मेहना'।

मिहमान
संज्ञा पुं० [फ़ा० मेहमान] दे० 'मेहमान'।

मिहमानदारी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० मेहमानदारी] दे० 'मेहमानदारी'।

मिहमानी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'मेहमानी'।

मिहर पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० मिहिर] सूर्य।

मिहर (२)
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० मेहर] दे० 'मेहर'। उ०— करहा सुणि सुदर कहइ मिहर करउ मों आज।—ढोला०, दू० ३५५। यौ०—मिहरनजर=कृपादृष्टि। उ०— कहर नजर कूँ छाँड़ि के मिहर नजर कूँ कीजै। सत कोटि गोपियों का उनता सबाब लीजै।—ब्रज० ग्रं०, पृ० ४१।

मिहरबान
संज्ञा पुं० [फ़ा० मेहरबाँ] दे० 'मेहरबान'।

मिहरबानी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० मेहरबानी] दे० 'मेहरबानी'।

मिहरा
संज्ञा पुं० [हिं०] १. दे० 'मेहरा'। २. दे० 'महरा'।

मिहराना ‡
क्रि० अ० [हिं० मेह या मेहरा] कुछ कुछ आर्द या नम होना।

मिहराब
संज्ञा स्त्री० [अ० मिहराब, मेहराब] दे० 'मेहराब'। उ०— कुदरती काबे की तू मिहराब में सुन गौर से। आ रही धुर से सदा तेरे बुलाने के लिये।—संत तुरसी, पृ० ५।

मिहरारू †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'मेहरारू'।

मिहल पु
संज्ञा पुं० [अ० महल] दे० 'महल'। उ०—पाच पचीसो तीन गुण, एक मिहल में राख।— कबीर सा०, पृ० ८७१।

मिहानी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० महना] दे० 'मथानी'।

मिहिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आसमान से पड़नेवाली बरफ। पाला। २. ओस। ३. कपूर।

मिहिर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य। उ०— करना होगा यह तिमिर पार। देखना सत्य का मिहिर द्वार।— तुलसी०, पृ० २०। २. आक का पौधा। ३. ताँबा। ४. बादल। ५. हवा। ६. चंद्रमा। ७. राजा। ८. दे० 'वराहमिहिर'।

मिहिर (२)
वि० वृद्ध। बुड्ढा।

मिहिरकुल
संज्ञा पुं० [फ़ा० महगुल का सं० रूप] शाकल प्रदेश के प्रसिद्ध हूण राजा तीरमाण (तुरमान शाह) के पुत्र का नाम। विशेष— इसने गुप्त सम्राटों पर विजय प्राप्त करके मध्य भारत पर अधिकार जमाया था। यह बौद्धों का बहुत बड़ा शत्रु था।एक बार मगध के राजा बालादित्य ने इसे पकड़ लिया था; पर फिर अपनी माता के कहने से छोड़ दिया था। इसने कुछ दिनों तक काश्मीर पर भी शासन किया था। यह ईसवी छठी शताब्दी के मध्य में हुआ था।

मिहिराण
संज्ञा पुं० [सं०] शिव।

मिहीं पु
वि० [हिं०] दे० 'महीन'। उ०— जैसे मिहीं पट मैं चटकीलो, चढ़ै रँग तीसरी बार के बोरैं।—मतिराम (शब्द०)।

मिहीं (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. मध्य प्रदेश में होनेवाली एक प्रकार की अरहर जिसके दाने कुछ बड़े होते हैं, और जो कुछ देर में तैयार होती है। २. गंडक नदी का एक प्राचीन नाम। उ०— आजकल जिसे गंडक कहते हैं, उन दीनों उसका नाम मिही था।—वैशाली०, पृ० १।

मिही पु (२)
वि० [हिं महीन] १. झीना। महीन। दे० 'मिहीं'। २. आर्द्र। तर। गीला। उ०— मिही अगौंछनि पोंछ लै फैल्यो काजर नैन। सरद चंद अति मँद यह चाहत मसता ऐन।—स० सप्तक, पृ० ३४८।

मिहीन †
वि० [हिं०] दे० 'महीन'। उ०— कबहु बादले रंग रंग के कतरि मिहीन उड़ावै।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ४१०।

मींगनी
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'मेंगनी'।

मींगी
संज्ञा स्त्री० [सं० मुद् गा(=दाल)] बीज के अंदर का गूदा। गिरी।

मीँचना
क्रि० स० [सं० मिष(=झपकना)या अभ्यंजन] दे० 'मीचना'। उ०— छिपने पर स्वयं मृदुल कर से, क्यों मेरी आँखें मीच रही।—कामयनी, पृ० ६७।

मीँजना † (१)
क्रि स० [हिं० मींडना] १. हाथों से मलना। मसलना। जैसे, छाती मींजना, हाथ मींजना। २. मर्दन करना। दलना। रगड़ना।

मीँजना (२) †
क्रि० स० [हिं० मीचना] मूँदना। बंद करना। (आँखों के लिये)। उ०— दूध माँझ जस घीउ है समुद माँह जस मोति। नैन मीजि जो देखहु जमक उठै तस जोति।— जायसी (शब्द०)।

मीँटना पु ‡
क्रि० स० [हं० मीचना, मीटना] दे० 'मींचना'। उ०— समाधि लगाइ करि आँखि मींटियतु है।—सुंदर० ग्रं०, भा० २, पृ० ६५७।

मीँड़
संज्ञा स्त्री० [सं० मीड़म्] संगीत में एक स्वर से दूसरे स्वर पर जाते समय मध्म का अंश इस सुंदरता से कहना जिसमें दोनों स्वरों के बीच का संबंध स्पष्ट हो जाय, और यह न जान पड़े कि गानेवाला एक स्वर से कूदकर दूसरे स्वर पर चला आया है। जैसे, 'सा' का उच्चारण करने के उपरांत 'रि' का उच्चारण करते समय पहले कोमल रिषभ का उच्चारण करना। गमक। विशेष— मींड़ की आवश्यकता किसी स्वर से केवल उसके दूसरे परवर्ती स्वर पर ही जाने में नहीं पड़ती बल्कि किसी एक स्वर से दूसरे स्वर पर जाने अथवा उतरने में भी पड़ती है। अर्थात् आरोहण और अवरोहण दोनों में उसके लिये स्थान है। जैसे, 'सा' के उपरांत 'म' का अथवा 'नि' के उपरांत 'ग' का उच्चारण करने में भी मींड़ का प्रयोग हो सकता और होता है। स्वरों की मूर्छनाओं का उच्चारण मीउ की सहायता से ही होता है। देशी बाजों में से बीन, रबाव, सरोद, सितार, सारंगी आदि में मींड़ बहुत अच्छी तरह निकाली जाती है, पर पियानो और हारमोनियम आदि अँगरेजी ढंग के बाजों में यह किसी प्रकार निकल ही नहीं सकती। विद्वानों का यह भी मत हैं कि मींड निकालने के लिये स्त्रियों के कंठ की अपेक्षा पुरुषों का कंठ बहुत अधिक उपयुक्त होता है; और इसका कारण यह है कि पुरुषों की स्वरनालिका स्त्रियों की स्वरनालिका की अपेक्षा अधिक लंबी होती है।

मीँडक पु
संज्ञा पुं० [हिं० मेढक] दे० 'मेढक'। उ०—(क) मन मींडक सूँ मारिये संका सरन निवारि।—दादू०, पृ० १५१। (ख) मान कियोड़ी महल ज्यूँ बुगला ज्यूँ कम बोल। मावड़ियो घर मींड़को पुरुखपणारी पोल।— बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० २३।

मींडना † (१)
क्रि० स० [हिं० माँड़ना] १. हाथों से मलना। मसलना। जैसे, आटा मींडना। २. (आँखें) मलना। बार बार (आँखें) दबाना। उ०— सो वह आँखे मींडि मींडि कै फिर फिरि के देखन लाग्यो, जो मोकों यह भ्रम तो नहों भयो।— दो सौ बावन०, भा० २, पृ० ९।

मींड़ासीगी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'मेंढ़ासींगी'।

मींत पु
वि० [सं० मत्त] दे० 'मत्त'। उ०— मनों मतवार लरै रस मींत।— पृ० रा०, ६१। ६४०।

मीयाँ †
संज्ञा पुं० [फ़ा० मियाँ] दे० 'मियाँ'। उ०— मींयाँ मैढ़ा आव घरि, वाढी बत्ता लोइ।— दादू० पृ० ६३।

मीआद
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. किसी कार्य की समाप्ति आदि के लिये नियत समय। अवधि। क्रि० प्र०—गुजरना।—बढ़ना।—बढ़ाना।—बीतना। २. कारागार के दंड का काल। कैद की अवथि। मुहा०—मीआद काटना=कारागार का दंड भोगना। सजा भुगतना। मीआद बोलना=कारावास का दंड देना। कैद की सजा देना।

मीआदी
वि० [हिं० मीआद+ई (प्रत्य०)] १. जिसके लिये कोई समय या अवधि निश्चित हो जैसे, मीआदी हुंडी। यौ०—मीआदी बुखार= एक प्रकार का ज्वर जो दो सप्ताह से लेकर छह सप्ताह तक चलता है। २. जो कारागार में रह चुका हो। जो जेलखाने में रहकर सजा भुगत चुका हो। जैसे, मीआदी चोर।

मीआदी हुंडी
संज्ञा स्त्री० [हिं० मीआदी+हुँडी] वह हुंडी जिसका रुपया तुरंत न देना पड़े, बल्कि एक नियत समय या अवधि पर देना पड़े। वह हुंडी जो मिति पूजने पर भुगताई जाय।

मीच पु
संज्ञा स्त्री० [सं० मृत्यु, प्रा० मिच्चु] मृत्यु। मौत। उ०—मीच गई जर बीच ही बिरहानल को झार।—मतिराम (शब्द०)।

मीचना
क्रि० स० [सं० मिप(=झपकना)या मिच्छ(=रोकना)] (आँखें) बंद करना। मूँदना।

मीचु पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० मृत्यु, प्रा० मिच्चु] मृत्यु। मौत।

मीजना
क्रि० स० [सं० मर्दन] दे० 'मींजना'।

मीजा †
संज्ञा स्त्री० [अ० मिज़ाज] १. अनुकूलना। २. स्वाभाव। मुहा०— मीजा पटना या मिलना=दो व्यक्तियों का परस्पर मेल जोल होना। स्वभाव मिलने के कारण मेल होना। ३. संमति। राय। क्रि० प्र०—देना।

मीजान
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. तुला। तराजू। २. तुला राशि। ३. कुल संख्याओं का योग। जोड़। (गणित)। क्रि० प्र०—देना।—लगाना। यौ०—मीजान मिलना= जमा खर्च का जोड़ बराबर होना। ४. दे० 'मीजा'।

मीटना †
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'मीचना'।

मीटर
संज्ञा पुं० [अ०] वह यंत्र या मशीन जो व्यय किए गए पानी या बिजली आदि की मात्रा बतलाती है।

मीटिंग
संज्ञा स्त्री० [अ०] परामर्श आदि के लिये एक स्थान पर बहुत से लोगों का जमावड़ा। अधिवेशन। सभा।

मीठ पु
वि० [सं० मिष्ट, प्रा० मिट्ठ] प्रिय। रुचिकर। मधुर। दे० 'मीठा-९'। उ०— मीठ बहुत सतनाम है पियत निकारै जान।— पलटू०, भा० १, पृ० ६।

मीठम पु
वि० [सं० मिष्ट+तम (प्रत्य०)] दे० 'मीठा-१'। उ०— ऊख गिरी धर ऊपरै, पल खाँडाँमय आब। तूंबा मीठम होय ती, सूबाँ, होय सवाब।—बाँकी० ग्रं०, भा० ३, पृ० ८१।

मीठा (१)
वि० [सं० मिष्ट, प्रा० मिट्ठ] [वि० स्त्री० मीठी] १. जो स्वाद में मयुर और प्रिय हो। चीनी या शहद आदि के स्वादवाला। 'खट्टा' या 'नमकीन' का उलटा। मधुर। जैसे,— (क) जितना गुड़ डालोगे उतना, मीठा होगा। (ख)यह आम बहुत मीठा है। मुहा०—मीठा और कठौता भर=अच्छा भी और अधिक भी। जो चीज अच्छी होती है वह अधिक मात्रा में नहीं मिलती। उ०— मीठो अरु कठवति भरो रौताई अरु खेम।— तुलसी ग्रं०, पृ० ८८। मीठा होना=किसी प्रकार के लाभ या आनंद आदि की प्राप्ति होना। अपने पक्ष में कुछ भलाई होना। जैसे,— हमें ऐसा क्या मीठा है, जो हम नित्य दौड़ दौड़कर तुम्हारे पास आया करें। २. जिसका स्वाद बहुत अच्छा हो। स्वादिष्ट। जायकेदार। जैसे, मीठा मीठा हप, कड़ुआ कड़ुआ थू। ३. धीमा। सुस्त। जैसे,— यह घोड़ा कुछ मीठा चलता है। ४. जो बहुत अच्छा न हो। साधारण या मध्यम श्रेणी का। मामूली। ५. जो तीव्र या अधिक न हो। हलका। मद्धिम। मंद। जैसे,—आज सबेरे से पेट में मीठा मीठा दर्द हो रहा है। यौ०—मीठा मीठा= हलका हलका। मंद। जैसे, दर्द। ६. जिसमें पुंस्त्व न हो, या कम हो। नामर्द। नपुंसक। ७. जो गुदाभंजन कराता हो। औंधा। ८. जो बहुत अधिक सुशील हो। किसी का कुछ भी अनिष्ट न करनेवाला। बहुत अधिक सीधा। जैसे,— इतने मीठे न बनो कि कोई चट कर जाय। ९. प्रिय। रुचिकर। जैसे, मीठे वचन, मीठी बात। उ०— वह चाहता है कि हम सबसे मीठे बने रहें।

मीठा (२)
संज्ञा पुं० १. मीठा खाद्यपदार्थ। मिठाई। २. गुड़। ३. हलुआ। ४. एक प्रकार का कपड़ा जो प्रायः मुसलमान लोग पहनते हैं और जिसे शीरींबाफ भी कहते हैं। ५. मीठा तेलिया। बछनाग नामक विष। ६. मीठा नीबू।

मीठा अमृतफल
संज्ञा पुं० [हिं० मीठा+अमृतफल] मीठा चकोतरा।

मीठा आलू
संज्ञा पुं० [हिं० मीठा+आलू] शकरकंद।

मीठा इंद्रजौ
संज्ञा पुं० [हिं० मीठा+इंद्रजी] कृष्ण कुटज। काली कुड़ा।

मीठा कद् दू
संज्ञा पुं० [हिं० मीठा+कद् दू] कुम्हड़ा।

मीठा गोखरू
संज्ञा पुं० [हिं० मीठा+गोखरू] छोटा गोखरू।

मीछा चावल
संज्ञा पुं० [हिं० मीठा+चावल] वह चावल जो चीनी या गुड़ के शरबत में पकाया गया हो।

मीठा जहर
संज्ञा पुं० [हिं० मीटा+अ० जहर] वत्सनाभ। बछनाग विष।

मीठा जीरा
संज्ञा पुं० [हिं० मीठा+जीरा] १. काला जीरा। २. सौंफ।

मीठा ठग
संज्ञा पुं० [हिं० मीठा+ठग] झूठा और कपटी मित्र। जो ऊपर से मिला रहे, पर धोखा दे।

मीठा तंबाकू
संज्ञा पुं० [हिं० मीठा+तंबाकू] तंबाकू जो कड़ी न हो। तीखापन दूर करने के लिये जूसी मिली तंबाकू।

मीठा तेल
संज्ञा पुं० [हिं०मीठा+ तेल] १. तिल का तेल। २. पोस्ते के दाने या खसखस का तेल।

मीठा तेलिया
संज्ञा पुं० [हिं० मीठा+तेलिया] बछनाग। वत्सनाभ विष।

मीठा नीबू
संज्ञा पुं० [हिं० मीठा+नीबू] जमीरी नीबू। चकोतरा।

मीठा नीम
संज्ञा पुं० [हिं० मीठा+नीम] एक प्रकार का छोटा वृक्ष जो प्रायः सारे भारत में पाया और कहीं कहीं लगाया जाता है। विशेष— इसमें एक प्रकार की मीठी गंध निकलती है। इसकी छाल पतली और खाकी रंग की होती है और पत्ते बकायन या नीम के पत्तों के समान होते हैं। इसके फल भी नीम के फल केही समान होते हैं जो कच्चे रहने पर हरे, और पकने पर काले हो जाते हैं। इनमें दो बीज रहते हैं। चैत बैसाख में इसके गुच्छों में छोटे छोटे फूल लगते है। इसकी जड़, छाल और पत्तियाँ औषध के रूप में काम आती हैं। वैद्यक में इसे चरपरा, कड़ुआ, कसैला और दाह, बवासीर, शूल आदि का नाशक माना गया है।

मीठा पानी
संज्ञा पुं० [हिं० मीठा +पानी] नीबू का अँगरेजी सत मिला हुआ पानी जो बाजारों में बंद बोतलों में मिलता है। लेमनेड।

मीठा पोइया
संज्ञा पुं० [हिं० मीठा+ पोइया] घोड़े की वह चाल जो न बहुत तेज हो और न बहुत धीमी।

मीठा प्रमेह
संज्ञा पुं० [हिं० मीठा+सं० प्रमेह] मधुमेह।

मीठा बरस
संज्ञा पुं० [हिं० मीठा+बरस] स्त्रियों की अवस्था का अठारहवाँ और कुछ लोगों के विचार से तेरहवाँ बरस जो उनके लिये कठिन समझा जाता है। मीठा साल।

मीठा भात
संज्ञा पुं० [हिं० मीठा+ भात] दे० 'मीठा चावल'।

मीठा विष
संज्ञा पुं० [हिं० मीठ+सं० विष] वत्सनाभ। बछनाग।

मीठा साल
संज्ञा पुं० [हिं० मीठा+फ़ा० साल] दे० 'मीठा बरस'।

मीठी
वि० स्त्री० [हिं०] दे० 'मीठा (१)'। मुहा०—मीठी को खट्टी मान लेना=अन्यथा बुद्धि होना। और का और समझ लेना। कुछ का कुछ समझ लेना। उ०— जाति को है अगर जिला रखना। तीन मीठी को मान ले खट्टी।—चुभते०, पृ० ५६।

मीठी खरखोड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० मीठी+खरखोड़ी] पीली जीवंती। स्वर्ण जीवंती।

मीठी गाली
संज्ञा स्त्री० [हिं० मीठी+गाली] मधुर गाली। वह गाली जो अप्रिय न लगे। जैसे, विवाहादि के अवसर पर गाई हुई गाली।

मीठी छुरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० मीठी +छुरी] १. वह जो देखने में मित्र, पर वास्तव में शत्रु हो। विश्वासघातक। २. वह जो देखने में सीधा पर वास्तव में दुष्ट हो। कपटी। कुटिल। मुहा०— मीठी छुरा चलाना=विश्वासघात करना कपट करना। उ०— हमारे हित के मूल में मीठी छुरी चलाते हैं।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० २१२।

मीठी तूँबी
संज्ञा स्त्री० [हिं० मीठी+तूँबी] कददू।

मीठी दियार
संज्ञा स्त्री० [हिं० मीठी+दियार] महापालू वृक्ष।

मीठी नजर
संज्ञा स्त्री० [हिं० मीठी+अ० नजर] प्रेम की निगाह। प्रेमभरी नजर।

मीठी नींद
संज्ञा स्त्री० [हिं० मीठी+नींद] सुखभरी नींद। आराम और निश्चिंतता की नींद। उ०— दो घड़ी के मेहमान हैं और बहुत जल्द ऐसी मीठी नीदं सोएँगे कि हर्श (हश्र) तक न जागेंगे।—फिसाना०, भा० ३, पृ० ८७।

मीठी मार
संज्ञा स्त्री० [हिं० मीठी+मार] ऐसी मार जिसकी चोट अंदर हो और जिसका ऊपर से कोई चिह्न न दिखाई दे। भीतरी मार।

मीठी लकड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० मीठी+लकड़ी] मुलेठी।

मीड़
संज्ञा स्त्री० [हिं० मींड] दे० 'मींड़'। उ०— भवती मीड़ मरीर दिए घन आनँद सौगुने रंग सों गाजै।—घनानंद, पृ० ४४।

मीडक †
संज्ञा पुं० [हिं० मेढक] [स्त्री० मीढकी] मंडूक। मेढक।

मीड़ना पु
क्रि० स० [हिं० माँडना(=मींजना)सं०मर्दन] मलना। दे० 'मींडना (१)'। उ०— गजराज इंद्र दिष्षै न तथ्थ। मीडंत मष्षिका जेम हथ्थ।—पृ० रा०, २। ३९७।

मीढ़
वि० [सं०] १. पेशाब किया हुआ। मूत्र के मार्ग से निकला या निकाला हुआ। २. मूत्र के समान। मूत्र का सा।

मीढुष (१)
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्र के एक पुत्र का नाम।

मीढुष (२)
वि० दयार्द्र। रहमदिल।

मीढुष्टम
संज्ञा पुं० [सं०] १. शिव। महादेव। २. सूर्य। ३. चोर।

मीढ्वा
संज्ञा पुं० [सं० मीढ्वस्] दे० 'मीढुष्टम' [को०]।

मीत
संज्ञा पुं० [सं० मित्र, प्रा० मित्त] मित्र। दोस्त। उ०— (क) मीत भै माँगा वेगि बिवानू। चाल सूर सँवरा अस्थानू।—जायसी (शब्द०)। (ख) हम हीं नर के मीत सदा साँचे हितकारी। इक हमहीं सँग जात तजत जब पितु सुत नारी।—भारतेंदु (शब्द०)।

मीन
संज्ञा पुं० [सं०] १. मछली। उ०— (क) कहि न सकत कछु चितवत ठाढ़े। मीन दीन जनु जल ते काढ़े।—मानस, २। ७०। (ख) बिरंच महादेव से मीन बहुतै जहाँ होय परगट कभी जोत मारा।—चरण० बानी, पृ० १३०। २. मेष आदि राशियों में से अंतिम या बारहवीं राशि। विशेष— इस राशि में पूर्व भाद्रपद नक्षत्र का अंतिम पद और उत्तर भाद्रपद तथा रेवती नक्षत्र हैं। इस राशि की अधिष्ठात्री देवियाँ दो मछलियाँ हैं और यबह चरणरहित, कफ- प्रकृति, जलचारी, निःशब्द, पिंगलवर्ण, स्निग्ध, बहुत संतानवाली और ब्राह्मण वर्ण की मानी गई है। कहते हैं, इस राशि में जो जन्म लेता है, वह क्रोधी, तेज चलनेवाला, अपवित्र और अनेक विवाह करनेवाला होता है। पर्या०—कीट। जलज। सौभ्य। अंगन। युग्म। सय। भक्ष्य। गुरुक्षेत्र। दीनात्मक। ३. मेष आदि बारह लग्नों में से अंतिम लग्न। विशेष— फलित ज्योतिष के अनुसार इस लग्न में जन्म लेनेवाला कार्यदक्ष, अल्पभोजी, स्त्री का बहुत कम साथ करनेवाला, चंचल, अनेक प्रकार की बातें करनेवाला, धूर्त, तेजस्वी, बलवान्, विद्वान्, धनवान्, चर्मरोगी, विकृतमुख, पराक्रमी, पवित्रतापूर्वक और शास्त्रानुकूल आचार आदि से रहनेवाला,विनीत, संगीतप्रेमी, कन्या संततिवाला, कीर्तिशाली, विश्वासी और धीर होता है और इसकी मृत्यु मूत्रकृच्छु, गुह्य रोग या उपवास आदि से होती है।

मीनक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का नयनांजन। एक तरह का सुरमा।

मीनकाक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] सफेद कनेर।

मीनकेत
संज्ञा पुं० [सं० मीनकेतु] दे० 'मीनकेतन'। उ०— तेरी ये बंसी लगै मीनकेत कौ बान।—स० सप्तक, पृ० १८७।

मीनकेतन (१)
वि० [सं०] जिसकी पताका में मीन का चिह्न हो। उ०— हुआ होगा बनना सफल जिसे देखकर मंजु मीनकेतन अनंग का।—लहर, पृ० ८३।

मीनकेतन (२)
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव।

मीनकेतु
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव [को०]।

मीनगंधा
संज्ञा स्त्री० [सं० मीनगन्धा] मत्स्यगंधा या सत्यवती का एक नाम।

मीनगंधिका
संज्ञा स्त्री० [सं० मीनगन्धिका] दे० 'मीनगोधिका' [को०]।

मीनगोधिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] जलाशय, तलाब या झील आदि।

मीनघाती (१)
संज्ञा पुं० [सं० मीनघातिन्] वगला।

मीनघाती (२)
वि० मछली मारनेवाला।

मीनति पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० विनती] दे० 'विनती'। उ०— पुन सराहिय सुंदरि मीनति जाहीरे।—विद्यापति, पृ० २२०।

मीनध्वज
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव [को०]।

मीननाथ
संज्ञा पुं० [सं०] गोरखनाथ के गुरु मत्स्येंद्रनाथ का एक नाम। मछंदरनाथ।

मीननेत्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] गाड़र दूब।

मीनपित्त
संज्ञा पुं० [सं०] कुटकी नामक ओषधि।

मीनमेख
संज्ञा पुं० [सं० मीन +मेष] सोच विचार। आगा- पीछा। असमंजस। उ०— (क) मीनमेख भा नारि के लेखे। कस पिउ पीठि दीन्हि मोहिं देखे।—जायसी (शब्द०)। (ख) मीनमेख बिनु बात करत तुम कहूँ मिथुन ललचाने।—भारतेंदु० ग्रं०, भा० २, पृ० ४५९। मुहा०—मीनमेख निकालना=(१)गुणदोष निकालना। गुणदोष देखना। उ०— तुम उसमें ख्वामख्वाह मीनमेख निकालने लगते हो।—रंगभूमि, भा० २, पृ० ६३३। (२) सोचविचार या आगापीछा।

मीनरंक
संज्ञा पुं० [सं० मीनरङ्क] जलकौवा। मरगाबी। मीनरंग।

मीनरंग
संज्ञा पुं० [सं० मीनरङ्ग] १. मछरंग नामक पक्षी जो मछली खाता है। २. जलकौआ।

मीनर
संज्ञा पुं० [सं०] शाखोट वृक्ष। सहोरा। २. मकर। घड़ियाल (को०)।

मीनहा पु
संज्ञा पुं० [सं० मीन+हा (प्रत्य०)] वंशी जिससे मछली पकड़ी जाती है। उ०— बडिस कुबेनी मीनहा मत्स्याधानी नाम।— अनेकार्थ०, पृ० ६२।

मीनांडी
संज्ञा स्त्री० [सं० मीनाण्ढी] एक प्रकार की शक्कर।

मीना (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] ऊषा की कन्या का नाम जिसका विवाह कश्यप से हुआ था।

मीना (२)
संज्ञा पुं० [देश०] राजपूताने की एक प्रसिद्ध योद्धा जाति। उ०— च्यारि सहस मीना प्रबल बैठे आइ बलाइ।— पृ० रा०, ७। ७८। विशेष— इस जाति के लोग बहुत वीर होते हैं और युद्ध में इनकी प्रवृत्ति बहुत होती है। किसी मसय ये बहुत बलशाली थे और प्रायः लूटमार करके अपना निर्वाह करते थे। महाराणा प्रताप को अपने युद्धों में इनसे बहुत सहायता मिली थी।

मीना (३)
संज्ञा पुं० [फ़ा०] १. रंग बिरंगा शीशा। २. एक प्रकार का नीले रंग का कीमती पत्थर। ३. कीमिया। ४. सोने, चाँदी आदि पर किया जानेवाला रंग बिरंग का काम। यौ०—मीनाकारी। ५. शराब रखने का कंटर या सुराही। उ०— मीना की ग्रीवा से झर झर गाती हो मदिरा स्वणिम स्वर।—मधु०, पृ० ६४।

मीनाकार
संज्ञा पुं० [फ़ा०] वह जो चाँदी या सोने आदि पर रंगीन काम बनाता हो। मीना करनेवाला।

मीनाकारी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] १. सोने या चाँदी पर होनेवाला रंगीन काम। २. किसी काम में निकाली या की हुई बहुत बड़ी बारीकी। मुहा०—मीनाकारी छौंटना=व्यर्थ का छिद्रन्वेषण करना। निरर्थक दोष निकालना। बाल की खाल निकालना।

मीनाक्ष (१)
वि० [सं०] मछली के समान सुंदर आँखोंवाला।

मीनाक्ष (२)
संज्ञा पुं० एक राक्षस का नाम।

मीनाक्षी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. भगवती दुर्गा का एक नाम। एक एक देवी जिनकी मूर्ति मदुराइ (तामलनाडु) मे है। २. कुबेर की कन्या का नाम। ३. गाड़र दूब। ४. ब्राह्मी बूटी। ५. शक्कर। चीनी।

मीनाबाजार
संज्ञा पुं० [फ़ा० मीनाबाजार] १. बाजार जिसमें हीरा मोती जैसा कीमती वस्तुए बिकती हो। २. वह बाजार जिसमें स्त्रियो के उपयोग की ही सारी चाजें हो और जिन्हें वे ही खरीदता बेचती हो। उ०— इस उत्सव मे मीनाबाजार भी लगाया जाता था, जहाँ सब अमीर उमरावा की स्त्रियाँ आकर दुकानें लगाती थी और सौदा भी प्रायः जनाना रखा जाता था।—राज० इति०, पृ० ७६६। विशेष—अकबर ने एक ऐसे ही बाजार का संचालन किया था।

मीनाम्रीण
संज्ञा पुं० [सं०] खंजरीट पक्षी। ममीला। खंजन।

मीनार
संज्ञा स्त्री० [अ० मनार] १. ईंट, पत्थर आदि की वह चुनाई जो प्रायः गोलाकार चलती है। यह प्रायः किसी प्रकार की स्मृति के रूप में तैयार की जाती है। स्तंभ। लाठ। २. मसजिदों आदि के कोनों पर बहुत ऊँची उठी हुई इसी प्रकार की गोल इमारत जो खंभे के रूप मे होती है। ३. वह ऊँचा स्थान जहाँ रोशनी की जाती है।

मीनारा
संज्ञा पुं० [अ० मनारह् हिं० मीनार] दे० 'मीनार'।

मीनालय
संज्ञा पुं० [सं०] समुद्र।

मीनी
संज्ञा स्त्री० [सं० मीन] दे० 'मीन'। उ०— वग मीनी का ध्यान धरि, पसू बिचारे खाइ।—दादू०, पृ० २०७।

मीमांसक
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो किसी बात की मीमांसा करता हो। मीमांसा या व्याख्या करनेवाला। आलोचक। समीक्षक। उ०— श्रव्य काव्य के मीमांसक वाणी के वैचित्र्य को काव्य का लक्षण मानेत थे और दृश्य काव्य के विवेचक रस का।—रस०, पृ० १। २. वह जो मीमांसा शास्त्र का ज्ञाता हो। मीमांसा का पंडित। ३. पूर्व मीमांसा के सूत्रकार जैमिनि ऋषि। ४. कुमारिल भट्ट का एक नाम। ५. भाष्यकार शबरस्वामी का एक नाम। ६. रामानुज का एक नाम। ७. माधवाचार्य का एक नाम।

मीनांसन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० मीमांसित] किसी प्रश्न की मीमांसा या निर्णय करने का काम।

मीमांसा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. किसी तत्व का विचार, निर्णय या विवेचन। अनुमान, तक आदि द्वारा यह स्थिर करना कि कोई बात कैसी है। उ०—अश्लीलता की मीमांसा के समय अपने पक्ष को न देखकर दूसरे पक्ष की भी देखना चाहिए।—रस क०, पृ० ४। २. हिंदुओं के छह् दर्शनों में से दो दर्शन जो पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा कहलाते हैं। विशेष— साधारणतः मीमांसा शब्द से पूर्व मीमांसा का ही ग्रहण होता है; उत्तर मीमांसा 'वेदांत' के नाम से ही अधिक प्रसिद्ध है। ३. जैमिनि कृत दर्शन जिसे पूर्व मीमांसा कहते हैं और जिसमें वेद के यज्ञपरक वचनों की व्याख्या बड़े विचार के साथ की गी है। विशेष— इसके सूत्र जैमिनि के हैं और भाष्य शबर स्वामी का है मीमांसा पर कुमारिल भट्ट के 'कातंत्रवार्तिक' और 'श्लोकवार्तिक' भी प्रसिद्ध हैं। माधवाचार्य ने भी 'जैमिनीय न्यायमाला विस्तार' नामक एक भाष्य रचा है। मीमांसा शास्त्र में यज्ञों का विस्तृत विवेचन है, इससे इसे 'यज्ञविद्या' भी कहते हैं। बारह अध्यायों में विभक्त होने के कारण यह मीमांसा 'द्वादशलक्षणी' भी कहलाती है। 'न्यायमाला विस्तार' में माधवाचार्य ने मीमांसासूत्रों के विषय में संक्षेप में इस प्रकार बताया है—पहले अध्याय में विधि, अर्थवाद, मंत्र, स्मृति और नामधेय की प्रामाणिता का विचार है। दूसरे मे अपूर्व कर्म और उसके फल का प्रीतपादन तथा विधि और निषेध का प्रक्रिया है; तीसरे मे श्रुतिलिंग वाक्यादि की प्रमाणता और अप्रमाणता कही गई है; चौथे में नित्य और नैमित्तिक यज्ञों का विचार है; पाँचवें में यज्ञो और श्रुतिवाक्या के पूर्वापर संबंध पर विचार किया गया। छठे में यज्ञों के करन और करानेवाला के अधिकार का निर्णय हे; सातवें और आठवें म एक यज्ञ की विधि को दूसरे यज्ञ में करने का वर्णन है; नवें में मंत्रों के प्रयोग का विचार है; दसवें मैं यज्ञों में कुछ कर्मों के करने या न करने से होनेवाले दोषों का वर्णन है; ग्यारहवे में तंत्रों का विचार है; और बारहवें में प्रसंग का तथा कोई इच्छा पूर्ण करने के हेतु यज्ञों के करने का विवेचन है। इसी बारहवें अध्याय में शब्द के नित्यानित्य होने के संबंध में भी सूक्ष्म विचार करके शब्द की नित्यता प्रतिपादित की गई है। मीमांसा में प्रत्येक अधिकरण के पाँच भाग हैं—विषय, संशय, पूर्वपक्ष, उत्तरपक्ष और सिद्धांत। अतः सुत्रों को समझने के के लिये यह जानना आवश्यक होता है कि कोई सूत्र इन पाँचों में से किसका प्रतिपादक है। इस शास्त्र में वाक्य, प्रकरण, प्रसंग या ग्रंथ का तात्पर्य निकालने लिये बहुत सूक्ष्म नियम और युक्तियाँ दी गई हैं। मीमांसकों का यह श्लोक सामान्यतः तात्पर्यनिर्णय के लिये प्रसिद्ध हैं— उपक्रमोपसंहारौ अभ्यासो/?/अपूर्वताफलम्। अर्थवादोपपत्ती च लिङ्ग तात्पर्यनिर्णये। अर्थात् किसी ग्रंथ या प्रकरण के तात्पर्यनिर्णय के लिये सात बातों पर ध्यान देना चाहिए—उपक्रम (आरंभ), उपसंहार (अंत), अभ्यास (बार बार कथन), अपूर्वता (नवीनता), फल (ग्रंथ का परिणाम वा लाभ जो बताया गया हो), अर्थवाद (किसी बात को जी में जमाने के लिये दृष्टांत, उपमा, गुणकथन आदि के रूप में जो कुछ कहा जाय और जो मुख्य बात के रूप में न हो), और उपपत्ति (साधक प्रमाणों द्वारा सिद्धि)। मीमांसक ऐसे ही नियमों के द्वारा वेद के वचनों का तात्पर्य निकालते हैं। शब्दार्थों का निर्णय भी विचारपूर्वक किया गया है। जैसे,—यज्ञ के लिये जहाँ 'सहस्र संवत्सर' हो, वहाँ 'संवत्सर' का अर्थ दिवस लेना चाहिए, इत्यादि। मीमांसाशास्त्र कर्मकांड का प्रतिपादक है; अतः मीमांसक पौरुषेय, अपौरुषेय सभी वाक्यों को कार्यपरक मानते हैं। वे कहते हैं कि प्रत्येक वाक्य किसी व्यापार या कर्म का बोधक होता है, जिसका कोई फल होता है। अतः वे किसी बात के संबंध में यह निर्णय करना बहुत आवश्यक मानते हैं कि वह 'विधि- वाक्य' (प्रधान कर्म सूचक) है अथवा केवल अर्थवाद (गौण कथन, जो केवल किसी दूसरी बात को जी में बैठाने, उसके प्रति उत्तेजना उत्पन्न करने, आदि के लिये हो)। जैसे रणक्षेत्र में जाओ, वहाँ स्वर्ग रखा है। इस वाक्य के दो खंड हैं।— 'रणक्षेत्र में जाओ' यह तो विधिवाक्य या मुख्य कथन है, और 'वहाँ स्वर्ग रखा है' यह केवल अर्थवाद या गौण बात है। मीमांसा का तत्वसिद्धांत विलक्षण है। इसकी गणना अनीश्वरवादी दर्शनों में है। आत्मा, ब्रह्म, जगत् आदि का विवेचन इसमें नहीं है। यह केवल बेद वा उसके शब्द की नित्यता का ही प्रतिपादन करता है। इसके अनुसार मंत्र ही सब कुछ हैं। वे ही देवता हैं; देवताओं की अलग कोई सत्ता नहीं। 'भट्ट दीपिका' में स्पष्ट कहा है 'शब्द मात्रं देवता'। मीमांसकों का तर्क यह है कि सब कर्म फल के उद्देश्य से होते हैं। फल की प्राप्ति कर्म द्वारा ही होती हैं अतः वे कहते हैं कि कर्म और उसके प्रतिपादक वचनों के अतिरिक्त ऊपर से और किसीदेवता या ईश्वर को मानने की क्या आवश्यकता है। मीमांसकों और नैयायिकों में बड़ा भारी भेद यह है कि मीमांसक शब्द को नित्य मानते हैं और नैयायिक अनित्य। सांख्य और मीमांसा दोनों अनीश्वरवादी हैं, पर वेद की प्रामाणिकता दोनों मानते हैं। भेद इतना ही है कि सांख्य प्रत्येक कल्प में वेद का नवीन प्रकाशन मानता है और मीमांसक उसे नित्य अर्थात् कल्पांत में भी नष्ट न होनेवाला कहते हैं। इस शास्त्र का 'पूर्वमीमांसा' नाम इस अभिप्राय से नहीं रखा गया है कि यह उत्तरमीमांसा से पहले बना। 'पूर्व' कहने का तात्पर्य यह है कि कर्मकांड मनुष्य का प्रथम धर्म है ज्ञानकांड का अधिकार उसके उपंरात आता है।

मीसांसाकार
संज्ञा पुं० [सं०] जैमिनि, जिन्होंने मीमासांसूत्र की रचना की है।

मीमांसित
वि० [स०] जिसकी मीमासां की जा चुकी हो। जो विचारपूर्वक स्थिर किया जा चुका हो।

मीमांस्य
वि० [सं०] १. जो मीमांसा करने के योग्य हो। २. जिसकी मीमांसा करनी हो।

मीयाँ पु
संज्ञा पुं० [फा० मियाँ] दे० 'मियाँ'। उ०—आए तालिब इलमजानि सब मीयाँ जी तब।—प्रेमघन०, भा० १, पृ० २०।

मीयाद
संज्ञा स्त्री० [अ० मीआद] दे० 'मीआद'।

मीयादी (१)
वि० [हिं०] दे० 'मीआदी'।

मीर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. समुद्र। २. पर्वत का एक भाग। ३. सीमा। हद। ४. जल।

मीर (२)
संज्ञा पुं० [फा़०] १. सरदार। प्रधान। नेता। उ०—मीर उमराव दिन चार के पाहुना।—पलटू०, भा० १, पृ० १९। २. धार्मिक आचार्य। ३. सैयद जाति की उपाधि। जैसे, मीर सुलतान अली। किसी बड़े सरदार या रईस का पुत्र। ५. ताश या रंजीफे में का सबसे बड़ा पत्ता। ६. वह जो खेल में औरों से पहले जीतकर अपना दाँव खेलकर अलग हो गया हो। (लड़के)। ७. वह जो सबसे पहले कोई काम विशेषतः प्रतियोगिता का नाम कर डाले। किसी काम में लगे हुए कई आदमियों में से वह जो सबसे पहले काम कर ले। मुहा०—मीर बनाना=प्रधान बनाना। प्रमुखता प्राप्त करना। उ०—'हरीचंद' तोहिं पकरि नचाउँ मीर बनू ब्रज बालन में।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ३९६। मीर होना=पहले जीत जाना या कोई काम कर डालना।

मीरअर्ज
संज्ञा पुं० [फा० मार+अ० अर्ज] वह कर्मचारी जो बादशाहों की सेवा में लोगों के निवेदनपत्र आदी उपस्थित करे।

मीरआखुर
संज्ञा पुं० [फा० मार+अ० आखुर] घुड़साल का निरक्षक। अस्तबल का दारोगा [को०]।

मीरआतिश
संज्ञा पुं० [फ०] वह कर्मचारी जिसकी अधीनता में तोपखाना हो।

मीरकाफिला
संज्ञा पुं० [अ० मीर काफिलह्] काफिले का नेता या सरदार।

मीरकारवाँ
'मीरकाफिला'।

मीरजा
संज्ञा पुं० [फ़ा० मीरज़ा] १. अमीर या सरदार का लड़का अमीरजादा। २. मुगल शाहजादों की एक उपाधि। ३. सैयद मुसलमानों की एक उपाधि। उ०—'यकरंग' ने तलाश किया है बहुत वले। मजहर सा इस जहाँ में कोई मीरजा नहीं। विशेष— दे० 'मिरजा'।

मीरजाई
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० मीरजा़ई] १. मीरजा होने का भाव। २. मीरजा का पद या उपाधि। ३. सरदारी। अमीरी। ४. अमीरों या शाहजादों का सा ऊँचा दिमाग होना। ५. अभिमान घमंड। शेखी। ६. दे० 'मिरजई'।

मीरफर्श
संज्ञा पुं० [फ़ा० मीरफर्श] वे गोल, ऊँचे और भारी पत्थर जो बड़े बड़े फर्शों या चाँदनियों आदि के कोनों पर इसलिये रखे जाते हैं जिसमें वे हवा से उड़ न जायँ।

मीरबख्शी
संज्ञा पुं० [फ़ा० मीरबख्शी] मुसलमानी राजत्व काल का एक प्रधान कर्मचारी जिसका काम वेतन बाँटना होता था।

मीरबहर
संज्ञा पुं० [फ़ा० मीरबह्र] दे० 'मीरबहरी'।

मीरबहरी
संज्ञा पुं० [फ़ा०] १. मुसलमानी राजत्वकाल में जल- सेना का प्रधान अधिकारी। २. वह प्रधान कर्मचारी जो बंदरगाहों आदि का निरीक्षण करता था।

मीरबार
संज्ञा पुं० [फ़ा०] पुराने मुसलमानी समय का वह अधिकारी जो लोगों को किसी सरदार या बादशाह के सामने उपस्थित होने से पहले उन्हें देखता और तब उपस्थित होने की आज्ञा देता था।

मीरभुचड़ी
संज्ञा पुं० [फ़ा० मीर + देश० भुचड़ी] एक कल्पित पीर जिसे हिजड़े अपना आदि पुरुष और आचार्य मानते हैं और जिसके वंश में वे अपने आप को समझते हैं। विशेष— कहते हैं कि ये स्त्रियों के वेश में रहते, चरखा कातकर अपना निर्वाह करते और छह महीने स्त्री तथा छह महीने पुरुष रहा करते थे। जब हीजड़ों में कोई नया हीजड़ा आकर संमिलित होता है, तब वे उसी के नाम की कड़ाही तलते और उसे पकवान खिलाते हैं। कहते हैं, जो कोई यह पकवान खा लेता है, वह भी हीजड़ों की तरह हाथ पैर मटकाने लगता है।

मीरमंजिल
संज्ञा पुं० [फ़ा० मीर+अ० मंजिल] वह कर्मचारी जो बादशाहों या लश्कर आदि के पहुँचने से पहले ही मंजिल या पड़ाव पर पहुँचकर वहाँ सब प्रकार की व्यवस्था करे।

मीरमजलिस
संज्ञा पुं० [फ़ा०] सभा या अधिवेशन का प्रधान अधिकारी। सभापति।

मीरमहल्ला
संज्ञा पुं० [फ़ा० मीर+अ० महल्ला] किसी महल्ले का प्रधान या सरदार।

मीरमुंशी
संज्ञा पुं० [फ़ा० मीर+अ० मुंशी] मुंशियों में प्रधान या सरदार। सबसे बड़ा मुंशी।

मीरशिकार
संज्ञा पुं० [फ़ा०] वह प्रधान कर्मचारी जो अमीरों या बादशाहों के शिकार की व्यवस्था करता है।

मीरसामान
संज्ञा पुं० [फा़०] वह प्रधान कर्मचारी जो अमीरों या बादशाहों की पाकशाला की व्यवस्था करते है।

मीरहाज
संज्ञा पुं० [फा़० मीर अ०+हज्ज] हाजियों का सरदार या हाजियों के समूह का प्रधान।

मीरास
संज्ञा स्त्री० [अ०] वह धन संपत्ति जो किसी के मरने पर उसके उत्तराधिकारी को मिले। तरका। बपौती।

मीरासी
संज्ञा पुं० [अ० मीरास] [स्त्री० मीरासिन] एक प्रकार के मुसलमान जो पश्चिम में पाए जाते है। विशेष— ये प्रायः गाने बजाने का काम करते हैं और भाँड़ों की तरह मसखरापन करके लोगों को प्रसन्न करते है।

मीरी
संज्ञा स्त्री० [फा़० मीर+ई (प्रत्य०)] १. मीर होने का भाव। २. खेल में किसी लड़के का सर्वप्रथम होना। ३. खेल में लड़कों का अपना दाँव खेलकर खेल से अलग हो जाना।

मील (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वन। जंगल। २. निमेष (को०)।

मील (२)
संज्ञा पुं० [अं०] दूरी की एक नाप जो १७६० गज की होती है। इसे साधारण कोस का आधा मानते हैं। यौ० —मील के पत्थर=प्रगति का प्रतीक। यात्रा का एवं मंजिल का सूचक।

मीलक
संज्ञा पुं० [सं०] रोहित मछली। रोहू।

मीलन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० मीलनीय, मीलित] १. बंद करना। जैसे, नेत्रमीलन। २. संकुचित करना। सिकोड़ना।

मीलित (१)
वि० [सं०] १. बंद किया हुआ। २. सिकोड़ा हुआ।

मीलित (२)
संज्ञा पुं० एक अलंकार जिसमें यह कहा जाता है कि एक होने के कारण दो वस्तुओं (उपमेय और उपमान) में भेद नहीं जान पड़ता, वे एक में मिली जान पड़ती हैं। जैसे,—पँखुरी लगी गुलाब की गात न जानी जाय।

मीवग
संज्ञा पुं० [सं०] एक बहुत बड़ी संख्या का नाम। (बौद्ध)।

मीवर (१)
वि० [सं०] १. हिंसक। २. पूज्य।

मीवर (२)
संज्ञा पुं० सेनापति।

मीवा
संज्ञा पुं० [सं० मीवन्] १. पेट में का कीड़ा। २. वायु। हवा। ३. सार। तत्व।

मीशान
संज्ञा पुं० [सं०] महारग्वध वृक्ष। अमलतास।