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बैक (१)
संज्ञा पुं० [देश०] कुलसूचक उपाधि। अल्ल। उ०—बूसर एक कस्बे का नाम था। जहाँ के पूर्व काल के वे रहनेवाले थे। जिससे यह बैंक उनका पड़ा। क्योकि बहुत से गोत वा बैंक गाँवों के नामों से भी होते हैं। वैसे ही यह भी हुआ।— सुंदर० ग्रं० (जी०), भा० १, पृ० ५।

बैंक (२)
संज्ञा पुं० [अं०] वह स्थान या संस्था जहाँ लोग ब्याज पाने की इच्छा से रुपया जमा करते हों और ऋण भी लेते हों। रुपए के लेन देन की बड़ी कोठी। यौ०—बैक जमा। बैंक डिपाजिट। बैक ड्राफ्ट। बैंक दर। बैंक बैलेन्स। बैंक रेट।

बैंकर
संज्ञा पुं० [अं०] महाजन। साहूकार। कोठीवाला।

बैंड
संज्ञा पुं० [अ०] १. झुंड। २. बाजा बजानेवालों का झुंड जिसमें सब लोग मिलकर एक साथ बाजा बजाते हैं। यौ०—बैंडमास्टर = बैंड का वह प्रधान जिसके संकेत के अनुसार बाजा बजाया जाता है।

बैंबिक
स्त्री० पुं० [सं० बैम्बिक] वह व्यक्ति या नायक जो प्रयत्न पूर्वक स्त्रियों के संपर्क में रहता हो या उन्हें प्यार करता हो [को०]।

बैंगन
संज्ञा पुं० [सं० वृन्ताक] १. एक वार्षिक पौधा जिसके फल की तरकारी बनाई जाती है। भंटा। उ०—गुरू शब्द का बैंगन करिले तब बनिहै कुँजड़ाई।—कबीर० श०, भा० ३, पृ० ४८। विशेष—यह भटकटैया की जाति का है और अबतक कहों कहीं जंगलों में आपसे आप उगा हुआ मिलता है जिसे 'बनभंटा' कहते हैं। जंगली रूप में इसके फल छोटे और कड़ुवे होते है। ग्राम्य रूप में इसकी दो मुख्य जातियाँ है; एक वह जिसके पत्तों पर काँटे होते हैं; दूसरी वह जिसके पत्तों पर काँटे नहीं होते। इसके अतिरिक्त फल के आकार, छोटाई, बड़ाई और रंग के भेद से अनेक जातियाँ हैं। गोल फलवाले बैंगन को मारुवा मानिक कहते हैं और लबोतरे फलवाले को बथिया। यद्यपि इसके फल प्रायः ललाई लिए गहरे नीले रंग के होते हैं, तथापि हरे और सफेद रंगके फल भी एक ही पेड़ में लगते हैं। इसकी एक छोटी जाति भी होती है। इस पौधे की खेती केवल मैदानों में होती है। पर्वतों की अधिक ऊँचाई पर यह नहीं होता। इसके बीज पहले पनीरी में बोए जाते हैं; जब पोधा कुछ बड़ा होता है, तब क्यारियों में हाथ हाथ भर की दूरी पर रोपे जाते हैं। इसके बीज की पनीरी साल में तीन बार बोई जाती है; एक कार्तिक में दूसरी माघ में और तीसरी जेठ अषाढ़ में। वैद्यक में यह कटु, मधुर और रुचिकारकतथा पित्तनाशक, व्रणकारक, पुष्टिजनक, भारी और हृदय को हितकारक माना गया है। पर्या०—वार्ताकी। वृंताक। मांसफला। वृंतफला। २. एक प्रकार का चावल जो कनारा और बंबंई प्रांत में होता है।

बैंगनी
वि० [हिं० बैंगन + ई (प्रत्य०)] १. वैगन की बनी हुई वस्तु। २. बैगन के रंग का। जो ललाई लिए नीले रंग का हो। बैंजनी। यौ०—बैगनीबूँद = एक प्रकार की छींट जिसमें सफेद जमीन पर बैंगनी रंग की छोटी छोटी बूटियाँ होती है।

बैंजनी
वि० [हिं० बैंगनी] जो ललाई लिए नीले रंग का हो। बैंगनी।

बैंड़ना
क्रि० स० [हिं० बाड़ा, बेढा़] दद करना। बेढ़ना। पशुओं को रोककर रखना। उ०—तू अलि कहा परयो है पैडे। ब्रज तू स्याम अजा भयो हमकौ यहऊ बचत न बैंड़े।—सूर०, १०।३६१५।

बैंढ़ा पु
वि० [हिं०] दे० 'बैड़ा'। उ०—मेढ़ा भँवर उछालन चकरा समेट माला। बैडा भँमीर तखता कट्टो पछार गर्रा।—नजीर (शब्द०)।

बैँत, बैँताँ
संज्ञा पुं० [वेतस्] दे० 'बेंत'।

बै (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० वाय] बैसर। कंघो। (जुलाहे)।

बै (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० वय] दे० 'वय'। यौ०—बैसांघ।

बै (३)
संज्ञा स्त्री० [अ०] रुपए पैसे आदि के बदले में कोई वस्तु दूसरे को इस प्रकार दे देना कि उसपर अपना कोई अधिकार न रह जाय। बेचना। बिक्री। क्रि० प्र०—करना।—होना। यौ०—बैनामा। मुहा०—बै लेना या खरीदना = जमीन आदि बैनामा लिखाकर मोल लेना।

बैकना †
क्रि० अ० [हिं० बहकना] अधिकार या सीमा से बाहर जाना।

बैकल †
वि० [सं० विकल, मि० फा़० बेकल] पागल। उन्मत्त। उ०—(क) कहुँ लतिकन महँ अरुझति अरुझी नेह। भइ बिहाल बैकल सी सुधि नहिं देह।—रघुराज (शब्द०)। (ख) यतिपति पर पंडित कुमति किय मारन अभिचार। ते बैकल बागल लगे बिष्ठा करत अहार।—रघुराज (शब्द०)।

बैकुंठ
संज्ञा पुं० [सं० वैकुण्ठ] दे० 'वैकुंठ'।

बैकुंठी †
स्त्री० स्त्री० [हिं० बैकुंठ + ई (प्रत्य०)] अरथी जिसपर शव रखकर श्मशान को ले जाते हैं। उ०—सुंदरदास जी की बैंकुंठी (चकडोल) बड़े ही सदभाव से सजाई गई थी।— सुंदर ग्रं० (जी०), भा० १, पृ० ११८।

बैखरी
संज्ञा स्त्री० [सं० बैखरी] दे० 'बैखरी'। उ०—परा पसंती मधमा बैखरी, चौबानी ना मानी।—कबीर श० भा०, पृ०, ३६।

बैखानबिद पु
वि० [सं० व्याख्यानविद्] व्याख्या करनेवाले। व्याख्याकार। ठीकाकार। उ०—जो पडित बैखानबिद सो पुनि भाषा चाहि। निंदति है ब्रजबानि कों पहुँचत बुद्धि न जाहि।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ५४२।

बैखानस
वि० [सं० वेखानस] दे० 'वैखानस'। उ०—बैखानस सोई सीचै जोगू। तप बिहाइ जेहि भावै भोगू।—मानस, १।१७३।

बैग
संज्ञा पुं० [अं०] १. थैला। झोला। बोरा। २. टाठ का वह थैला जिसमें यात्री अपना असबाब भरकर हाथ में खटकाकर साथ ले जाते हैं।

बैगन
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'बैंगग'।

बैगना
संज्ञा पुं० [हिं० बैगन] एक प्रकार का पकवान या पकोड़ी जो बैगन आदि के टुकड़ों को बेसन में लपेटकर और तेल में तलकर बनाई जाती है।

बैगनी (१)
वि० [हिं० बैगन] दे० 'बैगनी'।

बैगनी (२)
संज्ञा स्त्री० दे० बैगन'।

बैजंती
संज्ञा स्त्री० [सं० वैजयन्ती] १. फूल के एक पौधे का नाम। वैजयंती। उ०—राजति उर बैजती माल। चलत जु मत्त द्विरद की चाल।—नंद० ग्रं०, पृ० २९३। विशेष—इसके पत्ते हाथ हाथ भर तक के लंबे और चार पाँच अगुल चौडे़ धड़ या मूल काँड से लगे हुए होते हैं। इसमें टहनियाँ नहीं होतीं, केले की तरह कांड सीधा ऊपर की ओर जाता है। यह हलदी ओर कचूर जाति का पोधा है। कांड के सिर पर लाल या पीले फूल लगते हैं। फूल लबे और कई दलों के होते हैं और गुच्छों में लगते हैं। फूलों की जड में एक एक छोटी घुंडी होती है जो फूल सूखने पर बढ़कर बोडी़ हो जाती है। यह बोंडी़ तिकोनी और लंबोतरी होती है जिसपर छोटी छोटी नोक या कँगूरे निकले रहते हैं। बोंडी़ के भीतर तीन कोठे होते हैं जिनमें काले काले दाने भरे हुए निकलते हैं। ये दाने कडे़ होते हैं और लोग इन्हें छेदकर माला बनाकर पहनते हैं। यह फूलों के कारण शोभा के लिये बगीचे में लगाया जाता है। संस्कृत में इसे वैजयंती कहते हैं। २. विष्णु की माला।

बैजत्री पु
संज्ञा स्त्री० [सं० वैजयन्ती] दे० 'बैजती'। उ०—मार पच्छ चंदा एह माथे ग्रिव बैजत्री माला।—संत० दरिया, पृ० १०३।

बैज
संज्ञा पुं० [अं०] १. चिह्न। २. चपरास।

बैजई
वि० [अं० बैजा (= अंडा)] हलके नीले रंग का।

बैजई (१)
संज्ञा पुं एक रंग जो बहुत हलका नीला होता है। इस रंग की रँगाई लखनऊ में होती है। विशेष—कौवे के अंडे के रंग से मिलता जुलता होने के कारण इस रंग को लोग बैजइँ कहते हैं।

बैजनाथ
संज्ञा पुं [सं० वैद्यनाथ] दे० 'वैद्यनाथ'।

बैजनी
वि० [हिं० बैंगनी] हलके नीले रंग धा। बैंजनी। उ०— (क) सुभ काछनी बैजनी पैजनी पायन आमन मै न लगैझटको।—रसखान०, पृ० १८। (ख)/?/सकते तन सजि बैजनी पग पैजनी उतारि/?/मिलु न बैजनी/?/मल सों सजनी रजनी चारि।—भारतेंदु/?/अ०, भा० २, पृ० ७८/?/१।

बैजयती
संज्ञा स्त्री० [सं० वैजयन्ते/?/] बैजंती। वैजयते।

बैजला
संज्ञा पुं [देश०] १./?/का एक भेद। २. कबड्डी का खेल।

बैजवी
वि० [अ० बैजबी] दे 'वैजाबी'

बैजा
संज्ञा पुं [अ० बैजह्] १. अंडा। २. एक प्रकार का फोडा़ जिसके भीतर पानी होता है। फफोले की ठ/?/का फोडा़। गलका। ३. अंडकोश (को०)। ४. सिपाहियो के सिर पर की लोहे की टोपी (को०)। ५. सिरदर्द (को०)।

बैजावी
वि० [फा़० बैजाव] अंडाकृति। अडाकार। उ०—बूझा पत्थर के खड़ में से चि/?/ड ठेककर बनाया हुआ बैजाबी (अंडाकृति) पहले का/?/ठित ओजार न मेद की उपत्यका में तृतीयकोत्तर (पोस्ट/?/री) युग की कवरोली धरती में पाया गया था।—हिंदु/?/सभ्यता, पृ ११।

बैजिक (१)
वि० [सं०] [वि०/?/बैजिकी] १./?/संबंधी। २. मूलभूत। मूलगत। ३. परंपराप्राप्त।/?/। ४. विषय संबंधी। संभोग सो संबद्ब [को०]।

बैजिक (२)
संज्ञा पुं १. अंकुर।/?/हेतु। कारण। ३. आत्मा। ४. शिशु का तैल [को०]।

बैट
संज्ञा पुं [अ०] क्रिकेट के खेल में गेंद मारने का डंडा जो आगे की ओर चोडा़ ओर चिपटा होता है। बल्ला।

बैटरी
संज्ञा स्त्री० [अं०] १. ची/?/या शीशे आदि का गत्र जिसमें रासायनिक पदार्थों के/?/से रासायनिक प्रक्रिया द्वारा बिजली पैदा करके काम/?/ई जाती है। २./?/खाना।

बैटा
संज्ञा स्त्री० [देश०] रूई/?/की चर्खी। ओटने।

बैठ
संज्ञा पुं [हिं० बैठना (= पीला पडना)] सरक/?/मालगुजारी या लगान या उसकी दर। राजकीय कर या उसकी दर।

बैठक
संज्ञा स्त्री० [हिं० बैठना] बैठने का स्थान। उ०—चरष सरोवर समीप किधों बि/?/क्वणित कलहसेन की बैठक बनाय की।—केशव (शब्द)। २. वह स्थान जह कोई बैठता हो अथवा जहाँपर दुसरा/?/आकर उसके साथ बैठा करते हों। चोपाल। अथाइ। उ०—वह अपनी बैठक न पलंग पर लेटा है, उसकी आँख क/?/से लगी हैं, भोहे कुछ कुछ ऊपर को खिच गई है ओर वह चुपचाप देवहूति की छबि मन ही मन खींच रहा है।—अधखिला। (शब्द०)। यौ०—बैठकखाना = बैठने का स्थान। ३. वह पदार्थ जिसपर बैठा जाता है। आसन।/?/ठ। उ०— (क) अति आदर सो बैठक दोन्हों। मेरे गृह/?/वलि आई अति ही आनँद कीन्हो।—सूर (शब्द०)। (क) पिय आवत अँगनैया उठि कै लीन।/?/चतुर तिरियवा पदक/?/।— रहिमन (शब्द०)। ४. किसी मूर्ति या खभे आदि के नीचे की चोकी। आधार। पदस्तल। ५. बैठने का व्यागर। बैठाई। जमाव। जमावड़ा। जैसे,—उसके यहाँ शहर के लुच्चों की बैठक होती है। यो०—बैठकबाज। ६. आधिवेशन। सभासदों का एकत्र होना। जैसे, सभा की बैठक। ७. बैठने का ढंग या टेव। जैसे, जानवरों की बैठक। ८. साथ उठाना बैठाना। संग। मेल। उ०—माथुर लोगन के सँग की यह बैठक तोहि अजौं न उबीठी।—केशब (शब्द०)। १०. काँच या धातु आदि का दीवट जिसके सिरे पर बत्ती जलती या मोमबत्ती खोंसी जाती है। बैठकी। उ०—बैठक ओर हँडियों में मोमबत्तियाँ जल रही हैं।—अधखिला० (शब्द०)। ११. एक प्रकार की कसरत जिसमें बार बार खडा होना और बैठना पडता है।

बैठकबाज
वि० [हिं० बैठक + फा़० बाज] जमावड़े में बैठनेवाला। धूर्त। चालाक। शरारती। उ०—साधारण बुद्वि का मनुष्य ऐसी परिस्थिति में पड़कर घबडा़ उठता है, पर बैठकबाजों के माथे पर बल नहीं पड़ता।—गबन, पृ० १५०।

बैठका
संज्ञा पुं० [हिं० बैठक] वह चोपाल या दालान आदि जहाँ कोई बैठत हँ ओर जहाँ जाकर लोग उससे मिलते या उसके पास बैठकर बातचीत करते हों। बैठक। २. आसन। आधार। बैठकी। उ०—कनक सिंहासन बैठका, ओढ़न अंबर चीर।—धरनी० बानी, पृ० ५४।

बैठकी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० बैठक + ई(प्रत्य०)] १. बार बार बैठने और उठने की कसरत। बैठक २. आसन। आधार। उ०—कनक भूमि पर कर पग छाया, यह उपमा एक राजत। कर कर प्रति पद प्रति मणि बसुधा कमल बैठको साजत।—सूर (शब्द०)। ३. दे० 'बैठक—२, ४, ८'।

बैठकी † (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० बैठना] वह कर जो जमींदार की ओर से बाजार में बैठनेवाले वनियों और दूकानदारों आदि पर लगाया जाता है, बरतराई।

बैठन
संज्ञा स्त्री० [हिं० बैठना] १. बैठने की क्तिया। २. बैठने का ढंग या दशा। उ०—धनि यह मिलन धन्य यह बैठक धनि अनुराग नहीं रुचि थोरी। धनि यह अरस परस छबि लूटन महा चतुर मुख भोरे भोरी।—सूर (शब्द०)। ४. बैठक। आसन।

बैठना
क्रि० अ० [सं० वेशन, विष्ठ; प्रा० बिठ्ठ + हिं० ना या सं० वितिष्ठति, प्रा० बइट्ठइ] १. पुट्ठे के बल किसी स्थान पर इस प्रकार जमना कि धड ऊपर को सीधा रहे और पैर घुटने पर से मुडकर दीहरे हो जायँ। किसी जगह पर इस प्रकार टिकना कि कम से कम शरीर का आधा निचला भाग उस जगह से लगा रहे। स्थित होना। आसीन होना। आसन जमाना। उ०—(क) बैठो कोइ राज ओ पाटा। अंत सवै बैसे पुनि घाटा।—जायसी (शब्द०)। (ख) बैठे बरासन राज जानकि मुदित मन दसरथ भए।—तुलसी (शब्द०)। (ग) बैठे सोह काम रिपु कैसे। धरे शरीर शांत रस लैसे।—तुलसी (शब्द०)। (ध) शोभित बैठे तेहि सभा, सात द्वीप भूँप। तहँ राजा दशरथ लसै देव देव अनुरूप।—केशव (शब्द०)। संयो० क्रि०—जाना। मुहा०—कहीं या किसी के साथ बैठना उठना = (१) संग समय बिताना। कालक्षेप करना। उ०—जाइ आइ जहाँ तहा बैठि उठि जैसे तैसे दिन तो बितायो बधू बीतति हैं कै/?/राति।—पद्माकर (शब्द०)। (२) रहना। संग में रहना संगत में रहकर बातचीत करना या सुनना। बैठे ठाले = बि/?/काम काज के खाली बैठे रहनेवाले। उ०—फिर कि/?/भाव का स्वरूप दिखाकर बैठनेवाले लोगों को एक प्रकार के आनंद का अनुभव करा देता हे।—रस० पृ० ९८। बे/?/बिठाए = (१) अकारण। निरर्थक। जैसे,—बैठे बिठाए य/?/झगड़ा मोल लिया। उ०—एक रोज बैठे बिठाए कि/?/ने शगूफा छोडा कि हुजूर चल के पहाड की सैर कीजिए— सैर०, पृ० १५। (२) अचानक। एकाएक। जैसे—/?/बिठाए यह आफत कहाँ ये आ पडी़। बैठे बैठे = (१) नि/?/योजन। (२) अचानक। (३) अकारण। बैठे रहो = (१) अलग रहो। हाथ मत लगाओ। दखल मत दो। तुम्हा जरूरत नही। (२) चुप रहो। कुछ नत बोलो। बैठ दंड/?/एक कसरत जिसमें दंड करके बैठ जाते हें और बैठते समय हाथों को कुहनी पर रखकर उकडूँ बैठते हें। इनके अंनंदर फिर दंड करने लगते हैं। उठ बैठना = (१) लेटा न रहना (२) जाग पड़ना। जैसे,—खटका सुनते ही बह उठ बैठ बैठते उठते = सदा। सब अवस्था में, हरदम। जैसे,—बैठते उठते राम नाम जपना। बैठ रहना = (१) देर लगाना वहीं का हो रहना। जैसे,—बाजार जाकर बैठे रहे। (२) साहस त्यागना या निराश होता हातकर उधोग छोड दोना। २. किसी स्थान या अवकाश में ठीक रूप से जमना। ठीक सि/?/होना। जैसे, चूल का बैठना, अँगूठी के प्याले में नग/?/बैठेना, सिर पर टोपी का बैठना, छेद में पेध/?/कील बैठना। मुहा०—नस बैठना = सरकी हुई नस का ठीक जगह पर जाना। मोच दूर होना। हाथ या पेर बैठना = टुटा उखडा हुआ हाथ पैर ठीक होना। ३. कैडे पर आना। ठीक होना। अभ्यात होना। जासे,—कि/?/काम में हाथ बैठना। ४. पानी या अन्य द्रव पदाथों में मिली हुई चीजों का नीचे तह में जम जाना। जल आदि के सि/?/होने पर उसमें घुली वस्तु का नीचे आधार में जा लगना। पानी या भूमि मे किसी भारी चीज का दाब आदी पाय/?/नीचे जाना या घँसना। दबना या डूबना। जैसे, ना/?/बैठना, मकान का बैठना, इत्यादि। ६. सूजा या उभर हुआ न रहना। दबकर बराबर या गहरा हो जाना। पच/?/जाना। धँसना। जैसे, आँख बैठना, फोडा़ बैठना। (कारबार) चलता न रहना। बिगडना। जैसे, को बैठना, कारबार बैठना, इत्यादि। ८. तौल में ठहरना या परत पड़ना। जैसे,—(क) दस मन गेहूँ का नो मन बैठा। (ख) रुपए का सेर भर घी बैठता है। संयो० क्रि०—जाना। ९. लागत लगना। खर्च होना। जैसे,—घोडे़ की खरीद में सो रुपए बैठे। १०. गुड का वह जाना या पिघल जाना। ११. चावल पकाने में गीला हो जाना। १२. क्षिप्त वस्तु का निर्दिष्ट स्थान पर पहुँचना। फेंकी या चलाई हुई चीज का ठीक जगह पर जा रहना। लक्ष्य पर पड़ना। निशाने पर लगना। जैसे,—गोली बैठना, डंडा बैठना १३. घोडे़ आदि पर सवार होना। जैसे, घोडे पर बैठना, हाथी पर बैठना। १४. पौधे का जमीन में गाडा़ जाना। लगना। जैसे, जडहन बैठना। १५. किसी पद पर स्थित होना या नियत होना। जमना। जैसे, जब तुम उस पद पर एक बार बैठ जाओगे, तब फिर जल्दी नहीं हटाए जा सकोगे। १६. एक स्थान पर स्थिर होकर रहना। जगना। १७. (किसी वस्तु में) समाना। अँटना। आना। १८. किसी स्त्री का किसी पुरुष के यहाँ पत्नी के समान रहना। घर में रहना। जैसे,—वहु स्त्री एक सोनार के घर बैठ गई। १९. पक्षियों का अंडे सेना। जैसे, मुर्गी का बैठना। २०. जोडा़ खाना। भोग करना। (बाजारू)। २१. बेकाम रहना। काम छोड़कर खाली रहना। निरुद्योग रहना। निठल्ला रहना। बेरोजगार रहना। जैसे,—वह आज ६ महीने से बैठा है; कैसे खर्च चले ? २२. अस्त होना। जैसे, सूर्य का बैठना, दिन बैठना।

बैठनि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० बैठना] दे० 'बैठना'।

बैठनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० बैठन] करघे में वह स्थान जहाँ जुलाहे कपडा़ बुनते समय बैठते हैं।

बैठवाँ †
वि० [हिं० वैठना] वैठा या दबा हुआ। जो उठा हुआ न हो। चिपटा। जैसे, बैठवाँ जूता।

बैठवाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० वैठना] वैठाने की मजदूरी।

बैठवाना
संज्ञा स० [हिं० वैठना का प्रे० रूप] १. बैठने का काम दूसरे से कराना। २. पेड पोधे लगवाना। रोपना।

बैठा
संज्ञा पुं० [हिं० बैठना] चमचा या बड़ी करछी। (लश०)।

बैठाना
क्रि० स० [हिं० बैठना] १. स्थित करना। आसीन करना। उपविष्ट करना। खड़ा न रखकर कुछ विश्राम की स्थिति में करना। संयो० क्रि०—देना।—लेना। २.बैठने के लिये कहना। आसन पर विराजने को कहना। जैसे, लोग तुम्हारे यहाँ आए है; उन्हें आदर से ले जाकर बैठाओ। ३. पद पर स्थापित करना। प्रतिष्ठित करना। नियत करना। जैसे,—किसी मूर्ख को वहाँ बैठा देने से काम न चलेगा। ४. नियत स्थान पर ठीक ठीक ठहराना। ठीक जमाना। — 2 — अडा़ना या टिकाना। जैसे, पेंच बैठाना, मूर्ति बैठाना, चूल्हे पर बटलोई बैठाना, अँगूठी में नग बैठना। मुहा०—नस बैठाना = हटी हुई नस मलकर ठीक जगह पर लाना। मोच दूर करना। हाथ या पैर बैठाना = आघात या चोट के कारण जोड़ पर से उखडा़ हुआ हाथ या पेर ठीक करना। बैठा भात = वह भात जो चावल ओर पानी एक साथ आग पर रखने से पके। ५. किसी काम को बार बार करके हाथ को अभ्यस्त करना। माँजना। जैसे, लिखकर हाथ बैठाना। ६. पानी आदि में घुलि वस्तु को तल में ले जाकर जमाना। जैसे,—यह दवा सब मैल नीचे बैठा देगी। ७. धँसाना या डुबाना। नीचे की ओर ले जाना। जैसे,—इतना भारी बोझ दीवार बैठा देगा। ८. सूजा या उभरा हुआ न रहने देना। दबाकर बराबर या गहरा करना। पचकाना या घँसाना। जैसे,—यह दवा गिल्टी को बैठा देगी। ९. (कारबार) चलता न रहने देना। बिगाड़ना। १०. फेंक या चलाकर कोई चीज ठीक जगह पर पहुँचाना। क्षिप्त वस्तु को निर्दिष्ट स्थान पर डालना। लक्ष्य पर जमाना। जैसे, निशाना बैठाना, डंडा बैठाना। ११. घोडे आदि पर सवार कराना। १२. पौधे को पालने के लिये जमीन में गाड़ना। लगाना। जमाना। जैसे, जड़हन बैठाना। १३. किसी स्त्री को पत्नी के रूप में रख लेना। घर में डालना। १४. काम धंधे के योग्य न रखना। बेकाम कर देना। जैसे,—रोग ने उसे बैठा दिया।

बैठारना †
क्रि० स० [हिं० बैठाना] दे० 'बैठाना'। उ०—(क) सादर चरन सरोज पखारे। अति पुनीत आसन बैठारे।— तुलसी (शब्द०)। (ख) रत्न खचित सिंहासन धारयो। तेहि पर कृष्णहिं लै बैठारयो।—सूर (शब्द०)।

बैठालना
क्रि० स० [हिं०] दे० 'बैठाना'। उ०—बैठाला ज्योतिर्मुख कर खोली छवि तमस्तोम हर कर।—अर्चना, पृ० ३८।

बैडाल
वि० [सं० बिडाल >बैडाल] [वि० स्त्री० बैडाली] बिल्ली सँबंधी।

बैडालव्रत
संज्ञा पु० [सं०] [वि० बैडालव्रतक, बैडालव्रती] बिल्ली के समान अपने घात में रहना ओर ऊपर से बहुत सीधा सादा बना रहना।

बैडालव्रतिक
वि० [सं०] दे० 'बैडालव्रती' [को०]।

बैडालव्रती
वि० [सं० बैडालघ्रतिन्] बिल्ली के समान ऊपर से सीधा सादा, पर समय पर घात करनेवाला। कपटी।

वैढ़ना †
क्रि० स० [हिं० बाड़ा वेढ़ा] बंद करना। बेढ़ना। (पशुओं को)।

बैण
संज्ञा पुं० [सं०] बाँस को काटकर उसी से जीविका करनेवाला। बाँस का काम करनेवाला।

बैत (१)
संज्ञा स्त्री० [अ०] पद्य। श्लोक। शेर। उ०—दरब न जानै पीर कहावै। बैता पढ़ि पढ़ि जग समुझावै।—कबीर छी० (शिशु०), पृ० १८५। यौ०—बैतबाजी = (१) पद्य, श्लोक, शेर आदि के पाठ की प्रतियोगिता। (२) अंत्याक्षंरी प्रतियोगिता।

बैत (२)
संज्ञा पुं० [अ०] १. गृह। निवास। २. प्रासाद। मंदिर [को०]।

बेंतड़ा
वि० [हिं० बैतला़] १. जो व्यर्थ इधर उधर घूमता रहता हो। आवारा। २. लुच्चा। शोहदा।

बैतरना
संज्ञा स्त्री० [सं० वैतरणी] १. दे० 'वैतरणी'। २. एक प्रकार का धान जो अगहन में तैयार होता है। इसका चावल कई वर्ष तक रहता है।

बैतलमाल
संज्ञा पुं० [अ० बैत उल माला] वह व्यंक्ति जिसका कोई वारिस न हो। लावारिस। उ०—एक लखनऊ का मित्र यों बावला या बेहाल घूमता बैतलमाल बन राहा है।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० ११२।

बैतला (१)
वि० [अ० वैतउल्ला] १. (माल) जिसका कोई मालिक न हो। लावारिस।

बैतला (२)
संज्ञा पुं० चोरी का माल। (जुआरी)।

वैताल
संज्ञा पुं० [सं० वेताल]दे० 'वेताल'।

बैतालिक
वि०, संज्ञा पुं० [सं० वैतालिक]दे० 'वैतालिक'।

बैदंगर †
वि० [हिं० बैद + फा़० गर (प्रत्य०)] वैद्य विद्या का जानकार। चिकित्सक। उ०—नाडी़ निरख भया बैदंगर अनत औषधी कीन्हा। सारी धात रसायण करि करि आतम एक न चीन्हा।—राम० धर्म०, पृ० १४३।

वैदंगा †
संज्ञा पुं० [सं० वैद्याङ्ग] वैद्यक। बैदकी। चिकित्सा। उ०—केचित करहि बिविध बैदंगा। बूटी जारी टटोरहि अंगा।—सुंदर० ग्रं०, भा० १, पृ० ९०।

बैद
संज्ञा पुं० [सं० वैद्य] [स्त्री० बैदिन] चिकित्साशास्त्र का जाननेवाला पुरुष। वैद्य। उ०—(क) कुपथ माँग रुज ब्याकुल रोगी। बैद न देह सुनहु मुनि जोगी।—तुलसी (शब्द०)। (ख) बहु धन लै अहसान कै पारौ देत सराहि। बैद बधू हँसि भेद से रही नाह मुख चाहि।—बिहारी (शब्द०)।

वैदई
संज्ञा स्त्री० [हिं० बैद] वैद्य की विद्या या व्यवसाय। वैद्य का काम। उ०—बाँचि न आवै लखि कछू देखत छाँह न धाम। अर्थ सुनारी वैदई करि जानत पति राम।—केशव (शब्द०)।

बैदाई ‡
संज्ञा स्त्री० [हिं० बैद + आई] दे० 'बैदई'।

बैदूर्य
संज्ञा पुं० [सं० वैदूर्य] दे० 'वैदूर्य'।

बैदेही (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० वैदेही] १. दे० 'वैदेही'। २. पीपर। पिप्पली।—अनेकार्थ०, पृ० ५८।

बैन पु
संज्ञा पुं० [सं० वचन, प्रा० बयन] १. वचन। बात। उ०—(क) माया डोलै मोहती बोलै कड़आ बैन। कोई घायल ना मिलै, साई हिरदा सैन।—कबीर० (शब्द०)। (ख) बिप्र आइ माला दए कहे कुशल के बैन। कुँवरि पत्यारो तब कियो जब देख्यो निज नैन।—सूर (शब्द०)।मुहा०—वैन झरना = बात निकलना। बोल निकलना। उ०— उ०—जसुमति मन अभिलाष करै। कब मेरी लाल घुटुरुवन रेंगै, कब धरनी पग द्बैक घरे। कब द्वै दंत दूध के देखों कब तुनरे मुख बैन झरै।—सूर (शब्द०)। २. घर में मृत्यु होने पर कहने के लिये बँधे हुए शोकसूचक वाक्य जिसे स्त्रियाँ कहकर रोती हैं। (पंजाब)।

बैन पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० वैन्य] वेन का पुत्र। पृथु।

बैन (३)
संज्ञा स्ञी० [सं० वेणु] दे० 'वेणु', 'बीन'। उ०—(क) बिन ही ठाहर आसण पूरै, विन कर बैन बजावै।—दादू० बानी०, पृ० ५६६। (ख) मोहन मन हर लिया सु बैन बजाय के।—घनानंद०, पृ० १७९।

बैनतेय
संज्ञा पुं० [सं० वैनतेय] दे० 'वैनतेय'।

बैना (१)
संज्ञा पुं० [सं० बायन] वह मिठाई आदि जो विवाहादि उत्सवों के उपलक्ष में इष्टमित्रों के यहाँ भेजी जाती है।

बैना पु (२)
क्रि० स० [सं० वपन, प्रा० वयण] बोना।

बैना (३)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'वेंदा'।

बैनी पु
संज्ञा स्ञी० [सं० वेणी] दे० 'बेनी'। उ०—फूलन की बैनी गुही, फूलन की आँगिया, फूलन की सारी मानों फूली फुलवारी।—नँव० ग्रं०, पृ० ८०।

बैपारी
संज्ञा पुं० [सं० व्यापार] व्यापार। व्यवसाय। काम धँधा। उ०—प्रगम काटि गम कीन्हो हो रमैया राम। सहज कियो बैपार हो रमैया राम।—कबीर (शब्द०)।

बैपारी
संज्ञा पुं० [सं० व्यापारी] व्यापार करनेवाला। रोजगारी। व्यापारी। उ०—उठै हिलोर न जाय सँयारी। भागहिं कोइ निबहै बैपारी।—जायसी (शब्द०)।

बैयन
संज्ञा पुं० [सं० बायन (= वुनना)] लकड़ी का एक औजार जिससे बाना बैठाया जाता है। यह खड्ग के आकार का होता है और गड़रिये इसे कंबल की पट्टियों के बुनने के काम में लाते हें।

बैयर पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० बवूवर, हि० बहुअर] औरत। स्त्री। उ०—सरजा समत्थ बीर तेरे बैर बीजापुर बैरि बैयरनि कर वीन्ह न चुरीन की।—भूषण (शब्द०)।

बैयाँ (१)
क्रि० वि० [हिं बकैयाँ] घुटनों के बल। बाहु की कुहनियों के बल। बकैयाँ। उ०—बैयाँ बैयाँ डोलत कन्हेयाँ की बलैयाँ जाउँ मैया मैया बोलत जुन्हैया को लखावै री।—दीन० ग्रं०, पृ० ७।

बैयाँ (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० बाहु] बाह : भुजा। कलाई। उ०—(क) बिनती करत गहे धन बैयाँ। बृंदावन तेरे बिनु सूनौ बसत तुम्हारी छैयाँ।—छीत०, पृ० ८४। (ख) जसुदा गहति धाइ बैयाँ, मोहन करत न्हेयाँ न्हेयाँ नंददास बलि जाइ रे।—नंद० ग्रं०, पृ० ३९९।

बैया पु †
संज्ञा पुं० [सं० वाय] बै। बैसर। (जुलाहै)। उ०— पढे पढाए कछु नहीं बाम्हन भक्ति न जान। व्याह सरोधे कारणे बैया सूँडा तान।—कबीर (शब्द०)।

बैया † (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० भगिनिका] छोटी ननद। पति की छोटी बहन। (बुंदेल०)।

बैरंग
वि० [अं० बेयरिंग] वह चिट्ठी या पारसल जिसका महसूल भेजनेवाले की ओर से न दिया गया हो, पानेवाले से वसुल किया जाय। मुहा०—बैरंग लौटना या वापस होना = निष्फल या बिना काम हुए तुरंत लौट आना।

बैर (१)
संज्ञा पुं० [सं० वैर] १. किसी के साथ ऐसा संबंध जिससे उसे हानि पहुँचाने की प्रवृत्ति हो और उससे हानि पहुँचने का डर हो। अनिष्ट संबंध। शत्रुता। विरोध। अदावत। दुश्मनी। जैसे,—उन दोनों कुलो में पीढ़ियों का बैर चला आता था। २. किसी के प्रति अहित कामना उत्पन्न करनेवाला भाव। प्रीति का बिल्कुल उलटा। वेमनस्य। दुर्भाव। द्रोह। द्वेष। उ०—वैर प्रीति नहिं दुरत दुराए।—तुलसी (शब्द०)। क्रि० प्र०—रखना। मुहा०—बैर काढ़ना या निकालना = दुर्भाव द्वारा प्रेरित कार्य कर पाना। बदला लेना। उ०—यहि बिधि सब नवीन पायो ब्रज काढ़त बैर दुरासी।—सूर (शब्द०)। बैर ठानना = शत्रुता का संबंध स्थिर करना। दुश्मनी मान लेना दुर्भाव रखना आरंभ करना। उ०—सिर करि धाय कंचुकी भारी अब तो मेरो नाँव भयो। कालि नहीं यहि मारग ऐसे ऐसे मोंसों बैर ठयो।—सूर (शब्द०)। बैर डालना = विरोध उत्पन्न करना। दुश्मनी पैदा करना। बैर पडना = बाधक होना। तंग करना। शत्रु होकर कष्ठ पहुँचाना। उ०— कुटुँब बैर मेरे बरनि बरे सिसुपाल।—सूर (शब्द०)। बैर बढा़ना = अधिक दुर्भाव उत्पन्न करना। दुश्मनी बढा़ना। ऐसा काम करना जिससे अप्रसन्न या कुपित मनुष्य और भी अप्रसन्न और कुपित होता जाय। उ०—आवत जात रहत याही पथ मोसों बैर बढै़ही।—सूर (शब्द०)। बैर बिसाहना था मोल लेना = जिसे बात से अपना कोई संबंध न हो उसमें योग देकर दूसरे को अपना विरोधी या सत्रु बनाना। बिना मतलब किसी से दुश्मनी पैदा करना। उ०—चाह्यो भयो न कछु कबहूँ जमराजहु सो बृथा बैर बिसाह्यो।—पद्माकर (शब्द०)। बैर मानना = दुर्भाव रखना। बुरा मानना। दुश्मनी रखना। बैर लेना = बदला लेना। कसर निकालना। उ०—(क) लेत केहरि को बयर जनु भेक हति गोमाय।—तुलसी (शब्द०)। (ख) लेहों वैर पिता तेरे को, जैहै कहाँ पराई ?—सूर (शब्द०)।

बैर (२)
संज्ञा पुं० [देश०] हल में लगा हुआ चिलम के आकार का चोंगा जिसमें भरा हुआ बीज हल चलने में बराबर कूँड़ में पड़ता जाता है।

बैर † (३)
संज्ञा पुं० [सं० बदर, प्रा० बयर] बैर का फल और पेड़।

बैरख
संज्ञा पुं० [तु० बैरक] सेना का झंडा। ध्वजा। पताका। निशान। उ०—घन धावन बग पाँति पटो सिर बैरख तडित सोहाई।—तुलसी (शब्द०) (ख) बैरख ढाल गगन गा छाई। चाल कटक धरती न समाई।—जायसी (शब्द०)। (ग) चलती चपलान है फेरतै फिरंगै भट, इंद्र को न चाप रूप बैरख समाज को।—भूषण (शब्द०)।

बैरखी †
संज्ञा स्त्री [सं० बाहु + राखी] एक गहना। बहूँटा। बैराखी।

बैरन पु (१)
वि० स्त्री० [हिं० बैरिन] दे० 'बेरी'। उ०—देखन दै मेरी बैरन पलकैं।—नंद० ग्रं०, पृ० ३५१।

बैरन (२)
संज्ञा पुं० [अं०] [स्त्री० बैरोनेस] इंगलैंड के सामंतों तथा बडे़ बडे़ भूम्यघिकारियों को वंशपरपरा के लिये दी जानेवाली उपाधि जिसका दर्जा 'वाइकौंट' के नीचे है। वि० दे० 'डयूक'।

बैरा (१)
संज्ञा पुं० [देश०] चिलम के आकार का चोंगा जो हल में लगा रहता है और जिसमें बोते समय बीज डाला जाता है।

बैरा (२)
संज्ञा पुं० [अं० बेयरर] सेवक। चाकर। खिदमतगार।

बैरा (३)
संज्ञा पुं० [देश०] ईंट के टुकडे, रोडे़ आदि जो मेहराब बनाते समय उसमें चुनी हुई ईंटों को जमी रखने के लिये खाली श्थान में भर देते हैं।

बैराखी
संज्ञा स्त्री० [हिं० बाहु + राखी] एक गहना जिसे स्त्रियाँ भुजा पर पहनती हैं। इसमें लंबोतरे गोल बडे़ बड़े दाने होते हैं जो धागे में गूँथकर पहने जाते हैं। बहूँटा।

बैराग पु †
संज्ञा पुं० [सं० वैराग्य] दे० 'वैराग्य'। उ०—बैराग जोग कठिन ऊधो हम न गहैगो।—गीत।

बैरागर †
संज्ञा स्त्री० [देश०] हीरे की खान। उ०—(क) वैरागर हीरा हुए कुलवंतिया सपूत। सीपै मोती नापजै, सब ब्रम्मारा सून।—बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० २६। (क) सतगुरु साधु शब्द तहँ बैरागर की खानि। रज्जब। खोदि विवेक सूँ, तहाँ नहीं कछु हानि।—रज्जब०, पृ० १०।

बैरागी
संज्ञा पुं० [सं० विरागी] [स्त्री० बैरागिन] वैष्णव मत के साधुओं का एक भेद।

बैराग्य
संज्ञा पुं० [सं० वैराग्य] दे० 'वैराग्य'।

बैराना †
क्रि० अ० [हिं० बाइ, वायु] वायु के प्रकेप से बिग- डना। उ०—जे अँखियाँ बैरा रहीं लगै बिरह की बाइ। पीतम पगरज को तिन्है अंजन देहु लगाइ।—रसनिधि (शब्द०)।

बैरिस्टर
संज्ञा पुं० [अं०] दे० 'बारिस्टर'।

बैरी
वि० [सं० बैरी] [स्त्री० बैरिन] १. बैर रखनेवाला। शत्रु। दुश्मन। द्वेषी। उ०—शिव बैरी मम दास कहावै। सो नर सपनेहु मोहिं न पावै।—तुलसी (शब्द०)। (ख) लघु मिलनो बिछुरन घनो ता बिच बैरिन लाज। द्दग अनुरागी भाव ते कहु कह करै इलाज।—रसनिधि (शब्द०)। २. विरोधी।

बैरोमोटर
संज्ञा पुं० [अं०] वायुमडल का दबाव नापने का यंत्र जो थर्मामीटर की तरह का, पर उससे बड़ा होता है। वायुदाबमापी।

बैल (१)
वि० [सं० बिल] १. बिल में रहनेवाला। जैसे, चूहा। २. बिल से संबंध रखनेवाला कोई भी जानवर [को०]।

बैल (२)
संज्ञा पुं० [सं० बलद बलीवर्द] [स्त्री० गाय] १. चौपाया जिसकी मादा को गाय कहते हैं। विशेष—यह चौपाया बड़ा मेहनती और बोझा उठानेवाला होता है। यह हल में जोता जाता है और गाड़ियों को खींचता है। दे० 'गाय'। यौ०—बैलगाड़ी। पर्या०—उत्ता। भद्र। बलोवदं। बृषभ। अनड्वान। गो। २. मूख मनुष्य। जड़ बुद्धि का मनुष्य। जैसे,—वह पूरा बैल है। उ०—बातचीत में भी देखा जाता है कि कभी हम किसी को मूर्ख न कहकर बैल कह देते हैं।—रस०, पृ० ३४।

बैलर
संज्ञा पुं० [अं० वायलर] पीपे के आकार का लोहे का बड़ा देग जो भाप से चलनेवाली कलों में होता है। इसमें पानी भरकर खौलाते और भाप उठाते हैं जिसके जोर से कल के पुरजे चलते हैं।

बैलून
संज्ञा पुं० [अं०] १. गुब्बारा। २. बड़ा गुब्बारा जिसके सहारे लोग पहले ऊपर हवा में उड़ा करते थे।

बैल्ब (१)
वि० [सं०] १. बेल के वृक्ष से संबंधित या उसके किसी अंश से बना हुआ या निर्मित। २. बेल के वृक्षों से भरा हुआ या आवृत।

बैल्व (२)
संज्ञा पुं० बेल का फल [को०]।

बैषानस
संज्ञा पुं० [सं० बैखानस] दे० 'वैखानस'।

बैष्क
संज्ञा पुं० [सं०] शिकार किए गए किसी जानवर का माँस [को०]।

बैसंदर पु
संज्ञा पुं० [सं० वैश्वानर, प्रा० बैसंदर] अग्नि। उ०— कबिरा सीतलता भई उपजा ब्रह्मगियान। जिहि बैसंदर जग जल्पा सो मेरे उदिक समान—कबीर ग्रं०, पृ० ६३।

बैसंधि
संज्ञा स्त्री० [सं० वथःसंधि] दे० 'वयःसंधि'। उ०—रसिक छैल रिझवारहिं रिझवति रस मै रूप गुन भरी वैसंधि छूटी।—घनानंद, पृ० ५७४।

बैसँधि
संज्ञा स्त्री० [हिं० बै + संधि] दे० 'बैसंधि'। उ०—बाला बैसँधि मैं छबि पावै। मन भावै मुँह कहत न आवै।—नंव० ग्रं०, पृ० १२१।

बैस (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० वयस्] १. आयु। उम्र। उ०—(क) औ नयन गयल मोर कजल देत। अरु बैस गयल पर पुरुष लेत। —कबीर (शब्द०)। (ख) बूझति है रुक्मिनी पिय ! इनमें को वृषभानु किसोरी ? नेक हमैं दिखरावो अपने बालापन की जोरी। परम चतुर जिन कीने मोहन सुबस बैस ही थोरी। बेरे ते जिहि यहैं पढ़ायो बुधि बल कल बिधि चोरी।—सूर (शब्द०)। (ग) नित प्रति एकत हीं रहत बैस बरन मन एक। चहियत जुगल किशोर लखि लोचन जुगल अनेक।—बिहारी र०, दो० २३८। २. यौवन। जवानी। मुहा०—बैस चढ़ना = युवावस्था प्राप्त होना। जवानी आना। उ०—बैस चढ़े घर ही रहु बैठि अटानि चढ़े बदनाम चढै़गा।—रसिनिधि (शब्द०)।

बैस (२)
संज्ञा पुं० [?] (किसी मूल पुरुष के नाम पर)क्षत्रियों की एक प्रसिद्ध शाखा जो कन्नोज से लेकर अंतर्वेद तक बसी पाई जाती है। विशेष—यह शाखा पहले थानेश्वर के पास बसती थी पीछे विक्रम संवत् ६६३ के लगभग इस शाखा के प्रसिद्ध सम्राट् हर्षवर्धन ने पूरब के प्रदेशों को जीता और कन्नोज में अपनी राजधानी बनाई।

बैस † (३)
संज्ञा पुं० [सं० वैश्य, प्रा० बैस] दे० 'वैश्य'।

बैसना पु †
क्रि० स० [सं० वैशन] बैठना। उ०—(क) देखा कपिन जाइ सो बैसा। आहुति देत रुधिर अरु भैसा।— तुलसी (शब्द०)। (ख) ऐसी को ठाली बैसी है तो सो मूंड़ खवावै। झूठी बात तुसी सी बिन कन फटकत हाथ न आवै।—सूर (शब्द०)। (ग) मन मौज करि बैसब हो, भुलब बहोरि बहोरि।—गुलाल०, पृ० ७८।

बैसन्नर
संज्ञा पुं० [सं० वैश्वानर] दे० 'बैसंदर'। उ०—रिन रत्तौ कुंभक्रन्न परयो भूषौ बैसन्नर। घर बंदर धक धाह दत कटि षद्धे बन्नर।—पृ० रा०, २।२८९।

बैसर
संज्ञा स्त्री० [हिं० बय] जुलाहों का एक औजार जिससे करघे में कपड़ा बुनते समय बाने को बैठाते हैं। कंघी। बय। विशेष—यह बाँस की पतली तीलियों को बाँस के दो फट्टों पर आड़ी बाँधने से बनती है।

बैसवारा
संज्ञा पुं० [हिं० बैस + वारा (प्रत्य०)] [वि० बैस- वारी] अवध का पश्चिमी प्रांत। विशेष—यह प्रदेश बहुत दिनों तक थानेश्वर के बैस क्षत्रियों के अधिकार में रहा। बैस क्षत्रियों की बस्ती होने के कारण यह प्रदेश बैसवारा या बैसवाड़ा कहा जाने लगा। यहाँ की बोलचाल की भाषा को बैसवारी या बैसवाड़ी कहते हैं। यह अवधी की एक उपभाषा है। बैस वश के प्रसिद्ध सम्राट् हर्षवर्धन ने अपनी राजधानी कन्नौज में रखी थी, यह इतिहासप्रसिद्ध है।

बैसाख
संज्ञा पुं० [सं० वैशाख, प्रा० वैसाख] दे० 'वैशाख'।

बैसाखनंदन
संज्ञा पुं० [सं० वैशाखनन्दन] १. शदहा। गधा। २. मूर्ख। बेवकूफ (लाक्ष०)।

बैसाखी
संज्ञा स्त्री० [सं० विशाख (= वैसाख) (= मथानी) जिसमें शाखाएँ निकली हों)] १. वह लाठी जिसके सिर को कंधे के नीचे बगल में रखकर लँगड़े लोग टेकते हुए चलते हैं। इसके सिरे पर जो अदर्धचंद्रकार आड़ी लकड़ी (अड्डे के आकार की) लगी होती है, वही बगल में रहती। लँगड़े के टेकने की लाठी। उ०—(क) तिलक दुआदस मस्तक दीन्हे। हाथ कनक बैसाखी लीन्हे।—जायसी (शब्द०)। (ख) गिरइ बुद्ध बैसाखिय कर सों। होइ सरप तेहि धरइ न डर सों।—इंद्रा०, पृ० ३३। (ग) बैसाखी धरि कंध शस्त्रचातुरी दिखावन। किमि जीतै रनखेत बड़ी विधि सों समझावन।—श्रीधर पाठक (शब्द०)। २. वैशाख मास की पूर्णिमा।

बैसाना पु †
क्रि० स० [हिं० बैसना] स्थित करना। बैठाना। उ०—(क) सिधि गुटका जो दिस्टि समाई। पारहि मेल रूप बैसाई।—जायसी (शब्द०)। (ख) नयन धइल दोउ दुअरा बैसाई।—धरनी०, पृ० २।

बैसारना पु
क्रि० स० [हिं० बैसना] बैठाना। स्थित करना। उ०—तेहि पर खूँट दीप दुइ वारे। दुइ बुध दुहूँ खूँट बैसारे।— जायसी (शब्द०)।

बैसारिन
संज्ञा स्त्री० [सं० वैसारिण] मत्स्य। झष। मीन।—अनेकार्थ०, पृ० ८०।

बैसिक पु †
संज्ञा पुं० [सं० वैशिक] वेश्या से प्रीति करनेवाला नायक। वारांगनाविलासी पुरुष।

बैहर पु ‡ (१)
वि० [सं० वैर (= भयानक)] भयानक। क्रोधालु। उ०—बावर बरार बाघ बैहर बिलार बिग बगरे बराह जानवरन के जोभ हैं।—भूषण (शब्द०)।

बैहर †पु (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० वायु] वायु। उ०—बैहर बगारन की अरि अंगारन की नाघती पगारन नगारन की धमकै।— भूषण (शब्द०)।

बोँक
संज्ञा पुं० [हिं० बंक, बाँक ? ] लोहे का वह तिकोना कीला जो किवाड़ के पल्ले में नीचे की चूल की जगह लगाया जाता है।

बोँगना
संज्ञा पुं० [हिं० बहुगुना] [स्त्री० बाँगनियाँ] पीतल का एक बर्तन जिसकी बाढ़ें ऊँची और सीधी ऊपर को उठी हुई होती हैं। बहुगुना।

बोँड़री †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'बोड़री'।

बोँड़ी †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'बौँड़ी'।

बोँदार
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'बाकली'।

बोँहड़ा
संज्ञा पुं० [सं० व्यवहार, हिं० ब्यौहर] वाणिज्य। व्यापार। लेनदेन। उ०—राम नाम करि बोंहड़ा बाही बीज अघाइ। अँति कालि सूका पड़ै, तौ निरफल कदे न जाइ।—कबीर ग्रं०, पृ० ५८।

बो (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० वधू, प्रा० बहू, बग० बऊ> बो] पत्नी। स्त्री।

बो † (२)
संज्ञा स्त्री० [फा़० बू, हिं० बोय, बोह] गंध। बास। महक। जैसे, बो दार।

बोअनी †
संज्ञा स्त्री० [सं० बपन, हिं० बोना] बीज बोने की क्रिया। बीआ बोने का कार्य।

बोआई
संज्ञा स्त्री० [हिं० बोना] १. बोने का काम। २. बोने की मजदूरी।

बोआना †
क्रि० स० [हिं० बोना] बीज बोने का काम दूसरे से कराना।

बोइ पु
संज्ञा स्त्री० [फा० बू] दे० 'बोय'।

बोक †
संज्ञा पुं० [हिं० बकरा] बकरा। उ०—कहूँ बैल भैंसा भिरै भीम भारे। कहूँ एण एणीन के हेत कारे। कहूं बोक बाँके कहूँ मेष सूरे। कहूँ मत्त दंती लरै लोह पूरे।—केशव (शब्द०)।

बोकरा †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'बकरा'।

बोकरा †
संज्ञा स्त्री० [हिं०]दे० 'बकरी'।

बोकला †
संज्ञा पुं० [हिं०]दे० 'बकला'।

बोक्काण
संज्ञा पुं० [सं०] १. पश्चिम दिशा का एक पर्वत। (बृहत्संहिता)। २. वह झोला जो घोड़े के मुख पर खाने के लिये लगाया जाता है। तोबड़ा।

बोखार
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'बुखार'। उ०—हाड़ चाम हमरे जो कहिए तोहरे कनक बोखारा।—संत० दरिया०, पृ० ९३।

बोगुमा
संज्ञा पुं० [सं० वायुगुल्म?] घोड़ों की एक बीमारी जिससे उनके पेठ में ऐसी पीड़ा होती है कि वे बेचैन हो जाते हैं।

बोचना †
क्रि० स० [?] लोकना। झेलना।

बोज
संज्ञा पुं० [देश०] घोड़ों का एक भेद। उ०—लीले लक्खी लक्ख बोज बादामी चोनी।—सूदन (शब्द०)।

बोजा
संज्ञा स्त्री० [फा़० बोजह्] चावल से बनाया हुआ मद्य। चावल की सराब। उ०—जे बोजा बिजया पियै तिन पै आवत हैफ। मन मोहन द्दग अमल में क्या थोरी है कैफ।— रसनिधि (शब्द०)।

बोझ
संज्ञा पुं० [?] १. ऐसा पिंड जिसे गुरुत्व के कारण उठाने में कठिनता हो। ऐसी राशि या गट्ठर या वस्तु जो उठाने या ले चलने में भारी जान पड़े। भार। जैसे,—तुमने मन भर का बोझ उसके सिर पर लाद दिया, वह कैसे चले। क्रि० प्र०—उटना।—उठाना।—उतरना।—उतारना।— लदना।—लादना।—होना। २. भारीपन। गुरुत्व। वजन। जैसे,—इसका कुछ बहुत बोझ नहीं। ३. कोई ऐसा कठिन काम जिसके पूरे होने की चिंता बराबर बनी रहे। मुश्किल काम। कठिन बात। जैसे,— (क) बड़ा भारी बोझ तो कन्या का विवाह है। (ख) एक लड़के को अपने यहाँ रखना बोझ हो रहा है। ४. कठिन लगनेवाली बात पूरी करने की चिंता,खटका या असमंजस। क्रि० प्र०—पड़ना। ५. किसी कार्य को करने में होनेवाला श्रम, कष्ट या व्यय। मिहनत, हैरानी, खर्च या तकलीफ जो किसी काम को करने में हो। कार्यभार। जैसे,—(क) तुम सब कामों का बोझ हमारे सिर पर डाल देते हो। (ख) गृहस्थी का सा्रा बोझ उसके सिर पर है। (ग) वे इस काम में बहुत रुपए दे चुके हैं, अब उनपर और बोझ न डालो। (घ) उनपर ऋण का बोझ न डालो। क्रि० प्र०—उठाना।—उतारना।—डालना।—पड़ना। ६. वह व्यक्ति या वस्तु जिसके संबंध में कोई ऐसी बात करनी हो जो कठिन जान पड़े। जैसे,—यह लड़का तुम्हें बोझ हो, तो, मैं इसे अपने यहाँ ले जाकर रखूँगा। ७. घास, लकड़ी आदि का उतना ढेर जितना एक आदमी लेकर चल सके। गट्ठर। जैसै,—बोझ भर से ज्यादा लकड़ी नहीं है। ८. उतना ढेर जितना बैल, घोड़े, गाड़ी आदि पर लद सके। जैसे,—अब गाड़ी का पूरा बोझ हो गया, अब मत लादो। मुहा०—बोझ उटना = किसी कठिन बात का हो सकना। किसी कठिन कार्य का भार लिया जा सकना। बोझ उठाना = किसी कठिन कार्य का भार ऊपर लेना। कोई ऐसी बात करने का नियम करना जिसमें बहुत मेहनत, खर्च हैरानी, या तकलीफ हो। जैसे, गृहस्थी का बोझ उठाना, खर्च का बोझ उठआना। बोझ उतरना = किसी काम से छुट्टी पाना। चिंता या खटके की बात दूर होना। जी हलका होना। जैसे,—आज उसका रुपया दे दिया, मानो बड़ा भारी बोझ उतर गया। बोझ उतारना = (१) किसी कठिन काम से छुटकारा देना। चिंता या खटके की बात दूर करना। (२) कोई ऐसा काम कर डालना जिससे चिंता या खटका मिट जाय। जैसे,—धीरे धीरे महाजन का रुपया देकर बोझ उतार दो (३) किसी काम को बिना मन लगाए यों ही किसी प्रकार समाप्त कर देना। बेगार टालना।

बोझना
क्रि० स० [हिं० बोझ] बोझ के सहित करना। लादना। किसी नाव या गाड़ी पर माल रखना। उ०—(क) नैया मेरौ तनक सी बोझी पाथर भार।—गिरधरराय (शब्द०)। (ख) अवसर पड़ै तो पर्वत बोझै तहूँ न होवै भारी। धन सतगुरु यह जुगत बताई तिनकी मैं बलिहारी।—मलक०, पृ० ३।

बोझल
वि० [हिं० बोझ] दे० 'बोझिल'।

बोझा
संज्ञा पुं० [हिं० बोझ] १. दे० 'बोझ'। २. संदूक की तरह की तंग कोठरी जिसमें रात के बोरे इसलिये ऊपर रखे जाते हैं जिसमें शीरा या जूसी निकल जाय।

बोझाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० बोझना + आई (प्रत्य०)] १. बोझने या लादने का काम। २. बोझने की मजदूरी।

बोझिल
वि० [हिं० बोझ + इल (प्रत्य०)] [वि० स्त्री० बोझीली] वजनी। भारी। वजनदार। गुरु।

बोट
संज्ञा स्त्री० [अं०] १. नाव। नौका। २. स्टीमर। अगिन- बोट। जहाज।

बोटा
संज्ञा पुं० [सं० वृन्त, वोण्ट (= डाल, लट्ठा)] १. लकड़ी का काटा हुआ मोटा टुकड़ा जो लंबाई में हाथ दो हाथ के लगभग हो, बडा़ न हो। कुंदा। २. काटा हुआ टुकड़ा। खड।

बोटी
संज्ञा स्त्री० [हिं० बोटा] मांस का छोटा टुकड़ा। मुहा०—बोटी बोटी काटना = तलवार, छुरी आदि से शरीर को काटकर खंड खंड करना। बोटी बोटी फड़कना = (१) बहुत अधिक नटखट होना। (२) उत्साह या उमग से भर उठना। स्फूर्ति से भर उठना।

बोड़ (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] सिर पर पहनने का एक आभूषण।

बोड़ (२)
संज्ञा स्त्री० दे० [हिं० बौर] 'बौर', 'वल्ली'।

बोड़री †
संज्ञा स्त्री० [हिं० बौड़ी] तोंदी। नाभि। तुंदकूपिका।

बोडल
संज्ञा स्त्री० [देश०] पक्षी जिसे जेबर भी कहते हैं। इसकी चोंच पर एक सींग सा होता है। यह एक प्रकारका पहाड़ी महोख है।

बोड़ा (१)
संज्ञा पुं० [देश०] अजगर। बड़ा साँप।

बोड़ा (२)
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की पतली लंबी फली जिसकी तरकारी होती है। लोबिया। बजरबट्टू।

बोड़ी (१)
संज्ञा स्त्री० [?] १. दमड़ी। दमड़ी कौड़ी। २. अत्यंत अल्प धन। उ०—जाँचै को नरेस देस को कलेस करै, देहै तो प्रसन्न ह्वै बड़ी बड़ाई बोड़ियै।—तुलसी (शब्द०)।

बोड़ो (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'बौंड़ो', 'बौड़ी'।

बोत
संज्ञा पुं० [देश०] घोड़ों की एक जाति। उ०—कोइ अरबी जंगली पहारी। चिंरचेंचक चंपा कंधारी। कोई काबुली कँबोज कोइ कच्छी। बोत नेमना मुंजी लच्छी।— विश्राम (शब्द०)।

बोतक
संज्ञा पुं० [देश०] पान की पहले वर्ष की खेती।

बोतल
संज्ञा स्त्री० [अं० बाँटल] १. काँच का वह लंबी गरदन का गहरा बरतन जिसमें द्रव पदार्थ रख जाता है। २. मद्य। मदिरा। शराब। (लाक्ष०)। उ०—जैसी जब मौज हुई, बोतल का सेवन करते थे।—शराबी, पृ० ९१। मुहा०—बोतल चढ़ाना = मध्य पीना। बोतल पर बातल चढ़ाना = बहुत मद्य पीना। यौ०—बोतलवासिनी, बोतलवाहिनी = मदिरा। शराब।

बोतलिया (१)
वि० [हिं० बोतल] बोतल के रंग सा। कालापन लिये हरा।

बोतलिया (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] छोटी बोतल।

बोतली
वि० संज्ञा स्त्री० [हिं० बोतल का अल्पा० स्त्री०] दे० 'बोतलिया'।

बोता
संज्ञा पुं० [सं० पोत] ऊँट का बच्चा जिसपर अभी सवारी त्त होती हो।

बोदका
संज्ञा स्त्री० [रूसी वोदका] रूस में बनी एक प्रकार की मदिरा।

बोदकी
संज्ञा स्त्री० [देश०] कुसुम या बर्रें की एक जाति जिसमें काँटे नहीं होते और जिसके केवल फूल रँगाई के काम में आते हैं। बीजों से तेल नहीं निकाला जाता।

बोदर † (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] लचीली छड़ी।

बोदर (२)
संज्ञा पुं० [देश०] ताल या जलाशय के किनारे सिंचाई का पानी चढ़ाने के लिये बना हुआ स्थान जिसमें कुछ नीचे दो आदमी इधर उधर खड़े होकर टोकरे आदि में उलीचकर पानी ऊपर गिराते रहते हैं।

बोदा (१)
वि० [सं० अबोध] [वि० स्त्री०बोदी] १. जिसकी बुद्धि तीव्र न हो। मूर्ख। गावदी। उ०—गुरु के पथ चलै सो जोधा। गुरु के पथ चलै का बोदा।—सहजो०, पृ० ५। २. जो तत्पर बुद्धि का न हो। ३. सुस्त। मट्ठर। ४. जो द्दढ़ या कड़ा न हो। फुसफुस। उ०—पहाड़ पानी के बरेले सहते सहते बोदे हो गए हैं।—सैर०, पृ० ३९।

बोदापन
संज्ञा पुं० [हिं० बोदा + पन (प्रत्य०)] १. बुद्धि की अतत्परता। अक्ल का तेज न होना। २. मूर्खता। नासमझी।

बोदार †
संज्ञा पुं० [फा़० बू (= गंध) दार] सुंगंध से युक्त, इत्र। उ०—आँणो हिलवी आदरस, वोह यमनी बोदार।—बाँकी ग्रं०, भा० ३, पृ० ५७।

बोदुला
संज्ञा पुं० [देश०] मँझोले आकार का एक वृक्ष जो अवध, बुंदेलखंड और बंगाल में पाया जाता है। विशेष—इसकी पत्तिया टहनियों के सिरों पर गुच्छओं के रूप में होती हैं और पशुओं के चारे के काम में आती हैं। इसकी लकड़ी बहुत मुलायम होती है।

बोद्धव्य
वि० [सं०] १. जानने योग्य। समझने योग्य। ज्ञेय। २. बोध्य। उ०—जब बोद्धव्य प्रसंगानुसार आक्षेप कर लेता है तभी उसे शब्दबोध होता है।—शैली०, पृ० ७३।

बोद्धा (१)
वि० [सं० बोद्घधृ] जाननेवाला। बूझनेवाला [को०]।

बोद्धा (२)
संज्ञा पुं० [सं०] न्यायशास्त्र का विद्वान्। नैयायिक [को०]।

बोध
संज्ञा पुं० [सं०] १. भ्रम या अज्ञान का अभाव। ज्ञान। जानकारी। जानने का भाव। २. तसल्ली। धीरज। संतोष। उ०— जोध नाम तब जब मन कौ निरोध होइ, बोध कौं बिचारि सोध आतमा को करिए।—सुंदर० ग्र०, भा० २, पृ० ६१०। क्रि० प्र०—देना।—होना। यौ०—बोधकर। बोधगम्य। बोधवासर।

बोधक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. ज्ञान करानेवाला। ज्ञापक। जतानेवाला। २. शृंगार रस के हावों में से एक हाव जिसमें किसी संकेत या क्रिया द्वारा एक दूसरे को अपना मनोगत भाव जताता है। उ०—निरखि रहे निधि बन तरफ नागर नदकुमार। तोरि हीर को हार तिय लगी बगारन बार।— पद्माकर (शब्द०)। ३. जासूस। गुप्तचर।

बोधक पु (२)
वि० [सं० बौद्ध] बोद्ध संबंधी। बौद्धों का। उ०—परमोध बोधक पुरान। रामाइन सुन भारथ निदान।— पृ० रा०, १।३५२।

बोधकर
संज्ञा पुं० [सं०] १. वैतालिक। बंदीजन। २. शिक्षक। उपदेशक। ३. बोध करानेवाला या जगानेवाला व्यक्ति [को०]।

बोधगम्य
वि० [सं०] समझ में आने योग्य।

बोधगया
संज्ञा पुं० [हिं० बोध + गया] बिहार प्रदेश के गया जिले का वह स्थान जहाँ बुद्ध को पीपल के नीचे सबोधि प्राप्त हुई थी। उ०—वह बोधगया भी एक से अधिक बार हो आया था।—किन्नर०, पृ० ४०।

बोधन
संज्ञा पुं० [सं०] [बोधनीय, बोध्य, बोधित] १. वेदन। ज्ञापन। जताना। सूचित करना। २. जगाना। ३. उद्दीपन। अग्नि या दीपक को प्रज्वलित करना। (दिया) जगाना। ४. गध दीप देना। दीपदान। ५. मंत्र जगाना। ६. बुध ग्रह (को०)।

बोधना पु †
क्रि० स० [सं० बोधन] १. बोध देना। समझाना बुझाना। कुछ कह सुनकर संतुष्ट या शांत करना। उ०— सूर श्याम को जसुदा बोधति गगन चिरैया उड़त दिखावति।— सूर (शब्द०)। २. ज्ञान देना। जताना।

बोधनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रबोधिनी एकादशी। २. पिप्पला। ३. समझ। ज्ञान। जानकारी (को०)।

बोधनीय
वि० [सं०] ज्ञातव्य। बोधयोग्य। २. जानने लायक। ज्ञात कराने योग्य।

बोधयिता
संज्ञा पुं० [सं० बोधयितृ] १. अध्यापक। शिक्षक। उपदेशक। २. जगानेवाला।

बोधवासर
संज्ञा पुं० [सं०] प्रबोधिनी एकादशी। देवोत्थान एकादशी [को०]।

बोधान (१)
वि० [सं०] बुद्धिमान। चतुर। विज्र [को०]।

बोधान (२)
संज्ञा पुं० १. देवगुरु। बृहस्पति। २. विज्ञ या चतुर ब्यक्ति [को०]।

बोधायन
संज्ञा पुं० [सं०] ब्रह्मसूत्रवृत्ति के रचयिता एक आचार्य का नाम। २. एक श्रौतसूत्र के रचयिता। आचार्य।

बोधि
पुं० [सं०] १. समाधिभेद। २. पीपल का पेड़। ३. कौआ। काक (को०)। ४. बुद्ध का एक नाम (को०)।

बोधित
वि० [सं०] जिसे बोध या ज्ञान कराया गया हो। बुझाया, जताया या समझाया हुआ [को०]।

बोधितरु
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'बोधिद्रुम'।

बोधितव्य
वि० [सं०] ज्ञापन करने योग्य [को०]।

बोधिद्रुम
संज्ञा पुं० [सं०] गया में स्थित पीपल का वह पेड़ जिसके नीचे बुद्ध भगवान् ने संबोधि (बुद्धत्व) प्राप्त की थी। विशेष—बोद्धों के धर्मग्रंथों के अनुसार इस वृक्ष का कल्पांत में भी नाश नहीं होता और इसी के नीचे बुद्धघगण सदा संबोधि प्राप्त करते हैं।

बोधिमंडल
संज्ञा पुं० [सं० बांधिमण्डल] वह स्थान जहाँ बुद्ध ने संबोधि प्राप्त की थी। बोधगया।

बोधिवृक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'बोधितरु'।

बोधिसत्व
संज्ञा पुं० [सं० बोधिसत्व] वह जो बुद्धत्व प्राप्त करने का अधिकारी हो पर बुद्ध न हो पाया हो। विशेष—बोधिसत्व की तीन अवस्थाएँ होती हैं, जिन्हें पार करने पर बुद्धत्व की प्राप्ति होती है।

बोधी
वि० [सं० बोधिन्] [वि० स्त्री०बोधिनी] १. बोधयुक्त। जाननेवाला। ज्ञाता। २. बनाने या जतानेवाला। समझानेवाला [को०]।

बोधोदय
संज्ञा पुं० [सं०] ज्ञान का जागरण। बोध या समझ होना।

बोध्य
वि० [सं०] १. बोध के योग्य जानने योग्य। २. जताने या सूचित करने या समझाने के योग्य [को०]।

बोनस
संज्ञा पुं० [अं०] १. वह धन या रकम जो किसी को उसके प्राप्य के अतिरिक्त दी जाय। २. वह धन जो किसी कर्मचारी को उसके पारिश्रमिक या वेतन के अतिरिक्त दिया जाय। पुरस्कार। पारितोषिक। बखशीस। ३. वह अतिरिक्त लाभ या मुनाफा जो संमिलित पूँजी से चलनेवाली कंपनी के शेयरहोल्डरों या हिस्सेदारों को दिया जाय।

धोना (१)
क्रि० स० [सं० वपन, प्रा० खथण, ववण] १. बीज को जमने के लिये जुते खेत या भुरभुरी की हुई जमीन में छितराना। किसी दाने या फल के बीज को इसलिये मिट्टी में डालना जिसमें उसमें से अंकुर फूटे और पौधा उत्पन्न हो। संयो० क्रि०—डालना।—देना।—लेना। २. बिखराना। छितराना। इधर उधर डालना। उ०—जान बूझकर धोखा खाना है यह कौन शऊर। आम कहाँ से खाओगे जब बोते गए बबर।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ५५२।

बोना (२)
संज्ञा पुं० [सं० बुह्न] एक प्रकार की वनस्पति। धूसर- च्छदा। सफेद बोना।

बोपार †
संज्ञा पुं० [सं० व्यापार] वाणिज्य। व्यापार। उ०— बोपार तो यहाँ का बहुत किया अब वहाँ का भी कुछ सौदा कर लो।—राम० धम०, पृ० ९४।

बोबला †
संज्ञा पुं० [देश०] १. बाजरे का भूसा। २. रेत। बालू।

बोबा †
संज्ञा पुं० [देश०] [स्त्री० बोबी] १. स्तन। थन। चूँची। उ०—शिशु उदास ह्वै जब तजि बोबा। तब दोऊ मिलि लागत रोबा।—निश्चल (शब्द०)। २. घर का साज समान। अंगड खंगड़। ३. गट्ठर। गठरी। उ०—लीन भयो तहँ धोबी सोबी। ग्वालन पीठ लियो द्रुत बोबी।—गर्ग- संहिता (शब्द०)।

बोब्बी
संज्ञा स्त्री० [देश०] पुन्नाग या सुलताना चंपा का जाति का एक सदाबहार पेड़ जो दक्षिण में पश्चिमी घाट की पहाड़ियों में होता है।

बोय ‡
संज्ञा स्त्री० [फा़० बू] १. गंध। बास। २. सुगंध। उ०— कल करील की कुंज सो उठत अतर की बोय। भयौ तोहिं भाभी कहा उठी अचानक रोय—पद्माकर (शब्द०)।

बोर (१)
संज्ञा पुं० [हिं० बोरना] डुबाने की क्रिया। डुबाव। जैसे,— एक बोर में रग अच्छा नहीं चढ़ेगा, कई बोर दो। क्रि० प्र०—देना। उ०—अपने मन संकोच करत है किन रँग बोर दई।—कबीर श०, भा० ३, पृ० ४७।

बोर (२)
संज्ञा पुं० [सं० वर्त्तुल] १. चाँदी या सोने का बना हुआ गोल और कँगूरेदार घुँघरू जो आभूषणों में एवं वस्त्रादि में गूँथा जाता है। जैसे, पाजेब के बोर। उ०—हिले रेशम के छोर, शिंजित हैं बोर बोर।—अर्चना, पृ० ८१। २. गुंबज के आकार का सिर पर पहनने का गहना जिसमें मीनाकारी का काम होता है और रत्नादि भी जड़े हुए होते हैं। इसी 'बीजु' भी कहते हैं।

बोर † (३)
संज्ञा पुं० गड्ढा। खड्ड। बिल।

बोर ‡ (४)
संज्ञा पुं० [सं० बदर] बेर का फल बदरी फल। उ०— उमगे प्रभु भीलणी आँचा, ऐठाँ बोर अरोगै आप।—रघु० रू०, पृ० १४२।

बोरका †
संज्ञा पुं० [हिं० बोरना] १. दावात। २. मिट्टी की दवात जिसमें लड़के खड़िया घोलकर रखते हैं।

बोरना †
क्रि० स० [सं०, हिं० ब्रुड बूड़ना] १. जल या किसी और द्रव पदार्थ में निमग्न कर देना। पानी या पानी सी चीज में इस प्रकार डालना कि चारों पानी ही पानी ही जाय। डुबाना। २. डुबाकर भिगोना। पानी आदि में डालकर तर करना। जैसे,—कई बार बोरने से रंग चढ़ेगा। उ०—मानो मजीठ की माठ ढुरी इक ओर ते चाँदनी बोरति आवति।—नृपसंभु (शब्द०)। ५. कलंकित करना। बदनाम कर देना। जैसे, कुल बोरना, नाम बोरना। उ०— (क) तासु दूत ह्वै हम कुल बोरा।—तुलसी (शब्द०)। (ख) गावहिं पचरा मूड़ कँपावहिँ बोरहिँ सकल कमाई हो।—गुलाल०, पृ० २२। ४. युक्त या आवेष्टित करना। योग देना या मिलाना। उ०—कपट बोरि बानी मृदुल बोलेउ जुगुति समेत।—तुलसी (शब्द०)। ५. धुले रंग में डुबाकर रँगना। उ०—लागी जबै ललिता पहिरावन कान्ह को कंचुकी केसर बोरी।—पद्माकर (शब्द०)।

बोरसी
संज्ञा स्त्री० [हिं० गोरसी] मिट्टी का बरतन जिसमें आग रखकर जलाते हैं। अँगीठी।

बोरा (१)
संज्ञा पुं० [सं० पुट (= दोना या पत्र)] टाट का बना थैला जिसमें अनाज रखते हैं, विशेषतः कहीं ले जाने के लिये। यौ०—बोराबंदी।

बोरा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० बोर] चाँदी या सोने का बना छोटा घुँघरू। दे० 'बोर'।

बोरिका †
संज्ञा पुं० [हिं० बोरना] वह मिट्टी का बरतन जिसमें लड़के लिखने के लिये खड़िया घोलकर रखते हैं। बोरका।

बोरिया (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० बोरा] छोटा थैला।

बोरिया (२)
संज्ञा पुं० [फा़०] चटाई। बिस्तर। यौ०—बेरिया बँधना। मुहा०—बोरिया उठाना या बोरिया बँधना उटाना = चलने की तैयारी करना। प्रस्थान करना। उ०—जलसा बररख्वास्त। नाच रंग बंद, चहल पहल मौकूफ। तबलियों ने बोरिया बँधना उठाया।—फिसाना०, भा० १, पृ० १०।

बोरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० बोरा] टाट की छोटी थैली। छोटा बोरा। उ०—सूर स्थाम विप्रन बंदी जन देत रतन कचन की बोरी।—सूर (शब्द०)। मुहा०—बोरी बाँधना = चलने की तैयारी करना। उ०—जानउँ लाई काहु ठगोरी। खन पुकार खन बाँधै बोरी।—जायसी (शब्द०)।

बोरो
संज्ञा पुं० [हिं० बोरना] एक प्रकार का मोटा धान जो नदी के किनारे की सीड़ में बोया जाता है।

बोरोवाँस
संज्ञा पुं० [देश० बोरो + हिं० बाँस] एक प्रकार का बाँस जो पूर्वी बंगाल में होता है।

बोर्ड
संज्ञा पुं० [अं०] १. किसी स्थायी कार्य के लिये बनी हुई समिति। २. माल के मामलों के फैसले या प्रबंध के लिये बनी हुई समिति या कमेटी। यौ०—बोर्ड आफ डाइरेक्टर्स = संचालक समिति या मंड़ल। ३. कागज की मोटी दफ्ती। ४. लकडी का तख्ता। काष्ठ- फलक।

बोर्डर
संज्ञा पुं० [अं०] वह विद्यार्थी जो बोर्डिंग हाउस में रहता हो।

बोर्डिग हाउस
संज्ञा पुं० [अं०] वह घर जो बिद्यार्थियों कै रहने के लिये बना हो। छात्रावाम।

बोलंगी बाँस
संज्ञा पुं० [देश० बोलंगी + हिं० बाँस] एक प्रकार का बाँस जो उड़ीसा और चटगाँव की और होता है। यह घरों में होता है और टोकरे बनाने के काम में आता है।

बोल (१)
संज्ञा पुं० [हिं० बोलना] १. मनुष्य के मुँह से उच्चारण किया हुआ शब्द या वाक्य। वचन। वाणी। २. ताना। व्यंग्य। लगती हुई बात। क्रि० प्र०—सुनाना। मुहा०—बोल मारना = ताना देना। व्यंग्य वचन कहना। ३. बाजों का बाँधा या गठा हुआ शब्द। जैसे, तबले का बोल, सितार का बोल। ४. कही हुई बात या किया हुआ वादा। कथन या प्रतिज्ञा।—जैसे, उसके बोल का कोई मोल नहीं। मुहा०—(किसी का) बोलबाला रहना = (१) बात की साख बनी रहना। बात स्थिर रहना। बात का मान होते जाना। (२) मान मर्यादा का बना रहना। भाग्य या प्रताप काट बना रहना। बोलबाला होना = (१) बात की साख होना। बात का माना जाना या आदर होना। (२) मान मर्यादा की बढ़ती होना। प्रताप या भाग्य बड़कर होना। (३) प्रसिद्बि होना। कीर्ति होना। (किसी का) बोल रहना = साख रहना। मान मर्यादा रहना। इज्जत रहना। ५. गीत का टुकड़ा। अंतरा। ६. अदद। संख्य़ा (विशेषतःबायन में आई हुई वस्तुओं के संबंध में स्त्रियाँ बोलती है)। जैसे,—सौ बोल आए थे, चार चार लड़्डू बाँट दिए।

बोल † (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० बोल] कथन। वार्ता। कथा। उ०— (क) ससनेही सयणाँ तणाँ कलि मा रहिया बोल।—ढोला०, दू० ६७५। (ख) धी को बोल नूँ मानीयो बाप।—बी० रासो०, पृ० २४।

बोल (३)
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का सुगंधित गोंद जो स्वाद में कड़ुआ होता है। यह गूगल की जाति के एक पेड़ से निकलता है जो अरब में होता है।

बोलक पु
संज्ञा पुं० [देश०] जलभ्रमण। (डिं०)।

बोलचाल
संज्ञा स्त्री० [हिं० बोल + चाल] १. बातचीत। कथनोपकथन। बातों का कहना सुनना। २. मेलमिलाप। परस्पर सदभाव। जैसे,—आज कल उन दोनों में बोलचाल नहीं हैं। ३. छेड़छाड़। ४. चलती भाषा। रोजमर्रा या नित्य के व्यवहार की बोली। जैसे—वे अधिकतर बोलचाल की भाषा का व्यवहार करते हैं।

बोलता (१)
संज्ञा पुं० [हिं० बोलना] १. ज्ञान कराने और बोलनेवाला तत्व। आत्मा। उ०—बोलते को जान ले पहचान ले। बोलता जो कुछ कहे सो मान ले।—(शब्द०)। २. जीवन- तत्व। प्राण। उ—वह बोलता कित गया काया नगरी तजि कै। दश दरवाजे ज्यों के त्यों ही कौन राह गयो भजि कै।—चरण० बानी, पृ० ३३२। ३. अर्थयुक्त शब्द बोलने वाला प्राणी। मनुष्य। ४. हुक्का (फकीर)।

बोलता (२)
वि० २. खूब बोलनेवाला। वाकपटु। वाचाल। २. प्राण- युक्त। जीवनी शक्तिवाला। ३. बोलनेवाला। बात करनेवाला। जैसे, बोलता सिनेमा, बोलती तसवीर।

बोलती
संज्ञा स्त्री० [हिं० बोलना] बोलने की शक्ति। वाक्। वाणी। मुहा०—बोलती बंद होना = लज्जा, शर्मं या अपराधी होने की स्थिति में होना। दुःखदि के आधिक्य से बोल न पाना। बोलती मारी जाना = बोलने की शक्ति न रह जाना। मुँह से शब्द न निकलना।

बोलनहार, बोलनहारा †
संज्ञा पुं० [हिं० बोलना + हार (= वाला) (प्रत्य०)] शुद्ध आत्मा। बोलता।

बोलनिहारा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'बोलनहार'। उ०—पराधीन देव हौं स्वाधीन गुसाई। बोलनिहारे सो करै बलि बिनय कि भाई।—तुलसी (शब्द०)। संयो० क्रि०—उठना। उ०—आप ही कुंज के भीतर पैठि सुधारि कै सुंदर सेज बिछाई। बातै बनाय सटा के नटा करि, माधो सो आय कै राधा मिलाई। आली कहा कहों हाँसी की बात बिदूषक जैसी करी निठुराई। जाय रह्यो पिछवारे उतै पुनि बोलि उठ्यों वृषभानु की नाई।—(शब्द०)। यौ०—बोलना चालना = बात चीत करना। मुहा०—बोल जाना = (१) मर जाना। संसार में न रह जाना। (अशिष्ट)। (२) निःशेष हो जाना। बाकी न रह जाना। चुक जाना। जैसे,—अब मिठाई बोल गई; और मँगाओ। (३) पुराना या जीर्ण होना। और व्यवहार के योग्य न रह जाना। टूट। फूट जाना। घिस जाना या फट जाना। जैसे,—तुम्हारा जूता चार ही महीने में बोल गया। (४) हार मान लेना। हैरान होकर और आगे किसी काम में लगे रहने का बल या साहस न रखना। जैसे,—इतनी ही दूर में बोल गए, और दौड़ो। (५) सिटपिटा जाना। स्तब्ध हो जाना। (६) दिवाला निकाल देना। खुख हो जाना। २. किसी वस्तु का शब्द उत्पन्न करना। किसी चीज का आवाज निकालना। जैसे,—(क) घंटा बोलना। (ख) यह जूता चलने में बहुत बोलता है।

बोलना (१)
क्रि० अ० [सं० √ 'व्रू > व्रूयते' से 'वूर्यते' प्रा० वुल्लई] १. मुँह से शब्द निकालना। मुख से शब्द उच्चारण करना। जैसे, आदमियों का बोलना, चिड़िय़ों का बोलना, मेढ़क का बोलना, इत्य़ादि।

बोलना (२)
क्रि० स० १. कुछ कहना। कथन करना। वचन उच्चारणा करना। जैसे, कोई बात बोलना, वचन बोलना। संयो० क्रि०—देना।—जाना। मुहा०—बोल उठना = एकाएक कुछ कहने लगना। सहसा कोई वचन निकाल देना। चुप न रहा जाना। जैसे,—हम लोग तो बात कर ही रही थे, बीच में तुम क्यों, बोल उठे। २. आज्ञा देकर कोई बात स्थिर करना। ठहराना। बदना। जैसे,—(क) कूच बोलना, पड़ाव बोलना, मुकाम बोलना। (ख) साहब ने आज खजाने पर नौकरी बोली है। ३. उत्तर में कुछ कहना। उत्तर देना। ४. रोक टोक करना। जैसे,— इस रास्ते पर चले जाओ, कोई नहीं बोलेगा। ५. छेड़्छाड़ करना। सताना। दुःख देना। जैसे,—तुम डरो मत, यहाँ कोई बोल नहीं सकता। ६. पु † किसी का नाम आदी लेकर इसलिये चिल्लाना, जिसमें वह सुनकर पास चला आवे आवाज देना। बुलाना। पुकारना। उ०—ग्वालसखा ऊँचे चढ़ि बोलत बार बार लै नाम।—सूर (शब्द०)। संयो० क्रि०—लेना। ७.पु † आने के लिये कहना या कहलाना। पास आने के लिये कहना या सँदेसा भेजना। उ०—केसव बेगि चलौ, बलि, बोलति दीन भई बृषभानु की रानी।—केशव (शब्द०)। मुहा०—बोलि पठानापु = बुला भेजना। उ०—नाम करन कर अवसर जानी। भूप बोलि पठए मुनि ज्ञानि।—तुलसी (शब्द०)।

बोलनि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० बोल] बोलने की स्थिति या क्रिया। बोल। उ०—आयो बसंत रसाल प्रफुल्लित कोकिल बोलनि ओन सुहाई।—मति० ग्रं०, पृ० ४२०।

बोलबाला
संज्ञा पुं० [अ० बोल + फा़० बाला (= ऊँचा)] १. एक बहुत ऊँचा सदाबहार पेड़ जिसकी लकड़ी बहुत मजबूत और भीतर ललाई लिए होती है। मकान में लगाने के लिये यह बहुत अच्छी होती है। २. (प्रसिद्धि का) चरम उत्कर्ष पर होना।

बोलवाना
क्रि० स० [हिं० बोलना का प्रे, रूप०] १. उच्चारण। कराना। जैसे,—पहाड़े बोलवाना। २. दे० 'बुलवाना'।

बोलशोविक
संज्ञा पुं० [रूसी > अं०] रूसी कम्युनिस्ट पार्टी में मजदूरों और श्रमिकों के हितों और अधिकारों का समर्थक बहुसंख्यक दल। विशेष—अल्पमत दल को 'मनशेविक' कहा जाता है। यौ०—बोलशोविक क्रांति = वह संघर्षात्मिक विप्लव, गदर या उलट फेर जो रूस में रूसी कम्युनिस्ट पार्टी ने जारशाही के खिलाफ बोलशेविज्म को आधार बनाकर किया था।

बोलशेविज्म
संज्ञा पुं० [ रूसी > बोलशेविज्म] वह सिद्बांत या या मत जो श्रमिक वर्ग के हितों ओर अधिकारों को प्रमुख मानता हो तथा उन्हीं के शासन या हुकूमत का समर्थक हो।

बोलसर † (१)
संज्ञा पुं० [सं० बकुलश्री, हिं० मौलसिरी] मौलसिरी। उ०—कोइ सो बोलसर, पुहुप बकोरी। कोई रूपमंजरी गोरी।—जायसी (शब्द०)।

बोलसर † (२)
संज्ञा पुं० [?] एक प्रकार का घोड़ा। उ०—किरमिज नुकरा जरदे भले। रूपकरान बोलसर चले।—जायसी (शब्द०)।

बोलसिरी †
संज्ञा पुं० [सं० बकुलश्री] दे० 'मौलसिरी'।

बोलांश
संज्ञा पुं० [हिं० बोला + अंश] वह अंश या भाग जो किसी का कह दिया गया हो।

बोलाचाली
संज्ञा स्त्री० [हिं० बोलना + अनु० चालना] बातचीत या आलाप का व्यवहार। जैसे,—तुम्हारी उनकी बोलाचाली क्यों बंद हो गई?

बोलाना
क्रि० स० [हिं० बुलाना] दे० 'बुलाना'।

बोलारी †
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक रस्म। बोलावा। उ०—दादू जी ही को सब शुभ और अशुभ काय़ों (विवाह, जन्म, जड़ूल, जात, बोलारी,) में मानते और स्मरण करते हैं।—सुंदर ग्रं० (जी०), भा० १, पृ० ८।

बोलावा
संज्ञा स्त्री० [हिं० बुलाना] कहीं आने के लिये भजा हुआ संदेस या न्योता। निमंत्रण या आह्वान। उ०—पिंगल बोलावा दिया सोहड़ सो असवार।—ढोला०, दू० ५७९। क्रि० प्र०—आना।—जाना।—भेजना।

बोलिकी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० बोल] ओझा। मंत्र पढ़नेवाला। उ०—सखी कहै कहु बोलिकिहि आनौ। एक मंत्र अरु हाँहू जानौ।—नंद० ग्रं०, पृ० १३८।

बोली
संज्ञा स्त्री० [हिं० बोलना] १. किसी प्राणी के मुँह से निकाला हुआ शब्द। मुँह से निकली हुई आवाज। वाणी। जैसे,—(क) बच्चे की बोली, चिड़िया की बोली। (ख) वह ऐसा घबरा गया कि उसके मुँह से बोली तक न निकली। क्रि० प्र०—बोलना। मुहा०—मीठी बोली = शब्द या वाक्य जिसका कथन प्रिय हो। मधुर वचन। २. अर्थयुक्त शब्द या वाक्य। वचन। बात। ३. नीलाम करनेवाला और लेनेवाले का जोर से दाम कहना। ४. वह शब्दसमूह जिसका व्यवहार किसी प्रदेश के निवासी अपने भाव या विचार प्रकट करने के लिये संकेत रूप से करते है। भाषा।जैसे,—वहाँ बिहारी नहीं बोली जाती, वहाँ की बोली उड़िया है। ५. वह वाक्य जो उपहास या कूट व्यग्य के लिये कहा जाय। हँसी, दिल्लगी या ताना, ठठोली। उ०—सासु ननद बोलिन्ह जिउ लेहीं।—जायसी (शब्द०)। क्रि० प्र०—बोलना।—मारना।—सुनाना। यौ०—बोली ठोली। मुहा०—बोली कसना, बोली छोड़ना, बोली बोलना या मारना = किसी को लक्ष्य करके उपहास या व्यंग्य के शब्द कहना। जैसे,—अब आप भी मुझपर बोली बोलने लगे।

बोली ठोली
संज्ञा स्त्री० [हिं० बोली + ठिठोली] व्यंग्य। कटाक्ष। हँसी मजाक। उ०—बोली ठोली करै छिमा करि चुप मैं मारौं। भूँकि भूँकि फिरि जाँय जुगत से उनको टारौं।— पलटू, पृ० ६२। क्रि० प्र०—करना।—मारना।

बोलीदार
संज्ञा पुं० [हिं० बोली + फा़० दार] वह असामी जिसे जोतने के लिये खेत यों ही जबानी कहकर दिया जाय, कोई लिखा पढ़ी न हो।

बोल्लाह
संज्ञा पुं० [देश०] घोड़ों की एक जाति।

बोवना †
क्रि० सं० [सं० पवन, प्रा० बवण] दे० 'बोना'।

बोवाई
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'बोआई'।

बोवाना
क्रि० स० [हिं० बोना का प्रेरणाप] बोने का काम दूसरे से कराना।

बोसताँ
संज्ञा पुं० [फा़०] बाग। बाटिका। उपवन। उ०—सुनि बुलवुल बोसताँ होति जिहि दंग।—प्रेमघन०, भा० १, पृ० ७४।

बोसा
संज्ञा पुं० [फा़० बोसह्] चुंबन। उ०—हात उसका पकड़ जबीं के ऊपर, बोसा, दो बिठाता उसकूँ सर पर।—दक्खिनी०, पृ० २२८।

बोह †
संज्ञा स्त्री० [फा़० बोय] सुगंध। उ०—बग्गी राग खँभायची, लग्गी केसर बोह।—रा० रू०, पृ० ३४७।

बोह (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० बोर या सं० बाह] ड़ुबकी। गीता।मुहा०—बोह लेना = ड़ुबकी लेना। गोता लगाना। उ०—रूप जलधि बपुष लेत मन गयंद बौहैं।—तुलसी (शब्द०)।

बोह (३)
क्रि० अ० [देश०] जमना। उगना। उ०—जहाँ जल बिन कवला बोह अनंत। जहाँ वपु बिन भोरा गोह करंत।— दरिया० बानी, पृ० ४५।

बोहना †
क्रि० सं० [हिं० बोह] दे० 'बोना'।

बोहनी
संज्ञा स्त्री० [सं० बोधन(= जगाना)] १. किसी सौदे की पहली बिक्री। उ०—है कोइ संत सुजान करै मोरी बोहनियाँ।—कबीर श०, भा० ३, पृ० ४८। २. किसी दिन की पहली बिक्री। उ०—(क) मारग जात गाहि रह्यो री अँचरा मेरो नाहिन देत हों बिना बोहनी।—हरिदांस (शब्द०)। (ख) औरन छांड़ि परे हठ हमसी दिन प्रति कलह करत गहि ड़गरी। बिन बोहनी तनक नहिं दैहौं ऐसेहि छीनि लेहु बरु सगरी।—सूर० (शब्द०)। विशेष—जबतक बोहनी नहीं हुई रहती तबतक दूकानदार किसी को उधार सौदा नहीं देते। उनका विश्वास है कि पहली बिक्री यदि अच्छी होगी, तो दिन भर अच्छी होगी। इस पहली बिक्रि का शकुन किसी समय सब देशों में माना जाता था।

बोहनी † (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० बोह या बोवना] बोने की क्रिया। बोना। वपन करना।

बोहरा
संज्ञा पुं० [सं० व्यापार] व्यापार करनेवाली एक जाति। उ०—पहली हम होते छोहरा। कौड़ी बेच पेट निठि भरते अब तो हुए बोहरा।—सुंदर० ग्रं०, भा० २. पृ० ९१४। विशेष—'राजपुताना का इतिहास', पृ० १४२१ में लिखा है कि 'कई ब्राह्मणों ने व्योपार और शिल्पकारी का कार्य करना आरंभ किया और जब पेशों के अनुसार जातियाँ बनने लगीं तब शिल्प का कार्य करनेवाले ब्राह्मण 'खाती' और व्यापार करनेवाले ब्राह्मण 'बोहरा' कहलाने लगे।

बोहला ‡
क्रि० अ० [हि० बोह = (गोता) अथवा राज० वहला, बाहला] बहनेवाली अर्थात् नदी। उ०—लड़ जुड़ खग्गा बोहलै मुरड़ चले राठौड़।—रा० रू०, पृ० १९२।

बोहारनहार
वि० [हिं० बोहरना + हार(प्रत्य०)] बुहारनेवाला। सफाई करनेवाला। उ०—ते वृषभानु भुआल के द्बार बोहारनहार।—नंद० ग्रं०, पृ० ७८।

बोहारना †
क्रि० स० [हिं०] दे० 'बुहारना'। उ०—बगर बोहारति अष्ट महासिधि द्बारे सथिया पूरति नौ निधि।—नंद० ग्रं०, पृ० ३३१।

बोहारी †
संज्ञा स्त्री० [देशी या हिं० बोहारना] झाड़ू। मार्जनी। वर्धनी।

बोहित पु
संज्ञा पुं० [सं० बोहित्थ प्रा० बोहित्थ] नाव। जहाज। उ०—(क) बोहित भरी चला लै रानी। दान माँग सत देखी दानी।—जायसी (शब्द०)। (ख) बंदी चारिउ बेद भव बारिघि बोहित सरिस।—तुलसी (शब्द०)।

बोहित्थ पु
संज्ञा पुं० [सं० वोहित्थ, प्रा० बोहित्थ] दे० 'बोहित'। उ०—विष्णु स्वामि बोहित्थ सिंधु ससार पार करु।—भक्तमाल (श्री०), पृ० ३७५। विशेष—हेमचंद्र ने इसे देशी माना है।

बोहिथ
संज्ञा पुं० [सं० बोहित्थ, प्रा० बोहित्थ, बोहिथ] दे० 'बोहित'। उ०—(क) तो सम न और तिहु लोक में, नट्ट भट्ट नाटिक्क नर। संसार पार बोहिथ समह तोहि मात देवी सुबर।—पृ० रा०, ६।१४८। (ख) को बोहिथ को खेवट आही। जिहि तिरिए सो लीजै चाही।—कबीर ग्रं०, पृ० २३४।

बोहिया
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की चाय जो चीन में होती है। इसकी पत्तियाँ छोटी और काली होती है।

बोहोत †
वि० [हिं०] दे० 'बहुत'। उ०—सो तामस भक्त को श्रीठाकुर जी के प्रगट स्वरूप प्रति आसक्ति बोहोत रहत है।—दो सौ बावन०, भा० १, पृ० ३।

बोहोरि †
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'बहुरि'। उ०—बोहोरि एक दिन अदुर्ध रात्रि के समय श्रीगुसाई जी बोहोत प्रसन्नता में बैठे हते।—दो सौ बाबन०, भा० २. पृ० ६४।

बौँड़ †
संज्ञा स्त्री० [सं० वोराट(= वृत, टहनी] १. टहनी जो दूर तक डोरी के रूप में गई हो। २. लता। बेल। उ०— नृपहि मोद सुनि सचिव सुभाखा। बढ़त बौड़ जनु लही सुसाखा।—तुलसी (शब्द०)।

बौँड़ना †
क्रि० अ० [हिं० बौड़ + ना (प्रत्य०)] लता की तरह बढ़ना। टहनी फेंकना बढ़कर फैलना। उ०—(क) मूल मूल सुर बीथि तम तोम सुदल अधिकाई। नखत सुमन नभ बिटप बौड़ि मनो छपा छिटकि छबि छाई।—तुलसी (शब्द०)। (ख) राम बाहु बिटप बिसाल बौंड़ी देखियत जनक मनोरथ कलपबेलि फरी है।—तुलसी (शब्द०)।

बौंडर ‡
संज्ञा पुं० [सं०वायमरण्ड़ल, हिं० बवंड़र] घूम घूमकर चलनेवाली वायु का झोका। बगूला। उ०—उनहीं मैं सति भ्रमति है ह्वँ बोंड़र को पान।—मति० ग्रं०, पृ० ३२३। (ख) जहँ तहँ उड़े कोश भय पाए। यथा पात बौड़र के आए।—रघु० दा० (शब्द०)।

बौँड़ा (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० बौंड़] १. पौधों या लताओं के वे कच्चे फल जो साररहित होते हैं। ढेंड़ी। ढोंड़। जैसे, मदार या सेमर की बौड़ी। उ०—गए हैं बहर भूमि तहाँ कृष्ण भूमि आए करी बड़ी धूम आक बौड़िन सों मारि कै।—प्रियादास (शब्द०)। † २. फली। छीमी।

बौँड़ी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दमड़ी] दमड़ी। छदाम। उ०—जाचै को नरेस देस देस को कलेस करै दैहै तो प्रसन्न ह्नँ बड़ी बड़ाई बौड़ियै।—तुलसी (शब्द०)।

बौआ ‡
संज्ञा स्त्री० [सं० वधू, प्रा०, बहु] परिवार की बड़ी वधू।

बौआना †
क्रि० [अ० सं० वायु, हिं० बाउ + आना (प्रत्य०)] १. सपने में कुछ कहना। स्वप्नावस्था का प्रलाप। २. पागल या बाई चढ़े मनुष्य की भाँति अट्ट सट्ट बक उठना। बर्राना।उ०—एकोहं बहुस्यामि में काहि लगा अज्ञान। को मुरुख को पड़िता केहि कारण बौआन।—कबीर (शब्द०)।

बौखम ‡
वि० [हिं०] दे० 'बौखल'।

बौखल
वि० [हिं० बाउ + सं० स्खलन] सनकी। पागल। उ०— वह बौखल सा आदमी, जो खपरैल में बैठा था न, उसने बहुत दिक किया।—फिसाना०, भा० ३, पृ० १२७।

बौखलाना
क्रि० अ० [हिं० बाउ + सं० स्खलन] १. कुछ कुछ पागल हो जाना। बहक जाना। सनक जाना। २. झल्लाकर या क्रुद्घ होकर कुछ कहना।

बोखलाहट
संज्ञा स्त्री० [हिं० बौखल + आहट (प्रत्य०)] सनकीपन। पागलपन।

बौखा
संज्ञा स्त्री० [सं० वायु + स्खलन] हवा का तेज झोंका जो वेग में आँधी से कम हो।

बौछाड़
संज्ञा स्त्री० [सं० वायु + दरित] १. वायु के झोंके से तिरछी आती हुई बूँदों का समूह। बूँदों की झड़ी जो हवा के झोंके के साथ कहीं जा पड़े। झटास। क्रि० प्र०—आना। २. वर्षा की बूँदों के समान किसी वस्तु का बहुत अधिक संख्या में कहीं आकर पड़ना। जैसे, फेंके हुए ढेलों की बौछाड़। ३. बहुत अधिक संख्या में लगातार किसी वस्तु का उपस्थित किया जाना। बहुत सा देते जाना या सामने रखने जाना। वर्षा। झड़ी। जैसे,—उस विवाह में उसने रुपयों की बोछाड़ कर दी। ४. लगातार बात पर बात, जो किसी से कही जाय। किसी के प्रति कहे हुए वाक्यों का तार। जैसे, गालियों की बौछाड़। क्रि० प्र०—छूटना।—छोड़ना।—पड़ना। ५. प्रच्छन्न शब्दों में आक्षेप या उपहास। व्यंग्यपूर्ण वाक्य जो किसी को लक्ष्य करके कहा जाय। ताना। कटाक्ष। बोली ठोली। क्रि० प्र०—करना।—छोड़ना।—मारना।—होना।

बौछार †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'बौछाड़'।

बौड़ना पु
क्रि० अ० [सं० वातुल] वातग्रस्त होना।

बौड़म
वि० [सं० वातुल] सनकी। अर्धविक्षिप्त। पागल सा।

बौड़मपन
संज्ञा पुं० [हिं० बौड़म + पर (प्रत्य०)] पागलपन। सनक। बौड़म होना। उ—स्नेह के बौड़मपन में दाँतों को पीसता हुआ कहने लगा।—संन्यासी, पृ० १५५।

बौड़हा
वि० [सं० वातुल, हिं० बाउर + हा (प्रत्य०)] बावला। पागल।

बौत †
वि० [हिं० बहुत] दे० 'बहुत'।

बौता
संज्ञा पुं० [अं० व्वाय + हिं० ता या टा (प्रत्य़०)] जहाजों को किसी स्थान की सूचना देने के लिये पानी की सतह पर ठहराई हुई पीपे के आकार की वस्तु। समुद्र में तैरता हुआ निशान। तिरोंदा काती (लश०)।

बौद्ध (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० बौद्धी] १. बुद्ध द्वारा प्रचारित या बुद्ध संबंधी। जैसे, बौद्ध मत। २. बुद्धि। या समझ संबंधी। बौद्धिक। दिमागी (को०)।

बौद्ध (२)
संज्ञा पुं० गौतम बुद्ध का अनुयायी।

बौद्धधर्म
संज्ञा पुं० [सं०] वुद्ध द्वारा प्रवर्तित धर्म। गौतम बुद्ध का सिखाया मत। विशेष—संबोधन (संबोधि) प्राप्त करने उपरांत शाक्य मुनि गाया से काशी आए और यहाँ उन्होंने अपने साक्षात् किए हुए धर्ममार्ग का उपदेश आरंभ किया। 'आर्य सत्य' और 'द्वादश निदान' (या प्रतीत्यसमुत्पाद) के अंतर्गत उन्होंने अपने सिदधांत की व्याख्य़ा की है। आर्य सत्य के अंतर्गत ही प्रतिपद् या मार्ग है। इस नवीन मार्ग का नाम, जिसका मार्ग की व्याख्या भगवान् बुद्घ ने इस प्रकार की है—'हे भिक्षुओ ! परिव्राजक को इन दो। अंतों का सेवन न करना चाहिए। वे दोनों अंत कौन हैं ? पहला तो, काम य़ा विषय में सुख के लिये अनुयोग करना। यह अंत अत्यंत दीन, ग्रम्य, अनार्य और अनर्थसंहित है। दूसरा है, शरीर को क्लेश देकर दुःख उठाना। यह भी अनार्य और अनर्थसंहित है। हे भिक्षुओ ! तथागत ने (मैंने) इन दोनों अंतों को त्याग कर मध्यमा प्रतिपदा (मध्यम मार्ग) को जाना है।' मार्ग आर्य सत्यों में चौथा है।—चार आर्य सत्य ये हैं।—दुःख, दुःखसमुदय, दुःखनिरोध और मार्ग। पहली बात तो यह है कि दुःख है। फिर, इस दुःख का कारण भी है। कारण है तृष्णा। यह तृष्णा इस प्रकार उत्पन्न होती है। मूल है अविद्या। अविद्या से संस्कार, संस्कार से विज्ञान, विज्ञान से नामरूप, नामरूप से षड़ायतन (इंद्रियों और मन) षडायतन से स्पर्श, स्पर्श से वेदना, वेदना से तृष्णा, तृष्णा से भव, भव से जाति (जन्म), जाति या जन्म से जरामरण, इत्यादि। निदानों द्वारा इस प्रकार कारण मालूम हो जाने पर उसका निरोध आवश्यक है, यह जानना चाहिए। अंत में उस निरोध का जो मार्ग है, ससे भी जानना चाहिए। इसी मार्ग को निरोधगामिनी प्रतिपदा कहते हैं। यह मार्ग अष्टांग है। आठ अंग ये हैं।—सम्यकदृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक्वाचा, सम्यक्कमाँत, सम्यगाजीव, सम्यग्व्यायम, सम्यकस्मृति और सम्यक्समाधि। बौद्ध मत के अनुसार कोई पदार्थ नित्य नहीं, सब क्षणिक हैं। नित्य चैतन्य कोई पदार्थ नहीं, सब विज्ञानमात्र है। बौद्ध अमर आत्मा नहीं मानते, पर कर्मवाद उनका बहुत जोर है। कर्म के शेष रहने से ही फिर जन्म के बंधन में पड़ना पड़ता है। यहाँ पर शंका हो सकती है कि जब शरीर के उपरांत आत्मा रहती ही नहीं तब पुनर्जन्म किसका होता है। बौद्ध आचार्य इसका इस प्रकार समाधान करते हैं।— मृत्यु के उपरांत उसके सब खंड़—आत्मा इत्यादि सब—नष्टहो जाते है; पर उसके कर्म के कारण फिर उन खंड़ों के स्थान पर नए नए खंड़ उत्पन्न हो जाते हैं और एक नया जीव उत्पन्न हो जाता है। इस नए और पुराने जीव में केवल कर्म- संबंध- सूत्र रहता है; इसी से दोनों को एक कहा करते हैं। बोद्ध धर्म की दो प्रधान शाखाएँ हैं—हीनयान और महायान। हीनयान बौद्ध मत का विशुद्ध और पुराना रूप है। महायान उसका अधिक विस्तृत रूप है, जिसके अंतर्गत बहुतदेवोपासना और तंत्र की क्रियाएँ तक हैँ। हीनयान का प्रचार बरमा, स्याम और सिंहल मे है; और महायान का तिब्वत, मंगोलिया चीन, जापान, मंचूरिया आदि में है। इस प्रकार यौद्ध मत के माननेवाले अब भी पृथ्वी पर सबसे अधिक हैं।

बौद्धमत
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'बौद्ध धर्म'।

बौद्धिक
वि० [सं०] बुदि्ध या ज्ञान से संबद्ध। दिमागी। उ०— वे युग की संदेहात्मक एवं बौद्धिक प्रवृत्ति से अछूते न बच सके।—हिं० का० प्र०, १०३।

बौद्धिकता
संज्ञा स्त्री० [सं०] बौद्धिक होने की स्थिति, भाव या क्रिया।

बौध (१)
संज्ञा पुं० [सं०] बुध का पुत्र पुरुरवा।

बौध पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० बौद्ध] दे० 'बौद्ध'। उ०—(क) जोगी जैन जंगम संन्यासी बनबासी बोध, और कोऊ भेष पक्ष सब भ्रम भान्यौ हैं।—सुंदर ग्रं०, भा० २. पृ० ३९६। (ख) बोध आते हैं, बैस्नव आते हैँ।—रंगभूमि, भा० २, पृ० ४९५।

बौधायन
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्राचीन ऋषि जिन्होंने श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र की रचना की थी।

बौन पु
संज्ञा पुं० [सं० वामन] दे० 'बौना'। उ०—ज्यौं निरमल निसिनाथ कौ, हाथ पसारै बौन।—नंद० ग्रं०, पृ० १२४।

बौना (१)
संज्ञा पुं० [सं० वामन] [स्त्री बौनी] बहुत छोटे ड़ोल का मनुष्य। बहुत छोटा आदमी जो देखने में, लडके के समान जान पड़े, पर हो पूरी अवस्था का। अत्यंत ठिगना या नाटा मनुष्य। उ०—तहँ हौं कवन निपट मतिमंद। बौना पै पकरावौ चंद।—नंद० ग्रं०, पृ० २१६।

बौना (२)
वि० ठिंगना। नाटा।

बौरा † (१)
संज्ञा पुं० [सं० मुकुल, प्रा०, मुउड़] आम की मंजरी। मौर।

बौर पु (२)
[सं० बातुल, हिं० बाउर] बावला। बौड़म। उ०—(क) नाम रूप गुन भेद कै सौ प्रगटित सब ठौर। ता बिनु तत्व जु आन कछु, कहै सो अति बड़ बौर।—अनेकार्थ०, पृ० २। (ख) अँखिया खोलि देखु अब दुनिया है रँग बौर।—गुलाल०, पृ०, १२।

बौर पु (३)
वि० [सं० भ्रमर, हिं० बँवर] समूह। झुंड़। घेरा। उ०— अऱिन बौर छंड़ै न क्रन्न मंड़े दिलीय दिसि।—पृ० रा०, २५।७७६।

बौरई
संज्ञा स्त्री० [हिं० बौरा] पागलपन। सनक।

बौरना
क्रि० अ० [हिं० बौर + ना (प्रत्य०) ] आम के पेड़ में मंजरी निकलना। आंम का फूलना। मौरना। उ०— (क) डहडही बौरी मंजु डारै सहकारन की, चह चही चुहिल चहुँ कित अलीन की।— रसखानि (शब्द०)। (ख) दूजे करि डारी खरी बौरी बौरै। आम।— बिहारी (शब्द०)।

बौरहा †
वि० [हिं० बौरा + हा (प्रत्य०)] पागल। विक्षिप्त।

बौरा
वि० [सं० वातुल, प्रा० बाउड़ हिं० हाउ] [स्त्री० बौरी] १. बावला। पागला। विक्षिप्त। सनकी। सिड़ी। जिसका मस्तिष्क ठीक न हो। उ०— मोर बौरा देखल केहु दहहु जात। —विद्यापति, पृ० ३९७। २. भोला। अज्ञान। नादान। मूर्ख। उ०—(क) हौं ही बोरी विरह बम कै बौरी सब गाउँ। बिहारी (शब्द०)। (ख) हों बौरी ढुंढंन गई रही किनारे बैठ। —कबीर (शब्द०)। ३. गुँगा। मूक।

बौराई पु † (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० बौरा + ई(प्रत्य०)] पागलपन। उ०— सुनहु नाथ मन जरत त्रिविधि ज्वर करत फिरत बौराई।—तुलसी (शब्द०)।

बौराई (२)
वि० स्त्री० [हिं० बौराना] बौर से भरी हुई। मंजरियों से पूर्ण।

बौराना † (१)
क्रि० अं० [हिं० बौरा + ना (प्रत्य०)] १. पागल हो जाना। सनक जाना। विक्षिप्त हो जाना। उ०— कनक कनक तें सौगुनौ मादकता अधिकाइ। उहिं खाए बौराइ नर इहिं पाए बौराइ।—बिहारी र०, दो०, १९२। २. उन्मत्त हो जाना। विवेक या बुद्धि से रहित हो जाना। उ०— भरतहि दोष देइ को जाए। जग बौराइ राजपद पाए।—तुलसी (शब्द०)।

बौराना (२)
क्रि० सं० बेवकुफ बनाना। किसी को ऐसा कर देना कि वह भला बुरा न विचार सके। मति फेरना। उ०—(क) मधत सिंधु रुद्रहिं बौरायो। सुरन प्रेरि विषपान करायो।— तुलसी (शब्द०)। (ख) भल भूलिह ठग के बौराए।— तुलसी (शब्द०)।

बौराह पु †
वि० [हिं० बौरा] १. बावला। पागल। सनकी। उ०— बर बौराह बरह असवार। —तुलसी (शब्द०)। २. नासमझ।

बौरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० बौरा] बावली स्त्री। दे० 'बौरा'।

बौलड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० बहु + लड़] सिकड़ी के आकार का सिर पर पहनने का एक गहना।

बौलसिरी
संज्ञा स्त्री०[सं० वकुलश्री] बकुल। मौलसिरी। उ०— अपनै कर गुहि आपु हठि पहिराई गर लाल। नौल। सिरी औरे चढ़ा बौलसिरी की माल।—बिहारी (शब्द०)।

बौलहल पु
वि० [देश०] बावला। उ०— तेरे जो न लेखी मोहि मारत परेखो महा जान घन आनँद पेषाइ बौलहल हैं।— घनानंद०, पृ० ५४।

बौलाना †
क्रि० अ० [सं० व्यावर्तन] बीतना। समाप्त होना।उ०—बात हुई ग्रीषम बौलाई। उपर धुर बरखा रुत आई।— रा०, रू०, पृ० २३४।

बौह †
वि० [सं० बहु] बुहत। उ०— जोबन में मर जावणौ दल खल साजै दाप। एह उचित बौह आवखी, सिंहां बड़ौ सराप।— बाँकी ग्रं० भा०, १. पृ० ३५।

बौहर
संज्ञा स्त्री० [सं० वधुवर, हिं० बहुवर] वधू। दुलहिन। पत्नी।

बोहला †
वि० [सं० बहुल] अधिक। बहुत। उ०—बौहलाँ पाटा बाँधणाँ, आछों होसी आध।— बाँको० ग्रं०, भा०, १. पृ० ३४।

बौहलिया †
संज्ञा पुं० [हिं० बहल] छोटी उभ्र के बैल। छोटे बैल। उ०— बौहलिया। बिरदावियाँ, गरज सरै नह तार।— बाँकी०, ग्रं० भा० १. पृ० ४०।

बौहौटिया †
संज्ञा स्त्री० [सं० वधु] वधु। बहु। बधुटी। उ०— गैल में टटवारी मिल्यों मिल्यों। बोल्यों।—कै कोऐ, रामपरसादु का सी बोहीटिया।— पोद्दार अभि०, ग्रं०, पृ० १००८।

ब्यंग
संज्ञा पुं० [सं० व्यड्ग्य] दे० 'व्यंग्य'।

ब्य़ंगि पु
संज्ञा पुं० [सं० व्यङ्गय] दे० 'व्यंग'। उ०— प्रीतम को जब सागस लहै। व्यगि अव्यंगि बचन कछु कहैं।— नंद०, ग्रं०, पृ०, १४७।

ब्यंजन
संज्ञा पुं० [सं० व्यञ्जन] दे० 'व्यजन'। उ०—पेस सुरत की करी रसोई, ब्यजन आसन लाइय।— धरम० श० पृ० ५५।

ब्यक्ति
संज्ञा स्त्री० पुं० [सं० व्यक्ति] दे० 'व्यक्ति'।

ब्यजन †
संज्ञा पुं०[सं० व्यजन] दे० 'व्यजन'।

ब्यतीतना पु
क्रि० सं० [सं० व्यतीत + हिं० न (प्रत्य०)] गुजर जाना। व्यतीत हो जाना। बीत जाना। उ०—(क) जबै दिवस दस पाँच व्यतीते।— रघुराज (शब्द०)। (ख) एक समय दिन सात ब्यतीते। —रघुराज (शब्द०)। (ग) साधु प्रीतिबस मैं नहिं गयऊ। पहरा काल ब्यतीतत भयऊ।— रघुराज (शब्द०)।

ब्यथा
संज्ञा स्त्री०[सं० व्यथा] दे० 'व्यथा'।

ब्य़थित
वि० [सं० ब्यथित] दे० 'व्यथित'।

ब्यलीक
वि० [सं० व्यलीक] दे० 'व्यलीक'।

व्यवरना †पु
क्रि० अं० [सं० विवरण > हिं० ब्योरना] अलग अलग करना। बिवृत करना। उ०— जैसे, मधुमक्षिका सुवास कौ भ्रमर लेत तैस हो व्यवरि करि भिन्न भिन्न कीजिए।— सुंदर ग्रं०, भा०, २. पृ० ४६९।

ब्यवसाय
संज्ञा पुं० [सं० व्यवसाय] दे० 'व्यवसाय'।

ब्यवस्था
संज्ञा स्त्री० [सं० व्यवस्था] दे० 'व्यवस्था'।

ब्यवहर †
संज्ञा पुं० [सं० व्यवहार] उधार। कर्ज। क्रि० प्र०— देना।

ब्यवहरिया
संज्ञा पुं० [हिं० व्यवहार] व्यवहार या लेन देन करनेवाला। महाजन उ०— तब अनिय व्यवहरिया बोली। तुरत देउँ मै थैली खोली।— तुलसी (शब्द०)।

व्यवहार
संज्ञा पुं० [सं० व्यवहार] १. दे० 'व्यवहार'। २. रूपए का लेन देन। ३. रूपए के लेन देन का संबध। ४. सुख दुःख में परस्पर संमिलित होने का संबध। इष्ट मित्र का संबध। जैस,— हमारा उनका व्यवहार नही है।

व्यवहारी
संज्ञा पुं० [सं० व्यवहारिन्] [स्त्री० व्यवहारिणी] १. कार्यकर्ता। मामला करनेवाला। २. लेन देन करनेवाला। ब्यापारी। ३. जिसके साथ प्रेम का व्यवहार हो। हितु या इष्ट मित्र। ४. जिसके साथ लेन देन हो।

ब्यसन
संज्ञा पुं० [सं० व्यसन] दे० 'व्यसन'। उ०— आसा बसन ब्यसन यह तिनही। रघुपति चरित होहिं तहुँ सुनहीँ।—तुलसी (शब्द०)।

ब्यसनी
वि० [सं० व्यसनिन्] दे० 'व्यसनी'।

ब्याउ पु
संज्ञा पुं० [सं० बिवाह] दे० 'ब्याह'। उ०— नाहिंन करिहौं ब्याउ, करौ जिनि लाड़ हमारी।— नद० ग्रं० पृ० १९५

ब्याउर †
वि० [हिं० विश्राम + आउर(प्रत्य०)] जनन करनेवाली। बच्चा देनेवाली। उ०— ब्याउर बेदन बाँझ न बूझँ।—धरनी० बानी०, पृ० २९।

ब्याक्रन्न पु
संज्ञा पुं० [सं० व्याकरण, प्रा० ब्याक्रन्न]दे० 'व्याकरण' उ०—ब्याक्रन्न कथा नाटक्क छद।—पृ० रा०, १। ३७१।

ब्याघर पु †
संज्ञा पुं० [सं० व्याघ्र] दे० 'व्याघ्र'। उ०— (क) ब्यापार सिँघ सरप बहु काटी, बिन सत गुर पावे नहिं बार्टी कबीर० श०, भा०, १ पृ० ५८। (ख) ब्याघर के घर पढ़े पुरानो दादुल भै गौ बक्ता। —संत० दरिया, पृ० १२७।

ब्याज
संज्ञा पुं० [सं० व्याज] १. दे० 'व्याज'। २. वृद्धि। सूद। उ०—(क) कलि का स्वामी लोभिया मनसा रहे बँधाय। देवे पैसा व्याज को लेखा करत दिन जाय। —कबीर (शब्द०)। (ख) सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा। दिन चलि गयेउ व्याज बहु बाढा।—तुलसी (शब्द०)। क्रि० प्र०—जोड़ना।—फैलाना।—लगाना। यौ०— ब्याजखोर = सृदखोर। ब्याज बट्टा = हानि लाभ। नफा नुकसान।

ब्याजो
संज्ञा पुं० [सं० व्याजिन्] बहानेबाज। छली। अनेकार्थ०, पृ० ४८।

ब्याजू
वि० [हिं० ब्याज] व्याज पर दिया या लगाया हुआ (धन)। जैसे, —हमारे पास १०० रुपए थे, सो हमने व्याजु दे दिए।

ब्याध
संज्ञा पुं० [सं० व्याध] दे० 'व्य़ाध'।

ब्याधा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० व्याधि] दे० 'व्याधि'।

ब्याधा (२)
संज्ञा पुं० [सं० व्याध] दे० 'व्याध'।

ब्याधि
संज्ञा स्त्री० [सं० ब्याधि] दे० 'व्याधि'।

ब्यान (१)पु
संज्ञा पुं० [फा़० बयान] बखान। वर्णन। बयान। पलक राम सुन ज्ञान, कहुँ व्यान समझाइके।—घट० पृ० ३३०।

व्यान † (२)
संज्ञा पुं० [सं० विजनन, हिं० बिश्रान] दे० 'बिश्रान'। उ०— भगवान ने चाहा, तो सो रुपए इसी व्यान में पीट लूँगा।— गोदान, पृ० ५।

ब्याना (१)
क्रि० सं० [सं० वीज, हिं० बिया + ना (प्रत्य०)] जनना। उत्पन्न करना। पैदा करना। गर्भ से निकालना। जैसे, गाय का बछाड़ ब्याना।

ब्याना (२)
क्रि० अ० बच्चा देना। जनना।

ब्यापक, ब्यापकु पु
वि० [सं० व्यापक] दे० 'व्यापक'। उ०— व्यापकु एकु ब्रह्म अविनासी। सत चेतन घन आनँद रासी।— मानस, १। २३।

ब्यापना पु †
क्रि० अ० [सं व्यापन] १. किसी वस्तु या स्थान मे इस प्रकार फैलाना कि उसका कोई अंश बाकी न रह जाय। औत प्रोत होना। किसी स्थान में भर जाना। कोई जगह छेक लेना। २. चारों और जाना। फैलना। उ०— सुनि नारद के बचन तब सब कर मिटा विषाद। छन महँ व्यापेउ सकल पुर घर घर यह संवाद। —तुलसी (शब्द०)। ३. धेरना। ग्रसना। उ०— जरा अबहि तोहि व्यापै आई। भय़ेउ वृदध तब कह्मो सिर नाई।— सूर (शब्द०)। ४. प्रभाव करना। असर करना। उ०—(क) चिंता साँपिन को नहिं खाया। को जग जाहि न ब्यापी माया। —तुलसी (शब्द०)। (ख) गुरु मिला तब जानिए मिटे मोह तन ताप। हरष शोक ब्यापै नहीं तब हरि आपै आप।— कबीर (शब्द०)। संयो० क्रि०— जाना।

ब्यापार
संज्ञा पुं० [सं० ब्यापार] दे० 'व्यापार'।

ब्य़ापारी
संज्ञा पुं० [सं० व्यापारिन्] दे० 'व्य़ापारी'।

ब्य़ापित पु
वि० [सं० व्याप्त] दे० 'व्याप्त'। उ०— जल थल औ पवन पानी व्यापित है सोय।— जग० बानी, पृ० ३३।

ब्यार
संज्ञा स्त्री० [हिं० बयार] वायु। बयार। उ०— (क) आगै आगै धाय बादर बरखत जाय व्यारन तै जलकन ठौर ठौर छिरकायौ।—नंद० ग्रं० पृ० ३७३ (ख) चोबेजी —हा० व्यार ते कहुँ पहार उड़ँ है। —श्रीनिवास ग्रं० गृ० ४८।

ब्यारि †
संज्ञा स्त्री० [हिं० बय़ार] दे० 'बयार'। उ०— नेक हँसि के व्यारि हलावौ। —पौद्दार अभि०, ग्रं० पृ० ९१३।

ब्यारी
संज्ञा स्त्री० [सं० विहार ? या वि (विशिष्ट) + आहार] १. रात का भोजन। व्यालू। उ०—एक दिन हरि व्यारी करवाई। पूजक बीरी दियो न जाई।— रघुनाथ (शब्द०)। क्रि० प्र०— करना। उ०— रात दिन दस बजाकर ब्यारी करते। प्रेमघन०, भा० २, पृ० ८१। २. वह भोजन जो रात के लिये हो। जैसे, —मेरे लिये ब्यारी यहीं लाऔ ।

ब्यारु †
संज्ञा पुं० [सं० विहार] दे० 'ब्यालू'। उ०— पाखे ब्यारु कराई कै भगवद्बार्ता करि फेरि सैन कियो।— दो सौ बावन० भा०, २. पृ० ४७।

ब्याल
संज्ञा पुं० [सं० व्याल] १. दे० 'व्याल'। २. दुष्ट या क्रुर नर। ३. दिनांत। दिवस का अवसान —अनेकार्थ०, पृ० १४९।

ब्यालिस
संज्ञा पुं०, वि० [हिं० बयालिस] दे० 'बयालिस'।

ब्याली (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० व्याली] सर्पिणी। साँपिन। नागिन। उ०— दृग पुतरी इव सब दिन पाली। निरखत रहित यबा मणी व्याली।— रघु० दा० (शब्द०)।

ब्याली (२)
वि० [सं० ब्यालिन्] सर्पी को धारण करनेवाला। शिव। उ०— निरगुण निलज कुवेष कपाली। अकुल अगेह दिगंबर व्य़ाली।—तुलसी (शब्द०)।

ब्याली (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं० ब्यारी] रात का भोजन। ब्यालू। उ०— मूदगादाली, घृत की ब्याली। रस के कंदर सुंदर साली।— —नैद०, ग्रं०, पृ० ३०६।

ब्यालू
संज्ञा पुं० [सं० बिहार?] वह भोजन जो सायंकाल के समय किया जाता है। रात का खाना। रात का भोजन। ब्यारी।/?/राज इघर आय परमानंद से ब्यालू कर सोये।—/?/(शब्द०)।

ब्याव †
संज्ञा पुं० [सं० व्याह] विवाह। शादी। उ०— राजा को ठिकाणो सायरा कै ब्याव कीनूँ। चारण भाट राँणाँ नै अमोघी त्याह दीनूँ। —शिखर०, पृ० ११०।

व्याह
संज्ञा पुं० [सं० विवाह] देश, काल औरह जाति के नियया- नुसार वह रिति या रस्म जिसमें स्त्री और पुरुष में पति पत्नी का संबंध स्थापित होता है। विवाह। वि० दे० 'विवाह'। उ०— (क) पढ़े पढाए कछु नहीं ब्राह्म भक्ति ना जान। ब्याह श्राद्बे कारणो बैया सूँड़ा तान।— कबीर (शब्द०)। (ख) हिम हिमसैल सूता सिव व्याहु। शिशिर सुखत प्रभु जनम उछाहू। —तुलसी (शब्द०)। क्रि० प्र०—करना। होना। पर्या०— विवाह। उपयम। परिणाय। उद्बाह। उपयाम। दारिपरिग्रह। पाणिग्रहण। दारकर्म।

ब्याहता (१)
वि० स्त्री० [सं० विवाहित] जिसके साथ विवाह हुआ हो। जैसे, ब्याहता औरत।

ब्य़ाहता (२)
संज्ञा पुं० पति।

ब्याहना
क्रि० सं० [सं० विवाह + हिं० ना (प्रत्य०)] [वि० ब्याहता] १. देश, काल और जाति की रीति ते अनुसार पुरुष का किसी स्त्री को अपनी पत्नी या स्त्री का किसी पुरुष को अपना पति बनाना। उ०— ताल झाँझ भल बाजत आवेकहरा सब कोई नाचै हो। जेहि रँग दुलहा व्याहन आवै तेहि रँग दुलहिन राँचै हो।— कबीर (शब्द०)। संयो० क्रि०—लेना।— उ०— चैत्र मास पूनो कौ शुभ दिन शुभ नक्षत्र शुभ वार। ब्याहि लई हरि देवि रुक्मिणी बाढ़यो सुख जो अपार। —सूर (शब्द०)। २. किसी का किसी के साथ विवाह संबंध कर देना। जैसे,— उसने उसको अपनी लड़की व्याह दी। संयो० क्रि०— ड़ालना।—देना।

ब्याहुला
वि० [हिं० ब्यःह + उला (प्रत्य०)] विवाह संबंधी। विवाह का। वैवाहिक। जैसे, व्याहुले गीत।

ब्युहार ‡
संज्ञा पुं० [सं० व्यवहार] दे० 'व्यवहार'। उ०— औसे औसे, करत ब्युहारा, आयौ साहब का हलकारा। रामानंद०, पृ० २८।

ब्युँगा
संज्ञा पुं० [देश०] लकड़ी का एक औजार जिससे चमार चमड़े क्रो रगड़ा देकर सुलझाते है। यह रापी के आकार का होचा है, पर इसका अगला भाग अधिक चौड़ा होता है।

ब्योंच
संज्ञा स्त्री० [सं० विवतै ? या विमोच] नस आदि का अपने स्थान से हटाना। मोच। मुरकी।

ब्योंचना
क्रि० अ० [सं० बिकुञ्चन, प्रा०, बिउंचन] १. हाथ, पैर, उँगली, गरदन आदि किसी अंग के एकबारगी झोके के साथ मुड़ जाने या टेढे़ हो जाने से नसों का स्थान से हट जाना जिसके कारण पीड़ा और सूजन होती है। मुरकना। जैसे, पैर ब्योंचना। २. किसी अंग का एकबारगी इधर उधर मुड़ जाना जिससे पीड़ा हो। संयो० क्रि०—जाना।

ब्योंची ‡
संज्ञा स्त्री० [हिं० व्योंचना] उल्टी। वमन। कै।

ब्योंत
संज्ञा स्त्री०, पुं० [सं० व्यवस्था् या व्यवर्तन अथवला देश०] १. व्यवस्था। हाल। मामला। माजरा। ब्योरा। विवरण। उ०— छबै छिगुनी पहुँची गिलत अति दीनता दिखाय। बलि बामन को ब्योंत सुनि को बलि तुमहि पत्य़ाय़। —बिहारी (शब्द०)। २. कोई काम करने का ढंग। ढब। विधि। बिधान। तरौका। साधनप्रणाली। ३. युक्ति। उपाय। उ०— ए दई ऐसो कछु करु ध्य़ोंत जु देखे अदेखिन के द्दग दरगै। —पद्माकर (शब्द०)। ४. आयोजन। भूमिका। उपक्रम। किसी काम को करने की तैयारी। जैसे,— वह ऊपर चड़ने की ब्योंत कर रहा है। मुहा०— ब्योंत बाँधना = आयोजन करना। ब्योंत बताना = उपाय बताना। युक्ति य़ा तरीका बताना। उ०— मारिए कागही मोहि पै लै सिर मेरे ही केतिकौ ब्य़ोंत बतावत।— बैनी (शब्द०)। ५. संयोग। अवसर। नौबत। उ०— साहि रह्मो जकि सिवराज रह्मो तकि, और चाहि रह्नो चकि बने ब्योंत अनबन के।— भूषण (शब्द०)।६. प्रबंध। इंतजाम। व्यवस्था। डो़ल। जैसे—तुमने अपनी व्योंत तो कर ली; और किसी को चाहे मिले या न मिले। क्रि० प्र०— करना।—बैटाना। मुहा०— ब्योंत खाना = ठीक इंतजाम बैठना। व्यवस्था अनुकूल पड़ना। ब्य़ोंत फैलना =दे० 'व्योंत खाना'। ७. प्राप्त सामग्री से कार्य के साधन की व्यवस्था। काम पूरा उतारने का हिसाब किताब। जैसे,— कपड़ा तो कम है, पूरे की व्योंत कैसे करें? मुहा०— ब्य़ोंत खाना =पूरा हिसाब किताब बैठाना। ब्योंत फैलना =दे० 'व्योत खाना'। ८. साधन या सामग्री की सीमा। समाई। जैसे, —जहाँ तक ब्य़ोंत होगा, वहीं तक न खर्च करेंगे। ९. पहनाव बनाने के लिये कपड़े की काठ छाँट। तराश। किता। यौ०—कतरब्योंत।

ब्य़ोँतना
क्रि० सं० [हिं० ब्योंत] १. कोई पहनावा बनाने के लिये कपड़े को नापकर काटना छाटना। नाम से कतरना। उ०—(क) मोटा एक थान आय़ो राख्यों है बिछाइ के। लावो बेगि यहि क्षण मन की प्रवीन जानी, लायो दुख आनि ब्य़ोंति लई है सियाइ के —प्रिय़ा (शब्द०)। (ख) कह्यो न पछारयो। सूर स्वामी अति रिस भीम कि भुजा कै मिस ब्योंतत बसन जिमि तन फारयो।— सुर०, १०। ४२१७। (ग) दरजी किते तिते धन गरजी। ब्योंतहि पटु पट जिमि नृप मरजी —गोपाल (शब्द०)। (२) मारना। काटना। मार ड़ालना। (बाजारी)।

ब्योँताना
क्रि० सं० [हिं० ब्योंतना का प्रेरणा०] दरजी से नाप के अनुसार कपड़ा कटाना।

ब्योपार
संज्ञा पुं० [सं० व्यापार] दे० 'व्यापार'।

ब्योपारी
संज्ञा पुं० [सं० ब्यापारिन्] दे० 'व्यापारी'।

व्य़ोरना
क्रि० सं० [सं० विवरण] १. गुथे या उलझे हुए बालों को अलग अलग करना। उ०— वेई कर ब्योरहि कहै ब्योंरो कर बिचार। जिनही। उरझो मों हियों तिनही सुरझे वार। —बिहारी (शब्द०)। २. सूत या तागे के रूप की उलझी हुई वस्तुओं के तार तार अलग अलग करना।

व्योरनि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० ब्योंरा] दे० 'ब्यौरनि'।

ब्योरा
संज्ञा पुं० [सं० विवरण हिं० ब्य़ोरना] १. किसी घटना के अंतर्गत एक एक बात का उल्लेख या कथन। विवरण। तफसील। उं— एक लकड़े ने पेड़ गिरने का ब्योरा ज्य़ों त्यों कहा।— लल्लु (शब्द०)। य़ौ०—ब्योरेवार = एक एक बात के उल्लेख के साथ। सविस्तर। विस्तार के साथ। २. किसी विषय का अंग प्रत्यंग। किसी एक विषय के भीतर की सारी बात। किसी बात को पूरा करनेवाला एक एकखंड़। जैसे,—(क) सब १०० रूपया खर्च हुआ जिसका व्योरा नीचे लिखा है। (ख) उसके स्वरुप में इस प्रकार तल्लीन हीना पड़ता है। एक एक ब्योरे पर ध्य़ान जाय। —रस०, पृ० १२०। यौ०— ब्यौरेवार। ३. वृत्त। वृत्तांत। हाल। समाचार। उ०— उसने वहाँ का सब ब्योरा कह सुनाय़ा। —लल्लू (शब्द०)।

ब्य़ोसाय
संज्ञा पुं० [सं० व्यवसाय] दे० 'व्यवसाय'।

ब्य़ोहर
संज्ञा पुं० [सं० ब्यवहार] लेन देन का व्यापार। रूपया ऋण देना। उ०—ऋण में निपुण व्याज लेने में निपुण, भए ब्योहार निपुण, स्वर्ग कौड़ो की कमाई है।— रघुराज (शब्द०)। मुहा०— ब्योहर चलाना =सूद पर रुपया देना। महाजनी करना।

ब्योहरा
संज्ञा पुं० [हिं० ब्योहार] सूद पर रूपय़ा देनेवाला। हुड़ी चलानेवाला।

ब्य़ोहरिया
संज्ञा पुं० [सं० व्यवहार] सूद पर रूपए के लेन देन का व्यापार करनेवाला। महाजनी करनेवाला। उ०— जेहि ब्योहरिया कर व्यौहारु। का लेइ देब जो छेकिहि बारु।— जायसी ग्रं०, पृ० २०।

ब्योहार
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'व्यवहार'। उ०— यह उरले ब्योहार दूर दुरमति धरो। —कबीर श०, भा० ४, पृ० १।

ब्योहारी
वि० संज्ञा पुं० [हिं० ब्योहार] दे० 'ब्योहारा', ब्योहरिया'। उ०— काग़द लिखै सो कागदी, की ब्योहारी जीब।— कबीर सा० सं० पृ० ८५।

ब्यौँत
संज्ञा स्त्री० पु० [सं० व्यवस्था] दे० 'ब्योंत'।

ब्योँतना
क्रि० सं० [हिं० ब्यौंत] दे० 'ब्योतना'। उ०— ज्य़ों कपरा दरजी गही ब्योंतत काष्टहि कौ बढ़ई कसि आनै।— सुंदर ग्रं०, भा०, २. पृ० ३८६।

ब्यौछार †
संज्ञा स्त्री० [हिं० बौछार] दे० 'बौछार'। उ०— चहुँ दिसि टपकन लागी बूँदै। ब्यौछारन बिजंब भीजैगो, द्वार पिछोरी मूँदै। —नंद० ग्रं०, पृ० ३६०।

व्यौपार †
संज्ञा पुं० [हिं० ब्य़ोपार] दे० 'ब्यापार'। उ०— और जो कोई बैष्णव चाकरी न करतो ता को अपनी गोंठि तें द्रब्य दै के व्यौपार करावतेँ।— दो सौ बवन०, भा०, १. पृ० २३५।

ब्य़ौरन, ब्यौरनि पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० विवरण, हिं० ब्यारा,] ब्यौरा बाँलों के सँवारने को क्रिया या ढग। बाल सँवारने की रीती। उ०— वेऊ कर, व्यौरनि वहै व्यौरी कौन बिचार। जिनहीं उरभयौ मौ हियौ तिनही सुरझ बार।— बिहारी र०, दो०, ४३६।

ब्यौरा †
संज्ञा पुं० [हिं० ब्यौरा] विवरण। लेखा जोखा। हिसाब। उ०— पाप पुन्य का व्योरा माँगै। कागद निकसे तेरे। आगै।— सुंदर ग्रं०, भा०, १, पृ० ३३५।

ब्यौहर
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'ब्योहार'।

ब्यौहरिया
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'ब्योहरिय़ा'। उ०— अब आनिय ब्यौहरिया बाली। तुरत देऊँ मै थैली खोली।—तूलसी (शब्द०)।

ब्यौहार
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'ब्योहार'। उ०— जेहि व्यौहरिया कर ब्यौहारु। का लेह देब जो छेकहि बारु।— जायसी (शब्द०)।

ब्यौहारी †
संज्ञा पुं० [हिं० ब्य़ोहारी] दे० 'व्योहरिया' उ०— ये तो गुरू जगत ब्यौहारी। इनसे मुक्ति न होइ बिचारी।— घट०, पृ० २५२।

ब्रंद पु
संज्ञा पुं० [सं० वृन्द] वृंद। समूह। ब०— बने ब्रंद पथ्र्थ, पथे पथ्थ हथ्यं।— पृ० रा०, २। ४४१।

ब्रंदावन †
संज्ञा पुं० [सं० वृन्दावन] दे० 'वृंदावन'। उ०— ब्रदावन बैसाख पर, सोहे जान ससोह।—रा० रू०, पृ० ३४७।

व्रज
संज्ञा पुं० [सं० ब्रज] दे० 'व्रज'। यौ०— ब्रजनाथ। ब्रजभाषा। ब्रदमंड़ल। ब्रजराज। ब्रजलाला= दे० 'व्रज' शब्द० के क्रम में।

ब्रजगाम पु
संज्ञा पुं० [सं० व्रज + ग्राम] ब्रज। उ०— बैर कियो सिगरे ब्रजगम सौ, जाके लिये कुलकानि गँवाई।— मति०, ग्रं० पृ० ३००।

ब्रजधीस पु †
संज्ञा पुं० [सं० व्रज + अधीश] ब्रज के राजा। ब्रजराज। उ०— जौ कछु लघुता करत हौ सौ असीम है ईस। फिरि यह मों पायन परन अति अनुचित ब्रजधीस।— मोहन०, पृ० ५९।

ब्रजना पु
क्रि० अं० [सं० ब्रजन] जाना। चलना। गमन करना। उ०—(क) ब्रजति ब्रजेस के निवेस 'भुवनेस' बेस, चक्षुकृत चकृत बिवकृत भृकुटि बंक।—भुवनेश (शब्द०)। (ख) अब न ब्रजहु ब्रज में ब्रज प्यारे।— रघुराज (शब्द०)। (ग) षोड़स, कला कृष्ण सुखसारा। द्बादश कला राम अवतारा। षोड़स तजि द्बादश कम भजहु। समाधान करू नहि घर ब्रजहू।— रघुराज (शब्द०)।

ब्रजबादनी
संज्ञा स्त्री० [सं० ब्रज + बादनी?] एक प्रकार का आम जिसका पेड़ लता के रूप का होता है। इसे राजवल्ली भी कहते हैँ।

ब्रजबासी
वि०, संज्ञा पुं० [सं० ब्रज + वासिन्] [स्त्री० व्रज- वासिनी] ब्रज ग्राम का निवासी। उ०— ऐसे कहिके वा ब्रजवासिनी ने श्रीगोबर्धननाथ जी को सुदध भाव सो बाहोत ही प्रार्थना करिकै दंड़वत करि कहीं। —दो सौ बावन०, भा०, २. पृ० ३।

ब्रजबूली ‡
संज्ञा स्त्री० [सं० ब्रज + बंग० बुलि (=बोली, भाषा,)]ब्रज की बोली। उ— यह इसी से जाना जा सकता है कि वहाँ ब्रजवूली का अलग साहित्य ही बन गया हे।— पोद्दार० अभि०, ग्रं०, पृ० ८७।

ब्रध्न
संज्ञा पुं० [स०] १. सूर्य। २. वृक्षमूल। ३. अर्क। आक का पोधा। ४. शिव। ५. दिन। ६. घोड़ा। ७. मार्कड़ेय पुराण के अनुसार चौदहवे मनु मौत्य के पुत्र का नाम। ८. एक रोग। ९. ब्रह्मा (को०)। १०. सीसा धातु (को०) ११. तीर या वाण नुकीला अगला हिस्सा (को०)।

ब्रन्न पु †
संज्ञा पुं० [सं० वर्णा, प्रा०, बन्न] दे० 'बर्ण'। उ०— बिय ब्रन्न उप्पम देखि। कंचन कसौटिय रेखि। —पृ० रा०, २। ३१०।

ब्रन्नना पु †
क्रि० सं० [सं० बर्णन? प्रा० ब्रन्नन] वर्णन करना। बरनना। उ०— (क) कान धरौ रसना सरस ब्रन्नि दिखाऊँ तोहि।— पृ० रा०, १। ७८३। (ख) तिन कहों नाम परिमान ब्रन्न। जिन सुनत सुदध भव होत तन्न।—पृ० रा०, १।३१।

ब्रम्मा ‡
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्मत, प्रा० बंभ बम्ह] दे० 'ब्रह्मा'। उ० —बैरांगर हीरा हुए कुलवंतिया सपूत। सीपै मोती निपजै सब ब्रम्मा रा सूर। —बाँकी ग्रं भा०, २, पृ० ६९।

ब्रष पु
संज्ञा पुं० [सं० वर्ष, प्रा० ब्रष्प] वर्ष। बरिष। उ०— घरी दीह पल पष्प मास लष्षिय ब्रष तासह। पृ० रा०, १।७१७।

ब्रहम पु
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्म] १. ईश्वर। परमात्मा। उ० —ज दिन जनम प्रथिराज भौ त दिन भार धर उत्तरिय। बतरिय अंस अंसन ब्रहम रही जुर्गे जुग बत्तरिय। पृ० रा०, १। ६८८। २. द्बिज। ब्राह्मण। उ०—जग लोकवांण सीखै जवन, पढ़ै ब्रहम मुख पारसी। हित देव सेव आघा हुआ, काई लग्गाँ आरसी। —रा०, रु०, पृ० २२।

ब्रह्मंड़
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्माणड़, प्रा०, ब्रम्हंड़] दे० 'ब्रह्माड़'। उ०— धनुभंग को शब्द गयो भेदि ब्रह्मंड़ को। —केशव (शब्द०)।

ब्रह्म
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्मन्] १. एक मात्र नित्य चेतन सता जो जगत् का कारण हे। सत्, चित्, आनंद स्वरुप तत्व जिसके अतिरिक्त और जो कुछ प्रतीत होता है, सब असत्य़ और मिथ्या है। विशेष— ब्रह्मा जगत् का कारण है, यह ब्रह्म का तटस्थ लक्षण है। ब्रह्म सच्चिदानंद अंखंड़ नित्य निर्गुण अद्बितीय इत्यादि है। यह उसका स्वरुपलक्षण है। जगन् का कारण होने पर भी जैसी कि सांख्य़ की प्रकृति या बैशिषिक ता परमाणु है, उस प्रकार ब्रह्म परिणामी या आरंभक नहीं। वह जगत् का अभिन्न निमित्तोपादान-विवात कराण है, जैस, मकड़ी, जो जाले का निमित्त और उपादान दोनों कहीं जा सकती है। सारंश यह कि जगत् ब्रह्म का परिणाम या विकार नहीं है,। किसी वस्तु का कुछ और हो जाना विकार या परिणाम है। उसका और कुछ प्रतीत होना विवर्त है। जैसे, दूध का दही हो जाना विकार है, रस्सी का साँप प्रतीत होना विवर्त है। यह जगत् ब्रह्म का विवर्त है, अतः मिथ्या या भ्रम रुप है। ब्रह्मा के अतिरिक्त और कुछ सत्य नहीं है। और जो कुछ दिखाई पड़ता है, उसकी पारिमार्थिक सत्ता नहीं है। चैतन्य आत्मवस्तु के अतिरिक्त और किसी वस्तु की सत्ता न स्वागत भेद के रुप में, न सजानीय भेद के रूप में औऱ न विजातीय भेद के रूप में सिद्ध हो सकती है। अतः शुद्ध अद्वैत द्दष्टि में जीवात्मा ब्रह्म का अंश (स्वगत भेद) नहीं है, अपने को परिच्छन्न और मायाविशिष्ट समझना हुआ ब्रह्म ही है। सत् पदार्थ केवल एक ही हो सकता है। दो सत् पदार्थ मानने से दोनों को देश या काल से परिच्छन्न मानना पड़ेगा। नाम और रुप की उत्पत्ति का नाम ही सृष्टि है। नाम और रुप ब्रह्म के अवयव नहीं, क्योंकि वह तीनों प्रकार के भेदों से रहित है। अतः अद्वैत ज्ञान ही सत्य ज्ञान है। द्वैत या नानात्व ज्ञान अज्ञान है, भ्रम है। 'ब्रह्य' का सम्यक् निरुपण करनेवाले आदिग्रंथ उपनिषद् है। उनमें 'नेति' नेति' (यह नहीं, यह नहीं) कहकर ब्रह्य प्रपंचों से परे कहा गया है। 'तत्वमसि' इस वाक्य द्वारा आत्मा और ब्रह्म का अभेद व्यंजित किया गया है। ब्रह्मसंबंधी इस ज्ञान का प्राचीन नाम ब्रह्मविद्या है, जिसका उपदेश उपनिषदों में स्थान स्थान पर है। पीछे ब्रह्मतत्व का व्यवस्थित रुप में प्रतिपादन व्यास द्वारा ब्रह्मसूत्र में हुआ,जो वेदांत दर्शन का आधार हुआ। दे० 'वेदांत'। २. ईश्वर। परमात्मा। ३. आत्मा। चैतन्य। जैसे,—जैसा तुम्हारा ब्रह्म कहे, वैसा करो। ४. ब्राह्मण (विशेषतः समस्तपदों में प्राप्त)। जैसे ब्रह्मद्रोही, ब्रह्माहत्या। उ०— चल न ब्रह्मकुल सन बरिआई। सत्य कहौं दोउ भुजा उठाई।—तुलसी (शब्द०)। ५. ब्रह्मा (अधिकतर समास में)। जैसे, ब्रह्मसुता, ब्रह्मकन्यका। उ०—(क) मोर बचन सबके मनमाना। साधु साधु करि ब्रह्म बखाना।—मानस, १।१८५। (ख) ब्रह्म रचै पुरुषोतम पोसत संकर सृष्टि सँहरान हारे।— भुषण ग्रं०, पृ० ५१। ६. ब्राह्मण जो मरकर प्रेत हुआ हो। ब्राह्मण भुत। ब्रह्मराक्षस। मुहा०—ब्रह्म लगना =किसी के ऊपर ब्राह्मण प्रेत का अधिकार होना। उ०—तासु सुता रहि सुछबि विशाला। ताहि लग्यो इक ब्रह्य कराला।—रघुराज (शब्द०)। ७. वैद। ८. एक की संख्या। ९. फलित ज्योतिष में २७ योगों में से पचीसवाँ योग जो सब कार्यों के लिये शुभ कहा गया है। १०. संगीत में ताल के चार भेदों में से पक (को०)। १२. ब्राह्मणत्व (को०)। १३. प्रणव। ओंकर (को०)। १४. सत्य (को०)। १५. धन (को०)। १६. भोजन (को०)।

ब्रहाकन्यका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १.ब्रह्मा की कन्या, सरस्वती। २. भारंगी नाम की बुटी जो दवा के काम में आती है। ब्राह्मी बुटी।

ब्रह्यकन्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'ब्रह्मकन्यका'।

ब्रह्मकर्म
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्मकर्मन्] १. वेदविहित कर्म। २. ब्राह्मण का कर्म।

ब्रह्मकला
संज्ञा स्त्री० [सं०] दाक्षायनी।

ब्रह्मकल्प
संज्ञा पुं० [सं०] १. ब्रह्मा के तुल्य। २. उतना समय जितने में एक ब्रह्मा रहते हैं।

ब्रह्मकांड
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्माकाण्ड] वेद का वह भाग जिसमें ब्रह्म की मीमांसा की गीहै और जो कर्मकांड से भिन्न है। ज्ञानकांड। अध्यात्म।

ब्रह्मकाय
संज्ञा पुं० [सं०] एक विशेष जाति के देवता।

ब्रह्मकाष्ठ
संज्ञा पुं० [सं०] तुत का पेड़। शहतुत।

ब्रह्मकुशा
संज्ञा स्त्री० [सं०] अजमोदा।

ब्रह्मकूट
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक पर्वत का नाम। २. ब्रह्म का ज्ञाता, ब्राह्मण [को०]।

ब्रह्मकूर्च
संज्ञा पुं० [सं०] रजस्वला के स्पर्श या इसी प्रकार की और अशुद्धि दूर करने के लिये एक व्रत जिसमें एक दिन निराहार रहकर दुसरे दिन पंचगव्य पिया जाता है।

ब्रह्मकृत्
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो प्रार्थना करता है। २. विष्णु [को०]।

ब्रह्मकोश
संज्ञा पुं० [सं०] वेद [को०]।

ब्रह्मकोशी
संज्ञा स्त्री० [सं०] अजमोदा।

ब्रह्मक्षत्र
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु पुराण के अनुसार ब्राह्मण और क्षत्रिय से उत्पन्न एक जाति।

ब्रह्मगति
संज्ञा स्त्री० [सं०] मुक्ति। नजात।

ब्रह्मगाँठ
संज्ञा स्त्री० [सं० ब्रह्मग्रन्थि] जनेऊ की गाँठ।

ब्रह्मगायत्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह गायत्री मंत्र जो ब्रह्मा से संबद्ध है और जो गायत्री मंत्र के आधार पर रचित है [को०]।

ब्रह्मगिरि
संज्ञा पुं० [सं०] एक पर्वत का नाम। इसे ब्रह्मकूट भी कहते हैं।

ब्रह्मगीता
संज्ञा स्त्री० [सं०] ब्रह्मा का उपदेश जो इस नाम से महाभारत के अनुशासन पर्व में संकलित है।

ब्रह्मगुप्त
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रख्यात ज्योतिर्विद् जो ईसा की छठी शती (ई० ५९८) में हुए थे [को०]।

ब्रह्मगोल
संज्ञा पुं० [सं०] ब्रह्मांड।

ब्रह्मग्रंथि
संज्ञा स्त्री० [सं० ब्रह्माग्रन्थि] यज्ञोपवीत या जनेऊ की मुख्य गाँठ।

ब्रह्मग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] ब्रह्माराक्षस।

ब्रह्मघातक
संज्ञा पुं० [सं०] ब्राह्मण की हत्या करनेवाला।

ब्रह्मघातिनी
वि० स्त्री० [सं० ब्रह्मघातिन्] १. ब्राह्मण को मारनेवाली।२. रजस्वला होने के दूसरे दिन की संज्ञा (छत के विचार से)।

ब्रह्मघाती
वि० [सं० ब्रह्मघातिन्] [स्त्री० ब्रह्मघातिनी] ब्राह्मण का मार डालनेवाला। ब्रह्महत्या करनेवाला।

ब्रह्मघोप
संज्ञा पुं० [सं०] १. वेदध्वनि। २. वेदपाठ। उ०— भांति भाँति कहौं कहाँ लगि बाटिका बहुधा भली। ब्रह्मघोष घने तहाँ जनु है गिरा बन की थली।—(शब्द०)।

ब्रह्मघ्न
वि० [सं०] दे० 'ब्रह्मघाती' [को०]।

ब्रह्मचक्र
संज्ञा पुं० [सं०] संसारचक्र। (उपनिषद्)।

ब्रह्मचर
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्म (=ब्राह्मण) + चर (=भोजन)] वह माफी जमीन जो ब्राह्मण को पूजा आदि करने में दी जाय।

ब्रह्मचरज पु
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्मचर्य] दे० 'ब्रह्मचर्य'। उ०—ब्रह्म- चरज ब्रत रत मतिधीरा। तुम्हहि कि करइ मनोभव पीरा।—मानस, १।१२९।

ब्रह्मचर्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. योग में एक प्रकार का यम। वीर्य को रक्षित रखने का प्रतिबंध। मैथुन से बचने की साधना। विशेष—शुक्र धातु को विचलित न होने देने से मन और बुद्धि की शक्ति बहुत बढ़ती है और चित्त की चंचलता नष्ट होती है। २. चार आश्रमों में पहला आश्रम। आयु या जीवन के कर्तव्या- नुसार चार विभागो में सं प्रथम विभाग जिसमें पुरुष को स्त्री संभोग आदि व्यसनों से दूर रहकर अध्ययन में लगा रहना चाहिए। विशेष—प्राचीन काल में उपनयन संस्कार के उपरांत बालक इस आश्रम में प्रवेश करता था और आचार्य के यहाँ रहकर वेदशास्त्र का अध्ययन करता था। ब्रह्मचारी के लिये मद्य- मांस-ग्रहण गंधद्रव्य सेवन, स्वादिष्ट और मधुर वस्तुओं का खाना, स्त्रीप्रसंग करना, नृत्यगीतादि देखना सुनना, सारांश यह कि सब प्रकार के व्यसन निषिद्ध थे। उसे अच्छे गृहस्थ के यहाँ से भिक्षा लेना आचार्य के लिये आवश्यक वस्तुओं को जुटाना पड़ता था। भिक्षा माँगने में गुरु का कुल, अपना कुल और नाना का कुल बचाना पड़ता था। पर यदि भिक्षा योग्य कोई गृहस्थ न मिलता तो वह नाना- मामा के कुल से माँगना आरंभ कर सकता था। नित्य समिधकाष्ठ वन से लाकर प्रातः सायं होम करना होता था। यह होम यदि छुट जाता तो अवकीर्णी प्रायश्चित्त करना पड़ता था। ब्राह्मण ब्रह्मचारी के लिये एकांतभोजन आवश्यक होता था, पर क्षत्रिय और वैश्य ब्रह्मचारी के लिये नहीं। ब्रह्मचारी के लिये भिक्षा के समाय आदि को छोड़ सदा आचार्य के सामने रहना कर्तव्य था। आचार्य न हों तो आचार्य पुत्र के पास वह भी न हो तो अग्निहोत्र की अग्नि के पास रहना होता था। ब्रह्मचर्य दो प्रकार का कहा गया है—एक उपकुर्वाण जो गृहस्था- श्रम में प्रवेश करने के पूर्व सब द्विजों का कर्तव्य है, दुसरा नैष्ठिक जो आजीवन रहता है।

ब्रह्मचारिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. ब्रह्मचर्य व्रत धारण करनेवाली स्त्री। २. दुर्गा। पार्वती। गौरी।३. सरस्वती। ४. भारंगी बुटी।

ब्रह्मचारी
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्मचारिन्] [स्त्री० ब्रह्मचारिणी] १. ब्रह्मचर्य व्रत धारण करनेवाला। २. ब्रह्मचर्य आश्रम के अंतर्गत व्यक्ति। स्त्रीसंसर्ग आदि व्यसनों से दुर रहकर पहले आश्रम में विद्याध्ययन करनेवाला पुरुष। प्रथमाश्रमी।

ब्रह्मज
संज्ञा पुं० [सं०] १. हिरणगर्भ। २. ब्रह्मा। ३. ब्रह्म से उत्पन्न जगत्।

ब्रह्मजटा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दौने रा पौधा। दमनक।

ब्रह्मजटी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'ब्रह्मजटा'।

ब्रह्मजन्म
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्मजन्मन्] उपनयन संस्कार।

ब्रह्मजार
संज्ञा पुं० [सं०] १. ब्राह्मणी का उपपति। २. इंद्र।

ब्रह्मजिज्ञासा
संज्ञा स्त्री० [सं०] ब्रह्म को जानने की उत्कट इच्छा। ब्रह्मज्ञान के निमित्त तत्वमीमांसा विषयक प्रश्न [को०]।

ब्रह्मजीवो
वि० [सं० ब्रह्मजीविन्] श्रौत आदि कर्म कराकर जीविका चलानेवाला।

ब्रह्मज्ञ
वि० [सं०] ब्रह्म को जाननेवाला। वेदांत का तत्व समझनेवाला। ज्ञानी।

ब्रह्मज्ञान
संज्ञा पुं० [सं०] ब्रह्म का बोध। पारमार्थिक सत्ता का बोध। द्दश्य जगत् के मिथ्यात्व का निश्चय और एकमात्र शुद्ध निर्गुण चैतन्य की जानकरी। अद्वैत सिद्धांत का बोध। उ०—ब्रह्मज्ञान बिनु नारि नर कहहिं न दुसरि बात।— मानस, ७।९९।

ब्रह्मज्ञानी
वि० [सं० ब्रह्मज्ञानिन्] परमार्थ तत्व का बोध रखनेवाला। अद्वैतवादी।

ब्रह्मण्य (१)
वि० [सं०] १. ब्राह्मणनिष्ठ। ब्राह्मणों पर श्रद्धा रखनेवाला। २. ब्रह्म या ब्रह्मा संबंधी।

ब्रह्मण्य (२)
संज्ञा पुं० १. तुत का पेड़। शहतुत। २. वेद में पूणतः निष्णान व्यक्ति (को०)। ३. ताल वृक्ष (को०)। ४. मुँज नामक घास (को०)। ५. शनि (को०)। ६. विष्णु (को०)। ७. कार्तिकेय (को०)।

ब्रह्मण्यता
संज्ञा स्त्री० [सं०] ब्रह्मण्य होने का भाव या क्रिया। उ०—तुम्हारे ब्रत की तथा ब्रह्मण्यता की सचाई देखी।— भक्तमाल०, पृ० ५००।

ब्रह्मण्यदेव
संज्ञा पुं० [सं०] १. विष्णु। नारायण।२. वह जो ब्राह्मण का देवता के सद्दश समादर करता हो। उ०—प्रभु ब्रह्मण्यदेव मैं जाना। मोहि हित पिता तजे भगवाना।—तुलसी (शब्द०)।

ब्रह्मण्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] दुर्गा का एक नाम [को०]।

ब्रह्मता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'ब्रह्मस्व'।

ब्रह्मताल
संज्ञा पुं० [सं०] १४ मात्राओं का ताल। इसमें १० आघात और ४ खाली रहते है।

ब्रह्मतीर्थ
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत में वर्णित नर्मदा के तट पर एक प्राचीन तीर्थ।

ब्रह्मतेज
संज्ञा पुं० [सं०] १. ब्रह्म का प्रकाश या ज्योति। २. ब्रह्मचर्य, ब्रह्मज्ञान या ब्राह्मण का तेज [को०]।

ब्रह्मत्व
संज्ञा पुं० [सं०] १. शुद्ध ब्रह्म भाव। २. ब्राह्मणत्व। ३. ब्रह्मा नामक ऋत्विक् होने का भाव या धर्म।

ब्रह्मदंड
संज्ञा पुं० [ब्रह्मदण्ड] १. ब्राह्मण ब्रह्मचारी का डंडा। २. तीन शिखावाला केतु। ३. ब्राह्मण का शाप। ४. ब्रह्मास्त्र (को०)। ५. शिव (को०)। ६. ब्रह्मअष्टि। भारंगी (को०)। ७. अभिचार (को०)।

ब्रह्मदंडी
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक जड़ी जो जंगलों में प्रायः पाई जाती है। इसकी पत्तियों और फलों पर काँटे होते हैं। वैद्यक में इसे गरम और कड़वी तथा कफ और दातनाशक माना गया है। पर्या०—अजदंती। कटपत्रफला।

ब्रह्मदर्भा
संज्ञा स्त्री० [सं०] अजवाइन।

ब्रह्मदाता
संज्ञा स्त्री० [सं० ब्रह्मादातृ] वेद पढ़ानेवाला आचार्य।

ब्रह्मदान
संज्ञा पुं० [सं०] वेदविद्या देना। वेद पढ़ाना।

ब्रह्मदाय
संज्ञा पुं० [सं०] १. वेद का वह भाग जिसमें ब्रह्म का निरुपण है। २. ब्राह्मण की अधिकारगत भूमि या धन।

ब्रह्मदारु
संज्ञा पुं० [सं०] तुत का पेड़। शहतुत।

ब्रह्मदिन
संज्ञा पुं० [सं०] ब्रह्मा का एक दिन जो १०० चतुंयुं गियों का माना जाता है।

ब्रह्मदूषक
वि० [सं०] १. वेदनिंदक। नास्तिक। २. ब्रह्म या ब्राह्मणों की निंदा करनेवाला [को०]।

ब्रह्मदेय
संज्ञा पुं० [सं०] ब्राह्मणों को दान में दी हुई वस्तु। (शिलालेख)।

ब्रह्मदेया
वि० स्त्री० [सं०] ब्रह्मविवाह में दी जानेवाली (कन्या)। ब्राह्मविवाह विधि द्वारा दी जानेवाली (पुत्री)।

ब्रह्मादैत्य
संज्ञा पुं० [सं०] वह ब्राह्मण जो प्रेत हो गया हो। ब्रह्म राक्षस।

ब्रह्मदोष
संज्ञातपुं० [सं०] ब्राह्मण को मारने का दोष। ब्रह्महत्या का बुरा प्रभाव। जैसे,—इस कुल में ब्रह्मदोष है।

ब्रह्मदोषी
वि० [सं०] वह जिसे ब्रह्महत्या लगी हो।

ब्रह्मद्रव
संज्ञा पुं० [सं०] गंगाजल। उ०—कै बसुधा पै सुधादार ब्रह्माद्रव द्रौनी।—का० सुषमा, पृ० ६।

ब्रह्मद्रुम
संज्ञा पुं० [सं०] पलास। टेसु।

ब्रह्मद्रोही
वि० [सं० ब्रह्मद्रोहिन्] ब्राह्मणों से वैर रखनेवाला।

ब्रह्मद्वार
संज्ञा पुं० [सं०] खोपड़ी के बीच माना हुआ वह छेद जिससे योगियों के प्राण निकलते हैं। ब्रह्मारंध्र। ब्रह्माछिद्र। उ०—(क) षटदल अष्ट दादस दल निर्मल अजपा जाप जपाली। त्रिकुटी संगम ब्रह्माद्वार भिदि यों मिलिहैं बनमाली।—सूर (शब्द०)। (ख) ब्रह्मद्वार फिरि फोरिकै निकसे गोकुल राय।—सूर (शब्द०)।

ब्रह्मद्वेप
संज्ञा पुं० [सं०] वेद अथवा ब्राह्मण के प्रति द्रोहृ या निंदा भाव [को०]।

ब्रह्मद्वेषी
वि० [सं० ब्रह्माद्वेषिन्] दे० 'ब्रह्मदूषक'।

ब्रह्मधर
वि० [सं०] १. ब्रह्मज्ञ। २. वेद का ज्ञाता [को०]।

ब्रह्मनदी
संज्ञा स्त्री० [सं०] सरस्वती नदी का एक नाम [को०]।

ब्रह्मनाभ
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु।

ब्रह्मनिर्वाण
संज्ञा पुं० [सं०] १. कैवल्य। मोक्ष। २. दे० 'ब्रह्मा- नद' [को०]।

ब्रह्मनिष्ठ
१) वि० [सं०] १. ब्राह्मणभक्त। २. ब्रह्मज्ञानसंपन्न।

ब्रह्मनिष्ठ (२)
संज्ञा पुं० पारिस पीपल। शहतुत।

ब्रह्मनीड
संज्ञा पुं० [सं०] ब्राह्मण का निवासस्थान [को०]।

ब्रह्मपत्र
संज्ञा पुं० [सं०] पलास का पत्ता।

ब्रह्मपद
संज्ञा पुं० [सं०] १. ब्रह्मत्व। २. ब्राह्मणत्व। ३. मोक्ष। मुक्ति।

ब्रह्मपर
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो व्रह्मत्व को प्राप्त हो। ब्रह्मतत्व का ज्ञाता। उ०—जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान।—मानस, ७।४२।

ब्रह्मषरिषद्
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'ब्रह्मसभा'।

ब्रह्मपर्णी
संज्ञा स्त्री० [सं०] पिठवन नाम की लता।

ब्रह्मपवित्र
संज्ञा पुं० [सं०] कुश।

ब्रह्मपादप
संज्ञा पुं० [सं०] पलास का पेड़।

ब्रह्मपार
संज्ञा पुं० [सं०] ब्रह्मज्ञान का मूल तत्व या अंतिम लक्ष्य। [को०]। यौ०—ब्रह्मपारग = ब्रह्मतत्व को जाननेवाला। वेदपारग।

ब्रह्मपारायण
संज्ञा पुं० [सं०] १. समग्र वेदों का साद्यंत अध्ययन। २. संपूर्ण वेद [को०]।

ब्रह्मपाश
संज्ञा पुं० [सं०] ब्रह्मा का दिया हुआ पाश नामक अस्त्र। विशेष—पाश या फदे का प्रयोग प्राचीन काल में युद्ध में होता था।

ब्रह्मपिता
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्मपितृ] विष्णु का एक नाम [को०]।

ब्रह्मपुत्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. ब्रह्म का पुत्र। २. नारद। ३. वशिष्ठ। ४. मनु। ५. मरीचि। ६. सनकादिक।७. एक प्रकार का विष। विशेष—यह एक पौधे का कंद है जो मलयाचल पर होता है। इसका प्रयोग रसायन और बाजीकरण में होता है। ८. एक नद। ब्रह्मपुत्र नाम की प्रसिद्ध नदी। विशेष—यह मानसरोवर से निकलकर हिमालय के पूर्वीय प्रांत से भारतवर्ष में प्रवेश करता है और आसाम, बंगाल होता हुआ बंगाल की खाड़ी में गिरता है। इसका प्राचीन नाम 'लौहित्य' है। 'अमोघानंदन' नाम भी मिलता है।

ब्रह्मपुत्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक जहरीला पौधा। २. ब्रह्मपुत्र नद [को०]।

ब्रह्मपुत्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सरस्वती। वाक् की अधिष्ठात्री देवी। २. सरस्वती नदी। ३. बारही कद।

ब्रह्मपुर
संज्ञा पुं० [सं०] १. ब्रह्मलोक। २. ब्रह्म के अनुभव का स्थान। हृदय। ३. बृहत्संहिता के अनुसार इशान कोण में स्थित एक देश। ४. शरीर। देह (को०)।

ब्रह्मपुराण
संज्ञा पुं० [सं०] अठारह पुराणों में से एक। विशेष—पुराणों में इसका नाम पहले आने से कुछ लोग इसे आदि पुराण भी कहते हैं। मत्स्यादि पुराणों में इसके श्लोकों की संख्या दस हजार लिखी है। पर आजकल ७००० श्लोकों का ही यह पुराण मिलता है। जिस रुप में यह पुराण मिलता है, उस रुप में प्राचीन नहीं जान पड़ना। इसमें पुरुषोत्तम क्षेत्र का बहुत अधिक वर्णन हैं। जगन्नाथ जी और कोणादित्य के मंदिर आदि का ४० अध्यायों में वर्णन है। 'पूरुषोत्तम प्रासाद' से जगन्नाथ जी के विशाल मंदिर का अभिप्राय है जिसे गांगेय वंश के राजा चोडगंग ने वि० सं० ११३४ में बनवाया था। उत्तरखंड में मारवाड़ की बलजा नदी का माहोत्म्य है। कृष्ण की कथा भी आई है, पर अधिकतर वर्ण तीर्थों और उनके माहात्म्य का है।

ब्रह्मपुरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. ब्रह्मलोक। २. वारणसी नगरी [को०]।

ब्रह्मप्रलय
संज्ञा पुं० [सं०] सृष्टिचक्र का वह प्रलय या विनाश जो ब्रह्मा की १०० वर्ष की आयु की समाप्ति पर होता है [को०]।

ब्रह्मप्राप्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] ब्रह्मनिर्वाण। कैवल्य [को०]।

ब्रह्मफाँस
संज्ञा स्त्री० [सं० ब्रह्म + हिं० फाँस < सं० पाश] दे० 'ब्रह्मपाश'।

ब्रह्मबंधु
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्मबन्धु] १. वह ब्राह्मण जो अपने कर्म से हीन हो। पतित ब्राह्मण। २. वह जो केवल जाति से ब्राह्मण हो। जात्या ब्राह्मण।

ब्रह्मबल
संज्ञा पुं० [सं०] वह तेज या शक्ति जो ब्राह्मण को तप आदि के द्वार प्राप्त हो। ब्राह्मण की शक्ति।

ब्रह्मबान पु
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्म + वाण] दे० 'ब्रह्मस्त्र'—१। उ०—ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा।—मानस, ६।२०।

ब्रह्मबानी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० ब्रह्मवाणी] जगत् के कारणभूत नित्य चेतन सत्ता ईश्वर या परमात्मा की वाणी। वेदवाणी। उ०—गगन ब्रह्मबानी सुनि काना।—मानस, १। १८७।

ब्रह्मबिंदु
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्मबिन्दु] दे० 'ब्रह्मविंदु'।

ब्रह्मबिद्या
संज्ञा स्त्री० [सं० ब्रह्मविद्या] १. उपनिषद् विद्या। ब्रह्म- विद्या। २. आदिशक्ति। दुर्गा। उ०—सब सुभ लच्छन भरी, गुन नरी आनि ब्रह्मविद्या अवतरी।—नंद० ग्रं०, पृ० २२१।

ब्रह्मबीज
संज्ञा पुं० [सं०] १. 'ओं'। प्रणव। २. शहतुत का वृक्ष या फल [को०]।

ब्रह्मभट्ट
संज्ञा पुं० [सं०] १. वेदों का ज्ञाता। २. ब्रह्म या ईश्वर को जाननेवाला। ३. सृष्टि के आदि में ब्रह्मयज्ञ से उत्पन्न कवि नामक ऋषि की उपाधि। ४. एक प्रकार के ब्राह्मणों की उपाधि।

ब्रह्मभद्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] औषध में प्रयुक्त एक वनस्पति। त्राय- माणा लता [को०]।

ब्रह्मभाग
संज्ञा पुं० [सं०] १. शहतुत। २. यज्ञ में ब्रह्मा को मिलनेवाला अश या हिस्सा [को०]।

ब्रह्मभाव
संज्ञा पुं० [सं०] कैवल्य। मोक्ष [को०]।

ब्रह्मभूत
वि० [सं०] ब्रह्मलीन [को०]।

ब्रह्मभूति
संज्ञा स्त्री० [सं०] सायंकाल। संध्या [को०]।

ब्रह्मभूमिजा
संज्ञा पुं० [सं०] सिंहली।

ब्रह्मभूय
संज्ञा पुं० [सं०] १. ब्रह्मत्व। २. मोक्ष।

ब्रह्मभोज
संज्ञा पुं० [सं०] ब्राह्मणों को खिलाने का कर्म। ब्राह्मण- भोजन।

ब्रह्ममंडूकी
संज्ञा स्त्री० [सं० ब्रह्ममण्डूकी] १. मजीठ। २, मंडूक- पर्णी। ३. भारंगी।

ब्रह्ममति
संज्ञा पुं० [सं०] बौद्धों में एक प्रकार के उपदेवता जिनका वर्णन ललितविस्तर में आया है।

ब्रह्ममुहुरत पु
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्ममुहुर्त] दे० 'ब्रह्ममुहुर्त'। उ०— उ०—(क) ब्रह्ममुहुरत भयो सबेरो जागे दोऊ भाई।— सूर (शब्द०)। (ख) ब्रह्ममुहुरत जानि नरेशा। आयो निज यदुनाथ निवेशा।—रघुराज (शब्द०)।

ब्रह्ममुहुर्त
संज्ञा पुं० [सं०] बड़े तड़के का समय। सूर्योदय से ३-४ घड़ी पहले का समय।

ब्रह्ममूर्धमृत्
संज्ञा पुं० [सं०] शिव का एक नाम [को०]।

ब्रह्ममेखल
संज्ञा पुं० [सं०] मुंज तृण। मुँज।

ब्रह्ममेध्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] महाभारत में वर्णित एक नदी।

ब्रह्मयज्ञ
संज्ञा पुं० [सं०] १. विधिपूर्वक वेदाभ्यास। २. वेदाध्ययन। वेद पढ़ना।

ब्रह्मयष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] भारंगी। ब्रह्मनेटी।

ब्रह्मयाग
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'ब्रह्मयज्ञ'।

ब्रह्मयामल
संज्ञा पुं० [सं०] एक तंत्रग्रंथ।

ब्रह्मयोगि
संज्ञा पुं० [सं०] १८ मात्राओं का एक ताल जिसमें १२ आघात और ६ खाली होते हैं।

ब्रह्मयोनि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक तीर्थस्थान जो गया जी में है। २. ब्रह्म की प्राप्ति के लिये उसका ध्यान। ३. ब्रह्मनदी। सरस्वती (को०)।

ब्रह्मरंध्र
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्मरन्ध्र] मुर्धा का छेद। ब्रह्मांडद्वार। मस्तक के मध्य में माना हुआ गुप्त छेद जिससे होकर प्राण निकलने से ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। कहते हैं, योगियों के प्राण इसी रध्र से निकलते हैं। उ०—ब्रह्मरंध्र फोरि जीव यों मिल्यौ बिलोक जाइ। गेह चुरि ज्यो चकोर चंद्र में मिलै उड़ाई।—केशव (शब्द०)।

ब्रह्मराक्षस
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रेत योनि में गया हुआ ब्राह्मण। वह ब्राह्मण जो मरकर बूत हुआ हो। उ०—आजतक किसी भक्त महात्मा के सिर पर न कभी रामकृष्ण आए न ब्रह्म—हाँ, ब्रह्मराक्षस अलबत आते है। —चिंतामणि, भा०२, पृ० २०७। २. महादेव का एक गण।

ब्रह्मरात
संज्ञा पुं० [सं०] १. शुकदेव। २. याज्ञवल्क्य मुनि।

ब्रह्मरात्र
संज्ञा पुं० [सं०] रात के शेष चार दंड। ब्राह्ममुहुर्त।

ब्रह्मरात्रि
संज्ञा स्त्री० [सं०] ब्रह्मा की एक रात जो एक कल्प की होती है।

ब्रह्मराशि
संज्ञा पुं० [सं०] १. परशुराम का एक नाम। २. बृहस्पति से आक्रांत श्रवण नक्षत्र।

ब्रह्मरिन पु
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्मऋण] वह ऋण या कजं जो ब्रह्म या ब्राह्मण से संबंधित हो। उ०—सो अपने माथे ब्रह्मरिन होइगो।—दो सौ बावन० बा०१, पृ० २०२।

ब्रह्मरीति
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का पीतल।

ब्रह्मरूपक
संज्ञा पुं० [सं०] एक छद जिसके प्रत्येक चरण में गुरु, लघु, गुरु लघु के क्रम से १६ अक्षर होते हैं। इसे 'चंचला' और 'चित्र' भी कहते है। जैसे,—अत्र देइ सीख देइ राखी लेई प्राण जात। राज बाप मोल लै करै जु दिह पोषि गात। दास होय पुत्र होय, शिष्य होय कोइ माइ। शासना न मानई। तो कोटि जन्म नर्क जाइ।—केशव (शब्द०)।

ब्रह्मरूपिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] बंदा। बाँदा।

ब्रह्मरेख
संज्ञा स्त्री० [सं० ब्रह्मरेखा] भाग्य या अभाग्य का लेख जिसके विषय में कहा जाता है कि ब्रह्मा किसी जीव के गर्भ में आते ही उसके मस्तक पर लिख देते हैं, जो कभी मिट नहीं सकता,अवश्य ही होता है।

ब्रह्मर्षि
संज्ञा पुं० [सं०] ब्राह्मण ऋषि।

ब्रह्मर्षिदेश
संज्ञा पुं० [सं०] मनु द्वार निर्दिष्ट वह भूभाग जिसके अंतर्गत कुरुक्षेत्र, मत्स्य, पांचाल और शुरसेनक देश थे।

ब्रह्मलेख
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'ब्रह्मरेख'।

ब्रह्मलोक
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह लोक जहाँ ब्रह्मा रहते हैं। उ०—ब्रह्मलोक लगि गएउँ मैं चितएउँ पाछ उड़ात।—मानस, ७।७९। २. मोक्ष का एक भेद। विशेष—कहते हैं कि जो लोग देवयान पथ से ब्रह्मलोक को प्राप्त होते हैं उन्हें फिर इस लोक में जन्म नहीं ग्रहण करना पड़ता।

ब्रह्मलौकिक
वि० [सं०] १. व्रह्मलोक संबंधी। २. ब्रह्मलोक में निवास करनेवाला [को०]।

ब्रह्मवक्ता
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्मवक्तृ] ब्रह्म का व्याख्याता। वेद का अध्यापक [को०]।

ब्रह्मवद्य
संज्ञा पुं० [सं०] ब्रह्म का ज्ञान। ब्रह्मज्ञान [को०]।

ब्रह्मवध
संज्ञा पुं० [सं०] ब्रह्महत्या।

ब्रह्मवध्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] ब्रह्महत्या। ब्राह्मणवध।

ब्रह्मवर्चस्
संज्ञा पुं० [सं०] वह शक्ति जो ब्राह्मण तप और स्वाध्याय द्वार प्राप्त करे। ब्रह्मतेज।

ब्रह्मवर्चस्वी
वि० [सं० ब्रह्मवर्चस्विन्] ब्रह्मतेजवाला।

ब्रह्मवर्त
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'ब्रह्मावर्त'।

ब्रह्मवर्द्धन
संज्ञा पुं० [सं०] ताँबा।

ब्रह्मबल्ली
संज्ञा स्त्री० [सं०] इस नाम का एक उपनिषद्।

ब्रह्मवाणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] वेद।

ब्रह्मवाद
संज्ञा पुं० [सं०] १. वेद का पढ़ना पढ़ाना। वेदापाठ। २. वह सिद्धांत जिसमें शुद्ध चैतन्य मात्र की सत्ता स्वीकार की जाय, अनात्म की सत्ता न मानी जाय। अद्वैतवाद।

ब्रह्मवादिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. गायत्री। २. उपनिषदों में वर्णित ज्ञान वेदिनी विदुषी स्त्रियाँ।

ब्रह्मवादी
वि० [सं० ब्रह्मवादिन्] [स्त्री० ब्रह्मवादिनी] ब्रह्म अर्थात् शुद्ध चैतन्य मात्र की सत्ता स्वीकार करनेवाला। वेदांती। अद्वैतवादी।

ब्रह्मविंदु
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्मविन्दु] वेदपाठ करने में मुँह से निकला हुआ थुल का छींटा।

ब्रह्मविद्
वि० [सं०] १. ब्रह्म को जानने या समझनेवाला। २. वेदार्थज्ञाता।

ब्रह्मविद्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह विद्या जिसके द्वारा कोई व्यक्ति ब्रह्म को जान सके। उपनिषद विद्या। २. दुर्गा।

ब्रह्मविवधन
संज्ञा पुं० [सं०] १. इंद्र। २. विष्णु [को०]।

ब्रह्मवीणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की वीणा [को०]।

ब्रह्मवृक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १ पलाश वृक्ष। २. गुलर का पेड़।

ब्रह्मवेत्ता
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्मवेतृ] ब्रह्म को समझनेवाला। ब्रह्म- ज्ञानी। तत्वज्ञ।

ब्रह्मवैवर्त्त
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह प्रतीति मात्र जो ब्रह्म के कारण हो; जैसे, जगत् की। २. ब्रह्म का विवर्त जगत्। ३. श्रीकृष्ण। ४. अठारह पुराणों में से एक पुराण जो कृष्ण- भक्ति संबंधी है। विशेष—मत्स्यपुराण में इस पुराण का जो परिचय दिया हुआ हैं, उसमें लिखा है कि इसमें सावर्णि ने नारद से 'रथंतर' कल्प के श्रीकृष्ण का माहात्म्य और ब्रह्मवाराह की गथा कही है। पर इस नाम का जो पुराण आजकल मिलता है, उसमें न तो सावर्णि वक्ता है और न ब्रह्मवाराह की गाथा है। प्रचलित पुराण में नारायण ऋषि नारद जी से और नारद जी व्यास जी से कहते हैं। इसके 'ब्रह्म', 'प्रकृति', 'गणेश' और 'कृष्णजन्म' नामक चार खड हैं। ब्रह्मखंड में परब्रह्मनिरूपण, सृष्टि ब्रह्मंड की उत्पत्ति, कृष्णरूप में नारायण का आविर्भाव, महाविराट्जन्म, रासमंडल, राधा की उत्पत्ति, गोपों और गौओ की उत्पत्ति, पृथ्वी के गर्भ से मंगल की उत्पत्ति, इत्यादि विषय है। प्रकृति खड में शक्ति शब्द की निरुक्ति, ब्रह्मंड की उत्पत्ति, देवताओं का आविर्भाव, सरस्वती, लक्ष्मी और गंगा का परस्पर विवाद और शाप के कारण नदी रुप में हो जाना, भूमिदान आदि का पूण्यस भगीरथ का गंगा लाना, गोलोक में क्रोध करके राधा का गंगा को पान करने दौड़ना, गंगा का श्रीकृष्ण के चरण में शरण लेना, फिर ब्रह्मा आदि की प्रार्थना पर कृष्ण का गंगा' को पेर से निकाल कर जेना, तुलसी की कथा इत्यादि हैं। गणेशखंड में शिव का पार्वती को गंगातट पर हरिमंत्र देना, पार्वती का कृष्ण से वर प्राप्त करना, गणेशजन्म, गणेश के शिरच्छेद और गजाननत्व का वर्णन है। श्रीकृष्णजन्म खंड में श्रीकृष्ण की अनेक कथाओं ओर विहार आदि का वर्णन है। जेसा ऊपर कहा जा चुका है, इस पुराण के असल होने में बहुत संदेह है। नारद ओर शिवपुराण में दिए हुए लक्षण इसपर नहीं घटते। वैष्णव पुराण तो यह है ही, पर विष्णु के कृष्ण रूप को सबसे अधिक महत्व प्रदान करना ही इसका मुख्य उद्देश्य जान पडता है।

ब्रह्मशल्य
संज्ञा पुं० [सं०] बबूल का पेड़।

ब्रह्मशासन
संज्ञा पुं० [सं०] १. वेद या स्मृति की आज्ञा। २. वह गाँव या भूमि जो राजा की ओर से ब्राह्मण को दी गई हो।

ब्रह्मशिर
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्मशिरस्] एक अस्त्र जिसका उल्लेख रामायण और महाभारत दोनों में है। इस अस्त्र का चलाना अगस्त्य से सीखकर द्रोणाचार्य ने अर्जुन और अश्वत्थामा को सिखालाया था।

ब्रह्मसती
संज्ञा स्त्री० [सं०] सरस्वती नदी।

ब्रह्मसत्र
संज्ञा पुं० [सं०] विधिपूर्वक वेदपाठ। ब्रह्मयज्ञ।

ब्रह्मसदन
संज्ञा पुं० [सं०] कात्यायन श्रोत सूत्र के अनुसार यज्ञ में ब्रह्मा नामक ऋत्विक का आसन जो वारूणी काष्ठ का ओर कुश से ढका हुआ होता था।

ब्रह्मसभा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. ब्रह्माजी की सभा। उ०—ब्रह्मसभा हम सन दुखु माना। तेहि ते अजहु करहि अपमाना।— मानस, १। ६२। २. ब्राह्मणों की सभा।

ब्रह्मसमाज
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्म + समाज] एक नया संप्रदाय जिसके प्रवर्तक बंगाल के राजा राममोहन राय थे। विशेष—इसमें उपनिषदों में निरूपित एक ब्रह्म की उपासना और मनुष्यमात्र के प्रति भ्रातृभाव का उपदेश मुख्य है। बंग देश के नवशिक्षितों में एक समय इसका बहुत प्रचार हो चला था।

ब्रह्मसर (१)
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्मसरस्] एक प्राचीन तीर्थ जो महाभारत में वर्णित है।

ब्रह्मसर (२)
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्मशर] दे० 'ब्रह्मस्त्र'—१। उ०— प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा।—मानस, ३। १।

ब्रह्मसावर्णि
संज्ञा पुं० [सं०] दसवें मनु का नाम। विशेष—भागवत के अनुसार इनके मन्वतर में विष्वक्सेन अवतार ओर इंद्र, शभु, सुवासन, विरूद्ध इत्यादि देवता होंगे।

ब्रह्मसिद्धांत
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्मसिद्धान्त] ज्योतिष की एक सिद्धांत पद्धति।

ब्रह्मसुत
संज्ञा पुं० [सं०] मरीचि आदि ब्रह्मा के पुत्र।

ब्रह्मसुता
संज्ञा स्त्री० [सं०] सरस्वती।

ब्रह्मसुवर्चला
संज्ञा स्त्री० [सं०] हुरहुज या हुरहुर नाम का पोधा। पहले तपस्वी लोग इसका कडुआ रस पीते थे।

ब्रह्मसू
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु की चतुव्यूँ हात्मक मूर्तियों में से एक।

ब्रह्मसूत्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. जनेऊ। यज्ञोपवीत। २. व्यास का शारीरिक सूत्र जिसमें ब्रह्म का प्रतिपादन है ओर जो वेदांत दर्शन का आधार है।

ब्रह्मसृजू
संज्ञा पुं० [सं०] १. ब्रह्म को उत्पन्न करनेवाला। २. शिव का ऐक नाम।

ब्रह्मस्तेय
संज्ञा पुं० [सं०] गुरू की अनुमतकि के बिना अन्य को पढाया हुआ पाठ सुनकर अध्ययन करना। (मनु०)।

ब्रह्मस्व
संज्ञा पुं० [सं०] ब्राह्मण का भाग। ब्राह्मण का धन।

ब्रह्महत्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. ब्राह्मणवध। ब्राह्मण को मार डालना। विशेष—मनु आदि ने ब्रह्महत्या, सुरपान, चोरी ओर गुरूपत्नी के साथ गमन को महापातक कहा है।

ब्रह्महा
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्म + हन्] ब्रह्मघाती। ब्रह्मण की हत्या करनेवाला। उ०—ज्यौं ब्रह्महा जिवत ही मरयौ। ऐसी हौं हू विधना करयौ।—नद० ग्रं०, पृ० २३२।

ब्रह्महृदय
संज्ञा पुं० [सं०] प्रथम वर्ग के १९ नक्षत्रों में से एक नक्षत्र जिसे अँगरेजी में कैपेल्ला कहते हैं।

ब्रह्मांड
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्माण्ड] १. चौदहों भुवनों का समूह। विश्वगोलक। संपूर्ण विश्व, जिसके भीतर अनंत लोक हैं। विशेष—मनु ने लिखा है कि स्वयं भगवान ने प्रजासृष्ठि की इच्छा से पहले जल की सृष्टि की ओर उसमें बीज फेंका। बीज पड़ते ही सूर्य के समान प्रकाशवाला स्वर्णाभ अड या गोला उत्पन्न हुआ। पितामह ब्रह्मा का उसी अंड या ज्योति- र्गोलक में जन्म हुआ। उसमें अपने एक संवत्सर तक निवास करके उन्होंने उसके आधे आध दो खंड किए। ऊर्ध्वखड में स्वर्ग आदि लोकों को ओर अधोखंड में पृथ्वी आदि की रचना की। विश्वगोलक इसी से ब्रह्मांड कहा जाता है। हिरण्यगर्भ से सृष्टि की उत्पत्ति श्रुतियों में भी कही गई है। ज्योतिर्गोलक की यह कल्पना जगदुत्पत्ति के आधुनिक सिद्धांत से कुछ कुछ मिलती जुलती है जिसमें आदिम ज्योतिष्क नीहारिकामंडल या गोलक से सूर्य ओर ग्रहों उपग्रहों आदि की उत्पत्ति निरूपित की गई है। २. मत्स्यपुराण के अनुसार एक महादान जिसमें सोने का विश्व- गोलक (जिसमें लोक, लोकपाल आदि वने रहते हैं) दान दिया जाता है। ३. खोपडी़। कपाल। मुहा०—ब्रह्मांड चटकना = (१) खोपडी़ फटना। (२) अधिक ताप या गरमी से सिर में असह्म पीडा होना।

ब्रह्मांभ
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्माम्भस्] गोमूत्र [को०]।

ब्रह्मांडपुराण
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्माण्डपुराण] अठारह पुराणों में से एक का नाम [को०]।

ब्रह्मा
संज्ञा पुं० [सं०] १. ब्रह्म के तीन सगुण रूपों में से सृष्टि की रचना करनेवाला रूप। सृष्टिकर्ता। विधाता। पितामह। विशेष—मनुस्मृति के अनुसार स्वयंभू भगवान ने जल की सृष्टि करके जो बीज फेंका, उसी से ज्योतिर्मय हुआ। (दे० ब्रह्मांड)। भागवत आदि पुराणों में लिखा है कि भगवान विष्णु ने पहले महत्तत्व, अहंकार, पंचतन्मात्रा द्वारा एकादश इंद्रियाँ ओर पंचमहाभूत इन सोलह कलाओं से विशिष्ट विराट् रूप धारण किया। एकार्णव में योगनिद्रा में पडकर जब उन्होंने शयन किया, तब उनकी नाभि से जो कमल निकला उससे ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा के चार मुख माने जाते है जिनके संबध में मत्स्यपुराण में यह कथा है—ब्रह्मा के शरीर से जब एक अत्यंत सुंदरी कन्या उत्पन्न हुई, तब वे उसपर मोहित होकर इधर उधर ताकने लगे। वह उनके् चारों ओर घूमने लगी। जिधर वह जाती, उधर देखने के लिये ब्रह्मा को एक सिर उत्पन्न होता था। इस प्रकार उन्हें चार मुँह हो गए। ब्रह्मा के क्रमशः दस मानसपुत्र हुए—मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेता, वसिष्ठ, भृगु ओर नारद। इन्हें प्रजापति भी कहते हैं। महाभारत में २१ प्रजापति कहे गए हैं। दे० 'प्रजापति'। पुराणो में ब्रह्मा वेदों के प्रकटकर्ता कहे गए हैं। कर्मानुसार मनुष्य के शभाशुभ फल या भाग्य को गर्भ के समय स्थिर करनेवाले ब्रह्मा माने जाते हें। २. यज्ञ का एक ऋत्विके। ३. एक प्रकार का धान जो बहुत जल्दी पकता है।

ब्रह्माक्षर
संज्ञा पुं० [सं०] प्रणव। ओंकार [को०]।

ब्रह्माग्रभू
संज्ञा पुं० [सं०] अश्व [को०]। पर्या—ब्रह्मांगभ्। ब्रह्मात्मभू।

ब्रह्माणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. ब्रह्मा की स्त्री। ब्रह्मा की सक्ति। उ०—आसिस दै दै सराहहिं सादर उमा रमा ब्रह्मानी।—तुलसी (शब्द०)। २. सरस्वती। ३. रेणुका नामक गंधद्रव्य। ४. एक छोटी नदी जो कटक जिले में वैतरणी नदी से मिली है। ५. दुर्गा का एक नाम (को०)। ६. पीतल (को०)।

ब्रह्मदनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] हंसपदी। रक्त लज्जालु।

ब्रह्मानंद
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्मानन्द] ब्रह्म के स्वरूप के अनुभव का आनंद। ब्रह्मज्ञान से उत्पन्न आत्मतृप्ति।

ब्रह्माभ्यास
संज्ञा पुं० [सं०] वेद का अध्ययन [को०]।

ब्रह्मारण्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. वेदाध्ययन या वेदपाठ का स्थान। २. एक वन का नाम [को०]।

ब्रह्मार्पण
संज्ञा पुं० [सं०] ईश्वर को समर्पित किया हुआ कर्म या कर्मफल [को०]।

ब्रह्मावर्त
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रदेश का प्रचीन नाम। सरस्वती ओर दृशद्वती नदियों के बीच का प्रदेश।विशेष—मनु ने इस प्रदेश के परंपरागत आचार को सबसे श्रेष्ठ माना हे।

ब्रह्मासन
संज्ञा पुं० [सं०] वह आसन जिससे बैठकर ब्रह्म का ध्यान किया जाता हे। २. तंवोक्त देवपूजा में एक आसन।

ब्रह्मास्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का अस्त्र जो मंत्र से पवित्र करके चलाया जाता था। यह अमोघ अस्त्र सब अस्त्रों में श्रेष्ठ कहा गया हे। २. एक रसोषध जो सन्निपात में दिया जाता हे। यह रस पारे, गंघक, सीगिया ओर काली मिर्च के योग से बनता हे।

ब्रह्मिष्ठ
वि० [सं०] ब्रह्मा या वेद का पूर्ण ज्ञाता [को०]।

ब्रह्मिष्ठ
संज्ञा स्त्री० [सं०] दुर्गा।

ब्रह्मी (१)
वि० [सं० ब्रह्मिन्] वेद संबंधी [को०]।

ब्रह्मी (२)
संज्ञा पुं० विष्णु [को०]।

ब्रह्मी (३)
संज्ञा स्त्री० १. एक ओषधि। २. एक प्रकार की मछली [को०]।

ब्रह्मीभूत
संज्ञा पुं० [सं०] १. शंकराचार्य का एक नाम। २. ब्रह्म- सायुज्य। कैवल्यलाभ [को०]।

ब्रह्मशय
संज्ञा पुं० [सं०] १. विष्णु। २. कार्तिकेय का एक नाम [को०]।

ब्रह्मोपदेश
संज्ञा पुं० [सं०] वेद या ब्रह्मज्ञान की शिक्षा [को०]। यौ०—ब्रह्मोपदेशनेता=पलाश।

ब्रह्मोपनेता
संज्ञा पुं० [सं० ब्रह्मोपनेतृ] पलाश का वृक्ष [को०]।

ब्रांडी
संज्ञा पुं० [अं०] एक प्रकार की अँगरेजी शराब।

ब्रांत पु
संज्ञा [सं० व्रात्य] दे० 'व्रात्य'।

ब्राह्म (१)
वि० [सं०] ब्रह्मा संबंधी। जैसे, ब्रह्म दिन। ब्रह्म मूहूर्त।

ब्राह्म (२)
संज्ञा पुं० १. विवाह का एक भेद। २. एक पुराण। ३. नारद। ४. राजाओं का एक धर्म जिसके अनुसार उन्हें गुरुकुल से लोटे हुए ब्राह्मणों की पूजा करनी चाहिए। ५. एक नक्षत्र। रोहिणी नक्षत्र। ६. हथेली में अँगूठी के मूल से नीचे का हिस्सा। ७. पारा। पारद।

ब्राह्मण
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० ब्राह्मण] १. चार वर्णो में सबसे श्रेष्ठ वर्ण। प्राचीन अर्यो के लोकविभाग के अनुसार सबसे ऊँचा माना जानेवाला विभाग। हिंदुओं में सबसे ऊँची जाति जिसके प्रधान कर्म पठन पाठन, यज्ञ ज्ञानोपदेश आदि हैं। २. उक्त जाति या वर्ण का मनुष्य। विशेष—ऋग्वेद के पुरूषसूक्त में ब्राह्मणों की उत्पत्ति विराट् या ब्रह्म के मुख से कही गई है। अध्यापन, अध्ययन, यजन, याजन, दान ओर प्रतिग्रह ये छह कर्म ब्राह्मणों के कहे गए हैं, इसी से उन्हें पट्कर्मा भी कहते हैं। ब्राह्मण के मुख में गई हुई सामग्री देवताओं को मिलती है; अर्थात उन्हीं के मुख से वे उसे प्राप्त करते हैं। ब्राह्मणों को अपने उच्च पद की मर्यादा रक्षित रखने के लिये आचरण अत्यंत शुद्ध ओर पवित्र रखना पडता था। ऐसी जीविका का उनके लिये निषेध है जिससे किसी प्राणी को दुःख पहुँचे। मनु ने कहा है कि उन्हें ऋत, अमृत, मृत, प्रमृत या सत्यानृत द्वारा जीविका निर्वाह करना चाहिए। ऋत का अर्थ है भूमि पर पडे़ हुए अनाज के दानों को चुनना (उंछ वृत्ति) या छोडी़ हुई बालों से दाने झाड़ना (शिलवृत्ति)। बिना माँगे जो कुछ मिल जाय उसे ले लेना अमृत वृति है; भिक्षा माँगने का नाम है मृतवृत्ति। कृषि 'प्रमृत' वृति है योर वाणिज्य सत्यानृत वृति' है। इन्ही वृत्तियों के अनुसार ब्राह्मण चार प्रकार का कहे गए हैं—कुशूलधान्यक, कुभीधान्यक, त्र्यैहिक और अश्वस्तनिक। जो तीन वर्ष तक के लिये अन्नादि सामग्री संचित कर रखे उसे कुशलधान्यक, जो एक वर्ष के लिये संचित करे उसे कुंभीधान्यक, जो तीन दिन के लिये रखे, उसे त्र्यैहिक और जो नित्य संग्रह करे ओर नित्य खाय उसे अश्वस्तनिक कहते है। चारो में अश्वस्तनिक श्रेष्ठ है। आदिम काल में मंत्रकार या वेदपाठी ऋषि ही ब्राह्मण कहलीते थे। ब्राह्मण का परिचय उसके वेद, गोत्र और प्रवर से ही होता था। संहिता में जो ऋषि आए हैं, श्रोत ग्रंथों में उन्ही के नाम पर गोत्र कहे गए हैं। श्रोत ग्रंथों में प्रायः सो गोत्र गिनाए गए हैं। पर्या०—द्विज। द्विजाति। अग्रजन्मा। भूदेव। बाडव। क्षिप्र। सूत्रकंठ। ज्येष्ठवर्ण। द्विजन्मा। वक्तृज। मैत्र। वेदवास। नय। गुरू। पट्कर्मा। ३. वेद का वह भाग जो मंत्र नहीं कहलाता। वेद का मंत्राति- रिक्त अंश। ४. विष्णु। ५. शिव। ६. अग्नि। ७. पुरोहित। ८. अठ्ठाईसवाँ नक्षत्र। अभिजित् (को०)। ९. ब्रह्म समाज के लिये प्रयुक्त संक्षिप्त रूप।

ब्राह्मणक
संज्ञा पुं० [सं०] हीन ब्राह्मण। निंद्य ब्राह्मण।

ब्राह्मणत्व
संज्ञा पुं० [सं०] ब्राह्मण का भाव, अधिकार या धर्म। ब्राह्मणपन।

ब्राह्मणप्रिय
संज्ञा पुं० [सं०] ब्राह्मणों को प्रिय अथवा जिसे ब्राह्मण प्रिय हो अर्थात विष्णु [को०]।

ब्राह्मणव्रुव
संज्ञा पुं० [सं०] केवल कहने भर को ब्राह्मण। कर्म और संस्कार से हीन ब्राह्मण।

ब्राह्मणभोजन
संज्ञा पुं० [सं०] ब्राह्मणों का भोजन। ब्राह्मणों को खिलाना।

ब्राह्मणयष्टिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] भारंगी। भार्ङ्गी।

ब्राह्मणसंतर्पण
संज्ञा पुं० [सं० ब्राह्मणसन्तर्पण] ब्राह्मण को खिला- पिलाकर संतुष्ट करना।

ब्राह्मणाच्छंसी
संज्ञा पुं० [सं०] सोमयाग में ब्रह्मा का सरकारी एक ऋत्विक् (ऐतरेय ब्राह्मण)।

ब्राह्मणातिक्रम
संज्ञा पुं० [सं०] ब्राह्मण का अनादार [को०]।

ब्राह्मणायन
संज्ञा पुं० [सं०] वह ब्राह्मण जो शिक्षित एवं धार्मिक ब्राह्मणकुलोत्पन्न हो [को०]।

ब्राह्मणिक
वि० [सं०] ब्राह्मण संबंधी [को०]।

ब्राह्मणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. ब्राह्मण जाति की स्त्री। २. ब्राह्मण की पत्नी या स्त्री। ३. बुद्धि। (महाभारत)। ४. एक तीर्थ(महाभारत)। ५. एक प्रकार की छिपकली। बँभनी (को०)। ६. एक प्रकार की मक्खी या भिड़ (को०)। ७. पीतल का एक भेद (को०)।

ब्राह्मणेष्ट
संज्ञा पुं० [सं०] शहतूत का वृक्ष या फल [को०]।

ब्राह्मण्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. ब्राह्मण का धर्म या गुण। ब्राह्मणत्व। २. ब्राह्ममों का समूह। ३. शनि ग्रह।

ब्राह्मपिंगा
संज्ञा स्त्री० [सं० ब्राह्मपिङ्गा] रजन। चाँदी [को०]।

ब्राह्ममुहूर्त्त
संज्ञा पुं० [सं०] रात्रि के पिछले पहर के अंतिम दो दंड। सूर्योदय के पहले दो घडी़ तक का समय।

ब्राह्मसमाज
संज्ञा पुं० [सं० ब्राह्म + समाज] बंग देश में प्रवर्तित एक नया संप्रदाय जिसमें एक मात्र ब्रह्म की ही उपासना की जाती है। विशेष—अँगरेजी राज्य के आरंभ में जब ईसाई उपदेशक एक ईश्वर की उपासना के उपदेश द्वारा नवशिक्षितों को आकर्षित कर रहे थे, उस समय राजा राममोहन राय ने उपनिषद्में प्रतिपादित अद्वैत ब्रह्म की उपासना पर जोर दिया जिससे बहुत से हिंदू ईसाई न होकर उनके संप्रदाय में आ गए। इसे 'ब्राह्मधर्म' भी कहते हैं। इसका उपासनास्थल 'ब्राह्ममंदिर' कहा जाता है ओर इन म/?/दीक्षित 'ब्राह्मसमाजी' कहे जाते हैं।

ब्राह्मिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] ब्रह्मयष्टिका भारंगी।

ब्राह्मी
संज्ञा पुं० [सं०] १. दुर्गा। २. शिव की अष्ट मातृकाओं में से एक। ३. रोहिणी नक्षत्र (/?/उसके अधिष्ठाता देवता ब्रह्मा हैं)। ४. भारतवर्ष की वह प्रचीन लिपि जिससे नागरी, बँगला आदि आधुनिक लिपियाँ निकली हैं। हिंदुस्तान की एक प्रकार की पुरानी लिखावट या अक्षर। विशेष—यह लिपि उसी प्रकार बाँई ओर से दाहिनी ओर को लिखी जाती ती जैसे, उनसे निकली हुई आजकल की लिपियाँ। ललितविस्तर में लिपियों के जो नाम गिनाए गए हैं, उनमें 'ब्रह्मलिपि' का नाम भी मिला है। इस लिपि का सबसे पुराना रूप अशोक के शिलालेखों में ही मिला है। पाश्चात्य विद्वान् कहते है कि भारतवासियों ने अक्षर लिखना विदेशियों सो सीखा ओर ब्राह्मीलिपि भी उसी प्रकार प्रचीन फिनी- शियन लिपि से ली गई जिस प्रकार अरबी, यूनानी, रोमन आदि लिपियाँ। पर कई देशी विद्वानों ने सप्रमाण यह सिद्ध किया है कि ब्राह्मो लिपि का विकास भारत में स्वतंत्र रीति से हुआ। दे०—'नागरी'। ५. सरस्वती। वाणी (को०)। ६. कथन। वक्तव्य। उक्ति (को०)। ७. एक प्रकार का पीतल (को०)। ८. एक नदी (को०)। ९. ब्राह्म विवाह के विधान से विवाहिता स्त्री (को०)। १०. ओषध के काम में आनेवाली एक प्रसिद्ध बूटी। विशेष—यह बूटी छते की तरह जमीन में पैलती है। ऊँची नहीं होती। इसकी पत्तीयाँ छोटी छोटी ओर गोल होती हैं ओर एक ओर खिली सी होती हैं। इसके गो भेद होते हैं। जिसे ब्रह्ममंडूकी कहते हे, उसकी पत्तियाँ ओर छोटी होती हें। वैद्यक में ब्राह्मो शीतल, कसेली, कडवी, बुद्धिदायक, मेधाजनक सारक, कठशोधक, स्मरणशक्तिवर्धक, रसायन तथा कुष्ठ, पांडुरोग, खासी, सूजन, खुजली, पित्त, प्लीहा आदि को दूर करनेवाली मानी जाती हें। पर्या०—वयस्था। मत्स्याक्षी। सुरसा। ब्रह्मचारिणी। सोम- वल्लरी। सरस्वती। सुवचँला। कपोतवेगा। वैधात्री। दिव्यतेजा। ब्रह्मकन्यका। मंडूकमाता। दिव्या। शारदा।

ब्राह्मीअनुष्टुप्
संज्ञा पुं० [सं०] एक वैदिक छद जिसमें सब मिलाकर ४८ वर्ण होते हैं।

ब्राह्मीउप्णिक्
संज्ञा पुं० [सं०] एक वैदिक छद जिसमे सब मिलाकर ४२ वर्ण होते हैं।

ब्रह्मीकंद
संज्ञा पुं० [सं० ब्राह्मीकन्द] बाराही कंद।

ब्रह्मागायत्री
संज्ञा पुं० [सं०] एक वैदिक छंद जिसमें सब मिलाकर ३६ वर्ण होते हैं।

ब्राह्मीजगती
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का वैदिक छद जिसमें सब मिलाकर ७२ वर्ण होते हैं।

ब्राह्मीत्रिष्टुप्
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का वेदिक छद जिसमें कुल मिलाकर ६६ वर्ण होते हैं।

ब्राह्मीपक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं० ब्राह्मीपडि्क्त] एक वैदिक छंद जिसमें सव मिलाकर ६० वर्ण होते हैं।

ब्राह्मीवृहती
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का वैदिक छंद जिसमें सव मिलाकर ५४ वर्ण होते हे।

ब्राह्म
वि० [सं०] दे० 'ब्राह्म (१)'।

ब्रिंदावन पु
संज्ञा पुं० [सं० वृन्दावन] दे० 'वृदावन'। उ०— ब्रिदावन को चल जाऊँगी भत्त्कबछल को रिझाऊँगी में।— दक्खिनी०, पृ० १३१।

ब्रिख पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० वृक्ष, पू० हिं० बिरिख] वृक्ष। पेड़। उ०— जल बेली बिहु बाग ब्रख ते जिन भप अलोप।—पृ० रा०, १।४९५।

ब्रिख पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० वृष] एक राशि। दे० 'वृष'। उ०—ब्रिछिक सिंघ व्रिख कुंभ पुनीता।—संत० दरिया, पृ० २८।

ब्रिगेड
संज्ञा पुं० [अं०] सेना का एक समूह।

ब्रिगेडियर
संज्ञा पुं० [अं०] दे० 'ब्रिगेडियर जनरल'। यौ०—ब्रिगेडियर जनरल।

ब्रिगेडियर जेनरल
संज्ञा पुं० [अं०] एक सेनिक कर्मचाती जो एक ब्रगेड भर का संचालक होता हैं।

ब्रछिक पु
संज्ञा पुं० [सं० वृश्चिक] वृश्चिक राशि। उ०— ब्रिछिक सिघ ब्रिख कुभ पुनीता। चारिउ रासि चंद कर हीता।— संत० दरिया, पृ० २८।

ब्रिज
संज्ञा पुं० [अं०] १. पुल। सेतु। जैसे, सोन ब्रिज, हबडा ब्रिज। २. ताश का एक खेल।

ब्रिटिश
वि० [अं०] १. उस द्वीप से संबंध रखनेवाला जिसमें इंगलैड ओर स्काटलैड प्रदेश हैं। २. इंगलिस्तान का। अँगरेजी।यौ०—ब्रिटिश राष्ट्रमंढल =समान हितों ओर समान स्वार्थों की रक्षा के लिये संघटित वह राष्ट्रसमूह जो पहले ब्रिटिश अधिकार में था।

ब्रिटेन
संज्ञा पुं० [अं०] इंगलैड ओर वेल्स।

ब्रीखव †
संज्ञा पुं० [सं० वृषभ] दे० 'वृषभ' उ०— कहे दरिया ब्रह्मभेद नहीं नीर वेद कहा ब्रीखब हुआ।—संत दरिया, पृ० ६६।

ब्रीछ पु †
संज्ञा पुं० [सं० वृक्ष] दे० वृक्ष'। उ०—ब्रीक्ष एक वहँ सुंदर छाया। चौका चदन तहाँ बनाया।—संत०, दरिया, पृ०२।

ब्रीड़ना पु
क्रि० अ० [सं० व्रीडन] लज्जित होना। लजाना। उ०—कुडल झलक कपोलनि मानहुँ मीन सुधारस कीड़त। भ्रकुटी धनुष नैन खजन मनु उड़त नहीं मन ब्रीड़त।—सूर०, १०।१७९१।

ब्रीड़ा
संज्ञा स्त्री० [सं० ब्रीडा] दे० 'ब्रीडा'। उ०— मोहि सन करहिं विविध विधि क्रिड़ा। बरनत मोहि होति अति ब्रीड़ा। उ०— मानस, ७। ७७।

ब्रीद पु †
संज्ञा पु० [सं० विरुद, हि० बिरद] दे० 'ब्रिरद'। उ०— ब्रीद मेरे साइयाँ को 'तुका' चलावे पाग। सूरा सो हमसे लरे छोरे तन की आस।—दक्खिनी०, पृ० १०९।

ब्रीवियर
संज्ञा पुं० [अं०] एक प्रकार का छोटा टाइप जो आठ प्वाइंट का अर्थात पाइका का २/३ होता। व्रीवियर टाइप।

ब्रीहि
संज्ञा पुं० [सं० व्रीहि] दे० 'व्रीहि'।

ब्रश
संज्ञा पुं० [श्रं०] बालों का बना हुआ कूँचा जिससे टोपी या जूते इत्यादि साफ किए जाते है।

ब्रहम
संज्ञा स्त्री० [अं०] एक प्रकार की घोड़ा गाड़ी जिसे ब्रूहम नामक डाक्टर ने ईजाद किया था। इसमें एक ओर डाक्टर के बैठने का ओर उसके सामने दूसरी ओर केवल दवाओं का बेग रखने का स्थान होता है।

ब्रेक
संज्ञा पुं० [अ०] १. रोक। रूकाव। वह यंत्र हो गाडि़यों को रोकता है। २. रेल में वह डब्वा जिसमें रोकयंत्र लगा रहता है। इसे व्रकवान भी कहते है। उ०—व्रक से सब सामान निकलवाकर...मैं मतिया का हाथ पकड़कर उसे बाहर ले गया।—जिप्पी, पृ० २७६।

व्रेवरी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का कश्मीरी तंबाकू जो बहुत अच्छा होता है।

ब्रोकर
संज्ञा पुं [अं०] वह व्यक्ति जो दूसरे के लिये सोदा खरीदता ओर जिसे सोदे पर सैकडे़ पीछे कुछ वंधी हुई दलाली मिलती है। दलाल। जैसे, शेयर व्रोकर; पीस गुड्स वोकर।

ब्लाउज
संज्ञा पुं० [अं० ब्लाउज] १. विलायती ढंग या काठ की बानी हुई ओरतों की कुरत। यो०—व्लाउज पीस = कुरती का कपड़ा।

ब्लाक
संज्ञा पुं० [अ०] १. ठप्पा जिसपर से कोई चित्र छापा जाय। बैठाए हुए अक्षर, चित्र, लिखावट आदि का जस्ते, ताँवे आदि का बना हुआ ठप्पा जिससे वहु वस्तु छापी जाय। २. भुमि का कोई चोकोर दुवडा या वर्ग। भूमिखंड। मकानात। घरों का समूह। ४. किसी मकान का वह हिस्सा जो अपने आप में मकान या गृह की दृष्टि से पूरा हो। ५. विकास की दृष्टि से विभाजित छोटे क्षेत्र।

ब्लेड
संज्ञा पुं० [अं०] इस्पात का हलका एवं पतला छुरे की तरह धारदार टुकडा। पत्ती। इससे दाढी़ मूड़ते हैं।

ब्लेष्क
संज्ञा पुं० [सं०] जाल। बाहुर। फंदा [को०]।