विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/ड

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व्यंजनों में तेरहवाँ व्यंजन और टवर्ग का तीसरा वर्ण । इसका उच्चारण आभ्यंतर प्रयत्न द्वारा तथा जिह्वामध्य को मूर्धा में स्पर्श करने से होता है ।

डंक
संज्ञा पुं० [सं० दंश या दंशी] १. भिड़, बिच्छू, मधुमक्खी आदि कीड़ों के पीछे का जहरीला काँटा जिसे वे क्रोध में या अपने बचाव के लिये जीवों के शरीर में धँसाते हैं । उ०— उलटिया सूर ग्रह डंक छेदन किया, पोखिया चंद्र तहाँ कला सारी ।—राम० धर्म०, पृ० ३१६ । विशेष—भिड़, मधुमक्खी आदि उड़नेवाले कीड़ों के पीछे जो काँटा होता है, वह एक नली के रूप में होता है जिसमें होकर जहर की गाँठ से जहर निकलकर चुभे हुए स्थान में प्रवेश करता है । यह काँटा केवल मादा कीड़ों को होता है । क्रि० प्र०—मारना । २. कलम की जीभ । निब । ३. डंक मारा हुआ स्थान । डंक का घाव ।

डंक पु (२)
संज्ञा पुं० [सं०, प्रा० डक्क (= वाद्यविशेष) अथवा अनु०] डमरू । डिगडिगी । उ०—बाजीगर ने डंक बजाया । सब लोग तमाशे आया ।—कबीर मं०, पृ० ३३८ ।

डंकदार
वि० [हिं० डंक + फा़० दार] डंकवाला । काँटेदार ।

डँकना †
क्रि० अ० [अनु०] शब्द करना । गरजना । भयानक । शब्द करना । उ०—हथनाल हंकिय तोप डंकिय धुनि धमंकिय चंड ।—सूदन (शब्द०) ।

डंका (१)
संज्ञा पुं० [सं० ढक्का (= दुंदुभि का शब्द)] एक प्रकार का बाजा जो नाँद के आकर के ताँबे या लोहे के बरतनों पर चमड़ा मढ़कर बनाया जाता है । पहले लड़ाई में डंके काजोड़ा ऊँटों और हाथियों पर चलता था और उसके साथ झड़ा भी रहता था । क्रि० प्र०—बजना ।—बजाना ।—पिटना ।—पीटना । मुहा०—डंके की चोट कहना = खुल्लम खुल्ला कहना । सबको सुनाकर कहना । बेधड़क कहना । डंका डालना = (१) मुरगे से मुरगे को लड़ाना । (२) मुरगे का चोंच मारना । डंका देना या पीटना = (१) दे० 'डंका बजाना' । (२) मुनादी करना । डुग्गी फेरना । डौंड़ी फेरना । डंका बजाना = हल्ला करके सबको सुनाना । सबपर प्रकट करना । प्रसिद्ध करना । घोषित करना । किसी का डंका बजना = किसी का शासन या अधिकार होना । किसी की चलती होना । उ०—सजे अभी, साकेत, बजे हाँ, जय का डंका । रह न जाय अब कहीं किसी रावण की लंका ।—साकेत, पृ० ४०२ । यौ०—डंका निशान = राजाओं की सवारी में आगे बजनेवाला डंका और ध्वजा ।

डंका (२)
संज्ञा पुं० [अं० डाक] जहाजों के ठहरने का पक्का घाट ।

डंकिनि
संज्ञा स्त्री० [सं० डाकिनी] दे० 'डाकिनी' ।

डंकिनी बंदोबस्त
संज्ञा पुं० [अ० दवामी + फा़० बंदोबस्त] स्थायी व्यवस्था । दे० 'दवामी बंदोबस्त' ।

डंकी (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. कुश्ती का एक पेंच । २. मालखंभ की एक कसरत ।

डंकी (२)
वि० [हिं० डंक] डंकवाला ।

डंकुर
संज्ञा पुं० [हिं० डंका] एक प्रकार का पुराना बाजा जिससे ताल दिया जाता था ।

डंख (१)
संज्ञा पुं० [देश०] पलाश । ढंख ।

डंख पु (२)
संज्ञा पुं० [हिं० डंक] विष का दाँत । उ०—ये देखो ममता नागन आई रे भाई आई । तिनें तो डंख मारा रे मारा ।—दक्खिनी०, पृ० ५८ ।

डंग
संज्ञा पुं० [देश०] अधपका छुहारा ।

डंगम
संज्ञा पुं० [देश०] वृक्ष विशेष । एक पेड़ का नाम । विशेष— यह पेड़ बहुत बड़ा होता है । हर साल जाड़े के दिनों में इसके पत्ते झड़ जाते हैं । इसकी लकड़ी भीतर से भूरी, बहुत कड़ी और मजबूत निकलती है । दारजिलिंग के आसपास तथा खसिया की पहाड़ियों में यह अधिक मिलता है ।

डंगर (१)
संज्ञा पुं० [देश०] चौपाया (जैसे, गाय, भैंस) । उ०— मानुष हो कोइ मुवा नहिं, मुवा सो डंगर धूर ।—कबीर मं०, पृ० ३६४ ।

डंगर (२)
वि० दे० 'डाँगर' ।

डंगूज्वर
संज्ञा पुं० [अं० डेंगू + सं० ज्वर] एक प्रकार का ज्वर जिसमें शरीर जकड़ उठता है और उसपर चकत्ते पड़ जाते हैं । इसे लँपडा़ ज्वर भी कहते है ।

डंगोरी †
संज्ञा पुं० [देशी डंगा(= यष्टि) + हिं० ओरी (प्रत्य०)] डड़ौंकी । यष्टि । छड़ी । उ०— हथ डंगोरी पग खिसहिं डोली देहि नीमाणु ।—प्राण०, पृ० २५० ।

डंटा †
संज्ञा पुं० [हिं० डंडा] दे० 'डंडा' । स०— साले नगाड़ची ने ठीक सामने कपाल पर ही डंटा चलाया था ।—मैला०, पृ० ७५ ।

डंठल
संज्ञा पुं० [सं० बण्ड] छोटे पौधों की पेड़ी और शाखा । नरम छाल के झाड़ों और पौधों का धड़ और टहनी । जैसे, ज्वार का डंठल, मूली का डंठल ।

डंठी †
संज्ञा स्त्री० [सं० दण्ड] डंठल ।

डंड
संज्ञा पुं० [सं० दण्ड, प्रा० डंड] १. डंडा । सोंटा । उ०— कंथा पहिरि डंड कर गहा । सिद्ध होइ कहँ गोरख कहा ।— जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० २०५ । २. वाहुदँड । बाहुँ । ३. मेरुदंड । रीढ़ । उ०— दरिया चढिया गगन को, मेरु उलँग्या डंड । सुख उपजा साँई मिला, भेटा ब्रह्म अखंड ।—दरिया० बानी, पृ० १५ । ४. एक प्रकार का व्यायाम जो हाथ पैर के पंजों के बल पृथ्वी पर पट और सीधा पड़कर किया जाता है । हाथ पैर के पंजों के बल पर पड़कर की जानेवाली कसरत । क्रि० प्र०—करना । यौ०— डंडपेल । डंड बैठक = डंड और बैठक नाम की कसरत । मुहा०— डंड पेलना = खूब डंड करना । ५. दंड । सजा । ६. अर्थदंड । जुरमाना । वह रुपया जो किसी अपराध या हानि के बदले में दिया जाय । क्रि० प्र०—देना ।—लगना ।— लगाना । मुहा०— डंड डालना = अर्थदंड नियत करना । जुरमाना करना । डंड भरना = हानि के बदले में धन देना । जूरमाना या हरजाना देना । उ०— भूमि आस जौ कराहि भरहि तौ डंड सेव करि ।—पृ० रा०, ८ । ३ । ७. घाटा । हानि । नुकसान ।मुहा०— डंड पड़ना = नुकसान होना । व्यर्थ व्यय होना । जैसे,— कुछ काम भी नहीं हुआ, इतना रुपया डंड पड़ा । ८. घड़ी । दंड । दे० 'दंड' । उ०— डंड एक माया करु मोरें । जोगिनि होउँ चलौं सँग तोरें ।—पदमावत, पृ० ६५८ ।

डंडक पु †
संज्ञा पुं० [सं० दण्डक] दे० 'दंडक' — । उ०—परे आइ अब बनखँड माहाँ । डंडक आरन बींझ बनाहाँ ।—पदमावत, पृ० १३२ ।

डंडकारन पु
संज्ञा पुं० [सं० दण्डकारण्य] दे० 'दंडकारण्य' ।

डंडण पु
वि० [सं० दण्डन] दंड देनेवाला । उ०—अरि डंडण नव खंड अबीहौ ।—रा० रू०, पृ० १२ ।

डंडताल
संज्ञा पुं० [सं० दण्ड + ताल] एक प्रकार का बाजा जिसमें लंबे चिमटे में मंजीर जड़े रहते हैं । उ०— झाँझ मजीरा डंडताल करताल बजावत ।—प्रेमधन०, भा० १, पृ० २४ ।

डंडधारी
संज्ञा पुं० [सं० दण्ड + हिं० धारी] दंडी । सँन्यासी । उ०—स्वामी कि तुम्हे ब्रह्मा कि ब्रह्माचारी । कि तुम्हें बाभण पुस्तक कि डंडधारी ।— गोरख०, पृ० २२७ ।

डंडन पु
वि० [सं० दण्डन, प्रा० डंडण] दंड देनेवाला । वह जो दंड दे । उ०—पुनि गुज्जर बलिवंड लोह अनडंडनि डंडन ।—पृ० रा०, १३ । ३० ।

डंडना पु
क्रि० स० [सं० दण्डन, प्रा० डंडण] दंड देना । जुरमाना लगाना । दंडित करना । उ०— डंडयौ (डंडयूँ) साह साहाबदी अट्ठ सहस हैवर सुवर ।—पृ० रा०, २० । ६९ ।

डंडपेल
संज्ञा पुं० [हिं० डंड + पेलना] १. खूब डंड करनेवाला । कसरती पहलवान । २. बलवान या तगड़ा आदमी ।

डंडल
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की मछली । विशेष— यह बंगाल और बरमा में पाई जाती है । यह मछली पानी के ऊपर अपनी आँखें निकालकर तैरती है । इसकी लंबाई १८ इंच होती हैं ।

डंडवत पु †
संज्ञा पुं० [सं० दणडवत्] दे० 'दंडवत्' । उ०—(क) सोऊँ तब करुँ डंडवत पूजूँ और न देवा ।— कबीर श०, भाग १, पृ० ७२ । (ख) डँड़वी डाँड़ दिन्ह जँह ताइँ । आप डंडवत कीन्ह सबाई ।—जायसी (शब्द०) ।

डंडा (१)
संज्ञा पुं० [सं० दण्ड] १. लकडी या बाँस का सीधा लंबा टुकड़ा । लंबी सीधी लकड़ी या बाँस जिसे हाथ में ले सकें । सोंटा । मोटा छड़ी । लाठी । मुहा०—डंडा खाना = डंडे की मार सहना । डंडा चलाना = डंडे से प्रहार करना । डंडे खेलना = डंडो की लडा़ई का खेल खेलना । (भादों बदी चौय की पाठशालाओं के लड़के यह खेल खेलने निकलते हैं) । डंडा चलाना = डंडे से प्रहार करना । डंडे देना = विवाह संबंध होने के पीछे भादों बदी चौथ को बेटीवाले का बेटेवाले के यहाँ चाँदी के पत्तर चढे़ हुए कलम, दवात आदि भोजने की रीति करना । डंडा बजाते फिरना = मारा मारा फिरना । ३. डाँड़ । डँड़वारा । वह कम उँची दीवार जो किसी स्थान को घेरने के लिये उठाई जाय । चारदीवारी । क्रि० प्र०— उठाना । मुहा०— डंडा खींचना = चारदीवारी उठाना ।

डंडा पु † (२)
संज्ञा पुं० [देशी डंडय (= रथ्या)] मार्ग । लीक राह । उ०—बाग बृच्छ बेली पर अंडा । सतगुरु सुरति बतावैं डंडा ।—घट०, पृ० २४७ ।

डंडाकरन पु
संज्ञा पुं० [सं० दण्डकारण्य] दंडक वन । उ०— परैउ आइ सब बन खँड माहा । डंडाकरन बीझ वन जाहाँ ।— जायसी (शब्द०) ।

डंडाकुंडा
संज्ञा पुं० [हिं० डंडा + कुंडा] बल वैभव । सत्ता । प्रभाव । उ०—उनके आँख मुँदते साल भी नहीं बीतेगा कि अँगरेजों का डंडाकुंडा उठ जाएगा ।—किन्नर०, पृ० २३ ।

डंडाडोली
संज्ञा स्त्री० [हिं० डंडा + डोली] लड़कों का एक खेल जिसमें वे किसी लड़के की दो आड़े डंडों पर बैठाकर इधर उधर फिराते हैं । क्रि० प्र०—करना ।—खेलना ।

डंडाधारी पु †
संज्ञा पुं० [सं० दण्ड + हिं० धारी] दंडी । संन्यासी । उ०—मोनी उदासी डंडाधारी ।—प्राण०, पृ० ९२ ।

डंडानाच
संज्ञा पुं० [हिं० डंडा + नाच] वह नृत्य जिसमें डंडा लड़ाते हुए लोग नाचते हैं । उ०—डंडा नाच कुछ अंशों में गुजरात देश के 'गरवा नृत्य' के सदृश होता है । मुख्य अंतर यही है कि डंडा नाच पुरुषों का है और गरबा स्त्रियों का ।—शुक्ल अभि० ग्रं० (साहिं०), पृ० १३९ ।

डंडाबेड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] बेड़ी और उसके साथ लगा लोहे का डंडा जिससे कैदी न भाग सके ।

डंडारन पु †
संज्ञा पुं० [सं० दण्डकारण्य, प्रा० डंडारण्ण] दंडकारण्य' ।

डंडाल
संज्ञा पुं० [हिं० डंडा] नगाड़ा । दुंदुभि । डंका ।

डंड़िया †
संज्ञा स्त्री० [हिं० डंडी] १. दे० 'डाँडी—१६' । २. दें० 'डंडी' ।

डंडी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० डंडा] १. छोटी लंबी पतली लकड़ी । २. हाथ में लेकर व्यवहार की जानेवाली वस्तु का वह लंबा पतला भाग जो मुट्ठी में लिया या पकड़ा जाता है । दस्ता । हस्था । मुठिया । जैसे, छाते की डंडी । ३. तराजू की वह सीधी लकड़ी जिसमे रस्सियाँ लटका लटकाकर पलड़े बाँधे जाते हैं । डाँड़ी । उ०—काहे की डंडी काहे का पलरा काहे की मारो टेनिया ।— कबीर श०, भा० २, पृ० १५ । मुहा०—डंडी मारना = सौदा देने में चालाकी से कम तौलना । ४. वह लंबा डंठल जिसमें पत्ता, फूल या फल लगा होता है । नाल । जैसे, कमल की डंडी । पान की डंडी । उ०—कमलों के पत्ते जीर्ण होकर झड़ गए है, फूलों की कर्णिका और केसर भी गिर गई है, पाले के कारण उसमें डंढी मात्र शेष रह गई है ।—हिं० प्र० चि०, पृ० १४ । ५. फूल के नीचे का लंबा पतला भाग । जैसे, हरसिंगार की डंडी । ६. हरसिंगार का फूल । ७. आरसी नाम के गहने का वह छल्ला जो उँगली में पड़ा रहता है । ८. डंडे में बैधी हुई झीली के आकार कीएक सवारी जो ऊँचे पहाड़ों पर चलती है । झप्पान । ९. लिगेंद्रिय । १०. दंड धारण करनेवाला संन्यासी ।

डंडो (२)
वि० [सं० द्वन्द्व] झगड़ा लगानेवाला । चुगलखोर ।

डंडीमार
वि० [हिं०] टेनी मारनेवाला । सौदा कम तौलनेवाला ।

डंडूर
संज्ञा पुं० [प्रा० डुडुंल्ल] दे० 'डंडूल' । उ०— अग्नि ज्वाल किन तन उठत, किन तन बरसै मेह । चक्र पवन डंडूर के कैतन कंकर खेह ।—पृ० रा०, ६ । ५५ ।

डंडूल
संज्ञा पुं० [प्रा० ड़ुंडुल्ल(= घूमना, चक्कर लगाना)] वात्या— चक्र । बवंडर । उ०—कर सेती माला जपैं, ह्रिदै बहै डंड़ूल । पग तौ पाला मैं गिल्या, भाजण लागी सूल ।—कबीर ग्रं०, पृ० ४५ ।

डंडौत
संज्ञा पुं० [सं० अण्ड, प्रा० डण्ड + सं० वत् , हिं० औत] दे० 'दंडवत्' । उ०—पलटू उन्हैं डंडौत करौ, वोही साहब मेरा है जी ।—पलटू०, पृ० ५० ।

डंबर
संज्ञा पुं० [सं०] १. आयोजन । आडंबर । ढकोसला । धूम— घाम । २. विस्तार । उ०—उड्डि रेन डंबर अमर, दिष्यौ सेन चहुआन ।—पृ० रा०, ९ । १३० । ३. समूह । उ०—कुवा बावड़ियूँ के डंबर, बाड़ी बागू के आडंबर ।—रघु० रू०, पु० २३७ । ४. विलास । ५. एक प्रकार का चँदोवा । चदरछत । यौ०—मेघडंबर = बड़ा शामियाना । दलबादल । अंबर डंबर = वह लाली जो संव्या के समय आकाश में दिखाई पड़ती है । उ०—विनसत बार न लागई, ओछे जन के प्रीति । अंबर डंबर साँझ के ज्यों बारू की भीति ।—सं० सप्तक, पृ०, ३१२ ।

डंबल
संज्ञा पुं० [अं० डंबेल] दे० 'डंबेल' ।

डंबेल
संज्ञा पुं० [अं०] १. हाथ में लेकर कसरत करने की लीहै या लकड़ी की गुल्ली जिसके दोनों सिरे लट्टू की तरह गोल होते है । इसे हाथ मे लेकर तानते हैं । यह आवश्यकतानुसार भारी और हलकी होती है । कुछ डंबेलों में स्प्रिगें भी लगी रहती है । २. वह कसरत जो इस प्रकार के लट्टू से की जाती है । क्रि० प्र०—करना ।

डंभ पु
संज्ञा पुं० [सं० दम्भ, प्रा० डंभ] दे० 'डिंभ (२)' । उ०— डंभ अनै मत मानियो सत कहौं परमारथ जानी ।—कबीर श०, भा० ४, पृ० २४ ।

डंस
संज्ञा पुं० [सं० दंश, प्रा० डंस] एक प्रकार का बड़ा मच्छर जो बहुत काटता है और जिसका आकार बड़ी मक्खी से मिलता जुलता होता है । डँस । वनमशक । जंगली मच्छर । उ०—देव विषय सुख लालसा डंस मसकादि खलु झिल्ली रूपादि सब सर्प स्वामी ।—तुलसी (शब्द०) २. वह स्थान जहाँ डंक चुभा हो या साँप आदि बिषले कीड़ों का दाँत चुभा हो ।

डँकरना †
क्रि० अ० [हिं० डकार] दे० 'डकारना' ।

डँकारना †
क्रि० अ० [हिं० डकारना] डकार लेना । डकार आना ।

डँकियाना †
क्रि० स० [हिं० डंक + आना (प्रत्य०)] डंक मारना ।

डँकीला †
वि० [हिं० डंक + ईला (प्रत्य०)] डंकवाला ।

डँकौरो †
संज्ञा स्त्री० [हिं० डंक + औरी (प्रत्य०)] भिड़ । बर्रे । ततैया । हड़्डा ।

डँगरा †
संज्ञा पुं० [सं० दशाङ्गुल] खरबूजा ।

डँगरी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० डँगरा] लंबी ककड़ी । डाँगरी ।

डँगरी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० डाँगर (= दुबला)] एक प्रकार की चुड़ै़ल । डाइन । उ०—डाइन डँगरी नरन चबावत । गजन घुमाइ अकास पठावत ।—गोपाल (शब्द०) ।

डँगरी (३)
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का मोटा बेंत । विशेष—यह बेंत पूर्वी हिमालय, सिक्किम, भूटान से लेकर चट— गाँव तक होता है । यह सबसे मजबूत होता है और इसमें से बहुत अच्छी छड़ियाँ और डंडे निकलते हैं । टोकरे बनाने के काम में भी यह आता है ।

डँगवारा
संज्ञा पुं० [हिं० डंगर(= बैल, चौपाया)] हल बैल आदि की वह सहायता जिसे किसान एक दूसरे को देते हैं । जिता ।

डँगौरी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक पेड़ जिसकी लकड़ी मजबूत और चमकदर होती है । विशेष— इस पेड़ की लकड़ी से सजावट के सामान बहुत अच्छे बनते हैं । यह पेड़ आसाम और कछार में बहुतायत से होता है ।

डँटैया पु †
संज्ञा पुं० [हिं० डाँटना] डाँटनेवाला । डाँट बतानेवाला । घुड़कनेवाला । धमकानेवाला । उ०—साँसति घोर पुकारत आरत कौन सूनै चहुँ और डँटैया ।—तुलसी (शब्द०) ।

डँठरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० डंठल] दे० 'डंठल' ।

डँड़ †
संज्ञा पुं० [सं० दण्ड; प्रा० डंड] एक प्रकार का व्यायाम । दे० 'डंड—४' । यौ०—डँड़बैठक । डँड़पेल ।

डँड़का †
संज्ञा पुं० [हिं० डंडा] सीढ़ा का डंडा ।

डँड़वारा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० टाँड़ + वार(= किनारा)] [स्त्री० अल्पा० डँड़वारी] वह कम ऊँची दीवार जो रोक के लिये या किसी स्थान को घेरने के लिये उठाई जाय । दूर तक गई हुई खुली दीवार । क्रि० प्र०—उठाना । मुहा०—डँड़वारा खींचना = डँडवारा उठाना ।

डँडवारा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० दक्खिन + वार (प्रत्य०)] दक्षिण का वायु । दखनहरा । दखिनैया । क्रि० प्र०—चलना ।

डँड़वारी
संज्ञा स्त्री० [हिं० डाँड़ + वार (= किनारा)] कम ऊँची दीवार जो रोक के लिये या किसी स्थान को घेरने के लिये उठाई जाती है । मुहा०—डँड़वारी खीचाना = डँड़वारी या चारदीवारी उठाना ।

डँड़वी पु †
संज्ञा पुं० [देश०] दंड या राजकर देनेवाला । करद । उ०—डँड़वी डाँड़ दीन्ह जँह ताइं । आप डंडवत कीन्ह सवाई ।—जायसी (शब्द०) ।

डँड़हरा †
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. एक प्रकार की मछली जो बंगाल, मध्यभारत और बर्मा में पाई जाती है । यह तीन इंच लंबीहोती है । २. लकड़ी या लोहे का लंबा डंडा जो दरवाजे का खुलना रोकने के लिये किवाड़ के पीछे लगाया जाता है ।

डँड़हरी (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक छोटी मछली जो आसाम, बंगाल, उड़ीसा और दक्षिण भारत की नदियों में पाई जाती है ।

डँड़हरी (२) †
संज्ञा स्त्री० [सं० दण्ड + हिं० हरी (प्रत्य०)] टहनी ।

डँडहिया
संज्ञा पुं० [हिं० डंडा] वह डंडा जिससे बैलों की पीठ पर लदे हुए बोरे फँसाए रहते हैं ।

डँड़िया (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० डाँड़ी (= रेखा)] १. वह साड़ी जिसके बीच में लंबाई के बल गोटे टाँककर लकीरें बनी हों । छड़ीदार साड़ी । उ०—(क) लाल चोली नील डँड़िया संग युवतिन भीर । सूर प्रभु छबि निरखि रीभे मगन भौ मन कीर । —सूर (शब्द०) । (ख) नख सिख सजि सिंगार युवती तन डँड़िया कुसुमे बोरी की ।—सूर (शब्द०) । विशेष—इसे प्रायः कुँआरी लड़कियाँ पहनती हैं । कभी कभी यह रंग बिरंगे कई पाट जोड़कर बनाई जाती है । २. गेहूँ के पौधे में वह लंबी सींक जिसमें बाल लगी रहती है ।

डँड़िया (२)
संज्ञा पुं० [हिं० डाँड़(= अर्थर्दड; सीमा)] १. महसूल वसूल करनेवाला । कर उगाहनेबला । २. सीमा या हद पर कर उगहनेवाला ।

डँड़िया (३)
संज्ञा स्त्री० [कुमा० डाँडी, मेपा० डाँडी (= डोली)] उ०— (क) आलहि बाँस कटाइन डँड़िया फँदाइन हो साधो ।— पलटू०, पृ०, ५८ । (ख) छोटि मोटि इंड़िया चंदन कै हो, छोटे चार कहार ।—कबीर श०, भा०, २, पृ०, ६२ । २. दे० 'डाँड़ी' ।

डँड़ियाना
क्रि स० [हिं० डाँड़ी] किसी कपड़े के दो या अधिक पाटों को सीकर जोड़ना । दो कपड़ो की लंबाई के किनारों को एक में सीना ।

डँड़ियारा गोला
संज्ञा पुं० [हिं० डंडा + गोला] दोहरे सिरे का खंबा (तोप का) गोला । लठिया । —(लश्०) ।

डँडीर
संज्ञा स्त्री० [हिं० डाँडी़] सीधी लकीर ।

डँडूर डँडूल
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'डंडूर,' 'डंडूल' ।

डँडोरना
क्रि० सं० [अनु०] ढूँढ़ना । हिलोरकर ढूँढ़ना । उलट पलटकर खोजना । उ०—अबकै जब हम दरस पावैं देहि लाख करोर । हरि सो हीरा खोई कै हम रहीं समुद डँडोर ।—सूर (शब्द०) ।

डँभाना पु †
क्रि० सं० [देश०] दगवाना । दाग दिलाना । उ०— करहउ कूडइ मनि थकइ पन राखीपउ जाण । ऊकरडी डोका चुगइ अपस इँभायउ आँण ।—ढोला०, दू० ३३६ ।

डँब †
संज्ञा पुं० [देश०] या हिं० दाँव] दाँव । मौका । युक्ति । जैसे, कोई डँव बैठ जाय तो काम होते क्या देर ।

डँबरुआ
संज्ञा पुं० [सं० डमरू] वात का एक रोग जिसमें शरीर के जोड़ जकड़ जाते है और उनमे दर्द होता है । गठिया । उ०—अहंकार अति दुखद डँवरुआ । दंभ कपट मद मान नहरुआ ।—तुलसी (शब्द०) ।

डँवरुआ साल
संज्ञा पुं० [सं० डमरू (वाद्य) + हिं० सालना] धातु या लकड़ी के दो टुकड़ों को मिलाने के लिये डमरू के समान एक प्रकार का जोड़ । विशेष—इसमें एक टुकड़े को एक ओर से चौड़ा और दूसरी ओर से पतला काटते हैं और दूसरे टुकड़े में उसी काट की नाप से गडढ़ा करते हैं और उस कटे हुए अंश को उसी गड़ढे में बैठा देते हैं । यह जोड़ बहुत दृढ़ होता है और खींचने से नहीं उखड़ता ।

डँवरू पु
संज्ञा पुं० [सं० डमरू] दे० 'डमरू' । उ०— चँवर घंट औ डँवरू हाथा । गौरा पारबती धनि साथ ।—जायसी गं०, पृ० ९० ।

डँवाडोल
[हिं० डाँव डाँव + डोलना] अस्थिर । चंचल । विचलित । घबाराया हुआ । जैसे, चित्त डँवाडोल होना । उ०— पावक पवन पानी भानु हिमवान जम काल लोकपाल मेरे डर डँवाडोल हैं ।—तुलसी (शब्द०) । क्रि० प्र०— होना ।

डँसना
क्रि० स० [सं० दंशन, प्रा० डंसण] दे० 'डसना' ।


संज्ञा पुं० [सं०] १. ध्वनि । शब्द । २. नागाड़ा । ३. बड़वाग्नि । ४. भय । ५. शिव (को०) ।

डउल †
संज्ञा पुं० [हिं० डौल] दे० 'डौल' ।

डऊ †
वि० [हिं० डौल] डील डौलवाला । वयस्क । बड़ा । जैसे,— इतने बड़े डऊ हुए, अक्ल नहीं आई ।

डक (१)
संज्ञा पुं० [अ० डॉक] १. एक प्रकार का पतला सफेद टाट (कनवास) जिससे छोटे दल के जहाजों के पाल बनाते हैं । २. एक प्रकार का मोटा कपड़ा ।

डक (२)
संज्ञा पुं० [अं०] १. किसी बंदरगाह या नदी के किनारे एक घिरा हुआ स्थान, जहाँ जहाज आकार ठहरते हैं और जिसका फाटक पानी में बना होता है । २. अदालत में वह स्थान जहाँ आभियुक्त खड़े किए जाते हैं । कटघरा ।

डकइत †
संज्ञा पुं० [हिं० डाका + इत (प्रत्य०)] दे० 'डकैत' ।

डकई
संज्ञा पुं० [हिं० ढाका (= एक नगर)] केले की एक जाति जो ढाका में होती है ।

डकना पु
क्रि० स० [हिं०] 'डाँकना' । लाँघना । उ०— कोउक तरुनि गुनमय सरीर तन सहित चली डकि । मात पिता पति बंधु रहे झुकि न रहीं रुकि ।—नंद ग्रं०, पृ० २६ ।

डकरना
क्रि० अ० [हिं० डकार] १. दे० 'डकारना' । २. दे० 'डकराना' ।

डकरा
संज्ञा पुं० [देश०] काली मिट्टी जो ताल की चँदिया में पानी सूख जाने पर निकलती है और जिसमें दरार फटे होते हैं ।

डकराना
क्रि० अ० [अनु०] बैल या भैंस का बोलना ।

डकवाहा †
संज्ञा पुं० [हिं० डाक] डाक का चपरासी । डाकिया ।

डकार
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. पेट की वायु का एकबारगी ऊपर की ओर छूटकर कंठ से शब्द के साथ निकल पड़ने का शरीरिक व्यापार । मुँह से निकला हुआ वायु का उदगार । क्रि० प्र०—आना ।—लेना । बिशेष— योग आदि के अनुसार डकार नाग वायु की प्रेरणा से आती है । मुहा०— डकार न लेना = (१) किसी का धन या कोई वस्तु उड़ाकर पता न देना । चुपचाप हजम कर जाना । (२) कोई काम करके उसका पता न देना । २. बाघ सिंह आदि की गरज । दहाड़ । गुर्राहट । क्रि० प्र०— लेना ।

डकारना
क्रि० अ० [हिं० डकार + ना (प्रत्य०)] १. पेट की वायु को मुँह से निकालना । डकार लेना । २. किसी का माल उड़ाकार ले लेना । किसी की वस्तु चुपचाप मार लेना । हजम करना । पचा जाना । जैसे,— वह सब माल डकार जायागा । संयो० क्रि०—जाना । ३. बाघ सिंह आदि का गरजना । दहाड़ना ।

डकूरा †
संज्ञा पुं० [देश०] चक्र की तरह घूमती हुई वायु । बवंडर । चक्रवात । बगूला ।

डकैत
संज्ञा पुं० [हिं डाका + ऐत (प्रत्य०)] डाका मारनेवाला । जबरदस्स्ती माल छीननेवाला । लुटेरा ।

डकैती
संज्ञा स्त्री० [हिं० डकैत] डकैत का काम । डाका मारने का काम । जबरदस्ती माल छीनने का काम । लूटमार । छापा ।

डकौत
संज्ञा पुं० [देश०] भड़्डर । भड्डरी । सामुद्रिक । ज्योतिष आदि का ढोंग रचनेवाला । विशेष—इनकी एक पृथक् जाति है जो अपने को ब्राह्मण कहती है, पर नीच समझी जाती है ।

डक्क पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० डाकिनी] दे० 'डाकिन' । उ०— सीत तुट्टे तुरी इक्क नद्दं करी ।—पृ० रा०, २४ । २११ ।

डक्करना पु †
क्रि० अ० [अनु०] हुकरना । ध्वानि करना । शब्द करना । उ०— बुभुष्खा बहु डाकिनी डक्करती ।—कीर्ति०, पृ० १०६ ।

डक्कारी
संज्ञा स्त्री० [सं०] चांडाल वीणा [को०] ।

डखना †
संज्ञा पुं० [अनु०] पखना । पंख ।

डग
संज्ञा पुं० [हिं० डाँकना या स० दक्ष] १. चलने में एक स्थान से पैर उठाकर दूसरे स्थान पर रखने की क्रिया की समाप्ति । कदम । उ०—मुरि मुरि चितवति नंदगली । डग न परत ब्रजनाथ साथ बिनु, बिरह व्यथा मचली । —सूर (शब्द०) । (ख) ज्यों कोउ दुरि चलन कौं करै । क्रम क्रम करि डग डग पग धरै ।—सूर०, ३१३ । क्रि० प्र०—पड़ना । मुहा०—डग देना = चलने में आगे की ओर पैर रखना । उ०— पुर ते निकसी रघुबीर बघु धरि धीर दियो मग ज्यों डग द्वै ।—तुलसी (शब्द०) । डग भरना = चलने में आगे पैर रखना । कदम बढ़ना । उ०—क्यों नहीं बेडिगे भरें डग हम । पाँव क्यों जाय डगमगा मेरा ।—चुभते०, पृ० १० । डग मारना = कदम रखना । लंबे पैर बढ़ाना । उ०—मारि डगै जब फिरि चली सुंदर बेनि दुरै सब अंग । मनहुँ चंद के बदन सुधा को उड़ि उड़ि लगत भुअँग ।—सूर (शब्द०) । २. चलने में जहाँ से पैर उठाया जाय और जहाँ रखा जाय उन दोनों स्थानों के बीच की दूरी । उतनी दूरी जितनी पर एक जगह से दूसरी जगह कदम पड़े । पैंड़ ।

डगकु पु
क्रि० वि० [हिं० डग + एक] एक दो पग । एकाध कदम । उ०—डगकु डगति सी चलि, ठठुकि चितई, चली निहारि । लिए जाति चितु चोरटी, वहै गोरटी नारि ।—बिहारी र०, दो० १३९ ।

डगचाली †
संज्ञा स्त्री० [सं० डाकिनी] डाकिनी । उ०—भूतप्रेत डगचाली मानूँ करत बत ।—नट०, पृ० १७० ।

डगडगाना
क्रि० अ० [अनु०] हिलना । इधर से उधर हिलना । काँपना । मुहा०—डगडगाकर पानी पीना तेजी के साथ = एक दम में बहुत सा पानी पीना ।

डगड़ी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० डगर] मार्ग । रास्ता । राह । उ०— बिगड़ी बनती, बन जाय सही । डगड़ी गड़ती, गड़ जाय मही ।—अर्चना, पृ० ९ ।

डगडोलना †
क्रि० अ० [हिं० डग + डोलना] डगमगाना । हिलना । काँपना । उ०—भीषम द्रोण करण सुनै कोउ मुखहू न बोलै । ए पांडव क्यों काढ़िए धरना डगडोलै ।—सूर (शब्द०) ।

डगडौर
वि० [हिं० डग + डोलना] डाँवाडोल । हिलनेवाला । चलायमान । उ०—श्याम को एक तुही जान्यो दुराचरनी और । जैसे घट पूरन न डोलै अधभरो डगडौर ।—सूर (शब्द०) ।

डगण
संज्ञा पुं० [सं०] पिंगल में चार मात्राओं का एक गण ।

डगना पु †
क्रि० अ० [सं० दक्ष (= चलना), हिं० डिगना या डग + ना (प्रत्य०)] १. हिलना । टसकना । खसकना । जगह छोड़ना । उ०—डगइ न संभु सरासन कैसे । कामी वचन सती मन जैसे ।—तुलसी (शब्द०) । २. चूकना । भूल करना । उ०—तुरँग नचावहि कुँवर बर अकनि मृदंग निसान । नागर नट चितवहिं चकित, डगहिं न ताल बँधान ।—तुलसी (शब्द०) । ३. डगमगाना । लड़खड़ाना । उ०— डगकु डगति सी चलि ठठुकि चितई चली निहारि । लिए जाति चितु चोरटी वहै गोरटी नारि ।—बिहारी र०, दौ० १३९ । मुहा०—डग मारना = हिलना । झटका खाना । जैसे,—उठाने पर आलमारी डग मारती है ।

डगबेड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० डग + बेड़ी] पैर की बेड़ी । उ०— बँध्यौ ठान मै आप पाय, डगबेड़ी पाग्यौ ।—ब्रज० ग्रं०, पृ० १६ ।

डगमग
वि० [हिं० डग + मग] हिलता डुलता । डगमगाता यालड़खड़ाता हुआ । उ०—बिहरत बिबिध बालक संग । डगनि डगमग पगनि डोलत, धूरि, धूसर अंग ।—सूर०, १० । १८४ । २. विचलित । निश्चयहीन ।

डगमगना पु
क्रि० अ० [हिं० डगमग] दे० 'डगमगाना' ।

डगमगाना
क्रि० अ० [हिं० डग + मग] १. इधर उधर हिलना डोलना । कभी इस बल कभी उस बल झुकना । स्थिर न रहना । थरथराना । लड़खड़ाना । जैसे, पैर डगमगाना, नाव डगमगाना । २. विचलित होना । किसी बात पर दृढ़ न रहना ।

डगमगाना † (२)
क्रि० स० १. हिलाना डुलाना । कंपित करना । २. विचलित करना । दृढ़ न रहने देना ।

डगमगी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० डगमग] डावाँडोल वृत्ति । विचलन । अस्थिरता । उ०—छुटि डगमगी नाहिं संत को बचन न मानै ।—पलटू०, भा० १, पृ० ३ ।

डगर
संज्ञा स्त्री० [हिं० डग] मार्ग । रास्ता । पथ । पैंड़ा । उ०— नगरक धेनु डगर के संजर । कुमुदिनि वसु मकरन्या ।— विद्यापति, पृ० ३३२ । मुहा०—डगर बताना = (१) रास्ता बताना । (२) उपाय बताना । उपदेश देना । डगर पाना = निकास पाना । स्थान पाना । उ०—प्रथमहिं गए डगर तिन पायौ । पाछे के लोगनि पछितायौ ।—सूर०, १० । ९१९ ।

डगरना पु †
क्रि० अ० [हिं० डगर] १. चलना । रास्ता लेना । धीरे धीरे चलना । उ०—तातै इतैं डगरी द्विजदेव न जानती कान्ह अजौं मग सुटै । —द्विजदेव (शब्द०) । २. लुढ़कना । गिरते पड़ते आगे बढ़ना । जे फूलन तुलतीं सुखिन अतुल तीं अति ही खुलतीं ते डगरीं ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० २८९ ।

डगबगर
संज्ञा स्त्री० [हिं० डगर + अनु० बगर] राह कुराह । उ०—जगर मगर महिं, डगर बगर नहिं रबि ससि, निसु दिन, भाव नहीं ।—केशव अमी०, पृ० १० ।

डगरा † (१)
संज्ञा पुं० [हिं० डगर] रास्ता । मार्ग । उ०—गुरु कह्यो राम नाम नीको मोहिं लागत राम राज डगरो सो ।—तुलसी (शब्द०) ।

डगरा † (२)
संज्ञा पुं० [देश०] बाँस की पतली फट्टियों का बना हुआ छिछला डला । डलरा । छ़ाबड़ा ।

डगराना †
क्रि० स० [हिं० डगरना] १. रास्ते पर ले जाना । ले चलना । चलाना । २. हाँकना । ३. लुढ़काना ।

डगरिया †
संज्ञा स्त्री० [हिं० डगर] दे० 'डगर' ।

डगरि †
संज्ञा स्त्री० [हिं० डगर] दे० 'डगर' । उ०—(क) जमुन भरन जल हम गई तहँ रोकत डगरी ।—सूर०, १० । १४२० । (ख) तू चला चले पकड़ी डगरी ।—आराधना, पृ० १८ ।

डगा †
संज्ञा पुं० [हिं० डागा] डागा । डुग्गी बजाने की लकड़ी । नगाड़ा बजाने की लकड़ी । चोब । उ०—हउँ सब कबितन्ह कर पछलगा । किछु कहि चला तबल देइ डगा ।—जायसी (शब्द०) ।

डगाना
क्रि० स० [हिं० डग] दे० 'डिगाना' ।

डगाल †
संज्ञा पुं० [देश०] टहनी । छोटी डाल । पतली शाखा । उ०—जहाँ झाड़ियाँ अधिक घनी होती हैं वहाँ वृक्षों की डगालों को काटकर वे जलाते हैं ओर फिर पानी बरस जाने के बाद बीज बोते हैं ।—शुक्ख० अभि० ग्रं०, (विवि०), पृ० ४० ।

डगावना पु
क्रि० स० [हिं० डिगाना] दे० 'डिगाना' । उ०— कवि बोधा अनी घबी नेजहु ते चढ़ि तावै न चित्त डगावनो है ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० ३, पृ० ६१८ ।

डग्गर
संज्ञा पुं० [सं० तर्क्षुं] १. कुत्ते या भेड़िये की तरह का एक मांसाहारी पशु । विशेष—यह पशु रात को शिकार की खोज में निकलता है और कभी कभी वस्ती से कुत्तों, बकरी के बच्चों आदि को उठा ले जाता है । यह कई प्रकार का होता है; पर मुख्य भेद दो हैं—चित्तीवाला और बारीवाला । यह एशिया और अफ्रीका के बहुत से भागों में पाया जाता है । यह देखने में बड़ा डरावना जान पड़ता है । इसका पिछला धडु छोटा और अगला भारी होता है । गरदन लंबी और मोटी होती हैं, कंधे पर खड़े खड़े बाल होते हैं । इसके दाँत बहुत पैने और तेज होते हैं । यह जानवर डरपोक भी बड़ा होता है । यह मुरदे खाकर भी रहता है । इसका कब्र में से गड़े मुरदे ले जाना प्रसिद्ध है । २. लंबी टाँगों का दुबला घोड़ा ।

डग्गा
संज्ञा पुं० [हिं० डग] लंबी टाँगों का दुबला घोड़ा ।

डच (१)
संज्ञा पुं० [अं०] हालड संबंधा । हालैंड का निवासी ।

डट
संज्ञा पुं० [देश०] निशाना ।

डटना (१)
क्रि० अ० [सं० स्थातृ, हिं० ठाट या ठाढ़] १. जमकर खड़ा होना । अड़ना । ठहरा रहना । जैसे,—वे सबेरे से मेले में डटे हुए हैं । संयो० क्रि०—जाना ।—जा डटना । मुहा०—डटा रहना = सामना करने या कठिनाई झेलने के लिये खड़ा रहना । न हटना । मुँह न मोड़ना । डटकर खाना = खूब पेट भर खाना । २. भिड़ना । लग जाना । छू जाना । ३. अच्छा लगना । फबना ।

डटना पु † (२)
क्रि० स० [सं० दृष्टि, हिं० डीठ] ताकना । देखना । उ०—(क) उर मानिक की उरबली डटत घटत दृग दाग । झलकत बाहर कढ़ि मनौ पिय हिय को अनुराग । (ख) लटकि लटकि लटकत चलत डटत मुकुट की छाहँ । चटक भरयो नट मिलि गयो, अटक भटक बन माँह ।—बिहारी (शब्द०) ।

डटाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० डटाना] १. डटाने का काम । २. डटाने की मजदूरी ।

डटाना
क्रि० स० [हिं० डटना] १. एक वस्तु को दूसरी वस्तु से लगाना । सटाना । भिड़ाना । २. एक वस्तु को दूसरी वस्तु से लगाकर आगे की ओर ठेलना । जोर से भिड़ाना । ३. जमाना । खड़ा करना ।

डट्टा
संज्ञा पुं० [हिं० डाटना] १. हुक्के का नैचा । टेरुआ । २. डाट । काग । गट्टा । ३. बड़ी मेख । ४. छींट छापने का ठप्पा । साँचा ।

डडकना † (१)
क्रि० अ० [अनु०] जोर से बजना या शब्द उत्पन्न होना । उ०—डडक्कंत डौरूँ चहूँ फेर सद्दं ।—प० रासो, पृ० ८२ ।

डडकना † (२)
क्रि० स० [अनु०] जोर से बजाना ।

डड़हा †
संज्ञा पुं० [सं० डुण्डुभ] एक सर्प । डेड़हा ।

डड़ही
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की मछली ।

डड़ियाना †
क्रि० स० [हिं० डाँड़ा] बनाना । डाँड़े के समान करना ।

डड़ीच †
संज्ञा स्त्री० [देश० या हिं० डाँड़ी] पंक्ति । उ०—मन में आवै तो दो डड़ींच लिख भेजना ।—श्यामा०, पृ० ६२ ।

डड्ढ
वि० [सं० दग्ध, प्रा० दड्ढ, डड्ढ] दग्ध । जला हुआ । तप्त । संतप्त [को०] ।

डड्ढार (१)
संज्ञा पुं० [सं० दंष्ट्राल, प्रा० डड्ढाल] दे० 'डड्ढाल' । उ०—डिढ न रहे डड्ढार बाघ बनचर बन डुल्लिय ।—सूदन (शब्द०) ।

डड्ढार (२)
वि० [सं० दंष्ट्रा, हिं० डाढ़, डाढ़ी] बड़ी डाढ़ी रखनेवाला । विशेष—मध्य काल में और आज भी बड़ी डाढ़ी रखना वीरों का वेश समझा जाता है ।

डड्ढाल †
संज्ञा पुं० [सं० दंष्ट्राल प्रा० डड्ढाल] वाराह । शूकर । उ०—ढुंढत डढांल डड्ढाल त्रिय भुक्कारन बहु भुक्करहिं ।— पृ० रा०, ६ । १०२ । पृ० (उ०), पृ० १२२ ।

डड्ढार (३)
वि० [सं० दृढ़, प्रा० डिढ़; हिं० डिढ़] दृढ़ हृदय का । साहसी ।

डढ़न पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दग्ध, प्रा० डड्ढ, या सं० दहन] जलन । ताप । उ०—भक्ति लता फैलन लगी दिन दिन होत पाप को डढ़न ।—देवस्वामी (शब्द०) ।

डढ़ना पु
क्रि० अ० [सं० दग्ध, प्रा० डढ्ड + ना (प्रत्य०)] जलना । सुलगना । बलना । उ०—डढ़ै मनु रूप लसैं इह रूप । गढ़े जिमि कैयक हैं महि भूप ।—सुदन (शब्द०) । २. जलना । ताप से पीड़ा होना । जलन होना । उ०—अँचवत पय तातौ जब लाग्यौ रोवत जीभि डढ़ै ।—सूर०, १० । १७४ ।

डढ़ार (१)
संज्ञा पुं० [सं० दंष्ट्राल] दे० 'डड्ढार' (१) ।

डढ़ार † (२)
वि० [हिं० डाढ़] १. डाढ़वाला । जिसे डाढ़ हो । २. डाढ़ीवाला ।

डढ़ारा
वि० [हिं० डाढ़] १. डाढ़वाला । वह जिसके डाढ़ैं हो । दाँतवाला । २. वह जिसे डाढ़ी हो ।

डढ़ाल पु
संज्ञा पुं० [सं० दंष्ट्राल, प्रा० डड्ढाल] दे० 'डड्ढ़ार' । उ०— सोमेस सुतन आखेट डर इम डढ़ाल उस सह चसहि ।—पृ० रा०, ६ । १०१ । पृ० रा० (उ०), पृ० १२३ ।

डढ़ियल
वि० [हिं० डाढ़ी] डाढ़ीवाला । जिसके बड़ी डाढ़ी हो ।

डढ़ुआ †
संज्ञा पुं० [सं० दृढ़] बर्रे, गेहूँ, चने का तेल जो मोठ में मजबूती के लिये लगाया जाता है ।

डढ्ढना
क्रि० स० [सं० दग्ध, प्रा० डड्ठ + हिं० ना (प्रत्य०)] जलाना ।

डढयोरा पु
वि० [हिं० डाढ़ी] डाढ़ीवाला । उ०—सित असित डढयोरे दीह तन सजि सनेह रोसन सने ।—सूदन (शब्द०) ।

डपट (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० दर्प] डौट । झिड़की । घुड़की ।

डपट (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० रपट] दौड़ । घोड़े की तेज चाल । सरपट चाल ।

डपटना (१)
क्रि० स० [हिं० डपट + ना (प्रत्य०)] डाँटना । क्रोध में जोर से बोलना । कड़े स्वर से बोलना ।

डपटना (२)
क्रि० अ० [हिं० रपटना] तेज दौड़ना । वेग से जाना ।

डपोरसंख
संज्ञा पुं० [अनु० डपोर (= बड़ा)+ सं० शड्ख, प्रा० संख] १. जो कहे बहुत, पर कर कुछ न सके । डींग मारने— वाला । विशेष—इस शब्द के संबंध में एक कहानी प्रचलित है । एक ब्राह्मण ने दरिद्रता से दुखी हो समुद्र की आराधना की । समुद्र ने प्रसन्न होकर उसे एक बहुत छोटा सा संख दिया । और कहा कि यह ५००) रोज तुम्हें दिया करेगा । जब उस ब्राह्मण ने उस संख से बहुत सा धन इकट्ठा कर लिया तब एक दिन अपने गुरु जी को बुलाया और बड़ी धूम धाम से उनका सत्कार किया । गुरु जी ने उस संख का हाल जान लिया और वे धीरे से उसे उड़ा ले गए । ब्राह्मण फिर दरिद्र हो गया और समु्द्र का पास गया । समुद्र ने सब हाल सुनकर एक बहुत बड़ा सा संख दिया और कहा कि 'इससे भी गुरु जी के सामने रुपया माँगना, यह खूब बढ़ बढ़कर बातें करेगा, पर देगा कुछ नहीं । जब गुरु जी इसे माँगें तो दे देना और पहलेवाला छोटा संख माँग लेना' । ब्राह्मण ने ऐसा ही किया । जब ब्राह्मण ने गुरु जी के सामने उस संख से ५००) माँगा तब उसने कहा—'५००) क्या माँगते हो, दस बीस पचास हजार माँगो' । गुरु जी को यह सुनकर लालच हुआ और उन्होने वह संख लेकर छोटा संख ब्राह्मण को लौटा दिया । गुरु जी एक दिन उस बड़े संख से माँगने बैठे । पर वह उसी प्रकार और माँगने के लिये कहता जाता, पर देता कुछ नहीं था । जब गुरु जी बहुत व्यग्र हुए, तब उस बड़े संख ने कहा—'गता सा शांखिनी, विप्र ! या ते कामान् प्रपूरयेत् । अहं डपोरशं— खाख्यो वदामि न ददामि ते' । २. बड़े डीलडौल का पर मूर्ख । देखने में सयाना पर बच्चां की सी समझवाला ।

डप्पू
वि० [देश०] बहुत बड़ा । बहुत मोटा ।

डफ
संज्ञा पुं० [अ० दफ़०] १. चमड़ा मढ़ा हुआ एक प्रकार का बड़ा बाजा जो लकड़ी से बजाया जाता है । डफला । उ०— (क) दिन डफ ताल मृदंग बजावत गात भरत परस्पर छिन छिन होरी ।—स्वामी हरिदास (शब्द०) । (ख) कहै पदमाकर ग्वालन के डफ बाजि उठे गलगाजत गाढ़े । —पद्माकर (शब्द०) । २. लावनीबाजों का बाजा । चंग । विशेष—यह लकड़ी के गोल बड़े मेंड़रे पर चमड़ा मढ़कर बनाया जाता है । होली में इसे बजाते हुए निकलते हैं ।

डफनी
संज्ञा स्त्री० [अ० दफ़] दे० 'डफली' । उ०—मढ़ि मढ़ि मृदंग डफनी डफ दुंदुभि ढोल सुपीट बजाया है ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० २९७ ।

डफर
संज्ञा पुं० [अं० ड्रापर] जहाज के एक तरफ का पाल ।

डफला
संज्ञा पुं० [अं० दफ़] डफ नाम का बाजा ।

डफली
संज्ञा स्त्री० [अ० दफ़] छोटा डफ । खँजरी । मुहा०—अपनी अपनी डफली अपना अपना राग = जितने लोग उतनी राय ।

डफाण पु
संज्ञा पुं० [सं० दम्भन, दम्भना; फा० डंभणा, कुमा० डंफाणा, पुं० हिं० दंभान] पाखंड । आडंबर । दंभ । उ०— काहे रे नर करहु डफाण, अंतिकालि घर गोर मसाण ।— दादू०, पृ० ४८४ ।

डफार †
संज्ञा स्त्री० [अनु०] चिग्धाड़ । जोर से रोने या चिल्ला उठने का शब्द । उ०—ततखन रतनसेन अति घबरा । छाँड़ि डफार पांय लै परा ।—जायसी (शब्द०) ।

डफारना †
क्रि० अ० [अनु०] चिल्लाना । दहाड़ मारना । जोर से रोना या चिल्लाना । उ०—जाय बिहंगम समुद डफारा । जरे मच्छ, पानी भा खारा ।—जायसी (शब्द०) ।

डफालची
संज्ञा पुं० [हिं० डफला] दे० 'डफाली' ।

डफाली
संज्ञा पुं० [हिं० डफला] डफला बजानेवाला । एक मुसलमान जाति । विशेष—यह जाति डफला बजाती तथा डफ, ताशे ढोल आदि चमड़े के बाजों क मरम्मत करती है । अवध में डफाली डफला बजाकर गाजी मियाँ के गीत गाते और भीख माँगते फिरते हैं ।

डफोरना †
क्रि० अ० [अनु०] हाँक देना । चिल्लाना । ललकरना । गरजना । उ०—बचन विनीत कहि सीता को प्रबोध करि तुलसी त्रिकूट चढ़ि कहत डफोरि कै ।—तुलसी (शब्द०) ।

डफोल †
संज्ञा पुं० [हिं० डपोर] बकवास । निरर्थक बात । उ०— मोटे मीर कहावते, करते बहुत डफोल ।—सुदंर ग्रं०, भा० १, पृ० ३१७ ।

डफ्फ पु
संज्ञा पुं० [अ० दफ़, हिं० डफ] दे० 'डफ' । उ०—बीती जात बहार सँबत लगने पर आया । लीजै डफ्फ बजाय सुभग मानुष तनया या ।—पलटु०, भा० १, पृ० २० ।

डब (१)
संज्ञा पुं० [सं० द्रव] तरल । जैसे, आँखों का डब डब होना । विशेष—इस शब्द का स्वतंत्र प्रयोग नहीं मिलता । डबक, डबकना, डबकौंहँ आहि प्रचलित शब्दौं में इसका रूप मिलता है ।

डब (२)
संज्ञा पुं० [हिं० डब्बा] १. जेब । थैला । मुहा०—डब पकड़कर कुछ कराना = गरदन पकड़कर कुछ काम कराना । गला दबाकर काम कराना । जैसे,—रुपया देगा कैसे नहीं डब पकड़कर लूँगा । डब में आना = वश में होना । काबू में आना । २. कुप्पा बनाने का चमड़ा ।

डबकना (१)
क्रि० स० [हिं० डब] किसी धातु की चद्दर को कटोरी के आकार का गठन करना ।

डबकना (२)
क्रि० अ० [अनु०] १. पीड़ा करना । टपकना । दर्द देना । टीस मारना । २. लँगड़ाकर चलना ।

डबकना पु (३)
क्रि० अ० [सं० द्रव या द्रवक] तरलित होना । अश्रुपूर्ण होना । (नेत्रों में) आँसू भर आना ।

डबकौहाँ
वि० [अनु० या हिं० डबकना] [वि० स्त्री० डबकौहीं] आँसू भरा हुआ । डबडबाया हुआ । अश्रुपूरित । गीला । उ०—बिलखी डबकौंहें चखन, तिय लखि गमन बराय । पिय गहबर आयो गरौ राखी गरै लगाय ।—बिहारी (शब्द०) ।

डबडबाना
क्रि० अ० [अनु०, या हिं० डब डब] आँसू से आँखें भर आना । आँसू से (आँखों का) गीला होना । अश्रुपूर्ण होना । जैसे, आँखें डडडबाना । उ०—(क) जब जब सुरति करत तब तब डबडबाइ दोउ लोचन उमगि भरत ।—सूर (शब्द०) । (ख) उ०—डबडबाय आँखन में पानी । बूढ़े तन की यही निसानी ।—सहजो०, पृ० ३० । संयो० क्रि०—आना ।—जाना । विशेष—इस शब्द का प्रयोग 'आँख' के साथ तो होता ही है, 'आँसू' के साथ भी होता है ।

डबर †
संज्ञा पुं० [सं० डम्बर] आडंबर । उ०—डेराथी साजै डबर, यह इम कीध पयाण । करवा सुराँ सहायकज असुराँ सूँ आरण ।—रघु० रू०, पृ० १७३ ।

डबरा
संज्ञा पुं० [सं० दभ्र (= समुद्र या झील)] [स्त्री० अल्पा० डबरी] १. छिछला लंबा गड्ढा जिसमें पानी जमा रहे । कुंड । हौज । २. वह नीची भूमि का टूकड़ा जिसमें पानी लगता हो । ३. खेत का कोना जोतने में छूट जाता है । †४. कटोरा । पात्र ।

डबरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० डबरा] छोटा गड्ढा या ताल ।

डबल (१)
वि० [अं०] दोहरा । दूना । दोगुना । उ०—डबर जीन और गर्मी में भी फलालीन ।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० २५९ ।

डबल (२)
संज्ञा पुं० [सं० द्रम्य?] पैसा । अँग्रेजी राज्य का पैसा ।

डबलरोटी
संज्ञा स्त्री० [अं० डबल + हिं० रोटी] पावरोटी ।

डबलविक
वि० [अं०] दोहरी बत्ती ।

डबला
संज्ञा पुं० [देश०, तुल० हिं० डबरा] मिट्टी का पुरवा । कुल्हड़ । चुक्कड़ ।

डबा †
संज्ञा पुं० [हिं० डब्बा] दे० 'डब्बा', 'डिब्बा' ।

डबारी पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० डबरा] गड़ही । उ०—को है कूप, गंगाजल को है, को है सलिल डबारी ।—गुलाल०, पृ० ५२ ।

डबिया †
संज्ञा स्त्री० [हिं० डब्बा] छोटा डिब्बा । डिबिया ।

डबिरना †
क्रि० स० [देश०] खेत में से भेड़ों को निकाल लाना । (गड़ेंरियों की बोली) ।

डबी पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० डबा] दे० 'डब्बी', 'डिब्बी' । उ०—कंचन की झख रूप डबीन मैं खोल धरो मनौ नील नगी है ।— सुंदरी सर्वस्व (शब्द०) ।

डबुआ †
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'डबुलिया' । उ०—मिट्टी का कुल्हड़ या डबुआ बुरा नहीं मालूम होता ।—आधुनिक०, पृ० १६५ ।

डबुलिया †
संज्ञा स्त्री० [देश०] कुल्हिया । छोटा पुरवा ।

डबोना
क्रि० स० [अनु० डब डब, या सं० द्रवण] १. डुबाना । गोता देना । बोरना । मग्न करना । २. बिगाड़ना । नष्ट करना । चौपट करना । मुहा०—नाम डबोना = नाम में धब्बा लगाना । ख्याति नष्ट करना । वंश डबोना = वंश की मर्यादा नष्ट करना । कुल में कलंक लगाना । लुटिया डबोना = महत्व नष्ट करना । प्रतिष्ठा खोना ।

डब्वल †
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'डबल' ।

डब्बा
संज्ञा पुं० [तैलंग । वा सं० डिम्ब (=गोल)] १. ढक्कनदार छोटा गहरा बरतन जिसमें ठीस या भुरभुरी चीजें रखी जाती हैं । संपुट । २. रेलगाड़ी की एक गाड़ी ज अलग हो सकती हो ।

डब्बू
संज्ञा पुं० [हिं० डब्बा, तुल० देशी डोअ, गुज० डोयो] डाँड़ी लगा हुआ एक प्रकार का कटोरा जिससे परोसने का काम लिया जाता है ।

डभक
वि० [सं० स्तवक, या देश०] ताजा । पेड़ या पौधे से तत्काल तोड़ा हुआ । उ०—एक पीला सा डभक अमरूद उसने हाथ बढ़ाकर उठा लिया ।—नई०, पृ० १२९ ।

डभकना †
क्रि० अ० [अनु० डभ डभ या सं० द्रव] १. पानी में डूबना, उतरना । चुभकी लेना । २. (आँखों का) डबडबाना । (नेत्रों में) जल भर आना । उ०—बदन पियर जल डभकहिं नैना । परगट दुऔ पेम के बैना ।—जायसी (शब्द०) ।

डभका (१)
संज्ञा पुं० [हिं० डभकना] कुएँ से ताजा निकाला हुआ (पानी) । ताजा । †२. अश्रु । नेत्रजल ।

डभका † (२)
संज्ञा पुं० [देश०] १. भूना हुआ मटर या चना जो फूटा न हो । कोहरा ।

डभकौरी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० डभकना] उरद की पीठी की बरी जो बिना तले हुए कढ़ी में डाल दी जाती है । डुभकी । उ०—पानौरा राइता पकौरी । डभकौरी मुँगछी सुठि सौरी ।—सूर (शब्द०) ।

डभकौहाँ
वि० [हिं०] दे० 'डबकौहाँ' ।

डम
संज्ञा पुं० [सं०] एक नीच या वर्णसंकर जाति जिसे ब्रह्मवैवतं पुराण ने लेट और चांडली से उत्पन्न माना है । डोम ।

डमकना (१)
क्रि० अ० [अनु०] ध्वनि या शब्द करना (ढोल आदि का) ।

डमकना पु (२)
क्रि० अ० [हिं० दमकना] चमकना । द्योतित होना । उ०—चोपग चिंतामण वणक, वे डमक्या बरबार ।—बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० ७५ ।

डमडम
संज्ञा स्त्री० [अनु०] डमरू बजाने से होनेवाली आवाज । उ०—एक नाद का यही अंत हो, डम डम डमरू बजे फिर शांत ।—वाणी, पृ० ४८ ।

डमर
संज्ञा पुं० [सं०] १. भय से पलायन । भगेड़ । भगदजड़ । २. हलचल । उपद्रव । ३. गाँवों के साधारण संघर्ष (को०) ।

डमरु
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'डमरू' । उ०—खुनखुनाकर हँसत हरि, हर हँसत डमरु बजाइ ।—सूर०, १० । १६० ।

डमरुआ
संज्ञा पुं० [सं० डमरू] वात का एक रोग जिससे जोड़ों में दर्द होता है । गठिया । यौ०—डमरुआ साल = दे० 'डँवरुआ साल' ।

डमरुका
संज्ञा स्त्री० [सं०] हाथों की के तात्रिंक मुद्रा [को०] ।

डमरू
संज्ञा पुं० [सं० डमरू] १. एक बाजा जिसका आकार बीच में पतला और दोनों सिरों की और बारबार चौड़ा होता जाता है । विशेष—इस वाद्य के दोनों सिरों पर चमड़ा मढ़ा होता है । इसके बीच में दो तरफ बराबर बढ़ी हुई डोरी बँधी होती है जिसके दोनों छोटों पर एक एक कोड़ी या गोली बँधी होती है । बीच में पकड़कर जब बाजा हिलाया जाता है तब दोनों कौड़ियाँ चमड़ें पर पड़ती है और शब्द होता है । यह बाजा शिव जी को बहुत प्रिय है । बंदर नचानेवाले भी इस प्रकार का एक बाजा अपने साथ रखते हैं । २. डमरू के आकार की कोई वस्तु । ऐसी वस्तु जो बीच में पतली हो और दोनों और बारबर चौड़ी (उलटी गावदुम) होती गई हो । यौ०—डमरूमध्य । ३. एक प्रकार का दंडक वृत्त जिसके प्रत्येक चरण में ३२ लघु वर्ण होते हैं । जैसे,—रहत रजत नग नगर न गज तट गज खल कलगर गरल तरल धर । भिखारीदास ने इसी का नाम जलहरण लिखा है ।

डमरूमध्य
संज्ञा पुं० [सं० डमरू+ मध्य] धरती का वह तंग पतला भाग जो दो बड़े बड़े भूखंड़ों को मिलता हो । यौ०—जमडमरूमध्य = जल का वह तंग पतला भाग जो जल को दो बड़े भागों को मिलता हो ।

डमरूयंत्र
संज्ञा पुं० [सं० डमरू + यन्त्र] एक प्रकार का यंत्र या पात्र जिसमें अर्क खींचे जाते तथा सिंगरफ का पारा, कपूर, नौसादर आदि उड़ाए जाते हैं । विशेष—यह दो घड़ों का मुँह मिलाकर और कपड़मिट्टी से जोड़कर बनाया जाता है । जिस वस्तु का अर्क खींचना होता है उसे घड़ों का मुँह जोड़ने के पहले पानी के साथ एक घड़े में रख देते हैं ओर फिर सारे यंत्र को (अर्थात् दोनों जुड़े घड़ों को) इस प्रकार आड़ा रखते हैं कि एक घड़ा आँच पर रहता है और दूसरा ठंढ़ी जगह पर । आँख लगने से वस्तु मिले हुए पानी की भाप उड़कर दूसरे घड़े में जाकर टपकती है । यही टपका हुआ जल उस वस्तु का अर्क होता है ।सिंगरफ से पारा उड़ाने के लिये घड़ों को खड़े भल नीचे ऊपर रखते हैं । नीचे रके घड़े के पेंदे में आँच लगती है और ऊपर के घड़ें के पेंदे को गीला कपड़ा आदि रखकर ठंढा रखते हैं । आँख लगने पर सिंगरफ से पारा उड़कर ऊपरवाले घड़े के पेंदे में जम जाता है ।

डयन
संज्ञा पुं० [सं०] १. उड़ान । ड़ने की क्रिया । २. पालकी (को०) ।

डर
संज्ञा पुं० [सं० दर] १. दुःखपूर्ण मनोवेग लो किसी अनिष्ट या हानि की आशंका से उत्पन्न होता और उस (अनिष्ट वा हानि) से बचने के लिये आकुलता उत्पन्न करता है । भय । भीति । खौफ । त्रास । उ०—नाथ लखनु पुरु देखत चहहँ । प्रभु संकोच डर प्रकट न कहहीं ।—मानस, १ । २१८ । क्रि० प्र०—लगना ।—खाना । उ०—पैग पैग भुँइ चाँपत आवा । पंखिन्ह देखि सबन्हि डर खावा ।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० १६५ । मुहा०—डर के मारे = भय के कारण । २. अनिष्ट की संभावना का अनुमान । आशंका । जैसे,—हमें डर है कि वह कहीं भटक न जाय ।

डरना
क्रि० अ० [हिं० डर + ना (प्रत्य०)] १. किसी अनिष्ट या हानि की आशंका से आकुल होना । भयभीत होना । खौफ करना । सशंक होना । संयो० क्रि०—उठना ।—जाना । २. आशंका करना । अंदेशा करना ।

डरपक
वि० [हिं० डार + सं० पक्व] डार में ही पका हुआ (फल) । उ०—किधौं सु डरपक आम में मनि ह्वै मिल्यो मलिंद । किधों तनक ह्वै तम रह्यो कै ठोढ़ी को विंद ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० २०० ।

डरपना †
क्रि० अ० [हिं० डर] डरना । भयभीत होना । उ०— (क) इंद्रहु को कछु दूषन नाहीं । राजहेतु डरपत मन माहीं ।—सूर (शब्द०) । (ख) एकहि डर डरपत मन मोरा । प्रभु मोहि देब साप अति घोरा ।—तुलसी (शब्द०) ।

डरपाना †
क्रि० स० [हिं० डरपना] डराना । भयभीत करना ।

डरपुकना
वि० [हिं० डरपोकना] दे० 'डरपोक' । उ०—सिपारसी डरपुकने सिट्टू बोलै बात अकासी ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० ३३३ ।

डरपोक
वि० [हिं० डरना + पोंकना] बहुत डरनेवाला । भीरु । कायर ।

डरपोकना †
वि० [हिं० डरना + पोंकना] दे० 'डरपोक' ।

डरवाना (१)
क्रि० स० [हिं० डर] दे० 'डराना' ।

डरवाना † (२)
क्रि० स० [हिं० डालना] दे० 'डलवाना' ।

डरा †
संज्ञा पुं० [हिं० डला] [स्त्री० डरी] ढोका । डला । टुकड़ा ।

डराकू †
वि० [हिं० डरना] १. बहुत डरनेवाला । भीरु । २. डराने या भय उत्पन्न करनेवाला ।

डराडरि
संज्ञा स्त्री० [हिं० डर] दे० 'डराडरी' । उ०—जब आनि घेरत कटक काम को तब जिय होत डराडरि ।—स्वामी हरिदास (शब्द०) ।

डराडरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० डर] डर । भग । आशंका ।

डरान
वि० [हिं० डरावना] भयदायक । भयावना । भंयकर । उ०— डहकंत डङ्क डाइन डरान । गहकंत गिद्ध सिद्धनिय थान ।— पृ० रा०, १ । ६६१ ।

डराना
क्रि० स० [हिं० डरना] डर दिखाना । भयभीत करना । खोफ दिलाना । संयो० क्रि०—देना ।

डरानी
वि० [हिं० डरना] १. खौफ पैदा करनेवाली । भयावनी । २. डरी हुई । भयभीत । उ०—बोलै यों डरानी भावासिंह जू के डर मैं ।—मति० ग्रं०, पृ० ४१८ ।

डरापना
क्रि० स० [हिं० डर] किसी को डरा देना । भयभीत करना ।

डरारा पु †
वि० [हिं० डोरा + आर (प्रत्य०)] (आँख) जिसमें डोरे या हलकी रक्ताम रेखा हो । मस्त (आँख) । उ०—मीन मधुर पंकज मृग हारै । निरखत लोचन जुगम डरारे ।— माधवानन०, पृ० १९० ।

डरावना
वि० [हिं० डर + आवना (प्रत्य०)] [वि० स्त्री० डरावनी] जिससे डर लगे । जिससे भय उत्पन्न हो । भयानक । भयंकर । उ०—कारी घटा डरावनी आई । पापिनि साँपिनि सी थरि छाई ।—नंद० ग्रं०, पृ० १९१ ।

डरावा
संज्ञा पुं० [हिं० डराना] १. वह लकड़ी जो फलदार पेड़ों में चिड़ियाँ उड़ाने के लिये बँधी रहती है । इसमें एक लंबी रस्सी बँधी होती है जिसे खींचने से खट खट शब्द होता है । खट— खटा । घड़का । †२. डराने की दृष्टि से कही बात ।

डराहुक †
वि० [हिं० डरना] डरपोक ।

डरिया (१) †
संज्ञा स्त्री० [हिं० डार + इया (प्रत्य०)] दे० 'डार' या 'डाल' । उ०—अबके राखि लेहु भगवान । हम अनाथ बैठे द्रुम डरिया पारधि साधे बान ।—सूर (शब्द०) ।

डरिया (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० डलिया] दे० 'डलिया' । उ०—सीसनि धरै छाक की डरियनि । तकति गुपाल भूख की बरियनि ।— घनानंद०, पृ० ३१७ ।

डरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० डली] दे० 'डली' । उ०—परतीति दै कीनी अनीति महा, विष दीनौ दिखाय मिठास डरी ।— घनानंद, पृ० ८१ ।

डरीला † (१)
वि० [हिं० डार] डारवाला । शाखायुक्त । टहनीदार । उ०—हौदन दचीले तरु टूटत डरीले, शैल होत है फटीले शेष फन चमकीले है ।—रघुराज (शब्द०) ।

डरीला † (२)
वि० [हिं० डर + ईला (प्रत्य०)] दे० 'डरैला' ।

डरेरना †
क्रि० स० [हिं० दरेरना] दे० 'दरेरना । उ०—भुजा जोरि कै तोर मुक्की डरेरै ।—प० रासो, पृ० ४५ ।

डरैला †
वि० [हिं० डर] डरावना । भयानक । खौफनाक । उ०— बिटरन अंडा घरतच नाद उच्चरत डरैला ।—श्रीधर पाठक (शब्द०) ।

डल (१)
संज्ञा पुं० [हिं० डला (= टुकड़ा)] टुकड़ा । खंड । मुहा०—डल का डल = ढेर का ढेर । बहुत सा ।

डल (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० तल्ल] १. झील । २. काश्मीर की एक झोल । उ०—धनि सागर सस तूल, विमल विस्तृत डल वूलर ।—काश्मीर०, पृ० १ ।

डलई
संज्ञा स्त्री० [हिं० डला] दे० 'डलिया' ।

डलक
संज्ञा पुं० [सं०] दौरा । डला । बाँस आदि की बनी बड़ी डलिया [को०] ।

डलना
क्रि० अ० [हिं० डालना] डाला जाना । पड़ना । जैसे, झूला डलना ।

डलरी †
संज्ञा स्त्री० [ह० डलिया] छोटी डलिया । मूँज की बनी हुई छोटी पिटारी । उ०—नए बसन आभूषण सजि डलरी गुड़िया लै ।—प्रेमघन०, भा० १, पृ० २९ ।

डलवा
संज्ञा पुं० [हिं० डला] 'डला (२)' ।

डलवाना
क्रि० स० [हिं० डालना का प्रे० रूप] डालने का काम कराना । डालने देना ।

डला (१)
संज्ञा पुं० [सं० दल] [स्त्री० अल्पा० डली] १. टुकड़ा । ढौंका । खंड । उ०—रीठ पड़े धारू जलाँ, अर धड़ डला उधेड़ ।—रा० रू०, पृ० २६० । विशेष—साधारणतः इसका प्रयोग नमक, मिस्त्री आदि के लिये अधिक होता है । जैसे, नमक का डला, मिस्त्री आदि के डली । २. लिंगेंद्रिय ।—(बाजारू) ।

डला (२)
संज्ञा पुं० [सं० डलक] [स्त्री० अल्पा० डलिया] बाँस, बेंत आदि कौ पतली फट्ठियों या कमचियों को गाँछकर बनाया हुआ बरतन । टोकरा । दोरा । उ०—डला भरि हो लाल । कैसैं कै उठाऊँ । पठवौ ग्वाल छाक लै आवैं ।—नंद०, ग्रं०, पृ० ३६० । यौ०—डला खुलवाई = बनियों के यहाँ विवाह की एक रीति जिसमें दूल्हा दुलहन के यहाँ एक टोकरा लाता है ।

डलिया
संज्ञा स्त्री० [हिं० डला] छोटा डला । छोटा टोकरा । दौरी । उ०—प्रेम के परवर धरो डलिया में, आदि की आदी लाई । ज्ञान के गज्ञरा दृढ़ करि राखो गगन में हाट लगाई ।—कबीर श०, भा० ३, पृ० ४८ ।

डली (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० डला] १. छोटा टुकड़ा । छोटा ढेला । खंड । जैसे, मिश्री की डली, नमक की डली । २. सुपारी ।

डली (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० डला] दे० 'डलिया' । उ०—चुने डली में सुथरे, बड़े बड़े भरे भरे ।—बेला, पृ० १६ ।

डल्लक
संज्ञा पुं० [सं०] डला । दौरा ।

डल्ला †
संज्ञा पुं० [सं० डल्लक] दौरा ।

डवँरुआ
संज्ञा पुं० [सं० डमरु] दे० 'डँवरुआ' ।

डवँरू
संज्ञा पुं० [सं० डमरु] दे० 'डमरू' ।

डवँरुआ
संज्ञा पुं० [सं० डमरु] दे० 'डमरू' ।

डवा पु †
संज्ञा पुं० [हिं० डबा] दे० 'डिब्बा' । उ०—बिष को डवा है कै उदेघ को अँवा है, कल पलकौ न बाहै अथवा है चक्र बात को ।—घनानंद, पृ० ८० ।

डवित्थ
संज्ञा पुं० [सं०] काठ का बना हुआ मृग ।

डस
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. एक प्रकार की शराब । राम । २. तराजू की डोरी जिसमें पलड़ैं बँधे रहते हैं । जोती । ३. कपड़े की थान का छोर जिसमें ताने और बाने के पूरे तागे नहीं बुने रहते । छीर ।

डसण †
संज्ञा पुं० [सं० दशन; प्रा० डसण] दाँत । दशन । उ०—हीर डसण बिद्रम अधर, मारू भृकुटि मयंक ।—ढोला०, दू० ४५४ ।

डसन
संज्ञा स्त्री० [सं० दर्शन] १. डसने की क्रिया या भाव । २. डसने या काटने का ढंग । उ०—यह अपराध बड़ो उन कीने । नक्षत्र डसन साप मै दीनौ ।—सूर (शब्द०) ।

डसना (१)
क्रि० स० [सं० दंशन] १. किसी ऐसे कीड़े का दाँत से काटना जिसके दाँत में विष हो । साँप आदि जहरीले कीड़ों का काटना । उ०—अरे अरे कान्हु कि रभसि बोरि । मदन भुजंग डसु बालहि तोरि ।—विद्यापति, पृ० ३६९ । २. डंक मारना । संयो० क्रि०—लेना ।

डसना (२)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'डासन', 'दसना' । उ०—सुंदर सुमनन सेज बिछाई । अरगज मरगज डसनि डसई ।—नंद ग्रं०, पृ० १४१ ।

डसनी
वि० [सं० दंश, प्रा० डंस] काटनेवाली । उ०—सिसु— घातिनी परम पापिनी । संतानि की डसनी जु साँपिनी ।—नंद० ग्रं०, पृ० २३९ ।

डसवाना
क्रि० स० [हिं०] दे० 'डसाना' ।

डसा †
संज्ञा पुं० [सं० दंश] डाढ़ । चौभड़ ।

डसाना † (१)
क्रि० स० [हिं० डासना] बिछाना । उ०—'हे राम' खचित यह वही चैतरा भाई । जिसपर बापू ने अंतिम सेज डसाई ।— सूत० पृ० १३७ ।

डसी † (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० दसी] दे० 'दसी' ।

डसी (२)
संज्ञा स्त्री० पहचान या परिचय की वस्तु । पहचान के लिये दिया हुआ चिह्न । चिन्हानी । निशानी । सहदानी ।

डस्टर
संज्ञा पुं० [अं०] गर्द झाड़ने का कपड़ा । झाड़न ।

डहँकना
क्रि० स० [हिं० डहकना] दे० 'डहकना' । उ०—कह दरिया मन डहँकत फिरै ।—दरिया० बानी, पृ० ३५ ।

डहक
वि० [?] संख्या में छह । ६ ।—(दलाल) ।

डहकना (१)
क्रि० स० [हिं० डाका] १. छल करना । धोखा देना । ठगना । जटना । उ०—डहकि डहकि परचेहु सब काहू । अति असंक मन सदा उछाहू ।—तुलसी (शब्द०) । २. किसी वस्तु को देने के लिये दिखाकर न देना । ललचाकर न देना । उ०—खेलत खात, परस्पर डहकत, छीनत कहत करत रुग— दैया ।—तुलसी (शब्द०) ।

डहकना (२)
क्रि० अ० [हिं० डहाड़, धाड़] १. रोने में रह रहकर शब्द निकालना । बिलखना । विलाप करना । उ०—काल बदन ते राखि लीनो इंद्र गर्व जे खोई । गोपिनी सब ऊधो आगे डहकि दीनो रोइ ।—सूर (शब्द०) । २. हुँकारना । डकारलेना । दहाड़ मारना । गरजना । उ०—इक दिन कंस असुर इक प्रेरा । आवा घटि वपु विरपभ केरा । डहकत फिरत उड़ावत छारा । पकरि सींग तुरतै प्रभु मारा ।—विश्राम (शब्द०) ।

डहकना पु (३)
क्रि० अ० [देश०] छितराना । छिटकना । फैलना । उ०—चंदन कपूर जल धौत कलधौत धाम उज्जल जुन्हाई डहडही डहकत है ।—देव (शब्द०) ।

डहकलाय
वि० [?] सोलह । १६ ।—(दलाल) ।

डहकाना (१)
क्रि० स० [सं० दस (= खोना), हिं० डाका] खोना गँवाना । नष्ट कराना । उ०—वाद विवाद यज्ञ ब्रत साधै । कतहूँ जाय जन्म डहकावै ।—सूर (शब्द०) ।

डहकाना (२)
क्रि० अ० किसी के धोखे में आकर अपने पास का कुछ खोना । किसी के छल के कारण हानि सहना । धोखे में आना वंचित या प्रतारित होना । ठगा जाना । जैसे, इस सौदे में तुम डहका गए । उ०—(क) इनके कहे कौन डहकावै, ऐसी कौन अजानी?—सूर (शब्द०) । (ख) डहके ते डहकाइबो भलो जो करिय बिचार ।—तुलसी (शब्द०) । संयो० क्रि०—जाना ।

डहकाना (३)
क्रि० स० १. ठगना । धोखे से किसी की कोई वस्तु ले लेना । धोखा देना । जटना । २. किसी को कोई वस्तु देने के लिये दिखाकर न देना । ललचाकर न देना ।

डहकावनि पु
संज्ञा पुं० [हिं० डहकाना] [स्त्री० डहकावनि] ललचाना या धोखा देने का कार्य या स्थिति । उ०—लै लै ब्यंजन चछनि चखावनि । हँसनि, हँसावनि, पुनि डहकावनि ।—नंद ग्रं०, पृ० २६४ ।

डहडह
वि० [अनु०] दे० 'डहडहा' ।

डहडहा
वि० [अनु०] [वि० स्त्री० डहडही] १. हरा भरा । ताजा । लहलहाता हुआ । जो सूखा या मुरझाया न हो । (पेड़, पैधे, फुल, पत्ते आदि) । उ०—(क) जो काटै तो डहडही, सींचै तो कुम्हिलाय । यहि गुनवंती बेल का कुछ गुन कहा न जाय ।—कबीर (शब्द०) । २. प्रफुल्लित । प्रसन्न । आनंदित । उ०—तुम सौतिन देखत दई अपने हिय ते लाल । फिरति सबनि में डहडही वहै मरगजी बाल ।—बिहारी (शब्द०) । (ख) सेवती चरन चारु सेवती हमारे जान, ह्वै रही डहडही लहि आनँद कंद को ।—देव (शब्द०) । (ग) डहडहे इनके नैन अबहिं कतहुँ चितए हरि ।—नंद० ग्रं०, पृ० १५ । ३. तुरंत का । ताजा । उ०—लहलही इंदीवर श्यामता शरीर सोही डहडही चंदन की रेखा राजै भाल में ।—रघु— राज (शब्द०) ।

डहडहाट पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० डहडहा] हरापन । ताजगी ।

डहडहाना
क्रि० अ० [हिं० डहडहा] १. हरा भरा होना । ताजा होना । (पेड़, पौधे, आदि का) । उ०—दुर दमकत श्रवन शोभा जलज युगस डहडहत ।—सूर (शब्द०) । २. प्रफुल्लित होना । आनंदित होना ।

डहडहाव
संज्ञा पुं० [हिं० डहडहा] हराभरा होने का भाव । ताजगी । प्रफुल्लता ।

डहन (१)
संज्ञा पुं० [सं० डयन (= उड़ना)] डैना । पर । पंख । उ०—विषदाना कित देइ अँगूरा । जिहि भा मरन डहन धरि चूरा ।—जायसी (शब्द०) ।

डहन (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० दहन] जलन । डाह ।

डहना (१)
संज्ञा पुं० [सं० डयन] दे० 'डैना' । उ०—जैं पंखी कहवाँ थिर रहना । ताकै जहाँ जाइ जौं डहना ।—पदमावत, पृ० २५८ ।

डहना (२)
क्रि० अ० [सं० दहन] १. जलना । भस्म होना । २. कुढ़ना । चिढ़ना । द्वेष करना । बुरा मानना ।

डहना (३)
क्रि० स० १. जलाना । भस्म कराना । उ०—रावन लंका हौ डही वेई मोहि डाढ़न आइ ।—जायसी (शब्द०) । २. संतप्त करना । दुःख पहुँचाना । उ०—डहइ चंद अउ चंदन चीरू । दगध करइ तन विरह बधीरू ।—जायसी (शब्द०) । ३. ताड़ना । बजाना । उ०—डहरू अंकर डहै करैं जोवण किलकाराँ ।—रघु०, रू०, पृ० ४७ ।

डहर †
संज्ञा स्त्री० [हिं० डगर] १. रास्ता । मार्ग । पथ । उ०— जिहि डहरत डहर करत कहरो । चित चख चोरत चेटक चेहरो ।—रघुराज (शब्द०) । ३. आकाशगंगा । ३. पगडंडी ।

डहरना
क्रि० अ० [हि० डहर] चलवा । फिरवा । टहलना । उ०—जिहि डहरत डहर करत कहरो । चित चख चोरत चेठक चेहरो ।—रघुराज (शब्द०) ।

डहरा †
संज्ञा पुं० [हिं० डहर] मार्ग । डबर । उ०—सखौ री आज घज वरती धन देआ ।—सहजो०, पृ० ५७ ।

डहराना †
क्रि० अ० [हिं० डहरना] चलावा । दौड़ावा । फिरना । उ०—कोऊ बिरखि रही भाव चंदन एक चित आई । कोऊ बिरनि बिथुरी भृकृटि पर नैन डहराई ।—सूर (शब्द०) ।

डहरी पु † (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० दधि, हिं० दहेंड़ी] दही जमाने के काम में प्रयुक्त मिट्टी की हँड़िया । उ०—सुत कै बरजि राखहु महरि । डहर चअन न दैस काहैहि फोरि डारत डहरि ।— सूर०, १० ।१४२१ ।

डहरि पु (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० डहर] राह । उ०—अब भरम कोउ माहिं पावत रोकि राखत डहरि ।—सूर०, १० ।१४२२ ।

डहरिया †
संज्ञा पुं० [हिं० डहर] नाय बैल का घूमकर व्यापार करनेवाला व्यक्ति ।

डहरी †
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'कुठिआ' ।

डईरू †
संज्ञा पुं० [सं० डमरु] दे० 'डमरु' । उ०—डहरु संकर डहै, करैं जोगण किलकाराँ ।—रघु रू०, पृ० ४७ ।

डहार †
वि० [हिं० डाहना] डाहनेवाला । तंग करनेवाला । कष्ट पहुँचानेवाला । उ०—फोरहिं सिल लोढ़ा मदन लागे अढ़ुक पहार । कायर कूर कपूत कलि धर धर सहस डहार ।— तुलसी (शब्द०) ।

डहीली
वि० स्त्री० [हिं० डाह + ली (प्रत्य०)] डाह पैदा करनेवाली । उ०—पग द्वै चलति ठठकि रहै ठाढ़ी मौन धरै हरि के रस गीली । घरनी नख चरननि कुरवारति, सौतिनि भाग सुहाग डहीली ।—सूर० १० ।१७७२ ।

डहु, डहू
संज्ञा पुं० [सं०] १. वृक्षविशेष । लकुच । २. बड़हर ।

डहोला †
संज्ञा पुं० [देश०] हलचल । उपद्रव । भय । उ०—महा डहोलौ मेदनी विसतरियो तिण वार । साह तपस्या अग्गलौ अकबर सेण अपार ।—रा० रू०, पृ० ९९ ।

डांकृति
संज्ञा स्त्री० [सं० डाङ्कृति] घंटी आदि बजने की ध्वनि [को०] ।

डाँ
संज्ञा स्त्री० [सं० डा] डाकिनी । डाइन ।

डाँक (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० दमक, दवँक अथवा देश०] ताँबे या चाँदी का बहुत पतला कागज की तरह का पत्तर । विशेष—देशी डाँक चाँदी की होती है जिसे घोटकर नगीनों के नीचे बैठाते है । अब ताँबै के पत्तर की विदेशी डाँक भी बहुत आती है जिसके बोल और चमकीले टुकड़े काडकर स्त्रियों की टिकली, कपड़ों पर टाँकने की चमकी आदि बनती हैं । डाँक घोंटने की सान ८—९ लंबी और ३—४ अंगुल चौड़ी पटरी होती है जिसपर डाँक रखकर चमकाने के लिये घोटते हैं ।

डाँक † (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० डाँकना] कै । वमन । उलटी । क्रि० प्र०—होना ।

डाँक † (३)
संज्ञा पुं० [हिं० डंका] नगाड़ा । दे० 'डंका' । उ०—दान डाँक बाजै दरबारा । कीरति गई समुंदर पारा ।—जायसी (शब्द०) ।

डाँक (४)
संज्ञा पुं० [हिं० डंक] बिषैले जंतुओं के काटने का डंक । आर । उ०—जे तव होत दिखादिखी भई अभी इक आँक । बगैं तीरछी डीठि अब ह्वै बीछी को डाँक ।—बिहारी (शब्द०) ।

डाँकना †
क्रि० स० [सं० तक (= चलना)] १. कुदकर पार करना । लाँघना । फाँदना । २. पार कर जाना । लाँघ जाना । उ०—अजगर उड़ा सिखर कौ डाँका, गरुड़ थकित होय बैठा ।—दरिया० बानी पृ० ५९ । २. वमन करना । उलटी करना । ३. जोर से पुकारना । आवाज देना ।

डाँकिनी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० डाकिनी] दे० 'डाकिनी' । उ०— परहु नरक, फलचारि सिसु, मीच डाँकनी खाउ ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ११० ।

डाँग † (१)
संज्ञा पुं० [सं० डङ्क (= पहाड़ का किनारा और चोटी)]१. पहाड़ी । जंगल । बन । २. पाहाड़ की ऊँची चोटी ।

डाँग (२)
संज्ञा पुं० [सं० दघ्क, हिं० डाबा] मोठे बाँस का डंडा । लट्ठ ।

डाँग † (३)
संज्ञा पुं० [हिं० डाँकना] कुद । फलाँग ।

डाँग पु (४)
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'डंका' ।

डाँगर (१)
संज्ञा पुं० [देश०] १. चौपाया । ढोर । गाय, भैंस आदि पशु । †२. मरा हुआ चौपाया । (गाय, बैल आदि) चौपाए की लाश (पूरब) । मुहा०—डाँगर घसीटना = चमारों की तरह मरा हुआ चौपाया खींचकर ले जाना । अशुचि कर्म करना ।

डाँगर (२)
वि० १. दुबला पतला । जिसकी हड्डी हड्डी निकली हो । २. मुर्ख । जड़ । गावदी ।

डाँगा
संज्ञा पुं० [सं० वण्डक] १. जहाज के मस्तूल में रस्सियों को फैलाने के लिये आड़ी लगी हुई धरन । २. लंगड़ के बीच का मोटा डंडा । (लश०) ।

डाँट
संज्ञा स्त्री० [सं० दान्ति (= दमन, वश)या सं० दण्ड] १. शासन । वश । दाब । दबाब । जैसे,—(क) इस लड़के को डाँठ में रखो । (ख) इस लड़कें पर किसी की डाँट नहीं है । क्रि० प्र०—पड़ना ।—मानना ।—रखना । मुहा०—डाँट में रखना = शासन में रखना । बश में रखना । किसी पर डाँट रखना = किसी पर शासन या दबाब रखना । डाँट पर = पालकी के कहारों की एक बोली । (जब तंग और उँचा नीचा रास्ता आगे होता है तब अगला कहार कुछ बचकर चलने के लिये कहता है 'डाँट पर') । २. डराने के लिये क्रोधपूर्वक कर्कश स्वर से कहा हुआ शब्द । घुड़की । डपट । क्रि० प्र०—बताना ।

डाँटना (१)
क्रि० स० [हिं० डाँट + ना (प्रत्य०) अथवा सं० दण्डन] १. डराने के लिये क्रोधपूर्वक कड़े स्वर में बोलना । घुड़कना । डपटना । उ०—(क) जैसे मोन किलकिला दरसत, एसैं रहौ प्रभु डाँटत । पुनि पाछै अधसिंधु है सूर खाल किन पाटत ।—सूर, १ ।१०७ । (ख) जानै ब्रह्मा सो विप्रवर आँखि दिखावहि डाँटि ।—तुलसी (शब्द०) । (ग) सोई इहाँ जेंवरी बाँधे, जननि साँटि लै डाँटै ।—सूर० १० ।३४६ । संयो० क्रि०—देना । २. ठाठ से वस्त्र आदि पहनना । दे० 'डाटना'—६ । उ०— चाकर भी वर्दी डाँटे हैं ।—फिसाना०, भा० ३, पृ० ३६ ।

डाँठ †
संज्ञा पुं० [सं० दण्ड] डंठल ।

डाँड़
संज्ञा पुं० [सं० दण्ड, प्रा० डंड] १. सिधी लकड़ी । डंडा । २. गदका । उ०—सीखत चटकी डाँड़ विविध लकड़ी के दाँवन ।—प्रेमघन०, भा० १, पृ० २८ । यौ०—डाँड़ पटा = (१) फरी गतका । (२) गतके का खेल । ३. नाव खेने का लंबा बल्ला या डंडा । चप्पू । क्रि० प्र०—खेना ।—चलाना ।—मारना ।—भरना ।—(लश०) । ४. अंकुश का हत्था । ५. जुलाहों की वह पोली लकड़ी जिससे ऊरी फँसाई रहती है । †६. सीधी लकीर । ७. रीढ़ की हड्डी । ८. ऊँची उठी हुई तंग जमीन जो दुर तक लकीर की तरह चली गई हो । ऊँची मेंड़ । मुहा०—डाँड़ मारना = मेड़ उठाना । ९. रोक, आड़ आदि के लिये उठाई हुई कम ऊँची दीवार । १०. ऊँचा स्थान । छोटा भीटा या टीला । उ०—सो कर लै पंडाछिति गाड़े । उपज्यो द्रुत द्रुम इक तेहि डाँड़े ।—रघुराज (शब्द०) । ११. दो खेतों के बीच की सीमा पर की कुछ ऊँची जमीन जो कुछ दुर तक लकीर की तरह गई हो और जिसपर लोग आते जाते हों । मेंड़ । क्रि० प्र०—डाँड़ मारना = मेंड बनाना । सीमा या हदबंदी करना । यौ०—डाँड़ मैंड़ = दे० 'डाड़ामेड़' । १२. समुद्र का ढालुआँ रेतीला किनारा । १३. सीमा । हद । जैसे, गावँ का डाँड़ा । १४. वह मैदान जिसमें का जंगल कट गया हो । १५. अर्थदंड । किसी अपराध के कारण अपराधी से लिया जानेवाला धन । जुरमाना । क्रि० प्र०—लगाना । १६. वह वस्तु या धन जिसे कोई मनु्ष्य दूसरे से अपनी किसी वस्तु के नष्ट हो जाने या खो जाने पर ले । नुकसान का बदला । हरजाना । क्रि० प्र०—देना ।—लेना । १७. लंबाई नापने का मान । कट्ठा । बाँस ।

डाँड़ना
क्रि० स० [हिं० डाँड़ + ना (प्रत्य०); या सं० दण्डन] अर्थदंड देना । जुरमान करना । उ०—(क) उदधि अपार उतरतहूँ न लागी बार केसरीकुमार सो अदंड ऐसो डाँड़िगो ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) पड़ा जो डाँड़ जगत सब डाँड़ा । का निचिंत माटी के भाँड़ा ?—जायसी (शब्द०) ।

डाँड़र
संज्ञा पुं० [हिं० डाँठ] बाजरे के डंठल का गड़ा हुआ भाग जो फसल कट जाने पर भी खेतों में पड़ा रहता है । बाजरे की खूँटी ।

डाँड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० डाँड़] १. छड़ । डंडा । २. गतका । उ०— बज्र की साँप बज्र का डाँड़ा । उठी आमि तस बाजै खाँड़ा ।—जायसी (शहब्द०) । ३. नाव खेने का डाँड़ । ४. समुद्र का ढालुआँ रेतीला किनारा (लश०) । ५. हद । सीमा । मेंड़ । यौ०—डाँड़ा मेंड़ा । डाँड़ा मेंड़ी । मुहा०—होली का डाँड़ा = लकड़ी, घास, फूस आदि का ढेर जो वसंत पंचमी के दिन से होली जलाने के लिये इकट्ठा किया जाने लगता है ।

डाँड़ामेँड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० डाँड़ + मेंड़] १. एक ही डाँड़ या सीमा का अंतर । परस्पर अत्यंत सामीप्य । लगाव । २. अनबन । झगड़ा । क्रि० प्र०—रहना ।

डाँड़ामेँड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'डाँड़ामेंड़ा' ।

डाँड़ाशहेल
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का साँप जो बंगाल में होता है ।

डाँड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० डाँड़ा] १. लंबी पतली लकड़ी । २. हाथ में लेकर व्यवहार की जानेवाली वस्तु का वह लंबा पतला भाग जो हाथ में लिया या पकड़ा जाता है । लंबा हत्था या दस्ता । जैसे, करछी की डाँड़ी । उ०—हरि जु की आरती बनी । अति विचित्र रचना रचि राखी परति न गिरा बनी । कच्छप अध आसन अनूप अति, डाँड़ी शेष फनी ।—सूर (शब्द०) । ३. तराजू की वह सीधी लकड़ी जिसमें रस्सियाँ लटककार पलड़े बाँधे जाते हैं । डंडी । उ०—साँई मेरा बानिया सहज करें व्यवहार । बिन डाँड़ी बिन पालड़े तौलै सब संसार ।—कबीर (शब्द०) । मुहा०—डाँड़ी मारना = सौदा देने में कम तौलना । डाँड़ी सुभीते से रहना = बाजारभाव अनुकूल होना । उ०—भगवान कहीं गौं से बरखा कर दे और डाँड़ी भी सुभीते से रहे तो एक गाय जरूर लेगा ।—गोदान, पृ० ३० । ४. टहनी । पतली शाखा । ५. वह लंबा डंठल जिसमें फूल या फल लगा होता है । नाल । उ०—तेहि डाँड़ी सह कमलहि तोरी । एक कमल की दूनौ जोरी ।—जायसी (शब्द०) । ६. हिंडोले में लगी हुई वे चार सीधी लकड़ीयाँ या डोरी की लड़ें जिनसे लगी हुई बैठने की पटरी लटकती रहती है । उ०—पटुली लगे नग नाग बहुरँग बनी डाँड़ी चारि । मौरा भँवै भजि केलि भूले नवल नागर नारि ।—सूर (शब्द०) । ७. जुलाहो की वह लकड़ी जो चरखी की थवनी में डाली जाती है । ८. शहनाई की लकड़ी जिसके नीचे पीतल का घेरा होता है । ९. अनवट नामक गहने का वह भाग जो दूसरी और तीसरी उँगली के नीचे इसलिये निकाला रहता है जिसमें अनवट घूम न सके । १०. डाँड़ खेनेवाला आदमी (लश०) । ११. मट्ठर या सुस्त आदमी (लश०) । †१२. सीधी लकीर । लकीर । रेखा । क्रि० प्र०—खींचना । १३. लीक । मर्यादा । १४. सीमा । हद । उ०—डरे लोग वन डाँड़ियाँ, सुते ही सादुल । जे सूते ही जागता, सबलाँ माथा सूल ।—बाँकी० ग्रं०, भा० १, पृ० २४ । १५. चिड़ियों के बैठने का अड्डा । १६. फूल के नीचे का लंबा पतला भाग । १७. पालकी के दोनों ओर निकले हुए डंडे जिन्हें कहार कंधे पर रखते हैं । १७. पालकी । १९. डंडे में बँधी हुई झोली के आकार की एक सवारी जो उँचे पहाड़ों पर चलती है । झप्पान ।

डाँढ़री †
संज्ञा स्त्री० [सं० दग्ध, प्रा० डढ्ढ, हिं० डाढ़ा + री (प्रत्य०)] भूनी हुई मटर की फली ।

डाँबू
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का नरकट जो दलदल में उत्पन्न होता है ।

डाँभ †
संज्ञा पुं० [सं० दाह, प्रा० डाह, या सं० दग्ध, प्रा० डड्ढ, या हिं० दागना] १. जलने का दाग । दाग । २. जलने से उत्पन्न पीड़ा या कष्ट । उ०—बाँधउँ बड़री छाहड़ी, नीरूँ नागर बेल । डाँभ सँभालू करहला, चोपड़िसूँ चंपेल ।— ढोला०, दु० ३२० ।

डाँवरा †
संज्ञा पुं० [सं० डिम्ब] [स्त्री० डाँवरी] लड़का । बेटा । पुत्र ।

डाँवरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० डाँवरा] लड़की । बेटी । उ०—(क) कचन मन रतन जड़ित रामचंद्र पाँवरी । दाहिन सो राम वाम जनक राय डाँवरी ।—देवस्वामी (शब्द०) । (ख)बाहिर पोरि न दीजिए पाँवरी बाउरी होय सो डाँवरी डोलै ।—देव (शब्द०) । दे० 'डाबरी' ।

डाँवरू †
संज्ञा पुं० [सं० डिम्ब] बाघ का बच्चा ।

डाँवाडोल
वि० [हिं० डोलना] इधर उधर हिलता डोलता हुआ । एक स्थिति पर न रहनेवाला । चंचल । विचलित । अस्थिर । जैसे, चित्त डाँवाडोल होना ।

डाँवो †
क्रि० वि० [प्रा० डाव, गुज० डावो] बाई ओर । बाई तरफ । उ०—डाँवो साँड़, तडूकतो जाई ।—बी० रासो, पृ० ६० ।

डाँशपाहिड़
संज्ञा पुं० [देश०] संगीत में रुद्रताल के ग्यारह भेदों में से एक जिसमें पाँच आघात के पश्चात् एक शून्य (खाली) होता है ।

डाँस
संज्ञा पुं० [सं० दंश] १. बड़ा मच्छड़ । दंश । २. एक प्रकार की मक्खी जो पशुओं को बहुत दुःख देती है । उ०—जरा बछड़े को देखता हूँ.....बेचारे को डाँस परेशान कर रहे हैं ।— नई०, पृ० ३० । ३. कुकरौंछी ।

डाँसर †
संज्ञा पुं० [देश०] इमली का बीज । चिआँ ।

डा (१)
संज्ञा पुं० [अनु०] सितार की गत का एक बोल । जैसे—डा डिड़ डा ड़ा डा डा ड़ा ।

डा (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. ड़ाकिनी । २. टोकरी जो ढोकर ले जाई जाय [को०] ।

डाइचा †
संज्ञा पुं० [सं० दाय] दे० 'दायजा' । उ०—डाइचो दिद्ध दाहिन दुहम, भुज भुजंग कीरति करै ।—पृ० रा०, १६, १५ ।

डाइन
संज्ञा स्त्री० [सं० डाकनी] १. भूतनी । चुढ़ैल । राक्षसी । उ०—ओझा डाइन डर से डरपैं ।—कबीर श०, भा० २, पृ० २८ । २. टोनहाई । वह स्त्री जिसकी दृष्टि आदि के प्रभाव से बच्चे मर जाते हैं । ३. कुरूपा और डरावनी स्त्री ।

डाइनामाइट
संज्ञा पुं० [सं०] एक विस्फोटक पदार्थ का नाम ।

डाइनिंग रूम
संज्ञा पुं० [अं०] भोजन कक्ष । उ०—भाभी ने हम लोगों को डाईनिंग रूम में बुलाया ।—जिप्सी, पृ० ४२३ ।

डाइबीटी
संज्ञा पुं० [अं० डाइबिटीज] बहमुत्र रोग । मधुमेह ।

डाइरेक्टर
संज्ञा पुं० [अं०] १. प्रबंध चलानेवाला । कार्यसंचालक । निर्देश । निर्देशक । मुंतजिम । इंतजाम करनेवाला । २. मशीन में वह पुरजा जिसकी क्रिया से गति उत्पन्न होती है ।

डाइरेक्टरी
संज्ञा स्त्री० [अं०] वह पुस्तक जिसमें किसी नगर वा देश के मुख्य निवासियों या व्यापारियों आदि की सूची अक्षर क्रम से हो ।

डाइवोर्स
संज्ञा पुं० [अं०] तलाक । पति पत्नी का संबंधविच्छेद ।

डाई
संज्ञा पुं० [अं०] १. पासा । २. ठप्पा । साँचा । ३. रंग ।

डाईप्रेस
संज्ञा पुं० [अं०] ठप्पा उठाने की कल । उभरे हुए अक्षर उठाने की कल जिससे मानोग्राम आदि छपते हैं ।

डाक (१)
संज्ञा पुं० [हिं० उड़ाँक या उलाँक या डाँअकना (फाँदना)] १. सवारी का ऐसा प्रबंध जिसमें एक एक टिकान पर बराबर जानवर आदि बदले जाते हों । घोड़े गाड़ी आदि का जगह जगह इंतजाम । मुहा०— डाक बैठना = शीघ्र यात्रा के लिये स्थान स्थान पर सवारी बदलने की चौकी नियत करना । डाक लगाना = शीघ्र संवाद पहुंचाने या यात्रा करने के लिये मार्ग में स्थान स्थान पर आदमियों या सवारियों का प्रबंध रहना । डाक लगाना = दे० 'डाक बैठाना' । यौ०— डाक चौकी = मार्ग में वह स्थान जहाँ यात्रा के घोडे़ बदले जायँ या एक हरकारा दूसरे हरकारे को चिट्ठियों का थैला दे । उ०— पाछे राजा ने द्वारिका सों मेरता सों डाक चौकी बेठारि दीनी ।— दो सौ बावन०, भा० १, पृ० २४९ । २. राज्य की ओर से चिट्ठियों के आने जाने की व्यवस्था । वह सरकारी इतजाम जिसके मुताबिक खत एक जगह से दूसरी जगह बराबर आते जाते हैं । जैसे, डाक का मुहकमा । उ०— यह चिट्ठी डाक में भेजेंगे, नौकर के हाथ नहीं । यौ०— जाकखाना । डाकगाडी । ३. चिट्ठी पत्री । कागज पत्र आदि जो डाक से आवे । डाक से आनेवाली वस्तु । जैसे,— तुम्हारी डाक रखी है, ले लेना ।

डाक (२)
संज्ञा स्त्री० [अनु०] धमन । उलटी । कै । क्रि० प्र०— होना ।

डाक (३)
संज्ञा पुं० [अं० डाँक] समुद्र के किनारे जहाज ठहरने का वह स्थान जहाँ मुसाफिर या माल चढ़ाने उतारने के लिये बाँध या चबूतरे आदि बने होते हैं ।

डाक (४)
संज्ञा पुं० [बंग० डाकना(= चिल्लाना)] नीलाम की वोली । नीलाम की वस्तु लेनेवालों की पुकार जिसके द्वारा वे दाम लगाते हैं ।

डाकखाना
संज्ञा पुं० [हिं० डाक + फा़० खाना] वह स्थान या सरकारी दफ्तर जहाँ लोग भिन्न भिन्न स्थानों पर भेजने के लिये चिट्ठी पत्री आदि छोडते हैं और जहाँ से आई हुई चिट्ठियाँ लोगों को बाँटी जाती हैं ।

डाकगाडी
संज्ञा स्त्री० [हिं० डाक + गाड़ी] वह रेलगाड़ी जिसपर चिट्ठी पत्री आदि भेजने का सरकार की तरफ से इंतजाम हो । डाक ले जानेवाली रेलगाड़ी जो और गाड़ियों से तेज चलती है ।

डाकघर
संज्ञा पुं० [हिं० डाक + घर] दे० 'डाकखाना' ।

डाकनवार †
संज्ञा पुं० [हिं० डाकना + वाला (प्रत्य०)] पुकारने— वाला । बुलानेवाला । प्रियतम । उ०— जब डाकनवारो चढ़्यो सिर पै तब, लाज कहा खर के चढ़िबे की ।— नट०, पृ० ५४ ।

डाकना (१)
क्रि० अ० [हिं० डाक] कै करना । वमन करना ।

डाकना (२)
क्रि० स० [हिं० उडाँक, डाँक + ना (प्रत्य०)] फाँदना । लाँघना । कूदकर पार करना । उ०— मृग हाथ वीस दश डाकै । तृण हालि उठै तब ताकै ।— सुंदर ग्रं०, भा० १, पृ० १४१ । (ख) सुंदर सूर न गासणा डाकि पडै़ रंण माँहि । घाव सहै मुख माँमहाँ पीठि फिरावै नाँहिं ।—सुंदर० ग्रं०, भा० २, पृ० ७३८ । संयो० क्रि०—जाना ।

डाकबँगला
संज्ञा पुं० [हिं० डाँक + बँगला] वह बँगला या मकान जो सरकार की ओर से परदेसियों के लिये बना हो । विशेष— ईस्ट इंजिया कंपनी के समय में इस प्रकार के बँगले स्थान स्थान पर बने थे । पहले जब रेल नहीं थी तब इन्हीं स्थानों पर डाक ली जाती और बदली जाती थी । अतः सवा— रियों का भी यहीं अड्डा रहता था जिससे मुसाफिरों को ठहरने आदि का सुबीता रहता था ।

डाकमहसूल
संज्ञा पुं० [हिं० डाक + अ० महसूल] वह खर्च जो चीज को डाक द्वारा भेजने या मँगाने में लगे । डाकव्यय ।

डाकमुंशी
संज्ञा पुं० [हिं० डाक + फा० मुंशी] डाकघर का अफसर । पोस्टमास्टर ।

डाकर
संज्ञा पुं० [देश०] तालों की वह मिट्टी जो पानी सूख जाने पर चिटखकर कड़ी हो जाती है ।

डाकव्यय
संज्ञा स्त्री० [हिं० डाक + सं० व्यय] डाक का खर्च । डाक महसूल ।

डाका
संज्ञा पुं० [हिं० डाकना(= कूदना) वा सं० दस्यु अथवा देश०] वह आक्रमण जो धन हरण करने के लिये सहसा किया जाता है । माल असबाब जबरदस्ती छीनने के लिये कई आदमियो का दल बाँधकर धावा । बटमारी । मुहा०— डाका डालना = लूटने के लिये घावा करना । जबरदस्ती माल छीनने के लिये चढ़ दौड़ना । डाका पड़ना = लूट के लिये आक्रमण होना । जैसे,—उस गाँव पर आज डाका पड़ा । डाका मारना = जबरदस्ती मान लूटना । बलपूर्वक धन हरण करना ।

डाकाजनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० डाका + फा़० जनी] डाका मारने का काम । बटमारी ।

डाकीन
संज्ञा स्त्री० [सं० डाकिनी] दे० 'डाकिनी' ।

डाकिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक पिशाची या देवी जो काली के गणों में समझी जाती हो । २. डाइन । चुडै़ल ।

डाकिया
संज्ञा पुं० [हिं० डाक + इया (प्रत्य०)] डाक से आई चिट्ठियाँ आदि लोगों के पास पहुँचानेवाना कर्मचारी ।

डाकी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० डाक] वमन । कै ।

डाकी (२)
संज्ञा पुं० १. बहुत खानेवाला । पेठू । २. डाकू । उ०— सुंदर तृष्णा डाइनी डाकी लोम प्रचंड । तोऊ काडै़ आँषि जब, कंपि उठै ब्रह्मांड ।—सुंदर ग्रं०, भा० २, पृ० ७१४ ।

डाकी (३)
वि० सबल । प्रचड़ (डिं०) ।

डाकू
संज्ञा पुं० [हिं० डाका + ऊ (प्रत्य०), वा सं० दस्यु] १. डाका डालनेवाला । जबरदस्ती लोगों का माल लूटनेवाला । लुटेरा । बटमार । २. अधिक खानेवाला । पेटू ।

डाकेट
संज्ञा पुं० [अं०] किसी बड़ी चिट्ठी या आज्ञापत्र आदि का सारांश । चिट्ठी का खुलासा ।

डाकोर
संज्ञा पुं० [सं० ठक्कुर, हिं० ठाकुर] ठाकुर । विष्णु भगवान् (गुजरात) ।

डाक्टर
संज्ञा पुं० [अं०] १. आचार्य । अध्यापक । विद्वान् । २. वैद्य । चिकित्सक । हकीम ।

डाक्टरी
संज्ञा स्त्री० [अं० डाक्टर + ई (प्रत्य०)] १. चिकित्सा— शास्त्र । २. योरप का चिकित्साशास्त्र । पाश्यात्य आयुर्वेद । ३. डाक्टर का पेशा या काम । ४. वह परीक्षा जिसे पास करने पर आदमी डाक्टर होता है ।

डाक्टर
संज्ञा पुं० [अं० डाक्टर] दे० 'डाक्टर' ।

डाख †
संज्ञा पुं० [हिं० ढाख] ढाक । पलाश । उ०— तरवर झरहिं झरहिं बन डाखा । भई उपत फूल कर साखा ।— जायसी (शब्द०) ।

डाखिपी पु †
संज्ञा पुं० [?] भूखा सिंह (डिं०) ।

डागरि
संज्ञा स्त्री० [हिं० डगर] दे० 'डगर' ।

डागल †
संज्ञा पुं० [देशी डुंगर] शैल । पर्वत । उ०— जन दरिया इस झूठ की, डागल ऊपर दौड़ ।— दरिया० बानी, पृ० ३१ ।

डागा पु
संज्ञा पुं० [सं० वण्डक] नगाड़ा बजाने का डंडा । चोब ।

डागुर
संज्ञा पुं० [देश०] जाटों की एक जाति । उ०— डागुर पछाँ— दरे धरि मरोर । बहु जठ्ठ ठट्ठ बट्टे सजोर ।— सूदन (शब्द०) ।

डागुल †
संज्ञा पुं० [देशी डुंगर, हिं० डागल] शैल । पर्वत । उ०— काहे कौ फिरत नर भटकत ठौर ठौर । डागुल की दोर देवी देव सब जानिए ।— सुंदर ग्रं०, भा० २, पृ० ४७६ ।

डाच †
संज्ञा पुं० [सं० दंष्ट्र, प्रा डड्ढ, या देश०] मुख । उ०— (क) छोह घणौ ऊछज छरा, केहर फाडै़ डाच ।— बाँकी ग्रं०, भा० १, पृ० ११ । (ख) खलकाया रत खात भरे, डाँचा पल भक्खे ।— रघु० रू०, पृ० ४० ।

डाट (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० दान्ति] १. वह वस्तु जो किसी बोझ को ठहराए रखने या किसी वस्तु को खड़ी रखने के लिये लगाई जाती है । टेक । चाँड़ । क्रि० प्र०—लगाना । २. वह कौल या खूँटा जिसे ठोंककर कोई छेद बंद किया जाय । छेद रोकने या बंद करने की वस्तु । क्रि० प्र०—लगाना । ३. बोतल, शीशी आदि का मुँह बंद करने की वस्तु । ठेंठी । काग । गट्टा । क्रि० प्र०—कसना ।—लगाना । ४. मेहराब को रोके रखने के लिये इँटों आदि की भरती । लदाव की रोक । लदाव का ढोला ।

डाट (२)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'डाँट' ।

डाट (३)
संज्ञा पुं० [अं०] नुकता । बिंदु । उ०— इस कसबियों पर डाठ लगाकर ।— प्रेमघन, भा० २, पृ० ४५५ ।

डाटना
क्रि० स० [हिं० डाट] १. किसी वस्तु कौ किसी वस्तु पर रखकर जोर से ढकेलना । एक वस्तु को दूसरी वस्तु पर कसकर दबाना । भिड़ाकर ठेलना । जैसे, — (क) इसे इस डंडे से डाटो तब पीछे खिसकेगा । (ख) इस डंडे को डाटे रहो तब पत्थर इधर न लुढ़केगा । संयो० क्रि०—देना । २. किसी खंभे, डंडे आदि को, किसी बोझ या भारी वस्तु को ठहराए रखने के लिये उससे भिड़ाकर लगावा । ढैकना ।चाँड़ लगाना । ३. छेद या मुँह बंद करना । मुँह कसना । मुँह बंद करना । ठेंठी लगाना । ४. कसकर भरना । ठसकर भरबा । कसकर घुसेड़ना । उ०— ज्ञान गोली वहाँ खूब डाटी ।— कबीर श०, भा० १, पृ० ९८ ।५. खूब पेट भर खाना । कस कर खाना । उ०— अगनित तरु फल सुगंध मधुर मिष्ट खाटे । मनसा करि प्रभुहि अर्पि भोजन को डाटे ।— सूर (शब्द०) । ६. ठाट से कपड़ा, गहना आदि पहनना । जैसे, कोट डाठना, अँगरखा डाटना । ७. भिड़ाना । डाटना । मिलाना । उ०— रंच न साध सुधै सुख की विन राधिकै आधिक लोचन डेटे ।— केशव (शब्द०) ।

डाठी पु †
संज्ञा स्त्री० [देश०] दुर्वासना । बुरी आदत । उ०— अगुआ भचो काम की डाठी । जस कोइ गहे अंध की लाठी ।—चित्रा०, पृ० २७ ।

डाड़ना (१)
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'ढाड़ना,' 'घाड़ना' ।

डाड़ना (२)
क्रि० स० [हिं० डाँड़ना] डाँड़ना' ।

डाढ़
संज्ञा स्त्री० [सं० द्रंष्ट्रा, प्रा० डड्ढ] १. चबाने के चौडे़ दाँत । चौभड़ । दाढ़ । उ०— हम वो दो रुपए नहीं बदते । मिठाई आए तो डाढ़ तक गरम न हो । इतने में होता है क्या है !— फिसाना०, भा० ३, पृ० २७४ ।२. वट आदि वृक्षों की शाखाओं से नीचे की ओर लटकी हुई जटाएँ । बरोह ।

डाढ़ना पु †
क्रि० स० [सं० दग्ध, प्रा० डटुठ + हिं० ना (प्रत्य०)] जलाना । भस्म करना । उ०—तुलसीदास जगदघ जवास ज्यों अनघ आगि लागे डाढ़न ।—तुलसी (शब्द०) ।

डाढ़ा
१. दावानल । वन की आग । २. अग्नि । आग । उ०—रामकृपा कपि दल बल बाढ़ा । जिमि दृन पाइ लागि अति डाढ़ा ।— तुलसी (शब्द०) । क्रि० प्र०—लगना । ३. ताप । दाह । जलन । क्रि० प्र०—फुँकना ।

डाढार पु
संज्ञा पुं० [हिं० डाढ] फण । फन उ०— सेस सीस लचि भार डिढय डाढर करक्किव ।—रसर०, पृ० १०४ ।

डाढ़ी पु (१)
वि० [सं० दग्ध] दग्ध । पीड़ित । उ०— सखी संग की निरखति यह छबि भई व्याकुल मम्मय की डाढ़ी ।— सूर०, १० ।७३६ ।

डाढ़ी (१)
संज्ञा स्त्री० [प्रा० डङ्ढ, हिं० डाढ + ई (प्रत्य०)] १. चेहरे पर ओठ के नीचे का गोल उभरा हुआ भाय । ठोड़ी । ठुड्डी । चिबुक । २. ठुड्डी और कनपटी पर के बाल । चिबुक और गंडस्थल पर के लोम । दाढ़ी । उ०—दाढ़ी के रखैयन की डाढ़ी सी रहति छाती बाढ़ी मरजाद जस हद्द हिंदुवाने की ।—भूषण (शब्द०) । मुहा०— डाढ़ी छोड़ना = डाढ़ी न मुँड़वाना । डाढ़ी बढ़ाना । डाढ़ी का एक एक बाल करना = डाढ़ी उखाड़ लेना । अपमानित करना । दुर्दशा करना । डाढ़ी को कलप लगाना = बूढे़ आदमी को कलंक लगाना । श्रेष्ठ और वृद्ध को दोष लगाना । पेट में डाढ़ी होना = छोटी ही अवस्था में बड़ों की सी जानकारी प्रकट करना या बातें करना । पेशाब से डाढ़ी मुड़वाना = अत्यंत अपमान करना । अप्रतिष्ठा करना । दुर्गति करना । डाढ़ी फटकारना = (१) हाथ से डाढ़ी के वालों को झटकारना । (२) संतोष और उत्साह प्रट करना ।डाढ़ी रखना = डाढ़ी के बाल न मुँड़वाना । डाढ़ी बढ़ने देना ।

डाढ़ीजार †
संज्ञा पुं० [हिं०] दाढ़ीजार । उ०— अमिरती देवी ने पूछा—कौन है डाढ़ीजार, इतनी रात को जगावत है ?— मान०, भा० ५, पृ० २३ ।

डाब
संज्ञा स्त्री० [सं० दर्भ] १. डाभ नाम की घास । २. कच्चा नारियल । ३. परतला ।

डाबक
वि० [अनु०] दे० 'डाभक' ।

डाबर (१)
संज्ञा पुं० [सं० दभ्र (= समुद्र या झील)] १. नीची जमीन । गहरी भूमि जहाँ पानी ठहरा रहे । २. गड़ही । पोखरी । तलैया । गड्ढा जिसमें बरसाती पानी जमा रहता है । उ०— (क) सुरसर सुअग बनज वनचारी । डावर जोप कि हंसकुमारी ।— तुलसी (शब्द०) । (ख) ओ मैं वरवि कहों विधि केहीं । डावर कमठ की मंदर मेहीं ।—तुलसी (शब्द०) । ३. हाथ धोने का पात्र । चिलमची । ४. मैला पानी ।

डाबर (३)
वि० मटमैला । गदला । कीचड़ मिला । उ०— भूमि परद भा डबर पानी ।— तुलसी (शब्द०) ।

डाबा
संज्ञा पुं० [हिं० डब्बा] दे० 'डब्बा' । उ०— अंध अहित धूमव के डावा । अमल अरघ भाजन छवि छाया ।— पद्माकर (शब्द०) ।

डावी
संज्ञा स्त्री० [सं० दर्भ] कटी हुई घास वा फसल का पुला ।

डाभ
संज्ञा पुं० [सं० दर्भ] १. कुश की जाति की एक घास जो प्रायः रेह मिली हुई ऊसर जमीन में अधिक होती है । एक प्रकार का कुश । २. कुश । उ०— अलक डाभ, तिल आल यों अँसुवन को परवाह । सीदहि देत तिलांजलौ, नेना तुम विवु वाह ।— सुधारक (शब्द०) ।३. आम का मौर । आम की मंजरी । उ०— जउ लहि आमहि हाथ त होई । तउ लहि सुगँध बसाय न सोई ।— जायसी (शब्द०) ।४. कच्चा । नारियल ।

डाभक
वि० [अनु० डभक डभक] कुएँ से तुरंत का मिकला हुआ । ताजा (पानी) । जैसे, डाभक पानी ।

डाभर पु †
संज्ञा पुं० [सं० दभ्र] दे० 'डाबर' ।

डामचा
संज्ञा पुं० [देश०] खेत में खड़ा किया हुआ वह मचान जिसपर से खेत की रखवाली करते हैं । मैड़ा । माचा ।

डामर
संज्ञा पुं० [सं०] १. शिवकथित माना जानेवाला एक तंत्र जिसके छह भेद किए गए हैं— योग डामर, शिव जामर, दुर्वा डामर, सारस्वत डामर, ब्रह्मा डामर और गंधर्व डामर । २. हलचल । धूम । ३. आडंबर । ठाटबाट । ४. चमत्कार । ५. दुर्ग के शुभाशुभ जानने के लिये बनाए जानेवाले चक्रों में से एक । ६. क्षेत्रपाल । ४९ भैरवों में से एक । ७. एक मिश्रित या संकर जाति ।

डामर (२)
संज्ञा पुं० [देश०] १. साल वृक्ष का गोंद । राल । २. एकप्रकार का गोंद या कहरुआ जे दक्षिण में पश्चिमी घाट के पहाड़ों पर होनेवाले एक पेड़ से निकलता है और सफेद डामर कहलाता है । दे० 'कहरुआ' । ३. कहरुआ की तरह का एक प्रकार का लसीला राल या गोंद जो छोटी मधुमक्खियों के छत्ते से निकलता है । ४. वह छोटी मधुमक्खी जो इस प्रकार का राल वनाती है । ५. दे० 'डामल' (३) ।

डामरी †
संज्ञा स्त्री० [सं० डिम्ब] दे० 'डाँवरी' । उ०— उन पानि गहो हुतो मेरो जबै सबै गाय उठी ब्रज डामरियाँ ।— प्रेमघन०, भा० २, पृ० १८८ ।

डामल (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० दायमुल्हव्स] १. जनम कैद । उम्र भर के लिये कैद । २. देशनिकाला का दंड । विशेष— भारतवर्ष में अँगरेजी सरकरा भारी भारी अपराधियों को अंडमन टापू में भेजा करती थी । उसी को डामल कहते थे ।

डामल (२)
संज्ञा पुं० [अं० जायमंड] दे० 'डायमंड कट' । यौ०— जामल कड । जामल काट । क्रि० प्र०— छीलना ।

डामल † (३)
संज्ञा पुं० [देश०] अलकतरा । तारकोल । उ०— इस डंडे के पीछे इंच भर मोटा डामल का पलस्तर था जो आल या सील को रोकता था ।— हिंदु० सभ्यता, पृ० १७ ।

डामाडोल
वि० [हिं०] दे० 'डावाँडोल' ।

जामिलपु पु †
संज्ञा पुं० [हिं० डामल] दे० 'डामल' । उ०— केतने गुंडे डामिल गएन, केतने पाएन फँसिया ।— प्रेंमघन०, भा० २, पृ० ३४३ ।

डायँ डायँ
क्रि० वि० [अनु०] व्यर्थ इधर से उधर (घूमना) । व्यर्थ धूल छाचते हुए । जैसे, — वह यों ही दिन भर डायँ डायँ फिरा करता है ।

डायट
संज्ञा स्त्री० [अं] १. व्यवस्थापिका सभा । राज्यसभा । जैसे, जापान की इंपीरियल डायट । २. कुरूपा स्त्री ।

डायनामो
संज्ञा पुं० [अं०] एक प्रकार का छोटा एंजिन जिससे बिजली पैदा की जाती है ।

डायरिया
संज्ञा पुं० [अं०] दस्त की बीमारी । अतिसार ।

डायल
संज्ञा पुं० [अं०] १. घड़ी के सामने का वह गोल भाग जिसके ऊपर अंक वने होते हैं और सुइयाँ घुमतौ हैं । घड़ी का चेहरा । २. पहिए का टेढ़ा हो जाना (विशेषतः साइकिल आदि का) । अपनी जगह पर ठीक न बैठना ।

डायलाग
संज्ञा पुं० [अं० डायलाँग] संवाद । कथोपकथन । वार्ता लाप । उ०— अवकी दफे अपना डायलाग अच्छी तरह यार कर लो ।— आकाश०, पृ० १५२ ।

डायस
संज्ञा पुं० [अं०] वह ऊँचा स्थान या चबूतरा जिसपर किसी सभा के सभापति का आसन रखा जाता है । मंच ।

डायमंड कट
संज्ञा पुं० [अं०] गहनों की धातु को इस प्रकार छीलत जिसमें हीरे की सी चमक पैदा हो जाय । हीरे की सी काट । डामल काट ।

डायार्की
संज्ञा स्त्री० [अं०] वह शासनप्रणाली या सरकार जिसमें शासन अधिकार दो व्यक्तियों के हाथों में हो । द्वैष शासन । दुहत्था शासन । विशेष— भारत में सन् १९१९ ई० के गवर्नमेंट आफ इंडिया ऐक्ट के अनुसार प्रादेशिक शासनप्रणाली इसी प्रकार की कर दी गई थी । शासन के सुभीते के लिये प्रदेशों से संबंध रखनेवाले विषय दो भागों में बाँट दिए गए थे । एक रिजर्व्ड या रक्षित विषय जो गवर्नर और उनकी शासन— सभा के अधिकार में था, और दूसरा द्रांसफर्ड या हस्तां— तरित विषय, जो मिनिस्टरों या मंत्रियों के अधिकार में (जो निर्वाचित सदस्यों में से चुने जाते हैं) था । 'रक्षित विषयों' की सुव्यवस्था के लिये गवर्नर और उनकी शासन— सभा भारत सरकार और भारत सिव द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से पार्लमेंट अथवा ब्रिटिश मतदाताओं के सामने उत्तरदाता थी और हस्तांतरित विषयों के लिये गवर्नर के मंत्री अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय मतदाताओं के सामने उत्तर— दायी थे । यद्यपि विशेष अवस्थाओं में इनके मत के विरुद्ध कार्य करने का गवर्नर को अधिकार था, परंतु शासनसभा के बहुमत के विरुद्ध गवर्नर आचरण नहीं कर सकता था । शासनसभा के सदस्यों और मंत्रियों में एक अंतर यह भी था कि वे सम्राट् के आज्ञापत्र द्वारा नियुक्त होते थे, परंतु मंत्री को नियुक्त करने और हटाने का अधिकार गवर्नर को ही था । मंत्री का वेतन निर्दिष्ट करने का अधिकार व्यवस्थापिका सभा । को था ।— भारतीय शासनपद्धति ।

डार पु (१)
संज्ञा संज्ञा [सं० दारु(= लकड़ी)] १. डाल । शाखा । उ०— (क) रत्नजटित कंकन बाजूबंद गगन मुद्रिका सोहै । डार डार मनु मदन विटप तरु विकच देखि मन मोहै ।— सूर (शब्द०) । (ख) जिन दिन देखे वे कुसुम गई सो बीत बहार । अब अलि रही गुलाब में अपत कँटीली डार ।—बिहारी (शब्द०) । फानूस जलाने के लिये दीवार में लगाने की खूँटी ।

डार पु (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० डलक] डालिया । चँगेर । डाली । उ०— चली पाउन सब गोहनै फूल डार लेइ हाथ । बिस्सुनाथ कइ पूजा पदुमावति के साथ ।—जायसी (शब्द०) ।

डार (३)
संज्ञा स्त्री० [पं० डार (= झुंड)] समूह । झुंड ।

डारना
क्रि० सं० [हिं० डालना] दे० 'डालना' । उ०— (क) जिन्ने जन्म डारा है तुज कूँ । बिसर गया उनका ध्यान जू ।— दक्खिनी०, पृ० १४ । (ख) खूँद डारी धरनि सरन जल पूरि डारे चूर करि डारे सुख बिरही तियान के ।— ठाकुर०, पृ० १९ ।

डारा †
संज्ञा पुं० [हिं० डालना(= फैलना)] कपड़ा सुखाने के लिये बँधी रस्सी या बाँस । अरगनी ।

डारियास
संज्ञा पुं० [देश०] बाबून बंदर की एक जाति ।

डारी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० डार] दे० 'डार', 'डाल' ।

डाल (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० दारु(=लकडी), हिं० डार] १. पेड़ के धड़ से इधर उधर निकली हुई वह लंबी लकड़ी जिसमें पत्तियाँ और कल्ले होते हैं । शाखा । शाखा । मुहा०— डाल का टुटा = (१) डाल से पककर गिरा हुआ ताजा (फल) । (२) बढ़िया । अनोखा । चोखा । जैसे,— तुम्हीं एक डाल के टूटे हो जो सब कुछ तुम्हीं को दिया जाय । (३) नया आया हुआ । नवागंतुक । डाल का पका = पेड़ ही में पका हुआ । डालवाला = बंदर । शाखामृग । २. फानूस जलाने के लिये दिवार में लगी हुई एक प्रकार की खूँटी । ३. तलवापर का फल । तलवार के मूठ के ऊपर का मुख्य भाग । ४. एक प्रकार का गहना जो मध्यभारत और मारबाड़ में पहना जाता है ।

डाल
संज्ञा स्त्री० [सं० डाक, हिं० डला] १. डेलिया । चँगेरी । २. फूल, फल या खाने पीने की वस्तु जो डेलिया में सजाकर किसी के यहाँ भेजी जाय । ३. कपड़ा और गहना जो एक डलिया में रखकर विवाह के समय वर की ओर से वधू को दिया जाता है ।

डालना
क्रि० स० [सं० तलन (=नीचे रखना)] १. पकड़ी या ठहरी हुई वस्तु को इस प्रकार छोड़ देना कि वह नीचे गिर पडे़ । नीचे गिराना । छोड़ना । फेंकना । गेरना । जैसे,— ऐसी चीज क्यों हाथ में लिए हो ? उधर डाल दो । संयो० क्रि०—देना । मुहा०—डाल रखना = (१) किसी वस्तु को रख छोड़ना । (२) किसी काम को लेकर उसमें हाथ न लगाना । रोक रखना । देर लगाना । झुलाना । २. एक वस्तु को दूसरी वस्तु पर कुछ दूर से गिराना । छोड़ना । जैसे, हाथ पर पानी जालना, थूक पर राख डालना । संयो० क्रि०—देना । ३. किसी वस्तु को दूसरी वस्तु में रखने, ठहराने या मिलाने के लिये उसमें गिराना । किसी वस्तु को दूसरी वस्तु में इस प्रकार छोड़ना जिसमें वह उसमें ठहर या मिल जाय । स्थित या मिश्रित करना । रखना या मिलाना । जैसे, घडे़ में पानी डालना, दूध में चीनी डालना, दाल में घी डालना, चूर्ण में नमक डालना । संयो० क्रि०—देना । ४. घुसना । घुसेड़ना । प्रविष्ट करना । भीतर कर देना या ले जाना । जैसे, पानी में हाथ डालना, कुएँ में डोल डालना, बिल या मुँह में हाथ डालना । संयो० क्रि०—देना । ५. परित्याग करना । छोड़ना । खोज खबर न लेना । भुला देना । उ०— केहि अध औगुन आपनो करि डारि दिया रे ।— तुलसी (शब्द०) । ६. अंकित करना । लगाना । चिह्नित करना । जैसे, लकीर डालना, चिह्न डालना । संयो० क्रि०— देना । ७. एक वस्तु के ऊपर दूसरी वस्तु इस प्रकार फैलाना जिसमें वह कुछ ढक जाय । फैलाकर रखना । जैसे, मुँह पर चादर डालना, मेज पर कपड़ा डालना, सूखने के लिये गीली धोती डालना । संयो० क्रि०— देना । ९. शरीर पर धारण करना । पहनना । जैसे, अँगरखा डालना । संयो० क्रि०— लेना । १०. किसी के मत्थे छोड़ना । जिम्मे करना । भार देना । जैसे,— (क) तुम सब काम मेरे ही ऊपर डाल देते हो । (ख) उसका सारा खर्च मेरे उपर डाल दिया गया है । संयो० क्रि०— देना । ११. गर्भपात करना । पेट गिराना । (चौपायों के लिये) । संयो० क्रि०— देना । १२. (किसी स्त्री को) रख लेना । पत्नी की तरह रखना । संयो० क्रि०— लेना । १३. लगाना । उपयोग करना । जैसे, किसी व्यापार में रुपया डालना । १४. किसी के अंतर्गत करना । किसी विषय या वस्तु के भीतर लेना । जैसे,— यह रुपया ब्याह के खर्च में डाल दो । १५. अव्यवस्था आदि उपस्थित करना । बुरी बात घटित करना । मचाना । जैसे,— गड़बड़ डालना, आपत्ति डालना, विपत्ति डालना । १६. बिछाना । जैसे, खटिया डालना, पलंग डालना, चारा डालना । विशेष— इस क्रिया का प्रयोग संयो० क्रि० के रूप में भी, समाप्ति की ध्वनि व्यंजित करने के लिये, सकर्मक क्रियाओं के साथ होता है, जैसे, मार डालना, कर डालना, काट डालना, जला डालना, दे डालना, आदि ।

डालफिन
संज्ञा स्त्री० [अ०] ह्वैल मछली का एक भेद ।

डालर
संज्ञा पुं० [अ०] अमेरिका का सिक्का । यह १०० सेंट या टके का होता है । रुपयों में इसका मूल्य विनिमय दर के आधार पर सदा बदलता रहता है । कभी एक डालर तीन रुपए दो आने के बराबर था । संप्रति उसकी दर भारतीय रुपयों में लगभग ४.८७ न. पैसे है ।

डाला †
संज्ञा पुं० [सं० डलक] दे० 'डला', 'डाल' ।

डालिम
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दाडिम' [को०] ।

डाली (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० डाला] १. डलिया । चँगेरी । २. फल फूल, मेवे तथा खाने पीने की वस्तुएँ जो डलिया में सजाकर किसी के पास सम्मानार्थ भेजी जाती है । जैसे,— बडे़ दिन में साहब लोगों के पास बहुत सी डालियाँ आती हैं । क्रि० प्र०—भेजना । मुहा०—डाली लगाना = डलिया में मेवे आदि सजाकर भेजना ।

डाली (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० डाल] दे० 'डाल (१)' ।

डाँव पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'दाँव' । उ०— पाका काचा ह्वै गया, जीत्या हारै डाव । अंत काल गाफिल भया, दादू फिसले पाव ।— दादू०, पृ० २१२ ।

डावड़ा (१)
संज्ञा पुं० [देश०] पिठवन ।

डावड़ा (२)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'डावरा' ।

डावड़ी पु †
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'डावरी' ।

डावरा
संज्ञा पुं० [सं० डिम्ब?] [स्त्री० डावरी] लड़का । बेटा । उ०— दशरथ को डावरे साँवरो व्याहे जनककुमारी ।— रघुराज (शब्द०) ।

डावरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० डावरा] लड़की । बेटी । कन्या । उ०— (क) ठाढे़ भए रघुवंशमणि तिमि जनक भूपति डावरी ।— रघुराज (शब्द०) । (ख) जिन पानि गह्यो हुतो मेरौ तबै सब गाय उठीं ब्रज डावरियाँ ।— सुंदरीसर्वस्व (शब्द०) ।

डास
संज्ञा पुं० [देश०] चमारों का एक औजार जिससे चमडे के भीतर का रुख साफ करते हैं ।

डासन
संज्ञा पुं० [सं० दर्भासन, हिं० डाभ + आसन] बिछाने की चटाई, वस्त्र आदि । बिछावन । बिछौना । बिस्तर । उ०— लोभइ ओढ़न लोभइ डासन । सिस्नोदर पर जमपुर त्रास न ।— तुलसी (शब्द०) ।

डासना (१)
क्रि० स० [हिं० डासन] बिछाना । डालना । फैलाना । उ०— (क) निज कर डासि नागरिपु छाला । बैठे सहजहि संभु कृपाला ।— तुलसी (शब्द०) । (ख) डासत ही गइ बीति निसा सब कबहुँ नाथ नींद भरि सोयो ।— तुलसी (शब्द०) ।

डासना पु †
क्रि० स० [हिं० डसना] डसना । काटना । उ०— डासी वा विसासी विषमेषु विषधर उठै आठहू पहर विषै विष की लहर सी ।— देव (शब्द०) ।

डासनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० डासन] १. खाट । पलंग । चारपाई । २. बिछौना ।

डाह
संज्ञा स्त्री० [सं० दाह ] १. जलन । ईर्ष्या । द्वेष । द्रोह । उ०— इनके मन मैं औरों की जाह बड़ी प्रबल थी ।—श्री— निवास ग्रं०, पृ० २१२ । क्रि० प्र०— करना । रखना । २. ताप । जलन । उ०— पुहकर डाह वियोग, प्रान विरह वस होहिं जब । का समझावहिं लोग, अग्नि न थिर पारौ रहै ।— रसरतन, पृ० ६४ ।

डाहना
क्रि० स० [सं० दाहन] जलाना । सताना । दिक करना । तंग करना । उ०— काहें को मोहि डाहन आए रेनि देत सुख वाको ?— सूर (शब्द०) ।

डाहल, डाहाल
संज्ञा पुं० [सं०] एक देश । त्रिपुर देस [को०] ।

डाही
वि० [हिं० डाह] डाह करनेवाला । ईर्ष्या करनेवाला । ईर्ष्यालु । जैसे,— वह बड़ा डाही है,

डाहुक
संज्ञा पुं० [सं० दाहुक ? या देश०] १. एक पक्षी जो टिटिहरी के आकार का होता है और जलाशयों के निकट रहता है । २. चातक । पपीहा ।

डिंगर (१)
संज्ञा पुं० [सं० टिङ्गर ] १. मोटा आदमी । मोटासा । २. दुष्ट । बदमाश । ठग । ३. दास । गुलाम । ४. नीच मनुष्य । निम्न कोटि का व्यक्ति । ५. फेंकना । क्षेपण (को०) । ६. तिरस्कार (को०) ।

डिंगर (२)
संज्ञा पुं० [देश०] वह काठ जो नटखठ चौपायों के गले में बाँध दिया जाता है । ठिंगुरा । उ०— कबिरा माला काठ की पहिरी मुगद डुलाय । सुमिरन की सुध है नहीं ज्यों डिंगर बाँधी गाय ।— कबीर (शब्द०) ।

डिंगल (१)
वि० [सं० डिङ्गर] नीच । दूषित ।

डिंगल (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] राजपूताने की वह भाषा जिसमें भाट और चारण काव्य और वंशावली आदि लिखते चले आते हैं ।

डिंगसा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का चीड़ । विशेष— इसके पेड़ खासिया पर्वत तथा चटगाँव और वर्मा की पहाड़ियों में बहुत होते हैं । इससे बहुत बढ़िया गोंद या राल निकलती है । तारपीन का तेल भी इससे निकलता है ।

डिंडस
संज्ञा पुं० [सं० टिण्डिश] डिंड या टिंडसी वाम की तरकारी ।

डिंडिक
संज्ञा पुं० [सं० डिण्डिक] हँसोड भिखारी [को०] ।

डिंडिभ
संज्ञा पुं० [सं० डिण्डिभ] जलसर्प । डेडहा [को०] ।

डिंडिम
संज्ञा पुं० [सं० डिण्डिम] १. प्राचीन काल का एक बाजा । जिसपर चमड़ा मढ़ा होता था । डिमडिमी । डुगडुगिया । २. करौंदा । कृष्णपाक फल । यो०— डिंडिमथोष । डिंडिमनाद ।

डिंडिमी
संज्ञा स्त्री० [हिं० डिमडिमी] दे० 'डिंडिम' ।

डिंडिर
संज्ञा पुं० [सं० डिण्डिर] १. समुद्रफेन । २. पानी का झाग ।

डिंडिर मोदक
संज्ञा पुं० [सं० डिण्डिरमोदक] १. गृंजन । गाजर । २. लहसुन ।

डिंडिश
संज्ञा पुं० [सं० डिण्डिश] टिंड या टिंडसी नाम की तरकारी । डेंड़सी ।

डिंडी †
संज्ञा स्त्री० [देश०] मछली फँसाने का चारा । (विशेषतः) छोटी मछली ।

डिंडीर
संज्ञा पुं० [सं० डिणडीर] दे० 'डिंडिर' ।

डिंब
संज्ञा पुं० [सं० डिम्ब] १. हलचल । पुकार । वावैला । २. भयध्वनि । ३. दंगा । लड़ाई । ४. अंडा । ५. फेफड़ा । फुफ्फुस ६. प्लीहा । पिलही । ७. कीडे़ का छोटा बच्चा । ८. आरंभिक अवस्था का भ्रूण । ९ गर्भाशय (को०) । १०. कंदुक । गेंद (को०) । ११. भय । डर । भीति (को०) । १२. शरीर (को०) । १३. सद्योजात शिशु वा प्राणी (को०) । १४. मूर्ख (को०) ।

डिंबयुद्ध
संज्ञा पुं० [सं० डिम्बयुद्ध] दे० 'डिंबाहव' [को०] ।

डिंबाशय
संज्ञा पुं० [सं० डिम्ब + आशय] गर्भाशय ।

डिंबाहव
संज्ञा पुं० [सं० डिम्ब + आहव] सामान्य युद्ध । ऐसी लड़ाई जिसमें राजा आदि सम्मिलित न हों ।

डिंबिका
संज्ञा स्त्री० [सं० डिम्बिका] १. मदमाती स्त्री । २. सोना— पाठा । श्योनाक । ३. फेन । बुलबुला । बुल्ला (को०) ।

डिंभ (१)
संज्ञा पुं० [सं० डिम्भ ] १. बच्चा । छोटा बच्चा । उ०— अंब तू हो डिंभ, सो न बूझिए बिलंब अब अवलबं नाहीं आनराखत हों तिरिये ।— तुलसी (शब्द०) । २. पशु का छोटा बच्चा (को०) । ३. मूर्ख या जड़ मनुष्य । ४. एक प्रकार का उदर रोग जो धीरे धीरे बढ़ता हुआ अंत में बहुत भयानक हो जाता है ।

डिंभ † (२)
संज्ञा पुं० [सं० दम्भ] १. आडंबर । पाखंड । २. अभिमान । घमंड । उ०— करै नहिं कछु डिंभ कबहूँ, डारि मैं तै खोई ।— जग० वानी, पृ० ३५ ।

डिंभक
संज्ञा पुं० [सं० डिम्भक] [स्त्री० डिंभिका] १. बच्चा । छोटा । बच्चा । २. पशु का छोटा बच्चा (को०) ।

डिंभचक्र
संज्ञा पुं० [सं० डिम्भचक्र] स्वरोदय में वर्णित मनुष्यों के शुभाशुभ फल का सूचक एक तांत्रिक चक्र [को०] ।

डिंभा
संज्ञा स्त्री० [सं० डिम्भा] छोटी बालिका । नन्हीं बच्ची [को०] ।

डिंभिया
वि० [सं० दंभ, हिं० डिंभ] आड़वर रखनेवाला । पाखंडी । २. अभिमानी । घमंडी ।

डिँड़सी
संज्ञा स्त्री० [सं० टिणिडश] टिंड या टिंडसी नाम का तरकारी ।

डिकामाली
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक पेड़ जो मध्य भारत तथा दक्षिण में होता है । विशेष— इसमें एक प्रकार की गोंद या राल निकलती है जो हींग की तरह मृगी रोग में दी जाती है । इसकी लगाने से घाव जल्दी सूखता है और उसपर मक्खियाँ नहीं बैठतीं ।

डिक्करी
संज्ञा स्त्री० [सं०] युवा औरत । युवती [को०] ।

डिक्को
संज्ञा स्त्री० [हिं० धक्का] १. सींगों का धक्का । (जैसे मे़ढे देते हैं) । २. झपट । वार । आक्रमण ।

डिक्टेटर
संज्ञा पुं० [अं०] १. वह मनुष्य जिसे कोई काम करने का पूरा अधिकार प्राप्त हो । प्रधान नेता या पथप्रदर्शक । शास्ता । २. वह मनुष्य जिसे शासन की अबाधित सत्ता प्राप्त हो । निरंकुश शासक । उ०— देवता रूप वे डिक्टेटर, लोहू से जिनके हाथ सने ।— मानव०, पृ० ५६ । विशेष— डिक्टेटर दो प्रकार के होते हैं— (१) राष्ट्रपक्ष का और (२) राज्य या शासनपक्ष का । जब देश में संकट उपस्थित होता है तब देश या राष्ट्र उस मनुष्य को, जिसपर उसका पूरा विश्वास होता है, पूर्ण अधिकार दे देता है की वह जो चाहे सो करे । यह व्यवस्था संकट काल के लिये है । जैसै, सं० १९८० —८१ में महात्मा गांधी राष्ट्र के डिक्टेटर या शास्ता थे । पर राज्य या शासनपक्ष का डिक्टेटर वही होता है जो बड़ा जबरदस्त होता है । जिसका सब लोगों पर बड़ा आतंक छाया रहता है । जैसे, किसी समय इटली का डिक्टेटर मुसोलिनी था । यौ०— डिक्टेटरशिप = निरंकुश शासन । अधिनायकवाद ।

डिक्टेशन
संज्ञा पुं० [अं०] वह वाक्य जो लिखने कि लिये बोला जाय । इमला ।

डिकी
संज्ञा स्त्री० [अं०] १. आज्ञा । हुक्म । फरमान । २. न्यायालय की वह आज्ञा जिसके द्वारा लड़नेवाले पक्षों में से किसी पक्ष को किसी संपत्ति का अधिकार दिया जाय । उ०—अदालत डिक्री न दे ।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० ३७३ । वि० दे० 'डिगरी' ।

डिक्लरेशन
संज्ञा पुं० [अं०] वह लिखा हुआ कागज जिसमें किसी मजिस्ट्रेट के सामने कोई प्रेस खोलने, रखने या कोई समाचार- पत्र या पत्रिका छापने ओर निकालने की जिम्मेवारी ली या घोषित की जाती है । जैसे,—(क) उन्होंने अपने नाम से प्रेस खोलने का डिक्लरेशन दिया है । (ख) वे अग्रदुत के मुद्रक और प्रकाशक होने का डिक्लरेशन देनेवाले हैं ।

डिश्कनरी
संज्ञा स्त्री० [अं०] शब्दकोश । अभिधान ।

डिगंबर पु
वि० [सं० दिगम्बर] वस्त्ररहित । नग्न । दिगंबर । उ०—अंबर छाँड़ डिगंबर होई । उहि अगमन मग निवहै सोई ।—रसरतन, पृ० २४६ ।

डिगना
क्रि० अ० [सं० टिक (= हिलना । डोलना)] १. हिलना । टलना । खिसकना । हटना । सरकना । जगह छोड़ना । जैसे,— उस भारी पत्थर को कई आदमी उठाने गए पर वह जरा भी न डिगा । उ०—असवार डिगत बाहन फिरैं, भिरैं भूत भैरव विकट ।—हम्मीर०, पृ० ५८ । संयो० क्रि०—जाना । २. किसी बात पर स्थिर न रहना । प्रतिज्ञा छोड़ना । सँकल्प वा सिद्धांत पर दृढ़ न रहना । बार पर जमा न रहना । विचलित होना । संयो० क्रि०—जाना ।

डिगमिगाना † (१)
क्रि० अ० [हिं० डगमगाना] दे० 'डगमगाना' । उ०रणधीर के आने से ये सभा ऐसी डिगमिगाने लगी थी जैसे हाथी के चढ़ने से नाव डिगमिगाती है ।—श्रीनिवास ग्रं०, पृ० ८६ । (ख) डिगमिगात पग चलन दुखारो । यहो लकुट अब देति सहारे ।—शकुंतला, पृ० ८२ ।

डिगमिगाना (१)
क्रि० स० १. हिलाना । डिगाना । २. विचलित करना ।

डिगरी
संज्ञा स्त्री० [अं० डिग्री] १. विश्वविद्यालय की परीक्षा में उत्तीर्ण होने की पदवी । क्रि० प्र०—मिलना ।—लेना । २. अंश । कला । समकोण का १/९० भाग ।

डिगरी (२)
संज्ञा स्त्री० [अं० डिक्री] अदालत का वह फैसला जिसके जरिए से किसी फरीक को कोई हक मिलता है । न्यायलय की वह आज्ञा जिसके द्वारा लड़नेवाले पत्रों में से किसी को कोई स्वत्व या अधिकार प्राप्त होता है । जैसे,—उस मुकदमें में उसकी डिग्ररी हो गई । यौ०—डिगरीदार । मुहा०—डिगरी जारी कराना = फैसले के मुताबिक किसी जायदाद पर कब्जा वगैरह करने की कारँनाई कराना । न्यायालय के निर्णय के अनुसार किसी संपत्ति पर अधिकार करने का उपाय कराना । डिगरी देना = अभियोग में किसी के पक्ष में निर्णय करना । फैसले के जरिए से हक कायनकरना । डिगरी पाना = अपने पक्ष में न्यायालय की आज्ञा प्राप्त करना । जर डिगरी = वह रुपया जो अदालत एक फरीक से दूसरे फरीक को दिलावे ।

डिगरीदार
संज्ञा पुं० [अं० डिक्री + फा़० दार] वह जिसके पक्ष में डिगरी हुई हो ।

डिगलाना (१)पु
क्रि० अ० [हिं० डग, डिगना] डगमगाना । हिलना डोलना । लड़खड़ाना ।

डिगलाना (२)
क्रि० स० [हिं० डिगना] डिगाना । चालित करना ।

डिगवा
संज्ञा पुं० [देश०] एक चिड़िया का नाम ।

डिगाना
क्रि० स० [हिं० डिगना] १. हटाना । खसकाना । जगह से टालना । सरकाना । हिलाना । संयो० क्रि०—देना । २. बात पर जमा न रहना । किसी संकल्प या सिद्धांत पर स्थिर न रखना । विचलित करना । उ०—सुर नर मुनि देय डिगाय करै यह सबकी हाँसी ।—पलटू०, पृ० २५ । संयो० क्रि०—देना ।

डिगुलाना पु
क्रि० अ० [हिं० डग] दे० 'डिगलाना (१)' । उ०—डिगत पानि डिगुलात गिरि लखि सब ब्रज बेहान । कंपि किसोरी दरसि कै खरैं लजाने लाल ।—बिहारी (शब्द०) ।

डिग्गी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० दीर्घिका, बँग० दीघी (= बावली या तालाब)] पोखरा । बावली । जैसे, लालडिग्गी ।

डिग्गी (२) †
संज्ञा स्त्री० [देश०] हिम्मत । साहस । जिगरा ।

डिजाइन
संज्ञा स्त्री० [अं०] १. तर्ज । बनावट । खाका ।

डिटेक्टिब
संज्ञा पुं० [अं०] जासूस । मुखबिर । गुप्तचर । भोदिया । यौ०—डिडेक्टिव पुलिस = वह पुलिस जो छिपकर मामलों का पता लगावे । खुफिवा पुलिस ।

डिठार †
वि० [हिं० डीठ + आरा (प्रत्य०)] [वि० डिठारी] दृष्टिवाला । देखनेवाना । आँखवाला । जिसकी आँख से मूझे ।

डिठि †
संज्ञा स्त्री० [सं० दृष्टि] दे० 'दृष्टि' । उ०—अधर सुधा मिठी, दूधे धवरि डिठि, मधुसम मधुरे बानि रे ।—विद्यापति, पृ० १०३ ।

डिठियार, डिठियारा †
वि० [हिं०] दे० 'डिठार' । उ०—(क) तुलसी स्वारथ सामुहो परमारथ तन पीठि । अंध कहै दुख पाइहै डिठियारो केहि डीठि ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) अटकर सेती अंध डिठियारे राह बतावै ।—पलटू०, पृ० ७४ ।

डिठोँना
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'डिठौना' । उ०—सब बचाती हैं सुतों के गात्र । किंतु देती हैं डिठोंना मात्र ।—साकेत, पृ० १८० ।

डिठोहरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० डीठि + हरना अथवा देश०] एक जंगली पेड़ के फल का बीज जिसे तागे में पिरोकर बच्चों के गले में उन्हें नजर से बचाने के लिये पहनाते हैं । विशेष—दे० 'बजववट्ट' या 'नजरबट्टू' ।

डिठौना
संज्ञा पुं० [हिं० डीठ] काजल का टीका जिसे लड़कों के मस्तक पर नजर से बचाने को स्त्रियाँ लगा देती हैं । उ०— (क) पहिरायो पुनि बसन रँगीला । दीन्हों भाल डिठौना नीला ।—रघुराज (शब्द०) । (ख) सखि कंजन को परम सलोना भाल डिठौना देहीं । मनु पंकज कोना पर बैठी अलि- छौना मघु लेहीं ।—रघुराज (शब्द०) ।

डिड †
वि० [सं० दृढ़] दे० 'दृढ़' । उ०—नहि बाल वृद्ध किस्सोर तुअ धुअ समान पै डिड खरौ ।—पृ० रा०, २ ।५१० ।

डिडिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] मुहाँसा ।

डिडकार †, डिडकारी
संज्ञा स्त्री० [अनु०] पशुओं का गुर्राना ।

डिड़ई
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का धान जो अगहन में तैयार होता है ।

डिड़वा
संज्ञा पुं० [देश०] डिड़ई नाम का धान जो अगहन में तैयार होता है ।

डिडिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक रोग जिसमें युवावस्था में ही बाल पकने लगते हैं ।

डिडियाना †
क्रि० अ० [अनु०] शोक के आवेग में गाय का रँभाना । उ०—परी धरनि धुकि यों बिललाइ । ज्यों मृतबच्छ गाइ डिडियाइ ।—नंद० ग्रं०, पृ० २४२ ।

डिढ †
वि० [सं० दृढ़, प्रा० डिढ] दृढ़ । पक्का । मजबूत । उ०— सुनि दुंदुभि धुंकार धराघर घरघर बुल्लिय । डिढ न रहे डड्ढार, बाघ बनचर बन डुल्लिय ।—सुजान०, पृ० २६ ।

डिढय पु
वि० [सं० ड्ढ़] दे० 'डिढ' । उ०—सेस सीस लचि झार डिढय डाढार करक्किय ।—रसरतन, पृ० १०४ ।

डिढाना पु †
क्रि० स० [हिं० डिढ़] १. पक्का करना । मजबूत करना । २. ठानना । निश्चित करना । मन में दृढ़ विचार करना ।

डिढ्या †
संज्ञा स्त्री० [देश०] अत्यंत लालच । लालसा । कामना । तृष्णा । उ०—संग्रह करने की लालसा प्रबल हुई तो जोरी सै, चोरी सै, छल सै, खुशामद सै, कमाने की डिढया पड़ेगी और खाने खर्चने के नाम सै जान निकल जायगी ।—श्रीनिवास दास (शब्द०) ।

डित्थ
संज्ञा पुं० [सं०] १. काठ का बना हाथी । २. विशेष लक्षणोंवाला पुरुष । विशेष—साँवले, सुंदर, युवा और सर्वशास्त्रवेत्ता विद्वान् पुरुष को डित्य कहते हैं ।

डिनर
संज्ञा पुं० [अं०] रात का भोजन । उ०—कहो, सुना तुमने भी है कुछ, सेठ हमारे रामचंद्र ने, आज दिया हम सब लोगों को, है फरपो में एक डिनर ।—मानस, पृ० ६८ ।

डिपटी
संज्ञा पुं० [अं० डेपुटी] नायब । सहायक । सहकारी । जैसे, डिपटी कलक्टर, डिपटी पोस्टमास्टर, डिपटी इंसपेक्टर ।

डिपाजिट
संज्ञा पुं० [अ०] घरोहर । अमानत । तहवील ।

डिपार्टमेंट
संज्ञा पुं० [अं०] मुहकमा । सरिश्ता । विभाग । गुदाम । अमानतखाना । जखीरा । भांडार । जैसे, बुकडिपो ।

डिप्टी
संज्ञा पुं० [अं० डिपटी] दे० 'डिपटी' । जैसे, डिपटी कंट्रोलर ।

डिप्थीरिया
संज्ञा पुं० [अं०] छोटे बच्चों का एक संक्रामक रोगजिसे कंठरोहिणी कहते हैं । उ०—कीर्ति का छोटा भाई अकस्मात् एक विचित्र रोग का शिकार बन गया सहै । डाक्टरों ने कहा डिप्थीरिया हो गया है । औरतों ने कहा हब्बा डब्बा ।—संन्यासी, पृ० १६० ।

डिप्लोमा
संज्ञा पुं० [अं०] विद्यासंबंधिनी योग्यता का प्रमाणपत्र । सनद ।

डिप्लोमेसी
संज्ञा स्त्री० [अं०] १. वह चातुरी या कौशल जो कार्यसाधन के लिये, विशेषकर राजनीतिक कार्यसाधन के लिये किया जाय । कूटनीति । २. स्वतंत्र राष्ट्रों में आपस का व्यवहार संबंध । राजनीतिक संबंध ।

डिप्लोमैट
संज्ञा पुं० [अं०] वह जो डिप्लोमेसी या कूटनीति में निपुण हो । कूटनीतिज्ञ ।

डिफेंस
संज्ञा पुं० [अं०] आरक्षा । बचाव । सुरक्षा । २. सफाई (पक्ष संबंधी) ।

डिफेमेशन
संज्ञा पुं० [अं०] किसी की अप्रतिष्ठा या अपमान करने के लिये गर्हित शब्दों का प्रयोग । ऐसे गंदे शब्दों का प्रयोग जिससे किसी की मानहानि या बेइज्जती होती हो । हतक इज्जत । जैसे,—इधर महीनों से उनपर डिफेमेशन केस चल रहा है ।

डिबिया (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० डिब्बा + इया (लध्वर्थक प्रत्य०)] वह छोटा ढक्कनदार बरतन जिसके ऊपर ढक्कन अच्छी तरह जमकर बैठ जाय और जिसमें रखी हुई चीज हिलाने डुलाने से न गिरे । छोटा डिब्बा । छोटा संपुट । जैसे, सुरती की डिबीया ।

डिबिया † (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० जिह्वा] दे० 'जिह्वा' । उ०—राँम, राँम राँम, रतँन लागी डिबिया ।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ९६७ ।

डिबिया टँगड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] कुश्ती का एक पेच । विशेष—यह पेंच उस समय किया जाता है जब जोड़ (विपक्षी) कमर पर होता है ओर उसका दाहिना हाथ कमर में लिपटा होता है । इसमें विपक्षी को दाहिने हाथ से जोड़ का बायाँ हाथ कमर के पास से दाहिने जाँघ तक खींचते हुए और बाँए हाथ से लंगोट पकड़ते हुए बाँए पैर से भीतरी टाँग मारकर गिराते हैं ।

डिबेंचर
संज्ञा पुं० [अं०] १. वह कागज या दस्तावेज जिसमें कोई अफसर किसी कंपनी या म्युनिसिपालिटी आदि के लिए हुए ऋण को स्वीकार करता है । ऋण स्वीकारपत्र । २. माल की रफ्तनी के महसूल का रवन्ना । परमट का वसीका । बहती ।

डिब्बा
संज्ञा पुं० [तैलंग या सं० ढिम्ब (= गोला)] १. वह छोटा ढक्कनदार बरतन जिसके ऊपर ढक्कन अच्छी तरह जमकर बैठ जाय और जिसमें रखी हुई चीज हिलाने डुलाने से न गिरे । संपुट २. रेलगाड़ी की एक गाड़ी । ३. पसली के दर्द की बीमारी जो प्रायः बच्चों को हुआ करती है । पलई चलने की बीमारी ।

डिब्बी
संज्ञा स्त्री० [हिं० डिब्बा] दे० 'डिबिया' ।

डिभगना पु
क्रि० स० [देश०] मोहित करना । मोहना । छलना । डहकना । उ०—दुरजोधन अभिमानहिं गयऊ । पंडव केर मरम नहिं भयऊ । माया के डिभगे सब राजा । उत्तम मध्यम बाजन बाजा ।—कबीर (शब्द०) ।

डिम
संज्ञा पुं० [सं०] नाटक या दृश्य काव्य का एक भेद । विशेष—इसमें माया, इंद्रजाल, लड़ाई और क्रोध आदि का समा- वेश विशेष रूप से होता है । यह रौद्र रस प्रधान होता हैं और इसमें चार अंक होते हैं । इसके नायक देवता, गंधर्व, यक्ष आदि होते हैं । भूतों और पिशाचों की लीला इसमें दिखाई जाती है । इसमें शांत, शृंगार और हास्य ये तीनों रस न आने चाहिए ।

डिमडिम
संज्ञा स्त्री० [अनु०] डमरू से निकलनेवाली आवाज । उ०—डिम डिम डमरू बजा निज कर में नाचो नयन तृतीय तरेर ।—रेणुका, पृ० ३ ।

डिमडिमी
संज्ञा स्त्री० [सं० डिण्डिम] चमड़ा मढ़ा हुआ एक बाजा जो लकड़ी से बजाटा जाता है । डुगडगिया । डुग्गी । उ०— डिंमडिमी पटह डोल डफ बीणा मृदंग उमंग चँगतार ।— सूर (शब्द०) ।

डिमरेज
संज्ञा पुं० [अं०] १. बंदरगाह में जहाज के ज्यादा ठहरने का हर्जाना । २. स्टेशन पर आए हुए माल के अधिक दिन पड़ें रहने का हर्जा, जो पानेवाले को देना पड़ता है । क्रि० प्र०—लगना ।

डिमाई
संज्ञा स्त्री० [अं०] कागज या छापने के कल कौ एक नाप जो१८" x २२" इंच होती है ।

डिमाक पु
संज्ञा पुं० [अ० दिमाग] मस्तिष्क । दिमाग । सिर । उ०—डिमाक नाक चून कै कि नाक सों हरैं ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० २८४ ।

डिमोक्रेसी
संज्ञा स्त्री० [अं०] जनतांत्रिक शासन ।

डिला (१)
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की घास जो गीली भूमि में उत्पन्न होती है । मोथा ।

डिला (२)
संज्ञा पुं० [सं० दल] ऊन का लच्छा ।

डिलार †
वि० [फ़ा० दिलावर या दिलेर] जवाँमर्द । शूर । वीर ।

डिलारा
वि० [हिं० डील] बड़े कद का । डीलडौल वाला । उ०— बलक्कैं भलक्कैं ललक्कैं उमंडैं । बुखारैहु के हैं डिलारे घुमंड़ैं ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० २८० ।

डिलिवरी, डिलेवरी
संज्ञा स्त्री० [अं०] १. डाकखानों में आई हुई चिट्ठियों, पारसलों, मनीआर्डरों की बँटाई जो नियत समय पर होती है । २. किसी चीज का बाँटा या दिया जाना । ३. प्रसव होना ।

डिल्ला (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक छंद जिसके प्रत्येक चरण में १६ मात्राएँ और अंत में भगण होता है । जैसे,—राम नाम निशि वासर गावहु । जन्म लेन कर फल जग पावहु । सीख हमारी जो हिय लावहु । जन्म मरण के फद नसावहु । २. एक वर्णवृत्त का नाम जिसके प्रत्येक चरण में दो सगण (/?/) होते हैं । इसके अन्य नाम जिसका, तिल्ला और तिल्लानाभी हैं । जैसे,—सखि वाल खरो । शिव भाल घरो । अमरा हरषे । तिलका निरखे ।

डिल्ला (२)
संज्ञा पुं० [हिं० ठीला] बैलों के कंधों पर उठा हुआ कुबड़ । कुब्बा । ककुत्थ ।

डिविजनल
वि० [अं०] डिवीजन का । उस भूभाग, कमिश्नरी या किस्मत का जिसके अंतर्गत कई जिले हों । जैसे,—डिवीजनल कमिश्नर ।

डिविडेंड
संज्ञा पुं० [अं०] वह लाभ या मुनाफा जो जायंट स्टाक कंपनी या संमिनित पूंजी से चलनेवाली कपनी को होता है, और जो हिस्सेदारों में, उनके हिस्से के मुताबिक बँट जाता है । जैसे,—कृष्ण काटन मिल ने इस बार अपने हिस्सेदारों को पाँच सैकड़ें डिविड़ेंड बाँटा ।

डिवीजन
संज्ञा पुं० [अं०] १. वह भूभाग जिसके अंतर्गत कई जिले हों । कमिश्नरी । जैसे, बनारस डिविजन । २. विभाग । श्रेणी । जैसे,—वह मैट्रिक्युलेशन परीक्षा में फर्स्ट डिवीजन पास हुआ ।

डिसकाउंट
संज्ञा पुं० [अं०] वह कमी जो व्यवहार या लेनदेन में किसी वस्तु के मूल्य में की जाती है । बट्टा । दस्तूरी । कमीशन ।

डिसमिस
वि० [अं०] १. बरखास्त । २. खारिज । जैसे, अपील डिसमिस करना ।

डिसलायल
वि० [अं०] अराजभक्त । राजद्रोही । उ०—डिस- लायल हिंदुन कहत कहाँ मूढ़ ते लोग ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ७६५ ।

डिसीप्लिन
संज्ञा पुं० [अं०] १. नियम या कायदे का अनुसार चलने की शिक्षा या भाव । अनुशासन । २. आज्ञानुवर्तित्व । नियमानुवर्तित्व । फरमाबरदारी । ३. व्यवस्था । पद्धति । ४. शिक्षा । तालीम । ५. दंड । सजा ।

डिस्ट्रायर
संज्ञा पुं० [अं०] नाशक जहाज । वि० दे० 'टारपीडो बोट' ।

डिस्ट्रिक
संज्ञा पुं० [अं० डिस्ट्रिक्ट] दे० 'डिस्ट्रिक्ट' ।

डिस्ट्रिक्ट
संज्ञा पुं० [अं०] किसी प्रदेश या सूबे का वह भाग जो एक कलेक्टर या डिप्टी कमिश्नर के प्रबंधाधीन हो । जिला । यौ०—डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट । डिस्ट्रिक्ट बोर्ड ।

डिस्ट्रिक्ट बोर्ड
संज्ञा पुं० [अं०] दे० 'जिला बोर्ड़' ।

डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट
संज्ञा पुं० [अं०] दे० 'जिला मजिस्ट्रेट' ।

डिस्पेंसरी
संज्ञा स्त्री० [अं०] दवाखाना । औषधालय । उ०—पोस्ट आफिस से पहले यहाँ एक डिस्पेंसरी खुलवाना जरूरी था ।—मैला०, पृ० ७ ।

डिस्पोप्सिया
संज्ञा पुं० [अं०] मंदाग्नि । अग्निमांद्य । पाचन शक्ति की कमी ।

डिस्ट्रिब्यूट (करना)
क्रि० स० [अं०] छापेखाने में कंपोज किए हुए टाइपों (अक्षरों) को केसों (खानों) में अपने स्थान पर रखना ।

डिस्ट्रिब्यूटर
संज्ञा पुं० [अं०] १. कंपोज टाइपों को अपने स्थान पर रखनेवाला । २. वितरक । वितरण करनेवाला ।

डिहरी (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] ६००० गाँठों का एक मान जिसके अनुसार कालीनों (गलीचों) का दाम लगाया जाता है ।

डिइरी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० दीर्घ, हिं० दीह, डीह] कच्ची मिट्टी का ऊँचा बरतन जिसनें अनाज भरा जाता है ।

डींग
संज्ञा स्त्री० [सं० डीह (=उड़ान)] लंबी चौड़ी बात । खूब बढ बढ़कर कही हुई बात । अपनी बढ़ाई की झूठी बात । अभिमान की बात । शेखी । सिट्ट । क्रि० प्र०—उड़ाना । उ०—माखँ घुटना फूठे आँख । मूई डींग उड़ा रही है जमाने भर की ।—फिसाना०, भा० ३, पृ० १५१ ।—मारना ।—हाँकना । मुहा०—डीँग की लेना = शेखी बघारना ।

डीक
संज्ञा स्त्री० [देश०] झिल्ली या फाँफी जो आँख पर पड़ जाती है । जाला । मोतियाबिंद ।

डीकरा पु †
संज्ञा पुं० [सं० डिम्बक] पुत्र । बेटा ।

डीकरी पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० डिम्बक] बेटी । कन्या (डि०) ।

डीगंबर †
वि० [हिं०] दे० 'दिगंबर' । उ०—डीगंबर के गाँव में धोबी का क्या काम ।—मलूक०, पृ० ३३ ।

डीठ
संज्ञा स्त्री० [सं० दृष्टि, प्रा० दिट्ठि, डिट्ठि] १. दृष्टि । नजर । निगाह । उ०—गुरु शब्दन कूँ ग्रहन करि विषयन कूँ दे पीठ । गोविंद रूपी गदा महि मारो करमन डीठ ।—दया० ७ बानी, पृ० ६ । क्रि० प्र०—डालना ।—पसारना । मुहा०—डीठ चुराना = नजर छिपाना । सामने न ताकना । डीठ छिपाना = दे० 'डीठ चुराना' । डीठ जोड़ना = चार आँखों करना । सामने ताकना । डीठ बाँधना = नजरबंद करना । ऐसी माया या जादू करना जिसमें सामने की वस्तु ठीक ठीक च सूझे । डीठ मारना = नजर डालना । चितवन से चित्त मोहित करना । डौठ रखना= नजर रखना । निरीक्षण करना । डीठ लगाना = नजर लगाना । किसी अच्छी वस्तु पर अपनी दृष्टि का बुरा प्रभाव डालना । यौ०—डीठबंध । २. देखने की शक्ति । ३. ज्ञान । सूझ । उ०—दई पीठे बिनु डीठि हौ, तू विश्व विलोचन ।—तुलसी (शब्द०) ।

डीठना †पु (१)
क्रि० अ० [हिं० डीठ + ना (प्रत्य०)] दिखाई देना । दृष्टि में आना ।

डीठना पु † (२)
क्रि० स० [हिं० डीठ + ना (प्रत्य०)] १. देखना । दृष्टि डालना । उ०—रूप गुरू कर चेलै डीठा । चित समाइ होई चित्र पईठा ।—जायसी (शब्द०) । २. बुरी दृष्टि लगाना । नजर लगाना । जैसे,—कल से बच्चे को बुखार आ गया, किसी ने डीठ दिया है ।

डीठबंध
संज्ञा पुं० [सं० दृष्टिबन्ध] १. ऐसी माया था जादू जिससे सामने की वस्तु ठीक ठीक न सुझाई दे । नजरबंदी । इंद्रजाल । २. कुछ का कुछ कर दिखानेवाला । इंद्रजाल करनेवाला । जादूगर ।

डीठि †
संज्ञा स्त्री० [सं० दृष्टि] दे० 'डीठ' । उ०—कोउ प्रिय रूप नयन भरि उर मैं धरि धरि ध्यावति । मधुमाखी लौ डीठि दुहूँ दिसि अति छबि पावति ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३० ।

डीठिमूठि पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० डीठि + मूठ] नजर । टोना । जादू । उ०—रोवनि धोवनि अनखनि अनरनि डिठिमुठि निठुर नसाइहौ ।—तुलसी (शब्द०) ।

डीडू †
संज्ञा पुं० [डिं० डेड़हा] दे० 'डेड़हा' । उ०—डीड़ समान का सेष पनीजै ।—नद०, पृ० १५५ ।

डीन
संज्ञा स्त्री० [सं०] उड़ान । पक्षियों की गति । विशेष—ऊपर नीचे आदि इसके २६ भेद किए गए हैं ।

डीनडीनक
संज्ञा पुं० [सं०] उड़ान के २६ भेदों में से एक । बीच में रुक रुककर उड़ना [को०] ।

डीपो †
संज्ञा पुं० [अं० डिपो] उ०—पहचानोगे क्या खाकी वर्दी वालों में । हर एक जगह पर इनके डीपो डेरे हैं ।—मिलन०, पृ० १८८ ।

डीबुआ †
संज्ञा पुं० [देश०] पैसा । स०—बबुआ न आवा, मोर भैयन न पावा, याक तुपक को न वाला, गाँठि डीबुआ न द्यावा है ।—सूदन (शब्द०) ।

डीमडाम
संज्ञा पुं० [सं० डिम्ब (= धूमधाम)] १. ठाठ । ऐंठ । तपाक । ठसक । अंहकार । उ०—पाग पेंच खैंच दे लपेट फट फेंट बाँध ऐंड़ें ऐंड़ें आव, पैने टूटे डीमडाम के ।— हृदयराम (शब्द०) । २. धूमधाम । ठाठबाट । आडंबर । उ०—दुंदुभी बजाई ढोल ताल करनाई बड़ों ऊधम मचाई छल कीने डीमडाम को ।—हृदयराम (शब्द०) ।

डोल
संज्ञा पुं० [हिं० टीला] १. प्राणियों के शरीर की ऊँचाई । शरीर का विस्तार । कद । उठान । जैसे,—वह छोटे डील का आदमी है । उ०—भई यदपि नैसुक दुबराई । बड़ें डील नहिं देत दिखाई ।—शकुंतला, पृ० ३१ । यौ०—डील डौल = (१) देह की लंबाई चौड़ाई । शरीरविस्तार । (२) शरीर का ढाँचा । आकार । आकृति । काठी । डाल पील = दे० 'डीलडौल' । उ०—दोउ बंस सुदंध प्रकासु । बड़ि डील पील सु जालु ।—ह०, रासो० पृ० १२५ । २. शरीर । जिस्म । दहे । जैसे,—(क) अपने डील से उसने इतने रुपए पैदा किए । (ख) उनके डाल से किसी की बुराई नहीं हो सकती । ३. व्यक्ति । प्राणी । मनुष्य । जैसे,—सौ डील के लिये भोजन चाहिए । उ०—जेते डील लेते हाथी, तेतेई खवास साथी, कंचन के कुंड़ेल किरीट पुंज छायो है ।— हृदयराम (शब्द०) ।

डीला
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का नरकट जो प्रायः पश्चिमो- त्तर भारत में पाया जाता है ।

डीवट †
संज्ञा स्त्री० [हिं० डीवट] दे० 'दीवट' । उ०—हुजूर यह पुराने फैशन की डीवट तो हटाइए । लैंप मँगवाइए ।—फिसाना०, भा० ३, पृ० १५६ ।

डीह
संज्ञा पुं० [फ़ा० देह] १. गाँव । आबादी । बस्ती । २. उजड़े हुए गाँव का टीला । उ०—गतिहीन पंगु सा पड़ा पड़ा ढहकर जैसे बन रहा डीह । —कामायनी, पृ० १४५ । ३. ग्राम देवता ।

डीहदारी
संज्ञा स्त्री० [हिं० डीह + फा० दारी] एक तरह का हक जो उन जमींदरों को मिलता है जो अपनी जमीन बेच डालते हैं । खरीददार उनको गाँव का कोई अंश दे देता है जिससे उनका निर्वाह हो ।

डुंग †
संज्ञा पुं० [सं० तुङ्ग (= ऊँचा)] १. ढेर । अटाला । उ०— धर्ती स्वर्ग असूझ भा तबहुँ न आग बुझाय । उठहिं बज्र जरि डुंग वे धूम रहो जग छाय ।—जायसी (शब्द०) २. टीला । मीटा । पहाड़ी ।

डुंड †
संज्ञा पुं० [सं० या स्कन्ध (= तना)] १. ठूँठ । पेड़ों की सूखी डाल जिसमें पत्तें आदि न हों । उ०—देव जू अनंग अंग होमि कै भसम संग अंग अंग उमह्यौ अखैबर ज्यौ डुंड मै ।— देव (शब्द०) । २. शिररहित अंग । धड़ । उ०—उड़ि मुंड परत कहुँ हय सुतुंड । कहुं हथ्थ चरन कहुँ परिय डुंड ।—सुजान०, पृ० २२ ।

डुंडु
संज्ञा पुं० [सं० डुण्डुम] दे० 'डुंडुभ' ।

डुंडुभ
संज्ञा पुं० [सं० डुण्डुभ] पानी में रहनेवाला साँप जिसमें बहुत कम विष होता है । डेड़हा साँप । डचौढ़ा साँप ।

डुंडुम
संज्ञा पुं० [सं० डुणडुम] दे० 'डुंडुम' ।

डुंडुल
संज्ञा पुं० [सं० डुणडुल] छोटा उल्लू ।

डुंदुक
संज्ञा पुं० [सं० डुन्डुक] दे० 'डाहुक' [को०] ।

डुंब
संज्ञा पुं० [सं० डुम्ब, देशी] डोम [को०] ।

डुंबर
संज्ञा पुं० [सं० डुम्बर] डंबर । आडंबर ।

डुंक
संज्ञा पुं० [अनु०] घूँसा । मुक्का ।

डुकड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० टुकड़ी] दो घोड़ों की बग्घी । उ०—खुद डुकड़ी पर चढ़ के निकलती थी ।—सैर कु०, पृ० १४ ।

डुकाडुकी
संज्ञा स्त्री० [हिं० ढुकना] १. आँखमिचौनी । ढुकौवल । ढुकाढुकी । उ०—अति गह्वर तहँ ब्रज के बाल । डुकाडुकी खेलें बहुकाल ।—नंद० ग्रं०, २६२ ।

डुकिया
संज्ञा स्त्री० [हिं० डोका] दे० 'डोकिया' ।

डुकियाना
क्रि० स० [हिं० डुक] घूँसों से मारना । घूँसा लगाना ।

डुक्का डुक्की पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] घूसेवाली । आपस में घूँसों की मार । उ०—डुक्का डुक्की होन लगी ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० २७ ।

डुगडुगाना
क्रि० स० [अनु०] किसी चमड़ा मढ़े बाजे को लकड़ी से बजाना ।

डुगडुगी
संज्ञा स्त्री० [अनु०] चमड़ा मढ़ा हुआ एक छोटा बाजा । डौंगी । डुग्गी ।उ०—डुगडुगी सहर में बाजी हो ।—कबीर श०, भा० २, पृ० १४१ । क्रि० प्र०—बजाना ।—फेरना । मुहा०—डुगडुगी पीटना = डौड़ी बजाकर घोषित करना । मुनादी करना । चारों ओर प्रकट करना । डुगडुगी फेरना = दे० 'डुगडुगी पीटना' । उ०—आपने पत्रावलंबन ग्रंथ करके विश्वे- शवर द्वार पर भी डुगडुगी फेर दी थी जिसको हमसेशास्त्रार्थ करना हो पहले जाकर वह पत्र देख ले । —भारतेंदु ग्रं०, भा० ३, पृ० ५७४ ।

डुग्गी
संज्ञा स्त्री० [अनु०] दे० 'डुगडुगी' ।

डुचना †
क्रि० अ० [हिं० डूबना] दबना । चुकता न होना । उ०— नाचता है सूदखोर जहाँ कहीं ब्याज डुतचा ।—कुकुर०, पृ० १० ।

डुडला
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का वृक्ष जिसे दूदला भी कहते हैं ।

डुड़ †
संज्ञा पुं० [सं० दादुर] मेंढक ।

डुड़का
संज्ञा पुं० [देश०] धान के पौधों का एक रोग ।

डुडुहा †
संज्ञा पुं० [हिं० डाँड़] खेत में दो नालियों (बरहों) के बीच की मेंड़ ।

डुपटना †
क्रि० स० [हिं० दो + पट] चुनना । चुनियाना । उ०— अन्हवाइ तन पहिराइ भूषन वसन सुंदर डुपटि के ।— विश्राम (शब्द०) ।

डुपटा †
संज्ञा पुं० [हिं० दुपट्टा] दे० 'दुपट्टा' । उ०—डुपटा है रँग किरमची मनु मनके तई कमची ।—ब्रज ग्रं०, पृ० ५८ ।

डुपट्टा †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'दुपट्टा' ।

डुप्लीकेट
वि० [अं०] द्वितीय । दूसरी । उ०—कमरा बंद करके, चाबी अपने परिचित किसी एक मेस महाराज को दे दी, डुप्लीकेट उमादत्त के पास थी ।—संन्यासी, पृ० १२३ ।

डुबकना
क्रि० अ० [हिं० डुबकी] १. डूबना उतरना । २. चिंताकुल होना । घबराना । उ०—इनही से सब डुबकत डोलैं मुकद्दम और दीवान । खान पान सब न्यारा राखैं, मन में उनके मान ।—कबीर श०, भा० २, पृ० ६४ ।

डुबकी
संज्ञा स्त्री० [हिं० डूबना] १. पानी में डूबने में डूबने की क्रिया । डुब्बी । गोता । बुड़की । उ०—डुबकी खाइ न काहुअ पावा । डूब समुद्र में जीउ गँवावा ।—इंद्रा०, पृ० १५९ । क्रि० प्र०—खाना ।—देना ।—मारना ।—लगाना ।—लेना । मुहा०—डुबकी मारना या लगाना = गायब हो जाना । २. पीठी की बनी हुई बिना तली बरी जो पीठी ही की कढ़ी में डुबाकर रखी जाती है । ३. एक प्रकार का बटेर ।

डुबडुभी †
संज्ञा स्त्री० [सं० दुन्दुभि] दे० 'दुंदुभि' । उ०—बाजा बाजइ डुबडुभी, पुरणवा चाल्यो बीसलराव ।—बी० रासो, पृ० ३७ ।

डुबवाना
क्रि० स० [हिं० डुबाना का प्रे० रूप] डुबाने का काम कराना ।

डुबाना
क्रि० स० [हिं० डूबना] १. पानी या और किसी द्रव पदार्थ के भीतर डालना । मग्न करना । गोता देना । बोरना । २. चौपट करना । नष्ट करना । सत्यानाश करना । बरबाद करना । ३. मर्यादा कलंकित करना । यश में दाग लगाना । मुहा०—नाम डुबाना = नाम को कलंकित करना । यश को बिगा- ड़ना । किसी कर्म या त्रुटि के द्वारा प्रतिष्ठा नष्ट करना । मर्यादा खोना । लुटिया डुबाना = महत्व खोना । बड़ाई न रखना । प्रतिष्ठा नष्ट करना । वंश डुबाना = र्वश की मुर्यादा नष्ट करना । कुल की प्रतिष्ठा खोना ।

डुबान
संज्ञा पुं० [हिं० डूबना] पानी की उतनी गहराई जितनी में एक मनुष्य डूब जाय । डूवने भर की गहराई । जैसे,— यहाँ हाथी का डुबाव है ।

डुबुकी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० डूबना] दे० 'डुबकी' । उ०— परन जलज काढ़ै कहँ जाऊँ । डुबुकी खाऊँ सुमिरि वह नाउँ ।— इंद्रा०, पृ० ८२ ।

डुबोना †
क्रि० स० [हिं०] दे० ' डुबोना' ।

डुब्बा
संज्ञा पुं० [हिं० डूबना] दे० ' पनडुब्बा' ।

डुब्बो
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० ' डुबकी' । उ०— व्यर्थ लगाने को डुब्बी हाँ ! होगा कौन भला राजी ।— झरना, पृ० ३० ।

डुबकौरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० डुबकी + बरी] दे० ' डुभकौरी' । उ०— चोराई तोराई मुरई मुरब्बा भरी जी । डुबकौरी मुँगछौरी रिकवछ इँड़हर छीर छँछौरी जौ ।— रघुनाथ (शब्द०) ।

डुमकौरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० डूबना, डुबकी + बरी] पीठी की बिना तली बरी जो पीठी ही के झोल में पकाई और डुबाकर रखी जाती है । उ०— खँड़रा बचका जाससी और डुभकौरी । ग्रं०, पृ० १२४ ।

डुमई
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का चावल जो कछार में होता है ।

डुरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० डोरी] दे० ' ड़ोरी' । उ०— काम की घुरी नेह में जुरी मानौ किसी ने उसी की डुरी से बाँध दिया हो । श्यामा०, पृ० ३१ ।

डुलना पु †
क्रि० अ० [सं दोलन] दे० ' ड़ोलना' । उ०— मँद मंद मैगल मतंग लौ चलेई भले भुजन समेत भुज भूषन डुलत जात ।— पद्माकार (शब्द०) ।

डुलाना
क्रि० स० [हिं० डोलना] १. हिलाना । चलाना । गति में लाना । चलायमान करना । जैसे, पंखा डुलाना । २. हटाना । झगाना । उ०— कारे भए करि कृष्ण को ध्यान डुलाएँ ते काहू के डोलत ना ।— सुंदरीसर्वस्व (शब्द०) । ३. चलाना । फिराना । ४. घुमाना । टहलाना ।

डुलि
संज्ञा स्त्री० [सं०] कमठी । कछुई । कच्छपी ।

डुलिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] खंजन के आकार की एक चिड़िया [को०] ।

डुली
संज्ञा स्त्री० [सं०] चिल्ला साग । लाल पत्ती का बथुआ ।

डूँगर
संज्ञा पुं० [सं० तुड़्ग (= पहाड़ी)] १. टीला । भीटा । ढूह । उ०— सूरदास प्रभु रसिक शिरोमणि कैसे दुरत दुराय कहौं धौं डुँगरन की ओट सुमेर ।— सूर (शब्द०) । २. छोटी पहाड़ी । उ०— छिमही में ब्रज धोइ बहावै । डूँगर को कहुँ लावँ न पावैं ।— सूर (शब्द०) ।

डूँगर फल
संज्ञा पुं० [हिं० डूँगर + फल] बंदाल का फल । देवदाली का फल जो बहुत कड़ूवा होता है और सरदी में घोड़ों को खिलाया जाता हैं ।

डूँगरी
संज्ञा संज्ञा [हिं० डूँगर] छोटी पहाड़ा ।

डूँगा (१)
संज्ञा पुं० [सं० द्रोण] १. चम्मच । चमचा । २. एक लकड़ी की नाव । डोंगा (लश०) । ३. रस्से का गोल लपेटा हुआ लच्छा (लश०) ।

डूँगा † (२)
संज्ञा पुं० [सं० तुड़्ग] छोटी पहाड़ी । टीला । उ०— विविध संसार कौन बिधि तिरबौ, जे दृढ़ नाव गहे रे । नाव छाड़ि दे डूँगे तौ दुःख सहे रे ।— रै० बानी, पृ० ३८ ।

डूँगा (३)
संज्ञा पुं० [देश०] संगीत की २४ शोभाओं में से एक ।

डूँज †
संज्ञा स्त्री० [देश०] आँधी । तेज हवा (ड़िं०) ।

डूँड़ा (१)
वि० [सं० त्रुटि, हिं० टूटना] एक सींग का (बैल) । (बैल) जिसका एक सींग टूट गया हो । २. जिसके हाथ कटे हों । लूला । बिना हात पावँ का । ३. शिरविहीन (धड़) ।

डूँम
संज्ञा पुं० [देशां डुँब या ड़ोंब] दे० ' ड़ोम' । उ०— डूँम न जाँणे देवजस सूँम न जाँणे मोज । मुगल न जाँणे पोदया चुगल न जाँणे चोज ।— बांकी० ग्रं० भा० २, पृ० ४८ ।

डूँमणी
संज्ञा स्त्री० [हिं० डूँम] दे० 'डोमनी—३' । उ०— पीहर संदी डूँमणी, ऊँमर हंदइ संथ्थ ।— ढ़ोला०, दू० ६३० ।

डूक
संज्ञा स्त्री० [देश०] पशुओं के फेफड़ौं की एक बीमारी ।

डूकना †
क्रि० स० [सं० त्रुटिकरण, या हिं० चूकना] त्रुटि करना । भूल करना । गलती करना । मौका खोना । चूकना ।

डूबना
क्रि० अ० [अनु० डुब डुब] १. पानी या और किसी द्रव पदार्थ के भीतर समाना । एकबारगी पानी के भीतर चला जाना । मग्न होना । गोता खाता । बूड़ना । जैसे, नाव डूबना, आदमी डूबना । संयो० क्रि०—जाना । मुहा०— डूबकर पानी पीनी = धोखाघड़ी करना । औरों से छिपकर बुरा काम करना । उ०— हमीं में डूबकर पानी पीनेवाले हैं ।— चुभते० (दोदो०), पृ० ४ । डूब मरना = लज्जा के मारे मर जाना । शरम के मारे मुँह न दिखाना । उ०— उन्हें डूब मरने को संसार में चुल्लू भर पानी मिलना मुश्किल हो जाता ।— प्रेमघन०, भा० २ पृ० ३४१ । विशेष— इस मुहा० का प्रयोग विधि और आदेश के रूप में ही प्रायः होता है । जैसे, तू डूब मर ? तुम डूब क्यों नहीं मरते? चुल्लू भर पानी में डूब मरना = दें० 'डूब मरना' । डूबते को तिनके का सहारा होना = निराश्रय व्यक्ति के लिये थोड़ा सा आश्रय भी बहुत होना । संकट में पड़े हुए निस्सहाय मनुष्य के लिये थोड़ी सी सहायता भी बहुत होना । डूबा नाम उछालना = (१) फिर से प्रतिष्ठा प्राप्त करना । गई हुई मर्यादा को फिर से स्थापित करना । (२) अप्रासिद्धि से प्रसिद्धि प्राप्त करना । डूबना उतराना = (१) चिंता में मग्न होना । सोच में पड़ा जाना । (२) चिंताकुल होना । चित व्याकुल होना । जी घबराना । (२) बेहोशी होना । मूर्छा आना । विशेष— पद्माकर ने 'प्राण' शब्द के साथ भी इस मुहा० का प्रयोग किया है, जैसे, ऊबत हौ, डूबत हौ, डोलत हो, बोलत न काहे प्रीति रीतिन रितै चले ।...एरे मेरे प्राव ! कान्ह प्यारे की चलाचल में तब तों चले न, आब चाहत कितै चले । २ सूयँ, ग्रह नक्षत्र आदि का अस्त होना । सूर्य या किसी तारे का अदृश्य होना । जैसे, सूर्य डूबना, शुक्र डूबना । संयो० क्रि०— जाना । ३चौपट होना । सत्यानाश जाना । बरबाद होना । बिगड़ना । नष्ट होना । जैसे, वंश डूबना । उ०— डूबा वंश कबीर का, उपजे पूत कमाल ।— (शब्द०) । संयो० क्रि०— जाना । उ०— आवत जावत कोई न देखा डूब गया बिन पानी ।— कबीर श०, पृ० ३१ । मुहा०— नाम डूबना = मर्यादा बिगड़ाना । प्रतिष्ठा नष्ट होना । कुख्याति होना । ४ किसी व्यवासाय में लगाया हुआ धन नष्ट होना या किसी को दिया हुआ रूपया न वसूल होना । मारा जाना । जैसे,—(क) उसने जितना रुपया इधर उधर कर्ज दिया था सब डूब गया । (ख) जिसने जिसने हिस्सा खरीद सबका रुपया डूब गया । संयों क्रि०—जाना । ५ बेटी का बुरे घर ब्याहा जाना । कन्या का ऐसे घर पड़ना जहाँ बहुत कष्ट हो । संयो० क्रि०— जाना । ६ चिंतन में मग्न होना । विचार में लीन होना । अच्छी तरह ध्यान डटाना । जैसे, डूबकार सोचना । ७. लीन होना । तन्मय होना । लिप्त होना । अच्छी तरह लगना । जैसे, विषय वासना में डूबना, ध्यान में डूबना ।

डूम †
संज्ञा पुं० [सं० डूम्ब] दे० 'ड़ोम' ।— सुंदर यहु मन डूम है, माँगत करै न संक । दीन भयौ जाचत फिरै, राजा होइ कि रंक ।— सुंदर ग्रं०, भा० २, पृ० ७२६ ।

डूमा
संज्ञा पुं० [रूसी] रूस की पार्लमेंट या राजसभा का नाम ।

डूमना †
क्रि० अ० [हिं० ड़ुलमा] दे० ' डोलना' । उ०— पहिलै पोहरै रैण कै, दिवला अंवर डूल । धण कस्तूरी हुइ रही, प्रिव चंपारौ फूल ।— ढ़ोला०, दू० ५८२ ।

डेंटिस्ट
संज्ञा पुं० [अं० डेन्टिस्ट] दंतचिकित्सक । दाँत का डाक्टर । दांत बनानेवाला ।

डेंड़सी
संज्ञा स्त्री० [सं० टिण्डिश] ककड़ी की तरह की एक तरकारी जिसके फल कुम्हडे की तरह गोल पर छोटे होते हैं ।

डेउढा †
वि०, संज्ञा पुं० [हिं०] दे० ' डेवढ़ा', 'डयोढ़ा' ।

डेउढ़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० ' डयोढ़ी' ।

डेक † (१)
संज्ञा पुं० [देश०] महानिंच । बकायन ।

डेक (२)
संज्ञा पुं० [अं०] जहाज पर लकड़ी से पटा हुआ फर्श या छत ।

डेक्करना पु †
क्रि० अ० [अनु०] ध्वनि करना । दे० 'डकरना' । उ०— सब दिसे डाकिनि डेक्करह ।—कीर्ति०, पृ० १०८ ।

डेक्कार †
संज्ञा पुं० [अनु०] ड़मरू ध्वनि । उ०— उछलि ड़मरु डेक्कार वर ।— कीर्ति०, पृ० १०८ ।

डेग (१) †
संज्ञा पुं० [हिं० डग] दे० 'ड़ग' । उ०— बात बात में गाली और डेग डेग पर डाली ।— मैला०, पृ० २३ ।

डेग (२)
संज्ञा पुं० [हिं० देग] दे० 'देग' ।

डेगची
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० ' देगची' ।

डेट
संज्ञा स्त्री० [अं०] तिथि । तारीख ।

डेडरा †
संज्ञा पुं० [सं दादुर] दे० ' दादुर' । उ०— डेडरा से डरै, सींगी मच्छी को मरोड़ डारै । कानन के बीच जाय कुंजर को पक्करे ।— राम० धर्म०, पृ० ८१ ।

डेडरिया †
संज्ञा पुं० [हिं० डेड़र] दे० ' डेडरा' । उ०— डेडरिया खिण मइ हुवइ बूढइ सरजित्त ।— ढोला०, पृ० ५४८ ।

डोडहा †
संज्ञा पुं० [सं० डुणडुम] पानी का साँप जिसमें बहुत काम विष हेता है ।

डेढ़
वि० [सं० अध्यर्द्ध, प्रा० डिवड़्ढ] एक और आधा । सार्द्धेक । जो गिनती में १ १/२ हो । जैसे, डेढ़ रुपया, डेढ़ पाव, डेढ़ सेर, डेढ़ बजे । मुहा०— डेढ़ ईट लको जुदा मसजिद बनाना = खरेपन या अक्खड़- पन के कारण सबसे अमग काम करना । मिलकर काम न करना । डेढ् गाँठ = एक पूरी और उसके ऊपर दूसरी आधी गाँठ । रस्सी तागे आदि की गाँठ जिसमें एक पूरी गाँठ लगाकर दूसरी गाँठ इस लगाते हैं कि तागे का एक छोर दूसरे छोर की दूसरी ओर बाहर नहीं खींचते, तागे को थोड़ी दूर ले जाकर बीच ही में कस देते हैं । इसमें दोनों छोर एक ही ओर रहते हैं ओर दूसरे छोर को खोंचने से गाँठ खुल जाती है । मुद्धी । डेढ़ चावल की खिचड़ी पकाना = अपनी राय सबसे अलग रखना । बहुमत से भिन्न मत प्रकट करना । डेढ़ चुल्लू = थोड़ा सा । डेढ़ चुल्लू लहू पीना = मार डालना । खूब दंड़ देना ।(क्रोधोक्ति, स्त्रि०) । विशेष— जब किसी निदिंष्ट संख्या के पहले इस शब्द का प्रयोग होता है तब उस संख्या को एकाई मानकर उसके आधे को जोड़ने का अभिप्राय होता है । जैसे, डेढ़ सौ = सौ ओर उसका आधा पचास अर्थात् १५०, डेढ़ हजार = हजार और उसका आधा पचास सो अर्थात् १५०० । पर, इस शब्द का प्रयोग दहाई के आगे के स्थानों को निर्दिष्ट करनेवाली संख्याओं के साथ ही होता हैं । जैसे, सौ, हजार, लाख, करोड़, अरब इत्यादि । पर अनपढ़ और गँवार, जो पूरी गिनती नहीं जानते, ओर संख्याओं के साथ भी इस शब्द का पेरयोग कर देते हैं । जैसे, डेढ़ बीस अर्थात् तीस ।

डेढ़खम्मन
संज्ञा स्त्री० [हिं० डेढ + फ़ा० खम] एक प्रकार का बिरका या गोल रुखानी ।

डेढ़खम्मन
संज्ञा स्त्री० [हिं० डेढ़ + फ़ा० खम] (= टेढ़ा)] तंबाकू पीने का वह सस्ता नैचा जिसमें कुलफी नहीं होती । इसके घुमाव पर केवल एक लोह की टेढ़ी सलाई रखकर उसे पयाल और चिथडे़ आदि से लपेट देते हैं ।

डेढ़गोशी
संज्ञा पुं० [हिं० डेढ़ + फ़ा० गोशह (= कोना)] एक बहुत छोटा ओर मजबूत बना हुआ जहाज ।

डेढ़ा (१)
वि० [हिं० डेढ़] डेढ़ गुना । किसी वस्तु से उसका आधा और अधिक । डेवढ़ा ।

डेढ़ा (२)
संज्ञा पुं० एक प्रकार का पहा़ड़ा जिसमें प्रत्येक संख्या की डेढ़गुनी संख्या बतलाई जाती हैं ।

डेढ़िया (१)
संज्ञा पुं० [देश०] पुआले की जाति का एक बहुत ऊँचा पेड़ जिसके पत्ते सुगंधित होते हैं । विशेष— यह वृक्ष दारजिलिंग, सिक्किम और भूटान आदि में पाया जाता हैं । इसके पत्तों से एक प्रकार की सुगंध निकलती है । इसकी लकड़ी मकानों में लगाने तथा चाय के संदूक और खेती के सामान (हल, पाटा आदि) बनावे के काम में आती हैं । यह पेड़ पुआले की जाति का हैं ।

डेढ़िया † (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० डेंढ़] दे० ' डेढ़ी' ।

डेढ़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० डेढ़] किसानों को चोआई के समय इस शर्त पर अनाज उधार देने की रीति कि वे फसल कटने पर जिए हुए अनीज का ड़्योढा देंगे ।

डेना पु †
क्रि० स० [पं०] देना । प्रदान करना । उ०— तन भी डेवाँ, मन डेवाँ पिंड पराख वे ।— दादू०, पृ० ५१३ ।

डेपूटेशन
संज्ञा पुं० [अ०] चुने हुए प्रधान लोनों की वह मंडली जो जनसाधारण था किसी सभा संस्था की ओर से सरकार, राजा महारजा अथवा किसौ अधिकारी या शासक के पास किसी विषय में प्रार्थना करने के लिये भेजी जाय । प्रतिनिधि मंडल । विशिष्ट मंडल ।

डेबरा †
वि० [देश०] बैंहत्था । बाएँ हाथ से काम करनेवाला ।

डेबरी † (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] खेत का वह कोना जो जोसने में छूट जादा है । कोंतर ।

डेबरी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० डिब्बी] डिज्बी के आकार का टीन, शीशे आदि का एक बरतन जिसमें तेल भरकर रोशनी के लिये बत्ती जलाते हैं । डिब्बी ।

डेमोक्रेसी
संज्ञा स्त्री० [अं०] १. वह सरकार यै शासनप्रणाली जिसमें राजसत्ता जनसाधारण के हाथ में हो ओर उस सत्ता या शक्ति का प्रयोग वे स्वयं या उनके निर्वाचित प्रतिनिधि करें । वह सरकार जो जमसाधारण के अधीन हो । सर्व- साधारण द्वारा परिचालित सरकार । लोकसत्ताक राज्य । लोकसत्तात्मक राज्य । प्रजासत्तात्मक राज्य । २. वह राष्ट्र जिसमें समस्त राजसत्ता जनसाधारण के हाथ में हो और वह सामूहिक रूप से या अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा शासन और न्याय का विधान करते हों । प्राजातंत्र । ३. राजनीतिक और सामाजिक समानता । समाज की वह अव्स्थ जिसमें कुलीन अकुलीन, धनी दरिद्र, ऊँच नीच या इसी प्रकार का और भेद नहीं माना जाता ।

डेमोक्रैट †
संज्ञा पुं० [अं०] १. वह जो डेमोक्रेसी या प्रजासत्ता या लोकसत्ता के सिद्धात का पक्षपाती हो । वह जो सरकार को प्रजासत्ताक या लोकसत्ताक बनाने के सिद्धांत का पक्षपाती हो । २. वह जो राजनीतिक ओर प्राकृतिक समानता कापक्षपाती हो । वह जो कुलीनता अकुलीनता या ऊँच नीच का भेद न मानता हो ।

डेर † (१)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० ' डर' ।

डेर (२)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० ' डेरा' । उ०— रहै खेत पर ठाढ़ भक्ति की डेर मँहे ।—पलटू० पृ० ८७ ।

डेरा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० ठैरना, ठैराव या हिं० दर (स्थान)] १. टिकान । ठहराव । थोडे़ काल के लिये लिवास । थोडे़ दिन के लिये रहना । पड़ाव । जैसे,— आज रात को यहीं डेरा करो, सबेरे उठकर चलेंगे । क्रि० प्र०—होना ।— लेना । = स्थान तजबीजकर टिक जाना या निवास करना ।— ढोला०, दू० १८७ । २. टिकने का आयोजन । टिकान का सामान । ठहरने वा रहने के लिये फैलाया हुआ सामान । जैसे, बिस्तर, बरतन, भाँड़ा, छप्पर, तंबू इत्यादि । छावनी । जैसे,— यहाँ से चटपट डेरा उठाओ । यौ०— डेरा डेडा = टिकने का सामना । बोरिया बँधना । निवास का सामान । उ०— तसल्ली से असबाब वगेरह रखा गया और डेराडंडा ठीक हुआ ।— प्रेमघन०, भा० २, पृ० १५९ । मुहा०— डेरा डालना = सामान फैलाकर टिकना । टहरना । रहना । डेरा पड़ना = टिकान होना । छावनी पड़ना । उ०— (क) भरि चौरासी कोस परे गोपन के डेरा ।— सूर (शब्द०) । (ख) पास मेरे इधर उधर आगे । है दुखों का पड़ा हुआ डेरा ।— चुभते०, पृ० ४ । डेरा डंडा उखाडना = टिकने का सामान हटाकर चला जाना । ३. टिकने के लिये साफ किया हुआ और छाया बनाया हुआ स्थान । ठहरने का स्थान । छावनी । कैप । उ०— नौबत झरहि बहु नृपति डेरन दुंदुभी घुनि ह्वै रही ।— रघुराज (शब्द०) । ४. खेमा । तंबु । छोलदारी । शामियाना । क्रि० प्र०— खड़ा करना । ५. नाचने गानेवालों का दल । मंडली । गोल । ६. मकान । धर । निवासस्थान । जैसे,— तुम्हारा डेरा कितनी दूर है ?

डेरा पु (२)
वि० [सं० डहरा (= छोटा)?] [स्त्री० डेरी] बायाँ । सव्य । जैसे, डेरा हाथ । उ०— (क) फहमैं आगे फहमैं प्राछे, फहमैं दहिनेस डेरे ।— कबीर (शब्द०) (ख) सूर श्याम सम्मुख रति मानत गए मग बिसरि दाहिने डोरे ।— सूर (शब्द०) ।

डेरा (३)
संज्ञा पुं० [दे्श०] एक छोटा जंगली पेड़ जिसकी सफेद और मजबूत लकड़ी सजावट के समान बनाने के काम में आती है । विशेष— यह पेड़ पंजाब, अवध, बंगाल तथा मध्य प्रदेश और मदरास में भी होता है । इसे 'धरोली' भी कहते हैं । इसकी छाल और जड़ साँप काटने पर पिलाई जाती है ।

डेराना †
क्रि० अ० [हिं० डर] दे० ' डरना' । उ०— जहाँ पुहुप देखत अलि संगु । जिउ डेराइ काँपत सब अंगू ।— जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० ३४० ।

डेरावली
संज्ञा स्त्री० [हिं० डेरा + वाली] रखैल । उ०— खेलावन की डेरावली खुद आकार बालदेव की बुढ़िया मौसी से कह गई थी ।— मैला० पृ० १२ ।

डेरी
संज्ञा स्त्री० [अं० डेयरी] वह स्थाय जहाँ गौएँ, भैसें रखी और दूध मक्खन आदि बेचा जाता है । यौ०— डेरीफार्म ।

डेरीफार्म
संज्ञा पुं० [अं०] दे० 'डेरी' ।

डेरु पु
संज्ञा पुं० [हिं० डर] दे० 'डर' । उ०—जग को देखि मोहिं डेरु लाग्यो ।— जग०, बानी०, पृ० २८ ।

डेरूँ †
संज्ञा पुं० [सं० डमरू] दे० 'डमरू' । उ०— सिव सखी भेख साजिकै, आए गोरा कौ तजिकै । नाचै हैं डेरूँ लैकै, ब्रजबाल देखि झिझिकै ।— ब्रज ग्रं०, पृ० ६१ ।

डेल (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] वह भूमि जो रबी की फसल के लिये जोत— कर छोड़ दी जाय । परेल ।

डेल (२)
संज्ञा पुं० [देश०] कटहल की तरह का एक बड़ा ऊँचा पेड़ जो लंका में होता है । विशेष— इसके हीर की लकड़ी चमकदार और मजबूत होती है, इसलिये वह मेज कुरसी तथा सजावट के अन्य सामान बनाने वह काम में आती है । नावें भी उसकी अच्छी बनती हैं । इस पेड़ में कटहल के बरबार बड़े फल लगते हैं जो खाए जाते हैं । बीज भी खाने के काम में आते हैं । इन बीजों में से तेल निकलता है जो दवा और जलाने के काम में आता है ।

डेल (३)
संज्ञा पुं० [सं० डुण्डुल] उल्लू पक्षी । उ०— धननाद, जोवत, राजमद ज्यों पंछिन मँह डेल ।— स्वामी हरिदास (शब्द०) ।

डेल (४)
संज्ञा पुं० [सं० दल, हिं० डला] ढेला । पत्थर, मिट्टी या इँट का टुकड़ा । रोड़ा । उ०— (क) नाहिं न रास रसिक रस चाख्यो तातें डेल सो डारो ।— सूर (शब्द०) । (ख) डेल सो बनाय आय मेलत सभा के बीच लोगन कवित्त कीवौ खेल करि जानो है ।— इतिहास, पृ० ३८४ । क्रि० प्र० — डेल करवा = नष्ट करना । ढेला या रोड़ा कर देना । समाप्त करना ।— नंद० ग्र०, पृ० २७७ ।

डेल † (१)
संज्ञा पुं० [हिं० डला] वह डला जिसमें बहेलिए पक्षी आदि बंद करके रखते हैं । उ०—कित नैहर पुनि आउब, कित ससुरे यह खेल । आपु आपु कहँ होइहि, परब पंखि जस डेल ।— जायसी (शब्द०) ।

डेलआयरियन
संज्ञा स्त्री० [आयरिश] (स्वतंत्र) आयरलैंड की पार्लमेंट या व्यवस्थापिक परिषद जिसमें उस देश के लिये कानून कायदे आदि बनतै हैं ।

डेलटा
संज्ञा पुं० [यू०, अं०] नदियों के मुहाने या संगमस्थान पर उलके द्वार लाए हुए कीचड़ और बालू के जमने से बनी हुई वह भूमि जो धारा के कई शाखाओं में विभक्त होने के कारण तिकोनी होती है ।

डेला (१)
संज्ञा पुं० [सं० दल] १. ढेला । रोड़ा । २. आँख का सफेदउभरा हुआ भाग जिसमें पुतली होती हा । आँख का कोया । ३. एक जंगली वृक्ष । दे० 'डेररा' । उ० — डेले, पीलू, आक और जंड़ के कुड़मुड़ाए वृक्ष ।— ज्ञानदान, पृ० १०३ ।

डेला
संज्ञा पुं० [हिं० ठेलना] यह काठ जो नटखट चौपायों के गले में बांध दिया जाता है । ठेंगुर ।

डेलिगेट
संज्ञा पुं० [अं०] वह प्रतिनिधि जो किसी सभा में किसी स्थान के निवासियों की ओर से मत देने के लिये भेजा जाय ।

डेलिया
संज्ञा पुं० [देश०] एक पोधा जो फूलों के लिये लगाया जाता है । इसका फूल लाल या पीला होता है ।

डेली (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० डला] डलिया । बांस की झांपी । दे० ' डेल (५)' । उ०— बंधिगा सुआ करत सुख केली । चूरि पाँख मेलेसि धरि डेली ।— जायसी (शब्द०) ।

डेली (२)
वि० [अं०] दैनिक (अखबार आदि) ।

डेवढ़ † (१)
वि० [हिं० डेवढ़ा] डेढ़ गुना । डेवढ़ा । उ०— सुर सेनप उर बहुत उछाहू । विधि ते डेवढ़ सुलोचन लाहू ।— तुलसी (शब्द०) ।

डेवढ़ † (२)
संज्ञा स्त्री० तार । सिलसिला । क्रम । क्रि० प्र०—लगना ।

डेवढ़ना (१)
क्रि० अ० [हिं० डेवढ़ा] आँच पर रखी हुई रोटी का फूलना ।

डेवढ़ना (२)
क्रि० अ० १. कपडे़ को मोड़ना । कपड़ों की तह लगाना । किसी, वस्तु में उसका आधा और मिलाना । डेवढ़ा करना । ३. आँच पर रखी हुई रोटी को फुलाना ।

डेवढ़ा
वि० [हिं० डेढ़] आधा ओर अधिक । किसी पदार्थ से उसका आधा और ज्यादा । डेढ़गुना ।

डेवढ़ा
संज्ञा पुं० १ ऐसा तंग रास्ता जिसके एक किनारे ढाल या गढ़ा हो (पालकी के कहार) । २. गाने में वह स्वर जो साधारण से कुछ अधिक ऊँचा हो । ३. एक प्रकार का पहाड़ा जिसमें क्रम से अंकों की डेढ़गुनी संख्या बतलाई जाती है ।

डेवढ़ो
संज्ञा स्त्री० [सं० देहली] दे० 'डयोढ़ी' । उ०— पल पांवडे़ डारि रहौंगी डटी डेवढ़ी डर छोड़ि अधीरतियाँ ।—श्यामा०, पृ० १६९ ।

डेवलप करना
क्रि० अ० [अ० ड़ेवलप + हिं० करना] फोटोग्राफी में प्लेट को मसालो मिले हुए जल से धोना जिसमें अंकित चित्र का आकार स्पष्ट हो जाय ।

डेसिमल
संज्ञा पुं० [अं०] दशमलव । उ०— अपना आप हिसाब लगाया । पाया महा दीन से दीन । डेसिमल पर दस शून्य जमाकर, लिखे जहाँ तीन पर तीन ।— हिम त०, पृ० ७० ।

डेस्क
संज्ञा पुं० [अं०] लिखने के छोटी ढालुआँ मेज ।

डेहरी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० देहली] दरवाजे के नीचे की उठी हुई जमीन जिसपर चोखट के नीचे की लकड़ी रहती है । दहलीज । लतमर्दा ।

डेहरी † (१)
संज्ञा स्त्री० [हि० दह] अन्न रखने के लिये कच्ची मिट्टी का ऊँचा बरतन ।

डेहल
संज्ञा पुं० [सं० देहली] देहली । दहलीज ।

डैंगू फीवर
संज्ञा पुं० [अं० डेंगे फीवर] दे० ' डंगू ज्वर' । उ०— वै० १९२९ का डैंगू फीवर ।— प्रेमघन०, भा० २, पृ० ३४३ ।

डैगना
संज्ञा पुं० [हिं० डैग] काठ का लंबा टुकड़ा जो नटखट चौपायों के गले में इसलिये बाँध दिया जाता है जिसमें वे अधिक भाग न सकें । ठेंगुर । लंगर ।

डैन पु
संज्ञा पुं० [सं० डयन (= उड़ना)] दे० 'डैना' । उ०— गरजै गगन पंखि जब बोला । डोल समुद्र डौन जब डोला ।— जायसी ग्रं०, पृ० ६३ ।

डैना
संज्ञा पुं० [सं० डयन (=उड़ना)] चिड़ियों का वह फैलने और सिमटनेवाला अंग जिससे वे हवा में उड़ती हैं । पंख । पक्ष । पर । बाजू ।

डैमफूल
संज्ञा पुं० [अं०] एक अँगरेजी गाली । अभागा मूर्ख । नारकी । सत्यानाशी । उ०— और इसपर बदमाशों की डैमफूल । तहजीब के साथ बात करना जानते ही नहीं ।— झाँसी०, पृ० २५१ ।

डैरूँ †
संज्ञा पुं० [सं० डमरू] दे० ' डमरू' । उ०— सरप मरै बाँबी उठि नाचै कर विनु डैरूँ बाजै ।— गोरख०, २०८ ।

डैश
संज्ञा पुं० [अं०] एक प्रकार का अंग्रेजी विरामचिह्न जिसका प्रयोग कई उद्देश्यों से किया जाता है । विशेष— यदि किसी वाक्य के बीच डैश देकर कोई वाक्य लिखा जाता है तो उस वाक्य का व्याकरणसंबंध मुख्य वाक्य से नहीं होता । जैसे,— जो शब्द बोलचाल में आते हैं— चाह वे फारसी के हों, चाहे अरबी के, चाहे अँगरेजी के— उनका प्रयोग बुरा नहीं कहा जा सकता । डैश का चिह्न इस प्रकार का— होता है ।—

डोँगर
संज्ञा पुं० [सं० तुङ्ग (= पहाड़ी) या देशी ड़ुंगर] [स्त्री० अल्पा० डोंगरी] पहाड़ी । टीला । भीटा । उ०— (क) एक फूक विष ज्वाल के जल डोंगर जरि जाहि ।— सूर (शब्द०) । (ख) डोंगर को बल उनहिं बताऊँ । ता पाछे ब्रज खोजि बहाऊँ ।— सूर (शब्द०) । (ग) चित्त विचित्र विविध मृग डोलत डोंगर डाँग । जनु पुर बीथिनि बिहरत छैल सँवारे स्वाँग ।— तुलसी (शब्द०) ।

डोँगा
संज्ञा पुं० [सं० द्रोण] [स्त्री० अल्पा० डोंगी] १. बिना पाल की नाव । २. बडी नाव । मुहा०— डोंगा पार होना या लगाना = काम निबटना । छुटकारा होना ।

डोँगी
संज्ञा स्त्री० [हि० डोंगा] १. बिन पाल की छोटी नाव । २. छोटी नाव । ३. वह बरतन जिसमें लोहार लोहा लाल करके बुझाते हैं ।

डोँड़हा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० ' डोड़हा' ।

डोँड़ा
संज्ञा पुं० [सं० तुण्ड] १. बड़ी इलायची । २. टोंटा । कारतूस ।— उ०— चंद्रवाण सत्रएँ बिराजे । शत्रु हने सोइ बचेजू भागे । भरि बंदूक अठारह छोड़े । इतने उदिय होय तब डोंडें ।— हनुमान (शब्द०) ।

डोँडी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० तुण्ड] १. पोस्ते का फल जिसमें से अफीम निकलती है । कपास की कली । उ०— सोजा, मणिपुर राजकुमार । ज्यों कपास की डोंडी में सोता हैं पैर पसार । एक कीट नन्हा सा श्वेत, मृदुल सुकुमार ।— बंदन०, पृ० ९५ । २. उभरा मुँह । टोंटी ।

डोँडी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० द्रोणी] डोंगी । छोटी नाव ।

डोँडो (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० ' डौंड़ी' ।

डोँब
संज्ञा पुं० [देशी] दे० 'डोम' ।

डोई
संज्ञा स्त्री० [देशी डोआ; हिं० डोकी] काठ की ड़ाँडी की बड़ी करछी जिससे कड़ाह में दुध, घी चाशनी आदि चलाते हैं । विशेष— यह वास्तव में लोहे या पीतल का एक कटोरा होता है जिसमें काठ की लंबी डाँड़ी खडे़ बल लगी रहती है ।

डोक
संज्ञा पुं० [देश०] छुहारा जो पककर पीला हो जाय । पकी हुई खजूर ।

डोकनी †
संज्ञा स्त्री० [देश०] कठौती । उ०— बाँस का ठोंगा, काठ की डोकनी तथा बेंत की डलिया ।— नेपाल०, पृ० ३१ ।

डोकर
संज्ञा पुं० [हिं०] [स्त्री० डोकरी] दे० 'डोकरा' ।

डोकरड़ो †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'डोकरा' ।

डोकरा
संज्ञा पुं० [सं० दुष्कर, प्रा० डुक्कार?] [स्त्री० डोकरी] १. बूढ़ा आदमी । अशक्त और वृद्ध मनुष्य । † २. पिता ।

डोकरिया †
संज्ञा स्त्री० [हिं० डोकरी + इया (प्रत्य०)] दे० 'डोकरी' ।

डोकरी
संज्ञा स्त्री० [हिं०डोकरा] बुड़्ढी स्त्री । उ०— तहाँ मागं में एक डोकरी कौ घर मिल्यो ।— दो सौ बावन०, भा० १, पृ० ३२० ।

डोकरो †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'डोकरा' ।

डोका (१)
संज्ञा पुं० [सं० द्रोणक] काठ का छोटा बरतन या कटोरा जिसमें तेल, बटना आदि रखते हैं ।

डोका † (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] ड़ंठल । उ०— उकरड़ी डोका चुगइ, अपस डँभायउ आँण ।—ढोला०, दू० ३३६ ।

डोकिया
संज्ञा स्त्री० [हिं० डोका] काठ या छोटा कटोरा या बरतन जिसमें तेल, उबटन आदि रखते हैं ।

डोकी
संज्ञा स्त्री० [हिं० डोका] काठ का छोटा बरतन या कटोरा जिसमें तेल, बटना आदि रखते हैं ।

डोगर
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'डोंगर' ।

डोगरा
संज्ञा पुं० [हिं० डोंगर] जम्मू, कश्मीर, काँगड़ा आदि में बसी एक प्रसिद्ध जाति या उस जाति व्यक्ति ।

डोगरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] १. डोगरा जाति के लोगों की बोली जो पंजाबी की एक शाखा है । २. छोटे छोटे घर । उ०— काम करने के लिये मीलों दूर साधारण से छोटे छोटे घर बना लिए हैं,— जिन्हें डोगरी कहते हैं ।—किन्नर०, पृ० ६६ ।

डोज
संज्ञा स्त्री० [अं० डोज] मात्रा । खुराक । मोताद ।

डोड़हथी
संज्ञा स्त्री० [हिं० डाँडा + हाथ] तलवार (डिं०) ।

डोड़हा
संज्ञा पुं० [सं० डुणडुभ] पानी में रहनेवाला साँप ।

डोड़ी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक लता जो औषध के काम में आती है । विशेष—वैद्यक के अनुसार यह मधुर, शीतल, नेत्रों को हितकारी, त्रिदोषनाशक और वीर्यवर्धक मानी जाती है । इसे जीवंती भी कहते है ।

डोडो
संज्ञा पुं० [अं०] एक चिड़िया जो अब नहीं मिलती । विशेष—यह चिड़िया मारिशस (मिरिच के) टापू में जुलाई १६८१ तक देखी गई थी । इसके चित्र यूरोप के भिन्न भिन्न स्थानों में रखे मिलते हैं । सन् १८६६ में इसकी बहुत सी हड्डियाँ पाई गई थीं । डोडो भारी और बेढंगे शरीर की चिड़िया थी । डीलडौल में बत्तख के बराबर होथी थी, न अधिक उड़ सकती थी, न और किसी प्रकार अपना बचाव कर सकती थी । मारिशस में यूरोपियनों के बसने पर इस दीन पक्षी का समूल नाश हो गया ।

डोढ़ी †
संज्ञा स्त्री० [सं० देहली] दे० 'डयोढ़ी' । उ०—(क) इनके मिलने में डोढ़ी पहरा नहीं लगता ।—श्रीनिवास ग्रं० (नि०), पृ० ५ । (ख) देसोतारी डोढ़ियाँ गोला करे गलार ।—बाँकी ग्रं०, भा० २, पृ० ८७ ।

डोब
संज्ञा पुं० [हिं० डूबना] डुबाने का भाव । गोता । डुबकी । मुहा०—डोब देना = गोता देना । डुबाना । जैसे, कपड़े को रंग में दो तीन डोब देना । कलम को स्याही में डोब देना ।

डोबना
क्रि० स० [हिं० डुबाना] डुबकी देना । डुबाना । गोता देना । उ०—आगल डोबै पाछल तारे ।—प्राण०, पृ० ४६ ।

डोबा
संज्ञा पुं० [हिं० डुबाना] गोता । डुबकी । मुहा०—डोब देना या भरना = डुबाना । गोता देना । जैसे, कपड़े को रंग में डोबा देना, कलम को स्याही में डोबा देना ।

डोभरी †
संज्ञा स्त्री० [देश०] ताजा महुआ ।

डोभ
संज्ञा पुं० [सं० डम, देशी डुंब, डोंब] [स्त्री० डोमिनी, डोमनी] १. अस्पृश्य मीच जाति जो पंजाब से लेकर बंगाल तक सारे उत्तरी भारत में पाई जाती है । उ०—यह देखो डोम लोगों ने सुखे गले सड़ें फूलों की माला गंगा में से पकड़ पकड़कर देवी को पहिना दी है और कफन की ध्वजा लगा दी है ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० २९७ । विशेष—स्मृतीयों में इस जाति का उल्लेख नहीं मिलता । केवल मत्स्यसूक्त तंत्र में डोमों को अस्पृश्य लिखा है । कुछ लोगों का मत है कि ये डोम बोद्ध हो गए थे और इस धर्म का संस्कार इनमें अब तक बाकी है । इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी समय यह जाति प्रबल हो गई थी, और कई स्थान डोमों के अधिकार में आ गए थे । गोरखपुर के पास डोमन- गढ़ का किला डोम राजाओं का बनवाया हुआ था । पर अब यह जाति प्रायः निकृष्ट कर्मों ही के द्वारा अपना निर्वाह करती है । श्मशान पर शव जलाने के लिये आग देना, शव के ऊपर का कफन लेना, सूप, डले आदि बेचना आजकल डोमों का काम है । पंजाब के डोम कुछ इनसे भिन्न होतो हैं और जंगलों से फल और जड़ी बुटी लाकर बेचते हैं । २. एक नीच जाति जो मंगल के अवसरों पर लोगों के यहाँ गाती बजाती है । ढाढी । मीरासी ।

डोमकौआ
संज्ञा पुं० [हिं० डोम + कौआ] बड़ी जाति का कौआ जिसका सारा शरीर काला होता है । डोम काक या डोम काग नाम भी इसके हैं ।

डोमड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० डोम + ड़ा (प्रत्य०)] दे० 'डोम' । उ०— श्मशान के डोमड़ों तक की नौकाएँ ।—प्रेमधन०, भा० २, पृ० ११३ ।

डोमतमौटा
संज्ञा पुं० [देश०] एक पहाड़ी जाति जो पीतल ताँबे आदि का काम करती है ।

डोमनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० डोम] १. डोम जाति की स्त्री । २. डोम की स्त्री । ३. उस नीच जाति की स्त्री जो उत्सवों पर गाने बजाने का काम करती है । ये स्त्रियाँ गाने बजाने के अतिरिक्त कहीं कहीं वेश्यावृत्ति भी करती हैं ।

डोमसाल
संज्ञा पुं० [हिं० डोम + साल] मँझोले आकार का एक प्रकार का वृक्ष जिसे पीदड़ रूख भी कहते हैं । वि० दे० 'गीदड़ रूख' ।

डोमा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का साँप ।

डोमाकाग पु
संज्ञा पुं० [सं० द्रोण + काक] दे० 'डोमकौआ' । उ०—भँवर पतंग जरैं औ तागा । कोइल, भुजइल, डोमा- कागा ।—जायसी ग्रं०, पृ० १६३ ।

डोमिन
संज्ञा स्त्री० [हिं० डोम] १. डोम जाति की स्त्री । २. मीरासियों की स्त्री । दे० 'डोमनी' (३) । उ०—नटिनी डोमिन ढाड़िनी सहनायन परकरा । निरतत नाद विनोद सों विहँसत खेलत नार ।—जायसी (शब्द०) ।

डोमीनियन
संज्ञा स्त्री० [अं०] १. स्वतंत्र शासन या सरकार । २. स्वतंत्र शासनवाला देश या साम्राज्य । जैसे, ब्रिटिश डोमीनियन । ३. उपनिवेश । अधिराज्य । उ०—पर भारत को सन् १९३५ के अधिनियम द्वारा डोमीनियन का दर्जी नहीं मिला था ।—भारतीय०, पृ० २९ । यौ०—डोमीनियन स्टैट = अधिराज्य का दरजा । औपनिवेशिक राज्य का पद ।

डोर
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. डोरा । तागा । रस्सी । सूत । उ०—डीठि डोर नैना दही, छिरकि रूप रस तोय । मथि मो घट प्रीतम लियो मन नवनीत बिलोय ।—रसनिधि (शब्द०) । २. पतंग या गुड्डी उड़ाने का माँझेदार तागा । ३. सिलसिला । कतार । ४. अवलंब । सहारा । लगाव । मुहा०—डोर पर लगाना = रास्ते पर खाना । प्रयोजनसिद्धि के अनुकूल करना । ढ़ब पर लाना । प्रवृत्त करना । परचाना । डोर भरना = कपड़े को किनारे को कुछ मोड़कर उसके भीतर तागा भरकर सीना । फलीता लगाना । डोर मजबूत होना= जीवन का सूत्र दृढ़ होना । जिंदगी बाकी रहना । डोर होना = मुग्ध होना । मोहत होना । लट्टु होना । वि० दे० 'डोरी' ।

डोरक
संज्ञा पुं० [सं०] डोरा । तागा । सूत्र । धागा ।

डोरडा †
संज्ञा पुं० [देश०] धागे का कंकन, जो ब्याह में बँधता है और जिसे खोलकर वर वधू को जुआ खेलाने की रीति चलती है । उ०—खेले जुवा डोरडा खोले, सह सुभ कारज सारिया ।—रघु० रू०, पृ० ८७ ।

डोरना †
संज्ञा पुं० [हिं० डोर] दे० 'डोर' । उ०—हरीचंद यह प्रेम डोरना को कैसे करि छूटै ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ४६२ ।

डोरही
संज्ञा स्त्री० [देश०] बड़ी कटाई । बड़ी भटकटैया ।

डोरा (१)
संज्ञा पुं० [सं० डोरक] १. रूई, सन, रेशम आदि को बटकर बनाया हुआ ऐसा खंड जो चौड़ा या मोटा न हो, पर लंबाई में लकीर के समान दूर तक चला गया हो । सूत्र । सूत । तागा । धागा । जैसे, कपड़ा सीने का डोरा, माला गूँधने का डोरा । २. धारी । लकीर । जैसे,—कपड़ा हरा है, बीच बीच में लाला डोरे हैं । क्रि० प्र०—पड़ना ।—होना । ३. आँखों की बहुत महीन लाल नसें जो साधारण मनुष्यों की आँख में उस समय दिखाई पड़ती है जब वे नशे की उमंग में होते हैं या सोकर उठते हैं । जैसे,—आँखों में लाल डोरे कानों में बालियाँ । ४. तलवार की धार । उ०—डोरत में बाछे चीनी आछे आगे पाछे अति भारी ।—पद्माकर ग्रं० पृ० २८७ । ५. तपे घी की धार, जो दाल आदि में ऊपर से डालते समय बँध जाती है । मुहा०—डोर देना = तपा हुआ घी ऊपर से डालना । ६. एक प्रकार की करछी जिसकी डाँड़ी खड़े बल लगी रहती हैं और जिससे घी निकालते हैं या दूध आदि कढ़ाह में चलाते हैं । परी । ७. स्नेहसूत्र । प्रेम का बंधन । लगन । मुहा०—डोरा डालना = प्रेमसूत्र में बद्ध करना । प्रेम में फँसाना । अपनी ओर प्रवृत्त करना । परचाना । उ०—यह डोरे कहीं और डालिए, समझे आप ।—फिसाना०, भा० ३, पृ० १२५ । डोरा लगना = स्नेह का बंधन होना । प्रीति सबंध होना । ८. वह वस्तु जिसका अनुसरण करने से किसी वस्तु का पता लगे । अनुसंधान सूत्र । सुराग । उ०—जुबति जोन्ह में मिलि गई नेक न देत लखाय । सौंधे के डोरे लगी, अली चली सँग जाय ।—बिहारी (शब्द०) । †९. काजल या सुरमे की रेखा । १०. नृत्य में कंठ की गति । नाचने में गरदन हिलाने का भाव ।

डोरा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० ढ़ोड़] पोस्ते का डोड़ । डोडा ।

डोरि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० डोर] दे० 'डोरी' । उ०—ज्यौं कपि डोरि बाँधि बाजीगर कन कन कौं चौहटैं नचायौ ।—सूर०, १ । ३२६ ।

डोरिया (१)
संज्ञा पुं० [हिं० डोरा] १. एक प्रकार का सूती कपड़ा जिसमें कुछ मोटे सूत की लंबी धारियाँ बनी हों । २. एक प्रकार का बगला जिसके पैर हरे होते हैं । यह ऋतु के अनुसार रंग बदलता है । ३. जुलाहों के यहाँ तागा उठानेवाला लड़का । ४. एक नीच जाति जो राजाओं के यहाँशिकारी कुत्तों की रक्षा पर नियुक्त रहती थी । ये लोग कुत्तों को शिकार पर सधाते थे ।

डोरिया †पु (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'डोरी' । उ०—सुरत सुहागिनि जल भरि लावै बिन रसरी बिन डोरिया ।—धरम०, पृ० ३५ ।

डोरियाना †
क्रि० स० [हिं० डोरी + आना (प्रत्य०)] पशुओं को रस्सी से बाँधकर ले चलना । बागडोर लगाकर घोड़ों को ले जाना । उ०—गवने भरत पयादेहि पाये । कोतल संग जाँहि डोरियाये ।—तुलसी (शब्द०) । २. परचाना । हिलगाना ।

डोरिहार पु
संज्ञा पुं० [हिं० डोरी + हारा] [स्त्री० डोरिहारिन] पटवा ।

डोरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० डोरा] १. कई डोरों या तागों का बटकर बनाया हुआ खंड जो लंबाई में दूर तक लकीर के रूप में चला गया हो । रस्सी । रज्जु । जैसे, पानी भरने की डोरी, पंखा खींचने की डोरी । मुहा०—डोरी खींचना = सुध करके दूर से अपने पास बुलाना । पास बुलाने के लिये स्मरण करना । जैसे,—जब भगवती डोरी खींचेगी तब जायँगी (स्त्री०) । डोरी लगना = (१) किसी के पास पहुँचने या उसे उपस्थित करने के लिये लगातार ध्यान बना रहना । जैसे,—अब तो घर की डोरी लगी हुई है । उ०—आरति अरज लेहु सुनि मोरी । चरनन लागि रहे दृढ़ डोरी ।—जग० श०, पृ० ५८ । २. वह तागा जिसे कपड़े के किनारे को कुछ मोड़कर उसके भीतर डालकर सीते हैं । क्रि० प्र०—भरना । ३. वह रस्सी जिसे राजा महाराजाओं या बादशाहों की सवारी के आगे आगे हद बाँधने के लिये सिपाही लेकर चलते हैं । विशेष—यह रास्ता साफ रखने के लिये होता है जिसमें डोरी की हद के भीतर कोई जा न सके । क्रि० प्र०—आना ।—चलना । ४. बाँधने की डोरी । पाश । बंधन । उ०—मैं मेरी करि जनम गँवावत जब लगि परत न जम की डोरी ।—सूर (शब्द०) । मुहा०—डोरी टूटना = संबंध टूटना । उ०—का तकसीर भई प्रभु मोरी । काहे टूटि जाति है डोरी ।—जग० श०, पृ० ६४ । डोरी ढीली छोड़ना = देखरेख कम करना । चौकसी कम करना । जैसे,—जहाँ डोरी ढीली छोड़ी कि बच्चा बिगड़ा । ५. डाँड़ीदार कटोरा जिससे कड़ाह में दूध, चाशनी आदि चलाते हैं ।

डोरे पु
क्रि० वि० [हिं० डोर] साथ पकड़े हुए । साथ साथ । संग संग । उ०—(क) अमृत निचोरे कल बोलत निहोरे नैक, सखिन के डोरे 'देव' डोलौ जित तित कों ।—देव (शब्द०) । (ख) बानर फिरत डोरे डोरे अंध तापसनि, शिव को समाज कैधों ऋषि को सदन है ।—केशव (शब्द०) ।

डोल (१)
संज्ञा पुं० [सं० दोल (= झूलना, लटकाना)] १. लोहे का एक गोल बरतन जिसे कुएँ में लटकाकर पानी खींचते हैं । २. हिंडोला । झूला । पालना । उ०—(क) सघन कुंज में डोल बनायो झूलत है पिय प्यारी ।—सूर (शब्द०) । (ख) प्रभुहिं चितै पुनि चितै महि, राजत लोचन लोल । खेलत मनसिंज मीन जुग, जनु विधि मंडल डोल ।—तुलसी (शब्द०) । यौ०—डोल उत्सव = दे० 'दोलोत्सव' । उ०—सो इतने ही उनको सुधि आई जो आजु तो डोल कौ दिन है ।— दो सौ बावन० भा० १, पृ० २२९ । ३. डोली । पालकी । शिविका । उ०—महा डोल दुलहिन के चारी । देहु बताय हीहु उपकारी ।—रघुराज (शब्द०) । †४. धार्मिक उत्सवों में निकलनेवाली चौकियाँ या विमान । ६. जहाज का मत्सूल (शब्द०) । क्रि० प्र०—खड़ा करना । ७. कंप । खलभली । हलचल । उ०—बादसाह कहँ ऐस न बोलू । चढ़ै तै परै जगत महँ डोलू ।—जायसी (शब्द०) । क्रि० प्र०—पड़ना ।

डोल (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की काली मिट्टी जो बहुत उपजाऊ होती है ।

डोल † (३)
वि० [हिं० डोलना] डोलनेवाला । चंचल । उ०—तुम बिनु काँपे धनि हिया, तन तिनउर भा डोल । तेहि पर बिरह जराइकै चहै उड़ावा झोल ।—जायसी (शब्द०) ।

डोलक
संज्ञा पुं० [सं०] प्राचीन काल का ताल देने का एक प्रकार का बाजा ।

डोलची
संज्ञा स्त्री० [हिं० डोल + ची (प्रत्य०)] १. छोटा डील । २. फूल या फल आदि रखकर हाथ में लटकाकर ले चलने योग्य बाँस, बेंत आदि का पात्र ।

डोलडाल
संज्ञा पुं० [देश०] १. चलना फिरना । २. दिसा के लिये जाना । पाखने जाना । क्रि० प्र०—करना ।

डोलढाक
संज्ञा पुं० [हिं० ढाक?] पँगरा नाम का वृक्ष जिसकी लकड़ी के तख्ते बनते हैं । वि० दे० 'पँगरा' ।

डोलदहल
संज्ञा पुं० [हिं०] हलचल । उ०—डोलदहल क्षणभंगुर है, मत व्यर्थ डरो । सौ बार उजड़ने पर भी है दुनिया बसती ।—सूत०, पृ० ४८ ।

डोलना (१)
क्रि० अ० [सं० दोलना (=लटकाना, हिलना)] १. हिलना । चलायमान होना । गति में होना । २. चलना । फिरना । टहलना । जैसे,—चौपाए चारों ओर डोल रहे हैं । उ०—(क) भक्तबिरह कातर करुनाभय, डोलत पाछैं लागे ।— सूर०, १ । ८ । (ख) जाहि बन केओ न डोल रे । ताहि बन पिया हसि बोल रे ।—विद्यापति०, पृ० ३१९ । यौ०—डोलना फिरना = चलना घूमना । ३. चला जाना । हटना । दूर होना । जैसे,—वह ऐसा अकड़कर माँगता है कि डुलाने से नहीं डोलता । ४. (चित्त) विचलित होना । (चित्त का) दृढ़ न रह जाना । (चित्त का) किसीबात पर) जमा न रहना । डिगना । उ०—(क) मर्म बचन जब सीता बोला । हरि प्रेरित लछिमन मन डोला ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) बटु करि कोटि कुतर्क जथारुचि बोलई । अचल सुता मनु अचल बयारि कि डोलई ?—तुलसी (शब्द०) ।

डोलना (२)
संज्ञा पुं० [सं० दोलन] दे० 'डोला' ।

डोलनि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० डोलना] डोलने की स्थिति या कार्य । उ०—वैसिऐ हँसनि, चहनि पुनि बोलनि । वैसिऐ लटकनि, मटकनि, डोलनि ।—नंद०, ग्रं०, २६५ ।

डोलरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० डोल + री (प्रत्य०)] पलंग । खाट । झोली ।

डोला
संज्ञा पुं० [सं० डोल] [स्त्री० अल्पा० डोली] १. स्त्रियों के बैठने की वह बंद सवारी जिसे कहार कंधों पर लेकर चलते हैं । पालकी । मियाना । शिविका । मुहा०—(किसी का) डोला भेजना = दे० 'डोला देना' उ०— डोला भेजि दीलै जौन माँगत दिल्ली को पति, मोल्हन कहत सीख मेरी सीस धरु रे ।—हम्मीर०, पृ० २० । डोला माँगना = ब्याह के लिये कन्या माँगना । उ०—मुसलमानों द्वारा डोला की माँग को अस्वीकार करने पर उनपर आक्रमण किया गया तथा उनका किला जीत लिया गया ।—सं० दरिया (भू०), पृ० १० । (किसी का) डोला (किसी के) सिर पर या चौड़े पर उछलना = किसी दूसरी स्त्री का संबंध या प्रेम किसी स्त्री के पति के सात होना । डोला देना = (१) किसी राजा या सरदार को भेंट की तरह पर अपनी बेटी देना । (२) शुद्रों और नीची जातियों में प्रचलित एक प्रथा । अपनी बेटी को वर के घर पर ले जाकर ब्याहना । डोला निकालना = दुलहिन को बिदा करना । डोला लेना = भेंट में कन्या लेना । २. वह झोंका जो झूले में दिया लाता है । पेंग ।

डोलना
क्रि० स० [हिं० डोलना] १. हिलाना । चलाना । गति में रखना । जैसे, पंखा डोलना । संयो० क्रि०—देना । २. हटाना । दूर करना । भगाना ।

डोलायंत्र
संज्ञा पुं० [सं० दोलायंत्र] दे० 'दोलायंत्र' ।

डोलिया पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० डोली] डोली । पालकी । उ०— छोट मोट डोलिया चंदन कै छोटे चार कहार हो ।— धरम०, पृ० ६२ ।

डोलियाना
क्रि० स० [हिं० डोलना] १. किसी वस्तु को चुपके से हटा देना । किसी चीज को गायब कर देना । २. दे० 'डोली करना' ।

डोली
संज्ञा स्त्री० [हिं० डोला] स्त्रियों के बैठने की एक सवारी जिसे कहार कंधों पर उठाकर ले चलते हैं । पालकी । शिविका । उ०—गाँव चाँपासर की डोली के बाबत जो हाल महकमे बंदोबस्त से मिला उसकी नकल आपकी सेवा में भेजता हूँ ।—सुंदर ग्रं० (जी०), भा० १, पृ० ७५ ।

डोली करना
क्रि० स० [हिं० डोलना] घता बताना । हटाना । टालना ।—(दलाल) ।

डोली डंडा
संज्ञा पुं० [हिं०] बालकों का एक खेल ।

डोलू
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. रेवँद चीनी । विशेष—इसका पेड़ हिमालय के काँगड़ा, नेपाल, सिक्किम आदि प्रदेशों के जंगल में होता है । वहाँ से इसकी जड़, जो पीली पीली होती है, नीचे की ओर भेजी जाती है और बाजारों में बिकती है । पर, गुण में यह चीन की रेवँद (रेवँद चीनी), खुतन की रेवँद (रेवँद खताई) या विलायती रेवँद के समान नहीं होता । इसे पदमचल और चुकरी भी कहते हैं । २. एक प्रकार का बाँस । विशेष—यह बाँस पूर्वी बंगाल, आसाम और भूटान से लेकर बरमा तक होता है । इसकी दो जातियाँ होती हैं—एक छोटी, दूसरी बड़ी । यह चोंगे और छाते बनाने के काम में अधिकतर आती है । टोकरे और पान रखने के डले भी इससे बनते हैं ।

डोलोत्सव
संज्ञा पुं० [सं० दोलोत्सव] दे० 'दोलोत्सव' । उ०— तब श्री गुसाई जी वा वैष्णव सौं कहैं, जो अब कौ तुम डोलोत्सव कौन ठौर कौन प्रकार करयो?—दो सौ बावन०, भा० १, पृ० २३१ ।

डोसा †
संज्ञा पुं० [देश०] उड़द या चावल को पीसकर खमीर उठने पर बनाया जानेवाआ चिलड़ा या उलटा ।

डोहरा †
संज्ञा पुं० [देश०] काठ का एक प्रकार का बरतन जिससे कोल्हू से गिरा हुआ रस निकाला जाता है ।

डोहली
संज्ञा स्त्री० [हिं० डोली, मध्यगम डोहली (जैसे, अंबहर = अंबर)] दे० 'डोली' । उ०—मीराँ गयौ डोहली माँहै । साकुर पगाँ तणौ बल साहै ।—रा०, रू०, पृ० ३३५ ।

डाहि पु, डोही
संज्ञा स्त्री० [हिं० डोई] दे० 'डोई' । उ०—छननी चलनी डोहि और करछी बहु करछी ।—सूदन (शब्द०) ।

डोहीजना पु †
क्रि० स० [देश० तुल० हिं० टोहना] अन्वेषण करना । ढूँढ़ना । खोजना । उ०—मन सींचाणउ जइ हुवइ पाँखाँ हुबई त प्राण । जाइ मिलीजइ साजणाँ डोहीजइ महिराँण ।—ढोला०, पृ० २११ ।

डोँड़ा पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] डोंगा । नाव । उ०—धसके पहार भार प्रगटयौ पहार जल डोंगरनि डौंडा चले समद सुखाने हैं । रसरतन, पृ० १० ।

डौँड़ाना †
क्रि० अ० [हिं० डाँवाडोल] डाँवाँडोल रहना । विचलित होना । घबराना ।

डौँड़ी
संज्ञा स्त्री० [सं० डिण्डिम] १. एक प्रकार का ढोल जिसे बजाकर किसी बात की घोषणा की जाती है । ढिंढोरा । डुगडुगिया । उ०—चित डौंडी बुधि फेरी लावै । मन दुनौ के भीड़ उठावै ।—हिंदी प्रेम०, पृ० २७४ । क्रि० प्र०—पीटना ।—बजना ।—बजाना । मुहा०—डौंड़ी देना = (१) ढोल बजाकर सर्वसाधारण को सूचित करना । मुनादी करना । (२) सब किसी से कहते फिरना । डौड़ी बजना = (१) घोषणा होना । (२) दुहाई फिरना । जय जयकार होना । चलती होना । उ०—लौड़ी के घर डौंड़ी बाजी ओछो निपट आजानौ ।—सूर (शब्द०) ।२. वह सूचना जो सर्वसाधारण को ढोल बजाकर दी जाय । घोषणा । मुनादी । क्रि० प्र०—फिरना ।—फेरना । उ०—तब ब्रज के गामन डौंड़ी फेरी ।—दो सौं बावन०, भा० १, पृ० ३०० ।

डौँरा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की घास जो खोतों में पैदा हो जाती है । इसमें साँवाँ की तरह दाने पड़ते हैं जो खाने में कड़ुए होते हैं ।

डौँरु पु, डौरू
संज्ञा पुं० [सं० डमरु] दे० 'डमरू' । उ०—नील पाठ परोइ मणिगण फणिग धोखे जाइ । खुनखुनाकरि हँसत मोहन नचत डौरु जबाइ ।—सूर (शब्द०) ।

डौआ
संज्ञा पुं० [देश०] काठ का चमचा । काठ की डाँड़ी की बड़ी करछी । उ०—लकड़ी डौआ करुछुली सरस काजु अनुहारि । सुप्रभु संग्रहंहि परिहरहिं सेवक सखा विचारि ।— तुलसी (शब्द०) ।

डौका, डौकी †
संज्ञा स्त्री० [देश०] पंडुक पक्षी । पंडुकी । उ०— अभिसारिकाओं की नौका ऐसी प्रगल्भ मानो डौका ।—श्यामा० पृ० ३१ ।

डौर (१)
संज्ञा पुं० [हिं० डौल] डौल । ढंग । प्रकार । उ०—(क) औरै डौर झौरन पैं बौरन के वै गए ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० १६१ । (ख) पदमाकर चाँदनी चंदहु वे कछु और ही डौरन वै गए हैं ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० २०९ ।

डौर पु (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'डोर' । उ०—गुडनी डौर सुरति के धोरे मेरा मुझझ मिलाहीं ।—राम० धर्म०, पृ० ३७५ ।

डौरु, डौरू पु
संज्ञा पुं० [सं० डमरु] दे० 'डमरू' । उ०—(क) कहू बज्जियं डौरू रुद्रं समारी ।—प० रासो पृ० १७७ । (ख) बजै इक्क डौरू डमकं तड़क्कै । धकै मेरु हके गेन हक्के ।— पृ० रा० १ । ३९० ।

डौल (१)
संज्ञा पुं० [हिं० डील?] किसी रचना का प्रारंभिक रूप । ढाँचा । आकार । ढंड्ढा । ठाट । ठट्टर । क्रि० प्र०—खड़ा करना । मुहा०—डौल डालना = ढाँचा खड़ा करना । रचना का प्रारंभ करना । बनाने में हाथ लगाना । लग्गा लगाना । डौल पर लाना = काट छाँटकर सुडौल बनाना । दुरुस्त करना । २. बनावट का ढंग । रचना । प्रकार । ढब । जैसे,—इसी डौल का एक गिलास मेरे लिये भी बना दो । मुहा०—डौल से लगाना = ठईक क्रम से रखना । इस प्रकार रखना जिससे देखने में अच्छा लगे । ३. तरह । प्रकार । भाँति । किस्म । तौर । तरीका । ४. अभिप्राय के साधन की युक्ति । उपाय । तदबीर । ब्योंत । आयोजन । समान । उ०—कबीर राम सुभिरिए क्यों फिरे और की डौल ।—कबीर मं०, पृ० ३६५ । यौ०—डौलडाल । मुहा०—डौल पर लाना = अभिप्रायसाधन के अनुकूल करना । ऐसा करना जिससे कोई मतलब निकल सके । इस प्रकार प्रवृत्त करना जिससे कुछ प्रयोजन सिद्ध हो सके । डौल बाँधना = दे० 'डौल लगाना' । डौल लगाना = उपाय करना । युक्ति बैठाना । जैसे,—कहीं से सौ रुपए (१००) का डौल लगाओ । ५. रंग ढंग । लक्षण । आयोजन । सामान । जैसे,—पानी बरसने का कुछ डौल नहीं दिखाई देता । ६. बंदोबस्त में जमा का तकदमा । तखमीना ।

डौल (२)
संज्ञा स्त्री० खेतों की मेड़ । डाँड़ ।

डौलडाल
संज्ञा पुं० [हिं० डौल] उपाय । प्रयत्न । युक्ति । ब्योंत ।

डौलदार
वि० [हिं० डौल + फा० दार (प्रत्य०)] सुडौल । सुंदर । खूबसूरत ।

डौलना †
क्रि० स० [हिं० डौल] ४. गढ़ना । किसी वस्तु को काट छाँट या पीट पाटकर किसी ढाँचे पर लाना । दुरुस्त करना ।

डौला †
संज्ञा पुं० [देश०] हाथ का गट्टा । उ०—(क) नब्बन की बाँह के डौले में गोली लगी थी ।—फूलो०, पृ० ६१ । (ख) करि हिकमत रहकला बनाई । डौंले तले ले धरी कलाई ।—प्राण०, पृ० २२ ।

डौलियाना †
क्रि० स० [हिं० डौल] १. ढंग पर लाना । कह सुनकर अपनी प्रयोजन सिद्धि के अनुकूल करना । काट छाँट— कर किसी ठीक आकार का बनाना । गढ़कर दुरुस्त करना ।

डौबर
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की चिड़िया जिसके पर, छाती ओर पीठ सफेद, दुम काली और चोंच लाल होती है ।

डौवा
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'डौआ' ।

ड्यंभक पु †
संज्ञा पुं० [सं० डिम्भक] दे० 'डिंभक' । उ०—भेष बिबर्जित भीख बिबर्जित बिबर्जित ड्यंभक रूपं । कहै कबीर तिहूँ लोग बिबर्जित, ऐसा तत्त अनूपं ।—कबीर ग्रं०, पृ० १६३ ।

ड्यूक
संज्ञा पुं० [अं०] [स्त्री० डचेज] १. इंगलैंड, फ्रांस, इटली आदि देशों के सामंतों और भूम्यधिकारियों की वंशपरंपरागत उपाधि । इंगलैड के सामंतौ और भूम्यधिकारियों को दी जानेवाली सर्वोच्च उपाधि जिसका दर्जा प्रिंस के नीचे है । जैसे, कनाट के ड्यूक, विंडसर के ड्यूक । विशेष—जैसे हमारे देश में सामंत राजाओं तथा बड़े बड़े जमींदारों को सरकार से महाराजाधिराज, महाराजा, राजाबहादुर, राजा आदि उपाधियाँ मिलती हैं, उसी प्रकार इंगलैड में सामंतों तथा बड़े बड़े जमींदारौ को ड्यूक, मार्क्विस, अर्ल, वाईकौंट, बैरन आदि की उपाधियाँ मिलती हैं । ये उपाधियाँ वंशपरंपरा के लिये होती है । उपाधि पानेवाले के मरने पर उसका ज्येष्ठ पुत्र या उत्तराधिकारी उपाधि का भी अधिकारी होता है । इस प्रकार अधिकारी क्रम से उस वंश में उपाधि बनी रहती है । अब यह भी नियम हो गया है कि जिसे सरकार चाहे केवल जीवन भर के लिये उपाधि प्रदान करे । मार्क्विस, अर्ल, बाइकौंट और बैरन उपाधिधारी लार्ड कहलाते हैं । माक्विंस,बैरन आदि उपाधियाँ जापान में भी प्रचलित हो गई हैं । २. सामंत । सरदार । राजा ।

ड्यूटी
संज्ञा स्त्री० [अं०] १. करने योग्य कार्य । कर्तव्य । धर्म । फर्ज । जैसे,—स्वयंसेवकों ने बड़ी तत्परता से अपनी ड्यूटी पूरी की । २. वह काम जो सुपुर्द किया गया हो । सेवा । खिदमत । पहरा । जैसे,—(क) स्नयंसेवक अपनी ड्यूटी पर थे । (ख) कल सबेरे वहाँ उसकी ड्यूटी थी । ३. नौकरी का काम । जैसे,—वह अपनी ड्यूटी पर चला गया । ४. कर । चुंगी । महसूल । जैसे,—सरकार ने नमक पर यूड्टी कम नहीं की ।

ड्योढ़ा (१)
वि० [हिं० डेढ़] [स्त्री० ड्योढ़ी] आधा और अधिक । किसी पदार्थ से उसका आधा और ज्यादा । डेढ़गुना । यौ०—ड्यौढ़ी गाँठ = एक पूरी और उसके ऊपर दूसरी आधी गाँठ । डेढ़पाँठ । मुद्धी ।

ड्यौढ़ा (२)
संज्ञा पुं० १. ऐसा तंग रास्ता जिसके एक किनारे पर ढाल या गड्ढा हो ।—(पालकी के कहार) । २. गाने में वह स्वर जो साधारण से कुछ ऊँचा हो । ३. एक प्रकार का पहाड़ा जिसमें क्रम में अंकों की डढ़गुनी संख्या बतलाई जाती है ।

ड्योढ़ी
संज्ञा स्त्री० [सं० देहली] १. द्वार के पास की भूमि । वह स्थान जहाँ से होकर किसी घर कै भीतर प्रवेश करते हैं । चोखट । दरवाजा । फाटक । २. वह स्थान जो पटे हुए फाटक के नीचे पड़ता है या वह बाहरी कोठरी जो किसी बड़े मकान में घुसने के पहले ही पड़ती है । उ०—महरी ने दरोगा साहब की ड्योढ़ी पर जगाया ।—फिसाना०, भा० ३, पृ० २४ । ३. दरवाजे में घुसते ही पड़नेवाला बाहरी कमरा । पौरी । पँवरी । यौ०—ड्यौढ़ीदार । ड्यौढ़ीवान । मुहा०—(किसी की) ड्यौढ़ी खुलना = दरबार में आनै की इजाजत मिजना । आने जाने की आज्ञा मिलना । (किसी की) ड्यौढ़ी बंद होना = किसी राजा या रईस के यहाँ आने जाने की मनाही होना । आने जाने का निषेध होना । ड्यौढ़ी लगना = द्वार पर द्वारपाल बैठना जो बिना आज्ञा पाए लोगों को भीतर नहीं जाने देता । ड्यौढ़ी पर होना = दरवाजे पर या अधीनता में होना । नौकरी में होना । उ०— बस्त्रोः हुजूर हमने यह बात किसी रईस के घर में आजतक देखी ही नहीं । यहाँ चाहे बढ़ बढ़ के जो बातें बनाएँ, किसी और की ड्यौढ़ी पर होती तो जड़ खड़ें निकलवा दी आती ।—सैर कु०, पृ० ३२ ।

ड्यौढ़ी
[हिं० डेढ़] डेढ़गुनी । दे० 'डयौढ़ा' ।

ड्यौढ़ीदार
संज्ञा पुं० [हिं० ड्यौढ़ी + फा़ दार] दे० 'ड्यौढ़ीवान्' ।

ड्यौढ़ीवान
संज्ञा पुं० [हिं० ड्यौढ़ी] ड्यौढ़ी पर रहनेवाला सिपाही या पहरेदार । द्वारपाल । दरबान उ०—जहाँ न ड्यौढ़ीवान पायजामा तन धारे ।—श्रीधर पाठक (शब्द०) ।

ड्यौढ़, ड्यौढ़ा
संज्ञा पुं० [हिं० डेढ़] [वि० स्त्री० ड्यौढ़ी] १. एक और आधा अधिक । उ०—वह जिसके न, दून ड्यौढ़, पौन । जो वेदों में है सत्य, साम ।—आराधना, पृ० २० ।

ड्यौढ़ी †
संज्ञा पुं० [हिं० ड्योढ़िया] द्वारपाल । ड्योढ़ीदार । दरबान । उ०—सोभा ड्यौढ़ी प्रीत सवाई ।—रा० रू०, पृ० ३१५ ।

ड्रम
संज्ञा पुं० [अं०] १. एक प्रकार का अँगरेजी बाजा । ढोल । नगाड़ा । २. ढोल जैसै आकार का बड़ा पात्र या पीपा ।

ड्राइंग
संज्ञा स्त्री० [अं०] रेखाओँ के द्वारा अनेक प्रकार की आकृति बनाने की कला । लकीरों से चित्र या आकृति बनाने की विद्या ।

ड्राइंगरूम
संज्ञा पुं० [अं०] बैठने का कमरा । जिस कमरे में आनेवालों को बैठाया जाय । उ०—उनके लिये ड्राइंदरूम बनाकर सजाना पड़ता है ।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० ७७ ।

ड्राइवर
संज्ञा पुं० [अ०] गाड़ी हाँकने या चालानेवाला । जैसे, रेल का ड्राइवर ।

ड्राई प्रिंटिंग
संज्ञा स्त्री० [अं०] सूखी छपाई । छापेखाने में वह छपाई जो भिगोए हुए सूखे कागज पर की जाती है । विशेष—इस प्रकार की छपाई से कागज की चमक नहीं जाती है और छपाई साफ होती है ।

ड्रान
वि० [अं०] बराबर । हारजीतशून्य । उ०—बाजी ड्रान रही ।—गोदान, पृ० १३२ ।

ड्राप
संज्ञा पुं० [अ०] १. बूँद । बिंदु । २. दे० 'ड्राप सीन' ।

ड्राप सीन
संज्ञा पुं० [अ०] १. नाट्यशाला या थिएटर के रंगमंच के आगे का परदा जो नाटक का एक अंक पूरा होने पर गिराया जाता है । यवनिका ।

ड्राफ्ट
संज्ञा पुं० [अ०] १. मसविदा । असौदा । खर्रा । जैसे,— अपौल का ड्राफ्ट तैयार कर कमिटि मे भेज दिया गया । २. चेक । हुंडी ।

ड्राफ्ट्समैन
संज्ञा पुं० [अं०] नक्शा बनानेवाला । स्थूल मानचित्रप्रस्तुत करनेवाला । जैसे,—ड्राफ्ट्समैन ने मकान का नक्शा इजीनियर के पास भेजा ।

ड्राम
संज्ञा पुं० [अं०] पानी आदि द्रव पदार्थो को नापने का एक अंग्रेजी मान जो तीन माशे के बराबर होता है ।

ड्रामा
संज्ञा पुं० [अ०] १. रंगमंच पर पात्रों या नटों का आकृति, हाव भाव, वचन आदि द्वारा किसी घटना या दृश्य का प्रदर्शन । रंगमंच पर किसी घटना या घटनाओं का प्रदर्शन । अभिनय । २. वह रचना जिसमें मानव जीवन का चित्र अंकों और गर्भांको आदि में चित्रित हो । नाटक ।

ड्रिंक
संज्ञा पुं० [अं०] मद्यपान । उ०—कैलाश ने कहा पहले ड्रिंक चले, फिर खाना मँगाया जायगा ।—संन्यासी, पृ० ३४० ।

ड्रिल
संज्ञा स्त्री० [अं०] बहुत से सिपाहियों या लड़कों को कई प्रकार के क्रम से खड़े होने, चलने, अंग हिलाने आदि की नियमित शिक्षा । कवायद । जैसे,—स्कूल में ड्रिल नहीं होती । यौ०—ड्रिल मास्टर = कवायद सिखानेवाला शिक्षक ।

ड्रेटनाट
संज्ञा पुं० [अ०] जंगी जहाज का एक भेद जो साधारण जंगी जहाजों से बहुत अधिक बड़ा, शक्तिशाली और भीषण होता है ।

ड्रेन
संज्ञा पुं० [अ०] नगर के गंदे पानी के निकास का परनाला । मोरी । गंदगी के बहावाली नाली ।

ड्रेस
संज्ञा पुं० [अ०] पोशाक । वेशभूषा ।

ड्रेस करना
क्रि० स० [अ० ड्रेस + हिं० करना] घाव में दवा आदि भरकर बाँधना । मरहम पट्टी करना । पत्थर आदि को चिकना और सुडौल करना । ३. बाल छाँटना ।

ड्रौगून
संज्ञा पुं० [अं०] १. सवार । सिपाही । विशेष—पहले ड्रैगूव पैदल और सवार दोनों का काम देते थे । पर अब वे सवार ही हीते हैं । २. रिसाले का नौकर । ३. क्रूर या उद्दंड व्यक्ति । जंगली आदमी । ४. पंखदार साँप । सपक्ष नाग ।