विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/औ

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संस्कुत वर्णमाला का चौदहवाँ और हिंदी वर्णमाला का ग्यारहबाँ स्वर वर्ण । इसके उच्चारण का स्थान कंठ और ओष्ठ है । यह स्वर अ+ओ के संयोग से बना है ।

औंगकी
संज्ञा पुं० [मला०] गिब्बन की जाति का एक बंदर । जो सुमात्रा टापू में होता है । विशेष—यह जंतु कई रंग का होता है, पर विशेष कर ऊदापन लिए हुए पीले रंग का होता है । इसके पैर की उँगलियाँ मिली होती हैं । यह जंतु जोड़े के साथ रहता है । इसका स्वभाव सुशील और डरपोक है, पर यह बड़ा चालाक होता है ।

औंगना
क्रि० स० [सं० अवाञ्जन] बैलगाड़ी के पहिये की धुरी में तेल देना ।

औंगा पु †
वि० [सं० अवाक् या गुङ्ग] [स्त्री० औंगी] १. मूक । मूँगा । २. न बोलनेवाला । चुप्पा । उ०—सुनि खग कहत अंब औंगी रहि सुमुझि प्रेम पथ न्यारो । गए ते प्रभु पहुँचाइ फिरै पुनि करत करम गुन गारी ।—तुलसी (शब्द०) ।

औंगी
संज्ञा [सं० अवाक्] चुप्पी । गूँगापन । खामोशी ।

औंघना †
क्रि० अ० [सं० अवाङ् = नीचे मुँह अथवा प्रा० √ उंघ, √ उग्घ ओंघ] ऊँघना । अलसाना । झपकी लेना ।

औंघाई †
संज्ञा स्त्री० [सं० आवाङ् = नीचे मुँह या प्रा०] हलकी नींद । तंद्रा । झपकी ।

औंघना †
क्रि० अ० [सं० आवाङ या प्रा० √ उंघ] दे० 'औंघना' ।

औंजना (१) पु †
क्रि० अ० [सं० उद्वेजन = व्याकुल होना] ऊबना ।व्याकुल होना । अकुलाना । उ०—एक करै धौंज, एक कहै काढ़ौ सौंज, एक औंजि पानी पी कै कहै बनत न आपनो । एक परे गाढ़े, एक डाढ़त हीं काढ़े, एक देखत हैं ठाढ़े, कहैं पावक भयावनो ।—तुलसी ग्रं०, पृ० १७५ ।

औंजना (२)
क्रि० स० [?] एक बरतन में से दूसरे बरतन में डालना । उँहेलना । उलटना ।

औंटन
संज्ञा पुं० [सं० आकुट्टन, प्रा आउट्टण, आवट्टन = छेदन करना या सं० अवघटट्न] १. लकड़ी का ठीहा जिसपर चौपायों का चारा काटा जाता है । २. वह ठीहा जिसपर ऊख की गँडेरी काटी जाती है ।

औंटना
क्रि० अ०, क्रि० स० [सं० आवर्तन, प्रा० आउट्टण] दे० 'औटाना' ।

औंटाना
क्रि० स० [सं० आवर्तन, प्रा आउट्टण] दे० 'औटाना' ।

औंठ (१)पु
संज्ञा पुं० [सं० ओष्ठं] दे० 'औंठ' । उ०—हसति कहति बात, फूल से झरत जात औंठ अवदात राती देख मन मौहिये ।—केशव ग्रं० स भा० १, पृ० १४९ ।

औठ (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० ओष्ट, प्रा० ओट्ठ] उठा हुआ किनारा । उभरा हुआ किनारा । बारी । जैसे,—घड़े की औंठ । रोटी की औंठ । मुहा०—औंठ उठाना = परती पड़े हुए खेत को जोतना ।

औंठा †
संज्ञा पुं० [हिं० अँगूठा] स्त्रियों के पैर के अँगूठे में पहनने का एक आभूषण । उ०—बिछ्बा पहिरिन औंठा पहिरिन ।—कबीर श०, पृ० १५१ ।

औंड़ पु
संज्ञा पुं० [सं० कुण्ड, प्रा० उंड=गड़्ढा] गड़्ढा खोदनेवाला । मिट्टी खोदनेवाला । मिट्टी उठानेवाला मजदूर । बेलदार । उ०—चले जाहु ह्माँ कों करै हाथिन को ब्यौपार । नहिं जानत यहि पुर बसैं धोबी, औंड़, कुम्हार ।—बिहारी (शब्द०) ।

औंड़ा (१)
वि० [सं० कुण्ड, प्रा० उंड] [वि० स्त्री० औंड़ी] गहरा । गंभीर । उ०—(क) तब तिन एक पुरस भरि औंड़ी । एक एक योजन लाँबी चौड़ी ।—पद्माकर (शब्द०) । (ख) यो कहँ गोवर्धन के निकट जाय दो औंड़े कुड़ खूदवाए ।—लल्लू (शाब्द०) । (ग) यह समझ मणि न पाय श्रीकृष्ण- चंद्र सबको साथ लिए वहाँ गए जहाँ वह औंड़ी महाभयावनी गुफा थी ।—लल्लू (शब्द०) ।

औंड़ा (२)
वि० [हिं० औंड़ना = उमड़ना] [वि० स्त्री० औंड़ी] उमड़ा हुआ । चढ़ा हूआ । बढ़ा हुआ । उ०—आवत जात ही होय है साँझ बहै जमुना भतरौंड़ लौं औंड़ी ।—रसखान (शब्द०) ।

औंड़ाबौंडा़ †
वि० [हिं०] दे० 'अंडबंड़' ।

औंड़ी
वि० [हि० औंधी] उलटी । औंधी । उ०—(क) फेरी नृत्य डौंड़ी यह औंड़ी बात जानि महा; कही राजा रंक पढ़े नीकी ठौर जानि कै ।—भक्तमाल (श्रीभक्ति०), पृ० ५१३ । (ख) कर स्वतंत्र अधिकार सभी पिटवायी डौंड़ी । धूर्त चला जो जाल (चाल) पड़ी वह कभी न औंड़ी ।—कविता० कौ०, भा० २, पृ० ३५७ ।

औंदना पु †
क्रि० अ० [सं० उन्मादन] १. उन्मत्त होना । बेसुध होना । उ०—देय कहै आप औंदे बूझति प्रसंग आगे सुधि न सँभारै बूझि आनँद परस्पर ।—देव (शब्द०) । २. व्याकुल होना । घबराना । अकुलाना । उ०—देत दुसह दुख पवन मोहिं अंचल चारु उड़ाय । कसु कामिनि करिकै कृपा, औंदिय सुधि बिसराय ।—रघुराज (शब्द०) ।

औंदाना पु
क्रि० अ० [सं० उद्वेजन] ऊबना । व्याकुल होना । दम घटने के कारण घबराना । उ०—ब्रह्मा गुरु सुर असुर के संधिक विष नहिं जान । मरैं सकल औंदाइ कै संधिक विष करि पान ।—कबीर (शब्द०) ।

औंधना (१)
क्रि० अ० [सं० अधः या अवधा] उलट जाना । उलटा होना ।

औंधना (२)
क्रि० स० उलट देना । उलटा कर देना । उ०—जीति सबै जग औंधि धरे हैं मनोज महीप के दुंदुंभी दोऊ ।—(शब्द०) ।

औंधा (१)
वि० [सं० अधः या अव+अधः] [वि० स्त्री० औंधी] १. उलटा । पट । जिसका मुँह नीचे की ओर हो । जैसे; औंधा बरतन । उ०—औंधा घड़ा नहीं जल डूबै सूधे सों घट भरिया । जेहि कारन नर भिन्न भिन्न करु गुरु प्रसाद ते तरिया ।—कबीर (शब्द०) । मुहा०—औंधी खोपड़ी का = मूर्ख । जड़ । कूढ़मग्ज । उ०— कबिरा औंधी खोपड़ी, कबहूँ धापै नाहिं । तीन लोक की संपदा कब आवै घर माँहि ।—कबीर (शब्द०) । औंधी समझा = उल्टी समझ । जड़ बुद्धि ।—औंधे मुँह = मुँह के बल । नीचे मुँह किए । औंधे मुँह गिरना = (१) मुँह के बल गिरना ।(२) बेतरह चूकना या धोखा खाना । झटपट बिना सोचे समझे कोई काम करके दुःख उठाना । जैसे,—वे चले तो थे हमें फँसाने, पर आप ही औंधे मुँह गिरे । (३) भूल करना । भ्रम में पड़ना । जैसे,—रामायण का अर्थ करने में वे कई जगह औंधे मुँह गिरे हैं । औंधा हो जाना । = (१) गिर पड़ना (२) बेसुध होना । अचेत होना । २. नीचा । उ०—राजा रहा दृष्टि कै औंधी । रहि न सका तब भाँट रसौंधी ।—जायसी (शब्द०) । ३. वह जिसे गुदाभंजन कराने की आदत हो । गांडू (बाजारू) ।

औंधा (२)
संज्ञा पुं० एक पकवान जो बेसन और पीठी का नमकीन तथा आटे का मीठा बनता है । उलटा । चिल्ला । चिलड़ा ।

औंधाना
क्रि० स० [सं० अधः करण?] १. उलटना । उलट देना । पट कर देना । अधोमुख करना । उ०—औंधाई सीसी सुलखि विरह बरत बिललात । बीचहि सूखि गुलाब गौ छींटौ छुई न गात । —बिहारी (शब्द०) । २. नीचा करना । लटकाना । उ०—बुधि बल बिक्रम विजय बड़ापन सकल बिहाई । हारि गए हिय भूप बैठि सीसन औंधाई ।—रघुराज (शब्द०) ।

औंरा †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अँवला' ।

औंस
संज्ञा पुं० [अं० आउँस] दे० 'आउंस' ।

औंसना
क्रि० अ० [सं० उष्म+ √ कृ, हिं० उमसना] उमस होना ।

औंहर †
संज्ञा स्त्री० [सं० अवरोध, प्रा० ओरोह] अटकाव । रूकावट । बाधा । विघ्न ।

औ (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. अनंत । शेष । २. शब्द या ध्वनि (को०) । ३. चार की संख्या का वाचक शब्द (को०) ।

औ (२)
संज्ञा स्त्री० विश्वंभरा । पृथ्वी ।

औ (३) पु
अव्य० [हिं०] दे० 'और' ।

औ (४)
सर्व० [हिं०] यह । उ०—औ मेलूँ अवरा तणौ, असुरां करण अकाम । सिवौ नचिंतौ एण सूँ, राजड़ ने जगराम ।—रा० रू०, पृ० २५५ ।

औकन
संज्ञा स्त्री० [देश०] राशि । ढेर । विशेष—औकन ज्वार के उन बालों वा भुट्टों के ढेर को कहते हैं जिनसे दाने निकाल लिए गए हों । इस ढेर को एक बार फिर बचाखुचा दाना निकालने के लिये पीटते हैं ।

औकात (१)
संज्ञा पुं० [अ० वक्त का बहु व०] समय । वक्त ।

औकात (२)
संज्ञा स्त्री० (एक व०) १. वक्त । समय । यौ०—औकात बसरी = जीवननिर्वाह । मुहा०—औकात जाया करना = समय नष्ट करना । औकात बसर करना = जीवन निर्वाह करना । २. हैसियत । बिसात । बिसारत । जैसे, —अपनी औकात देखकर खर्च करना चाहिए । उ०—क्यों कर निभेगी हमसे मुलाकात आपकी । वल्लाह क्या जलील है औकात आपकी ।—शेर०, भा० १, पृ० २६५ ।

औक्ष, औक्षक
संज्ञा पुं० [सं०] वृषभसमूह । बैलों का झुंड ।— संपूर्णा० अभि० ग्रं०, पृ० २४८ ।

औख †
संज्ञा स्त्री० [सं० उषर] दे० 'औखल' ।

औखद †
[सं० औषध] दे० 'औषध' ।

औखध
संज्ञा स्त्री० [सं० औषध] दे० 'औषधि' । उ०—इसके पीछे उसने अपनी झोली में कोई औखध निकाली ।—ठेठ०, पृ० ३८ ।

औखल †
संज्ञा स्त्री० [सं० ऊषर] वह भूमि जो परती से आबाद की गई हो ।

औखा
संज्ञा पुं० [हिं० ओख] गाय का चमड़ा । गाय का चरसा ।

औगत (१)पु
संज्ञा स्त्री० [सं० अवगति या अपगति] दुर्दशा । दुर्गति । क्रि० प्र०—करना । होना ।

औगत (२)
वि० [सं० अवगत] दे० 'अवगत' ।

औगति पु
संज्ञा स्त्री० [सं० अपगति] अवगति । अधोगति । उ०— ज्ञान हीन औगति भयो मरि नरकहिं जाई ।—भीखा० श०, पृ० ६७ ।

औगन पु
वि० [सं० अवगुण] दे० 'औगुन' । उ०—आये औगन एक के गुन सब जाय नसाय ।—दीन० ग्रं० पृ० ८४ ।

औगम्म पु
वि० [सं० अपगम] दे० 'अगम' । उ०—जहाँ न मानुस संचरे निरजन जान मरम्म । जंबू दीप के मानई, भरतखंड औगम्म ।—चित्रा०, पृ० १५९ ।

औगाह
वि० [सं० अवगाह] दे० 'अवगाह' । उ०—अति औगाह थाह नाहिं पाई । विमल नीर जहँ पुहुमि देखाई ।—चित्र०, पृ० ६० ।

औगाहना पु
क्रि० अ० [सं० अवगाधन, प्रा० ओगाहण, हिं० अवगाहना] दे० 'अवगाहना' ।

औगी (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. रस्सी बटकर बनाया हुआ कोड़ा जो पीछे की ओर मोटा और आगे की ओर बहुत पतला होता है । इसे घोड़ों को चक्कर देते समय उनके पीछे जोर जोर से हवा में फटकारते हैं । जिसके शब्द से चौंक कर वे और तेजी से दौड़ते हैं । २. बैल हाँकने की छड़ी । पैना । ३. कारचोबी के जूते के ऊपर का चमड़ा ।

औगी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० अवगर्त] हाथी, शेर, भेड़िए आदि को फँसान का गड्ढ़ा जो घास फूस से ढंका रहता है ।

औगुन पु †
संज्ञा पुं० [सं० अवगुण] दे० 'अवगुण' ।

औगुनी पु †
वि० [सं० अवगुणिन्] १. निर्गुणी । २. दोषी । ऐबी ।

औघ
संज्ञा पुं० [सं०] जलप्लावन । बाढ़ [को०] ।

औघट पु †
वि० [हिं० अवघट] दे० 'अवघट' । उ०—साधो अजब नगर अधिकाई । ओघट घाट बाट जहँ बाँकी उस मारग हम जाई ।—चरण० बानी०, भा० २, पृ० १३७ । यौ०—औघट घाट; औघट घाटी = अटपटा मार्ग । दुर्गम मार्ग । उ०—बंकनाल की औघट घाटी, तहाँ त पग ठहराई ।— कबीर० श०, पृ० ७८ ।

औघड़
संज्ञा पुं० [सं० अघोर = भयानक; शिव] [स्त्री० औघड़िन] १. अघोर मत का पुरुष । अघोरी । २. काम में सोचविचार न करनेवाला मनमौजी । ३. बुरा शकुन । अपशकुन (ठगों की बोली) । ४. अविवेकी । विवेकरहित व्यक्ति ।यो०—औघड़पंथ = दे० 'अघोर पंथ' । औघड़पंथी = दे० अघोर- पंथी । औघड़मार्ग = दे० 'अघोरमार्ग' ।

औघड़ (२)
वि० [सं० अब+घट्ट] अंडबंड । उलटा पलटा । अटपट ।

ओघर
वि० [सं० अव+घट] १. अटपट । अनगढ़ । अंडबंड । उलटा- पलटा । 'सुघर' का प्रतिकूल । २. अनोखा । विलक्षण । उ०— (क) कुंजबिहारी नाचत नीकें लाडिली नचावति नीके । औघर ताल धरे श्रीश्यामा मिलवत ताताथेई ताथेई गवत सँग पी के ।—हरिदास (शब्द०) । (ख) बलिहारी वा रूप की लेति सुघर औ औघर तान दै चुंबन आकर्षति प्रान ।—सूर (शाब्द०) । (ग) मोहन मुरली अधर धरी । औघर तान बँधान सरस सुर अरु उमगि भरी ।—सूर (शब्द०) ।

औघी †
संज्ञा स्त्री० [देश० औगी?] वह जगह जहाँ नए घोड़ों को सिखलाने के लिये चक्कर दिलाया जाता है ।

औघूरना पु
क्रि० अ० [सं० अवघूर्णन] चक्कर खाना । घूमना ।

औचक
क्रि० वि० [सं० अव+चक = भ्रांति] अचानक । एकाएक । सहसा । एकबारगी । उ०—(क) खेलत औचक ही हरि आए । जननी बाँह पकरि बैठाए ।—सूर (शब्द०) । (ख) औचक आय जोबनवाँ अति दुख दीन । छुटिगो संग गोइयवाँ नहिं भल कीन ।—रहीम (शब्द०) ।

औचट (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० अवोच्चाट, हिं० उचटना = हटना] ऐसी स्थिति जिसमें निस्तार का उपाय जल्दी न सूझे । अंड़स । संकट । कठिनता । साँकरा । उ०—रसखान सों केतों उचाटि रही, उचटी न सकोच की औचट सों । अलि कोटि कियो अटकी न रही, अटकी अँखियाँ लटकी लट सों ।— रसखान (शब्द०) । मुहा०—औचट में पड़ना = संकट में पड़ना । जैसे,—साँप जब औचट में पड़ता है तभी काटता है ।

औचट (२)
क्रि० वि० १. अचानक । अकस्मात् । उ०—इक दिन सब करती रहीं जमुना में अस्नान । चीर हरे तहँ आइकै औचट स्याम सुजान ।—विश्राम (शब्द०) । २. अनचीते में । भूल से । उ०—स्वारथ के साथी तज्यो, तिजरा को सो टोटको औचट उलटि न हेरो ।—तुलसी (शब्द०) ।

औचाट †
संज्ञा पुं० [सं० उच्चाटन] दे० 'उच्चाटन' । उ०— थंभन मोहन बसिकरन छाड़ो औचाट । सूणौ हो जोगेसरौ जोगारंभ की बाट ।—गोरख०, पृ० १३० ।

औचिंत पु
वि० [सं० अव = नहीं+चिन्ता] निश्चिंत । बेखबर । उ०—काल सचाना नर चिड़ा औजड़ औ औचिंत ।— कबीर (शब्द०) ।

औचिती
संज्ञा स्त्री० [सं०] औचित्य । उपयुक्तता । योग्यता ।

औचित्य
संज्ञा पुं० [सं०] उचित का भाव । उपयुक्ताता । उ०— विपक्षी की प्रतिकूलता ही हर पक्ष को औचित्य की सीमा के बाहर नहीं जाने देती ।—द्विवेदी (शब्द०) ।

औछ
संज्ञा स्त्री० [देश०] दारुहल्दी की जड़ ।

औछकी पु †
वि० [सं० अवचकित, हिं० औचक+ई (प्रत्य०)] चौंकी हुई । उ०—छकी सी घुमति कछु औछकी सी बात करै ।—गंग०, पृ० ५२ ।

औछाना पु †
क्रि० स० [सं० अवछादन] आच्छादित करना । छा जाना । फैलना । उ०—छत्रे अकास एम औछायौ । धण आयौ किरि वरण घण ।—बेलि०, दू० १४४ ।

औछार
संज्ञा पुं० [देश०] ओहार । झूल । हाथी आदि की पीठ पर डाला जानेवाला आवरण या पट जो नीचे तक झूलता रहता है । उ०—जरकम जराव औछार मंडि, सुरराज द्विपन सोभात षंडि ।—पृ० रा०, १८ ।८३ ।

औछाह †
संज्ञा पुं० [सं० उत्साह, प्रा० उच्छाह] दे० 'उछाह' । उ०—भावसिंघ सबल का मांडण सवाई । औछाह सी लागै जाकूँ साह की लड़ाई ।—रा० रू०, पृ० १२२ ।

औज (१)
संज्ञा स्त्री० [अ० औज] दे० 'औज' ।

औज (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० ओज] ऊँचाई । उत्कर्ष । बुलंदी । उ०— सआदत का जिस औज है आशियाँ, निझा देख अँधारा उजाला तमाम ।—दक्खिनी०, पृ० १४५ ।

औजक पु †
क्रि० वि० [हिं० औझक] दे० 'औचक' ।

औजकमाल
संज्ञा पुं० [अ०] संगीत में एक मुकाम (फारसी—राग) का पुत्र ।

औजड़
वि० [सं० अव या अप+जड] उजड़्ड । अनाड़ो । उ०— काल सचाना, नर चिड़ा औजड़ औ औचिंत ।—कबीर (शब्द०) ।

औजस
संज्ञा पुं० [सं०] सोना । तैजस । स्वर्ण [को०] ।

औजसिक (१)
वि० [सं०] औजयुक्त । ओजस्वी । उत्साही [को०] ।

औजसिक (२)
संज्ञा पुं० वीर पुरुष । ओजस्वी व्यक्ति ।

औजस्य (१)
वि० [सं०] उत्साहवर्धक । बलवर्धक । ताकतवर । शक्ति बढ़ानेबाला [को०] ।

औजस्य (२)
संज्ञा पुं० १. औज का भाव । २. बल । शक्ति । ३. उत्साह [को०] ।

औजार
संज्ञा पुं० [अ० वजर का बहु व० औजर] वे यंत्र जिनसे वैज्ञानिक, इंजिनियर, छात्र, लोहार, बढ़ई आदि अपना काम करते हैं । हथियार । राछ ।

औजूद पु
संज्ञा पुं० [अ० वुजूद] तन । शरीर । जिस्म । देह । उ०—दादू मालिक कहा अरवाह सौं, अरवाह कह्या औजूद । औजूद आलम सौं कह्या हुकम खबर मौजूद ।—दादू०, पृ० ४२० ।

औज्जवल्य
संज्ञा पुं० [सं०] उजलापन । उज्वलता [को०] ।

औझक पु †
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'औचक' ।

औझड़ (१)
क्रि० वि० [सं० अव+हिं० झड़ी] लगातार । निरंतर । उ०—होय बेअकलि तन की सुधि जाई । औझड़ भरमें राहि न पाई ।—प्राण०; पृ० १५६ । मुहा०—औझड़ मारना या लगाना=वार पर वार करना । धड़ाधड़ चाँटे लगाना ।

औझड़ † (२)
संज्ञा पुं० [देश०] १. सयाना । बृद्ध । गुणी । २. उजाड़ । वीरान स्थान । उ०—बड़ी बड़ आँखी किछु सूझे नाहीं । राह छाँड़ औझड़ क्यों पाहीं । —प्राण०, पृ० ३२ ।

औझर
क्रि० वि० [हिं० औझड़] लगातार । अनवरत । उ०—हिरना बिरुझेऊ सिंह ते औझर खुरी चलाय । झारखंड़ झीना परयो सिंहा चले पराय ।—गिरिधर (शब्द०) ।

औटन
संज्ञा स्त्री [सं० आवर्त्तन प्रा० आउट्टन, आवट्टन] १. उबाल । ताव । २. ताप । गर्मी । उ०—कनक पान कित जोबन कीन्हा । औटन कठिन बिरह वह दीन्हा ।—जायसी (शब्द०) । ३. तंबाकू काटने की छुरी । ४. औटने का भाव या क्रिया । २. औटने की वस्तु ।

औटना (१)
क्रि० स० [सं० आवर्त्तन, प्रा० आउट्टन, आवट्टन] १. दूध या किसी और पतली चीज को आँच पर चढ़ाकर धीरे धीरे चलाना और गाढ़ा करना । उ०—औट्चौ दूध कपूर मिलयो प्यावत कनक कटोरे । पीवत देखि रोहिणी यशुमति डारत है तृन तोरे—सूर (शब्द०) । २. पानी, दूध या और किसी पतली चीज को आँच पर गरम करना । खौलाना । विशेष—इस शब्द का प्रयोग केवल तरल पदार्थों के लिये होता है । ३. पु व्यर्थ घूमना । इधर उधर हैरान होना ।

औटना (२)
क्रि० अ० १. किसी तरल वस्तु का आँच या गरमी खाकर गाढ़ा होना । २. खौलना ।

औटनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० औटना] कलछी या चम्मच जिससे आँच पर चढ़े हुए दूध या और किसी तरल पदार्थ को हिलाते या चलाते हैं ।

औटपाई पु
वि० स्त्री० [हिं० औटपाय] शरारती । नटखट । उ०— चुँहटि जगाई अधराति औटपाई आनि ।—घनानंद, पृ० २०९ ।

औटपाय पु
संज्ञा पुं० [हिं० औठपाय] दे० 'औठपाय' ।

औटाना
क्रि० स० [हिं० ओटना का प्रे० रूप] दूध या किसी और पतली चीज को आँच पर चढाकर धीरे धीरे हिलाना और गाढ़ा करना । खौलाना । उ०—(क) लखि द्विज धर्म तेल औटायो । बरत कराह माँझ डरवायो ।—विश्राम (शब्द०) । (ख) पय औटावत महँ इक काला । कढ़े रंगपति विभव विशाला । —रघुराज (शब्द०) ।

औटी
संज्ञा स्त्री० [हिं० औटना] वह पुष्टई जो गाय को ब्याने पर दी जाती है । २. पानी मिलाकर पकाया हुआ ऊख का रस ।

औठपाय †
संज्ञा पुं० [देश०] उत्पात । शरारत । नटखटी । उ०— अनगने औठपाय रावरे गने न जाहिं वेऊ आहिं तमकि करैया अति मान की । तुम जेई सोई कहौ, वेऊ जोई सुनै, तुम जीभ पातरे वे पातरी हैं कान की ।—केशव (शब्द०) ।

औड़ पु
संज्ञा पुं० [सं० कुण्ड = गड़ढा] दे० 'औड़' ।

औड
वि० [सं०] आर्द्र । तर । गीला [को०] ।

औडन पु
संज्ञा पुं० [हिं० ओड़ना] दे० 'औड़न' । उ०—पग उभारि दल रारि तारि कढ्ढन दुज्जन वै । औडन हंथह धषि घांषि भ्रत चालुक्कन खै । —पृ० रा०, १२ ।३३२ ।

औडव (१)
वि० [सं०] नक्षत्र संबंधी । ताराओं से संबद्ध [को०] ।

औडव (२)
संज्ञा पुं० संगीत में एक राग का नाम [को०] ।

औड़ा
क्रि० वि० [हिं० औंड़ा] गहरे । अंदर की ओर । भीतर । उ०—विषय के अंदर पहुँच जाने की योग्यतावाले जितने औड़े जायँगे उतने ही मुरजीवा को तरह रात्त और मोती लेकर आवैगे ।—सुंदर०, ग्रं०, भा० १, पृ० २०५ ।

औडुंबर
संज्ञा पुं० [सं० ओडुम्बर] दे० 'औदुंबर' [को०] ।

औडुपिक (१)
वि० [सं०] नाव से (नदी आदि) पार करनेवाला [को०] ।

औडुपिक (२)
संज्ञा पुं० नौका के यात्री [को०] ।

औडुलोमि
संज्ञा पुं० [सं०] एक ऋषि वा आचार्य जिनका मत वेदांत सूत्रों में उदाहृत किया गया है ।

औड्र
संज्ञा पुं० [सं०] उड़ीसा प्रदेश का निवासी । उड़ीसा का रहने वाला [को०] ।

औढर
वि० [सं० अव+हिं० ढार या ढाल] जिस ओर मन में आवे उसी ओर ढल पड़नेवाला । जिसकी प्रकृति का कुछ ठीक ठिकाना न हों । मनमौजी । उ०—देत न अघात रीझि जात पात आक ही के भोरानाथ जोंगी जब औढर ढरत हैं ।—तुलसी (शब्द०) ।

औढरदानी (१)
वि० [हिं० औढर+दानी] बहुत अधिक देनेवाला ।

औढरदानी (२) पु
संज्ञा पुं० [हिं० औढर+दानी] शिव । शंकर । जो तरंग में आकर विना बिचारे सेवकों की कामना पूर्ण करते हैं । उ०—औढरदानि द्रवत पुनि थोरे । सकत न देखि दीन कर जोरे ।—तुलसी (शब्द०) ।

औणक
संझा पुं० [सं०] एक वैदिक गीत ।

औतरना पु
क्रि० अ० [सं० अवतरण] दे० 'अवतरना' । उ०— (क) मीन की मराल की ममोले मृग मुकुर की मानिनी मनोंज जग जीतिबे औतरी है ।—गंग०, पृ० ३७ । (ख) औसर बीतै फिरि पछतावै । औतरि औतरि या तें आवे ।—सुंदर० ग्रं०, भा० १, पृ० २२० ।

औतार पु
संज्ञा पुं० [सं० अवतार] दे० 'अवतार' । उ०—मलखान अवतार मेरौ सुलिख्यौ ।—प० रासो, पृ० ८४ ।

औतारी पु †
वि० [हिं० अवतारी] दे० 'अवतारी' ।

औत्कंठय
संज्ञा पुं० [सं० औत्कण्ठ्य] १. उत्कंठा । उत्सुकता । २. आकांक्षा । इच्छा । ३. चिंता [को०] ।

औत्कर्ष्य
संज्ञा पुं० [सं०] उत्कर्षता । उच्चता । श्रेष्ठता [को०] ।

औत्क्य
संज्ञा पुं० [सं०] उत्सुकता । उत्कंठा । इच्छा [को०] ।

औत्तमर्णिक
वि० [सं०] शुक्र नीति के अनुसार दूसरे से सूद ब्याज पर दिया हुआ (धन) ।

औत्तमि
संज्ञा पुं० [सं०] १४ मनुऔं में से तीसरा ।

औत्तर
वि० [सं०] १. उत्तरी । उत्तर दिशा संबंधी । २. उत्तर में रहने या होनेवाला [को०] ।

औत्तरेय
संज्ञा पुं० [सं०] अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा से उत्पन्न परीक्षित नरेश [को०] ।

औत्तानपाद, औत्तानपादि
संज्ञा पुं० [सं०] १. उत्तानपाद के पुत्र हरिभक्त ध्रुव । २. ध्रुव नाम का तारा [को०] ।

औत्तापिक
वि० [सं०] १. उत्ताप संबंधी । २. उत्तापजन्य ।

औत्पत्तिक
वि० [सं०] १. उत्पत्ति संबंधी । २. स्वाभाविक । सहज । जन्मजात ।

औत्पातिक
वि० [सं०] उत्पात या उपद्रव संबंधी [को०] ।

औत्स
वि० [सं०] उत्स, प्रवाह या झरना । संबंधित [को०] ।

औत्सर्गिक
वि० [सं०] १. उत्सर्ग संबंधी । २. सहज । स्वाभाविक । ३. व्याकरण में सामान्य रूप से मान्य या सामान्यतः स्वीकार्य (नियम) । ४. त्यागनेवाला । छोड़नेवाला ।२. सामान्य [को०] ।

औत्सुक्य
संज्ञा पुं० [सं०] उत्सुकता । उत्कंठा । हौसला ।

औथरा पु
वि० [सं० अवस्थल+क (प्रत्य०)] उथला । छिछला । उ०—अति अगाध अति औथरी नदी कूप सर वाय । सो ताकौ सागर जहाँ जाकी प्या बुझाय ।—बिहारी (शब्द०) ।

औदक (१)
वि० [सं०] जल संबंधी । जलवाला । जलीय [को०] ।

औदक (२)
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य के अनुसार वह उपनिवेश जिसमें जल की बहुतायत हो ।

औदकना पु
क्रि० अ० [हिं० उदकना] उछलना । चौंकना ।

औदनिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. कौटिल्य के अनुसार पका चावल अर्थात् भात दाल बेचनेवाला । २. भात पकनेवाला रसोइया (को०) ।

औदयिक (१)
वि० [सं०उदय] उदय संबंधी ।

औदयिक (२)
संज्ञा पुं० जैन मतानुसार वह भाव या विचार जो पूर्वसंचित कर्मों के कारण चित्त में उठता है ।

औदर
वि० [सं०] पेट संबंधी । २. पाचन क्रिया संबंधी [को०] ।

औदरिक
वि० [सं०] १. उदर संबंधी । बहुत खानेवाला । पेटू ।

औदर्य
वि० [सं०] उदर संबंधी । पेट का । औदरिक ।

औदश्वित
संज्ञा पुं० [सं०] मट्ठा जिसमें आधा पानी मिलाया गया हो । छाछ [को०] ।

औदसा पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० अवदशा] बुरी दशा । दुर्दशा । दुःख । आपत्ति । क्रि० प्र०—फिरना = बुरे दिन आना ।

औदान †
संज्ञा स्त्री० [सं० अवदान] वह वस्तु जों मोल लेनेवाले को ऊपर से दी जाती हैं । घाल । घलुआ ।

औदार्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. उदारता । २. सात्विक नायक का एक गुण । ३. अर्थसंपत्ति । अर्थवत्ता (को०) । ४. महत्ता । श्रेष्ठता (को०) ।

औदासीन्य, औदास्य
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उदासीनता' ।

औदीच्य (१)
वि० [सं०] उत्तर संबंधी । उत्तरी [को०] ।

औदीच्य (२)
संज्ञा पुं० गुजराती ब्राह्मणों की एक जाति ।

औदुंबर (१)
वि० [सं० औदुम्बर] उदुंबर या गूलर का बना हुआ । २. ताँबे का बना हुआ ।

औदुंबर (२)
संज्ञा पुं० १. गूलर की लकड़ी का बना हुआ यज्ञपात्र । २. १४ यमों में से एक । ३. एक प्रकार के मुनि जिनका यह नियम होता था कि सबेरे उठकर जिस दिशा की ओर पहले दृष्टि जाती थी, उसी ओर जो कुछ फल मिलते थे, उस दिन उन्हीं को खाते थे । ४. गूलर का फल (को०) । ५. गुलर की लकड़ी (को०) । ६. ताँबा या ताम्रपात्र (को०) । ७. एक प्रकार का कोढ़ [को०] ।

औदुंबरक
संज्ञा पुं० [सं० औदुम्बरक] गूलर का जंगल [को०] ।

औदुंबरी
संज्ञा स्त्री० [सं० औदुम्बरी] गूलर के वृक्ष की शाखा या लकड़ी [को०] ।

औद्दालक (१)
संज्ञा पुं० [सं उद्दालक] १. दीमक और बिलनी आदि बाँबी के कीड़ों के बिल से निकला हुआ चेप या मधु । २. एक तीर्थ का नाम ।

औद्दालक (२)
वि० उद्दालक के वंश का ।

औद्धत्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. उग्रता । अक्खड़पन । उजडड्पन । २ अविनीतता । अशालीनता । धृष्टता । ढिठाई ।

औदि्भज्ज (१)
वि० [सं०] धरती से उत्पन्न या प्राप्त [को०] ।

औद्भिज्ज (२)
संज्ञा पुं० खारा नमक [को०] ।

औद्भिद (१)
वि० [सं०] १. (कुँए से) निकलनेवाला । धरती के अंदर से फूटने या व्यक्त होनेवाला । २. विजयी [को०] ।

औद्भिद (२)
संज्ञा पुं० १. प्रपात या झरने का जल । २. पहाड़ी नमक । खारा नमक [को०] ।

औद्योगिक
वि० [सं०] उद्योग संबधी ।

औद्वाहिक (१)
वि० [सं०] १. विवाह संबंधी । २. विवाह का । विवाह में प्राप्त ।

औद्वाहिक (२)
संज्ञा पुं० १. विवाह में ससुराल से मिला हुआ धन जिसका बटवारा नहीं होता । २. विवाह में स्त्री को भेंट या उपहार स्वरूप मिला धन ।

औध (१)पु
संज्ञा पुं० [सं० अवध] पुं० 'अवध' । उ०—संग सुभामिन भाइ भलो, दिन द्वै जनु कौध हुते पहुनाई ।—तुलसी ग्रं०, पृ० १६१ ।

औध (२)पु
संज्ञा स्त्री० [सं० अवधि] दे० 'अवधि' । उ०—औध अनल तन तिनको मंदर चहुँ दिसि ठाठ ठ्यो । —कबीर ग्रं०, पृ० २९४ ।

औधमोहरा
संज्ञा पुं० [सं० उर्द्ध+हिं० मोहड़ा] सिर उठाकर चलनेवाला हाथी ।

औधस
वि० [सं०] [वि० स्त्री० औघसी] थन या स्तन से संबंध रखनेवाला, जैसे, दूध [को०] ।

औधस्य
संज्ञा पुं० [सं०] दूध । दुग्ध [को०] ।

औधान पु
संज्ञा पुं० [सं० अवधान, हिं० अवधान, अउधान] गर्भ । अउधान । उ०—लै कन्या ऋषि घरहिं सिधाये । भृगुकुल हरि औधानहि आये ।—कबीर सा०, पृ० ३२ ।

औधि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० अवधि] दे० 'अवधि' । उ०—आवन के दिन तीस कहे गति औधि की ठीक तपी परसौं ।—गंग०, पृ० ४८ ।

औधूत पु †
संज्ञा पुं० [सं० अवधूत] दे० 'अवधूत' । उ०—करता है सो करेगा, दादू साखी भूत । कौतिगहारा ह्नै रह्या अणकरता औधूत ।—दादू०, पृ० ४५७ ।

औन पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० अवनि] दे० 'अवनि' । उ०—अरु साधुन के दुस्सह कौन । जिनके नहिं ममता मति औन ।—नंद० ग्रं०, पृ० २२२ ।

औनापौना (१)
वि० [सं० ऊन (कम)+हिं० पौना (३/४ भाग)] आधा- तीहा । थोड़ा बहुत । अधूरा ।

औनापौना (२)
क्रि० वि० कमती बढ़ती पर । मुहा०—औनेपौने करना = कमती बढ़ती दाम पर बेच डालना । जितना मिले उतने पर बेच डालना ।

औनि पु, औनी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० अवनि] दे० 'अवनि' । उ०— मृग की मानौ चंचल छौनी । पावन करति फिरति छबि औनी ।—नंद० ग्रं०, पृ० १२० । यौ०—औनिप = दे० अवनिप । औनिबाल = पृथिवीपुत्र मंगल । उ०— जावक सुरंग मैं न, इंगुर के रंग मैं न, इंद्रबधू अंग मैं न, रंग औनिंपाल मैं ।—गंग०, पृ० २४ ।

औन्नत्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. उन्नति । उत्थान । २. उच्चता । ऊँचाई [को०] ।

औप पु
संज्ञा पुं० [हिं० ओप] दे० 'ओप' । उ०—अंग बर्म चर्म सु कीन । सिर टीप औप सु दीन ।—ह० रासो, पृ० १२३ ।

औपकार्य
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० औपकार्या] निवास । डेरा । पड़ाव । खेमा [को०] ।

औपक्रमिक
वि० [सं०] उपक्रम संबंधी । प्रारंभिक [को०] ।

औपक्रमिक निर्जरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] अर्हत या जैन दर्शन में दो निर्जराऔं में से एक । वह निर्जरा या कर्मक्षय जिसमें तपोबल द्वारा कर्म का उदय कराकर नाश किया जाय ।

औपग्रंतिक, औपग्रहिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. ग्रहण । उपराग । २. ग्रहणग्रस्त सूर्य या चंद्रमा [को०] ।

औपचारिक
वि० [सं०] १. उपचार संबंधी । २. जो केवल कहने सुनने के लिये हो । बोलचाल का । जो वास्तविक न हो । जैसे,—यदि देह से आत्मा आभिन्न हुआ तो मेरा 'देह', इस प्रकार की प्रतीति किस प्रकार ही सकती है । इसके उत्तर में यही कहना है कि 'राहु का शिर' इत्यादि प्रतीति की नाईं 'मेरा देह', इस प्रकार औपचारिक प्रतीति हो जाती है ।

औपटा पु †
वि० [हिं०] [वि० स्त्री० औपटी] दे० 'अटपटी' । उ०— हाय कछु औपटी उदेग आगि जागि जाति, जब मन लागि जात काहू निरमोही सो ।—रत्नाकर, भा० २, पृ० ३१ ।

औपदेशिक
वि० [सं०] १. उपदेश संबंधी । २. उपदेश या शिक्षा द्वारा जीविका चलानेवाला । ३. उपदेश द्वारा कमाया या प्राप्त (धन) [को०] ।

औपद्रविक
वि० [सं०] १. उपद्रव संबंधी । २. रोगादि के लक्षणों से संबंध रखनेवाला [को०] ।

औपधर्म्य
संज्ञा पुं० [सं०] धर्मविरोधी विचार या मत [को०] ।

औपधिक (१)
वि० [सं०] १. धोखा देनेवाला । धोखेबाज । छली । २. धोखा देकर किया जानेवाला (कार्य) ।

औपधिक (२)
संज्ञा पुं० धोखा देकर धन लेनेवाला पुरुष । ठग ।

ओपनिधिक
वि० [सं०] १. उपनिधि या धरोहर संबंधी । २. शुक्र- नीति के अनुसार विश्वास पर किसी के यहाँ रखा हुआ (धन) ।

औपनिवेशिक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] उपनिवेश में रहनेवाला व्यक्ति । वह जो उपनिवेश में रहता है । जैसे,—दक्षिण अफ्रिका के भारतीय औपनिवेशिक ।

औपनिवेशिक (२)
वि० उपनिवेश का । उपनिवेश संबंधी । जैसे, — औपनिवेशिक शासन । औपनिवेशिक सचिव । औपनिवेशिक स्वराज्य आदि ।

औपनिषद (१)
वि० [सं०] उपनिषद् संबंधी । उपनिषद् में बताया हुआ [को०] ।

औपनिषद (२)
संज्ञा पुं० १. परब्रह्म । २. उपनिषद् का अनुसरण करनेवाला व्यक्ति । उपनिषद् का अनुयायी [को०] ।

औपनिषदिक
वि० [सं०] १. उपनिषद् संबंधी या उपनिषद् के समान । उ०—वैदिक साहित्य से औपनिषदिक साहित्य की विशेषताएँ निम्न निर्दिष्ट हैं ।—सं० दरिया (भू०), पृ० ५६ । २. उपनिषद् के अध्यापन से गुजर बसर करनेवाला ।

औपनिषदिक कर्म (२)
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य अर्थशास्त्र के अनुसार वे कर्म जो शात्रु का नाश करनेवाले कहे गए हैं । शत्रुनाशक कार्य ।

औपनी पु †
संज्ञा स्त्री० [हि० ओप] दे० 'ओपनी' ।

औपन्यासिक (१)
वि० [सं०] १. उन्यास विषयक । उपन्यास संबंधी । २. उपन्यास में वर्णन करने योग्य । ३. अद् भुत । विलक्षण । ४. उपन्यास की बातों के समान ।

औपन्यासिक (२)
संज्ञा पुं० [सं०] उपन्यास लिखनेवाला । उपन्यास लेखक । जैसे, शरत बाबू बंगला के प्रसिद्ध औपन्यासिक हैं । विशेष—इस अर्थ में इस शब्द का प्रयोग बहुत हाल में बंगालियों की देखादेखी होने लगा है ।

औपपत्तिक
वि० [सं०] १. उपपत्ति संबंधी । २. युक्ति या तर्क द्वारा सिद्ध होनेवाला । तर्कसाध्य । युक्तिसंगत । ३. सैद्धांतिक ।

औपपत्तिक शरीर
संज्ञा पुं० [सं०] देवलोक और नरक के जीवों का नैसर्गिक वा सहज शरीर । लिंगशरीर ।

औपम्य
संज्ञा पुं० [सं०] उपमा का भाव । समता का बराबरी । तुल्यता ।

औपयिक (१)
वि० [सं०] १. न्याय के योग्य । २. ठीक । उपयुक्त । ३. प्रयास द्वारा प्राप्त ।

औपयिक (२)
संज्ञा पुं० १. साधन । ढंग । तरीका । उपाय [को०] ।

औपयोगिक
वि० [सं०] उपयोग या प्रयोग में आनेवाला । उपयोग संबंधी [को०] ।

औपराजिक
वि० [सं०] राजप्रतिनिधि से संबंधित [को०] ।

औपरिष्टक
संज्ञा पुं० [सं०] वात्स्यायन कामसूत्र में वर्णित रति- क्रिया का एक प्रकार [को०] ।

औपल
वि० [सं०] [वि० स्त्री० औपला, औपली] १. उपल या पत्थर संबंधी । २. प्रस्तर निर्मित । पत्थर का बना हुआ । ३. पत्थर से प्राप्त होनेवाला (कर आदि) [को०] ।

औपवस्त
संज्ञा पुं० [सं०] उपवास । फाका [को०] ।

औपवस्त्र, औपवस्त्रक
संज्ञा पुं० [सं०] १. उपवास के उपयुक्त भोजन । २. उपवास [को०] ।

औपवास
वि० [सं०] १. उपवास काल में दिया जानेवाला (धन आदि) । २. उपवास में किया जानेवाला [को०] ।

औपवाह्य (१)
वि० [सं०] सवारी करने योग्य । सवारी के काम में आनेवाला [को०] ।

औपवाह्य (२)
संज्ञा पुं० १. राजा की सवारी का हाथी । २. राजा की कोई भी सवारी, जैसे, रथ, अश्व आदि [को०] ।

औपशामिक
वि० [सं०] १. शांतिकारक । शंतिदायक । २. उपशम अर्थात् शांति संबंधी (को०) । यौ०—औपशमिक भाव = जैन संप्रदाय में वह भाव जो अनुदय- प्राप्त कर्मों के शांत न होने पर उत्पन्न हो, जैसे,—गँदला पानी रीठी डालने से साफ हो जाता है ।

औपश्लेषिक (
आधार) संज्ञा पुं० [सं०] व्याकरण में अधिकरण कारक के अतर्गत तीन आधारों में से वह आधार जिसके किसी अंश ही से दूसरी वस्तु का लगाव हो । जैसे,—वह चटाई पर बैठा है । वह बटलोई में पकाता है । यहाँ चटाई और बटलोई औपश्लेषिक आधार हैं ।

औपसर्गिक (१)
वि० पुं० [सं०] १. उपसर्ग संबंधी । २. उपसर्ग के रूप में होनेवाला (को०) । ३. छूत से उत्पन्न होनेवाला । रोग आदि (को०) । ४. दुःख आदि का सामना करने में समर्थ ।

औपसर्गिक (२)
संज्ञा पुं० एक प्रकार का संनिपात ।

औपस्थिक
संज्ञा पुं० [सं०] व्यभिचार आदि के आधार पर जीविका चलानेवाला व्यक्ति [को०] ।

औपस्थिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] रंडी । गणिका । विश्या [को०] ।

औपस्थ्य
संज्ञा पुं० [सं०] मैथुन । संभोग । सहवास [को०] ।

औपहारिक (१)
वि० [सं०] १. उपहार संबंधी या उपहार के काम में आनेवाला [को०] ।

औपहारिक (२)
संज्ञा पुं० भैंट । उपहार [को०] ।

औपाधिक
वि० [संग] १. उपाधि संबंधी । २. विशिष्ट स्थितियों में होनेवाला । विशेष धर्म से संबद्ध । ३. उपाधिजन्य । ४. (न्याय०) विशेष परिस्थिति या कार्य की करणभूत परिस्थिति [को०] ।

औपायनिक
वि० [सं०] १. उपायन या उपहार संबंधी । २. उपहार या नजराने में प्राप्त । ३. उपहार में दिया जानेवाला [को०] ।

औपसान (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह वैदिक अग्नि जो उपासना के लिये हो । गृह्याग्नि । २. कृत्य जो औपासन अग्नि के पास किया जाय । ३. पितरों को देय पिंड [को०] ।

औपासन (२)
वि० [सं०] १. गार्हपत्य अग्निसंबंधी । २. अर्चन या पूजा संबंधी । ३. पावन । पवित्र [को०] ।

औपेंद्र
पि० [सं० औपेन्द्र] उपेंद्र या विष्णु संबंधी [को०] ।

औम (१) पु
संज्ञा स्त्री० [सं० अवम] अवम तिथि । वह तिथि जिसकी हानि हुई हो । उ०—गनती गनबे तें रहे छत हू अछत समान । अलि अब ये तिथि औम लौं परे रहो तन प्रान ।—बिहारी (शब्द०) ।

औम (२)
वि० १. उमा संबधी । २. सन का बना हुआ [को०] ।

औमक, औमिक
वि० [सं०] सन का बना हुआ । सन का [को०] ।

औमोन
संज्ञा पुं० [सं०] सनई का खेत । सन का खेत ।—संपूर्णा० अभि० ग्रं०, पृ० २४९ ।

औरंग
संज्ञा पुं० [फा०] १. राजसिंहासन । २. बुद्धिमानी । यौ०—औरंगजेब = (१) राज्यसिंहासन की शोभा । (२) शासक । राजा । (३) मुगलवंश का अंतिम प्रतापी नरेश । यह शाहजहाँ का तृतीय पुत्र था । इसका शासनकाल ईस्वी १३५९ से १७०७ तक था । ग्रंथों में औरंग, औरँग और नौरंग आदि इसके नाम प्राप्त होते हैं । औरगनशीन = सिंहासनारूढ़ ।

औरंगोटंग
संज्ञा पुं० [मला०] दे० 'औरंगोटंग' ।

और (१)
अव्य० [सं० अपर, प्रा० अवर] एक संयोजक शब्द । दो शब्दों या वाक्यों को जोड़नेवाला शब्द । जैसे, —(क) घोड़े और गधे चर रहे हैं । (ख) हमने उनको पुस्तक दे दी और घर का रास्ता दिखला । दिया ।

और (२)
वि० १. दूसरा । अन्य । भिन्न । जैसे, —यह पुस्तक किसी और मनुष्य को मत देना । मुहा०—और और = अन्यान्य । विभिन्न । दूसरे प्रकार के । उ०— अनेक भावों के और और आलंबन खड़े होते रहते हैं ।— रस०, पृ०१३६ । और का और = (१) कुछ का कुछ । विप- रीत । अंड़बंड । जैसे, —वह सदा और का और समझता है । और का और होना = भारी उलट फेर होना । विशेष परिवर्तन होना । उ०—द्विज पतिया दे कहियो श्यामहिं । अब ही और की और होत कछु लागै बारा । ताते मैं पाती लिखी तुम प्रान अधारा—सूर (शब्द०) । और क्या = (१) हाँ । ऐसा ही है । जैसे,—(क) प्रश्न—क्या तुम अभी आओगे ? उत्तर—और क्या ? (ख) क्या इसका यही अर्थ है ? उत्तर—और क्या ? विशेष—ऐसे प्रश्नों के उत्तर में इसका प्रयोग नहीं होता जिनके अंत में निषेधार्थक शब्द 'नहीं' या 'न' इत्यादि भी लगे हों, जैसे, —तुम वहाँ जाओगे या वहीं? (२) आश्चर्यसूचक शब्द । (३) उत्साहवर्धक वाक्य । और तो और = (१) और बातों को जाने दो । और सब तो छोड़ दो । जैसे, —और तो और पहले आप इसी की करके देखिए । (२) दे० 'और तो क्या' । (३) दूसंरों का ऐसा करना तो उतने आश्चर्य की बात नहीं । दूसरों से या दूसरों के विषय में ऐसी संभावना हो भी । जैसे, —(क) और तौ और, स्वयं सभापति जी नहीं आए । (ख) और तो और यह छोकड़ा भी हमारे सामने बातें करता है । और ही कुछ होना = सबसे निराला होना । विलक्षण होना । उ०—वह चितवनि औरै कछू जिहि बस होत सुजान ।—बिहारी (शब्द०) । और तो क्या = 'और बातें तो दूर रहीं' । और बातों का तो जिक्र ही क्या । उचित तो बहुत कुछ था । जैसे, —और तौ क्या, उन्होंने पान तंबाकू के लिये भी न पूछा । औरलो; और सुनो = यह वाक्य किसी तीसरे से उस समय कहा जाता है जब कोई व्यक्ति एक के उपरांत दूसरी और अधिक अनहोनी बात कहता है या कहनेवाले पर दोषारोपण करता है । और सौ और पु = दे० ओर का और' । उ०—अधर मधुर मधु सहित मुख हुतो सबन सिर मौर । सो अब बगरे फलन ज्यौं भयौ और सौं और ।—ब्रज० ग्रं०, पृ० ९३ । २. अधिक । ज्यादा । विशेष । जैसे,—अभी और कागज लाओ, इतने से काम न चलेगा ।

औरग (१)
वि० [सं०] उरग या साँप का । सर्प संबंधी [को०] ।

औरग (२)
संज्ञा पुं० आश्लेषा नाम का नक्षत्र [को०] ।

औरत
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. स्त्री । महिला । २ जोरू । पत्नी ।

औरना पु †
क्रि० अ० [हिं० और = अधिक+ना (प्रत्य०)] १. आगे की ओर बढ़ना । अग्रसर होना । २. दिखाई पड़ाना । लौकना । सूझना ।

औरभ्र (४)
वि० [सं०] मेष या भेड़ संबंधी । भेड़ का [को०] ।

औरभ्र (२)
संज्ञा पुं० १. भेड़ का मांस । २. ऊन का वस्त्र । कंबल [को०] ।

औरभ्रक
संज्ञा पुं० [सं०] मेष समूह । भेड़ों का झुंड [को०] ।

औरभ्रिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. मेषपाल । गड़ेरिया । २. मेष संबंधी कोई भी कार्य या वस्तु [को०] ।

औरस (१)
संज्ञा पुं० [सं०] स्मृति के अनुसार १२ प्रकार के पुत्रों में सबसे श्रेष्ठ पुत्र । अपनी धर्मपत्नी से उत्पन्न पुत्र ।

औरस (२)
वि० जो अपनी विवाहिता स्त्री सी उत्पन्न हो । जायज । बैध ।

औरसना पु
क्रि० अ० [सं० अव या अप = बुरा+रस+हिं० ना (प्रत्य०)] विरस होना । अनखना । रुष्ट होना । उदासीन होना ।

औरसी
संज्ञा स्त्री० [सं०] विवाहिता स्त्री से उत्पन्न कन्या ।

औरस्य
सं० पु० [सं०] औरस पुत्र ।

औराना पु †
क्रि० स० [सं० आ+वरण, हिं० वरना या हिं० 'ओराना'] अर्जित करना । सीख कर सामाप्त करना । जानना । वरण करना । सीखना । उ०—नैहर महै जिन गुन औरावा । ससुरे जाय सोइ सुख पावा ।—चित्रा०, पृ० २२३ ।

औरासना पु
क्रि० अ० [हिं० औरसना] दे० 'ओरसना' । उ०— खंजन नैन सुरँग रस माते ....बसे कहूँ सोइ बात कही सखि रहे इहाँ केहि नाते । सोइ संज्ञा देखत औरासी विकल उदास कला ते ।—सूर (शब्द०) ।

औरासी पु †
वि० [सं० अप+राशि] १. बुरी या निकृष्ट राशि में पैदा होनेवाला । ३. विचित्र । बेढंगा । विलक्षण । उ०— बिसरो सूर बिरह दुख अपनो अब चली चाल ओरासी ।—सूर (राधा); २८७७ ।

औरेब
संज्ञा पुं० [सं० अव = विरूद्ध+रेख>रेह>रेअ>रेब या फा० उरेब] १. वक्र गति । तिरछी चाल । २. कपड़े की तिरछी काट । ३. पेंच । उलझन । ४. पेंच की बात । चाल की बात । उ०—दीनी है मधुप सबहिं सिख नीकी । हमहूँ कछुक लखी है तब की औरेबै नँदलाल की ।—तुलसी (शब्द०) । ५. किंचित् दोष या त्रुटि । साधारण खरीबी । मुहा०—औरेब सुधारना = उलझन दूर करना । यौ०—औरेबदार = टेढ़ी काटवाला ।

और्णिक
वि० [सं०] ऊर्ण या ऊन से संबंधिन । ऊन से बननेवाला । ऊनी [को०] ।

और्द ध्वदेह
संज्ञा पुं० [सं०] अंत्येष्टि कर्म [को०] ।

और्दद्धदेहिक, और्दद्धदेहिक
वि० [सं०] मरने के पीछे का । अंत्येष्टि । यौ०—औद्ध्र्वदैहिक कर्म = प्रेतक्रिया । दसगात्र, सपिंड दान आदिक कम ।

और्व
संज्ञा पुं० [सं०] १. बड़वानल । २. नोनी मिट्टी का नमक । ३. पौराणिक भूगोल का दक्षिण भाग जहाँ संपूर्ण नरक है और दैत्य रहते हैं । ४. पंच प्रवर मुनियों में से एक । २. भृगुवंशीय ऋषि ।

और्व (२)
वि० १. उरु अर्थात् जाँघ से उत्पन्न । ३. उर्वी अर्थात् पृथिवी संबंधी । ३. और्व ऋषि से संबंद्ध [को०] ।

और्वशेय
संज्ञा पुं० [सं०] १. उर्वशी के पुत्र । २. वशिष्ट ऋषि । ३. अगस्त्य मुनि ।

औलंब पु
संज्ञा पुं० [सं० अवलम्ब] दे० 'अवलंब' । उ०— इसि खोजि बारह मास पिय को हारि भामिनि भौन हीं । धारि रूप जोगिन को रही औलंब करि इन मौन ही ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ५०९ ।

औलंभा पु
संज्ञा पुं० [सं० उपालम्भ] दे० 'औलेभा' । उ०—ऊभी दइ छई औलंभा, करि लागइ अरि मोड़ पूछइ बाँह ।— बी० रासो०, पृ० ९७ ।

औल
संज्ञा पुं० [देश०] जंगली ज्वर ।

औलग (१)पु
संज्ञा स्त्री० [सं० अवलग्न; प्रा० ओलग्ग] सेवा । उ०— औलग करूँ अभंग हरि आगे बिरह बचन निशि वाशा । बाँचूँ विरद न को उर बीजा एक तुम्हारी आशा ।—राम० धर्म०, पृ० १८३ ।

औलग (२)पु †
संज्ञा पुं० [अप० अउलग] प्रवास । दूर गमन ।

औलना †
क्रि० अ० [हिं० अऊलना, उबलना] जलाना । तपना । गर्म होना ।

औला पु
संज्ञा पुं० [सं० उपल] दे० 'ओला' । उ०—सती साझ सिणगार तेल तिरिया इक बारा । औला जल गल मिल्या फेर हौवै नहिं सारा ।—राम० धर्म०, पृ० २४४ ।

औलाद
संज्ञा स्त्री० [अं० वल्द का बहुव०] १. संतान । संतति । २. वंशपरंपरा । नस्ल ।

औलादौला
वि० [देश०] जिसे किसीबात का ध्यान या चिंता न हो । लापरवाह । जैसे, —बाबू बाहब औलादौला आदमी ठहरे, जिस पर प्रसन्न हुए उसे निहाल कर दिया ।

औलामौला
वि० [अ० औल+मौला] मनमौजी ।

औलान
संज्ञा पुं० [सं०] १. अवलंब । आश्रय । सहारा । २. पानी की टंकी या हौज [को०] ।

औलि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० अवलि] दे० 'अवली' । उ०—जाई करी बैठी चौखंड़ि । पेहली बांची उपली औलि ।—बी० रासी, पृ० ९१ ।

औलिया
संज्ञा पुं० [अ० वली का बहुव०] मुसलमान मत के सिद्ध लोग । पहुँचे हुए फकीर । उ०—सुर नर मुनि जन पीर औलिया कोई न पावै पारा ।—कबीर शा०, भा० १, पृ० ६६ ।

औली †
संज्ञा [सं० आवली] वह नया और हरा अन्न जो पहले पहल काटकर खेत से लाया जाय । नवान्न ।

औलूक
संज्ञा पुं० [सं०] उल्लुओं का समूह ।

औलूक्य
संज्ञा पुं० [सं०] कणाद या उलूक ऋषि का नाम जो वैशे— षिक दर्शन के प्रवर्तक हैं । यो०—औलुक्य दर्शन = वैशेषिक दर्शन ।

औलूखल
वि० [सं०] [वि० स्त्री, औलूखली] १. उलूखल या ओखली से संबंधित । २. जो ओखली में कूटा गया हो [को०] ।

औलेखाँ
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'औलेभाई' ।

औलेभाई
संज्ञा पुं० [हिं०] ठगों की बोली का एक शब्द । विशेष—ठग लोग जब किसी को देखकर यह जानना चाहते हैं कि यह ठग है या मुसाफिर, तब वे उससे यदि वह हिंदू हुआ तो 'औले भाई राम राम' और यदि मुसलमान हुआ तो 'औले खाँ सलाम' कहते हैं । यदि उसने ठगों की बोली में ही जवाब दिया तब वे समझ जाते हैं कि यह भी ठग है ।

औलोती पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० ओलती] दे० 'ओलती' । उ०—जुगिया न्याय मरै मरि जाइ । घर जाजरौ वलीडौ टेढ़ौ, औलोती डरराइ ।—कबीर ग्रं०, पृ० ९६ ।

औल्बण्य
संज्ञा पुं० [सं०] अधिकता । प्राबल्य । अतिशयता [को०] ।

औवल (१)
वि० [अ०] १. पहला । प्रथम । २. प्रधान । मुख्य । ३. सर्वश्रेष्ठ । सर्वोत्तम । उ०—सुना है मंजिले औवल की पहली रात भारी है—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ८४८ ।

औवल (२)
संज्ञा पुं० आरंभ । शुरू ।

औवल (३)
क्रि० वि० प्रथमतः । पहले ।

औशि पु
क्रि० वि० [सं० अवश्य] दे० 'अवश्य' ।

औशीर (१)
संज्ञा पुं० [अं०] १. उशीर अर्थात् खस यां तृण की चटाई । २. चँवर या पंखा । ३. खस की जड़ (को०) । ४. खस का लेप (को०) । २. पंखे या चँवर की डाँड़ी (को०) । ६. बैठने का आसन (को०) ।

औशीर (२)
वि० उशीर या खस का बना हुआ अथवा उससे संबंधित ।

औशीरिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अँखुआ । अंकुर । जलाधारा । जल का पात्र [को०] ।

औषण
संज्ञा पुं० [सं०] १. कड़आपन । कड़वाहट । १. काली मिर्च [को०] ।

औषणशौंडी
संज्ञा स्त्री० [सं० औषणशौण्डी] १. सोंठ । २. काली मिर्च [को०] ।

औषद, औषदि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० ओषध, औषधि] दे० 'ओषधि' ।

औषध
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह द्रव्य जिससे रोगनाश हो' रोग दूर करनेवाली वस्तु या दवा । यौ०—औषधालय = चिकित्सालय । औषधसेवन = दवा का सेवन । औषधोपचार = चिकित्सा । दवादारू । २. विष्णु का नाम (को०) । ३. एक खनिज द्रव्य (को०) ।

औषधि, औषधी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'ओषधि, ओषधी' ।

औषधिराई पु
संज्ञा पुं० [हिं० औषधि+राई = राजा] औषधियों के राजा चंद्रमा । एक ओर प्रभु ओषधिराई । अस्ताचल । शिखरन को जाई ।—शकुंतला, पृ० ६५ ।

औषर, औषरक
संज्ञा पुं० [सं० उसरः] छुटिया नोन । खारा नमक रेह का नमक । २. चुंबक पत्थर (को०) ।

औषस
वि० [सं०] ऊषा से संबंधित । ऊषाकालीन [को०] ।

औषसी
संज्ञा स्त्री० [सं०] उषःकाल । भोर । प्रभात [को०] ।

औष्ट्र (१)
वि० [सं०] ऊँट से संबंधित या उत्पन्न [को०] ।

औष्ट्र (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. उँटनी का दूध । २. ऊँट का स्वभाव । ३. भैस का चमड़ा [को०] ।

औष्ट्रक (१)
वि० [सं०] ऊँट संबंधी । ऊँट विषयक [को०] ।

औष्ट्रक (२)
संज्ञा पु० ऊँटों का झुंड । उ०—बैलों के झुंड के लिये औक्षक, ऊँटों के झुंड के लिये औष्ट्रक....प्रचलित थे ।—संपूर्णा० अभि० ग्रं०, पृ० २४८ ।

औष्ट्ररथ
संज्ञा पुं० [सं०] ऊँटगाड़ी [को०] ।

औष्ट्रिक (१)
वि० [सं०] ऊँट से प्राप्त या मिला हुआ, जैसे, दूध [को०] ।

औष्ट्रिक (२)
संज्ञा पुं० तेली [को०] ।

औष्ठ
वि० [सं०] ओंठ के आकार का । ओष्ठाकृति [को०] ।

औष्ठय
वि० [सं०] औंठ से संबंधित ।

औष्ठयवर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'ओष्ठयवर्ण' [को०] ।

औष्ठयस्थान
वि० [सं०] (वर्ण या शब्द) जो ओंठ से उच्चरित हो [को०] ।

औष्टयस्वर
संज्ञा पुं० [सं०] ओष्ट स्थानीय स्वर । वे स्वर जिनका उच्चारण ओठ से हो । उ, ऊ, स्वर (को०) ।

औष्ण
संज्ञा पुं० [सं०] उष्णाता । उष्मा । गर्मी [को०] ।

औष्ण्य
संज्ञा पुं० [सं०] दे० औष्ण' [को०] ।

औष्म्य
संज्ञा पुं० [सं०] गर्मी की स्थिति । ऊष्मा [को०] ।

औस पु
संज्ञा स्त्री० [सं० अवश्याय] दे० 'ओस' । उ०—अरुन उदै लौं तरुनई अँग अँग झ की आइ । छिन छिन तिय तन औस सी मिटत लरकई जाइ ।—स० सप्तक, पृ० ३७० ।

औस (२)
संज्ञा स्त्री० [हि० उमस] दे० 'उमस' ।

औसत
संज्ञा पु० [अ०] १. वह संख्या जो कई स्थानों की भिन्न भिन्न संख्याओं को जोड़ने और उस जोड़ को, जितने स्थान हों उतने से भाग देने पर निकलती हो । बराबर का परता । समष्टि का सम विभाग । सामान्य । जैसे,—एक मनुष्य ने एक दिन १०), दूसरे दिन २०), तीसरे दिन १५) और चौथे दिन ३५), कमाए, तो उसकी रोज की औसत आमदनी २०) हुई । २. माध्यमिक । दरमियानी । साधारण । मामूली । जैसे,—वह औसत दरजे का आदमी है ।

औसतन्
क्रि० वि० [हिं० औसत] सामान्य रूप से । साधारणतः ।

औसना †
क्रि० अ० [हिं० उमस+ना (प्रत्य०)] १. गरमी पड़ना । ऊमस होना । २. देर तक रखी हुई खाने की चीजों में गंध उत्पन्न होना । बासी होकर सड़ना । क्रि० प्र०—जाना । ३. गरमी से व्याकुल होना । क्रि० प्र०—जाना । ४. फल आदि का भूसे आदि में दबकर पकना ।

औसर पु
संज्ञा पुं० दे० १.'अवसर' । उ०—अटक हीण असपती, पाप छित औसर पायौ । रद करबा रज्जियाँ, दुरद जेहौ मद आयौ ।—रा० रू०, पृ० १९ । २. बारी । पारी । उ०— पाँच पति एक नारि औसरे सों मानी है ।—गंग०, पृ० १३१ ।

औसाण पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'औसान' । उ०—दादू जिन प्राण पिंड हमके दिया, अंतर सेवैं ताहि । जै आवै औसाण सिरि, सोई नाव सबाँहि ।—दादू०, पृ० ३६ ।

औसान (१)
संज्ञा पुं० [सं० अवसान] १. अंत । २. परिणाम । उ०— जेहि तन गोकुल नाथ भज्यो । ऊधो हरि बिछुरत ते बिरहिनि सो तनु तबहिं तज्यो ।....अब औसान घटत कहि कैसे मन उपजी परतीति—सूर (शब्द०) ।

औसान (२)पु
संज्ञा पुं० सुधबुध । होशहवास । चेत । धैर्य । प्रत्युत्पन्न- मति । उ०—सुरसरि सुवन रन भूमि आए । बाण वर्षा लागे करन अति क्रोध ह्वै पार्थ औसान तब भुलाए ।—सूर (शब्द०) । मुहा०—औसान उड़ना, औसान खता होना, औसान जाता रहना, औसान भूलना = सुधबुध भूलना । बुद्धि का चकराना । धैर्य न रहना । मतिभ्रम होना । उ०—पूँछ राखी चापि रिसनि- काली काँपि, देखि सब साँप औसान भूले । पूँछ लोनी झटकि, धरनि सों गहि पटकि फूँ कह्यो लटकि करि क्रोध फले ।— सूर (शब्द०) ।

औसाना
क्रि० स० [हिं० औसना] फल या और किसी वस्तु को भूसे आदि में दबाकर पकाना ।

औसाफ
संज्ञा पुं० [अ० औसाफ] खासियत । गुण । विशेषता । उ०—तीन लोक जाके औसाफ । जनका गुनह करै सब माफ ।—मूलक०, पृ० ३ ।

औसि पु
क्रि० वि० [सं० अवश्य] दे० 'अवश्य' ।

औसी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'औली' ।

औसेर पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'अवसेर' । उ०—बन मापक मुरली की टेर । आवति ब्रजवासिनी औसेर ।—घनानंद, पृ० २२८ ।

औहठ †
वि० [हिं०] दे० 'औघट' । उ०—औहठ पटणि ताके दस द्वार ।—प्राण०, पृ० ११ ।

औहठी पु
वि० [सं० अप+हठिन्] बुरे हठवाला । हठी । जिद्दी । उ०—औहठी हठीले हने बदरजहान रिपु कौतुक कों बिबिध बिमान छिति छवै रहे ।—गंग०, पृ० ११६ ।

औहत
संज्ञा स्त्री० [सं० अपघात या अवहन = कुचलना, कूटना] अपमृत्यु । कुगति । दुर्गति । उ०—औहत होय मरौं नहिं झरी । यह सठ मरौ जो नेरहि दूरी ।—जायसी (शब्द०) ।

औहाती पु †
वि० स्त्री० [हिं०] दे० 'अहिवाती' ।