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पिंग (१)
वि० [सं० पिङ्क] १. पीला। पीलापन लिए हुए। २. भुरापन लिए लाल। तामड़ा। दीपशिखा के रंग का। उ०—सित सरोज पर क्रीड़ा करना जैसे मधुमय पिंग पराग।—कामा- यनी, पृ,० २३।३. सुंघनी रंग का। भुरापन लिए पीला। यौ०—पिंगचत्तु। पिंगजट। पिंगलोचन। पिंगात्त। पिंगास्थ।

पिंग (२)
संज्ञा पुं० १. भैसा। २. चुहा। मुसा। ३. हरताल।४. पिंग वर्ण या रंग।

पिंगकपिशा
संज्ञा स्त्री० [सं० पिङ्ककपिशा] गुबरैले के आकार का एक कीड़ा जिसका रंग काला और तामड़ा होता है। तेलपायी। तेलचटा।

पिंगचक्षु (१)
वि० [सं० पिङ्गचक्षुस्] जिसकी आँखें भुरे या तामड़े रंग की हों।

पिंगचक्षु (२)
संज्ञा पुं० १. नक्र नामक जलजंतु। नाक। २. कर्कट। केकड़ा [को०]।

पिंगजट
संज्ञा पुं० [सं० पिङ्गजट] शिव [को०]।

पिंगमूल
संज्ञा पुं० [सं० पिङ्गमूल] गाजर [को०]।

पिंगल (१)
वि० [सं० पिंङ्गल] १. पीला। पीत। २. भुरापन। लिए लाल। दीपशिखा के रंग का तामड़ा। ३. भुरापन लिए पीला। सुंघनी रंग का। ऊदे रंग का।

पिंगल (२)
संज्ञा पुं० १एक प्राचीन मुनि या आचार्य जिन्होने छंदः सुत्र बनाए। ये छंद—शास्त्र के आदि आचार्य माने जाते हैं और इनके ग्रंथ की गणना वेदांगों में है। २. उक्त मुनि का बनाया छंदः- शास्त्र। ३. छंद शास्त्र। ४. साठ संवत्सरों में से ५१ वाँ संवत्सर। ५. एक नाग का नाम। ६. भैरव राग का एक पुत्र अर्थात् एक राग जो सबेरे गाया जाता है। ७. सुर्य का एक पारिपार्श्विक या गण। ८. एक निधि का नाम। ९. बंदर। कपि। १०. अग्नि। ११. नकुल। नेवला। १२. एक यज्ञ का नाम। १३. एक पर्वत का नाम। १४. मार्कडेय पुराण में वर्णित भारत के उत्तर पश्चिम में एक देश। १५. पीतल। १६. हरताल। १७. उल्लु पक्षी। १८. उशोर। खस। १९. रास्ना। २०. एक प्रकार का फनदार साँप। २१. एक प्रकार का स्थावर विष।

पिंगला
संज्ञा स्त्री० [सं० पिङ्गला] १. हठ योग और तंत्र में जो तीन प्रधान नाड़ियाँ मानी गई हैं उनमें से एक। विशेष—दस नाड़ियों में से इला, पिंगला और सुषुम्ना ये तीन प्रधान मानी गी हैं। शरीर के बाँएँ बाग में पिंगला नाड़ी होती है। ये तीनों क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और शिव स्वरुपिणी हैं। तंत्रसार में लिखा है, इला नाड़ी में चंद्र और पिंगला नाड़ी में सुर्य का निवास रहता है। जिस समय पिंगला नाड़ी कार्य करती है उस समय साँस दाहिने नथने से निकलती है। प्रणतोषिणी में बहुत से कार्य गिनाए गए हैं जो यदि पिंगला नाड़ी के कार्यकाल में किए जायँ तो शुभ फल देते हैं—जैसे, कठिन विषयों का पठनपाठन, स्त्रीप्रसंग, नाव पर चढ़ना, सुरापान, शत्रु के नगर ढाना, पशु, बेचना, जुई खेलना, इत्यादि। २. लक्ष्मी का नाम। ३. गोरोचन। ४. शीशम का पेड़। ५. एक चिड़िया। ६. राजनीति। ७. दक्षिण दिग्गज की स्त्री। ८. एक धातु। पीतल (को०)। ९. एक वेश्या का नाम। विशेष—इसकी कथा भागवत में इस प्रकार है। विदेह नगर में पिंगला नाम की एक वेश्या रहती थी। उसने एक दिन एक सुंदर धनिक को जाते देखा। उसके लिये वह बेचैन हो उठी पर वह न आया। रात भर वह उसी की चिंता में पड़ी रही। अंत में उसने विचार किया कि मैं कैसी नासमझ हुँ कि पास में कांत रहते दुर के कांत के लिये मर रही हुँ। इस प्रकार उसे यह ज्ञान हो गया कि आशा ही सारे दुःखों का मुल है। जिन्होंने सब प्रकार की आशा छोड़ दी है वे ही सुखी हैं। उसने भगवान् के चरणों में चित्त लगाया और शांति प्राप्त की। महाभारत में भी जहाँ भीष्म ने युधिष्ठिर को मोक्ष धर्म का उपदेश किया है वहाँ इस पिंगला वेश्या का उदाहरण दिया है। सांख्यसुत्र में भी 'निराशः सुखी पिंगलावत्' आया है।

पिंगलाक्ष
संज्ञा पुं० [सं० पिङ्गलाक्ष] शिव [को०]।

पिंगलौह
संज्ञा पुं० [सं० पिङ्गलौह] पीतल [को०]।

पिंगलिका
संज्ञा स्त्री० [सं० पिङ्गलिका] १. बगला। बलाका। २. एक प्रकार का उल्लु (को०)। ३. मक्खी की जाति का एक कीड़ा जिसके काटने से जलन और सुजन होती है (सुश्रुत)।

पिंगलित
वि० [सं० पिङ्गलित] पिंगल वर्ण का।

पिंगसार
संज्ञा पुं० [सं० पिङ्गसार] हरताल।

पिंगस्फटिक
संज्ञा पुं० [सं० पिङ्गस्फटिक] गोमेदक मणि।

पिंगा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० पिंङ्गगा] १. गोरोचन। २. हींग। ३. हलदी। ४. बंसलोचन। ५. चंडिका देवी। ६. धनुष की डोरी। प्रत्यंचा (को०)। ७. एक रक्तवाहिनी नाड़ी।

पिंगा (२)
संज्ञा पुं० [सं० पङ्गंगु] १. वह पुरुष जिसके पैर टेढ़े हों। २. वह जिसकी आँखों पिंगवर्ण हों। पिंगाक्ष।

पिंगात्त (१)
नि० [सं० पिङ्गगाक्ष] [वि० स्त्री० पिंगाक्षी] जिसकी आँखे भूरी या तामड़े रंग की हों।

पिंगाक्ष (२)
संज्ञा पुं० १. शिवा। २. कुंभौर। नक्र नामक जलजंतु। नाक। ३. बिल्ली। ४. एक कपि। हनुमान। ५. बनमानुस (को०)। ६. कर्कट। केकड़ा (को०)।

पिंगाक्षी
संज्ञा स्त्री० [सं० पिङ्गाक्षी] कुमार की अनुचरी एक मातृका।

पिंगाश
संज्ञा पुं० [सं० पिङ्गाश] १. एक प्रकार की मछली जिसे बंगाल में पांगाश कहते हैं। २. गाँव का मुखिया या चौधरी। ३. चोखा सोना।

पिंगाशी
संज्ञा स्त्री० [सं० पिङ्गारा] नील का पेड़।

पिंगास्य
संज्ञा पुं० [सं० पिङ्गास्य] पिंगाश मछली [को०]।

पिंगिमा
संज्ञा स्त्री० [सं० पिङ्गिमन्] पीला रंग [को०]।

पिंगो
संज्ञा स्त्री० [सं० पिङ्गी] १. शमी का पेड़। २. चुहिया (को०)। ३. कपिंजल नामक पक्षी। उ०—चल्यौ पहु पिंगी निकर— पृ० रा०, २४। २९७।

पिंगूरा
संज्ञा पुं० [हिं० पेंग] रस्सियों के आधार पर टँगा हुआ खटोला जिसपर बच्चों को सुलाकर इधर से उधर झुलाते हैं। झुला। पालना।

पिंगेक्षण
वि० संज्ञा पुं० [सं० पिङ्गक्षणा] दे० 'पिंगाक्ष'।

पिंगेश
संज्ञा पुं० [सं० पिङ्गेश] अग्नि का एक नाम।

पिंघूरा पु
संज्ञा पुं० [हिं० पेंग] पालना। झुला। उ०—भुल न दुध धाइ का पीवै, मा कै चुसै फुलै। सदा मुदित रोवै नहिं कबह़ुँ परया पिंघुरे झुले।—सुंदर० ग्रं०, भा० २, पृ० ८७५।

पिंछ
संज्ञा पुं० [सं० पिञ्च्छ] दे० 'पिच्छ' [को०]।

पिंज (१)
संज्ञा पुं० [सं० पिञ्ज] १. बल। २. बघ। ३. एक प्रकार का कपुर। ४. चंद्रमा (को०)। ५. समुह। संग्रह (को०)।

पिंज (२)
वि० व्याकुल।

पिंजक
संज्ञा पुं० [सं० पिञ्जत] हरताल।

पिंजट
संज्ञा पुं० [सं० पिञ्जट] आँख का मल। कीचड़।

पिंजड़ा
संज्ञा पुं० [सं० पिञ्जर] दे० 'पिंजरा'।

पिंजन
संज्ञा पुं० [सं० पिञ्जन] १. वह धनुष या कमान जिससे धुनिए रुई धुनते हैं। धुनकी। २. रुई आदि धुनना (को०)।

पिंजर (१)
वि० [सं० पिञ्जर] १. पीला। पीतवर्ण का। २. भुरापन लिए लाल रंग का। ३. ललाई या भुरापन लिए पीला। सुँघनिया। ऊदे रंग का।

पिंजर (२)
संज्ञा पुं० १. पिंजड़ा। २. शरीर के भीतर का हड्डियों का ठठ्ठर। ३. तन। शरीर (लाक्ष०)। उ०—दिन दस नाम सम्हारि ले, जब लगि पिंजर साँस।—कबीर सा० सं०, पृ० ७४। ४. हरताल। ५. सोना। ६. नागकेसर। ७. भुरापन लिए लाल रंग का घोड़ा।

पिंजरक
संज्ञा पुं० [सं० पिञ्जरक] हरताल।

पिंजरा
संज्ञा पुं० [सं० पञ्जर] लोहे, बाँस आदि की तीलियों का बना हुआ झाबा जिसमें पक्षी पाले जाते हैं।

पिंजरापोल
संज्ञा पुं० [हिं० पिंजरा + पोल(=फाटक) वह स्थान जहाँ पालने के लिये गाय, बैल आदि चौपाए रखे जाते हैं। पशुशाला। गोशाला।

पिंजरिक
संज्ञा पुं० [सं० पिञ्जरिक] एक प्रकार का बाध [को०]।

पिंजरित
वि० [सं० पिञ्जरित] पीले रंग का। २. बादामी रंग का [को०]।

पिंजरिमा
संज्ञा स्त्री० [सं० पिञ्जरिमन्] ललाई लिए हुए पीला रंग [को०]।

पिंजल (१)
वि० [सं० पिञ्जल] जिसका चेहरा पीला या फीका पड़ गया हो। व्याकुल। घबराया हुआ।

पिंजल (२)
संज्ञा पुं० १. कुश पत्र। २. हरताल। ३. अंबुवेतस्। जलबेंत।

पिंजली
संज्ञा स्त्री० [सं० पिञ्जली] नोक सहित एक एक बीते के एक में बँधे हुए दो कुशों की जुरी जिसका काम श्राद्ध या होम में पड़ता है।

पिंजा
संज्ञा स्त्री० [सं० पिञ्जा] १. हलदी। २. रुई। ३. आघात पहुँचाना (को०)।

पिंजान
संज्ञा पुं० [सं० पिञ्जान] स्वर्ण। सोना।

पिंजारा
संज्ञा पुं० [सं० पिञ्जा+ हिं० आरा (प्रत्य०)] रुई धुननेवाला। धुनिया।

पिंजारी
संज्ञा स्त्री० [देश०] त्रायमाण नाम की ओषधि। गुरबियानी।

पिंजाल
संज्ञा पुं० [सं० पिञ्जाल] स्वर्ण। सोना [को०]।

पिंजिका
संज्ञा स्त्री० [सं० पिञ्जिका] रुई की पोली बत्ती जिससे कातने पर बढ़ बढ़कर सुत निकलते हैं। पुनी।

पिंजियारा
संज्ञा पुं० [सं० पिञ्जिका (रुई की बत्ती)] रुई ओटनेवाला।

पिंजिल
संज्ञा पुं० [सं० पिञ्जिल] रुई की बत्ती।

पिंजुल
संज्ञा पुं० [सं० पिञ्जुलम्] १. घास का गट्ठर। २. दीपक या लालटेन की बत्ती [को०]।

पिंजूल
संज्ञा पुं० [सं० पिञ्जूलम्] [स्त्री० पिंजूली] दे० 'पिंजुल' [को०]।

पिंजूष
संज्ञा पुं० [सं० पिञ्जूष] कान की मैल। खूँट।

पिंजेट
संज्ञा पुं० [सं० पिञ्जेट] नेत्रमल। आँख का कीचड़।

पिंजोता
संज्ञा स्त्री० [सं० पिञ्जोता] पत्तियों की सरस- राहट [को०]।

पिंजोला
संज्ञा स्त्री० [सं० पिञ्जोला] पत्तियों की सरसराहट। पत्तियों के सरसराने की ध्वनि [को०]।

पिंड (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. कोई गोल द्रव्यखंड। गोल मटोल टुकड़ा गोला। २. कोई द्रव्यखंड। ठोस टुकड़ा। ढेला या लोंदा। लुगदा। थुवा। जैसे, मृत्तिकापिंड, लोहपिंड। ३. ढेर। राशि। ४. पके हुए चावल, खीर आदि का हाथ से बाँधा हुआ गोल लोंदा जो श्राद्ध में पितरों को अर्पित किया जाता है। विशेष—पिता, पितामह आदि को पिंडदान देना पुत्रादिकों का प्रधान कर्तव्य माना जाता है। पिंडदान पाकर पित्रों का पुन्नाम नरक से उद्धार होता है। इसी से पुत्र नाम पड़ा। वि० दे० 'श्राद्ध'। यौ०—पिंडदान। सपिंड। ५. भोजन। आहार। जीविका। ६. शरीर। देह। ७. कौर। ग्रास (को०)। ८. भिक्षा। भीख (को०)। ९. मांस (को०)। १०. भ्रुण (को०)। ११. पदार्थ। वस्तु (को०)। १२. घर का कोई एक विशेष भाग (को०)। १३. वृत्त के चतुर्थांश का चौबीसवाँ भाग (को०)। १४. कुभंस्थल (को०)। १५. दरवाजे के सामने का छायादार भाग (को०)। १६. सुगंधित पदार्थ। लोबान (को०)। १७. जोड़। योग (को०)। १८. घनत्व (ज्या०)। १९. शक्ति। बल (को०)। २०. लोहा (को०)। २१. ताजा मक्खन (को०)। २२. सेना (को०)। २३. जल। पानी (को०)। २४. ओड़ पुष्प (को०)। २५. पिंडली (को०)। मुहा०—पिंड छुटना = मुक्त होना। संबंध खतम होना। राहत मिलना। पिंड छोड़ना = साथ न लगा रहना या संबंध न रखना। तंग न करना। पिंड पड़ना = पीछे पड़ना।

पिंड (२)
वि० १. ठोस। २. घना। सघन [को०]।

पिंड (३)
संज्ञा पुं० [सं० पाण्डु] पांडुरोग। पीलिया। यौ०—पिंडरोग = पीलिया। पिंडरोगी। पांडुरोगी।

पिंडकद
संज्ञा पुं० [सं० पिंडकन्द] पिंडालु।

पिंडक
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डक] १. बोल। मुरमक्की। २. शिला- रस। ३. पिंडालु। ४. कवल। ग्रास (को०)। ५. गोला। पिंड (को०)। ६. गाजर (को०)। ७. गीलट (को०)।

पिंडकर
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डकर] मुकर्रर मालगुजारी। स्थिर या नियत कर जैसा आजकल दवामी बंदोबस्तवाले प्रदेशों में है।

पिंडकर्कटी
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्डकर्कटी] विलायती पेठा।

पिंडका
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्डका] मसुरिका रोग। छोटी चेचक।

पिंडखजुर
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्डखर्जुर] एक प्रकार की खजुर जिसके फल मीठे होते हैं। इन फलों का गुड़ भी बनता है। खरक। सेंधी। विशेष दे० 'खजुर'।

पिंडखर्जुर
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डखर्जुर] दे० 'पिंडखजुर' [को०]।

पिंडखर्जुरिका, पिंडखर्जुरी
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्डखर्जुरिका, पिण्ड- खर्जुरी] दे० 'पिंडखर्जुर'।

पिंडगोस
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डगोल] १. गंधरस। २. बोल।

पिंडज
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डज] सब अंगों के बनने पर गर्भ से सजीव निकलनेवाला जंतु, जैसे चमगादर, नेवला, कुत्ता, बिल्ली, बैल, मनुष्य, इत्यादि जो गर्भ से अंडे के रूप में न निकले, बने बनाए शरीर के रूप में निकले। जरायुज।

पिंडत ‡
संज्ञा पुं० [सं० पण्डित] दे० 'पंडित'।

पिंडतैल
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डतैल] शिलारस (को०)।

पिंडतैलक
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डतैलक] शिलारस।

पिंडद
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डद] १. पिंडा देनेवाला। २. भोजन या आहार देनेवाला। २. स्वामी। संरक्षक (को०)।

पिंडदान
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डदान] पितरों को पिंड देने का कर्म जो श्राद्ध में किया जाता है। क्रि० प्र०—करना।—होना।

पिंडन
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डन] १. गोल वस्तुएँ बनाना। पिंड के आकार का बनाना। २. ढीला या किनारा। ३. बाँध [को०]।

पिंडनिर्वपण
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डनिर्वपण] पितरों को पिंडदान देना [को०]।

पिंडपात
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डपात] १. पिंडदान। २. भिक्षादान।

पिंडपातिक
पुं० [सं० पिण्डपातिक] वह जो क्षिक्षा से जीवन- निर्वाह करे। भिक्षोपजीवी [को०]।

पिंडपाद, पिंडपाद्य
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डपाद, पिण्डपाद्य] हाथी।

पिंडपुष्प
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डपुष्प] १. अशोक का फुल। २. जपा पुष्प। अड़हुल। देवी फुल। ३. तगर का फुल। ४. अशोक वृक्ष (को०)। ५. पद्म पुष्प। कमल [को०]।

पिंडपुष्पक
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डपुष्पक] बथुआ का शाक।

पिंडफल
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डफल] कद्दु।

पिंडफला
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्डफला] कड़ई तुँबी। कड़ुआ घीआ। तितलौकी।

पिंडवीजक
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डबीजक] कनेर का पेड़।

पिंडभाक् (१)
वि० [सं० पिण्डभाग] पिंडभाग प्राप्त करनेवाला।

पिंडभाक् (२)
संज्ञा पुं० पितर जो पिंडभाग को प्राप्त करने के अधिकारी हैं [को०]।

पिंडभृति
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्डभृति] जीवित रहने का साधन। आजीविका [को०]।

पिंडमुस्ता
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्डमुस्ता] नागरमोथा।

पिंडमूल
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डमूल] १. गाजर। २. शलजम।

पिंडमूलक
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डमूलक] गाजर [को०]।

पिंडयज्ञ
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डयज्ञ] पितरों को पिंडदान करने का कृत्य। पिंडदान [को०]।

पिंडरक
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डरक] पुल। सेतु [को०]।

पिंडरिका
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्डरिका] १. मजीठ। २. चौलाई का शाक।

पिंडरी पु †
संज्ञा पुं० [सं० पिण्ड] दे० 'पिंडली'।

पिंडरोग
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डरोग] १. रोग जो शरीर में घर किए हो। २. कोढ़।

पिंडरोगी
वि० [सं० पिण्डरोगी] रुग्ण शरीर का।

पिंडल
संज्ञा पुं० [सं०] आने जाने के लिये नदी या नाले पर बना हुआ मार्ग। पुल [को०]।

पिंडली
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्ड] टाँग का ऊपरी पिछला भाग जो मांसल होता है। घुटने के पीछे के गड्ढे से नीचे का भाग जिसमें चढ़ाव उतार होता है। मुहा०—पिंडली हिलना = पैर थर्राना। भय से कँपकँपी होना।

पिंडलेप
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डलेप] पिंडदान में पिंड का एक विशेष भाग जो वृद्ध पितामह आदि तीन पुरखों को दिया जाता है।

पिंडलोप
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डलोप] १. पिंड देनेवाले वंशजों का क्षय। निर्वश। २. पिंडदान का कृत्य न होना (को०)।

पिंडवाही
संज्ञा स्त्री० [?] एक प्रकार का कपड़ा।

पिंडवेणु
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डवेणु] एक प्रकार का बाँस (को०)।

पिंडशर्करा
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्डशर्करा] जुआर की बनी शक्कर। यवनाल की चीनी [को०]।

पिंडसंबंध
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डसम्बन्ध] मृत व्यक्ति से जीवित व्यक्ति का ऐसा संबंघ जिसके आधार पर जीवित व्यक्ति मृत व्यक्ति को पिंडदान करने का अधिकारी हो सके [को०]।

पिंडस
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डस] भिक्षा द्वारा निर्वाह करनेवाला।

पिंडस्थ
वि० [सं० पिण्डस्थ] मिला हुआ। मिश्रित। ढेर में मिश्रित [को०]।

पिंडस्वेद
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डस्वेद] गरम पुल्टिस [को०]।

पिंडा (१)
संज्ञा पुं० [सं० पिण्ड] [स्त्री० अल्पा० पिंडी] १. ठोस या गीली वस्तु का टुकड़ा। २. गोल मटोल टुकड़ा। ढेला या लोंदा। लुगदा। जैसे, आटे का पिंडा, तंबाकु या मिट्टी का पिंडा। ३. मधु, तिल मिली हुई खीर आदि का गोल लोंदा जो श्राद्ध में पितरों को अर्पित किया जाता है। क्रि० प्र०—देना। यौ०—पिंडा पानी। मुहा०—पिंडापानी देना=श्राद्ध और तर्पण करना। पिंडा पारना = पिंडदान करना। उ०—पारे पिंड मीन ले खाई। कहैं कबीर लोग बौराई।—कबीर श०, बा० १, पृ० १२। ४. शरीर। देह। तन। जिस्म। मुहा०—पिंडा फीका होना=जी अच्छा न होना। तबीयत खराब होना। पिंडा धोना = स्नान करना। नहाना। ५. स्त्रियों की गुप्तेद्रिय। धरन।

पिंडा (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्ड] १. एक प्रकार की कस्तुरी। २. वंशपत्री। ३. इसपात। ४. हलदी।

पिंडा (३)
संज्ञा पुं० [देश०] करघे में पीछे को ओर लगी हुई एक खुँटी। वि० दे० 'महतवान'।

पिंडाकार
वि० [सं० पिण्डाकार] गोल बँधे हुए लोंदे के आकार का। गोल।

पिंडात
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डात] शिलारस।

पिंडान्वाहार्यक
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डान्वाहार्य्यक] एक श्राद्ध जो पितृपिंड के उपरांत होता हैं।

पिंडापा
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्डापा] नाड़ी हिंगु।

पिंडाभ
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डाभ] सिह्लक। लोबान [को०]।

पिंडाभ्र
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डाभ्र] ओला। बनौरी। वर्षोपल [को०]।

पिंडायस
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डायस] इसपात।

पिंडार
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डार] १. एक प्रकार का फल। शाक। पिंडारा। २. क्षपणक। ३. गोप। ४. भैंस का चरवाहा। ५. विक्रंकत वृक्ष। ६. अकथ्य का कथन। जुगुप्सासुचक शब्द० (को०)।

पिंडारक
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डारक] १. एक नाग का नाम। २. वसुदेव और रोहिणी के एक पुत्र का नाम। ३. एक पवित्र नद का नाम। ४. एक प्राचीन तीर्थ जो गुजरात में समुद्रतट से कोस भर पर है। इसका उल्लेख महाभारत, स्कंदपुराण और लिंगपुराम में है। कहा जाता है, इस तीर्थ में स्नान करके पांडव गोहत्या से छुटे थे।

पिंडारा (१)
संज्ञा पुं० [सं० पिंण्डार] एक शाक जो वैद्यक में शीतल और पित्तनाशक माना गया है।

पिंडारा (२)
संज्ञा पुं० दक्षिण की एक जाति जो बहुत दिनों तक मध्य प्रदेश तथा और और स्थानों में लुटपाट किया करती थी। दे० 'पिंडारी'।

पिंडारी
संज्ञा पुं० [देश०] दक्षिण की एक जाति जो पहले कर्णाट, महाराष्ट्र आदि में बसती थी, और खेती करती थी, पीछे अवसर पाकर लुट मार करने लगी और मुसलमान हो गई। विशेष—मुसलमानों से पिंडारियों में यह भेद है कि ये गोमांस नहीं खाते और देवताओं की पुजा और व्रत उपवास आदि करते हैं। पिंडारी लोग बहुत दिनों तक मरहटों की सेवा में थे और लुट पाट में उनका साथ देते थे, यहाँ तक कि पानीपत की लड़ाई में मरहठों की सेना में उनके दो सरदार अठारह हजार सवारों के साथ थे। पीछे मध्यप्रदेश में बसकर पिंडारी चारों ओर घोर लुटाट करने लगे और प्रजा इनके अत्याचारों से तंग आ गई। जब सन् १८०० के पीछे ये अँगरेजी राज्य में भी उपद्रव करने लगे, तब लार्ड हेस्टिंग्ज ने सेनाएं भेजकर इनका दमन किया।

पिंडालक्तक
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डालक्तक] महावर [को०]।

पिंडालु, पिंडालुक
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डालु, पिण्डालुक] दे० 'पिंडालु' [को०]।

पिंडालू
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्ड+ आलु] १. एक प्रकार का कंद या सकरकंद जिसके ऊपर कड़े कड़े सुत से होते हैं। यह खाने में भी मीठा होता है और उबालकर खाया जाता है। सुथनी। पिंडिया। २. एक प्रकार का शफतालु या रतालु।

पिंडाश
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डाश] भिक्षुक। भीखारी [को०]। पर्या०—पिंडपातिक। पिंडस। पिडाशक। पिंडाशन। पिंडाशी।

पिंडशी
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डाशिन्] [स्त्री० पिंडाशिनी] भिखारी [को०]।

पिंडाह्वा
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्डाह्वा] नाड़ी हिंगु।

पिंडि
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्डिः] पिंडी [को०]।

पिंडिका
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्डिका ] १. छोटा पिंड़। पिंडी़। छोटा गोलमटोल टुकड़ा। २. छोटा ढेला या लोंदा। लुगदी। ३. पहिए के बीच का वह गोल भाग जिसमें धुरी पहनाई रहती है। चक्रनाभि। ४. पिंड़ली। ५. श्वेताम्लिका। इमली। ६. वह पिंडी जिसपर देवमुर्ति स्थापित की जाती है। वेदी।

पिंडित (१)
वि० [सं० पिण्डित ] १. पिंड के रुप में बँधा हुआ। दबाकर घनीभुत किया हुआ। २. पिंडी के रुप में लपेटा हुआ। संहत। ३. गणित। गिना हुआ (को०)। ४. परस्पर मीलित। मिला हुआ (को०)। ५. गुणित। गुणा किया हुआ।

पिंडित (२)
संज्ञा पुं० १. शिलारस। २. काँसा। ३. गणित।

पिंडितद्रुम
वि० [सं० पिण्डितद्रुम ] तृणों से भरा हुआ [को०]।

पिंडितार्थ
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डितार्थ ] सारांश [को०]।

पिंडिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्डिनी ] अपराजिता लता।

पिंडिया
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्डिका ] १. गीली भुरभुरी वस्तु का मुट्ठी से बँधा हुआ लंबोतरा टुकड़ा। लंबोतरी पिंडी। जैसे, मिठाई की पिंड़िया, अचार की पिंड़िया। क्रि० प्र०—बाँधना। २. गुड़ की लंबोतरी भेली। मुट्ठी। ३. लपेटे हुए सुत, सुतली या रस्सी का छोटा गोला। क्रि० प्र०—करना।—बनाना।

पिंडिल (१)
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डिल ] १. सेतु। २. गणक।

पिंडिल (२)
वि० १. गणना करने में दक्ष। २. जिसकी पिंडलियाँ बड़ी हों [को०]।

पिंडिला
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्डिला ] ककड़ी।

पिंडी
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्डिन् ] १. ठोस या गीली वस्तु का छोटा गोल मटोल टुकटा। छोटा डेला या लोंदा। लुगदी। जैसे, आटे की पिंडी, तंबाकु की पिंडी। क्रि० प्र०—बाँधना। २. गीली या भुरभुरी वस्तु का मुट्ठी में दबाकर बाँधा हुआ लंबोतरा टुकड़ा। जैसे, खाँड़ की पिंडी, गुड़ की पिंडी। ३. चक्रनेभि। पिंडिका। ४. घीया। कद्दु। लौकी। ५. पिंड खजुर। ६. एक प्रकार का तगर फुल। हजारा तगर। ७. वेदी जिसपर बलिदान किया जाता है। ८. पीठ। पीढ़ा। (को०)। ९. पिंडली (को०)। १०. गृह। घर। मकान (को०)। ११. कसकर लपेटे हुए सुत, रस्सी आदि का गोल लच्छा। क्रि० प्र०—करना।

पिंडीकरण
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डीकरण ] पिंड का रुप देना। पिंड बनाना [को०]।

पिंडीतक
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डीतक ] १. मदन वृक्ष। मैनफल। २. पिंडी तगर। हजारा तगर।

पिंडीपुष्प
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डीपुष्प ] अशोक वृक्ष।

पिंडीभवन
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डीभवन ] पिंड के आकार का होना। पिंडाकार होना [को०]।

पिंडीर (१)
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डीर ] १. अनार। २. समु्द्रफेन।

पिंडीर (२)
वि० शुष्क। नीरस [को०]।

पिंडोशुर
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डीशूर ] १. घर ही में बैठे बैठे बहादुरी दिखलानेबाला। बाहर आकर कुछ न कर सकनेवाला। २. खाने में बहादुर। पेटु।

पिंडुर पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पिंडली'।

पिंडुरी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पिंडली'। उ०—पिंडुरी काँपत अंग थहरत लहरि कच मुख पास। तन स्वेद कन जलकत रहत कोउ चाहि मंद बतास। —भारतेंदु ग्रं०, भा०२, पृ० ११८।

पिंडुली पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पिंडली'।

पिंडुक
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पंडुक'। उ०—रोवत मिलि पिंडुक सँग ता के घाव लखात। —भारतेंदु ग्रं० भा०१, पृ० २२१।

पिंडोदकक्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्डोदकक्रिया ] पिंडदान की क्रिया और तर्पण।

पिंडोद्धरण
संज्ञा पुं० [सं० पिण्डोद्धरण ] पिंडदान में भाग लेना [को०]।

पिंडोपजीवी
वि० [सं० पिण्डोपजीविन् ] दूसरों के दिए हुए टुकड़ों पर जीवित रहनेवाला। दुसरों के द्धारा पोषण प्राप्त करनेवाला [को०]।

पिंडोल
संज्ञा स्त्री० [सं० पाण्डु ] पीली मिट्टी। पोतनी मिट्टी।

पिंडोलि (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्डोलि ] थाली या पत्तल पर का अन्न जो खाने से बचा हो।

पिंडोलि (२)
संज्ञा पुं० [?] ऊँट।

पिंडोलिका
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्डोलिका ] दे० 'पिंडोलि' [को०]।

पिंघना पु †
क्रि० स० [सं० परिधारण ] दे० 'पहनना'। उ०—तान्हि बैश्याहि करो सुखसार मंडंते अलक तिलका पत्रावली खंडंते दिव्यांबर पिंधंते। —कीर्ति०, पृ० ३४।

पिंम ‡
संज्ञा पुं० [सं० प्रेमन्, प्रा० पेम्म, पेम, पिम्म ] दे० 'प्रेम'। उ०—भर भोर अभय भय सील नील। सरसात पिंम रस पिंम चील। —पृ० रा०, २।९७।

पिंशन
संज्ञा स्त्री० [अं० पेनशन ] दे० 'पेनशन'।

पिँगला
संज्ञा स्त्री० [सं० पिङ्गला ] दे० 'पिंगला'।

पिँजड़ा, पिँजरा
संज्ञा पुं० [सं० पिञ्जरा ] १. लोहे, बाँस आदि की तीलियों का बना झाबा जिसमें पक्षी पालते हैं। २. बहुत छोटी जगह (लाक्ष०)।

पिँझरापोल
संज्ञा पुं० [हिं०] पशुशाला। गोशाला।

पिँजारा
संज्ञा पुं० [सं० पिञ्जा (=रुई) ] रुई घुननेवाला। घुनिया। उ०—धमाधम्म मत्ती, महो माहि धानों। पिंजारे सतं रुव पीजंत मानो। —पृ० रा०, २५। ४५०।

पिँजियारा
संज्ञा पुं० [सं० पिञ्जिका ] रुई ओटनेवाला।

पिँड़की
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पंड़ुकी'।

पिँड़री, पिँड़ली
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्ड] दे० 'पिंडली'।

पिँड़वाही
संज्ञा स्त्री० [?] एक प्रकार का वस्त्र। उ०—पठवहिं चीर आनि सब छोनी। सारी कंचुकि पहिरि पटोरी। फुंदिया और कँसिया राती। छायल पिंडवाही गुजराती। —जायसी (शब्द०)।

पिँड़िया
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्डिका] दे० 'पिंडिया'। क्रि० प्र०—करना। —बनाना। —बाँधना।

पिँहकारना †
क्रि० अ० [अनु०] कोयल, पपीहा, मयुर आदि सुंदर कंठवाले पक्षियों का बोलना। पिहकना। उ०—पपीहे भी ऋषभ स्वर के साथ पिंहकारने लगे। —प्रेमघन०, भा०२, पृ० १४।

पिअ (१)
वि० [सं० प्रिय] दे० 'प्रिय'।

पिअ (२)
संज्ञा पुं० दे० 'पिय'।

पिअना †
क्रि० स० [हिं० पीना] दे० 'पीना'। उ०—पिअत नयन पुट रुप पियुषा। मृदित सु असन पाइ जिमि भुखा। — मानस, २।१११।

पिअर ‡
वि० [सं० पीत] दे० 'पीला'। उ०—(क) पिअर उपरना काखा सोती। —मानस, १।३२७। (ख) परिहँस पिअर भए तेहिं बासा। —जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० १९७।

पिअरवा ‡ (१);
वि० [हिं०] दे० 'प्यारा'।

पिअरवा (२)
संज्ञा पुं० दे० 'पति'।

पिअरवा † (३)
संज्ञा स्त्री० [पिअरा (=पिला) ] बरतन बनाने की पीली रंग की मिट्टी (कुम्हार)।

पिअराई पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० पीत, हिं० पिअर+ आई (प्रत्य०) ] पीलापन।

पिअरिया † (१)
संज्ञा पुं० [पिअर (=पीला)+ इया (प्रत्य०) ] पीले रंग का बैल जो बहुत मजबुत और तेज चलनेवाला होता है।

पियरिया (२)
संज्ञा स्त्री० दे० 'पिअरी' (१)।

पिअरी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० पीली ] १. हल्दी के रंग में रँगी हुई वह धोती जो विवाह के समय में वर या वधु को पहनाई जाती है। २. इसी प्रकार पीली रँगी हुई वह धोती जो प्रायः देहाती स्त्रियाँ गंगा जी को चढ़ाती हैं। क्रि० प्र०—चढ़ाना।

पिअरी (२)
वि० स्त्री० दे० 'पीला'। उ०—पिअरी झीनी झँगुली साँवरे शरीर खुली बालक दामिनी ओढ़ी मानो बारे बारिधर।—तुलसी (शब्द०)।

पिआज
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'प्याज'।

पिआन पु †
संज्ञा पुं० [सं० प्रयाण] दे० 'पयान'। उ०—जल ते निकसि जलि किआ पिआना। —प्राण०, पृ० ४४।

पिआना
क्रि० स० [हिं०] दे० 'पिलाना'।

पिआनो
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पियानो'।

पिआर †
संज्ञा पुं० [हिं० अप, पिअ> पिय+ड़ा] दे० 'प्यार'।

पिआरा †
वि० [हिं० अप, पिअ> पिय+ड़ा, हिं० प्यारा ] दे० 'प्यारा'। उ०—बचन बज्र जेहि सदा पिआरा। सहस नयन परदोष निहारा। —मानस, १।४।

पिआस †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'प्यास'।

पिआसा †
वि० [हिं०] दे० 'प्यासा'। उ०—चात्रिक होहु पुकारु पिआसा। —जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० २७७।

पिउ
संज्ञा पुं० [सं० प्रिय] पति। खाविद।

पिउनी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पुनी'।

पिउष, पिऊख पु
संज्ञा पुं० [सं० पीयुष, प्रा० पीऊस] दे० 'पियुष'। उ०—(क) मृग मद मयुष जनु पिउष पान। —पृ० रा०, ६।३७। (ख) नाय पिऊखन अमृत चाखै। —दरिया०, पृ०, ६१।

पिक
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० पिकी] कोयल। कोकिल। यौ०—पिकबंधुर। पिकवल्लभ। विशेष—मीमांसा के भाष्यकार शवर स्वामी ने पिक, तामरस, नेम आदि कुछ शब्दों को म्लेच्छ भाषा से गृहीत बतलाया है।

पिकप्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] बड़ा जामुन।

पिकबंधु
संज्ञा पुं० [सं० पिकबन्धु] आम का पेड़।

पिकबंधुर
संज्ञा पुं० [सं० पिकबन्धुर] आम का पेड़।

पिकबयनी पु
[सं० पिक+ बचन, प्रा० वयण, हिं० बैन+ई (प्रत्य०) ] कोयल की तरह मीठा बोलनेवाली। मधुभाषिणी। उ०—किसी पिकबयनी की आवाज आकर कान में पड़े तो पुरा आनंद मिले। —श्रीनिवास ग्रं०, पृ० २५३।

पिकबांधव
संज्ञा पुं० [सं० पिकबान्धव ] वसंत ऋतु [को०]।

पिकबेंनी
वि० [हिं०] दे० 'पिकबयनी'। उ०—रानै मृगनैनी पिकबेंनी छाबिरेनी बोरी लचकत लंक छीन कटि सोभा भार है। —पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ३८७।

पिकबैनी
वि० [हिं०] दे० 'पिकबयनी'। उ०—मनसहु अगम समुझि यह अवसरु कत सकुचति पिकबैनी। —तुलसी ग्रं०, पृ० ३१०।

पिकराग
संज्ञा पुं० [सं०] आम का पेड़।

पिकवल्लभ
संज्ञा पुं० [सं०] आम का पेड़।

पिकांग
संज्ञा पुं० [सं० पिकाङ्ग ] चातक पक्षी।

पिकाक्ष (१)
संज्ञा पुं० [सं०] ताल मखाना।

पिकाक्ष (२)
वि० जिसकी आँखें कोयल के समान हों [को०]।

पिकानंद
संज्ञा पुं० [सं० पिकानन्द] वसंत ऋतु।

पिकी
संज्ञा स्त्री० [सं०] कोयल।

पिकेक्षणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] ताल मखाना।

पिकेट
संज्ञा पुं० [अं०] १. पलटनियों का पहरा जो कहीं उपद्रव होने या उसकी आशंका होने पर उसे रोकने के लिये बैठाया जाता है। २. किसी काम को रोकने के लिये दिया जाने- बाला पहरा। धरना।

पिकेटिंग
संज्ञा स्त्री० [अं०] किसी बात को रोकने के लिये पहरा देना। धरना। जैसे,—स्वयंसेवक विदेशी वस्त्र की दुकानों के सामने पिकेटिंग कर रहे थे; इससे कोई ग्राहक नहीं आया।

पिक्क
संज्ञा पुं० [सं०] १. बीस बरस की आयु का हाथी। २. हाथी का बच्चा [को०]।

पिक्खना पु
क्रि० स० [सं० प्रेत्तण, प्रा० पेक्खण, पिक्खण] दे० 'पेखना'। उ०—वोटा अनेक वरनु किते, पंचसिखा पिक्खिय प्रगट। —ह० रासो, पृ० १०।

पिक्चर
संज्ञा स्त्री० [अं०] १. चित्र। तस्वीर। २. सिनेमा।

पिगलना †
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'पिघलना'। उ०—सुखबासीलाल (सरोजनी से) जल्हदी अपने सफरदाइयों को बुला। (मन में) आखिरकार पिगले, कहिए अब इनकी वो तेजी कहाँ है। —श्रीनिवास ग्रं०, पृ० ५०।

पिघरना पु
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'पिघलना'। उ०—पिघरि चल्यो नवनीत मीत नवतीत सद्दस हिय। —नंद ग्रं०, ११।

पिघलना
क्रि० अ० [सं० प्र+ गलन] १. ताप के कारण किसी घन पदार्थ का द्रव रुप में होना। गरमी से किसी चीज का गलकर पानी सा हो जाना। द्रवीभुत होना। जैसे, मोम पिघलना, रागा पिघलना, घी पिघलना। २. चित्त में दया उत्पन्न होना। किसी की दशा पर करुणा उत्पन्न होना। पसीजना। जैसे,—महीनों तक प्रार्थना करने पर अब वे कुछ पिघले हैं।

पिघलाना
क्रि० स० [हिं० पिघलना का प्रे० रुप] १. किसी कड़े पदार्थ को गरमी पहुँचाकर द्रव रुप में लाना। किसी चीज को गरमी पहुँचाकर पानी के रुप में लाना। २. किसी के मन में दया उत्पन्न करना। दयार्द्र करना।

पिचंड
संज्ञा पुं० [सं० पिचण्ड] १. उदर। पेट। २. जानवर का कोई अंग [को०]।

पिचंडक
वि० [सं० पिचरण्डक] औदरिक। पेटु [को०]।

पिचंडिक, पिचंडिल
वि० [सं० पिचण्डिक, पिचण्डिल] १. बड़े पेटवाला। तुँदियल। २. मोटा। स्थुलकाय [को०]।

पिच
संज्ञा स्त्री० [अनु०] दे० 'पीक'।

पिचक †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पिचकारी'।

पिचकना
क्रि० अ० [सं० पिच्च (=दबना)] किसी फुले या उभरे हुए तल का दब जाना। जैसे, पिचकना, गिरने के कारण लोटे का पिचकाना।

पिचकवाना
क्रि० स० [हिं० पिचकना का प्रे० रुप] पिचकाने का काम दुसरे से कराना। किसी दुसरे को पिचकाने में प्रवृत्त करना।

पिचका (१)
संज्ञा पुं० [हिं० पिचकना] बड़ी पिचकारी।

पिचका (२)
संज्ञा पुं० दे० 'पिचुकिया'।

पिचकाई पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पिचकारी'। उ०—(क) कंचन की पिचकाइयाँ मारत हैं तकि दुरि। —छीत०, पृ०२३। (ख) पहिरै बसन विविध रँग भुषन, करन कनक पिचकाई। —नंद० ग्रं०, पृ० ३८१।

पिचकाना
क्रि० स० [हिं० पिचकना का प्रे० रुप] फुले या उभरे हुए तल को भीतर की ओर दबाना।

पिचकारी
संज्ञा स्त्री० [हिं० पिचकना] एक प्रकार का नलदार यंत्र जिसका व्यवहार जल या किसी दुसरे तरल पदार्थ को (नल में) खींचकर जोर से किसी ओर फेंकने में होता है। विशेष—पिचकारी साधारणतः बाँस, शीशे, लोहे, पीतल टीन आदि पदार्थों की बनाई जाती है। इसमें एक लंबा खोखला नल होता है जिसमें एक ओर बहुत महीन छेद होता है और दुसरी ओर का मुँह खुला रहता है। इस नल में एक डाट लगा दी जाती है जिसके ऊपर उसे आगे पीछे हटाने या बढ़ाने के लिये दस्ते समेत कोई छड़ लगी रहती है। जब पिचकारी का बारीक छेदवाला सिरा पानी अथवा किसी दुसरे तरल पदार्थ में रखकर दस्ते की सहायता से भीतरवाली डाट को ऊपर की ओर खींचते हैं तब नीचे के बारीक छेद में से तरल पदार्थ उस नल में भर जाता है और जब पीछे से उस डाट को दबाते हैं तब नल में भरा हुआ तरल पदार्थ जोर से निकलकर कुछ दुरी पर जा गिरता है। साधारणतः इसका प्रयोग होलियों में रंग अथवा महफिलों में गुलाब जल आदि छोड़ने के लिये होता है परंतु आजकल मकान आदि धोने और आग बुझाने के लिये बड़ी बड़ी पिचकारियों और जख्म आदि धोने के लिये छोटी पिचकारियों का भी उपयोग होने लगा है। इसके अतिरिक्त इधर एक ऐसी पिचकारी चली है जिसके आगे एक छेददार सुई लगी होती है। इस पिचकारी की सुई की शरीर के किसी अंग में जरा सा चुभाकर अनेक रोगों की औषधों का रक्त या मांसपेशी में प्रवेश भी कराया जाता है। क्रि० प्र०—चलाना। —छोड़ना। —देना। —मारना।—लगाना। मुहा०—पिचकारी छुटना या निकलना = किसी स्थान से किसी तरल पदार्थ का बहुत वेग से बाहर निकलना। जैसे, सिर से लहु की पिचकारी छुटना। पिचकारी छोड़ना = किसी तरल पदार्थ को वेग से पिचकारी की भाँति बाहर निकलना। जैसे, पान खाकर पीक की पिचकारी छोड़ना।

पिचकी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० पिचकग] दे० 'पिचकारी'।

पिचपिच
संज्ञा पुं० [अनु०] दे० 'चिपचिप'।

पिचपिचा
वि० [हिं०] दे० 'चिपचिपा'।

पिचपिचाना
क्रि० अ० [अनु०] घाव या किसी और चीज में से बराबर थोड़ा थोड़ा पदार्थ रसना। पानी निकलना।

पिचपिचाहट
संज्ञा स्त्री० [हिं० पिचपिचाना] गीले या आर्द्र रहने का भाव। पिचपिचाने का भाव।

पिचरकी पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पिचकारी'। उ०—भरि सुमति पिचरकी अपनै हाथ, हम भरिहैं तुमहिं त्रिलोकनाथ।—सुंदर ग्रं० भा०२, पृ० ९०२।

पिचरिया †
संज्ञा स्त्री० [हिं० पिचलना] एक प्रकार का छोटा कोल्हु जिसकी कोठी छोटी होती है।

पिचलना †
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'कुचलना'।

पिचवय †
संज्ञा पुं० [?] वटवृक्ष। (डिं०)।

पिचव्य
संज्ञा पुं० [सं०] कपास का पौधा [को०]।

पिचाश, पिचास †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पिशाच'।

पिचिंड
वि० [सं० पिचिण्ड] १ उदर। पेट। २ पशु का कोई अंग [को०]।

पिचिंडक
वि० [सं० पिचिण्डिक] पेटु। औदरिक [को०]।

पिचिंडिका
संज्ञा स्त्री० [सं० पिचिण्डिका] पिंडली।

पिंचिंडी
वि० [सं० पिचिण्डिन्] तोंदिल। तुंदिल [को०]।

पिचीस
वि० [हिं०] दे० 'पचीस'। उ०—पाँचों यार पिचीसों बस कर इनमें चहै कोई होय। —कबीर श०, भा०१, पृ० ६७।

पिचु
संज्ञा पुं० [सं०] १. रुई। २. एक प्रकार का कोढ़। कोढ़ का एक भेद। ३. एक तौल जो दो तोले के बराबर होती है। ४. एक अन्न (को०)। ५. एक असुर का नाम।

पिचुक
संज्ञा स्त्री० [सं०] मैनफल का वृक्ष।

पिचुकारी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पिचकारी'। उ०—पाप पुन्य दोउ ले पिचुकारी छोड़त हैं बारी बारी। —चरण० बानी, पृ० ७०।

पिचुकिया
संज्ञा स्त्री० [हिं० पिचकी] १. छोटी पिचकारी। २. वह गुझिया (कवा) जिसमें केवल गुड़ और सोंठ भरी जाती है। विशेष—यह एक प्रकार का पकवान है जो होली आदि के विशिष्ट अवसरों पर बनता है।

पिचुक्का
संज्ञा पुं० [हिं० पिचकना] १. पिचकारी। २. गोलगप्पा।

पिचुतुल
संज्ञा पुं० [सं०] कपास की रुई। रुई [को०]।

पिचुमंद
संज्ञा पुं० [सं० पिचुमन्द] नीम का पेड़ [को०]।

पिचुमर्द
संज्ञा पुं० [सं०] नीम का पेड़।

पिचुल
संज्ञा पुं० [सं०] १. झाऊ का पेड़ (ड़िं०)। २. समुद्रफल। ३. रुई। ४. गोताखोर। ५. जलकाक। जलवायस [को०]।

पिचु
संज्ञा पुं० [देश०] १६. माशे को तौल। कर्ण। पर्या०—अत्त। तिंदुक। विडाल। परडक। सुवर्ण। हंसपद। उदुंबर।

पिचुका
संज्ञा पुं० [हिं० पिचकना] दे० 'पिचुक्का'।

पिचोतरसो
संज्ञा पुं० [सं० पञ्चोत्तरशत] एक सौ पाँच की संख्या। सौ और पाँच (पहाड़ा)।

पिच्चट (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वैद्यक के अनुसार आँख का एक रोग। २. सीसा। राँगा।

पिच्चट (२)
वि० दबाकर निचोड़ या चिपटा किया हुआ [को०]।

पिच्चा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सोलह मोतियों की माला जिसका वजन एक धरन (मोतियों की एक तौल) हो [को०]।

पिच्चिट
संज्ञा पुं० [सं०] एक विषैला कीड़ा [को०]।

पिच्चित (१)
वि० [सं० पिच्च (= दबना, पिचकना)] पिचका हुआ। दबा हुआ। जो दबकर चिपटा हो गया हो।

पिच्चित (२)
संज्ञा पुं० १. वह वस्तु जो दबकर पिचक गई हो या चिपटी हो गई हो। २. सुश्रुत के अनुसार एक प्रकार का घाव या क्षत। विशेष—यह शरीर के किसी भाग पर किसी भारी वस्तु की चोट लगने अथवा दाब पड़ने के कारण होता है। जो स्थान दबता है वह फैलकर चिपटा हो जाता है और प्रायः उस स्थान की हड्डी की भी यही दशा होती है, त्वचा कट जाती है और कटा हुआ बाग रुधिर और मज्जा से चिपचिपा बना रहता है।

पिच्ची
वि० [हिं०] दे० 'पिच्चित'।

पिच्छ
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी पशु की पुँछ। ऐसी पुँछ जिसपर बाल हों। लांगुल। २. मोर की पुँछ। मयुरपुच्छ। ३. मोर की चोटी। चुड़ा़। ४. मोचरस। ५. पंख। डैना (को०)। ६. वाण का पंख (को०)। ७. दुम या पुँछ के पंख। जैसे, मोर का (को०)।

पिच्छक
संज्ञा पुं० [सं०] १. लांगुल। पुँछ। २. मोचरस।

पिच्छतिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] शीशम। शिंशिपा।

पिच्छिन
संज्ञा पुं० [सं०] किसी वस्तु को अत्यंत दबाना। दबाकर चिपटा करने की क्रिया। अत्यंत पीड़न।

पिच्छपाद
संज्ञा पुं० [सं०] पैरों में होनेवाला एक रोग।

पिच्छपादी
वि० [सं० पिच्छपादिन्] जिसको पिच्छपाद हो गया हो। पिच्छपाद रोगयुक्त (घोड़ा)।

पिच्छबाण
संज्ञा पुं० [सं०] बाज। श्येन।

पिच्छमार
संज्ञा पुं० [सं०] मोर की पुँछ।

पिच्छम पु
वि० [हिं० पाच्छिम] दे० 'पश्चिम'। उ०—धर पिच्छम निरखण मन धआरे। परसण हरि द्धारका पधारे। —रा० रु०, पृ० १२।

पिच्छल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. मोचरस। २. अकासबेल। आकाशबल्ली। ३. शीशम। शिंशिपा वृक्ष। ४. वासुका के वंश का एक सर्प।

पिच्छल (२)
वि० जिसपर से पैर रपट या फिसल जाय। रपटनवाला। चिकना।

पिच्छल (३)
वि० [हिं०] दे० 'पिंछला'।

पिच्छल (४)
संज्ञा पुं० [हिं० पिछला] जहाज का पिछला भाग। (लश०)।

पिच्छलच्छदा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बेर। बदरीवृक्ष। २. पोय। उपोदकी शाक।

पिच्छलतिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुँछ पर के पंख [को०]।

पिच्छलदला
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'पिच्छलच्छदा'।

पिच्छलपाद
संज्ञा पुं० [सं०] घोड़ों के पैर में होनेवाला एक रोग।

पिच्छा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मोचरस। २. सुपारी। पुंग वृक्ष। ३. शीशम। ४. नारंगी का वृक्ष। ५. निर्मली का पेड़। ६. आकाशलता। आकाशबेल। ७. आवरण। खोल (को०)। ८. कवच। सनाह (को०)।९. राशि। समुह (को०)। १०. कतार। पंक्ति। लाइन (को०)। ११. पिंडली (को०)। १२. सर्प की विषाक्त लार। फणिलाला (को०)। १३. घोड़ों का एक रोग। पिच्छलपाद। १४. भात या चावल का माँड़।

पिच्छास्राव
संज्ञा पुं० [सं०] लिबलिबी लार [को०]।

पिच्छिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. चँवर। चामर। २. ऊन की चँवरी जो जैनी साधु अपने पास रखते हैं। ३. मोरछल।

पिच्छितिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] शीशम।

पिच्छिल (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० पिच्छिला] १. सरल और स्निग्ध (पदार्थ)। गीला और चिकना। २. फिसलनेवाला। फिसलन युक्त। जिसपर कोई वस्तु ठहर न सके। जिसपर पड़ने से पैर रपटे। ३. चावल के माँड़ से चुपड़ा हुआ। ४. चुड़ा़युक्त (पक्षी)। जिसके सिर पर चुड़ा़ हो। ५. दुमदार। पुँछवाला (को०)। ६. खट्टा, कोमल, फुला हुआ और कफकारी (पदार्थ) (वैद्यक)।

पिच्छिल (२)
संज्ञा पुं० १. लसोड़ा। श्लेष्मांतक। २. चावल का माँड़। भक्तमंड (को०)। ३. स्निग्ध सरल व्यंजन (दाल, कढ़ी आदि)।

पिच्छिलक
संज्ञा पुं० [सं०] १. मोचरस। २. धामिन का पेड़।

पिच्छिलाच्छदा
संज्ञा पुं० [सं०] १. बेर। बदरी वृक्ष। २. पोय। उपोदकी शाक।

पिच्छिलत्वक्, पिच्छिलत्वच्
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. नारंगी का पेड़। २. धामिन का पेड़।

पिच्छिलदला
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'पिच्छिलच्छदा'।

पिच्छिलवास्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] निरुढ़वस्ति का एक भेद। विशेष—दे० 'निरुढ़वस्ति'।

पिच्छिलसार
संज्ञा पुं० [सं०] मोचरस।

पिच्छिला (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पोई। २. शीशम। ३. सेमल। शाल्मली वृक्ष। ४. तालमखाना। कोकिलाक्ष। ५. वृश्चि- काली जंडी़। वृश्चिका क्षुप। ६. शुली घास। ७. अगर। ८. अलसी। ९. अरवी।

पिच्छिला (२)
वि० स्त्री० दे० 'पिच्छिल'।

पिछ †
वि० [हिं० पीछे] पीछे। पीछा का समास में प्रयुक्त रुप। जैसे, पिछलगा आदि।

पिछड़ना
क्रि० अ० [हिं० पिछाड़ी+ ना (प्रत्य०) ] १. पीछे रह जाना। साथ साथ, बराबर या आगे न रहना। २. श्रेणी में आगे या बराबर न रहना। संयो० क्रि०—जाना।

पिछड़ापन
संज्ञा पुं० [हिं० पिछड़ना+ पन (प्रत्य०)] पिछड़ने या पीछे रहने या होने की स्थिति। विकास की विरोधी स्थिति। अविकसित अवस्था।

पिछनावना पु
क्रि० स० [हिं० पहचनवाना, गुज० पिछान, पिछानवुँ] पहचान कराना। परिचय कराना। उ०—तव भैरव इक गन सरिस किंन हुकम हर नंद। विवरि नाम वीरन सबन कहि पिछनावहु चंद। —पृ० रा०, ६। ६४।

पिछरना †
क्रि० स० [हिं०] पछाड़ना। मारना। उ०—पकरि कसाई पटकि पिछरना। समुझि देखि निश्चै करि मरना। — सुंदर ग्रं० भा०१, पृ० ३३४।

पिछलगा
संज्ञा पुं० [हिं० पीछे+ लगना] १. वह मनुष्य जो किसी के पीछे पीछे चले। अधीन। आश्रित। २. वह आदमी जो अपने स्वतंत्र विचार या सिद्धांत न रखता हो, बल्कि सदा किसी दुसरे के विचारों या सिद्धांतों के अनुसार काम करे। किसी का मतानुयायी। अनुवर्ती। अनुगामी। शिष्य। शागिर्द। चेला। ३. सेवक। नौकर। खिदमतगार।

पिछलगी
संज्ञा स्त्री० [हिं० पिछलगा] १. दे० 'पिछलगा'। २. पिछलगा होने का भाव। अनुयायी होना। अनुगमन करना। अनुवर्तन। अनुसरण।

पिछलगु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पिछलगा'।

पिछलग्गु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पिछलगा'।

पिछलत्ती †
संज्ञा स्त्री० [हिं० पिछला+ लात] गधे घोड़े आदि पशुओं का पिछले पैर से पीछे की और मारना।

पिछलना
क्रि० अ० [हिं० पीछा] पीछे की ओर हटना या मुड़ना (क्व०)।

पिछलपाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० पीछा+पाही=पैरवाली] १. चुड़ैल। विशेष—चुड़ैलों के संबंध में लोगों की धारणा है कि इनके पैरों में एड़ी आगे और पंजे पीछे की ओर होते हैं। २. जादुगरनी।

पिछला (१)
वि० [हिं० पीछा] [स्त्री० पिछली] १. जो किसी वस्तु की पीठ की ओर पड़ता हो। पीछे की ओर का। 'अगला' का उलटा जैसे,—(क) इस मकान का पिछला हिस्सा कुछ कमजोर है। (ख) इस घोड़े की पिछली दोनों टाँगे खराब हैं। २. जो घटना स्थिति आदि के क्रम में किसी के अथवा सबके पीछे पड़ता हो। जिसके पहले या पुर्व में कुछ और हो या हो चुका हो। बाद का। अनंतर का। पहला का उलचा। जैसे,—अभियुक्त ने अपना पहला बयान तो वाप्स ले लिया , परंतु पिछले को ज्यों का त्यों रखा है। ३. किसी वस्तु के उत्तर भाग से संबंध रखनेवाला। अंत के भाग का या अध्रांश का। पश्चा- दुवर्ती। अंत की ओर का। जैसे—(क) इस पुस्तक के पिछले प्रकरण अधिक उपादेय हैं। (ख) अपने पिछले प्रयत्नों में उन्हें वैसी सफलता नहीं हुई जैसी पहले प्रयत्नों में हुई थी। मुहा०—पिछला पहर =दो पहर या आधी रात के बाद का समय। दिन अथवा रात का उत्तर काल। पिछली रात= रात्रि का उत्तर काल। रात में आधी रात के बाद का समय। पिछले काँटे =(१) परवर्ती काल में। (२) वर्तमान के ठीक पहले के समय में। उ०— मगर, पिछले काँटे वह मानिक के घर बहुत कम आने लगी। —शराबी, पृ० ३९। ४. बीता हुआ। गत। जो भूत काल का विषय हो गया हो। पुराना। गुजरा हुआ। जैसे,—पिछली बातों को भूल जाना अच्छा होगा। ५. सबसे निकटस्थ। भूत काल का उस भूत काल का जो वर्तमान के ठीक पहले रहा हो। गत बातों में से अंतिम या अंत की ओर का। जैसे, पिछले साल आदि। मुहा०—पिछला दिन = वह दिन जो वर्तमान से एक दिन पहले बीता हो। पिछली रात = कल की रात। आज से एक दिन पहले बीती हुई रात। गत रात्रि। पिछली बातों पर खाक डालना= गत काल की बातों को भुला देना। बीती बात को भुला देना। बीती बात को बिसार देना। उ०—लाडी- चलो अब पिछली बातों पर खाक डालो। —सैर कु०, पृ० ३३।

पिछला (२)
संज्ञा पुं० १. पिछले दिन पढा़ हुआ पाठ। एक दिन पहले पढा़ हुआ पाठ। आमोख्ता। जैसे,—तुमको अपना पिछला दुहराने में देर लगती है। क्रि० प्र०—दुहराना। २. बह खाना जो रोजे के दिनों में मुसलमान लोग कुछ रात रहते खाते हैं। सहरी।

पिछला (३)
संज्ञा पुं० [देश०] पछेली। हाथ में पीछे पहनने का एक आभुषण उ०—कँगने पहुँची, मृदु पहुँचों पर, पिछला, मँझुवा, अगला क्रमतर, चुड़ियाँ, फूल की मठियाँ वर। —ग्राप्या पृ० ४०।

पिछवाई
संज्ञा पुं० [हि० पीछा] पीछे की ओर लटकाने का परदा।

पिछवाड़ा
संज्ञा पुं० [हि० पीछा + वाड़ा (प्रत्य०)] [स्त्री० पिछवाडी़] १. किसी मकान का पीछे का भाग। घर का पृष्ठ भाग। घर का वह भाग जो मुख्य द्बार के विरुद्ब दिशा में हो। २. घर के पीछे का स्थान या जमीन। किसी मकान के पृष्ठ भाग से मिली हुई जमीन। घर पीठ की ओर का खाली स्थान।

पिछवारा
संज्ञा पुं० [हि०] दे० 'पिछवाड़ा'।

पिछाड़ी
संज्ञा स्त्री० [हि० पीछवाड़ी] १. पिछला भाग। पीछे का हिस्सा। पृष्ठ भाग। २. पंक्ति में अंत का व्यक्ति। ३. वह रस्सी जिससे घोड़े के पिछले पैर बाँधते हैं। क्रि० प्र०—लगाना। —बाँघना।

पिछान पु †
संज्ञा स्त्री० [हि० पहचान] दे० 'पहचान'। उ०— सहिब एक अगम्य है, ताकर करहु पिछान। —कबीर सा०, पृ० ५९८।

पिछानना पु
क्रि० सं० [हि० पिछान] दे० 'पहचानना'। उ०— छला परोसिनि हाथ तें छल लियो पिछानि। —बिहारी (शब्द०)।

पिछानि पु
संज्ञा स्त्री० [हि०] दे० 'पहचान'। उ०—जल तै निकासि बहु भाँति गहि डारि तट 'लीजिये पिछानि' देखि सुधि बुधि गई है। —भक्तमाल, पृ० ४८६।

पिछारी †
संज्ञा स्त्री० [हि०] दे० 'पिछाड़ी'।

पिछेलना
क्रि० स० [हि० पीछी + ऐलना (हेलना)] १. पीछे ठेलना या करना। उ०—आता है जो में तात यही, पीछे पिछेल व्यवधान मही। झट लोटुँ चरणों में आकर; सुख पाऊँ करस्पर्श पाकर। —साकेत, पृ०, १८५। २. किसी कार्य में आगे निकल जाना। पिछाड़ देना।

पिछोंकड़ा ‡
संज्ञा पुं० [हिं० पीछे+ओंकड़ा (प्रत्य०)] मकान के पीछे का भाग। पिछवाड़ा। उ०—भीख जन उदास होकर मंदिर के पिछोकड़ें जाकर बैठ गया और वहाँ से भगवान् की स्तुति करता हुआ ध्यान करने लगा। —सुंदर ग्र० (जी०), भा०, १, पृ० ८५।

पिछोंरा
संज्ञा पुं० [हि०] [संज्ञा स्त्री० पिछोरी] दे० 'पिछौरा'। उ०—फूलन को मुकुट बन्यों, फूलन को पिछोंरा तन सोहित अति प्यारो बर फूलन को सिंगार। —नदं० ग्र, पृ०, ३७९।

पिछौँड़ †
वि० [हि० पीछे+औंड़ (प्रत्य०)] जिसने अपना मुँह पीछे कर लिय़ा हो। किसी के मुँह की ओर जिसकी पीठ पड़ती हो। किसी वस्तु को न देखता हुआ।

पिछैँड़ा †
क्रि० वि० [हिं० पीछा+औड़ा (प्रत्य०)] पीछे की ओर।

पिछौंता
क्रि० वि० [हि० पीछा+औता (प्रत्य०)] १. पीछे की ओर।

पिछौंहा †
वि० [हि० पीछा+औहा (प्रत्य०)] १.पीछे का। पीछे की ओर का। २. पश्चिमीय। पश्चिम का।

पिछौही †
संज्ञा स्त्री० [हि०] दे० 'पिछौरी'।

पिछौहै पु
क्रि० वि० [हि० पिछौहा] पीछे की ओर। पीछे की ओर से। उ०—कहै पदमाकर पिछौहैं आय आदर से छलिया छबीलो छैल बासर बितै बितै। —पदमाकर (शब्द०)।

पिछौरा
संज्ञा पुं० [सं० पक्षपट? प्रा० पच्छावड़, पछेवड़ा] १. मर- दाना दुपट्टा। पुरुषों की चादर। २. ओढ़ने का मोटा कपड़ा।

पिछौरी †
संज्ञा स्त्री० [हि० पिछौरा] १. स्त्रियों का वह वस्त्र जिसे वे सबसे ऊपर औढ़ती है। स्त्रियों की चादर। उ०—झगा पगा अरु पाग पिछौंरी ढढिन को पहिरायो। —सूर (शब्द०) २. ओढ़ने का वस्त्र। कोई कपड़ा जो ऊपर से डाल लिया जाय।

पिछछी पु
क्रि० वि० [हि०] दे० 'पीछे'। पीछे की ओर। उ०— फौज पिछछी फिरी राज राजंगरी। —पृ० रा०, २४। २१४।

पिटंकाकी, पिटंकोको
संज्ञा स्त्री० [सं० पिटङ्काकी, पिटङ्किकी] इंद्रयान। इंद्रवारुणी।

पिटंत
संज्ञा स्त्री० [हिं० पीटना+अंत (प्रत्य०)] पीटने की क्रिया या भाव। मारपीट। मारकूट।

पिट (१)
संज्ञा पुं० [अं०] थिएटर में गैलरी के आगे की सीटें या आसन।

पिट (२)
संज्ञा स्त्री० [अनु०] किसी वस्तु के आघात से उत्पन्न घ्वनि।

पिट (३)
संज्ञा पुं० [सं०] १. पिटक। पिटारा। संदुक। २. गृह। मकान। ३. छत। छाजन [को०]।

पिटक
संज्ञा पुं० [सं०] १. पिटारा। २. फुड़िया। फुंसी। ३. आभूषण जो इंद्रध्वजा में लगाया जाता है। ४. धान्यकोष्ठ। धान्यागार। कुसूल (को०)। ५. किसी ग्रंथ का एक भाग। ग्रंथविभाग। खंड़ हिस्सा। जैसे, त्रिपिटक=तीन भागोंवाला (बौद्ब) ग्रंथ।

पिटका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पिटारी। २. कुंसी।

पिटना (१)
क्रि० अ० [हिं० पीटना] १. मार खाना। ठोंका जाना आघात सहना। उ०—पाछे पर न कुसंग के पदमाकर यहि डीठ। पर धन खात कुपेट ज्यों पिटत वितारी पीठ। — पद्माकर (शब्द०)। २. पराजित होता। हार जाना। ३. बजना। अघात पाकर आवाज करना। जैसे, ड़ौड़ी पिटना, ताली पिटना आदि।

पिटना (२)
संज्ञा पुं० [हिं० पिटना] वह औजार जिससे किसी वस्तु को विशेषतः चूने आदि की बनी हुई छत को राज लोग पीटते है। पीटने का औजार। थापी।

पिटापिट
संज्ञा स्त्री० [अनु०] पिट पिट शब्द। किसी छोटी वस्तु के गिरने का या हलके आघात का शब्द।

पिटपिटाना
क्रि० अ० [अनु०] असमर्थता आदि के कारण हाथ पैर पटककर रह जाना। विवश होकर रह जाना।

पिटमान
संज्ञा पुं० [?] पाल। (लश०)।

पिटरिया †
संज्ञा स्त्री० [हिं० पिटारा+ईया (प्रत्य०)] झाँपी। दे० 'पिटारी'।

पिटवाँ
वि० [हिं० पीटना] पीटकर बनाया हुआ।

पिटवाना
क्रि० सं० [हिं० पटिना] १. किसी के पिटने या मारे जाने का कारण होना। अन्य के द्बारा किसी पर आघात कराना। ठोंकवाना। कुटवाना। मार खिलवाना। २. बजवाना। जैसे, डो़डी पिटवाना। ३. पीटने का काम दूसरे से कराना। दूसरे को पीटने में प्रवृत्त करना।

पिटस
संज्ञा स्त्री० [हि०] दे० 'पिट्टस'। उ०—मेरे नरगिसी आँखोवाले बेटा दुल्हन लाश पर खड़ी है आखिरी दीदार तो दो। इस फिकरे पर पिटस पड़ गई। —फिसाना०, भा०, ३. पृ० ६१३।

पिटाई
संज्ञा स्त्री० [हि० पीटाना] १. पीटने का काम या भाव। जैसे, छत की पिटाई। २. आघात। प्रहार मार। मारकूट। ३. पोटने की मजदुरी। ४. मारने का पूरस्कार। ५. पिटवाने की मजदुरी।

पिटाक
संज्ञा पुं० [सं०] पिटारा। संदूक। बक्स [को०]।

पिटापिट †
संज्ञा स्त्री० [हि० पटिना] मारपीट। मारकूट। किसी वस्तु को कुछ समय तक बराबर पीटना। जैसे—वहाँ खूब पिटापिट मची रही।

पिटारा
संज्ञा पुं० [सं० पिटक] [स्त्री० पिटारी] १बाँस, बेत,मूँज आदि के नरम छिलकों से बना हुआ एक प्रकार का बड़ा संपुट या ढकनेदार पात्र। झाँपा। विशेष—इसका घेरा गोल, तल बिलकुल चिपटा ओर ढ़कना ढालुवाँ गोल अथवा बीच में उठा हुआ होता है। पहले पिटारे का व्यवहार बहुत था, पर तरह तरह के टुंकों के प्रचार के कारण इसका व्यवहार घटता जाता है। बाँस आदि की अपेक्षा मूँज और बेंत का पिटारा अधिक मजबूत होता है। मजबूती के लिये अक्सर इसको चमड़े या किसी मोटे कपड़े से मढ़वा देते है। आजकल लोहे के पतले गोल तारों से भी पिटारे बनते हैं। २. बड़ा गुब्बारा।

पिटारी
संज्ञा स्त्री० [हिं० पिटारा का स्त्री० और अरुपा०,] १. छोटा पिटारा। झाँपी। २पान रखने का बरतन। पानदान। मुहा०—पिटारी का खर्च =(१) वह धन जो स्त्रियों के पान के खर्च के लिये दिया जाय। पानदान का खर्च। (२) वह धन जो किसी स्त्री को व्यभिचार से प्राप्त हो। व्यभिचार की कमाई।

पिटिक्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] पिटारों का समुह [को०]।

पिटौर
संज्ञा पुं० [हिं० √ पीट+और (प्रत्य०)] वह डंडा या लाठी जिससे फसल की बालों आदि को पीटकर उसके दाने निकालते है। पिटना।

पिट्टक
संज्ञा पुं० [सं०] दाँत की मैल।

पिट्टन
संज्ञा स्त्री० [हि० पीटना] रोने पीटने की क्रिया या भाव पिट्टस। क्रि० प्र०— पड़ना।

पिट्टस
संज्ञा स्त्री० [हि० पीटना+स (प्रत्य०)] शोक या दुःख से छाती पीटने की क्रिया। (स्त्री०)। मुहा०—पिट्टस पढ़ना या मचना = शोक या दुःख में छाती पीटा जाना। रोना धोना होना। हाय हाय सचना। जैसे— यह खबर सुनते ही वहाँ पिट्टस पड़ गई।

पिट्ट
वि० [हि० पिट्ठ+ऊ (प्रत्य०)] जो प्रायः पीटा जाय। मार खाने का अभ्यस्त।

पिट्ठु पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पीठ'। उ०—तजे विन आयुध पिट्ठि दिखाया। —ह० रासो, पृ०, ८।

पिट्ठू
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पीठी'।

पिट्ठू
संज्ञा पुं० [हि० पिट्ठु+ऊ(प्रत्य०)] १. पीछे चलनेवाला। पिछलगा। अनुयायी। २. सहायक। मददगार। पृष्ठपोषक। हिमायती। ३किसी खिलाड़ी का वह कल्पित साथी जिसकी बारी में वह स्वयं खेलता है। विशेष—जब दोनों पक्षों के खिलाड़ियों की संख्या बराबर नहीं होती तब न्युनसंख्यक पक्ष के एक दो खिलाड़ी अपने अपने साथ एक एक पिठ्ठू, मान लेते हैं ओर अपनी बारी खेल चुकने पर दूसरी बार उस पिट्ठ को बारी लेकर खेलते है। ४. खेल में साथ रहनेवाला। ५. अंघानुकरण करनेवाला। बिना समझे बुझे किसी का अनुयायी होनेवाला। ६. किसी की हर एक बात का समर्थन करनेवाला। हाँ में हाँ मिलाने वाला। खुशामदी।

पिठमिल्ला
संज्ञा पुं० [हिं० पीठ+मिलना] अंगरखे या कोट आदि का वह भाग जो पीठ पर रहता है। पीठ।

पिठर
संज्ञा पुं० [सं०] १. मोथा। मुस्तक। २. मथानी। मथनदंड। ३. थाली। ४. एक प्रकार का घर। ५. एक अग्नि। ६. एक दानव।

पिठरक
संज्ञा पुं० [सं०] १. थाली। पात्र। बर्तन। २. एक नाग का नाम।

पिठककपाल
संज्ञा पुं० [सं०] टुटे हुए बरतन का दुकड़ा [को०]।

पिठरपाक
संज्ञा पुं० [सं०] भिन्न भिन्न परमाणुओं के गुणों में तेज के संयोग से फेरफार होना। जैसे, घड़े का पककर लाल होना।

पिठरिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] थाली।

पिठरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. थाली। पात्र। २. राजमुकुट।

पिठवन
संज्ञा स्त्री० [सं० पृष्टपर्णी] एक प्रसिद्ब लता जो औषध के काम में आती है। पिठौनी। पृष्ठपर्णी। विशेष—यह पश्चिम और बंगाल में अधिकता से पाई जाती है। परंतु दक्षिण में नहीं दिखाई पड़ती। इसके पत्ते छोटे गोल गोल होते है और एक एक डाँड़ी में तीन तीन लगते है। फूल गोल और सफेद होते हैं। जड़ कम मिलने के कारण इसकी लता ही प्रायः काम में लाई जाती है। वैद्यक में इसको कटु, तिक्त, उष्ण, मधुर, क्षारक, त्रिदोषनाशक, वीर्यजनक, तथा दाह, ज्वर, श्वास, तृषा, रक्तातिसार वमन, वातरक्त, व्रण और उन्माद आदि का नाशक लिखा है। पर्या०—कंकशत्रु। कदला। कलशी। व्याष्टुक। मेखला। कोष्टुक। पच्छिका। चक्रकुत्या। चर्कपर्णी। तन्वी। धमनी। दीघिपर्णी। पृथक्पर्णी। पुश्निपर्णी। चित्रपर्णी। त्रिपर्णी। सिंहपुच्छी। गुहा। पिष्टपर्णी। लंगुली। श्रुगाल- वृंता। मेखाला। लांगुलिका। ब्रह्मापर्णा। सिंहपुष्पी। अंघ्रिपर्णी। विष्णुपर्णी। अतिगुहा। घष्टिला।

पिठी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पिट्ठी'।

पिठीनस
संज्ञा पुं० [सं०] एक ऋषि।

पिठौनी
संज्ञा स्त्री० [सं० पृष्टपर्णी, हिं० पिठवन्] दे० 'पिठवन'।

पिठौरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० पिट्ठी+औरी (प्रत्य०)] १. पीठी की बनी हुई खाने की कोई चीज, जैसे, बरी पकौरी। २. गुँधे हुए आटे का वह छोटा पेड़ा जो पकाती हुई दाल में छोड़ दिया जाता है और उसी में उबलकर पक जाता है। दलफरा।

पिट्ठ पु
संज्ञा स्त्री० [सं० पुष्ठ, प्रा० पिट्ट, हि० पीट्ठ] दे० 'पीठ'। उ०—असलान निभानहु पिट्ठ दिउँ। —कीर्ति० पृ०, ११२।

पिड़क
संज्ञा पुं० [सं० पिड़क] छोटा फोड़ा। फुंसी। स्फोटक।

पिड़का
संज्ञा स्त्री० [सं० पिड़का] दे० 'पिड़क'।

पिड़कना
क्रि० अ० [हिं० पिनकना] १. आवेश में आना। २. झुँझलाना।

पिड़काना।
क्रि० स० [हिं० पिड़कना] चिढा़ना। परेशान करना। झुँझलाहट पेँदा करना।

पिड़किया
संज्ञा स्त्री० [हिं० पिचुकिया] एक प्रकार का पकवान गुझिया।

पिड़की
संज्ञा स्त्री० [सं० पिड़क] १. दे० 'पिड़क'। २. दे० 'पेंड़ुकी'।

पिड़गना ‡
संज्ञा पुं० [फा० पर्गनह् परगनह, हि० परगना] दे० 'परगना'। उ०—बावन पिड़गना तो रायसल नै साहि दीनाँ।—शिखर०, पृ० २०२।

पिड़भू †
संज्ञा स्त्री० [सं० पिराड़+भुमि] युद्बभुमि। रणक्षेत्र। उ०—पिड़भू भीम पछाड़ियौ खुरम गयों कर खेह। —बाँकी- दास ग्रं० भा०, १. पृ०, ७३।

पिड़वार †
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रतिपदा, हिं० पड़िवा] दे० 'प्रतिपदा'। उ०—असुराँ सिर आयौ अखौ, पिड़वारै परभात। —रा०, रू०, पृ० २७९।

पिड़िका
संज्ञा स्त्री० [सं० पिड़का] दे० 'पिड़का'। उ०—भोज और सुश्रुत के मत से नौ पिड़िका है और चरक के मत से सात ही। —माधव०, पृ० १८७।

पिड़िया
संज्ञा स्त्री० [सं० पिष्टक या पिणिड़िका अथवा, हिं० पेड़ा] १. चावल का गुँधा हुआ आटा जो लंबोतरे पेड़े के आकार का बनाकर अदहन में छौड़ दिया जाता है और उबल जाने पर खाया जाता है। २. लंबोतरे और गोल आकार के सत्तू की बड़ी हुई पिंड़िका।

पिड़ुरी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पिड़री'। उ०—जाँघें भर आई और पिड़ुरी थरथराने लगीं। —श्यामा०, पृ०, १२१।

पिढ़ई
स्त्री० स्त्री० [हिं० पीढा़ + अई (प्रत्य०)] १.छोटा पीढा़ या पाटा। २. किसी छोटे यंत्र का आधार जो छोटे पीढे के समान हो। वह ढाँचा जिसपर कोई छोटा यंत्र रखा रहे, जैसे, रहँट का।

पिढ़िपानी ‡
संज्ञा स्त्री० [हिं० पीढा़ + पानी] आगत को बैठने के लिये पाटा और हाथ मुँह धोने के लिये जल। पीढा़ और पानी। उ०—के तों थिकाह ककर कुल जानी। बिनु परिचय नहि दिव पिढ़िपानी। —विद्यापति, पृ०, ३९३।

पिढ़ी †
संज्ञा स्त्री० [सं० पीठिका] १. मचिया। उ०—कोऊ कहै बलि पाँवरी लावौ। बलि बलि मोहि पिढी़ पकरावौ। —नंद ग्रं, पृ०, २५५। २. दे० 'पीढी़'।

पिण पु
अव्य० [सं० पुनः?] १. परंतु। किंतु। लेकिन। उ०— पुणजै सुध अखरोट पिण,? दश दोस असाध। —रधु०, रु०, पृ०, १३। २. भी। उ०—म्हे पिण जास्याँ नरवरइ, एकण साथ खड़ाँह। —ढोला०, दू०, ६२८।

पिणया
संज्ञा स्त्री० [सं०] मालकँगनी।

पिण्बाक
संज्ञा पुं० [सं०] १. तिल या सरसों की खली। २. हींग। ३. शीलाजीत। ४. शीलारस। सिहलक। ५. केशर।

पितंबर पु
संज्ञा पुं० [सं० पीताम्बर] दे० 'पीतांबर'। उ०—(क) ओढि पितंबर लै लकुटी बन गोधन ग्वारनि संग फिरौगी। रसखान०, पृ० १३। (ख) चोलिया पहिरि धनि चली है गवनवाँ, सेत पितंबर लागे हिंडोल। —धरनी० श०, पृ०,७०।

पितपापड़ा
संज्ञा पुं० [सं० पीतपर्पट] एक झाड़ या क्षुप जिसका उपयोग औषध के रूप में होता है। विशेष—इसे दवनपापड़ा भी कहते हैं। इसके दो भेद होते हैं —एक में लाल फूल लगते है, दूसरे में नीले। लाल फूलवाला अधिक गुणदायक माना जाता है। बैद्यक में इसको शीतल, कड़वा, मलरोधक, बात को कुपित करनेवाला, हलका तथा भ्रम, मद, प्रमेंह तृषा, पित्त, कफ ज्वर, रक्त- विकार अरुचि दाह, ग्लानि ओर रक्तपित्त को नष्ट करनेवाला माना है। पर्या०—पर्पट। वरतिक्त। पांशुपर्याय। कवचनामक। त्रियष्टि। तिक्त। चरक। वरक। अरक। रेणु। तुष्णारि। शीत। शीतप्रिय। पांशु। कलपांग। वर्मकंटक। कृष्णशाख। प्रगंध। सुतिक्त। रक्तपुष्पक। पित्तारि। कटुपत्र। नक्र। शीतवल्लभ।

पितर
संज्ञा पुं० [सं० पितृ पितर] मृत पूर्वपूरुष। मरे हुए पूरखे जिनके नाम पर श्राद्ब या जलदान किया जाता है। विशेष— दे० 'पितृ'—२। उ०—देव पितर सब तुमहिं गोसाई। राखहुँ पलक नयन की नाई। —मानस, २। ५७।

पितरपख †
संज्ञा पुं० [सं० पितृपत्त] दे० 'पितृपक्ष'।

पितरपच्छ †
संज्ञा पुं० [सं० पितृपत्त] दे० 'पितृपक्ष'। उ०— पितरपच्छ के दिन आ गए थे। —नई०, पृ० १०२।

पितरपति
संज्ञा पुं० [सं० पितृ + सं० पति] यम राज।

पितराईँ ध †
संज्ञा स्त्री० [हिं० पीतल + गंध] किसी खाद्य वस्तु के स्वाद और गंध में वह विकार जो पीतल के बरतन में अधिक समय तक रखे रहने से उत्पन्न हो जाय। पीतल का कसाव।

पितराई †
संज्ञा स्त्री० [हि० पीतल+आई (प्रत्य०)] पीतल का कसाव। पीतल का स्वाद। पितराईँध। जैस,—दही में पितराई उतर आई है।

पितराना
क्रि० अ० [हिं० पीतर से नाम०] पितराइँघ आना। पीतल का स्वाद आ जाना। कसाव पैदा होना।

पितरिहा (१)
वि० [हि० पीतल + हा (प्रत्य०)] पीतल का। पीतल का बना हुआ।

पितारिहा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० पीतल] पितल का घड़ा।

पितल पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पीतल'। उ०—पारस परसि पितल होय सोनू। —नंद०, ग्रं० पृ०, १४३।

पितलाना
क्रि० अ० [हिं० पोतल से नाम०, ] दे० 'पितराना'।

पितससुर
संज्ञा पुं० [हिं० पितिया ससुर]दे० 'पितिया ससुर'।

पितांबर
संज्ञा पुं० [हि०] दे० 'पीतांबर'। उ०—और श्री ठाकुरजी ने अपने पितांबर उढ़ायो। —दो सौ बावन० भा०, २. पृ० ७८।

पिता
संज्ञा पुं० [सं० पितृ का कर्ता कारक] जन्म देकर पालनपोषण करनेवाला। बाप। जनक। पर्या०—तात। जनक। प्रसविता। वप्ता। जनियता। गुरू। जन्य। जनित। वीजी।

पितामह
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० पितामही] १. पिता का पिता। दादा। २. भीष्म। ३. ब्रह्मा। ४. शिव। ५. एक ऋषि जिन्होंने एक धर्मशास्त्र बनाया था।

पितिजिया
संज्ञा स्त्री० [सं० पुत्रजीवक] इंगुदी की तरह का एक प्रकार का पेड़। पितौजिया। जियापोता। बिशेष—इसके पत्ते और फल भी इंगुदी के पत्तों और फलों से मिलते जुलते होते हैं। इसके बीजों की रुद्राक्ष की तरह, माला बनती है। वैद्यक मे इसे शोतल, बीर्यवर्धक,कफकारक, गर्म और जीवदायक, नेत्रों को हितकारी, पित्त को शांत करनेवाला तथा दाह और तृषा को हरनेवाला कहा जाता है।

पितिया
संज्ञा पुं० [सं० पितृव्य] [स्त्री० पितियानी] चचा। चाचा। बाप का भाई।

पितियानी
संज्ञा स्त्री० [हिं० पितिया + नी (प्रत्य०)] चाचा की स्त्री। चची। चाची।

पितियाससुर
संज्ञा पुं० [हिं० पितिया + ससुर] चचिया ससुर। ससुर का भाई। स्त्री या पति का चाचा।

पितियासासु
संज्ञा स्त्री० [हिं० पितिया + सास] चचिया सास। ससुर के भाई की स्त्री। स्त्री या पति की चाची।

पितु पु
संज्ञा पुं० [सं० पितृ] दे० 'पिता'।

पितृ
संज्ञा पुं० [सं०] १. दे० 'पिता'। २. किसी व्यक्ति के मृत बाप दादा परदादा आदि। ३. किसी व्यक्ति का ऐसा मृत पूर्वपूरुष जिसका प्रेतत्व छुट चुका हो। विशेष—प्रेत कर्म या अंत्येष्टि कर्म संबंधी पुस्तकों में माना गया है कि अरण और शवदाह के अनंतर मृत व्यक्ति तो आतिवाहिक शरीर मिलता है। इसके उपरांत जब उसके पुत्रादि उसके निमित्त दशगात्र का पिंडदान करते है तब दशपिंडों से क्रमशः उसके शरीर के दश अंग गठित होकर उसको एक नया शरीर प्राप्त होता है। इस देह में उसकी प्रेत संज्ञा होती है। षोडश श्राद्ब और सपिंडन के द्बारा क्रमशः उसका यह शरीर भी छुट जाता है और वह एक नया भोगदेह प्राप्त कर अपने बाप दादा और परदादा आदि के साथ पितृलोक का निवासी बनता है अथवा कर्मसंस्कारा- नुसार स्वर्ग नरक आदि में सुखदुःखादि भोगता है। इसी अवस्था में उसको पितृ कहते है। जबतक प्रेतभाव बना रहता है तब तक मृत व्यक्ति पितृ संज्ञा पाने का अधिकारी नहीं होता। इसी से सपिंडीकरण के पहले जहाँ जहाँ आवश्यकता पड़ती है प्रेत नाम से ही उसका संबोधन किया जाता है। पितरों अर्थात् प्रेतत्व से छूटे हुए पूर्वजों की तृप्ति के लिये श्राद्ब, तर्पण आदि पुत्रादि का कर्तव्य माना गया है। दे० 'क्षाद्ब'। ४. एक प्रकार के देवता जो सब जिवों के आदिपूर्वज माने गए है। विशेष—मनुस्मृति में लिखा है कि ऋषियों से पितर, पितरों से देवता और देवताओं से संपूर्ण स्थावर जंगम जगत की उत्पत्ति हुई है। ब्रह्मा के पूत्र मनु हुए। मनु के मरोचि, अग्नि आदि पुत्रों को पुत्रपरंपरा ही देवता, दानव, दैत्य, मनुष्य आदि के मूल पूरूष या पितर है। विराट्पुत्र सोमदगण साध्यगण के; अत्रिपुत्र वर्हिषदगण दैत्य, दानव, यक्ष, गंधर्व, सर्प, राक्षस, सूपर्ण, किन्नर और मनुष्यों के; कविपुत्र सोमपा ब्राह्मणों के; अगिरा के पुत्र हविर्भुज क्षत्रियों के; पुलस्स्य के पुत्र आज्यपा वैश्यों के और वशिष्ठ- पुत्र कालिन शुद्रों के पितर हैं। ये सब मुख्य पितर है। — इनके पुत्र पौत्रादि भी अपने अपने वर्गों के पितर हैं। द्विजों के लिये देवकार्य से पितृकार्य का अधिक महत्व है। पितरों के निमित्त जलदान मात्र करने से भी अक्षय सुख मिलता है (मनु० ३। १४९४—२०३)।

पितृऋण
संज्ञा पुं० [सं०] धर्मशास्त्रानुसार मनुष्य के तीन ऋणों में से एक जिनको लेकर वह जन्म ग्रहण करता हे। पुत्र उत्पन्न करने से इस ऋण से मृक्ति होती है।

पितृक
वि० [सं०] १. पितृसंबंधी। पिता का। पैतृक। २. पितृदत्त। पिता का दिया हुआ।

पितृकर्म
संज्ञा पुं० [सं० पितृकर्मन्] वह कर्म जो पितरों के उद्देश्य से किया जाय। श्राद्ब तर्पण आदि कर्म।

पितृकल्प (१)
संज्ञा पुं० [सं०] श्राद्बादि कर्म।

पितृकल्प (२)
वि० पिता के समान। पितृतुल्य [को०]।

पितृकानन
संज्ञा पुं० [सं०] शमशान।

पितृकार्य
संज्ञा पुं० [सं०] पितृकर्म।

पितृकुल
संज्ञा पुं० [सं०] बाप, दादा, परदादा या उनके भाई बंधुओं आदि का कुल। बाप की ओर के संबंधी। पिता के वंश के लोग।

पितृकुल्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. महाभारत में वर्णित एक स्थान। २. एक पवित्र नदी जो मलय पर्वत से निकली है (को०)।

पितृकृत्य
संज्ञा पुं० [सं०] पितृकर्म। श्राद्बादि।

पितृक्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] पितृकर्म। श्राद्बादि कार्य।

पितृगण
संज्ञा पुं० [सं०] १. मनुपुत्र मरीचि आदि के पुत्र। विशेष—दे० 'पितृ'—४। २. समग्र पूर्वपुरुष। पितर लोग।

पितृगणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दुर्गा का एक नाम [को०]।

पितृगाथा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पितरों द्बारा पठित कुछ विशेष श्लोक या गाथा। भिन्न भिन्न पुराणों के मत से ये गाथाएँ भिन्न भिन्न हैं।

पितृगामी
वि० [सं० पितृगामिन्] पिता से संबंधित [को०]।

पितृगीता
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक विशेष गीता जिसमें पितरों का माहात्म्य दिया गया है। यह वाराह पुराण के अंतर्गत है।

पितृगृह
संज्ञा पुं० [सं०] १. बाप का घर। नैहर। पीहर। मायका। (स्त्रियों के लिये)। २. श्मशान।

पितृग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] सुश्रुत के अनुसार कार्तिकेय के उन अनुचरों में से एक जो कुछ रोगों के उत्पादक माने गए हैं।

पितृघात
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० पितृघातन, पितृघाती, पितृघ्न] बाप को मार डालना। पिता की हत्या करना।

पितृधातक
वि० [सं०] दे० 'पितृघाती'।

पितृघाती
वि० [सं० पितृघातिन] पिता का वध करनेवाला [को०]।

पितृघ्न
वि० [सं०] पिता का वध करनेवाला।

पितृचरण
संज्ञा पुं० [सं०पितृ+चरण] पिता के चरण। पिता। पिता के लिये आदरार्थक प्रयोग।

पितृतर्पण
संज्ञा पुं० [सं०] १. पितरों के उद्देश्य से किया जाने वाला जलदान। विशेष—दे० 'तर्पण'। २. पितृतीर्थ। ३. तिल। ४. श्राद्ध में दी जानेवाली वस्तुएँ (को०)।

पितृतिथि
संज्ञा स्त्री० [सं०] अमावास्या। विशेष—कहते हैं पितरों को अमावास्या बहुत प्रिय है और श्राद्ध आदि कार्य इसी तिथि को करने चाहिए, और इसी लिये इसका नाम पितृतिथि हैं।

पितृतीर्थ
संज्ञा पुं० [सं०] १. गया। गया तीर्थ। २. मत्स्य- पुराण के अनुसार गया, वारणासी, प्रयाग, विमलेश्वर आदि २२२ तीर्थ। ३. अँगूठे और तर्जनी के बीट का भाग जिसका उपयोग पितृकर्म में दान किया हुआ पिंड़ अथवा संकल्प का जल छोड़ने में होता है।

पितृत्व
संज्ञा पुं० [सं०] पिता या पितृ होने का भाव। पितृ या पिता होने की स्थिति।

पितृदत्त
वि० [सं०] पिता द्बारा प्रदत्त (जेसे, पिता द्बारा स्त्री को मिलनेवाली संपत्ति)।

पितृदान, पितृदानक
संज्ञा पुं० [सं०] पितरों के उद्देश्य से किया जानेवाला दान। वह दान जो मृत पूर्वजों के उद्देश्य से किया जाय।

पितृदाय
संज्ञा पुं० [सं०] पिता से प्राप्त धन या संपत्ति। बपौती।

पितृदिन
संज्ञा पुं० [सं०] अमावस्या।

पितृदेव
संज्ञा पुं० [सं०] पितरों के अधिष्ठाता देवता। अग्नि- ष्वात्तादि पितर गण। दे० 'पितृ'—४।

पितृदेवत (१)
वि० [सं०] पितृदेवता संबंघी। पितरों की प्रसन्नता के लिये किया जानेवाला (यज्ञ आदि)। (यज्ञ का अनिष्ठान) जो पितृदेवों को प्रसन्नता के लिये किया जाय।

पितृदेवत (२)
संज्ञा पुं० मघा नक्षत्र [को०]।

पितृदेवत्य
वि० [सं०] 'पितृदेवत' (१)।

पितृदैवत (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. मघा नक्षत्र। २. यम।

पितृदैवत (२)
वि० [सं०] दे० 'पितृदेवत'[को०]।

पितृदैवत्य (१)
वि० [सं०] पितृदेवत।

पितृदैवत्य (२)
संज्ञा पुं० अगहन, पूस, माघ और फागुन की कृष्ण अष्टमी (अष्टका) तिथियों को किया जानेवाला पितृकृत्य [को०]।

पितृद्रव्य
संज्ञा पुं० [सं०] पैतृक संपत्ति।

पितृनाथ
संज्ञा पुं० [सं०] १. यमराज। २. अर्यमा नामक पितर जो सब पितरों मे श्रेष्ठ माने जाते है।

पितृपक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १. कुआर या आश्विन क कृष्ण पक्ष। कुआर की कृष्ण प्रतिपदा से अमावास्या का समय। विशेष—यह पक्ष पितरों को अतिशय प्रिय माना गाया है। कहा जाता है कि इसमें उनके निमित श्राद्ध आदि करने से वे अत्यंत संतुष्ट होते हैं। इसी से इसका नाम पितृपक्ष हुआ है। प्रतिपदा से अमावास्या तक नित्य उनके निमित तिल- तर्पण और अमावास्या को पार्वणविधि से तीन पीढी़ ऊपर तक के मृत पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है। भिन्न भिन्न पूर्वजों की मृत्युतिथियों को भी उनके निमित इस पक्ष में श्राद्ध करते हैं। पर यह श्राद्ध एकोद्दिष्ट न होकर त्रेपुरुषिक ही होता है। इन पंद्रह दिनों में आहार और विहार में प्रायः अशौच के नियमों का सा पालन किया जाता है। २. पिता की ओर के लोग। पिता के संबंधी। पितृकुल।

पितृपति
संज्ञा पुं० [सं०] यम।

पितृपद
संज्ञा पुं० [सं०] १. पितरों का देश पितरों का लोक २. पितर होने की स्थिति या भाव पितृत्व।

पितृपति
संज्ञा पुं० [सं० पितृपितृ] पितरों के पिता, ब्रह्मा।

पितृपुरुष
संज्ञा पुं० [सं० पितृ + पुरुष] पूर्वज।

पितृपैतामह
वि० [सं०] जिसका संबंध बाप दादों से हो। बाप दादों का।

पितृप्रसू
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दादी। आजी बाप की माँ। पिता- मही। २. संध्या। विशेष—पितृकृत्य में संध्यागामिनी अथवा सूर्यास्त समय में वर्तमान तिथि ही ग्रहण की जाती है; तथा प्रेतकृत्य में संध्या माता के समान उपकार करनेवाली मानी गई है। यै ही दो उसके पितृप्रसू संज्ञा प्राप्त करने के कारण हैं।

पितृप्राप्त
वि० [सं०] १. पिता से प्राप्त। २. पैतक धन के रूप में प्राप्त [को०]।

पितृप्रिय
संज्ञा पुं० [सं०] १. भँगरा। भँगरैया। भृंगराज। २. अगस्त का वृक्ष।

पितृबंधु
संज्ञा पुं० [सं० पितृबन्धु] १.पिता के पक्ष से होनेवाला संबंध। २. पितामह की बहिन के पुत्र, पितामही की बहिन के पुत्र और पिता के मामा के पुत्र [को०]।

पितृभक्त
वि० [सं०] पिता की भक्तिभाव से सेवा करनेवाला [को०]।

पितृभक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पिता की भक्ति। पिता में पूज्य बुद्धि। २. पुत्र का पिता के प्रति कर्तव्य।

पितृभोजन
संज्ञा पुं० [सं०] १. उरद। माष। २. पितरों की भोज्य वस्तु।

पितृभ्राता
संज्ञा पुं० [सं० पितृभ्रातृ] चाचा। चचा [को०]।

पितृमंदिर
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'पितृगृह' [को०]।

पितृमात्रर्थ
संज्ञा पुं० [सं०] वह व्यक्ति जो माता पिता के लिये भीख माँग [को०]।

पितृमेध
संज्ञा पुं० [सं०] वैदिक काल के अंत्येमेष्ट कर्म का एक भेद जिसमें अग्निदान और दक्षपिंडदान आदि संमिलित होते थे और जो श्राद्ध से भिन्न होता था।

पितृयज्ञ
संज्ञा पुं० [सं०] तर्पणादि। पितृतर्पण।

पितृयाण
संज्ञा पुं० [सं०] मृत्यु के अनंतर जीव के जाने का वह मार्ग जिससे वह चंद्रमा को प्राप्त होता है। वह मार्ग जिससे जाकर मृत व्यक्ति को निश्चित काल तक स्वर्ग आदि में सुख भोगकर पुनः संसार में आना पड़ता है। विशेष—ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति का प्रयास न कर अनेक प्रकार के अग्निहोत्र आदि विस्तृत पुण्यकर्म करनेवाले व्यक्ति जिस मार्ग से ऊपर के लोकों को जाते है वही पितृयाण है। इसमें से जाते हुए वे पहले धूमाभिमानी देवताओं को प्राप्त होते हैं। फिर रात्रि, फिर कृष्ण पक्ष, फिर दक्षिणायन षण्मास के अभिमानी देवताओं को प्राप्त होते हैं। इसके पीछे पितृलोक और वहाँ से चंद्रमा को प्राप्त होते हैं। अनंतर वहाँ से पतित होकर संसार में कर्मसंस्कार के अनुसार किसी एक योनि में जन्म ग्रहण करते हैं। देवयान अर्थात् ब्रह्मज्ञानी- पासकों के मार्ग से यह उलटा है। दे० 'देवयान'।

पितृयान
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'पितृयाण'।

पितृराज
संज्ञा पुं० [सं०] यम।

पितृरिष्ट
संज्ञा पुं० [सं०] फलित ज्योतिष के अनुसार वह योग जिसमें बालक का जन्म होने से पिता की मृत्यु होती है। विशेष—भिन्न भिन्न आचार्यो के मत से भिन्न भिन्न अवस्थाओं में ऐसे योग पड़ते हैं।

पितृरूप
संज्ञा पुं० [सं०] शिव। विशेष—शिव संपूर्ण प्राणियों के पिता माने गए है इसी लिये उन्हें पितृरूप कहा जाता है।

पितृलोक
संज्ञा पुं० [सं०] पितरों का लोक। वह स्थान जहाँ पितृगण रहते हैं। विशेष—छांदोग्योपनिषद् में पितृयाण का वर्णन करते हुए पितृलोक को चंद्रमा से ऊपर कहा गया है। अथर्ववद में जो उदन्वती, पीलुमती और प्रद्यौ ये तीन कक्षाएँ द्युलोक की कही गई हैं उनमें चंद्रमा प्रथम कक्षा में ओर पितृलोक या प्रद्यौ तीसरी कक्षा से कहा गया है।

पितृवंश
संज्ञा पुं० [सं०] पिता का कुल। पितृकुल [को०]।

पितृवन
संज्ञा पुं० [सं०] १. श्मशान। २. मृत्यु। मौत। मरणा (को०)।

पितृवनेचर
संज्ञा पुं० [सं०] १. श्मशान में बसनेवाले, शिव। २. भूत प्रेत, दैत्य आदि (को०)।

पितृवर्तो
संज्ञा पुं० [सं० पितृवर्तिन्] पुराणानुसार एक राजा का नाम।

पितृवसति
संज्ञा पुं० [सं०] श्मशान।

पितृवित्त
संज्ञा पुं० [सं०] बाप दादों की संपत्ति। पैतृक धन। मौरूसी जायदाद।

पितृविसर्जन
संज्ञा पुं० [सं० पितृ + विसर्जन] पितरों की बिदाई। विशेष—पितृविसर्जन का कृत्य श्राश्विन मास की अमावास्या को होता है।

पितृवेश्म
संज्ञा पुं० [सं० पितृ़वेश्मन्] दे० 'पितृगृह' [को०]।

पितृव्य
संज्ञा पुं० [सं०] बाप का भाई। चचा। चाचा। काका।

पितृव्रत
संज्ञा पुं० [सं०] १. पितरों की पूजा करनेवाला। २. दे० 'पितृकर्म' [को०]।

पितृश्राद्ध
संज्ञा पुं० [सं०] पिता या पितरों का श्राद्ध [को०]।

पितृषद्
संज्ञा पुं० [सं०] बाप का घर। पितृगृह। मैका। पीहर (स्त्रीयों के लिये)।

पितृषूदन
संज्ञा पुं० [सं०] कुश।

पितृष्वसा
संज्ञा स्त्री० [सं० पितृष्वसृ] बाप की बहन। बूआ।

पितृष्वस्त्रीय
संज्ञा पुं० [सं०] बूआ का बेटा। फुफेरा भाई।

पितृसंनिभ
वि० [सं० पितृसन्निभ] पिता के समान आदरणीय। पिता के तुल्य [को०]।

पितृसद्भ
संज्ञा पुं० [सं० पितृसभन] श्मशान [को०]।

पितृसत्ताक
वि० [सं० पितृ + सत्ता + क (प्रत्य०)] जहाँ पिता की सत्ता प्रधान हो। जहाँ पिता के अधिकार की प्रघानता हो। उ०—यह बिलकुल संभव है कि अफगानिस्तान में रहते वक्त आर्यो का समाज पितृसत्ताक रहा हो।—भा० इ० रू०, पृ० ४४।

पितृसत्तात्मक
वि० [सं० पितृ + सत्तात्मक] दे० पितृसत्ताक। उ०—मातृसत्ता की जगह प्रितृसत्तात्मक व्यवस्था ने ले ली। प्रा० भा० प० (भू०), पृ० 'ख'।

पितृसू
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दादी। पितामही। २. संध्या।

पितृसूक्त
संज्ञा पुं० [सं०] एक वैदिक मंत्रसमूह।

पितृस्थान
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो पिता के स्थान पर हो। अभिभावक। २. जो पितृतुल्य हो। जो पितृवत् हो।

पितृस्थानोय
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'पितृस्थान'।

पितृस्वसा
संज्ञा स्त्री० [सं०] बूआ [को०]।

पितृस्वसीय
संज्ञा पुं० [सं०] फुफेरा भाई [को०]।

पितृहंता
संज्ञा पुं० [सं० पितृहन्तृ] दे० 'पितृहा'।

पितृहत्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'पितृघात'।

पितृहा
संज्ञा पुं० [सं० पितृहन्] पिता की हत्या करनेवाला। पितृहंता। पितृधाती।

पितृहू
संज्ञा पुं० [सं०] १. पितरों को देने योग्य वस्तु। २. दाहिना कान।

पितृहूय
संज्ञा पुं० [सं०] पितरों ता आह्वान करना। पितरों का बुलाना।

पितौंजिया †
संज्ञा स्त्री० [सं० पुञजीवक] पुत्रजीवक नामक वृक्ष। वि० दे० 'पितिजिया'।

पित्त
संज्ञा पुं० [सं०] एक तरल पदार्थ जो शरीर के अंतर्गत यकृत में बनता है। इसका रंग नीलापन लिए पीला और स्वाद कड़वा होता है। आयुर्वेद शास्त्र के त्रिदोषों (कफ, वात, पित्त) में एक। विशेष—इसकी बनावट में कई प्रकार के लवण और दो प्रकार के रंग पाए गए हैं। यह यकृत के कोषों से रसकर दो विशेष नालियों द्बारा पक्वाशय में आकर आहार रस से मिलता है और वसा या चिकनाई के पाचन में सहायक होता है। यदि पक्वाशय में भोजन नहीं रहता तो यह लौटकर फिर यकृत को चला जाता है और पित्ताशय या पित्त नामक उससे संलग्न एक विशेष अवयव में एकत्र होता रहता है। वसा या स्नेहतत्व को पचाने के लिये पित्त का उससे यथेष्ट मात्रा में मिलना अतीव आवश्यक है। यदि इसकी कमी हो तो वह बिना पचे ही विष्ठा द्बारा शरीर से बाहर हो जाता है। इसके अतिरिक्त इसके और भी कई कार्य हैं, जैसे आमाशय से पक्वाश्य मे आए हुए आहार रस की खटाई दूर करना, आँतों में भोजन को सड़ने न देना, शरीर का तापमान स्थिर रखना, आदि। पित्त की कमी से पाचन क्रिया बिगड़ जाती है और मंदग्नि, कब्ज अतिसार आदि रोग होते हैं। इसी प्रकार इसकी वृद्धि से ज्वर, दाह, वमन, प्यास मूर्छा और अनेक चर्मरोग होते हैं। जिसका पित्त के बढ़ गया हो उसका रंग बिलकुल पीला हो जाता है। पित्त के बढे़ या बिगड़े हुए होने की दशा में वह अकसर वमन द्बारा पेट से बाहर भी निकलता है। वैद्यक के अनुसार पित्त शरीर के स्वास्थ्य और रोग के कारण- भूत तीन प्रधान तत्वों अथवा दोषों में से एक है। जिस प्रकार रस का मल कफ है उसी प्रकार रक्त का मल पित्त है जो यकृत या जिगर में उससे अलग किया जाता है। भावप्रकाश के अनुसार यह उष्ण, द्रव, आमरहित दशा में पीला और आमसहित दशा में नीला, सारक , लघु, सत्वगुणायुक्त, स्निग्ध, रस में कटु परंतु विपाक के समय अम्ल हैं। अग्नि स्वभाववाला तो स्वयं अग्नि है। शरीर में जो कुछ उष्णता तत्व है उसका आधार यही है। इसी से अग्नि, उष्ण, तेजस् आदि पित्त के पर्याय हैं। इसमें एक प्रकार की दुर्गंधि भी आती है। शरीर में इसके पाँच स्थान हैं जिनमें यह अलग अलग पाँच नामों से स्थिर रहकर पाँच प्रकार के कार्य करता है। ये पाँच स्थान हैं—आमाशय (कहीं कहीं आमाशय और पक्वाश्य का मध्य स्थान भी मिलता है), यकृत, प्लीहा, ह्वदय, दोनों नेत्र, और त्वचा। इनमें रहनेवाले पित्तों का नाम क्रम से पाचक, रंजक, साधक, आलोचक और भ्रजक हैं। पाचक पित्त का कार्य खाए हुए द्रव्यों को अपनी स्वाभाविक उष्णता से पचाना और रस, मूत्र और मल को पृथक् पृथक् करना है। रंजक पित्त आमाशय से आए हुए आहार रस को रंजित कर रक्त में परिणत करता है। साधक पित्त कफ और तमोगुण को दूर करता और मेधा तथा बुद्धि उत्पन्न करता है। आलोचक पित्त रूप के प्रतिबिंब को ग्रहण करता है। यह पुतली के बीचोबीच रहता है और मात्रा में तिल के बराबर है। भ्राजक पित्त शरीर की कांति, चिकनाई आदि का उत्पादक तथा रक्षक है। आमाशय या अग्न्याशय में स्थित पाचक पित्त अपनी स्वाभाविक शक्ति से अन्य चार पित्तों की क्रिया में भी सहायक होता है। पाचक पित्त को ही पाचकाग्नि या जठराग्नि भी कहा है। गरम, तीखी, खट्टी, आदि चीजें खाने से पित्त बढ़ता है और कुपित होता है, शीतल मधुर, कसैली, क्डवी, स्निग्ध वस्तुओं से वह कम और शांत होता हैं। अरबी में पित्त को सफरा और फारसी में तलखा कहते हैं। उपादान उसका अग्नि और स्वभाव गरम खुश्क माना है। जिस प्रकार शारीरिक उष्णता का कारण पित्त माना गया है उसी प्रकार मनोवृत्तियों के तीव्र होने अर्थात् क्रोध आदि मनोविकारों के पैदा करने में भी वह कारण माना गया है। पित्त खौलना, पित्त उबलना, आदि मुहावरों की— जिनका अर्थ क्रुद्ध हो जाना है—उत्पत्ति में इसी कल्पना का आधार जान पड़ता है। अँगरेजी में भी पित्तार्थक बाइल (Bile) शब्द का एक अर्थ क्रोधशीलता है। पर्या०—मायु। पलज्वल। तेजस्। तिक्त। धातु। उष्मा। अग्नि। अनल। रंजन। मुहा०—पित्त उबलना या खौलना = दे० 'पित्ता उबलना या खौलना'। पित्त गरम होना = शीघ्र क्रुद्ध होने का स्वभाव होना। क्रोधशील होना। मिजाज में गरमी होना। क्रोध की अधिकता होना। जैसे,—अभी तुम जवान हो इसी से तुम्हारा पित्त इतना गरम है। पित्त डालना = कै करना। वमन करना। उलटी करना।

पित्तकर
वि० [सं०] पित्त को बढ़ाने या उत्पन्न करनेवाला। द्रव्य। जैसे, बाँस का नया कल्ला आदि।

पित्तकास
संज्ञा पुं० [सं०] पित्त के दोष से उत्पन्न खाँसी या कास रोग। विशेष—इस रोग के लक्षण छाती में दाह, ज्वर, मुँह सूखना, मुँह का स्वाद तीता होना, खाँसी के साथ पीला और कड़वा कफ निकलना, क्रमशः शरीर का पांडुवर्ण होते जाना आदि हैं।

पित्तकोश, पित्तकोप
संज्ञा पुं० [सं०] पित्त की थैली [को०]।

पित्तक्षोभ
संज्ञा पुं० [सं०] पित्तवृद्धि या पित्त का बिगड़ना [को०]।

पित्तगदी
वि० [सं० पित्तगदिन्] पित्त के रोग से पीड़ित [को०]।

पित्तगुल्म
संज्ञा पुं० [सं०] पित्त की अधिकता से पेट का फूल जाना [को०]।

पित्तघ्न
वि० [सं०] पित्तनाशक (द्रव्य)। विशेष—वैद्यक ग्रंथों के अनुसार मधुर, तिक्त और कषाय रसवाले संपूर्ण द्रव्य पित्तनाशक हैं।

पित्तघ्न (२)
संज्ञा पुं० घी। घृत।

पित्तघ्नी
संज्ञा स्त्री० [सं०] गुड़ुच। गिलोय।

पित्तज
वि० [सं०] पित्त के कारण उत्पन्न। पित्तविकार से पैदा होनेवाला [को०]।

पित्तज स्वरभेद
संज्ञा पुं० [पित्तज + स्वरभेद] पित्त के विकार के द्वारा उत्पन्न गले की खराबी जिसमें रोगी की आँख और विष्ठा दोनों पीली हो जाती हैं (माधव०, पृ० ९९)।

पित्तज्वर
संज्ञा पुं० [सं०] वह ज्वर जो पित्त के दोष या प्रकोप से उत्पन्न हो। पित्तवृद्धि से उत्पन्न ज्वर। पैत्तिक ज्वर। विशेष—वैद्यक ग्रंथों के अनुसार आहार विहार के दोष से बढ़ा हुआ पित्त आमाशय में जाकर स्थित हो जाता है और कोष्ठस्थ अग्नि को वहाँ से निकालकर बाहर की और फेंकता हैं। अतीसार, निद्रा की अल्पता, कंठ, ओठ, मुँह और नाक का पका सा जान पड़ना, पसीना निकलना, प्रलाप, मुँह का स्वाद कड़वा हो जाना, मूर्छा, दाह, मत्तता, प्यास, भ्रम, मल, मूत्र और आँखों में हल्दी की सी रंगत होना आदि इस ज्वर के लक्षण हैं।

पित्तदाह
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'पित्तज्वर'।

पित्तद्रावी (१)
वि० [सं० पित्तद्राविन्] पित्त को पिघलानेवाला (द्रव्य)। जिससे पित्त पिघले।

पित्तद्रावी (२)
संज्ञा पुं० मीठा नीबू।

पित्तधरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सुश्रुत के अनुसार आमाशय और पक्वाशय के बीच में स्थित एक कला या झिल्ली। ग्रहणी।

पित्तनाड़ी
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार का नाड़ीव्रण जो पित्त के कुपित होने से होता है।

पित्तनिबर्हण
वि० [सं०] पित्त को समाप्त करनेवाला। पित्त- नाशक [को०]।

पित्तपथरी
संज्ञा स्त्री० [सं० पित्त + हिं० पथरी] एक रोग जिसमें पित्ताशय अथवा पित्तवाहक नालियों में पित्त की कंकड़ियाँ बन जाती हैं। विशेष—ये कंकड़ियाँ पित्त के अधिक गाढ़े हो जाने, उसमें कोलस्ट्रामई नामक द्रव्य की अधिकता अथवा उसके उपादानों में कोई विशेष परिवर्तन होने से उत्पन्न होती हैं। यद्यपि ये पित्ताशय में बनती हैं, तथापि यकृत और पित्तप्रणालियों में भी पाई जाती हैं। इस रोग में आहार के अंत में पेट में पीड़ा होती है और पित्ताशय में जलन मालूम होती है। स्पर्श करने से उसमें छोटी छोटी पथरियाँ सी जान पड़ती हैं और वह कड़ा, बढा़ हुआ और पत्थर का सा मालूम होता है। कुछ तक इस रोग की स्थति होने से कामला, आँतों के कार्य में रुकावट और यकृत में फोड़ा आदि अन्य रोग होते हैं। यह रोग आयुर्वेंदिय ग्रंथों में नहीं मिलता, इसका पता पाश्चात्य ड़ाक्टरों ने लगाया है।

पित्तपांडु
संज्ञा पुं० [सं० पित्तपाण्डु] एक पित्तजनित रोग जिसमें रोगी के मूत्र, विष्ठा, नेत्र विशेष रूप से और संपूर्ण शरीर सामान्य रूप से पीला हो जाता है और उसे दाह, तृष्णा, तथा ज्वर रहता हैं।

पित्तपापड़ा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पितपापड़ा'।

पित्तप्रकृति
वि० [सं०] जिसकी प्रकृति पित्त की हो। जिसके शरीर में वात और कफ की अपक्षा पित्त की अधिकता हो। विशेष—वेद्यक के अनुसार पित्तप्रकृति व्यक्ति को भूख और प्यास अधिक लगति है। उसका रंग गोरा होता है, हथेली, तलुवे ओर मुँह पर ललाई होती है, केश पांड़ुवर्ण और रोएँ कम होते है, वह बहुत शूर, मानी पुष्प चंदनादि के लेप से प्रीति करनेवाला सदाचारी, पवित्र, अश्रितों पर दया करनेवाला, वैभव, साहस और वुद्धिबल से युक्त होता है, भयभीत शत्रु की भी रक्षा करता है, उसकी स्मरण शक्ति उत्तम होती है, शरीर खूब कसा हुआ नहीं होता, मधुर, शीतल, कड़वे और कसैले भोजन पर रुचि रहती है, शरीर में बहुत पसीना और दुगँधि निकलती है। उसे विष्ठा अधिक होती है और भोजन जलपान वह अधिक मात्रा में लेता है। उसे क्रोध और ईर्ष्या अधिक होती है। वह धर्म का द्बेषी और स्त्रियों को प्रायः अप्रिय होता है, नेत्रों की पुतलियाँ पीली और पलकों में बहुत थोड़े बाल होते हैं, स्वप्न में कनेर ढाक आदि के पुष्प, दिगदाह, उल्कापात, बिजली सूर्य तथा अग्नि को देखता है, क्लेशभीत, मध्यम आयु और बलवाला होता है और बाघ, रीछ, बंदर, बिल्ली, भेड़िया आदि से उसका स्वभाव मिलता है।

पित्तप्रकोप
संज्ञा पुं० [सं०] पित्त का बढ़ना [को०]।

पित्तप्रकोपी
वि० [सं० पित्तप्रकोपिन्] पित्त को बढाने या कुपित करनेवाला (द्रव्य)। (वस्तु) जिसके भोजन से पित्त की बुद्धि हो। विशेष—तक्र, मद्य मांस, उष्ण, खट्टी, चरपरी आदि वस्तुएँ पित्तप्रकोपी हैं।

पित्तप्रमेह
संज्ञा पुं० [सं० पित्त + प्रमेह] एक प्रकार का प्रमेह रोग जिसमें मूर्छा तथा पतले दस्त होते हैं, वस्ति और लिंग में पीड़ा होती है। (माधव०, पृ० १८५)।

पित्तभेषज
संज्ञा पुं० [सं०] मसूर। मसूर की दाल।

पित्तर पु
संज्ञा पुं० [सं० पितृ, हि० पितर] दे० 'पितृ'। उ०— कबीर० श०, भा०, पृ० ३३।

पित्तरक्त
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'रक्तपित्त'।

पित्तल (१)
वि० [सं० पित्त] जिससे पित्त का उभाड़ हो। जिससे पित्तदोष बढे़। पित्तकारी (द्रव्य)।

पित्तल (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. भोजपत्र। २. हरताल। ३. पीतल धातु।

पित्तल
संज्ञा स्त्री० १. जलपीपल। २. सरिवन। शालपर्णी। ३. पीतल धातु।

पित्तला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जलपीपल। २. योनि का एक रोग जो दूषित पित्त के कारण उत्पन्न होता है। 'भावप्रकाश' के मत से योनि में अत्यंत दाह, पाक तथा ज्वर इस रोग के लक्षण हैं।

पित्तबर्ग
संज्ञा पुं० [सं०] मछली, गाय, घोड़े, रुरु मृग और मोर के पित्तों का समूह। पंचविध पित्त। विशेष—मतांतर से सूअर, बकरे, भैसे, मछली और मोर के पित्त पित्तवर्ग के अंतर्गत माने गए हैं।

पित्तवल्लभा
संज्ञा स्त्री० [सं०] काला अतीस।

पित्तवायु
संज्ञा स्त्री० [सं०] पित्त की वृद्बि और विकार से पेट में वायु का बढ़ना [को०]।

पित्तविदग्धदृष्टि
संज्ञा पुं० [सं०] आँख का एक रोग जो दूषित पित्त के दृष्टिस्थाँन में आ जाने से होता है। विशेष—इसमें द्दष्टिस्थान पीतवर्णा हो जाता है और साथ ही सारे पदार्थ भी पीले दिखाई पड़ने लगते हैं। दोष आँख के तीसरे परदे या पटल में रहता है इससे रोगी को दिन में नहीं सुझाई पड़ता, वह केवल रात में देखता है।

पित्तविसर्प
संज्ञा पुं० [सं०] विसर्प रोग का एक भेद।

पित्तव्याधि
संज्ञा स्त्री० [सं०] पित्तदोष से उत्पन्न रोग। पित्त के बिगड़ने से पैदा हुई बीमारी।

पित्तशमन
वि० [सं०] पित्त को दूर करनेवाला [को०]।

पित्तशूल
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का शूल रोग जो पित्त के प्रकोप से होता है। विशेष—इसमें नाभि के आसपास पीड़ा होती है। प्यास लगना, पसीना निकलता, दाह, भ्रम और शोष इस रोग के लक्षण हैं। डाक्टरों के मत ले पित्त के अधिक गाढे़ होने अथवा उसकी पथरियों के आँतों में जाने से यह रोग उत्पन्न होता है। ऐसे पित्त या पथरियों के संचार में जो पीड़ा होती है वही पित्तशूल है।

पित्तशोथ
संज्ञा पुं० [सं०] पित्तवृद्बि से होनेवाली सूजन [को०]।

पित्तश्लेश्मज्त्रर
संज्ञा पुं० [सं०] वह ज्वर जो पित्त और कफ दोनों के प्रकोप अथवा अधिकता से हुआ हो। विशेष—मुख का कड़ुवापन, तंद्रा, मोह, खाँसी, अरुचि, तृष्णा, क्षणिक दाह और कुछ ठंढ लगना आदि इसके लक्षण हैं।

पित्तश्लेश्माल्वण
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का सन्निपात ज्वर। विशेष—इसमें शरीर के भीतर दाह और बाहर ठंढा रहता है। प्यास बहुत अधिक लगती है, दहिनी पसलियों, छाती, सिर और गले में दर्द रहता है; कफ और पित्त बहुत कष्ट से बाहर निकलता है। मल पतला होकर निकलता है; साँस फूलती है और हिचकियाँ आती हैं।

पित्तसंशयन
संज्ञा पुं० [सं०] आयुर्वेदोक्त ओषधियों का एक वर्ग या समूह जिसमें की औषधियाँ प्रकुपित पित्त को शांत करनेवाली मानी जाती हैं। विशेष—सुश्रुत के अनुसार इस वर्ग में निम्नालिखित ओषधियाँ हैं—चंदन, लालचंदन, नेत्रबाला, खस, अर्कपुष्पी, बिदारीकंद, सतावर, गोंदी, सिवार, सफेद कमल, कुई, नील कमल केला, कँवलगट्टा, दूब मरोरफली (मूर्वा)। काकोल्यादिगण न्यग्रोधादिगण और तृणपंचसूल।

पित्तस्थान
संज्ञा पुं० [सं०] शरीर के वे पाँच स्थान जिनमें वँद्यक ग्रंथों के अनुसार पाचक, रंजक आदि पाँच प्रकार के पित्त रहते हैं। ये स्थान आमाशय पक्वाशय, यकृत प्लीहा, ह्वदय दोनों नेत्र और त्वचा हैं।

पित्तस्यंद
संज्ञा पुं० [सं० पित्तस्यन्द] पित्त के कारण उत्पन्न एक नेत्ररोग [को०]।

पित्तस्राव
संज्ञा पुं० [सं०] सुश्रुत के अनुसार एक नेत्ररोग जिसमें नेत्रसंधि से पीला या नीला और गरम पानी बहता है।

पित्तहर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] खस। उशीर।

पित्तहर (२)
वि० [सं०] पित्त का नाशक [को०]।

पित्तहा (१)
संज्ञा पुं० [सं० पित्तहन] पित्तपापड़ा।

पित्तहा (२)
वि० पित्तनाशक (द्रव्य)।

पित्तांड
संज्ञा पुं० [सं० पित्ताण्ड] घोड़ों के अंडकोश में होनेवाला एक रोग।

पित्ता
संज्ञा पुं० [सं० पित्त] १. जिगर में वह थैली जिसमें पित्त रहता है। पित्ताशय। विशेष विवरण के लिये दे० 'पित्ताशय'। मुहा०—पित्ता उबलना = दे० 'पित्ता खौलना'। पित्ता खौलना = बड़ा क्रोध आना। मिजाज भड़क उठना। जैसे—तुम्हारी बातें सुनकर तो उसका पित्ता खौल गया। विशेष—पित्त का नाम अग्नि तथा तेज मी है, इन्हीं कारणों से इन मुहावरों की उत्पात्ति हुई है। पित्ता उबलना, पित्ता खौलना, आदि पित्त उबलना या पित्त खौलना का लक्षणा- त्मक रूप है। पित्ता निकालना † ‡ = काम कराके अथवा और किसी प्रकार से किसी को अत्यंत पीड़ित करना। बहुत अधिक परिश्रम का काम कराना। पित्ता पानी करना = बहुत परिश्रम करना। जान लड़ाकर काम करना। अति कठोर प्रयास करना। जैसे,—इस काम में बड़ा पित्ता पानी करना पड़ेगा। पित्ता मरना = कुद्ध या उत्तेजित होने की आदत छूट जाना। गुस्सा न रह जाना। जैसे,—अब उसका पित्ता बिलकुल मर गया। पित्ता मारना = (१) क्रोध दबाना। क्रोध होने पर चित्त शांत रखना। सहना।उत्तेजना को दबा रखना। जब्त करना। जैसे,—मैं पित्ता मारकर रह गया नहीं तो अनर्थ हो जाता। (२) बिना उदविग्न हुए या ऊबे कोई कठिन काम करते रहना। कोई अरुचिकर या कठिन काम करने में न ऊबना। जैसे,—जो बड़ा पित्ता मारे वह इस काम को कर सकता है। पित्तमार काम = वह काम जो रुचिकर न हो। अरुचिकर और कठिन काम। कर्ता को उबा देनेवाला काम। मन मारकर किया जानेवाला काम। २. हिम्मत। साहस। हौसला। जैस,---उसका कितना पित्ता है जो दो दिन भी तुम्हारे मुकाबले ठहर सके।

पित्तातिसार
संज्ञा पुं० [सं०] वह अतिसार रोग जिसका कारण पित्त का प्रकोप या दोष होता है। विशेष—मल का लाल, पीला अथवा हरा और दुर्गधयुक्त होना, गुदा पक जाना, तृषा मूर्छा और दाह की अघिकता इस रोग के लक्षण हैं।

पित्ताधिक
संज्ञा पुं० [सं० पित्त + अधिक आधिक्य] सन्निपात का एक रोग।—माधव०, पृ० २८।

पित्ताभिष्यंद, पित्ताभिस्यंद
संज्ञा पुं० [सं० पित्ताभिष्यन्द, पित्ता- भिस्यन्द] आँख का एक रोग। पित्तकोप से आँख आना। विशेष—आँखों का उष्ण और पीतवर्ण होना, उनमें दाह और पकाव होना उनमें धुआँ उठता सा जान पड़ना और बहुत अधिक आँसू गिरना इस रोग के लक्षण हैं।

पित्तारि
संज्ञा पुं० [सं०] १. पित्तपापड़ा। २. लाख। ३. पीला चंदन।

पित्ताशय
संज्ञा पुं० [सं०] पित्त की थैली। पित्तकोष। विशेष—यह यकृत या जिगर में पीछे और नीचे की ओर होता है। इसका आकार अमरूद या नासपाती का सा होता है। यकृत में पित्त का जितना अंश भोजनपाक की आवश्यकता से अधिक होता है वह इसी में आकर संचित रहता है।

पित्तिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक ओषधि। एक प्रकार की शतपदी।

पित्ती (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० पित्त + ई] एक रोग जो पित्त की अधि- कता अथवा रक्त में बहुत अधिक उष्णता होने के कारण होता है। विशेष—इसमें शरीर भर में छोटे छोटे ददोरे पड़ जाते हैं और उनके कारण त्वचा में इतनी खुजली होती है कि रोगी जमीन पर लोटने लगता है। क्रि० प्र०—उछलना। २. लाल लाल महीन दाने जो पसीना मरने से गरमी के दिनों में शरीर पर निकल आते हैं। अँभौरी।

पित्ती † (२)
संज्ञा पुं० [सं० पितृ] पितृव्य। चाचा। काका। बाप का भाई।

पित्ती (३)
संज्ञा स्त्री० [?] एक प्रकार की बेल जिसे रक्तवल्ली भी कहते हैं।

पित्तेदार
वि० [हिं० पित्ता + फा़० दार (प्रत्य०)] क्रोधी। आवेश में आनेवाला। उ०—पित्तेदार मनुष्य के लिये कोइ जरा सी बात हो जाती वो उसको खुर्दबीन की भाँत अपने मन ही मन में सोच सोचकर पहाड़ की बराबर बना लेता है।— श्रीनिवास ग्रं०, पृ० ७८।

पित्तोक्लिष्ट
संज्ञा पुं० [सं०] आँख की पलकों का एक रोग जिसमें पलकों का दाह, क्लेद अत्यंत पीड़ा होती है, आँखें लाला और देखने में असमर्थ हो जाती हैं।

पित्तोदर
संज्ञा पुं० [सं०] पित्त के बिगड़ने से होनेवालाएक उदर- रोग। विशेष—इसमें शरीर का वर्ण, नेत्र और मल, मूत्र आदि सब पीला हो जाता है, और शोष तृषा, दाह और ज्वर का प्रकोप होता है।

पित्तोपहत
वि० [सं०] पित्त से पीड़ित [को०]।

पित्तोल्वण सन्निपात
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का सन्नि- पातिक ज्वर। आशुकारी ज्वर। विशेष—इसका लक्षण है—आतिसार, भ्रम, मूर्छा, मुँह में पकाव, देह में लाल दानों का निकल आना और अत्यंत दाह होना।

पित्र पु
संज्ञा पुं० [सं० पितृ] दे० 'पितृ'। उ०—सोनित कुंड भराय कै पोषे अपने पित्र। तिनकै निरदय रूप में नाहिन कोऊ चित्र।—नंद० ग्रं०, १८१।

पित्र्य (१)
वि० [सं०] १. पितृ संबंधी। २. श्राद्ध करने योग्य। जिसका श्राद्ध हो सके।

पित्र्य (२)
संज्ञा पुं० १. शहद। मधु। २. उरद। ३. बड़ा भाई। ४. पितृतीर्थ। ५. तर्जनी और अँगूठे का अंतिम भाग।

पित्र्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मघा नक्षत्र। २. पूर्णिमा। ३. अमावस्या।

पित्सत
संज्ञा पुं० [सं०] पक्षी [को०]।

पित्सल
संज्ञा पुं० [सं०] मार्ग। पथ [को०]।

पिथौरा
संज्ञा पुं० [सं० पृथ्वीराज] भारत का अंतिम हिंदू सम्राट् पृथ्वीराज।

पिदड़ी
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'पिद्दी'।

पिदर
संज्ञा पुं० [फा़०, तुल० सं० पितर, अं० फादर] पिता। जनक [को०]। यौ०—पिदरकुशी = पितृहननन। पिता की हत्या।

पिदरीयत
संज्ञा स्त्री० [फा़० पिदर + ईयत (प्रत्य०)] पितृत्व। उ०—आप लड़कियों के एतबार से पिदरायत के जिस दर्जे में हैं, लड़कों के एतबार से उसी दर्जे में मैं हूँ।—प्रेम० और गोर्की, पृ० ३७।

पिदारा †
संज्ञा पुं० [हिं० पिद्दा] पिद्दी पक्षी का नर। पिद्दा। उ०—चकई चकवा और पिदारे। नकटा लेदी सोन सलारे।— जायसी (शब्द०)।

पिद्दा
संज्ञा पुं० [हिं० पिद्दी] १. पिद्दी का पुल्लिंग। विशेष दे० 'पिद्दी'। २. गुलेल की ताँत में वह निवाड़ आदि की गद्दी जिसपर गोली को फेकने के समय रखते हैं। फटकना।

पिद्दो
संज्ञा स्त्री० [हिं० पिद्दा या फुदकना फुदकी] १. बया की जाति की एक सुंदर छीटी चिड़िया। विशेष—यह बया से कुछ छोटी और कई रंगों की होती है। आवाज इसकी मीठी होती है। अपने चंचल स्वभाव के कारण यह एक स्थान पर क्षण भर भी स्थिर होकर नहीं बैठती, फुदकती रहती है। इसी से इसे 'फुदकी' भी कहते हैं। २. बहुत ही तुच्छ और अगण्य जीव।

पिद्धना पु
क्रि० स० [गुज०, पिधेलु] १. पिलाना। २. पीना। पान करना। उ०—अमृत्त देव पिद्धयं। सुरा सुदैत सिद्धयं।— पृ० रा०।

पिधातव्य
वि० [सं०] ढकने, बंद करने वा मूँदने योग्य [को०]।

पिधान
संज्ञा पुं० [सं०] १. आच्छादन। आवरण। पर्दा। गिलाफ। २. ढक्कन। ढकना। ३. तलवार का मान। खड्गकोष ४. आच्छादित करने की क्रिया (को०)। ५. पु किवाड़। उ०—सुख के निधान पाए हिए के पिधान लाए ठग के से लाड़ू खाए प्रेममधु छाके हैं—तुलसी (शब्द०)।

पिधानक
संज्ञा पुं० [सं०] १. म्यान। कोष। २. आच्छादन। ढक्कन (को०)।

पिधानी
संज्ञा स्त्री० [सं०] ढकनेवाली वस्तु। ढक्कन [को०]।

पिधायक
वि० [सं०] ढकनेवाला। छिपानेवाला [को०]।

पिधायो
वि० [सं० पिधायिन्] ढकनेवाला। छिपानेवाला [को०]।

पिन
संज्ञा स्ञी [अं०] लोहे या पीतल आदि की बहुत छोटी कील जिससे कागज इत्यादि नत्थी करते हैं। आलपीन।

पिनक
संज्ञा स्ञी० [हिं०] दे० 'पीनक'।

पिनकना
क्रि० अ०[ हिं० पिनक] १. अफीम के नशे में सिर का झुका पड़ना। अफीमची का नशे की हालत में आगे की ओर झुकना या ऊँघना। पीनक लेना। २. नींद में आगे को झुकना। ऊँधना। जसे,—शाम हुई और तुम लगे पिनकने। ३. चिढ़ना। खीझना।

पिनकी
संज्ञा पुं० [हिं० पीनक] वह व्यक्ति जो अफीम के नशे में पीनक लिया करे। पिनकनेवाला अफीमची।

पिनच पु
संज्ञा स्ञी० [सं० प्रत्यञ्चा] दे० 'पनच'। उ०—पैली पार की पारधी, ताकी घुनहीं पिनच नहीं रे। ता बेर्ली कौ ढूँक्यौ मृगलौ ता मृग कैसी सनहीं रे।—कबीर ग्रं०, पृ० १६०।

पिनद्ध
वि० [सं०] बँधा हुआ। कसा हुँआ। २. धारण किया हुआ। पहना हुआ। ३. आच्छादित। छिपा हुआ। आवृत। ४. बिद्ध। बिंधा हुआ [को०]।

पिनपिन †
संज्ञा पुं० [ अनु०] १. बच्चों का आनुनासिक और अस्पष्ट स्वर में ठहर ठहरकर रोने का शब्द। नकियाकर धीमे धीमे ओर थोड़ा रुक रुककर रोने की आवाज। २. रोगी या दुर्बल बच्चे के रोने का शब्द। रोगी या दुर्बल बच्चे का रोना। ३. पिनपिन करके रोना। बार बार धीमी और अनुनासिक आवाज में रोना। नकियाकर और ठहर ठहरकर रोना। क्रि० प्र०—करना।—लगाना।

पिनपिनहाँ †
संज्ञा पुं० [हिं० पिनपिन + हा (प्रत्य०)] १. पिन पिन करनेवाला बच्चा। रोना लड़का। वह बालक जो हर समय रोया करे। २. रोगी या दुर्बल बालक कमजोर या बीमार बच्चा।

पिनपिनाना †
क्रि० अ०[हिं० पिनपिन] १. पिनपिन शब्द करना। रोते समय नाक से स्वर निकालना। २. धीमे स्वर में और रुक रुककर रोना। ३. रोगी अथवा कमजोर बच्चे का रोना।

पिनपिनाहट
संज्ञा स्त्री० [हिं० पिनपिनाना] १. पिनपिन करके रोने का शब्द। २. पिनपिन करके रोने की क्रिया या भाव।

पिनल कोड
संज्ञा पुं० [अं० पेनल कोड] दंडित या शासित करने की संहिता। नियम वा कानून की संहिता। दंडसंहिता। उ०—समाजनीति के पिनल कोडों में लिखा है।—शराबी, पृ० ९९।

पिनसन †
संज्ञा स्ञी [अं० पेन्शन] दे० 'पेंशन'।

पिनसिन ‡
संज्ञा स्त्री० [अं० पेन्शन] दे० 'पेंशन'।

पिनहाँ
वि० [फा़०] छिपा हुआ। गुप्त। उ०—बोले अलख अल्ला तु है, पिनहाँ तेरा इसरार है।—कबीर मं०, पृ० ३९०।

पिनाक
संज्ञा पुं० [सं०] शिव का धनुष जिसे श्रीरामचंद्र जी ने जनकपुर में तोडा़ था। अजगव। यौ०—पिनाकगोप्ता। पिनाकधृक्, पिनाकघृत, पिनाकहस्त = दे० 'पिनाकपाणि'। मुहा०—पिनाक होना = (किसी काम का) अत्यंत कठिन होना। (किसी काम का) दुष्कर या असाध्य होना।— जैसे,—तुम्हारे लिये जरा सा काम भी पिताक हो रहा है । २. कोई धनुष। ३. त्रिशूल। ४. एक प्रकार का अभ्रक। नीला अभ्रक। नीलाभ्र। †५. एक प्रकार का वाद्य। दे० 'पिनाकी'—२। उ०—किन्नर तमूर बाजै कानूड़ की तरंगी। ढोलक पिनाक खँजरि तबले बजै उमंगी।—ब्रज० ग्रं०, पृ० ६०। ६. पांशुवर्षा। धूलिवर्षण (को०)। ७. बेंत या लाठी (को०)।

पिनाकी (१)
संज्ञा पुं० [सं० पिनाकिन्] महादेव। शिव।

पिनाकी (२)
संज्ञा स्त्री० एक प्रकार का प्राचीन बाजा जिसमें तार लगा रहता था और जो उसी तार को छेड़ने से बजता था।

पिनालटी
संज्ञा स्त्री० [अं० पेनाल्टी] हर्जाना। वह सजा जो रुपए पैसे के रूप में दी जाती है। अर्थदंड। उ०—आपको पिना- ल्टी देनी पड़ेगी।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० १४७।

पिनावना पु
क्रि० स० [सं० पिञ्जन] रुई धनुवाना। उ०— जोइ जोइ निकट पिनावन आवै, रुई सबनि की पींजै। परमारथ कौं देह धरयौ है, मसकति कछू न लीजै।—सुंदर० ग्रं०, भा० २, पृ० ८६९।

पिन्न पिन्न ‡
संज्ञा स्त्री० [अनुध्व०] दे० 'पिनपिन'। उ०—एक नया तार पिन्न पिन्न करने लगा।—संन्यासी, पृ० २९५।

पिन्नस † (१)
संज्ञा पुं० [ सं० पीनस] दे० 'पीनस'।

पिन्नस † (२)
संज्ञा स्त्री० [फा़० पीनस] पालकी। डोली।

पिन्ना † (१)
वि० [हिं० पिनपिनाना] जो सदा रोता रहे। रोनेवाला। रोना।

पिन्ना † (२)
संज्ञा पुं० [ सं० पिञ्जन] १. 'पींजन'। २. धनुकी।

पिन्ना † (३)
संज्ञा पुं० [ सं० पींडन या देश०] दे० 'पीना' (२)। 'पिना' (३)।

पिन्निय पु
वि० [सं० पिनद्ध] आवृत। आच्छादित। बँधा हुआ। युक्त। उ०—सुभ लच्छिन उत्तंग अंग अंगं गुन पिन्निय। ता समान धबि बाम आन करतार न किन्निय।—पृ० रा०, १७।८६।

पिन्नी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की मिठाई, जो आटे या अन्नचूर्ण में चीनी या गुड़ मिलाकर बनाई जाती है।

पिन्यास
संज्ञा पुं० [सं०] हींग।

पिन्हाना
क्रि० स० [हिं० पहिनना या सं० पिनद्धन] दे० 'पहनाना'।

पिपतिषत्, पिपतिषु
संज्ञा पुं० [सं०] विहग। पक्षी [को०]।

पिपरमिंट
संज्ञा पुं० [अ०] पुदीने की जाति का पर रूप में उससे भिन्न एक पौधा। विशेष—यह पौधा यूरोप और अमेरिका में होता है। इसकी पत्तियों में एक विशेष प्रकार की गंध और ठंढक होती है जिसका अनुभव त्वचा और जीभ पर बड़ा तीव्र होता है। इसका व्यवहार औषध में होता है। पेट के दर्द में यह विशेषतः दिया जाता है। इसका पौधा देखने में भाँग के पौधे से मिलता जुलता होता है। टहनियाँ दूर तक सीधी जाती है जिनमें थोड़े अंतर पर दो दो पत्तियाँ और फूलों के गुच्छे होते हैं। पत्तियाँ भाँग की पत्तियों की सी होती है। २. उक्त पौधे से बना हुआ सफेद रंग का पदार्थ।

पिपरामूल
संज्ञा पुं० [सं० पिप्पलीमूल] पिप्पलीमूल। पीपल की जड़।

पिपराही †
संज्ञा पुं० [हिं० पीपर + आही (प्रत्य०)] पीपल का वन। पीपल का जंगल।

पिपली
संज्ञा स्त्री० [देश० नेपाली] एक पेड़ जो नैपाल, दार्जि- लिंग आदि में होता है। इसकी लकड़ी बहुत मजबूत होती है और किवाड़, चौकठे, चौकियाँ, आदि बनाने के काम में आती है।

पिपास
संज्ञा स्त्री० [सं० पिपासा] दे० 'पिपासा'। उ०—छूटै सब सबनि के सुख क्षुत्पिपास।—केशव (शब्द०)।

पिपासा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पानेच्छा। तृष्णा। तृषा। प्यास। २. लालच। लोभ। जैसे, धन की पिपासा।

पिपासर्ति
संज्ञा स्त्री० [सं० पिपासा + आर्ति] प्यास अर्थात् तीव्रेच्छा को मनोव्यथा। उत्कट कामना की वेदना। उ०—यह वेदना संक्रांति काल के २ जनसमूह की पिपासार्ति है।—कुंकुम (भू०), पृ० १३।

पिपासित
वि० [सं०] तृषित। प्यासा।

पिपासी
वि० [सं० पिपासिनू] तृषित। प्यासा [को०]।

पिपासु
वि० [सं०] तृषित। पानेच्छु। प्यासा। २. उग्र इच्छा रखनेवाला। तीव्र इच्छुक। लालची। जैसे, रक्तपिपासु, अर्थपिपासु।

पिपियाना (१)
क्रि० अ० [ हिं० पीप + इयाना (प्रत्य०)] पीप पड़ना। मवाद आना। जैसे, फोड़े का पिपियाना।

पिपियाना (२)
क्रि० स० पीप उत्पन्न करना। मवाद पैदा करना। जैसे,—यह दवा फोडे़ को पिपिया देगी।

पिपियाना ‡ (३)
क्रि० अ० [हिं० पिनपिनाना] १. पें पें करना। अनावश्यक बोलना। २. बच्चों का रुदन करना। जैसे— क्यों पिपियाते हो ?

पिपिली
संज्ञा स्त्री० [सं०] चींटी। पिपीलिका [को०]।

पिपीतक
संज्ञा पुं० [सं०] भविष्य पुराण के अनुसार एक ब्राह्मण जिसने पिपीतकी द्वादशी का ब्रत पहले पहल किया था।

पिपीतकी
संज्ञा स्त्री० [सं०] वैशाख शुक्ल द्वादशी। विशेष—भविष्य पुराण में यह व्रत का दिन कहा गया है। पहले पहल इस को पिपीतक नाम के एक ब्राह्मण ने किया था जिसकी कथा इस प्रकार है। पिपीतक को यमदूत ले गए। यमलोक में उसे बड़ी प्यास लगी और वह व्याकुल होकर चिल्लाने लगा। अंत में उसने यमराज की बड़ी स्तुति की जिससे प्रसन्न होकर उन्होंने उसे फिर मर्त्यलोक में भेजा और वैशाख शुक्ल द्वादशी का व्रत बताया। इस व्रत में ठंढे पानी से भरे हुए घड़े ब्राह्मण को दिए जाते हैं।

पिपील
संज्ञा स्त्री० [सं०] चींटी [को०]।

पिपीलक
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० अल्पा० पिपीलिका] चींटी। चिउँटा।

पिपीलिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. चींटा। २. सोना जो चींटों द्वारा एकत्र हो [को०]। यौ०—पिपीलिकपुट = वल्मीक। बाँबी।

पिपीलिकमध्य
एक प्रकार का व्रत।

पिपीलिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] चिउँटी। चींटी। कीड़ी। यौ०—पिपीलिकापरिसर्पण—चींटियों का इधर उधर दौड़ना। पिपीलिकामध्य = मनुस्मृति के अनुसार एक व्रत।

पिपिलिकाभक्षी
संज्ञा पुं० [सं०] दक्षिण अफ्रिका का एक जंतु जिसे बहुत लंबा थूथन और बहुत बड़ी जीभ होती है। विशेष—इसे दाँत नहीं होते। इसके अगले पंजे बहुत दृढ़ होते हैं।जिनसे यह चींटियों के बिल खोदता है। यह उँगलियों के बल चलता है तलवों के बल नहीं। इसके कंधे मोटे और भद्दे होते हैं। गरदन से रीढ़ तक लंबे लंबे बाल होते हैं। यह चींटियों के बिलों में अपने थूथन को डालकर उन्हें खींच लेता है। चींटी के आहार के बिना यह जंतु नहीं रह सकता।

पिपीलिकामातृका दोष
संज्ञा पुं० [सं०] एक बालरोग जो जन्म के दिन से ग्यारहवें दिन, ग्यारहवें महीने या ग्यारहवें वर्ष होता है। इसमें बालक को ज्वर होता है और उसका आहार छूट जाता है।

पिपीलिकोद्वाप
संज्ञा स्त्री० [सं०] बाँबी। वल्मीक [को०]।

पिपीली
संज्ञा स्त्री० [सं०] पिपीलिका, चींटी।

पिप्तटा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की मिठाई।

पिप्पल
संज्ञा पुं [सं०] १. पीपल का पेड़। अश्वत्थ। २. एक पक्षी। ३. रेवती से उत्पन्न मित्र का एक पुत्र। (भागवत)। ४. नंगा आदमी। नग्न व्यक्ती। ५. जल। ६. वस्त्रखंड। ७. अंगे आदि की बाँह या आस्तीन। ८. गोदा। पीपल की गोदा (को०)। ९. ऐंद्रिक भोग (को०)। १०. स्तनाग्र। चूचुक। कुचाग्र (को०)। ११. कर्मजन्य फल। कर्मफल (को०)।

पिप्पलक
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्तनमुख। चूचुक। २. सिलाई करने का तागा (को०)।

पिप्पलयोग
संज्ञा पुं० [सं०] चीन और जापान में होनेवाला एक पौधा। मोमचीना। विशेष—यह अब भारतवर्ष में भी फैल गया है और गढ़वाल, कुमाऊँ और काँगड़े की पहा़ड़ियों में पाया जाता है। इसके फलों के बीज के ऊपर चरबी या चिकना पदार्थ होता है जिसे चीनी मोम कहते हैं।

पिप्पला
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्राचीन नदी का नाम [को०]।

पिप्पलाद (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक ऋषि जो अथर्ववेद की एक शाखा के प्रवर्तक थे और जिनका नाम पुराणों में आया है।

पिप्पलाद (२)
वि० [सं०] १. पीपल का गोदा खानेवाला। २. ऐंद्रिक भोगों में लीन। विषय भोग में आसक्त [को०]।

पिप्पलाशन
वि० [सं०] दे० 'पिप्पलाद' (२) [को०]।

पिप्पलि
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक ओषधि। विशेष दे० 'पीपल' (२)[को०]।

पिप्पली
संज्ञा स्त्री० [सं०] पीपल।

पिप्पलीका
संज्ञा पुं० [सं०] पीपल का छोटा पेड़ [को०]।

पिप्पलीखंड़
संज्ञा पुं० [सं० पिप्पलीखण्ड] वैद्यक के अनुसार प्रस्तुत एक औषध। विशेष—इसकी निर्माणविधि इस प्रकार कही है—पीपल का चूर्ण ४ पल, घी ६ पल, शतमूली का रस ८ पल, चीनी दो सेर, दूध ८ सेर एक साथ पकावे, फिर पाग में इलायची, मोथा, तेजपत्ता, धनिय़ाँ, सोंठ, वंशलोचन, जीरा, हड़, आँवला और मिर्च डाले और ठंढे होने पर ३ पल मधु भी मिला दे।

पिप्पलीमूल
संज्ञा पुं० [सं०] पिपरामूल। पिपलामूल।

पिप्पल्यादिगणा
संज्ञा पुं० [सं०] सुश्रुत के अनुसार ओषधियों का एक वर्ग जिसके अंतर्गत पिप्पली, चीता, अदरख, मिर्च, इलायची, अजवायन, इंद्रजौ, जीरा, सरसों, बकायन, हींग, भार्गी, अतिविषा, बच, बिडंग और कुटकी हैं।

पिप्पिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दाँतों की मैल।

पिप्पिक
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० पिप्पीका] एक पक्षी।

पिप्लु
संज्ञा पुं० [सं०] १. जंतु मणि। २. तिल (को०)।

पिथ पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रिय, प्रा० पिअ] स्त्री का पति। स्वामी। उ०—बहुरि बदन बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितै भौंह करि बाँकी। खंजन मजु तिरीछे नैननि। निज पति कहेउ तिन्हहिं सिय सैननि।—तुलसी (शब्द०)।

पियक्कड़ (१)
वि० [हिं० पीना + अक्कड़ (प्रत्य०)] अधिक पीनेवाला। सीमा से ज्यादा पीनेवाला।

पियक्कड़ (२)
संज्ञा पुं० शराबी। उ०—सुख भोगना लिखा होता, तो जवान बेटे चल देते, और इस पियक्कड़ के हाथों मेरी यह साँसत होती।—गबन, पृ० २३४।

पियड़ा पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रिय, प्रा० पिअ; पिअल] प्रिय। पति। स्वामी। उ०—सती सत साचा गहै मरणौंन ड़राई। प्राण तजै जग देखतां, पियड़ौ उर लाई।—दादू०, पृ० ५८५।

पियना पु
वि० [हिं० पीना] पेय। पीने का। उ०—पूत कौ नित पियनौ पय हुतौ। आँच लगैं अति उमग्यौ सु तौ।— नंद० ग्रं०, पृ० २४९।

पियर †
वि० [सं० पीत] दे० 'पीयर', 'पीला'।

पियरई ‡
संज्ञा स्त्री० [हिं० पियर + ई (प्रत्य०)] पीलापन।

पियरवा ‡
संज्ञा पुं० [ सं० प्रिय० प्रा० पिअ, अप० पियल, हिं० पियड़ + वा (प्रत्य०)] दे० 'पियारा'।

पियराई †
संज्ञा स्त्री० [हिं० पियर, पीयर + आई (प्रत्य०)] पीतता। पीलापन। जर्दी।

पियराना पु †
क्रि० अ० [हिं० पियर] पीला पड़ना। पीला होना।

पियरो पु † (१)
वि० स्त्री० [हिं०] दे० 'पीली'।

पियरी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० पियर] १. पीली रँगी हुई धोती। २. २. पीलापन। पीतता। उ०—डर ते मुख पियरो गई। ललित कपोलन पर छबि छई।—नंद ग्रं०, पृ० २५१। ३. एक प्रकार का पीला रंग जो गाय को आम की पत्तियाँ खिलाकर उसके मूत्र से बनाया जाता है। ४. † एक रोग। पीलिया।

पियरोला
संज्ञा पुं० [हिं० पीयर] पीले रंग की एक छोटी चिड़िया जो मैना सें कुछ छोटी होती हैं और जिसकी बोली बहुत मीठी होती है।

पियली
संज्ञा स्त्री० [हिं० प्याली] नारियल की खोपरी का वह दुकड़ा जिसे बढ़ई आदि बरमे के ऊपरी सिरे के काँटे पर इसलिये रख लेते हैं जिसमें छेद करने के लिये बरमा सहज में घूम सके।

पियल्ला † (१)
संज्ञा पुं० [हिं० पीना] दूधपीता बच्चा। दूध का बच्चा। उ०—तियन को तल्ला पिय, तियन पियल्ला त्यागे ढौसत प्रबल्ला मल्ला धाए राजद्वार को।—रघुराज (शब्द०)।

पियल्ला (२)
संज्ञा पुं० [हिं० पीयर] दे० 'पियरोला'।

पियवास
संज्ञा पुं० [ हिं० पिय + बाँस] दे० 'पियाबाँसा'।

पिया पु
संज्ञा पुं० [ सं० प्रिय] दे० 'पिय'।

पियाज ‡
संज्ञा पुं० [ फा़० प्याज] दे० 'प्याज'।

पियाजी †
वि० [हिं० पियाज + ई (प्रत्य०)] दे० 'प्याजी'।

पियादा †
संज्ञा पुं० [फा़० प्यादह्, प्यादा] दे० 'प्यादा'।

पियादा पु
वि० [सं० पादतल, प्रा० पायदल] पैदल। जो पाँव पाँव चले। उ०—कबही सोवै भुई पियादे मँजिल गुजारी।— पलटू, भा० १, पृ० १४।

पियान पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रयाण] यात्रा। दे० 'प्रयाण'। उ०— (स्वामी जी) अगम अगोचर दूर पियाना मारग लष न कोई।—रामानंद०, पृ० १४।

पियाना †
क्रि० स० [हिं०] दे० 'पिलाना'।

पियानो
संज्ञा पुं० [अं०] एक प्रकार का बड़ा अँगरेजी बाजा जो मेज के आकार का होता है। विशेष—इसके भीतर स्वरों के लिये कई मोटे पतले तार होते हैं जिनका संबंध ऊपर की पटरियों से होता है। पटरियों पर ठोकर लगने स्वर निकलते हैं।

पियाबाँसा
संज्ञा पुं० [ सं० प्रिय, हिं० पिय + बाँस] कटसरैया। कुरबक।

पियामन
संज्ञा पुं० [देश०] राजजामुन नाम का वृक्ष। वि० दे० 'राजजामुन'।

पियार (१)
संज्ञा पुं० [ सं० पियाल] मझोले आकार का एक पेड़। विशेष—देखने में यह पेड़ महुवे के पेड़ सा जान पड़ता है। पत्ते भी इसके महुवे के पत्तों से मिलते जुलते होते हैं। वसंत ऋतु में इसमें आम की सी मंजरियाँ लगती हैं जिनके झड़ने पर फालसे के बराबर गोल गोल फल लगते हैं। इन फलों में मीठे गूदे की पतली तह होती है जिसके नीचे चिपटे बीज होते हैं। इन बीजों की गिरी स्वाद में बादाम और पिस्ते के समान मीठी होती है और मेवों में गिनी जाती हैं। यह गिरी चिरौंजी के नाम से बिकती है। पियार के पेड़ भारतवर्ष भर के विशेषतः दक्षिण के जंगलों में होते हैं। हिमालय के नीचे भी थोड़ी उँचाई तक इसके पेड़ मिलते हैं पर यह विशेषतः विंध्य पर्वत के जंगलों में अधिकता से पाया जाता है। इसके धड़ में चीरा लगाने से एक प्रकार का बढ़िया गोंद निकलता है जो पानी में बहुत कुछ घुल जाता है। कहीं कहीं यह गोंद कपड़े में माड़ी देने के काम में आता है और छीपी इसका व्यवहार करते हैं। छाल और फल अच्छे वारनिश का काम दे सकते हैं। इसकी लड़की उतनी मजबूत नहीं होती पर लोग उससे खिलौने, मुठिया और दरवाजे के चौखट आदि भी बनाते हैं। पत्तियाँ चारे के काम में आती हैं। इस वृक्ष के संबंध में यह समझ रखना चाहिए कि यह जंगलों में आपसे आप उगता है, कहीं लगाया नहीं जाता। इसे कहीं कहीं अचार भी कहते हैं।

पियार † (२)
वि० [हिं०] दे० 'प्यारा'।

पियार † (३)
संज्ञा पुं० दे० 'प्यार'।

पियार † (४)
संज्ञा पुं० [हिं० पलाल] दे० 'पयाल'।

पियारा †
वि० [हिं०] दे० 'प्यारा'। उ०—भाई बंधु औ लोग पियारा; बिनु जिय जिय धरी न राखै पारा।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० २५३।

पियाल
संज्ञा पुं० [सं०] चिरौंजी का पेड़। विशेष दे० 'पियार'।

पियाला पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'प्याला'। उ०—अजब चीज खूरदनी पियाल ए मस्ता।—दादू०, पृ० १०९।

पियाला
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'प्याला'।

पियावबड़ा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की मिठाई। विशेष—इसके बनाने की विधि इस प्रकार है—पहले चावल को पकाकर सिल पर पीसते हैं, फिर गुलाब अतर और पाँचो मेवे मिलाकर बड़े की तरह बनाते हैं। अनंतर घी में तलकर चाशनी में डाल देते हैं।

पियास †
संज्ञा स्त्री [हिं०] दे० 'प्यास'।

पियासा †
वि० [हिं० पियास] दे० 'प्यासा'। उ०—जैसे कँवल सुरुज कै आसा। नीर कंठ लहि मरै पियासा।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० २७२।

पियासाल
संज्ञा पुं० [सं० पोतसाल, प्रियसालक] बहेड़ या अर्जुन की जाति का एक बड़ा पेड़। विशेष—यह भारतवर्ष के जंगलों में प्रायः सर्वत्र होता है। इसके पत्ते बहेड़े के पत्तों के समान चौड़े होते हैं जो शिशिर ऋतु में झड़ जाते हैं। फल भी बहेडे़ के समान होते हैं और कहीं कहीं चमडा़ सिझाने के काम में आते हैं। लकड़ी इसकी मजबूत होती है और मकानों में लगती है। गाडी, नाव और मूसल आदि भी इस लकड़ी के अच्छे होते हैं। इसकी छाल से पीला रंग बनता है। रंग के अतिरिक्त छाल दवा के काम में आती है। लाख भी इसमें लगता है। छोटा नागपुर और सिंहभूमि के आसपास के कोए पियासाल के पेड़ों पर पाले जाते हैं। वैद्यक में पियासाल कोढ़, विसप, प्रमेह, कृमि, कफ और रक्तपित्त को दूर करनेवाला तथा त्वचा और कोशों को हितकारी माना गया है। इसे सज भी कहते हैं। पर्या०—पीतसार। पीतसालक। प्रियक। असन। पीतशाल। महासर्ज।

पियासी †
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक तरह की मछली।

पियुख पु
संज्ञा पुं० [सं० पीयूष] दे० 'पीयूष' उ०—पियुख पयोधि मद्ध मनिन सौं बद्ध भूमि रोध सौं रूधिर रूचि रोचक रवन में।—मति० ग्रं०, पृ० ३३७।

पियूख पु
संज्ञा पुं० [सं० पीयूष] दे० 'पीयूष'।

पियूष पु
संज्ञा पुं० [सं० पीयूष] दे० 'पीयूष'।

पियूषभानु पु
संज्ञा पुं० [सं० पीयूषभानु] चंद्रमा। पीयूषभानु। उ०—तीछन जुन्हाई भई ग्रीषम को घामु, भयो भीषम पियूष- भानु भानु दुपहर कौ।—मति० ग्रं०, पृ० ३०३।

पिरंनि पु †
संज्ञा पुं० [सं० प्राणी, हिं० परानी †] प्राणी। जीव। उ०—दादू पसु पिरंनि के, येही मंझि कलूब। बैठो आहे बिच मैं पाणजो महबूब।—दादू०, पृ० ९०।

पिरकी ‡
संज्ञा स्त्री० [ सं० पिटिका, पिडक, पिडका,] फोड़िया। फुंसी। यौ०— पिरकी पाक †= फोडा़ फुंसी।

पिरतम †
संज्ञा पुं० [सं० प्रियतम] दे० 'प्रियतम'। उ०—बलाय जाऊँ मैं तो चरण ऊपर सूँ। महबुब साहेब तू ही पिरतम तुम बाज नहीं।—दक्खिनी०, पृ० १२६।

पिरता
संज्ञा पुं० [सं० पट्ट या हिं० पेरना (= दबाना)?] काठ या पत्थर का टुकड़ा जिसपर रूई की पूनी रखकर दबाते हैं।

पिरथम पु †
वि० [सं० प्रथम] दे० 'प्रथम'। उ०—तासु कला पिरथम सुन्न आई।—कबीर सा०, पृ० ६१।

पिरथिमी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० पृथिवी] दे०— 'पृथ्वी'। उ०—सब पिरथिमी असीसइ जोरि जोरि कै हाथ।—जायसी ग्रं० (गुप्त) प० १३०।

पिरथी पु ‡
संज्ञा स्त्री० [सं० पृथिवी; पुं० हिं० पृथी] दे० 'पृथ्वी'। उ०—पिरथी पवन के बीज पानी। दरमियान में तेज ककोलता है।—कबीर० रे०, पृ० २६।

पिरथोनाथ पु
संज्ञा पुं० [हिं० यिरथी + सं० नाथ] दे० 'पृथ्वीनाथ'।

पिरन †
संज्ञा पुं० [देश०] चौपायों का लँगडा़पन।

पिरभू पु †
संज्ञा पुं० [सं० प्रभु] ईश्वर। प्रभु। स्वामी। उ०— परतष ही दीसरै प्राणी, परभू भजण तणों परताप।— रघु० रू० पृ० २३।

पिरम्म पु
संज्ञा पुं० [ सं० प्रेम, हिं० पिरेम †] दे० 'प्रेम'। उ०— जो तुहि साध पिरम्म की सीस काटि करि गोइ। खेलत खेलत हाल करि जो किछु होइ त होइ।—कबीर ग्रं०, पृ० २५४।

पिराई पु †
संज्ञा स्त्री० [ हिं० पीला, पीरा] दे० 'पियराई'। उ०— यों उजराई, पिराई, ललाई, मलाई हू कै न मुलायमी है तन।—(शब्द०)।

पिराक
संज्ञा पुं० [ सं० षिष्टक, प्रा० पिट्ठक, पिडक] एक पकवान। गोझा। गुझिया। गोझिया। विशोष—इसको बनाने की विधि यह है कि मोयन दिए हुए मैदे की पतली लोई के भीतर सूजी, खोवा, मेवे आदि मीठे के साथ भरते हैं और उसे अर्धचंद्राकार मोड़कर कोर को गूँथ देते हैं फिर उसे घी में तरलकर निकाल लेते हैं।

पिराग †
संज्ञा पुं० [सं० प्रयाग] दे० 'प्रयाग'। उ०—जैसे कासी कुरखेत मथुरा पिराग हेत, जात हैं जगत सव काटन कौं पाप जू। —सुंदर ग्रं० (जी०), भा० १, पृ० १६९।

पिरान पु
संज्ञा पुं० [सं० प्राण] दे० 'प्राण'। उ०— नाहिंन चले पिरान, सो उपाय कीजै जु किन। — ब्रज० ग्रं०, पृ० ४।

पिराना पु †
क्रि० अ० [सं० पीडन] १. पीड़ित होना। दर्द करना। दुखना। उ०— चलत चलत पग पाँय पिराने।— सूर (शब्द०)। २. पीड़ा अनुभव करना। दुःख समझना। सहानभूति करना। उ०— सेइ साधु सुनि समुझि कै पर पीर पिरातो।— तुलसी (शब्द०)।

पिरामिड
संज्ञा पुं० [अं०] दे० 'पीरामिड'।

पिरारा पु ‡
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'पिंडारा'। उ०— रूप रस रासि पास पथिक ! पिरारे ऐन नैन ये तिहारे ठग ठाकुर मदन के।— रघुनाथ (शब्द०)।

पिरावना पु †
क्रि० स० [हिं० पेराना] पेरना। पेरवाना। उ०— पुष्प तिली संगम जब कीन्हा। कोल्हू माहि पिरावन लीन्हा।—कबीर सा०, पृ० २८२।

पिरावनो †
वि० [हिं० पिराना] पीडा देनेवाला। कष्टकर। उ०— कबीर पीर पिरावनी पंजर पीड़ न जाइ। एक न पीड परीत की रही कलेजा छाइ। — कबीर ग्रं०, पृ० ८।

पिरिंच †
संज्ञा पुं० [देश०] कटोरा। तश्तरी।

पिरिथिमो †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पृथ्वी'। उ०— सोने फूल पिरिथिमी फुली।— जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० ३५०।

पिरिया † (१)
संज्ञा पुं० [देश०] १. कुएँ से पानी निकालने का रहँट। २. एक प्रकार का बाजरा।

पिरिया पु † (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० पीढी़] पीढी़। पुश्त। उ०— पिरिया सहित सासरो पीहर, तारे खावंद आप तिरै।— रघु० रु०, पृ० १०२।

पिरो पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] 'प्रिय'। उ०— अठे पहर अरस मैं, बैठा पिरी पसंनि। दादू पसे तिनके जे दीदार लहंनि।— दादू०, पृ० १२९।

पिरीत पु
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रीति] दे० 'प्रीति'। उ०— कीन्हेसि प्रथम जोति परकासू। कीन्हेसि तेहि पिरीत कैलासू।— जायसी ग्रं०, पृ० १।

पिरीतम पु ‡
संज्ञा पुं० [सं० प्रियतम] दे० 'प्रियतम'। उ०— भल तुम्ह सुवा कीन्ह है फेरा। गाढ़ न जाइ पिरीतम केरा।— जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० २७२।

पिरीता पु
वि० [सं० प्रीत (= प्रसन्न)] प्रिय। प्यारा। उ०— हा रघुनंदन प्रान पिरीते। तुम बिनु जियत बहुत दिन बीते।— तुलसी (शब्द०)।

पिरीति, पिरीती पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'प्रीति'। उ०— पीउ सेवाति सों जैस पिरीती। टेकु पियास बाँधु जिय थीती।— जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० ३५४।

पिरोज
संज्ञा पुं० [फा़० फीरोज ?] कटोरा। तश्तरी।

पिरोजन (१)
संज्ञा पुं० [हिं० पिरोना या सं० प्रयोजन] बालक के कान छेदने की रीति। कनछेदन।

पिरोजन † (२)
संज्ञा पुं० [सं० प्रयोजन] दे० 'प्रयोजन'।

पिरोजा
संज्ञा पुं० [फा० फीरोजा] हरापन लिए एक प्रकार का नीला पत्थर। दे० 'फिरोजा'। उ०— मानिक मरकत कुलिस पिरोजा। चीर कोर पचि रचे सरोजा। — मानस, १। २८८।

पिरोड़ा †
संज्ञा स्त्री० [देश०] पीली कड़ी मिट्टी की भूमि।

पिरोना
क्रि० स० [सं० प्रोत, प्रा० पोइअ, पोअ + ना (प्रत्य०)] १. छेद के सहारे सूत तागे आदि में फँसाना। सूत तागे आदि में पहनाना। गूथना। पोहना। जैसे, तागे में मोती पिरोना, माला पिरोना। २. सूत तागे आदि को किसी छेद के आर- पार निकालना। तागे आदि को छेद में डालना। जैसे, सुई में तागा पिरोना। संयो०—देना।—लेना।

पिरोला
संज्ञा पुं० [हिं० पीला] पियरोला पक्षी।

पिरोहना †
क्रि० स० [हिं०] दे० 'पिरोना'।

पिथमी, पिर्थवी
संज्ञा स्त्री० [सं० पृथिवी] दे० 'पृथ्वी'। उ०— पाखँड की यहु पिर्थमी, परपँच का संसार।— संतवाणी, पृ० ९४। (ख) सात दीप नव खंड पिर्थवी सात समूद्र समाना।— जग० श०, पृ० ७९।

पिल
संज्ञा स्त्री० [अं०] (दवा की) गोली। बटी। जैसे, क्विना- इन पिल। टानिक पिल।

पिलई † (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० प्लीहा] बरवट। तापतिल्ली।

पिलई † (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० पिल्ला] कुत्ते की मादा संतति।

पिलक
संज्ञा पुं० [हिं० पीला] १. पीले रंग की एक चिड़िया जो मैना से कुछ छोटी होती है और जिसका कंठ स्वर बहुत मधुर होता है। यह ऊँचे पेड़ों पर घोंसला बनाती है और तीन या चार अंडे देती है। पियरोला। जर्दक। २. अबलक कबूतर।

पिलकना (१)
क्रि० स० [सं० +पिल (= प्रेरित करना)] १. गिराना। २. लुढ़काना। ढकेलना।

पिलकना † (२)
क्रि० अ० [हिं० पिनकना] चिढ़ना। खीझना।

पिलका ‡
संज्ञा स्त्री० [हिं० पिंडली] दे० 'पिंडली'।

पिलकीया
संज्ञा पुं० [देश०] पीलापन लिए खाकी रंग की एक छोटी चिड़िया जो जाडे के दिनों में पंजाब से आसाम तक दिखाई देती है। यह चट्टानों के नीचे बच्चे देती है।

पिलखन
संज्ञा पुं० [सं० प्लक्ष] पाकर का पेड़।

पिलच पु
संज्ञा पुं० [हिं० पिलना] पिलने का भाव। पिल पड़ना। मुहा०— पिलच पड़ना = एकाएक आक्रमण कर देना। टूट पड़ना। उ०—बन्तो-ना हुजूर, लौंडी न जाने की। मेरे ही पीछे पड़ जायगी और पिलच पडे़गी। बंदी दरगुजरी।— सैर कु०, पृ० ३०।

पिलचना
क्रि० अ० [सं० पिल (=प्रेरणा)] १. दो आदमियों का खुब भिड़ना। गुथना। लिपटना। २. (किसी काम आदि में) खूब लग जाता। तप्तर होना। लीन होना।

पिलड़ी
संज्ञा स्त्री० [देश०] कीमा। मसालेदार कीमा।

पिलना
क्रि० अ० [सं० पिल (=प्रेरणा)] १. किसी ओर एक- बारगी टूट पड़ना। ढल पड़ना। झुक पड़ना। घँस पड़ना। जैसे,— सब लोग उस मंदिर में पिल पडे़। संयो० क्रि०—पड़ना। मुहा०— पिल पड़ना = एकाएक आक्रमण कर देना। जत्था बनाकर टूट पड़ना। २. एकबारगी प्रवृत्त होना। एकबारगी लग जाना। लिपट जाना। भिड़ जाना। जैसे, किसी काम में पल पड़ना। ३. पेरा जाना तेल निकालने के लिए दबाया जाना। संयो० क्रि० — जाना।

पिलपिल †
वि० [हिं०] दे० 'पिलापिला'।

पिलपिला
वि० [अनु०] इतना नरम और ढीला कि दबाने से भीतर का रस या गूदा बाहर निकलने लगे। भीतर से गीला और नरम। जैसे,— (क) आम पककर पिलपिला हो गया है। (ख) फोड़ा पिलपिला हो गया है।

पिलपिलाना
क्रि० स० [हिं० पिलपिला] भीतर से रसदार या गूदेदार वस्तु को दबाना जिससे रसा या गूदा ढीला होकर बाहर निकलने लगे। — जैसे,— (क) आम को पिलपिलाओ मत। (ख) फोडे़ को पिलपिलाने से मवाद आता है। संयो० क्रि०— डालना।— देना।

पिलपिलाहट
संज्ञा स्त्री० [हिं० पिलपिला] दबकर गूदे या रस के ढीले होने के कारण आई हुई नरमी।

पिलप्पित पु
संज्ञा पुं० [सं० पील] पीलवान। महावत। उ०— घर- घ्घर होहिं पिलप्पित जोर।— पृ० रा०, २५।२३०।

पिलवान पु
संज्ञा पुं० [सं० पील] दे० 'पीलवान'। उ०— पिलवान हलै करि पील गिरै। कलसा मनो देवल के बिहरै। —पृ० रा०, २५।१९३।

पिलवाना (१)
क्रि० स० [हिं० पीलाना का प्रे० रूप] पिलाने का काम कराना। दूसरे को पिलाने में लगाना। जैसे,— थोड़ा पानी पिलवा दो। संयो० क्रि० — देना।

पिलवाना
क्रि० स० [हिं० पेलना] पेलने या पेरने का काम कराना। पेरवाना। जैसे, कोल्हू में पिलवाना।

पिला † पु
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'पिंडली'। उ०— सथल तले पिलाँ ले दीनी।— प्राण०, पृ० २४।

पिलाना
क्रि० स० [हिं० पीना] १. पीने का काम कराना। जैसे,— तुम्हें जबरदस्ती दवा पिलाएँगे। २. पीने को देना। जैसे, पानी पिलाओ। संयो० क्रि०— देना। ३. किसी छेद में डाल देना। भीतर भरना। जैसे, (क) कानमें सीसा पीलाना (ख) दीवार के दराजों में सीसा या राँगा पिलाना (ग) यह छडी़ इतनी भारी है मानो भीतर लोहा पिलाया है। मुहा०— (कोई बात) पिलाना = कान में भरना। मन में बैठा दैना। जी में जमाना।

पिलास
संज्ञा पुं० [अं० प्लायर्स] एक प्रकार का औजार जो तार को मोडने, काटने, ऐंठने तथा छोटी मोटी चीजों को पकड़कर उठाने के काम आता है। सँड़सी।

पिलुंडा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पुलिंदा'।

पिलु, पिलुक
संज्ञा पुं० [सं०] पीलू का पेड़।

पिलुनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] मूर्वा।

पिलुपर्णी
संज्ञा स्त्री० [सं०] मूर्वां।

पिलौधा †
वि० [हिं० पिल + औधा (प्रत्य०)= लोंदा] पिलपिला। पिचपिचा। उ०— चाँटे के पड़ते ही पिलौधा हुआ।— कुकुर०, पृ० ४३।

पिल्ला
संज्ञा पुं० [सं०] एक नेत्ररोग जिसमें आँखों से थोड़ा थोड़ा कीचड़ बहा करता है और वे चिपचिपाती रहती हैं। २. आँख जिसमें पिल्ला रोग हुआ हो (को०)।३. उक्त रोगग्रस्त प्राणी (को०)।

पिल्लका
संज्ञा स्त्री० [सं०] हस्तिनी। हथिनी।

पिल्लना पु
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'पिलना'। उ०— लखी फौज चंदेल की बीर पिल्ले।— प० रासो, पृ० ८२।

पिल्ला
संज्ञा पुं० [देश०] कुत्ते का बच्चा।

पिल्लू
संज्ञा पुं० [सं० पीलू (=कृमि)] बिना पैर का सफेद लंबा कीड़ा जो सडे़ हुए फल या घाव आदि में देखा जाता है। ढोला।

पिव पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रिय] दे० पिय।

पिवना पु
क्रि० स० [हिं०] दे० 'पीना'। उ०— तरनि ताप तल- फल चकोर गति पिवत पियूष पराग। — सूर०, १०।१७७७।

पिवनी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पिउनी'। उ०— पिवनी नहदै कात सूत ले जुलहा बूनी। — पलटू०, पृ० ३८।

पिवाना
क्रि० स० [हिं०] दे० 'पिलाना'।

पिवास पु
संज्ञा स्त्री० [सं० पिपासा] प्यास। तृषा।

पिशंग (१)
संज्ञा पुं० [सं० पिशङ्ग] पीलापन लिए भूरा रंग। धूमल रंग।

पिशंग
वि० उक्त रंग का। भूरे रंग का।

पिशंगक
संज्ञा पुं० [सं० पिशङ्गक] १. विष्णु। २. विष्णु का अनुचर [को०]।

पिशंगिला
संज्ञा स्त्री० [सं० पिशाङ्गिला] कांस्य। काँसा।

पिशंगी
वि० [सं० पिशाङ्गिन्] १. बादामी रंग का। २. भूरा [को०]।

पिश
वि० [सं०] १. पापरहित। पापमुक्त। २. अनेक रूप का। बहुरूपी [को०]।

पिशाच
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० पिशाची] १. एक हीन देव- योनि। भूत। विशेष— यक्षों और राक्षसों से पिशाच हीन कोटि के कहे गए हैं और इनका स्थान मरुस्थल बताया गया है। ये बहुत अशुचि और गंदे कहे गए हैं। युद्धक्षेत्रों आदि में इनके बीभत्स काडों का वर्णन कवि लोगों ने किया है, जैसे खोपडी़ में रक्त पीना आदि। २. प्रेत (को०)। ३. अत्यंत क्रूर और दुष्ट व्यक्ति (को०)।

पिशाचक
संज्ञा पुं० [सं०] भूत। पिशाच।

पिशाचकी
संज्ञा पुं० [सं०] पिशाचकिन् कुबेर।

पिशाचक
संज्ञा पुं० [सं०] सिहोर का पेड़। शाखोट वृक्ष।

पिशाचगृहीतक
संज्ञा पुं० [सं०] पिशाच से पीड़ित। प्रेतबाधा से आक्रांत [को०]।

पिशाचघ्न (१)
वि० [सं०] पिशाचों को नष्ट या दूर करनेवाला।

पिशाचघ्न (२)
संज्ञा पुं० पीली सरसों। विशेष— प्रेत उतारनेवाले ओझा प्रायः पीली सरसों फेकते हैं। और उसी से काम लेते हैं।

पिशाचचर्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] श्मशान सेवन। जैसे शिव जी करते हैं।

पिशाचता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'पिशाचत्व' [को०]।

पिशाचत्व
संज्ञा पुं० [सं०] १. पिशाच होने का भाव। २. क्रूरता [को०]।

पिशाचदोपिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] पिशाचों का दीया। एक मिथ्या ज्योति। लुकारी। लुक जो रात को घने अंधकार में दिखाई देती है [को०]।

पिशाचद्रु
संज्ञा पुं० [सं०] शाखोट वृक्ष। पिशाच वृक्ष [को०]।

पिशाचपति
संज्ञा पुं० [सं०] पिशाचों के स्वामी शिव [को०]।

पिशाचबाधा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पिशाच द्वारा जन्य या प्राप्त पीड़ा। प्रेतबाधा [को०]।

पिशाचभाषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'पैशाची' [को०]।

पिशाचमोचन
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रेतबाधा से मुक्ति। पिशाचों से मुक्ति। २. एक तीर्थ। ३. काशी का एक प्रसिद्ध तीर्थ।

पिशाचवदन
वि० [सं०] राक्षम की तरह मुँहवाला [को०]।

पिशाचवृक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] शाखोट वृक्ष। सिहोर का पेड़।

पिशाचसंचार
संज्ञा पुं० [सं० पिशाचसञ्चार] प्रेतबाधा [को०]।

पिशाचांगना
संज्ञा स्त्री० [सं० पिशाचाङ्गना] पिशाची [को०]।

पिशाचालय
संज्ञा पुं० [सं०] अंधकारयुक्त वह स्थान जहाँ बिना आग जले प्रकाश की लुक दिखाई पडे़ [को०]।

पिशाचिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. छोटी जटामासी। २. पिशाची।

पिशाची
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पिशाच स्त्री। २. जटामासी।

पिशिक
संज्ञा पुं० [सं०] बृहत्संहिता में वर्णित एक देश का नाम।

पिशित
संज्ञा पुं० [सं०] १. मांस। गोश्त। २. छोटा टुकडा या हिस्सा (को०)।यौ०— पिशिताश, पिशिताशी, पिशितभुक् = दे० 'पिशिताशन'। पिशितपिंड = मांसखंड। मांस का टुकड़ा।

पिशिताशन
संज्ञा पुं० [सं०] १. राक्षस। प्रेत। २. नरभक्षी। ३. भेड़िया [को०]।

पिशी
संज्ञा स्त्री० [सं०] जटामासी।

पिशील, पिशीलक
संज्ञा पुं० [सं०] मिट्टी का प्याला या कटोरा। (शतपथ ब्राह्मण)।

पिशुन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक की बुराई दूसरे से करके भेद डालनेवाला। चुगलखोर। इधर की उधर लगानेवाला। दुर्जन। खल। उ०— इसे पिशुन जान तू, सुन सुभाषिणी है बनी। 'घरो' खगि, किसे धरूँ ? धृति लिए गए हैं धनी।— साकेत, पृ० २५९। २. कुंकुम। केसर। ३. कपिवक्त्र। नारद। ४. काक। कौआ। ५. तगर। ६. कपास। ७. एक प्रेत जो गर्भवती स्त्रियों को कष्ट पहुँचाता है (को०)। ८. प्रवंचित करना। धोखा देना।

पिशुन (२)
वि० १. परस्पर भेद डालनेवाला। सूचक। २. चुगली करनेवाला। प्रवंचक। धोखेबाज। ३. क्रूर। निर्भय। निर्दय। नीच। निम्न। ४. मूर्ख [को०]। यौ०— पिशुनवचन, पिशुनवाक्य = चुगली।

पिशुनता
संज्ञा स्त्री० [सं०] चुगलखोरी।

पिशुना
संज्ञा स्त्री० [सं०] असवर्ग। पृक्का।

पिशोन्माद
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का उन्माद या पागलपन। विशेष—इसमें रोगी प्रायः ऊपर को हाथ उठाए रहता है; अधिक बकता और भोजन करता है, रोता तथा गंदा रहता है।

पिशोर
संज्ञा पुं० [देश०] हिमालय की एक झाडी़ जिसकी टहनियों से बोझ बाँधते हैं और टोकरे आदि बनाते हैं। †२. पेशावर।

पिश्वाज
संज्ञा पुं० [फा़० पिश्वाज] नृत्य के समय पहना जानेवाला। लहँगा। पेशवाज [को०]।

पिष्ट (१)
वि० [सं०] १. पिसा हुआ। चूर्ण किया हुआ। २. निचोड़ा हुआ [को०]। ३. गूँधा हुआ आटा आदि [को०]।

पिष्ट (२)
संज्ञा पुं० १. पानी के साथ पीसा हुआ अन्न, विशेषतः दाल। पीठी। पिट्ठी। २. कचौरी या पूआ। रोट। ३. सीसा धातु (को०)।

पिष्टक
संज्ञा पुं० [सं०] १. पिष्ट। पीठी। पिट्ठी। २. कचौरी या पूआ। रोट। ३. एक नेत्ररोग। फूला। फूली। ४. विशेष प्रकार का अस्थिभंग (सुश्रुत)। ५. सीसा धातु।

पिष्टपचन
संज्ञा पुं० [सं०] कड़ाही या तावा [को०]।

पिष्टप
संज्ञा पुं० [सं०] लोक। भुवन।

पिष्टपशु
संज्ञा पुं० [सं०] पिसे हुए आटे का बना पुतला [को०]।

पिष्टयाचक
संज्ञा पुं० [सं०] कड़ाही।

पिष्टपिंड
संज्ञा पुं० [सं० पिष्टपिण्ड] रोटी। अंगाकरी। बाटी [को०]।

पिष्टपूर
संज्ञा पुं० [सं०] एक मिठाई। घृतपूर [को०]।

पिष्टपेष
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'पिष्टपेषण'।

पिष्टपेषण
संज्ञा पुं० [सं०] १. पिसे हुए को पीसना। २. कही बात को फिर फिर कहना।

पिष्टपेषणन्याय
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का न्याय। विशेष— दे० 'न्याय'।

पिष्टप्रमेह
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का प्रमेह जिसमें चावल के पानी के समान पदार्थ मूत्र के साथ गिरता है।

पिष्टमेह
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'पिष्टप्रमेह'।

पिष्टवर्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] पीठी। मूँग, मसूर, चावल आदि को पीसकर बनाई हुई पीठी या लोई [को०]।

पिष्टसौरभ
संज्ञा पुं० [सं०] चंदन जिसे पीसने से सुगंध निकलती है।

पिष्टात
संज्ञा पुं० [सं०] वखादि को सुगंधित करने का चूर्ण। गुलाल। अबीर। बुक्का।

पिष्टातक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० पिष्टात।

पिष्टाद
वि० [सं०] पीठी या आटा खानेवाला [को०]।

पिष्टान्न
संज्ञा पुं० [सं०] पिसे हुए अन्नचूर्ण से निर्मित वस्तु।

पिष्टालिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] चंदन।

पिष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] चूर्ण। आटा [को०]।

पिष्टिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. चावलों से बनाई हुई तवासीर या बंसलोचन। २. पिसे हुए चावल का जल [को०]।

पिष्टोडी
संज्ञा स्त्री० [सं०] श्वेताम्ली का पौधा।

पिष्टोदक
संज्ञा पुं० [सं०] पीसे हुए चावल का घोल या पानी [को०]।

पिष्षना पु
क्रि० स० [सं० प्रेरण, प्रा० पिष्षन] दे० 'पेखना'। उ०— स्याम रंग पिष्षहि न घटा धनखोर गरज्जत।— पृ० रा०,२। ३४९।

पिसंग
वि०, संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'पिशंग'।

पिसंदर
संज्ञा पुं० [फा़०] सौतेला पुत्र [को०]।

पिसण पु
संज्ञा पुं० [सं० पिशुन] शत्रु। दुश्मन। उ०— पिसण मार सुत पिसण रौ, असमझ लियो उबार। — बाँकी० ग्रं०, पृ० ६०।

पिसतावा †
संज्ञा पुं० [सं० पश्चात्ताप] पश्चात्ताप। पछतावा। उ०— जद करसी पिसतावो जमरा, पूत फिरैला दोला।— रघु० रु०, पृ० २७।

पिसनहिरया, पिसनहरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० पीसना] १. दे० 'पिसनहारी'। २. आटा आदि पीसने का स्थान।

पिसनहारी
संज्ञा स्त्री० [हिं० पीसना + हारी (प्रत्य०)] आटा पीसनेवाली। वह स्त्री जिसकी जीविका आटा पिसने से चलती हो।

पिसना (१)
क्रि० अ० [हिं० पीसना] १. रगड़ या दबाव से टूटकर महीन टुकड़ों में होना। दाव या रगड़ खाकर सूक्ष्म खंडों में विभक्त होना। चुर्ण होना। चूर होकर धूल सा हो जाना। जैसे, गेहूँ पिसना, मसाला पिसना। संयो० क्रि०—जाना।२. पिसकर तैयार होनेवाली वस्तु का तैयार होना। जैसे आटा पिसना, पिट्ठी पिसना। संयो० क्रि०— जाना। ३. दब जाना। कुचल जाना। जैसे,— पहिए के नीचे पैर पडे़गा तो पिस जायगा। संयो० क्रि०—उठना।—जाना। ४ ओर कष्ट, दुःख या हानि उठाना। पीड़ित होना। जैसे,— (क) एक दुष्ट के साथ न जाने कितने निरपराध पिस गए। (ख) महाजन के दिवाले से न जाने कितने गरीब पिस गए। संयो० क्रि०—जाना। ५. परिश्रम से अत्यंत क्लांत होना। अत्यंत श्रांत एवं शांत होना। पककर बेदम होना।

पिसना पु
संज्ञा पुं० [हिं० पीसना] पीसना। पीसी जानेवाली चीज गेहूँ आदि। उ०— पिसना पीसै राँड़री पिउ पिउ करै पुकार।— पलटू, भा० १, पृ० १७।

पिसमान पु
वि० [सं० पश्यमान] दिखाई पड़ता हुआ। दृश्यमान। दृग्गोचर। उ०— उन यह सृष्टि कीन्ह पिसमाना।— कबीर सा०, पृ० ५९९।

पिसर
संज्ञा पुं० [फा़०] पुत्र। आत्मज। बेटा। लड़का। उ०— दिया था खुदा उसको सब कुछ मगर। वले सख्त मुहताज था बिन पिसर।—दक्खिनी०, पृ० १३९। यौ०— पिसरलादा = पौत्र। पुत्र का पुत्र। पिसरख्वादा, पिसर ए मुतवन्ना = दत्तक पुत्र। गोद लिया बेटा।

पिसबाज
संज्ञा स्त्री० [फा़० पिश्वाज] दे० 'पेशवाज'।

पिसवाना
क्रि० स० [हिं० पीसना का प्रे० रूप] पीसने का काम कराना।

पिसाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० पीसना] १. पीसने की क्रिया या भाव। २. पीसने का काम या व्यवसाय। ३. चक्की पीसने का काम। आटा पीसने का धंधा। जैसे,— वह पिसाई करके अपना पेट पालती है। ४. पीसने की मजदूरी। ५. अत्यंत अधिक श्रम। बड़ी कड़ी मिहनत। जैसे,— वहाँ नौकरी करना बड़ी पिसाई है।

पिसाच पु
संज्ञा पुं० [सं० पिशाच] दे० 'पिशाच'। उ०— भरे कुंडनि रुधिर रन रुंडनि की रासि भषै मास खग जंबुक पिसाच समुदाई।— हम्मीर०, पृ० ५७।

पिसाचर †
संज्ञा पुं० [सं० पिशाचर + हिं० (प्रत्य०)] पिशाच। निशाचर। उ०—ये सब मृत्यु अकाल दिखाई। मुए सु योनि पिशाचर पाई।— सहजो० पृ० ३४।

पिसान †
संज्ञा पुं० [सं० पिष्टान्न, या हिं० पिसना, पिसा+ अन्न] अन्न का बारीक पिसा हुआ चूर्ण। धूल की तरह पिसी हुई अनाज की बुकनी। आटा। मुहा०— पिसान होना = दबकर चूर होना।

पिसाना (१)
क्रि० स० [हिं० पीसना का प्रे० रूप] दे० 'पिसवाना'।

पिसाना (२)
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'पिसना'।

पिसानी पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पेशानी'। उ०— चढे़ ते कुमहि चकताहू की पिसानी मैं।—भूषण ग्रं०, पृ० १०३।

पिसावनी
[हिं० पीसना] पीसने का काम। पीसने की किया। उ०— सती पिसावनि ना करै पीसि खाय सो राँड। साधु जन माँगे नहीं माँगि खाय सो साँड़।— स० दरिया पृ० १८३।

पिसिया †
सज्ञा० पु० [हिं० पिसना] १. एक प्रकार का छोटा और मुलायम लाल गेहूँ। †२. वह जो पीसने का काम करता हो। ३. पिसने का काम।

पिसी (१)
संज्ञा स्त्री० [हि० पिसना] गेहूँ।

पिसी
संज्ञा स्त्री० [हिं० पितृस्वस] पिता की बहन। फूआ (बंग- भाषा में प्रयुक्त)।

पिसुन पु
संज्ञा पुं० [सं० पिशुन] दे० 'पिशुन'। उ०— गात सरोवर पंच वग प्रान हस उहिं वारि। पिसुन वचन किए व्याधि विधि दी सकल विडारि।— माधवानल०, पृ० २१४।

पिसुराई
संज्ञा स्त्री० [देश०] तरकंडे का एक छोटा टुकड़ा जिसपर रुई लपेटकर पुनी बनाते हैं।

पिसेरा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का हिरन। विशेष— इसके ऊपर का हिस्सा भुरा और नीचे का काला होता है। इसके ऊचाई एक फुट और लंबाई दो फूट होती है। यह दक्षिण भारत में पाया जाता है। यह बड़ा डरपोक होता है और सुगमता से पाला जा सकता है। यह पत्थरों की आड़ में रहता है और दिन को बाहर कहीं नहीं निकलता।

पिसौनी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० पीसना] १. पीसने का काम। चक्की पीसने का धंधा। २. कठिन काम। परिश्रम का काम। ३. पीसने की मजूरी। पिसाई।

पिस्त
संज्ञा पुं० [फा़०] सत्तू। सक्तु [को०]।

पिस्तई
वि० [फा़० पिस्तह] पिस्ते के रंग का। पीलापन लिए हरा।

पिस्तरना पु
क्रि० स० [सं० प्रस्तारण] प्रसार करना। फैलाना। उ०— दुज सुमन ड़सिय बुध पक्व रस, वट विलास गुन पिस्तरिय।— पृ० रा०, १।४।

पिस्ताँ
संज्ञा स्त्री० [फा़० पिस्तान] स्तन। कुच। वक्षोज [को०]।

पिस्ता
संज्ञा पुं० [फा़० पिस्तह] काकड़ा की जाति का एक छोटा पेड़ और उसका फल जो एक प्रसिद्ध मेवा है। विशेष— इसाक पेड़ शाम, दमिश्क और खुरासान से लेकर अफगानिस्तान तक थोड़ा बहुत होता है और इसके फल की गिरी अच्छे मेवों में है। इसके पत्ते गुलचीनी के पत्तों के से चौडे़ चौडे़ होते हैं और एक सींक में तीन तीन लगे रहते हैं। पत्तों पर नसें बहुत स्पष्ट होती हैं। फल देखने में महुवे के से लगते हैं। रुमी मस्तगी के समान एक प्रकार का गोंद इस पेड़ से भी निकलता है। पिस्ते के पत्तों पर भीकाकड़ासींगी के समान एक प्रकार की लाही सी जमती है जो विशेषतः रेशम की रँगाई में काम आती है। पिस्ते के बीज से तेल भी बहुत सा निकलता है जो दवा के काम में आता है।

पिस्तौल
संज्ञा स्त्री० [अं० पिस्टल] तमंचा। छोटी बंदूक।

पिस्त्र
संज्ञा पुं० [फा० पिस्रसर] बेटा। पुत्र। उ०— हक ने अपना फजल जब उस पर किया। यक पिस्र मकबूल तब उसकूँ दिया।— दक्खिनी०, पृ० ३६३।

पिस्सी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० पिसना] एक प्रकार का गेहूँ।

पिस्सू
संज्ञा पुं० [फा़० पश्शह] एक छोटा उड़नेवाला कीड़ा जो मच्छड़ों की तरह काटता और रक्त पीता है। कुटकी।

पिहक
संज्ञा स्त्री० [अनु०] दे० 'पिहकनी'।

पिहकना
क्रि० अ० [अनु०] कोयल, पपीहे, मोर आदि सुंदर कंठवाले पक्षियों का बोलना।

पिहकनि पु
संज्ञा स्त्री० [अनु०] पिहकने की क्रिया या भाव।

पिहरा
संज्ञा पुं० [हिं० पिहान] पत्ती जो पास के ऊपर बिछाई जाती है। (कुम्हार)।

पिहान †
संज्ञा पुं० [सं० पिधान, प्रा० पिहाण] बरतन का ढक्कन। ढकना। ढाँकने की वस्तु। आच्छादन।

पिहानी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० पिधानिका] दे० 'पिहान'। उ०— आलस, अनख न आचरज, प्रेम पिहानी जानु।— तुलसी० ग्रं०, पृ० १३९।

पिहिकना †
क्रि० स० [हिं० अनु०] दे० 'पिहकना'। उ०— गिरिवर पिहिकत मोर झींगुर झनकारेव।—सं० दरिया, पृ० ८८।

पिहित (१)
वि० [सं०] छिपा हुआ।

पिहित (२)
संज्ञा पुं० एक अर्थालंकार जिसमें किसी के मन का कोई भाव जानकर क्रिया द्वारा अपना भाव प्रकट करना वर्णन किया जाय। जैसे,— गैर मिसिल ठाढौ शिवा अंतरजामी नाम। प्रकट करी रिस साह को, सरजा करि न सलाम। (यहाँ शिवाजी ने औरंगजेब का उपेक्षाभाव जानकर उसे सलाम न कर अपना क्रोध प्रकट किया।)

पिहुवा †
संज्ञा पुं० [देश०] एक पक्षी।

पिहोली
संज्ञा पुं० [देश०] एक पौधा जो मध्यप्रदेश और बरार से लेकर बंबई के आसपास तक होता है। यह पान के बीडों में लगाया जाता है। इसकी पत्तियों से बड़ी अच्छी सुगंध निकलती है। इन पत्तियों से इत्र बनाया जाता है, जो पचौली के नाम से प्रसिद्ध है। दे० 'पचौली'।