विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/झ

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हिंदी व्यंजन वर्णमाला का नवाँ और चवर्ग का चौथा वर्ण जिसका स्थान तालु है । यह स्पर्श वर्ण है और इसके उच्चारण में संवार, नाद और घोष प्रयत्न होते हैं । च, छ, ज, और ज्ञ इसके सवर्ण हैं ।

झं
संज्ञा पुं० [अनु०] १. वह शब्द जो धातुखंडों के परस्पर टकराने से निकलता है । २. हथियारों का शब्द ।

झंकना
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'झीखना' ।

झंकाड़
संज्ञा पुं० [हिं०]दे० 'झंखाड़' ।

झंकार
संज्ञा स्त्री० [सं० झङ्कार] १. झंझनाहट का शब्द जो किसी धातुखंड से निकलता है । झन् झन् शब्द । झनकार । जैसे, पाजेब की झंकार, झाँझ की झंकार । उ०— शुभे, धन्य झंकार है धाम में, रहे किंतु टंकार संग्राम में ।— साकेत, पृ० ३०५ । २. झींगुर आदि छोटे छोटे जानवरों के बोलने का शब्द जो प्रायः झन् झन् होता है । झनकार । जैसे, झिल्लियों की झंकार । ३. झन् झन् शब्द होने का भाव ।

झंकारना (१)
क्रि० स० [सं० झङ्कार] धातुखंड आदि में से झनझन शब्द उत्पन्न करना । जैसे, झाँझ झंकारना ।

झंकारना (२)
क्रि० अ० झन झन शब्द होना । जैसे, झिल्लियों का झंकारना ।

झंकारिणी
संज्ञा स्त्री० [सं० झंङ्कारिणी] गंगा । भागीरथी [को०] ।

झंकारित (१)
संज्ञा पुं० [पुं० झंङ्कारित] दे० 'झंकार' [को०] ।

झंकारित (२)
वि० झंकार करता हुआ । झंकृत [को०] ।

झंकारी
वि० [सं० झङ्कारिन्] झंकार करनेवाला । झन् झन् करनेवाला । झंकार-गुण-युक्त [को०] ।

झंकृत (१)
वि० [सं० झङ्कृत] झंकार करता हुआ । झंकारयुक्त [को०] ।

झंकृत (२)
संज्ञा पुं० धीरे धीरे होनेवाली मधुर ध्वनि । झंकार [को०] ।

झंकृता
संज्ञा स्त्री० [सं० झङ्कृता] तंत्र के अनुसार दस महाविद्या । में से एक । देवी तारा [को०] ।

झंकृति
संज्ञा स्त्री० [सं० झङ्कृति] झंकार । मधुर ध्वनि [को०] ।

झंखन
संज्ञा स्त्री० [देशी √ झंख, हिं० झंखना] झीखना । रोना- धोना । दुःख का प्रकाशन । उ०— झंखन झुरवन सबही छोडो़ । झमकि करो गुरु सेव ।— कबीर श०, भा० ४, पृ० २५ ।

झंखना
क्रि० अ० [हिं० खीजना] बहुत अधिक दुखी होकर पछताना और कुढ़ना । झीखना । उ०—(क) बरस दिवस धन रोय हार परी चिंत झंख ।—जायसी (शब्द०) । (ख) पाँच तत्व का बना पींजरा तामें मुनियाँ रहती । उड़ि मुनियाँ डारी पर बैठे झंखन लागे सारी दुनिया ।—कबीर (शब्द०) ।

झंखर †
संज्ञा पुं० [देशी झंखर] शुष्क वृक्ष । उ०—थल भूरा बन झंखरा नहीं सु चंपउ जाइ । गुणे सुगंधी मारवी, महकी सहु वणराइ ।—ढोला०, दू० ४६८ ।

झंखाट
वि० [हिं० झंखा़ड]दे० 'झंखाड़' ।

झंखाड़
संज्ञा पुं० [हिं० 'झाड़' का अनु०] १. घनी और काँटेदार झाडी़ का पौधा । २. ऐसे काँटेदार पौधों या झाड़ियों का घना समूह जिसके कारण भूमि या कोई स्थान ढँक जाय । उ०— ऊँचे झाड़, कँटीले झंखाड़ों ने वन मग छाया ।—क्वासि, पृ० ७२ । ३. वह वृक्ष जिसके पत्ते झड़ गए हों । ४. व्यर्थ की और रद्दी, विशेषतः काठ की चीजों का समूह ।

झंगर †
संज्ञा स्त्री० [सं० कन्दरा या देश०] १. गुफा । कंदरा । उ०— मिलै सिंघ गिर झंगराँ, सो एकलो सदीव । रच टोलौ फिरता रहै, जठै तठ बन जीव ।—बाँकी० ग्रँ०, पृ० २७ । २. धनी झाडी ।

झंजार पु †
संज्ञा पुं० [हिं० र्जजाल] जंजाल । मायाजाल । दुःख । उ०—इनके चरन सरन जे आए मिटे सकल झंजार । छीत स्वामी गिरिधरन श्री विट्ठल सकल वेद कौ सार ।—छीत०, पृ० १४ ।

झंझकार पु
संज्ञा पुं० [सं० झङ्कार] झंकार । झन् झन् की मधुर ध्वनि । उ०—निगम चारि उतपति भयो चतुरानन मुख वैन । उचरेउ शब्द अनाहदा झंझकार मद ऐन ।—संत० दरिया, पृ० ४० ।

झंझ (१)
संज्ञा पुं० [झन् झन् से अनु०] दे० 'झाँझ' । उ०—कोउ वीणा मुरली पटह चंग म़ृदंग उपंग । झालरि झंझ बजाई कै गावहि तिनके संग ।—(शब्द०) ।

झंझ (२) †
वि० [देश०] खाली । रीता । शुष्क । रहित ।

झंझट
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. व्यर्थ का झगड़ा । टंटा । बखेड़ा । २. प्रपंच । परेशानी । कठिनाई । क्रि० प्र०—उठाना ।—में पड़ना ।—में फँसना ।

झंझटिया †, झंझटिहा †
वि० [हिं० झंझट] दे० 'झंझटी' ।

झंझटी
वि० [हिं झंझट] १. झंझट करनेवाला । २. झंझट से भरा हुआ (काम) ।

झंझन
संज्ञा पुं० [सं० झञ्झन] आभूषण की झंकार । झुन झुन की मधुर ध्वनि [को०] ।

झंझनाना (१)
क्रि० स० [सं० झञ्झन] झन झुन का शब्द करना । झंकार करना । झंकारना ।

झंझनाना (२)
क्रि० अ० १. झंकार होना । †२. कोई बात इस ढंग से कहना जिसमें खीझ और झल्लाहट भरी हो । झल्लाना ।

झंझर (१)
संज्ञा पुं० [सं० झञ्झर] दे० 'झज्झर' ।

झंझर (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० झँझऱी] दे० 'झँझरी' ।

झंझा
संज्ञा स्त्री० [ सं० झ्ञ्झा] । १. वह तेज आँधी जिसकै साथवर्षा भी हो । उ०—मन को मसूसी मनभावन सों रूसि सखी दामिनि को दूषि रही रंभा झुकि झंझा सी ।—देव (शब्द०) । यौ०—झझानिल । झंझामारुत । झझामारुत = दे० 'झँझावात' । २. तेज आँधी । अघड़ । ३. बडी़ बूँदों की वर्षा । ४. झाँझ । ५. खोई हुई वस्तु । हिराई हुई चीज (को०) ।

झंझा पु
वि० प्रचंड । तीखा । तेज ।

झंझानिल
संज्ञा पुं० [सं० झञ्झानिल] १. प्रचंड वायु । आँधी । २. वह आँधी जिसके साथ वर्षा भी हो ।

झंझार
संज्ञा पुं० [सं० झञ्झा] आग की वह लपट जिसमें से कुछ अब्यक्त शब्द के साथ धुँआ और चिनगारियाँ निकलें । उ०— (क) आति अगिनि झार भंमार, धुंधार करि, उचटि अंगार झंझार छायौ ।—सूर०, १० ।५९६ । (ख) लाल तिहारे विरह की लागी अगिन अपार । सरसै बरसैं नीरहूँ मिटै न झर झंझार ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ४९५ ।

झंझावात
संज्ञा पुं० [सं० झञ्झावात] १. प्रचंड वायु । आँधी । २. वह आँधी जिसके साथ पानी भी बरसे ।

झंझी
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. फूटि कौडी़ । २. दलाली का धन । झज्झी । (दलालों की बोली) ।

झंझेरना पु
क्रि० स० [हिं झकझोरना] दे० 'झँझोड़ना' ।

झंझोटी, झंझौटी
संज्ञा स्त्री० [हिं० ] एक राग । दे० 'झिंझौटी' । उ०—तीसरे ने कहा वाह झंझौटी है ।—श्रीनिवास ग्रं०, पृ० २०४ ।

झंझोरना पु
क्रि० स० [हिं० झकझोरना] दे० 'झँझोड़ना' । उ०— विषम वाय जिम लता मोरि मारुत झंझोरै । (क) चित्र लिखी पुत्तरी जोरि जोरंत निहोरै ।—पृ० रा०, २ ।३४८ ।

झंटी
संज्ञा स्त्री० [देशी] छोटे और उठे हुए बाल । झोंटा ।

झंड
संज्ञा पुं० [सं० जट, या देशी] १. छोटे बालकों के मुंडन के पहले के केश । २. करील ।

झंडा
संज्ञा पुं० [सं० जयन्ता या देश०] १. तिकोने या चौकोर कपडे़ का टुकडा़ जिसका एक सिरा लकडी़ आदि के डंडे में लगा रहता है और जिसका व्यवहार जिह्न प्रकट करने, संकेत करने, उत्सव आदि सूचित करने अथवा इसी प्रकार के अन्य कामों के लिये होता है । पताका । निशान । फरहरा । व्यजा । मुहा०—झंडे तले की दोस्ती = बहुत ही साधारण या राह चलते की जान पहचान । झंडे पर चढ़ना = बदनाम होना । अपने सिर बहुत बदनामी लेना । झंडे पर चढा़ना = बहुत बदनाम करना । २. ज्वार, बाजरे आदि पौधों के ऊपर का नर फूल । जीरा ।

झंडा कप्तान
संज्ञा पुं० [हिं० झंडा + अं० कैप्टेन] १. उस जहाज का प्रधान जिसपर प्रतीकात्मक ध्वजा रहती है (नौसैनिक) । २. वह व्यक्ति जिसपर संस्था के प्रतीकात्मक ध्वज की जिम्मेदारी हो ।

झंडा जहाज
संज्ञा पुं० [हिं० झंडा + अं० जहाज ] बेडे़ का प्रधान जहाज जिसपर बेडे़ का नायक रहता है ।

झंडा दिवस
संज्ञा पुं० [हिं० झंडा + सं० दिवस] वह दिन जब किसी कार्य से प्रेरित होकर लोगों से सहायता या चंदा लिया जाता है और चिह्न स्वरूप सहायता देनेवाले को झंडी दी जाती है (नौसैनिक) ।

झंडाबरदार
संज्ञा पुं [हिं० झंडा + बरदार] वह व्यक्ति जो किसी राज्य या संस्था का झंडा लेकर चलता है ।

झंडी
संज्ञा स्त्री० [हिं० 'झंडा' का स्त्री० अल्पा०] छोटा झंडा जिसका ब्यवहार प्रायः संकेत आदि करने और कभी कभी सजावट आदि के लिये होता है । मुहा०—झंडी दिखाना = झंडी से संकेत करना ।

झंडीदार
वि० [हिं० झंडी + फा० दार] जिसमें झंडी लगी हो । झंडीवाला ।

झंडोत्तोलन
संज्ञा पुं०[ हिं० झंडा + सं० उत्तोलन] झंडा फहराना ध्वज फहराने का कार्य । क्रि० प्र०—करना ।—करना ।—होना ।

झंप
संज्ञा पुं० [सं० झम्य] १. उछाल । फलाँग । कुदान । मुहा०—झंप देना = कूदना । उ०—करि अपनों कुल नास बनहि सो अगिन झंप दै आई ।—सूर (शब्द०) । पु †२. हाथियों और घोड़ों आदि के गले का एक आभूषण । गलझंप ।

झंपण
संज्ञा पुं० [अप०] आँखों को आधा खुली रखना । नेत्रों का अर्धोन्मीलन ।—महा पु, भा० १, पृ० १२ ।

झंपणी
संज्ञा स्त्री० [देशी] बरुनी । बरौनी । पक्ष्म ।

झंपन (१)
संज्ञा पुं० [सं० झम्पन] १. उछलने की क्रिया । उछाल । २. झोंका । उ०—निराशा सिकता कुपथ में अश्मरेखा सी सुअंकीत । वायु झंपन में धबल मे हिमशिखर सी तुम अकंपित ।—क्वासि, पृ० ९९ ।

झंपन (२)पुं०
संज्ञा पुं० [सं० आच्छादन; प्रा० झंपण, हिं० झाँपना] छिपाने की क्रिया । आवरित करने का कार्य । उ०—तिहि अवसर लालान आइ गए उपमा कवि ब्रह्म कही नहिं जाई । कंचन कुंभ के झंपन को भुकि झंपत चंद झलक्कत झाई ।— अकबरी०, पृ० ३४९ ।

झंपना पु
क्रि० स० [सं० आच्छादन, प्रा० झंपण] छिपाना । ढकना । आच्छादित करना । उ०—कंचन कुंभ के झंपन को झुकि झंपत चंद झलक्कत झाई—अकबरी०, पृ० ३४९ ।

झंपाक
संज्ञा सं०[ सं० झम्पाक] [स्त्री० झंपाकी] वानर । बंदर [को०] ।

झंपान †
संज्ञा पुं० [सं० झाम्प या देश० ] १. दे० 'झँपान' । २. कुदान । उछाल ।

झंपापात पु
संज्ञा पुं० [सं० झम्प + पात] ऊँचाई से गहरे पानी में झम से कूद जाना । कूदकर प्राणत्याग करना । उ०— (क) जोग जज्ञ जपतप तीरथ बतादि और, झंपापात लेत जाइ हिवारै गरत हैं ।—सुंदर०, ग्रं०, भा० १, पृ० ४५५ । (ख) कौ बूडे़ झंपापाती, इंद्रिय बसि करि न जाती ।—सुंदर ग्रं०, भा० १, पृ० १४७ ।

झंपापाती पु
वि० [हिं० झंपापात] बहुत ऊँचाई से नदी में गिरकर प्राणत्याग करनेवाला ।

झंपावना पु
क्रि० स० [सं० झम्पन] १. हिलाना । कँपाना । उ०—झनझनात झिल्ली, झंपावत झरना झर झर झाडी़ ।—श्यामा०, पृ० १२० । †२. उछालना । कुदाना । उ०— फागुण मासि वसंत रुत आयउ जइ न सुणेसि । चाचरिकइ मिस खेलती होली झंपावेसि ।—ढोला०, दू० १४५ ।

झंपारु
संज्ञा पुं० [सं० झम्पारु] बानर । बंदर [को०] ।

झंपित
वि० [सं० झम्प] ढँका हुआ । छिपा हुआ । आच्छादित । छाया हुआ ।

झंपी
वि० [सं० झम्पिन्] कपि । झंपाक । बंदर [को०] ।

झंब
संज्ञा पुं० [सं० स्तबक या हिं० झब्बा] झोंपा । गुच्छा । स्तबक [को०] ।

झँकना पु
क्रि० स० [हिं०] दे० 'झाँकना' । उ०—ब्रज जुवतिन कौ दर्पन जोई । तामै मुँह झँकि आई सोई ।—नंद० ग्रं०, पृ० १२९ ।

झँका पु
संज्ञा [हिं०] दे० 'झोंका' ।

झँकिया
संज्ञा स्त्री० [हिं० झाँकना] १. छोटी खिड़की । झरोखा । २. झँझरी । जाली ।

झँकोर †
संज्ञा पुं० [हिं०]दे० 'झकोरा' ।

झँकोरना †
क्रि० अ० [हिं०]दे० 'झकोरना' ।

झँकोलना †
क्रि० अ० [हिं०]दे० 'झकोरना' ।

झँकोला †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'झकोरा' ।

झँखना पु
क्रि० अ० [हिं० झंखना]दे० 'झंखना' । उ०—(क) क्रीड़त प्रात समय दोउ बीर । माखन माँगत, बात न मानत, झँखत जसोदा जननी तीर ।—सूर०, १० ।१६१ । (ख) सूरज प्रभु आवत हैं हलधर को नहिं लखत झँखति कहति तो होते संग दोऊ ।—सूर (शब्द०) ।

झँगरा †
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का बाँस का जालदार गोल झाँपा जिसे बोरा भी कहते हैं ।

झँगा
संज्ञा पुं० [हिं० झगा]दे० 'झगा' । उ०—(क) नव नील कलेवर पीत झँगा झलकै पुलकै नृप गोव लिए ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) आव लाल ऐसे मदु पीजै तेरी झँगा मेरी अँगिया धीर ।—हरिदास (शब्द०) ।

झँगिया †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झँगुली' ।

झँगुआ
संज्ञा पुं० [देश०] मठिया नामक गहने में की, कुहनी की ओर से तीसरी चूड़ी़ । दे०'मठिया' ।

झँगुला †
संज्ञा पुं० [हिं०]दे० 'झगा' ।

झँगुलिया †
संज्ञा स्त्री० [हिं० 'झगा' का अल्पा०] छोटे बालकों के पहनने का झगा या ढीला कुरता । उ०—(क) घुटुरन चलत कनक आँगन में कौशिल्या छबि देखत । नील नलिन तनु पीत झँगुलिया घन दामिनि द्युति पेखत ।—सूर (शब्द०) ।

झँगुली पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० ]दे० 'झँगुलिया' । उ०—(क) उठि कह्यो भोर भयो झँगुली दै मुदित महरि लखि आतुरताई ।— तुलसी (शब्द०) । (ख) कोउ झँबुली कोड मृदुल बढ़निया कोउ लावै रचि ताजा ।—रघुराज (शब्द०) ।

झँगूली पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं०]दे० 'झँगुलिया', 'झँगुली' । उ०— कुलही चित्र विचित्र झँगूली । निरखहि मातु मुदित मन फूली ।—तुलसी ग्रं०, पृ० २८५ ।

झँझनना
क्रि० अ० [अनु०] झन झन शब्द होना । झनक झनक शब्द होया । झंकारना । उ०— नेकु रहौ मति बोलो अबै मनि पायनि पैजनिया झँझनैगी ।—(शब्द०) ।

झँझरा (१)
संज्ञा पुं० [सं० जर्जर (= छिद्रयुक्त), प्रा० जज्जर, या हिं० ] मिट्टी का जालीदार ढँकना जो खौले हुए दूध के बर्तन पर रखा जाता है ।

झँझरा (२)
वि० [स्त्री० झँझरी] जिसमें बहुत से छोटे छोटे छेद हों । झीना ।

झँझरी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० जर्जर, हि० झर झर अनु०] १. किसी चीज में बहुत से छोटे छोटे छेदों का समूह । जाली । उ०—(क) झँझरी के झरोखनि ह्वै कै झकोरति रावटी हूँ मैं न जात सही ।—देव (शब्द०) । (ख) झँझरी फूट चूर होई जाई । तबहि काल उठि चला पराई ।— कबीर मं०, पृ० ५६४ । २. दिवारों आदि में बनी हुई छोटी जालीदार खिड़की । ३. लोहे का वह गोल जालीदार या छेददार टुकडा़ जो दमचूल्हे आदि में रहता है और जिसके ऊपर सुलगते हुए कोयले रहते हैं । जले हुए कोयले की राख इसी के छेदों में से नीचे गिरती है । दमचूल्हे की जाली या झरना । ४. लोहे आदि की कोई जालीदार चादर जो प्रायः खिड़कियों या बरामदों में लगाई जाती है । ५. आटा छानने की छलनी । ६. आग आदि उठाने का झरना । ७. दुपट्टे या धोती आदि के आँचल में उसके बाने के सूतों का, सुंदरता या शोभा के लिथे बनाया हुआ छोटा जाल, जो कई प्रकार का होता है ।

झँझरी (२)
वि० स्त्री० [हिं० झँझरा का अल्पा० स्त्री०]दे० 'झँझरा' ।

झँझरीदार
वि० [हिं० झँझऱी + फा़० दार ] जालीदार । सूराखदार । जिसमें झँझरी या जाली हो ।

झँझेरना पु †
क्रि० स० [सं० झर्झन] दे० 'झँझोड़ना' । उ०— देख्यौं भक्त प्रधान जब राजा जाग्यौ नाँहिं । सुंदर संक करी नहीं पकरि झँझेरी बाँहिं ।— सुंदर० ग्रं०, भा० २, पृ० ७९१ ।

झँझोटी
संज्ञा स्त्री० [हिं० ]दे० 'झिंझौटी' ।

झँझोड़ना
क्रि० स० [सं० झर्झन] १. किसी चीज को बहुत वेग और झटके के साथ हिलाना जिसमें वह टूट फूट जाय या नष्ट हो जाय । झकझोरना । जैसे,— वे सोए हुए थे, इन्होंने जाते ही उन्हें खूब झँझोडा़ । २. किसी जानवर का अपने से छोटे जानवर को मार डालने के लिये दाँतों से पकड़कर खूब झटका देना । झकझोरना । जैसे, कुत्ते या बिल्ली का चूहे को झँझोड़ना ।

झँझोरा
संज्ञा पुं० [देश०] कचनार का पेड़ ।

झँझौटी
संज्ञा स्त्री० [हिं० ]दे० 'झींझौटी' ।

झँडूलना
संज्ञा पुं० [हिं० ]दे० 'झंडूला' ।

झँडुला (१)
वि० [हिं० झंड + ऊला (प्रत्य०)] १. जिसके सिर परगर्भ के बाल हों । जिसका मुंडन संस्कार न हुआ हो । गर्भ के बालोंवाला (बालक) । २. मुँडन संस्कार के पहले का । गर्भ का (बाल) । उ०—डर बघनहाँ कंठ कठुला झँडूले केस मेढी़ लटकन मसिबिंदु मुनि मनहर ।—तुलसी ग्रं०, पृ० २८६ । विशेष— इस अर्थ में यह शब्द प्रायः बहुवचन रूप में बोला जाता है । जैसे, झँडूले केश, झँडूले बार । उ०— उर बघनहाँ, कंठ कठुला, झँडूले बार, बेनी लटकन मासि बुंदा मुनि मनहर । सूर १० ।१५१ । ३. घनी पत्तियौंवाला । सघन ।

झँडूला (२)
संज्ञा पुं० १. वह बालक जिसके सिर पर गर्भ के बाल हों । वह लड़का जिसके गर्भ के बाल अभी तक मुँडे़ न हों । २. मुँडन संस्कार से पहले का बाल । ग्रभ का बाल जो अभी तक मूँडा न गया हो । ३. घनी पत्तियोंवाला वृक्ष । सघन वृक्ष ।

झँपकना
क्रि० अ० [हिं० झपकना]दे० 'झपकना' ।

झँपकी
संज्ञा स्त्री० [हिं० झपकी] दे० 'झपकी' ।

झँपताल
संज्ञा पुं० [हिं० अपताल]दे० 'झपताल' ।

झँपक
संज्ञा पुं० [सं० झम्पाक] बंदर ।

झँपना (१)
क्रि० अ० [सं० झम्प] १. ढँकना । छिपना । आड़ में होना । २. उछलना । कूदना । लपकना । झपकना । उ०— (क) छकि रसाल सौरभ सने मधुर माधुरी गंध । ठौर ठौर झौरत झँपत झौरं झौंर मधु अंध । —बिहारी (शब्द०) । (ख) जबहि झँपति तबहि कंपति विहँसि लगति उरोज ।— सूर (शब्द०) । ३. टूट पड़ना । एक दम से आ पड़ना । उ०— जागत काल सोवत काल काल झंपै आई । काल चलत काल फिरत कबहूँलै जाई ।— दादू (शब्द०) । ४. झेंपना । लज्जित होना ।

झँपना (२)पु
क्रि० स० पकड़कर दबा लेना । छोप लैना । ढाँक लेना । उ०— नीची मैं नीची निपट लौं दिठि कुही दौरि । उठि ऊँचै नीचौ दियौ मनु कुलिंगु झँपि झौरि ।—बिहारी (शब्द०) ।

झँपरिया
संज्ञा स्त्री० [हिं० झाँपना(= ढँकना)] पालकी को ढाँकने की खोली । गिलाफ । ओहार । उ०—आठ कोठरिया नौ दरवाजा दसयें लागि केवरिया । खिड़की खोलि पिया हम देखल ऊपर झाँप झँपरिया ।— कबीर (शब्द०) ।

झँपरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० झँपरिया]दे० 'झँपरिया' ।

झँपाक
संज्ञा पुं० [सं० झम्पाक] बंदर । कपि ।

झँपान
संज्ञा पुं० [सं० झम्प] सवारी के लिये एक प्रकार की खटोली जिसमें दोनों ओर दो लंबे बाँस बँधे होते हैं । झप्पान । विशेष— इन बाँसों के दोनों ओर बीच में रस्सियाँ बँधी होती हैं, जिनमें छोटे छोटे दो और बाँस पिरोए रहते हैं । इन्हीं बाँसों को चार आदमी कंधों पर रखकर सवारी ले चलते हैं । यह सवारी बहुधा पहा़ड़ की चढा़ई मे काम आती है ।

झँपोला
संज्ञा पुं० [हिं० झाँप + ओला (प्रत्य०)] [स्त्री० अल्पा० झाँपोली, झँपोलिया] छोटा झाँपा या झाबा । छाबड़ा ।

झँफान †
संज्ञा पुं० [झम्प] कांतिहीन होना । समाप्त या नष्ट होना । गलित होना । उ०— रूप रंग ज्यों फूलड़ा तन तरवर ज्यों पान । हरिया झोलो काल को झड़ि हुए झँफान ।—राम० धर्म०, पृ० ६७ ।

झँवकार पु †
[हिं० झाँवला + काला] कृष्ण वर्ण का । झाँवले रंग का । कुछ कुछ काला । उ०— गैड गयंद जरे भए कारे । ओ बन मिरग रोझ झँवकारे ।—जायसी (शब्द०) ।

झँवराना
क्रि० अ० [हिं० झाँवर] १. कुछ काला पड़ना । २. कुम्हलाना । सूखना । फीका पड़ना ।

झँवा
संज्ञा पुं० [हिं०]दे० 'झाँवाँ' । उ०—झझकत हिये गुलाब के झवाँ झँवावति पाँय ।—बिहारी (शब्द०) ।

झँवाना (१)
क्रि० अ० [हिं० झाँवाँ] १. झाँवे के रंग का हो जाना । कुछ काला पड़ जाना । जैसे, धूप में रहने के कारण चेहरा झँवा जाना । २. अग्नि का मंद हो जाना । आग का कुछ ठंढा हो जाना । ३. किसी चीज का कम हो जाना । घट जाना । ४. कुम्हलाना । मुरझाना । ५. झाँवे से रगड़ा जाना । संयो० क्रि०—जाना ।

झँवाना (२)
क्रि० स० १. झाँवे के रंग का कर देना । कुछ काला कर देना । जैसे,—धूप ने उनका चेहरा झँवा दिया । २. अग्नि को मंद करना । आग ठंढी करना । ३. किसी चीज को कम करना । उ०—ज्ञान को अभिमान किए मोको हरि पठ्यो । मेरोई भजन मा थापि माया सुख झँवायो ।—सूर (शब्द०) । ४. कुम्हला देना । मुरझा देना । ५. झाँवे से रगड़ना । ६. झाँवे से रगड़वाना ।

झँवावना पु
क्रि० स० [हिं० झँवाना] झाँवे से रगड़ना या रगड़वाना । उ०—झझकत हिये गुलाब के झँवा जँवावति पाँय ।—बिहारी (शब्द०) ।

झँसना
क्रि० स० [अनु०] १. सिर वा तलुए आदि में में तेल या और कोई चिकना पदार्थ लगाकर हथेली से उसे बार बार रगड़ना जिसमें वह उस अंग के अंदर समा जाय । जैसे— सिर में कददू का तेल झँसने तुम्हारा सिर दर्द दूर होगा । संयो० क्रि०—देना । २. किसी को बहकाकर या अनुचित रूप से उसका धन आदि ले लेना । जैसे—इस ओझा ने भूत के बहाने उससे दस रुपए झँस लिए । संयो० क्रि०—लेना ।


संज्ञा पुं० [सं०] १. झँझावात । वर्षा मिली हुई तेज आँधी । २. सुरगुरु । बृहस्पति । ३. दैत्यराज । ४. ध्वनि । गुंजार शब्द । ५. तीब्र वायु । तेज हवा ।

झइँ †पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०]दे० 'झाँई' । उ०—भरतहि देखि मातु उठि धाई । मुरछित अवनि परी झइँ आई ।—तुलसी (शब्द०) ।

झई †पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०]दे० 'झाँई' । उ०—को जाने काहू के जिय की छिन छिन होत नई । सूरदास स्वामी के बिछुरे लागे प्रेम झई ।—सूर (शब्द०) ।

झउआ (१) †
संज्ञा पुं० [हिं० झाबा] खाँचा । टोकरा । झाबा ।

झउआ (२) †पु
संज्ञा पुं० [सं० झावुक, हिं० झाऊ]दे० 'झाऊ' । उ०— साधो एक बन झाकर झउआ । लावा तितिर तेहि माह भुलाने सान बुझावत कौआ ।—दरिया, पृ० १२५ ।

झउवा †
संज्ञा पुं० [हिं०]दे० 'झउआ' ।

झक (१)
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १.कोई काम करने की ऐसी धुन जिसमें आगा पीछा या भला बुरा न सूझे । २. धुन । सनक । लहर । मौज । क्रि० प्र०—चढ़ना ।—लगना ।—समाना ।—सवार होना । ३. आँच । ताप । ज्वाला । उ०— मात्रा के झक जग जरै, कनक कामिनी लागि । कह कबीर कस बचिहै, रुई लपेटी आगि ।— संतवानी०, पृ० ५७ । ४. झींका । झमक । झाक । क्रि० प्र०—आना ।

झक (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० झख]दे० 'झख' ।

झक (३)
वि० चमकीला । साफ । ओपदार । जैसे, सफेद झक ।

झककेतु पु
संज्ञा पुं० [सं० झषकेतु] दे० 'झषकेतु' ।

झकजक (१)
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. व्यर्थ की हुज्जत । फलूल झगड़ा या तकरार । किचकित । २. व्यर्थ की बकवाद । निरर्थक वादविवाद । बकबक । यौ०—बकबक झकझक ।

झकझक (२)
वि० [अनु०] चमकीला । ओपदार । चमकदार । उ०— झकझक झलकती वह्नि वामा के द्दग त्यों त्यों ।—अपरा, पृ० ४७ ।

झकझका
वि० [अनु०] चमकीला । ओपदार । चमकदार ।

झकझकाहट
संज्ञा स्त्री० [अनु०] ओप । चमक । जगमगाहट ।

झकझेलना
क्रि० स० [हिं०]दे० 'झकझोरना' ।

झकझोर (१)
संज्ञा पुं० [अनु०] झोंका । झटका । उ०— तन जस पियर वात भा मोरा । तेहि पर बिरह देइ झकझोरा ।—जायसी (शब्द०) ।

झकझोर (२)
वि० झोंकेदार । तेज । जिसमें खूब झोंका हो । उ०— काम क्रोध समेत तृष्णा पवन अति झकझोर । नाहिं चितवन देति तिय सुत नाम नौका ओर ।— सूर (शब्द०) ।

झकझोरना
क्रि० स० [अनु०] किसी चीज को पकड़कर खूब हिलाना । झोंका देना । झटका देना । उ०— (क) सूरदास तिनको ब्रज युवती झकझोरति उर अंक भरे ।—सूर (शब्द०) । (ख) अधिक सुगंधनि सेवक चारू मलिंदन को झकतझोरति है ।—सेवक (शब्द०) । (ग) बातन ते ड़रपैए कहा झकझोरत हूँ न अरी अरसात है ।— (शब्द०) ।

झकझोरा
संज्ञा पुं० [अनु०] झटका । धक्का । झोंका । उ०— मँद विलंद अमेंरा दलकनि पाइब दुख झकझोरा रै ।—तुलसी (शब्द०) ।

झकझोरी
संज्ञा स्त्री० [अनु०] छीनाझपटी । होड़ाहोड़ी । उ०— भारत में मती है होरी । इक ओर भाग अभाग एक दिसि होय रही झकझोरी ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ४०५ ।

झकझोलना (१)
क्रि० स० [हिं० झकझोला]दे० 'झकझोरना' ।

झकझोलना पु (२)
क्रि० अ० काँपना । हिलना ड़ुलना । झोंका खाना । उ०—पकरयो चीर दुष्ट् दुस्सासन बिलख बदन भइ ड़ोलै । जैसै राहु नीच ढिग आऐं चंद्रकिरन झकझोलै ।—सूर०, १ ।२५६ ।

झकझोला
संज्ञा पुं० [अनु०]दे० 'झकझोरा' । उ०—मोर और तोर देत झकझोला, चलत बेक नहिं जोर ।—तुरसी० श०, पृ० ७ ।

झकझौल †
संज्ञा पुं० [अनु०] आथात । धक्का । झकझोरा । उ०— रचना यह परब्रह्म की चौराशी झकझौल ।—सुंदर० ग्रं०, भा० १. पृ० ३१५ ।

झकड़
संज्ञा पुं०[हिं० झक]दे० 'झक्कड़' ।

झकड़ा †
संज्ञा स्त्री० [देश०] सूत सी निकली हुई जड़ । (अं० फाइवर्स ।)

झकड़ी †
संज्ञा स्त्री० [देश०] दोहनी । दूध दुहने का बरतन ।

झकना †
क्रि० अ० [अनु०] १. बकवाद करना । व्यर्थ की बातें करना । २. क्रोध में आकर अनुचित बचन कहना । उ०— बेगि चलो सब कहें, जकैं तिन सों निज हठ तै ।—नंद० ग्रं०, पृ० २०९ । ३. झुझलाना । खीझना । उ०— हरि कौ नाम, दाम खोटे लौं झकि झकि डारि दयौ ।—सूर०, १ ।६४ । ४. पछताना । कुढ़ना । उ०— ऊधो कुलिश भई यह छाती । मेरो मन रसिक लग्यो नँदलालहिं झकत रहत दिन राती ।—सूर (शब्द०) ।

झकर †
संज्ञा पुं० [हिं० झकड़]दे० 'झक्कड़' ।

झका †
वि० [हिं०]दे० 'झक' ।

झकाझक पु †
वि० [अनु०] जो खूब साफ सौर चमकता हुआ हो । दकादक । चमकीला । झलाझल । उज्वल । जैसे,—सफेदी होने से यह कमरा झकाकक हो गया । उ०—झोंकि कै प्रीति सों झीने झरोखनि झरि कै झाका झकाझक झाँकी ।—रघुराज (शब्द०) ।

झकाझक्क पु
वि० [अनु०] चमकीला । उज्वल । उ०—खँसी है कटारी कट्यौ में अन्यारी । झकाझक्क क्वारी दई की सझारी ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० २८२ ।

झकाझोर
संज्ञा पुं० [अनु०] दे० 'झकझोर' । उ०— चहूँ ओर तोपै चलै बान छूटै । झकाझोर समसेर की मार बोलै ।—हम्मीर०, पृ० १९ ।

झकाझोरी
संज्ञा स्त्री० [अनु०] हिलाने या झकझोरने का क्रिया या स्थिति । उ०—थोरी हू किसोरी गोरी रोरी रंग बोरी तब मची दुहूँ ओर ... झकाझोरी हैं ।—ब्रज० ग्रं०, पृ० २९ ।

झकुराना (१) †
क्रि० अ० [हिं० झकोरा] झकोरा लेना । झूमना ।उ०—रुक्यौ साँकरै कुंजमग करतु झाँकि झकुरातु । मंद मंद मारुत तुरँग खुंदतु आवतु जातु ।—बिहारी (शब्द०) ।

झकुराना (२)
क्रि० स० झकोरा देना । झूमने में प्रवृत्त करना ।

झकोर पु
संज्ञा पुं० [अनु०] १. हवा का झोंका । पवन की हिलोर । हिलकोरा । उ०—(क) चारु लोचन हँसि विलोकनि देखिकै चितचोर । मोहनी मोहन लगावत लटकि मुकुट झकोर ।—सूर (शब्द०) । (ख) पवि पाहन दामिनी गरज झरि चकोर खरि खीझि । रोष न प्रीतम दोष लखि तुलसी रागाहि रीझि ।—तुलसी (शब्द०) । (ग) चारिहुँ ओर तें पौन झकोर झकोरन घोर घटा घहरानी ।—पद्माकर (शब्द०) । २. झटका । झोंका । धक्का ।

झकोरना
क्रि० अ० [अनु०] हवा का झोंका मारना । उ०—(क) चहुँ दिसि पवन झकोरत घोरत मेघ घटा गंभीर ।—सूर (शब्द०) । (ख) झँझरी के झरोखनि ह्वै कै झकोरति रावटी हूँ में न जात सही ।—देव (शब्द०) ।

जकोरा
संज्ञा पुं० [अनु०] हवा का झोंका । वायु का वेग ।

झकोल पु †
संज्ञा पुं० [अनु०]दे० 'झकोर' या 'झकोरा' । उ०— मृदु पदनास मंद मलयानिल विलगत शीश निचौल । नील पीत सित अरुन ध्वजा चल सीर समीर झकोल ।—सूर (शब्द०) ।

झकोला
संज्ञा पुं० [हिं०]दे० 'झकोरा' । उ०—(क) धन भई वारी पुरुष भए भोला सुरत झकोला खाय ।—कबीर सा० सं०, पृ० ७५ । (ख) उन्हें कभी कोई नोका उमड़े हुए सागर में झकोले खाती नजर आती ।—रंगभूमि, पृ० ४७९ ।

झक्क (१)
वि० [प्रा० जगजग(= चमकना)अथवा अनु०] खूब साफ और चमकता हुआ । झकाझक । ओपदार ।

झक्क (२)
संज्ञा स्त्री० [अनु०]दे० 'झक' । क्रि० प्र०—चढ़ना ।—उतरना ।

झक्कड़ (१)
संज्ञा पुं० [अनु०] तेज आँधी । तूफान । तीव्र वायु । अंधड़ । क्रि० प्र०—आना ।—उठना ।—चलना ।

झक्कड़ (२)
वि० [हिं० झक्क + ड़ (प्रत्य०)]दे० 'झक्की' ।

झक्का
संज्ञा पुं० [अनु०] १. हवा का तेज झोंका । २. झक्कड़ । आँधी (लश०) ।

झक्का भुक्की
संज्ञा स्त्री० [हिं० झाँक झूँक] किसी बात को ध्यान से न सुनकर इधर उधर झाँकना । बात को गौर से न सुनना । महटियाना । उ०— घाघ कहै तब अनते चितवै झक्काझुक्की करते । सं० दरिया, पृ० १३५ ।

झकाझोरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० झकझोरना] दे० 'झकझोरी' । उ०— झक्काझोरी ऐंचातानी, जहँ तहँ गए बिलाई ।— जग० बानी, पृ० ६८ ।

झक्की
वि० [अनु० या प्रा० झंख] १. व्यर्थ की बकवाद करनेवाला । बहुत बक बक करनेवाला । २. जिसे झक सवार हो । जों आदमी अपनी धुन के आगे किसी की न सुने । सनकी ।

झक्खना पु †
क्रि० अ० [प्रा० झंखण, झक्खण]दे० 'झींखना' । उ०— कह गिरिधर कविराय मातु झक्खै वहि ठाहीं ।— गिरधर (शब्द०) ।

झक्खर पु †
[हि० झक्कड़] झकोरा । उ०—घर अंबर बीच वेलड़ी, तहँ लाल सुगंधा बूल । झक्खर इक माँ आयो, नानक नहीं कबूल ।—संतवाणी०, पृ० ७० ।

झख (१)
संज्ञा स्त्री० [हि० झोखना] झींखने का भाव या क्रिया । मुहा०—झख मारना = (१) व्यर्थ समय नष्ट करना । वक्त खराब कमना । जैसे,—आप सबेरे से यहाँ बैठे हुए झख मार रहे हैं । (२) अपनी मिट्टी खराब करना । (३) विवश होकर बुरी तरह झीखना । लाचार होकर खूब कुढ़ना । जैसे,— (क) तुम्हें झख मारकर यह काम करना होगा । (ख) झख मारो और वहीं जाओ । उ०—नीर पियावत का फिरै घर घर सायर वारि । तृषावंत जो होइगा पीवैगा झख मारि ।— कबीर सा० सं०, भा० १, पृ० १५ ।

झख (२)पु
संज्ञा पुं० [सं० झष] मत्स्य । मछली । उ०—अँखिन तै आँसू उमड़ि परत कुचन पर आन । जनु गिरीस के सीस पर ढारत झख मुकतान ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० १७० । यौ०—झखकेतु । झखनिकेत । झखराज । झखलग्न ।

झखकेतु
संज्ञा पुं० [सं० झषकेतु]दे० 'झषकेतु' । उ०—आँखों को नचा नचाकर झखकेतु ध्वजा फहरात ।—बी० शा० महा०, १८८ ।

झखना पु †
क्रि० अ० [प्रा० जक्खण]दे० 'झीखना' । उ०— (क) बाबा नंद झखत केहि कारण यह कहि मया मोह अरुझाय । सूरदास प्रभु मातु पिता को तुरताहि दुख डारयो बिसराय ।—सूर (शब्द०) । (ख) पुनि धांइ धरी हरि जू की भुजान तैं छूटिबे को बहु भाँति झखी री ।—केशव (शब्द०) । (ग) कवि हरिजन मेरे उर बनमाल तेरे बिन गुन माल रेख सेख देखि झखियाँ ।—हरिजन (शब्द०) ।

झखनिकेत पु
संज्ञा पुं० [सं० झषनिकेत]दे० 'झषनिकेत' ।

झखराज पु
संज्ञा पुं० [ सं० झषराज] मकर । नक्र । झषराज । उ०—झखराज ग्रस्यो गजराज कृपा ततकाल बिलंब कियो न तहाँ ।—तुलसी ग्रं०, पृ० १९९ ।

झखलगन पु
संज्ञा पुं० [सं० झषलग्न]दे० 'झषलग्न' ।

झखिया
संज्ञा स्त्री० [हि० झख + इया (प्रत्य०)]दे० 'झखी' ।

झखी †पु
संज्ञा स्त्री० [सं० झष] मीन । मछली । मत्स्य । उ०— (क) आवत बन ते साँझ देखो मैं गायन माँझ, काहू को ढ़ोढारी एक शीष मोर पखियाँ । अतसी कुसुम जैसे चंचल दीरघ नैन मानो रस भरी जों लरत जुगल झखियाँ ।—सूर (शब्द०) । (ख) गोकुल माह मैं मान करै ते भई तिय बारि बिना झखियाँ है ।—(शब्द०) ।

झगड़ना
क्रि० अ० [देशी झगड़ (= झगड़ा, कलह) + हि० ना (प्रत्य०) या झकझक से अनु० ] दो आदमियों का आवेश में आकर परस्पर विवाद करना । झगड़ा करना । हुज्जत तकरार करना । लड़ना । संयो० क्रि०—जाना ।—पड़ना ।

झगड़ा
संज्ञा पुं० [देशी झगड़ या हिं० झकझक से अनु०] दो मनुष्यों का परस्पर आवेशपूर्ण विवाद । लड़ाई । टंटा । बखेड़ा । कलह । हुज्जत । तकरार । क्रि० प्र०—करना ।—उठाना ।—समेटना ।—डालना ।— फैलाना ।—तोड़ना ।—खड़ा करना ।—मचाना ।—लगाना । यौ०—झगड़ा बखेड़ा । झगड़ा झमेला । मुहा०—झगड़ा खड़ा होना = झगड़ा पेदा होना । झगड़ा खरीदना = अकारण कोई ऐसी बात कह देना जिससे अनायास झगड़ा खड़ा हो जाय । उ०—शेख जी जहाँ बैठते हैं झगड़ा जरूर खरीदते हैं ।—फिसाना०, भा० १, पृ० १० । झगड़ा मोल लेना = दे० 'झगड़ा खरीदना' ।

झगड़ालू
वि० [हि० झगड़ा + आलू (प्रत्य०)] लड़ाई करनेवाला । जो बात बात में झगड़ा करता हो ।

झगड़ी पु
संज्ञा स्त्री० [हि० झगड़ा] अपने नेग के लिये झगड़ा करनेवाली स्त्री ।

झगर
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की चिड़िया । उ०—तूती लाल कर करे सारस झगर तोते तीतर तुरमती बटेर गहियत है ।— रघुनाथ (शब्द०) ।

झगरना
क्रि० अ० [देशी झगड़; हि० झगड़ा]दे० 'झगड़ना' । उ०—जसुमति मम अभिलाख करै ।... कब मेरी अँचरा गहि मोहन जोइ सोइ कहि मोसौ झगरैं ।—सूर०, १० ।७६ ।

झगरा पु †
संज्ञा पुं० [देशी झगड़ा]दे० 'झगड़ा' ।

झगराऊ पु †
वि० [हि० झगड़ालू]दे० 'झगडालू' उ०—याहि कहा मैया मुँह लावति, गनति कि एक लँगरि झगराऊ ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ४३४ ।

झगरिनि पु
संज्ञा स्त्री० [हि० झगड़ी]दे० 'झगड़ी' । उ०—(क) बहुत दिनन की आसा लागी झगरिनि झगरौ कीनौ ।— सूर०, १० ।१५ । (ख) झगरिनि तैं हों बहुत खिझाई । कंचनहार दिए नहिं० मानति तुहीं अनोखी दाई ।—सूर०, १० ।१३ ।

झगरी पु †
संज्ञा स्त्री० [हि० झगड़ी]दे० 'झगड़ी' । उ०—यशोमति लटकति पाँय परै । तेरौ भलो मनइहौं झगरी तूँ मति मनहि डरै ।—सूर (शब्द०) ।

झगरो †
संज्ञा पुं० [हि०]दे० 'झगड़ा' । उ०—(क) और जो वा समय प्रभुन को मुरारीदास वह वस्तू न देते तब भी श्री बालकृष्ण जी प्राकृतिक बालक की नाई झगरो मुरारी— दास सों करते ।—दो सौ बावन०, भा० १, पृ० १०० । (ख) तहँ तुम सुनहु बड़ा धन तुम्हारौ । एक मोक्षता पर सब झगरौ—नंद० ग्रं०, यृ० २७३ ।

झगला पु
संज्ञा पुं० [हि० झगा + ला (प्रत्य०)]दे० 'झगा' ।

झगा
संज्ञा दे० [देश०] १. छोटे बच्चों के पहनने का कुछ ढीला कुरता । उ०—नंद उदै सुनि आयौ हो वृषभानु कौ जगा । दैबे कौं बड़ौ महर, देत ना लावै गहर लाल की बधाई पाऊँ लाल कौ झगा ।—सूर० १० ।३९ । २. वस्ञ । शरीर पर पहनने का कपड़ा । उ०—(क) झगा पगा अरु पाग पिछौरी ढाढिन को पहिरायो । हरि दरियाई कंठ लगाई परद्रा सात उठायो ।—सूर (शब्द०) । (ख) सीस पगा न झगा तन में प्रभु जावे को आहि बसै किहि ग्रामा ।—कविता कौ०, भा० १, पृ० १४९ ।

झगुलि, झगुलिया †पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झगा का अल्पा०]दे० 'झगा' । ऊ०—प्रफुलित ह्वै के आनि, दीनी है जसोदा रानी, झीलीयै झगुलि तामैं कंचन तगा ।—सूर०, १० ।३९ ।

झगुली पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं०]दे० ' झगा' ।

झगुला पु
संज्ञा पुं० [हिं०]दे० ' झगा' । उ०—डार द्रुम पलना बिछौना नव पल्लव कौ, सुमन झगूला सोंहैं तन छवि भारी है ।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० १५७ ।

झज्झर
संज्ञा पुं० [सं० आलिन्जर] कुछ चौड़े मुँह का पानी रखने का मिट्टी का एक बरतन । विशेष—इस बरतन की ऊपरी तह पर पानी को ठंढा करने के लिये थोड़ी सी बालू लगा दी जाती है । इसकी ऊपरी सतह पर सुंदरता के लिये तरह तरह की नकाशियाँ भी की जाती हैं । इसका व्यवहार प्रायः गरमी के दिनों में जल को अधिक ठंढा करने के लिये होता है ।

झज्झी
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. फूटी कौड़ी । २. दलाली का धन ।— (दलालों की भाषा) ।

झझक
संज्ञा स्त्री० [हिं० झझकना] १. झझकने की क्रिया का भाव । किसी प्रकार के भय की आशंका से रुकने की क्रिया । चमक । भड़क । जैसे,—अभी इनकी झझक नहीं गई है, इसी से खुलकर नहीं । बोलते । क्रि० प्र०—जाना ।—मिटना ।—होना । मुहा०—झजक निकलना = झझक दुर होना । भय का नष्ट होना । झझक निकालना = झझक या भय दुर करना । जैसे,—हम चार दिन में इनकी झझक निकाल देंगे । २. कुछ क्रोध से बोलने की क्रिया या भाव । झुँझलाहट । ३. किसी पदार्थ में से रह रहकर निकलनेवाली विशेषतः आप्रिय गंध । क्रि० प्र०—आना ।—निकलना । ४. रह रहकर होनेवाला पागलपन का हलका दौरा । कभी कभी होनेवाली सनक । क्रि० प्र०—आना ।—चढना ।—सवार होना ।

झझकन पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झझकना] झझकने या झड़कने का भाव । डरकर हटने या रुकने का भाव । भड़क ।

झझकना
क्रि० अ० [अनु०] १. किसी प्रकार के भय की आशंका से अकस्मात् किसी काम से रुक जाना । अचानाक डरकर ठिठकना । बिदकना । चमकना । भड़कना । उ०—(क) कबहुँ चुंबन देत आकर्षि जिय लेत करति बिन चेत सब हेत अपने । मिलति भुज कंठ वै रहति अंग लटकि कै जात दुख दुर ह्वँ झझकि सपने ।—सूर (शब्द०) । (ख) छाले परिबे के डरन सकै न हाथ छुवाइ । झझकति हियहिं गुलाब के झँवा झँवावति पाइ ।—बिहारी (शब्द०) । संयो० क्रि०—उठना ।—जाना ।—पड़ना । २. झुँझलाना । खिजलाना । ३. चौंक पड़ना । उ०— जसुमतिमन मन यहै विचारति । झझकि उठयौ सोवत हरि अवहीं कछु पढ़ि पढ़ि तन दोष निवारति ।—सूर०, १० ।२०० । ३. संकुचित होना । झिझकना । उ०— अति प्रतिपाल कियौ तुम हमरौ सुनत नंद जिय झझकि रहे ।— सूर०, १० ।३११२ ।

झझकनि पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० जझकना]दे० ' झझकन' । उ०— वह रस की झझकनि वह महिमा, वह मुसुकनि वैसो संजोगा ।—सूर (शब्द०) ।

झझकाना
क्रि० स० [हिं० झझकना का प्रे० रूप] १. अचानक किसी प्रकार के भय की आशंका कराके किसी काम से रोक देना । चमकाना । भड़काना । उ०—जुज्यों उझकि झाँपति बदन फुकति बिहँसि सतराइ । तुत्यों गुलाल मुठी झुठी झझकावत पिय जाइ ।—बिहारी (शब्द०) । २. चौंका देना ।

झझकार
संज्ञा स्त्री० [हिं० झझकारना] झझकारने की क्रिया या भाव ।

झझकारना
क्रि० स० [अनु०] १. डपटना । डाँटना । २. दुर- दुराना । ३. अपने सामने कुछ न गिनना । किसी को अपने आगे मंद बना देना । उ०—नख मानो चँद्र बाण साजि कै झझकारत उर आग्यो । सूरदास मानिनि रण जीत्यों समर संग डरि रण भाग्यो ।—सूर (शब्द०) ।

झझकना पु
क्रि० अ० [अनु०] झाँझ बाजे का बजना । झाँझ की ध्वनि होना । उ०—झंझ झझक्कत उठत तरंग रंग, आरि उच्चारहिं दंद दंद मिरदंग ।—माधवानल०, पृ० १९४ ।

झझरी
संज्ञा स्त्री० [सं० जर्जर, हिं० झँझरी] जालीदार खिड़की । झँझरी । उ०—झझकि झझकि झझरिन जहाँ झाँकति झुकि झुकि झूमि ।—ब्रज० ग्रं०, पृ० ३ ।

झझिया पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं०]दे० 'झिँझिया' ।

झट
क्रि० वि० [सं० झटिति] तुरंत । उसी समय । तत्क्षण । फौरन । जैसे,—हमारे पहुँचते ही वे झट उठकर चले गए । मुहा०—झट से = जल्दी से । शीघ्रतापूर्वक । यौ०—झट पट ।

झटक पु †
संज्ञा पुं० [अनु०] वायु का झोंका । आँधी । उ०— झटक झाटल छोड़ल ठाम, कएल महातरु तर बिसराम ।— विद्यापति, पृ० ३०३ ।

झटकनहार
वि० [हिं० झटकना + हार] झटकनेवाला । झटका देलेवाला । उ०—भटकनहार भटकबो । झटकनहार झटकबो ।—प्राण०, पृ० ११८ ।

जटकना
क्रि० स० [हिं० झट] १. किसी चीज को इस प्रकार एक- बारनी झोंके से हिलाना कि उसपर पड़ी हुई दूसरी चीज गिर पड़े या अलगा हो जाय । झटके से हलका धक्का देना । झटका देना । उ०—नासिका ललित बेसरि बानी अधर तट सुभय तारक छबि कहि न आई । धरनि पद पटकि झटकि भोंहनि मटकि अटकि तहाँ रीझे कन्हाई ।—सूर (शब्द०) । विशेष—इस अर्थ में इस शब्द का प्रयोग उस वीज के लिये भी होता है जो किसी दूसरी चीज पर चढ़ती या पड़ती है । और उस चीज के लिये भी होता है जिसपर कोई दूसरी चीज चढ़ती या पड़ती हैं । जैसे,—यादि धोती पर कनखजूरा चढ़ने लगे तो कहेंगे कि 'धोती झटक दो' और यदि राम ने कृष्ण अपने हाथ पकड़ा और कृष्ण ने झटका देकर राम का हाथ अपने हाथ से अलग कर दिया तो कहेंगे कि 'कृष्ण ने राम का हाथ झटक दिया' । संयो० क्रि०—देना । २. किसी चीज को जोर से हिलाना । झोंका देना । झटका देना । मुहा०—झटककर = झोंकें से । झटके से । तेजी से । उ०— झटकि चढ़ति उतरति अटा नेक न थाकति देह । भई रहति नट कौ बटा अटकि नागरी नेह ।—बिहारी (शब्द०) । ३. दबाव डालकर चालाकी से या जबरदस्ती किसी की चीज लेना । ऐंठना । जैसे,—(क) आज एक बदमाश ने रास्ते में दस रुपए उनसे झटक लिए । (ख) पंडित जी आज उनसे एक धोती झटक लाए । संयो० क्रि०—लेना । मुहा०—झटके का माल = जबरदस्ती छीना या चुराया हुआ माल ।

झटकना (२)
क्रि० अ० रोग या दुःख आदि के कारण बहुत दुर्बल या क्षीण हो जाना । जैसे,—चार ही दिन के बुखार में वे तो बिलकुल झटक गए संयो० क्रि० —जाना ।

झटका
संज्ञा पुं० [अनु०] १. झटकने की क्रिया । झोंके से दिया हुआ हलका धक्का । झोंका । उ०—पिउ मोतियन की माल है, पोई काचे धाग । जतन करो झटका घना, नहिं टूटै कहुँ लागि ।—संतवाणी०, पृ० ४२ । क्रि० प्र०—खाना ।—देना ।—मारना ।—लगना ।—लगाना । २. झटकने का भाव । ३. पशुवध का वह प्रकार जिसमें पशु एक ही आघात से काट डाला जाता है । उ०—मुसलमान के जिबह हिंदू के मारैं झटका ।—पलटू०, पृ० १०६ । यौ०—झटके का मांस = उत्क प्रकार के मारे हुए पशु का मांस । ४. आपत्ति, रोग या शोक अदि का आघात । क्रि० प्र०—उठाना ।—खाना ।—लगना । ५. कुश्ती का एक पेंच जिसमें विपक्षी की गरदन उस समय जोर से दोनों हाथों से दबा दी जाती है जब वह भीतरी दाँव करने कै इरादे से पेट में घुस आता है ।

झटकाना पु †
क्रि० स० [हिं० झटकना] झटके से स्थानच्युत कर देना झटके से अस्तब्यस्त कर देना ।—उ०—याहि लालच अँकवारि भरत हो, हार तोरि चोली झटकाई ।—सूर (शब्द०) ।

झटकार †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] १. झटकारने का भाव । झटकने का भाव वा क्रिमा । २. दे० 'फटकार' ।

झटकारना
क्रि० स० [अनु०] किसी चीज को इस प्रकार हिलाना जिसमें उसपर पड़ी हुई दूसरी चीज गिर पड़े या अलग हो जाय । झटकना । जैसे, ऊपर पड़ी हुई गर्द साफकरनें के लिये चादर झटकारना या किसी का हाथ झटकारना । दे० 'झटकना' ।

झटक्कना पु †
क्रि० स० [हिं० झटकना] झटका देना । झोंका देना । उ०—झटक्कत इक्कन कौ गहि इक्क ।—प० रासो, पृ० ४१ ।

झटझारी †
क्रि० वि० [अनु०] जल्दी जल्दी । उ०—आजु आओत हरि गोकुल रे, पथ चलु झटकारी ।—विद्यापति, पृ० ३६५ ।

झटपट
अव्य० [प्रा० जड़प्पड़ या हिं० झट + अनु० पट] अति शीघ्र । तुरंत ही । तत्क्षण । फौरन । बहुत जल्दी । जैसे,— तुम झटपट जाकर बाजार से सौदा ले आओ उ०— राम युधीष्ठर बिक्रम की तुम झटपट सुरत करो री ।—भारतेंदु० ग्रं० भा० १, पृ० ५०३ ।

झटा
संज्ञा स्त्री० [सं०] भू आँवला ।

झटाका
क्रि० वि० [अनु०]दे० 'झड़ाका' ।

झटापटा पु
संज्ञा स्त्री० [प्रा० झडप्पड = छीना झपटी, (झड़प्पिअ= छीना हुआ)] हलचल । उत्पात । उपद्रव । उ०—तिहुँ लोक होत झटापटा, अब चारं जुगन निवास हो—कबीर, सा०, पृ० ११ ।

झटास †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झड़ी] बौछार ।

झटि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. छोटा पेड़ । २. झाड़ी । गुल्म [को०] ।

झटिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'झाटा' ।

झटिति †पु
क्रि० वि० [सं०] १. झट । चटपट । फौरन । तत्काल । तुरंत । उ०—कटत झटिति पुनि नूतन भए । प्रभु बहु बार बाहु सिर हए ।—तुलसी (शब्द०) । २. विना समझे बूझे ।

झटोला †
संज्ञा पुं० [देश०] वह खाट जिसकी बुनावट टूट टूटकर ढीली हो गई हो । उ०—माटी के कुड़िल न्हआओ, झटोले सुलाऔ । फाटी गुदरिया बिछाऔ, छोरा कहि कहि बोलौ ।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ९१७ ।

झट्ट †
क्रि० वि० [अनु०]दे० 'झट' । उ०—दुअं तीन षानं हयं- तीहि पानं । वहै षग्ग झट्टं सुदाहिंम घट्टं ।—पृ० रा०, २४ । १७५ ।

झठ †
क्रि० वि० [हिं० झट] शीघ्र । दे० 'झट' । उ०—जद जावे रे जद जावे । झठ सेस गयो समझावे ।—रघु० रू०, पृ० १५६ ।

झड़ पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० झड़ना] १. दे० 'झड़ी' । २. ताले के भीतर का खटका जो चाभी के आघात से घटता बढ़ता है ।

झड़कना
क्रि० स० [अनु०]दे० 'झिड़कना' ।

झड़क्का †
संज्ञा पुं० [अनु०]दे० 'झड़ाका' ।

झड़झड़ाना
क्रि० स० [अनु०]दे० १. 'झिड़कना' । दे० 'झँझोड़ना' ।

झड़न
संज्ञा स्त्री० [हिं० झड़ना] १. जो कुछ झड़ के गिरे । जड़ी हुई चीज । २. झड़ने की क्रिया या भाव । ३. लगाए हुए धन का मुनाफा या सूद ।—(क्व०) । यौ०—झड़नझुड़न = दे० 'झरन' ।

झड़ना
क्रि० अ० [सं० क्षरण या √ शद्, अथवा सं० झर ('निर्झर' में प्रयुत्क), प्रा० झड] किसी चीज से उसके छोटे छोटे अंगों या अंशों का टूट टूटकर गिरना । जैसे, आकाश से तारे झड़ना, बदन की धूल झड़ना, पेड़ में से पत्तियाँ झड़ना, वर्षा की बूँदें झड़ना । मुहा०— फुल झड़ना । दे० 'फूल' के मुहावरे । २. अधिक मान या संख्या में गिरना । संयो० क्रि०—जाना ।—पड़ना । ३. वीर्य का पतन होना । (बाजारू) । संयो० क्रि०—जाना । ४. झाड़ा जाना । साफ किया जाना । ५. वाद्य का बजना । जैसे, नौबत झड़ना ।

झड़प (१)
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. दो जीवों की परस्पर मुठभेड़ । लड़ाई । २. क्रोध । गुस्सा । ३. आवेश । जोश । ४. आग की लौ । लपट ।

झड़प (२)
क्रि० वि० [देशी झड़प्पा या अनु०]दे० 'झड़ाका' ।

झड़पना
क्रि० अ० [अनु०] १. आक्रमण करना । हमला करना । वेग से किसी पर गिरना । २. छोप लेना । ३. लड़ना । झगड़ना । उलझ पड़ना । संयो० क्रि०—जाना ।—पड़ना । ४. जबरदस्ती किसी से कुल छीन लेना । झटकना । संयो० क्रि०—लेना ।

झड़पा
संज्ञा स्त्री० [अनु० या देशी झड़प्प] हाथापाई । गुत्थमगुत्था । यौ०—झड़पाझड़पी = हाथापाई । कहा सुनी ।

झड़पाना
क्रि० स० [अनु०] दो जीवों विशेषतः पक्षियों को लड़ाना—(क्व०) ।

झड़पी
संज्ञा स्त्री० [अनु०]दे० 'झड़पा' ।

झड़बेरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० झाड़ + बेर] १. जंगली बेर । २. जंगली बेर का पौधा । मुहा०—झड़बेरी का काँटा = लड़ने या उलझनेवाला मनुष्य । व्यर्थ झगड़ा करनेवाला मनुष्य ।

झड़बैंरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झड़वेरी' ।

झड़बाई पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झड़ (= झड़ी) + सं० वायु, हिं० वाइ] वह वायु जो झड़ी लिए हो । वर्षा की झड़ी से भरी हुई वायु । वह वायु जिसमें वर्षा की फुहारें मिली हों । उ०— अति घण ऊनिमि ऊनिमि आवियउ झाझी रिठि झड़वाइ । बग ही भला त बप्पड़ा धरिण न मुक्कइ पाइ ।—ढ़ोला०, दू० २५७ ।

झड़वाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० झाड़ना]दे० 'झड़ाई' ।

झड़वाना
क्रि० स० [हिं० झाड़ना का प्रे० रूप] झाड़ने का काम दूसरे से कराना । दूसरे को झाड़ने में प्रवृत्त करना ।

झड़ाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० झाड़ना] झाड़ने का भाव । झाड़ने का काम या झाड़ने की मजदूरी ।

झड़ाक
क्रि० वि० [अनु०]दे० ' झड़ांका' ।

झड़ाका (१)
संज्ञा पुं० [अनु०] झड़प । दो जीवों की परस्पर मुठभेड़ ।

झड़ाका (२)
क्रि० वि० जल्दी से । शीघ्रतापूर्वक । चटपट ।

झड़ाझड़
क्रि० वि० [अनु०] १. लगातार । बिना रुके । बराबर । एक के बाद एक । उ०—भर भर तोप झड़ाझड़ मारो ।— कबीर० श०, पृ० ३८ । २. जल्दी जल्दी ।

झड़ाझड़ि पु
क्रि० वि० [अनु०]दे० 'झड़ाझड़' । उ०—रन में पैठि झड़ाझड़ि खेलै सन्मुख सस्तर खावै ।—चरण० बानी०, पृ० ८७ ।

झड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० जड़ना अथवा सं० झर (= झरना) या देशी झड़ी (= निरंतर वर्षा)] १. लगातार झड़ने की क्रिया । बूँद या कण के रूप में बराबर गिरने का कार्य या भाव । २. छोटी बूँदों की वर्षा । ३. लगातार वर्षा । बराबर पानी बरसना । ४. बिना रुके हुए लगातार बहुत सी बातें कहते जाना या चीजें रखते, देते अथवा निकालते जाना । जैसे,— उन्होंने बातों (या गालियों) की झड़ी लगा दी । क्रि० प्र०— बँधना ।—लगना ।—लगाना । ५. ताले के भीतर का खटका जो चाभी के आघात से हटता बढ़ता है ।

झणझण, झणझणा
संज्ञा स्त्री० [सं] झन् झन् की ध्वनि । झनझन का शब्द (को०) ।

झणत्कार
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'झनकार' [को०] ।

झन
संज्ञा स्त्री० [अनु०] वह शब्द जो किसी धातुखंड़ आदि पर आघात लगने से होता है । धातु के टुकड़े के वजने की ध्वनी । यौ०—झन झन ।

झनक
संज्ञा स्त्री० [अनु०] झनकार का शब्द । झन झन का शब्द जो बहुधा धातु आदि के परस्पर टकराने से होता है । जैसे, हथियारों की झनक, पाजेब की झनक, चूड़ियों की झनक । उ०—ढोल ढनक झाँझ झनक गोमुख सहनाई ।—घनानंद, पृ० ४८६ ।

झनकना
क्रि० अ० [अनु०] १. झनकार का शब्द करना । २. क्रोध आदि में हाथ पैर पटकना । ३. चिड़चिड़ाना । क्रोध में आकर जोर से बोल उठना । ४. दे० 'झीखना' ।

झनकमनक
संज्ञा स्त्री० [अनु०] मंद मंद झनकार जो बहुधा आभूषणों आदि से उत्पन्न होती है । उ०— झनक मनक धुनि होत लगत कानन को प्यारी ।—ब्रज० ग्रं०, पृ० ११९ ।

झनकवात
संज्ञा स्त्री० [अनु० झनक + सं० वात] घोड़ों का एक रोग जिसमें वे अपने पैर को कुछ झटका देकर रखते हैं ।

झनकाना
क्रि० स० [अनु० झनकना का प्रे० रूप] झनकार उत्पन्न करना । बजाना ।

झनकार
संज्ञा स्त्री० [सं झणत्कार, प्रा० झणवकार]दे० ' झंकार' उ०— घर घर गोपी दही बिलोवहिं कर कंकन झनकार ।— सूर (शब्द०) ।

झनकारना (१)
क्रि० अ० [हिं० झनकार]दे० ' झंकारना' ।

झनकारना (२)
क्रि० स० दे० 'झंकारना' ।

झनकोर पु †
संज्ञा पुं० [हिं० झनकार या झकोर]दे० 'झनकार' । उ०—लौका लौकै बिजुली चमकै झिंगुर बोलै झनकोर कै ।—कबीर० श०, भा० ३, प्र० ३० ।

झनझन
संज्ञा स्त्री० [अनु०] झन झन शब्द । झनकार । झन- झनाहट ।

झनझना (१)
संज्ञा पुं० [देश०] एक कीड़ा जो तमाखू जो की नसों में छेद कर देता है । इसे चनचना भी कहते हैं ।

झन झना (२)
वि० [अनु०] जिसमें से झनझन शब्द उत्पन्न हो ।

झनझनाना (१)
क्रि० अ० [अनु०] १. झन झन शब्द होना । २. (लाक्ष०) भय, सिहरन या हृर्ष से रोमांचित होना । किसी अनुभूति से पुलकित होना । जैसे, न रोएँ झनझनाना ।

झनझनाना
क्रि० स० झनझन शब्द उत्पन्न करना ।

झनझनाहट
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. झनझन शब्द होने की क्रिया या भाव । झंकार । २. झुन झुनी ।

झनझोरा †
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का पेड़ ।

झनत्कृत
वि० [सं०]दे० 'झंकृत' । उ०—दूध अंतर का सरल, अम्लान, खिल रहा मुखदेश पर द्युतिमान । किंतु है अब भी झनत्कृत तार, बोलते हैं भूप बारंबार ।—साम०, पृ० ४८ ।

झननन
संज्ञा पुं० [अनु०] झन झन शब्द । झंकार ।

झननाना †
क्रि० अ० और स० [अनु०]दे० ' झंकारना' ।

झनवाँ
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का धान ।

झनस
संज्ञा पुं० [देश० ?] प्राचीन काल का एक प्रकार का बाजा जिसपर चमड़ा मढा़ हुआ होता था ।

झनाझन (१)
संज्ञा स्त्री० [अनु०] झंकार । झनझन शब्द ।

झनाझन (२)
क्रि० वि० झनझन शब्द सहित । इस प्रकार जिसमें झन झन शब्द हो । जैसे,—झनाझन खाँड़े बजने लगे, झनाझन रुप- बरसने लगे ।

झनिया
वि० [हि० झीना]दे० ' झीना' । उ०—कनक रतन मनि जटित कटि किंकिन कलित पीत पट झनिया ।—सूर (शब्द०) ।

झन्नाना
क्रि० अ० [अनु०]दे० 'झनझनाना' । उ०—मुखर झन्नाते रहे या मूक हो सब शब्द, पोपले वाचाल ये थोथे निहोरै ।—हरी घास०, पृ० २१ ।

झन्नाहट
संज्ञा स्त्री० [अनु०] झनकार का शब्द । झनझनाहट । उ०—टुटे सार सन्नाह झन्नाहटे सौं । परे छूटि कै भूमि खन्नाहटे सौं ।—सूदन (शब्द०) ।

झप
क्रि० वि० [सं० झंम्प (= जल्दी से गिरना, कूदना)] जल्दी से । तुरंत । झट । उ०—खेलत खेलत जाइ कदम चढ़ि झप यमुना जल लीनो । सोवत काला जाइ जगायो फिरि भारत हरि कीनो ।—सूर (शब्द०) । यौ०—झप झप । झपाझप । मुहा०—झप खाना = (१) पतंग का जल्दी से पेंदी के बल गिर पड़ना । (२) झेंप खाना । झँपना ।

झपक
संज्ञा स्त्री० [हिं० झपकना] १. उतना समय जितना पलक गिरने में लगता है । बहुत थोड़ा समय । २. पलकों का परस्पर मिलना । पलक का गिरना । ३. हलकी नींद । झपकी । ४. लज्जा । शर्म । हया । झेंप ।

झपकना
क्रि० अ० [सं० झम्प (= जोर से पड़ना, कूदना)] १.२. पलक गिराना । पलकों का परस्पर मिलना । झपकी लेना । ऊँघना ।—(क्व०) । ३. तेजी से आगे बढ़ना । झपटना । ४. ढ़केलना । ५. झेंपना । शरमिंदा होना । उ०— तभी, देवि, क्यों सहसा दीख, झपक, छिप जाता तेरा स्मित मुख, कविता की सजीव रेखा सी मानस पट पर घिर जाती है ।—इत्यलमू, पृ० ९८ । ६. ड़रना । सहम जाना । उ०— कहु देत झपकी झपकि झपकहु देत खाली दाऊँ ।—रघुराज (शब्द०) ।

झपका
संज्ञा पुं० [अनु०] हवा का झोंका ।—(लश०) ।

झपकाना
क्रि० स० [अनु०] पलकों को बार बार बंद करना । जैसे, आँख झपकाना ।

झपकारी
वि० स्त्री० [हिं० झपक + आरी (प्रत्य०)] १. निदियारी । झपकानेवाली । २. हयादार । लज्जा से झुकनेवाली । उ०— कारी झपकारी अनियारी बरुनी सधन सुहाई ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ४१४ ।

झपकी
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. हलकी नींद । थोड़ी निद्रा । उँघाई । ऊँघ । जैसे,—जरा झपकी ले लें तो चलें । क्रि० प्र०—आना ।—लगना ।—लेना । २. आँख झपकने की क्रिया । ३. वह कपड़ा जिससे अनाज ओसाने या बरसाने में हवा देते हैं । बँवरा । ४. धोखा । चकमा । बहकाना । उ०—कहुँ देत झपकी झपकि झपकहु देत खाली दाउँ । बढ़ि जात कहुँ द्रुत बगल ह्वै बलगात दक्षिण पाउँ ।— रघुराज (शब्द०) ।

झपको पु
संज्ञा पुं० [हिं० झपका] हवा का झोंका । उ०—दीपक बरत बिवेक कौ तौ लौं या चित माँहि । जौ लों नारि कटाक्ष पट झपको लागत नाहिं ।—ब्रज० ग्रं०, पृ० ८८ ।

झपकौँहाँ, झपकौहाँ पु †
वि० [हिं० झपना] [वि० स्त्री० झपकौहीं] १. नींद से भरा हुआ (नेत्र) । जिसमें झपकी आ रही हो (वह आँख) । झपकता हुआ । उ०—(क) झपकौहें पलनि पिया के पीक लीक लखि झुकि झहराइहूँ न नेकु अनुरागै त्यों ।—पद्माकर (शब्द०) । (ख) झुकि झुकि झपकौंहै पलनु फिरि फिरि जुरि, जमुहाइ । बींदि पिआगम नींद मिसि दीं सब अली उठाय ।—बिहारी र०, दो० ५८९ । २. मस्त । नशे में चूर । मतवाला । नशे में भरा हुआ । उ०—ससि अंश लटूरी चहुँधा पूरी जोति समूरी भाल लसैं । इगदुति झपकौंहीं भाँह बढ़ौंहीं । नाक चढ़ौंही अधर हँसै ।—सूदन (शब्द०) ।

झपट
संज्ञा स्त्री० [सं० झम्प (= कूदना)] झपटने की क्रिया या भाव । उ०—(क) देखि महीप सकल सकुचाने । बाज झपट जनु लवा लुकाने ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) मब पंछी जब लग उड़े विषय वासना माहिं । ज्ञान बाज की झपट में तब लगि आया नाहिं ।—कबीर (शब्द०) । यौ०—लपट झपट = लपटने या झपटने की क्रिया या भाव । उ०—लपट झपट झहराने हहराने जात भजराने भट परयो प्रबल परावनो ।—तुलसी (शब्द०) । मुहा०—झपट लेना = बहुत तेजी से बढ़कर छीनना ।

झपटना (१)
क्रि० अ० [सं० झंम्प (= कूदना)] १ । किसी (वस्तु या व्यत्कि) की ओर झोंक के साथ बढ़ना । वेग से किसी की ओर चलना । २ । पकड़ने या आक्रमण करने के लिये वेग से बढ़ना । टूटना । धावा करना । मुहा०—किसी पर झपटना = किसी पर आक्रमण करना । जैसे, बिल्ली का चूहे पर झपटना ।

झपटना (२)
क्रि० स० बहुत तेजी से बढ़कर कोई चीज ले लेना । झपटकर कोई चीज पकड़ या छीन लेना ।—जैसे, तोते को बिल्ली झपट ले गई । संयो० क्रि०—लेना ।

झपटान †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झपटना] झपटने का क्रिया ।

झपटाना
क्रि० स० [हिं० झपटना का प्रे० रूप] धावा कराना । आक्रमण कराना । हमला कराना । इश्तियालक देना । वार कराना । लड़ने को उभारना । उसकाना । बढ़ावा देना । किसी को झपटने में प्रवृत्त करना ।

झपट्टा †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झपटना]दे० 'झपट' । क्रि० प्र०—मारना । यौ०—झपट्टामार = झपट्टा मारनेवाला । झपटनेवाला ।

झपताल
संज्ञा पुं० [देश०] संगीत में एक ताल जो पाँच मात्राओं का होता है और जिसमें चार पूर्णं और दो अर्धँ होती हैं । इसमें तीन आघात और एक खाली रहता है । इसका मृदंग का बोल यह हैं— +  १  २  ०  + धाग, धागे+ने, तटे, धागे, ने घा । और इसका तबले का बोल यह है—धिन  धा,  धिन  धिन  धा,  देता,  ता  तिन  तिन ता । धा + ।

झपना (१)पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] झपने या मुदनेवाली वस्तु । पलक । उ०—अगमपुरी की सँकरी गलियाँ अड़बड़ हैं चलना । ठोकर लगी गुर ज्ञान शब्द की उघर गए झपना ।—कबीर० श० भा० १, पृ० ६७ ।

झपना (२)
क्रि० अ० [अनु०] १. (पलकों का) गिरना । (पलकों का) बंद होना । २. (आँखे) झपकना या बंद होना । झुकना । ३. लज्जित होना । झेंपना । झिपना ।

झपनी †
संज्ञा स्त्री० [देश०] १ । ढ़कना । वह जिससे कोई चीज ढ़की जाय । २. पिठारी ।

झपलैया †
संज्ञा स्त्री० [हिं०]दे० 'झपोला' । उ०—अस कहि झपलैया दिखरायो ।—शिलपिल्लै को दरस करायो ।—रघुराज (शब्द०) ।

झपबाना
क्रि० स० [अनु०] झपाना का प्रेरणार्थक रूप । किसी को झपाने में प्रवृत्त करना ।

झपस
संज्ञा स्त्री० [हिं० झपसना] १. गुंजान होने की क्रिया या भाव । २. कहारों की परिभाषा में पेड़ की झुकी हुई डाल । विशेष—इसका व्यवहार पिछले कहार को आगे पेड़ की डाल होने की सूचना देने के लिये पहला कहार करता है ।

झपसट
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १ । धोखा । दबसट । कपट । †२. एक गाली ।

झपसना
क्रि० अ० [हिं० झँपना (= ढँकना)] लता या पेड़ की डालियों का खूब घना होकर फैलना । पेड़ या लता आदि का गुंजान होना । जैसे,—यह लता खूब झपसी हुई है ।

झपाक
क्रि० वि० [हिं० झप] पलक भाँजते । चटपट । उ०— झकोरि झपाक झपटि नर समय गँवाई । नहिं समुझत निज मूल अंध ह्वै दृष्टि छिपाई ।—भीखा श०, पृ० ८७ ।

झपाका (१)
संज्ञा पुं० [हिं० झप] शीघ्रता । जल्दी ।

झपाका (२)
क्रि० वि० जल्दी से । शीघ्रतापूर्वक ।

झपाट †
क्रि० वि० [हिं० झप] झटपट । तुरंत । शीघ्र ही ।

झपाटा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० झपठ] चपेट । आक्रमण । दे० 'झपट' ।

झपाटा (२)
क्रि० वि० [हिं० झपाट] शीघ्र । झटपट ।

झपाना
क्रि० स० [हिं० झपना] १ । झपने का सकमँक रूप । मूँदना या बंद करना (विशेषतः आँखों या पलकों का) । २ । झुकावा । ३. दे० 'झिगाना' ।

झपाव
संज्ञा पुं० [देश०] घास काटने का एक प्रकार का औजार ।

झपावना †
क्रि० स० [हिं० झपाना] छिपाना । गोपन करना । उ०—बदन झपावए अलकत भार, चाँदमडल जनि मिलए अंधार ।—विद्यापति, पृ० ३४० ।

झपित
वि० [हिं० झपना] १. झपा हुआ । मुँदा हुआ । २. जिसमें नींद भरी हो । झपकौहा या उनींदा (नेत्र) । ३. लज्जित । लज्जायुक्त । लजालू । उ०—कवि पद्माकर छकित झपित झपि रहत द्यगंचल ।—पद्माकर (शब्द० ।) ।

झपिया
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. गले में पहनने का एक प्रकार का गहना । विशेष—यह गहना हँसुली की तरह का बना होता है और इसके सोने या चाँदी के बीच में एक अकीक जड़ा रहता है । यह गहना प्रायः डोम जाति की स्त्रियाँ पहनती हैं । २. पेटारी । पच्छी ।

झपेट
संज्ञा स्त्री० [हिं० झपट] दें० 'झपट' ।

झपेटना
क्रि० स० [अनु०] आक्रमण करके दबा लेना । चपेटना । दबोचना । छोप लेना । उ०—सहमि सुखात बात जात की सुरति करि लवा ज्यों लुकात तुलसी झपेटे बाज के ।—तुलसी ग्रं०, पृ० १८३ ।

झपेटा †
संज्ञा पुं० [अनु०] १ । चपेट । झपट । आक्रमण । २ । भूत- प्रेतादि कृत बाधा या आक्रमण । ३. हवा का झोंका । झकोरा ।—(लश०) ।

झपोला
संज्ञा पुं० [हिं०] [स्त्री० अल्पा० झपोली]दे० 'झँपोला' ।

झपोली
संज्ञा स्त्री० [हिं०] झँपोला का अल्पार्थक । छीटा झपोला या झाबा । झँपोली ।

झप्पड़
संज्ञा पुं० [अनु०] झापड़ । थप्पड़ ।

झप्पर †
संज्ञा पुं० [अनु०] १. दे० 'झप्पड़' । २. मार । चोट । उ०—दीनो मुहीम को भार बहादुर ढ़ागो सहै क्यों गयंद को झप्पर ।—भूषण ग्रं० पृ० ७१ ।

झप्पान
संज्ञा पुं० [हिं० झँपान] झँपान नाम की एक प्रकार की पहाड़ी सवारी जिसे चार आदमी उठाकर ले चलते हैं ।

झप्पानी
संज्ञा पुं० [ हिं० झंपान] झप्पान उठानेवाला कहार या मजदूर ।

झबक
संज्ञा स्त्री० [हिं० झपक]दे० 'झपकी' ।

झबकै †पु
क्रि० वि० [हिं० झबक] झपकी में ही । उ०—सांभलि राजा बोल्या रे अवधू सुणै अनोपम बांणी जी । निरगुण नारी सूँ नेह करंता झबकै रैणि बिहाणी जी ।—गोरख०, पृ० १५३ ।

झबकना †
क्रि० अ० [अनु०] झब झब करना । ज्योति सी उठना । दीप्त होना । चमकना । उ०—काया झबकइ कनक जिम, सुंदर केहें सुख्ख । तेह सुरंगा किम हुवइँ, जिण वेहा वहु दुख्ख ।— ढ़ोला०, दू० ५४६ ।

झबझबी
संज्ञा स्त्री० [देश०] कान में पहनने का एक प्रकार का तिकोना पत्ते के आकार का गहना ।

झवड़ा
वि० [अनु०]दे० ' झबरा' ।

झबधरी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की घास जो गेहूँ को हानि पहुँचाती है ।

झबरक †पु
संज्ञा पुं० [अनु०] जलते हुए दीपक में मोटी बत्ती । उ०—कसतूरी मरदन कीयो झबरक दीप लै गहरी बाट ।— वी० रासो, पृ० ९८ ।

झबरा (१)
वि० [अनु०] [वि० स्त्री० झबरी] चारों तरफ बिखरे और घूमे हुए बडे़ बड़े बालोंवाला । जिसके बहुत लंबे लंबे बिखरे हुए बाल हों । जैसे, झबरा कुत्ता । उ०—कलुआ कबरा मोतिया झबरा बुचवा मोंहि डैरवावै ।—मलूक० बानी, पृ० २५ ।

झबरा (२)
संज्ञा पुं० कलंदरों की भाष में नर भालू ।

झबरीला
वि० [हिं० झबरा + ईला (प्रत्य०)] [वि० स्त्री० झब— रीली] कुछ बड़ा । चारो तरफ बिखरा और घूमा हुआ (बाला) ।

झबरैरा †पु
[हिं० झबरा + ऐरा (प्रत्य०)] [ वि० स्त्री० झबरैरी] दे०'झबरीला' । उ०—कुंतल कुटिल छबि राजत झबरैरी । लोचन चपल तारे रुचिर झबरैरी ।—सूर (शब्द०) ।

झबा
संज्ञा पुं० [अनु०]दे० 'झब्बा' ।उ०—(क) सीस फूल धरि पाटी पोंछत फूँदनि झबा निहारत । वदन विंद जराइ की बेंदी तापर बनै सुधारत ।—सूर (शब्द०) । (ख) छहरै सिर पै छबि मोर पखा उनकी नथ के मुकता थहरैं । फहरै पियरो पट बेनी इतै उनकी चुनरी के झबा झहरैं ।—बेनी कवि (शब्द०) ।

झबार †
संज्ञा स्त्री० [अनु०] टंटा । बखेड़ा । झगड़ा । उ०— भरि नयन लखहु रघुकुल कुमार । तजि देहु और जग की झबार ।—रघुराज (शब्द०) ।

झबारि †
संज्ञा स्त्री० [हिं०]दे० 'झबार' । उ०—(क) बड़े घर की बहु बेटी करति बृथा । झबारि सूर अपनों अंश पावै जाहि घर झख मारि ।—सूर (शब्द०) । (ख) बहुत अचगरी जिन करौ अजहुँ तजौ झबारि । पकरि कंस लै जाइगो कालिहिसूर खबारि ।—सूर (शब्द०) । (ग) यह झगरो बगरो जग रोधत हरिपद अति अनुरागा । ताते सज्जन रसिक शिरोमाणि यह झबारि सब त्यागा ।—रघुराज (शब्द०) ।

झबिया † (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० झब्बा का स्त्री० अल्पा०] १. छोटा झब्बा छोटा फुँदना । २. सोने या चाँदी आदि की बनी हुई बहुत ही छोटी कटोरी जो बाजूबंद, जोशन, हुमेल, आदि गहनों में सूत या रेशम में पिरोकर गूँथी जाती है । उ०—मदनातुर ती तिनऊ पर श्याम हुमेलन की झमकै झबिया ।—लाल कवि (शब्द०) ।

झबिया (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० झबा का स्त्री० अल्पा०] वह झाबा जो आकार में छोटा हो ।

झबी
संज्ञा स्त्री० [हिं० झबा का स्त्री० अल्पा०]दे० 'झबा' । उ०— झबी जराऊ जोरि, अमित गूँथननि सँवारि ।— नंद० ग्रं०, पृ० ३८६ ।

झबुआ †
वि० [अनु०]दे० 'झबरा' ।

झबूकड़ा पु †
संज्ञा स्त्री० [अनु०] [ अन्य रूप —झबुक्कड़ा, झबूकड़इ] चमका जगमगाहट । उ०—(क) ऊचउ मंदिर आति घणाउ आवि सुहावा कंत । वीजलि लियइ झबूकड़ा सिहराँ अलि लागंत ।—ढोला०, दु० २६८ । (ख) बीज न देख चहड़्डियाँ, प्री परदेश गयाँह । आपण लीय झबुक्काड़ा गलि लागि सहराँह ।—ढोला०, दू० १५२ ।

झबूकना †
क्रि० अ० [अनु०] १. चमकना । जगमगाना । दीप्त होना । ज्योतित होना । उ०—(क) मंदिर माँहि झबूकती दीवा कैषी जोति । हंस बटाऊ चलि गया काढ़ौ धर की छोति ।—कबीर ग्रं०, पृ० ७३ । (ख) भभूकै उड़ै यों झबूकै फुलंगा । मनो अग्नि बेताल नच्चैं खुलंगा ।—सूदन (शब्द) । २. झझकना ।

झब्बा
संज्ञा पुं० [अनु०] १. एक ही में बँधे हुए रेशम या सूत आदि के बहुत से तारों का गुच्छा जो कपड़ों य़ा गहनों आदि में शोभा बढ़ाने के लिये लटकाया जाता हैं । जैसे, पगड़ी का झब्बा । २. एक में लगी गूँथी या बँधी हुई छोटी चीजों का समूह । गुच्छा । जैसे, तालियों का झब्बा घुँघुरूओं का झब्बा । उ०—झब्बा से बहु छोटे बटुए झूलत सुंदर ।—प्रेमघन०, भा० १, पृ० १२ ।

झमंकना पु
क्रि० स० [अनु०] झम् झम् की ध्वनि होना । झंकार होना । उ०—अवधू सहंस्त्र नाड़ी पवन चलैगा, कोटि झमंकै नादं । बहतारि चंदा बाई सोष्या किरणि प्रगटी जब आदं ।—गोरख०, पृ० १९ ।

झमंकार पु
संज्ञा स्त्री० [अनु०] झम झम की ध्वनि । झंकार । उ०— तमंते तमंते तमं तेज मारे । झमंते झमंते झमंकार झारे ।— पृ० रा०, १२ । ८६ ।

झमक
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. चमक का अनुकरण । २. प्रकाश । उजेला । ३. झम झम शब्द । उ०—पग जेहरि बिछियन की झमकनि चलत परस्पर बाजत । सूर स्याम सुख जोरी मणि कंचन छवि लाजत ।—सूरक (शब्द०) ४. ठसक या नखरे की चाल ।

झमकड़ा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० झमक + ड़ा (प्रत्य०)]दे० 'झमक' । उ०—मिरजा साहब—एक झमकड़ा नजर आया ।— फिसाना०, भा० ३, पृ० ८ ।

झमकड़ा (२)
वि० झनझनानेवाले । झमझम शब्द करनेवाले । उ०— बड़े बड़े कच छुटि पड़े उमड़े नैन बिसाल । कड़े झमकड़े ही गड़े अड़े खड़े नँदलाल ।—स० सप्तक, पृ० २५१ ।

झमकना
क्रि० अ० [हिं० झमक] १. प्रकाश की किरणें फेंकना । रह रहकर चमकना । दमकना । प्रकाश करना । प्रज्वलित होना । २. झपकना । छावा । छा जाना । उ०—आलस सों कर कौर उठावत नैननि नींद झमकि रहि भारी । दोउ माता निरखत आलस मुख छूबि पर तन मन डारतिं वारी ।—सूर०, १० ।१२८ । ३. झम झम शब्द होना । झनकार की ध्वनि होना । उ०—झूमि झूमि झुकि झुकि झमकि झमकि आली रिमझिम रिमझिम असाढ़ बरसतु हैं ।—ठाकुर, पृ० १९ । ४. झम झम करते हुए उछलना कूदना । गहनों की झनकार के साथ हिलना डोलना । उ०— (क) कबहुँक निकट देखि बर्षा ऋतु झूलत सुरँग हिडोरे । रमकत झमकत जगक सुता सँग हाव भाव चित चोरे ।—सूर (शब्द०) । (ख) ज्यों ज्यों आवति निकट निसि त्यौं त्यौं खरी उताल । झमकि झमकि टहलैं करै लगी रहचटै बाल ।— बिहारी र०, दो० ५४३ । ५. गहनों की झनकार करते हुए नाचना । ६. लड़ाई में हथियारों का चमकना और खनकना । उ०—झल्ल लगे चमकन खग्ग लगे झमकन सूल लगे दमकन तेग लगे छहरान ।—गोपाल (शब्द०) । ७. अकड़ दिख- लाना । तेजी दिखाना । झोंक दिखाना । ८. झम झम शब्द करना । बजने का सा शब्द करना । उ०—तैसिये नन्हीं बूँदनि बरसतु झमकि झमकि झकोर ।—सूर (शब्द०) ।

झमकाना
क्रि० स० [हिं० झमकना का स० रूप] १. चमकाना । बार बार हिलाकर चमक पेदा करना । २. चलने में आभूषण आदि बजाना और चमकाना । उ०—सहज सिंगार उठत जोबन तन बिधि निज हाथ बनाई । सूर स्याम आए ढिग आपुन घट भरि चलि झमकाई ।—सूर०, १० ।१४४७ । ३. युद्ध में हथियारों आदि का चमकाना और खनखनाना ।

झमकारा
वि० [हिं० झमं झम] [ वि० स्त्री० झमकारी] झमाझम बरसनेवाला (बादल) । उ०—सोखे सिंधु सिंधुर से बंधुर थ्यों बिंध्य गंधमादन के बंधु गरज गुरवानि के । झमकारै झूमत गगन घने घूमत पुकारे मुख चूमत पपीहा मोरान के ।— देव (शब्द०) ।

झमझम (१)
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. झम झम शब्द जो बहुधा घुँघुरूओं आदि के बजने से उत्पन्न होता है । छम छम । २. पानी बरसने का शब्द । ३. चमक दमक ।

झमझम (२)
वि० जिसंमें से खूब चमक या आभा निकले । चमकता हुआ ।

झमझम (३)
क्रि० वि० झम झम शब्द के साथ । जैसे, घुँघुरूओँ काझमझम बोलना, पानी का झमझम बरसना । २. चमक दमक के साथ । झमाझम ।

झमझमाना (१)
[क्रि० अ०] १. झम झम शब्द होना । २. चमचमाना । चमकना । ३. (लाक्ष०) झनझनाना । पुलकित होना । रोमांचित होना । उ०—एक विचित्र अनुभूति से मिस मेहता की त्वचा झमझमा उठी ।—पिंजरे०, पृ० ५५ । क्रि० प्र०—उठना ।

झमझमाना (२)
क्रि० स० १. झमझम शब्द उत्पन्न करना । २. चमकाना ।

झमझमाहट
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. झमझम शब्द होने की क्रिया या भाव । २. चमकने की क्रिया या भाव ।

झमना
क्रि० अ० [अनु०] नम्र होना । झुकना । दबना । उ०— मुरली श्याम के कर अधर बिबं रमी । लेति सरबस जुवतिजन कौ मदन विदित अमी । महा कठिन कठोर आली बाँस बंस जमी । सूर पूरन परसि श्रीमुख नैकु नाहिं झभी ।— सूर०, १० ।१२२८ ।

झमा पु †
संज्ञा पुं० [सं० झामक] दे० 'झवाँ' या 'झाँवाँ' ।

झमाका
संज्ञा पुं० [अनु०] १. झम झम शब्द । पानी बरसने या गहनों के बजने आदि का शब्द । २. ठसक । मटक । नखरा ।

झमाझम
क्रि० वि० [अनु०] उज्वल कांति के सहित । दयक के साथ । जैसे, सलमे सितारे टँके हुए कपड़ों का झमाझम चमकना । २. झमझम शब्द सहित । जैसे, पाजेब का झमाझम बोलना, पानी का झमाझम बरसमा ।

झमाट
संज्ञा पुं० [अनु०] झुरमुट । उ०— पर्वत के सिर पर क्या देखाता है कि बहुत से सूखे झाड़ों के झमाट सें बड़ा धटाटोप धूम निकल रहा है ।—व्यास (शब्द०) ।

झमाना (१)
क्रि० अ० [अनु०] झपकना । छाना । घिरना । उ०— (क) खेलत तुम निसि अधिक गई सुत नैननि नीद झमाई । बदन जँभात अंग ऐड़ाबत जननि पलोटत पाई ।—सूर (शब्द०) । (ख) त्यों पदमाकर झोरि झमाई सुदौरी सबै हरि पै इक दाऊ ।—पद्माकर (शब्द०) ।

झमाना (२)
क्रि० अ० [हिं० झाँवाँ या झमा + ना (प्रत्य०)]दे० 'झँवाना' ।

झमाना (३)
क्रि० स० [हिं० जमाना ? अथवा अनु० झमाट] इकठ्ठा करना । एकत्र करना ।

झझारना †पु
क्रि० स० [ हिं झँवाना का प्रे० रूप] झाँवरा करना । झाँवाँ की तरह कर देना कुछ कुछ श्याम वर्ण का कर देना । उ०—दोहन करत ब्रजमोहन मनोरथनि, आनँद को घन रंग झलनिं झमारई ।—घनानंद, पृ० २०४ ।

झमाल (१)
संज्ञा पुं० [देशी] इंद्रजाल । माया [को०] ।

झमाल (२)
संज्ञा पुं० [डिं०] एक प्रकार का डिंगल गीत । उ०—दूहै पर चोद्रायणों, धरै ड़लालो धार । गीताँ रूप झमाल बुण, वरणै मंछ विचार ।—रघु० रू०, पृ० ९२ ।

झमूरा
संज्ञा पुं० [हिं० झवरा या झमाट?] १. घने बालोंवाला पशु । जैसे, रीछ, झबरा कुत्ता आदि । २. वह लड़का जो बाजीगर के साथ रहता है और बहुत से खेलों में बाजीगर को सहायता देता है । ३. वह बच्चा जो ढीले ढाले कपडे़ पहनता हो । ४. कोई प्यारा बच्चा ।

झमेल
संज्ञा स्त्री० [हिं० झमेला] दे० 'झमेला' ।

झमेला
संज्ञा पुं० [अनु० झाँव झाँव] १. बखेड़ा । झंझट । झगड़ा । टंटा । २. लोगों का झुंड । भीड़ भाड़ । उ०—शत्रुन के झमेला बीर पाय शस्त्र ठेला प्रान त्यागि अलबेला तन लहै काम चेला सो ।—गोपाल (शब्द०) ।

झमेलिया
संज्ञा पुं० [ेहिं० झमेला + इया (प्रत्य०)] झमेला करनेवाला । झगड़ालू । बखेड़िया ।

झर
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पानी गिराने का स्थान । निर्झर । २. झरना । सोता । चश्मा । पर्वत से निकलता हुआ जलप्रवाह । ३. समूह । झुड । ४. तेजी । वेग । उ०—प्रात गई नीके उठि ते घर । मैं बरजी कहाँ जाति री प्यारी तब खीझी रिस झर ते ।—सूर (शब्द०) । ५. झड़ी । लगातार दृष्टि । ६. किसी वस्तु की लगातार वर्षा । उ०—(क) वर्षत अस्त्र कवच सर फूटे । मघा मेघ मानो झर जुटे ।—लाल (शब्द०) । (ख) पावक झर ते मेह झर दाहक दुसह बिसेखि । दहै देह वाके परस याहि दृगन की देखि ।—बिहारी (शब्द०) । (ग) सूरदास तबही तम नासौ ज्ञान अगिन झर फूटै ।—सूर (शब्द०) । ७. आँच । ताप । लपट । ज्वाला । झाल । उ०—(क) श्याम अंकम भरि लीन्हीं विरह अगिन झर तुरत बुझानी ।—सूर० (शब्द०) (ख) श्याम गुणराशि मानिनि मनाई । रह्यो रस परस्पर मिटयो तनु बिरह झर भरी आनंद प्रिय उन न माई ।—सूर (शब्द०) । (ग) सटपटाति सी ससिमुखी मुख घूँघट पट ढाँकि । पावक झर सी झमकि कै गई झरोखे झाँकि ।—बिहारी (शब्द०) । (घ) नेकु न झुरसी बिरह झर नेह लता कुंभिलाति । नित नित होत हरी हरी खरी झालरति जाति ।—बिहारी (शब्द०) । ८. ताले का खटका । ताले की भीतर की कल । ताले का कुत्ता ।

झरक †पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० झलक] दे० 'झलक' ।

झरकना पु
क्रि० अ० [हिं०] १. दे० 'झलकना' । उ०—सरल विसाल विराजही विद्रुम खंभ सुजोर । चारु पाटियनि पुरट की झरकत मरकत भोर ।—तुलसी (शब्द०) । २. दे० झिड़कना । उ०—रोवति देखि जननि अकुलानी लियो तुरत नौवा को झरकी ।—सूर (शब्द०) ।

झरक्कना पु (१)
क्रि० अ० [हिं० झलकना] दे० 'झलकना' । उ०— हँसत दसन अस चमके पाहन उठे झरक्कि । दरिउँ सरि जो न कै सका फाटेउ हिया दरक्कि ।—जायसी ग्रं०, पृ० ७४ ।

झरक्कना पु (२)
कि० अ० [सं० झर (= पानी का बहना)] धीरे धीरे बहना । झर झर शब्द करते चलना । उ०—पौन झरक्के हिय हरख लागै सियरि बतास ।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० ३५० ।

झरकाना †
क्रि० अ० [सं० झर (= समूह, झुंड)] एकत्र होना । झुंड में आ जाना । उ०—इत चौका महँ अस भो भाई । बहु चिउँटी चूल्है झरकाई ।—कबीर सा०, पृ० ४०६ ।

झरझर
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. जल के चहने, बरसदे या हवा के चलने आदि का शब्द । २. किसी प्रकार से उत्पन्न झर झर शब्द ।

झरझराना (१)
क्रि० स० [अनु०] किसी बसंत में से किसी वस्तु को इस प्रकार झाड़कर गिरा देना कि उस वस्तु के गिरने से झरझर शब्द हो ।

झरझराना (२)
क्रि० अ० झहरा उठना । काँप उठना । कँपित होना । उ०—झरझराति झहराति लपट अति, देखियत नहीं उबार ।—सूर०, १० । ५९३ ।

झरन
संज्ञा स्त्री० [हिं० झरना] १. झरने की क्रिया । २. वह जा कुछ झरकर निकला हो । वह जो झरा हो । ३. दे० 'झड़न' ।

झरना (१)पु
क्रि० अ० [सं० क्षरण] १. झड़ना । २. किसी ऊँचे स्थान से जल की धारा का गिरना । ऊँची जगह से सोते का गिरना । जैसे,—पहाड़ों में झरने झर रहे थे । उ०—नंद नँदन के बिछुरे अखियाँ उपमा जोग नहीं । झरना लों ये झरत रैन दिन उपमा सकल नहीं । सूरदास आसा मिलिबे की अब घट साँस रही ।—सूर (शब्द०) । ३. वीर्य का पतन होना । वीर्य स्खलित होना ।—(बाजारू) । ४. बजाना । झड़ना । जैसे, नौबत झरना । विशेष—(१) दे० 'झड़ना' । विशेष—(२) इन अर्थों में इस शब्द का प्रयोग उस पदार्थ के लिये भी होता है जिसमें से कोई चीज झरती है ।

झरना (२)
संज्ञा पुं० [सं० झर] ऊँचे स्थान से गिरनेवाला जलप्रवाह । पानी का वह स्रोत जो ऊपर से गिरता हो । सोता । चश्मा । जैसे, उस पहाड़ पर कई झरने हैं ।

झरना (३)
[सं० क्षरण] [स्त्री अल्पा० झरनी] १. लोहे या पीतल आदि की बनी हुई एक प्रकार की छलनी जिसमें लंबे लंबे छेद होते हैं और जिसमें रखकर समुचा अनाज छाना जाता है । २. लंबी डाँड़ी की वह करछी या चम्मच जिसका अगला भाग छोटे तवे का सा होता है और जिसमें बहुत से छोटे छोटे छेद होता हैं । पौना । विशेष—इससे खुले घी या तेल आदि में तली जानेवाली चीजों को उलटते पलटते, बाहर निकालते अथवा इसी प्रकार का कोई औक कांम लेते हैं । झरने पर जो चीज ले ली जाती है उसपर का फालतू घी या तेल उसके छेदों से नीचे गिर जाता है और तब वह चीज निकाल ली जाती है । २. पशुओं के खाने की एक प्रकार की घास जो कई वर्षों तक रखी जा सकती है ।

झरना (४)
वि० [वि० स्त्री० झरनी] १. झरनेवाला । जो झरता हो । जिसमें से कोई पदार्थ झरता हो ।

झरनाहट
संज्ञा स्त्री० [अनु०] झनझनाहट । उ०—झाँजर झरनाहट पर जेहर का झनका था ।—वट०, पृ० १११ ।

झरनि †पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झरन' । उ०—नूपुर बजत मानि मृग से अधीन होत मीन होत चरणामृत झरनि को ।— चरण (शब्द०) ।

झरनी †
वि० [हिं० झरना का स्त्री० अल्पा०] झरनेवाली । दे० 'झरना' । उ०—झरनी सुरस विंदु घरनी मुकुंद जू की धरनी सुफल रूप जेत कर्म काल की । नरनी सुधरनी उघेरनी वर बानी चारु पात तम तरनी भगति नंदलाल की ।— गोपाल (शब्द०) ।

झरप †पु
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. झोंका । झकोंर । उ०—बंधु कीए मधुप मदंध कीए पुरजन सुमोह्यो मन गंधी की सुगंध झरपन सौ—देव (शब्द०) । २. वेग । तेजी । उ०—घेरि घेरि घहर घन आए घोर तापैं महा मारुत झकोरत झरप सों ।—कमलापति (शब्द०) । ३. किसी चीज को गिरने से बचाने के लिये लगाया हुआ सहारा । चाँड़ । टेक । ४. चिक । चिल- मन । चिलवन । परदा । उ०—(क) तासन की गिलमैं गलीचा मखतूलन के झरपैं झुमाऊ रहीं झूमि रंग द्वारी में ।— पद्माकर (शब्द०) । (ख) झाकैं झुकी युवती ते झरोखन झुंडनि ते झरपैं कर टारी ।—रघुराज (शब्द०) । ५. दे० 'झड़प' ।

झरपना †पु
क्रि० अ० [अनु०] १. झोंका देना । बौछार मारना । उ०—वर्षत गिरि झरपत ब्रज ऊपर । सो जल जँह तँह पूरन भू पर ।—सूर (शब्द०) । २. दे० 'झडपना'—१ । ३. दे० 'झडपना'—३ । उ०—एते पर कबहू जब आवत झरपत लरत घनेरो ।—सूर (शब्द०) ।

झरपेटा †
संज्ञा पुं० [अनु०] दे० 'झपट' ।

झरफ
संज्ञा स्त्री० [अनु०] चिलमन । परदा । झरप ।

झरबेर †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'झड़बेरी' ।

झरबेरी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झड़बेरी' । उ०—महके कटहल, मुकुलित जामुन, जंगल में झरबेरी झूली ।—ग्राम्या, पृ० ३६ ।

झरबैरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झड़बेरी' ।

झरर
संज्ञा पुं० [सं०] झाड़ देनेवाला । स्थान झाड़नेवाला । विशेष—कैटिल्य ने लिखा है कि झाड़ू देनेवाला को जब कोई पड़ी हुई चाज मिलती थी ती उसका १/३ भाग चंद्रगुप्त का राज्य लेता था और २/३ भाग उसको मिलता था ।

झरबाना †
क्रि० स० [हिं० झारना का प्रे० रूप] १. झारने का काम दूसरे से कराना । दूसरे को झारने में प्रवृत करना । २. दे० 'झड़वाना' ।

झरसना (१)पु †
क्रि० अ० [अनु०] १. दे० 'झुलसना' । २. सूखना । मुरझाना । कुम्हलाना ।

झरसना (२)पु †
क्रि० स० १. दे० 'झुलसाना' । २. सुखाना । मुरझा देना । उ०—विषय विकार को जवास झरस्यो करै ।—प्रेम— घन, भा० १ पृ० २०१ ।

झरहरना †
क्रि० अ० [अनु०] झर झर शब्द करना । उ०—अजहूँ चेति मूढ़ चहूँ दिसि तैं उपजी काल अगिनि झर झरहरि । सूर काल बल ब्याल गुसत है श्रीपति सरन परति किन फरहरि ।—सूर०, १ ।३१२ ।

झरहरा †
वि० [हिं० झँझरा] [वि० स्त्री० झरहरी] दे० 'झँझरा' । उ०—झुकि झुकि झूमि झिल झिल झेल झेल झरहरी झाँपत में झमकि झमकि उठै ।—पद्माकर (शब्द०) ।

झरहराना (१) †
क्रि० अ० [अनु०] पत्तों का वायु या वर्षा वायु या वर्ष के कारण शब्द करना या शब्द करते हुए गिरना । हवा के झोंके से पत्तों का शब्द करना अथवा शब्द सहित गिरना । उ०— झरहरात बनपात, गिरत तरु, घरनि तराकि तराकि सुनाई । जल बरषत गिरिवर तर बाँचे अब कैसे गिरि होत सहाई । सूर०, १० । ५९४ ।

झरहराना (२)
क्रि० स० १. झरझर शब्द सहित किसी चीज को, विशेषतः पेड़ों के पत्तों को, गिराना । पेड़ की डाल हिलाना । २. झटकना । झाडना ।

झरहिल
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की चिड़ियाँ ।

झराँ †
संज्ञा पुं० [हिं० झरना] नष्ट होना । बेकार होना ।

झरा (१)
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का धान, जो पानी भरे हुए खेतों में उत्पन्न होता है ।

झरा (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] झरना । स्रोत । सोता [को०] ।

झराझर
क्रि० वि० [अनु०] १. झरझर शब्द सहित । २. लगातार । बराबर । ३. वेग सहित । उ०—श्री हरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी दोउ मिलि लरत झराझरि ।—हरिदास (शब्द०) ।

झरपना पु
क्रि० अ० [हिं० झपट] हमला करना । झपटना ।

झराबोर
संज्ञा पुं० वि० [हिं०] दे० 'झलाबोर' ।

झराहर पु
संज्ञा पुं० [सं० ज्वाला + धर] सूर्य ।

झरि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० झर] दे० 'झड़ी' । उ०—दस दिसि रहे बान नम चाई । मानहु मधा मेघ झरि लाई ।—तुलसी (शब्द०) ।

झरिफ पु
संज्ञा पुं० [हिं० झरप] चिक । चिलमन । परदा ।

झरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० झरना] १. पानी का झरना । स्रोत । चश्मा । २. वह धन जो किसी हाट, बाजार या सट्टी आदि में जाकर सौदा बेचनेवाले छोटे छोटे दुकानदारों विशेषतः खोनचेवालों और कुँजड़ों आदि से प्रतिदिन किराए के रूप में वहाँ के जमींदार या ठीकेदार आदि को मिलता है । ३. दे० 'झड़ी' । उ०—कुंकुम आगर अरगजा छिरकहिं भरहिं गुलाल अबीर । नभ प्रसून झरि पुरी कोलाहल भइ मनभावति भीर ।—तुलसी (शब्द०) ।

झरुआ
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की घास ।

झरोखा
संज्ञा पुं० [सं० जाल + गवाक्ष अतवा अनु० झर झर (= वायु बहने का शब्द) + गौख अथवा सं० जालगवाक्ष] [स्त्री० झरोखी] दीवारों आदि में बनी हुई झँझरी । छोटी खिड़की या मोखा जिसे हवा और रोशनी आदि के लिये बनाते हैं । गवाक्ष । गौखा । उ०—होर राणीआँ झरोखियों पर बैठीआँ सी भी सुणकर सभ के मन पवन इस्थिर हो गए ।—प्राण०, पृ० १८३ ।

झर्झर
संज्ञा पुं० [सं०] १. हुड़ुक नाम का लकड़ी का बाजा जिसपर चमड़ा मढ़ा होता है । २. कलियुग । ३. एक नद का नाम । ४. हिरण्याक्ष के एक पुत्र का नाम । ५. लोहे आदि का बना हुआ झरना जिससे कड़ाही में पकनेवाली चीज चलाते हैं । ५. झाँझ । ७. पैर में पहनने का झाँझ या झाँझर नाम का गहना ।

झर्झरक
संज्ञा पुं० [सं०] कलियुग ।

झर्झरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. तारा देवी का नाम । २. वेश्या । रंडी ।

झर्झरावती
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. गंगा नदी । २. कटसरैया का पौधा ।

झर्झरिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] तारा देवी ।

झर्झरी (१)
संज्ञा पुं० [सं० झर्झरिन्] शिव ।

झर्झरी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] झाँझ नामक बाजा ।

झर्झरीक
संज्ञा पुं० [सं०] १. देश । २. शरीर । ३. चित्र ।

झर्ना
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'झरना' । उ०—नदी, झर्ना, वृक्ष और आकाश में, मुझको आपके साथ अत्यंत सुख मिलता था ।—श्रीनिवास ग्रं०, पृ० ३९८ ।

झर्प पु
संज्ञा स्त्री० [अनु०] दे० 'झड़प' ।

झर्रा
संज्ञा पुं० [देश०] १. बया पक्षी । २. एक प्रकार की छोटी चिड़िया ।

झर्रैया
संज्ञा पुं० [देश०] बया नाम की चिड़िया ।

झल
संज्ञा पुं० [हिं० झार, सं० झल (= ताप, चिलचिलाती धूप) । अथवा सं० ज्वल्, प्रा० झल] १. दाह । जलन । आँच । २. उग्र कामना । किसी विषय की उत्कट इच्छा । उ०—(क) जीव विलंबा जीव सो अलख लख्यो नहिं जाय । साहब निलै न झल बुझै रहो बुझाय बुझाय ।—कबीर (शब्द०) । (ख) झल पीछे बायें झल दाहिने झल ही में व्यवहार । आगे पीछे झल जलै राखै सिरजनहार ।—कबीर (शब्द०) । ३. काम की इच्छा । विषय या संभोग की कामना । ४. क्रोध । गुस्सा । रिस । ५. समूह । उ०—पुनि आए सरजू सरित तीर ।...कछु आपु न अध अध गति चलंति । झल पतितन को ऊरध फलंति ।—केशव (शब्द०) ।

झलक
संज्ञा स्त्री० [सं० झल्लिका (=चमक)] १. चमक । दमक । प्रकाश । प्रभा । द्युति । आभा । उ०—मनि खंभन प्रतिबिंब झलक छबि छलकि रहै भारी आँगनै ।—तुलसी (शब्द०) । २. आकृति का आभास । प्रतिबिंब । जैसे,—वे खाली एक झलक दिखलाकर चले गए । उ०—मकराकृत कुंडल की झलकैं इतहूँ भूज मूल में छाप परी री ।—पद्माकर (शब्द०) ।

झलकदार
वि० [हिं० झलक + फ़ा० दार] चमकीला । चमकनेवाला । उ०—छोटी छोटी झँगुली झलाझल झलकदार छोटी सी छुरी को लिए छोटे छोटे राज ढोटे हैं ।—रघुराज (शब्द०) ।

झलकना
क्रि० अ० [सं० झल्लिका (= चमक)] १. चमकना । दमकना । उ०—झलका झलकत पायन्ह कैसे । पंकज कोस ओस कन जैसे ।—तुलसी (शब्द०) । २. कुछ कुछ प्रकट होना । आभास बोना । जैसे,—उनकी आज की बातों से झलकता था कि वे कुछ नाराज हैं । उ०—कुंडल लोल कपोलनि झलकत मनु दरपन मैं झाँई री ।—सूर०, १० ।१३७ ।

झलकनि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झलक' । उ०—श्रवन कुंडल मकर मानो नैन मीन बिसाल । सलिल झलकनि रूपआभा देख री नँदलाल ।—सूर (शब्द०) । (ख) मदन मोर कै चंद की झलकनि निदरति तनजोति । नाल कमल, मनि जलद की उपमा कहे लघु मति होति ।—तुलसी ग्रं०, पृ० २७८ ।

झलका
संज्ञा पुं० [सं० ज्वल (= जलना); प्रा० झल + हिं० का (प्रत्य०)] चलने या रगड़ लगने आदि के कारण शरीर में पड़ा हुआ छाला । उ०—झलका झलकत पायन्ह कैसे । पंकज कोस ओसकन जैसे ।—तुलसी (शब्द०) ।

झलकाना
क्रि० स० [हिं० झलकना का सकल रूप] १. चमकाना । दजमकाना । लसकाना । २. दरसाना । दिखलाना । कुछ आभास देना ।

झलकावनी पु
वि० [हिं० झलकना] चमकानेवाली । दीप्त करनेवाली । झलकानेवाली । उ०—सुरतरु लतात चारु फल है फलित किधों, कामधेनु धारा सम नेह उपजावनी । कैधों चितामनिन की माला उर सोभित, बिसाल कंठ में धरे हैं जोति झलकावनी ।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ३०५ ।

झलकी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झलक' ।

झलक्कना पु
क्रि० अ० [हिं० झलकना] दीप्त होना । झलकना । उ०—झलक्कत नूर चमक्कत सेल ।—ह० रासो, पृ० ९२ ।

झलज्झला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बूँदों के गिरने का शब्द । वर्षा की झड़ी से उत्पन्न शब्द । २. हाथी के कान की फटफटाहट [को०] ।

झलझल (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं०झलकना] चमक दमक ।

झलझल (२)
क्रि० वि० रह रहकर निकलनेवाली आभा के साथ । जैसे, झलझल चमकना ।

झलझला
वि० [अनु०] झलझल करनेवाली चमचमाती हुई । चमकनेवाली । उ०—तरवार बनी ज्यों झलझला ।—पलटू०, पृ० ४५ ।

झलझलाना (१)
क्रि० अ० [अनु०] चमकना । चमचमाना । उ०— झलझलात रिस ज्वाल बदनसुत चहुँ दिसि चाहिय ।—सूदन (शब्द०) । २. दे० 'झल्लाना' ।

झलझलाना (२)
क्रि० स० चमकाना । चमचमाना ।

झलझलाहट
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. चमक । दमक । २. झल्लाहट ।

झलना (१)
क्रि० स० [हिं० झलझल (= हिलना) से अनु०] १. किसी चीज को हिलाकर किसी दूसरे चाज पर हवा लगाना या पहुँचाना । जैसे,—(क) जरा उन्हें पंखा झल दो । (ख) वे मक्खियाँ झल रहे हैं । २. हवा करने के लिये कोई चीज हिलाना । जैसे, पंखा झलना । संयो० क्रि०—देना । † ३. ढकेलना । ठेलना । धक्का देकर आगे बढ़ाना ।

झलना (२)
क्रि० अ० १. किसी चीज के अगले भाग का इधर उधर हिलाना । उ०—फूलि रहे, झूलि रहे, फैलि रहे, फबि रहे, झंपि रहे, झलि रहे, झुकि रहे झूमि पहे ।—पद्माकर (शब्द०) † २. शेखी बघारना । डींग हाँकना ।

झलना (३)
क्रि० अ० [हिं० झालना का अक० रूअ] १. दे० 'झालना' । २. दे० 'झेलना' ।

झलफला †
संज्ञा पुं० [प्रा० झलहल] उँजियाला । दे० 'झलमंल (१)' ।

झलमल (१)
संज्ञा पुं० [सं० ज्वल (= दीप्ति)] १. अँधेरे के बीच थोड़ा थोड़ा उजाला । हलका प्रकाश । २. अँधेरा (कहरों की परि०) । ३. चमक दमक ।

झलमल (२)
क्रि० वि० दे० 'झलमल' ।

झलमलताई पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० झलमल + ताई (प्रत्य०)] चमक । झलमलाहट । उ०—दुति तिय तन अस दीन्हि दिखाई । सरद चंद जल झलमलताई ।—नंद० ग्रं०, पृ० १२४ ।

झलमला
वि० [हिं० झजमलाना] चमकीला । चमकता हुआ । उ०—मोर मुकुट अति सोहई श्रवणनि वर कुंडल । ललित कपोलनि झलमले सुंदर अति निर्मल ।—सूर (शब्द०) ।

झलमलाना (१)
क्रि० अ० [हिं० झलमल] १. रह रहकर चमकना । रह रहकर मंद और तीव्र प्रकाश होना । चमचमाना । २. ज्योति का अस्थिर होना । अस्थिर ज्योति निकलना । ठहरकर बराबर एक तरह न जलना या चमकना । निकलते हुए प्रकाश का हिलना डोलना । जैसे, हवा के झोंके से दीए का झलमलाना । उ०—(क) मैया की मैं चंद लहौगौ । कहा करौं जलपुट बीतर को बाहर ब्यौंकि गहौंगौ । यह तौ झलमलात झकझोरत कैसैं कै जु लहाँगौ ।—सूर, १० ।१९४ । (ख) श्याम अलक बिच मोती मंगा । मानहु झलमलति सीस गंगा ।—सूर (शब्द०) । (ग) बालकेलि बातबस झलकि झलमलत सोभा की दीयटि मानो रूप दीप दियो है ।— तुलसी ग्रं० पृ० २७३ ।

झलमलाना (२)
क्रि० स० किसी स्थिर ज्योति या लौ को हिलाना डुलना । हवा के झोंके आदि से प्रकाश को अस्थिर या बुझने के निकट करना ।

झलमलित पु
वि० [हिं० झलमलाना] झलमलाता हुआ । हवा में हिलता हुआ । उ०—धरनी जिव झलमलित दीप ज्यों होत अंधार करो अँधियारी ।—धरनी० बा० पृ० २६ ।

झलरा (१) †
संज्ञा पुं० [हिं०झालर] १. एक प्रकार का पकवान जिसे 'झालर' भी कहते हैं ।

झलरा (२)पु †
संज्ञा स्त्री० दे० 'झालर (१)' ।

झलराना पु †
क्रि० अ० [हिं० झालर] फैलकर छाना । बढ़ना । झालरना ।

झलरिया पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झालर] दे० 'झालर (१)' । उ०—चहुँ दिस लागी झलरिया, तो लोक असंख हो । धरम०, पृ० ४४ ।

झलरी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. हुडुक नाम का बाजा । २. बजाने की झाँझ ।

झलरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झलरा या झालर का अल्पा० स्त्री०] दे० 'झालर (१)' ।

झलवाना (१)
क्रि० स० [हिं० झलना] झलना का प्ररणार्थक रूप । झलने काम दूसरे से करना ।

झलवाना (२)
क्रि० स० झालना का प्रेरणार्थक रूप । झालने का काम दूसरे से कराना ।

झलहल पु
संज्ञा स्त्री० [प्रा० झलहल] दे० 'झलझल (१)' । उ०—झलहल तीर तरवारि बरछी देखि काँदरे काचा । छूटैं तीर तुपक अरु गोला घाव सहै मुख साँचा ।—सुंदर० ग्रं० भा० २, पृ० ८८५ ।

झलहलना पु
क्रि० अ० [अनु०] चमकना । दमकना । उ०—तप तेज पुंज झलहलत तहै, दरसन तैं पातक सुधर ।—ह० रासो, पृ० १० ।

झलहला †
संज्ञा स्त्री० [प्रा० झलहल] उजियाला । झलमल ।

झलहाया
संज्ञा पुं० [हिं० झल +हाया (प्रत्य०)] [स्त्री० झलहाई] वह जो डाह करता हो । हसद करनेवाला आदमी । ईर्ष्यालु व्यक्ति ।

झलहाला पु †
संज्ञा पुं० [अनु०] झलमलाहट । प्रकाश की मंद तेज चमक । उ०—नयन दामिनी होत झलहाला । पाछै नहीं आनिल उजियाला ।—कबीर सा०, पृ० ९९ ।

झला (१)पु †
संज्ञा पुं० [हिं० झड़] १. हलकी वर्षा । २. झालर, तोरण या बंदनवार आदि । ३. पंखा । बीजना । बेना । ४. समूह । उ०—झलकत आवैं झुंड झिलिम झलानि झप्यो, तमकत आवै तेगवाही औ सिलाही हैं ।—पद्माकर (शब्द०) । ५. तीब्र वर्षा । झड़ी लगना ।

झला (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आतप । धूप । चिलचिलाती धूप । चमका । २. पुत्री । कन्या । बेटी (को०) । ३. झिल्ली । झींगुर (को०) ।

झला (३) †
संज्ञा पुं० [सं० ज्वाला अथवा झल] १. क्रोध । गुस्सा । २. जलन । दाह ।

झलाई (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० √ झल + आई (प्रत्य०)] पंखा झलने का काम या उसकी मजदुरी ।

झलाझल
वि० [अनु०] खूब झलझलाता या चमचमाता हुआ । चमाचम । उ०—(क) चोटी छोटी झँगुली झलाझल झलकदार छोटी सी छुरी को लिये छोटे राज ढोटे हैं ।— रघुराज (शब्द०) । (ख) कंचन के कलस भराए भूरि पन्नन के ताने तुंग तोरन तहाँई झलाझली के ।—पद्माकर (शब्द०) ।

झलाझलि पु
वि० [हिं०] दे० 'झलाझली' । उ०—नक सिख ले सब भुखन बनाई । बसन झलाझलि पैंधे आई ।—सं० दरिया, पृ० ३ ।

झलाझली पु (१)
वि० [अनु०] चमकीला । चमकदार । झलाझल । उ०—जिन्हैं लखे झलाझली हलाहली हिये लजे ।—गोपाल (शब्द०) ।

झलाझली (२)
संज्ञा स्त्री० झलाझल होने की क्रिया या भाव ।

झलाना (१)
क्रि० अ० [अनु० झनझन] हड्डी, जोड़ या नस आदि पर एकबारगी चोट लगने के कारण एक विशेष प्रकार की संवेदना होना । सुन्न सा हो जाना । जैसे,—ऐसी ठोकर लगी कि पैर झला गया । संयो० क्रि०—उठाना ।—जाना ।

झलाना (२)
क्रि० स० [हिं० झालना] दूसरे से झालने का काम करना । झालने में किसी को प्रवृत्त करना ।

झलाना (३) †
क्रि० स० [हिं० झलना] दे० 'झलवाना (१)' ।

झलाबोर (१)
संज्ञा पुं० [हिं० झल झल (=चमक)] १. कलावतू का बना हुआ साड़ी का चौड़ा अंचल । २. कारचोबी । उ०— झलाबोर का घँघरा घूम घुमाल तिस पर सच्चे मोती टके हुए ।—लल्लू (शब्द०) । ३. एक प्रकार की आतिशबाजी ।— ४. काँटा । झाड़ी । ५. चमक । दमक ।

झलाबोर (२)
वि० चमकीला । ओपदार ।

झलामल (१) †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झलझल (= चमक)] चमक । दमक । उ०—चहुँ दिस लगी है बजार झलामल हो रही । झूमर होत अपार अधर डोरी लगी ।—कबीर (शब्द०) ।

झलामल (२)
वि० चमकीला । चमक दमकवाला । ओपदार ।

झलारा †
वि० [सं० ज्वल, पुं० हिं० झल, हिं० झाल, झार] तीखा । तेज । मिर्च के स्वादवाला । झालवाला ।

झलासी
संज्ञा स्त्री० [देशी] सूखी हुई पतली लकड़ी या पतली टहनी । उ०—सोच विचारकर मैं सूखी झलासियों से झोंपड़ी बनाने सगा । लतरों को काटकर उसपर छाजन हुई ।—इंद्र०, पृ० ७२ ।

झलि
संज्ञा स्त्री० [सं०] सुपारी । पूगी फल [को०] ।

झलुसना †
क्रि० सं० [देश० अथवा सं० ज्वल से विकसित हिं० नामिक धातु] दे० 'झुलसना' ।

झलूस पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'जलूस' । उ०—सुण अतुल साज झलूस सारा मिले छक मिथलेस ।—रघु० रू०, पृ० ८३ ।

झल्ल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. व्रात्य अर्थात संस्कारहीन क्षत्रिय और सवर्ण स्त्री से उत्पन्न वर्णसंकर जाति । २. भाँड या विदूषक । ३. पटह था हुड़ुक नामक बाजा । ४. लपट । ज्वाला । उ०— बहिन को देखकर उसे अधिक क्रोध आजा, क्योंकि उसकी आँखों में जैसे झल्ल सी उठने लगची, जिसे द्खकर हम तीनों भयभीत हो जाते ।—अंधेरे०, पृ० २६ ।

झल्ल (२)
संज्ञा स्त्री० [अनु०] झल्ला होने का भाव ।

झल्लकंठ
संज्ञा पुं० [सं० झल्लकण्ठ] परेवा ।

झल्लक
संज्ञा पुं० [सं०] १. काँसे का बना करताल । झाँझ । २. मँजीरा । जोड़ी ।

झल्लकी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'झल्लक' ।

झल्लना †
क्रि० अ० [अनु०] बहुत झूठी झूठी बातें करना । बहुत ड़ींग हाकना या गप्प उड़ाना ।

झल्लरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'झल्लरी' [को०] ।

झल्लरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. हुड़ुक नाम का बाजा । २. झाँझ । ३. पसीना । स्वेद । ४. पसेव । ५. शुद्धता । सुच्चापन (को०) । ६. घुँघराले केश (को०) ।

झल्ला (१)
संज्ञा पुं० [देश०] १. खाँचा । बड़ा टोकरा । २. वर्षा । वृष्टि । ३. बौछार । ४. वे दाने जो पके हुए तमाखू के पत्ते पर पड़ जाता हैं ।

झल्ला (२)
वि० [हिं० जल] बहुत तरल या पतला । जिसमें अधिक पानी मिला हो । जो गाढ़ा न हो । जैसे, झल्ला रस, झल्ली भाँग ।

झल्ला (३) †
वि० [हिं० झल्लाना] १. पागल । २. बहुत बड़ा बेवकूफ । ३. झल्लानेवाला ।

झल्लाना (१)
क्रि० अ० [हिं० झल्ल] बहुत चिढ़ना । खिजलाना । किटकिटाना । झुँझलाना ।

झल्लाना (२)
क्रि० स० एसा काम करना जिससे कोई बहुत चिढे़ । किसी को झल्लाने या चिढ़ने में प्रवृत करना ।

झल्लानी
संज्ञा स्त्री० [देश०] झल्ला । पानी की फुही । उ०— झल्लानी झर फुट्टि, छुट्टि संका सामंता । ज्यों लट्ठी पर नारि, धीग मिल्यौ धावंता ।—पृ० रा०, १२ । ३१९ ।

झल्लिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. देह पोंछने का कपड़ा । अँगोछा । २. शरीर का वह मैल जो उबटन आदि लगाने, किसी चीज से मलने या पोछने से निकले । ३. दीप्ति । प्रकाश । ४. सूर्य की किरणों का तेज ।

झल्ली (१) †
वि० [हिं० झलना] बातूनिया । गप्पी । बकवादी ।

झल्ली (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] हुड़ुक की तरह का एक बाजा जिसपर चमड़ा मढ़ा होता है ।

झल्ली (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं० झल्ला] बड़ी टोकरी । झाबा । उ०— अहीर झल्ली ढोकर जो कुछ ला पाता, उसी में गुजारा चल रहा था ।—अभिशप्त, पृ० १३ ।

झल्लीवाला
संज्ञा पुं० [हिं० झल्ला] झाबा था झल्ली ढोने का काम करनेवाला । उ०—वहीं एक झल्लीवाला रहता है ज्वाला ।—अभिशप्त, । पृ० २३ ।

झल्लीसक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का नृत्य ।

झबकना
क्रि० अ० [देश०] झलकना । चमकना । उ०—काया झब्कई कनक जिम सुंदर केहे सुख्ख । तेह सुरंग जिम हुवइँ । जिण वेहा बहु दुख्ख ।—ढोला०, दू० ५४६ ।

झवर †
संज्ञा पुं० [हिं० झगड़ा] झगड़ा ।

झवा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० झाँवाँ । उ०—अलबेली सुजाना के पायनि पानि पन्यौ न टन्यौ मन मेरो झवा ।—घनानंद, पृ० ८ ।

झवारि पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झबार' ।

झष
संज्ञा पुं० [सं०] १. मत्स्य । मीन । मछली । उ०—संकुल मकर इरग झष जाती । अति अगाध दुस्तर सब भाँती ।— तुलसी (शब्द०) । २. मकर । मगर । ३. ताप । गरमी । ४. वन । ५. मीन राशि । ६. मीन लग्न । ७. दे० 'झख' ।

झषकेत—पु
संज्ञा पुं० [सं० झष + केत (= पताका)] दे० 'झष केतन' । उ०—हरिहि हेरि ही हरि गयौ बिसिख लगे झषकेत । थहरि सयन तें हेत करि डहरि डहरि के खेत ।— स० सप्तक, पृ० २६१ ।

झषकेतन
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव जिसकी पताका में मीन का चिह्न है । झषकेतु [को०] ।

झषकेतु
संज्ञा पुं० [सं० झषकेतु] कंदर्प । कामदेव ।

झषध्वज
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'झषकेतु' [को०] ।

झषना पु
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'झंखना' या, 'झीखना' ।

झषनिकेत
संज्ञा पुं० [सं०] १. जलाशय । २. समुद्र ।

झषराज
संज्ञा पुं० [सं०] मगर । मकर ।

झषलग्न
संज्ञा पुं० [सं०] मीन लग्न ।

झषांक
संज्ञा पुं० [सं० झषाङ्क] कामदेव ।

झषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] नागवाला । गुलसकरी ।

झषाशन
संज्ञा पुं० [सं०] शिशुमार नामक जलजंतु । सूँस ।

झषोदरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] व्यास की माता । मत्स्यगंधा ।

झषना
क्रि० स० [हिं०] दे० 'झँसना' ।

झहनना (१)पु
क्रि० अ० [अनु०] १. झन्नाना । झन्नाटे या सन्नाटे में आना । २. (रोएँ का) खड़ा होना । उ०—गहन गहन लागीं गावन मयूरमाला झहन झहन लागे रोम छन में ।—श्रीपति (शब्द०) ३. झन झन शब्द करना ।

झहनना (२)
क्रि० स० दे० 'झहनाना' ।

झहनाना
क्रि० स० [अनु०] १. झहनना का सकर्मक रूप । २. झनकार शब्द करना । झनकारना । उ०—गति गयंद कुच कुंभ किंकिनी मनहु घंट भहनावै ।—सूर (शब्द०) ।

झहरना †पु (१)
क्रि० अ० [अनु०] १. झर झर शब्द करना । झड़ने का सा शब्द करना । उ०—झहरि झहरि झुकि झीनी झर लाये देव छहरि छहरि छोटी बूँदनि छहरिया ।—देव (शब्द०) २. (शरीर आदि का) बहुत शिथिल पड़ना । ढील हो जाना । उ०—झहरि झहरि परे पाँसुरी लखाय देह बिरह बसाय हाय कैसे दूबरे भये ।—रघुनाथ (शब्द०) ।

झहरना (२)
क्रि० स० झिड़कन । झल्लाना । उ०—सुनि सजनी मैं रही अकेली बिरह बहेली इत गुरु जन झहरैं ।—सूर (शब्द०) ।

झहराना
क्रि० अ० [अनु०] १. शिथिल होकर झर झर शब्द के साथ या लड़खड़ाकर गिरना । उ०—(क) असुर लै तरु सों पछारयो गिरयो तरु झहराइ । ताल सों तरु ताल लाग्यो उठयो बन बहराइ ।—सूर (शब्द०) । (ख) आपु गए जमलार्जुन तरु तर, परसत पात उठे झहराई ।—सूर०, १० ।३८३ । (ग) लपट झपट झहराने, हहराने बात फहराने भट परयो प्रबल परावनो ।—तुलसी ग्रं०, पृ० १७१ । २. झल्लाना । किट— किटाना । खिजलाना । उ०—(क) एक अभिमान हृदय करि बैठी एते पर झहरानी ।—सूर (शब्द०) । (ख) नागरि हँसति हँसी उर छाया तापर अति झहरानी । अधर कंप रिस भोंह मरोरी मन की मन गहरानी ।—सूर (शब्द०) । ३. हिलाना । उ०—बालधी फिरावै बार बार झहरावै, झरैं बुँदियाँ सी, लंक पधिलाइ पागि पागिहै ।—तुलसी ग्रं०, पृ० १७३ ।

झांकृत
संज्ञा पुं० [सं० झाङ्कृत] १. झरने आदि के गिरने या नुपुर के बजने भा शब्द । झंकार । २. पैर का एक गहना जिसमें घुँगरू लगे रहते हैं । नूपुर (को०) ।

झाँई, झाँई
संज्ञा स्त्री० [सं० छाया] १. परछाई । प्रतिबिंब । छाया । आभा । झलक । उ०—(क) झाँई न मिटन पाई आए हरि आतुर ह्वै जब जान्यो गज ग्राह लए जात जल में ।—सूर (शब्द०) । (ख) बेसरि के मुकुता में झाँई बरन बिराजत चारि । मानो सुर गुर शुक्र भीम शनि चमकत चंद्र मझारि । सूर—(शब्द०) । (ग) कह सुग्रीव सुनहु रघुराई । ससि मह प्रकट भूमि की झाँई ।—तुलसी (शब्द०) । (क) मेरी भव बाधा हरौ राधा मागरि सोई । जा तन की झाँई परे स्याम हरित दुति होइ ।—बिहारी (शब्द०) । २. अंधकार । अँधेरा । उ०—रेशमी सतत शाल लाल पट लपिटे महल भीतर न शीतभीत रैनि की न झाँई है ।—देव (शब्द०) । ३. धोखा । छल । मुहा०—झाँई बताना = छल करना । धोखा देना । यौ०—झाँई झप्पा = धोखा धड़ी । ४. प्रतिशब्द । प्रतिध्वनि । उ०—कुहकि उठे बन मोर कंदरा गरजति झआँई । चित चकृत मृग बृंद बिथा मनमथ सरसाई ।— मागरीदास (शब्द०) । ५. एक प्रकार के हलके काले धब्बे जो रक्तविकार से मनुष्यों के शरीर विशेषतः मुँह पर पड़ जाते हैं ।

झाँई माँई
संज्ञा स्त्री० [अनु०] बच्चों का एक खेल जिससे वे 'झाँई माँई कौवों की बरात आई' कहते जाते और घूमते जाते हैं । मुहा०—झाँई माई होना = नजरों से गायब हो जाना । अदृश्य हो जाना ।

झाँक (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं०झाँकना] झाँकने की क्रिया या भाव । यौ०—ताक झाँक = दे० 'ताक झाँक' ।

झाँक (२)
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'झाँख' ।

झाँकना
क्रि० अ० [सं० चक्ष (= चक्षण = देखना) या अधि + अक्ष, अध्यक्ष, प्रा० अज्झक्ख (= आँख के सामने)] १. ओट के बगल में से देखना । उ०—(क) जँह तँह उझकि झरोखा जाँकति जनक नगर की नारि ।—सूर (शब्द०) । (ख) तुलसी मुदित मन जनक नगर जन झाँकति झरोखे लागी शोभा रानी पावती ।—तुलसी (शब्द०) । २. इधर उधर झुककर देखना ।

झाँकनी पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झाँकना] १. झाँकी । दर्शन । उ०—झाँकनी दै कर काँकनी की सुनै कानन बैन अनाकनी कीने ।—देव (शब्द०) । २. कुआँ (कहारों की परि०) ।

झाँकर
संज्ञा पुं० [प्रा० झंखर] दे० 'झंकाड़' ।

झाँकरी पु
वि० स्त्री० [प्रा० झंखर (= शुष्क तरु)] झुलसी हुई । दुर्बल । सूखि हुई । उ०—उमड़ी इमड़ी दृग रोवत अबीर बए, मुख दुति पीरौ परी बिरह महा भरी । 'हरिचंद' प्रेम माती मनहुँ गुलाबी छकीं, काम कर झाँकरी सी दुति तन की करी ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० १७३ ।

झाँका
संज्ञा पुं० [हिं० झाँकना] १. रहठे का खाँचा । जालीदार खाँचा । २. झरोखा । उ०—सभा माँझ द्रोपदि पति राखी पति पानिप कुल ताकी । बसन ओट करि कोट बिसंभर परन न दीन्हौ झाँकी ।—सूर, १ ।११३ ।

झाँकी
संज्ञा स्त्री० [हिं० झाँकना] १. दर्शन । अवलोकन । झाँकने या देखने की क्रिया या भाव । क्रि० प्र०—करना ।—देना ।—मिलना ।—लेना ।—होना । २. दृश्य । वह जो कुछ देखा जाय । उ०—काँटे समेटती, फूल छींटती झाँकी ।—साकेत, पृ० २१० । क्रि० प्र०—देखना । ३. वह जिसमें से झाँका जाय । झरोखा ।

झाँख
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का बड़ा जंगली हिरन । उ०— ठाढे ढिग बाध बिग चीते चितवत झाँख मृग शाखामृग सब रीझि रीझि रहे हैं ।—देव (शब्द०) ।

झाँकना पु †
क्रि० अ० [हिं० झंखाना] दे० 'झीखंना' । उ०— (क) इंद्री वश न्यारी परी सुख लूटति आँखि । सूरदास संग रहै तेऊ भरै झांखि ।—सूर (शब्द०) । (ख) एहि विधि राउ मनहि मन झाँखा । देखि कुभाँति कुमति मनु माँखा ।— तुलसी (शब्द०) ।

झाँखर
संज्ञा पुं० [प्रा० झंखर; हिं० झंखाड़] १. 'झंखाड़' । उ०— झाँखर जहाँ सुछाड़हु पंथा । हिलगि मकोय न फारहू कंथा ।—जायसी (शब्द०) । २. अरहर की वे खूँटियाँ जो फसल काटने के बाद खेत में रह जाती हैं ।

झाँगला
वि० [देश०] ढीला ढाला (कपड़ा) । उ०—पहिर झाँगले पटा पाग सिर टेढ़ी बाँधे । घर में तेल न लोन प्रीत चेरी सों साधे ।—गिरधर (शब्द०) ।

झाँगा पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'झागा' । उ०—पीत बसन पहिरे सुठि झाँगा । चक्षु चपल अलकैं जनु नागा ।—विश्राम (शब्द०) ।

झाँजन
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झाँझन' ।

झाँझ
संज्ञा स्त्री० [सं० झल्लक या झनझन से अनु०] १. मजीर की तरह के, पर उससे बहुत बड़े काँसे के ढले हुए तश्तरी के आकार के दो ऐसे गोलाकार टुकड़ों का जोड़ा जिसके बीच में कुछ उभार होता है । झाल । उ०—(क) घंटा घंटि पखाउज आउज झाँझ बेनु उफ ताल ।—तुलसी ग्रं०, पृ० २६५ । (ख) ताल मृदंग झाँझ इंद्रिनि मिलि बीना बेनु बजायौ ।—सूर०, १ ।२०५ । क्रि० प्र०—पीटना ।—बजाना । विशेष—इसकी उभार में एक छेद होता है जिसमें डीरी पिरौई रहती है । इसका व्यवहार एक टुकड़े से दूसरे टुकड़े पर आघात करके पूजन आदि के समय घड़ियालों और शंखों के साथ यों ही बजाने में, रामायण की चौपाइयों के गावे के समय राम— लीला में अथवा ताशे और ढोल आदि के साथ ताल देने में दोता है । २. क्रोध । गुस्सा । क्रि० प्र०—उतारना ।—चढ़ाना ।—निकालना । ३. पाजीपन । शरारत । उ०—रुक्यो साँकरे कुंज मन करत जाँझ झकरात । मंद मंद मारुत तुरंग खुँदन आवत जात ।— बिहारी (शब्द०) । ४. किसी दुष्ट मनोविकार का आवेग । ५. सूखा हुआ कुआँ या तालाब । ६. भोग की इच्छा । विषय की कामना । ७. दे० 'झाँझन' ।

झाँझ (२) †
वि० [सं० जर्जर] जो गाढ़ा या नहरा न हो । मामूली । हलका (भाँग आदि का नसा) ।

झाँझड़ी पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झाँझ + ड़ी (प्रत्य०)] १. दे० 'झाँझ' । २. दे० 'झाँझन' ।

झाँझण †
संज्ञा पुं० [देश०] मारवाड़ में कुशी का एक गीत । उ०— सुंदर बंछि विषै सुख कौं घर बूड़त हैं अस झाँझण गावै ।—सुंदर ग्रं०, भा० २, पृ० ४५९ ।

झाँझन
संज्ञा स्त्री० [अनु०] कड़े की तरह का पैर में पहनने का एक प्रकार का गहना । पैंजनी । पायल । विशेष—यह गहना चाँदी का बनता है ओर इसमें नकाशी और जाली बनी होती है । यह भीतर से पोला होता है और इसके अंदर छरें पड़े होते हैं जिनके कारण पैरों के उठाने और रखने में 'झन झन' शब्द होता है । कभी कभी लोग घोड़ों और बैलों आदि को भी शोभा के लिये और झन् झन् शब्द होने के लिये पीतल या जाँबे की झाँजन पहनाते हैं ।

झझाँर (१)पु †
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. झाँझन । पैंजनी । उ०—ख बाँहे सुंदरी बहरखा, चासू चुड़ स वचार । मनु हरि कटि थल मेखला, पग झाँझर झणकार ।—ढोला०, दू० ४८१ । २. दे० 'छलनी' ।

झाँझर (२) † पु
वि० १. पुराना । जर्जर । छिन्न भिन्न । फूटा टूटा । २. छेदवाला । छिद्रयुक्त । उ०—आन अनुरागे पिया आन देस गैला । पिथा बिना पाँजर झाँझर भेला ।—विद्यापति, पृ० १७६ ।

झाँझरा
वि० [सं० जर्जर] [वि० स्त्री० झाँझरी] पोला । जर्जर । खोखला । उ०—मलूक कोटा झाँझरा भीत परी भयराय ।— मलूक०, पृ० ४० ।

झाँझरि पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झाँझन' । उ०—(क) सहस कमल सिंहासन राजैं । अनहद झाँझरि मितही बाधै ।—चरण० बानी, पृ० २९८ ।

झाँझरी (१) †
संज्ञा स्त्री० [देश०] झाँझ नामक बाजा । झाल । उ०— बजै झाँझरी शंख नगारे । गए प्रेत सब देव अगारे ।— रघुराज (शब्द०) । २. झाँझन नामक पैर का गहना । उ०— झाँझरियाँ झनकेगी खरी तरकैगी तनी तनी तन कौ तन तारै ।—देव (शब्द०) ।

झँझरी (२)
वि० स्त्री० [सं० जर्जर] छिद्रों से भरी हुई । जिसमें बहुत से छेद हों । उ०—(क) कबिरा नाव त झाँजरी कूटा खेवन— हार । हलक हलका तरि गया बुड़े जिन सिर बार ।—कबीर (शब्द०) । (ख) गहिरी नदिया नाव झाँझरी, बोझा अधिक भई ।—धरम० श०, पृ० २६ ।

झाँझा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० झाँझर] १. फसल में लगनेवाला एक प्रकार का कीड़ा । विशेष—यह बढ़ी हुई फसल के पत्तों को बीच बीच में से खाकर बिल्कुल जँझरा कर देता है । यह छोटा बड़ा कई आकार और प्रकार का होता है और बहुत तमाकू या मूकखी (मूली?) के पत्तों पर पाया जाता है । २. घो और चीनी के साथ भूनी हुई आँन की फंकी । † ३. देव छानने का पौधा ।

झाँझा (२)
संज्ञा पुं० [अनु०] दे० 'झाँझ' । २. झंझत । बखेड़ा ।

झाँझिया
संज्ञा पुं० [हिं० झाँज +इया (प्रत्य०)] झाँझ बजानेवाला मनुष्य । बाजेवालों में से वह जो झाँझ बजाता हो ।

झाँट
संज्ञा स्त्री० [सं० जट, हिं० झड़ (बाल)] १. पुरुष या स्त्री का मूत्रेंद्रिय पर के बाल । उपस्थ पर के बाल । पशम । शष्प । उ०— आबरू की आँख में एक गाँठ है । आबरू सब शायरों की झाँट है ।— कविता कौ०, भा० ४, पृ० १० । मुहा०— झाँठ उखाड़ना = (१) बिलकुल व्यर्थ समय नष्ट करना । कुछ भी काम न करना । (२) कुछ भी हानि या कष्ट न पहुँचा सकना । इतनी हानि भी न पहुँचा सकना जितनी एक झाँट उखड़ जाने से हो सकती है । झाँट जल जामा या राख हो जाना= किसी को अभिमान आदि की बातें करते देखकर बहुत बुरा मालूम होना । विशेष— इस मुहवरे का व्यवहार अभिमान करनेवाला के प्रति बहुत अधिक उपेक्षा दिखलाने के लिये किया जाता है । २. बहुत तुच्छ वस्तु । बहुत छोटी या निकम्मी चीज । मुहा० — झाँड़ बराबर = (१) बहुत छोटा । (२) अत्यंत तुच्छ । झाँट की झँदुल्ली = अत्यंत तुच्छ (पदार्थ या मनुष्य) ।

झाँटा †
संज्ञा पुं० [देश०] १. झंझट । २. झाड़ू ।३. झापड़ । थप्पड़ ।

झाँटि पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झाँत] दे० 'झाँट' । उ०—एकोहं आपुहिं भयो द्वितीया दीन्हों काटि । एकोहं कासों कहै महापुरुष की झाँटि ।— कबीर (शब्द०) ।

झाँती पु †
संज्ञा स्त्री० [देश०] देह । शरीर । उ०— दादू झाँती पाए पसु पिरी अंदरि सो आहे । होणी पाणे बिच मैं मिहर न लाहे ।— दादू० बानी, पृ० १९३ ।

झाँप (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० झाँपना] १. वह जिससे गोई चीज ढाँकी जाय टोकरा, झाबा आदि ।२. पड़ी हुई चीजें निकालने की एक प्रकार की कल ।३. नींद । झपकी । ४. पर्दा । चिक । उ०— झुकि झुकि झूमि झूमि झिल झिल झेल झेल झरहरी झाँपन में झमकि झमकि उठै ।— पद्माकर (शब्द०) । ५. निकासा । मस्तूल का झुकाव (लश०) । ६. मूँज का बना पिटारा । झाँपा ।

झाँप (२)
संज्ञा पुं० [सं० झम्प] उछल कूद । क्रि० प्र०— देना = दे० 'झंप' का मुहा० 'झंप देना' ।

झाँपना (१)
क्रि० स० [सं० उज्झम्पन, हिं० झाँपना] १. ढाँकना । आवरण डालना । ओट में करना । आड़ में करना । उ०— जथा गगन धन पटल निहारी । झाँपेउ भानु कहहिं कुविचारी ।—तुलसी (शब्द०) । २. पकड़कर दखा लेना । छोप लेना ।

झाँपना (२)
क्रि० अ० लजाना । शरमाना । झेंपना ।

झाँपा †
संज्ञा पुं० [हिं० झापना] १. ढाँकनै का बाँस आदि का वना हुआ बड़ा टोकरा । २. मूँज का बना हुआ पिटारा ।

झाँपी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झाँपना] १. ढकने की टोकरी । २. मूँज की बनी हुई पिटारी, जिसमें कभी कभी चमड़ा भी मढ़ा होत है । ३. झपकी । नींद । ऊँघ ।

झाँपी
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. धोबिन चिड़िया । खंजन पक्षी । २. छिनाल स्त्री । पुंश्चली । यौ० — झांपो के †= एक गाली ।

झाँम †
वि० [देशी या सं० दग्ध] १. दीप्त । दग्ध । २. अनुज्वल ।

झाँयँ पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झाँई' । उ०— चंदकांति मनि माझ जिमि, परति चंद की झाँय ।— नंद० ग्रं०, पृ० १३१ ।

झायँ झायँ
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. किसी स्थान की वह स्थिति जो सन्नाटे या सूनेपन के कारण होती है । २. दे० 'झाँव झाँव' ।

झाँव झाँव
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. शोर गुल । २. रंग ढंग । भाव ताव । उ०— बनियऊँ झाँव झाँव दिखलाने के लिये..... ।— प्रेमघन०, भा० २, पृ० ४३९ । क्रि० प्र०—करना ।—दिखाना ।—होना ।

झाँवना
क्रि० सं० [हिं० झाँवा] झाँवे से रगड़कर (हाथ पैर आदि) धोना । उ०— हौं गई भेंट भई न सहेट मैं तातें रुखाहट मो मन छायगो । कालिंदी के तट झाँवत पाँट हौं आयों तहाँ लखि रूखे सुभायगो ।— प्रतापसिंह सवाई (शब्द०) ।

झाँवर (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० ड़ावर] वह नीची भूमि जिसमें वर्षाकाल में जल भर लाता है और जिसमें मोटा अन्न जमता है । डावर । विशेष— ऐसी भूमि धान के लिये बहुत उपयुक्त होती है ।

झाँवर (२) †
वि० [सं० श्यामल] [वि० स्त्री० झाँवरी] १. झाँवे के रंग का । कुछ कुछ काले रंग का । २. मलिन । उ०— साँची कहों रावरे सों झाँवरे लगैं तमाल ।— (शब्द०) । ३. मुरझाया हुआ । कुम्हलाया हुआ । ४. शिथिल । भंद । सुस्त । उ०— निसि न नींद आवै दिवस न भोजन पावै जितवत मग भई दृष्टि झाँवरौ ।— सूर (शब्द०) ।

झाँवरा पु
वि० [हिं० झाँवर] कुछ कुछ काले रंग का । उ०— वलिहारी अब क्यौ कियौ सैन साँवरे संम । नहि कछु गोरे अंग ये भए झाँवरे रंग ।—स० सप्तक, पृ० २४९ ।

झाँवली
संज्ञा स्त्री० [हिं० छाँव(= छाया)] १. झलक ।२. आँख की कलखी । कनखी । यौ०— झाँवलीवाज । मुहा०—झाँवली देना = (१) आँख से इशारा करना । (२) बातों से फँसाना । भुलावा देना ।

झाँवाँ
संज्ञा पुं० [सं० झामक] जली हुई ईंट । वह इँट जो जलकर काली हो मई हो । इससे रगड़कर अस्त्र, शस्त्र आदि चीजों की, विशेषतः पैरों की मैल छुड़ाते हैं । उ०— झाँवाँ लेबै जोग तेग को मलै बनाई ।— पलटू०, पृ० २ ।

झाँसना
क्रि० स० [हिं० झाँसा] १. ठगना । धोखा देना । झाँसा देना । २. किसी स्त्री को व्यभिचार में प्रवृत्त करना । स्त्री को झाँसना ।

झाँसा
संज्ञा पुं० [सं० अध्यास (= मिथ्या ज्ञान), प्रा० अञ्झास] अपना काम साधने के लिये किसी को बहकाने की क्रिया । धोखा । दमबुत्ता । छल । उ०— अरे मन उसे क्या है दुनियाँ का झाँमा । लिया हात में भीक का जिसने काँसा ।— दक्खिनी०, पृ० २५७ । क्रि० प्र०—देना । उ०— अध्वासी लल्ली पत्तो करके कहाँ ले गई कैसा झाँसा दे गई ।—फिसाना०, भा० ३, पृ० ४१० ।—बताना । उ०—रुपया पैसा अपने पास रक्ख/?/, यारन के दूर से झाँसा बताव/?/।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० ३३५ । यौ०—झाँसा पट्टी = धोखा घड़ी । मुहा०—झाँसे में आना = धोखे में आना । उ०—यहाँ बड़े बड़ों की आँखें देखी हैं । आपक् झाँसे में कोई आए तो आए हमपर चकमा न चलेगा ।—फिसाना०, भा० १, पृ० ५ ।

झाँसिया
संज्ञा पुं० [हिं० झाँसा + इया (प्रत्य०)] झाँसा देनेवाला । धोखेबाज ।

झाँसी
संज्ञा पुं० [देश०] १. उत्तर प्रदेश का एक प्रसिद्ध नगर जहाँ की रानी लक्ष्मीबाई ने, जो झाँसी की रानी नाम से प्रसिद्ध हैं, सन् १८५७ में स्वतंत्रता संग्राम (गदर) के अवसर पर अंग्रेजों से जमकर लोहा लिया और युद्धक्षेत्र में लड़ती हुई मारी गई थी । २. एक प्रकार का गुबरैला जो दाल और तमाखू की फसल को हानि पहुँचाता है ।

झाँसूँ
संज्ञा पुं० [हिं० झाँसा] झाँसा देनेवाला । धोखेबाज ।

झा
संज्ञा पुं० [सं० उपाध्याय; पा० उपज्झाय प्रा० उवज्झय, उवज्झाय, उज्झ, उज्झाय, उज्झाओ, ओज्झाय, हिं० औझा आतवा सं० ध्या (= ध्यान, चिंतन]; प्रा० झा] मैथिली या गुजराता ब्राह्मणों की एक उपाधि ।

झाई (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झाँई' । उ०—मनि दर्पन सम अवनि रमनि तापर छबि देही । बिथुरति कुंड़ल अलक तिलक झुकि झाई लेहीं ।—नंद ग्रं०, पृ० ३२ ।

झाई (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झाँई' ।

झाऊ
संज्ञा पुं० [सं० झाबुक] एक प्रकार का छोटा झाड़ जो दक्षिणी एशिया में नदियों के किनारे रेतीले मैदानों में अधिकता से होता है । पिचुल । अफल । बहुग्रंथि । विशेष—यह झाड़ बहुत जल्दी और खूब फैलता है । इसकी पत्तियाँ सरो की पत्तियों से मिलती जुलती होती है और गरमी के अंत में इसमें बहुत अधिकता से छोटे छोटे हलके गुलाबी फूल लगते हैं । बहुत कड़ी सरदी में यह झाड़ नहीं रह सकता । कुछ देशों में इससे एक प्रकार का रंग निकाला जाता है और इसकी पत्तियों आदि का व्यवहार औषधों में किया जाता है । इसमें से एक प्रकार का क्षार भी निकलता है । इसकी टहनियों से ठोकरियाँ और रस्सियाँ आदि बनती हैं और सूखी लकड़ी जलाने के काम में आती है । कहीं कहीं रेगिस्तानों में यह जाड़ बहुत बढ़कर पेड़ का रूप भी धारण कर लेता है ।

झाक पु
संज्ञा पुं० [प्रा० झक्क] बज्रपात । अशनिपात । उ०—(१) वह वह रुकह कै कै हाक । बज्जै विषम आवध झाक ।—पृ० रा०, ९ ।१९३ ।

झाकर
संज्ञा पुं० [देशी जंखर] कँटीली झाड़ियों और पौधों का समूह । झंखाड़ । उ०—साघो एक बन झाकर झउआ । लावा तितिर तेहि माह भुलाने सान बुझावत कौआ ।—सं० दरिया, पृ० १२५ ।

झाग
संज्ञा पुं० [हिं० गाजा] पानी आदि का फेन । गाज । फेन । क्रि० प्र०—उठना ।—छुटना ।—छोड़ना ।—निकलना ।— फेंकना ।

झागड़ पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'झगड़ा' । उ०—सहज ही सहज पग धारा जब आगम को दसौ परकार झागड़ बजाई ।— चरण० बानी, पृ० ५५ । क्रि० प्र०—बजाना ।

झागना (१) †
क्रि० स० [हिं० झाग] झाग उत्पन्न् करना । फेन निकालना ।

झागना (२) †
क्रि० स० [हिं० झाग] झाग उत्पन्न् करना । फेन निकालना ।

झाज पु (१)
संज्ञा पुं० [अ० झहाज] दे० 'जहाज' । उ०—किया था खुदा यूँ उसे सरफराज, जो थे सातों दरिया उपर उसके झाज ।—दक्खिनी०, पृ० ७७ ।

झाज (२)
संज्ञा पुं० [?] महीने कागज । बैलून । गुब्बारा । उ०—बम्बा गिरा गिरा को तोपाँ चला चला को । झाजाँ में भर को ग्यासाँ हव्वा में तू उड़ा को ।—दक्खिनी०, पृ० २९६ ।

झाझ (१) †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झाँझ' ।

झाझ (२)पु
संज्ञा पुं० [अ० जहाज; दक्खिनी; झाज] दे० 'जाहज' ।

झाझन पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झाँजन' । उ०—बाजे संक बीन स्वर सोई । झाझन केरी बाजन होई ।—कबीर सा०, पृ० ५८४ ।

झाझी पु †
वि० [सं० दग्ध; प्रा० दज्झ, दाझ; राज० झाझ] १. दग्ध करनेवाली । जलानेवाली । इतनी अधिक सीतल जिससे जलने का भाव प्रतीत हो । उ०—अति घण ऊनिमि आवियउ, झाझी रिठि झड़वाइ । बग ही भला त बप्पड़ा, धरणि न मुक्कइ पाइ ।—ढोला०, दू० २५७ ।

झाट (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. कुंज । निकुंज । २. झाड़ी । ३. ब्रण का प्रक्षालन । घाव को धोना ।

झाट (२)
संज्ञा पुं० [देश०] शस्त्रों का प्रहार । उ०—पड़ झाट थाट छल राज पाट, दिल्लीस जले दल बले दाट ।—रा० रू०, पृ० ७४ ।

झाटकपट
संज्ञा पुं० [सं० शाटक पट ?] एक प्रकार की ताजीम जो राजपूताने के राजदरबारों में अधिक प्रतिष्ठित सरदारों को मिला करती थी ।

झाटल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का लोध्र । गोलीढ । घंटा— पटलि । २. मोरवा नामक वृक्ष । विशेष—यह सफेद और काला होने के कारण दो प्रकार का होता है । आक की भाँति इसमें से भी दूध निकलता है । इसके पत्ते बड़े होते हैं और फल घंटियों की भाँति लटकते हैं ।

झाटल पु † (२)
वि० [?] आहत । त्रस्त । उ०—झटक झाटल छोड़ल ठाम । कएल महातरु तर बिसराम ।—विद्यापति, पृ० ३०३ ।

झाटा †
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जुही । २. भुँइँ आँवला ।

झाटास्त्रक
संज्ञा पुं० [सं०] तरबूज । मतीरा [को०] ।

झाटिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] भुई आँवला । पर्या०— झाटा । झाटीका । झाटी ।

झाड़
१ संज्ञा पुं० [सं० झाट; देशी झाड(= लतागहन)] १. वह छोटा पेड़ या कुछ बड़ा पौधा जिसमें पेड़ी न हो और जिसकी डालियाँ जड़ या जमीन के बहुत पास से निकलकर चारों ओर खूब छितराई हुई हों । पौधे से इसमें अंतर यह है कि यह कटीला होता है । २. झा़ड़ के आकार का एक प्रकार का रोशनी करने का सामान जो छत में लटकाया या जमीन पर बैठकी की तरह रखा जाता है । विशेष—इसमें कई ऊपर नीचे वृत्तों में बहुत से शीशे के गिलास लगे हुए होते हैं, जिनमें मोमबत्ती, गैस या बिजली आदि का प्रकाश होता है । नीचे से ऊपर की ओर के गिलासों के वृत्त बराबर छोटे होते जाते हैं । यौ०— झाड़ फानूस=शीशे के झाड़, हाड़ियाँ और गिलास अदि जिलका व्यवहार रोशनी और सजापट आदि के लिये होता है । ३. एक प्रकार की आतिशबाजी जो छूटने पर झाड़ या बड़े पौधे के आकार की जान पड़ती है । ४. छीपिटों का एक प्रकार का छापा, जो प्रायः दस अंगुल चौड़ा और बीस अंगुल लंबा होता है और जिसमें छोटे पेड़ या झाड़ की आकृति बनी रहती है । ५. समुद्र में उत्पन्न होनेवाली एक प्रकार की घास जिसे जरस या जार भी कहते हैं ।—(लश०) । ६. गुच्छा । लच्छा ।

झाड़ (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० झाड़ना] १. झाड़ने की क्रिया । झटककर या झाड़ू आदि देकर साफ करने की क्रिया । यौ०—झाड़ पौंछ = झाड़ और पौंछकर साफ करने की क्रिया । क्रि० प्र०—करना ।—रखना ।—होना । विशेष— इस शब्द का प्रयोग यौगिक शब्दों ही में विशेषतः होता है । जैसे, झाड़पोंछ, झाड़बुहार, झाड़झूड़ । २. बहुत ड़ाँट या फटकारकर कही हुई बात । फटकार । ड़ाँटड़पट । क्रि० प्र०—देना ।—बताना ।—सुनना ।—सुनाना । ३. मंत्र से झाड़ने की क्रिया । यौ०—झाड़ फूँक = मंत्रोपचार ।

झाड़ (४)
संज्ञा पुं० [हिं०झाड़ना] झटका (कुश्ती) ।

झाड़खंड़
संज्ञा पुं० [हिं० झाड़ + झंखड़] १. काँटेदार जंगल । बन । ऐसा बनविभाग जिसमें अधिकतर झरबेरी आदि के कँटीले झाड़ हों । २. अत्यंत घना और भयंकर जंगल । ३. छत्तीसगढ़ और गोडवाने का उत्तरी भाग । झारखंड़ ।

झाड़ झंखाड़
संज्ञा पुं० [हिं० झाड़ + झंखा़ड़] १. काँटेदार झाड़ियों का समूह ।२. व्यर्थ की निकम्मी चीजों का समूह ।

झाड़दार
१ वि० [हिं० झाड़ + फा० दार] १. सधन । धना । २. कँटीला । काँटेदार । ३. जिसपर झाड़ या बेलबूटे आदि बनेहों । ४. जिसमें शीशे के झाड़ की सजावट हो । जैसे,— झाड़दार कमरा ।

झाड़दार (२)
संज्ञा पुं० १. एक प्रकार का कसीदा जिसमें बड़े बड़े बेल बूठे बने होते हैं । २. एक प्रकार का गलीया जिसपर बड़े बड़े बेल बूठे बने होते हैं ।

झाड़न
संज्ञा स्त्री० [हिं० झा़ड़ना] १. वह जो कुछ झाड़ने पर निकले । २. वह कपड़ा आदि जिससे कोई चीज गर्द आदि दूर करने के लिये झाड़ी जाय । झाड़ने का कपड़ा ।

झाड़ना (१)
क्रि० स० [सं० क्षरण] १. किसी चीज पर पड़ी हुई गर्द आदि साफ करने या और कोई चीज हटाने के लिये उस चीज को उठाकर झटका देना । झटकारन । फटकारना । जैस,— जरा दरी और चाँदनी झाड़ दो । २. झटका देकर किसी एक चीज पर पड़ी हुई किसी दूसरी चीज को गिराना । जैसे,— इस अँगोछे पर बहुत से बीज चिपक गए हैं, जरा उन्हें झाड़ दो । ३. झाड़ू या कपड़े आदि की रगड़ या झटके से किसी चीज पर पड़ी या लगी हुई दूसरी चीज गिराना या हटाना । जैसे,—इन किताबों पर की गर्द झाड़ दो । ४. झाड़ु या कपड़े आदि के द्वारा अथवा और किसी प्रकार गर्द मैल, या और कोई चीज हटाकर कोई दूसरी चीज साफ करना । जैसे,— (क) सबेरे उठते ही उन्हें सारा घर झाड़ना पड़ता है । (ख) इस मेज को झाड़ दो । संयो० क्रि०—ड़ालना ।—देना ।—लेना । ५. बल या युक्तिपूर्वक किसी से धन ऐंठना । झटकना ।— (क्व०) । संयो० क्रि०—लेना । ६. रोग या प्रेतबाधा आदि दूर करने के लिये किसी को मंत्र आदि से भूँकन । मंत्रोच्चार करना । जैसे, नजर झाड़ना । संयो० क्रि०—देना । ७. बिगड़कर कड़ी कड़ी बातें कहना । फटकारना । डाँटना । संयो० क्रि०—देना । ८. निकालना । दूर करना । हटाना । छुड़ाना । जैसे,— तुम्हारी सारी बदमाशी झाड़ देंगे । उ०— मोहूँ ते ये चतुर कहावति । ये मनही मन मोको नरति । ऐसे वचन कहूँगी इन टें चतुराई इनकी मैं झारति ।—सूर (शब्द०) । ९. अपनी योग्यता दिखलाने के लिये गढ़ गढ़कर बातें करना । जैसे,— वह आते ही अँगरेजी झाड़ने लगा । १०. त्यागना । छोड़ना । गिराना । जैसे, चिड़यों का पंख झाड़ना ।

झाड़फूँक
संज्ञा स्त्री० [हिं० झाड़ना + फूँकना] मंत्र आदि से झाड़ने या फूँकने की वर क्रिया जो भुत प्रेत आदि की बाधाओं अथवा रोगों आदि को दूर करने के लिये की जाती है । मंत्र आदि पढ़कर झाड़ना या फूकना । क्रि० प्र०—करना ।—कराना ।—होना ।

झाड़बुहार
संज्ञा स्त्री० [हिं० झाड़ना + बुहारना] झाड़ने और बुहारने की क्रिया । सफाई ।

झाड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० झाड़ना] १. झाड़ फूँक । २. तलाशी । ३. सितार के सब तारों (विशेषतः वाजे का तार और चिकारी का तार) को एक साथ बजाना । झाला । ४. मल । गुह । मैला । मुहा०— झाड़ा फिरना= मलोस्सर्ग करना । हगना । झाड़ा फिराना = हगना । छोटे बच्चों की मलत्याग कराना । ५. मलोत्सर्ग का स्थान । पाखाना । टट्टी । क्रि० प्र०— जाना ।

झाड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० झाड़] १. छोटा झाड़ा । पौधा । २. बहुत से छोटे छोटे पेड़ों का समूह या झुरमुट । ३. सूअर के बालां की कूँची । बलौंछी ।

झाड़ीदार
वि० [हिं० झाड़ी + फा० दार] झाड़ी की तरह का । छोठे झा़ड़ का सा । २. कँटीला । काँटेदार ।

झाड़ू
संज्ञा स्त्री० [हिं० झाड़ना] १. बहुत सी लंबी सीकों आदि का समूह जिससे जमीन, फर्श आदि झाड़ते हैं । र्कूचा । बोहारी । सोहती । बढ़नी । मुहा०— झाड़ू देना = (१) झाड़ू की सहायता से कूड़ा करकट साफ करना । (२) दे० 'झाड़ फेरना' । झाड़ू फिरना = सफाया हो जाना । कुछ न रहना । झाड़ू फेरना = बिलकुल नष्ट कर देना । झाड़ू । मारना = (१) घृणा करना । (२) निरादर करना । (स्त्रि०) । २. पुच्छल तारा । कंतु । दुमदार सितारा ।

झुड़ूकश
संज्ञा पुं० [हिं० झुड़ू + फा० कश] १. झाड़ू देनेवाला । झुड़ू बरदार । २. भंगी । मेहतर । चमार ।

झड़ूदुमा
संज्ञा पुं० [हिं० झाड़ू + दुम] वह हाथी जिसकी दुम झाड़ू की तरह फेली हो । ऐसा हाथी ऐबी गिना जाता है ।

झाड़ूबरदार
संज्ञा पुं० [हिं० झाड़ + फा० बरदार] १. वह जो झाड़ू देता हो । २. चमार । भंगी । मेहतर ।

झाड़ूवाला
संज्ञा पुं० [हि झाड़ू + वाला] १. वह जो झाड़ू देता हो । झाड़ू बरदार । २. भंगी, मेहतर या चमार ।

झाण
संज्ञा पुं० [सं० ध्यान, प्रा० झाण] १. अंतःकरण में उपस्थित करने की क्रिया या भाव । मानसिक प्रत्यक्ष । ध्यान । २. हठयोग के अनुसार वह सावना जिसमें शरीर के भोतरी पाँच तत्वों के साथ पंचमहाभूतों का ध्यान करके उन्हें ऊर्ध्व में स्थित किया जाता हैं ।

झाती पु
संज्ञा स्त्री० [सं० ध्यातृ, प्रा० झाती या देश०] ध्यान करनेवाला । चिंतक । उ०— खंड़ित निद्रा अल्प अहारी । झाती पावै अनभै बारी ।—प्राण०, पृ०, ८६ ।

झाप †पु
संज्ञा पुं० [हिं० झाँपना] गोपन । छिपाव । उ०— आतर दुतर नरि, से कइसे जएवह तरि, आरति न करइ झप ।— विद्यापति, पृ०, १५८ । क्रि० प्र०—करना ।

झपड़
संज्ञा पुं० [सं० चपेटा] थप्पड़ । पड़ाका । लुप्पड़ा । तमाचा । क्रि० प्र०— मारना ।—लगाना ।मुहा०—झापड़ कसना । झापड़ देना । झापड़ झारना = थप्पड़ आरना । उ०— यदि कोई बोल दे तो बिना एकाध झापड़ झरे मानते भी नहीं ।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० ६७ ।

झापा †
संज्ञा स्त्री० [प्रा० झंप, हिं० झाँपना] १. झपकी । तंद्रा । २. कमजोरी । शिथिलता । उ०— कहा होई जो त्री दुख तापा । सूखै जोअ दाह औ झापा ।—इंद्रा०, पृ०, १५१ ।

झाबर (१)
संज्ञा पुं० [?] दलदली भूमि ।

झाबर (२)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'झाबा' । उ०— पुनि झाबर पै झाबर आई । घिरित खाँड़ का कहौं मिठाई ।—जायसी (शब्द०) ।

झाबा
संज्ञा पुं० [हिं० झापना(=ढ़ाँकना)] १. टोकरा । खाँचाँ । हठ्ठे का बड़ा दौरा । उ०— हम लोग दो रोटी के लिये सिर पर झाबा रखे तरकारी बेचते फिरें ।—फूलो०, पृ० ११ । २. घी, तेल आदि तरल पदार्थो के रखने का चमड़े का टोंटीदार बरतन । ३. चमड़े का बना हुआ गोल थाल जिसमें पंजांब में लोग आटा छानते हैं । इसे सफरा कहते हैं । ४. रोशनी का झाड़ जो लटकाया जाता है । ५. दे० 'झब्बा' ।

झाबी
संज्ञा स्त्री० [हिं० झाबा] छोटा झाबा । टोकरी ।

झाम पु
संज्ञा पुं० [देश०] १. झब्बा । गुच्छा । उ०— सुंदर दसन चिबुक आति सुंदर हृदय विराजत दाम । सुंदर मुजा पीत पट सुंदर कनक मेखला झाम ।—सूर (शब्द०) । २. एक प्रकार की बड़ी कुदाल जिससे कुएँ की मिट्टी निकालते हैं । ३. घुड़की । ड़ाट । ड़पट । ४. धोखा । छल । कपट ।

झमक
संज्ञा पुं० [सं०] जली हुई ईंट । झावाँ ।

झमर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. टेकुआ रगड़ने की सान । तर्कशाण । सिल्ली । २. स्त्रियाँ का पैर में पहनने का एक गहना जो पैजनी की तरह का होता है ।

झामर (२)
वि० [सं० श्यामल, प्रा० झामर] मलिन । साँवला । झाँवर । उ०— एव भेल विपरीत झमर देहा । दिवसे मलिन जनु चाँदक रेहा ।—विद्यापति, पृ०, १३३ ।

झामरझूमर पु
संज्ञा स्त्री० [अनुध्व०] चमक दमक । धूमधाम । झुठा प्रपंच । ढकोसला । उ०— दुनिया झामरझूमर अरुझी ।—कबीर० शा०, पृ० ४१ ।

झामरि †पु
वि० स्त्री० [सं० श्यामल, प्रा० झामर] दे० 'झामर' । उ०— सामरि हे झामरि तोर देह, की कह के सर्य लाएलि नेह ।—विद्यापति, भा०, २, पृ० ५६ ।

झामा †
संज्ञा पुं० [सं० श्यामल, प्रा०, झामल] 'झाँवा' । उ०— शरीर का पसीवा शरीर पर सुख कैदियों की त्वचा कड़ी और झामें की तरह खुरदुरी हो गई ।—भस्माधृत०, पृ० २० ।

झामी †
वि० संज्ञा पुं० [हिं० झाम] धोखेबाज । चालाक । धूर्त । जिनके मंत्र न कोऊ झानी । झूठि न वादि न परतिय- गामी ।—पद्माकर (शब्द०) ।

झुय़ँ झायँ
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. झनकार । झन् झन् शब्द । २. सन्नाटे में हवा का शब्द । वह शब्द जो किसी सुबसान स्थान में हवा के चलते तथा गूँज आदि के कारण सुनाई पड़ता है और जिससे कुछ भय सा होता है । जैसे, इतना बड़ा सूना घर झायँ झायँ करता है ।

झार पु † (१)
वि० [सं० सर्व, प्रा० सारो, हिं० सारा] १. एकमात्र । निपठ । केवल । उ०— दीयो दधि दान को सूकेसे ताहि भावत है जाहि मन मायो झर झगरे गोपाल को । —पद्माकर (शब्द०) । २. संपूर्ण । कुल । सब । समस्त । उ०— कै नख तें सिख सौ पदमाकर जाहिरै झार सिंगार किया है । —पदमा— कर ग्रं०, पृ० १६८ । ३. समूह । झुंड़ । यौ०— झारझार । झारझार ।

झार (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० झाला (=ताप,)] १. दाह डाह । जलन । ईर्ष्या । उ०—मोसौं कहौ बात बाबा यह बहुत करत तुम सोच बिचार । कहा कहौं तुम सों मैं प्यारे कंस करत तुमसौं कछु झार ।— सूर० १० ।५३० । २. ज्वाला । लपट । आँच । सं०—(क) जनहुँ छाँह मँह धूप दिखाई । तैसे झार लाग जो आई ।—जायसी (शब्द०) । (ख) नाम लै चिलात बिलखात अकुलात अति तात तात तोंसियत झोंसियत झारहीं ।—तुलसी ग्र०, पृ० १७४ । (ग) गरज किलक आघात उठत मनु दामिनि पावक झार ।—सूर (शब्द०) । ३. झाल । चरपरापन । उ०— छाँछ छबीली धरी धुँगारी । झरहै उठत झार की न्यारी ।—सूर (शब्द०) । ४. बर्षा की बूँदे । झड़ी ।

झार (३)
संज्ञा पुं० [हिं० झड़ना] झरना । पौना ।

झार (४)
संज्ञा पुं० [सं० झाट, देश झाड़(=लता गहन)] १. वृक्ष । पेड़ । झाड़ । २. एक पेड़ का नाम ।

झारखंड़ं
संज्ञा पुं० [हिं० झाड़ + खंड़] १. एक पहाड़ जो वैद्यनाथ होता हुआ जगन्नाथ पुरी तक चला गया है । विशेष— मुसलमानों ने अपने इतिहास ग्रंथों में छत्तीसगढ़ और गोड़वाने के उत्तरी भाग को झारखंड़ के नाम से लिखा है । २. दे० झड़खंड़ ।

झारन
क्रि० स० [हिं० झाड़ना] दे० 'झाड़न' ।

झारना (१)पु
क्रि० स० [सं० झर] १. बाल साफ करने के लिजे कंघी करना । २. छाँटना । अलग करना । जुदा करना । ३. दे० 'झाड़ना' ।

झारना (२)पु
क्रि० सं० [हिं० झलना] दे० 'झलना' । उ०— सुरति चँवर लै सनसुख झारे ।—कबीर श०, भा० ३, पृ० १७ ।

झापफूँक †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झड़फूंक' ।

झारा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० झारना] १. पतली छवी हुई भांय । २. वह सूप जिससे अन्न को फटककर सरसों इत्यादि से पृथक् करते हैं । झरना । †— ३. लाठी तेजी से चलाने का हुनर ।

झार (२)पु
संज्ञा स्त्री० [सं० ज्वाला, हिं० झाल] झार । ज्वाला । उ०— औरु दगध का कहों अपारा । सूनै सो जरौ कठिन असि झरा ।— पद्मावत, पृ० २४१ ।

झारि (१)पु †
वि० [हिं० झार] दे० 'झार (१)' । उ०— कहहु सुमंतविचारि केहि बालक घोटक गह्यो । बसैं इहाँ ऋषि झारि क्षत्रिन कर न निवास इत ।— (शब्द०) ।

झारि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० झड़ी या सं० धार (= धारा)] अनवरत वर्षा की झड़ी । अखंड़ बूँदों की धारा । उ०— मेघनि जाइ कही पुकारि । सात दिन भरि बरसि ब्रज पर गई नैकु न झारि ।— सूर०, १० ।८८२ ।

झारी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० झरना] लुटिया की तरह एक प्रकार का लँबोतरा पात्र जिसमें जल गिराने के लिये एक और एक टोंटी लगी रहती है । इस टोंटी में से धार बँधकर जल निकलता है । इसका व्यवहार देवताओं पर जल चढ़ाने अथवा हाथ पैर आदि धुलाने में होता है । उ०— (क) आसन दे चौकी आगे धरि । जमुनाजल राख्यो झारी भरि ।— सूर (शब्द०) । (ख) आपुन झारी माँगि विप्र के चरन पखारे । हती टूर श्रम कियों राज द्विज भए दुखारे ।— सूर (शब्द०) ।

झारी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० झारि] वह पानी जिसमें अमचुर, जीरा, नमक आदि घुला हुआ हो । इसका व्यवहार पश्चिम में अधिक होता हैँ ।

झारी पु (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं० झाड़ी] दे० 'झाड़ी' । उ०—फूल झरें सखीं फुलवारी । दिस्टि परीं उकठीं 'सब झारी' ।— जायसी ग्रं०, पृ० २५४ ।

झारी (४)
वि० [हिं०] दे० 'झार' ।

झारू
संज्ञा पुं० [हिं० झाड़ू] दे० "झाड़ू' ।

झारनेवाला †
वि० [सं० शदु प्रा०, झुड़, हिं० झारा + वाला (प्रत्य०)] पटा खेलनेवाला । पटा । बनेठी या लकड़ी चलानेवाला ।

झर्झुर
संज्ञा पुं० [सं०] ढोल या हुड़ुक बाजा बजानेवाला [को०] ।

झाल (१)
संज्ञा पुं० [सं० झल्लक] झाँझ । काँसे का बना हुआ ताल देने का वाद्य । उ०— सहस गुंजार में परमली झाल है, झिलमिली उलटि के पौन भरना ।— पलटू०, पृ० ३० ।

झाल (२)
संज्ञा पुं० [देश०] १. रहट्टे का बड़ा खाँचा । २. झालने की क्रीया या भाव ।

झाल (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० झाला] १. चरपराहट । तीतापन । तीक्ष्णता । जैसे, राई की झाल, मिरचे की झाल । २. तरंग । मौज । लहर । ३. कामेच्छा । चुल । प्रसंग करने की कामना । झल ।

झाल (४)
संज्ञा पुं० [हिं० झड़] दो तीन दिन की लगातार पानी की झ़ड़ी जो प्रायः जाड़े में होती है । उ०— जिन जिन संबल नां किया असपुर पाटन पाय । झाल परे आथए संबल किया न जाय ।—कबीर (शब्द०) । क्रि० प्र०— करना ।

झाल (५)
वि० [हिं० झार] दे० 'झार' (१) ।

झाल (६)
संज्ञा स्त्री० [सं० ज्वाल, प्रा०, झाल] १. आँच । ज्वाला । उ०— अग्नि के झल मैं सांकड़े पैसता बैठते ऊठते श्री राम रक्षा करें ।—रामानंद०, पृ० ६ । †२. ग्रीष्म । ऋतु । उ०— आये भेल झाल कुसुम सब छुछ । वारि विहुन सर किओ नहिं पूछ ।—विद्यापति, पृ०, ३१५ ।

झालड़
संज्ञा स्त्री० [सं० झल्लरी] १. घड़ियाल जो पूजा आदि के समय बजाया जात है । २. दे० 'झालर' ।

झालना पु (१)
क्रि० सं० [हिं०?] १. धातु की बनी हुई वस्तुओं में टाँका देकर जो़ड़ लगाना । २. पीने की चोजों की बोतल आदि में भरकर ठंढा करने के लिये बरफ या सोडे में रखना । संयो० क्रि०—देना ।

झालना (२) †पु
क्रि० सं० [सं० क्ष्वेल; प्रा० झेल; हिं० झेलना] ग्रहण करना । धारण करना । उ०— जिणि दीहे तिल्ली त्रिड़इ, हिरणी झालइ गाभ । ताँह दिहाँरी गोरड़ी पड़पउ झलइ आम ।—ढ़ोला०, दू० २८२ । २. कबूल करना । स्वीकार । करना । उ०— केताँइ झाली चाकरी, ढूँण इजाका दीध ।—रा०, पृ० १२६ ।

झालर (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० झल्लरी] १. किसी चीज के किनारे पर शोभा के लिये बनाया, लगाया या टाँका हुआ वह हाशिया जो लबकता रहता है । विशेष— इसकी चौड़ाई प्रायः कम हुआ करती है और उसमें सुंदरता के लिये कुछ बेल बूटे आदि बने रहते हैं । मुख्यतः झालर कपड़े में ही होती हैं, पर दूसरी चीजों में भी शोभा के लिये झालर के आकार की कोई चीज बना या लगा लेते है । जैसे, गद्दी या तकिये की झलर, पंखे की झालर । २. झालर के आकार की या किनारे पर लटकती हुई कोई चीज । ३. किनारा । छोर ।—(क्व०) । ४. झाँझ । झाल । उ०— (क) सुन्न सिखर पर झालर झलकै बरसै अभी रस बुंद हुआ ।—कबीर श०, भा० ३, पृ० १० । (ख) धुरत निस्सान तहँ गैब की झालरा गैव के वंट का नाद आवै ।— कबीर श०, पृ० ८८ । ५. घड़ियाल जो पूजा आदि के समय बजाया जाता है । उ०— घटे क्रिया बाँभण, मिटे झालर परसाँदा । ईन प्रजा उपजे, निरख दुर रीत निसादा ।—रा० व०, पृ० २० ।

झालर (२) †
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का पकावान जिसे झलरा भी कहते है । उ०— झालर माँड़े आए पोई । देखत उजर पाग जस घोई ।— जायसी (शब्द०) ।

झालरदार
वि० [हिं० झालर + दार प्रत्य०] जिसमें झालर लगी हो ।

झालरना
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'झलराना' । उ०— नेक न झुरसी विरह झर नेह लता कुंभिलाति । निति निति होति हरी हरी खरी झलरति जाति ।— बिहारी (शब्द०) ।

झलरा (१) †
संज्ञा पुं० [हिं० झालर] एक प्रकार का रुपहला हार । हुमेल ।

झालरा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० ताल] चौड़ा कुआँ । बावली । कुंड ।

झालरि पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झालर] बंदनवार । लटकते हुए मोती आदि की पंक्ति । उ०— कनक कलस धरि मंगल गावो, मोतियन झालरि लाव हो ।—धरम०, पृ०, ४९ ।

झलरी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० झल्लरी] दे० 'झाल' । उ०— घंटा तालझालरी बाजै । जग मग जोति अवभि पुर छाजै ।—रामानंद०, पुं० ७ ।

झाला (१)
संज्ञा पुं० [देश०] १. राजपूतों की एक जाति जो गुजरात और मारवाड़ में पाई जाती है । २. सितार बजाने में गत के अंत में द्रुत गति से बाज और चिकारी के जातों का झड़ा बजाना । ३. बकझक । झँझाँ ।

झाला (२)पु
संज्ञा स्त्री० [सं० ज्वाला, प्रा०, काला] दाह । ताप । जलव । छीस । उ०— तपन तन, जिव उठत झाला, कठिन दुख अब को सहै ।— संतबानी०, भा० २, पृ० १६ ।

झालि (१) †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झड़] पानी की झड़ी । भाल । उ०— झालि परे देन अथए अंतर पर गइ सांझ । बहुत रसिक के लागाते वेश्या रहिगै बाँझ ।—कबीर (शब्द०) । क्रि० प्र०— छाना ।— पड़ना ।

झालि (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की काँजी जो कच्चे आम को पीसकर उसमें राई नमक और सूनी हींग मिलाकर बनाई जाती है ।—झरी ।

झावँ झावँ
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. बकवाद । बकबक । २. हुज्जत तकरार । क्रि० प्र०— करना ।— मचाना ।

झावारि पु
संज्ञा पुं० [हिं० झुमर] दे० 'झूमर' उ०— कढ़त गोल की गोल खेल खेलन झावरि हित ।—प्रेमघन०, आ० १, पृ० ३३

झावना पु
क्रि० सं० [हिं० झाबाँ से नाम०] झाँवे से रगड़कर धोना । मैल साफ करता । उ०— नायन न्हवायकै गुसायनि के पाँय झाबै, उझकि उझकि उठे वा कर लसन ते ।—नट०, पृ० ७४ ।

झावर
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'झँवर' ।

झावु, झावुक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'झऊ' ।

झिंग †
संज्ञा स्त्री० [सं० झिङ्गाक] तरोइ । तोरी । तुरई ।

झिंगन
संज्ञा पुं० [देश०] १. एक प्रकार का पेड़ जिसकी पत्ती सी लाल रंग बनता है । २. सारस्वत ब्राह्मणों की एक जाति ।

झिंगरि पु
संज्ञा पुं० [दे० प्रा०, झिंगिर] उ०— झिंगरि सलूर पावस निगज ।—पृ० रा०, १ ।४३४ ।

झिंगा पु †
वि० [देश०? झिंगिर पु झिग्गर] झींगुर के समान । झींगुर की ध्वनि सा । उ०— अनहद झिंगा शब्द सुनायोँ ।— कबीर श०, भा० १, पृ० ५७ ।

झिंगाक
संज्ञा पुं० [सं० झिङ्गाक] तोरई । तरोई ।

झिंगिनी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० झिङ्गिनी] एक प्रकार का जंगली बृक्ष जो बहुत ऊँचा होता है । इसके पत्ते महुए के समान और शाखाओं में दोनों ओर लगते हैं । फूल सफेद और फल बेर के समान होते हैं । पर्या०— झिंगी । झिंगिनी । झिगिनी । प्रमोदिनी । सुनिर्यास । २. प्रकाश । ज्योति । चमक । लुक (को०) ।

झिंगिनी (२)पु
संज्ञा स्त्री० [देश०] क्षुद्र कीटविशेष । खद्योत । जुगनू । उ०— चमकत सार सनाह पर, हय गय नर भर <page n="1844" लग्गि । मनों वृच्छ परि झिंगिनियों, करत केलि निसि जग्गि ।—पृ० रा०, ८ ।४३ ।

झिंगी
संज्ञा स्त्री० [सं० झिड्गि] दे० 'झिगिनी' ।

झिंझि †
वि० [देशी] अत्यंत क्षीण । दुर्बल ।

झिंझिम
संज्ञा पुं० [सं० झिञ्झिम] जलता हुआ वन [को०] ।

झिंझिया
संज्ञा स्त्री० [अनु०] दे० 'झिंझिया' (२) ।

झिंझिरिस्टा
संज्ञा स्त्री० [सं० झिञ्झिरिष्टा] झिझिरिटा नामक क्षुप ।

झिंझिरीटा
संज्ञा स्त्री० [सं० झिझिरिस्टा] एक प्रकार का क्षुप ।

झिंझी
संज्ञा स्त्री० [सं० झिञ्झी] झिल्ली । झींगुर ।

झिंझोटो
संज्ञा स्त्री० [देश०] संपूर्ण जाति की एक रागिनी जिसमें सब शुद्ध स्वर लगते हैं । यह दिन के चौथे पहर में गाई जाती है ।

झिंटी
संज्ञा स्त्री० [सं० झिण्टी] कठसरैया । पियाबासा ।

झिंकवा
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'झिंका' । उ०—चोखे चलु जँतवा, झमकि लेहु झिकवा, देवस भुखल भैया पाहुन रे की ।—कबीर (शब्द०) ।

झिंगनी †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] तरोई । तुरई ।

झिँगबा
संज्ञा स्त्री० [सं० झिङ्कट, झिंङ्गट] एक प्रकार का छोटी मछली जिसके मुँह और पूँछ के पास दोनो तरफ बाल होते हैं ।

झिंगारना पु †
क्रि० अ० [हिं० झींगुर या झनकार] झींगुर का शब्द होना । झींगुर का शब्द करना ।

झिंगुली पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झगा] छोटे बच्चों के पहनने का कुरता । झगा । उ०— पीत झीन झिगुली तन सोही । किलकनि चितवनि भावति मोही ।—तुलसी (शब्द०) ।

झोंगोरना पु †
क्रि० अ० [सं० झङ्करण] झंकार करना । कूकना आवाज करना । पिहकना । उ०— ड़ूँगरिया हरिया हुआ वणे झिगोरया मोर । इण रिति तीणाइ नोसरइ, जाचक, चातक, चोर ।— ढोला०, दू० २५३ ।

झिँझि पु
वि० स्त्री० [देशी] झीनी । अत्यंत क्षीण । उ०—कहहि कबिर किहि देबह खोरी । जब चलिहहु झिंझि आसा तोरी ।—कबीर वी०, पृ० २८२ ।

झिंझिया
संज्ञा स्त्री० [अनु०] छोटे छोटे छोदोंवाला वह घड़ा जिसमें दोया बाल कर कुआर के महीने में लड़कियाँ घुमाती है । उ०— आसरंध्र मग ह्वै कढ़ँ तिय तव दीपति पुँज । झिझिंया कैसो घट भयों दिन ही में बनकुंज ।—मतिराम (शब्द०) ।

झिँझोटी, झिंझौटी
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'झिंझौटी' ।

झिकझोरना †
क्रि० सं [हिं० झकझोरना] दे० 'झकझोरना' । उ०— नहिं नहिं करए नयन ढर नोर । काँच कमल भमरा झिंकझोर ।— विद्यापति, पृ० २०४ ।

झिकना पु
क्रि० अ० [हिं० झाँकना] देखना । ताकना । उ०—बरुनीन ह्वै नैन झिके झिझिकै मनो खंजन मीन पै जाल परे ।—ठाकुर (शब्द०) ।

झिखना †—पु
क्रि० अ० [हिं०] टिमाटिमाना । उ०— झलकंत बगत्तर टोप झिखै । रसचाह निसा प्रतिब्यंब रखै । —रा० रू०, पृ० ३४ ।

झिखना पु (२)
क्रि० अ० [हिं० झिखना] दे० 'झींखना' । उ०— भोर जगि प्यारी अध ऊरध इतै सी और भाखी खिझि झिराकि उघारि अध पलकै ।—पद्माकर (शब्द०) ।

झिगड़ा †
संज्ञा पुं० [अनु०] दे० 'झगड़ा' ।

झिगामिग †पु
वि० [हिं० झिलमिल] दे० 'झिखमिल' । उ०— दीस रहया दिला माँहि दर्शन साँई दा । साँई दा साँई दा झिगमिग झाँई दा ।—राम० धर्म०, पृ० ४६ ।

झिगरा, झिगरो पु
संज्ञा पुं० [अनु०] झगडा । झंझट । उ०— समुझिय जग जनमें को फल मन में, हरि सुमिरन में दिन भरिए । झिगरो बहुतेरो घेरु घनेरो मेरो तेरो परिहरिए ।— भिखारी० ग्रं०, भा० १, पृ० २२६ ।

झिझक
संज्ञा स्त्री० [अनु०] दे० 'झझक' ।

झिझिकना
क्रि० अ० [हिं० झझक, झिझक] दे० 'झझकना' । उ०— वहाँ साँचे चलैं तजि आपुनपौ झिझके कपटी गो निसाँक नहीं— घनानंद (शब्द०) ।

झिझकार
संज्ञा स्त्री० [अनु०] दे० 'झझकार' ।

झिझकारना
क्रि० स० [अनु०] १. दे० 'झझकारना' । उ०— वोही ढँग तुम रहै कन्हाई सबै उठी झिझकारि । लेहु असीस सवन के मुख ते कताहि दिवावत गारि ।—सूर (शब्द०) । २. दे० 'झटकना' । उ०— रसना मति इत नैना निज गुन लीन । कर में पिय झिझकारे अजुगति कोन ।—रहीम (शब्द०) ।

झिझकी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झझक' । उ०— झुकि झाँकत झिझकी कराति, उझकि झरोखनि बाल ।—ब्रज० ग्रं०, पृ० २ ।

झिझिक पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झझक' ।

झिझिकना पु †
क्रि० अ० [हिं० झिझक + वा (प्रत्य०)] उ०— बरुनीन है नैन झिकै झिझिकै मनो खजन मीन पै जाये परे ।—ठाकुर (शब्द०) ।

झिझिया
संज्ञा स्त्री० [अनु०] दे० 'झिझिया' ।

झिझोड़ना
क्रि० स० [अनु०] दे० 'झकझोरना' । उ०— उसे झिझेड़कर उसने हिला दिया, क्योंकि मधुबन का बह रूप देखकर मैवा को भी गय लगा ।—तितली, पृ०, १८९ ।

झिटका
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'झटका' उ०— एक झिटका सा लगा सहर्ष । निरखने लगे लुटे से, कौन । गा रहा यह सुंदर संगीत ? कुतूहल रह न सका फिर मौन ।—कामायनी, पृ० ४५ ।

झिटकारना †
क्रि० सं० [हिं० झिटका] दे० 'झटकारना' या 'झटकना' ।

झिड़क †
संज्ञा स्त्री० [अनु०] दे० 'झिड़की' ।

झिड़कना
क्रि० स० [अनु०] १. अवज्ञा या तिरस्कारपूर्वक बिगड़कर कोई बात कहना । २. अलग फेंक देना । झटकना ।—(क्व०) ।

झिड़की
संज्ञा स्त्री० [हिं० झिड़कना] १. वह बात जो झिड़ककर कही जाय । डाँट । फटकार । क्रि० प्र०—देना ।—मिलना ।—सुनना । २. झिड़कने की क्रिया या भाव ।

झिड़झिड़ाना
क्रि० अ० [अनु०] भला बुरा कहना । कटु वचन कहना । चिड़चिड़ाना ।

झिड़झिड़हट
संज्ञा स्त्री० [हिं० झिड़झिड़ाना] झिड़झिड़ाने का भाव या क्रिया ।— (क्व०) ।

झिनझिन पु
संज्ञा स्त्री० [अनु०] दे० 'झन झन' । उ०— यह झिन- झिन जंतर बाजै भाला । पीवै प्रेम होय मतवाला ।—द० सागर, पृ० ३८ ।

झिनवा (१)
संज्ञा पुं० [देश०] महीन चावल का धान । उ०— राय- भोग औ काजररानी । झिनवा रूद् औ दाउदखनी ।— जायसी (शब्द०) ।

झिनवा (२)
वि० [सं० क्षीण, प्रा०, झीण] दे० 'झीना' ।

झिप् झिप्
क्रि० वि० [अनु०] रिमझिम शब्द के साथ । उ०— पहले नन्हीं नन्हीं बूंदे पड़ीं पीछे बड़ी बड़ी बूँदों से झिप् झिप् पानी बरसने लग ।—ठेठ०, पृ० ३२ ।

झिपना
क्रि० अ० [हिं० छिपना] दे० 'झेंपना' ।

झिपाना
क्रि० सं० [हिं० झिपना का स, रूप] लज्जित करना । शरमिंदा करना ।

झिमकना †
क्रि० अ० [अनु०] दे० 'झमकना' ।

झिमझिमी
वि० [हिं० झीनी; या देशी झिमिअ(=अवयवों की जड़ता)] मंद ज्योतिवाली । उ०— उसकी झिमझिमी आँखों से उल्लास के आँसू झड़ने लगते ।—पिंजरे०, पृ० ७८ ।

झिमिटना
क्रि० अ० [हिं० सिमटना] इकट्ठा होना । एक जगह जुट आना । उ०— झिमिट आते हैं जहाँ जो लोग, प्रकट कर कोई अकथ अभियोग । मौन रहते हैं खड़े बैचैत सिर झुकाकर फिर उठाने हैं न ।— साकेत, पृ० १७३ ।

झिर
संज्ञा स्त्री० [हिं० झिरीं] बूंद । फुहार । झिर्री । उ०— झिर पिचकारी की मची आँधी उड़त गुलाल । यह धूँघारि धाँसि लीजिए पकारि छबीले लाल ।— सं० सप्तक, पृ० ३६० ।

झिरकनहारी
वि० स्त्री० [हिं० झिरकरना + हारी (प्रत्य०)] झिड़कनेवाली । उ०—यातैं तुमको ढीठि कही । स्यामहिं तुम भई झिरकनहारी एते पर पुनि हारि नहीं ।— सूर०, १० ।१५ ।३६ ।

झिरकना पु
क्रि० सं० [हिं० झिड़कना] दे० 'झिड़कना' । उ०— (क) छरीदार बैराग विनोदी झिरकि बहिरैं कीन्हैं ।—सूर०, १ ।४० । (ख) भोर जगि प्यारी अध ऊरघं इतै की और और भाखी खिझि झिरकि उधारि अध पलकै ।— पद्माकर (शब्द०) । २. अलग फैक देना । झटकना । —(क्व०) । उ०— मुकुट शिर श्राखंड़ सोहै निरखि रहिं ब्रजनारि । कोटि सुर कोदंड़ आमा झिराकि डारैं वारि ।—सूर (शब्द०) ।

झिरझिर
क्रि० वि० [अनु०] १. मंद मंद । धीरे धीरे । उ०—झिर झिर बहै बयार प्रेम रस ड़ोलै हो ।— घरम०, पृ० ४६ । २. झिप झिर शब्द के साथ ।

झिरझिरा
वि० [हिं० झरना] बहुत पतला या बारीक (कपड़ा आदि) । झँझरा । झीना ।

झिरझिराना
क्रि० अ० [अनु०] १. झिरझिर शब्द के साथ बहना (वायु, जल आदि) । २. दे० 'झिड़ाझिड़ाना' ।

झिरना (१)
क्रि० अ० [सं०/?/क्षर, प्रा०, झिर, हिं०/?/झरना] बहकना । गिरना । प्रवाहित होना । 'झरना' । उ०— जहाँ तहां झाड़ी में झिरती हैं झरनों की झड़ी यहाँ ।— पंचवटी, पृ० ९ ।

झिरना (२)
संज्ञा पुं० १. छेद । सूराख । २. दे० 'झरना' ।

झिरमिर पु
वि० [हिं०] दे० 'झिलमिल' । उ०— झिरमिर बरसै सूर । बिन कर बाजै ताल तूर ।—दरिया० बानी, पृ० ४८ ।

झिरहर, झिरहिर पु
वि० [हिं०] १. झीना । छिद्रित । छेदोंवाला । उ०— छिनहर घर अरु झिरहर टाटी । घन गरजन कंपै मेरा छाती ।— गंगा जमुन के बीच में एक झिरहिर नीरा हो ।— धरम०, पृ० ३७ ।

झिरा †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झरना(=रस कर निकलना)] आमदनी । आय ।

झिराना
क्रि० अ० [हिं०] झुराना ।

झिरिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] झींगुर [को०] ।

झिरहिरो पु
वि० [अनु०] मंद मंद । धीरे धीरे । उ०— झिरि- हिरी बहै बयारि, अमी रस ढरकै हो ।— पलटू०, भा० ३, पृ० ७६ ।

झिरी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० झरना] १. छोटा छेद जिससे कोई द्रव पदार्थ धीरे धीर बह जाय । दरज । शिगाफ । २. वह गड्ढा जिसमें पानी झिर झिरकर इकट्ठा हो । ३. कुएँ के बगल में से निकला हुआ छोटा सोता । ४. तुषार । पाला । ५. वह फसल जिसे पाला मार गया हो ।

झिरी (२)
संज्ञा [सं०] झींगुर । झिल्ली [को०] ।

झिरीका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'झिरिका' [को०] ।

झिर्री
संज्ञा स्त्री० [हिं० झरना या झिरी] वह छोटा गड्ढा जो नाली आदि में पानी रोकने के लिये खोदा जाता है । घेरुआ ।

झिलँगा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० ढीला + अंग] १. टूटी हुई खाट का बाध । २. ऐसी खाट जिसकी बुनावट ढोली पड़ गई हो ।

झिलँगा (२) †
वि० २. ढीला ढाला । झोलदार । २. झीना ।

झिलँगा (३)
संज्ञा पुं० [हिं० झींगा] दे० 'झींगा' ।

झिलना (१)
क्रि० अ० [?] १. बलपूर्वक प्रवेश करना । घँसना । घुसाना । उ०— झिसी फौज प्रतिभट गिरे खाइ घाव पर घाव । कुँवर दोरि परबत चढ़यो बढ़यो युद्ध को चाव ।—लाल (शब्द०) । २. तृप्त होना । अघा । जाना । उ०— मिले राम कृष्ण, झिले पाइकै मनोरथ की, हिले दग रूप किए चूरि चूरि चूरि को ।—प्रिया (शब्द०) । ३. मग्न होना । तल्लीन होना । उ०— कटयो कर चले हरि रंग माँझ झिले मानी जानी कछु चूक मेरी यहै उर धारिए ।—प्रिया (शब्द०) । ४. (कष्ट, आपत्ति आदि) झेला जाना । सहा जाना । सहन होना । उठाया जाना ।

झिलना (२)
संज्ञा पुं० [सं० झिल्ली] झींगुर ।

झिलम
संज्ञा स्त्री० [हिं० झिलमिला] लोहे का बना हुआ एक प्रकार का झांझरीदार पहरावा जो लड़ाई के समय सिर और मुँह पर पहना जाता था । एक प्रकार का लोहे का टोप या खोल । उ०— झलकत आवै झुंड झिलम झलानि झप्यो तमकत आवै तेगवाही औ सिलाही के ।—पद्माकर (शब्द०) ।

झिलमटोप
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'झिलम' ।

झिलमलित पु †
वि० [हिं० झिलमिल + इत (प्रत्य०)] झिलमिलाता हुआ । काँपता हुआ ।

झिलमा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का धान जो संयुक्त प्रांत में होता है ।

झिलमिल (१)
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. काँपती हुई रोशनी । हिलता हुआ प्रकाश । झलमलाता हुआ उजाला । २. ज्योति की अस्थिरता । रह रहकर प्रकाश के घटने बढ़ने की क्रिया । उ०— (क) हेरि हेरि बिल में न लीन्हों हिलमिल में रही हौं हाथ मिल में प्रभा की झिलमिल में ।—पद्माकर (शब्द०) । (ख) घुँघट कै घूमि कै सु झूमके जवाहिर के झिलमिल झालर की भूमि झिल झुकत जात ।— पद्माकर (शब्द०) । ३. बढिया मलमल या तरजेब की तरह का एक प्रकार का बारीक और मुलायम कपड़ा । उ०—(क) चँदनोता जो खरदुख भारी । बाँस- पूर झिलमिल की सारी ।—जायसी (शब्द०) । (ख) राम आरती होन लगी है, जगमग जगमग जोति जगी है । कंचन भवन रतन सिंहासन । दासम डासे झिलमिल डासन । तापर राजत जगत प्रकाशन । देखत छोबि मति प्रेम पगी है ।— मन्नालाल (शब्द०) । पु ४. युद्ध में पहननै का लोहे का कवच । उ०— करन पास लीन्हैत कै छंड़ू । विप्र रूप धरि झिलामिल इंदू ।— जायसी (शब्द०) ।

झिलमिल
वि० रह रहकर चमकता हुआ । झलमलाता हुआ । उ०— नदी किनारे मैं खड़ी पानी झिखमिल होय । मै मैली प्रेय ऊजरे मिलना किस विधि होय ।— (शब्द०) ।

झिलामिला
वि० [अनु०] [वि० स्त्री० झिलमिली] १. जो गफ या गाढ़ा न हो । २. जिसमें बहुत से छोटे छोटे छोद हों । झँझरा झीना । ३. जिसमें रह रहहकर हिलता हुआ प्रकाश निकले । ४. झलझलाता हुआ । चमकता हुआ । ५. जो बहुत स्पष्ट न हो ।

झिलमिलाना (१)
क्रि० सं० [अनु०] १. रह रहकर चमकना । जुगजुगाना । उ०— गल नल कंधर ग्रीव पुनि कंठ कपोटी कैन ? पीक लीक जहँ झिलमिलत सो छबि कीने औन ।— अनेकार्थ, पृ० २९ । २. प्रकाश का हिलना । ज्योति का सस्थिर होना । ३. प्रकाश का टिमटिमाना ।

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झिलमिलाना
क्रि० स० १. किसी चीज को इस प्रकार हिलाना कि जिसमें वह रह रहकर चमके । २. हिलाना । कँपाना ।

झिलमिलाहट
संज्ञा स्त्री० [अनु०] झिलमिलाने की क्रिया या भाव ।

झिलमिली
संज्ञा स्त्री० [हिं० झिलामिल] १. एक दूसरे पर तिरछी लगी हुई बहुत सी आड़ी पटरियों का ढाँचा जो किवाड़ों और खिड़ाकियों आदि में जड़ा रहता है । खड़खड़िया । विशेष— थे सब पटरियाँ पीछे की ओर पतली लंबी लकड़ी या छड़ में ज़ड़ी होती हैं जिनकी सहयना से झिलमिली खोली या बंद की जाती है, । इसका व्यवहार बाहर से आनेवाला प्रकाश और गर्द आदि रोकने के लिये अथवा इसलिये होता है कि जिसमें बाहर से भीतर का दृश्य दिखालाई न पड़े । झिलमिली के पीछे लगी हुई लकड़ी या छड़ को जरा सा नीचे की ओर खोंचने से एक दूसरे पर पड़ी पटरियाँ अलग अखग खड़ी हो जाती हैं और उन सबके बीच में इतना अवकाश निकल आता है जिसमें से प्रकाश या वायु आदि अच्छी तरह आ सके । क्रि० प्र०— उठाना ।—खोलना । —गिरना । —चढ़ाना । २. चिक । चिलमन । ३. कान में पहनने का एक प्रकार का गहना । ४. देखने या शोभा के लिये मकानों में बनी जाली ।

झिलवाना †
कि० सं० [हिं० झेलना का प्रे० रूप] झेलने का क्राम कराना । सहन कराना ।

झिलमिलि पु
वि० [अनु०] दे० 'झिलमिल' । उ०— छाँड़ो झिल- मिलि नेह, पुरुष गम रखि कै ।— धरम०, पृ० ५२ ।

झिलिम्म पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० झिलम] दे० 'झिलम' । उ०— धरे टोप कुंड़ी कसे कौच अंगं । झिलिम्मै धटाटोप पेटी अभंगै— हम्मीर०, पृ० २४ ।

झिल्ली †पु
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'झिल्ली' । उ०— भननात गोलिन की भनक जनु धनि धुकार झिल्लीन की ।— पद्माकर ग्रं०, पृ० १२ ।

झिल्ल
संज्ञा स्त्री० [सं०] नील की जाति का एक प्रकार का पौधा । इसकी छाल और फूल लाल होते हैं और पत्ते और फल बहुत छौटे होते हैं ।

झिल्लड़
वि० [हिं० झिल्ला] (वह कपड़ा) जिसकी बुनावट दूर दूर पर हो । पतला ओर झलरा (कपड़ा) गफ का उलटा ।

झिल्लन (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] दरी बुनने की करघे की वह कड़ी लकड़ी जिसमें बै का बाँस लगा रहता है । गुरिया ।

झिल्ला †
वि० [अन०] [वि० स्त्री० झिल्ली] १. पतला । बारीक । २. झँझरा । जिसमें बहुत से छोटे छोटे छेद हों ।

झिल्लि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक बाजे का नाम । २. झींगुर । झिल्ली । २. चिमड़ा कागज । चर्मपत्र [को०] ।

झिल्लिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. झींगुर । झिल्ली । २. झिल्ली की झंकार (को०) । ३. सूर्य का प्रकाश (को०) । ३. चमक । प्रकाश । दीप्ति (को०) । ५. उबटन, अंगराग आदि शरीर पर मलने से गिरनेवाली मैल (को०) । ६. रंग आदि लगाने में प्रयुक्त वस्त्र (को०) ।

झिल्ली (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. झींगुर । २. चर्मपत्र (को०) । ३. एक वाद्दा (को०) । ४. दीए की बत्ती (को०) । ५. दे० 'झिल्लिका' ।

मिल्ली (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० चैल अथवा सं० झिल्लिका (=चमकादार पारदर्शी पतला आवरण) या अ० जिल्द (=आवरण) अथवा सं० झुट] १. किसी चीज की ऐसी पतली तह जिसके ऊपर की चीत दिखाई पड़े । जैसे, चमड़े की झिल्ली । २. बहुत बारीक छिलका । ३. आँख का जाला ।

झिल्ली (३)
वि० स्त्री० बहुत पतला । बहुत बारीक ।

झिल्लीक
संज्ञा पुं० [सं०] झिंगुर ।

झिल्लीका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. झींगुर । झिल्ली । २. सूर्य की दीप्ति या प्रकाश । ३. उबटन आदि का मैल । झिल्ली [को०] ।

झिल्लीदार
वि० [हि० झिल्लि + फा० दार] जिसके ऊपर किसी चीज की बहुत पतली तह लगी हो । जिसपर झिल्ली हो ।

झीँका †
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'झींका' । क्रि० प्र०—लेना ।—ड़ालना ।

झीँकना (१)
क्रि० अ० [प्रा० झँख] दे० 'झींखना' । उ०— तुम्हें हर समय झींकते रहना पड़ता है ।— सुखदा पृ० ७८ ।

झीँकना (२) †
क्रि० सं० [देश०] फेंकना । पटकना ।

झीँका
संज्ञा पुं० [देश०] १. उतना अन्न जितना एक बार पीसने के लिये चक्की मे डाला जाता है । २. सीका । छीका ।

झीँख †
संज्ञा स्त्री० [प्रा० झंख] झींखने की क्रिया या भाव । खीज ।

झीँखना (१)
क्रि० अ० [प्रा० झंख, हिं० खीजना] १. किसी आनिवार्य अनिष्ट के कारण दुःखी होकर बहुत पछताना और कुढ़ना । खीजना । २. दुखड़ा रोना । अपनि विपत्ति का हाल सुनाना । उ०— खाट पड़े नर झींखन लागे, निकासि प्रान गयो चोरी सी ।— कबीर सा०, सं० भा०, २, पृ० ५ ।

झाँखना (२)
संज्ञा पुं० १. झींखने की क्रिया या भाव । २. दुःख का बर्णन । दुखड़ा ।

झीँगट
संज्ञा पुं० [देश०] पतवार थामनेवाला । मल्लाह । कर्णधार ।—(लश०) ।

झींगन
संज्ञा पुं० [देश०] मँझोले आकार का एक प्रकार का वृक्ष जिसरा तना मोटा होता है और जिसमें ड़ालियाँ अपेक्षाकृत बहुत कम होती हैं । विशेष— यह सारे उत्तरी भारत, आसाम, बरमा और लंका में पाया जाता है । इसमें से पीलापन लिए सफेद रंग का एक प्रकार का गोंद निकलता है जिसका व्यवहार छोटों की छपाई और ओषधि के रूप में होता है । इसकी छाल से टस्सर रँगा जाता है और चमड़ा सिझाया जाता है । इसकी पत्तियाँ चारे के काम में आती हैं और हीर की लक़ड़ी से कई तरह के सामान बनते हैं ।

झीँगा
संज्ञा पुं० [सं०चिङ्गट] १. एक प्रकार की मछली जो प्रायः सारे भारत की नदियों और जलाशयों आदि में पाई जाती है । झिंगवा ।विशेष— इस मछली के अगले भाग मे छाती के नीचे बहुत पतले पतले ओर लंबे आठ पैर होते है; इसीलिये प्राणिशास्त्रज्ञ इसे केकड़े आदि के अंतर्गत मानते हैं । आठ पैरों के अतिरिक्त इसके दो बहुत लंबे धारदार डंक भी होते हैं । इसकी छोटी बड़ी अनेक जातियाँ होती हैं और यह लंबाई में चार अंगुल से प्रायः एक हाथ तक होती है । इसका सिर और मुँह मोटा होता है और दुम की तरफ इसकी मोटाई बराबार कम होती जाती है । यह मछली अपना शरीर इस प्रकार झुका सकती है कि सिर के साथ इसकी दुम लग जाती है । इसके सिर पर उँगलियों के आकार के दों छोटे छोटे अंग होते हैं जिनके सिरों पर आँखे होती हैं । इन आँखों से बिना मुड़े यह चारों ओर देख सकती है । यह अपने अंड़े सदा अपने पेट के अगले भाग में छोती पर ही रखती है । इसके शरीर के पिछले आधे भाग पर बहुत कड़े छिलके होते है । जो समय समय पर आप- से आप साँप की केचुली की तरह उतर जाते हैं । छिलके उतर जाने पर कुछ समय तक इसका शरीर बहुत कोमल रहता है पर फिर ज्यों का त्यों हो जाता हैं । इसका मांस खाने में बहुत स्वादिष्ट होता है । बहुधा मांस के लिये यह सुखाकर भी रखी जाती है । २. एक प्रकार का धान जो अगहन में तैयार होता है । इसका चावल बहुत दिनों तक रह सकता है । २. एक प्रकार का कीड़ा जो कपास की फसल को हानि पहुँचाता हैं ।

झीँगुर
संज्ञा पुं० [अनु० झी + कर] एक प्रसिद्ध छोटा कीड़ा । घुरघुरा । जंजीरा । झिल्ली । विशेष— इसकी छोटी बड़ी अनेक जानियाँ होती हैं । यह सफेद, काला और भूरा कई रंगों का होता है । इसकी छह टाँगे और दो बहुत बड़ी मूँछे होती हैं । यह प्रायः अँधेरे घरों में पाया जाता हैं तथा खेंतों और मैदानों में भी होता है । खेतों में यह कोमल पत्तों आदि को कट ड़ालना है । इसकी आवाज बहुत तेज झीं झीं हीतो है और प्रायः बरसात में अधिकता से सुनाई देती है । नीच जाती को लोग इसका मांस भी खाते हैं ।

झीँझड़ा †
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'छिछड़ा' । उ०— जैसे चील झिझड़े पर छापा मारे ।— शराबी, प० ७६ ।

झीँझना †
क्रि० अ० [अनु०] झुँझलना । खिजलाना ।

झीँझो
संज्ञा पुं० [देश०] १. एक रस्म । झिंझिया । विशेष—इस रस्म में आश्विन शुकल चतुर्दशी को मिट्टी की एक कच्ची हाँड़ी में बहुत मे छोद करके उसके बीच में एक दिया बालकर रखते हैं । इसे कुमारी कन्याएँ हाथ में लेकर अपने संबंधियों के घर जाती हैं और उस दीपक का तेल उनके सिर में लगाती हैं ओंर वे लोग उन्हें कुछ देते हैं । उसी द्रव्य से वे सामग्री मँगाकर पूर्णिमा के दिन पूजन करती हैं और आपस में प्रसाद बाँटती हैं । लोगों का यह भी विश्वास है कि इसका तेल लगाने से सेहुँआ रोग नहीं होता अथवा अच्छा हो जाता है । २. मिट्टी की वह कच्ची हाँड़ी जिसमें छेद करके इस काम के लिये दीआ रखते हैं ।

झीँटना †
क्रि० अ० [देश०] दे० 'झींकना' ।

झीँपना †
क्रि० अ० [देशी झंप] १. दे० 'झेंपना' । २. 'ढँपना' ।

झिँमना †
क्रि० अ० [हिं० झूमना] दे० 'झूमना' । उ०— मानों झींम रहे हैं तरु भी मंद पवन के झोकों से ।—पंचवटी, पृ० ५ ।

झीँवर पु
संज्ञा पुं० [सं० धीवर] दे० 'धीवर' । उ०— उज्जल उदक धुवाया ओयण, लँघे पार सरिता मृदु लोयण । प्रभु झींवर कोधी भवपार ।—रघु० रू०, पृ० ११० ।

झीँसा †
संज्ञा पुं० [हिं० झींसी] दे० 'झीसी' ।

झीँसी
संज्ञा स्त्री० [अनु० या हिं० झीना (=बहुत महीन)] फुहार । छोटो छोटी बूँदों की वर्षा । वर्षा की बहुत महीम बूँदे । क्रि० प्र०—पड़ना ।

झीक (१)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'झींका' । उ०— काम क्रोध मद लोभ चक्की के पीसनहारे । तिरगुन ड़ारै झीक पकरि कै सबै निकारे ।—पलटू०, पृ० ८४ ।

झीक (२) †
क्रि० वि० [हिं०] झटके से । शीघ्रता से । उ०— काबाड़ी नित काटता, झीक कुहाड़ा झाड़ ।—बाँकी० ग्रं०, भा० १, पृ० ३२ ।

झीका
संज्ञा पुं० [सं० शिकव] रस्सी का लटकता हुआ जालदार फँदा जिसपर बिल्ली आदि के ड़र से दूध या खाने की दूसरी वस्तुएँ रखते हैं । छीका । सिकहर ।

झीखना
क्रि० अ० [प्रा० झंख] दे० 'झींखना' ।

झीख (१) †
वि० [सं० क्षीण] [वि० स्त्री० झीझी] झीना । झँझरा ।

झीण पु, झीणा पु †
वि० [सं० क्षीण, प्रा० झीण] दे० 'झीना' । उ०— (क) पाँणीं हों तैं पातला, धूवाँ ही तैं झीण ।—कबीर ग्रं०, पृ० २९ (ख) मनवाँ तो अधर बस्या बहुतक झीण होइ ।— कबीर ग्रं०, पृ० २० । (ग) मारू सेकइ हत्थड़ा, झीणो अँगरेइ ।— ढोला०, दू० २०६ ।

झीत
संज्ञा पुं० [लश०] जहाज के पाल का बटन ।

झीन †
[सं० नक्षीण; प्रा० झीण] दे० 'झिना' ।

झीना
वि० [सं०क्षीण] [वि० स्त्री० झीनी] १. बहुत महीन । बारीक । पतला । उ०— प्रफुल्लित ह्वै के आनि दीन है जसोदा रानि झीनियै झँगुली तामें कंचन को तगा ।—सूर (शब्द०) । २. जिसमें बहुत से छेद हों । झँझरा । ३. गुल दुबला । दुर्बल । ४. मंद । धीमा ।

झीनासारी †
संज्ञा पुं० [हिं०] धान का एक प्रकार ।

झीमना
क्रि० अ० [हिं० झूमना] दे० 'झूमना' । उ—नव नील कुंज हैं झिम रहे, कुसुमों की कथा न बंद हुई ।—कामायनी, पृ० ६५ ।

झीमर
संज्ञा पुं० [सं० धीवर] दे० 'झीवर' ।

झीर पु †
संज्ञा पुं० [देश०] मार्ग । रास्ता । उ०— हरिजन सहजे उतरि गए ज्यों सूखे खाल को झीर ।—भीखा श०, पृ० २४ ।

झीरिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] झींगुर [को०] ।

झीरुका
संज्ञा स्त्री० [सं०] झींगुर । झिल्ली [को०] ।

झील
संज्ञा पुं० [सं० क्षीर (=जल)] १. वह बहुंत बड़ा प्राकृतिक जलाशय जो चारों ओर जमीन से घिरा हो । विशेष— झीलें बहुत बड़े मैदानों में होती हैं और प्राय इनकी लंबाई और चौड़ाई सैकड़ों मील तक पहुच जाती है । बहुत सी झीलें ऐसी होती हैं जिनका सोता उन्हीं के तल में होता है और जिनमें न तो कहीं बाहर से पानी आता है और न किसी ओर सै निकलता है । ऐसी झीलों कै पाने का निकास बहुधा भाप के रूप में होता है । कुछ झींलें ऐसी भी होती हैं जिनमें नदियाँ आकार गिरती है और कुछ झीलों में से नदियाँ निकलती भी हैं । कभी कभी झील का संबंध नदी आदि के द्वारा समुद्र से भी होता है । अमेरिका के संयुक्त राज्यों में कई ऐसी झीले हैं जो आपस में नदियों द्वारा सब एक दूसरे से संवद्ध है । झीलें खारे पानी की भी होतीं हैं और मीठे पानी की भी । २. तालाबों आदि से बड़ा कोई प्राकृतिक या बानावटी जलाशय । बहुत बड़ा तालाब । ताल । सर ।

झीलण पु †
क्रि० अ० [सं० स्ना, प्रा० झिल्ल] स्नान करना । नहाना । उ०— ढोला हुँ तुझ बाहिरी, झीलण गइय तलाइ । उजल काला नागा जिउँ लहिरो ले ले खाइ ।— ढोला०, पृ० ३९६ ।

झीलम
संज्ञा स्त्री० [हिं० झिलम] दे० 'झिलम' । उ०— साँगि समाहि कियो सुर ऐसी, टूटि परा सिर झिलम जाई ।—सं० दरिया, पृ० ३६ ।

झीलर †पु
संज्ञा पुं० [हिं० झील, अथवा छोलर] छोंटी झील । छोटा तालब । छीलर । उ०— इंस, बसै सुख सागरे, झीलर नहि । आवै ।—कबीर श०, भा० ३, पृ० ४ ।

झीली †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झिल्ली] १. मलाई । २. दे० 'झिल्ली' ।

झीवर पु
संज्ञा पुं० [सं० धीवर] माँझी । मल्लाह । मछुआ । दे० 'धीवर' ।

झुंट
संज्ञा पुं० [सं० झुण्ट] १. पेड़ । २. झाड़ी [को०] ।

झुंड़
संज्ञा पुं० [सं० यूथ] बहुत से मनुष्यों पशुओं या पक्षियों आदि का समूह । प्राणियों का समुदाय । वृंद । गिरोह । जैसे, झिड़ियों का झुड़, कबुतरों का झुंड़ । मुहा०— झुंड़ के झु़ड़े = संख्या में बहुत अधिक (प्राणी) । झुंड़ में रहना = अपने ही वर्ण के दूसरे बहुत से जीवों मे रहना ।

झुंड़ी
संज्ञा स्त्री० [देशी खुंट (=खूँटी) या सं० झुण्ट(= झाड़] १. वह खूँटी जो पौधों की काट लेने के बाद खेतों में खड़ी रह जाती है । २. चिलमन या परदा लटकाने का कुलाबा जो प्रायः कुंदे में लगा रहता है ।

झुँकवाई
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झोंकवाई' ।

झुँकवाना
क्रि० सं० [हिं०] दे० 'झोंकवाना' ।

झुँकाई
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झोंकाई' ।

झुँगना †
संज्ञा पुं० [हिं० जिंगना, जुँगना] जुगनू ।

झुँगर †
संज्ञा पुं० [देश०] साँवा नामक अन्न ।

झँझना †
संज्ञा पुं० [अनुं०] बच्चों का एक खिलौना । झुनझुना ।

झुँझलाना
क्रि० अ० [अनु०] खिझलाना । किटकिटाना । बहुत दुःखी और क्रुद्ध हौकर बात करना । चिड़चिड़ाना ।

झुँझलाहट
संज्ञा स्त्री० [हिं० झुँझलाना] खीज । चिढ़ ।

झुँझई †
संज्ञा स्त्री० [देश०] निंदा । चुगली । चुगलखोरी ।

झुँझायों पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं०?] खीझ । झुँझलाहट । उ०— माखन चोर री मैं पायौ । नितप्राति रीची देखि कमोरी मोहिं अति लगत झुँझयौ ।— सूर०, १० ।१८८ ।

झुकझोरना
क्रि० सं० [अनु०] दे० 'झकझोरना' ।

झुकना
क्रि० अ० [सं० युज्, युक, हिं० जुक] १. कीसी खड़ी चीज के ऊपर के भाग का नीचे की ओर टेढ़ा होकर लटक आना । ऊपरी भाग का नीचे की ओर लटकना । निहुरना । नवना । जैसे, आदमी का सिर या कमर झुकना । मुहा०— झुक झुक पड़ना= नशे या नींद आदि के कारण किसी मनुष्य का सीधा या अच्छी तरह खड़ा या बैठा न रह सकना । उ०— अमिय हलाहल मदभरे सेत स्याम रतनार । जियत मरत झुकि झुकि परत जेहि चितवत एत बार ।—(शब्द०) । २. किसी पदार्थ के एक या दोनों सिरों का किसी ओर प्रवृत्त होना । जैसे, छड़ी का झुकना । ३. किसी खड़े या सीधे पदार्थ का किसी और प्रवृत्त होना । जैसे, खंभे या तख्ते का झुकना । ४. प्रवृत्त होना । दत्तचित्त होना । रुजू होना । मुखातिब होना । ५. किसी चीज को लेने के लिये आगे बढ़ना । ६. नम्र होना । विनीत होना । अवसर पड़ने पर अभिमान या उग्रता न दिखलाना । संयो० क्रि० —जाना ।—पड़ना । ७. क्रुद्ध होना । रिसाना । उ०— (क) सुनि प्रिय वचन मलिन मनु जानी । झुकी रानि अवरहु अरगानी ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) अब झूठो अभिमान करति सिय झुकति हमारे ताँई । सुख ही रहसि मिली रावण को अपने सहज सुभाई ।— सूर (शब्द०) । (ग) अनत वसे निसि की रिसनि उर बर रह्यो बिसेखि । तऊ लाज आई झुकत खरे लजौहैं देखि ।— बिहारी (शब्द०) । † ८. शरीरांत होना । मरना ।

झुकमुख
संज्ञा पुं० [हिं० झाकना + मुख] प्रातःकाल या संध्या का वह समय जब कि कोई व्याक्ति स्पष्ट नहीं पहचाना जाता । ऐसा आँधेरा समय जब कि किसी व्यक्ति या पदार्थ की पहचानने में कठिनता हो । झुटपुटा ।

झुकरना †
क्रि० अ० [अनु०] झुँझलाना । खिजलाना ।

झुकराना †
क्रि० अ० [हिं० झोंका] झोंका खाना ।— उ०— सक्यों साँकरे कुंज मग करतु झांझ झुकरात । मंद मंद मारुत तुरँग खूँदन आवत जात ।— बिहारी (शब्द०) ।

झुकवाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० झुकवाना] १. झुकवाने की क्रिया या भाव । २. झुकवाने की मजदूरी ।

झुकवाना
क्रि० स० [हिं० झुकना] झुकाने का काम दूसरे से कराना । किसी को झुकाने में प्रवृत्त करना ।

झुकाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० झुकना] १. झुकाने की क्रिया या भाव । २. झुकाने की मजदूरी ।

झुकाना
वि० स० [हिं० झुकना] १. किसी खड़ी चीज के ऊपरी भाग को टेढ़ा करके नीचे की और लाना । निहुराना । नवाना । जैसे, पेड़ की ड़ाल झुकना । २. किसी पदार्थ के एक या दोनों सिरों की किसी ओर प्रवृतत्त करना । जैसे, वेत झुकाना, छड़ झुकाना । ३. किसी खड़े या सीधे पदार्थ को किसी और प्रवृत्त करना । ४. प्रवृत्त करना । रूजू करना । ५. नम्र करना । विनीत बनाना । ६. अपने अनुकूल करना । अपने पक्ष में करना ।

झुकामुकी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झुकामुखी' । उ०—सखि बिखर गई हैं कलियाँ । कहाँ गया प्रिय झुकाझुकी में करके वे रंग— रलियाँ ।— साकेत, पृ० २९७ ।

झुकामुखी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झुकमुख' । उ०—जानि झुका- मुखी भेष छपाय कै गागरी ले घर तैं निकरी ती ।—ठाकुर (शब्द०) ।

झुकार †
संज्ञा पुं० [हिं० झकोरा] हवा का झोंका । झकोरा ।

झुकाव
संज्ञा पुं० [हिं० झुकना] १. किसी ओर लटकने, प्रवृत्त होने या झुकने की क्रिया । २. झुकने का भाव । ३. ढाल । उतार । ४. प्रवृत्ति । मन का किसी ओर लगना ।

झुकावट
संज्ञा स्त्री० [हिं० झुकना + आवट (प्रत्य०)] १. झुकने या नम्र होने की क्रिया या भाव । २. प्रवृत्ति । चाह । झुकाव ।

झुगिया पु †
संज्ञा स्त्री० [? या देश०] झोपड़ी । कुटिया । उ०— हरि तुम क्यौं न हमारैं आए । ताके झुगिया मैं तुम बैठे, कौन बड़प्पन पायो । जाति पाँति कुलहू तैं न्यारी, है दासी को जायो ।— सूर०, १ ।२४४ ।

झुग्गी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झुगिया] दे० 'झुगिया' ।

झुझकाना, झुझकावना पु
क्रि० सं० [सं०] [युद्ध, प्रा० झुज्झ; हिं० झुँझलाना] उत्तेजित करना । आगे बढ़ना । भिड़ा देना । संघर्ष कराना ।

झुझाऊ पु
वि० [जुझाऊ] दे० 'जुझाऊ' । उ०— बाजत झुझाऊ सहनाई सिंधू राग पुनि सुनत ही काइर की छुटि जात कल हैं ।—सुंदर० ग्रं०, भा० १, पृ० ४८४ ।

झुझार पु †
वि० [हिं० झुझ + आर (प्रत्य०)] दे० 'जुझार' । उ०— गुजरात देश सित्तर हजार । बालुका राइ चालुक झुझार ।— पृ० रा०, १ ।४३० ।

झुट पु †
संज्ञा पुं० [हिं० झूठ] दे० 'झूठ' । उ०— देख सखि झुट कमान । कारन किछुओ बुझइ नाहि पारिए तब काहे रेखल कान ।— विद्यापति, पृ० ४२६ ।

झुटपुट
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'झुटपुटा' । उ०— अरे, उस धूमिल विजन में ? स्वर मेरा था चिकना ही, अब घना हो चला झुटपुट ।—हरी घास०, पृ० ३२ ।

झुटपुटा
संज्ञा पुं० [अनुं०] कुछ अँधेरा और कुछ उजेला समय । ऐसा समय जब कि कुछ अंधकार और कुछ प्रकाश हो । झुकझुख ।

झुटलाना
क्रि० सं० [हिं० झूठ] दे० 'झुठलाना' ।

झुटालना
क्रि० सं० [हिं० जूठा अथवा सं० अध्यत्स>अज्झट्ट> अज्झुट्ठ> झुठ] जूठा करना । जुठारना ।

झुटुंग
वि० [हिं० झोंटा] जिसके खड़े खड़े और बिखरे हुए बाल हों । झोंटेवाला । जटावाला । दे० 'झोटंग' । उ०— जोगिनी झुटुंग झुंड़ झुड़ बनी तापसी सी तीर तीर बैठी सो समरसरि खोरि के ।—तुलसी ग्रं०, पृ० १९५ ।

झुट्ट पु †
संज्ञा पुं० [सं० यूथ, हिं० जुट्ट] गिरोह । झुंड़ । उ०— छोहौं भरि छुट्टे कैसों खुट्टे झुट्टक झुटे भुव लुट्टे ।—सुजान०, पृ० ३१ ।

झुट्ठा
वि० [हिं० झूठा] दे० 'झूठा' ।

झुठकाना
क्रि० सं० [हिं० झूठ] १. झूठी बात कहकर अथवा किसी प्रकार (विशेषतः बच्चों आदि को) धोखा देना । २. दे० 'झुठलाना' ।

झुठलाना
क्रि० सं० [हिं० झुठ + लाना (प्रत्य०)] १. झुठा ठह- राना । झूठा प्रमाणित करना । झूठा बनाना । २. झूठ कहकर धोखा देना । झुठाकाना ।

झुठाई †पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० झुठ + आई (प्रत्य०)] झूठापन । असत्याता । झूठं का भाव । उ०—(क) जानि परत नहिं साँच झुठाई धेन चरावत रहे झुरैया ।— सूर (शब्द०) । (ख) आधि मगन मन व्याधि बिकल तन बचन मलीन झुठाई ।—तुलसी (शब्द०) ।

झुठाना
क्रि० सं० [हिं० झुठ + आना(प्रत्य०)] झूठा ठहराना । झूठा साबित करना । झुठलाना ।

झुठामुठी पु
क्रि० वि० [हिं० झूठ] दे० 'झूठामूठी' ।

झुठालना
क्रि० सं० [हिं०] १. दे० 'झुठलाना' । २. 'जुठारना' ।

झुन
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. एक प्रकार की चिड़िया । २. दे० 'झुनझुनी' ।

झुनक पु
संज्ञा पुं० [अनु०] नूपुर का शब्द ।

झुनकना पु
क्रि० अ० [अनु०] झुन झुन शब्द करना । झुन झुन बोलना या बजाना ।

झनकना पु
संज्ञा पुं० [अनु०] दे० 'झुनझुना' ।

झुनका पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] १.धोखा । छल । २. दे० 'झुनझुना' उ०— दुनो और झुनका झुन झुन बाजे, ताहाँ दीपक ले बारी ।—सं० दरिया, पृ० १०६ ।

झुनकार (१) पु †
वि० [हिं०झीना] [स्त्री० झुनकारी] झिंझरा । पतला । झीना । महीन । बारीक । उ०— अँगिया झुनकारी खरी सितजाकरी की सेदकनी कुच दू पर लौं ।— (शब्द०) ।

झुनकार †पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० झनकार] दे० 'झंकार' ।

झुनझुन
संज्ञा पुं० [अनु०] झुन झुन शब्द जो नूपुर आदि के बजने से होता है । उ०— अरुन तरनि नख ज्योति जगप्रगित झुन झुन करत पाय पैजनियाँ ।—सूर (शब्द०) ।

झुनझुना
संज्ञा पुं० [हिं० झुन झुन से अनु०] [स्त्री० अल्पा० झुनझुनी] बच्चों के खेलने का एक प्रकार का खिलौना जो धातु, काठ, ताड़ के पत्तों या कागज आदि सें बनाया जाता है । घुनघुना । उ०— कबहुँक ले झुनझुना बजावति मीठी बतियनै बोलै ।— भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ४६७ । विशेष— यह कई आकार और प्रकार का होता है, पर साधारणताइसमें पकड़ने के लिये एक ड़ंड़ी होती है जिसके एक या दोनों सिरों पर पोला गोल लट्टू होता है । इसी लट्टू में कंकड़ या किसी चीज के छोटे छोटे दाने भरे होते हैं जिनके कारण उसे हिलाने या बजाने से झुन झुन शब्द होता है ।

झुनझुनाना (१)
क्रि० अ० [अनु०] झुन झुन शब्द होना । घुँघरू के जैसा बोलना ।

झुनझुनाना (२)
क्रि० स० झुन झुन शब्द उत्पन्न करना । झुन झुन शब्द निकालना ।

झुनझुनियाँ (१) †
संज्ञा स्त्री० [अनु०] सनई का पौधा ।

झुनझुनियाँ (२)
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. पैर में पहनने का कोई आभू— षण जो झुन झुन शब्द करे । २. बेड़ी । निगड़ । क्रि० प्र०—पहनना ।—पहनाना ।

झुनझुनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० झुनझुनाना] हाथ या पैर के बहुत देर तक एक स्थिति में मुड़े रहने के कारण उसमें उत्पन्न एक प्रकार की सनसनाहट या क्षोभ । २. दे 'झुनझुना' ।

झुनी
संज्ञा स्त्री० [देश०] जलाने की पतली लकड़ी ।

झुनुक पु
संज्ञा पुं० [अनु०] झुन झुन बजने की आवाज । उ०— झुनुक झुनुक वह पगनि की डोलनि । मधुर ते मधुर सुतुतरी बोलनि ।—नंद ग्रं०, पृ० २४५ ।

झुन्नी †
संज्ञा स्त्री० [अनु०] दे० 'झुनझुनी' —१ । उ०— पावों में झुन्नी चढ़ गई ।—जिप्सी, पृ० १३० ।

झुपझुपी
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'झुबझुबी' ।

झुपरी †
संज्ञा स्त्री० [देशी झुपडा] दे० 'झोंपड़ी' । उ०— साधुन की झुपरी भली ना साकट को गाँव । चंदन की कुटकी भली ना बबूल बनराव ।—कबीर (शब्द०) ।

झुप्पा
संज्ञा पुं० [अनु०] १. दे० 'झुव्वा' । २. दे० 'झुड़' ।

झुबझुबी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का गहना जो देहाती स्त्रियाँ कान में पहनती हैं ।

झुमुक
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'झूमर' । उ०— पाँच रागिनी झुमक पचीसो, छठएँ धरम नगरिया ।—धरम०, पृ० ३४ ।

झुमका
संज्ञा पुं० [हिं० झुमना] १. कान में पहनने का एक प्रकार का झूलनेवाला गहना जो छोटी गोल कटोरी के आकार का होता है । उ०—सिर पर हैं चँदवा शीशा फूल, कानों में झुमके रहे झूल ।—ग्राम्या, पृ० ४० । विशेष— इस कटोरी का मुँह नीचे की ओर होता है और इसकी पेंदी में एक कुंदा लगा रहता है जिसके सहारे यह कान में नीचे की ओर लटकती रहती है । इसके किनारे पर सोने के तार में गुथे हुए मोतियों आदि की झालर लगी होती है । यह सोने, चाँदी या पत्थर आदि का और सादा कथा जड़ाऊ भी होता है । यह अकेला भी कान में पहना जाता है और करण— फूल के नीचे लटकाकर भी । २. एक प्रकार का पौधा जिसमें झुमके के आकार के फूल लगते हैं । ३. इस पौधे का फूल ।

झुमड़ना पु
क्रि० अ० [हिं० झूमना] दे० 'घुमड़ना' । उ०— रहे झुमड़ि घन गगन घन भौं तम तोम बिसेख । निसि बासर समुझ न परत प्रफुलित पंकज पेख ।—सं० सप्तक, पृ० ३६३ ।

झुमना † (१)
वि० [हिं० झूमना] [वि० स्त्री० झुमनी] झूमनेवाला । हिलनेवाला ।

झुमना (२)
संज्ञा पुं० [देश०] वह बैल जो अपने खूँटे पर बँधा हुआ अपने पिछले पैर उठा उठाकर झूमा करे । यह एक कुलक्षण है ।

झुमरन पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० झूमना] झूमने का भाव । लहरने का कार्य । उ०— बेनी सिथिल खसित कच झुमरन लुलित पीठ पर सोहै ।— भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ५३२ ।

झुमरा
संज्ञा पुं० [देश०] लुहारों का एक प्रकार का घन या बहुत भारी हथौड़ा जिसका व्यवहार खान में से लोहा निकालने में होता है ।

झुमरी
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. काठ की मुँगरी ।२. गच पीटने का औजार । पिटाना ।

झुमाऊ
वि० [हिं० झूमना] झूमनेवाला । जो झूमता है ।

झुमाना
क्रि० स० [हिं० झूमना का स० रूप] किसी को झूमने में प्रवृत्त करना । किसी चीज के ऊपरी भाग को चारों ओर धीरे धीरे हिलाना ।

झुमिरना पु
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'झूमना' ।

झुरकुट
वि० [अनु०] १. मुरझाया हुआ । सूखा हुआ । २. दुबला । कृश ।

झुरकुटिया (१)
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का पक्का लोहा जिसे खेड़ी कहते हैं । विशेष— दे० 'खेड़ी'-१ ।

झुरकुटिया (२)
वि० [अनु०] दुबला पतला । कृश ।

झुरकुन †
संज्ञा पुं० [हिं० झर + कण] किसी चीज के बहुत छोटे छोटे टुकड़े । चूर ।

झुरझुरी
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. कँपकँपी जो जूड़ी के पहले आती है । २. कँपकँपी । कंपन ।

झुरना
क्रि० अ० [हिं० धूल या चूर] १. सूखना । खुश्क होना । दे० 'झुराना' । उ०— हाड़ भई झुरि किंगड़ी नसें भई सब ताँति । रोंव र्रोंव तन धुन उठें कहौं विथा केहि भाँति ।— जायसी (शब्द०) । २. बहुत अधिक दुःखी होना या शोक करना । उ०— (क) साँझ भई झुरि झुरि पथ हेरी । कौन धौं घरी करी पिय फेरी ।— जायसी (शब्द०) ।(ख) इनका बोझ आपके सिर है; आप इनकी खबर न लेंगे तो संसार में इनका कहीं पता न लगेगा । वे बेचारे यो हो झुर झुर कर मर जायँगे ।— श्रीनिवासदास (शब्द०) । ३. बहुत अधिक चिंता, रोग या परिश्रम आदि के कारण दुर्बल होना । घुलना । उ०— (क) ये दोऊ मेरे गाइ चरैया । जानि परत नहिं साँच झुठाई चारत धेनु झुरैया । सूरदास जसुदा मैं चेरी कहि कहि लेति बलैया ।— सूर०, १० ।५१३ । (क) सूनौ कै परम पद, ऊनो कै अनंत मद नूनौ कै नदीस नद इंदिरा झुरै परी ।—देव (शब्द०) ।संयो० क्रि० —जाना । पड़ना (क्व०) । — पु परना । उ०— सिद्धिन की सिद्धि दिगपालन की रिद्धि वृद्धि वेधा की समृद्धि सुरसदन झुरै परीं ।— रघुराज (शब्द०) ।

झरुमुट
संज्ञा पुं० [सं० झुट(=झाड़ी)] १. कई झाड़ों या पत्तों आदि का ऐसा समूह जिससे कोई स्थान ढक जाय । एक ही में मिले हुए या पास पास कई झाड़ या क्षुप । उ०— आनँदघन बिलोदझर झुरमुट लखें बनै न परत भाख्यौ । — धनानंद, पृ० ४४५ । २. बहुत से लोगों का समूह । गिरोह । उ०— खन इक मँह झुरमुट होइ बीता । दर मँह चढे़ रहैं सो जीता ।— जायसी (शब्द०) । ३. चादर या ओढ़ने आदि से शरीर को चारों ओर से छिपाने या ढक लेने की क्रिया । मुहा०— झुरमुट मारना= चादर या ओढ़ने आदि से सारा शरीर इस प्रकार ढक लेना कि जिसमें जल्दी कोई पहचान न सकै ।

झुरवन †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झुरना + वन (प्रत्य०)] वह अंश जो किसी चीज के सूखने के कारण उसमें में निकल जाता है ।

झुरवना पु
क्रि० अ० [हिं० झुरना या झुरना] दुःखी होना । चिंता से क्षीण होना । दे० 'झुरना' । उ०— मन मन झुरवै दुलहिनि काह कीन्ह करतार हो ।— कबीर श०' पृ० २ ।

झुरवाना
क्रि० स० [हिं० झुरना] १. सुखाने का काम दूसरे से से कराना । दूसरे को सुखाने में प्रवृत्त करना । †२. झुराना । उ०— कोउ रंजक झुरवावहिं खोली झारहिं पोछहिं ।— पेरंगघन०, भा० १, पृ० २४ ।

झुरसना
क्रि० अ० क्रि० स० [हिं० झुलसना] दे० 'झुलसना' । उ०— आनँदघन सों उघरि मिलौंगी झुरसति बिरहा झर मैं ।— घनानंद, पृ० ५३३ ।

झुरमाना
क्रि० स० [हिं० झुलसाना] दे० 'झुलसाना' ।

झुरहुरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० झुरझुरी] दे० 'झुरझुरी' ।

झुराना (१) †
क्रि० स० [हिं० झुरना] सुखाना । खुश्क करना ।

झुराना (२) †
क्रि० अ० १. सूखना । २. दुःख या भय से घबरा जाना । दुःख से स्तब्ध होना । उ०— यह बानी सुनि ग्वारि झुरानी । मीन भए मानों बिन पानी ।— सूर (शब्द०) । ३. दुबला होना । क्षीण होना । दे० 'झुरना' । संयो० क्रि० — जाना ।

झुरावन
संज्ञा स्त्री० [हिं० झुरना + वन(प्रत्य०)] वह अंश जौ किसी चीज को सुखाने के कारण उसमें से निकल जाता हैं । झुरवन ।

झुरावना पु
क्रि० स० [हिं० झुराना] दे० 'झुराना' । उ०— मंजन कै नित न्हय कै अंग अँगोछि कै बार झुरावन लागी ।— मति०, पृ० ३८३ ।

झुर्रि
संज्ञा स्त्री० [हिं० झुरना] किसी चीज की सतह पर लंबी रेखा के रूप में उभरा या धँसा हुआ चिह्न जो उस चीज के सूखने, मुड़ने या पुरानी हो जाने आदि के कारण पड़ जाता है । सिकुड़न । मिलवट । शिकत । जैसे, आम पर की झुर्री, चेहरे पर की झुर्रि । क्रि० प्र०— पड़ना । विशेष— बहुधा इसका प्रयोग बहुवचन में ही होता है । जैसे—अब वे बहुत बुड्ढे हो गए, उनके सारे शरीर में झुरियाँ पड़ गई हैं ।

झुलकना पु †
क्रि० अ० [हिं० झुलना] दे० 'झूलना' । उ०—सुरह सुगंधी बास मोती काने झुलकते । सूती मंदिर खास जाणूँ ठोलई जागवी ।— ढोला०, दू० ५०७ ।

झुलका
संज्ञा पुं० [अनु०] दे० 'झुलझुना' ।

झुलना † (१)
संज्ञा पुं० [हिं० झूलना] स्त्रियों के पहनने का एक प्रकार का ढीला ढाला कुरता । झुल्ला । झूला ।

झुलना † (२)
वि० [हिं० झूलना] झूलनेवाला । जो झूलता हो ।

झुलना † (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं० झुलनी + इया (प्रत्य०)] दे० 'झुलनी' । उ०— झुलनियाबाली हँसि कै जियरा लै गैली हमार ।— प्रेमघन०, भा० २, पृ० ३६३ ।

झुलनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० झूलना] १. सोने आदि के तार में गुथा हुआ छोटे छोटे मोतियों का गुच्छा जिसे स्त्रियाँ शोभा के लिये नाक की नथ में लटका लेती हैं अथवा बिना नथ के एक आभूषण की तरह पहनती हैं । २. दे० 'झूमर' ।

झुमनीबोर
संज्ञा पुं० [देश०] धान का बाल ।—(कहारों की परि०) ।

झुलमुल †
वि० [अनु०] दे० 'झिलमिल' । उ०— काननि कनिक पत्र चक्र चमकत चारु ध्वजा झुलमुल झलकति अति सुखदाइ ।—केशव (शब्द०) ।

झुलमुला †
वि० [अनु०] [वि० स्त्री० झुलमुली] दे० 'झिलमिल' । उ०— झीने पट में झुलमुली झलकति झोप अपार । सुरतरु की मुन सिंधु मै लसति सपल्लव डार ।— बिहारी (शब्द०) ।

झुलवना पु
क्रि० स० [हिं० झुलाना] दे० 'झुलौना' । उ०— निकट रहते उद्यपि श्री ललना । कब बाँधै कब झुलबै पलना ।— नंद० ग्रं०, पृ० २५० ।

झुलवा
संज्ञा पुं० [देश०] १. एक क्रकार की कपास जो बहराइच, बलिया, गाजीपुर और गोंड़ा आदि में उत्पन्न होता है । यह अच्ची जाति की हैं पर कम निकलती है । यह जेठ में तैयार होती है, इसलिये इसे जेठवा भी कहते हैं । २. दे० 'झूला' ।

झुलवाना
क्रि० स० [हिं० झूलना] झुलाने का काम दूसरे से कराना । दूसरे को झुलाने में प्रवृत्त करना ।

झुलसना (१)
क्रि० अ० [सं० ज्वल + अंश] १. किसी पदार्थ के ऊपरी भाग या तल का इस प्रकार अंशतः जल पाना कि उसका रंग काला पड़ जाय । किसी पदार्थ के ऊपरी भाग का अधजला होना । झौंसना । जैसे,— यह लड़का अँगीठी पर गीर पड़ा था इसी से इसका सारा हाथ झुलम गया । २. बहुत अधिक गर्मी पड़ने के कारण किसी चीज के ऊपरी भाग का सूखकर कुछ काला पड़ जाना । जैसे,— गरमी के दिनों में कोमर पौधों की पत्तियाँ झुलस जाती हैं । संयो० क्रि० — जाना ।

झुलसना (२)
क्रि० स० १. किसी पदार्थ के ऊपरी भाग या तल कोइस प्रकार अंशतः जलाना कि उसका रंग काला पड़ जाय और तल खराब हो जाय । झौंसना । जैसे— उन्होंने जानबूझ कर अपना हाथ झुलस लिया । २. अधिक गरमी से किसी पदार्थ के ऊपरी भाग को सुखाकर अधजला कर देना । जैसे,— आज दोपहर की धूप ने सारा शरीर झुलसा दिया । संयो० क्रि० — ड़ालना ।—देना । मुहा०— मुँह झुलसना = देखो 'मुँह' के मुहावरे ।

झुलसवाना
क्रि० स० [हिं० झुलसना का प्रे० रूप] झुलसने का काम दूसरे से कराना । दूसरे को झुलसने में प्रवृत करना ।

झुलसाना
क्रि० स० [हिं०] दे० 'झुलसना' । २. दे० 'झुलसवाना' ।

झुलाना
क्रि० स० [हिं० झूलना] हिंड़ोले या झूले मैं बैठाकर हिलाना । किसी को झूलने में प्रवृत्त करना । उ०— रहो रहो नाहीं नाहं अब ना झुलाओ लाल बाबा की सौं मेरो ये जुगल जंघ थहरात ।— तोष (शब्द०) । २. अधर में लटकाकर या टाँगकर इधर उधर हिलाना । बार बार झोंका देकर हिलाना । ३. कोई चीज देने या कोई काम करने कै लिये बहुत अधिक समय तक आसरे में रखना । अनिश्चित या अनिर्णीत अवस्था में रखना । कुछ निष्पत्ति या निपटेरा न करना । जैसे,— इस कारीगर को कोई चीज मत दो, यह महीनों झुलाता है ।

झुलाबना पु †
क्रि० स० [हिं० झुलना] दे० 'झुलाना' उ०— लेइ उछंग कबहुँक हलरावइ । कबहुँ पालने घालि झुलावइ ।—तुलसी (शब्द०) ।

झुलावनि पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झुलाना] झुलाने का भाव या क्रिया ।

झुलुआ †
संज्ञा पुं० [हिं० झूला] दे० 'झूला' ।

झुलौवा पु (१)
संज्ञा पुं० [हिं० झूला(=कुरता)] जनाना कुरता ।

झुलौवा पु † (२)
वि० [हिं० झूलना] जो झूलता या झुलाया जा सकता हो । झूलने या झूल सकनेवाला ।

झलौवा † (३)
संज्ञा पुं० झूलना । पालना । झूला ।

झुल्ला †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'झूला' ।

झुहिरना †
क्रि० अ० [हिं० ?] लवना । लादा जान । उ०— रतन पदारथ नग जो बखाने । धौरन मँह देखे झुहिराने ।— जायसी (शब्द०) ।

झुहिराना †
क्रि० स० [हिं० ?] लादना । वोझ रखना ।

झूँक पु (१)
संज्ञा पुं० [हिं० झोंक] दे० 'झोंका' । उ०— (क) मुहमद गुरु जो विधि लिखी का कोई तेहि फूँक । जेहि के भार जम थिर रहा उड़े न पवन के झूँक ।— जायसी (शब्द०) । (ख) त्यौं पद्माकर पौन के झूँकन क्वैलिया कूकन को सहि लैहैं ।— पद्माकर (शब्द०) ।

झूंक पु † (२)
संज्ञा स्त्री० दे० 'झोंक' । उ०— किकिनी की झमकानि भुलावनि झूँकनि सों झूकि जान कटी की ।— देव (शब्द०) ।

झूँकना पु †
क्रि० स० [हिं०] १. दे० 'झोंकना' । २. दे० 'झखना' ।

झूँका पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'झोंका' । उ०— यह गढ़ छार होइ एक झूँके ।— जायसी(शब्द०) ।

झूँखना पु †
क्रि० अ० [हिं०] 'झोंखना' । उ०— अवनि गनत इकटक मग जोवत तब इतनी नहीं झूँखी ।— सूर (शब्द०) ।

झूँझल
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झुँझलाहट' ।

झूँझा †
वि० [देश०] [वि० स्त्री० झूँझी] इधर की उधर लगानेवाला । चुगलखोर । निंदक ।

झूँटा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० झोंटा] पेंग । दे० 'झोंटा' ।

झूँटा (२)
वि० [हिं० झूठा] दे० 'झूठा' ।

झूँठ †
वि०, संज्ञा पुं० [हिं० झूठ] दे० 'झूठ' ।

झूँठा पु †
वि० [हिं० झूँठ, झूठा झूठो] दे० 'झूठी' । उ०— अँजन अधर धरैं, पीक लीक सोहै आछी काहे को लजात झूँठी सौंह खात ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३५७ ।

झूँठी
संज्ञा स्त्री० [हिं० जुट्टी] वह ड़ंठल जो नील के सड़ाने पर बच रहता है ।

झूँपड़ा पु †
संज्ञा पुं० [देशी झुंपड़ा] दे० 'झोपड़ा' । उ०— सुणि करहा ढोलउ कहइ साची आखे जोइ । अग्गर जेहा झूपड़ा तउ आसंगे मोइ ।— ढोला०, दू० ३१४ ।

झूँवणहार पु †
वि० स्त्री० [?] जोनेवाली । उ०— हिव सूँमर हेरा हुवइ, मारू झूबणहार । पिंगल बोलावा दिया, सोहड़ सो असवार ।— ढोला०, दू० २६७ ।

झूँबना पु †
क्रि० अ० [प्रा० झंप] दे० 'झूपना' । उ०— ढोलउ हल्लाणउ करइ, घण हल्लिवा न देह । झबझब झूँबइ पागड़इ, डबडब नयन भरेह ।— ढोला०, दू० ३०४ ।

झूँमना पु
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'झूमना' । उ०— झूंमत प्यारी मारी पहिरैं, चलत सु कटि लटकाइ ।— नंद ग्रं०, पृ० ३८९ ।

झूँसना (१) †
क्रि० अ० क्रि० स० [हिं० झौंसना] दे० 'झुलसना' ।

झूँसना (२)
क्रि० स० [अनु०] किसी को बहकाकर या दसपट्टी देकर उसका धन आदि लेना । झँसना ।

झूँसा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की घास ।

झूकटी
संज्ञा स्त्री० [हिं० जूट + काँटा] छोटी झाड़ी । उ०— (क) वह झूकटी तिरस्कृत प्रकृती को अनुसरती है ।— श्रीधर पाठक (शब्द०) । (ख) जिमि वसंत न फूल झूकटी तले लखाई ।— श्रीधर पाठक (शब्द०) ।

झूकना पु †
क्रि० अ० [हिं० झूँखना] दे० 'झोंखना' । उ०— (क) जाकौ दीनामाथ निवाजैं । भवसागर मैं कबहुँ न झूकै अभथ निसाने वाजे ।— सूर०, १ ।३६ । (ख) पावस रितु वरसै जब मेहा । झुकति मरौं हौं सुमिरि सनेहा ।— हिं० प्रेमगाथा०, पृ० २२० ।

झूखना पु †
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'झींखना' ।

झूझ पु
संज्ञा पुं० [सं० युद्ध, प्रा० झूझ] दे० 'युद्ध' । उ०— परे खंड़ खंडं निजं सामि अग्गै । न को हारि मन्नै न को झूझ भग्गै ।— पृ० रा०, ९ । १५३ ।

झूझना
क्रि० अ० [हिं० झूझ] दे० 'जुझना' । उ०— साहब कोभावइ नही सो बाट न बूझी रे । साई सो सनमुख रहे इस मन से झूझी रै ।— दादू (शब्द०) ।

झूझाउ पु
वि० [सं० युद्ध, प्रा० झूझ + हिं० आउ (प्रत्य०)] दे० 'जुझाऊ' । उ०— बाजत झूझाउ सिंधू राग सहनाई पुनि सुनत ही काइर की छूटि जात कल है ।— सुंदर० ग्रं० भा० १, पृ० ४८५ ।

झूझार
वि० [हिं० झूझ + आर (प्रत्य०)] [वि० स्त्री० झूझारी पु] दे० 'जुझार' । उ— पँच महारिषि तहाँ कुटवाल । तिनकी तृया महा झूझारि ।— प्राण०, पृ० १६७ ।

झूट
संज्ञा पुं०, वि० [देशी झुठ्ठ] दे० 'झूठ' ।

झूठ (१)
संज्ञा पुं० [सं० अयुक्त, प्रा० अजुत्त अथवा देशी झुठ्ठ] वह कथन जो वास्तविक स्थिति के विपरीत हो । वह बात जो यथार्थ न हो । सच का उलटा । क्रि० प्र०— करना । — बोलना । मुहा०— झूठ सच करना= निंदा करना । शिकायत करना । झूठ का पुल बाँधना= लगातार एक के बाद एक झूठ बोलते जाना । झूठ सच जोड़ना= दे० 'झूठ सच कहना' । यौ०— झूठ का पुतला= भारी झूठा । एकदम असत्य बातें कहने— वाला । झूठमूठ । झूठसच ।

झूठ (२)
वि० [हिं०] दे० 'झूठा' ।—(क्व०) । उ०— मुख संपति दारा सुत हय गय झूठ सबै समुदाइ । छन भंगुर यह सबै स्याम बिनु अंत नाहिं सँग जाइ ।— सूर०, १ ।३१७ ।

झूठ (३) †
संज्ञा स्त्री० [हिं० जूठ] दे० 'जूठन' ।

झूठन
संज्ञा स्त्री० [हिं० जूठन] दे० 'जूठन' ।

झूठमूठ
क्रि० वि० [हिं० झूठ +अनु० मूठ] बिना किसी वास्तविक आधार के । झूठे ही । यों ही । व्यर्थ । जैसे,—उन्होंने झूठमूठ एक बात बनाकर कह दी ।

झूठसच
वि० [हिं०] ठीक बेठीक । जिसमें सत्य और असत्य का मिश्रण हो ।

झूठा (१)
वि० [हिं० झूठ] १. जो वास्तविक स्थिति के विपरीत हो । जो झूठ हो । जो सत्य न हो । मिथ्या । असत्य । जैसे, झूठी बात, झूठा अभीयोग । २. जो झूठ बोलता हो । झूठ बोलने— वाला । मिथ्यावादी । जैसे,— ऐसे झूठे आदमियों का क्या विश्वास । क्रि० प्र० — ठहरना । — निकलना ।— बनना । ३. जो सच्चा या असली न हो । जो केवल रूप और रंग आदि में असली चीज के समान हो पर गुण आदि में नहीं । जो केवल दिखौआ और बनावटी हो या किसी असली चीज के स्थान पर यों ही काम देने, सुभीता उत्पन्न करने अथवा किसी को धोखे में ड़ालने के लिये बनाया गया हो । नकली । जैसे,— झूठे जवाहिरात, झूठा गोटा पट्ठा, झूठी घड़ी झूठा मसाला या काम (जरदोजी का), झूठा दस्तावेज, झूठा कागज । विशेष— इस अर्थ में 'झूठा' शब्द का प्रयोग कुछ विशिष्ट शब्दों के साथ ही हो है ताजिन में से कुछ ऊपर उदाहरण में दिए गए हैं । ४. जो (पुरजे या अंग आदि) बिगड़ जाने के कारण ठीक ठीक काम न दे सकें । जैसे, ताले या खटके आदि का झठा पड़ जाना । हाथ या पैर का झूठा पड़्ना । क्रि० प्र०— पड़ना ।

झूठा (२)
वि० [हिं० जूठा] दे० 'जूठा' ।

झूठामूठी
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'झूठमूठ' ।

झूठों
क्रि० वि० [हिं० झूठा] १. झूठमूठ । यों ही । २. नाम मात्र के लिये । कहने भर को । जैसे,— वे झूठों भी हमें बुलाने के लिये न आए । उ०—झूठों हि दोस लगावे मोहें राजा ।— गीत (शब्द०) ।

झूणि
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार की सुपारी । २. एक प्रकार का अशकुन ।

झुना †
वि० [सं० जीर्ण, प्रा० जूर्ण, गुज० जून] दे० 'झीना' । उ०— (क) तब लो दया बनो दुसहु दुख दारिद्र को साथरी को सोइबो ओढ़वो झूने खेस को ।— तुलसी (शब्द०) । (ख) तेहि वश उड़े झूने सुसीकर परम शीतल तृण परै ।— रघुराज (शब्द०) ।

झूम
संज्ञा स्त्री० [हिं० झूमना, तुल० बँग० 'घूम'] १. झूमने की क्रिया या भाव । ३. ऊँघ । उँघाई । झपकी ।— (क्व०) ।

झूमक (१)
संज्ञा पुं० [हिं० झूमना] १. एक प्रकार का गीत जिसे होली के दिनों में देहात की स्त्रिमाँ झूम झूमकर एक घेरे में नाचती हुई गाती हैं । झूमर । झूमकरा । उ०— लिए छरी बेत सौंधे विभाग । चाचरि झूमक कहै सरस राग ।— तुलसी (शब्द०) । २. इस गीत के साथ होनेवाला नृत्य । ३. एक प्रकार का पूरबी गीत जो विशेषतः विवाह आदि मंगल अवसरों पर गाया जाता है । झूमर । उ०— कहूँ मनोरा झूमक होई । फर औ फूल लिये सबकोई ।— जायसी (शब्द०) । ४. गुच्छा । स्तबक । ५. चाँदी सोने आदि के छोटे छोटे झुमको या मोतियों आदि के गुच्छों की वह कतार जो साड़ी या ओढ़नी आदि के उस भाग में लगी रहती है जो माथे के ठीक ऊपर पड़ता हैं । इसका व्यवहार पूरब में अधिक होता है । ६. दे० 'झुमका' ।

झूमकसाड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० झूमक + साड़ी] १. वह साड़ी जिसके सिर पर रहनेवाले भाग में झुमके या सोने मोती आदि के गु्च्छे टँके हों । २. लँहगे पर की वह ओढ़नी जिसमें सिर के पल्ले पर सोने के पत्ते या मोती के गुच्छे टँके हों ।

झूमकसारी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झूमकसाड़ी' । उ०— (क) लाख टका अरु झूमकसारी देहु दाह को नेग ।— सूर (शब्द०) । (ख) सुनि उमगीं नारी प्रफुलित मन पहिरें झूमकसारी ।—छीत०, पृ० ९ ।

झूमका पु
संज्ञा पुं० [हिं०] १. दे० 'झुमका' । उ०— मरुवा मयारि विरोज लाल लटकत सुंदर सुदर ढरावनो । मोतिन झालरि झमका राजत बिच नील मणि वहु भावनो ।— सूर (शब्द०) । २. दे० 'झूमक' । उ०— पग पटकत लटकत लटवाहू । मटकत भौंहन हस्त उछाहू । अंचल चंचल झूमका ।—सूर (शब्द०) ।

झूमड़
संज्ञा पुं० [हिं० झूमड़] दे० 'झूमर'—६ । उ०— घाट छोड़ नौकाओं के झूमड़ धारा में पड़ चले ।— प्रेमघन०, भा० २, पृ० ११५ ।

झूमड़झामड़
संज्ञा पुं० [हिं० झूमड़] ढकोसला । झूठा प्रपंच । निरर्थक विषय । उ०— अपने हाथे करैं थापना अजया का सिस काटी । सौ पूजा घर लैगो माली मूरति कुत्तन चाटी । दुनियाँ झूमड़िझामड़ि अटकी ।— कबीर (शब्द०) ।

झुमड़ा †
संज्ञा पुं० [हिं०] चौदह मात्रा का एक ताल । दे० 'झूमरा' ।

झूमना (१)
क्रि० अ० [सं० झम्प(=कूदना)] १. आधार पर स्थित किसी पदार्थ के ऊपरी भाग या सिरे का बार बार आगे पीछे, नीचे ऊपर या इधर उधर हिलना । बार बार झोंके खाना । जैसे, हवा के कारण पेड़ों की ड़ालों का झूमना । मुहा०— बादल झूमना = बादलों का एकत्र होकर झुकना । २. किसी खड़े या बैठे हुए जीव का अपने सिर और धड़ को बार बार आगे पीछे और इधर उधर हिलाना । लहराना । जैसे, हाथी या रीछ का झूमना । नशे या नींद में झूमना । उ०— आई सुधि प्यारे की विचारै मति टारै तब, धारै पग मग झूमि द्वारावति आए हैं ।— प्रिया (शब्द०) । विशेष— यह क्रिया प्रायः मस्ती, बहुत अधिक प्रसन्नता, नींद या नशे आदि के कारण होती है । मुहा०— दरवाजे पर हाथी झूमना = इतना अमीर होना कि दरवाजे पर हाथी बँधा हो । इतना संपन्न होना कि हाथी पाल सके । उ०— झूमत द्वार अनेक मतंग जँजीर जड़े मद अंबु चुचाते । — तुलसी (शब्द०) ।झूम झूम कर = सिर और धड़ को आगे पीछे या इधर उधर खूब हिल हिलाकर । लहरा लरहाकर । जैसे— झुम झूमकर पढ़ना, नाचना या (भृत प्रेत आदि बाधाओं के कारण) खेलना ।

झूमना (२)
संज्ञा पुं० १. बैलों का एक रोग जिसमें वे खूँटे पर बँधे इधर उधर सिर हिलाया करते हैं । २. वह बैल जो झूमता हो ।

झूमर
संज्ञा पुं० [हिं० झूमना या सं० युग्म, प्रा० जुम्म + र (प्रत्य०)] १. सिर में पहनने का एक प्रकार का गहना जिसमें प्रायः एक या ड़ेढ अंगुल चौड़ी, चार पाँच अंगुल लंबी और भीतर से पोली सीधी अथवा धनुषाकर एक पटरी होती है । विशेष— यह गहना प्रायः सोने का ही होता है और इसमें छोटी जंजीरों से बँधे हुए घुँघरू या झब्बे लटकते रहते हैं । किसी किसी झूमर में जंजीरों से लटकती हुई एक के बाद एक इस प्रकार दो पथरियाँ भी होती हैं । इसके पिछले भाग के कुंड़े में चाँप के आकार के एक गोल टुकड़े में दूसरी जंजीर या ड़ोरी लगी होती है जिसके दूसरे सिरे का कुंड़ा सिर की चोटी या माँग के पास के बालों में अटका दिया जाता हैं । यह गहना सिर के अगले बालों या माथे के ऊपरी भाग पर लटकता रहता है और इसके आगे के लच्छे बराबर हिलते रहते हैं । संयुक्त प्रदेश (उत्तर प्रदेश) में केवल एक ही झूमर पहना जाता है जो सिर पर दाहिनी ओर रहता है, और यहाँ इसका व्यवहार वेश्याएँ करती हैं, पर पंजाब में इसका व्यवहार गृहस्थ स्त्रियाँ भी करती हैं और वहाँ झूमरों की जोड़ी पहनी जाती है जो माथे पर आगे दोनों ओर लटकती रहती है । २. कान में पहनने का झुमका नामक गहना । ३. झूमक नाम का गीत जो होली में गाया जाता है ।४. इस गीत के हाथ होनेवाला नाच । ५. एक प्रकार का गीत जो बिहार प्रांत में सब ऋतुओं में गाया जाता है । ६. एक ही तरह की बहुत सी चीजों का एक स्थान पर इस प्रकार एकत्र होना कि उनके कारण एक गोल घेरा सा बन जाय । जमघटा । जैसे, नावों का झूमर । क्रि० प्र० —डालना ।—पड़ना । ७. बहुत सी स्त्रियों या पुरुषों का एक साथ मिलकर इस प्रकार घूम घूमकर नाचना कि उनके कारण एक गोल घेरा सा बन जाय । ८. भालू को खड़ा करने पर रस्सी लेकर भागना ।— (कलंदरों की भाषा) । ९. गाड़ीवानों की मोंगरी । १०. झूमरा नामक ताल । दे० 'झूमरा' । ११. एक प्रकार का काठ का खिलौना जिसमें एक गोल टुकड़े में चारों ओर छोटी छोटी गोलियाँ लटकती रहती हैं ।

झूमरा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० झूमर] एक प्रकार का ताल जो चौदह मात्राओं का होता है । इसमें तीन आघात और एक बिराम होता है । +  ० धि धिं तिरकिट, धिं धिं धा धा, तित्ता तिरकिट, धिं धिं धा धा ।

झूमरा पु (२)
वि० [हिं० झूमना] झूमनेवाला । उ०— बहुरि अनेक अगाध दजु सरवर । रस झूमरे, घूमरे तरवर ।— नंद० ग्रं०, पृ० २८५ ।

झूमरि पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झूमर] दे० 'झूमर' ।

झूमरी
संज्ञा स्त्री० [देश०] शालक राग के पाँच भेदों में से एक ।

झूर पु † (१)
वि० [हिं० धूर या चूर] सूखा । खुश्क । शुष्क ।

झूर पु † (२)
वि० [हिं०झूठ] १. खाली । रीता । २. व्यर्थ ।

झूर पु † (३)
वि० [सं० जुष्ट] जूठा । उच्छिष्ट ।

झूर पु (४)
संज्ञा स्त्री० [सं० ज्वल, हिं० झार] १. जलन । दाह । २. परिताप । दुःख । उ०— अजहुँ कहै सुनाइ कोई करें कुबिजा द्वरि । सूर दाहनि मरत गोपी कूबरी के झूरि ।— सूर (शब्द०) ।

झूरणा पु †
क्रि० अ० [हिं० झूर] दे० 'झुराना (२)' । उ०— मन ही माहै झूरणां, रोवै मनही माँहि । मन ही माँहै षाह दे, दादू बाहरि नाहिं ।— दादू०, पृ० ७६ ।

झूरना पु
क्रि० स० [हिं० झूर] दे० 'झुराना' ।

झूरा पु † (१)
वि० [हिं० झूर] १. शुष्क । सूखा । खुश्क । २. खाली । उ०— किंगरी गहै बजाए झूरी । भोंर साझ सिंगी नित पूरी ।— जायसी (शब्द०) । ३. दे० 'झूर' ।

झूरा पु (२)
संज्ञा पुं० १. सूखा स्थान । वह स्थान जो पानी से भींगा न हो । २. जलवृष्टि का अभाव । अवर्षण । सूखा । क्रि० प्र०— पड़ना । ३. न्यूनता । कमी । उ०— करी कराह साज सब पूरा । काढ़हु पूरी परी न झूरा ।—रघुराज (शब्द०) ।

झूरि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० झूर] दे० 'झूर (४)' ।

झुरै (१)पु
क्रि० वि० [हिं० झूर] व्यर्थ । निष्प्रयोजन ।

झूरै (२)पु
वि० दे० 'झूर' । उ०— बाँधि अची डोरी नहिं पूरै । बार बार खीजत रिस झूरै ।— सूर (शब्द०) ।

झूल (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० झूलना] १. वह चौकोर कपड़ा जो प्रायः शोभा के लिये चौपायों की पीठ पर डाला जाता है । उ०— शेर के समान जब लीन्हे सावधान श्वान झूलन ढपान जिन वेग बेप्रमान है ।—रघुराज (शब्द०) । विशेष— इस देश में हाथियों और घोड़ों आदि पर जो झूल डाली जाती है वह प्रायः मखमल की और अधिक दामों की होती है और उसपर कारचोबी आदि का काम किया होता है । बड़े बड़े राजाओं के हाथियों की झूलों में मोतियों की झालरें तक चँकी होती हैं । ऊँटों तथा रथों के बैलों पर भी इसी प्रकार की झूलें ड़ाली जाती हैं । आजकल कुत्तों तक पर झूल ड़ाली जाने लगी है । मुहा०— गधे पर झूल पड़ना = बहुत ही अयोग्य या कुरूप मनुष्य के शरीर पर बहुमूल्य और बढ़िया वस्त्र होना ।—(व्यंग्य) । २. वह कपड़ा जो पहना जाने पर भद्दा और बेहंगम जान पड़े ।— (व्यंग्य) । पु ३. दे० 'झूला' । उ०— मखतूल के झूल झुलावत केशव भानु मनो शनि अंक लिए ।— केशव (शब्द०) ।

झूल † (२)
संज्ञा पुं० [हिं०] झुंड़ । समूह । उ०— जो रखवालत जगत मैं, झाड़ी जंबक झूल ।— बाँकी० ग्रं०, भा० १, पृ० १४ ।

झूल पु (३)
संज्ञा पुं० [हिं०झूलन] झूलते समय झूले को आगे और पीछे झोंका देना । पेंग । उ०— बिच झुरमुट झूला चलत, जल छवै लाँबी झूल ।— घनानंद, पृ० २१५ ।

झूलदंड़
संज्ञा पुं० [हि० झूलना + सं० दण्ड़] एक प्रकार की कसरत जिसमें बारी बारी से बैठक और झूलते हुए दंड़ करते है ।

झूलन (१)
संज्ञा पुं० [हिं० झूलना] १. एक उत्सव । हिंड़ोल । विशेष— इस उत्सव में देवमूर्ति, विशेषतः श्रीकृष्ण या रामचंद्र आदि की मूर्तियों को झूले पर बैठाकर झुलाते हैं और उनके सामने नृत्य गीत आदि करते हैं । यह साधारणतः वर्षा ऋतु में और विशेषतः श्रावण शुक्ला एकादशी से पूर्णिमा तक होता है । २. एक प्रकार का रंगीन या चलता गाना ।

झूलन † (२)
संज्ञा स्त्री० झूलने की क्रिया या भाव ।

झूलना
क्रि० अ० [सं० दोलन] १. किसी लटकी हुई वस्तु पर स्थित होकर अथवा किसी आधार के सहारे नीचे की ओर लटककर बार बार आगे पीछे या इधर उधर हटते बढ़ते रहना । लटक कर बार बार इधर उधर हिलना । जैसे, पंखे की रस्सी झूलना, झूले पर बैठकर झलना । २. झूले पर बैठकर पेंग लेना । उ०—(क) प्रेम रंग बोरी भोरी नवल- किसोरी गोरी झूलति हिंड़ोरे यो सोहाई सखियान मैं । काम झूलै उर में, उरोजन में दाम झूलै स्याम झूलै प्यारी की अन्यारी अँखियान में ।— पद्माकर (शब्द०) । (ख) फूली फूली बेली सी नवेली अलबेली वधू झलति अकेली काम केली सी बढ़ती हैं ।— पद्माकर (शब्द०) । ३. किसी कार्य के होने की आशा में अधिक समय तक पड़े रहना । आसरे में अथवा अनिर्णीत अवस्था में रहना । जैसे— जो लोग बरसो से झूल रहे हैं उनका काम होता ही नहीं और आप अभी से जल्दी मचाने हैं ।

झूलना (२)
वि० [वि० स्त्री० झूलनी] झूलनेवाला । जो झूलता हो । जैसे झूलना पुल ।

झूलना (३)
संज्ञा पुं० १. एक छंद जिसके प्रत्येक चरण में ७,७,७, और ५ के विराम से २६ मात्राएँ और अंत में गुरु लघु होते हैं । जैसे- हरि राम बिभु पावन परम, गोकुल बसत मनमान । २. इसी छंद का दूसरा भेद जिसके प्रत्येक चरण में १०, १० १० और ७ के विराम से ३७ मात्राएँ और अंत में यगण होता है । जैसे,— जैति हिम बालिका अमुर कुल घालिका कालिका मालिका सुरस हेतु । ३. हिंड़ोला । झूला । (क्व०) । उ०— अँबवा की डाली तले आली झूलना डला दे ।—गीत (शब्द०) ।

झूलनि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० झूलना] झूलने का भाव या स्थिति । उ०— हत यह ललित लतन की फूलनि । फूलि फूलि जमुना जल झूलनि ।— नंद० ग्रं०, पृ० ३१९ ।

झूलनी बगली
संज्ञा स्त्री० [हिं० झूलना + बगली] मुगदर की एक प्रकार की कसरत जो बगली की तरह की होती है । विशेष— बगली की अपेक्षा इसमें यह विशेषता है कि पीठ पर से बगल में मुगदर छोड़ते समय पंजे को इस प्रकार उलटना पड़ता है कि मुगदर बराबर झूलता हुआ जाता है । इससे कलाई में बहुत जोर आता है ।

झूलनी बैठक
संज्ञा स्त्री० [हिं० झूलना + बैठक (=कसरत)] एक प्रकार की कसरत । विशेष— बैठक की इस कसरत में बैठक करके एक पैर को हाथी के सूँड़ की तरह झुलाकर और तब उसे समेटकर बैठना और फीर उठकर दूसरे पैर को उसी प्रकार झुलाना पड़ता है । इसमें शरीर के तौलने की विशेष साधना होती है ।

झूलर पु †
संज्ञा पुं० [हिं० झूल] झुंड़ । जमघट । उ०— बालूँबाबा देसणउ जहाँ पाँणी सेवार । ना पाणिहारी झूलरउ ना कूपइ लेकार ।— झोला०, दू० ६६४ ।

झूलरि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० झूलना] झूलता हुआ छोटा गुच्छा या झुमका । उ०— बर बितान बहु तने तनावन । मनि झालरि झूलरि लटकावन ।— गोपाल (शब्द०) ।

झूला
संज्ञा पुं० [सं०दोला] १. पेड़ की ड़ाल, छत या और किसी ऊँचे स्थान में बाँधकर लटकाई हुई दोहरी या चौहरी रस्सियाँ जंजीर आदि से बँधी पटरी जिसपर बैठकर झूलते हैं । हिंड़ोला । विशेष— झूला कई प्रकार का होता है । इस प्रांत में लोग साधारणतः वर्षा ऋतु या पेड़ों की ड़ालों में झूलते हुए रस्से बाँधकर उसके निचले भाग में तख्ता या पटरी आदि रखकर उसपर झूलते हैं । दक्षिण भारत में झूलें का रवाज बहुत है । वहाँ प्रायः सभी धरों में छतों में तार या रस्सी या जंजीर लटका दी जाती है और बड़ै तख्ते या चौकी के चारे कोने से उन रस्सियों को बाँधकर जंजीरों को जड़ देते हैं । झूले का निचला भाग जमीन से कुछ ऊँचा होना चाहिए जिसमें वह सरलता से बराबर झूल सके । झूले के आगे और पीछेजाने और आने को पेंग कहते हैं । झूले पर बैठकर पेंग देने के लिये या तो जमीन पर पैर की तिरछा करे आघात करते हैं या उसके एक सिरे पर खड़े होकर झाँके से नीचे की ओर झुकते हैं । क्रि० प्र०—झूलना ।—ड़ोलना ।—पड़ना । २. बड़े बड़े रस्से, जंजीरों या तारों आदि का बना हुआ पुल जिसके दोनों सिरे नदी या नाले आदि के दोनों किनारों पर किसी बड़े खँभै, चट्टान या बुर्ज आदि में बँधे होते हैं और जिसके बीच का भाम अधर में लटकता और झूलता रहता है । झूलता हुआ पुल । जैसे, लछमन झूला । विशेष— प्राचीन काल में भारतवर्ष में पहाड़ी नदियों आदि पर इसी प्रकार के पुल होते थे । आजकल भी उत्तरी भारत तथा दक्षिणी अमेरिका की छोटी छोटी पहाड़ी नदियों और बड़ी बड़ी खाइयों पर कहीं कहीं जंगली जातियों के बनाए हुए इस प्रकार के पुरानी चाल के पुल पाए जाते हैं । पुरानी चाल के पुल दो तरह के होते हैं—(१) एक बहुत छोटे और मजबूत रस्से के दोनों सिरे नदी या खाई आदि के दोनो किनारों पर की दो पड़ी चट्टानों आदि में बाँध दिए जाते हैं और उनमें बहुत बड़ा बौरा या चौखटा आदि लटका दिया जाता है । ऊपरवाले रस्से को पकड़कर यात्री उसे कभी कभी स्वयं सरकाता चलता है ।(२) मोटी मोटी मजबूत रस्यों का जाल बुनकर अथवा छोटे छोटे ड़ंड़े बाँधकर नदी गी चौड़ाई के बराबर लंबी और ड़ेढ हाथ चौड़ी एक पटरी सी बना लेते हैं और उसे रस्सों में लटकाकर दोनों और रस्सियों से इस प्रकार बाँध देते हैं कि नदी के ऊपर उन्हीं रस्सी और रस्सियों की लटकती हुई एक गली सी बन जाती है । इसी में से होकर आदमी चलते हैं । इसके दोनों सिरे भी नदी के दोनों किनारे पर चट्टानों के बंधे होते है । आजकल यूरोप, अमेरिका आदि की बड़ी बड़ी नदियों पर भी मोटे मोटे तारों और जंजीरों से इसी प्रकार के बहुत बड़े, बढ़िया और मजबूत पुल बनाए जाते हैं । ३. वह बिस्तर जिसके दोनों सिरे रस्सियों में बाँधकर दोनों ओर दो ऊँची खूँटियों या खंभों आदि में बाँध दिए गए हो । विशेष— इस देश में साधारणतः देहाती लोग इस प्रकार के टाट के बिस्तर पेड़ों में बाँध देते हैं और उनपर सोते हैं । जहजों में खलासी लोग भी इस प्रकार के कनवास के बिस्तरों का व्यवहार करते हैं । ३. पशुओं की पीठ पर ड़ालने की झूल । ५. देहाती स्त्रियों के पहनने का ढीला ढाला कुरता । ६. झोंका । झटका ।— (क्व०) । † ७. तरबूज । † ८. स्त्रियों का एक प्रकारा का आभूषण । २. दे० 'झूलना' ।

झूलाना पु †
क्रि० स० [हिं० झुलाना] दे० 'झुलाना' । उ०— तामें श्री ठाकुर जी को ड़ोल झूलाए ।— दो सौ बावन०, भा० १, पृ० २३० ।

झूलौ
संज्ञा स्त्री० [हिं० झुलना] १. वह कपड़ा जससे हवा करके अन्न ओसाया जाता है । परती ।२. खलासियों आदि का जहाजी बिस्तर जिसके दोनों सिरे रस्सियों से बाँधकर दोनों ओर ऊँची खूँटियों या खंभों आदि में बाँध दिए जाते हैं । दे० 'झूला' (३) ।

झूसर पु †
संज्ञा पुं० [सं० युग, हिं० जूआ] वह लकड़ी जो बैलों को नाधने के लिये उनके कंधों पर रखी जाती है । जूआ । उ०— झूसर भार न झल्लही गोधा गावड़ियाँह । इम जस भार न ऊपड़े मोला मावड़ियाँह ।— बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० १५ ।

झूसा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की बरसाती घास । गुलमुला । पलंजी । बड़ा मुरमुरा । विशेष— यह घास उत्तरी भारत के मैदानों में अधिकता से होती है और इसे घोड़े तथा गाय बैल आदि बड़े चाव से खाते है ।

झेँडा पु †
संज्ञा पुं० [सं० जयन्त, हीं० झंड़ा] झंड़ा । ध्वज । उ०— कहे कासी पंडत लाला झेड़े बहुत । पाय दल जावे तहत क्या कलयत खबर ।— दाक्खिनी०, पृ० ४६ ।

झेँप
संज्ञा स्त्री० [हिं०झपना] लाज । शर्म । हया ।

झेँपना
क्रि० अ० [हिं० छिपना] शरमाना । लजाना । लज्जित होना । संयों० क्रि०— जाना ।

झेकना †
क्रि० स० [अनु०] झूकाना । बैठना । उ०— (क) ढोलइ मनह विमासियउ, साँच कहइ छह एह । करह झेकि दोमूँ चढा कूट न संभालेह ।— ढोला०, दू० ६३७ ।(ख) घाली टापर वाग मुखि, झेक्यउ राजदुआरी ।— ढोला०, दू० ३४५ । विशेष— ऊट के बैठने की राजस्थानी में झेकना कहते हैं । ऊँट को बैठाते समय झे झे किया जाता है । उसी के अनुकरण पर यह शब्द बना है ।

झेपना
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'झेंपना' ।

झेर पु (१)
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० देर] बिलंब । देर । उ०— (क) चलहु तुरंत जिनि झेर लगावहु अबही याइ करौ विश्राम ।— सूर (शब्द०) । (ख) काहे को तुम झेर लगावति । दान देहु घर जाहु बेचि दधि तुम ही को वह भावति ।— सूर (शब्द०) ।

झेर पु (२)
संज्ञा पुं० [हिं० छेड़ना] बखेड़ा । झगड़ा । उ०— (क) सूरदास प्रभु रासबिहारी श्री बनबारी वृथा करत काहे झेरे ।— (शब्द०) । (ख) मधुकर समाना ऐसा बैरन ।...नंदकुमार छाँड़ि को लैहै योग दुखन की टेरन । जहाँ न परम उदार नंद सुत मुक्त परो किन झेरन ।— सूर (शब्द०) ।

झेरना पु
क्रि० स० [हिं० झेखना] झेलना । सहना । उ०— कह नृप पद अब ते गहौ गहे रानि सुख झेरि । मन में भयो न मैल कछु लागे सेवन फेरि ।— विश्राम (शब्द०) ।

झेरना (२)
क्रि० स० [हिं० छेड़ना] शुरू करना । आरंभ करना । उ०— मेरी बड़ेरी जाहि झेरी मुरली बहुतेरी वनी ।— गोपाल (शब्द०) ।

झेरा पु
संज्ञा पुं० [हिं० झेर?] १. झंझट । बखेड़ा । झेर । उ०— (क) जीव की जनम का जीवक आप ही आपलेझानि झेरा ।— दादू (शब्द०) । (ख) दीपक मैं धरयो बारि देखत भुज भए चारि हारी हौ धरति करत दिन दिन को झेरो ।— सूर (शब्द०) । (ग) सुंदर बाही बचन है जामहिं कछू विबेक । नातरु झेरा मैं परयो बोलत मानो भेक ।— सुंदर ग्रं०, भा० २, पृ० ७२६ । २. छोटा सोता । फिरी । थौड़े पानीवाला । गढ़ा । † ३. समूह । झुंड़ ।

झेल (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० झेलना] १. पानी में तैरने आदि में हाथ पैर से पानी हटाने की क्रिया । २. हलका धक्का या हिलोरा । उ०— सुरत समुद्र मगन दंपति सो झेलत अति सुख झेल ।— सूर (शब्द०) । ३. झेलने की क्रिया या भाव ।

झेल (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० झेल] बिलंब । देर । झेर । उ०— (क) सब कहँ देखि भूप मणि बोले सुनहु सकल मम है बैना । भये कुमार विवाहन लायक उचित झेल कछु है ना ।— रघुराज (शब्द०) । (ख) झाँकति है का झरोखा लगी लग लागिबे को इहाँ झेल नहीं फिर ।— पद्माकर (शब्द०) ।

झेलना
क्रि० स० [क्ष्वेल(= हिलाना डुलाना)] १. ऊपर लेना । सहारना । सहना । बरदाश्त करना । जैसे, दुःख झेलना, कष्ट झेलना, मुसीबत झेलना । उ०— टूटे पत अकास को कौन सकत है झेलि ।— कबीर (शब्द०) । २. पानी में तैरने या चलने में हाथ पैर से पानी हटाना । पानी को हाथ पैर से हिलाना । उ०— (क) कर पग गहि अँगुठा मुख मेलता प्रभु पौढे़ पालने अकेले हरखि हरखि अपने रंग खेलत । शिध सोचन विधि बुद्धि विचारत वट बाढ्यो सागर जल झेलत ।—सूर (शब्द०) । (ख) बालकेलि को विशद परम सुख सुख समुद्र नृप झेलत ।—सूर (शब्द०) । ३. पानी में हिलना । हेलना । जैसे, कमर तक पानी झेलकर नदी पार करना । ४. ठेलना । ढकेलना । आगे बढ़ाना । आगे चलाना । उ०— दुहुन की सहज विसात दुहूँ मिलि सतरँज खेलत । उर, रुख, नैन चपल अश्व चतुर बाराबर झेलत ।— हरिदास (शब्द०) । † ५. पचाना । हजम करना । ६. सहना । ग्रहण करना । मानना । उ०— पाँयन आनि परे तो परे रहे केती करी मनुहारि न झेली ।— मतिराम । (शब्द०) ।

झेलनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० झेलना] एक प्रकार की जंजीर जो कान के आभूषण का भार सँभालने के लिये बालों में अटकाई जाती है ।

झेली
संज्ञा स्त्री० [हिं० झेलना] बच्चा जनते समय स्त्री को विशेष प्रकार से हिलाने डुलाने की क्रिया । क्रि० प्र० — देना ।

झेलुआ †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'झूला' ।

झैर पु †
संज्ञा पुं० [हिं० जहर] दे० 'जहर' उ०— जपुरनाथ जैसा धाम बेटा तीन पाया । प्याला झैर पाया एक बैटा नै मराया ।—शिखर०, पृ० ७४ ।

झौँक
संज्ञा स्त्री० [सं० युज०युक, युक्त, हिं० झुकना] १. झुकाव । प्रवृत्ति । २. तराजू के किसी पलड़े का किसी और अधिक नीचा होना । मुहा०— झोंक मारना = डाँड़ी मारना । कम तौलना । ३. बोझ । भार । जैसे— इसकी झोंक सब उसी पर पड़ती है । ४. वेग । झटका । तेजी । प्रचंड गति । जैसे— (क) गाड़ी बड़ी झोंक से आ रही थी । (ख) साँड़ आ रहा है कहीं झोंक में पड़ जाओगे तो बड़ी चोट आवेगी । (ग) नशे की झोंक, क्रोध की झोंक, लिखने की झोंक, नींद की झोंक, ५. किसी काम का घूमघाम से उठाना । कार्य की गाति । जैसे— पहली झोंक में उसने इतना काम कर ड़ाला । ६. ठाट । सजावट । चाल । अंदाज । यौ०— नोक झोंक = ठाट बाट । धूम धाम । ७. पानी का हिलोरा । ८. दे० 'झोंका' । ९. दो लड्ढे जो बैल- गाड़ी की मजबूती के लिये दोनों ओर लगे रहते हैं ।

झोँकना
क्रि० स० [हिं० झोंक] १. झटके के साथ एकबारगी किसी वस्तु को आगे की ओर फेंकना । वेग से सामने की ओर डालना । फेंककर छोड़ना । जैसे, भाड़ में पत्ते झोंकना । इंजन में कोयला झोंकना । आँख में धूल झोंकना । संयो० क्रि०—देना । मुहा० — भाड़ झोंकना = (१) भाड़ में सूखे पत्ते आदि फेंकना । २. तुच्छ ब्यवसाय करना (व्यंग्य में) । जैसे— इतने दिन दिल्ली में रहे, भाड़ झोंकते रहे । २. ढकेलना । ठेलना । जबरदस्ती आगे की और बढ़ाना या करना । जैसे— उसने मुझे एकबारगी आगे की ओर झोँक दिया । ३. अंधाधुंध खर्च करना । बहुत अधिक व्यय करना । बहुत अधिक खर्च करना । बहुत अघिक किसी काम में लगाना । जैसे, व्याह शादी में रुपया झोंकना । संयो० क्रि०—देना ।—डालना । ४. किसी अपत्तिया दुःख के स्थान में डालना । भय या कष्ट के स्थान में कर देना । बुरी जगह ठेलना । जैसे—(क) तुमने हमें कहाँ लाकर झोंक दिया, दिन रात आफत में जान पड़ी रहती है । (ख) उसने अपनी लड़की को बुरे घर झोंक दिया । ५. कार्य का बहुत अधिक भार देना । बहुत ज्यादा काम ऊपर डालना । बिना सोचे समझे काम लादना । जैसे— तुम जो काम होता है हमारे ही ऊपर झोंक देते हो । ६. बिना विचारे आरोपित करना । (दोष आदि) मढ़ना । (दोष) लगाना । जैसे—सारा कसूर उसी पर झोंकते हो ।

झोँकरना †
क्रि० अ० [अनु०] १ झौँ झौँ करना । २. बहुत जोर से रोना । ३. झुलस जाना ।

झोँकवा †
संज्ञा पुं० [देश०] भट्ठे या भाड़ में खड़पताई झोंकनेवाला मनुष्य ।

झोँकवाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० झोंकना] १. झोंकने की क्रिया या भाव । २. झोंकवाने की क्रिया या भाव । ३. झोंकने के काम की उजरत । झोंकने की मजूरी ।

झोँकवाना
क्रि० स० [हिं० झोंकना का प्रे० रूप] १. झोंकने का काम करना । २. किसी को आगे की ओर जोर से डालना ।

झोँका
संज्ञा पुं० [हिं० झोंक] १. वेग से जानेवाली किसी वस्तु के स्पर्श का आघात । तेजी से चलनेवाली किसी चीज के छू जाने से उत्पन्न झटका । धक्का । रेला । झपट्टा । २. वेग से चलनेवाली वायु का आघात । हवा का झटका या धक्का । वायु का प्रवाह । हबा का बहाव । झकोरा । जैसे— ठंढी हवा का झोंका आया । ४. पानी का हिलोरा । ५. बगल से लगनेवाला धक्का जिसके कारण कोई वस्तु गिर पड़े या अपने स्थान से हट जाय । रेला । ६. इधर से उधर झुकने या हिलने डोलने की क्रिया । मुहा०— झोंके आना = नींद के कारण झुक झुक पड़ना । ऊँघ लगना । झोंका खाना = किसी आघात यो वेग आदि के कारण किसी ओर झुकना । जैसे, झोंका खाकर गिरना, नींद से झोंका खाना । ७. ठाट । सजावट । चाल । अंदाज । उ०— पहिरे राती चूनरी सिर उपरना सोहै । कटि लहंगा लीलो बन्यो झोंको जो देखि मन मोहै ।— सूर (शब्द०) । ८. कुश्ती का एक पेंच । विशेष— यह पेंच (दाँव) उस समय किया जाता है जब दोनों पहलवानों के हाथ एक दूसरे की कमर पर होते हैं । इसमें एक हाथ विपक्षी के हाथ के बाहर निकालकर मोढे़ पर चढ़ाते और दूसरा बगल से भोढे़ पर ले जाते हैं और फिर झोंकां देकर गिराते हैं ।

झोँकाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० झोंकना] १. झोंकने की क्रिया या भाव । २. झोंकने की मजदूरी ।

झोँकारना †
क्रि० स० [हिं०] कुछ कुछ झुलसा देना । जला देना ।

झोँकिया
संज्ञा पुं० [हिं० झोंकना] भाड़ में पताई आदि झोंकनेवाला । झोंकवा ।

झोँकी
संज्ञा स्त्री० [हिं० झोंक] १. भार । बोझ । जवाबदेही । जैसे— सब झोंकी मेरै ही सिर ? २. भारी अनिष्ट या हानि की आशंका । जोखों । जोखिम । जैसे—दूसरे का माल रखकर झोंकी कौन सहै । क्रि० प्र०— सहना ।

झोँझ पु †
संज्ञा पुं० [देश०] १. खोता । घोंसना । २. कुछ पक्षियों (जैसे, ढेक, गीध आदि) के गले की थैली या लटकता हुआ मांस । ३. खुजली । सुरसुराहट । चुल । मुहा०— झोंझ मारना = खुजली होना । चुल होना ।

झोँझल पु
संज्ञा पुं० [हिं० झुँझलाना] झुँझलाहट । क्रोध । कुढ़न । गुस्सा । क्रि० प्र०—आना ।

झोँट
संज्ञा पुं० [सं० झुएट(=झाड़ी)] १. झाड़ी । २. आड़ । झुर- मुट । ३. समूह । जूरी । जुट्टी । ४. दे० 'झोंटा' । ५. चाल । ठाट । झोंक । अंदाज । उ०— लोचन बिलोच पोच ललिता की ओटन हाव, भाव भरी करत झोंटन पै ललित बात ।— नंद० ग्रं०, पृ० ३७६ ।

झोँटमझोँटा †
संज्ञा पुं० [हिं०] झोंटाझोंटी । उ०— अब झोंटम झोंटा की नौबत आनेवाली है और सारा कसूर मुगलानी का है ।—फिसाना०, भा० ३, पृ० २१४ ।

झोंटा (१)
संज्ञा पुं० [सं० जूट] १. बड़े बड़े बालों का समूह । इधर उधर बिखरे बड़े बड़े बालों का जुट्टा । उ०— हसरे सबद बिवेक लगरी चूतर में सोंटा । आबरूह लै भागु पकरि के कटिहों झोंटा ।— पलटू०, भाग ३, पृ० ८९ । मुहा०— झोंटे पकड़कर काटना, मारना, निकालना, घसीटना या इसी पर्कार का और कुव्यवहार करना = सिर के बाल खींचकर वे सब व्यवहार करना ।—(स्त्रियों के लिये यह अपमान की बात है) । झोंटे खसोटना = सिर के बाल खींचना । यौ०— झोंटा झोंटी = ऐसा लड़ाई झगड़ा या मारपीट जिसमें झौंटा पकड़ने की नौबत आवे । २. जुट्टा । पतली लंबी वस्तुओं का इतना बड़ा समूह जो एक बार हाथ में आ सके ।

झोँटा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० झोंका] १. वह धक्का जो झूले को इधर हिलाने के लिये दिया जाता है । झोंका । पेंग । उ०— (क) ललिता विशाखा देरी झोंटा रीझि अँग न समाति ।— सूर (शब्द०) । (ख) एक समय एकांत वन में ड़ोल झूलत कुंजविहारी । झेंटा देत परस्पर अबीर उड़ावत जारी ।— हरिदास (शब्द०) । मुहा०— झोंटा देना = झूले को बढ़ाने के लिये धक्का देना । पेंग मारना । झोंटा मारना = दे० 'झोंटा देना' । २. झटका । झौंक । चाल । अंदाज ।

झोँटा (३)
संज्ञा पुं० [हिं० ढोटा] १. भैंस का बच्चा । पड़वा । २. भैंसा । महिष ।

झोँटी (१)पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झोंटा] दे० 'झोंटा (१)' —१ । उ०— सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी । लगे घसीटन धरि धरि झोंटी ।— तुलसी (शब्द०) । यौ०— झोंटीझोटा = लड़ाई झगड़ा । दे० 'झोटाझोटी' ।

झोँट (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] 'झोंका (१)' —१ ।

झोँप
वि० [प्रा० झंप, हिं० झाँपना] ढक लेनेवाला । आच्छादित कर लेनेवाला । घना । निविड़ । उ०— सो रहा है झोंप अँधियाला नदी की जाँघ पर ।— हरी घास०, पृ० ४८ ।

झोँपड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० छोपना(=छाना) अथवा प्रा० झंप, हिं० झोंप] [स्त्री० अल्पा० झोपड़ी] वह बहुत छोटा सा घर या मनुष्यों के रहने का स्थान जो विशेषतः गाँवों या जंगलों आदि में कच्ची मिट्टी की छोटी छोटी दीवारों को उठाकर और घास फूस से छाकर बना लेते हैं । कुटी । पर्णशाला । मुहा०— अंधा झोंपड़ा = पेठ । उदर (फकीर०) । अंधे झोपड़े में आग लगना = भूख लगना (फकीर०) ।

झोँपड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० झोपड़ा का स्त्री० अल्पा०] छोटा झोंपड़ा । कुटिया । पर्णशाला । मढ़ी । उ०— कंत बीस लोचन बिलोकिए कुमंत फल ख्याल लंका लाई कपि राँड़ की सी झोंपड़ी ।— तुलसी (शब्द०) ।

झोँपा
संज्ञा पुं० [हिं० झब्बा] झब्बा । गुच्छा । उ०— झूलहिं रतन पाट के झोंपा । साज मदन नेहि का कँह कोपा ।— जायसी (शब्द०) ।

झोक पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झोंक' । उ०— नाम अमल ते मौ मतवाला, झोक में झोक सो आवै ।— सं० दरिया, पृ० ११२ ।

झोखना †
क्रि० स० [हिं० झोंकना] ड़ालना । छोड़ना । देना । उ०— घम झोखे आहुत झाल में जो ।— रघु० रू०, पृ० २१३ ।

झोझ †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झोंझ] १. किसी वस्तु का वह अनावश्यक लटकता हुआ अंश जो फूला फूला थैली जैसा दिखाई दे । उ०— नितम्ब गुरुत्व कपड़ों के झोंझ लटकाकर लाना चाहा ।— प्रेमघन०, भा० २, पृ० २६१ ।

झोझर
संज्ञा पुं० [प्रा० ओज्झर] पचौनी । ओझर ।

झोझा
संज्ञा पुं० [प्रा० ओज्झर] दे० 'औझर' ।

झोटा (१)
संज्ञा पुं० [हिं०] पेग । दे० 'झोंका (१)' । उ०— (क) गाजे घण सुण गावणो, प्याला भर भव पाव । झूले रेशम रंग झड़, झोटा देर झुलाव ।— बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० ८ । (क) कोउ अंचल छोरि कटिं मैं बाँधि कसिकै देत । कोउ किए लावन की कछोटी चढ़त झोटा देत ।— भारतेदु ग्रं०, भा० २, पृ० ११८ ।

झोटिंग (१)
वि० [हिं० झोंटा] झोंटेवाला । जिसके सिर पर बहुत बड़े बड़े और खड़े बाल हों । उ०— मज्जहि भूत पिशाच बैताला । प्रथम महा झोटिंग कराला ।— तुलसी (शब्द०) ।

झोटिंग (२)
संज्ञा पुं० बहुत बड़े बड़े और खड़े बालोंबाला । भूत प्रेत या पिशाच आदि ।

झोड़
संज्ञा सं० [सं० झोड] सुपारी का बृक्ष ।

झोपड़ा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'झोंपड़ा' ।

झोपड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झोपड़ी' ।

झोपरिया पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झोपड़ी + इया (प्रत्य०)] दे० 'झोपड़ी' । उ०—खिरकी बैठ गोरी चितवन लागी, उपराँ झाँप झोपरिया ।— कबीर श०, भा० १, पृ० ५५ ।

झोबाझोब
क्रा० वि० [अनु०] दे० 'झम झम'—१ । उ०— सहजो गुरु ऐसा मिलै सम दृष्टी निलेभि । सिष कूँ प्रंम समुद्र में कर दे झोबाझोब ।—सहजो०, पृ० १२ ।

झोर †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'झोल' ।

झोरई (१) †
वि० [हिं० झोल + ई (प्रत्य०)] जिसमें झोल हो । रसेदार । उ०— सूर करतिर सलस तोरई । सेमि सींगरी छमकि झोरई ।— सूर (शब्द०) ।

झोरई (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० झोल] रसेदार तरकारी ।

झोरना †
क्रि० स० [सं० दोलन] १. झटका देकर हिलाना या कंपाना । उ०— कह्यो कहारनि हमैं न सोरि । नयो कहार चलत पग झोरि ।— सूर (शब्द०) । २. किसी चीज को इस प्रकार झटका देकर बार बार हिलाना जिसमें उसके साथ लगी हुई दूसरी चीजें गिर पड़े । जैसे पेड़ की डाल झोरना । आम झोरना । इमली झोरना, आदि । उ०— झोरि से कौन लए बन बाग ये कौन जु आमन को हरियाई ।— रसकुसुमार (शब्द०) । † नृप्तिपूर्वक भोजन करना । छककर खाना । सयो० क्रि० — डालना । — देना । ३. इकट्ठा करना । एकत्र करना ।— (क्व०) ।

झोरा पु † (१)
संज्ञा पुं० [हिं० झोंरा] गुच्छा । झब्बा ।

झोरा पु † (२)
संज्ञा पुं० [हिं० झोंरा] दे० 'झोला' । उ०— लाल मखमली रुचिर पान को झीरा धारे ।— प्रेमघन०, भा० १, पृ० १२ ।

झोरि पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'झोली' ।

झारी पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० झोली] १. झोली । उ०— (क) भाय करी मन की पद्माकर ऊपर नाय अबीर की झोरी ।— पद्माकर (शब्द०) । (ख) हमारे कौन वेद विधि साधे । बदुआ झोरी दंड़ अधारी इतनेन को आराधै ।— सूर (शब्द०) । २. पेट । झोझर । ओझर । उ०— जो आवै आनगनत करोरी । डारै खाइ भरै नहिं झोरी ।— विश्राम (शब्द०) । ३. एक प्रकार की रोटी । उ०— रोटी वाटी पोरी झोरी । एक कोरी एक घीव चभोरी ।— सूर (शब्द०) । पु ४. रस्सी आदि के जालों या फंदों से युक्त झोला के आकार का बड़ा जाल जिसमें आहत लोगों को उठाकर पहुँचाते थे । दे० 'झोली'-७ । उ०— (क) बद्धाइय दिल्ली नयर अवर सेन जुधमग्ग । घाय घुमत झोरिन घले, श्रवन सुनंतह अग्गि ।— पृ० रा०, ६१ । २४६८ । (ख) वाजीद षांन झोरी धरिय, धाउ पंच रंधर नृपति ।— पृ० रा० १० । ३४ ।

झोल (१)
संज्ञा पुं० [हिं० झालि (= आम का पना)] तरकारी आदि का गाढ़ी रसा । शोरबा । २. किसी अन्न के आटे में मसाले देकर कढ़ी आदि की तरह पकाई हुई कोई पतली लेई । ३. माँड़ । पीच । ४. मुलम्मा या गीलट जो धातुओं पर चढ़ाया जाता है । क्रि० प्र०—करना ।— चढ़ाना ।—फेरना । यौ०—झोलदार ।

झोल (२)
संज्ञा पु० [सं० दोल(दोलन), हिं० झूलना] १. पहने या ताने हुए पकड़ों आदि में वह अंश जो ढीला होने के कारण झूल या लटककर झोले की तरह ही जाता है । जैसे, कुरते या कोट में का झोल, छत की चाँदनी में का झोल आदि । २. कपड़े आदि के ढीले होने के कारण उसके झूलने या लटकने का भाव या क्रिया । तनाव या समाब का उलटा । क्रि० प्र०— डालना ।—निकलना ।— निकालना । — पड़ना । ३. पल्ला । आँचल । उ०— फूली फिरत जसोदा घर घर उबटि कान्ह अन्हवाय अमोल । तनक बदन दोउ तनक तनक कर तनक चरन पोंछत पट झोल ।— सूर (शब्द०) । ४. परदा । ओट । आड़ । उ०— ऊधो सुनत तिहारो बोल । ल्याए हरि कुसलात धन्य तुम घर घर पारयो गोल । कहन देहु कहु करै हमरो बन उठि जैहे झोल । आवत ही याको पहिचान्यो निपटहि ओछो चोल ।—सूर (शब्द०) । ५. हाथी की चाल का एक ऐब जिसके कारण वह बिल्कुल सीधा न चलकर बराबर झूलता हुआ चलता है ।

झौल (३)
वि० १. ढीला । जो कसा या तना न हो । यौ०— झोलझाल = ढीलाढाला । २. निकम्मा । खराब । बुरा ।

झोल (४)
संज्ञा पुं० भूल । गलती । जैसे— गदहे की गौने में नौ मन का भोल ।—(कहा०) ।

झोल (५)
संज्ञा पुं० [हिं० झिल्ली या झोली] १. वह झिल्ली या थैली जिसमें गर्भ से निकले हुए बच्चे या अंडे रहते हैं । जैसे, कुतिया का झोल, मुरगी का झोल, मछली का झोल आदि । बिशेष— इस शब्द का प्रयोग केवल पशुओं और पक्षियों आदि के संबंध में ही होता है, मनुष्यों आदि के संबंध में नहीं । क्रि० प्र०— निकलता ।—निकालना । मुहा०— झोल वैठान = मुरगी के नीचे सेने के लिये अंडे रखना । २. गर्भ । उ०— भक्ति बीज बिनसै नहीं आय परे जो झोल । जो कंचन बिष्ठा परे घटै न ताको माल ।— कबीर (शब्द०) ।

झोल (६)
संज्ञा पुं० [सं० ज्वाल हिं० झाल] १. राख । भस्म । खाक । उ०— (क) तुम बिन कंता धन हरछै (हृदै या हृदै) तृन तृन बरमा जोल । तेहि पर बिरह जराइ के चहै उड़ावा झोल ।— जायसी (शब्द०) । (ख) आगि जो लगी समुद्र में टुटि टुटि खसै जो झोल । रोवै कबिरा डिंभिया मोरा हिरा जरै अमोल ।— कबीर (शब्द०) । २. दाह । जलन ।

झोलदार
वि० [हिं० झोल + फा० दार] १. जिसमें रसा हो । रसेदार । २. जिसपर गिलट या मुलम्मा किया हो । ३. झोल संबंधी । ४. जिसमें झोल पड़ता हो । ढीलाढाला ।

झोलना
क्रि० स० [सं० ज्वलन] जलाना । उ०— हमको तुझ बिन सबै सतावत ।......पूछ पूछ सरदार सखन के इहि बिधि दई बड़ाई । तिन अति बोल झोलि तनु डारयो अनल भँवर की नाई ।— सूर (शब्द०) ।

झोला (१)
संज्ञा पुं० [हिं० झलना वा सं० चोल] [स्त्री० अल्पा० झोली] १. कपड़े की बड़ी झोली या थैली । २. ढीलाढाला गिलाफ । खोली । जैसे, बंदूक का झोला । ३. साधुओं का ढीला कुलता । चोला । ४. बात का एक रोग जिसमें कोई अंग (जैसे, हाथ पैर आदि) ढीला पड़कर बैकाम पड़ जाता है । एक प्रकार का लकवा या पक्षाघात । मुहा०—किसी को झोला मारना = (१) बात रोग से किसी अंग का बेकाम हो जाना । पक्षाघात होना । (२) सुस्त पड़ जाना । बेकाम हो जाना । ५. पेड़ों कि पाला लू आदि के कारण एकबारगी कुम्हला जाने या सूख जाने का रोग । क्रि० प्र०— मारना । ६. झटका । आघात । धक्का । झोंका । बाधा । आपत्ति । उ०— पाकी खेती देखिके गरवै कहा किसान । अजहूँ झोला बहुत है घर आवै तब जान ।— कबीर (शब्द०) । ७. हाथ का संकेत । इशारा । ८. पाल की गोन या रस्सी को झटका देने या ढीलने की क्रिया ।

झोला (२) †
संज्ञा पुं० [हिं० झलना] झोंका । झँकोरा । हिलोर । ल०—कोई खाहिं पवन कर झोला । कोई करहिं पात अस डोला ।—जायसी (शब्द०) ।

झोलाहल
संज्ञा पुं० [सं० जाज्वल्, प्रा० झलहल] (युद्ध की) चमक । दीप्ति । प्रकाश । उ०—हय हिंसहि गज चिकरि मगर सम दिष्षि कुलाहल । बलि पंषिनि बेताल नंदि नंदिय झोलाहल ।—पृ० रा०, ८ ।५४ ।

झोलिका
संज्ञा स्त्री० [हिं० झोली] दे० 'झोली' । उ०—ऊधम अति होत जात घुँघट मैं नहिं लाखत छूटत बहुरंग उड़त अबिर झोलिका ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ३६३ ।

झोलिहारा
संज्ञा पुं० [हिं० झोली + हारा (प्रत्य०)] १. झोली लटकानेवाला । २. कहार । (सोनारों की बोली) ।

झोली (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० झूलना] १. इस प्रकार मोड़कर हाथ में लिया या लटकाया हुआ कपड़ा कि उसके नीचे का भाग एक गोल बरतन के आकार का हो जाय और उसमें कोई वस्तु रखी जा सकै । कपड़े को मोड़कर बनाई हुई थैली । धोकरी । जैसे, गुलला की झोली, साधुओं की झोली । विशेष—यह किसी चौखूँटे कपड़े के चारों कोनों को लेकर इकट्ठा बाँधने से बन जाती है । कभी कभी इसके नीचे के खुले हुए चारों कोनों को कुछ दूर तक सी भी देते हैं । मुहा०—झोली छोड़ना = बुढ़ापे के कारण शरीर के चमड़े का झूल जाना । झोली डालना = भिक्षा माँगने के लिये झोली उठाना । साधु या भिक्षुक हो जाना । झोली भरना = साधु को भरपूर भिक्षा देना । २. घास बाँधने का जाल । ३. मोट । चरसा । पुर ४. वह कपड़ा जिससे खलिहान में अनाज में मिला हुआ भूसा उड़ाकर अलग किया जाता है । ५. बौंरा । कुशती का एक पेंच । विशेष—यह पेंच उस समय किया जाता है । जब विपक्षी किसी प्रकार अपनी पीठ पर आ जाता है । इसमें एक हाथ उलटकर उसकी कमर पर देते हैं और दूसरे से उसकी टाँगों की संधि पकड़ कर उठाते हैं । ६. सफरी बिस्तर जो चारों कोनों पर लगी हुई रस्सियों के द्वारा खंभे पेड़ आदि में बाँधकर फैलाया जाता है । ७. रस्सियों का एक प्रकार का फंदा जिसके द्वारा भारी चीजों को उठाते हैं ।

झोली (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० ज्वाला या झाला] राख । भस्म । मुहा०—झोली बुझाना = सब काम हो चुकने पर पीछे उसे करने चलना । कोई बात हो जाने पर व्यर्थ उसके संबंध में कुछ करना । जैसे,—पंचायत तो हो चुकी क्या झोली बुझाने आए हो ? विशेष—यह मुहावरा घर जलने की घटना से लिया गया है अर्थात् जब घर जलकर राख हो गया तब पानी लेकर बुझाने के लिये पहुँचे ।

झौँझट पु †
संज्ञा पुं० [हिं० झंझट] दे० 'झंझट' ।

झाद
संज्ञा पुं० [हिं० झोंझ] पेट । उदर । उ०—कोई कर्म बिहीन या नासा बिन कोई । झौंद फुटे कोई पेड़ स्वासा बिनु होई ।—सूदन (शब्द०) ।

झौँर पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० युग्म, प्रा० जुम्म, हिं० झूमर] १. झुंड । समूह । उ०—छकि रसाल सौरभ सने मधुर माधुरी गंध । ठौर ठौर झौंरत झपत झौंर झौंर मधु अंध ।—बिहारी (शब्द०) । २. फुलों, पत्तियों या छोटे छोटे फलों का गुच्छा । उ०— दाख कैसी झौंर झलकति जोति जोबन की चाटि जाते भौंर जो न होती रंग चंपा की ।—(शब्द०) । ३. एक प्रकार का गहना जिसमें मोतिया या चाँदी सोने के दानों के गुच्छे लटकते रहते हैं । झब्बा । उ०—कलगी तुर्रा झौंर जग्ग सरपेच सुकुंडल ।—सुर (शब्द०) । ४. पेड़ों या झाड़ियों का घना समूह । झापस । कुंज । उ०—बंस झौर गंभीर भीतिकर नहिं सूझत दस आसा ।—रघुराज (शब्द०) । ५. दे० 'झाँवर' ।

झौँर पु (२)
संज्ञा स्त्री० [अनु०] झंझट । उ०—तुम काहे को झौंर करौ इतनी, नहिं काज है लाज हिये मढ़िबे को ।—नट० पृ० ५४ ।

झौँरना
क्रि० अ० [अनु०] १. गूँजना । गुंजारना । उ०—छकि रसाल सौरभ सने मधुर माधुरी गंध । ठौर ठौर झौंरत झँपत झौंर झौंर मधु अंध ।—बिहारी (शब्द०) । २. दे० 'झौरना' ।

झौँरा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'झौंर' ।

झौँराना (१)
क्रि० अ० [हिं० झौवाँ या झाँवरा] १. झँवरे रंग का हो जाना । बदरंग हो जाना । काला पड़ जाना । २. मुरझाना । कुम्हलाना ।

झौँराना पु (२)
क्रि० अ० [हिं० झूमना] इधर उधर हिलना । झूमना । उ०—साँठिहिं रंक चलै झौंराई । निसँठ राव सब कह बौराई ।—जायसी (शब्द०) ।

झौँसना
क्रि० स० [हिं०] दे० 'झुलसना' । उ०—नाम लै चिलात बिललात अकुलात अति तात तात तौंसियत झौंसियत झारहीं ।—तुलसी (शब्द०) ।

झौनी †
संज्ञा स्त्री० [देश०] टोकरी । दौरी ।

झौर
संज्ञा पुं० [अनु० झाँव झाँव] १. झंझट । बखेड़ा । हुज्जत । तकरार । हौरा । विवाद । उ०—(क) नहीं ढीठ नैनन ते और । कितनों मैं बरजति समझावति उलटि करत हैं झौर ।—सूर (शब्द०) । (ख) महरि तुम ब्रज चाहति कछु और । बात एक मैं कही कि नाहीं आप लगावति झौर ।— सूर (शब्द०) । २. डाँट । फटकार । कहासुनी । ऊँचा नीचा । उ०—और को केतउ झौर सहै पै न बावरी रावरी आस भुलैहै ।—द्विजदेव (शब्द०) ।

झौरना
क्रि० स० [हिं० झपटना] छोप लेना । दबा लेना । झपट कर पकड़ना । उ०—इती भाषि कै दुग्ग त्यों बीर दौरयौ । मृगाधीश ज्यों मृग्ग कै जूह झौरयौ ।—सूदन (शब्द०) ।

झौरा
संज्ञा पुं० [अनु० झावँ झावँ] झंझट । बखेड़ा । हुज्जत । तकरार । हौरा । विवाद । क्रि० प्र०—करना ।—मचाना । यौ०—हौरा झौरा ।

झौरी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० झोल] दे० 'झोलै' । उ०—उलटा कुंभ भरे जल नाहीं बगुला खोजै झौरी ।—सं० दरिया, पृ० १२७ ।

झौरे
क्रि० वि० [हिं० धौरे] १. समीप । पास । निकट । २. साथ । संग । उ०—सौरे अंग सुझत न पोरे खोलि दौरे राति अधिक लौ राधिका के झौरे ई लगे रहैं ।—देव (शब्द०) ।

झौल
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'झोल' । उ०—यह नर गरम झुलइया देखि माया को झौल ।—कबीर सा०, पृ० ५४३ ।

झौवा †
संज्ञा पुं० [हिं० झावा] रहठे की बनी हुई वह छोटी दौरी जिसमें मजदूर लोग खोदी हुई मिट्टी भरकर फेंकने के लिये ले जाते हैं । खँचिया ।

झौहाना
क्रि० अ० [अनु०] १. गुर्राना । २. जोर से चिड़चिड़ाना । क्रोध में झल्लाना ।

झयूलना पु †
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'झूलना' । उ०—यँऊ आए फिर वासुदेव बोले । ज्यों आनंद मद सूँ झ्यूले ।—दक्खिनी०, पृ० १२२ ।