विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/फ

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हिंदी वर्णामाला में बाईसवाँ व्यंजन और पवर्ग का दूसरा वर्ण। इसके उच्चारण का स्थान ओष्ठ है और इसके उच्चारण में आभ्यंतर प्रयत्न होता है। इसे उच्चारण करने मे जीभ का अगला भाग होठों से लगता है। इसलिये इसे स्पर्श वर्ण कहते हैं। इसके बाह्य प्रयत्न, सवार, श्वास और अधोष हैं। इसकी गिनती गहाप्राण में होती है। प, व, भ और म इसके सवर्ण है।

फंक †
संज्ञा स्त्री० [हि० फाँक] दे० 'फाँक'। उ०— सिद्ध सो समृद्ध पाय सिद्ध से आधाय रहे केते परसिद्ध सब अंगन की करै फंक।—गोपाल (शब्द०)।

फंका
संज्ञा पुं० [हि० फाँकना, फाँक] [स्त्री० फकी] १. सूखे दाने या बुकनी की उतनी मात्रा। जितनी एक बार मुँह में फाँकी जा सके। मुहा०— फंका करना = नाशा करना। नष्ट करना। फंका मारना = मुंह में फंका ड़ालना। २. कतरा। टुकड़ा। खंड। उ०— केते घर घर के आयुध करके केते सरके संक भरे। तेहि सूरज वंका दै रन हंका करि अरि फाँकी दूरि करे।—सूदन (शब्द०)।

फंकी (१)
संज्ञा स्त्री० [हि० फांक] १. चूर्ण आदि की पुड़िया जो सूखी फाँकी जाय। फाँकने की दवा। २. उतनी दवा जितनी एक बार में फाँकी जाय।

फंकी ‡ (१)
संज्ञा स्त्री० [हि० फाँक] छोटी फाँक। छोटा टुकड़ा।

फंग पु
संज्ञा पुं० [सं० बन्ध या पञ्ज] १. बंधन। फंदा। उ०—(क) जाहु चली मैं जानी तोकों। आजुहि पढ़ि लीनी चतुराई कहा दुरावति मोकों। एही ब्रज तुम हम नँदनंदन दूरि कतहुँ नहि जँहो। मेरे फंग कबहुँ तो परिहो मुजरा तबहीं दैहो।—सूर (शब्द०)। (ख) शोभा सिंधु संभव से नीके नीके नग है मातु पितु भाग बस गए परि फंग है।—तुलसी (शब्द०)। २. राग। अनुराग। उ०—सुनत सखी तँह दोरी गई। सुने श्याम सुखमा के आए धाई तरुणि नई। कोउ निरखति मुख कोउ निरखति अंग कोउ निराखति रँग और। रेनि फंग कहुँ पगे कन्हाई कहति सबै करि रोर।— सूर (शब्द०)।

फंजिका
संज्ञा स्त्री० [सं० फञ्जिका] १. भारंगी या ब्रह्मण यष्टिका नाम का क्षुप। २. देवसाड़। ३. जवासा। हिगुवा। ४. दंती वृक्ष।

फंजिपत्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं० फञ्जिपत्रिका] मूसाकानी।

फंजी
संज्ञा स्त्री० [सं० फञ्जिन्] १. भारंगी या ब्रह्मनिष्ठा नामक क्षुप। २. मजीठ। ३. दंती वृक्ष।

फंट ‡
संज्ञा पुं० [देशज] दे० 'फर्णी'।

फंड (१)
संज्ञा पुं० [अं०] वह घन या संपत्ति जो किसी नियत काम में लगाने के लिये एकत्र की जाय। कोश।

फंड (२)
संज्ञा पुं० [सं० फण, प्रा० फड] साँप का फण।

फंड (३)
संज्ञा पुं० [सं० फण्ड] पेडू। पेटी। पेट [को०]।

फंद
संज्ञा पुं० [सं० बन्ध, हि० फंदा] १. बंध। बंधन। उ०— (क) जा का गुरु है अंधरा चाला खरा निरंध। अंधे को अँधा मिला परा काल के फंद।—कबीर (शब्द०)। (ख) सुनत वचन प्रिय रसाल जागे अतिशय दयाल भागे जंजाल विपुल दुख कर्दम टारे। त्यागे भ्रम फंद द्वंद निरखि के मुखारविंद सूरदास अति अनंद मेटे मद भारे।— सूर (शब्द०)। २. रस्सी या बाल आदि का फँदा। जाल। फाँस। उ०— (क) यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि बिहँसि उठी मति मंद। भूषन सजति विलोकि मृग मनहु किरतिनि फंद।—तुलसी (शब्द०) (ख) हरि पद कमल को मकरंद। मलिन मति मन मधुप परि हरि विषय नर रस फंद।—(शब्द०)। ३. छल। धोखा। उ०— हनिहीं निशाचर वृंद। बचिहैं न करि बहु फंद।— रघुराज (शब्द०)। ४. रहस्य। मर्म। उ०— पंडित केरी पोथियाँ ज्यों तीतर को ज्ञान। औरन शकुन बतावहीं अपना र्फद न जान।— कबीर (शब्द०)। ५. दुःख। कष्ट। उ०— शिव शिव जपत मन आनंद। जाहि सुमिरे विघन विन- शत कटत जम को फंद (शब्द०)। ६. नथ की काँटी फँसाने का फँदा। गूँज। उ०—मदमाती मनोज के आसव सों अँग्र जासु मनों रँग केसरि को। सहजे नथ नाक ते खोलि धरी कह्यो कौन धों फंद या सेसरि की।— कमलपति (शब्द०)।

फंदना पु (१)
क्रि० अ० [सं० बन्धन वा हिं० फंदा] फंदे में पड़ना। फँसना। उ०—(क) आस आस जग फंदियों रहै उरध लपटाय। राम आस पूरन करे सकल आस मिट जाय।— कबीर (शब्द०)। (ख) मोको निंदि पर्वतहि बंदत। चारौ कपट पंछि ज्यों फंदत।—सूर (शब्द०)।

फंदना (२)
क्रि० सं० [हि० फाँदना] फाँदना। लाँघना। उल्लंघन करना।

फंदरा
संज्ञा पुं० [हिं० फंद + रा (स्वा० प्रत्य०)] दे० 'फंदा'।

फंदवार
वि० [हिं० फंदा] जो फंदा लगावे। फंदा लगानेवाला।

फंदा
संज्ञा पुं० [सं० पाशा वा बन्ध] १. रस्सी या बाल आदि की बनी हुई फाँस। रस्सी, तागे आदि का घेरा जो किसी को फँसाने के लिये बनाया गया हो। फनी। फाँद। मुहा०— फंदा देना या लगाना = गाँठ लगाकर फंदा तैयार करना। यौ०— फंददार = एक प्रकार की बेल जो गलीचे और कसींदे आदि में बुनी या काढ़ी जाती है। २. पाश । फाँस। जाल। उ०—(क) अक्षर आस ते फंदा परे। अक्षर लखे तो फंदा टरे।—कबीर (शब्द०)। (ख) ठगति फिरति ठगिनी तुम नारि।...फँसिहारिनि, बटपारिनि हम भई आपुन भए सुधर्मा भारि। फंदा फाँस कमान बान सौ, काहूँ देख्यो डारत मारि।— सूर, १०। १५८१। मुहा०—किसी पर फंदा पड़ना = जाल पड़ना। फँसना। फंदा लगना = (१) जाल फैलना। (२) ढंग लगना। धोखा चल जाना। जैसे,— इनपर तुम्हारा फंदा नहीं लगेगा। फंदा लगाना = (१) जाल फैलाना। किसी की फसाना के लिये जाल लगाना। (२) किसी को अपनी चाल में लाने का प्रयत्न करना। धोखा देना।फंदे में पढ़ना =(१) धोखे में पड़ना। जाल में फँसना। (२) वशीभूत होना। किसी के वश में होना। ३. बंधन। दुःख। कष्ट। उ०— परिवा छट्ठ एकादस नंदा। दुइज सत्तिमी द्वादस फंदा।— जायसी (शब्द०)।

फंदावली पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० फंद] दे० 'फंदा'। उ०— सुनहु काल ज्ञान को संधी। छोरों जीव सकल की फंदी।—कबीर सा०, पृ० ८०७।

फंध पु †
संज्ञा पुं० [हि० फंद या फंदा] दे० 'फंद'। उ०— कबीर माया पापणी फंध ले बैठी हाटि। सब जग चौ फंधै पड़्या गया कबीरा काटि।—कबीर ग्रं०, पृ० ३२।

फंधा †
संज्ञा पुं० [हि० फंदा] दे० 'फंदा'। उ०—(क) पुनि ओर अनेक सुगंधा। ये सकल जीव को फंधा।— सुंदर ग्रं०, भाग० १, पृ० १२८। (ख) सब जग परयो काल के फंधा। बहु विधि तिनको बाँधे बंधा।—कबीर सा०, पृ० ४५६।

फंध्या †
संज्ञा पुं० [हि० फंदा] दे० 'फंदा'। उ०— यही बचन में सब जग बंध्या। नाम विना नहिं छूटत फंध्या।—कबीर सा०, पृ० १०१३।

फंफाना पु
क्रि० अं० [प्रा० फंफ(= उछलना)] फों फों करना फुंकारना। फुफकारना। उ०— अबलंबने गोरी तोरए जाए, कर कंकन फनि उठ फंफाए।—विद्यापति, पृ० ५१३।

फंस ‡
संज्ञा पुं० [देश० या सं० पाश] शाखा। टहनी। उ०— पश्चिम की ओर मार्ग दो फँसों में फूटा है।—झाँसी०, पृ०, १५९।

फँकनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फाँकना] वह दवा आदि जो फाँककर खाई जाय। चूर्ण। फंकी। क्रि० प्र०—फाँकना।

फँग पु
संज्ञा पुं० [सं० बन्ध] फंग। बंधन। फंदा। उ०— जमुना चली राधिका गोरी। युवति वृंद बिच चतुर नागरी देखे नंदसुअन तेहि हेरी। ब्याकुल दशा जानि मोहन की मन ही मन डरपी उनकी री। चतुर काम फँग परे कन्हाई अब धौं इनहिं वुझावै को री।—सूर (शब्द०)।

फँद पु
संज्ञा पुं० [हि० फंद] दे० 'फंद'। उ०— जनु अकुलात कमल मंडल मे फँदे फँदन जुग खंजन।—नंद० ग्रं०, पृ० ३८४।

फँदना पु (१)
क्रि० अ० [सं० बन्धन या हि० फंदा] फंदे या बंधन में पड़ना। फँसना। उ०— (क) प्रान पखेरू परे तलफैं लखि रूप चुगो सु फँदे गुन गाथन।— आनंदघन (शब्द०)। (ख) दुहुं ओर सो फाग मड़ी उमड़ी जहाँ श्री चढ़ी भीर ते भारी भिरी। धधकी दे गुलाल की धूधुर में धरी गोरी लला मुख मीडि सिरी। कुच कंचुकी कोर छुए छरकै पजनेस फँदी फरकै ज्यौं चिरी। झरपै झपै कौंध कढ़ै तरिता तरिपै मनी लाल घटा में घिरी।— पजनेस, पृ० १६।

फँदना पु (२)
क्रि० सं० [हिं० फाँदना] फाँदना। लाँघना। उल्लं- घन करना। उ०— बढयो बीर राजा करे जोर हल्ला। फंद्यो धाय खाई करयो लोग हल्ला।—सूदन (शब्द०)।

फँदवार पु
वि० [हिं० फंद + वार] जो फंद या फंदा लगाए। फंदा लगानेवाला। उ०—(क) पायन धरा ललाट तिन बिनय सुनहू हो राय। अलक परी फँदवार है कैसहि तजै न पाय।—जायसी (शब्द०)।(ख) अस फँदवार केस वै परा सीस के फाँद। अष्टाकुली नाग सब उरझे केस के बाँद।— जायसी (शब्द०)।

फँदवारि पु
वि० स्त्री० [हि० फंद + वारी] फंदा लगानेवाली। फंदा डालनेवाली। उ०—परम प्रेम फँदवारि है प्यारिनि गहि आन।—घनानंद, पृ० ४५५।

फँदाना (१)
क्रि० सं० [हिं० फंदना] फंदे में लाना। जाल में फंसाना। उ०—(क) लसत ललित कर कमलमाल पहिरावत। काम फंद जनु चंदहि बनज फँदावत।—तुलसी (शब्द०)। (ख) मेरै माई लोभी नैन भए। कहा करौं ये कह्यौ न मानत बरजत ही जु गए। रहत न घूँघट ओट भवन में पलक कपाट दए। लए फँदाइ विहंगम झानों मदन ब्याध बिधए।—सूर०, १०। २२९८। (ग) अलक डोर मुख छबि नदी बेसर बंसी लाई। दै चारा मुकतानि को मो चित चली फँदाई।—मुबारक (शब्द०)। (घ) जीवहिं राखे फंद फंदाई। शब्द बान महँ मारो जाई।— कबीर सा०, पृ० ८३१।

फँदाना पु (२)
क्रि० अ० [हिं० फंदना] फँसना। फंदे में आना। उ०—(क) पाप पुन्य महँ सबै फँदाना। यहि विधि जीव सबै उरझाना।—कबीर सा०, पृ०, ४५। (ख) फँद अनेकन सकल फँदना। मूरख जीव शब्द नहिं माना।— कबीर सा०, पृ० २७३।

फँदाना (३)
क्रि० सं० [सं० स्पन्दन, फन्दन] उछालना। कुदाना। फाँदने का काम दूसरे से करना। उ०— उनके पीछे रथों के ताँते दृष्टि आते थे, उनकी पीठ पर घुड़चढ़ों के यूथ के यूथ वर्ण वर्ण के घोड़े गोटे पट्टे वाले गजगान पाखर डाले, जमाते ठहराते नचाते कुदाते, फँदाते ले जाते थे।— लल्लू (शब्द०)।

फँदाना पु † (४)
क्रि० सं० [हि० फानना का प्रे० रूप] तैयार कराना। सजवाना। उ०—(क) जल्दी से डोलिया फँदाय माँगे बलमु।— कबीर० श०, भा० २ पृ० १०४। (ख) राँध परोसिनि भेंटहूँ न पायों, डोलिया फँदाए लिए जात हो।— घरनी०, पृ० ३४। (ग) सत गुरु डोलिया फँदावल लगें चार कहार हो।— धरनी०, पृ० ४७।

फँदैत †
संज्ञा पुं० [हिं० फँदा + ऐत (प्रत्य०)] वह सिखाया हुआ पशु या पक्षी जो किसी प्रकार अपनी जाति के अन्य़ पशुओं या पक्षियों आदि को मालिक के जाल या फंदे में फँसाता हो।

फँधाना पु
क्रि० अ० [हि० फंदना] दे० 'फँदना'। उ०— कृपन जु गृह ममता करि बँधे। चलि न सकता दृढ़ फंदनि फँधे।— नंद०, ग्रं०, पृ० २४४।

फँफाना †
क्रि० अं० [अनु०] १. शब्द उच्चारण के समय जिह्वा। का काँपना। हकलाना। उ०— झोला बाइ सों फँफात। बोला काल ज्यों हँकात।—सूदन (शब्द०)। २. आग पर खौलते द्रव्य का फेन छोड़कर ऊपर उठना।

फँसड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फाँस + ड़ी (प्रत्य०) फाँस। बंधन। फंदा। उ०— ऋणी हो जाने से किसान के गले की फँसड़ी महाजन के हाथ हो जाती है।— प्रेमघन०, भा० २, पृ० २९७।

फँसना
क्रि० सं० [सं० पाशा० हि० फाँस] १. बंधन में पड़ना। पकड़ा जाना। फंदे में पड़ना। उ०— हाय, संसार छोड़ा भी नहीं जाता। सब दुःख सहती हूँ पर इसी में फँसी पड़ी हूँ।—हरिश्चंद्र (शब्द०)। २. अटकना। उलझना। जैसे, काँटे में फँसना, दलदल में फँसना, काम में फँसना। उ०—(क) यही कहे देता है कि तू किसी की प्रीति में फँसी है।— हरिश्चंद्र (शब्द०)। (ख) ऐसी दशा रघुनाथ लखे यहि आचरजै मति मेरी फँसे।— रघुनाथ (शब्द०)। मुहा०— किसी से फँसना = किसी से प्रेम होना। किसी से अनुचित संबंध होना। बुरा फँसना = आपत्ति में पड़ना। विपत्ति में पड़ना। उ०— हा ! मेरी सखी वुरी फँसी।— हरिश्चद्र (शब्द०)।

फँसनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फँसना] एक प्रकार की हथोड़ी जिससे कसेरे लोटे गगरे आदि का गला बनाते हैं।

फँसरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० फाँस + रा (प्रत्य०)] १. फंदा। २. फाँसी।

फँसाऊ
वि० [हि० फँसाना + आऊ (प्रत्य०)] फँसानवाला।उ०— आँख उठाकर भी फँसाऊ और बतोलिये उपदेशक की ओर नहीं।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० २७५।

फँसान
संज्ञा स्त्री० [हिं० फँसना + आन (प्रत्य०)] दे० 'फँसाव'।

फँसाना
क्रि० स० [हिं० फँसना] १. फंदे में लाना या अट- काना। बझाना। उ०—और जो कदाचि काहू देवता को होय छल तौ तो ताहि नीके ब्रह्म फाँस सों फँसाइयो।— हनुमान (शब्द०)। २. वशीभूत करना। अपने जाल या वश में लाना। जैसे,— इन्होंने एक मालदार असामी को फँसाया है। ३. अटकना। बझाना। उ०— गायगो री मोहनी सुराग बाँसुर के बीच कानन सुहाय मार मंत्र को सुनायगो। नायगो री नेड़ ड़ोरी मेरे गर में फँसाय हदय थली बीच चाय बोलि को बँधायगो।— दीनदयाल गिरि (शब्द०)।

फँसाव
संज्ञा पुं० [हिं० फँसाना + आव (प्रत्य०)] फँसने का भाव या स्थिति। फँसना। २. ऐसी बात या स्थिति जिससे बचा न जा सके। ३. अवकाश या फुरसत न होना। अति व्यस्तता।

फँसावा
संज्ञा पुं० [हिं० फसना + आवा (प्रत्य०)] दे० 'फँसाव'।

फँसिहारा पु
वि० [हि० फाँस + हारा (प्रत्य०)] [स्त्री० फँसि हारिन] फँसानेवाला। उ०—ठगति फिरति ठगिनी तुम नारी। जोइ आवति सोइ सोइ कहि डारति जाति जनावति दै दै गारी। फँसिहारिन् बटपारिनि हम भई आपुन भए सुधर्मा भारी। फंदा फँसि कमान बान सों काहू देख्यो डारत मारी। जाके मन जैसोई बरतै मुखबानी कहि देत उधारी। सुनहु सूर प्रभु नीके जान्यों ब्रज युवती तुम सब बटपारी।—सूर (शब्द०)।

फँसौरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० फाँसना + औरी (प्रत्य०)] फंदा। पाशा। उ०— गच काँच लखि मन नाच सिखि जनु पाँचसर सु फँसौरि।—तुलसी (शब्द०)।

फ (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. कटु वाक्य। रूखा वचन। २. फुक्कार। फुक्कार। ३. निष्फल भाषण। ४. यक्षसाधन। ५. अंधड़। ६. जम्हाई। ७. स्फुट। ८. फललाभ। ९. वृद्धि। विस्तार। वर्धन (को०)।

फ (२)
वि० सुस्पष्ट। प्रकट। व्यक्ति। प्रत्यक्ष [को०]।

फउज ‡
संज्ञा स्त्री० [अं० फौ़जा] सेना। उ०— मारे गोला नाम ते सब फउज पराई।— धरनी० श०, पृ० ६।

फउजदार †
संज्ञा पुं० [हिं० फउज + दार] दे० 'फौजदार'।

फउदार पु †
संज्ञा पुं० [अ० फौज + फा० दार] सेनापति। फौजदार। उ०— पाँच पचीस नगर के बासी मनुवाँ है फउदार।—गुलाल० बानी०, पृ० १५।

फक (१)
वि० [सं० स्फटिक] १. स्वच्छ। सफेद। २. बदरंग। मुहा०— रंग फक हो जाना या फक पढ़ जाना = हक्का बक्का हो जाना। घबरा जाना। चेहरे का रंग फीका पड़ जाना। जैसे,— हमें देखते ही उनके चेहरे का रंग फक हो जाता है।

फक (२)
संज्ञा स्त्री० [अ० फंक,फक्क] १. दो मिली हुई चीजों का अलग अलग होना। मोक्ष। छूटना। २. जबड़ा (को०)। ३. खोलना। मुहा०— फक रेहन= बंधन से मुक्त होना। फक कराना = छुड़ाना।

फकड़ी
संज्ञा स्त्री० [हि० फक्कड़ + ई (प्रत्य०)] दुर्दशा। दुर्गति। उ०—खूबो में अगर जावै तो होती यह फकड़ी। खैचे है कोई हाथ कोई छोने है लकड़ी।—नजीर (शब्द०)।

फकत
वि० [अ० फकत] १. बस। अलम्। पर्याप्त। २. केवल। सिर्फ। उ०— एक औरत ने फकत कहा है कि नाक कान काट लूँगी और तुम यहाँ दोड़े आए। तुम्हें शरम नहीं आती।— दुर्गाप्रसाद (शब्द०)।

फकर (१)
संज्ञा पुं० [अ० फकीर] दे० 'फकीर'। उ०— दुइ पासाही फकर की इक दुनियाँ इक दीन।—पलटू, भा०, १, पृ० ६३।

फकर (२)
संज्ञा पुं० [अ० फ़क्र] निर्धनता। गरीबी। दरिद्रता। उ०— कबही फाका फकर है कबही लाख करोर।—पलटू०, भा० १, पृ० १४।

फका पु
संज्ञा पुं० [हि० फाँक] फाँक। टुकड़ा।

फकिरवा †
संज्ञा पुं० [हि० फकीर + वा (प्रत्य०)] दे० 'फकीर'। उ० —तोहिं मोरि लगन लगाए रे फकिरवा।—कबीर श०, भा० २, पृ० ४५।

फकीर
संज्ञा पुं० [अ० फकीर] [स्त्री० फकीरन, फकीरनी] १. भीख माँगनेवाला। भिखमंगा। भिक्षुक। उ०— साहिन के उमराव जितेक सिवा सरजा सब लूट लिए है। भूषन ते बिनु दौलत ह्वँ कै फकीर ह्लै देस विदेस गए हैं।—भूषण (शब्द०)। २. साधु। संसारत्यागी। उ०— उदर समाता अन्न ले तनहि समाता चीर। अधिकाई संग्रह ना करै तिसका नाम फकीर।— कबीर (शब्द०)। ३. निर्धन मनुष्य। वह जिसके पास कुछ न हो। मुहा०— फकीर का घर बढ़ा है = फकीर को अपनी फकीरी की शक्ति से सब कुछ प्राप्त है। फकीर की सदा = माँगने के लिये फकीर की आवाज या पुकार।

फकीराना पु
वि० [अं० फकीरानह] फकीर जैसा। फकीरों की तरह। साधुओं के समान।

फकीरी
संज्ञा स्त्री० [अ० फकीरी, हि० फकीर + ई] १. भिखमंगा- पन। २. साधुता। उ०—मन लागो मेरी यार फकीरी में। जो सुख पावो नाम भजन में, जो सुख नाहिं अमीरी में।— कबीर श०, भा० १, पृ० ७०। ३. निर्धनता। ४. एक प्रकार का अंगूर।

फकीरी लटका
संज्ञा पुं० [हिं० फकीरी + लटका] फकीर की दी हुई या कही हुई दवा या जड़ी बूटी।

फकीह
संज्ञा पुं० [अ० फकीह] धर्माशास्त्र का ज्ञाता। मुसलिम धर्म- शास्त्र का विद्वान् [को०]।

फक्क (१)
संज्ञा पुं० [सं०] पंगु या विकलांग व्यक्ति। अंगहीन [को०]।

फक्क (२)
संज्ञा पुं० [अ० फक्क] मोचन। खोलना। संयुक्त वस्तुओं को अलगाना या पृथक् करना।

फक्कड़ (१)
संज्ञा पुं० [सं० फक्किका] गालीगलीज। कुवाच्य। क्रि० प्र०—बकना। मुहा०—फक्कड़ तौलना = गालीगुपता बकना। कुवाच्य कहना।

फक्कड़ (२)
वि० १. जो अपने पास कुछ भी न रखता हो, सब कुछ उड़ा डालता हो। मस्त मौला। २. उच्छृंखल। उद्धत। ३. फकीर। मिखमंगा।

फक्काड़बाज
वि० [हिं० फक्कडा़ + फा० बाज़] १. गाली बकनेवाला। २. निर्धन या कंगाल।

फक्काड़बाजी
संज्ञा स्त्री० [हि० फक्कड़ + फा० बाजी] १. गालियाँ बकना। गाली गलौज करना। २. निर्धनता।

फक्कर †
संज्ञा पुं० [अ० फिक, हि० फिकर] दे० 'फिक्र'। उ०— पर इसकी क्या चिंता फक्कर तो होना ही था, जप न हो सकी।—श्यामा०, पृ० १११।

फक्किका
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. ग्रंथ का वह अंश जो शास्त्रार्थ, गूढ़ व्याख्या में दुरूह स्थल को स्पष्ट करने के लिये कहा जाय। कूट प्रश्न। २. अनुचित व्यवहार। ३. धोखीबाजी।

फक्कीर †
संज्ञा पुं० [हि०] दे० 'फकीर'। उ०— दास पलटू कहे यार फक्कीर को।— पलटू०, भा० २, पृ० १०।

फक्कुल रिहनु, फक्के रिहन
संज्ञा पुं० [अ०] गिरवी या बँधक रखी चीज को छुड़ाना।

फकोफाका
संज्ञा पुं० [अ० फक व फाकह्] निर्धनता और भूख। गरीबी और उपवास। उ०— कहाँ तक में अब फक्रोफाका सहूँ, नहीं मुज मे बर्दाश्त ता चुप रहूँ।—दक्खिनी०, पृ० २११।

फखर
संज्ञा पुं० [फा० फाखर या फख] गोरव। गर्व। अभिमान। जैसे,—आपको अपने इल्म का बहुत फखर है।

फखीर
वि० [फा० फखीर] अभिमानी। घमंडी।

फख्र
संज्ञा पुं० [फा० फखू] गर्व। अभिमान। दे० 'फखर'। उ०— मिश्र जी भी चलते चलते अपनी ढाई चावलों की खिचड़ी पकाते रहे। वह सरकार के आदमी हैं, इसपर उनको फख्र भी है।— काले०, पृ० ४२।

फख्रिया
क्रि० वि० [फा० फ़ख्रियह्] सगर्व। गर्वपूर्वक। साभिमान। अभिमान सहित।

फग पु
संज्ञा पुं० [हिं० फंग] दे० 'फंग'। उ०— आँधरो अघम जड़ जाजरो जराजवन सूकर के सावक ढका ढकेलो मग में। गिरे हिए हहरि हराम हो हराम हन्यो हाय हाय करत परीगो काल फग में। तुलसी बिसोक ह्वै त्रिलोकपति लोक गयो नाम को प्रताप बात बिदित है जग में। सोई राम नाम जो सनेह सो जपत जन ताकी महिमा क्यों कही है जात अग मे।—तुलसी ग्रं० पृ० २१५।

फगफूर
संज्ञा पुं० [फा० फग्कूर] चीन के बादशाहों की उपाधि उ०—(क) ओ फगफूर की बारगाह बीच आ।—दक्खिनी०, पृ० २७०। (ख) खिदमत में है सारे मेरे फगफुर के आगे।—कबीर मं०, पृ० ४६६।

फगुआ
संज्ञा पुं० [हिं० फागुन] १. होली। होलिकोत्सव का दिन। २. फाल्गुन के महिने में लोगों का वह आमोद प्रमोद जो वसंत ऋतु के आगमन के उपलक्ष में माना जाता है। इसमें लोग परस्पर एक दूसरे पर रंग कीच आदि डालते हैं और अनेक प्रकार के विशेषतः अश्लील गीत गाते हैं। फाग। उ०—दीहें मारि असुर हरि ने तब दीन्हों देवन राज। एकन को फगुआ इंद्रासन इक पताल को साज।—सूर (शब्द०)। मुहा०—फगुआ खेलना = होली के उत्सव में रंग गुलाल आदि एक दूसरे पर डालना। उ०—बन घन फूले टेसुआ बगियन बेलि। चले बिदेस पियरवा फगुआ खएलि।—रहीम (शब्द०)। फगुआ मानना = फागुन में स्त्री पुरुषों का परस्पर मिलकर रंग खेलना और गुलाल मलना आदि। उ०—खेलत बसंत राजाधिराज। देखत नभ कौतुक सुर समाज। नुपुर किंकिन पुनि अति सुहाइ। ललनागन जब गाहि धरहिं घाइ। लोचन आजहिं फगुआ मनाइ। छाड़हिं नचाइ हा हा कराइ।— तुलसी (शब्द०)। ३. फाल्गुन के महीने में गाए जानेवाले गीत, विशेषतः अश्लील गीत। ४. वह वस्तु जो किसी को फाग के उपलक्ष्य में दी जाय। फगुआ खेलने के उपलक्ष में दिया जानेवाला उपहार। उ०—(क) ज्यों ज्यों पट झटकति हटति हँसति नचावति नैन। त्यों त्यों निपट उदार ह्वै फगुआ देत बनैन।—बिहारी (शब्द०)। (ख) कहैं कबीर ये हरि के दास। फगुआ माँगै बैकुँठवास।—कबीर (शब्द०)। क्रि० प्र०—देना।—माँगना।

फगुआना ‡
क्रि० स० [हिं० फगुआ] किसी के ऊपर फागुन के महीने में रंग छोड़ना या उसे सुनाकर अश्लील गीत गाना।

फगुन
संज्ञा पुं० [सं०] एक गोत्रप्रवर्तक ऋषि का नाम।

फगुनहट
संज्ञा स्त्री० [हिं० फागुन + हट (प्रत्य०)] १. फागुन में चलनेवाली तेज हवा जिसके साथ बहुत सी धूल और वृक्षों की पत्तियाँ आदि भी मिली रहती हैं। २. फागुन में होनेवाली वर्षा।

फगुनियाँ †
संज्ञा पुं० [हिं० फागुन + इयाँ (प्रत्य०)] त्रिसंधि नामक फूल।

फगुवा †
संज्ञा पुं० [हिं० फाग] दे० 'फगुआ'। उ०—जो पै फगुवा देत बनै नहिं, राधा पाँइन लागु।—नंद०, ग्रं०, पृ० ३८४।

फगुहरा †
संज्ञा पुं० [हिं० फगुआ] दे० 'फगुहारा'।

फगुहारा पु †
संज्ञा पुं० [हिं० फगुआ + हार (प्रत्य०)] फाग खेलनेवाला। उ०—बाहर सों फगुहार जुरे जुव जन रस राते।— प्रेमघन, भा० १, पृ० ३८३।

फगुहारा †
संज्ञा पुं० [हिं० फगुआ + हारा (प्रत्य०)] [स्त्री० फगुहारी,फगुहारिन] १. वह जो फाग खेलने के लिये होली में किसी के यहाँ जाय। उ०—मुँद्यो ब्रजमंडल मदन सुख सदन में नंद को नंदन चित चोरन डरत है। अंबर में राधा मुख चंद्र उयो चाहै तौ लों फगुहारे पाहरुनि सोर सरसत हैं।— देव (शब्द०)। २. फगुआ गानेवाला पुरुष।

फजर
संज्ञा स्त्री० [अ०] प्रातःकाल। सबेरा। उ०—(क) मुझे आया जानै, जाया मानै दी ठिकाने रहि, फजर की गजर बजाऊँ तेरे पास मैं।—सूदन (शब्द०)। (ख) फजर उठि रैन की जागी। चलन दर मँजल को लागी।—घट०, पृ० ३३४।

फजिर पु
संज्ञा स्त्री० [अ० फजर] दे० 'फजर'। उ०—फजरि आनि हाजरि भयौ, सुरजव करी सलाँम।—ह० रासो, पृ० ११४।

फजल (१)
संज्ञा पुं० [अ०] अनुग्रह। कृपा। मेहरबानी। उ०—दिया जिवजान जो पिया पहिचान ले। राह से रोशनी फजल आवै।—तुलसी० श०, पृ० २०।

फजल † (२)
संज्ञा पुं० [अ० फजर] दे० 'फजर'।

फजिर †
संज्ञा स्त्री० [अ० फजर] दे० 'फजर'।

फजिल †
संज्ञा पुं० [अ० फजल] दे० 'फजल'।

फजिहत †
संज्ञा स्त्री० [अ० फजीहत] अप्रतिष्ठा। फजीहत।

फजिहतिताई पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० फजीहति + ताई (प्रत्य०)] फजीहत होने का भाव। अप्रतिष्ठा। बेइज्जती। उ०—काके ढिग जाई काहि कबित सुनाई भाई अब कबिताई रही फजिहतिताई है।—कविता कौ०, भा० १, पृ० ३९१।

फजीत पु
संज्ञा स्त्री० [अ० फजीहत] दे० 'फजीहत'। उ०— रसियो नागी रौड़ सूँ, फसियो होण फजीक।—बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० २।

फजीता पु †
संज्ञा पुं० [अ० फजीहत] दे० 'फजीहत'।

फजीती †
संज्ञा स्त्री० [अ० फजीहत] दे० 'फजीहत'।

फजीलत
संज्ञा स्त्री० [अ०] उत्कृष्टता। श्रेष्ठता। मुहा०—फजीलत की पगड़ी = विद्वत्तासूचक पदक वा चिह्न। उ०—जिन्हें इस हुनर में फजीलत की पगड़ी हासिल है वे क्या नहीं कर सकेत।—भट्ट (शब्द०)। विशेष—मुसलमानों में यह चाल है कि जब कोई पूर्ण विद्वान् होता है और विद्वानों की सभा में अपनी विद्वता को प्रमाणित करता है तब सब विद्वान् वा प्रधान उसके सिर पर पगड़ी बाँधते हैं जिसे फजीलत की पगड़ी कहते हैं। इस पगड़ी को बाँधकर वह जिस सभा में जाता है लोग उसका आदर और प्रतिष्ठा करते हैं।

फजीहत
संज्ञा स्त्री० [अ०] दुर्दशा। दुर्गति। अपमान। बदनामी। उ०—(क) तुलसी परिहरि हरिहरहिं पाँवर पूजहिं भूत। अंत फजीहत होहिंगे गनिका के से पुत।—तुलसी (शब्द०)। (ख) साईँ नदी समुद्र को मिली बड़प्पन जानि। जाति नसायो मिलत ही मान महत की हानि। मान महत की हानि, कहो अब कैसे कीजै। जल खारी ह्वै गयो ताहि कहो कैसे पीजै। कह गरिधर कविराय कच्छ ओ मच्छ सकुचाई। बड़ी फजीहत होय तबौ नदियन की साई।—गिरघर (शब्द०)।

फजीहति पु
संज्ञा स्त्री० [अ० फजीहत] फजीहत। दुर्दशा। उ०— जब डायन की सुधि चीन्ही। तब पकरि फजीहति कीन्ही।—सुंदर० ग्रं०, भा० १, पृ० १३९।

फजीहती
संज्ञा स्त्री० [हिं० फजीहत] दे० 'फजीहत'।

फजूल
वि० [अ० फुजूल] जो किसी काम का न हो। व्यर्थ। निरर्थक। जैसे,—(क) वहाँ आने जाने मे फजूल (१०) खर्च हो गए। (ख) तुम तो दिन भर फजूल बातें किया करते हो।

फजूलखर्च
वि० [फा० फुजूलखर्च] अपव्ययी। बहुत खर्च करनेवाला।

फजूलखर्ची
संज्ञा स्त्री० [फा० फुजूलखर्ची] व्यर्थ व्यय करना। अपव्यय।

फज्जर पु
संज्ञा स्त्री० [अ० फजर] दे० 'फजर'। उ०—फाजल सेख खुलती फज्जर। असुर धसे लागो अति आतुर।—रा० रू०, पृ० २५७।

फज्ल
संज्ञा पुं० [अ० फज्ल] दे० 'फजल'।

फझियत पु †
संज्ञा स्त्री० [अ० फजीहत] दे० 'फजीहत'। उ०— फबत फाग फझियत बड़ी चलत चहत जदुराइ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० १३६।

फट्
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. एक अनुकरण शब्द। २. एक तांत्रिक मंत्र जिसे अस्त्रमंत्र भी कहते हैं और जिसका प्रयोग पात्रादि प्रक्षालन, अघमर्षण, प्रक्षेपन, अंतरिक्ष विघ्नोत्सादन, करांरन्यास, अन्यावाहन आदि में होता है।

फट (१)
संज्ञा स्त्री० [अनु०] किसी फैले तल की हलकी पतली चीज के हिलने या गिरने पड़ने का शब्द। जैसे, कुत्ते का काम फट फट करना, सूप फट फट करना। यौ०—फट फट। मुहा०—फट से = तुरंत। झट।

फट † (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० पट] १. चटाई या टाट का टुकड़ा जो गाड़ी के नीचे रखा जाता है। फट्ट (बुंदेलखंड)। २. दुतकार। फटकार।

फटक † (१)
संज्ञा पुं० [सं० स्फटिक, पा० फटिक] बिल्लौर पत्थर। स्फटिक। उ०—(क) सेत फटक जस लागै गढ़ा। बाँध उठाय चहूँ गढ़ मढ़ा।—जायसी (शब्द०)। (ख) सेत फटक मनि हीरै बीधा। इहि परमारथ श्री गोरष सीधा।— गोरख०, पृ० १७०।

फटक (२)
क्रि० वि० तत्क्षण। झट। उ०—कह गिरिधर कविराय सुनो हो मेरे नोखे। गयो फटक ही टूटि चोंच दाड़िम के धोखे।—गिरिधर राय (शब्द०)।

फटक † (३)
संज्ञा पुं० [हिं० फटकना] लटकने या पछोरने की वस्तु। सुप। छाज। उ०—मूँग मसूर उरद चनदारी। कनक फटक धरि फटकि पठारी।—सूर०, १०। ३६९।

फटकन
संज्ञा स्त्री० [हिं० पटकना] वह भूसी या दूसरे निरर्थक पदार्थ जो किसी अन्न आदि को फटकने पर निकलकर बाहर या अलग गिरते हैं। वह जो फटककर निकाला जाय।

फटकना (१)
क्रि० स० [अनु० फट, फटक] १. हिलाकर फट फट शब्द करना। फटफटाना। उ०—देखे नंद चले घर आवत। ...फटकत स्रवन स्वानि द्वारे पर गगरी करति लराई। माथे पर ह्वै काग उड़ान्यो कुसगुन बहुतक पाई।—सूर०, १०। ५४१। २. पटकना। झटकना। फेंकना। उ०—पान लै चल्यो नृप आ कीन्हों।...नैकु फटक्यौ लात सबद भयो आघात, गिरयो भहरात सकटा सँहारयो। सूर प्रभु नंदलाल मारयो दनुज ख्याल, मेटि जंजाल ब्रज जन उबारयौ।—सूर०, १०। ६२। ३. फेंकना। चलाना। मारना। उ०—(क) असुर गजरूढ़ ह्वै गदा मारै फटकि श्याम अंग लागि सो गिरे ऐसे। बाल के हाथ ते कमल अमल नालयुत लागि गजराज तन गिरत जैसे।—सूर (शब्द०)। (ख) राम हल मारि सो वृक्ष चुरकुट कियो द्विविद शिर फटि गयो लगत ताके। बहुरि तरु तोरि पाषण फटकन लग्यो हल मुसल करन परहार बाँके।—सूर (शब्द०)। ४. सूप पर अन्न आदि को हिलाकर साफ करना। अन्न आदि का कूड़ा कर्कट निकालना। उ०—(क) सत संगति है सूप ज्यों त्यागै फटकि असार। कहै कबीर हरि नाम लै परसै नाहिं बिकार।—कबीर (शब्द०)। (ख) पहले फटकै छाज कै थोंथा सब उड़ि जाय। उत्तम भाँड़े पाइयै फटकंता ठहराय।—कबीर (शब्द०)। (ग) थोथी कथनी काम न आवै। थोथा फटकै उड़ि उड़ि जावै।—चरण० बानी, पृ० २१५। मुहा०—फटकना पछारना = दे० 'फटकना पछोरना'। उ०—मूँग मसूर उरद चनदारी। कनक फटक धरि फटकि पछारी।— सूर, १०। ३६९। फटकना पछोरना = (१) सूप या छाज पर हिलाकर साफ करना। उ०—कम थोरे काँकर घने देखा फटक पछोर।—मलूक० बानी, पृ० ४०। (२) अच्छई तरह जाँच पड़ताल करना। ठोंकना बजाना। जाँचना। परखना। उ०—(क) देश देश हम बागिया ग्राम ग्राम की खोरि। ऐसा जियरा ना मिला जो लेइ फटकि पछोरि।—कबीर (शब्द०)। तुम मधुकर निर्गुन निजु नीके, देखे फटकि पछोरे। सूरदास कारेन की संगति को जावै अब गोरे।—सूर०, १०। ४३८१। ५. रूई आदि को फटके से धुनना

फटकना (२)
क्रि० अ० [अनु०] १. जाना। पहुँचना। उ०—कृष्ण हैं, उद्धव हैं, पर ब्रजवासी उनके निकट फटकने नहीं पाते।— प्रेमसागर (शब्द०)। २. दूर होना। अलग होना। उ०— (क) एकहि परनि परे खग ज्यौं हरि रूप माँझ लटके। मिले जाइ हरदी चूना ज्यौं फिर न सूर फटके।—सूर० १० २३८९। (ख) ललित त्रिभंगी छबि पर अँटके फटके मो सौं तोरि। सूर दसा यह मेरी कीन्हीं आफुनि हरि सौं जोरि।—सूर०, १०। २२४७। ३. तड़फड़ाना। हाथ पैर पटकना। ४. श्रम करना। हाथ पैर हिलाना।

फटकना (३)
संज्ञा पुं० गुलेल का फीता जिसमें गुलता रखकर फेंकते हैं।

फटकरना (१)
क्रि० अ० [हिं० फटकारना] फटकारा जाना।

फटकरना (२)
क्रि० स० [हिं० फटकना] फटकना। उ०—खोट रतन सोई फटकरै। केहि घर रतन जो दारिद हरै।— जायसी (शब्द०)।

फटका (१)
संज्ञा पुं० [अनु०] १. धुनिए की धुनकी जिससे वह रूई आदि घुनता है। २. वह लकड़ी जो फले हुए पेड़ों में इसलिये बाँधी जाती है कि रस्सी के हिलने से वह उठकर गिरे और फट फट का शब्द हो जिससे फल खानेवाली चिड़ियाँ उड़ जायँ अथवा पेड़ के पास न आएँ। ३. कोरी तुकबंदी। रस और गुण से हीन कविता। क्रि० प्र०—जोड़ना। ४. तड़फड़ाहट। मुहा०—फटका खाना = तड़फना। तड़फड़ाना।

फटका (२)
संज्ञा पुं० [हिं० फाटक] दे० 'फाटक'।

फटका (३)
संज्ञा पुं० [हिं० फटकन] एक प्रकार की बलुई भूमि जिसमें पत्थर के टुकड़े भी होते है और जो उपजाऊ नहीं होती।

फटका (४)
संज्ञा पुं० [हिं० फटकना] फटकने, पछोरने या धुननेवाली गालीगलौज भरी कजली। उ०—इन कजलियों को वे लोग 'फटका' के नाम से पुकारते हैं।—प्रमघन०, भा० २, पृ० ३४५।

फटकाना † (१)
क्रि० स० [हिं० फटकना] १. अलग करना। २. फेंकना। उ०—(क) आपुन चढ़े कदम पर धाई।....जाइ कहौ मैया के आगैं लेहु सबै मिलि मोहि बँधाई। मौकौं जुरि मारन जब आई तब दीन्ही गेंड़ रि फटकाई।—सूर०, १०। १४१८। (ख) काहू की गगरी ढरकावै। काहू की इँडुरी फटकावै।—सूर, १०। १३९९।

फटकाना † (२)
क्रि० स० [हिं० फटकना का प्रेरणार्थक रूप] फटकने का काम दूसरे से कराना।

फटकार
संज्ञा स्त्री० [हिं० फटकारना] १. फटकारने की क्रिया या भाव। झिड़की। दुतकार। जैसे,—दो चार फटकार सुनाओ तब वह मानेगा। क्रि० प्र०—सुनाना।—बताना। २. शाप। दे० 'फिटकार'।

फटकारना
क्रि० स० [अनु०] १. (शस्त्र आदि) मारना। चलाना। उ०—(क) खटपट चोट गदा फटकारी। लागत शब्द कुलाहल भारी।—लल्लू (शब्द०)। (ख) अर्जुन अग्नि बान फटकारा। सब शर करे निमिष महँ छारा।—सबल० (शब्द०)। २. एक में मिली हुई बहुत सी चीजों को एक साथ हिलाना या झटका मारना जिसमें वे छितरा जायँ। जैसे, दाढ़ी फटकारना, टुटिया फटकारना। उ०—घायन के घमकेउठे दियरे डमरु हरि डार। नचे जटा फटकारि के भुज पसारि तत्कार।—लाल (शब्द०)। ३. प्राप्ति करना। लेना। लाभ उठाना। जैसे,—आज कल तो वे रोज कचहरी से पाँच सात रुपए फटकार लाते हैं। ४. कपड़े को पत्थर आदि पर पटककर साफ करना। अच्छी तरह पटक पटककर धोना। ५. झटका देकर दूर फेंकना। उ०—(क) नीकैं देहु न मेरी गिंडुरी।....काहूँ नहीं डरात कन्हाई बाट घाट तुम करत अचगरी। जमुना दह गिंडुरी फटकारी फोरी सब मटकी अरु गगरी।—सूर०, १०। १४१६। (ख) ब्रज गौंडे कोउ चलत न पावत।...काहू की इँडुरी फटकारत काहू की गगरी ढरकावत।—सूर०, १०। १४३४। ६. दूर करना। अलग करना। हटाना। ७. क्रुद्ध होकर किसी से ऐसी कड़ी बातें कहना। जिससे वह चुप या लज्जित हो जाय। खरी और कड़ी बात कहकर चुप करना। जैसे,—आप उन्हें जब तक फटकारेंगे नहीं तब तक वे नहीं मानेंगें। संयो० क्रि०—देना।

फटकिया
संज्ञा पुं० [देश०] मीठा नामका विष के एक भेद का नाम यह गोबरिया से काम विषैला होता है और उससे छोटा भी होता है।

फटकी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फटक] १. टोकरी के आकार का छोटे मुँह का पिंजड़ा जिसमें चिड़ीमार चिड़ियों को पकड़कर रखते हैं। २. दे० 'फटका'।

फटना
क्रि० अ० [हिं० फाड़ना का अक० रूप] १. आघात लगने का कारण अथवा यों ही किसी पोली चीज का इस प्रकार टूटना या खंडित होना अथवा उसमें दरार पड़ जाना जिसमें भीतर की चीजें बाहर निकल पड़ें अथवा दिखाई देने लगें। जैसे, दीवार फटना, जमीन फटना, सिर फटना, जूता फटना। उ०—लागत सीस बीच ते फटें। टूठहि जाँघ भुजा धर कटें।—लल्लू (शब्द०)। मुहा०—छाती फटना = असह्य दुःख होना। मानसिक वेदना होना। बहुत अधिक दुःख पहुँचना। उ०—(क) तुम बिन छिन छिन कैसे कटे। पलक ओट में छाती फटे।—लल्लू (शब्द०)। (ख) न जाने क्यों इसके रोने पर मेरा कलेंजा फटा जा रहा है।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० ३१०। (किसी से) मन या चित्त फटना = विरक्ति होना। संबंध रखने को जी न चाहना। तबीयत हट जाना। जैसे,—अब की बार के उसके व्यवहार से हमारा मन फट गया। २. झटका लगने के कारण वा और किसी प्रकार किसी वस्तु का कोई भाग अलग हो जाना। जैसे कपड़ा फटना, किताब फटना। ३. किसी पदार्थ का बीच से कटकर छिन्न भिन्न हो जाना। जैसे, कोई फटना, बादल फटना। ४. अलग हो जाना। पृथक् हो जाना। ५. किसी गाढ़ें द्रव पदार्थ में कोई ऐसा विकार उत्पन्न होना जिससे उसका पानी और सार भाग दोनों अलग अलग हो जायँ। जैसे, दूध फटना, खून फटना। संयो० क्रि०—जाना। ६. किसी बात का बहुत अधिक होना। बहुत ज्यादा होना। विशेष—इस अर्थ में प्रायः यह संयो० क्रि० 'पड़ना' के साथ बोला जाता है। जैसे, रूप फटा पड़ना, आफत का फट पड़ना। मुहा०—फट पड़ना=अचानक आ पहुँचना। सहसा आ पड़ना। संयो० क्रि०—पड़ना। ७. असह्य वेदना होना। बहुत अधिक पीड़ा होना। जैसे,— मारे दर्द के सिर फट रहा है। मुहा०—फटा जाना या पड़ना=बहुत अधिक पीड़ा होना। बहुत तेज दर्द होना। जैसे,—ऐसी पीड़ा है कि हाथ फटा जा रहा है।

फटफट
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. फट फट शब्द होना। २. बकवाद। व्यर्थ की बात। क्रि० प्र०—करना। मुहा०—फटफट होना=तकरार होना। कहा सुनी होना। ३. जूते आदि के पटकने का शब्द।

फटफटाना (१)
क्रि० स० [अनु०] १. व्यर्थ बकवाद करना। २. हिलाकर पट फट शब्द करना। पड़फड़ाना। जैसे, कबूतर का पर फटफटाना, कुत्तें का कान फटफटाना। उ०—रुरुआ चहुँ दिसि ररत डरत सुनि के नर नारी। फटफटाइ दोउ पंख उलूकहु रटत पुकारी।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० २९८। ३. हाथ पैर मारना। प्रयास करना। इधर उधर फिरना। टक्कर मारना।

फटफटाना (२)
क्रि० अ० फटफट शब्द होना।

फटहा ‡
वि० [हिं० फटना] १. फटा हुआ। २. अंड बंड बकनेवाला। गाली गलौज करनेवाला।

फटा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. साँप का फन। २. घमंड। शेखी। गरूर। ३. दाँत (को०)। ४. छल। धोखा।

फटा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० फटना] छिद्र। छेद। दरार। मुहा०—किसी के फटे में पाँव देना=झगड़े के बीच में पड़ना। दूसरे की आपत्ति को अपने ऊपर लेना।

फटा (३)
वि० १. फटा हुआ। जो फट गया हो। २. बेकार का।

फटाका †
संज्ञा पुं० [हिं०] १. 'फट' की तेज या ऊँची आवाज। २. पटाखा।

फटटोप
संज्ञा पुं० [सं०] साँप के फन का फैलाव या विस्तार [को०]।

फटाटोपी
संज्ञा पुं० [सं० फटाटोपिन्] साँप। सर्प।

फटाव
संज्ञा पुं० [हिं० फटना + आव (प्रत्य०)] १. फटने की क्रिया या स्थिति। २. दरार। शिगाफ। फटन।

फटिक
संज्ञा पुं० [सं० स्फटिक, पा० फटिक] १. काँच की तरह सफेद रंग का पारदर्शक पत्थर। बिल्लौर। विशेष—दे० 'स्फटिक'। उ०—(क) सुंदर मनोहर मंदिरायत अजिररुचिर फटिक रचे।—तुलसी (शब्द०)। (ख) ऐसे कहुत गए अपने पुर सवहि विलक्षण देख्यो। मणिमय महल फटिक गोपुर लाखि, कनक भूमि अवरेख्यो।—सूर (शब्द०)। २. मरमर पत्थर। संग मरमर। यौ०—फटिकशिला, फटिकसिला=स्फटिक की शिला। उ०— (क) जों गज फटिकशिला में देखत दसनन जाय अरत। जो तू सूर सुखहि चाहत है तो क्यों विषय परत।—सूर (शब्द०)। (ख) फटिकसिला बैठे द्वै भाई।—मानस, ५। २९।

फटिका
संज्ञा स्त्री० [सं,० स्फटिक (=फटिक)] एक प्रकार की शराब जो जो आदि से खमीर उठाकर बिना खीचे बनाई जाती है।

फट्ठा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० फटना] [स्त्री० फट्ठी] चीरी हुई बाँस की छड़। बाँस को बीच से फाड़ या चीरकर बनाया हुआ लट्ठा। फलटा।

फट्ठा (२)
संज्ञा पुं० [सं० पट] टाट। मुहा०—फट्ठा लौटना या उलटना=दिवाल निकलना। टाठ उलटना।

फट्ठी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फट्ठा] बाँस की चोरी हुई पतली छड़।

फड़ (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० पण] १. दाँव। जुए का दाँव जिसपर जुआरी बाजी लगाकर जुआ खेलते हैं। २. वह स्थान जहाँ जुआरी एकत्र होकर जुआ खेलते हों। जुआखाना। जुए का अड्डा। ३. वह स्थान जहाँ दुकानदार बैठकर माल खरीदता या बेचना हो। ४. पक्ष। दल। उ०—हठकि हथ्यार फड़ बाँधि उभरवन की कीन्ही तब नीरंग ने भेंट सिवराज की।—भूषण (शब्द०)। क्रि० प्र०—बाँधना।

फड़ (२)
संज्ञा पुं० [सं० पटल वा फल] १. गाड़ी का हरसा। २. वह गाड़ी जिसपर तोप चढ़ाई जाती है। चरख।

फड़ (३)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'फर'।

फड़ (४)
संज्ञा पुं० [अनु०] दे० 'फट'।

फड़क
संज्ञा स्त्री० [अनु०] फड़कने की क्रिया या भाव।

फड़कन (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० फड़कना] १. फड़कने की क्रिया या भाव। फड़फड़ाहट। २. धड़कन। ३. उत्सुकता। लालसा।

फड़कन † (२)
वि० १. भड़कने या फड़कनेवाला। जैसे, फड़कन बैल। २. तेज। चंचल।

फड़कना
क्रि० अ० [अनु०] १. फड़ फड़ करना। फड़फड़ाना। उछलना। बार बार नीचे ऊपर या इधर उधर हिलना। उ०—जिन तन पै जवानी की पड़ी फड़कै थी बोटी। उस तन को न कपड़ा है न उस पेट को रोटी।—नजीर (शब्द०)। मुहा०—फड़क उठना=उमंग में होना। आनंदित होना। प्रसन्न होना। फड़क जाना=मुग्ध होना। २. किसी अंग वा शरीर के किसी स्थान में अचानक स्फुरण होना। किसी अंग में गति उत्पन्न होना। उ०—इतनी बात सुनते ही रूक्मिणी जी की छाती से दूध धार बह निकली और बाई बाँह फड़कने लगी।—लल्लू (शब्द०)। विशेष—लोगों को विश्वास है कि भिन्न भिन्न अंगों के फड़कने का शुभ या अशुभ परिणाम होता है। ३. हिलना डोलना। गति होना। मुहा०—बोटी फड़कना = अत्यंत चंचलता होना। ४. तड़फड़ाना। घबड़ाना। स्थिर न रहना। चंचल होना। क्रिया के लिये उद्यत होना। ५. पक्षियों का पर हिलना।

फड़काना
क्रि० स० [हिं० फड़कना का प्रे० रूप] १. दूसरे को फड़कने में प्रवृत्त करना। २. उमंग दिलाना। उत्सुक बनाना। ३. हिलाना। विचलित करना। मुहा०—फड़का देना = मन में उमंग ला देना। तबियत फड़क जाना। उ०—मगर बाह रे मौलवी, ऐसा गर्मागर्म फिकरा चुस्त किया कि फड़का दिया। इस सूझ बूझ के कुरबान।—सैर कु०, पृ० २६।

फड़कापेलन
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का बैल जिसका एक सींग तो सीधा ऊपर को होता है और दूसरा नीचे को झुका होता है।

फड़नवीस
संज्ञा पुं० [फा० फर्दनवीस] मराठों के राजत्वकाल का एक राजपद। विशेष—पहले यह पद केवल उन्हीं लोगों का माना जाता था जो राजसभा में रहकर साधारण लेखकों का काम करते थे। पर पीछे यह पद उन लोगों का माना जाने लगा जो दीवानी या माल विभाग के प्रधान कर्मचारी होते थे। ये लोग लगान वसूल करनेवाला का हिसाब जाँचा और लिया करते थे। बड़े बड़े इनाम या जागीरें देने की व्यवस्था भी ये ही लोग किया करते थे।

फड़ना पु †
क्रि० स० [सं० फण्ड (=पेडू। पेट)] फाँड़ बाँधना। काछना। पहनना। उ०—फड़ि कचोठा हर इसर बोलावेट, मगन जना सबे कोटि कोटि पावे।—विद्यापति, पृ० ५१५।

फड़ फड़
संज्ञा स्त्री० [अनुध्व०] 'फड़ फड़' की आवाज होना। कागज या चिड़ियों के पंखों के बार बार उड़ने या हिलने से उत्पन्न ध्वनि या आवाज। उ०—फड़ फड़ करने लगे जाग पेड़ों पर पक्षी।—साकेत, पृ० ४०३।

फड़फड़ाना (१)
क्रि० स० [अनु०] १. फड़फड़ शब्द उत्पन्न करना। हिलाना। जैसे, पर फड़फड़ाना। २. दे० 'फटफटाना'।

फड़फड़ाना (२)
क्रि० अ० १. फड़ फड़ शब्द होना। २. घबराना। ३. तड़फड़ाना। ४. उत्सुक होना।

फड़बाज
संज्ञा पुं० [हिं० फड़ + फा० बाज (प्रत्य०)] वह जिसके यहाँ जुए का फड़ बिछता हो। अपने यहाँ लोगों को जूआ खेलानेवाला व्यक्ति।

फड़बाजी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फड़बाज + ई (प्रत्य०)] १. फड़बाज का भाव। २. अपने यहाँ दूसरों को जूआ खेलाने की क्रिया।

फड़वाना
क्रि० स० [हिं० फाड़ना का प्रेरणार्थक] किसी अन्य से फाड़ने का काम कराना।

फड़िंगा
संज्ञा स्त्री० [सं० फडिङ्गा] १. फतिंगा। फनिगा। २. झींगुर [को०]।

फड़िका पु
संज्ञा पुं० [सं० फलक, हिं० फरका] दे० 'फरका'। उ०—आपण ही टाटी फड़िका आपण ही हंध। आपण ही मृतक आफण ही कंध।—गोरख०, पृ० १३६।

फड़िया
संज्ञा पुं० [हिं० फड़ (=दुकान) + इया (प्रत्य०)] १. वह बनिया जो फुटकर अन्न बेचता हो। २. वह पुरुष जो जूआ खेलाने का व्यापार करता हो। जुए के फड़ का मालिक।

फड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फड़] एक गज, चौड़ी, एक गज ऊँची और तीस गज लंबी पत्थरों या ईंटों आदि की ढेरी।

फड़ुआ ‡
संज्ञा पुं० [हिं०] [स्त्री० फड़ुई] दे० 'फावड़ा'।

फड़ुई (१) ‡
संज्ञा स्त्री० [हिं० फड़ वा भाड़] लाई। फरवी।

फड़ुई † (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० फड़ुआ या फड़ुहा] १. छोटा फावड़ा। २. एक प्रकार का लकड़ी का कड़छा जिससे नील का माठ मथा जाता है।

फड़ुहा ‡
संज्ञा पुं० [हिं०] [स्त्री० फड़ुही] फावड़ा।

फड़ुही ‡ (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० फड़ या भाड़] लाई। फरवी।

फड़ुही ‡ (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० फड़ुहा] दे० 'फड़ई (२)'।

फड़ोलना †
क्रि० स० [सं० स्फुरण] किसी चीज को उलटना। इधर उधर या ऊपर नीचे करना।

फण
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० फणा] १. साँप का सिर उस समय जब वह अपनी गर्दन के दोनों ओर की नलियों में वायु भर कर उसे फैलाकर छत्राकार बना लेता है। फन। उ०— फण न बढ़ावत नागहू जो छेडयो नहि होइ।—शकुंतला, पृ० १२९। पर्या०—फणा। फटा। फट। स्फट। दर्वी। भोग। स्फुट। विशेष—इस शब्द के अंत में धर, कर, घृत, वत् शब्द लगाकर बनाया हुआ समस्त पद साँप का बोधक बनता है। २. रस्सी का फंदा। मुद्धी। कीआरी। ३. नाव में ऊपर के तखते की वह जगह जो सामने मुँह के पास होती है। नाव का ऊपरी अगला भाग।

फणकर
संज्ञा पुं० [सं०] साँप।

फणधर
संज्ञा पुं० [सं०] १. साँप। २. शिव [को०]।

फणभर
संज्ञा पुं० [सं०] साँप।

फणभृत्
संज्ञा पुं० [सं०] १. सर्प। साँप। २. नौ की संख्या। ३. आठ की संख्या [को०]।

फणमंडल
संज्ञा पुं० [सं० फणमण्डल] साँप का गोलाकार फण। कुंडलित फण [को०]।

फणमणि
संज्ञा पुं० [सं०] साँप के फण पर की मणि।

फणवान्
संज्ञा पु० [सं० फणवत्] सर्प।

फणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'फण'। यौ०—फणाकर = साँप। फणाघर = (१) सर्प। (२) शिव। फणा- फलक = साँप के फण का आभोग या विस्तार। फणाभर, फणाभृत् = सर्प।

फणाल पु
वि० [सं० फण + हिं० आल (प्रत्य०)] फणावाली। उ०—सहस फणालइ काल भूयंग, जीमण थी उतरउ वामेइ अंग।—बी० रासो, पृ० ५९।

फणावान्
संज्ञा पुं० [सं० फणावत्] साँप [को०]।

फणिक
संज्ञा पुं० [सं० फणि+ हिं० क (प्रत्य०)] साँप। नाग। उ०—सखी री नंदनंदन देखु। धूरि धूसरि जटा जुटली हरि किए हर भेखु। नीलापाट पिरोइ मणि गर फणिक धोखे जाय। खुन खुना कर हँसत मोहन नचत डौरु बजाय।— सूर (शब्द०)।

फणिकन्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] नागकन्या। नाग की कन्या [को०]।

फणिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] काले गूलर का पेड़।

फणिकार
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्राचीन देश का नाम जो बृहत्संहिता के अनुसार दक्षिण में था।

फणिकेशर
संज्ञा पुं० [सं०] नागकेसर।

फणिकेसर
संज्ञा पुं० [सं०] नागकेसर।

फणिखेल
संज्ञा पुं० [सं०] एक पक्षी का नाम [को०]।

फणिचक्र
संज्ञा पुं० [सं०] फलित ज्योतिष के अनुसार नाड़ीचक्र का नाम। विशेष—यह एक सर्पाकर चक्र होता है जिसमें भिन्न भिन्न स्थानों पर नक्षत्रों के नाम लिखे रहते हैं। इस चक्र से विवाह के समय वर और कन्या की नाड़ी का मिलान किया जाता है; पर यदि वर और कन्या दोनों एक ही राशि के हों तो इस चक्र का मिलान नहीं होता।

फणिजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की तुलसी, जिसकी पत्तियाँ बहुत छोटी छोटी होता हैं।

फणिजिह्वा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. महाशतावरी। बड़ी सतावर। २. कँगहिया नामक ओषधि। महासमंगा।

फणिजिह्विका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'फणिजिह्वा'।

फणिज्झ
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'फणिज्झक'।

फणिज्झक
संज्ञा पुं० [सं०] १. छोटे पत्ते की तुलसी। फणिजा। २. श्यमा तुलसी। ३. नीबू।

फणित
वि० [सं०] १. गत। गया हुआ। २. द्रवित। तरल किया हुआ [को०]।

फणितल्प
संज्ञा पुं० [सं०] सर्प की शय्या [को०]।

फणितल्पग
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु।

फणिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० फणिन्] १. साँपिन। २. एक औषधि। सर्पिणी [को०]।

फणिपित
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'फणींद्र'।

फणिप्रिय
संज्ञा पुं० [सं०] वायु। हवा।

फणिफेन
संज्ञा पुं० [सं०] अफीम। अहिफेन।

फणिभाषित
वि० [सं०] पतंजलि द्वारा उक्त या कथित [को०]।

फणिभाष्य
संज्ञा पुं० [सं०] पतंजलि रचित व्याकरण ग्रंथ। महाभाष्य [को०]।

फणिभुज्
संज्ञा पुं० [सं० फणिभुक्] १. गरुड़। २. मोर (को०)।

फणिमुक्ता
संज्ञा स्त्री० [सं०] साँप की मणि।

फणिमुख
संज्ञा पुं० [सं०] प्राचीन काल का चोरों का एक प्रकार का औजार। विशेष—इससे वे सेंध लगाने के समय मिट्टी खोदकर फेंकते थे।

फणिलता, फणिवल्ली
संज्ञा स्त्री० [सं०] नागवल्ली। पान।

फणिहंत्री
संज्ञा स्त्री० [सं० फणिहन्त्री] गंधनाकुली। नेउरकंद। रास्ना।

फणींद्र
संज्ञा पुं० [सं० फणीन्द्र] १. शेषनाग। २. वासुकी। ३. महर्षि पतंजलि। ४. बड़ा साँप।

फणी
संज्ञा पुं० [सं० फणिन्] १. साँप। उ०—काल फणी की मणि पर जिसने फैलाया है अपना हाथ।—साकेत, पृ० ३८६। २. केतु नामक ग्रह। ३. सीसा। ४. मरुवा। ५. महाभाष्यकार पतंजलि का नाम (को०)। ६. सर्पिणी नामक ओषाधि।

फणीश
संज्ञा पुं० [सं०] १. शेष। २. महर्षि पतंजलि। ३. वासुकि। ४. बड़ा साँप।

फणीश्वर
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'फणीश' [को०]।

फणीश्वर चक्र
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का चक्र। विशेष—इसके द्वारा शनि ग्रह की नक्षत्रस्थिति से सप्त द्वीपों के शुभ अशुभ फल का कथन होता है।

फतवा
संज्ञा पुं० [अ० फत्वा] मुसलमानों के धर्मशास्त्रनुसार (जिसे शरअ कहते हैं) व्यवस्था जो उस धर्म के आचार्य या मौलवी आदि किसी कर्म के अनुकूल वा प्रतिकूल होने के विषय में देते हैं। क्रि० प्र०—देना।—लेना।

फतह
संज्ञा स्त्री० [अ० फंतह] १. विजय। जीत। उ०—(क) दास तुलसी गई फतह कर अगम को। सुरत सज मिली जहाँ प्रीतम प्यारा।—तुलसी० श०, पृ० २१। (ख) कभी उस बेईमान के सामने लड़कर फतह नहीं मिलनी है।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० ५२१। २. सफलता। कृतकार्यता। क्रि० प्र०—करना।—पाना।—मिलना।—होना। यौ०—फतहनामा = वह कविता या लेख जो किसी के विजयो- पलक्ष्य में लिखा जाय। फतहमंद। फतहयाब = विजेता। जिसने विजय पाई हो। फतहयाबी = विजयप्राप्ति। जीत होना।

फतहमंद
वि० [अं० फतह + फा० मंद] जिसे फतह मिली हो। जिसकी जीत हुई हो। विजयी।

फतात
संज्ञा स्त्री० [अ० फतात] युवती। तरुणी। जवान औरत [को०]।

फतिंगा
संज्ञा पुं० [सं० पतङ्ग] [स्त्री० फतिंगी] किसी प्रकार का उड़नेवाला कीड़ा, विशेषतः वह कीड़ा जो बरसात के दिनों में अग्नि या प्रकाश के आसपास मँडराता हुआ अंत में उसी में गिर पड़ता है। फतिंगा। पतंग। उ०—जो हमें मेली दिए जैसा मिले। हो फतिंगे के मिलन साजो मिलन।—चुभते०, पृ० ६५।

फतील
संज्ञा पुं० [अ० फतील] दे० 'फतीला'।

फतीलसोज
संज्ञा पुं० [अ० फतील + फा० सोज] १. पीतल या और किसी धातु की दीवट जिसमें एक वा अनेक दिए ऊपर नीचे बने होते हैं। चौमुखा। विशेष—इनमें तेल भरकर बत्तियाँ जलाई जाती हैं। उन दिपों में किसी में एक, किसी में दो और किसी में चार बत्तियाँ जलती हैं। २. कोई साधारण दीवट। चिरागदान।

फतीला
संज्ञा पुं० [अ० फतीलह्] १. बत्ती के आकार में लपेटा कागज जिसपर यंत्र लिखा हो। पलीता। उ०—ताबीज फतीला फाल फिसू और जादू मंतर लाना है।—राम० धर्म०, पृ० ९२। २. वह बत्ती जिससे रंजक में आग लगाई जाती है। ३. दीपवर्तिका। दीए की बत्ती। ४. जरदोजी का काम करनेवालो की लकड़ी की वह तीली जिसपर बेल बूटा ओर फूलों की डालियाँ बनाने के लिये कारीगर तार को लपेटते हैं। यौ०—फतीलासोज = दे० 'फतीलसोज'।

फतुही †
संज्ञा स्त्री० [अ० फतुही] दे० 'फतूही। उ०—झँगले के बजाय बे बटन की फतुही पहने।—अभिशप्त, पृ० १३८।

फतूर
संज्ञा पुं० [अ० फुतूर] १. विकार। दोष। क्रि० प्र०—आना। २. हानि। नुकसान। ३. विघ्न। बाधा। क्रि० प्र०—डालना।—पड़ना। ४. उपद्रव। खुराफात। क्रि० प्र०—उठाना।—खड़ा करना।

फतूरिया
वि० [अ० फुतूर, हिं० फतूर + इया (प्रत्य०)] जो किसी प्रकार का फतूर या उत्पात करे। खुराफात करनेवाला। उपद्रवी।

फतूह
संज्ञा स्त्री० [अ० फतूह 'फ़तह' का बहुवचन] १. विजय। जीत। जय। उ०—(क) सुनत फतुह शाह सुख पायो। बढ़ि नवाब को मन सब आय।—लाल (शब्द०)। (ख) दबटयो जोर सुभट समूह। वह बलिराम लेत फतूह।—सूदन (शब्द०)। (ग) पुहुमि को पुरहून शत्रुशाल को सपूत संगर फतूहै सदा जासों अनुरागती।—मतिराम (शब्द०)। २. विजय में प्राप्त धन आदि। वह धन जो लड़ाई जीतने पर मिला हो। ३. लूट का माल।

फतूही
संज्ञा स्त्री० [अ० फुतूही] १. एक प्रकार की पहनने की कुरती जो कमर तक होती है और जिसके सामने बटन या घुंडी लगाई जाती है। इसमें आस्तीन नहीं होती। सदरी। उ०—फतूही को वेस्ट कोट पुकारती।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० २५९। २. बहँकटी। सलूका। ३. विजय या लूट का धन। लड़ाई या लूट में मिला हुआ माल। क्रि० प्र०—मारना।

फते पु †
संज्ञा स्त्री० [अ० फतह्] दे० 'फतह'। उ०—(क) रणत- भवँर की फते दे, कदमु आऊँ चाह।—ह० रासो, पृ० ८४। (ख) सामाँ सैन सयान की सबै साहि के साथ। बाहु बली जयसाहि जू फते तिहारे हाथ।—बिहारी (शब्द०)। (ग) फिरयो सुफेरि साथ कों। फते निसान गाथ कों।—सूदन (शब्द०)।

फतेह
संज्ञा स्त्री० [अ० फतह] विजय। जीत। जय। उ०— भौंसिला अभंग तू तो जुरत जहाँई जंग तेरी एक फतेह होत मानो सदा संग री।—भूषण (शब्द०)।

फतै पु †
संज्ञा स्त्री० [अ० फत् ह] दे० 'फतह'। उ०—जीत लीधी जमी कठैथी जेणरी; पराजै हुई नँह फतै पाई।—रघु० रू०, पृ० ३१।

फत्कारी
संज्ञा पुं० [सं० फत्कारिन्] पक्षी [को०]।

फत्ह
संज्ञा स्त्री० [अ० फत् ह] दे० 'फतह'। उ०—आज यह फत्ह का दरबार मुबारक होए।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० ५४२।

फत्थर पु ‡
संज्ञा पुं० [सं० प्रस्तर, प्रा० हिं० पत्थर] दे० 'पत्थर'। उ०—तू नादिर हुमर हुनर सूँ करेगा अगर। फत्थर कूँ सोना होर सोने कूँ फत्थर।—दक्खिनी०, पृ० ३४९।

फदकना
क्रि० अ० [अनु०] १. फद फद शब्द करना। भात, रस आदि का पकने समय फद फद शब्द करेक उछलना। खदबद करना। २. दे० 'फुदकना'। उ०—फूले फदकत लै फरी पल कठाछ करवार। करत बचावत बिय नयन पायक घाव हजार।—बिहारी (शब्द०)। ३. स्पंदित होना। लहराना। तरंगित होना। छलकना। उ०—गऊ पद माँही पहौकर फदके, दादर मर्रय झिलारै। चत्रिग मैं चौमासौ बोलौ, ऐसा समा हमारे।—गोरख०, पृ० २११।

फदका †
संज्ञा पुं० [हिं० फदकना] गुड़ का वह पाग जो बहुत अधिक गाढ़ा न हो गया हो।

फदाना †
क्रि० अ० [हिं० फँदाना] फँसना। ग्रस्त होना। फंदे में होना। उ०—दुनिया माया मोह फदाना। राग रंग निशिवासर साना।—कबीर सा०, पृ० २७०।

फदफदाना
क्रि० अ० [अनु०] १. शरीर में बहुत सी फुंसिया या गरमी के दाने निकल आना। २. वृक्षों में बहुत सी शाखाएँ निकलना। † दे० 'फदकना'—१।

फदिया †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'फरिया (१)'।

फनकना पु
क्रि० अ० [अनु०] फन् फन् शब्द करना। फनकना। उ०—फनंकत सायक चारिहु ओर। भनंकत गोलिन की घनघोर।—सूदन (शब्द०)।

फन (१)
संज्ञा पुं० [सं० फण] १. साँप का सिर उस समय जब वह अपनी गर्दन के दोनों ओर की नलियों में वायु भरकर उसे फैलाकर छत्र के आकार का बना लेता है। फण। उ०—शेषनाग के सहस फन जामें जिह्वा दोय। नर के एकै जीभ है ताही में रह सोय।—कबीर (शब्द०)। २. बाल। ३. भटवांस। ४. नाँव के डाँड़ का वह अगला और चौड़ा भाग जिससे पानी काटा जाता है। पत्ता। (लश०)। ५. अगला सिरा। अग्रभाग। उ०—थल वेत छुट्टी फनं बेत उट्टी। पृ० रा०, १२। ८३।

फन (२)
संज्ञा पुं० [सं० फणी] दे० 'फणी'।

फन (३)
संज्ञा पुं० [अ० फन] १. गुण। खूबी। २. विद्या। ३. दस्तकारी। ४. बाजीगरी। इंद्रजाल (को०)। ५. छलने का ढंग। मकर। उ०—नागिन के तो एक फन नारी के फन बीस। जाको डस्यो न फिरि जिऐ मरिहै बिस्बा बीस।— कबीर (शब्द०)।

फनकना
क्रि० अ० [अनु०] हवा में सन् सन् करते हुए हिलना, डोलना या चलना। फन् फन् शब्द करना। फनफनाना।

फनकार (१)
संज्ञा स्त्री० [अनु०] फन फन होने का शब्द। वैसा शब्द जैसा साँप के फूँकने या बैल आदि के साँस लेने से होता है।

फनकार (२)
संज्ञा पुं० [अं० फन + फा० कार] कलावंत। गुणवाला विद्वान् [को०]।

फनगना †
क्रि० अ० [सं० स्फुटन, हिं० फुनगी] नए नए अंकुरों का निकलना। कल्ला फूटना। पनपना।

फनगा † (१)
संज्ञा पुं० [हिं० फनगना] १. नई और कोमल डाली। कल्ला। २. बाँस आदि की तीली।

फनगा (२)
संज्ञा पुं० [सं० पतङ्ग] फतिंगा। उ०—पाँखी ओर फनगे इत्यादि।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० १३।

फनना †
क्रि० अ० [हिं० फानना] काम का आरंभ होना। काम हाथ में लिया जाना। काम में हाथ लगाया जाना।

फनपति पु
संज्ञा पुं० [सं० फणिपति] सपों का राजा। शेष या वासुकि। उ०—फनपति बीरन देख के, राखे फनहि सकोर।—कबीर सा०, पृ० ८६४।

फनफन
संज्ञा स्त्री० [अनुध्व०] १. बार बार फन फन शब्द होना। २. नाक से जोर से मल बाहर निकालना।

फनफनाना
क्रि० अ० [अनु०] १. हवा छोड़कर वा चीरकर फन फन शब्द उत्पन्न करना। जैसे, साँप का फनफनाना। २. चंचलता के कारण हिलना या इधर उधर करना। उ०—छनछनत तुरंगम तरह हार। फनफनत बदन उच्छलत वार।—सूदन (शब्द०)।

फनस
संज्ञा पुं० [सं० पनस, प्रा० फनस] कटहल।

फना
संज्ञा स्त्री० [अ० फना] १. विनाश। नाश। बरबादी। २. मृत्यु। मौत। उ०—(क) फना को करै कबूल सोई वह काबापावै।—पलटू०, भा० १, पृ० ७६। ३. लुप्त। गायब। अंतर्घान। उ०—मेरी तो इन हथकंड़ों से रूह फना होती है।—रंगभूमि भा० २, पृ० ६९२। मुहा०—दम फना होना = मारे भय के जान सूखना। बहुत अधिक भयभीत होना। जैसे,—तुम्हें देखते ही लड़के का दम फना हो जाता है।

फनाना †
क्रि० स० [हिं० फानना] १. प्रारंभ करना। शुरू करना। २. तैयार करना।

फनाली पु
संज्ञा स्त्री० [सं० फणावली] फनों की पंक्ति। फनों की अवली। उ०—जनम को चाली एरी अदभुत खयाली आजु काली की फनाली पै नचत बनमाली है।—पद्माकर ग्रं०, २३१।

फनाह पु
संज्ञा स्त्री० [अ० फना] दे० 'फना'। उ०—भयौ तौ दिली कौ पति देखत फनाह आज।—हम्मीर०, पृ० ३७।

फनिंग
संज्ञा पुं० [सं० फणीन्द्र, हिं० फन + इंग (प्रत्य०)] साँप। उ०—दान लैहों सब अंगनि को। अति मद गलित ताल फल ते गुरु इन युग उरोज उरंगनवि को।...कोकिल कीर कपोत किसलता हाटक हंस फनिंगन को।—सूर (शब्द०)।

फनिंद पु †
संज्ञा पुं० [सं० फणीन्द्र] सर्प। फणीद्र। उ०—फैले बृंद फनिंद कै गैल छैल नहिं भूल। मेघ पुंज तम कुंज कौ चली अली अनुकूल।—स० सप्तक, पृ० ३९१।

फनिंदी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० फनिंद + ई (प्रत्य०)] सर्पिणी। नागिन। उ०—नाथि फनिंदहि तोषि फनिंदी प्रगट भयो द्रुत मध्य कलिंदी।—भिखारी०, ग्रं०, भा० १, पृ० २६८।

फनि पु
संज्ञा पुं० [सं० फण] १. दे० 'फणी'। उ०—स्वाति बूँद बरसै फनि ऊपर सीस विषै होई जाई। वही बूँद कै मोती निपजै संगत की अधिकाई।—रैदास बानी, पृ० ७२। २. दे० 'फण'।

फनिक पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'फणिक'। उ०—गइ मनि मनहु फनिक फिरि पाई।—मानस, २। ४४।

फनिग पु (१)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'फणिक'।

फनिग (२)
संज्ञा पुं० [हिं० फतिंगा] फतिंगा। फनगा। उ०—सबद एक उन्ह कहा अकेला। गुरु जस भिंग फनिग जस चेला।—जायसी (शब्द०)।

फनिधर
संज्ञा पुं० [सं० फणिधर] साँप।

फनिपति
संज्ञा पुं० [सं० फणिपति] दे० 'फणिपति'।

फनियाला (१)
संज्ञा पुं० [हिं० देश०] गज डेढ़ गज लंबी करघे की एक लकड़ी जिसपर तानी लपेटी जाती है और जिसके दोनों सिरों पर दो चूले और चार छेद होते हैं। लपेटन। तूर।

फनियाला (२)
संज्ञा पुं० [हिं० फन + इयाला (प्रत्य०)] साँप।

फनिराज
संज्ञा पुं० [सं० फणिराज] फणींद्र।

फनी पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० फणी] दे० 'फणी'।

फनी (२)
संज्ञा स्त्री० दे० 'फण'।

फनीक पु
संज्ञा पुं० [हिं०] फनिक। सर्प। उ०—तरिवर हीन भयो बिनु पल्लौ सो गनि बिनु कवन जो कहत फनीका।—सं० दरिया, पृ० ६३।

फनीपति पु
संज्ञा पुं० [सं० फणिपति] दे० 'फणिपति'। उ०— दलके चढ़त फनमंडल फनीपति को।—मतिराम ग्रं०, पृ० ३९४।

फनूस पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'फानूस'। उ०—हवसी गुलाम भए देखि कारे केस तेरे, चीनी लिख गालन को फोरत फनूस हैं।—भाररेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ८६४।

फनेस पु
संज्ञा पुं० [सं० फणीश; हिं० फन + ईस] फनों का स्वामी। वह जिसके अनेक फण हो। शेषनाग। उ०—दास जू बादि जनेस मनेस घनेस फनेस गनेस कहैवो।—भिखारी० ग्रं०, भा० २, पृ० ३८।

फन्न
संज्ञा पुं० [अ० फन्न] दे० 'फन' (२)।

फन्नी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० फण] १. लकड़ी आदि का वह टुकड़ा जो किसी ढीली चीज की जड़ में उसे कसने या दृढ़ करने के लिये ठोंका जाता है। पच्चर। २. कंघी की तरह का जुलाहों का एक औजार जो बाँस की तीलियों का बना हुआ होता है और जिससे दबाकर बुना हुआ बाना ठीक किया जाता है।

फन्नी (२)
वि० [अ० फन्नी] फन संबंधी। कला संबंधी [को०]।

फपक
संज्ञा स्त्री० [हिं०] बढ़ती। बाढ़।

फपकना
क्रि० अ० [हिं०] १. बढ़ना। २. दे० 'फफकना'।

फप्फस
वि० [अनु०] जिसका शरीर बादी आदि के कारण बहुत फूल गया हो। मोटा और भद्दा।

फफकना
क्रि० अ० [अनु०] १. रुक रुककर रोना। २. भभकना जैसे, दिए का।

फफका †
संज्ञा पुं० [अनु०] फफोला। छाला।

फफदना †
क्रि० अ० [सं० प्रपतन या अनु०] १. किसी गीले पदार्थ का बढ़कर फैलना। जैसे, गोबर का फफदना। २. फैलना। कढ़ना (चर्मरोग या घाव आदि के संबंध में)। जैसे, दाद का फफदना। घाव का फफदना।

फफसा † (१)
संज्ञा पुं० [सं० फुप्फुस] फुफ्फुस। फेफड़ा।

फफसा (२)
वि० [अनु०] १. फूला हुआ और अंदर से खाली। पोला। २. (फल) जिसका स्वाद बिगड़ गया हो। बुरे स्वादवाला। ३. स्वादाहीन। फीका।

फफूँद
संज्ञा स्त्री० [हिं० फाहा या अनु०] दे० 'फफूँदी (२)'।

फफूँदी पु (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० फुबती] स्त्रियों के साड़ी का बंधन। नीवी। उ०—लीन्ही उसास मलीन भई दुति दीन्हीं फुँदी फफूँदी की छपाय कै।—देव (शब्द०)।

फफूँदी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० (रूई का) फाहा] काई की तरह की पर सफेद तह जो बरसात के दिनों में फल, लकड़ी आदि पर लग जाती हैं। भुकड़ी।विशेष—यह वास्तव में खुमी या कुकुरमुत्ते की जाति के अत्यंत सूक्ष्म उदभिद हैं जो जंतुओं या पेड़ पौधों, मृत या जीवित शरीर पर ही पल सकते हैं। और उद्भिदों के समान मिट्टी आदि द्रव्यों को शरीरद्रव्य में परिणत करने की शक्ति इनमें नहीं होती।

फफोर
संज्ञा पुं० [सं० ?या देश०] एक प्रकार का जंगली प्याज। विशेष—यह हिमालय में छह हजार फुट की ऊँचाई तक होता है और प्रायः प्याज की जगह काम में आता है।

फफोला
संज्ञा पुं० [सं० प्रस्फोट] आग में जलने से चमड़े पर का पोला उभार जिसके भीतर पानी भरा रहता है। छाला। झलका। उ०—कँवल चरन मँह परै फफोला। प्यास से जीभ भई जस ओला।—हिंदी प्रेम गाथा०, पृ० २३९। क्रि० प्र०—डालना।—पड़ना। मुहा०—दिल के फकोले फोड़ना = अपने दिल की जलन या क्रोध प्रकट करना। बुखार निकालना। दिल के फफोले फूटना = दिल की जलन या क्रोध प्रकट होना।

फबकना
क्रि० अ० [हिं० फफदना] १. दे० 'फफदना'। २. मोटा होना।

फबड़ा ‡
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की घास। उ०—एक दिवस कृष्ण की संतान मद पीकर मस्त होकर लड़ी और उसने फबड़े उखाड़ उखाड़कर एक दूसरे को मार मारकर सबके सब मर गए।—कबीर मं० पृ० २४५।

फबती
संज्ञा स्त्री० [हिं० फबना] १. वह बात जो समय के अनुकूल हो। देशकालानुसार सूक्ति। २. हँसी की बात जो किसी पर घटती हो। व्यंग्य। चुटकी। मुहा०—फबती उड़ाना = हँसी उड़ाना। फबती कसना = फबती कहना या उड़ाना। उ०—जमीदार पर फबती कसता, बाम्हन ठाकुर पर है हँसता।—ग्राम्या, पृ० ४५। फबती कहना = चुभती हुई पर हँसी की बात कहना। हँसी उड़ाते हुए चुटकी लेना। हास्यपूर्ण व्यंग्य कराना। फबितियाँ होना = चुभती या लगती बातें होना। उ०—हजरत की किता शरीफ देखकर हँस पड़े, फबतियाँ होने लगीं।—फिसाना०, भा० ३, पृ० २५।

फबन
संज्ञा स्त्री० [हिं० फबना] फबने का भाव। शोभा। छवि। सुंदरता।

फबना
क्रि० अ० [सं० प्रभवन, प्रा० पभवन] शोभा देना। सुंदर या भला जान पड़ना। खिलना। सोहना। उ०—(क) मान राखिबो माँगिबो पिय सो नित नव नेह। तुलसी तीनिउ तब फबै ज्यों चातक मति लेहु।—तुलसी (शब्द०)। (ख) फबि रही मोर चंद्रिका माथे छबि की उठत तरंग। मनहु अमर पति धनुष बिराजत नव जलधर के संग।—सूर (शब्द०)।

फबाना
क्रि० स० [हिं० फबना का सक० रूप] उपयुक्त स्थान में लगाना। उचित स्थान पर रखना। ऐसी जगह लगाना या रखना जहाँ भला जान पड़े। उ०—कहाँ साँच मैं खोवत करते झूठे कहाँ फबावत। सूर श्याम नागर नागारि वह हम तुम्हरे मन आवत।—सूर (शब्द०)।

फबि पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० फबना] फबने का भाव। फबन। छबि। शोभा। उ०—त्रिबली तटनी तट की पुलिनाई, काऊ बहि जाय कबौ फबि में।—(शब्द०)।

फबीला
वि० [हिं० फबि + ईला (प्रत्य०)] [वि० स्त्री० फबीली] जो फबता या भला जान पड़ता हो। शोभा देनेवाला। सुंदर। उ०—जैसे ही पोहि धरयो ठकुराइन मोती के ये गजरा चट- कीले। वैसेइ आय गए रघुनाथ कह्यो हँसि कौन कहैं ये फबीले। नाव तिहारो हियो कहि मैं तो उठाय लिए सुख पाय ह्वै ढीले। आखि सों लाय रहे पल एक रहे पल छाती सों छवाय छबीले।—रघुनाथ (शब्द०)।

फरकना पु
क्रि० अ० [हिं०] फलाँगना। फाँद जाना। लाँघ जाना। उ०—बूड़े थे परि ऊबरे गुर की लहरि चमंकि। भेरा देख्या जरजरा, (तब) ऊतरि पड़े फरंकि।—कबीर ग्रं०, पृ० ३।

फरग
संज्ञा पुं० [फा०] दे० 'फिरंग'।

फरंज
संज्ञा पुं० [फा०] दे० 'फिरंग'।

फर पु ‡ (१)
संज्ञा पुं० [सं० फल] १. दे० 'फल'। उ०—सास ससुर सम मुनितिय मुनिबर। असनु अमिय संमःकंद मूल फर।—मानस, २। १४०। यौ०—फल फउल = फल और फूल। उ—फर फूलन कै इंछा बारी।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० २४६। (ख) शाखा पत्र और फर फूला।—सुंदर० ग्रं०, भा० १, पृ० १११। २. दे० 'फड़'। ३. सामना। मुकाबिला। रण। युद्ध। उ०— भगे बलीमुख महाबली लखि फिरें न फर पर झेरे। अंगद अरु हनुमंत पाय द्रुत बार बार अस टेरे।—रघुराज (शब्द०)। ४. बिछावन। बिछौना। उ०—सूल से फूलन के फर पै तिय फूल छरी सी परी मुरझाती।—(शब्द०)। ५. बाण का अगला नोकादार हिस्सा। फल। उ०—बिनु फर बान राम तेहि मारा।—मानस, १। २१०।

फर (२)
संज्ञा पुं० [सं०] ढाल [को०]।

फरक † (१)
क्रि० वि० [सं० पराक्] दूर। अलग। परे। उ०—कोउ पत्र पवन तें बाजै। मृग चौकि फरक हो भाजै।—सुंदर० ग्रं० भा० १, पृ० १४१।

फरक (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० फरकना] १. फरकने का भाव। २. फरकने की क्रिया। ३. फुरती से उछलने कूदने की चेष्टा। चंचलता। फड़क। उ०—मृगनैनी दृग की फरक, उर उछाह, तन फूल। बिनही पिय आगम उमगि पलटन लगी दुकूल।—बिहारी र०, दो० २२२।

फरक (३)
संज्ञा पुं० [अ० फरक] १. पार्थक्य। पृथकत्व। अलगाव। २. दो वस्तुओं के बीच का अंतर। दूरी। मुहा०—फरक फरक होना = 'दूर हो' या 'राह छोड़ो' कीआवाज होना। 'हटो बचो' होना। उ०—चल्यो राजमंदिर की ओरा। फरक फरक माच्यो मग सोरा।—रघुराज (शब्द०)। ३. भेद। अंतर। जैसे,—(क) इसमें और उसमें बड़ा फरक है। (ख) बात में फरक न पड़ने पावे। (ग) उन्हें अपने और पराए का फरक नहीं मालूम है। ४. दुराव। परायापन। अन्यता। ५. कमी। कसर। जैसे,—(क) उसकी तोल में फरक नहीं है। (ख) घोड़े की असलियत में फरक मालूम होता है।

फरकन
संज्ञा पुं० [हिं० फरकना] १. फड़कने का भाव। दे० 'फड़क'। उ०—अँग फरकन अरु अरुनई इत्यादिक अनुभाव। गर्व असूथा उग्रता तहँ संचारी नाँव।—पद्माकर (शब्द०)। २. फरकने की क्रिया। फड़क। उ०—एरे बाम नैन मेरे एरे भुज बाम आज रोरे फरकन ते जो बालम निहारिहौं।—मतिराम (शब्द०)।

फरकना पु † (१)
क्रि० अ० [सं० स्फुरण] १. शरीर के किसी अवयव में अचानक फरफराहट या स्फुरण होना। फड़कना। उड़ना। फड़फड़ाना। दे० 'फड़कना'। उ०—(क) सुनु मंथरा बात फुर तोरी। दहिन आँखि नित फरकति मोरी।—तुलसी (शब्द०)। (ख) कुच भुज अधर नयन फरकत हैं बिनहिं बात अंचल ध्वज डोली। सोच निवारि करो मन आनँद मानों भाग्य दशा विधि खोली।—सूर (शब्द०)। (ग) सुमिरन एसा कीजिए दूजा लखे न कोय। ओठ न फरकत देखिए प्रेम राखिए गोय।—संतवाणी०, पृ० १००। २. आपसे आप निकलता या बाहर आना। स्फुरित होना। उमड़ना। उ०—मीठी अनूठी कढ़ैं बतियाँ सुनि सौतिनि का छतियाँ दरकी परैं। कोकिल कूकनि की का चली, कलहंसनहूँ के हिए धरकी परैं। प्यारी के आनन तेरो कढ़ै तेहि की उपमा द्विज को फरकी परै। धार सुंधार सुधारस की सुमनों बसुधा ढरकी परै।—द्विज (शब्द०)। (ख) लरिबे को दोऊ भुजा, फरकैं अति सिहारयँ। कहत बात कासों लरैं, कापै अब चढ़ि जायँ।—लल्लु (शब्द०)। ३. उड़ना। उ०—ध्वजा फरक्कै शून्य में बाजै अनहद तूर। तकिया है मैदान में पहुँचैगा कोई सूर।—कबीर (शब्द०)।

फरकना † (२)
क्रि० अ० [अ० फरक (=अंतर)] १. अलग होना। दूर होना। २. फटकर पृथक् हो जाना।

फरका (१)
संज्ञा पुं० [सं० फलक] १. छप्पर जो अलग छाकर बडेर पर चढ़ाया जाता है। उ०—ताको पूत कहावत हौ जो चोरी करत उघारत फरको। सूर श्याम कितनो तुम खैहो दधि माखन मेरे जहँ तहँ ढरको। २. बँडेर के एक ओर की छाजन। पल्ला। ३. आवरण। रोक। आच्छादन। उ०—सुंदर जो बिभचारिणी, फरका दीयौ डारि। लाज सरम वाके नहीं, डोलै घर घर बारि।—सुंदर ग्रं०, भा० २, पृ० ६९२। ४. टट्टर जो द्वार पर लगाया जाता है।

फरका (२)
संज्ञा पुं० [अ० फिरका] दे० 'फिर्का'।

फरकाना (१)
क्रि० स० [हिं० फरकना] १. फरकने का सकर्मक रूप। हिलाना। संचालित करना। उ० (क) तू काहैं नहिं वेगहिं आवै तोकौं कान्ह बुलावे। कबहुँ पलक हरि मूँदि लेत हैं कबहुँ अधर फरकावै।—सूर०, १०। ४३। (ख) सखी रोक ! यह फिर कहने की उत्सुकता दिखालाता है। देख, अधर अपना ऊपर का बार बार फरकाता है।—द्विवेदी (शब्द०)। २. फड़फड़ाना। बार बार हिलाना। उ०— आगम भो तरुनापन को बिसराम भई कछु चंचल आँखैं। खंजन के युग सावक ज्यों उड़ि आवत ना फरकावत पाँखैं।— बिसराम (शब्द०)।

फरकाना (२)
क्रि० स० [हिं० फरक (= अलग)] विलग करना। अलगाना। अलग करना।

फरकिल्ला
संज्ञा पुं० [हिं० फार + कील] वह खूँटा जो गाड़ी में हरसे के बाहर पटरी में लगाया जाता है और जिसपर लकड़ी, बाँस या बल्ले रखकर रस्सियों से कसकर ढाँचा बनाया जाता है।

फरकी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० फरक] १. बाँस की पतली तीली जिसमें लासा लगाकर चिड़ीमार चिड़िया फँसाते हैं। २. वह बड़ा पत्थर जो दीवारों की चुनाई में दूर दूर पर खड़े बल में लगाया जाता है।

फरकीला † (१)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'फरकिल्ला'।

फरकीला (२)
वि० [हिं० फड़क, फरक + ईला (प्रत्य०)] दे० 'फरकौहाँ'।

फरके †
क्रि० वि० [सं० पराक्] दूर। अलग। परे। फरक। उ०—और फिकिर करि फरके, जिकिर लगाउ रे।—जग० बानी, पृ० ४९।

फरकौहाँ पु †
वि० [हिं० फरक+ औहाँ (प्रत्य०)] फड़कनेवाला। स्पंदनशील। उ०—मदनातुर चातुर पियै पेखि भयौ चित लोल। पुनि पट सरकौहैं भए फरकौंहें सुकपोल।—स० सप्तक, पृ० २३९।

फरक्क ‡ (१)
संज्ञा पुं० [अ० फरक] दे० 'फरक'।

फरक्क ‡ (२)
क्रि० वि० [सं० पराक्, फरक, हिं० फरके] दूर। अलग। परे। उ०—बेड़ा देखा झाँझरा, ऊतरि भया फरक्क।— कबीर सा० सं०, भा० १, पृ० २।

फरगट †
वि० [सं० प्रकट, हिं० प्रगट, परगट] दे० 'प्रकट'। उ०—फरगट मारे फूटरा, कर सूँ सरगट काढ़। सठ दाखै भालौ सरस, गिनकावालो गाढ़।—बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० २।

फरच, फरचा †
वि० [सं० स्पृश्य, प्रा० फरस्स] १. जो जूठा न हो। शुद्ध। पवित्र। २. साफ। सुथरा। उ०—घासहरे को कुँअर भी फरचा कर आया। खबर पाइ मनसूर भी खुसियौं से छाया।—सुजान०, पृ० १४६।

फरचई, फरचाई †
संज्ञा स्त्री० [हिं० फरचा + ई (प्रत्य०)] १. शुद्धता। पवित्रता। २. सफाई।

फरचाना †
क्रि० स० [हिं० फरचा] १. बरतन आदि को धोकर साफ करना। २. पवित्र या शुद्ध करना। ३. हुक्म देना। आज्ञा देना।

फरजंद
संज्ञा पुं० [फा० फरजंद] पुत्र। लड़का। बेटा। उ०— (क) पेर कूच करि दूसरा रबिजा तढ आया। तहँ फरजंद वजीर संग मिलना ठहराया।—सूदन (शब्द०)। (ख) कहैं रघुराज मुनिराज हमसे कहो, कौन के फबे फरजंद दिलहूब हैं।—रघुराज (शब्द०)।

फरजंदी
संज्ञा स्त्री० [फा० फर्जदी] पिता-पुत्र-संबंध।

फरज (१)
संज्ञा स्त्री० [अ० फरज] दरार।

फरज (२)
संज्ञा पुं० [अ० फर्ज] दे० 'फर्ज'।

फरजानगी
संज्ञा स्त्री० [अ० फर्ज] बुद्धिमत्ता।

फरजाना
वि० [फा० फरजानह्] बुद्धिमान्।

फरजिंद †
संज्ञा पुं० [फा० फरजानह्] दे० 'फरजंद'।

फरजी
संज्ञा पुं० [फा० फरजी] शतरंज का एक मोहरा जिसे रानी या वजीर भी कहते हैं। वजीर। उ०—(क) बड़ो बड़ाई ना तजै छोटे बहु इतराय। ज्यों प्यादा फरजो भयो टेढ़ो टे़ढ़ो जाय।—रहीम (शब्द०)। (ख) पहले हम जाय दियो कर में, तिय खेलत ही घर में फरजी। बघुवंत इकंत पढ़ो, तबही रतिकंत के बानन लै बरजी। बिलखी हमें और सुनाइबे को कहि तोष लख्यो सिगरी भरजी। गरजी ह्वै दियो उन पान हमें पढ़ि साँवरे रावरे की अरजी।—तोष (शब्द०)। विशेष—यह मोहरा खेल भर में बड़ा उपयोगी माना जाता है। शतरंज के किसी किसी खेल में यह टेढ़ा चलता है और शेष में प्रायः सीधा और टेढ़ा दोनों प्रकार की चाल आगे और पीछे दोनों ओर चलता है।

फरजी (२)
वि० जो असली न हो बल्कि मान लिया गया हो। नकली। बनावटी। जैसे,—वे अपना एक फरजी नाम रखकर दरबार में पहुँचे।

फरजीबंद
संज्ञा पुं० [फा० फरजीबंद] शतरंज के खेल में एक योग जिसमें फरजी किसी प्यादे के जोर पर बादशाह को ऐसी शह देता है जिससे विपक्ष की हार होती है।

फरजीबँद पु
संज्ञा पुं० [हिं० फरजीबंद] दे० 'फरजीबंद'। उ०— घोड़ा दै फरजीबँद लावा। जेहि मुहरा रुख चहै सो पावा।—जायसी (शब्द०)।

फरद (१)
संज्ञा स्त्री० [अ० फर्द] १. लेखा वा वस्तुओं की सूची आदि जो स्मरणार्थ किसी कागज पर अलग लिखा गई हो। जैसे,— घर के सब समान की एक फरद तैयार कर लो। दे० 'फर्द'। उ०—फारि डारु फरद न राखु रोजनामा कहूँ खाता खत जान दे बही को बहि जान दे।—पद्माकर (शब्द०)। २. एक ही तरह के, एक साथ बननेवाले अथवा एक साथ काम में आनेवाले कपड़ों के जोड़ में से एक कपड़ा। पल्ला। जैसे, एक फरद धोती, एक फरद चादर, एक फरद शाल। ३. रजाई या दुलाई का ऊपरी पल्ला। उ०—कहै पद्माकर जु कैघौं काम कारीगर नुकता दियो है हेम फरद सोहाई में।— पद्माकर (शब्द०)। ४. एक पक्षी का नाम जो बरफीले पहाड़ों पर होता है और जिसके विषय में वैसी ही बातें प्रसिद्ध हैं जैसी चकवा और चकई के विषय में। ५. एक प्रकार का लक्का कबूतर जिसके सरि पर टीका होता है। ६. दो पदों की कविता।

फरद (२)
वि० जिसकी बराबरी करनेवाला कोई न हो। अनुपम। बेजोड़। जैसे,—आप भी बातें बनाने में फरद हैं। (बोल- चाल)। उ०—चल्यो दरद जेहि रच्यो फरद विधि मित्र दरद हर।—गोपाल (शब्द०)।

फरना पु ‡
क्रि० अ० [सं० फलन] १. फलना। उ०—(क) गुलगुल तुंरँग सदा फर फरे। नारँग अति राते रस भरे।—जायसी (शब्द०)। (ख) धनुषयज्ञ कमनीय अवनितल कौतुक ही भए आय खरे री। छबि सुर सभा मनहुँ मनसिज के कलित कलपतरु रूख फरै री।—तुलसी (शब्द०)। २. फलित करना। अर्थयुक्त करना। उ०—आरति इस्क इमाने धरई। अल्लह अगुने बानी फरई।—गुलाल० बानी पृ०, १२६। ३. फोड़े फुंसियाँ या छोटे छोटे दोनों का अधिकता से होना। जैसे,—दाढ़ी फरना, देह फरना। मुहा०—फरना फूलना = दे० 'फलना'। उ०—गोंद कली सग बिगसी ऋतु बसंत और फाग। फूलहु फरहु सदा सुख सफल सुहाग।—जायसी (शब्द०)।

फरनीचर
संज्ञा पुं० [अं०] साज सजावट का सामान जिसमें कुर्सी मेज, आलमरी सजावट के समाना आदि की गणना है। उ०—एक दिन बहुत लाचार होकर राबिन का स्वामी अपना तमाम फरनीचर.... बेच शहर छोड़कर चला गया।— तारिका, पृ० २।

फरप्फर पु
क्रि० वि० [सं० परस्पर] परस्पर में। आपस में। उ०—फरप्फर फौज तरप्फर मार।—प० रासो, पृ० ४२।

फरफंद
संज्ञा पुं० [हिं० फर अनु०, फंद (=फंदा, जाल)] १. दाँव पेंच। छल कपट। माया। उ०—(क) उनको नहिं दोस परोस तज्यो कहि को फरफंद परायौ परै।—बेनी (शब्द०)। (ख) चल दूर हो, दुष्ट कहीं का, मै तुझे और तेरे फरफंदों को भली भाँति जानता हूँ।—अयोध्यासिंह (शब्द०)। (ग) छाँड सब दीन फरफंदा, भए अव साध के बंदा।—तुरसी० श०, पृ० ५९। क्रि० प्र०—करना।—रचना। २. नखरा। चोचला। क्रि० प्र०—करना।—खेलना।—दिखाना।

फरफदी
वि० [अनु० फर + ङिं० फंदा] १. फरफंद करनेवाला। छल कपट या दाँव पेंच करनेवाला। धूर्त। चालबाज। २. नखरेबाज। ३. धूर्तता या छल से भरा हुआ। उ०—खेलन खेल मेल फरफदी, बूँदी तन रुचिर सुहाई।—घट०, पृ० २७९।

फरफर (१)
संज्ञा पुं० [अनु०] किसी पदार्थ के उड़ने या फड़कने से उत्पन्न शब्द। उ०—(क) लग्गिय तुरंगान थरथरा। नथुनान लग्गिय फरफरा।—सूदन (शब्द०)। (ख) फहर रहे थे केतु उच्च अट्टें पर फर फर।—साकेत, पृ० ४१०।

फरफर (२)
क्रि० वि० [अनुध्व०] बिना रुके हुए। तेजी से। बिना बाधा के। उ०—(क) देवता शुद्ध हिंदी फरफर बोल रहा था।—किन्नर०, पृ० १०६। (ख) मेरे जैसै वेशभूषा के आदमी को फरफर ल्हासा की नागरिक भाषा में बात करते देखकर पहले आश्चर्य हुआ।—किन्नर०, पृ० ४०।

फरफराना (१)
क्रि० अ० [अनु० फरफर] 'फर फर' शब्द उत्पन्न होना। फड़फड़ाना। उ०—फरफरात फर में घर लागे। सेख मुनीर मानि भय भागे।—लाल (शब्द०)।

फरफराना (२)
क्रि० स० १. फरफर शब्द उत्पन्न करना। २. दे० 'फड़फड़ाना'।

फरफुंदा पु †
संज्ञा पुं० [अनु० फरफर] उड़नेवाला कीड़ा। फतिंगा। उ०—गहि फरफुँदा तेहि गुद माहीं। डारी सींक दया भय नाहीं।—रघुराज (शब्द०)।

फरमंडल पु
संज्ञा पुं० [हिं० फर + सं० मण्डल] रणक्षेत्र। युद्ध का मैदान। उ०—(क) हुंकरत हींसत फवत फुँकरत, फरमंडल मझार दल दीरय दलत हैं।—हम्मीर०, पृ० ४। (ख) कीनौ घमसान समसान फरमंडल मैं घाइनु अघाइ अघवाए वीर वास मैं।—सुजान०, पृ० २३।

फरमाँ
संज्ञा पुं० [फा० फरमाँ] दे० 'फरमान'।

फरमाँबरदार
संज्ञा पुं० [फा० फरमाँबरदार] आज्ञाकारी। आज्ञा- नुयायी।

फरमा (१)
संज्ञा पुं० [अं० फ्रेम] १. ढाँचा। डौल। २. लकड़ी आदि का बना हुआ ढाँचा साँचा जिसपर रखकर चमार जूता बनाते हैं। कालबूत। ३. किसी प्रकार का साँचा जिसमें कोई चीज ढाली जाय। ४. कंपोज करके चेस में कसा हुआ मैटर जो छपने के लिये तैयार हो।

फरमा (२)
संज्ञा पुं० [अं० फार्म] कागज का पूरा तखता जो एक बार में प्रेस में छापा जाता है। जुज। दे० 'फार्म'।

फरमाइश
संज्ञा स्त्री० [फा० फरमाइश] आज्ञा, विशेषतः वह आज्ञा जो कोई चीज लाने या बनाने आदि के लिये दी जाय। जैसे,—(क) यह आलमारी फरमाइश देकर बनावाई गई है। (ख) उन्होंने मुझसे कुछ किताबों की फरमाइश की थी। क्रि० प्र०—करना।—देना।—पूरी करना।

फरमाइशी
वि० [फा० फरमाइशी] जो फरमाइश करके बनवाया या मँगाया गया हो। विशेष रूप से आज्ञा देकर मँगाया या तैयार कराया हुआ। (ऐसा पदार्थ प्रायः अच्छा और बढ़िया समझा जाता है।) जैसे, फरमाइशी जूता। फरमाइशी थान।

फरमान
संज्ञा पुं० [फा० फरमान; मि० सं० प्रमाण, पुं० हिं० परमान, पुरमान] राजकीय आज्ञापत्र। वह आज्ञापात्र जो राजा या राज्य की ओर से किसी को लिखा गया हो। अनुशासनपत्र। उ०—(क) मुल्ला तुझे करीम का अब आया फरमान। घट फोरा घर घर किया साहेब का नीसान।— कबीर (शब्द०)। (ख) आमिल हू छिन पौन प्रवीन लै नाफरमा फरमानु पठायो।—गुमान (शब्द०)। (ग) वार पार मयुरा तलक हूआ फरमाना। बकसी की जागीर दै बकसी मैं ठाना।—सूदन (शब्द०)। (घ) फरमान मेल कञोण चाहि, तिरहुति लेलि जन्हि साहि।—कीर्ति०, पृ० ५८। यौ०—फरमाँबरदार। फरमाँबरदारी = आज्ञाकारी होना। फरमाँ- बरदार होना।

फरमाना
क्रि० स० [फा० फरमान] आज्ञा देना। कहना। उ०— (क) सोयो बादशाह निसि आय कै सपन दियो कियो वाको इष्ट वेष कही प्यास लागी है। पीयो जल जाय आबखाने लै बखाने तब अति ही रिसाने को पियावै कोउ रागी है। फिरि मारयो लात अरे सुनी नहीं बात मेरी, आप फरमावो जो पियावे बड़ भागी है। सो तो तै लै कैद करयो सुनि अवरेउ डरयो भरयो हिय भाव मति सोवत से जागी है।— प्रियादास (शब्द०)। (ख) अब जो रोस साह उर आवै। तो हम पे फौजें फरमावै।—लाल (शब्द०)। विशेष—इस शब्द का प्रयोग प्रायः बड़ों के संबंध में उनके प्रति आदर सूचित करने के लिये होता है। जैसे,—यही बात मौलवी साहब भी फरमाते थे।

फरमायश
संज्ञा स्त्री० [फा० फरमाइश] दे० 'फरमाइश'। उ०— लाला मदनमोहन ने फरमायश की।—श्रीनिवास ग्रं०, पृ० १८२।

फरमूद
वि० [फा० फरमूदह्] फरमाया हुआ। कहा हुआ। उ०—उसकूँ छोड़ राह विचार शरियत जिसकूँ कहना। इंसाफ उपर सभी काम फरमूद के सूँ रहना।—दक्खिनी०, पृ० ५५।

फरमोस पु
वि० [फा० फरमोश] विस्मृत। भूला या भुलाया हुआ। उ०—भीखा का मन कपट कुचाली दिन दिन होइ फरमोस।—भीखा०, श०, पृ० २८।

फरयाद
संज्ञा स्त्री० [फा० फर्याद] दे० 'फरियाद'।

फरयारी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फाल] हल के जाँघे में लगी हुई वह लकड़ी जिसमें फाल (फल) लगा रहता है। खोपी।

फरराना † (१)
क्रि० अ० [हि० फहराना] दे० 'फहराना'। उ०—है गै गैंवर सघन घन, छत्र धजा धजा फरराइ। ता सुख सुख पैं भिष्या भली, हरि सुमिरत दिन जाइ।—कबीर ग्रं०, पृ० ५३।

फरराना (२)
क्रि० स० दे० 'फहराना'।

फरलांग
संज्ञा पुं० [अं०] भूमि की लंबाई की एक अँगरेजी माप। विशेष—यह एक मील का आठवाँ भाग होता है और चालीस राड या पोल (लट्ठे) के बराबर होता है।

फरलो
संज्ञा स्त्री० [अं०] एक प्रकार की छुट्टी जो सरकारी नौकरों की आधे वेतन पर मिलती है।

फरवरी
संज्ञा पुं० [अं० फेब्रुअरी] अँगरेजी सन् का दूसरा महीना जो प्रायः अट्ठाइस दिन का होता है। विशेष—जब सन् ईसवी ४ से पूरा पूरा विभक्त हो जाता है उस वर्ष यह मास २९ दिन का होता है। परतुं जब सन् में एकाई और दहाई दोनों अंकों के स्थानों के स्थान में शून्य होता है, उस अवस्था में यह तबतक २९ दिन का नहीं होता जबतक सैकड़े और हजार का अंक ४ से पूरा पूरा विभाजित न हो। जिस वर्ष यह महीना २९ दिन का होता है उस वर्ष इसे अँगरेजी हिसाब से लौंद का महीना कहते हैं।

फरवार †
संज्ञा पुं० [सं० फल, हिं० फर + बार (प्रत्य०)] वह स्थान जहाँ किसान अपने खेत की उपज रखते हैं और जहाँ उसे दाँते और पीटते हैं। खलिहान। उ०—कटत धान अरु दाँय जात जब फरवारन महँ।—प्रेमघन०, भा० १, पृ० ४४।

फरवारी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० फरवार + ई (प्रत्य०)] अन्न का वह भाग जो किसान अपने खलिहान में से राशि उठाने के समय बढ़ई, धोबी, नाई ब्राह्मण आदि को निकालकर देते हैं।

फरवी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० स्फुरण] एक प्रकार का भुना हुआ चावल जो भुनने पर भीतर से पोला हो जाता है। मुरमुरा। लाई।

फरवी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० फावड़ा अथवा देश०] दे० 'फरुही (१)'।

फरश
संज्ञा पुं० [अं०फर्श] १. बैठने के लिये बिछाने का वस्त्र। बिछावन। २. बराबर भूमि जिसपर लोग बैठते हैं। धरातल। समतल भूमि। ३. घर या कोठरी के भीतर की वह समतल भूमि जो पत्थर ईंटें बिछाकर या चुने गारे से बराबर की गई हो। बनी हुई जमीन। गच।

फरशबंद
संज्ञा पुं० [फा० फर्शबंद] वह ऊँचा और समतल स्थान जहाँ फरश बना हो।

फरशा †
वि० [बँग०, मिं० हिं० फरचा] गोरा। साफ। उ०— फरशा फरशा गामेर रंग।—भस्मावृत०, पृ० ७२।

फरशी (१)
संज्ञा स्त्री० [फा० फर्शी] १. फूल, पीतल, आदि का बना हुआ बरतन जिसका मुँह पतला और तंग होता है और जिस पर नैचा, सटक आदि लगाकर लोग तमाकू पीते हैं। गुड़- गुड़ी। २. वह हुक्का जो उक्त बरतन पर नैचा आदि लगाकर बनाया गया हो।

फरशी (२)
वि० फर्श से संबंधित या फर्श पर रखा वा बिछाया जानेवाला।

फरसंग
संज्ञा पुं० [फा० फरसंग] ४००० गज की दूरी। प्रायः सवा दो मील। उ०—तख्त कई फरसंग का हाजरि हुआ हुक्म सूँ उनके नित बर हवा।—दक्खिनी०, पृ० १०४।

फरस पु (१)
संज्ञा पुं० [अं० फर्श] दे० 'फरश'। उ०—बैठी जसन जलूस करि फरस फबी सुखदान। पानदान तै लै दऐ पान पान प्रति पान।—स० सप्तक, पृ० ३६४। यौ०—फरसबंद = दे० 'फरशबंद'। उ०—कहै पद्माकर फराकत फरसबंद फहरि फुहारन की फरस फबी है फाब।—पद्माकर (शब्द०)।

फरस पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० परशु] दे० 'फरसा'। यौ०—फरसराम = परशुराम। उ०—फरसराम फरसी गही लग्यो षत्रियन काल।—पृ० रा०, २। २५६।

फरसा
संज्ञा पुं० [सं० परशु (=फरशु)] १. पौनी और चौड़ी धार की एक प्रकार की कुल्हाड़ी। यह प्राचीन काल में युद्ध में काम आती थी। उ०—काल कराल नृपालन के धनुभंग सुने फरसा लिए धाए।—तुलसी (शब्द०)। २. फावड़ा।

फरसी (१)
संज्ञा स्त्री० [फा० फर्शी] दे० 'फरशी'।

फरसी पु (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० परशु] दे० 'फरसा'। उ०—फरसराम फरसी ग्रही लग्यौ पत्रियन काल।—पृ० रा०, २। २५६।

फरसूदा
वि० [फा० फर्सूदह्] १. जीर्णशीर्ण। जर्जर। २. पुराना [को०]।

फरस्सी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० फरसा] एक प्रकार की चौड़ी और पेनी धार की कुल्हाड़ी। दे० 'फरसा'। उ०—तबै फर्सरामं फरस्सी उभारी। पृ० रा०, २। २५३।

फरहंग
संज्ञा पुं० [फा०] १. कोश। शब्दसंग्रह। जैसे, फरहंग ए आसफिया। २. विवेक। ३. व्याख्या [को०]।

फरह
संज्ञा पुं० [अ० फरह] हर्ष। आनंद।

फरहटा †
संज्ञा पुं० [हिं० फाल] चौड़ी और पतली पटरियाँ जो चरखी आदि के बीच की नाभि से बाँधकर या गाड़कर खड़े बल में लगाई जाती हैं। फरेहा।

फरहत
संज्ञा स्त्री० [अ० फहँत] १. आनंद। प्रसन्नता। उ०— नजर करती है बस तुम्हारा जमाल। मेरे दिल को हासिल है फरहत कमाल।—दक्खिनी०, पृ० २१७। २. मनःशुद्धि।

फरहद
संज्ञा पुं० [सं० पारिभद्र,० पा० पारिभद्द, प्रा० पारिहिद्द] एक पेड़ का नाम जो बंगाल में समुद्र के किनारे बहुत होता है। वहाँ के लोग इसे 'पालिते मंदार' कहते हैं। विशेष—यह पेड़ थोड़े दिनों में बढ़कर तैयार हो जाता है और न बहुत बड़ा और न बहुत छओटा, मध्यम आकार का होता है। इसमें पहले काँटे होते है; पर बड़े होने पर छिलका उतरता है और स्कंध चिकना हो जाता है। किंतु डालियों में फिर भी छोटे छोटे काँटे रह जाते हैं। ढाक की पत्तियों के समान इसमें भी एक नाल में तीन तीन पत्तियाँ होती हैं। फूल लाल और सुंदर होते हैं। फूलों के झड़ जाने पर फलियाँ लगती हैं। फूलों से लाल रंग निकलता है। छाल से भी रंग निकाला जाता है और उसे कूटकर रस्सी भी बटी जाती है। इसकी लकड़ी नरम और साफ होती है और धूप में फटती या चिटकती नहीं। इसके खिलौनी आदि बनाए जाते हैं क्योकि इसपर बार्निश अच्छई खिलती है। पान केभीटों पर इसे छाया के लिये लोग लगाते हैं। पुराणों में इसे पंच देवतरु में माना है। इसे 'नहसुत' भी कहते हैं। वैद्यक में इसका स्वाद कटु, प्रकृति उष्ण और गुण अरुचि, कफ, कृमि और प्रमेह नाशक लिखा गया है। इसका फूल पित्तरोग और कर्णरोग का नाशक माना जाता है। पर्या०—पारिभद्र। भद्रक। प्रमंदर। कंटकिंशुक। निंबतरु।

फरहर ‡
वि० [सं० स्फार, प्रा० फार (=अलग अलग), अथवा फरहरा] १. जो एक में लिपटा या मिला हुआ न हो, अलग अलग हो। जैसे, फरहर भात। २. साफ। स्पष्ट। ३. शुद्ध। निर्मल। ४. जो कुछ दूर दूर पर हो। ५. जो उदास न हो। खिला हुआ। प्रसन्न। हरा भरा। ६. तेज। चालाक।

फरहरन पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० फरहरना] फरहराने का स्थिति। उ०—सखि निरखि भई मति पंगु, पीतांबर फरहरन में।—नंद० ग्रं०, पृ० ३८५।

फरहरना †
क्रि० अ० [अनु० फरफर] १. फरफराना। फरकना। उ०—भीमसेन फरके भुजदंडा। अधर फरहरत रोस प्रचंडा।—सबलसिंह (शब्द०)। २. उड़ना। फहराना। उ०— सिर केतु सुहावन फरहरै। जेहि लखि परदल थरहरै।— गोपाल (शब्द०)।

फरहरनि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] फरहराने का कार्य या स्थिति।

फरहरा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० फहराना] १. पताका। झंडा। उ०— जौं शरीर आगू चलत चपल प्रान तुहि जात। मनौ वातबस फरहरा पाछे ही फहरात।—श्यामा०, पृ० ६९। २. कपड़ें आदि का वह तिकोना या चौकना टुकड़ा जिसे छड़ या डंडे के सिरे पर लगाकर झंडी बनाते हैं और जो हवा के झोंड़े से उड़ता रहता है।

फरहरा (२)
वि० [हिं० फरहर] १. अलग अलग। स्पष्ट। २. शुद्ध। निर्मल। ३. खिला हुआ। प्रसन्न।

फरहारी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० फल या फर + हरा (प्रत्य०)] फल। उ०—सुख कुरियार फरहरी खाना। विष भा जबहि बिआध तुलाना।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० १६७।

फरहा †
संज्ञा पुं० [हिं० फल] धुनियों की कमान का वह भाग जो चौड़ा होता है और जिसपर से होकर ताँत दूसरी छोर तक जाती है। यह बेने के आकार का होता है और धुनते समय आगे पड़ता है।

फरहार †
संज्ञा पुं० [सं० फलाहार] दे० 'फलाहार'। उ०—पूजि पितर सुर अतिथि गुरु करन लगे फरहार।—मानस, २। २७८।

फरही †
संज्ञा स्त्री० [हिं० फरहा] लकड़ी का वह चौड़ा टुकड़ा जिसपर ठठेरे बरतन रखकर रेती से रेतते हैं।

फरा †
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का व्यंजन। फारा। विशेष—इसके बनाने के लिये पहले चावल के आटे को गरम पानी में गूँधकर उसकी पतली बत्तियाँ बटते हैं और फिर उन बत्तियों को उबलते हुए पानी की भाप में पकाते हैं।

फराक पु (१)
संज्ञा पुं० [फा० फराख] मैदान। आयत स्थान। उ०— उठाय बाग उप्परयो सु बिप्फरयो फराक में। महा अराक अड्डियो धमाक धुँधराक में।—सूदन (शब्द०)।

फराक (२)
वि० लंबा चौड़ा। विस्तृत। आयत। उ०—दूरि फराक रुचिर सो घाटा। जहँ जल पिअहि बाजि गज ठाटा।— तुलसी (शब्द०)।

फराक † (३)
संज्ञा पुं० [अं० फ्राक] एक प्रकार का छोटी आस्तीन का ढीला कुरता जिसे लड़कियाँ पहनती हैं।

फराकत (१)
वि० [फा० फराख] आयत। विस्तृत। लंबा चौड़ा और समतल। उ०—कहै पद्माकर फराकत फरमबंद फहरि फुहारन की फरस फबी है फाब।—पद्माकर (शब्द०)।

फराकत (२)
वि० [अ० फराग़त] दे० 'फरागत'।

फराकत (३)
संज्ञा पुं० दे० 'फरागत'।

फराख
वि० [फा० फ़राख़] विस्तुत। लंबा चौड़ा। आयत। उ०— करो फराख दिल फहम टुक कीजिए, फरक संसार से पीठ फेरी।—पलटू० बानी, भा० २, पृ० २७। यौ०—फराखदस्त =(१) उदार। (२) धनी। फराखदामन = दे० 'फराखदस्त'। फराखहौसला =(१) हिम्मती। (२) धैर्यशाली। धीर।

फराखी
संज्ञा स्त्री० [फा० फराखी] १. चौड़ाई। विस्तार। फैलाव। २. आढ्यता। संपन्नता। ३. घोड़े का तंग। विशेष—यह घोड़े की पीठ पर कंबल, गरदनी आदि डालकर उसपर लगाया जाता है। यह चौड़ा तमसा या फीता होता है और इसके दोनों सिरों पर कड़े लगे रहते हैं।

फरागत
संज्ञा स्त्री० [अ० फरागत] १. छुटकारा। छुट्टी। मुक्ति। मुहा०—फरागत करना = समाप्त करना। पूरा करना। उ०— इतना काम फरागत करके तब उठना। फरागत पाना या होना = छुटकारा पाना। निश्चिंत होना। २. निश्चिंतता। बेफिक्री। ३. मलत्याग। पाखाना फिरना। यौ०—फरागतखाना = शौचालय। मुहा०—फरागत जाना = पाखाने जाना। टट्टी जाना।

फराज
वि० [फा० फराज] ऊँचा। यौ०—नशेइफराज =(१) ऊँचा नीचा। (२) भला बुरा।

फराजी
संज्ञा स्त्री० [फा० फराजी] ऊँचाई। बुलंदी।

फराना पु †
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'फहराना'। उ०—सुंन गगन में धजा फराई पुछो सबद भयो प्रकासा।—रामानंद०, पृ० ४९।

फरामोश (१)
वि० [फा० फरामोश] भुला हुआ। विस्तृत। चित्त से उतरा हुआ। उ०—क्या शेख व क्या बरहमन जब आशिकी में आवे। तसबी करे फरमोश जुन्नार भूल जावे।—कविता कौ०, भा० ४, पृ० १५।

फरामोश (२)
संज्ञा पुं० लड़कों का एक खेल जिसमें वे आपस में कुछ समय के लिये यह बद लेते हैं कि यदि एक दूसरे को कोईचीज दे तो वह तुरंत 'फरमोश' कह दे। यदि चीज पाने पर पानेवाला 'फरामोश' न कहे तो वह हार जाता है। क्रि० प्र०—बदना।

फरमोस पु
वि० [फा० फरामोश] दे० 'फरामोश'। उ०— फरामोस कर फिकर फेल बद, फहम करै दिल माहीं।—कबीर श०, भा० ४, पृ० २८।

फरार (१)
वि० [अ० फरार] भागा हुआ। जो भाग गया हो। जैसे, फरार कैदी।

फरार (२)
संज्ञा पुं० भागना। पलायन।

फरार (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं० फैलाव] दे० 'फराल'।

फरार (४)
संज्ञा पुं० [हिं० फरहार] दे० फलाहार'।

फरारी
संज्ञा स्त्री० [अ० फरार + फा० ई (प्रत्य०)] भागा हुआ। पलायित।

फराल †
संज्ञा स्त्री० [हिं० फैलाव] १. फैलाव। विस्तार। २. तखता।

फरालन ‡
क्रि० स० [हिं० फैलाना] फैलाना। पसारना।

फराश
संज्ञा पुं० [देश०] झाऊ को जाति की जाति का एक प्रकार का बड़ा वृक्ष। विशेष—यह पंजाब, सिंध, अफागानिस्तान और फारस में अधिकता से पाया जाता है। यह गरमी के दिनों में फूलता है। खारी भूमि में अच्छी तरह बढ़ता है।

फरास † (१)
संज्ञा पुं० [सं० पलाश] दे० पलाश'।

फरास † (२)
संज्ञा पुं० [फा० फर्राश] दे० 'फर्राश'। उ०—रूप चाँदनी की गढ़ी स्वच्छ राखिबे हेत। दृग फरास हाजिर खड़े वरुनि बहारू देत।—स० सप्तक, पृ० १८२।

फरासीस
संज्ञा पुं० [फा०] १. फ्रांस देश। २. फ्रांस का रहनेवाला व्यक्ति। उ०—फरासीस कोम को फिरंगी एक नामी। जंगी हज्जार बीस फोज का कमामी।—शिखर०, पृ० १००। ३. एक प्रकार की छींट। विशेष—इसका रंग लाल होता है और जिसमें पीली या सफेद बूटियाँ अथवा बूटे बने हुए होते हैं। यह पहले फ्रांस देश से आया करती थी ।

फरासीसी
वि० [हिं० फरासीस] १. फ्रांस का रहनेवाला। उ०— काव्यसमीक्षा में फरासीसियों की प्रधानता के कारण इस शब्द को इसी अर्थ में ग्रहण करने से योरप में काव्य- दृष्टि इधर कितनी संकुचित हो गई।—रस०, पृ० ५८। २. फ्रांस का बना हुआ। ३. फ्रांस देश में उत्पन्न। फ्रांस का।

फराहम
वि० [फा० फराहम] इकट्ठा किया हुआ। संचित।

फराहमी
संज्ञा स्त्री० [फा० फराहमी] संचय करना या इकट्ठा करना। एकत्र करना।

फरिआ †
संज्ञा स्त्री० [हिं० फरना] ओढ़नी। उ०—सासु नँनद के लेहँगा फारे, बड़ी जिठानी की फरिआ, जच्चा मेरी लड़नों न जाने रे।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ९१५।

फरिका ‡
संज्ञा पुं० [हिं०] १. दे० 'फरका'। २. द्वार पर का टट्टर। दरवाजे के किवाड़। उ०— सुनत मुरली अलिन धीर धरिकै। चली पितु मातु अपमान करिकै। लरत निकसी सबै तोरि फरि कै। भई आतुर वदन दरश हरि कै।— सूर (शब्द०)।

फरिया (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० फरना] १. वह लहँगा जो सामने की ओर सिला नहीं रहता। उ०— औचक ही देखे तहँ राधा नयन विशाल बाल दिए रोरी। नील बसन फरिया कटि पहिरे बेनी पीठ रुचिर झकझोरी।— सूर (शब्द०)। विशेष— यह कपडे़ का चौकोर टुकड़ा होता है जिसको एक किनारे की ओर चुन लेतेत हैं। इसे स्त्रियाँ वा लड़कियाँ अपनी कमर में बाँध लेती हैं। २. ओढ़नी। फरिआ।

फरिया (२)
संज्ञा पुं० [हिं० फरना] रहट के चरखे वा चक्कर में लगी हुई वे लकड़ियाँ जिनपर मिट्टी की हँड़ियों की माला लटकती रहती है।

फरिया (३)
संज्ञा पुं० [हिं० परी (=मिट्टी का कटोरा)] मिट्टी की नाँद जो चीनी के कारखानों में इसलिये रखी जाती है कि उसमें पाग छोड़कर चीनी बनाई जाय। हौद।

फरियाद
संज्ञा स्त्री० [फा० फरियाद] १. दुःखित या पीड़ित प्राणियों का अपने परित्राण के लिये चिल्लाना। दुःख से बचाए जाने के लिये पुकार। शिकायत। नालिश। जैसे, नौकर का अपने मालिक से फरियाद करना, विद्यार्थी का अपने शिक्षक से फरियाद करना। उ०— (क) कबिरा दर दीवान में क्योंकर पावै दाद। पहिले बुरा कमाइ के पीछे कर फरियाद।— कबीर (शब्द०)। (ख) था इरादा तेरी फरियाद करूँ हाकिम से। वह भी कमबख्त तेरा चाहनेवाला निकला।— नजीर (शब्द०)। २. बिनती। प्रार्थना। यौ०— फरियादरस = पीड़ित को न्याय देने या दिलानेवाला। फरियादरसी = न्याय। इंसाफ।

फरियादी
वि० [फा० फरियादी] फरियाद करनेवाला। नालिश करनेवाला। अपने दुःख के परिहार के लिये प्रार्थना करनेवाला। उ०— तब ते काशीराज पहँ फरियादी में आय। निज निज हिसा देने कहि लाए ताहि बढ़ाय।—रघुनाथदास (शब्द०)।

फिरयाना (१)
क्रि० स० [सं० फलीकरण (=फटकना)] १. छाँटकर अलग करना। भूसी आदि अलग करके साफ करना। २. साफ करना। ३. पक्षनिर्णय करना। निपटाना। तै करना।

फरियाना (२)
क्रि० अ० १. छँटकर अलग होना। २. साफ होना। ३. तै होना। निर्णय होना। निबटना। ४. समझ पड़ना। सूझ पड़ना। साफ साफ दिखाई पड़ना।

फरिश्ता
संज्ञा पुं० [फा० फरिश्तह्] १. मुसलमानी धर्मग्रंथों के अनुसार ईश्वर का वह दूत जो उसकी आज्ञा के अनुसार कोई काम करता हो। जैसे, मौत का फरिश्ता, नेकी बदी की खबर लेनेवाला फरिश्ता। २. देवता। ३. सरल स्वभाव का बहुत ही सज्जन व्यक्ति (को०)।

फरिश्ताखू
वि० [फा० फिरिश्तह्खू] फरिश्तों की तरह नेक या अच्छी प्रकृतिवाला। उ०— अथी इस ठार एक जाहिद कूँ बेटी, फरिश्ताखू था तिस आबिद कूँ बेटी।—दक्खिनी०, पृ० २७९।

फरिस्ता
संज्ञा पुं० [फा० फरिश्तह्] दे० 'फरिश्ता'। उ०— कजा सिर पर खड़ी द्वारे। फरिस्ते तीर तक मारे।— तुरसी० श०, पृ० ३०।

फरी †
संज्ञा स्त्री० [सं० फल, फलक] १. फाल। कुशी। २. गाड़ी का हरसा। फड़। ३. चमडे़ की बनी हुई गोल छोटी ढाल जिसे गतके के साथ उसकी मार को रोकने के लिय लोकर खेलते हैं। ३. ढाल। उ०— (क) तब तो वह अति झुँझलाया फरी खाँड़ा उठाय रथ से कूद श्रीकृष्ण चंद्र की ओर झपटा।—लल्लू (शब्द०)। (ख) फूलै फदकत लै फरी फल कटाच्छ कर वार। करत बचावत विय नयन पाक घाय हजार।—बिहारी (शब्द०)। ४. दे० 'फली'।

फरीक
संज्ञा पुं० [अ० फरीक] १. मुकाबला करनेवाला। प्रति- द्वद्वी। विरोधी। विपक्षी। दूसरे पक्ष का। २. दो पक्षों में से किसी पक्ष का मनुष्य। दो परस्पर विरुद्ध व्यक्तियों में से कोई एक। ३. पक्ष का मनुष्य। तरफदार। यौ०— फरीकसानी = प्रतिवादी। (कानून)।

फरीकैन
संज्ञा पुं० [अ० फरीक का बहुवचन] दोनों या सब फरीक या पक्ष। जैसे— उस मुकदमे में फरीकैन में सुलह हो गई है।

फरीदबूटी
संज्ञा स्त्री० [अ० फरीद + हीं० बूटी] एक वनस्पति का नाम जिसकी पत्तियाँ बरियारे के आकार की छोटी छटी होती हैं। विशेष— इन पत्तियों को पानी में डालकर मलने से लबाब निकलता है। यह ठंढी होती है और गर्मी शांत करने के लिये पी जाती है।

फरुआ ‡
संज्ञा पुं० [हिं० फाड़ना, फाड़ा हुआ] लकड़ी का वह बरतन जिसे लेकर भिक्षुक भीख माँगते हैं।

फरुई
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'फरुही'।

फरुवक
संज्ञा पुं० [सं०] पीकदानी।

फरुसा ‡
संज्ञा पुं० [सं० परशु] दे० 'फरसा'।

फरुहा †
संज्ञा पुं० [सं० परशु, हिं० फरुसा] दे० 'फावड़ा'।

फरुही † (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० फवड़ा] १. छोटा फावड़ा। २. फावडे़ के आकार का लकड़ी का बना हुआ एक औजार। विशेष— इससे क्यारी बनाने के लिये खेत की मिट्टी अथवा घोडे़ की लीद हटाई जाती है और इसी प्रकार के दूसरे भी काम लिए जाते हैं। ३. मथानी।

फरुही (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० स्फुरण, हिं० फुरना] एक प्रकार का भूना हुआ चावल जो भुनने पर फूलकर भीतर से खोखला हो जाता है। फरवी। मुरमुरा। लाई।

फरुहरी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'फुरहरी' या 'फुरेरी'।

फरूकना पु †
क्रि० अ० [सं० स्फुरण, प्रा० फुरण; राजय फरुक्क, फरुक] दे० 'फरकना'। (क) आज फरूकइ अंखियाँ, नाभि भुजा अहराँह। सही न छोड़ा सज्जणाँ, साम्हाँ किया घराँह।—ढोला०, दू० ५१६। (ख) उ०— म्हारी धर्म०, पृ० ३१।

फरेँद, फरेँदा †
संज्ञा पुं० [सं० फलेन्द्र, प्रा० फलेंद] [स्त्री० फरेंदी] जामुन की एक जाति का नाम। विशेष— इसके फल बहुत बडे़ बडे़ और गूदेदार होते हैं। इसकी पत्तियाँ जामुन की पत्तियों से अधिक चौड़ी और बड़ी होती हैं। फल आषाढ़ में पकते हैं और खाने में मीठे होते हैं। यह पाचक होता है। विशेष दे० 'जामुन'।

फरेफ्ता
वि० [फा० फरेफ्तह] लुभाया हुआ। आसक्त। आशिक।

फरेब
संज्ञा पुं० [फा फरेब] छल। कपट। धोखा। जाल। क्रि० प्र०—करना।—देना।—होना। यौ०—फरेबकरा = धोखेबाज। फरेबखुर्दा = वंचित। ठगा हुआ। फरेबदिहिंदा = छली। धोखेबाज।

फरेबिया †
वि० [हिं० फरेब + इया (प्रत्य०)] दे० 'फरेबी'।

फरेबी
वि० [फा० फरेबी] फरेब या छल कपट करनेवाला। धोखेबाज। कपटी।

फरेरा †
संज्ञा पुं० [हिं० फरहरा] दे० 'फरहरा'।

फरेरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० फलहरी या फल = रा (प्रत्य०)] जंगल के फल। जंगली मेवा। उ०— मुख कुरवार फरेरी खाना। बहु विषभा जब ब्याध तुलाना।—जायसी (शब्द०)।

फरैदा †
संज्ञा पुं० [फा० परिंदह्, हिं० परिंदा] एक प्रकार का तोता।

फरो
वि० [फा़०] दबा हुआ। तिरोहित। जैसे, झगड़ा फरो करना।

फरोख्त
संज्ञा स्त्री० [फा० फरोख्त] बेचने या बिकने की क्रिया या भाव। विक्रय। विक्री।

फरोख्ता
वि० [फा० फरोख्तह्] विक्रीत। बेचा हुआ।

फरोग
संज्ञा पुं० [फा० फरोग] १. प्रकाश। रोशनी। २. शोभा। ३. प्रसिद्धि।

फरोगुजाश्त
संज्ञा पुं० [फा० फिरोगुजाश्त, उर्दू फरोगुजाश्त (=गफलत, कोताकी)] छोड़ देना। उपेक्षित करना। भूल जाना। उ०— जाने का ख्याल बिलकुल फरोगुजाश्त कर चुके हैं।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० १३५।

फरोदस्त
संज्ञा पुं० [फा०] एक प्रकार का संकर राग जो गौरी, कान्हड़ा और पूरबी के मेल से बना होता है। कहते हैं, यह राग अमीर खुसरो ने निकाला था। २. एक ताल जो १४ मात्राओं का होता है और जिसमें ५ आघात और २ खाली होते हैं। इसके तबले के बोल इस प्रकार हैं— धिन (१), धिन (२), धाकेटे (३), ताग धिन धा गदे ता, तेटेकता, गदिधेन। धा।

फरोश
वि० [फा० फरोश] बेचनेवाला। जैसे, मेवाफरोश, दवाफरोश। विशेष— यह समास के अंत में आता है।

फरोशी
संज्ञा स्त्री० [फा० फरोश] विक्री। बेचना। उ०— बात- फरोशी हाय हाय। वह लस्सानी हाय हाय।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ६७८।

फर्क
संज्ञा पुं० [अ० फर्क] दे० 'फरक'।

फर्च
वि० [हिं०] दे० 'फरच'।

फर्चा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'फरचा'।

फर्जद
संज्ञा पुं० [फा० फर्जद] दे० 'फरजंद'।

फर्ज
संज्ञा पुं० [अ० फर्ज] १. मुसलमानी धर्मानुसार विधिविहित कर्म जिसके न करने से मनुष्य को प्रायश्चित करना पड़ता है। धार्मिक कृत्य। २. कर्तव्य कर्म। जैसे,— उनसे माफी माँगना आपका फर्ज है। ३. उत्तरदायित्व। ४. कल्पना। मान लेना। जैसे,— फर्ज कीजिए कि वे खुद आए, तब आप क्या करेंगे ? यौ०— फर्जमुहाल = असंभव को संभव समझना या मानना। मुहा०— फर्ज अदा करना = कर्तव्य का निर्वाह करना। फर्ज करना = मान लेना। कल्पना करना। फर्ज होना = अवश्य कर्तव्य होना।

फजीनगी
संज्ञा स्त्री० [फा० फर्जानगी] योग्यता। बुद्धिमत्ता। अक्लमंदी। उ०— ऐ खिरदमंदो मुबारक हो तुम्हें फर्जानगी। हम हों और महरा हो और वहशत हो औ दीवानगी।—कविता कौ०, भा० ४, पृ० ४३।

फर्जी (१)
वि० [फा० फर्जी] १. कल्पित। माना हुआ। २. नाम मात्र का। सत्ताहीन।

फर्जी (२)
संज्ञा पुं० [फा० फर्जी] दे० 'फरजी'।

फर्त
संज्ञा पुं० [अ० फर्त] अधिकता। बहुतायत।

फर्द (१)
संज्ञा स्त्री० [फा० फर्द] १. कागज वा कपडे़ आदि का टुकड़ा जो किसी के साथ जुड़ा वा लगा न हो। २. कागज का टुकड़ा जिसपर किसी वस्तु का विवरण, लेखा, सूची वा सूचना आदि लिखी गई हों या लिखी जाय। यौ०—फर्द करारदाद जुर्म = फौजदारी की अदालत की कारे- वाई में वह लेख जिसके द्वारा न्यायाधीश वा मजिस्ट्रेट अभियुक्त व्यक्ति को किसी अपराध का अपराधी ठहराकर उससे उत्तर माँगता है। फर्दतालिका = वस्तुओं की वह सूची जो कुरकी करनेवाले को अदालत में देनी पड़ती है। फर्द सजा = फौजदारी के विभाग में वह कागज जिसपर अपराधी के दंड का विवरण वा व्यवस्था होती है। फर्दहकूक = बंदो- बस्त में वह कागज जिसमें किसी गाँव के स्वत्वाधिकारियों के स्वत्व का विवरण लिखा रहता है। फर्दहिसाब = हिसाब का लेखा या चिट्ठा। ३. रजाई, शाल आदि का ऊपरी पल्ला जो अलग बनता ओर बिकता है। चद्दर। पल्ला। दे० 'फरद'। ४. वह पशु या पक्षी जो जोडे़ के साथ न रहकर अलग और अकेला रहता है। ५. परण।

फर्द (२)
वि० एक। अकेला। अद्वितीय। दे० 'फरद'। उ०— वह भी गाने में सारे रतनपुर की तवायफों में फर्द थीं।—शराबी, पृ० १९।

फर्फरीक
संज्ञा पुं० [सं०] फैलाई हुई उँगलियों सहित हथेली। २. कोमलता। मृदता। ३. कल्ला या नई टहनी [को०]।

फर्फरीका
संज्ञा स्त्री० [सं०] उपानह। जूता। पदत्राण [को०]।

फर्म
संज्ञा पुं० [अं०] १. व्यापारी या महाजनी कोठी। साझे का कारवार। जैसे— कलकत्ते में व्यापारियों के कितने ही फर्म हैं। २. वह नाम जिससे कोई कंपनी या कोठी कारवार करती है। जैसे,— बलदेवदास युगलकिशोर; ह्वाइटवे लेडला ऐँड कंपनी।

फर्मा
संज्ञा पुं० [फा० फर्मा] आज्ञा। फरमान।

फर्माबरदार
वि० [फा० फर्माबरदार] आज्ञापालक। सेवक। उ०— नजरों में सारा जाहँ फर्माबरदार।—कुकुर०, पृ० १६।

फर्माबरदारी
संज्ञा स्त्री० [फा० फर्माबरदारी] आज्ञापालन। उ०— यमुनाप्रसाद ढीले हुए भी, सरकार की फर्मांबरदारी के बल से कडे़ रहे।—काले०, पृ० ५७।

फर्माना
क्रि० स० [हिं० फरमाना] दे० 'फरमाना'।

फर्याद
संज्ञा स्त्री० [फा० फरियाद] दे० 'फरियाद'।

फर्र (१)
संज्ञा पुं० [अ० फर्र] १. प्रकाश। ज्योति। २. शान शौकत। ३. दबदबा। रोब। प्रताप।

फर्र (२)
संज्ञा पुं० [अनुध्व०] १. फर्र की सी आवाज। २. फर्र की सी आवाज करते हुए उड़ जाना।

फर्रा † (१)
संज्ञा पुं० [अनु०] गेहूँ या धान की फसल का एक रोग। विशेष— यह रोग उस अवस्था में उत्पन्न होता है जब फूलने के समय तेज हवा बहती है। इसमें फूल गिर जाने से बालों में दाने नहीं पड़ते।

फर्रा ‡ (२)
संज्ञा पुं० [देश०] मोटी टं।

फर्राटा
संज्ञा पुं० [अनु०] १. वेग। तेजी। शीघ्रता। जैसे, फर्राटे से सबक सुनाना। उ०— फर्राटे से तर्जुमा करते चले जाइए।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० ३१। मुहा०— फर्राटा मारना वा भरना = वेग से दौड़ना। तेजी से दौड़ना। २. दे० 'खर्राटा'।

फर्राश
संज्ञा पुं० [अ० फर्राश] [वि० स्त्री० फर्राशन, फर्राशिन] १. वह नौकर जिसका काम जेरा गाड़ना, सफाई करना, फर्श बिछाना, दीपक जलाना और इसी प्रकार के और दूसरे काम करना होता है। २. नौकर। खिदमतगार। उ०— छिड़काव हुआ हो पानी का और खूब पलँग भी हो भींगा। हाथों में प्याला शरबत का हो, आगे हो फर्राश खड़ा ।— नजीर (शब्द०)।यौ०— फर्राशखाना = खेमा या खेमे का सामान रखने का कमरा।

फर्राशी (१)
वि० [फा० फर्राशी] फर्श या फर्राश के कामों से संबंध रखनेवाला। यौ०— फर्राशी पंखा = बड़ा पंखा जिससे पूरे फर्श पर हवा की जा सकती हो। उ०— फर्राशी पंखा झलता हो तब देख बहारें जाडे़ की।— नजीर (शब्द०)।

फर्राशी (२)
संज्ञा स्त्री० १. फर्राश का काम। २. फर्राश का पद।

फर्राहट
संज्ञा स्त्री० [हिं० फर्र + आहट (प्रत्य०)] फरफराना। फड़कना। उ०— उनके व्यक्तित्व की शुभ्रता, उनकी गठन और औज, मुख की मुस्कराहट और मूछों की फर्राहट ये सभी पुकार पुकार कर कहते हैं कि यहाँ जनता का एक जन्मजात नेता मौजूद है।—शुक्ल अभि० ग्रं०, पृ० ६३। २. फरफराने या फड़फड़ाने की आवाज। उ०— ताशों के पत्तों की फर्राहट।—भस्मावृत०, पृ० ३७।

फर्लो
संज्ञा स्त्री० [अं०] दे० 'फरली'।

फर्श
संज्ञा स्त्री० [अं० फर्श] १. बिछावन। बिछाने का कपड़ा। २. दे० 'फरश'। यौ०— फर्शखाक = पृथ्वी। जमीन। मुहा०— फर्श से अर्श तर = पृथ्वी से आकाश पर्यत। फर्शे जमीं होना = दफन होना। मर जाना।

फर्शी (१)
संज्ञा स्त्री० [फा० फर्शी] एक प्रकार का बड़ा हुक्का जिसमें तमाकू पीने के लिये बड़ी लचीली नली लगी होती है।

फर्शी (२)
वि० फर्श संबंधी। फर्श का। यौ०— फर्शी झाड़ = वह झाड़ जिसे फर्श पर रोशन किया जाय। फर्शी सलाम = बहुत झुककर या फर्श तक झुककर किया जानेवाला सलाम। फर्शी हुक्का = फरशी। फर्शी।

फर्स पु
संज्ञा पुं० [सं० परशु (=फरशु), हिं० फरसा] दे० 'फरसा'। उ०— दियौ रिष्ष बरदान जा जुद्ध कज्जं, जबै दिष्षियं षित्रियं फर्श भ्ज्जं।—पृ० रा०, २। २५५। यौ०— फर्सराम = परशुराम। उ०— तवै फर्सराम फरस्सी उभारी।—पृ० रा०, २। २५३।

फर्सी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० फर्स या फरसा] दे० 'फरस्सी'। उ०— करी पैज संसार्जुन कामधेन, चल्यी राम फर्सी धरै गज्जि गेनं।—पृ० रा०, २। २५५।

फर्स्ट
वि० [अं० फर्स्ट] गिनती में सबसे आरंभ में पड़नेवाला। पहला। अव्वल। जैसे— फर्स्ट क्लास का डव्बा। फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट।

फलंक पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० प्लवङ्ग, हिं० फलाँग] दे० 'फलाँग'।

फलंक (२)
संज्ञा पुं० [फा० फलक] आकाश। अंतरिक्ष। उ०— सो है अत्र ओढे़ जे न छोडे़ सीस संगर की, लंगर लँगूर उच्च ओज के अतंका में। कहै पद्माकर त्यौ हुंकरत फुंकरत, फेलत फलात फाल बाँधत फलंका में। आगे रघुवीर के समीर के तनय के संग, तारी दै तड़ाके तड़ा तड़के तमंका में। संका तै दसानन को, हंका दै सुबंका बीर, डंका दै विजय को कपि कूद परयौ लंका में।—पद्माकर (शब्द०)।

फलंग पु
संज्ञा पुं० [सं० प्लवङ्ग] छलाँग। फलाँग। उ०— (क) बाग लेत अति लेत फलंगनि, जिमि हनुमत किय समुद उल- घनि।—हिम्मत०, पृ० ७। (ख) सटा नमाबै बाय मै फलँग अटा गरकाब।—बाँकी० ग्रं०, भाग १, पृ० २६।

फल
संज्ञा पुं० [सं०] १. वनस्पति में होनेवाला वह बीच अथवा पोषक द्रव्य या गूदे से परिपूर्ण बीजकोश जो किसी विशिष्ट ऋतु में फूलों के आने के बाद उत्पन्न होता है। विशेष— वैज्ञानिक दृष्टि से बीज (दाने, अनाज आदि) और बीजकोश (साधारण बोलचालवाले अर्थ में फल) में कोई अंतर नहीं माना जाता, परंतु व्यवहार में यह अंतर बहुत ही प्रत्यक्ष है। यद्यपि गेहूँ, चना, जौ, मटर, आम, कटहल, अंगूर, अनार, सेव, बादास, किशमिश आदि सभी वैज्ञानिक दृष्टि से फल हैं, पर व्यवहार में लोग गेहूँ, चने, जौ, मटर आदि की गिनती बीज या अनाज में और आम, कटहल, अनार, सेब आदि करी गिनती फलों में करते हैं। फल प्रायः मनुष्यों और पशुपक्षियों आदि के खाने के काम में आते हैं। इनके अनेक भेद भी होते हैं। कुछ में केवल एक ही बीज या गुठली रहती है, कुछ में अनेक। इसी प्रकार कुछ के ऊपर बहुत ही मुलायम और हलका आवरण या छिलका रहता है, कुछ के ऊपर बहुत कड़ा या काँटेदार रहता है। २. लाभ। उ०— फल कारण सेवा करे निशदिन जाँचे राम। कहै कबीर सेवक नहीं चहै चौगुनो दाम।—कबीर (शब्द०)। ३. प्रयत्न वा क्रिया का परिणाम। नतीजा। उ०— (क) सुनहु सभासद सकल सुनिंदा। कही सुनी जिन संकर निंदा। सो फल तुरत लहब सब काहू। भली भाँति पछिताब पिताहू।— तुलसी (शब्द०)। (ख)तब हरि कह्यो कोऊ जनि डरियो अबहिं तुरत मैं जैहौं। बालक ध्रुव वन करत गहन तप ताहि तुरत फल दैहौं।—सूर (शब्द०)। ४. धर्म या परलोक की दृष्टि से कर्म का परिणाम जो सुख और दुःख है। कर्मभोग। उ०— (क) कोउ कह जो भल अहइ विधाता। सब कहँ सुनिय उचित फलदाता।—तुलसी (शब्द०)। (ख) सो फल मोहि विधाता दीन्हा। जो कछु उचित रहा सो कीन्हा।—तुलसी (शब्द०)। ५. गुण। प्रभाव। उ०— (क) नाम प्रभाव जानु सिव नीके। कालकूट फल दीन्ह अमी के।— तुलसी (शब्द०)। (ख) मज्जन फल पेखिय ततकाला। काक होंहि पिक बकउ मराला।— तुलसी (शब्द०)। ६. शुभ कर्मों के परिणाम जो संख्या में चार माने जाते हैं और जिनके नाम धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष हैं। उ०— (क) सेवत तोहि सुलभ फल चारी बरदायिनि त्रिपुरारि पियारी।—तुलसी (शब्द०)। (ख) आनंद महँ आनँद अबध आनँद बधावन होइ। उपमा कहौं चारि फल की, मोको भलो न कहैंगो कवि कोइ।— तुलसी (शब्द०)। (ग) होइ अटल जगदीश भजन में सेवा तासु चारि फल पावै। कहूँ वीर वहिं कमम चरण बिनु भृंगी ज्यों दसहूँ दिसि धावै।—सूर (शब्द०)। ७. प्रतिफल।बदला। प्रतिकार। उ०— एक बार जो मन देइ सेवा। सेवहि फल प्रसन्न होइ देवा।—जायसी (शब्द०)। ८. बाण, भाले, छुरी, कटारी, तलवार आदि का वह तेज अगला भाग जो लोहे का बना होता है और जिससे आघात किया जाता है। जैसे, तीर की गाँसी, भाले की अनी, इत्यादि, सब फल कहलाती है। ९. हल की फाल। १०. फलक। ११. ढाल। १२. उद्देश्य की सिद्धि। उ०— मति रामहिं सों गति रामहिं सो रति राम सों रामहिं को बलु है। सबकी न कहै तुलसी के मते इतनो जगजीवन को फलु है।—तुलसी (शब्द०)। १३. पासे पर की बिंदी या चिह्न। १४. न्याय शास्त्र के अनुसार वह अर्थ जो प्रवृत्ति और दोष से उत्पन्न होता है। इसे भी गौतम जी ने अपने प्रमेय के अंतर्गत लिया है। १५. गणित की किसी क्रिया का परिणाम। जैसे योगफल, गुणन- फल इत्यादि। १६. त्रैराशिक की तीसरी राशि वा निष्पत्ति में प्रथम निष्पत्ति का द्वितीय पद। १७. क्षेत्रफल। १८. फलित ज्योतिष में ग्रहों के योग का परिणाम जो सुख दुःख आदि के रूप में होता है। १९. मूल का ब्याज वा वृद्धि। सूद। २०. मूनाफा। लाभ (को०)। २१. हानि। नुकसान। (को०)। २२. आर्तव। रज (को०)। २४. त्रिफला (को०)। २५. प्रयोजन। २६. जायफल। २७. कंकोल। २८. कोरैया का पेड़।

फलकंटक
संज्ञा पुं० [सं० फलकण्टक] १. कटहल। २. खेत पापड़ा।

फलकंटकी
संज्ञा स्त्री० [सं० फलकण्टकी] इंदीवरा।

फलक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. पटल। तखता। पट्टी। २. चादर। ३. वरक। तबक। ४. पत्र। वरक। पृष्ठ। ५. हथेली। ६. फल। परिणाम। ७. मेज। चौकी। ८. खाट की बुनन जिसपर लोग लेटते हैं। ९. नितंब (को०)। १०. लाभ (को०)। ११. आर्तव (को०)। १२. कमल का बीजकोश (को०)। १३. मस्तक की अस्थि (को०)। १४. ढाल (को०)। १५. धोबी का पाटा या पाट (को०)। १६. बाण की गाँसी (को०)। १७. बृहत्संहिता के अनुसार पाँच लड़ी के हार का नाम।

फलक (२)
संज्ञा पुं० [अ० फलक] १. आकाश। जैसे,— आजकल उनका दिमाग फलक पर है। २. स्वर्ग। उ०— बहुदिन सुफल कियो महि कारज। फलक जाहु तुम यदुकुल आरज।—गिरधरदास (शब्द०)। यो०— फलकजदा = अत्यंत पीड़ित। फेटहाल। निर्धन। फलक- परवाज = आकाश तक पहुँचनेवाला। फलकमर्तबा, फलक- रुतबा = उच्चपद्स्थ। फलकसैर = (१)वायु जैसे वेगवाला (घोड़ा)। (२) भंग। भाँग। फलके पीर = बूढ़ा। मुहा०— फलक टूटना = आसमान टूटना। फलक पर चढ़ना = आसमान पर चढ़ना। फलक पर चढ़ाना = आसमान पर या बहुत ऊँचे चढ़ाना। फलक याद आना = फालचक्र याद आना। उलटफेर याद आना।

फलकक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत के अनुसार एक यक्ष का नाम।

फलकना
क्रि० अ० [अनु०] १. छलकना। उमगना। उ०— कैकेयी अपने करमन को सुमिरत हिय में दलकि उठी। सब देवन की मानि मनौती पूरन होइ कैं फलकि उठी।— देवस्वामी (शब्द०)। २. दे० 'फरकना'।

फलकयंत्र
संज्ञा पुं० [सं० फलकयन्त्र] ज्योतिष संबंधी एक प्रकार का यंत्र जिसके अनुसार ज्या आदि का निर्णय किया जाता है।

फलकर
संज्ञा पुं० [हिं० फल + कर] वह कर जो वृक्षों के फल पर लगाया जाय। फलों पर लगनेवाला महसूल।

फलकर्कशा
संज्ञा स्त्री० [सं०] जंगली बेर। झड़बेरी।

फलका (१)
संज्ञा पुं० [अ० फलक] नाव या जहाज की पाटन में वह दरवाजा जिसमें से होकर नीचे से लोग ऊपर जाते और ऊपर से नीचे उतरते हैं। (लश०)।

फलका (२)
संज्ञा पुं० [सं० स्फोटक, प्रा० फोड़ओ, हिं० फोला] फफोला। छाला। झलका। उ०— कोमल बदन परे बहु फलके। कमल दलन पर जनु कन जल के।—पद्माकर (शब्द०)।

फलका ‡ (३)
संज्ञा पुं० [हिं० फूलना, फुलका] दे० 'फुलका'। उ०— षाटो बीच फनका मांस बाटी दाल न्यारी।—शिखर०, पृ० ५२।

फलकाम
वि० [सं०] जो कर्म के फल की कामना करता हो। जो निष्काम होकर काम न करे बल्कि सकाम होकर करे।

फलकारना पु
क्रि० स० [हिं०] ललकारना। बढ़ावा देना। उ०— तरकि तरकि अति बज्र से डारै। मदमत इंद्र ठढ़ौ फलकारै।—नंद० ग्रं०, पृ० १९२।

फलकाल
संज्ञा पुं० [सं०] फल लगने का समय या मौसम [ को०]।

फलका वन
संज्ञा पुं० [सं०] एक कल्पित वन का नाम जिसके संबंध में यह प्रसिद्ध है कि वह सरस्वती को बहुत प्रिय है।

फलकी (१)
वि० [सं० फलकिन्] १. फलक द्वारा निर्मित। काष्ठ के तख्ते का बना हुआ। २. झाल से सज्जित [को०]।

फलकी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक प्रकार की मछली जिसे चीतल कहते हैं। इसे फली और फल्लकी भी कहते हैं। २. चंदन (को०)। ३. काठ की चौकी (को०)।

फलकी वन
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत के अनुसार एक वन का नाम जो किसी समय तीर्थ माना जाता था।

फलकृच्छ्र
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का कृच्छ्र व्रत जिसमें बेल आदि फलों के क्वाथ को पीकर एक मास तक रहना पड़ता है।

फलकृष्ण
संज्ञा पुं० [सं०] १. जल आँवला। २. करंज का पेड़े।

फलकेसर
संज्ञा पुं० [सं०] नारियल का वृक्ष।

फलकोश, फलकोप
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुरुष की इंद्रिय। लिंग। २. अंडकोष।

फलखंडन
संज्ञा पुं० [सं० फलखण्डन] फल की प्राप्ति न होना। निराशा [को०]।

फलग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] फल ग्रहण करना। लाभ लेना [को०]।

फलग्रहि
वि० [सं०] फलयुक्त या समय पर फलनेवाला [को०]।

फलग्रहिष्णु
वि० [सं०] फलयुक्त [को०]।

फलग्राही
संज्ञा पुं० [सं० फलग्राहिन्] वृक्ष। पेड़।

फलचमस
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का पुराना व्यंजन। विशेष—श्राद्धतत्व के अनुसार यह बड़ की छाल को कूटकर उसके चूर्ण को दही में मिलाकर बनाया जाता था।

फलचारक
संज्ञा पुं० [सं०] बौद्ध मत के अनुसार प्राचीन काल के एक कर्मचारी के पद का नाम।

फलचोरक
स्त्री० पुं० [सं०] चोरक या चोर नाम का गंधद्रव्य।

फलछदन
संज्ञा पुं० [सं०] लकड़ी के तख्ते या फलक का बना घर [को०]।

फलड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० फल + ड़ा (प्रत्य०)] (हथियार आदि के) फल का अल्पार्थक रूप। जैसे, चाकू का फलड़ा।

फलतः
क्रि० वि० [सं० फलतस्] फलस्वरूप। परिणामतः। इसलिये। जैसे,— लोगों ने धन देना बंद कर दिया और फलतः चिकित्सालय बंद हो गया।

फलत †
संज्ञा स्त्री० [हिं० फलना] फलने की क्रिया या भाव। जैसे,— इस साल सभी जगह आम की फलत बहुत अच्छी हुई है।

फलत्रय
संज्ञा पुं० [सं०] १. द्राक्षा, परुष और काशमीरी, ये तीनों फल। २. हड़, बहेड़ा और आँवला इन तीनों का समूह। त्रिफला।

फलत्रिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. भावप्रकाश के अनुसार त्रिफला। हड़, बहेड़ा और आँवला। २. अमरकोश के अनुसार सोंठ, पीपल और काली मिर्च।

फलद (१)
वि० [सं०] फल देनेवाला। जो फल दे। उ०— चूक समै न बिचारि तू, बादि करै अपसोस। अपने करम फलद चितै, हरि को देइ न दोस।— स० सप्तक, पृ० २५८।

फलद (२)
संज्ञा पुं० वृक्ष। पेड़।

फलदाइक पु
वि० [सं० फल + दायक] दे० 'फलदायक'। उ०— जौ तुम कहहु तुमहु सब लाइक। जगनाइक अरु सब फलदाइक।— नंद० ग्रं०, पृ० २२६।

फलदाता
वि० [सं० फलदातृ] १. फल देनेवाला। २. फलित होनेवाला। ३. लाभदायक [को०]।

फलदान
संज्ञा पुं० [हिं० फल + दान] १. हिंदुओं की एक रीति जो विवाह होने के पहले उस समय होती है जब कोई व्यक्ति अपनी कन्या का विवाह किसी के लड़के के साथ करना निश्चित करता हैं। विशेष— इसमें कन्या का पिता रुपए, मिठाई, अक्षत, फूल आदि वस्तुएँ लोकप्रथा के अनुसार शुभ मुहूर्त में वर के घर भेजता है। उस समय विवाह निश्चित मान लिया जाता है। इसे वरक्षा भी कहते हैं। २. विवाह संबंधी टीके की रसम।

फलदार
वि० [हिं० फल + दार (फा़ ० प्रत्य०)] १. फलवाला। जिसमें फल लगे हों। २. जो फले। जिसमें फल लगें।

फलदू
संज्ञा पुं० [सं० फलज्रुम] एक वृक्ष का नाम जिसे धौली भी कहते हैं। दे० 'धौली'।

फलन
संज्ञा पुं० [सं०] १. फलयुक्त होना। फलना। २. परिणाम या फल देना [को०]।

फलना (१)
क्रि० अ० [हिं० फल वा सं० फलन] १. फल से युक्त होना। फल लाना। उ०—बन उपवन फूलते फलते हैं उससे सब जीव जंतु, पशु पक्षी आनंद में रहते हैं। —लल्लू (शब्द०)। २. फल देना। लाभदायक होना। परिणाम निकलना। उ०—जोग जुगुति तप मंत्र प्रभाऊ। फलइ तबहिं जब करिय दुराऊ। —तुलसी (शब्द०)। मुहा०— फलना फूलना = (१) सफल मनोरथ होना। उ०— फूलै फलै, फलै, खल सीदै, साधु पल पल, बानी दीपमालिका ठठाइयत सूप हैं। —तुलसी (शब्द०)। २. विकसित होना। विकास करना। उ०—राजनीतिक परिस्थितियों में उसकी छत्रछाया के नीचे साहित्य फलता फूलता रहा। —अकबरी०, पृ० १०। ३शरीर के किसी भाग पर बहुत से छोटे छोटे दानों का एक साथ निकल आना जिससे पीडा़ होती है।

फलना † (२)
संज्ञा पुं० [हिं० फाल वा पहल] एक प्रकार की छेनी जिससे चितेरे और संगतराश सादी पत्तियाँ बनाते हैं।

फलनिवृ (२)त्ति (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. फलनिष्पत्ति। फलोदय २. अंतिम परिणाम [को०]।

फलनिर्वृत्ति (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] फल का होना [को०]।

फलनिष्पत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] फलोदय। फल की सत्पत्ति [को०]।

फलपरिणति
संज्ञा स्त्री० [सं०] फल का पूरा पूरा पक जाना [को०]।

फलपरिणाम
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'फलपरिणत्ति' [को०]।

फलपाक
संज्ञा पुं० [सं०] १. करौदा। २. जलआँवला।

फलपाकांता
संज्ञा स्त्री० [सं० फलपाकान्ता] फल पकने के बाद नष्ट हो जानेवाला पौधा [को०]।

फलपाकावसाना
संज्ञा स्त्री० [सं०] फलने के वाद समाप्त होनेवाला क पौधा। एकवार्षिक पौधा [को०]।

फलपाकी
संज्ञा पुं० [सं० फलपाकिन्] गर्दभांड का पेड़।

फलपातन
संज्ञा पुं० [सं०] बटोरने के लिये फल गिराना [को०]।

फलपिता
संज्ञा पुं० [सं० फल + पिता] फल का पिता अर्थात् फूल।—अनेकार्थ०, पृ० ६०।

फलपुच्छ
संज्ञा पुं० [सं०] वह वनस्पति जिसकी जड़ में वाँठ पड़ती है। जैसे, प्याज, शलजम इत्यादि।

फलपुष्प
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० फलपुष्पा] वह वनस्पत्ति जिसमें फल और पुष्प दोनों हों।

फलपुष्पा, फलपुष्पी
संज्ञा पुं० [सं०] पिंड खजूर।

फलपूर
संज्ञा पुं० [सं०] १. दाडि़म। अनार। २. विजोरा नीबू [को०]।

फलपूरक
संज्ञा पुं० [सं०] विजौरा नीबू [को०]।

फलप्रदान
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'फलदान' [को०]।

फलप्राप्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] फललाभ। सफलता [को०]।

फलप्रिय
संज्ञा पुं० [सं०] द्रोण काक। डोम कौवा।

फलप्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रियंगु।

फलफंद पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'फरफंद'।

फलफलारी †
संज्ञा स्त्री० [सं० फल + हिं० फलहरी, फलारी] फल मूल। फल मेवा आदि। उ०—पाछें वैष्णव ने फलफलारी मेवा सामग्री सिद्ध करि न्हाय कै श्रीठाकुर जी के उत्थापन कराए। —दो सौ बावन०, भा० २, पृ० ११०।

फलफूल
संज्ञा पुं० [सं० फल + हिं० फूल] फल और फूल।

फलबंधी
वि० [सं० फलबन्धिन्] जिसमें फल आ रहे हों [को०]।

फलभर
संज्ञा पुं० [सं०] फलों का भार या बोझ। उ०—फलभर नम्र बिटप सब रहे भूमि नियराइ। —मानस, ३।३४।

फलभरता
संज्ञा स्त्री० [सं० फलभर + ता (प्रत्य०)] फलों से भरा होना। फलों के भार या बोझ से पूर्ण होने की स्थिति। उ०—पुलकित कदंब की माना सी पहना देती हो अंतर में, झुक जाती है मन की डाली अपनी फलभरता के डर में। —कामयनी, पृ० १८।

फलभाक्, फलभागी
वि० [सं० फलभाज्, फलभागिन्] फल पानेवाला या भोगनेवाला [को०]।

फलभुक् (१)
संज्ञा पुं० [सं० फलभुज्] कपि। बंदर [को०]।

फलभुक् (२)
वि० फल दापैवासा। फलभोवी [को०]।

फलभूमि
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्थान जहाँ कर्मों के फल का भोग करना पड़ता हो।

फलभृत्
वि० [सं०] फलति। फलयुक्त। जिसमें फल आए या लगे हों [को०]।

फलभोग
संज्ञा पुं० [सं०] १. कर्म के फल का भोग। २. भाग का अधिकार [को०]।

फलभोजी
वि० [सं० फलभोजिन्] फल खानेवाला [को०]।

फलमत्स्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] धीकुँवार। बृतकुमारी।

फलमुंड
संज्ञा पुं० [सं० फलमुण्ड] नारियल का वृक्ष।

फलमुख्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] अजमोदा। अजवायन।

फहसुद्गरिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] पिंड खजूर।

फलमूल
संज्ञा पुं० [सं०] फल और कंद या मूल। उ०—(क) लिए फलमूल भेंज फरि भारा। मिलन चलेउ हिय हरषु अपारा।—मानस, ३।८८। (ख) सुचि फलमूल मधुर मृदु जानी।—मानस, २।८९।

फलयोग
संज्ञा पुं० [सं०] १. नाइक में वह स्थान जिसमें फल की प्राप्ति या उसके नायक के उद्देश्य की सिद्धि हो। २. फल मिलना। फल की प्राप्ति (को०)। ३. वेतन। मजूरी (को०)।

फलराज
संज्ञा पुं० [सं०] १. तरबूज। २. खरबूजा।

फलरुहा
संज्ञा स्त्री० [सं० फलेरुहा] पाडर। —अनेकार्थ०, पृ० ५४।

फललक्षणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की लक्षणा। विशेष— दे० 'लक्षणा'।

फलवंध्य
संज्ञा पुं० [सं०] न फलनेवाला वृक्ष। निष्फल वृक्ष वह बृक्ष जो फल न दे [को०]।

फलवर्णिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] फलों का अवलेह या मुरब्बा। फलों की जेली [को०]।

फलवती
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रियंगु का पौधा [को०]।

फलवती
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रियंगु का पौधा [को०]।

फलवर्ति
संज्ञा स्त्री० [सं० मि० अ० फतीलह्] मोटी बत्ती जो घाव में रखी जाती है।

फलवर्तुल
संज्ञा पुं० [सं०] कुम्हडा़।

फलवस्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार का वस्तिकर्म जिसमें अँगूठे के बराबर मोटी और बारह अंगुल लंबी पिचकारी गुदा में दी जाती है।

फलवान्
वि० [सं० फलवत्] [वि० स्त्री० फलवती] फलयुक्त। फलित। जिसमें फल लगा हो।

फलविक्रयी
संज्ञा पुं० [सं० फलविक्रयिन्] फल बेचनेवाला व्यक्ति या दुकानदार। मेवाफरोश [को०]।

फलविप
संज्ञा पुं० [सं०] वह वृक्ष जिसके फल बिषैले होते हैं। जैसे, करंभ इत्यादि। विशेष—सुश्रुत में कुमुदूनी, टेलुका, करंभ, महाकरंभ, कक्रोंटक, रेणुक, खद्योतक, चर्मरी, इअगंधा,सर्पघाती, नंदन और सर- पाक के फल विष कहे गए हैं।

फलवृक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] फल का पेड़ [को०]।

फलवृक्षक
संज्ञा पुं० [सं०] कटहल।

फलश (१)
संज्ञा पुं० [सं०] कटहल [को०]।

फलश (२)
संज्ञा पुं० दे० 'फलशाक'।

फलशाक
संज्ञा पुं० [सं०] वह फल जिसकी तरकारी बनाकर खाई जा सकती हो।

फलशाडव
संज्ञा पुं० [सं०] अनार। दाडिम।

फलशाली
वि० [सं० फलशालिन्] १. फलयुक्त। २. फल देनेवाला [को०]।

फलशैशिर
संज्ञा पुं० [सं०] बेर का पेड़।

फलश्रुति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अर्थवाद। वह वाक्य जिसमें किसी कर्म के फल का वर्णन होता है और जिसे सुनकर लोगों की वह कर्म करने की प्रवृत्ति होती है। जैसे, अमुक यज्ञ करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, दान करने से अक्षय पुण्य होता है, आदि। २. ऐसे वाक्य सुनना।

फलश्रेष्ठ
संज्ञा पुं० [सं०] आम।

फलसपत्
संज्ञा स्त्री० [सं० फलसम्पत्] १. फल की अधिकता। २. सफलता [को०]।

फलसंबद्ध
संज्ञा पुं० [सं० फलसम्बद्ध] गूलर।

फलसँभारा
संज्ञा स्त्री० [सं० फलसम्भारा] कृष्णोदुंवरी। कसूमर।

फलसंस्कार
संज्ञा पुं० [सं०] आकाश के किसी ग्रह के केंद्र का समीकरण या मंदफल निरुपण।

फलसंत्थ
वि० [सं०] फलोत्पादक। फल उत्पन्न करनेवाला [को०]।

फलस
संज्ञा पुं० [सं०] पनस। कठहल [को०]।

फलसा
संज्ञा पुं० [देश०] १. दरवाजा। द्वार। २. गाँव की सीमा। उ०—नेसी आँणि फलसा कोठडी़ काँ नैं खुलाया। हेलो देर सारा कोटडी काँ नै जगाया। —शिखर०, पृ० ३८।

फलसाधन
संज्ञा पुं० [सं०] इष्टप्राप्ति का उपाय या साधन [को०]।

फलसिद्धि
संज्ञा स्त्री० [सं०] फल की प्राप्ति। सफलता [को०]।

फलस्थापन
संज्ञा पुं० [सं०] फलीकरण या सीमंतोन्नयन नामक संस्कार। विशेष—हिंदुओं के दस प्रकार के संस्कारों में यह तीसरा संस्कार है।

फलस्नेह
संज्ञा पुं० [सं०] अखरोट।

फलहक
संज्ञा पुं० [सं०] काष्ठफलक। तखता [को०]।

फलहरी † (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० फल + हरी (प्रत्य०)] १. वन के वृक्षों के फल। मेवा। वनफल। २. फल। मोवा। जैसे,— कुछ फलहरी ले आओ।

फलहरी (२)
वि० [हिं० फलहार + ई (प्रत्य०)] दे० 'फलहारी'।

फलहार
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'फलाहार'।

फलहारी (१)
वि० [हिं० फलहार + ई (प्रत्य०)< सं० फलाहारीय] जिसमें अन्न न पडा़ हो अथवा जो अन्न से न बना हो। जैसे, फलहारी मिठाई, फलहारी जलेबी, फलहारी पूरी।

फलहारी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] कालिका देवी का नाम।

फलही
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कपास का पौधा। २. झिल्ली। भृंगारी [को०]।

फलहीन
वि० [सं०] १. निष्फल। २. फलरहित। जैसे, वृक्ष [को०]।

फलहेतु
वि० [सं०] फल के लिये काम करनेवाला [को०]।

फलांत
संज्ञा पुं० [सं० फलान्त] बाँस।

फलांश
संज्ञा पुं० [सं०] तात्पर्य। सारांश। फलितांश। असल मतलब।

फलाँ (१)
वि० [फा़० फलाँ] अमुक। कोई अनिश्चित।

फलाँ (२)
संज्ञा पुं० लिंग। पुरुषेंद्रिय।

फलाँग
संज्ञा स्त्री० [सं० प्लवन वा प्रलङ्घन] १. एक स्थान से उछलकर दूसरे स्थान पर जाने की क्रिया या उसका भाव। कुदान। चौकडी़। उ०—सुनी सिंह भय मानि अवाज। मारि फलाँग चली वह आज। —सूर (शब्द०)। क्रि० प्र०—भरना। —मारना। २. वह दूरी जो फलाँग से तै की जाय। उ०— बानर सुभाव बाल केलि भूमि भानु लगि फलँगु फलाँग हूँ ते घाटि नभ तल भो। —तुलसी (शब्द०)। ३. मालखंभ की एक कसरत। उलटना। कलाबाजी। विशेष— यह एक प्रकार की उडान है जिसमें एक हाथ वा दोनों हाथों को जमीन पर टेककर पैरों को उठाकर चक्कर लगाते हुए दूसरी ओर भूमि पर गिरते हैं।

फलाँगना
क्रि० अ० [हिं० फलाँग + ना (प्रत्य०)] एक स्थान से उछलकर दूसरे स्थान पर जाना या गिरना। कूदना। फाँदना।

फला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. शमी। २. प्रियंगु। ३. झिंझिरीय।

फलाकना †
क्रि० अ० [हिं० फलाँग] लाँघना। छलाँग मारकर पार करना।

फलाकांक्षा
संज्ञा स्त्री० [सं० फलाकाङ्क्षा] फलप्राप्ति की कामना या इच्छा [को०]।

फलागम
संज्ञा पुं० [सं०] १. फल आना। फल लगना। २. फल आने का काल। फल आने की ऋतु या मौसम। ३. शरद ऋतु। ४. नाटक में फलार्थी व्यक्ति द्वारा आरब्ध कार्य की पाँचवीं अवस्था जिसमें आरंभ किए कार्य का फल प्राप्त होना दिखाया जाय। जैसे रत्नावली नाटिका में चक्रवर्तित्व के साथ रत्नावली का लाभ। विशेष—अन्य चार अवस्थाएँ क्रमशः आरंभ, यत्न, प्रात्याशा और नियताप्ति हैं।

फलाढ्य
वि० [सं०] फलयुक्त। फल से भरा हुआ। [को०]।

फलाढया
संज्ञा स्त्री० [सं०] कठकेला। जंगली केला।

फलातूँ †
संज्ञा पुं० [यूनानी प्लातोन, फा़० अफ़लातून, फ़लातून] यूनान का एक प्रसिद्ध विद्वान् और दार्शनिक जो अरस्तू का गुरु और सुकरात का शिष्य था। अफलातून। उ०—मेढ़क एक बोलता था ज्यों सुकरात, फलातूँ ,सा दूसरा सुनता बात। — कुकुर०, पृ० ४०।

फलात्मिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] करेला।

फलादन
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो फल खाता हो। २. तोता।

फलादेश
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी बात का फल या परिणाम बतलाना। फल कहना। २. जन्मकुंडली आदि देखकर या और किसी प्रकार से ग्रहों आदि का फल कहना (ज्योतिष)।

फलाघ्यक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १. खिरनी का पेड़। २. फल देनेवाला, ईश्वर। ३. वह जो फलों का मालिक हो।

फलाना (१)
संज्ञा पुं० [अ० फला + ना (प्रत्य०) या फा़० फ़लाँ] [स्त्री० फलानी] अमुक। कोई अनिश्चित। उ०—उन कह्यौ धन हम देष्यौ है फलानी ठौर, मनन करत भयौ कब घरि आनिए। —सुंदर०, ग्रं० भा० २, पृ० ६२९।

फलाना (२)
क्रि० स० [हिं० फलना का प्रे० रुप] किसी को फलने में प्रवृत्त करना। फलने का काम करना।

फलानी †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] भग।

फलानुबंध
संज्ञा पुं० [सं० फलानुबन्ध] फल की परंपरा। परिणाम का अनुक्रम [को०]।

फलानुमेय
वि० [सं०] फल द्वारा अनुमेय या जानने योग्य। [को०]।

फलानेजीब
संज्ञा पुं० [अं० फ्लोइंग लीब] जहाज का एक तिकोना पाल जो आगे की ओर होता है।

फलान्वेषी
वि० [सं० फलान्वेषिन्] [वि० स्त्री० फलान्वेषिणी] फल की इच्छा रखनेवाला। फल खोजनेवाला [को०]।

फलापेक्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] फल की अपेक्षा या आकांक्षा [को०]।

फलापेक्षी
वि० [सं० फालपेक्षिन्] फल की अपेक्षा करनेवाला।

फलापेत
वि० [सं०] फलशून्य। निष्फल। २. अनुत्पादक [को०]।

फलाफल
संज्ञा पुं० [सं०] किसी कर्म का शुभ अशुभ या इष्ठ अनिष्ट फल। उ०—ज्ञानोज्वल जिनका अंतस्तल उनको क्या सुख दुःख, फलाफल। —मधुज्वाल, पृ० १४।

फलाफूला
वि० [हिं० फलना + फूलना] १. फल और फूलों से युक्त। २. विकसित। भरापूरा (ला०)।

फलाम्ल
संज्ञा पुं० [सं०] १. विषावली। विषाविल। २. अम्लवेत। ३. वह फल जिसका रस खट्टा हो। खट्टा फल।

पलाम्लपंचक
संज्ञा पुं० [सं० फलाम्लपञ्चक] बेर, अनार, विषा- विल, अम्लवेत और बिजौरा ये पाँच खट्टे फल।

फलाम्लिक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार की इमली की चटनी।

फलाम्लिक (२)
वि० अम्ल या खट्टे फल का बना हुआ [को०]।

फलायोषित्
संज्ञा स्त्री० [सं०] झिल्ली। झींगुर [को०]।

फलार †
संज्ञा पुं० [सं० फल + आहार = फलाहार] [स्त्री० फलारी] दे० 'फलाहार'।

फलाराम
संज्ञा पुं० [सं०] फलों का उपवन [को०]।

फलारिष्ट
संज्ञा पुं० [सं०] चरक के अनुसार एक प्रकार का अरिष्ट (अर्क या काढा़) जो बवासीर के रोगी को दिया जाता है।

फलार्थी
संज्ञा पुं० [सं० फलार्थिन्] [स्त्री० फलार्थिनी] वह जो फल की कामना करे। फलकामी।

फलालीन, फलालेन, फलालैन
संज्ञा पुं० [अं० फ्लैनेल] एक प्रकार का ऊनी वस्त्र जो बहुत कोमल और ढीली ढाली बुनावट का होता है।

फलाशन
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो फल खाता हो। फल खानेवाला। २. शुक। तोता।

फलासंग
संज्ञा पुं० [सं० फलासङ्ग] वह आसक्ति जो किसी कार्य के फल पर हो।

फलासक्त
वि० [सं०] फल के प्रति आसक्ति रखनेवाला [को०]।

फलासय
संज्ञा पुं० [सं०] चरक के अनुसार दाख, खजूर आदि फलों के आसव जो २६ प्रकार के होते हैं।

फलास्थि
संज्ञी पुं० [सं०] नारियल का पेड़।

फलाहार
संज्ञा पुं० [सं०] फलों का आहार। केवल फल खाना। फलभोजन। उ०—अपने प्रभू के लिये पुजारिन फलाहार सज लाई थी। —साकेत, पृ० ३६८।

फलाहारी (१)
संज्ञा पुं० [सं० फलाहारिन्] [स्त्री० फलाहारिणी] फल खानेवाला। वह जो फल खाकर निर्वाह करता हो।

फलाहारी (२)
वि० [हिं० फलाहार + ई (प्रत्य०)] फलाहार संबंधी। जिसमें अन्न न पडा़ हो। जो केवल फलों से बना हो।

फलि पु (१)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'फंली'। उ०—फैलि परी हित की फलि, अंतरसूल गई। भागनि बल यह सुभ घरी बिधि बनाय दई। —घनानंद, पृ० ५५६।

कलि (२)
पुं० [सं०] १. एक प्रकार की मछली जिसका मांस भारी, चिकना, बलकारक और स्वादिष्ट होता है। २. शराव। पात्र। भोजन (को०)।

फलिक (१)
वि० [सं०] फल का भोग करनेवाला।

फलिक (२)
संज्ञा पुं० पहाड़। पर्वत [को०]।

फलिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक प्रकार की निष्पावी (सेम) जो हरे रंग की होती है। हरे रंग की सेम। २. सरपत आदि के आगे का नुकीला भाग।

फलित (१)
वि० [सं०] १. फला हुआ। २. संपन्न। पूर्ण। यौ०—फलित ज्योतिष = ज्योतिष का वह अंग जिसमें ग्रहों के योग से शुभाशुभ फल का निरुपण किया जाता है। विशेष— दे० 'ज्योतिष'।

फलित (२)
संज्ञा पुं० १. वृक्ष। पेड़। २. पत्थरफूल। शैलेय। छरीला।

फलितव्य
वि० [सं०] जो फलने के योग्य हो। फलने लायक।

फलिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] रजस्वला स्त्री। ऋतुमती स्त्री [को०]।

फलितार्थ
संज्ञा पुं० [सं०] सारांश। तात्पर्यार्थ [को०]।

फलिन
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह वृक्ष जिसमें फल लगते हों। २. कटहल। ३. श्योनाक वृक्ष। ४. रीठा।

फलिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रियंगु। २. अग्निशिखा वृक्ष। ३. मूसली। ४. इलायची। ५. मेंहदी। नखकरंज। ६. श्योनाक। ७. त्रायमाणा लता। ८. जलपीपल। ९. दुधिया। दूधी। १०. दाख का बना हुआ आसव।

फली (१)
संज्ञा पुं० [सं० फलिन्] १. श्योनाक। २. कटहल। ३. वह वृक्ष जिसमें फल लगते हों।

फली (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रियंगुलता। विशेष—कवियों ने इसे आम की पत्नी कहा है। देखिए रघुवंश के अष्टम सर्ग का ६१ वाँ श्लोक। २. मूसली। ३. अमडा़। ४. एक छोटी मछली। फलि (को०)।

फली (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं० फल + ई (प्रत्य०)] छोटे छोटे पौधों में लगनेवाले वे लंवे और चिपटे फल जिनमें गूदा नहीं होता बल्कि उसके स्थान पर एक पंक्ति में कई छोटे छोटे बीज होते हैं। विशेष—ये फल खाए नहीं जाते बल्कि कच्चे ही तरकारी आदि के काम में आते हैं। प्रायः सभी फलियाँ खाने में बहुत पौष्टिकहोती हैं और सूख जाने पर पशुओं के भी खाने के काम में आती हैं। जैसे, मटर की फली, सेम की फली।

फलीकरण
संज्ञा पुं० [सं०] भूसे या भूसी से अनाज को अल- गाना [को०]।

फलीकृत
वि० [सं०] १. माँडा़ या दाँया हुआ। २. कूटा हुआ। ३. फटककर साफ किया हुआ [को०]।

फलीता
संज्ञा पुं० [अ० फ़लीतह्] १. बड़ आदि के बररोह या छाल आदि के रेशों से बटी हुई रस्सी का टुकडा़ जिसमें तोडे़दार बंदूक दागने के लिये आग लगाकर रखी जाती है। पलीता। २. बत्ती। ३. पत्ती डोर जो गोट लगाते समय सुंदरता के लिये कपडे़ के भीतर किनारा छोड़कर ऊपर से बखिया की जाती है। ४. प्रेतबधित को बाधाशांति के लिये धूनी देनेवाली तावीज की बत्ती। मुहा०— फलीता दिखाना=(१) आग लगाना। (२) तोप या बंदूक को दागना। फलीता सुँघाना = ताबीज या जंतर की धूनी देना।

फलीभूत
वि० [सं०] लाभदायक। फलदायक। जिसका फल या परिणाम निकले। जैसे, परिश्रम फलीभूत होना।

फलुई †
संज्ञा स्त्री० [सं०?] एक मछली का नाम।

फलूष
संज्ञा पुं० [सं०] एक लता [को०]।

फलेंद्र
संज्ञा पुं० [सं० फलेन्द्र] फलेंदा। बडा़ जामुन।

फलेँदा
संज्ञा पुं० [सं० फलेन्द्र] एक प्रकार का जामुन जिसका फल बडा़, गूदेदार और मीठा होता है। इसके पेड़ और पत्ते भी जामुन से बडे़ होते हैं। फरेंदा। पर्या०—नद। राजजंबू। महाफला। सुरभिपत्रा। महाजंबू।

फलेपाकी
संज्ञा स्त्री० [सं०] गंधमुस्ता।

फलेपुष्पा
संज्ञा स्त्री० [सं०] गूमा।

फलेरुहा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पाटलि या पाड़र का वृक्ष।

फलोच्चय
संज्ञा पुं० [सं०] फल का ढेर।

फलोत्तमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १ काकली दाख। २. दुग्धिका। दुषिया। ३. त्रिफला।

फलोत्पत्ति (१)
संज्ञा पुं० [सं०] आम का पेड़।

फलोत्पत्ति (२)
संज्ञा स्त्री० १. फल आना वा लगना। फल की उत्पत्ति २. लाभ [को०]।

फलोदक
संज्ञा पुं० [सं०] एक यक्ष का नाम।

फलोदय
संज्ञा पुं० [सं०] १. लाभ। २.हर्ष। ३. देवलोक। ४. निग्रह। प्रतीकार (को०)। ५. परिणाम या फल की उत्पति (को०)।

फलोद्बभव
वि० [सं०] जो फल से उत्पन्न हुआ हो।

फलोपजीवी
वि० [सं० फलोपलीविन्] फल बेचकर जीविका चलानेवाला [को०]।

फलोपेत
वि० [सं०] फलयुक्त। फलवाला [को०]।

फल्क
संज्ञा पुं० [सं०] विसारितांग। फैले हुए अंगवाला।

फल्गु (१)
वि० [सं०] १. असार। जिसमें कुछ तत्व न हो। २. निरर्थक। व्यर्थ। ३. क्षुद्र। छोटा। ४. सामान्य। साधारण। ५. कमजोर। अशक्त। उ०—उस समय उनके कल्पना के मेत्रों के संमुख तपस्विनियों के जराजीर्ण, फल्गु मात्र अरुचिकर शरीर नाच रहे थे। —ज्ञानदान, पृ० १९। ६. असत्य (को०)। ७. सुंदर। रम्य। रमणीय (को०)।

फल्गु (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वसंत ऋतु (को०)। २. अबीर। गुलाल (को०)। ३. कठूमर। जंगली गूलर (को०)। ४. असत्य कथन। झूठ वचन (को०)। ५. ज्यौतिष में पूर्वा फाल्गुनी और उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र (को०)। ६. बिहार की एक नदी का नाम। गया तीर्थ इसी नदी के किनारे हैं। यौ०—फल्गुदा = फल्गुनदी।

फल्गुद
वि० [सं०] लोभी। कृपण। कंजूस [को०]।

फल्गुन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. अर्जुन। २. इंद्र (को०)। ३. फाल्गुन मास।

फल्गुन (२)
वि० १. फाल्गुनी नक्षत्र संबंधी। २. लाल (को०)।

फल्गुनक
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार एक जाति का नाम।

फल्गुनाल
संज्ञा पुं० [सं०] फाल्गुन मास।

फल्गुनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'फाल्गुनी'।

फाल्गुनीभव
संज्ञा पुं० [सं०] बृहस्पति का नाम।

फल्गुलुक
संज्ञा पुं० [सं०] बृहत्संहिता के अनुसार एक देश।

फल्गुलुका
संज्ञा स्त्री० [सं०] बृहत्संहिता के अनुसार वायु कोण की एक नदी का नाम।

फल्गुवाटिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] कठूमर।

फल्गुवृंत, फल्गुवृंताक
संज्ञा पुं० [सं० फल्गुवृन्त, फल्गुवृन्ताक] एक प्रकार का श्योनाक।

फल्गूत्सव
संज्ञा पुं० [सं०] होली। वसंतोत्सव [को०]।

फल्य
संज्ञा पुं० [सं०] फूल।

फल्लकी
संज्ञा पुं० [सं० फल्लिकिन्] एक प्रकार की मछली जिसे फलुई कहुते हैं।

फल्लफल
संज्ञा पुं० [सं०] सूप के फटकने से होनेवाली हवा [को०]।

फल्ला
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का रेशम जो बंगाल के रामपुर हाठ नामक स्थान से आता है। विशेष— इसका रंग पीलापन लिए सफेद होता है और यह तंदूरी से कुछ घटिया होता है।

फसकड़ा †
संज्ञा पुं० [अनु०] पालथी। पलथी। जैसे,— जहाँ देखो वहीं फसकडा़ मारकर वैठ जाते हैं। क्रि० प्र०— मारना।

फसकना † (१)
क्रि० अ० [अनु०] १. कपडे का मसकना या दबने आदि के कारण कुछ फट जाना। मसकना। २. अंदर को बैठना। घँसना। ३. फस फस या फुसफुस की आवाज करते हुए बात करना। ४. कोई लगती बात मंद स्वर में बोल देना।५. फटना। तड़कना। जैसे, अधिक पूर देने के कारण पेड़ा फसक गया।

फसकना (२)
वि० १. जो जल्दी मसक या फट जाय। २. जो जल्दी धँसे या बैठ जाय।

फसकना † (२)
क्रि० अ० [सं० भकषण> भक्षण] अस्पष्ट आवाज के साथ कुछ खाना। भसकना।

फसकाना †
क्रि० अ० [अनु०] १. कपड़े को मसकाना या दबा कर कुछ फाड़ना। २. धँसाना। बैठाना।

फसडी पु
वि० [हिं०] दे० 'फिस़ड्डी'।

फसल
संज्ञा स्त्री० [अ० फ़स्ल] १. ऋतु। मौसम। २. समय। काल। जैसे, बोने की फसल, काटने की फसल। ३. शस्य। खेत की उपज। अन्न। जैसे, खेत की फसल। ४. वह अन्न की उपज जो वर्ष के प्रत्येक अयन में होती है। विशेष— अन्न के लिये वर्ष के दो अयन माने गए हैं, खरीफ और रवी। सावन से पूस तक में उत्पन्न होनेवाले अन्नों को खरीफ की फसल कहते हैं और माघ से आषाढ़ तक में उपजनेवाले को रबी की फसल।

फसली (१)
वि० [अ० फस्ल + फा़० ई (प्रत्य०)] मौसिमी। ऋतु का। जैसे, फसली बुखार।

फसील (२)
संज्ञा पुं० (१). एक प्रकार का संवत्। विशेष— इसे दिल्ली के सम्राट् अकबर ने हिजरी संवत् को, जिसका प्रचार मुसमानों में था और जिसमें चांद्रमास की रीति से वर्ष की गणना थी, बदलकर सौर मास में परिवर्तन करके चलाया था। अब ईसवी संवत् से यह ५८३ वर्ष कम होता है। इसका प्रचार उत्तरीय भारत में फसल य़ा खेती बारी आदि के कामों में होता है। २. हैजा। ३. बुखार। मियादी बुखार।

फसली कौवा
संज्ञा पुं० [अ० फस्ल + फा़० ई (प्रत्य०) + हिं० कौवा] १. पहाडी़ कौवा जो शीत ऋतु में पहाड़ से उतरकर मैदान में चला आता है। २. वह जो केवल अच्छे समय में अपना स्वार्थ साधन करने के लिये किसी के साथ रहे और उसकी विपत्ति के समय काम न आवे। स्वार्थी। मतलबी।

फसलीगुलाब
संज्ञा सं० [हिं० फसली + फा़० गुलाब] चैती गुलाब।

फसली बुखार
संज्ञा पुं० [अ० फस्ल + फा़० ई (प्रत्य०)+ बुखार] १. वह ज्वर जो किसी एक ऋतु की समाप्ति और दूसरी ऋतु के आरंभ के समय होता है। २. जाडा़ देकर आनेवाला वह बुखार जो प्रायः बरसात में होता है। जूडी़। मलेरिया।

फसली सन्, फसली साल
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'फसली (२)'—१।

फसाद
संज्ञा पुं० [अ० फ़साद] [वि० फसादी] १. बिगाड़। विकार। २. बलवा। विद्रोह। ३. ऊधम। उपद्रव। ४. झगडा़। लडाई। ५. विवाद। क्रि० प्र०—करना।—उठाना।—खड़ा करना।—दबना।— दबाना।—मचना। —मचाना। मुहा०—फसाद का घर=झगड़ालू। फसाद की जड़=झगड़े के मुल कारण।

फसादी
वि० [फा०] १. फसाद खड़ा करनेवाला। उपद्रवी। २. झगड़ालू। लड़ाका। ३. नटखट। पाजी।

फसाना
संज्ञा पुं० [फा० फसानह्] आख्यान। कहानी। किस्सा। यौ०—फसानानवीस, फसानानिगार=कहानी लेखक।

फसाहत
संज्ञा स्त्री० [अ० फसाहत] किसी विषय का साधु और मार्जित वर्णन करना। भाषा का प्रसाद गुण। उ०—'रसा' महवे फसाहत दोस्त क्या दुश्मन भी हैं सारे। जमाने में तेरे तजें सखुन की यादगारी है।— भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ८४८।

फसिल †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'फसल'।

फसील
संज्ञा स्त्री० [अ० फसील] १. भित्ति। दीवार। २. प्राचीर। परकोटा।

फसीह
वि० [अ० फसीह] प्रसाद गुणवाली भाषा लिखने या बोलनेवाला। उ०—श्री जहूरबख्श विशुद्ध संस्कृतमयी शैली में भी लिख सकते हैं और फसीह उर्दु में भी।—शुक्ल अभि० ग्रं० (साहित्य), पृ० ९२।

फस्त
संज्ञा स्त्री० [अ० फस्द] दे० 'फस्द'।

फस्द
संज्ञा स्त्री० [अ० फस्द] नस को छेदकर शरीर का दूषित रक्त निकालने की क्रिया। उ०—फस्द देते हुए फस्साद को रोकें।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० १९३। मुहा०—फस्द खोलना=नस या धमनी को छेदकर रक्त निका- लना। फस्द खुलवाना=(१) शरीर का दूषित रक्त निकालना। (२) पागलपन की चिकित्सा कराना। होश की दवा कराना। फस्द लेना=(१) शरीर का दूषित रक्त निकलवाना। (२) पागलपन की चिकित्सा कराना।

फस्ल
संज्ञा स्त्री० [अ० फस्ल] १. दे० 'फसल'। २. अंतर। पार्थक्य। ३. आवरण। पट। परदा। ४. किसी ग्रथ का अध्याय या परिच्छेद। यौ०—फल्ले गुल, फस्ले बहार=फूलो का मौसम। बसंत ऋतु।

फस्ली
वि०, संज्ञा पुं० [अ० फस्ल + फा० ई (प्रत्य०)] दे० 'फसली'।

फस्साद
संज्ञा पुं० [अ० फस्साद] फस्द खोलनेवाला। दूषित रक्त निकालनेवाला। उ०—फस्द देते हुए फस्साद को रोकें।— प्रेमघन०, भा० २, पृ० १९३।

फहमंद पु
वि० [अ० फह्म, हिं० फहम] जानकार। भेदी। उ०—फे फहमंदा भजन को दिब्य दृष्टि को जाय।—भीखा०, श०, पृ० ८९।

फहम
संज्ञा स्त्री० [अ० फह्म] ज्ञान। समझ। विवेक। उ०— (ख) फहमै आगे फहमै पाछे फहमै दाहिने डैरी। फहमै पर जो फहम करत है सोई है मेरी।—कबीर (शब्द०)। (ख) कलि कुचालि संतन कही सोइ सही, मोहिं कछु फहम न तरनि तमी को।—तुलसी (शब्द०)। (ग) आए सुकसारन बोलाए ते कहन लागे, पुलके सरीर सेना करत फहम ही।—तुलसी (शब्द०)।

फहमाइस
संज्ञा स्त्री० [फा० फहमाइश] १. शिक्षा। सीख। २. आज्ञा। हुकुम। क्रि० प्र०—करना।—देना।—होना।

फहरना
क्रि० अ० [सं० प्रसरण] फहराना का अकर्मक रूप। वायु में उड़ना। फड़फड़ाना। उ०—(क) सखिन बीच नागरीं बिराजति भई प्रीति उर हरि के। मंद मंद गति चलत अधिक छबि अंचल रहेउ फहरि के।—सूर (शब्द०)। (ख) फहरैं फुहारे नहरैं नदी सी बहै, छहरैं छबीन छाम छीटन की छाटी है।—पद्माकर (शब्द०)।

फहरान
संज्ञा स्त्री० [हिं० फहराना] फहरने या फहराने का भाव या क्रिया।

फहराना (१)
क्रि० स० [सं० प्रसारण] उड़ाना। कोई चीज इस प्रकार खुली छोड़ देना जिसमें वह हवा में हिलने और उड़ने लगे। जैसे, हवा में दुपट्टा फहराना, झंडा फहराना।

फहराना (२)
क्रि० अ० फहरना। वायु में पसरना। हवा में रह रहकर हिलना या उड़ना। उ०—(क) काया देवल मन ध्वजा विषय लहर फहराय। मन चलता देवल चले ताको सरबस जाय।—कबीर (शब्द०)। (ख) घंट घंटि धुनि बरनि न जाहीं। सरब करहिं पायक फहराहीं।—तुलसी (शब्द०)। (ग) चारिहुँ ओर ते पौन झकोर झकोरनि घोर घटा घहरानी। ऐसे समय पद्माकर काहु के आवत पीत पटी फहरानी।—पद्माकर (शब्द०)।

फहरानि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'फहरान'। उ०—(क) वा पट पीत की फहरानि। कर धरि चक्र चरण की धावनि नहिं बिसरति वह बानि।—सूर (शब्द०)। (ख) अंचर की फहरानि हिए घहरानि उरोजन पीन तटी की।—देव (शब्द०)।

फहरिस्त
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'फेहरिस्त'।

फहश
वि० [अ० फुह्श] फुहड़। अश्लील।