विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/फा

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फांट (१)
संज्ञा पुं० [सं० फाण्ट] थोड़े आयास द्वारा बननेवाला काढ़ा। औषधिचूर्ण को गर्म पानी में डालकर छानने से बना हुआ काढ़ा। २. मंथन से निकलनेवाले मक्खन के कण [को०]।

फांट (२)
वि० अनायास तैयार होनेवाला। आसानी से तैयार किया हुआ। ३. आलसी। सुस्त [को०]।

फांटक (१)
संज्ञा पुं० [सं० फाण्टक] काढ़ा। क्वाथ [को०]।

फांटक (२)
वि० दे० 'फांट (२)' [को०]।

फांड
संज्ञा पुं० [सं० फाण्ड] पेट। उदर [को०]।

फाँक (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० फलक या देश०] १. किसी गोल या पिंडाकार वस्तु का काटा या चीरा हुआ टुकड़ा। गोल मटोल वस्तु का वह खंड जो किसी सीध में बराबर काटने से अलग हो। छुरी, आरी आदि से अलग किया हुआ टुकड़ा। उ०—छोरी बंदि बिदा करि राजा राजा होय कि राँको। जरासंध को जोर उधेरयो फारि कियो द्वै फाँको।—गोपाल (शब्द०)। २. किसी फल का एक सिरे से दूसरे तक काटकर अलग किया हुआ टुकड़ा। जैसे, नीबू, आम, अमरूद, खरबूजे आदि की फाँक। ३. खंड। टुकड़ा। उ०—टघरि टघरि चामीकर के कंगूर गिरैं फटकि फरस फूटि फूटि फाँके फहराहिं।— (शब्द०)। विशेष—टूट टुटकर अलग होनेवाले टुकड़े के लिये इस शब्द का व्यवहार बहुत कम मिलता है। ४. लकीरें जिनसे कोई गोल या पिंडाकार वस्तु सीधे टुकड़ों में में बँटी दिखाई दे। जैसे, खरबूजे की फाँकें। ५. छिद्र। दरार। शिगाफ। संधि। जैसे, दरवाजे की फाँक।

फाँकड़ा
वि० [हिं० फाँक + देश० ड़ा (प्रत्य०)] १. बाँका। तिरछा। २. हृष्टपुष्ट। तगड़ा। मुस्टंडा। मजबूत।

फाँकना
क्रि० स० [हिं० फाँका] चूर, दाने या बुकनी के रूप की वस्तु को दूर से मुँह में डालना। कण या चूर्ण को दूर से मुँह में फेंककर खाना। जैसे, चीनी फाँकना। उ०—लपसी लौंग गनै इक सारा। खाँड़ं परिहरि फाँके छारा।—कबीर (शब्द०)। मुहा०—धूल फाँकना=(१) खाने को न पाना। (२) ऐसे स्थान में जाना या रहना जहाँ बहुत गर्द हो। (३) दुर्दशा भोगना।

फाँका (१)
संज्ञा पुं० [हिं० फेंकना] १. किसी वस्तु को दूर से फेंककर मुँह में डालने की क्रिया या भाव। फंका। मुहा०—फाँका मारना=किसी वस्तु को फाँकना। २. उतनी वस्तु जो एक बार में फाँकी जाय।

फाँका पु † (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० फाँक] दे० 'फाँक'। मुहा०—फँका देना=अंतर करना।

फाँका † (३)
संज्ञा पुं० [अ० फाकह्] दे० 'फाका'। यौ०—फाँकामस्त, फाँकेमस्त=दे० 'फाकामस्त'। उ०—जुरि आए फाँकेमस्त होली होइ रही।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ३९६।

फाँकी †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'फाँक'।

फाँग, फाँगी †
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का साग। उ०— (क) रुचि तल जानि लोनिका फाँगी। कढ़ी कृपालु दूसरे माँगी।—सूर (शब्द०)। (ख) पोई परवर फाँग फरी चुनि। टेंटी टेंट सो छोलि कियो पुनि।—सूर (शब्द०)।

फाँट † (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० फाटना, फटना वा सं० पट्ट] १. यथा- क्रम कई भागों में बाँटने की क्रिया या भाव। क्रि० प्र०बाँधना।—लगाना २. क्रम से बाँटा हुआ भाग। अलग अलग किए हुए कई भागों में से एक भाग। ३. दर या पड़ना जिसके अनुसार कोई वस्तु बाँटी जाय। यौ०—फाँटबंदी।

फाँट (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० फाण्ड] १. ओषधि को गरम पानी में औटाना। काढ़ा बनाने की क्रिया या भाव। २. क्वाथ। काढ़ा।

फाँट † (३)
संज्ञा पुं० [सं० फाण्ड (=पेट, उदर)] दे० 'फाँड़ा'। उ०— वसन एक इसहाक सोहावा। बाँधहिं फाँट सो लीन्ह कढ़ावा।—हिंदी प्रेमगाथा०, पृ० २३५।

फाँटना
क्रि० स० [हिं० फाट] १. किसी वस्तु को कई भागों में बाँटना। विभाग करना। २. जड़ी बूटी आदि को पानी में औटाना। काढ़ा करना।

फाँटबंदी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फाँट + फा० बंदी] वह कागज जिसमें किसी गाँव में नामुकुम्मल फट्तीदारों के हिस्सों के अनुसार उस गाँव की आमदनी आदि की गाँठ लिखो रहती है।

फाँटा
संज्ञा पुं० [हिं० फाटना] लोहे वा लकड़ी का वह झुका हुआ या कोणयुक्त टुकड़ा जो मिलकर कोण बनाती हुई दो वस्तुओं को परस्पर जकड़े रखने के लिये जोड़ पर जड़ दिया जाता है। कोनिया।

फाँड़
संज्ञा पुं० [सं० फाण्ड] दे० 'फाँड़ा'।

फाँड़ा †
संज्ञा पुं० [सं० फाण्ड (=पेट)] दुपट्टे या धोती का कमर में बँधा हुआ हिस्सा। क्रि० प्र०—कसना।—बाँधना। मुहा०—फाँड़ा बाँधना या कसना=किसी काम के लिये मुस्तैद होना। कटिबद्ध होना। कमर कसना। फाँड़ा पकड़ना= (१) इस प्रकार पकड़ना जिसमें कोई मनुष्य भागने न पावे। (२) स्त्री का किसी पुरुष को अपने भरण पोषण आदि के लिये जिम्मेदार ठहराना।

फाँद (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० फाँदना] उछाल। उछलने का भाव। कूदकर जाने की क्रिया या भाव।

फाँद † (२)
संज्ञा स्त्री०, पुं० [हिं० फंदा] रस्सी, बाल, सूत आदि का गेरा जिसमें पड़कर कोई वस्तु बँध जाय। फंदा। पाश। उ०— पवन पानि होइ होइ सब गरिई। पेम के फाँद कोउ जनि परई।—जायसी ग्रं०, पृ० २६४। २. चिड़िया आदि फँसाने का फंदा या जाल। उ०—(क) तीतर गीव जो फाँद है निवहिं पुकरै दोष।—जायसी (शब्द०)। (ख) प्रेम फाँद जो परा न छूटा। जीव दीन्ह पर फाँद न टूटा।—जायसी (शब्द०)। विशेष—कवियों ने इस शब्द को प्रायः पुल्लिंग ही माना है।

फाँदना (१)
क्रि० अ० [सं० फणन, हिं० फानना] झोंक के साथ शरीर को ऊपर उठाकर एक स्थान से दुसरे स्थान पर जा पड़ना। कूदना। उछलना। उ०—दृग मुगनैननि के कहूँ फाँद न पावै जान। जुलुक फँदा मुख भूमि पै रोपे बधिक सुजान। रसनिधि (शब्द०)। संयो० क्रि०—जाना।

फाँदना (२)
क्रि० स० १. उछलकर पार करना। कूदकर लाँघना। शरीर उछालकर किसी वस्तु के आगे जा पड़ना। डाँकना। जैसे, नाली फाँदना, गड्ढा फाँदना। २. नर (पशु) का मादा पर जोड़ा खाने के लिये जाना।

फाँदना (३)
क्रि० स० [हिं० फंदा] फंदे में डालना। फँसाना। उ०— कुटिल अलक सुभाय हरि के भुवनि पै रहे आय। अनो मम्मथ फाँदि फंदन मीन विधि लटकाय।—सूर (शब्द०)।

फाँदना † (४)
क्रि० स० [हिं०] दे० 'फानना'।

फाँदा †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'फंदा'। उ०—गुरु मुख सती महा परसादा। बाबत मेटै करम कर फाँदा।—कबीर सा०, पृ० ४११।

फाँदी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फंदा] १. वह रस्सी जिससे कई वस्तुओं को एक साथ रखकर बाँधते हैं। गट्ठा बाँधने की रस्सी। २. गन्नों का गट्ठा। एक में बँधे हुए बहुत से गन्नों का बोझ।

फाँफट †
संज्ञा पुं० [हिं० पहपठ] १. कूड़ा करकट। धूल धक्कड़। २. असत्य। झूठा। मिथ्या (लाक्ष०)। उ०—चोरी करि चप- रावत सोंहनि काहे कौं इतनो फाँफट फाँकत।—घनानंद०, पृ० ३३९।

फाँफी
संज्ञा स्त्री० [सं० पर्पटी] १. बहुत महीन झिल्ली। बहुत बारीक तह। २. दुध के ऊपर पड़ी हुई मलाई की पतली तह। ३. पतली सफेद झिल्ली जो आँख की पुतली पर पड़ जाती है। माँड़ा। जाला।

फाँवरिया पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रावार, हिं० पामरी, पाँवड़ी + इया (प्रत्य०)] या हिं० फरिया] ओढ़नी। पट। उ०—दिखण दिशा री मँगाय फाँवरिया अपणे हाथ ओढ़ाऊ।—राम० धर्म०, पृ० १।

फाँस (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० पाश] १. पाश। बंधन। फंदा। उ०— माया मोह लोभ अरु मान। ए सब त्रय गुण फाँस समान।—सूर (शब्द०)। २. वह रस्सी जिसका फंदा डालकर शिकारी पशु पक्षी फँसाते हैं। उ०—(क) दृष्टि रही ठग- लाड़ू, अलक फाँस पड़ गीव। जहाँ भिखारि न बाँचइ तहाँ बँचई को जीव?—जायसी (शब्द०)। (ख) वरुण फाँस ब्रजपतिहिं छिन माहिं छुड़ावै। दुखित गयंदहि जानि के आपुन उठि घावै।—सूर (शब्द०)।

फाँस (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० पनस] १. बाँस, सूखी लकड़ी आदि का कड़ा तँतु जो शरीर में चुभ जाता है। बाँस या काठ का कड़ा रेशा जिसकी नोक काँटे की तरह हो जाती है। महीन काँटा। उ०—(क) करकि करेजे गड़ि रही वचन वृक्ष की फाँस। निकसाए नकसै नहीं रही सो काहू गाँस।—कबीर (शब्द०)। (ख) नस पानन की काढ़ै हेरी। अधर न गड़े फाँस तेहि केरी।—जायसी (शब्द०)। क्रि० प्र०—गड़ना।—चुभना।—निकलना।—निकालना।— लगना। २. बाँस, बेंत आदि को चीरकर बनाई हुई पतली तीली। पतली कमाची। उ०—अमृत ऐसे बचन में रहिमन रस की गाँस।जैसे मिसिरिहु में मिली निरस बाँस की फाँस।—रहीम (शब्द०)। मुहा०—फाँस चुभना=जो में खटकनेवाली बात होना। कसकनेवाली बात होना।—ऐसी बात होना जिससे चित्त को दुःख पहुँचे। फाँस निकलना=कंटक दूर होना। ऐसी वस्तु या व्यक्ति का न रह जाना जिससे दुःख या खटका हो। कष्ट पहुँचानेवाली वस्तु का हटना। फाँस निकालना=कंटक दूर करना। ऐसी वस्तु या व्यक्ति को दूर करना जिससे कुछ कष्ट या बात का खटका हो।

फाँसना
क्रि० स० [सं० पाश, प्रा० फाँस] १. बंधन में डालना। पकड़ना। पाश में बाँधना। जाल में फाँसना। उ०—निरखि यदुवंश को रहस मन में भयो देखि अनिरुद्ध सों युद्ध माँड्यो। सूर प्रभु ठटी ज्यों भयो चाहें सो त्यों फाँसि करि कुँअर अनिरुद्ध बाँध्यो। २. धोखे में डालना। धोखा देकर अपने अधिकार में करना। वशीभूत करना। ३. किसी पर ऐसा प्रभाव डालना कि वह वश में होकर कुछ करने के लिये तैयार हो जाय। जैसे,—किसी बड़े आदमी को फाँसो तब रुपया मिलेगा। संयो क्रि०—फूँसना=फँसाना। उ०—मनबोध हुजूर लाला कल्लू को फाँसफूँस के ले गए हैं।—फिसाना०, भा० ३, पृ० ५००।—लाना।—लेना।

फाँसरी पु †
संज्ञा स्त्री० [हि०] फंदा। फँसरी। पाश। उ०— भली भई जो पिउ मुआ, नित उठि करता रार। छूटी गल की फाँसरी, सोऊँ पाँव पसार।—कवीर सा० सं०, पृ० ४७।

फाँसी
संज्ञा स्त्री० [सं० पाशी] १. फँसाने का फंदा। पाश। उ०— लालन बाल के द्वै ही दिना से परी मन आय सनेह की फाँसी।—मतिराम (शब्द०)। २. वह रस्सी या रेशम का फंदा जिसमें फँसने से गला घुट जाता है और फँसनेवाला मर जाता है। क्रि० प्र०—लगना। ३. रेशम या रस्सी का फंदा जो दो ऊँचे खंभे गाड़कर ऊपर से लटकाया जाता है और जिसे गले में डालकर अपराधियों को प्राणदंड दिया जाता है। मुहा०—फाँसी खड़ी होना=(१) फाँसी के खंभे इत्यादि गड़ना। फाँसी दिए जाने की तैयारी होना। (२) प्राण जाने का डर होना। डर की बड़ी भारी बात होना। जैसे,— जाते क्यों नहीं, क्या वहाँ फाँसी खड़ी है ? फाँसी चढ़ना = पाश द्वारा प्राणदंड पाना। फाँसी चड़ाना=गले में फंदा डालकर प्राण दंड देना। ४. वह दंड जो अपराधी को फंदे के द्वारा मारकर दिया जाय। पाश द्वारा प्राणदंड। मौत की सजा जो गले में फंदा डालकर दी जाय। क्रि० प्र०—होना। मुहा०—फाँसी देना=पाश द्वारा प्राणदंड देना। गले में फंदा डालकर मार डालना। फाँसी पाना = पाश द्वारा प्राणदंड पाना। किसी अपराध में गले में फदा डालकर मार डाला जाना।

फाइदा
संज्ञा पुं० [अ० फाइदह्] दे० 'फायदा'। उ०—जिस तरह हो सके हम अपनी जन्मभूमि को कुछ फाइदा पहुँचा सकें।— भारतेंदु ग्रं० भा० ३, पृ० ७८।

फाइन (१)
संज्ञा पुं० [अं० फाइन] जुर्माना। अर्थदंड। जैसे,— उसपर १००) फाइन हुआ।

फाइन (२)
वि० [अ० फाइन] सुंदर। अच्छा। बढ़िया।

फाइनल
वि० [अ० फाइनल] आखिरी। अंतिम। जैसे, फाइनल परीक्षा।

फाइनांस
संज्ञा पुं० [अ० फाइनान्स] सार्वजनिक राजस्व और उसके आयव्यय की पद्धति। अर्थव्यवस्था।

फाइनानशल
वि० [अ० फाइनान्शल] १. सार्वजनिक राजस्व या अर्थव्यवस्था संबंधी। मालगुजारी के मुताल्लिक। माली। जैसे, पाइनानशल कमिश्नर। २. आर्थिक। अर्थ संबंधी। माली।

फाइनानशल कमिश्नर
संज्ञा पुं० [अ० फाइनान्शल कमिश्नर] वह सरकारी अफसर जिसके अधीन किसी प्रदेश का राजस्व विभाग या माल का महकमा हो।

फाइल
संज्ञा स्त्री० [अं० फाइल] १. मिसिल। नत्थी। २. लोहे का तार जिसमें कागज या चिट्ठियाँ नत्थी की जाती हैं। ३. सामयिक पत्रों आदि के कुछ पूरे अंकों का समूह।

फाइलेरिया
संज्ञा पुं० [अ० फाइलेरिया] श्लीपद रोग।

फाउटेन
संज्ञा पुं० [अं० फाउटेन] १. निर्झर। सोता। चश्मा। स्याही रखने का पात्र। यौ०—फाउन्टेन पेन=लेखनी जिसमें स्याही भरकर लिखा जाता है जिससे बार बार उसे दावात में डुबाने की जरूरत नहीं होती।

फाउंड्री
संज्ञा स्त्री० [अ० फाउन्ड्री] वह कल या कारखाना जहाँ धातु की चीजें ढाली जाती हों। ढालने का कारखाना। जैसे, टाइप फाउँड्री।

फाउड़ि †
संज्ञा स्त्री० [हिं० पाँवड़ी] दे० 'पावँड़ी'। उ०—तजो कहरि नजिर भभूत, बटवा फाउड़ि जिनि लेउ हाथ। एता आरंभ परिहरौ सिद्धो, यो कथत जती गोरखनाथ।— गोरख०, पृ० २३८।

फाका
संज्ञा पुं० [अ० फाकह्] उपवास। निराहार रहना। उ०— फे फाके का गुन यही राजिक करे यादा।—चरण० बानी, पृ० ११२। यौ०—फाकाकशी। फाकेमस्त। क्रि० प्र०—करना।—होना। मुहा०—फाका पड़ना = उपवास होना। फाकों का मारा=भोजन न मिलने से अत्यंत शिथिल। भूख से मरता हुआ। फाकों मरना = भूखों मरना। उपवास का नष्ट सहना।

फाकामस्त, फाकेमस्त
वि० [अ० फाकह् (ए) + फा० मस्त, हिं० फाके + फा० मस्त] जो खाने पीने का कष्ट उठाकर भी कुछ चिंता न करता हो। जो पैसा पास न रखकर भी बेपरवा रहता हो।

फाखतई (१)
वि० [अ० पाखतह् + फा० ई (प्रत्य०) या फाख्तह् + ई (प्रत्य०)] पंडुक के रंग का। भूलापन लिए हुए लाल।

फाखतई (२)
संज्ञा पुं० एक रंग का नाम। विशेष—यह रंग ललाई लिए भूरा होता है। आठ माशे वायोलेट को आध सेर मजीठ के काढ़े में मिलाकर इसे बनाते हैं।

फाखता
संज्ञा स्त्री० [अ० फाखतह्] [वि० फाखतई] पडुक। धवँरखा। मुहा०—फाख्ता उड़ जाना =(१) घूरा जाना। व्याकुल होना। (२) बेहोश होना।

फाग
संज्ञा पुं० [हिं० फागुन] १. फागुन के महीने में होनेवाला उत्सव जिसमें लोग एक दूसरे पर रंग या गुलाल डालते और वसंत ऋतु के गीत गाते हैं। उ०—तेहि सिर फूल चढ़हिवै जेहि माथे मन भाग। आछँद सदा सुगंध वह जनु बसंत औ पाग।—जायसी (शब्द०)। क्रि० प्र०—खेलना। उ०—निकस्यो मोहन साँवरों हो फागु खेलन ब्रज माँझ ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३८२। २. वह गीत जो फाग के उत्सव में गाया जाता है।

फागुन
संज्ञा पुं० [सं० फाल्गुन] शिशिर ऋतु का दूसरा महीना। माघ के बाद का महीना। फाल्गुन। उ०—ऋतु फागुन नियरानी, कोई पिया से मिलावे।—कबीर श०, भा० १, पृ० ६८। विशेष—यद्यपि इस महीने की गिनती पतझड़ या शिशिर में है, तथापि वसंत का आभास इसमें दिखाई देने लगता है। जैसे, नई पत्तियाँ निकलना आरंभ होना, आमों में मजरी लगना, टेसू फूलना इत्यादि। इस महीने की पूर्णिमा को होलिका- दहन होता है। वह आनंद का महीना माना जाता है। इस महीने मे जो गीत गाए जाते है उन्हें फाग कहते हैं।

फागुनी
वि० [हिं० फागुन + ई (प्रत्य०)] फागुन संबंधी। फागुन का।

फाजिर
वि० [अ० फाजिर] [वि० स्त्री० फाजिरा] दुष्कर्मी। दुराचारी।

फाजिल
वि० [अ० फाजिल] १. अधिक। आवश्यकता से अधिक। जरुरत से ज्यादा। खर्च या काम से बचा हुआ। क्रि० प्र०—निकलना।—निकलना।—होना। २. विद्वान्। गुणी। उ०—(क) सो है फाजिल संत महरमी पूरन ब्रह्म समावै।—भीखा श०, पृ० २५। (ख) बहुत ही आला दर्जे के फाजिल और उस्ताद हैं।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० ९०।

फाजिल बाकी (१)
संज्ञा स्त्री० [अ० फाजिल बाकी] हिसाब की कमी या बेशी। हिसाब में का लेना देना। क्रि० प्र०—निकलना।

फाजिल बाकी (२)
वि० हिसाब में बाकी निकला हुआ। बचा हुआ। अवशिष्ट। जैसे,—तुम्हारे जिम्मे १००) फाजिल बाकी है।

फाटक (१)
संज्ञा पुं० [सं० कपाट] १. बड़ा द्वार। बड़ा दरवाजा। तोरण। उ०—चारों और ताँबे का कोट और पक्की चुआन चौड़ो खाई स्फटिक के चार फाटक तिनमें अष्टधाती किव्राँड़ लगे हुए... .....।—लल्लू (शब्द०)। २. दरवाजे पर की बैठक। ‡३. मवेशीखाना। काँजी हौस।

फाटक (२)
संज्ञा पुं० [हिं० फटकना] फटकन। पछोड़न। भूसी जो अनाज फटकने से बची हो। उ०—फाटक दै कर, हाटक माँगत भोरी निपटहि जानि।—सूर (शब्द०)।

फाटका
संज्ञा पुं० [हिं०] सट्टा। सट्टे का जुआ। उ०—सट्टे या फाटके का सौदा भी किया जाता था।—हिंदु० सभ्यता, पृ० २९९। यौ०—फाटकेबाज=सट्टे का जुआ खेलनेवाला। सट्टेबाज। सटोरिया।

फाटकी
संज्ञा स्त्री० [सं०] फिटकिरी [को०]।

फाटना पु †
क्रि० अ० [हिं०] 'फटना'। उ०—(क) धरती भार न अँगवे पाँव धरत उठ हाल। कर्म कूट भुइँ फाटी तिन हस्तिन की चाल।—जायसी (शब्द०)। (ख) दुध फाटि धृत दूधे मिला नाद जो (मिला) अकास। तन छूटै मन तहँ गया जहाँ धरी मन आस।—कबीर (शब्द०)। मुहा०—फाट पड़ना †=टूट पड़ना। उ०—दूर दूर से मरभूखे फाट पड़े।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० २७४।

फाड़खाऊ ‡
वि० [हिं० फाड़ + खाना] १. फाड़ खानेवाला। कटखन्ना। २. क्रोधी। बिगड़ैल। चिड़चिड़ा। ३. भयानक। घातक।

फाड़न
संज्ञा स्त्री०, पुं० [हिं० फाड़न] १. कागज, कपड़े आदि का टुकड़ा जो फाड़ने से निकले। २. दही के ताजे मक्खन की छाँछ जो आग पर तपाने से निकले।

फाड़ना
क्रि० स० [सं० स्फाटन, प्रा० फाडण, हिं० फाटना] १. किसी पैनी या नुकीली चीज को किसी सतह पर इस प्रकार मारना या खींचना कि सतह का कुछ भाग हठ जाय या उसमें दरार पड़ जायँ। चीरना। विदीर्ण करना। जैसे, नाखून से कपड़े फाड़ना, पेट फाड़ना। संयो० क्रि०—डालना।—देना। मुहा०—फाड़ खाना=क्रोध से झल्लाना। बिगड़ना। चिड़- चिड़ाना।२. झटके से किसी परत होनेवाली वस्तु का कुछ भाग अलग कर देना। टुकड़े करना। खंड करना। जैसे, थान में से कपड़ा फाड़ना, कागज फाड़ना। ३. धज्जियाँ उड़ाना। जैसे, हवा का बादल फाड़ना। संयो० क्रि०—डालना।—देना।—लेना। ३. जुड़ी या मिली हुई वस्तुओं के मिले हुए किनारों को अलग अलग कर देना। संधि या जोड़ फैलाकर खोलना। जैसे, आँख फाड़ना, मुँह फाड़ना। ४. किसी गाढ़े द्रव पदार्थ को इस प्रकार करना कि पानी और सार पदार्थ अलग हो जायँ। जैसे,—(क) खटाई डालकर दूध फाड़ना। (ख) चोट पर लगाने से फिटकरी खून फाड़ देती है।

फाणि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. गुड़। भेली। २. दही में साना हुआ सत्तू [को०]।

फाणित
संज्ञा पुं० [सं०] १. राब। २. शीरा।

फातिमा
संज्ञा स्त्री० [अ० फातिमह्] पैगंबर मुहमद की पुत्री जो अली की पत्नी और हसन हुसैन की जननी थी।

फातिहा
संज्ञा पुं० [अ० फातिहह्] १. प्रार्थना। उ०—कबीर काली सुंदरी होइ बैठी अल्लाह। पढ़ै फातिहा गैब का हाजिर को कहै नाहि।—कबीर (शब्द०)। २. वह चढ़ावा जो मरे हुए लोगों के नाम पर दिया जाय। जैसे,—हलवाई की दुकान और दादे का फातिहा। यौ०—फातिहाख्वानी=फातिहा फढ़ने की रस्म। क्रि० प्र०—पढ़ना।

फादर
संज्ञा पुं० [अं० फादर तुल० सं० पितर] १. पिता। बाप। २. पादरियों की सम्मानसूचक उपाधि। जैसे, फादर जोन्स। उ०—मैं अभी आप दोनों को गिर्जें में फादर के पास ले जाती हूँ।—जिप्सी, पृ० १६५।

फानना (१)
क्रि० स० [सं० फारण या स्फालन] धुनना। रूई को फटकना।

फानना † (२)
क्रि० स० [सं० उपायन] किसी काम को आरंभ करना। अनुष्ठान करना। कोई काम हाथ में लेना। किसी काम में हाथ लगा देना।

फानी
वि० [अ० फानी] नश्वर। नष्ट होनेवाला। उ०—रंगीन दलों पर जो कुछ था, तसवीर एक वह फानी थी।—द्वंद्व०, पृ० ५२।

फानूस (१)
संज्ञा पुं० [फा० फानस] १. एक प्रकार का दीपाधार जिसके चारों ओर महीन कपड़े या कागज का मंडप सा होता है। कपड़े या कागज से मढ़ा हुआ पिंजरे की शकल का चिरागदान। एक प्रकार की बडी कंदील। उ०—बाल छवीली तियन में बैठी आफ छिपाइ। अरगट ही फानूस सी परगट होति लखाई।—बिहारी (शब्द०)। विशेष—यह लकड़ी का एक चौकोर वा अठपहल ढाँचा होता था जिसपर पतला कपड़ा मढ़ा रहता था। इसके भीतर पहले चिरगदान पर चिराग रखकर लोग फरश पर रखते थे। २. शीशे की मृदगी, कमल वा गिलास आदि जिसमें बत्तियाँ जलाई जाती हैं। ३. समुद्र के किनारे का वह ऊँचा स्थान जहाँ रात को इसलियें प्रकाश जलाया जाता है कि जहाज उसे देखकर बंदर जान जाय। कदीलिया।

फानूस (२)
संज्ञा पुं० [अं० फरनेस] इँटों आदि की भट्ठी जिसमें आग सुलगाई जाती है और जिसके ताप से अनेक प्रकार के काम लिए जाते हैं। जैसे, लोहा, ताँबा, गंधक आदि गलाना।

फाफड़, फाफड़ा †
संज्ञा पुं० [सं० पर्पट] कूटू। कूलू। दे० 'कूटू'। उ०—और उस जगह फाफड़ा बोया।—किन्नर०, पृ० ६४।

फाफर
संज्ञा पुं० [सं० पर्पट] कूटू। कूलू। दे० 'कूटू'।

फाफा
संज्ञा स्त्री० [अनु० या सं० फार (= निरर्थक)] दाँत गिर जाने से 'फा फा' करके बोलनेवाली बुढ़िया। पोपली बुढ़िया। मुहा०—फाफा कुटनी = इधर उधर करनेवाली स्त्री। बुढ़िया जो कुटनपन करती वा इधर उधर करती हो। फाफी उड़ानी = दे० 'फाफाकुटनी'। व्यर्थ बकबक करनेवाली। उ०—झूठ पछी रे फाफी उड़ानी का झगरा करिए ।—सं० दरिया, पृ० १३७।

फाफुदा पु
संज्ञा पुं० [सं० पतङ्ग, हिं० फतिंगा, फतंगा] शलभ। पतंगा। टिड्डी।

फाब पु
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रभा, प्रा० पभा (= विपर्यय) या हिं० फबना?] शोभा। फबन। छबि। उ०—कहै पद्माकर फरा- कत फरसबद, फहरि फुहारन की फरस फबी है फाब।— पद्माकर (शब्द०)।

फाबना पु †
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'फबना'। उ०—तत करिअ जात फाबए चोरि। परसन रस लए न रहिअ अगोरि।— विद्यापति, पृ० ३३२।

फायदा
संज्ञा पुं० [अ० फाइदह्, फायदह्] १. लाभ। नफा। प्राप्ति। आय। जैसे,—इस रोजगार में बड़ा फायदा है। २. प्रयोजन- सिद्धि। मतलब पूरा होना। जैसे,—उससे पूछने से कुछ फायदा नहीं, वह न बतावेगा। ३. अच्छा फल। अच्छा नतीजा। भला परिणाम। जैसे,—महात्माओं का उपदेश सुनने से बहुत फायदा होता है। ४. उत्तम प्रभाव। अच्छा असर। बुरी से अच्छी दशा में लाने का गुण। जैसे,—इस दवा ने बहुत फायदा किया। क्रि० प्र०—करना।—होना। मुहा०—फायदे का = फायदा पहुँचानेवाला। लाभदायक।

फायदेमंद
वि० [फा़०] लाभदायक। उपकारक।

फायर
संज्ञा पुं० [अं० फा़यर] १. आग। २. दे० 'फैर'। यौ०—फायर आर्म = आग्नेयास्त्र। जैसे, बंदूक, पिस्तौल, रिवा- ल्वर आदि। फायर इंजन, फायर एंजिन, = आग बुझाने की कल। वि० दे० 'दमकल'। उ०—बारे फायर इंजन समयपर आ पहुँचा और अग्नि का वेग कम हुआ।—काया०, पृ० ३३४। फायर ब्रिगेड। फायर मैन।

फायर ब्रिगेड
संज्ञा पुं० [अं० फायर + ब्रिगेड] आग बुझानेवाले कर्मचारियों का दल।

फायर मैन
संज्ञा पुं० [अं० फा़यरमैन] वह कर्मचारी जो इंजन में कोयला झोंकने का काम करता है।

फाया
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'फाहा'।

फार पु †
संज्ञा पुं० [हिं० फारना] १. फार। फाल। खंड। उ०—चमकहि बीज होई उजियारा। जेहि सिर परे होइ दुइ फारा।—जायसी (शब्द०)। २. दे० 'फाल'।

फारकती पु †
संज्ञा स्त्री० [अ० फारिग + खत + फा़० ई (प्रत्य०)] दे० 'फारखती'। उ०—करै विसास न लेखा लेइ। सब कौं फारकती लिखि देइ।—अर्ध०, पृ० ६।

फारखती
संज्ञा स्त्री० [अ० फा़रिग + खती] वह लेख या कागज जिसके द्वारा किसी मनुष्य को उसके दायित्व से मुक्त किया जाय। वह कागज या लेख जो इस बात का सबूत हो कि किसी के जिम्मे जो कुछ था, वह अदा हो गया। चुकती। बेबाकी। क्रि० प्र०—लिखना।

फारना पु †
क्रि० स० [हिं०] दे० 'फाड़ना'। उ०—पेट फारि हरनाकुस मारयो जय नरहरि भगवान्।—सूर (शब्द०)।

फारम
संज्ञा पुं० [अं० फा़र्म] १. दरखास्त, बहीखाते, रसीद आदि के नमूने जिसमें वह दिखाया रहता है कि कहाँ क्या क्या बात लिखनी चाहिए। २. छपाई में एक पूरा तख्ता जो एक बार एक साथ छापा जाता हो। ३. छापने के लिये बैठाए हुए उतने अक्षर जितने एक तख्ता छापने के लिये पूरे हों। ४. वह कृषि भूमि जिसका रकबा बड़ा हो और जिसमें वैज्ञानिक ढंग से खेती की जाय।

फारमूला
संज्ञा पुं० [अं० फार्मूला] १. संकेत। सिदधांत। सूत्र। २. विधि। कायदा। ३. नुसखा।

फारस
संज्ञा पुं० [फा़० फा़रस] दे० 'पारस'।

फारसी
संज्ञा स्त्री० [फा़० फारसी] फारस देश की भाषा। उ०— ठोडर सुकवि ऐसे हुठी तें न टारयो टरे भावै कही सुधी बात भावै कहो फारसी।—अकबरी०, पृ० ५२।

फारा †
संज्ञा पुं० [सं० फाल] १. फाल। कतरा। कटी हुई फाँक। उ०—रीधे ठाढ़ सेब के फारे। छोंकि साग पुनि सौंधि उतारे।—जायसी (शब्द०)। २. दे० 'फाल'। ३. दे० 'फरा'।

फारिक पु
वि० [अ० फा़रिग] मुक्त। बेबाक। उ०—मूल ब्याज दै फारिक भए। तब सु नरोत्तम के घर गए।—अर्ध०, पृ० ३७।

फारिखती †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'फारखती'। उ०—रसीद, फारिखती देने में भी बहुत कुछ टालटूल किया करते हैं।— प्रेमघन०, भा० २, पृ० ८०।

फारिग
वि० [अ० फा़रिग] १. काम से छुट्टी पाया हुआ। जो अपना काम कर चुक हो। जैसे,—अब वह शादी के काम से फारिग हो गए। २. निश्चिंत। बेफिक्र। ३. छूटा हुआ। मुक्त।

फारिग उल बाल
वि० [फा़रिग उल् बाल] १. जिसके पास निर्वाह के लिये यथेष्ट धन संपत्ति हो। संपन्न। २. जो सब प्रकार से निश्चिंत हो। जिसे किसी बात की चिंता न हो। निश्चिंत।

फारिग उल बाली
संज्ञा स्त्री० [अ० फा़रिग उल् बाल + फा़० ई (प्रत्य०)] १. संपन्नता। अमीत्री। २. निश्चिंतता। बेफिक्री।

फारिस
संज्ञा पुं० [फा़० फारस] दे० 'फारस'। उ०—फारिस से मँगाए थे गुलाब।—कुकुर०, पृ० १।

फारी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] एक प्रकार का वस्त्र या कपड़ा। उ०—चदनोटा खीरोदक फारी। बाँसपोर झिलमिल की सारी।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० ३४४।

फारेन
वि० [अं०] दूसरे देश या राष्ट्र का। विदेश या परराष्ट्र संबंधी। वैदेशिक। परराष्ट्रीय। जैसे, फारेन डिपार्टमेंट, फारेन सेक्रेटरी।

फारेनहाइट
संज्ञा पुं० [अं० फारेनहाइट (जर्मन)] फारेनहाइट थमामीटर का आविष्कारक जर्मन वैज्ञानिक। यौ०—फारेनहाइट थर्मामीटर = एक प्रकार का थर्मामीटर जिसमें हिमांक ३२० डिग्री पर और क्वथनांक २१२० डिग्री पर होता है।

फार्म
संज्ञा पुं० [अं० फा़र्म] दे० 'फारम'।

फाल (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] लोहे की चौकोर लंबी छड़ जिसका सिरा नुकीला और पैना होता है और जो हल की अँकड़ी के नीचे लगा रहता है। जमीन इसी से खुदती है। कुस। कुसी। विशेष—संस्कृत में यह शब्द पुं० है।

फाल (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. महादेव। २. बलदेव। ३. फावड़ा। ४. नौ प्रकार की दैवी परीक्षाओं या दिव्यों में से एक जिसमें लोहे की तपाई हुई फाल अपराधी को चटाते थे और जीभ के जलने पर उसे दोषी और न जलने पर निर्दोष समझते थे।

फाल (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० फलक या हिं० फाड़ना] १. किसी ठोस चीज का काट या कतरा हुआ पतले दल का टुकड़ा। जैसे, सुपारी की फाल। २. कटी सुपारी। छालिया।

फाल (४)
संज्ञा पुं० [सं० प्लव] चलने या कूदने में एक स्थान से उठकर आगे के स्थान में पैर डालना। डग। फलाँग। उ०— (क) धनि बाल सुचाल सो फाल भरे लौ मही रँग लाल में बोरति हैं।—सेवक (शब्द०)। (ख) सौ जोजन मरजाद सिंध के करते एक फाल।—धरम० श०, पृ० ८४। मुहा०—फाल भरना = कदम रखना। डग भरना। फाल बाँधना = फलाँग मारना। कूद कर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना = उछलकर लाँधना। उ०—कहै पद्माकर त्यों हुकरत फुकरत, फैलत फलात, फाल बाँधत फलका मैं।—पद्माकर (शब्द०)। २. चलने या कूदने में उस स्थान से लेकर जहाँ से पैर उठाया जाय उस स्थान तक का अंतर जहाँ पैर पड़े। कदम भरका फालसा। पैंड़। उ०—(क) तीन फाल वसुधा सब कीनी सोइ वामन भगवान।—सtर (शब्द०)। (ख) धरती करते एक पग, दरिया करते फाल। हाथन परबत तोलते तेऊ खाए काल।—कबीर (शब्द०)।

फाल (५)
संज्ञा स्त्री० [अ० फा़ल] सगुन। शकुन [को०]। यौ०—फालगी = सगुन विचारनेवाला।

फालकृष्ट
वि० [सं०] १. हल से जोता हुआ। जैसे, फालकृष्ट भूमि। २. जो हल से जोते हुए खेत में उत्पन्न हो। विशेष—बहुत से व्रतों में फालकृष्ट पदार्थ नहीं खाए जाते।

फालखेला
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक पक्षी [को०]।

फालतू
वि० [हिं० फाल (= टुकड़ा) + तू (प्रत्य०)] १. जो काम में आने से अव रहे। आवश्यकता से अधिक। जरूरत से ज्यादा। अतिरिक्त। बढ़ती। जैसे,—इतना कपड़ा फालतू है, तुम ले जाओ। २. जो किसी काम के लायक न हो। निकम्मा। जैसे,—क्या हमीं फालतू आदमी हैं जो इतनी दूर दौड़े जायँ।

फालसई
वि० [फा़० फालसह्, हिं० फालसा + ई (प्रत्य०)] फालसे के रंग का। ललाई लिए हुए हलका ऊदा। विशेष—इस रंग के लिये कपड़े को तीन बोर देने पड़ते हैं। पहले तो कपड़े को नील रँगते हैं, पिर कुसुम के पहले उतार के रंग में रँगते हैं, जो जेठा रंग होता है। फिर फिट- करी या खटाई मिले पानी में बोरकर निखार देने से रंग साफ निकल आता है।

फालसा (१)
संज्ञा पुं० [फा़० फालसह्, तुल० सं० परूरक, परूष, प्रा० फरूस] एक छोटा पेड़। विशेष—इसका धड़ ऊपर नहीं जाता और इसमें छड़ी के आकार की सीधी सीधी डालियाँ चारों ओर निकलती हैं। डालियों के दोनों ओर सात आठ अगुल लबे चौड़े गोल पत्ते लगते हैं जिनपर महीन लोइयाँ सी होती हैं। पत्ते की ऊपरी सतह की अपेक्षा पीछे की सतह का रंग हलका होता है। डालियों में यहाँ से वहाँ तक पीले फूल गुच्छों में लगते हैं जिनके झड़ जाने पर मोती के दाने के बराबर छोटे छोटे फल लगते हैं। पकने पर फलों का रंग ललाई लिए ऊदा और स्वाद खट- मीठा होता है। बीज एक या दो होते हैं। फालसा बहुत ठंढा समझा जाता है, इससे गरमी के दिनों में लोग इसका शरबत बनाकर पीते हैं। वैद्यक में कच्चे फल को वातघ्न और पित्तकारक तथा पक्के फल को रुचिकारक, पित्तघ्न और शोथनाशक लिखा है। पर्या०—परूपक। गिरिपिलु। शेपण। पारावत।

फालसा (२)
संज्ञा पुं० [?] शिकारियों की बोली में वह जंगली जानवर जो जंगल से निकलकर मैदान में चरने आए।

फालसाई
वि० [हिं० फालसा + ई (प्रत्य०)] दे० 'फालसई'।

फालाहत
वि० [सं०] दे० 'फालकृष्ट' [को०]।

फालिज
संज्ञा पुं० [अ० फा़लिज] एक रोग जिसमें प्राणी का आधा अंग सुन्न या बेकार हो जाता है। अर्धय। अधरंग। पक्षाघात। विशेष—इसमें शरीर के संवेदन सूत्र या गतिवाहक सूत्र निष्क्रिय हो जाते हैं। संवेदन सूत्रों के निष्क्रिय होने से अंग सुन्न हो जाता है, उसमें संवेदना नहीं रह जाती और गतिवाहक सूत्रों के निष्क्रिय होनो से अग का हिलना डोलना बंद हो जाता है। यौ०—फालिजजदा = फालिज या लकवे का बीमार। मुहा०—फालिज गिरना = अधरंग रोग होना। अंग सुत्र पड़ जाना। फालिज मारना =दे० 'फालिज गिरना'।

फालूदा
संज्ञा पुं० [फा़० फा़लूदह्] शर्बत के साथ पीने के लिये बनाई हुई एक चीज जिसका व्यवहार प्रायः मुसलमान करते हैं। विशेष—गेहूँ के सत्तू से बने हुए नाश्ते को बारीक काटकर शरबत में मिलाकर रखते हैं और ठंढा हो जाने पर पीते हैं। यह गरमी के दिनों में पिया जाता है।

फालेज
संज्ञा पुं० [फा़० फा़लेज] खरबूजे और ककड़ी का खेत।

फालावर
वि० [अ० फा़लोवर] अनुगामी। शिष्य। पीछा करनेवाला। उ०—बहार उसके पीछे ज्यों भुक्खड़ फालोवर।— कुकुर०, पृ० २४।

फाल्गुन
संज्ञा पुं० [सं०] १. दूर्वा नामक सोमलता। विशेष—शतपथ ब्राह्मण में इसे दो प्रकार का लिखा है, एक लोहितपुष्प, दूसरा चारुपुष्प। २. एक चांद्र मास का नाम जिसमें पूर्णमासी के दिन चंद्रमा का उदय पूर्वा फाल्गुनी वा उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में होता है। विशेष—यह महीना माघ के समाप्त हो जाने पर प्रारंभ होता है। इसी महीने की पूर्णिमा की रात को होलिका दहन होता है। दे० 'फागुन'। ३. अर्जुन का नाम। उ०—नयनन मिलत लई कर गहि के फाल्गुन चले पराय। सुनि बलदेव क्रोध अति बाढ़ेउ कृष्ण शांत किय आय।—सूर (शब्द०)। ४. अर्जुन नामक वृक्ष। ५. एक तीर्थ का नाम। ६. वृहस्पति का एक वर्ष जिसमें उसका उदय फाल्गुनी नक्षत्र में होता है।

फाल्गुनानुज
संज्ञा [सं०] १. चैत्र। २. वसंत ऋतु। ३. नकुल और सहदेव [को०]।

फाल्गुनाल
संज्ञा पुं० [सं०] फागुन का महीना [को०]।

फाल्गुनि
संज्ञा पुं० [सं०] अर्जुन।

फाल्गुनिक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] फागुन का महीना [को०]।

फाल्गुनिक (२)
वि० १. फाल्गुनी नक्षत्र से संबंध रखनेवाला। २. फाल्गुनी पूर्णमासी संबंधी [को०]।

फाल्गुनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. फाल्गुन मास की पूर्णिमा। २ पूर्बा पाल्गुनी और उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र। यौ०—फाल्गुनीभव = बृहस्पति।

फाल्तू
वि० [हिं०] दे० 'फाल्तू'। उ०—खजांची ने पूछा तुम्हारे धनुष की फाल्तू प्रत्यंचा कहाँ हैं।—श्रीनिवास, ग्रं०, पृ० २२४।

फावड़ा
संज्ञा पुं० [सं० फाल, प्रा० फाड] मिट्टी खोदने और टालने का चौड़े फल का लोहे का एक औजार जिसमें डंडे की तरह का लंबा बेंट लगा रहता है। फरसा। कस्सी। क्रि० प्र०—चलाना। मुहा०—फावड़ा चलाना = खेत में काम करना। फावड़ा बजना = खुदाई होना। खुदना। खुदकर गिरना। घ्वस्त होना। फावड़ा बजाना = खोदना। खोदकर ढाना या गिराना। जैसे,—वह जरा चूँ करे तो मकान पर फावड़ा बजा दूँ।

फावड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फावड़ा] १. छोटा फावड़ा। २. फावड़े के आकार की काठ की एक वस्तु जिसमें घोड़ों के नीचे की घास, लीद आदि हटाई जाती है या मैला आदि हटाया जाता है।

फाश
वि० [फा़० फाश] खुला। प्रकट। ज्ञात। उ०—छिपा न उसका इश्क राज आखिर की सब कुछ फाश हुआ।— भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ५६४। क्रि० प्र०—करना।—होना। मुहा०—परदा फाश करना = छिपी हुई बात खोलना। भेद या रहस्य प्रकट करना।

फासफरस
संज्ञा पुं० [यूना० अ० फा़सफ़रस] पाश्चात्य रासाय- निकों के द्वारा जाना हुआ एक अत्यंत ज्वलनशील मूल द्रव्य जिसमें धातु का कोई गुण नहीं होता और जो अपने विशुद्ध रूप में कहीं नहीं मिलता—आक्सीजन, कैलसियम और मैगनेशियम के साथ मिला हुआ पाया जाता है। विशेष—इसका प्रसार संसार में बहुत अधिक है क्योंकि यह सृष्टि के सारे सजीव पदार्थों के अंगविधान में पाया जाता है। वनस्पत्तियों, प्राणियों के हड्डियों, रक्त, मूत्र, लोभ आदि में यह व्याप्त रहता है। बहुत थोड़ी गरमी या रगड़ पाकर यह जलता है। हवा में खुला रखने से यह धीरे धीरे जलता है और लहसुन की सी गंधभरी भाप छोड़ता है। अँधेरे में देखने से उसमें सफेद लपट दिखाई पड़ती है। यदि गरमी अधिक न हो तो यह मोम की तरह जमा रहता है और छुरी से काटा या खुरचा जा सकता है, पर १०८ मात्रा का ताप पाकर यह पिघलने लगता है और ५५० मात्रा के ताप में भाप बनकर उड़ जाता है। यह बहुत सी धातुओं के साथ मिल जाता है और उनका रूपांतर करता है। इसे तेल या चरबी में घोलने पर ऐसा तेल तैयार हो जाता है जो अँधेरे में चमकता है। दियासलाई बनाने में इसका बहुत प्रयोग होता है। और भी कई चीजें बनाने में यह काम आता है। औषध के रूप में भी यह बहुत दिया जाता है क्योंकि डाक्टर लोग इसे बुद्धि का उद्दीपक और पुषट मानते हैं। ताप के मात्राभेद से फासफरस का गहरा रूपातंर भी हो जाता है। जैसे, बहुत देर तक २१२ मात्रा की गरमी से कुछ कम गरमी में रखने से यह लाल फासफरस के रूप में हो जाता है। तब यह इतना ज्वलनशील और विषैला नहीं रह जाता और हाथ में अच्छी तरह लिया जा सकता है।

फासफूस पु †
संज्ञा पुं० [हिं० फास + फूस] घास फूस। तुच्छ वस्तु। उ०—नाम बिना सब संचय झूठा फासफूस हो जाय रे।—राम० धर्म०, पृ० २१९।

फासला
संज्ञा पुं० [अ० फासलह्] दूरी। अंतर।

फासिज्म
संज्ञा पुं० [इता० फा़स + अं० इज्म] फासीवाद। अधि- नायक तंत्र। इटली की फासिस्ट पार्टी का मूल दर्शन वा सिद्धांत।

फासिस्ट
वि० [अं०] अधिनायक तंत्र को माननेवाला या अनुयायी।

फासिटीवाद
संज्ञा पुं० [अं० फा़सिटी + सं० वाद] फा़सिज्म। अधिनायकवाद।

फासिर्द
वि० [अ० फा़सिद] फसादी। खोटा। बुरा।

फासिल
वि० [अ० फा़सिल] अंतर डालनेवाला। पृथक् या अलग करनेवाला।

फासिला
संज्ञा पुं० [अ० फा़सलह्] दे० 'फासला'।

फास्ट
वि० [अ० फा़स्ट] १. तेज। २. शीघ्र चलनेवाला। शीघ्र- गामी। वेगवान्। जैसे, फास्ट पैसिंजर। विशेष—जब घड़ी की चाल बहुत तेज होती है, तब उसे फास्ट कहते हैं।

फाहशा
वि० [अ० फा़हशह्] छिनाल। पुंश्चली। उ०—फाहशा का पति कहलाने से यों गम खाना ही क्या बेहतर नहीं।— भस्मावृत०, पृ० ४०।

फाहा
संज्ञा पुं० [सं० फाल (= रूई का) वा सं० पोत (= कपड़ा), प्रा० पोय, हिं० फोया] १. तेल, घी, इत्र आदि चिकनाई में तर की हुई कपड़े की पट्टी वा रुई का लच्छा। फाया। साया। २. मरहम से तर पट्टी जो घाव, फोड़े आदि पर रखी जाती है।

फाहिशा
वि० [अ० फाहिशह्] छिनाल। पुंश्चली।

फिंगक
संज्ञा पुं० [सं० फिङ्गक] फिंगा नामक पक्षी।

फिंगा
संज्ञा पुं० [सं० फिङ्गक] एक प्रकार का पक्षी जिसके पर भूरे, चोंच पीली और पंजे लाल होते हैं। फेंगा। विशेष—यह सिंध से आसाम तक ऐसे बड़े बड़े मैदानों में जहाँ हरी घास अधिकता से होती है, छोटी छोटे झुंडों में पाया जाता है। इसके झुंड में से जहाँ एक पक्षी उड़ता है, वहाँ बाकी सब भी उसी का अनुकरण करते हैं। इसकी लँबाई प्रायः डेढ़ बालिश्त होती है और यह वर्षा ऋतु में तीन अंडे देता है।

फिंकरना †
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'फेंकरना'।

फिँकवाना
क्रि० स० [हिं० फेँकना का प्रे० रूप] फेंकने का काम करना। फेंकने के लिये प्रेरित करना।

फिकई
संज्ञा स्त्री० [देश०] चेने की तरह का एक मोटा अन्न जो बुंदेलखंड में होता है।

फिकना
क्रि० स० [हिं०] फेंका जाना। दे० 'फेंकना'। उ०— माताओं के हाथों पथ में शिशुओं को फिकते देखो।—हस०, पृ० ३३।

फिकर ‡
संज्ञा स्त्री० ]अ० फिक्र] दे० 'फिक्र'।

फिकरा
संज्ञा पुं० [अं० फिक़रह्] १. शब्दों का सार्थक समूह। वाक्य। जुमला। २. झाँसापट्टी। दमबुत्ता। यौ०—फिकरेबाज। मुहा०—फिकरा चलाना = धोखा देने के लिये कोई बात बनाकर कहना। जैसे,—आप भी बैठे बैठे फिकरा चलाया करते हैं। फिकरा चलना = धोखा देने के लिये कही हुई बात का अभीष्ट फल होना। जैसे, अगर आपका फिकरा चल गया तो रुपए मिल ही जायँगे। फिकरा देना या बताना = झाँसा देना। दम बुत्ता देना। फिकरा बनाना या तराशना = धोखा देने के लिये कोई बात गढ़कर कहना। फिकरे सुनाना, ढालना या कहना = व्यंगपूर्ण बात कहना। बोली बोलना। आवाज कसना।

फिकरेबाज
संज्ञा पुं० [अ० फिक़रह् + फा़० बाज] वह जो लोगों को धोखा देने के लिये बातें गढ़ गढ़कर कहता हो। झाँसा- पट्टी देनेवाला।

फिकरेबाजी
संज्ञा स्त्री० [अ० फिकरह्+ फा़० बाजी] धोखा देने के लिये तरह तरह की बातें कहना। झाँसापट्टी देना। दमबाजी। उ०—काँग्रेस प्रदर्शनी की सैर भी साथ ही हुई और पग पग पर फिकरेबाजियाँ रहीं।—प्रेम० और गोर्की, पृ० ८।

फिकवाना
क्रि० स० [हिं०] दे० 'फिंकवाना'।

फिकार
संज्ञा पुं० [देश०] चेने की तरह एक मोटा अन्न। फिकई।

फिकाह
संज्ञा पुं० [अ० फ़िका़ह] इस्लाम का धर्मशास्त्र।

फिकिर ‡
संज्ञा स्त्री० [अ० फ़िक़] दे० 'फिक्र'।

फिकैत
संज्ञा पुं० [हिं० फेँकना + ऐत (प्रत्य०)] वह जो फरी- गदका या पटाबनेठी चलाता हो। यौ०—फिकैतबाज = फिकैती का काम जाननेवाला।

फिकैती
संज्ञा स्त्री० [हिं० फिकैत + ई (प्रत्य०)] पटाबनेठी चलाने का काम या विद्या।

फिक्र
संज्ञा स्त्री० [अ० फ़िक्र] १. चिंता। सोच। खटका। दुःख- पूर्ण ध्यान। उदास करनेवाली भावना। क्रि० प्र०—करना।—होना। २. ध्यान। विचार। चित्त अस्थिर करनेवाली भावना। जैसे,— काम के आगे उसे खाने पीने की भी फिक्र नहीं रहती। मुहा०—फिक्र लगना = ऐसा ध्यान बना रहना कि चित्त अस्थिर रहे। ख्याल या खटका बना रहना। ३. उपाय की उदुभावना। उपाय का विचार। यत्न। तदबीर। जैसे,—अब तुम अपनी फिक्र करो, हम तुम्हारी मदद नहीं कर सकते।

फिक्रमंद
वि० [अ० फ़िक्र + फा० मंद] चिंताग्रस्त।

फिगार
वि० [फा़० फ़िगार] घायल। जैसे, दिलफिगार, सीना- फिगार। उ०—हरजा बिहिश्त बाग में देखो तो नौ बहार। और जा बजा में बैठे हैं सदहा जो दिल फिगार।—कबीर मं०, पृ० २२३।

फिचकुर
संज्ञा पुं० [सं० पिछ (= लार)] फेन जो मूर्छा या बेहोशी। आने पर मुँह निकलता है। क्रि० प्र०—निकलना।—बहना।

फिजूलखर्ची
वि० [अ० फूजूल + फा़० खर्ची] दे० 'फजूलखर्ची'। उ०—परोपकार की इच्छा ही अत्यंत उपकारी है परंतु हद्द से आगे बढ़ने पर वह भी फिजूलखर्ची समझी जायगी।— श्रीनिवास ग्रं०, पृ० १८९।

फिट (१)
अव्य० [अनु०] धिक्। छी। थुड़ी (धिक्कारने का शब्द)। यौ०—फिट फिट—धिक्कार है, धिक्कार। थुड़ी है। छी छी। लानत है।

फिट (२)
वि० [अं० फिट] १. उपयुक्त। ठीक। २. जिसके कल पुरजे आदि ठीक हों। जैसे,—यह मशीन बिलकुल फिट है। मुहा०—फिट करना = मशीन के पुरजे आदि यथास्थान बैठाकर उसे चलने के योग्य बनाना। ३. जो अपने स्थान पर ठीक बैठता हो। जैसे,—(क) यह कोट बिलकुल फिट है। (ख) यह आलमारी यहाँ बिलकुल फिट है।

फिट (३)
संज्ञा पुं० मिरगी आदि रोगों का वह दौरा जिसमें आदमी बेहोश हो जाता है और उसके मुँह से झाग आदि निकलने लगती है। मुहा०—फिट आना = मिरगी का दौरा होना। बेहोशी आना। फिट का रोग = मिरगी या मूर्छा का रोग।

फिटकारी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'फिटकिरी'।

फिटकार
संज्ञा पुं० [हिं० फिट + कार] १. धिक्कार। लानत। उ०—काफिरों को सदा फिटकार मुबारक होए।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० ५४२। क्रि० प्र०—खाना।—देना। मुहा०—मुँह पर फिटकार बरसना = फिट्टा मुँह होना। चेहरा फीका या उतरा हुआ होना। मुख मलिन होना। मुख की कांति न रहना। श्रीहत होना। २. शाप। कोसना। बददुआ। मुहा०—फिटकार लगना = शाप लगना। शाप ठीक उतरना। ३. हलकी मिलावट। बास। भावना। जैसे,—इसमें केवड़े की फिटकार है।

फिटकारना ‡
क्रि० स० [हिं० फिटकार + ना (प्रत्य०)] १. शाप देना। कोसना। २. दे० 'फटकारना'।

फिटकिरी
संज्ञा स्त्री० [सं० फटिका, स्फटिकारि, फाटकी] एक मिश्र खनिज पदार्थ जो सलफेट आफ पोटाश और सलफेटआफ अलुमीनियग के मिलकर पानी में जमने से बनता है। विशेष—यह स्वच्छ दशा में स्फटिक के समान श्वेत होता है, इसी से इसे स्फटिका या फिटकिरी कहते हैं। मैल के योग से फिटकिरी लाल, पीली और काली भी होती है। यह पानी में घुल जाती है और इसका स्वाद मिठाई लिए हुए बहुत ही कसैला होता है। हिंदुस्तान में बिहार, सिंध, कच्छ और पंजाब में फिटकरी पाई जाती है। सिंधु नदी के किनारे 'कालाबाग' और छिछली घाटी के पास 'कोटकिल' फिटकिरी निकलने के प्रसिद्ध स्थान हैं। फिटकिरी मिट्टी के साथ मिली रहती है। मिट्टी को लाकर छिछले हौजों में बिछा देते हैं और ऊपर से पानी डाल देते हैं। 'अलगीनियम सलफेट' पानी में घुलकर नीचे बैठ जाता है जिसे फिटकिरी का बीज कहते हैं। इस बीज (अलुमीनम सलफेट) को गरम पानी में घोलकर ६ भाग 'सलफट आफ पोटाश' मिला देते हैं। फिर दोनों को आग पर गरम करके गाढ़ा करते हैं। पाँच छह् दिन में फिटकिरी जम जाती है। फिटकिरी का व्यवहार बहुत कामों में होता है। कसाव के कारण इसमें संकोचन का गुण बहुत अधिक है। शरीर में पड़ते ही यह तंतुओं और रक्त की नलियों को सिकोड़ देती है जिससे रक्तस्राव आदि कम या बंद हो जाता है। फिटकिरी के पानी से धोने से आई हुई आँख भी अच्छी होती है। वैद्यक में फिटकिरी गरम, कसैली, झिल्लियों को संकुचित करनेवाली तथा वात, पित्त, कफ, व्रण और कुष्ठ को दूर करनेवाली मानी जाती हैं। प्रदर, मुत्रकृच्छ, वमन, शोथ, त्रिदोष और प्रमेह में भी वैद्य इसे देते हैं। कपड़े की रँगाई में तो यह बड़े ही काम की चीज है। इसमें कपड़े पर रंग अच्छी तरह चढ़ जाता है। इसीसे कपड़े को रँगने के पहले फिटकिरी के पानी में बोर देते हैं जिसे जमीन या अस्तर देना कहते है। रंगने के पीछे भी कभी कभी रंग निखारने और बराबर करने के लिये कपड़े फिटकिरी के पानी में बोरे जाते हैं।

फिटकी (१)
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. छींटा। २. सूत के छोटे छोटे फुचरे जो कपड़े की बुनावट में निकले रहते हैं।

फिटकी पु (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'फिटकिरी'।

फिटन
संज्ञा स्त्री० [अं०] चार पहिए की एक प्रकार की खुली गाड़ी जिसे एक या दो घोड़े खींचते हैं।

फिटरा †
वि० [अ० फ़ितरह् (= धूर्त)] फितरा। फितरती। उ०— जो फिटरे। तें मोकों अबताई क्यों न जनाई।—दो सौ बावन, भा० १, पृ० १३९।

फिटसन
संज्ञा पुं० [देश०] कठसेमल नाम का छोटा वृक्ष जिसकी पत्तियाँ चारे के काम में आती हैं। वि० दे० 'कठसेमल'।

फिटाना पु †
क्रि० स० [हिं०] हटाना। भगाना। उ०—नैक न उसास लेत फौज मै फिटाई देत, पेत नहिं छाड़ै मारि करे चकचूर है।—सुंदर ग्रं०, भा० २, पृ० ४८९।

फिट्टा
वि० [हिं० फिट] फटकार खाया हुआ। अपमानित। उतरा हुआ। श्रीहत। उ०—आपमे तो सकत नहीं, फिर ऐसे राजा का, फिट्टे मुँह। हम कहाँ तक आपको सताया करेंगे।—इनशा० (शब्द०)। मुहा०—फिट्टा मुँह, फिट्टे मुँह = उतरा या फीका पड़ा हुआ चेहरा।

फितना
संज्ञा पुं० [अ० फ़ितनह्] १. वह उपद्रव जो अचानक किसी कारण से उठ खड़ा हो। झगड़ा। दंगा फसाद। २. विद्रोह। बगावत (को०)। क्रि० प्र०—उठना।—उठाना। ३. विशुन (को०)। ४. एक फूल का नाम। ५. एक प्रकार का इत्र।

फितनेपर्दाज
वि० [अ० +फ़ितनह् + पर्दाज] उपद्रव खड़ा करनेवाला। उ०—परसों शब को फितनेपर्दाज के फरेब में आकार हजरत ने मुझसे चक्कर लाए थे।—श्रीनिवास ग्रं०, पृ० ११९।

फितरत
संज्ञा स्त्री० [फ़ितरत] १. प्रकृति। २. आदत। स्वभाव। ३. उत्पत्ति। पैदाइश। ४. धूर्तता। चालाकी। शरारत [को०]।

फितरती
वि० [अ० फ़ितरत + फा़० ई (प्रत्य०)] १. चालाक। चतुर। २. फितूरी। मायावी। धोखेबाज।

फितूर
संज्ञा पुं० [अ० फू़तूर] [वि० फितूरी] १. न्यूनता। घाटा। कमी। क्रि० प्र०—आना।—पड़ना। २. विकार। विपर्यय। खराबी। क्रि० प्र०—आना।—उठना।—पड़ना। ३. झगड़ा। बखेड़ा। दंगा फसाद। उपद्रय। क्रि० प्र०—उठना।—करना।—पड़ना।—मचाना।

फितूरिया †
वि० [हिं० फितूर + इया (प्रत्य०)] फितूर करनेवाला। फितूरी।

फितूरी
वि० [हिं० फितूर] १. झगड़ालू। लड़ाका। २. उपद्रवी। फसादी।

फिदवी (१)
वि० [अ० फ़िदाई से फा़० फ़िदवी] स्वामिभक्त। आज्ञाकारी।

फिदवी (२)
संज्ञा पुं० [स्त्री० फिदविया] दास।

फिदा
वि० [अ० फ़िदह्] मुग्ध। मोहित। किसी पर आसक्त।

फिदाई
वि० [फा़० फ़िदाई] मुग्ध या मोहित होनेवाला। मुहा०—फिदाई होना = प्रेमी होना। किसि पर मुग्ध होना।

फिद्दा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पिद्दा'।

फिना पु
संज्ञा स्त्री० [अ० फना] दे० 'फना'।

फिनाइल
संज्ञा पुं० [अं० फिनाइल] कीटाणुनाशक एक द्रव पदार्थ जो मोरी पनालों में सफाई के लिये डाला जाता है। यह कोलतार या अलकतरे से निकलता है।

फिनिया
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक गहना जो कान में पहना जाता है। उ०—छोटी छोटी ताजैं शीश राजै ग्रहराजै सम, छोटी छोटी फिनियाँ फबी हैं छोटे कान में।—रघुराज (शब्द०)।

फिनीज
संज्ञा स्त्री० [स्पे० पिनज] एक छोटी नाव जिसपर दो मस्तूल होते हैं और जो डाँड़े से चलाई जाती है।

फिफरी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० फेफरी] दे० 'फेफड़ी'।

फिया ‡
संज्ञा स्त्री० [सं० प्लीहा] प्लीहा। तिल्ली।

फिरंग
संज्ञा पुं० [अ० फ्रांक] १. यूरोप का देश। गोरों का मुल्क। फिरंगिस्तान। विशेष—फ्रांक नाम का जरमन जातियों का एक जत्था था जो ईसा की तीसरी शताब्दी में तीन दलों में विभक्त हुआ। इनमें से एख दल दक्षिण की ओर बढ़ा और गाल (फ्रांस का पुराना नाम) से रोमन राज्य उठाकर उसने वहाँ अपना अधिकार जमाया। तभी से फ्रांस नाम पड़ा। सनू १०९६ और १२५० ई० के बीच यूरोप के ईसाइयों ने ईसा की जन्मभूमि को तुर्कों के हाथ से निकालने के लिये कई चढ़ाइयाँ कीं। फ्रांक शब्द का परिचय तभी से तुर्कों को हुआ और वे यूरोप से आनेवालों को फिरंगी कहने लगे। धीरे धीरे यह शब्द अरब, फारस आदि होता हुआ हिंदुस्तान में आया। हिंदुस्तान में पहले पुर्तगाली दिखाई पड़े इससे इस शब्द का प्रयोग बहुत दिनों तक उन्हीं के लिये होता रहा। फिर यूरोपियन मात्र को फिरंगी कहने लगे। २. भावप्रकाश के अनुसार एक रोग। गरमी। आतशक। विशेष—पहले पहल भावप्रकाश में ही इस रोग का उल्लेख दिखाई पड़ता है और किसी प्राचीन वैद्यक ग्रंथ में नहीं है। भावप्रकाश में लिखा है कि फिरंग नाम के देश में यह रोग बहुत होता है इससे इसका नाम 'फिरंग' है। यह भी स्पष्ट कहा गया है कि फिरंग रोग फिरंगी स्त्री के साथ संभोग करने से हो जाता है। इस रोग के तीन भेद किए हैं—बाह्य फिरंग, आभ्यंतर फिरंग और बहिरंतर्भव फिरंग। बाह्य फिरंग, विस्फोटक के समान शरीर में फूट फूटकर निकलता है और घाव या व्रण हो जाते हैं। यह सुखसाध्य है। आभ्यंतर फिंरग में संधि स्थानों में आमवात के समान शोथ और वेदना होती है। यह कष्टसाध्य है। बहरितर्भव फिरंग एक प्रकार से असाध्य है।

फिरग बात
संज्ञा पुं० [हिं० फिरंग + सं० बात] बातज फिरंग। दे० 'फिरंग—२'।

फिरगिस्तान (१)
संज्ञा पुं० [अं० फ्रांक + फा़० स्तान] फिरंगियों के रहने का देश। गोरों का देश। यूरोप। फिरंग। वि० दे० 'फिरग'—१।

फिरंगी (१)
वि० [हिं० फिरंग] १. फिरंग देश में उत्पन्न। २. फिरंग देश में रहनेवाला। गोरा। ३. फिरंग देश का।

फिरंगी (२)
संज्ञा पुं० [स्त्री० फिरगिन] फिरंग देशवासी। यूरोपियन। उ०—हबशी रूमी और फिरंगी। बड़ बड़ गुनी और तेहि संगी।—जायसी (शब्द०)।

फिरंगी (३)
संज्ञा स्त्री० विलायती तलवार। यूरोप देश की बनी तलवार। उ०—चमकती चपला न, फेरत फिरंगै भट, इंद्र को चाप रूप बैरष समाज को।—भूषण (शब्द०)।

फिरंट
वि० [हिं० फिरना] १. फिरा हुआ। विरुद्ध। खिलाफ। उ०—जिन लोगों से इकरार करके गए थे वह सब फिरंट हो गए।—फिसाना०, भा० ३, पृ० ३४। २. बिगड़ा हुआ। विरोध या लड़ाई पर उद्यत। जैसे,—बात ही बात में वह मुझसे फिरंट हो गया। क्रि० प्र०—होना।

फिरंदर
वि० [हिं० फिरना] घूमनेवाला। घुमंतू। खाना- बदोश। यायावर। उ०—अथर्ववेद में मगध के निवासियों को ब्रात्य कहा गया है, जो अंत्यज और फिरंदर समझे जाते थे।—हिंदु० सभ्यता, पृ० ९६।

फिर
क्रि० वि० [हीं० फिरना] १. जैसा एक समय हो चुका है वैसा ही दूसरे समय भी। एक बार और। दोबारा। पुनः। जैसे,—इस बार तो छोड़ देता हुँ, फिर ऐसा काम न करना। उ०—नैन नचाय कही मुसकाय लला फिर आइयो खेलन होरी।—पद्माकर (शब्द०)। यौ०—फिर फिर = बार बार। कई दफा। उ०—फिर फिर बूझति, कहि कहा, कह्यो साँवरे गात । कहा करत देखे कहा अली। चली क्यों जात ?—बिहारी (शब्द०)। २. आगे किसी दूसरे वक्त। भविष्य में किसी समय। और वक्त। जैसे,—इस समय नहीं है फिर ले जाना। ३. कोई बात हो चुकने पर। पीछे। अनंतर। उपरांत। बाद में। जैसें,—(क) फिर क्या हुआ ? (ख) लखनऊ से फिर कहाँ जाओगे ? उ०—मेरा मारा फिर जिऐ तो हाथ न गहौं कमान।— कबीर (शब्द०)। ४. तब। उस अवस्था में। उस हालत में। जैसे,—(क) जरा उसे छेड़ दो फिर कैसा झल्लाता है। (ख) उसका काम नकल जायगा फिर तो वह किसी से बात न करेगा। उ०—(क) सुनतै धुनि षीर छुटै छन में फिर नेकहु राखत चेत नहीं।—हनुमान (शब्द०)। (ख) तुम पितु ससुर सरिस हितकारी। उतर देउँ फिर अनुचित भारी।—तुलसी (शब्द०)। मुहा०—फिर क्या है ? = तब क्या पूछना है। तब तो किसी बात की कलर ही नहीं है। तब तो कोई अड़चन ही नहीं है। तब तो सब बात बनी बनाई है। ५. देश संबंध में आगे बढ़कर। और चलकर। आगे और दूरी पर। जैसे,—उस बाग के आगे फिर क्या है ? ६. इसके अतिरिक्त। इसके सिवाय। जैसे,—वहाँ जाकर उसे किसी बात का पता न लगेगा, फिर यह भी तो है कि वह जाय या न जाय।

फिरऊन
संज्ञा पुं० [अ० फ़िरऔन] मिस्र के बादशाहों की उपाधि जो अपने आपको ईश्वर कहा करते थे। उ०—यह समस्तसंसार हिरण्यकशिपु और फिरऊन इत्यादि के सदृश अंधा और अज्ञानी है।—कबीर मं०, पृ० २२२।

फिरऔन (१)
संज्ञा पुं० [अ० फ़िरऔन] प्राचीन मिस्त्र के बादशाहों की उपाधि।

फिरऔन (२)
वि० अभिमानी। अहंमन्य [को०]।

फिरक
संज्ञा स्त्री० [हिं० फिरना] एक प्रकार की छोटी गाड़ी जिसपर गाँव के लोग चीजों को लादकर इधर उधर ले जाते हैं। (रुहेलखंड)।

फिरकना
क्रि० अ० [हिं० फिरना] १. थिरकना। नाचना। २. किसी गोल वस्तु का एक ही स्थान पर घूमना। लट्टू की तरह घूमना या चक्कर खाना।

फिरकनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फिरना] दे० 'फिरकी'। उ०—दूर दूर फिरती रहती थी, जैसे, फिरती गिरे फिरकनी।—मिट्टी०, पृ० ११०।

फिरका
संज्ञा पुं० [अ० फ़िरकह्] १. जाति। २. जत्था। झुंड। ३. पंथ। संप्रदाय। यौ०—फिरकापरस्त = सांप्रदायिक। फिरकापरस्ती = सांप्रदायि- कता। फिरकाबंदी = जमात या गिरोह बनाना। गुटबंदी। फिरकावार = संप्रदायानुसार।

फिरकी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फिरकना] १. वह गोल या चक्राकार पदार्थ जो बीच की कीली को एक स्थान पर टिकाकर घूमता हो। २. लड़कों का एक खिलौना जिसे वे नचाते हैं। फिरहरी। ३. चकई नाम का खिलौना। उ०—नई लगनि कुल की सकुचि बिकल भई अकुलाय। दुहँ ओर ऐंची फिरै फिरकी लौं दिन जाय।—बिहारी (शब्द०)। ४. चमड़ें का गोल टुकड़ा जो तकवे में लगाकर चरखे में लगाया जाता है। चरखे में जब सूत कातते है तब उसके लच्छे को इसी के दूसरे पार लपेटते हैं। ५. लकड़ी, धातु वा कद्दू के छिलके आदि का गोल टुकड़ा जो तागा बटने के तकवे के नीचे लगा रहता है। ६. मालखंभ की एक कसरत जिसमें जिधर के हाथ से माल- खभ लपेटते है उसी ओर गर्दन झुकाकर फुरती से दूसरे हाथ के कंधे पर मालखंभ को लेते हुए उड़ान करते हैं। यौ०—फिरकी का नक्कीकस = मालखंभ की एक कसरत। (इसमें एक हाथ अपनी कमर के पास से उलटा ले जाते हैं और दूसरे हाथ से बगल में मालखंभ दबाते हैं और फिर दोनों हाथों की उँगलियों को बाँट लेते हैं। इसके पीछे जिधर का हाथ कमर पर होता है उसी ओर सिर और सब धड़ को घुमाकर सिर को नीचे की ओर झुकाते हुए मालखंभ में लगाकर दंडवत् करते हैं)। फिरकी दंड = एक प्रकार का कस- रत या दंड जिसमें दंड करते समय दोनों हाथों को जमाकर दोनों हाथों के बीच में से सिर देकर कमान के समान हाथ उठाए बिना चक्कर मारकर जिस स्थान से चलते हैं फिर वहीं आ जाते हैं। ७. कुश्ती का एक पेंच। विशेष—जब जोड़ के दोनों हाथ गर्दन पर हों अथवा एक हाथ गर्दन पर और एक भुजदंड पर हो तब एक हाथ जोड़ की गर्दन पर रखकर दूसरे हाथ से उसके लँगोटे को पकड़े और उसे सामने झोंका देते हुए बाहरी टाँग मारकर गिरा दे।

फिरकैयाँ पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० फिरकी] चक्कर।

फिरता (१)
संज्ञा पुं० [हिं० फिरना] [स्त्री० फिरती] १. वापसी। २. अस्वीकार। जैसे, हुंडी की फिरती।

फिरता (२)
वि० वापस। लौटाया हुआ। जैसे,—लिया हुआ माल कहीं फिरता होता है ? क्रि० प्र०—करना।—होना।

फिरदोस पु
संज्ञा पुं० [अ० फ़िरदौस] दे० 'फिरदौस'। उ०—जो रखो फिरदोस पर टुक इक मजर। गैव के हातिक नै यूँ लाया खबर।—दक्खिनी०, पृ० १७८।

फिरदौस
संज्ञा पुं० [अ० फ़िरदौस] स्वर्ग। उ०—आज वह फिर- दौस सुनसान है पड़ा।—अनामिका, पृ० ६२।

फिरदौसी
संज्ञा पुं० [अ० फ़िरदौसी] ईरान का एक प्राचीन कवि जिसका नाम अबुल कासिम तूसी था और जिसने फारसी का प्रख्यात महाकाव्य 'शाहनामा' लिखा था।

फिरना
क्रि० अ० [हिं० फेरना का अक० रूप] १. इधर उधर चलना। कभी इस ओर कभी उस ओर गमन करना। इधर उधर डोलना। ऐसा चलना जिसकी कोई एक निश्चित दिशा न रहे। भ्रमण करना। जैसे,—(क) वह धूप में दिन भर फिरा करता है। (ख) वह चंदा इकट्ठा करने के लिये फिर रहा है। उ०—(ख) खेह उड़ानी जाहि घर हेरल फिरात सो खेह। जायसी (शब्द०)। (ख) फिरिहहिं मृग जिमि जीव दुखारी।—तुलसी (शब्द०)। (ग) फिरत सनेह मगन सुख अपने।—तुलसी (शब्द०)। २. टहलना। विचरना। सैर करना। जैसे,—संध्या को इधर उधर फिर आया करो। यौ०—घूमना फिरना। ३. चक्कर लगाना। बार बार फेरे खाना। लट्टू की तरह एक ही स्थान पर घूमना अथवा मंडल बाँधकर परिधि के किनारे घूमना। नाचना या परिक्रमण करना। जैसे, लट्टू का फिरना, घर के चारों ओर फिरना। उ०—(ख) फिरत नीर जोजन लख वाका। जैसे फिरै कुम्हार के चाका।—जायसी (शब्द०)। (ख) फिरैं पाँच कोतवाल सो फेरी। काँपे पाँव चपत वह पौरी।—जायसी (शब्द०)। ४. ऐंठा जाना। मरोड़ा जाना। जैसे,—ताली किसी ओर को फिरती ही नहीं है। ५. लौटना। पलटना। वापस होना। जहाँ से चले थे उसी ओर को चलना। प्रत्यावर्तित होना। जैसे,—(क) वे घर पर मिले, नहीं मैं तुरंत फिरा। (ख) आगे मत जाओं, घर फिर जाओ। उ०—(क) आय जनमपत्री जो लिखी। देय असीस फिरे ज्योतिषी।—जायसी (शब्द०)। (ख) पुनि पुनि विनय करहिं कर जोरी। जो यहि मारग फिरिय बहोरी।—तुलसी (शब्द०)। (ग) अपने धाम फिरे तब दोऊ जानि भई कछु साँझ। करि दंडवत परसि पद ऋषि के बैठे उपवन माँझ।—सूर (शब्द०)।संयो० क्रि०—आना।—जाना।—पड़ना। ६. किसी मोल ली हुई वस्तु का अस्वीकृत होकर बेचनेवाले को फिर दे दिया जाना। वापस होना। जैसे,—जब सौदा हो गया तब चीज नहीं फिर सकती। संयो० क्रि०—जाना। ७. एक ही स्थान पर रहकर स्थिति बदलना। सामना दूसरी तरफ हो जाना। जैसे,—धक्का लगने से मूर्ति का मुँह उधर फिर गया। संयो० क्रि०—जाना। ८. किसी ओर जाते हुए दूसरी ओर चल पड़ना। मुड़ना। घूमना। चलने में रुख बदलना। जैसे,—कुछ दूर सीधी गली में जाकर मंदिर की ओर फिर जाना। संयो० क्रि०—जाना। मुहा०—किसी ओर फिरना = प्रवृत्त होना। झुकना। मायल होना। जैसे,—उसका क्या, जिधर फेरो उधर फिर जाता है। उ०—तसि मति फिरी अहइ जसि भावी।—तुलसी (शब्द०) जो फिरना= चित्त न प्रवृत्त रहना। उचट जाना। हट जाना। विरक्त हो जाना। ९. विरुद्ध हो पड़ना। खीलाफ हो जाना। विरोध पर उद्यत होना। लड़ने या मुकाबला करने के लिये तैयार हो जाना। जैसे,—बात ही बात में वह फिर गया। मुहा०—(किसी पर) फिर पड़ना = विरुद्ध होना। क्रुद्ध होना। बिगड़ना। १०. और का और होना। परिवर्तित होना। बदल जाना। उलटा होना। विपरीत होना। जैसे, मति फिरना। उ०— काल पाइ फिरति दसा, दयालु। सब ही कौ, तोहि बिनु मोहिं कबहूँ न कोउ चहँगो।—तुलसी (शब्द०)। संयो० क्रि०—जाना। मुहा०—सिर फिरना = बुद्धि भ्रष्ट होना। उध्माद होना। ११. बात पर द्दढ़ न रहना। प्रतिज्ञा आदि से विचलित होना। हटना। जैसे, वचन से फिरना, कौल से फिरना। संयो० क्रि०—जाना। १२. सीधी वस्तु का किसी ओर मुड़ना। झुकना। टेढ़ा होना जैसे,—इस फावड़े की धार गई है। संयो० क्रि०—जाना। १३. चारो ओर प्रचारित होना। घोषित होना। जारी होना। सबके पास पहुँचाया जाना। जैसे, गश्ती चिट्ठी फिरना, दुहाई फिरना। उ०—(क) नगर फिरी रघुबीर दुहाई।— तुलसी (शब्द०)। (ख) भइ ज्योनार फिरी खँड़वानी।— जायसी (शब्द०)। १४. किसी वस्तु के ऊपर पोता जाना। लीप या पोतकर फैलाया जाना। चढ़ाया जाना। जैसे, दीवार पर रंग फिरना, जूते पर स्याही फिरना। १५. यहाँ से वहाँ तक स्पर्श करते हुए जाना। रखा जाना।

फिरनी
संज्ञा स्त्री० [फा़० फ़िरनी] एक प्रकार का खाद्य पदार्थ जो चावलों को पीसकर और दूध में पकाकर तौयार किया जाता हैं। विशेष—इसका व्यवहार प्रायः पश्चिम में और विशेषतः मुसल- मानों में होता है।

फिरना
संज्ञा पुं० [हिं० फिरना] १. सोने का एक आभूषण जो गले में पहना जाता है। २. सोने की अँगूठी जो तार को कई फेरे लपेटकर बनाई गई हो।

फिरवाना (१)
क्रि० स० [हिं० फेरना का प्रेर० रूप] फेरने का काम कराना।

फिरवाना (२)
क्रि० स० [हिं० फिराना का प्रे० रूप] फिराने का काम कराना।

फिराऊ
वि० [हिं० फिरना] १. फिरता हुआ। वापस लौटता हुआ। २. (माल) जो फिरा या फेरा जा सके। जाकड़।

फिराक † (१)
संज्ञा पुं० [देश०] १. चिंता। सोच। खटका। २. ठोह। खोज। मुहा०—फिराक में रहना = खोज में रहना। फिक्र या तलाश में रहना।

फिराक (२)
संज्ञा पुं० [अ० फ़िराक] १. अलगाव। पृथक्ता। २. वियोग। विछोह। ३. धुन। ध्यान। यौ०—फिराके यार = प्रिय का विरह।

फिराकिया
वि० [अ० फ़िराक + फा़० इयह् (प्रत्य०)] वियो- गात्मक। विरह संबंधी। यौ०—फिराकिया नज्म = विरह काव्य।

फिराद पु
संज्ञा स्त्री० [फा़० फ़रियाद] दे० 'फरियाद'। उ०— कवि ठाकुर कीजे फिराद कहा यह लाज हमारी तुही लहिया। ठाकुर०, पृ० २६।

फिरादि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'फरियाद'।

फिराना
क्रि० स० [हिं० फिरना] १. इधर उधर चलाना। कभी इस ओर कभी उस ओर ले जाना। इधर उधर डुलाना। ऐसा चलाना कि कोई एक निश्चित्त दिशा न रहे। २. टह- लाना। सैर कराना। जैसे,—जाओ, इसे बाहर फिरा लाओ। ३. चक्कर देना। बार बार फेरे खिलाना। लट्टू की तरह एक ही स्थान पर घुमाना अथवा मंडल या परिधि के किनारे घूमाना। नचाना या परिक्रमण कराना। जैसे, लट्टू फिराना, मंदिर के चारों ओर फिराना। उ०—(क) फिरै लाग बोहित तहँ आई। जस कुम्हार धरि चाक फिराई।— जायसी (शब्द०)। (ख) हस्ति पाँच जो आगे आए। ते अंगद धरि सूँड़ फिराए।—जायसी (शब्द०)। संयो० क्रि०—डालना।—देना।—लेना। ४. ऐंठना। मरोड़ना। जैसे,—ताली उधर को फिराओ। उ०— मद गजराज द्वार पर ठाढ़ो हरि कह्यो नेकु बचाय। उन नहिं मान्यो संमुख आयो पकरयो पूँछ फिराय।—सूर (शब्द०)। ५. लौटाना। पलटाना। उ०—तुम नारायण भक्त कहावत। काहे को तुम मोहिं फिरावत।—सूर (शब्द०)।६. एक ही स्थान पर रखकर स्थिति बदलना। सामना एक ओर से दूसरी ओर करना। दे० 'फेरना'। उ०—मुख फिराय मन अपने रीसा। चलत न तिरिया कर मुख दीसा।—जायसी (शब्द०)। संयो० क्रि०—देना।—लेना। ७. किसी ओर जाते हुए को दूसरी ओर चला देना। घुमाना। दे० 'फेरना'। ८. और का और करना। परिवर्तन करना। बदल देना। दे० 'फेरना'। ९. बात पर दृढ़ न रहने देना। विचलित करना। दे० 'फेरना'।

फिरार
संज्ञा पुं० [अ० फ़िरार] [वि० फिरारी] भागना। भाग जाना। मुहा०—फिरार होना = भागना। चल देना।

फिरौरी (१)
वि० [अ० फ़िरार + फा़० ई (प्रत्य०)] १. भागनेवाला। भगेड़ू। भगोड़ा। २. वह अपराधी जो दंड पाने के भय से भागता फिरता हो। उ०—फिरारी सुराजी को पकड़नेवालों को सरकार बहादुर की ओर से इनाम मिलता है।—मैला०, पृ० ३।

फिरौरी (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] ताश के खेल में उतनी जीत जितनी एक हाथ चलने में होती है। एक चाल की जीत।

फिरि पु †
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'फिर'। उ०—नागमती चितउर पथ हेरा। पिउ जो गए फिरि कीन्ह न फेरा।—जायसी ग्रं०, (गुप्त), पृ० ३५२।

फिरिकी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'फिरकी'।

फिरियाद, फिरियादि पु ‡
संज्ञा स्त्री० [अ० फ़रियाद] १. वेदना- सूचक शब्द। ओह। हाय। २. दुहाई। आवेदन। पुकार। उ०—सुख में सुमिरन ना किया दुख में कीनी याद। कहै कबीर ता दास की कैसै लगे फिरियाद।—कबीर (शब्द०)। क्रि० प्र०—करना।—मचाना।—होना।—लाना।—लगना।

फिरियादी पु †
वि० [फा़० फरियादी] १. फरियाद करनेवाला। अपना दुखड़ा सुनाने के लिये पुकार करनेवाला। २. आवेदन करनेवाला। नालिश करनेवाला।

फिरिश्ता
संज्ञा पुं० [फा़० फ़िरिश्तह्] दे० 'फरिश्ता'। यौ०—फिरिश्ताखसलत, फिरिश्ताख् = भला। दे० 'फरिश्ता खूँ'। फरिश्तासूरत = देवरूप। मुहा०—फिरिश्ते की गुजर न होना, या दाल न गलना = किसी का बस न होना। किसी की पहुँच न होना। फिरिश्ते दिखाई देना, या नजर आना = मौत करीब या नजदीक होना। फिरिश्तों को खबर न होना = अत्यंत गूढ़ या गोपनीय होना।

फिरिहरा
संज्ञा पुं० [हिं० फिरना] एक पक्षी का नाम, जिसकी छाती लाल और पीठ काले रंग की होती है।

फिरिहरी, फिरिहिरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० फिरना + हारा (प्रत्य०)] फिरकी नाम का खिलौना जिसे बच्चे नचाते हैं।

फिरोही
संज्ञा स्त्री० [देश०] वह धन जो दूकानदार माल खरीदनेवाले के नौकर को देता है। दस्तूरी। नौकराना।

फिर्का
संज्ञा पुं० [अ० फ़िर्कह्] दे० 'फिरका'।

फिलफिल
संज्ञा स्त्री० [अ० फिल़फिल़] मरिच। मिर्च [को०]।

फिलफौर
क्रि० [अ० फ़िलफ़ौर] १. तत्काल। उसी क्षण। २. ईश्वरेच्छया। उ०—गुरु शब्द से फिलफौर रंग पलट हो जावे।—कबीर म०, पृ० ३६२।

फिलहाल
क्रि० वि० [अं० फ़िलहाल] अभी। इस समय। संप्रति।

फिलासफर
संज्ञा पुं० [अं० फ़िलासफ़र] दार्शनिक। उ०—फिला- सफर का जोड़ फिलासफर से ही हो सकता है।—गोदान, पृ० १२६।

फिलासफी
संज्ञा स्त्री० [अं० फ़िलासफी़] १. दर्शन शास्त्र। २. सिद्धांत या तत्व की बात। गूढ़ बात। जैसे,—कहने सुनने को तो यह साधारण सी बात है, पर इसमें बड़ी भारी फिलासफी है।

फिल्म
संज्ञा पुं० [अ० फ़िल्म] १. छाया ग्रहण करनेवाला लेप जो सेल्युलाइड आदि के फीते या प्लेट पर रहता है। २. चित्र या चित्रफलक। ३. सिनेमा संबंधी चित्र। छायाचित्र। उ०— यह फिल्म तुम्हें बहुत बुरी लगती है।—सुनीता, पृ० १३२।

फिल्माना
क्रि० स० [अं० फ़िल्म से नाम०] सिनेमा बनाना। छाया चित्र तैयार करना। उ०—कुछ निर्माताओं ने मुंशी प्रेमचंद जी की अन्य रचनाओं को फिल्माने की घोषणा भी की।—प्रेम० और गोर्की, पृ० २५९।

फ्ल्लाह
वि० [अ० फिल्लाह] समाप्त। नष्ट। बर्बाद। यौ०—फनाफिल्लाह = अस्तित्व न रहना। ब्रह्मलीन। उ०—तब फनाफिल्लाह होवै, मारफत मकान ठहराइ के जी।—पलटू० बानी, पृ० ६०।

फिल्ली
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. लोहे के छड़ का एक टुकड़ा जो जुलाहों के करघे में तूर में लगाया जाता है। †२. पिंडली।

फिश्
अव्य० [अनु०] धिक्। फिट्। घृणासूचक अव्यय।

फिस
वि० [अनु०] कुछ नहीं। विशेष—जब कोई आदमी बड़ी तैयारी या मुस्तैदी से कोई काम करने चलता है और उससे नहीं हो सकता तब तिरस्कार रूप में यह शब्द कहा जाता है। जैसे,—बहुत कहते थे कि यह करेंगे पर सब फिस। मुहा०—टाँय टाँय फिस = थी तो बड़ी धूम पर हुआ कुछ नहीं। फिस हो जाना = हवा हो जाना। न रह जाना। जैसे, इरादा फिस होना, मामला फिस होना।

फिसकाना पु
क्रि० अ० [अनु० फिस ?] श्रीहीन होना। पश्चात्- पद होना। फिस हो जाना। फिसफिसाना। उ०—सुंदर दोऊ दल जुरै अरु बाजै सहनाइ, सूरा कै मुख श्री चढ़ै काइर दे फिसकाइ।—सुंदर० ग्रं०, भा० २, पृ० ७३९।

फिसही
वि० [अनु० फिस] १. जिससे कुछ करते धरते न बने। जिसका कुछ किया न हो। जो काम हाथ में लेकर उसे पूरा न कर सके। २. जो काम में पीछे रहे। जो किसी बात में बढ़ न सके।

फिसफिसाना
क्रि० अ० [अनु० फिस] १. फिस होना। २. ढीला पड़ना। शिथिल होना। जोर के साथ न चलना।

फिसलन
संज्ञा स्त्री० [हिं० फ़िसलना] १. फिसलने की क्रियाया भाव। चिकनाई के कारण न जमने या ठहरने की क्रिया या भाव। रपटन। २. ऐसा स्थान जहाँ चिकनाई के कारण पैर या और कोई वस्तु न जम सके। चिकनी जगह जहाँ पड़ने से कोई वस्तु न ठहरे, सरक जाय।

फिसलना (१)
क्रि० अ० [सं० प्र + सरण] १. चिकनाहठ और गीलेपन के कारण पैर आदि का न जमना। चिकनाई के कारण पैर आदि का न ठहर सकना। सरक जाना। रपटना। खिसलना। जैसे, कीचड़ में पैर फिसलना, पत्थर पर जमी काई पर शरीर फिसलना। संयो० क्रि०—जाना।—पड़ना। २. प्रघृत्त होना। झुकना। जैसे,—जिधर अपना लाभ देखते हो उसी ओर फिसल जाते हो। मुहा०—जी फिसलना = मन प्रवृत्त या मोहित होना।

फिसलना (२)
वि० जिसपर फिसल जायँ। रपटीला। बहुत चिकना। जैसे, फिसलना पत्थर।

फिसलाना
क्रि० स० [हिं० फिसलना] किसी को ऐसा करना कि वह फिसल जाय।

फिसाद
संज्ञा पुं० [अ० फ़साद] दे० 'फसाद'। उ०—आप लोगों ने जो काँटे बोएँ हैं उन्हीं का फल है। शहर में फिसाद हो गया है।—काया०, पृ० ३८।

फिसाना
संज्ञा पुं० [फा़० फ़सानह्] कथा। कहानी। उ०—(क) ये जहाँ एक ओर करुण चित्रों के आकलन में सिद्धहस्त हैं वहाँ पुरमजाक, फबती भरे, गुदगुदा देनेवाले फिसाने लिखने में भी।—शुक्ल अभि० ग्रं० (साहित्य), पृ० ९२। (ख) मिस्ले मजनूँ हाल मेरा भी फिसाना हो गया।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ८५०।

फिहरिस्त
संज्ञा स्त्री० [फा़० फ़िहरिस्त] सूची। सूचीपत्र। बीजक।

फींचना ‡
क्रि० स० [अनु० फिच् फिच्] पछारना। कपड़े को पटककर साफ करना। धोना। उ०—दिल लेकर फिर कपड़े सा फींचा।—कुकुर०, पृ० ३०।

फी
अव्य० [अ० फ़ी] १. प्रति एक। हर एक। जैसे,—(क) फी आदमी दो आने लगेंगे। (ख) फी रुपया दो आना सूद मिलता है। २. से। ३. में। बीच। यौ०—फी कस = प्रति व्यक्ति। फी जमाना = आजकल। इन। दिनों। उ०—फी जमाना अरबी और फारसी में वह सानी नहीं रखते।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० ९०। फी साल = प्रतिवर्ष। फी सैकड़ा = प्रति शत। सैकड़ा पीछे।

फीक †
वि० [हिं० फीका] १. अरुचिकर। फीका। २. धूमला। मलिन। उ०—चलब नीति मग राम पग नेह निबाहब नीक। तुलसी पहिरिय सो बसन जो न पखारे फीक।— तुलसी (शब्द०)।

फीकरिया पु †
वि० [हिं० फीका] [वि० स्त्री० फीकी] नीरस। रसहीन। फीका। उ०—बालूँ बाबा देसड़क जहाँ फीकरिया लोग। एक न दीसह गोरियाँ, घरि घरि दीमह सोग।—ढोला०, दू० ६६५।

फीका
वि० [सं० अपक्व, प्रा० अपिक्क] १. स्वादहीन। सीठा। नीरस। बेजायका। जो चखने में अच्छा न लगे। अरुचिकर। उ०—(क) माया तरवर त्रिविध का साख विषय संताप। शीतलता सपने नहीं फल फीका तन ताप।—कबीर (शब्द०)। (ख) जे जल दीखा सोई फीका। ताकर काह सराहे नीका।—जायसी (शब्द०)। (ग) प्रभु पद प्रीति न सामझ नीकी । तिन्हहिं कथा सुनि लागहि फिकी।—तुलसी (शब्द०)। (घ) देह गेह सनेह अर्पण कमल लोचन ध्यान। सूर उनको भजन देखत फीको लागत ज्ञान।—सूर (शब्द०)। २. जो चटकीला न हो। जो शोख न हो। धूमला। मलिन। उ०— चटक न छाड़त घटत हूँ सज्जन नेह गँभरि। फीको परे न बरु फटै रँग्यो चोल रँग चोर।—बिहारी (शब्द०)। क्रि० प्र०—करना।—पकड़ना।—होना। ३. बिना तेज का। कांतिहीन। प्रभाहीन। वे रौनक। मंद। जैसे, चेहरा फीका पड़ना। उ०—दुलहा दुलहिन मिलि गए फीकी परी बरात।—कबीर (शब्द०)। ४. प्रभावहीन। व्यर्थ। निष्फल। उ०—(क) प्रभु सों कहत सकुचाता हो परो जिनि फिरि फीको। निकट बोलि बलि बरजिए परिहरि ख्याल अब तुलसीदास जड़ जी को।—तुलसी (शब्द०)। (ख) नीकी दई अनाकनी फीकी पड़ी गुहारी। मनो तज्यो तारन बिरद बारिक तारि।—बिहारी (शब्द०)।

फीटना पु †
क्रि० सं० [प्रा० फिट्ट(= ध्वस्त होना), हिं० फटना] १. फटना। अलग होना। दूर होना। हटना। उ०—फीटौ तिमिर मान तब ऊग्यौ अंतर भयौ प्रकासा रे।—सुंदर० ग्रं० (जी०), भा० १, पृ० १७। २. नष्ट होना। उ०—सहज सुभाव भेरी तृष्ना फीटी, सीगी नाद संगि मेला।—गोरख०, पृ० २०७।

फीटिक †
संज्ञा पुं० [सं० स्फटिक, प्रा० फटिक] दे० 'फटिक', 'स्फठिक'। यौ०—फीटिकसील्या † = स्फटिक का प्रस्तरखंड़ या शिला। फीटिकसिला। उ०—फीटिक, सील्या दरस देखे जहाँ जाए गयंद दसन भरे।—सं० दरिया, पृ० ६६।

फीता
संज्ञा पुं० [पुर्त०] १. नेवार की पतली धज्जी, सूत, आदि जो किसी वस्तु को लपेटने या बाँधने के काम में आता है। उ०—खेलत चंग से चित्त चली ज्यों बँधी रघुराज के प्रेम के फीता।—रघुराज (शब्द०)। २. पतला किनारा। पतली कोर।

फीफरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'फेफरी'।

फीफसु †
संज्ञा पुं० [सं० फुफ्फुस] दे० 'फुपफुस'। उ०—सुरखी फीफसु पित बिचि कीन्हा।—प्राण०, पृ० १६।

फीरनी
संज्ञा स्त्री० [फा़० फिरनी] एक प्रकार की खीर जो दूध में चावल का बारीक आठा पकाकर बनाई जाती है। इसे मुसलमान अधिक खाते हैं।

फीरोजा
संज्ञा पुं० [फा़०; मि० सं० परेज, पेरोज] एक प्रकार का नग या बहुमूल्य पत्थर जो हरापन लिए नीले रंग का होता है।विशेष—इसमें अलमीनियम फासफेट और कुछ लोहे ओर ताँबे का योग होता है। अच्छा फीरोजा फारस की पहाड़ियों में होता है जहाँ से रोम होता हुआ यह यूरोप गया। अमेरिका से भी फीरोजा बहुत आता है। इसकी गिनती रत्नों में है और यह आभूषणों मे जड़ा जाता है। हलके मोल के पत्थर पच्चीकारी में भी काम आते हैं। वैद्य लोग इसका व्यवहार औषध के रूप में भी करते हैं। यह कसैला, मीठा और दीपन कहा गया है। पर्या०—हरिताश्म भस्मांग। पेरोज।

फीरिजी
वि० [फा़० फीरोजी] फीरोजे के रंग का। हरापन लिए नीला। विशेष—इस रंग में कपड़ा इस प्रकार रँग जाता है। पहले कपड़े को तुतिये के पानी में रँगते है, फिर तूतिये से चौगुना चूना मिले पानी में उसे बोर देते हैं। और फिर पानी में निथा- रतें हैं। यह क्रिया तीन बार करते हैं।

फील
संज्ञा पुं० [फा़० फील] हाथी। उ०—झालरि। झुकत झलकत झपे फीलन पै अली अकबर खाँ के सुभट सराह सराह के। अरि उर रोर सोर परत संसार घोर बाजत नगारे नरवर नाह के।— गुमान (शब्द०)। यौ०—फिलपाँव = श्लीपद। दे० 'फीलपा'।

फीलखाना
संज्ञा पुं० [फा़० फीलखानह] हथिसार। हस्तिशाला। वह घर जहाँ हाथी बाँधा जाता हो।

फीलपा
संज्ञा पुं० [फा़० फीलपा] एक रोग जिसमें पैर फूलकर हाथी के पैर की तरह हो जाता है। यह रोग शरीर के दूसरे अंगों पर भी आक्रमण करता है।

फीलपाया
संज्ञा पुं० [फा़० फीलपायह] १. ईटे का बना हुआ मोटा खंभा जिसपर छत ठहराई जाती है। इसे फोलपावा भी कहते हैं। २. दे० 'फीलपा'।

फीलवान
संज्ञा पुं० [फा़० फीलवान] हाथीवान।

फीली
संज्ञा स्त्री० [सं० पिण्ड] पिंडली। घुटने के नीचे एँड़ी तक का भाग। उ०—सिंह की चाल चलै डग ढीली। रोवाँ बहुत जाँघ औ फीली।—जायसी (शब्द०)।

फील्ड
संज्ञा पुं० [अं० फील्ढ] १. खेत। मैदान। २. गेंद खेलने का मैदान।

फील्ड़ ऐंबुलेन्स
संज्ञा पुं० [अं० फील्ड ऐम्बुलेन्स] दे० 'एम्बुलेन्स'।

फीवर
संज्ञा पुं० [अं० फीवर] ज्वर। बुखार।

फीस
संज्ञा स्त्री० [अं० फीस] १. कर। शुल्क। २. मेहनताना। उजरत। जैसे, ड़ाक्टर की फीस, स्कूल की फीस। क्रि० प्र०—लगना।

फुंकरना
क्रि० अ० [हिं० फुंकार] फूत्कार छोड़ना। उ०—(क) तब चले बान कराल। फुंकरत जनु बहु व्याल।—तुलसी (शब्द०)। (ख) कहै पद्माकर त्यों हुँकरत फुंकरत फुंकरत, फैलत फलात फाल बाँधत फलंका मेँ।—पद्माकर (शब्द०)।

फुंकार
संज्ञा पुं० [अनु०] फूत्कार। दे० 'फुँकार'। उ०—तब धाइ आयो जाइ जगायो मानो छूटी हाथियाँ। सहस फन फुंकार छाड़े जाई काली नाथियाँ।—सूर (शब्द०)।

फुंसी
संज्ञा स्त्री० [सं० पनसिका, पा० फनस] छोटी फोड़िया। यौ०—फोड़ा फुंसी।

फुँकना (१)
क्रि० स० [हिं० फूँकना] १. फूँकने का अकर्मक ऱूप। २. जलना। भस्म होना। संयो० क्रि०—लाना। ३. नष्ट होना। बरबाद होना। व्यर्थ खर्च होना। जैसे,—इतना रुपया फुँक गया। ४. मुँह की हवा भरकर निकाला जाना।

फुँकना (२)
संज्ञा पुं० १. बाँस, पीतल आदि की नली जिसमें मुँह की भरकर आग पर छोड़ते हैं। फुँकनी। २. प्राणियोँ के शरीर का वह अवयव जिसमें मुत्र रहता है। यह पेड़ू के पास होता है।

फुँकनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फूँकना] १. नली जिसमें मुँह की हवा भरकर आग पर इसलिये छोडते हैं जिसमें वह दहक जाय। २. भाथी।

फुँकरना
क्रि० अ० [सं० फूत्कार, हिं० फुंकार] फूत्कार छोड़ना। फूँ फूँ शब्द करना। मुँह से हवा छो़ड़ना।

फुँकवाना
क्रि० स० [हिं० फूँकना का प्रे० रूप] १. फूँकने का काम कराना। २. मुँह से हवा का झोंका निकलवाना। ३. जलवाना। भस्म करवाना।

फुँकाना
क्रि० स० [हिं० फूँकना का प्रे रूप] फूँकने का काम कराना।

फुँकार
संज्ञा पुं० [अनु०] साँप बैल आदि के मुँह वा नाक के नथनों से बलपूर्वक वायु के बाहर निकालने से उत्पन्न शब्द। फूत्कार।

फुँदना
संज्ञा पुं० [हिं० फूल + फंद ? या देश०] १. फूल के आकार की गाँठ जो बंद, इजारबंद, चोटी बाँधने या धोती कसने की डोरी, झालर आदि के छोर पर शोभा कै लिये बनाते हैं। फुलरा। झब्वा। उ०—उठी सो धूम नयन गरुवानी। लागी परै आँसु बहिरानी। भीनै लागि चुए कठमुंदन। भीजै भँवर कमल सिर फुंदन।—जायसी (शब्द०)। २. तराजू की डंड़ी के बीच की रस्सी की गाँठ। ३. कोड़े की डोरी के छोर पर की गाँठ। ४. सूत आदि का बँधा हुआ गुच्छा या फूल जो शोभा के लिये डोरियों आदि में लटकता रहता हैः। झब्बर।

फुँदिया † (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० फुँदना] १. झब्बा। फूलरा। फुँदना। २. दे० 'फुँदना'। उ०—फुँदिया और कसनिया राती। छायल- बँद लाए गुजराती।—जायसी (शब्द०)।

फुँदी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० फँदा सं० बन्ध ? ] फंदा। गाँठ। उ०— लीन्ही उसास मलीन भई दुति दीन्ही फुँदी फुफुदी की छिपाइ कै।—देव (शब्द०)।

फुँदी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० बिंदी] बिंदी। टीका। उ०—सारी लठकति पाट की, विलसति फुँदी लिलाट।—मति० ग्रं०, पृ० ४५२।

फु
संज्ञा पुं० [सं०] १. मंत्र पढ़कर फूँकने की ध्वनि। मंत्र पढ़करफूँकने का शब्द। २. मामूली बात। तुच्छ या छोटी बात [को०]।

फुआ †
संज्ञा स्त्री० [सं० पितृप्वसा] पिता की बहन। बुआ।

फुआरा †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'फुहारा'।

फुक
संज्ञा पुं० [सं०] पक्षी चि़ड़िया [को०]।

फुकना (१)
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'फुँकना' (१)'।

फुकना (२)
संज्ञा पुं० दे० 'फुँकना' (२)'।

फुकनी †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० फुँकनी'।

फुकली †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] फोकला। छिलका।

फुकाना
क्रि० स० [हिं०] दे० 'फुँकाना'।

फुगाँ
संज्ञा पुं० [फा़० फुगाँ] आर्तनाद। दुहाई। उ०—(क) जबाँ भी खैच लेना तुम, अगर मुँह से फुगाँ निकले।—श्यामा० (भू०), पृ० १४। (ख) तड़पते हैं फुगाँ करते हैं और करवट बदलते हैं।—भारतेंदु० ग्रं०, भा० २, पृ० ८४८।

फुचड़ा
संज्ञा पुं० [देश० या अ० फुज्लह्(= बचा हुआ, फालतू)] कपड़े, दरी, कालीन, चठाई आदि बुनी हुई वस्तुओं में बाहर निकला हुआ सूत या रेशा। जैसे,—थान में जो जगह जगह फुच़डे़ निकले हैं उन्हें कैची से काट दो। क्रि० प्र०—निकलना।

फुजला
संज्ञा पुं० [अ० फाजिल का बहु० फुज्लह्] १. अतिरिक्त या शेष भाग। फालतू अंश। २. सीठी। ३. मैल।

फुजूल
वि० [अ० फुजूल] दे० 'फजूल'। यौ०—फुजूलखर्च = अपव्ययी। फुजूलखर्ची = अपव्यय।

फुट (१)
वि० [सं० स्फुट] १. जिसका जोड़ा न हो। अयुग्म। समूह या अवयवी से फूडा। अलग जा पड़ा हुआ। एकाकी। अकेला। २. जो लगाव में न हो। जो किसी सिलसिले में न हो। जिसका संबंध किसी क्रम या परंपरा। से न हो। पृथक् अलग। यौ०—फुटमत।

फुट (२)
संज्ञा पुं० [अं० फुट] आयत विस्तार का एक अंग्रेजी मान। लंबाई, चौड़ाई मापने की एक माप जो १२ इच या ३६ जो के बराबर होती है।

फुट (३)
संज्ञा पुं० [सं०] साँप का फन [को०]।

फुटकर (१)
वि० [सं० स्फुट + कर = (प्रत्य०)] १. अयुग्म। विषम। फुट। जिसका जोड़ा न हो। एकाकी। अकैला। २. अलग। पृथक्। जो लगाव में न हो। जिसका कोई सिलसिला न हो। जैसे, फुठकर कविता। ३. भिन्न भिन्न। कई प्रकार का। कई मेल का। ४. खंड खंड। थो़डा़ थोड़ा। इकट्ठा नहीं। थोक का उलटा। जैसे,—(क) वह फुठकर सौदा नहीं बेचता। (ख) चीज इकट्ठा लिया करो फुटकर लैने में ठीक नहीं पड़ता।

फुटकर (२)
संज्ञा पुं० खुदरा। रेजगारी।

फुटकल
वि० [हिं०] दे० 'फुठकर'।

फुटका (१)
संज्ञा पुं० [सं० स्फोटक] १. फफोला। छाला। आबला। क्रि० प्र०—पड़ना। २. धान, मक्के, ज्वार आदि का लावा।

फुटका (२)
संज्ञा पुं० [देश०] वह कडा़ह जिसमें गन्ने का रस पकता है।

फुटकी
संज्ञा स्त्री० [सं० पुटक] १. किसी वस्तु के छोटे लच्छे, या जमे हुए कण जो पानी, दूध आदि में अलग अलग दिखाहै पड़ते हैं। बहुत छोटी छोटी अंठी। जैसे,—(क) दूध फल गया है, नसमें फुटाकियाँ सी दिखाई पड़ती हैं। (ख) घुले हुए बेसन की फुटकियाँ। २. खून, पीब आदि का छींटा जो किसी वस्तु (जैसे मल, थूक आदि) में दिखाई। ३. एक प्रकार की छोटी चिड़िया। फुदकी

फुटना † (१)
वि० [हिं०] जो फूट जाय। भग्न होनेवाला। फूटा हुआ भग्न।

फुटना पु (२)
क्रि० अ० दे 'फूटना'—१। उ०—यह तन काचा कुंभ है लिये फिरै था साथ। ठपका लागा फुटि गाया कछू न आया हाथ।—कबीर (शब्द०)।

फुटनोट
संज्ञा स्त्री० [अं० फुटनोट] वह टिप्पणी जो किसी लेख वा पुस्तक के पुष्ठ में नीचे की ओर दी जाती है। पादटिप्पणी।

फुटपाथ
संज्ञा पुं० [अं० फुटपाय] १. शहरों में सड़क की पडरी पर का वह मार्ग जिसपर मनुष्य पैदल चलते हैं। २. पगड़ंडी।

फुटबाल
संज्ञा पुं० [अं०] १. चमड़े का बना हुआ बड़ा गेंद जिसके अंदर रबर की थैली में हवा भरी जाती है और जिसे पैर की ठोकर से उछालकर खेलते हैं।

फुटमत †
संज्ञा पुं० [हिं० फूट + सं० मत] मतभेद। विरोध।

फुटानी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० फुट + आनी (प्रत्य०) या देश०] चुभने या लगनेवाली बात। व्यंग्यात्मक बढ़ी चढ़ी या बेलगाम बात। उ०—बीच में फुटानी छाँठकर सब गड़बड़ा दिया।—मैला०, पृ० २९३।

फुटेरा †
वि० [हिं० फूटना + ऐरा (प्रत्य०)] अभागा। फूटे भाग्य का। फुट्टैल। उ०—स्वारथ सब इंद्रिय समूह पर बिरहा धीर धरत। सूरदास घर घर की फुटेरी कैसे धीर धरत।— सूर (शब्द०)।

फुटेहरा
संज्ञा पुं० [हिं० फूटना + हरा (= फल)] १. मटर या चने का दाना जो भूनने से ऐसा खिल गया हो कि छिलका फट गया हो। २. चनेका भुना हुआ चर्बन।

फुटैल
वि० [हिं० फुट + ऐल (प्रत्य०)] दे० 'फुट्टैल'।

फुट्ट
वि० [हि०] दे० 'फुट'।

फुट्टक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का वस्त्र [को०]।

फुट्टिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार का वुना हुआ वस्त्र [को०]।

फट्टैल (१)
वि० [सं० स्फुट, पा० फुट + ऐल (प्रत्य०)] १. झुंड या समूह से अलग। अकेला रहनेवाला। जिसका जोड़ा न हो। जो जोडे़ से अलग हो। (विशेषतः जानवरों के लिये)।

फुट्टैल (२)
वि० [हिं० फूटना] फूटे भाग्य का। अभागा।

फुड़िया
संज्ञा स्त्री० [हिं० फोड़ा का अल्पा०] छोटा फोड़ा या फुंसी। उ०—जस बालक फुड़िया दुख माई। माता चहै नीक होइ जाई।—घट०, पृ० २४०।

फुतकार पु
संज्ञा पुं० [सं० फुस्कार] दे० 'फूत्कार'। उ०—जिन फन फुतकार उड़त पहार भारे।— भूषण ग्रं०, पृ० ९७।

फुतूर
संज्ञा पुं० [अ० कुतूर] दे० 'फतूर'।

फुतूरिया, फुतूरी
वि० [हिं०] दे० 'फतूरिया'।

फुत्कर
संज्ञा पुं० [सं०] अग्नि [को०]।

फुत्कार
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'फूत्कार' [को०]।

फुत्कृत (१)
वि० [सं०] १. फूँका हुआ। २. चिल्लाया हुआ [को०]।

फुत्कृत (२)
संज्ञा पुं० १. फूँकने से बजनेवाले बाजे की ध्वनि। २. चीत्कार। ३. दे० 'फूत्कृति' [को०]।

फुत्कृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'फूत्कृति' [को०]।

फुदंग
संज्ञा पुं० [देश०] नेपाल के लिंबू जाति में प्रचलित एक वैवाहिक प्रथा। विशेष—जहाँ वर वधू में कोई पूर्व परिचय नही होता वहाँ वर अपने किसी निकट संबंधी द्वारा वधू के पिता पास एक मारा हुआ सूअर भेजता है। इस प्रथा को लिंबू लोग 'फुदंग'। कहते हैं।

फदकना
क्रि० अ० [अनु०] १. उछल उछलकर कूदना। उछलना। २. हर्ष से फूल जाना। उमंग में आना। फूले न समाना।

फुदकी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फुदकना] एक छोटी चिड़िया जो उछल उछल कर कूदती हुई चलती है।

फुनंग
संज्ञा स्त्री० [सं० पुलक] वृक्ष वा शाखा का अग्रभाग वा अंकुर। जैसे,—अगर कोई दररख्त की फुनंग पर जा चढे़ तो भी काल नहीं छोड़ता।

फुन
अव्य० [सं० पुनः] फिर। पुनः।

फुनकार †
संज्ञा पुं० [सं० फुत्कार] दे० 'फुंकार'।

फुनग
संज्ञा पुं० [सं० पन्नग प्रा० पराणग] शेषनाग। उ०— मोहे इंद्र फुनग फुनि मोहे, मुनि मोहे तेरी करत सेवा।— दादू०, बानी, पृ० ५०८।

फुनगी
संज्ञा स्त्री० [सं० पुलक या देश०] वृक्ष ओर वृक्ष की शाखाओं का अग्रभाग। फुनंग। अंकुर। उ०—वह अपनी ऊँची फुनगियों को वायु के झोंके से न हिलने दें और न पत्तों की खड़खड़ा- हट का शब्द होने दें।— भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० ६२५।

फुनना
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'फुँदना'।

फुनसली †
संज्ञा स्त्री० [हिं० फुस्सी] छोटी फुसी। उ०—सुंदर कबहूँ फुनग्रगी कबहूँ फोरा होइ। ऐसी याही देह मैं क्यों सुख पावै कोइ।—सुंदर ग्रं०, भा० २, पृ० ७२२।

फुनिंग पु
संज्ञा पुं० [सं० पन्नग] नाग। सर्प। उ०—ज्यु फुनिंग चंदनि रहै, परिमल रहै लुभाए रे। त्यूँ मन मेरा राम सों अबकी बेर अघाए रे।—दादू० बानी, पृ० ६८१।

फुनिंद पु
संज्ञा पुं० [सं० फणीन्द्र] दे० 'फणींद्र'। उ०—अग्गेव। मनी लभ्भी फुनिंद, अग्गेव सरद निसि उग्गि चंद।—पृ० रा०, १।६२२।

फुनि पु ‡
अव्य० [सं० पुन, हिं० फुन] दे० 'पुनि'। उ०—फुनि मालमीक रामावतार। शत कोटि ग्रंथ कथि तत्त सार।— पृ० रा०, १।२७।

फुप्फुकारक
वि० [सं०] हाँफनेवाला [को०]।

फुप्फुस
संज्ञा पुं० [सं०] फेफड़ा।

फुफँदी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फूल + फंद०] लहँगे के इजारबंद या स्त्रियों की धोती कसने की डोरी की गाँठ जो कमर पर सामने की ओर रहती है और जिसके खींचने से लहँगा या धोती खुल जाती है। नीवी। उ०—आँगी कसै उकसे कुच ऊँचे हँसे हुलसै फुफँदीन की फूँदै।—देव (शब्द०)।

फुफकाना
क्रि० अ० [अनु०] दे० 'फुफकारना'। उ०—कोप करि जौ लों एक फन फुफकावे काली, तौ लों बनमानी सोऊ फन पै फिरत है।—पद्माकर (शब्द०)।

फुफकार
संज्ञा पुं० [अनु०] फूक जो साँप मुँह से निकालता है। साँप के मुहँ से निकली हुई हवा का शब्द। फुँकार। फूत्कार।

फुफकारना
क्रि० अ० [हिं० फुफकार] साँप का मुँह से फूँक निकालना। मुहँ से हवा निकालकर शब्द करना। फूत्कार करना। जैसे, साँप का फुफकारना।

फुफाना पु †
क्रि० अ० [अनु०] फू फू करना। फुंकारना। फुफकारना। उ०—इक सत फननि फुफात सु तातौ। द्वै सत लोचन अनल चुचातौ।—नंद० ग्रं०, पृ० २८३।

फुफी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'फूफी'।

फुफुदी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'फुँफदी'। उ०—(क) लीन्हीं उसास मलीन भई दुति दीन्हीं फुँदी फुफुदी की छिपाई कै।— देव (शब्द०)। (ख) विवेक घँघरा तत्त सारी फुफुदी हैं विस्वासनं। साधु सेवा अंग अँगिया रहनी बाजू बंदनं।—पलटू० बानी, भा० ३, पृ० ६४।

फुफुनी †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'फुफंदी'।

फुफू पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'फूफी'।

फुफेरा
वि० [हिं० फूफा + एरा (प्रत्य०)] [वि० स्त्री० फुफेरी] फूफा से उत्पन्न। जैसे, फुफेरा भाई, फुफेरी बहन।

फुबती †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'फुफँदी'।

फुर † (१)
वि० [हिं० फुरना] सत्य। सच्वा। उ०—(क) वह सँदेस फुर मानि कै लीन्हो शीश चढ़ाय। संतो है संतोष सुख रहह तो ह्वदय जुड़ाय।—कबीर (शब्द०)। (ख) सुदिन सुमगल दायकु सोई। तोर कहा फुर जेहि दिन होई।— तुलसी (शब्द०)।

फुर (२)
संज्ञा स्त्री० [अनु०] उड़ने मे परों का शब्द। पंख फड़फड़ाने की आवाज। जैसे,—चिड़िया फुर से उड़ गई। विशेष—चट' 'पट' आदि अनु० शब्दों के समान यह भी से विभक्ति के साथ ही आता है।

फुरकत
संज्ञा स्त्री० [अं० फुरकत] बिछुड़ने का भाव। जुदाई। वियोग।

फुरकना (१)
क्रि० स० [अनु०] जुलाहों की बोली में किसी वस्तु को मुँह में चबाकर साँस के जोर से थूकना।

फुरकना पु (२)
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'फड़कना' (१)। उ०—दुतियं उपमा कविता सुर कै। मनो पूर नदी हय ज्यों फुरकै।—पृ० रा०, २४।१९२।

फुरकाना †
क्रि० स० [हिं०] दे० 'फड़काना' (१)।

फुरति पु, फुरती
संज्ञा स्त्री० [सं० स्फूर्त्ति (= फुरति)] शीघ्रता। तेजी। उ०—लख्यो बलराम यह सुभट बड़ है कोऊ हल मुसल शस्त्र अपनो सँभारयो। द्बिविद लै शाल को बृक्ष संमुख भयो फुरति करि राम तनु फँकि मारयो।—सूर (शब्द०)।

फुरतीला
वि० [हिं० फुरती + ईला (प्रत्य०)] [वि० स्त्री० फुरतीली] जिसमें फुरती हो। जो सुस्त न हो। जो काम में ढिलाई न करे। तेज।

फुरना
क्रि० अ० [सं० स्फुरण, प्रा० फुरण] १. स्फुटित होना। निकलना। उद्भूत होना। प्रकट होना उदय होना। उ०— (क) लोग जानै बौरी भयो गयो यह काशी पुरी फुरी मति अति आयो जहाँ हरि गाइए।—प्रिया० (शब्द०)। (ख) नील नलिन श्याम, शोभा अगनित काम, पावन ह्वदय जेहि उर फुरति।—तुलसी (शब्द०)। २. प्रकाशित होना। चमक उठना। झलक पड़ना। उ०—आधी रात बीती सब सोए जिय जान आन राक्षसी प्रभंजनी प्रभाव सो जनायो है। बीजरी सी फुरी भाँति बुरी हाथ छुरी लोह चुरी ड़ीठि जुरी देखि अंगद लजायो है।—हनुमान (शब्द०)। ३. फड़कना। फड़फडाना। हिलाना। उ०—(क) उग्यो न धनु जनु वीर विगत महि किधों कहु सुभट दूरे। रोषे लखन विकट भृकुठी करि भुज अरु अधर फुरे।—तुलसी (शब्द०)। (ख) अजहूँ अपराध न जानकी की भुज बाम फुरे मिलि लोचन सों। हनुमान (शब्द०)। ४. स्फुटित होना। उच्चरित होना। मुँह से शब्द निकलना। उ०—(क) सूर सोच सुख करि भरि लोचन अंतर प्रीति न थोरी। सिथिल गात मुख बचन फुराति नहिं ह जो गई मति भोरी।—सूर (शब्द०)। (ख) उठि के मिले तंदुल हरि लीन्हें मोहन बचन फुरे। सूरदास स्वामी की महिमा टारी नाहिं टरे।—सूर (शब्द०)। ५. पूरा उतरना। सत्य ठहरना। ठीक निकलना। जैसे सोचा समझा या कहा गया था वैसा ही होना। उ०—फुरी तुम्हारी बात कही जो मों सों रही कन्हाई।—सूर (शब्द०)। ६. प्रभाव उत्पन्न करना। असर करना। लगना। उ०—(क) फुरे न यंत्र मंत्र नहिं लागे चले गुणी गुण हारे। प्रेम प्रीति की व्यथा तप्त तनु सो मोहिं डारति मारे।—सूर (शब्द०)। (ख) यंत्र न फुरत मंत्र नहिं लागत प्रीति सिरा जाति।—सूर (शब्द०) ७. सफल होना। सोचा हुआ परिणाम उत्पन्न करना। उ०—फुरै न कछु उद्योग जहँ उपजै अति मन सोच।—पद्माकर (शब्द०)।

फुरफुर
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. उड़ने में परों की फरफराहट से उत्पन्न शब्द। डैनों का शब्द। २. पर आदि की रगड़ से उत्पन्न शब्द।

फुरफुराना (१)
क्रि० अ० [अनु० फुरफुर] १. फुरफुर करना। उड़कर परों का शब्द करना। जैसे, चिड़ियों या फतिंगों का फुरफुराना। २. किसी हलकी छोटी वस्तु (जैसे, रोएँ, बाल आदि) का हवा में इधर उधर हिलना। हलकी वस्तु का लहराना।

फुरफुराना (२)
क्रि० स० १. पर या और कोई हलकी वस्तु हिलाना जिससे फुर फुर शब्द हो। जैसे, पर फुरफुराना। २. कान में रूई की फुरेरी फिराना। जैसे,—कान में खुजली है तो फुरेरी डालकर फुरफुराओ।

फुरफुराहट
संज्ञा स्त्री० [अनु०] फुरफुर शब्द होने का भाव। पंख फड़फड़ाने का भाव।

फुरफुरी
संज्ञा स्त्री० [अनु०] 'फुरफुर' शब्द होने का भाव। पंख फड़फड़ाने का भाव। उ०—राजा के जी में घमंड़ की चिड़िया ने फिर फुरफुरी ली।—शिवप्रसाद (शब्द०)। मुहा०—फुरफुरी लेना = उड़ने के लिये पंखहिलाना।

फुरमान
संज्ञा पुं० [फा़० फरमान] १. राजाज्ञा। अनुशासनपत्र। २. मानपत्र। सनद। ३. आज्ञा आदेश। उ०— मंगल उत्पति आदि का सुनियो संत सुजान। कहे कबीर गुरु जाग्रत समरथ का फुरमान।—कबीर (शब्द०)।

फुरमाना †
क्रि० स० [फा़० फरमान] कहना। आज्ञा देना। दे० 'फरमाना'। उ०—तब नहि होते गाय कसाई। कहु बिसमिल्लह किन फुरमाई।—कबीर (शब्द०)।

फुरसत
संज्ञा स्त्री० [अ० फुरसत] १. अवसर। समय। २. पास में कोई काम न होने की स्थिति। किसी कार्य में न लगे रहने की अवस्था। काम से निबटने या खाली होने की हालत। अवकाश। निवृत्ति। छुट्टी। जैसे,—इस वक्त फुरसत नहीं है, दूसरे वक्त आना। क्रि० प्र०—देना।—पाना।—मिलना।—होना। मुहा०—फुरसत पाना = नौकरी से छूटना। बरखास्त होना। (लश०)। फुरसत से = खाली वक्त में। धीरे धीरे। बिना उतावली के। जैसे,—यह काम दे जाओं, मैं फुरसत से करूँगा। ३. बीमारी से छुटकारा। रोग से मुक्ति। आराम।

फुरहरना ‡
क्रि० अ० [सं० प्रस्फुरण] १. स्फुरित होना। निक- लना। प्रादुर्भूत होना। उ०—छप्पन कोटि बसंदर बरा। सवा लाख पर्वत फुरहरा।—जायसी (शब्द०)। २. दे० 'फरहरना'।

फुरहरी
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. पर को फुलाकर फड़फड़ाना। उ०—सबै उड़ान फुरहरी खाई। जो आ पंख पाँख तन लाई।—जायसी (शब्द०)। क्रि० प्र०—लाना।—लेना।२. फड़फड़ाहट। फड़कने का भाव फड़कना। उ०—फरकि फरकि बाम बाहु फुरहरी लेत खरकि, खरकि खुलै मैन सर खोजहै।—देव (शब्द०)। क्रि० प्र०—खाना।—लेना। ३. कपड़े आदि के हवा में हिलने की क्रिया या शब्द। फरफरा- हट। ४. कँपकँपी। फुरेरी। कंप और रोमांच। दे० 'फुरेरी'। उ०—नहिं अन्हाय नहिं जाय घर चित चिहुटयो तकि तीर। परमि फुरहरी लै फिरति बिहँसति घँसति न नीर।—बिहारी (शब्द०)। मुहा०—फुरहरी लेना = (१) काँपना। थरथराना। (२) फड़- फड़ाना। फड़कना। (३) होशियार होना। ५. दे० 'फुरेरी'।

फुरहरू पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'फुरहरी'—४। उ०—सरित तीर मीताहि निरखि हरपि हरषि हँसि देत। नीर तरफ तकि तकि रहत, फेर फुरहरू लेत।—स० सप्तक, पृ० ३७६।

फुराना (१)
क्रि० स० [हिं० फुर से नाम०] १. सच्चा ठहराना। ठीक उतारना। २. प्रमाणित करना।

फुराना (२)
क्रि० अ० दे० 'फुरना'।

फोरुहुरा †
संज्ञा पुं० [हिं०] फरहरा। झंडा। उ०— विचिञांबरक फुरुहुरा कइसन देषुजनि कांचन गिरिकाँ शृंग मयर नचइतें अछ।—वर्ण०, पृ० ७।

फुरेरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फुरफुराना] १. सींक जिसके सिरे पर हलकी रुई लपेटी हो और जो तेल, इत्र दवा आदि में डु़बोकर काम मे लाई जाय। २. सरदी, भय आदि के कारण थरथराहट होना और रोंगटे खड़े होना। रोमांचयुक्त कंप। उ०—रह रहकर शरीर पर फुरेऱी दीड़ जाती थी।—फूली०, पृ० १९। मुहा०—फुरेरी आना = झुझुरी होना। सरदी, ड़र आदि के कारण कँपकँपी होना। फुरेरी लेना = (१) सरदी, भय आदि के कारण काँपना। कँपकँपी के साथ रोंगटे खड़े करना। थरथराना। (२) फड़फड़ाना। फड़काना। हिलना। (३) होशियार होना। चौंकना। एकबारगी सँभल जाना।

फुर्ती
संज्ञा स्त्री० [सं० स्फूर्ति] दे० 'फुरती'।

फुर्माना †
क्रि० स० [हिं० फरमाना, फुरमाना] दे० 'फरमाना'। उ०—उन्दाता जी ! य़ा बात आपका फर्माबा लायक नहीं है।—श्रीनिवास ग्रं०, पृ० १९।

फुर्सत
संज्ञा स्त्री० [अ० फुरसत] दे० 'फुरसत'।

फुलंगो ‡
संज्ञा स्त्री० [हिं० फुल ? या देश०] पहाडी़ में होनेवाली जंगली भाँग का वह पौधा जिसमें बीज बिलकुल नहीं लगते। कलंगो का उलटा।

फुलंदर पु †
संज्ञा पुं० [हिं० फूल + इंदर या नर (प्रत्य०)] पुष्पों में इंद्र—कमल। उ०—मनसा फूल फुलंदर लागी। बाड़ी इस विधि सींचो माली।—रामानंद०, पृ० १४।

फुलका
संज्ञा पुं० [हिं० फूलना] १. फफोला। छाला। उ०— तब तिय कर फुलका करि आयो। कछु दिन में ताते सुत जायो।—रघुराज (शब्द०)। २. [स्त्री फुलकी] हलकी और पतली रोटीयाँ। चपाती। ३. एक छोटा कड़ाह जो चीनी के कारखाने में काम आता है।

फुलकारी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फूल + कारी (प्रत्य०)] १. एक प्रकार का कपड़ा जिसमें मामूली मलमल आदि पर रंगीन रेशम से बूटियाँ आदि काढ़ी हुई होती हैं। उ०—मरना तो था ही, दस रोज पहले ही मरती। नसीबन सुहागन तो मरती। अर्थी पर फुलकारी पड़ जाती।—अभिशप्त, पृ० १०१। २. कसीदाकारी। गुलकारी।

फुलचुही
संज्ञा स्त्री० [हिं० फुल + चूसना] नीलापन लिए काले रंग की एक चमकती चिड़िया जो फूलों पर उड़ती फिरती है। इसकी चोंच पतली और कुछ लबी होती है जिससे वह फूली का रस चूसती है। फुलसुंघी। उ०—रायमुनी तुम औरत- मुही। अलिमुख लागि भई फुलचुही।—जायसी (शब्द०)।

फुलझड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फूल + झड़ना] १. एक प्रकार की आतशबाजी जिससे फूल की सी चिनगारियाँ निकलती हैं। उ०—हँसी तेरी पियारे फुलझड़ी है। यहीं गुंचा के दिल में गुलझड़ी है।—कविता कौ०, भा० ४, पृ० २०। क्रि० प्र०—छोड़ना। २. कही हुई ऐसी बात जिसमें कुछ आदमियों में झगड़ा, विवाद या और कोई उपद्रव हो जाय। आग लगानेवाली बात। क्रि० प्र०—छूटना।—छोड़ना।

फुलझरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'फुलझ़ड़ी'। उ०—बिहँसी शशि तरई जनु फरी। कैधौं रैन छुटें फुलझरी।—जायसी (शब्द०)।

फुलडास पु
संज्ञा पुं० [हिं० फूल + डास] फूल का बिछौना। उ०—भा निरमर सब धरनि अकासू। सेज सँवारि कीन्ह फुलडासू।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० ३५०।

फुलनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फूलना] एक बारहमासी घास जो प्रायः ऊसर भूमि में होती है।

फुलफुल, फुलफुला
वि० [हिं० फूलना] फूला हुआ जैसा।

फुलवारी पु ‡
संज्ञा स्त्री० [हिं० फूल + बारी < सं० वाटिका, वाटी] दे० 'फुलवारी'। उ०—मोहित होत मनुज मन लखि लीला फुलवारी।—प्रेमघन०, भा० १, पृ० ३३४।

फुलरा †
संज्ञा पुं० [हिं० फूल + रा (प्रत्य०)] फुँदना।

फुलरी
सं० स्ञी० [हिं० फूल + री (प्रत्य०)] फूल। बेलबूटे। उ०— जैसे बुनत महीर मै, फुलरी परती जाहिं। ऐसे सुंदर ब्रह्म से जगत भिन्न कछु नाहिं।—सुंदर० ग्रं०, भा० २. पृ० ८०४।

फुलवना पु †
क्रि० स० [हिं० फूलना का सक० रूप] दे० 'फुलाना'। उ०—बलुआ के घरुआ मैं बसते, फुलवत देह अयाने।— कबीर ग्रं०, पृ० २७६।

फुलवर
संज्ञा पुं० [हिं० फूल + वार] एक कपड़ा जिसपर रेशम केबेल बूटे बुने या कढ़े होते हैं। उ०—स्त्रीजन पहनीं छीटे, फुलवर साटन।—ग्राम्या, पृ० ३९।

फुलवाई पु
संज्ञा स्त्री० [सं० पुष्पवाटी] दे० 'फुलवाड़ी'। उ०—(क) एक सखी सिय संग बिहाई। गई रही देखन फुलवाई।— तुलसी। (शब्द०)। (ख) एक दिन शुक्रसुता मन आई। देखों जाय फूल फूलवाई।—सूर (शब्द०)।

फुलवा घास
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का तृण। दे० 'फुलनी'।

फुलवाड़ी
संज्ञा स्त्री० [सं० पुष्पवाटी] दे० 'फुलवारी'। उ०—इस फुलवाड़ी के दक्खिन और क्या आलाप सा सुनाई देता है।— शकुंतला, पृ० १३।

फुलवार पु †
वि० [सं० फुल्ल] प्रफुल्ल। प्रसन्न। उ०—जानहुँ जरन आगि जस परा। होइ फुलवार रहस हिय भरा।— जायसी (शब्द०)।

फुलवारा † (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० पुष्य या फुल्ल, हिं० फूल + सं० वाटी, हिं० वारी] १. पुष्पवाटिका। उद्यान। बगीचा। उ०— (क) आपुहि मूल फूल फुलवारी। आपुहि चुनि खाई। कहैं कबीर तेई जन उबरे जेहि गुरु लियो जगाई।—कबीर (शब्द०)। (ख) पुनि फुलवारि लागि चहुँ पासा। वृक्ष बोधि चंदन भइ बासा।—जायसी (शब्द०)। २. कागज के बने हुए फूल और वृक्षादि जो ठाट पर लगाकर विवाह में बरात के साथ निकाले जाते हैं।

फुलवारी (२)
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकारा का घोड़ा। उ०—हरे हरदिया इस खिंग गर्रा फुलवारी।—सूजान०, पृ० ८।

फुलसरा
संज्ञा पुं० [हिं० फूल + सार] काले रंग की एक चिड़िया जिसके सिर पर सफेदे छीटे होते हैं।

फुलसुंघी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फुल + सूँघना] एक चिड़िया। फुलचुही।

फुलसुँघी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फूल + सूँघना] दे० 'फुलसुघी'।

फुलहारा पु
संज्ञा पुं० [हिं० फूल + हारा] [स्त्री० फुलहारी] माली। उ०—लैक फूल बैठे फुलहारी। पान अपूरब धरे सँवारी।—जायसी (शब्द०)।

फुलांग
संज्ञा पुं० [हिं० फूल + अंग] एक प्रकार की भाँग।

फुलाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० फूलना] १. दे० 'सरफुलाई'। २. खुखंडी ३. एक प्रकार का बबूल। फुलाह। विशेष—यह पंजाब में सिंधु और सतलज नदियों के बीच की पहाड़ियों पर होता है। इसके पेड़ बहुत ऊँचे नहीं होते ओर विशेषकर खेतों की बाड़ों पर लगाए जाते है। इसकी लकड़ी मजबूत और ठोस होती है तथा कोल्हू की जाठ ओर गाड़ीयों के पहिए आदि बनाने के काम में आती है। इससे एक प्रकार का गोंद निकलता है जो औषध में काम आता है और अमृत- सर का गोंद कहलाता है।

फुलाना (१)
क्रि० स० [हिं० फूलना] १. किसी वस्तु के विस्तार या फैलाव को उसके भीतर वायु आदि का दबाव पहुँचाकर बढ़ाना। भीतर के दबाव से बाहर की ओर फैलाना। उ०— हरखित खगपति पंख फुलाए।—तुलसी (शब्द०)। मुहा०—मुँह फुलाना वा गाल पुलाना = मान करना। रिसाना। ऱुठना। २. किसी को पुलकित वा आनंदित कर देना। किसी में इतना आनंद उत्पन्न करना कि वह आपे के बाहर हो जाय। उ०— तुलसी भनित भली भमिन उर सों पहिराइ फुलावों।— तुलसी (शब्द०)। ३. किसी में गर्व उत्पन्न करना। गर्वित करना। घमंड़ बढ़ाना। जैसे,—तुम्हीं ने तो तारीफ कर करके उसे और फुला दिया है। ४. कूसुमित करना। फूलों से युक्त करना। उ०—चावर ह्वै गेहूँ रहे कबों उरद ह्वै आय। कबहूँ मुदगर चिबुक तिल सरसों देत फुलाय।—मुबारक (शब्द०)।

फुलाना (२)
क्रि० अ० दे० 'फूलाना'।

फुलाना पु (३)
वि० [हिं० फुलना] फूला हुआ। उ०—गगन मँदिल में फूल फूलाना उहाँ भँवर रस पीवैँ।—कबीर श०, भा० ३, पृ० २३।

फुलायल पु
संज्ञा पुं० [हिं० फूल] दे० 'फुलेल'। उ०—(क) मुहमद बाजी पेम कै ज्यौं भावै त्यौं खेल। तिल फूलहिं के संग ज्यों होइ फुलायल तेल।—जायसी (शब्द०)। (ख) छोरहु जटा, फुलायल लेहू। झारहु केस, मुकुट सिर देहू।— जायसी (शब्द०)।

फुलाव
संज्ञा पुं० [हिं० फूलना] फूलने की क्रिया या भाव। फूलने की अवस्था। उभार या सूजन।

फुलावट
संज्ञा स्त्री० [हिं० फूलना] फूलने की क्रिया या भाव। उभार या सूजन।

फुलावा
संज्ञा पुं० [हिं० फूल] स्त्रियों के सिर के बालों को गूँथने की ड़ोरी जिसमें फूल फुँदने लगे रहते हैं। खजुरा।

फुलिग पु
संज्ञा पुं० [सं० स्फुलिङ्ग, प्रा० फुलिंग] चिनगारी। उ०— जीन्ह लगै अब पावक पुंज ओ कुज के फूल फुलिंग ज्यों लागे।—(शब्द०)।

फुलिया
संज्ञा स्त्री० [हिं० फूल] १. किसी कील या छड़ के आकार की वस्तु का फूल की तरह उभरा और फैला हुआ गोल सिरा। २, कील या काँटा जिसका सिरा फूल की तरह फैला हुआ, गोल और मोटा हो। ३. एक प्रकार की लौंग (गहना) जो कान में पहनी जाती है।

फुलिसकेप
संज्ञा पुं० [अं० फूल्स + कैप] एक प्रकार का लिखने या छापने का कागज। विशेष—पहले इसके तख्ते में मनुष्य के सिर का चित्र बना रहना था जिसपर नोकदार टोपी थी। इसी कारण इसे 'फूल्स कैप' कहने लगे जिसका अर्थ बेवकूफ की टोपी होता है। अव इस कागज में अनेक चिह्न बनाए जाते हैं। इस कागज की माप १३ १/२ x १७ इंच होती हैं।

फुलुरिया
संज्ञा स्त्री० [देश०] कपड़े का एक टुक़ड़ा जो छोटे बच्चों के चूतड़ के नीचे इसलिये बिछाया वा रखा जाता है कि उनका मल दूसरी जगह न लगे। गँड़तरा।

फुलेरा
संज्ञा पुं० [हिं० फूल ऐरा + (प्रत्य०)] फूल की बनी हुई छतरी जो देवताओं के ऊपर लगाईजाती है।

फुलेल
संज्ञा पुं० [हिं० फूल + तेल] १. फूलों की महक से बासा हुआ तेल जो सिर में लगाने के काम में आता है। सुगंधयुक्त तैल। उ०—(क) उर धारी लठै छूटी आनन पै, भीजी फुलेलन सों, आली हरि संग केलि।—सूर (शब्द०)। (ख) रे गंधी, मतिमंद तू अतर दिखावत काहि। करि फुलेल को आचमन मीठो कहत सराहि।—बिहारी (शब्द०)। विशेष—फुलेल बनाने के लिये तिल को धोकर छिलका अलग कर देते हैं। ताजे फूलों की कलियाँ चुनकर बिछा दी जाती हैं और उनके ऊपर तिल छितरा दिए जाते हैं। तिलों के ऊपर फिर फूलों की कलियाँ बिछाई जाती हैं। कलियों के खिलने पर फूलों की महक तिलों में आ जाती है। इस प्रकार कई बार तिलों को फूलों की तह पर फैलाते है। तिल फूलों में जितना ही अधिक बासा जाता है उतनी ही अधिक सुगंध उसके तेल में होती है। इस प्रकार बासे हुए तिलों को पेलकर कई प्रकार के तेल तैयार होते है, जैसे, चमेली का तेल, बेले का तेल। गुलाब के तेल को गुलरोगन कहते हैं। २. एक पेड़ जो हिमालय पर कुमाऊँ से दारजिलिंग तक होता है। विशेष—इसके फल की गिरी खाई जाती है और उससे तेल भी निकलता है जो साबुन और मोमबत्ती बनाने के काम में आता है। इसकी लकड़ी हलके भूरे रंग की हीती है जिसकी मेज, कुरसी आदि बनती है।

फुलेली
संज्ञा स्त्री० [हिं० फुलेल] काँच आदि का वह बड़ा बरतन जिसमें फुलेल रखा जाता है।

फुलेहरा †
संज्ञा पुं० [हिं० फुल + हार] सून, रेशम आदि के बने हुए झब्बेदार बंदनवार जो उत्सवों में द्बार पर लगाए जाते हैं। उ०—प्रदीप पाँति भावती सुमंगलानि गावती। सुदाम दाम पावती फुलेहरानि लावती।—रघुराज (शब्द०)।

फुलौरा
संज्ञा पुं० [हिं० फुल + बरा] बड़ी फुलौरी। पकौड़ा।

फुलौरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फूल + बरी] चने या मटर आदि के बेसन की बरी। बेसन की पकौड़ी। उ०—पापर, बरी, फुलौरि, मिथौरी। कूरबरी, कचरी, पीठौरी।—सूर (शब्द०)। विशेष—बेसन को पानो में खूब फेटकर उसे खौलते हुए घी या तेल में थोड़ा थोड़ा करके ड़ालते हैं जिसमें वह फूल और पक्कर गोल गोल बरी बन जाती है।

फुल्ल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] फूल।

फुल्ल (२)
वि० १. फूला हुआ। विकसित। उ०—शिशिर के धुले फुल्ल मुख को उठाकर वे तकते रह जाते हैं।—अनामिका, पृ० १०३। २. प्रसन्न। प्रमुदित। यौ०—फुल्लतुवरी। फुल्लदाम। फुल्लनयन, फुल्लनेत्र = जिसकी आँखें प्रसन्नता से विकसित हों। फुल्ललोचन = (१) एक प्रकार का मृग। (२) दे० 'फुल्लनयन'। फुल्लवदन = प्रसन्नमुख।

फुल्लतुवरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्फाटिका। फिटकिरी [को०]।

फुल्लदाम
संज्ञा पुं० [सं० फुल्लदामन्] उन्नीस वर्ण की एक वृत्ति जिसके प्रत्येक चरण में ६, ७, ८, ९, १०, ११ और १७वाँ वर्ण लघु होता है।

फुल्लन
संज्ञा पुं० [सं०] वायु से फुलाने का कार्य या स्थिति [को०]।

फुल्लना पु
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'फूलना'। उ०—रस रंग सरोज सु फुल्लि रहै। रासो, पृ० २१।

फुल्लफाल
संज्ञा पुं० [सं०] पछोरने के समय सूप या छाज से उत्पन्न वायु [को०]।

फुल्लरीक
संज्ञा पुं० [सं०] जिला। शहर। भूमिभाग। २. साँप। सर्प [को०]।

फुल्ला †
संज्ञा पुं० [हिं० फूलना] १. मक्के या चावल आदि की भुनी हुई खीला। लावा। २. दे० 'फूली'।

फुल्लि
संज्ञा स्त्री० [सं०] फूलना। खिलना [को०]।

फल्लित
वि० [सं० प्रफुल्लित] प्रफुल्लित। प्रसन्न। उ०—सहजो गुरु किरपा करी कहा कहूँ मैं खोल। रोम रोम फुल्लित भई मुखै न आवै बोल।—सहजो० बानी, पृ० ११।

फुल्ली
संज्ञा स्त्री० [हिं० फूल] १. फुलिया। २. फूल के आकार का कोई आभूषण या उसका कोई भाग।

फुवारा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'फुहारा'।

फुस
संज्ञा स्त्री० [अनु०] वह शब्द जो मुँह से साफ फूटकर न निकले। बहुत धीमी आवाज। यौ०—फुस फुस = (१)फेफड़ा। फुप्फुस। (२) साफ साफ न सुनाई पड़नेवाली धीमी आवाज। मुहा०—फुस फुस करना = बहुत मंद स्वर में बात करना। फुसफुसाना। उ०—मृतक के कान में भी थीड़ी देर फुस फुस करें, तो वह भी उठकर नाचने लगे।—प्रेमघन०, भा०, २, पृ० ८०। फुस से = बहुत धीरे से। अत्यंत मंद स्वर से। जैसे,—जो बात होती है वह उसके पास जाकर फुस से कह आता है।

फुसकारना पु †
क्रि० अ० [अनु०] फूँक मारना। फूत्कार छोड़ना। उ०—ऐसो फैल परत फुसकारत मही में मानों तारन को वृंद फूतकारत गिरत है।—पद्माकर (शब्द०)।

फुसकी †
संज्ञा स्त्री० [फुस से अनु०] अपना वायु। पाद। गोज।

फुसड़ा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'फुचड़ा'।

फुसफुसा
वि० [हिं० फूस, अनु० फुस] १. जो दबाने में बहुत जल्दी चूर चूर हो जाय। जो कड़ा या करारा न हो। नरम। ढीला। २. फुस से टूट जानेवाला। कमजोर। ३. जो तीक्ष्ण न हो। मंदा। मद्धिम। जैसे, फुसफुसा तंबाकू।

फुसफुसाना
क्रि० सं० [अनु०] फुस फुस करना। इतना धीरे कहना कि शब्द व्यक्त न हो। बहुत ही दबे हुए स्वर से बोलना या कुछ कहना।

फुसलाना
क्रि० स० [हिं० फिसलाना या देश०] १. बच्चों की शांतरखने के लिये किसी प्रकार उनका। ध्यान दूसरी ओर ले जाना। भुलाकर शांत और चुप रखना। बहलाना। जैसे,—बच्चों को फुसलाना सब नहीं जानते। २. अनुकूल करने के लिये मीठी मीठी बातें कहना। किसी बात के पक्ष में या किसी ओर प्रवृत्त करने के लिये इधर उधर की बातें करना। भुलावे की बातें करना। चकमा देना। झाँसा देना। बहकाना। उ०—बुद्धि की निकाई कछु जाति है न गाई लाल ऐसी फुसलाई है, मिलाई लाल उर सों।—रघुनाथ (शब्द०)। ३. मीठी मीठी बातें करके किसी और प्रवृत्त करना। भुलावा देकर अपने मतलब पर लाना। जैसे,—(क) वह हमारे नौकर को फुसला ले गया। (ख) दूसरे फरीक ने गावाहों को फुसला लिया। संयो० क्रि०—लेना। ४. मनाना। संतुष्ट करने के लिये प्रिय ओर विनीत वचन कहना। उ०—राजा ने उन ब्राह्मणों के पाँव पड़ पड़ अनेक भाँति फुसलाया समझाया, पर उन तामसी ब्राह्मणों ने राजा का कहना न माना।—लल्लू (शब्द०)।

फुहकार पु †
संज्ञा पुं० [अनुध्व० या सं० फूत्कार, हिं० फुफकार] उपेक्षा। फटकार। उ०—आन सुने फुहकार करत है झूठी बातन ज्ञाता।—सं० दरिया, पृ० १३८।

फुहर पु
वि० स्ञी० [हिं०] फूहड़। बेशऊर।

फुहरिया पु †
वि० स्त्री० [हिं० फुहड़, फूहर + इया (प्रत्य०)] फूहड़। बेशऊर। उ०—नैहर में कछु गुन नहिं सीख्यो ससुरे में भई फुहरिया हो। अपने मन की बड़ी कुलवंती छुए न पावै गगरिय़ा हो।—पलटु० बानी, भा० ३, पृ० ३८।

फुहस †
संज्ञा पुं० [अ० फह्श या फाहिश ? ] अश्लील या अशिष्ठ। उ०—सत्त सों एक अवलंब करु आपनो, तजो बकवाद बहु फुहस कहना।—भीखा० श०, पृ० ६४।

फुहार
संज्ञा पुं० [सं० फूत्कार (= फूँक से उठा हुआ पानी का छींटा या बुलबुला) या अनु० मू० देश०] १. पानी का महीन बारि फुहार भरे बदरा छींटा। जलकण। २. महीन। बूँदों की झड़ी। झींसी। उ०—सोइ सोहते। कुंजर से मतवारे।—श्रीधर (शब्द०)। क्रि० प्र०—पड़ना।

फुहारा
संज्ञा पुं० [हिं० फुहार] १. जल का महीन छींटा। २. जल की वह टोंटी जिसमें से दबाव के कारण जल की महीन धार या छींटे वेग से ऊपर की ओर उठकर गिरा करते हैं। जल के छींटे देनेवाला यंत्र। जलयंत्र। उ०—फहरै फुहारे, नीर नहरै नदी सी बहैं, छहरैं छबीली छाम छीटिन की छीटी है।—पद्माकर (शब्द०)।

फुहिया
संज्ञा स्त्री० [हिं० फुही] दे० 'फुही'।

फुही
संज्ञा स्त्री० [हिं० फुहार] १. पानी का महीन छींठा। सूक्ष्म जलकण। २. महीन महीन बूँदों की झड़ी। झींसी। उ०— (क) सूर बरसत सुदेश मानौ मेघ फुही। मुख मंडित रोरी रंग सेंदुर माँग छुही।—सूर (शब्द०)। (ख) फूलि भरे अँग पूरे पराग, परे रसरूप की चारु फुही सो।—(शब्द०)।

फूँक
संज्ञा स्त्री० [अनु० फू फू] १. मुँह को बटोरकर वेग के साथ छोड़ी हुई हवा। वह हवा जो ओंठों को चारों ओर से दबाकर झोंक से निकाली जाय। जैसे,—वह इतना दुबला पतला है कि फूँक ले उड़ सकता है। मुहा०—फूँक मारना = जोर से मुहँ की हवा छोड़ना। जैसे, आग दहकाने या दिया बुझाने के लिये। २. साँस। मुँह की हवा । उ०—कुँवर और उमराव बने बिगरे कछु नाहीं। फूँक माहिं वे बनत फूँक ही सों मिटि जाहीं।— श्रीधर (शब्द०)। मुहा०—फूँक निकल जाना = दम निकल जाना। प्राण निकल जाना। ३. मंत्र पढ़कर मुँह सें छोड़ी हुई वायु जो उस मनुष्य की ओर छोड़ी जाती है जिसपर मंत्र का प्रभाव डालना। होता है। उ०—परम परब पाय, हाय जमुना के नीर पूरि कै पराग अंगराग के अगर तें। द्बिजदेव की सों द्बिजराज अंजली के काज जौ लौं चहे पानिप उठाय कंज कर तें। तौ लौं वन जाय मनमोहन मिलापी कहूँ फूँक सी चलाई फूँकि बाँसुरी अधर तें। स्वासा काढ़ों नासा तें, वासा तें भुजाएँ काढी़ अंजली न अंजली तें, आखरी न गर तें।—द्बिजदेव (शब्द०)। यौ०—झाड़फूँक = मंत्र यंत्र का उपचार। क्रि० प्र०—चलाना।—मारना। ४. गाँजा, तंबाकू आदि का कश।

फूँकना
क्रि० स० [हिं० फूँक] १. मुहँ को बटोरकर वेग के साथ हवा छोड़ना। ओठों को चारों ओर से दबाकर झोंक से हवा निकलना। जैसै,—(क) यह बाजा फूँकने से बजता है। (ख) फूँक दो तो कोयला दहक जाय। (ग) उसे फूँक दो तो उड़ जाय। उ०—पुनि पुनि मोहिं दिखाई कुठारू। चहत उड़ावन फूँकि पहारू।—तुलसी (शब्द०)। विशेष—जिसपर वायु छोड़ी जाती है वह इस क्रिया का कर्म होता है, जैसे,—गर्द फूँक दो, उड़ जाय। संयो० क्रि०—देना। मुहा०—फूँक फूँककर पैंर रखना या चलना = (१) बचा बचाकर चलना। पैर रखने के पहले जगह को फूँक लेना जिसमें चींटी आदि जीव हट जायँ पैर के नीचे दबकर न मरने पाएँ। (२) बहुत बचाकर कोई काम करना। बहुत साव- धानी से कोई काम करना। कोई बात फूँकना = कान में धीरे से कोई बात कहना। बहकाना। कान भरना। २. मंत्र आदि पढ़कर किसी पर फूँक मारना। यौ०—झाड़ना फूँकना। ३. शंख, बाँसुरी आदि मुँह से बजाए जानेवाले बाजों को फूँककरबजाना। जैसे, शंख फूँकना। ४. मुँह की हवा छोड़कर दहकाना। फूँककर प्रज्वलित करना। जैसे, आग फूँकना। ५. जलाना। भस्म करना। उ०—या पयाल को फूँकिए तनियक लाई आग। लहना पाया ढूँढ़ता धन्य हमारा भाग।—कबीर (शब्द०)। संयो० क्रि०—डालना।—देना। उ०—ताको जननी की गति दीनी परम कृपाल गोपाल। दोन्हों फूँकि काठ तन वाको मिलि कै सकल गुवाल।—सूर (शब्द०)। ६. धातुओं को रसायन की रीति से जड़ी बूटियों की सहायता से भस्म करना। जैसे, सोना फूँकना, पारा फूँकना। ७. नष्ट करना। बरबाद करना। व्यर्थ व्यय कर देना। फजूल खर्च कर देना। उड़ाना। जैसे, धन फूँकना, रुपए पैसे फूँकना। संयो० क्रि०—डालना।—देना। यौ०—फूँकना तापना = व्यर्थ खर्च कर देना। उड़ाना। ८. जलाना। सताना। दुःख देना। ९. चारों ओर फैला देना। प्रकाशित कर देना। जैसे, खबर फूँक देना।

फूँका
संज्ञा पुं० [हिं० फूँक] १. भाथी वा नली से आग पर फूँक मारना। फूँक मारने की क्रिया। २. बाँस की नली में जलन पैदा करनेवाली ओषधियाँ भरकर और उन्हें स्तन में लगाकर फूँकना जिससे गाएँ स्तन मे दूध चुरा न सकें और उनका सारादूध बाहर निकल आए। क्रि० प्र०—देना।—मारना। ३. बाँस आदि की नली जिससे फूँका मारा जाता है। ४. फोड़ा। फफोला।

फूँकारना †
क्रि० अ० [हिं० फुंकार से नाम०] दे० 'फुँकारना'। उ०—काले नाग फन फँलाएफूँकारते। प्रेमघन०, मा० २, पृ० १३।

फूँद
संज्ञा स्त्री० [हिं० फूल + फद] फूँदना। फुलरा। झब्बा। उ०—आँगी कसै, उकसै कुच ऊँचे हँसे हुलसै फुफुंदीन की फूँदै।—देव (शब्द०)।

फूँदा पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] १. दे० 'फुँदना'। उ०—(क) रत्न जटित गजरा बाजूबँद शोभा भुजन अपार। फूँदा सुमग फूल फूले मनी मदन विटप की डार।—सूर (शब्द०)। (ख) मोहन मोहनी अंग सिंगारत। बेनी ललित ललित कर गूँथन निरखत सुंदर। माँग सँवारत सीसफूल धरि पारि पोछंत फूँदन झवा निहारत।—सूर (शब्द०)। यौ—फूँदफुँदारा = फूँदनेवाला। फुलरेवाला। उ०—हाथ हरी हरी छाजै छरी अरु जूती चढी़ पग फूँदफुँदौरी।—देव (शब्द०)। २. फुफूँदी। भुकड़ी।

फू
संज्ञा स्त्री० [अनु०] फूँकने की ध्वनि या आवाज।

फूआ
संज्ञा स्त्री० [सं० पितृष्वसा] पिता की बहिन। बूआ।

फूई
संज्ञा स्त्री० [हिं० फुही] १. घी का फूल या बुलबुलों का समूह जो तपाते समय ऊपर आ जाता है। २. फफूँदी। भुकड़ी।

फूट
संज्ञा स्त्री० [हिं० फूटना] १. फूटने की क्रिया या भाव। २. बैर। विरोध। बिगाड़। अनबन। उ—अँगरेजी में एक कहावत है कि फूट उपजाओं और शासन करो।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० २४४। क्रि० प्र०—कराना।—होना। यौ०—फूट फटक = अनबन। बिगाड़। मुहा०—फूट डालना = भेद डालना। भेदभाव या विरोध उत्पन्न करना। झगड़ा ड़ालना। उ०—नारद हैं ये बड़े सयाने घर घर डा़रत फूट।—सूर (शब्द०)। ३. एक प्रकार की बड़ी ककड़ी जो खेतों में होती है और पकने पर फट जाती है। मुहा०—फूट सा खिलना = पक्कर या खस्ता होकर दरकना।

फूटक
वि० [हिं० फूट + क (प्रत्य०) अथवा हिं० फुटकर] फुटकर। मृक्तक। उ०—अध्यात्म बत्तीसिका पयडी फाग धमाल। कीनी सिंधु चतुर्दशी फूटक कवित रसाल।—अर्ध० पृ० ५७।

फूटन
संज्ञा स्त्री० [हिं० फूटना] १. टूकड़ा जो फूटकर अलग हो गया हो। २. शरीर के जोड़ों में होनेवाली पीड़ा। जैसे, हड़फूटन।

फूटना
क्रि० अ० [सं० स्फुटन, प्रा० फुडन; या सं० स्फुट>हिं० फट + ना (प्रत्य०)] १. खरी या करारी वस्तुओं का दबाव या आघात पाकर टूटना। खरी वस्तुओं का खंड खंड होना। भग्न होना। करकना। दरकना। जैसे, घड़ा फूटना, चिमनी फूटना, रेवड़ी फूटना, बताशा फू़टना, पत्थर फूटना। संयो० क्रि०—जाना। मुहा०—उँगलियाँ फूटना = खींचने या मोड़ने से उँगलियोँ के जोड़ का खट् खट् बोलना। उँगलियाँ चठकाना। विशेष—इस क्रिया का प्रयोग खरी या करारी वस्तुओं के लिये होता है। चमड़े, लकड़ी आदि चीमड़ वस्तुओं के लिये नहीं होता। २. ऐसी वस्तुओं का फटना जिनके ऊपर छिलका या आवरण हो अथवा मुलायम या पतली चीज भरी हो। जैसे, कटहल फूटना, सिर फूटना, फोड़ा फूटना। ३. नष्ट होना। बिग- ड़ना। जैसे, आँख फू़टना, भाग्य फूटना। ४. भेदकर निकलना। भीतर से झोंक के साथ बाहर आना। जैसे सोता फूठना, धार फूटना। ५. शरीर पर दाने या धाव के रूप में प्रकट होना। फोड़े आदि की तरह निकलना जैसे, दाने फूटान, कोढ़ फूटना, गरमी फूटना। ६. कली का खिलना। प्रस्फुटित होना। ७. जुड़ी हुई वस्तु के रूप में निकलना। अवयव, जो़ड़ यां वृद्धि के रुप में प्रकट होना। अंकुर, शाखा आदि का निकलना। जैसे, कल्ला फूटना, शाखा फूटना। उ००—बिरवा एक सकल संसारा। पेड़ एक फूटी बहु डारा।—कबीर (शब्द०)। ८. अंकुरित होना।फटकर अँखुबा निकलना। जैसे, बीज फूटना। ९. शाखा के रूप में अलग होकर किसी सीध में जाना। जैसे,—थो़ड़ी दूर पर सड़क से एक और रास्ता फूटा है। १०. बिखरना। फैलना। व्याप्त होना। उ०—(क) दिसन दिसन सों किरनैं फटहिं। सब जग जानु फुलझरी छूटहिं।—जायसी (शब्द०)। (ख) रेंड़ा रूख भया मलयागिरि चहुँ दिसि फूटी बास।— कबीर (शब्द०)। ११. निकलकर पृथक् होना। संग या समूह से अलग होना। साथ छोड़ना। जैसे, गोल से फूटना। १२. पक्ष छोड़ना। दूसरे पक्ष में हो जाना। जैसे, गवाह फूटना। १३. अलग अलग होना। विलग होना। संयुक्त न रहना। मिलाप की दशा में न रहना। जैसे, जोड़ा फूटना, संग फूटना। उ०—(क) जिनके पद केशव पानि हिए सुख मानि सबै दुख दूर किए। तिनको सँग फूटत ही फिट रे फटि कोटिक टूक भयो न हिए।—केशव (शब्द०)। (ख) तू जुग फूटै न मेरी भटू यह काहू कह्यो सखिया सखियान तें। कंज से पानि से पाँसे परे अंसुआ गिरे खजन सी अँखियान। तें।—नृपशंभु (शब्द०)। १४. शब्द का मुँह से निकलना। जैसे, मुँह से बात फूटना। मुहा०—फूट फूटकर रोना = बिलख बिलखकर रोना। बहुत विलाप करना। फूट पड़ना = रो पड़ना। १५. बोलना। मुँह से शब्द निकलना। जैसे, कछु तो फूटी। (स्त्रि०)। १३. व्यक्त होना। प्रकट होना। प्रकाशित होना। उ०—अंग अंग छबि फूटि कढ़ति सब निरखत पुर नर नारी।—सूर (शब्द०)। १७. पानी का इतना खौल जाना कि उसमें छोटे छोटे बुलबुलों के समूह दिखाई देने लगें। पानी का खदखदाने लगाना। १८. किसी भेद का खूल जाना। जैसे—कहीं बात फूट गई तो बड़ी मुश्किल होगी। उ०— संतन संग बैठि बैठि लोकलाज खोई। अब तो बात फूटि गई जानत सब कोई।—मीरा (शब्द०)। १९. रोक या परदे का दबाव के कारण हट जाना। बाँध, मेड़ आदि का टूट जाना। जैसे, बाँध फूटना। २०. पानी या और किसी पतली चीज का रसकर इस पार से उस पार निकल जाना। जैसे, यह कागज अच्छा नहीं है, इसपर स्याही फूटती है। २१. जोड़ों में दर्द होना।

फूटरा †
संज्ञा पुं० [देश०] कटाक्ष। इशारेबाजी। आँख मारना। उ०—फरगठ मारे फू़टरा, कर सूँ सरगट काढ़। सठ दाखै भालो सरस, गिनका बाली गाढ़।—बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० २।

फूटा (१)
वि० [हिं० फूटना] [वि० स्त्री० फूटी] भग्न। टूटा हुआ। फूटा हुआ। जैसे, फूठी कौड़ी। फूटी आँख। उ०—कबिरा राम रिझइ ले मुख अमरित गुन गाइ। फूटा नग ज्यों जोरि मन संधिहि संधि मिलाइ।—कबीर (शब्द०)। मुहा०—फूटी आँख का तारा = कई बेटों में बचा हुआ एक बेटा। बहुत प्यारा लड़का। फूटी आँखों न भाना = तनिक भी न सुहाना। वहुत बुरा लगना। अत्यंत अप्रिय लगना। जैसे,—अपनी चाल से वह फूटी आँखों नहीं भाता। (स्त्रि०)। फूटी आँखों न देख सकना = बुरा मानना। जलना। कुढ़ना। जैसे,— वह मेरे लड़के को फूटी आँखों नहीं देख सकती। (स्त्रि०)। पास में फूटी कौड़ी न होना = पास में कुछ भी न होना। अकिंचन होना। फूटे मूँह से न बोलना = दो बात भी न करना। अत्यंत उपेक्षा करना।

फूटा (२)
संज्ञा पुं० १. वह बालें जो टूटकर खेतों में गिर पड़ती हैं। २. जोडों का दर्द।

फूतकार पु
संज्ञा पुं० [सं० फूत्कार] दे० 'फूत्कार'। उ०— जैसे प्रलै काल मैं फनी के फनामडल ते, फैले फूतकारनि फुलिंगै सरसत है।—हम्मीर०, पृ० ३१।

फूत्कार
संज्ञा पुं० [सं०] १. मुह से हवा छोड़ने का शब्द। फूँक। फूफकार। जैसे, सर्प का फूत्कार। २. साँप की फूँक या फुफकार (को०)। ३. चीख। चीत्कार (को०)। ४. सिसकना। सिसकी भरना (को०)।

फूत्कृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'फुत्कार' [को०]।

फूफा
संज्ञा पुं० [हिं० फूफी] फूफी का पति। बाप का बहनोई।

फूफी
संज्ञा स्त्री० [अनु० अथवा सं० पितृस्वसा० पा०, पितुच्छा प्रा० पिउच्चा, पिउच्छा; बंग० पिसी वा देशी] बाप की बहन। बुआ।

फूफू
संज्ञा स्त्री० [हि०] दे० 'फुफी'।

फूर
वि० [हि० फुरना] सत्य। सच। उ०—(क) कह गुलाल सो दिखे हजुर। को मानै यह बचन फूर।— गुलाल० बानी, पृ० ९१। (ख) चारि अवस्था सपने कहई। झूठी फूरी मानत रहई।— कबीर वी० (शिशु), पृ० १०८।

फूरना पु
क्रि० अ० [हिं०] फूलमा। स्फुरित होना। उ०— धावन प्रबल दल धुजत धरनि, फन, फुंकरत फुरत फनीस लरजत है।— हम्मीर, पृ० २५।

फूल (१)
संज्ञा पुं० [सं०फुल्ल] १. गर्भाधानवाले पौधों में वह ग्रंथि जिसमें फल उत्पन्न करने की शक्ति होती है और जिसे उदिभदों की जननेद्रिय कह सकते हैं। पुष्प। कुसुम। सुमन। विशेष— बड़े फूलों के पाँच भाग होते है। —कटोरी, हरा पुट, दल (पंखड़ी) गर्भकेसर ओर परागकेसर। नाल का वह चौड़ा छोर, जिसपर फूल का सारा ढाँचा रहता है, कटोरी कहलाता है। इसी के चारों ओर जो हरी पत्तियों सी हीती हैं उनके पुट के भीतर कली की दशा में फूल बंद रहता है। ये आवरणपत्र भिन्न भिन्न पौधों में भिन्न भिन्न आकार प्रकार के होते है। घुंड़ी के आकार का जो मध्य भाग होता है उसके चारों ओर रंग विरंग के दल निकले होते हैं जिन्हें पंख़डी कहते है। फूलों की शोभा बहुत कुछ इन्ही रँगीली पंखड़ियों के कारण होती है। पर यह ध्यान रखना चाहिए कि फूल में प्रधान वस्तु बीच की घुंड़ी ही है। जिसपर पराग- केसर और गर्भकेसर होते है। क्षुद कोटि के पोधों में पुट, पंखड़ी आदि कुछ भी नहीं होती, केवल खुली घुंड़ी होती है।वनस्पति शास्त्र की द्दष्टि से तो घुंड़ी ही वास्तव में फूल है और बाकी तो उसकी रक्षा या शोभा के लिये है। दोनों प्रकार के केसर पतले सूत्र के आकार के होते हैं। परागकेसर के सिरे पर एक छोटी टिकिया सी हीती है जिसमें पराग या घुल रहती है। यह परागकेसर पुं० जननेंद्रिय है। गर्भकेसर बिलकुल बीच में होते है जिनका निचला भाग या आधार कोश के आकार का होता है। जिसकै भीतर गर्भांड़ बंद रहते हैं और ऊपर का छोर या मुँह कुछ चौढ़ा सा होता है। जब परागकेसर का पराग झड़कर गर्भकेसर के इस मुँह पर पड़ता है तब भीतर ही भीतर गर्भ कोश में जाकर गर्भाड़ को गर्भित करता है, जिससे धीरे धीरे वह बीज के रूप में परिणत होता है और फल की उत्पत्ति होती है। गर्भाधान के विचार से पौधे कई प्रकार के होते है—एक तो वे जिनमें एक ही पेड़ में स्त्री०फूल और पुं० फूल अलग अलग होते हैं। जैसे, कुम्हड़ा, कदुदु, तुरई ,ककड़ी इत्यादि। इनमें कुछ फुलों में केवल गर्भकेसर होते हैं और कुछ फूलों में केवल परागकेसर। ऐसे पौधों में गर्भकोश के बीच पराग या तो हवा से उड़कर पहुँचता है या कीड़ों द्बारा पहुँचाया जाता है। मक्के के पौधे में पु० फूल ऊपर टहनी के सिरे पर मंजरी के रूप में लगते है और जीरे कहलाते है और स्त्री० फूल पौधे के बीचोबीच इधर उधर लगते हैं और पुष्ट होकर बाल के रूप में होते हैं। ऐसे पौधे भी होती है जिनमें नर और मादा अलग अलग होते हैं। नर पौधे में पराग केसरवाली फूल लगते हैं और मादा पोधे में गर्भकेसरवाले। बहुत से पोधों में गर्भकेसर और परागकेसर एक ही फूल में होते हैं। किसी एक सामान्य जाति के अंतर्गत संकरजाति के पौधे भी उत्पन्न हो सकते हैं। जैसे किसी एक प्रकार के नीबु का पराग दुसरे प्रकार के नीबू के गर्भकोश में जा पड़े तो उससे एक दोगला नीबू उत्पन्न हो सकता है। पर ऐसा एक ही जाति कै पौधों के बीच हो सकता है। फूल अनैक आकार प्रकार के होते है। कुछ फूल बहुत सूक्ष्म होते हैं और गुच्छों में लगते हैं। जैसे, आम के नीम के तुलसी के। ऐसे फूलों को मंजरी कहते हैं। फुलों का उपयोग बहुत प्राचीन काल से सजावट और सुंगध के लिये होता आया है। अबतक संसार में बहुत सा सुगंध द्रब्य (तेल, इत्र आदि) फुलों ही से तैयार होता है। सुकुमारता, कोमलता और सौंदर्य के लिये फूल सब देश के कवियों में प्रसिदध रहा है। मुहा०— फूला आना = फूल लगाना। फूल उतारना = फूल तोड़ना। फूल चुनना = फूल तोड़कर इकटठा करना। फूस झड़ना = मुँह से प्रिय ओर मधुर बातें निकलना। उ०— झरत फूल मुँह ते वहि केरी। —जायसी (शब्द०)। क्या फूल झड़ जायँगें ?= क्या ऐसा सुकुमार है कि अमुक काम करने के योग्य नहीं हैं ? फूल लोढ़ना = फूल चुनना। फुल सा = अत्य़ंत सुकुमार, हलका या सुंदर। फूल सूँधकर रहना = बहुत कम खाना। जैसे,— वह खाती नहीं तो क्या फूल सुँधकर रहती है ? (स्त्री० व्यंग्य में)। फूलों का गहना =(१) फूलों की माला, हार आदि सिंगार या सजावट का सामान। (२) ऐसी नाजुक और कमजोर चीज जो थोड़ी देर की शीभा के लिये हो। फूलों की छड़ी =वह छड़ी जिसमें फूलों की माला लपेड़ी रहती है और जिससे चोथी खेलते है। फूलों की सेब = वह पलंग या शय्या जिसपर सजावठ और कोमलता के लिये फूलों की पँखड़ियाँ बिछी हों। आनंद की सेज। (श्रुंगार की एक सामग्री)। पान फूल सा =अत्यंत सुकुमार सा। २. फुल के आकार के बेल बूटे या नक्काशी। उ०— मनि फूल रचित मखतूल की झूलन जाके तूल न कोउ। —गोपाल (शब्द०)। ३. फूल के आकार का गहना जिसे स्त्रियाँ कई अंगों में पहनती है। जैसे, करनफूल, नकफूल, सीसफूल। उ०— (क) कानन कनक फूल छबि देहीं।— तुलसी (शब्द०)। (ख) पुनि नासिक भल फूल अमोला। —जायसी (शब्द०)। (ग) पायल औ पगपान सुनूपूर। चुटकी फूल अनौठ सुभूपुर।— सूदन (शब्द०)। ४. चिराग की जलती बत्ती पर पड़े हुए गोल दमकते दाने जो उभरे हुए मालूम होते हैं। गुल। मुहा०— फूल पड़ना = बत्ति में गोल दाने दिखाई पड़ना। फूल करना = बुझना (चिराग का)। ५. आग की चिनगारी। स्फुलिंग। क्रि० प्र०— पड़ना। ६. पीतल आदि की गोल गाँठ या घुंड़ी जिसे शोभा के लिये छड़ी, किवा़ड़ के जोड़ आदि पर जड़ते हैं। फुलिया। ७. सफेद या लाल धब्वा जो कुष्ठ रोग के कारण शरीर पर जगह जगह पड़ जाता है। सफेद दाग। श्वेत कुष्ठ। क्रि० प्र०— पड़ना। ८. सत्त। सार। जैसे, अजवायन का फूल। क्रि० प्र०— निकालना।—उतारना। ९. वह मद्य जो पहली बार का उतरा हो। कड़ी देशी शराब। उ०— थोड़ो ही सी चाखिया भाँड़ा पीया धोय। फूल पियाला। जिन पिया रहे कलालाँ सोय। —कबीर (शब्द०)। विशेष—यह शराब बहुत साफ होती है और जलाने से जल उठती है। इसी की फिर खींचकर दोआतशा बनाते है। १०. आटे चीनी आदि का उत्तम भेद। ११. स्त्रियों का वह रक्त जो मासिक धर्म में निकलता है। रज। पूष्प। क्रि० प्र०— आना। १२. गर्भाशय।१३. धुटने या पैर की गोल हड्डी। चक्की। टिकिया। १४. वह हड्डी जो शव जलाने के पोछे बच रहती। है और जिसे हिदु किसी तीर्थस्थान या गंगा में छोड़ने के लिये ले जाते हैं। क्रि० प्र०— चुनना। १५. सूखे हुए साग या भाँग की पत्तियाँ (बोलचाल)। जैसे,— मेथी के दो फुल दे देना। १३. किसी पतली या द्रव पदार्थ को सुखाकर जमाया हुआ पत्तर वा वरक। जैसे, स्याही के फूल। १७. मथानी के आगे का हिस्सा जो फूल जो फुल के आकारका होता है। १८. एक मिश्र या मिलाजुली धातु जो तांबे और राँगे के मेल से बनती है। विशेष— यह धातु उजली औ स्वच्छ चाँदी के रंग की हीती है और इसमें रखने से दही या और खट्टी चाजें नहीं बिगड़ती। अच्छा फूल 'बेधा' कहलाता है। साधारण फूल में चार भाग ताँबा ओर एक भाग राँगा होता है पर बेधा फूल में १०० भाग ताँबा और २७ भाग राँग होता है और कुछ चाँदी भी पड़ती है। यह धातु बहुत खरी होती है और आघात लगने पर चट टुट जाती है। इसके लोटे, कटोरे, गिलास, आबखोरे आदि बनते हैं। फूल काँसे से बहुत मिलता जुलता है पर काँसे से इसमें यह भेद है काँसे में ताँबे के साथ जस्ते का मेल रहता है और उसमें खट्टी चीजें बिगड़ जाती है।

फुल (२)
संज्ञा स्त्री० [हि० फूलना] १. फूलने की क्रिया या भाव। प्रफुल्ल होने का भाव। उत्साह। उमंग। उ०— (क) फूलि फूलि तरु फूल बढ़ावत। मोहत महा मोद उपजावत।— केशव (शब्द०)। (ख) फरक्यो चंपतराय को दच्छिन भुज अनुकूल। बड़ी फौज उमड़ी सुनि भई जुद्ध की फूल। —लाल (शब्द०)। २. आनंद। प्रसन्नता। उ०—(क) करिए अरज. कबूल। जो चित्त चाहत फूल।— सूदन (शब्द०)। (ख) फूल श्याम के उर लगे फूल श्याम उर आय। —रहीम (शब्द०)।

फूलकारी
संज्ञा स्त्री० [हि० फुल + फा़० कारी] बेल बूटे बनाने का काम।

फुलगोभी
संज्ञा स्त्री० [हि० फूल + गोभी] गोभी की एक जाति जिसमें मंजरियों का बँधा हुआ ठोस पिंड़ होता है जो तरकारी के काम में आता है। विशेष— इसके बीज असाढ़ से कुआर तक बोए जाते है। इसके बीज की पहले पनीरी तैयार करते है। फिर पोधों को उखाड़ उखाड़कर क्यारियों में लगाते है। कहीं कहीं पौधे कई बार एक स्थान से उखाड़कर दूसरे स्थान में लगाए जाते हैं। दो ढ़ाई महीने पीछे फुलों की घुंड़ियाँ दिखाई देती है। उस समय कीड़ों सें बचाने के लिय़े पौधौ पर राख छितराई जाती है। कलियों के फूटकर अलग होने के पहले ही पीछे काट लिए जाते है।

फुलझरी पु
संज्ञा स्त्री० [हि०] दे० 'फुलझड़ी'।

फुलडोल
संज्ञा पुं० [फुल + ड़ोल] एक उत्सव जो चैत्र शुक्ल एकादशी के दिन मनाया जाता है। विशेष— इस दिन भगवान् कुष्णचंद्र के लिये फूलों का ड़ोल वा झुला सजाया जाता है। मथुरा और उसके आसपास के स्थानों में यह उत्सव मनाया जाता है।

फूलढ़ोंक
संज्ञा पुं० [देश०] एक जाति की मछली जो भारत के सभी प्रातों में पाई जाती है और हाथ भर तक लंबी होती है।

फुलदान
संज्ञा पुं० [हि० फुल + फा़० दान (प्रत्य०)] १. पीतल आदि का बना हुआ बरतन जिसमें फल सजाकर देवाताओं के सामने रखा जाता है। २. गुलदस्ता रखेने का काँच, पीतल, चीनी मिट्टी आदि का गिलास के आकार का बरतन।

फूलदार
वि० [हिं० फूल + फ़ा० दार (प्रत्य०)] जिसपर फूल पत्ते और वेल बूटे काढ़कर, बुनकर, छापकर वा खोदकर बनाए गए हों। २. फूल रखनेवाला। फूलोंवाला।

फूलना
क्रि० अ० [हि० फूल + ना (प्रत्य०)] १. फूलों से युक्त होना। पुष्पित होना। फूल लाना। जैसे— यह पोधा वसंत में फूलेगा। उ०— (क) फूलै फरै न बेत जदपि सुधा बरसहि जलद।—तुलसी (शब्द०)। (ख) तरूवर फूलै फलै परिहरै अपनी कालहि पाई।— सूर (शब्द०)। संयो० क्रि०— जाना।—उठना।—आना। मुहा०— फूलना फरना = धन धान्य, संतति आदि से पूर्ण और प्रसन्न रहना। सूखी और संपन्न होना। बढ़ना और आनंद में रहना। उन्नति करना। उ०— फूलौ फरौ रहौ जहँ चाही यहै असीस हमारी।—सूर (शब्द०)।फूलना फलना = (१) प्रफूल्ल होना। उल्लास में रहना। प्रसन्नःहोना। (२) दे० 'फूलना फरना'। फूली फाली = प्रफूल्लित प्रसन्न वदन। उ०— फूली फाली फूल सी फिरती विमल विकास। भोर तरैयाँ होयँगी चलत तोहि पिय पास।—बिहारी (शब्ट०)। २. फूल का संपुट खुलना जिससे उसकी पंखड़ियाँ फैल जायँ। विकसित होना। खिलना। उ०— (क) फूलै कुमुद केति उजि- यारे।— जायसी (शब्द०)। (ख) फूलि उठे कमल से अमल हितु के नैन, कहै रघुनाथ भरे चैन रस सियरे। —रघुनाथ (शब्द०)। ३. भीतर किसी वस्तु के भर जायँ या अधिक होने के कारण अधिक फैल या बढ़ जाना। ड़ीप डीप या पिंड का पसरना। जैसे, हवा भरने से गेंद फूलना, गाल फूलना, भिगोया हुआ चना फूलना, पानी पड़ने से मिट्टी फूलना, कड़ाह में कचौरी फूलना। ४. सतह का उभरना। आसपास की सतह से उठा हुआ होना। ५. सूजना। शरीर के किसी भाग का आसपास की सतह से उभरा हुआ होता। जैसे— जहाँ चोट लगी वहाँ फूला हुआ है और दर्द भी है। संयो० क्रि०— आना। ६. मोटा होना। स्थूल होना। जैसे,— उसका बदन बादी से फूला है। ७. गर्व करना। घंमड़ करना। इतरना। जैसे,— जरा तु्म्हारी तारीफ कर दी बस तुम फूच गए। उ०— कबहुँक बैठयो रहसि रहसि के ढ़ोटा गोद खेलायो। कबहुँक फूलि सभा में बैठयो मुछनि ताव दिखायो।— सूर (शब्द०)। (ख) वेठि जाइ सिहासन फुली। अति अभियान त्रास सब भूली।—तुलसी (शब्द०)। मुहा०— फूले फिरना = गर्व करते हुए घुमना। घमंड़ में रहना। उ०— मनवा तो फूला फिरै कहै जो करता धर्म। कोटिकरम सिर पर चढ़ै चेति न देखे मर्म।— कबीर (शब्द०)। फूलकर कुप्पा होना =(१) अत्यधिक आनंद, गर्व या हर्ष युक्त होना। (२) अत्यंत स्थुल होना। ८. प्रफुल्ल होना। आनंदित होना। उल्लास में होना। बहुत खुश होना। मगन होना। उ०—(क) परमानंद प्रेम सुख फूले। बीथिन फिरै मगन मन भूले।—तुलसी (शब्द०)। (ख) अति फूले दशरथ मन ही मन कौशल्या सुख पायो। सौमित्रा कैकयि मन आनँद यह सब ही सुत जायी।— सूर (शब्द०)। मुहा०— फूला फिरना या फूला फूला फिरना = प्रसन्न घुमना। आनद में रहना। उ०—(क) फूली फिरति रोहिणी मैया नखसिख किए सिंगर। —सूर (शब्द०)। (ख) फूले फिरत अयोध्यावासी गनत न त्यागत पीर। परिरंमन हँसि देत परस्पर आनंद नैनन नीर।—सूर (शब्द०)। (ग) फूले फले फिरत है आज हमारे व्याह।—(प्रचलित)। फूले अँग अँग वपु न समान = आनंद का इतना अधिक उद्बैग होना कि बिना प्रकट किए रहा न जाय। अत्यंत आनंदित होना। उ०—(क) उठा फूलि अँग नाहि समाना। कंथा टूक टूक भहराना। —जायसी (शब्द०)। अति आनंद कोलाहल घर घर फूले अँग न समात।— सूर (शब्द०)। (ग) चेरी चंदन हाथ कै रीझि चढा़यो गात। विहवल छिति धर डिंभ शिशु फूले वपु न समात।— केशव (शब्द०)। फूले फरकना पु = प्रफुल्ल होकर घुमना। फुले फरकत लै फरी पर कटाच्छ करवार। करत, वचावत पिय नयन पायक घाय हजार।— बिहारी (शब्द०)। फूले न समाना = दे० 'फुले अंग न समाना'। उ०— आधुनिक मत की प्रसंसा में फूले महीं समाने। प्रेअवस०, भा० २, पृ० २०८। ६. मुँह फुलाना। कठना। मान करना। जैसे,— वह तो वहाँ फुलकर बैठा है।

फुलनि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० फूलना] फूलने की क्रिया या भाव। विकास। प्रस्फुटन। उ०— इत यह ललित अतमि को फूलनि फुलि फुलि जमुना जब झुलनि।— नंद० ग्रं० पृ० ३१९।

फुलपान
वि० [हि० फूल + पान] (फूल या पान के अभाव) बहुत ही कोमल। बासुक (लाश०)

फुलविरंज
संज्ञा पुं० [हिं० फूल + विरंज] एक प्रकार का धान जिसका चावल अच्छा होता है। विशेष—यह आदों उसरते कुआर के आरंभ में पककर काटने योग्य हो जाता है।

फुलभाँग
संज्ञा स्त्री० [हि० फूल + भाँग] हिमालय में होनेवाली एक प्रकार की भाँव का वर पेड़ जिसकी टहनियों से रेशे विकालै जाते है।

फुलमंड़नी पु
संज्ञा स्त्री० [हि० फुल + सं० मराड़न + हि० ई (प्रत्य०)] पुष्पोस्तव। वह केलि जिसमें अब कुछ पुष्पमय होता है। उ०— नंदनँदन नृयमानु नंदिनी बैठे फूलमंड़नी राजै।— छीत०, पृ० २७।

फुलमती
संज्ञा स्त्री० [हिं० फुल + मत (प्रत्य०)] एक देवी का नाम। विशेष— शीतला रोग के एक भेद की यह अधिष्ठात्री देवी मानी जाती है। इसकी उपासना नीच जाति के लोग करते हैं। यह राजा वेणु की कन्या कही जाती है।

फुलवारा
संज्ञा पुं० [देश०] चिउली नाम का पेड़।

फूलवाला
संज्ञा पुं० [हिं० फूल + वाला] [स्त्री० फूलवाली] माली।

फूलसँपेल
वि० [हिं० फूल+साँप] (बैल या गाय) जिसका एक सींग दाहिनी ओर दूसरा बाई ओर को गया हो

फूलसुँघनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फुल + सुँघनी] दे० 'फुलसुँघी'। उ०— सुनाती है बोली नहीं फुलसुँघनी।— हरी घास०, पृ० ३९।

फुलसुँघी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फुल+सुँघी] दे० 'फुलसुँघी'। उ०— उहुँ, यह फुलसुँघी है, पींजरे में जी नहीं सकती।— आकाश०, पृ० ११७।

फूला
संज्ञा पुं० [हिं० फूलना] १. खीला। लावा। २. वह कड़ाह जिसमें गन्ने का रस पकाया या उबाला जाता है। ३. एक रोग जो प्रायः पक्षियों को होता है। (इससे पक्षी फूल जाता है और उसके मुँह में काँटे निकल आते है जिससे वह मर जाता है।)। ४. आँख का एक रोग जिसमे काली पुतली पर सफेद दाग या छींटा सा पड़ जाता है । फूली।

फूली
संज्ञा स्त्री० [हिं० फूल] १. सफेद दाग जो आँख की पुतली पर पड़ जाता है। विशेष— इससे मनुष्य की आँख की द्दष्टि कुछ कम हो जाती है और यदि वह सारी पुतली मर पर या उसके तिल पर होता है तो द्दष्ठि विलकुल मारी जाती है। २. एक प्रकार की सज्जी। ३, एक प्रकार की रूई जो मथुरा के आसपास होती है।

फूवा † (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'फूफी'।

फूवा † (२)
संज्ञा पुं० तृण। फूस। तुष।

फूस
संज्ञा पुं० [सं० तुप, पा० भूस, फुस] १. सूखी हुई लंबी धास जो छप्पर आदि छाने के काम में आए। उ०—(क) कायर का घर फुस का भमकी चहुँ पछीत। शूरा के कछु ड़र नहीं गचगोरी की भीत। —कबीर (शब्द०)। (ख) कबीर प्रगटहि राम कहि छानै राम न गाय। फूस क जोड़ा दुर करु बहुरि न लागै लाय। —कबीर (शब्द०)। २. सूखा तृण । खर। तिनका। २. जीर्ण शीर्ण वस्तु।

फुसि पु
संज्ञा स्त्री० [अनुध्व०] झूठी बात। निराधार बात। उ०—अपथ सपथ कए कहकत फूसि, खन मोहें तखने रहत रुसि।— विद्यापति, पृ० १६९।

फूहड़
वि० [सं० पव (=गोबर) + घट(=गढ़ना)अथवा देश०] १. जिसकी चालढ़ाल बेढंगी हो। जिसका ढंग भद्दा हो। जो किसी कार्य को सुचारू रूप से न कर सके। जिसे कुछ करनेका ढंग न हो। बेशऊर। (इस शब्द का प्रयोग अधिकतर स्त्रियों के लिये होता है।) उ०— लूगरा गँधात रबड़ी चीकट सी गातमुख धोवै न अन्हात प्यारी फूहड़ बहार देति।—कविता कौ०, भा०, २, पृ० १०१। २. जो देखने में बेंढंगा लगे। भद्दा।

फूहड़पन
संज्ञा पुं० [हिं० फूहड़ + पन (प्रत्य०)] भददापन। गंदनी। बेढ़ंगापन।

फूहर †
वि० [हिं०] दे० 'फूहड़'। उ०— फूहर वही सराहिए परसत टपकै लार।— गिरधर (शब्द०)। (ख) जीभ का फूहरा, पंथ का चुहरा, तेज तमा घरै आप खौवै। —कबीर रे०, पृ० ३२।

फूहरी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० फूहर + ई (प्रत्य०)] फूहर का काम। फूहड़पन। उ०— पातरी फूहरी अधम का काम है; राँड का रोवना भाँड़ गावै। —कबीर रे०, पृ० ३२।

फूहा
संज्ञा पुं० [देश०] रूई का गाल।

फुही
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. पानी की महीन बूँद। २. महीन बूँदों की झड़ी। उ०—अंत न पार कल्पना तेरी ज्यों बरिखा ऋतू फुही। —सुंदर ग्रं०, भा०, २ पृ० ८४०।

फेंसी
वि० [अं० फेन्सी] दे० 'फैंसी'।

फेँक
संज्ञा स्त्री० [ हिं० फेंकना ] फेंकने की क्रिया या भाव।

फेँकना
क्रि० सं० [सं० प्रेषण, प्रा० पेखण अथवा सं० क्षेपण, (खेपन, फेंकना)] १. झोंके के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान पर ड़ालना। इस प्रकार गति देना कि दूर जा गिरे। अपने से दूर गिराना। जैसे, तीर फेँकना, ढ़ेला फेंकना, पत्थर फेंकना। उ०— बलराम जो ने उसकी दोनों पिछली टाँगें पकड़ फिरायकर ऊँचे पेड़ पर फेँका। —लल्लू (शब्द०)। मुहा०— घोड़ा फेँकना = घोड़ा दोड़ाना। २. कुश्ती आदि में पटकना। दूर चित गिराना। ३. एक स्थान से ले जाकर और स्थान पर ड़ालना। जैसे ,—(क) यहाँ बहुत सा कूड़ा पड़ा है, फेंक दो। (ख) जो सड़े आम हों उन्हें फेंक दो। संयो० क्रि०—देना। ४. असावधानी से इधर उधर छोड़ना या रखना। बेपरवाही से डाल देना। जैसे,— (क) किताबें इधर उधर फेंकी हुई हैं सजाकर रख दो। (ख) कपड़े यों ही फेंककर चले जाते हो, कोई उठा ले जायगा। ५. बेपरवाही से कोई काम दूसरे के ऊपर ड़ालना। खूद कुछ न करके दूसरे के सूपुर्द करना। अपना पीछा छुड़ाकर दूसरे पर भार ड़ाल देना। जैसे,— वह सब काम मेरे ऊपर फेंककर चला जाता है। ६. भूल से कहीं गिराना या छोड़ना। भूलकर पास से अलग कर देना। गाँवना। खोना। जैसे,— बच्चे के हाथ से अँगुठी ले ली, कहीं फेंक देगा। संयो० क्रि०— ड़ालना।—देना। ७. जुए आदि के खेल में कोड़ी, पाँसा गोटी आदि आदि का हाथ में लेकर इंसलिये जमीन पर ड़ालना कि उनकी स्थिति के अनुसार हार जीत का निर्णय हो। जैसे, पाँसा फेंकना, कोड़ी फेंकना। ८. तिरस्कार के साथ त्यागना। ग्रहण न करना। छोड़ना। पत्यिग करना। उ०—कंचन फेकि काँच कर राख्यो। अमरित छाँड़ी मुढ़ विष चाख्यो।—लल्लू (शब्द०) ९. अपव्यय करना। फजूल खर्च करना। जैसे— ऐसे काम मे क्यो व्यर्य रूपया फेंकते हो ?१० उछालना। ऊपर नीचे हिलाना ड़ुलाना। झटकना पटकना। जैसे, (क) बच्चे का हाथ पैर फेंकना। (ख) मिरगी में हाथ पैर फेंकना। ११. (पटा) चलाना। (पटा) लेकर घुमाना या हिलाना। डु़लाना।

फेँकरना पु †
क्रि० अ० [अनु० फेंकें + करना] १. गीदड़ का रोना या बोलना। उ०— कटु कुठायँ करटा रटहिं फेंकरहिं फेरू कुभाँति। नीच निसाचर मीचु बस अनी मोह मग माति।—तूलसी (शब्द०)। २.फूट फूटकर रोना। चिल्ला चिल्लाकर रोना।

फेँकाना (१)
क्रि० सं० [हिं० फेंकना, का प्रे० रूप] फेंकने का काम कराना।

फेँकाना (२)
क्रि० अ० फेंक दिया जाना। झटके से बिना किसी कारण के या अकस्मात् गिर पड़ना।

फेँकैत
संज्ञा पुं० [हिं० फिकैत] फेकैत। पटेबाज। उ०— रसिकों के हासविलास, गुंड़ो के रूप रंग और फेंकेतों के दावघात का मेरी द्दष्टि में रत्ती भर भी मुल्य नहीं।— मान०, भा०, ५. पृ० ७४।

फेँगा †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'फिंगा'।

फेँट (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० पेट या पेटी, अथवा देश०] १. कमर का घेरा। कटि का मड़ल। उ०— फेंट पीतपट साँवरे कर पलास के पात। हँसत परस्पर ग्वाल सब बिमल बिमल दधि खात।— सूर (शब्द०)। २.धोती का वह भाग जो कमर में लपेटकर वाँधा गया हो। कमर में बाँधा हुआ कोई कपड़ा। पटुका। कमरबंद। उ०—(क) खायबे को कछु भाभी दोनी श्रीपति मुख तें बोले। फेंट उपर ते अंजुलि तंदुल बल करि हरि जु खोले।— सूर (शब्द०)। (ख) लाल की फेंट सों लैकै गुलाल लपेटि गई अब लाल के गाल सों।— रघुनाथ (शब्द०)। मुहा०—फेंठ गहना, धरना या पकड़ना = जाने न देना। रोकना। इस प्रकार पकड़ना कि भागने न पाए। उ०— (क) श्याम सखा को गेंद चलाई। धाय गह्यो तब फेंट श्याम की देहु न मेरी गेंद मँगई।—सूर (शब्द०)। (ख) अब लौ तो तुम विरद बुलायो भई न मोसों भेंट। तजौ बिरद कै मोहि उबारौ सूर गही कसि फेंट। —सूर (शब्द०)। (ख) जो तू राम नाम चित धरती। सूरदास बैकुंठ पैठ में कोउ न फेंट पकरतो।— सूर (शब्द०)। फेंट कसना या बाँधना = कटिबद्ध होना। कमर कसकर तैयार होना। सन्नद्ध होना। उ०—(क) ढोल बजावती गावती गोत मचावती घुँघुर धूरि के धारन। फेंट फते कीकसे द्विजदेव जू चंचलता बस अंचल तारन। —द्विजदेव (शब्द०)। (ख) पाग पेंच खैच दै, लपेटि पट फेट बाँधि, ऐंड़े ऐंड़े आवैं पैने टूटे ड़ीम ड़ीम ते। —हनुमान (शब्द०)। ३। फेरा। लपेट। घुमाव।

फेँट (२)
संज्ञा स्त्री० [फेँटना] फेंटने की क्रिया या भाव।

फँटना
क्रि० स० [सं० पिष्ट, प्रा०, पिट्ठ + ना (प्रत्य०) या हि० फेंद से नामिक धातु] १. गाढे द्रव पदार्थ को उँगली घुमा घुमाकर हिलाना। लेप या लेई की तरह चीज को हाथ या उँगली से मथना। जैस, पीठी फेंटना, बेसन फेंटना, तेल फेंटना। संयो० क्रि०—देना।—लेना। २. उँगली से हिलाकर खूब मिलाना। जैसे,—इस बुकनी को शहद में फेटकर चाट जाओ। ३.गड़डी के तासों को उलट पलटकर अच्छी तरह मिलाना। जैसे,— ताश फेंटना।

फेँटा
संज्ञा पुं० [हिं० फेंट] १. कमर का घेरा। २. धोती का वह भाग जो कमर में लपेटकर बाँधा गया हो। ३. पटुका कमरबंद।उ०— अब मै नाच्यो बहुत गुपाल। माया को कठि फेंटा बाँध्यो लोभ तिलक दियो भाल।— सूर (शब्द०)। ४.वह वस्त्र जो सिर पर लपेटकर बाँधा जाता है। छोटी पगड़ी। ५. अटेरन पर लपेटा हुआ सूत। सूत की बड़ी अटो।

फेंटी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फेंट] सूत का गोला। अटेरन पर लपेटा हुआ सूत।

फेकरना (१)
क्रि० अ० [हिं० फेकारना] (सिर का) खुलना। (सिर का) आच्छादनरहित होना। नंगा होना। उ०— फेकरे मूँड़ चँवर जनु लाए। निकासि दाँत मुँह बाहर आए।— जायसी (शब्द०)।

फेकरना (२)
क्रि० अ० दे० 'फेकरना'।

फेकारना †
क्रि० सं० [सं० अप्रखर (=बिना झूल का?)] (सिर) खोलना या नंगा करना।

फेकैत
संज्ञा पुं० [हि० फेकना] लाठी से प्रहार करने में कुशल। पटेबाज। लाठी फेंकने में कुशल। — उ०—पक्का फैकैत है।— रंगभूमि, भा०, २, पृ० ५२४।

फेट
संज्ञा स्त्री० [हिं० फेटना] फेंटने की क्रिया या भाव। लपेट। चक्कर। उ०— उर अंधारी जहँ नराँ सतगुर कूँ नहिं भेट। आए थे हरि मिलन कूँ लगी ओर ही फेट। —राम,० धर्म, पृ० ७१।

फेड़ पु †
संज्ञा पुं० [हि० पोंड़, पेड] उ०— हीरा मध्य फेड़ बिस्तारा।—दरिया० बनी०, पृ० १६।

फेण
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'फेन'।

फेणक
संज्ञा पुं० [सं०] १. फेन। २. एक प्रकार की मिठाई जिसे फेनी, बतासफेनी भी कहते हैं [को०]।

फेत्कार
संज्ञा पुं० [हिं०] गीदड़ का 'हुआँ हुआ' करना। उ०— चौर क व्यापार शिवा क फेत्कार।—वर्ण०, पृ० १७।

फेदा ‡
संज्ञा पुं० [देश०] घुँइया। अरुई।

फेन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० फेनिल] १. महीन महीन बुलबुलों का वह गठा हुआ समूह जो पानी या और किसी द्रव पदार्थ के खूब हिलने, सडने या खौलने से ऊपर दिखाई पड़ता है। झाग। बुदबुदसंघात। यौ०—फेनदुग्धा।फेनधर्मा = क्षणभंगुर। फेनपिंड =(१) बुल- बुला। बुदबुद। (२) निरर्थक विचार। सारहीन बात। फेनवाही =(१) फेन की तरह शुभ्र वस्त्र। (२) छनना। छानने का कपड़ा। क्रि० प्र०—उठना।—निकलना। २. मुख से निकला हुआ झाग या फेन (को०)। ३. लार। लाला (को०)। ४. रेंट। नाक का मल।

फेनक
संज्ञा पुं० [सं०] १. फेन। झाग। २. टिकिया के आकार का एक पकवान या मिठाई। बतासफेनी। ३. शरीर धोने या मलने की एक क्रिया (संभवतः रीठी आदि के फेन से धोना जिस प्रकार आजकल साबुन मलते हैं)। ३. साबुन।

फेनका
संज्ञा स्त्री० [सं०] पानी में पका हुआ चावल का चूर। फेनी।

फेनदुग्धा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दूधफेनी नाम का पौधा जो दवा के काम में आता है। यह एक प्रकार की दुधिया घास है।

फेनना †
क्रि० स० [हिं० फेन] किसी तरल वस्तु को उँगली घुमाते हुए इस प्रकार हिलाना कि उसमें से झाग उठने लगे।

फेनप
संज्ञा पुं० [सं०] वे ऋषि जो वनों में स्वयं गिरे हुए फल या फेन आदि खाते थे [को०]।

फेनमेह
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का मेह। (इसमें वीर्य फेन की भाँति थोड़ा थोड़ा गिरता है। यह श्लेष्मज माना जाता है।)

फेनल
वि० [सं०] फेनयुक्त। फेनिल।

फेनाग्र
संज्ञा पुं० [सं०] बुदबुद। बुलबुला।

फेनाशनि
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्र।

फेनिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] फेनी नाम की मिठाई। फेनका।

फेनिल (१)
वि० [सं०] फेनयुक्त। जिसमें फेन हो। फेनवाला।

फेनिल (२)
संज्ञा पुं० रीठा। रीठी।

फेनी
संज्ञा स्त्री० [सं० फेनिका या फेणी] लपेटे हुए सूत के लच्छे के आकार की एक मिठाई। उ०—(क) फेनी पापर भूजे भए अनेक प्रकार। भइ जाउर भिजियाउर सीझी सब जेवनार।—जायसी (शब्द०)। (ख) घेवर फेनी और सहारी। खोवा सहित खाव बलिहारी।—सूर (शब्द०)। विशेष—ढीले गुँधे हुए मैदे को थाली में रखकर घी के साथ चारों ओर गोल बढा़ते हैं। फिर उसे कई बार उँगलियों पर लपेटकर बढा़ते हैं। इस प्रकार बढा़ते और लपेटते जाते हैं। अंत में घी में तलकर चाशनी में पागते या यों ही काम में लाते हैं। यह मिठाई दूध में भिगोकर खाई जाती है।

फेफड़ा
संज्ञा पुं० [सं० फुप्फुस + हि० ड़ा (प्रत्य०)] शरीर के भीतर थैली के आकार का वह अवयव जिसकी क्रिया से जीव साँस लेते हैं। वक्षआशय के भीतर श्वास प्रश्वास काविधान करनेवाला कोश। साँस की थैली जो छाती के निचे होती है। फुप्फुस। विशेष—वक्षआशय के भीतर वायुनाल में थोडी़ दूर नीचे जाकर इधर उधर दो कनखे फूटें रहते हैं जिनसे लगा हुआ मांस का एक एक लोथड़ा दोनों ओर रहता है। थैली के रूप के ये ही दोनों छिद्रमय लोथडे़ दाहिने ओर बाएँ फेफडे़ कहलाते हैं। दहिना फेफड़ा बाएँ फेफडे़ की अपेक्षा चौड़ा और भारी होता है। फेफडे़ का आकार बीच से कटी हुई नारंगी की फाँक का सा होता है जिसका नुकिला सिरा ऊपर की ओर होता है। फेफडे़ का निचला चौड़ा भाग उस परदे पर रखा होता है जो उदराशय को वक्षआशय से अलग करता है। दाहिने फेफडे़ में दो दरारें होती है जिनके कारण वह तीन भागों में विभक्त दिखाई पड़ता है पर बाएँ में एक ही दरार होती है जिससे वह दो ही भागों में बँटा दिखाई पड़ता है। फेफडे़ चिकने और चमकीले होते हैं और उनपर कुछ चित्तियाँ सी पडी़ होती है। प्रौढ मनुष्य के फेफडे़ का रंग कुछ नीलापन लिए भूरा होता है। गर्भस्थ शिशु के फेफडे़ का रंग गहरा लाल होता है जो जन्म के उपारंत गुलाबी रहता है। दोनों फेफड़ों का वजन सवा सेर के लगभग होता है। स्वस्थ मनुष्य के फेफडे़ वायु से भरे रहने के कारण जल से हलके होते हैं और पानी में नहीं डूबते। परंतु जिन्हें न्यूमोनिया, क्षय आदि बीमारियाँ होती है उनके फेफडे का रुग्ण भाग ठोस हो जाता है और पानी में डालने से डूब जाता है। गर्भ के भीतर बच्चा साँस नहीं लेता इससे उसका फेफड़ा पानी में डूब जायगा, पर जो बच्चा पैदा होकर कुछ भी जिया है उसका फेफड़ा पानी में नहीं डूबेगा। जीव साँस द्वारा जो हवा खींचते हैं वह श्वासनाल द्वारा फेफडे में पहुँचती हैं। इस टेंटुवे के निचे थोडी दूर जाकर श्वासनाल के इधर उधर दो कनखे फूटे रहते हैं जिन्हें दाहनी और बाई वायुप्रणालियाँ कहते हैं। फेफडे़ के भीतर घुसते ही ये वायुप्रणालियाँ उत्तरोत्तर बहुत सी शाखाओं में विभक्त होती जाती हैं। फेफडे़ में पहुँचने के पहले वायुप्रणाली लचीली हड्डी के छल्लों के रुप में रहती है पर भीतर जाकर ज्यों ज्यों शाखाओं में विभक्त होती जाती है त्यों त्यों शाखाएँ पतली और सूत रूप में होती जाती है, यहाँ तक कि ये शाखाएँ फेफडे़ के सब भागों में जाल की तरह फैली रहती हैं। इन्हीं के द्वारा साँस से खींची हुई वायु फेफडे़ के सब भागों में पहुँचती हैं। फेफडे़ के बहुत से छोटे छोटे विभाग होते है। प्रत्येक विभाग को सूक्ष्म आकार का फेफड़ा ही समझिए जिसमें कई घर होते हैं। ये घर वायुमंदिर कहलाते हैं और कोठों में बँटे होते हैं। इन कोठों के बीच सूक्ष्म वायुप्रणालियाँ होती है। नाक से खींची हुई वायु जो भीतर जाती है, उसे श्वास कहते हैं। जो वाय नाक से बाहर निकाली जाती है उसे प्रश्वास कहते हैं। भीतर जो साँस खींची जाती है उसमें कारबन, जलबाष्प तथा अन्य हानिकारक पदार्थ बहुत कम मात्रा में होते हैं और आक्सीजन गैस, जो प्राणियों के लिये आवश्यक है, अधिक मात्रा में होती है पर, भीतर से जो साँस बाहर आती है उसमें कारबन या अगारक वायु अधिक और आक्सीजन कम रहती है। शरीर के भीतर जो अनेक रासायनिक क्रियाएँ होती रहती हैं उनके कारण जहरीली कारबन गैस बनती रहती है। इस गैत के कारण रक्त का रंग कालापन लिए हो जाता है। यह काला रक्त शरीर के सब भागों से इकट्ठा होकर दो महाशिराओं के द्वारा हृदय के दाहने कोठे में पहुँचता हैं। हृदय से यह दूषित रक्त फुप्फुमीय धमनी (दे० 'नाडी') द्वारा दोनों फेफड़ों में आ जाता है। वहाँ रक्त की बहुत सी कारबन गैस बाहर निकल जाती है और उसकी जगह आक्सिजन आ जाता है, इस प्रकार फेफड़ों में जाकर रक्त शुद्ध हो जाता है। लाल शुद्ध होकर फिर वह हृदय में पहुँचता है और वहाँ से धमनियों द्वारा सारे शरीर में फैलकर शरीर को स्वस्थ रखता हैं।

फेफड़ी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० पपड़ी] गरमी या खुश्की से ओठों के ऊपर चमडे़ की सूखी तह। प्यास या गरमी से सूखे ओठ का चमड़ा। मुहा०—फेफड़ी बाँधना या पड़ना =ओठ सूखना।

फेफड़ी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० फेफड़ा] चौपायों का एक रोग जिसमें उनके फेफडे़ सूज आते हैं और उनका रक्त सूख जाता है।

फेफरी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'फेफड़ी'। उ०—मथुरापुर में शोर परयो। गर्जत कंस बेस सब साजे मुख को नीर हरयो। पीरो भयो, फेफरी अधरन हिरदय अतिहि डरयो।—सूर (शब्द०)।

फेरंड
संज्ञा पुं० [सं० फेरण्ड] गीदड़। सियार।

फेर (१)
संज्ञा पुं० [हिं० फेरना] १. चक्कर। घुमाव। घूमने की क्रिया दशा या भाव। उ०—(क) ओहि क खंड जस परबत मेरू। मेरुहि लागि होइ अति फेरू।—जायसी (शब्द०) (ख) फेर सों काहे को प्राण निकासत सूधेहि क्यों नहिं लेत निकारी।—हनुमान (शब्द०)। मुहा०—फेर खाना = घुमाव का रास्ता तय करना। सीधा न जाकर इधर उधर घूमकर अधिक चलना। जैसै,—मैं तो इसी रास्ते जाऊँगा, उधर उतना फेर खाने कौन जाय ? फेर पड़ना = घुमाव का रास्ता पड़ना। साधा न पड़ना। जैसे,— उधर से मत जाओ बहुत फेर पडे़गा, मैं सीधा रास्ता बताता हूँ। फेर बाँधना = क्रम या तार बँधना। सिलसिला लगना। फेर बाँधना = सिलसिला डालना। तार बाँधना। फेर की बात = घुमाव की बात। बात जो सीधी सादी न हो। २. मोड। झुकाव। मुहा०—फेर देना = घुमाना। मोडना। रूख बदलना। ३. परिवर्तन। उलट पलट। रद बदल। कुछ से कुछ होना। यौ०—उलट फेर।मुहा०—दिनों का फेर = समय का परिवर्तन। जमाने का बदलना। एक दशा से दूसरी दशा की प्राप्ति (विशेषतः अच्छी से बुरी दशा की)। उ०—(क) दिनन को फेर होत मेरु होत माटी को।—(शब्द०)। (ख) हंस बगा के पाहुना कोइ दिनन का फेर। बगुला कहा गरविया बैठा पंख बिखेर।—कबीर (शब्द०)। समय का फेर =दे० 'दिनों का फेर'। उ०— मरत प्यास पिँजरा परयो सुआ समय के फेर। आदर दै दै बोलियत बायस बलि की बेर।—बिहारी (शब्द०)। कुफेर =(१) बुरे दिन। बुरी दशा। (२) बुरा अवसर। बुरा दाँव। सुफेर =(१)अच्छे दिन। अच्छी दशा। (२) अच्छा अवसर। अच्छा मौका। उ०—पेट न फूलत बिनु कहे कहत न लागत बेर। सुमति बिचारे बोलिए समुझि कुफेर सुफेर।—तुलसी (शब्द०)। ४. बल। अंतर। फर्क। भेद। जैसे—यह उनकी समझ का फेर है। उ०—(क) कबिरा मन दीया नहीं तन करि डारा जेर। अंतर्यामी लखि गया बात कहन का फेर।—कबीर (शब्द०)। (ख) नदिया एक घाट बहुतेरा। कहैं कबीर कि मन का फेरा।—कबीर (शब्द०)। (ग) मीता। तू या बात को हिथे गौर करि हेर। दरदवंत बेदरद को निसि बासर को फेर।—रसनिधि (शब्द०)। मुहा०—फेर पड़ना = अंतर या फर्क होना। भेद पड़ जाना। उ०— दरजी चाहत थान को कतरन लेहुँ चुराय। प्रीति ब्योंत में, भावते ! बडो़ फेर परि जाय।—रसनिधि (शब्द०)। यौ०—हेर फेर। ५. असमंजस। उलझन। दुबधा। अनिश्चय की दशा। कर्तव्य स्थिर करने की कठिनता। जैसे,—वह बडे़ फेर में पड़ गया है कि क्या करे। उ०—घट मँह बकत चकतभा मेरू। मिलहि न मिलहि परा तस फेरू।—जायसी (शब्द०)। मुहा०—फेर में पड़ना = असमंजस में होना। कठिनाई में पड़ना। फेर में डालना = असमंजस में डालना। अनिश्चय की कठिनता सामने लाना। किंकर्तव्यमूढ करना। जैसे,— तुमने तो उसे बडे़ फेर में डाल दिया। ६. भ्रम। संशय। धोखा। जैसे,—इस फेर में न रहना कि रूपया हजम कर लेंगे। उ०—माला फेरत जुग गया गया न मन का फेर। कर का मनका छोड़ के मन का मनका फेर।— कबीर (शब्द०)। ७. चाल का चक्कर। षट्चक्र। चाल- बाजी। जैसे—तुम उसके फेर में मत पड़ना, वहाँ बड़ा धूर्त हैं। मुहा०—फेर में आना या पड़ना = धोखा खाना। फेर फार की बात = चालाकी की बात। ८. उलझाव। बखेड़ा। जंजाल। प्रपंच। जैसे,—(क) रूपए का फेर बड़ा गहरा होता है। (ख) तुम किस फेर में पडे़ हो, जाओ अपना काम देखो। मुहा०— निन्नानबे का फेर = सौ रूपए पूरे करने की दुन। रूपया बढा़ने का चसका। विशेष—इसपर यह कहानी है की दो भाई थे, जिनमें एक दरिद्र और दूसरा धनी था। पहला भाई दरिद्र होने पर भी बडे़ सुख चैन से रहता था। उसकी निश्चिंतता देख बडे़ भाई को ईर्ष्या हुई। उसने एक दिन धीरे से अपने दरिद्र भाई के घर में निन्नानबे रूपए की पोटली डाल दी। दरिद्र रूपए पाकर बहुत प्रसन्न हुआ, पर गिनने पर उसे मालूम हुआ कि सौ में से एक कम है। तभी से वह सौ रूपए पूरे करने की चींता में रहने लगा और पहले से भी अदिक कष्ट से जीवन बिताने लगा। ९. युक्ति। उपाय। ढंग। कौशल रचना। तदबीर। डील। उ०—(क)। फेर कछु करि पौरि तें फिरि चितई मुसकाय। आई जामन लेन को नेहे चली जमाय।—बिहारी (शब्द०)। (ख)। आज तो तिहारे कूल बसे रहैं रूख मूल, सोई सूल कीबो पैडों रात ही वनायबो। बात है न आरस की रति न सियारस की, लाख फेर एक बार तेरे पार जायबो।—हनुमान (शब्द०)। यौ०—फेरफार। मुहा०—फेर लगाना = उपाय का ढंग रचना। युक्ति लगाना। १०. अदला बदला। एवज। कुछ लेना और कुछ देना। यौ०—हेर फेर = लेन देन। व्यवसाय। जैसे,—वहाँ लाखों का हेर फेर होता है। ११. हानि। टोटा। घाटा। जैसे,—उसकी बातों में आकर मैं हजारों के फेर में पड़ गया। मुहा०—फेर में पड़ना = हानि उठाना। घाटा सहना। १२. भूत प्रेत का प्रभाव। जैसे,—कुछ फेर है इसी से वह अच्छा नहीं हो रहा है।

फेर पु (२)
संज्ञा पुं० [हिं०] ओर। दिशा। पार्श्व। तरफ। उ०— सगुन होहिं सुंदर सकल मन प्रसन्न सब केर। प्रभु आगमन जनाव जनु नगर रम्य चहुँ फेर—तुलसी (शब्द०)।

फेर (३)पु
अव्य० [हिं०] फिर। पुनः। एक बार और। उ०— (क)। सुनि रवि नाउ रतन भा राता। पंडित फेर उहै कहु बाता।—जायसी (शब्द०)। (ख)। ऐहे न फेर गई जो निशा तन यौवन है धन की परछाहीं।—पद्माकर (शब्द०)।

फेर (४)
संज्ञा पुं० [सं०] ऋगाल। गीदड़।

फेरक पु †
संज्ञा पुं० [हिं० फेरा] फेरा। घेरा। ङ—बन काटो अज्ञा दइ एता। फेरक पाँच कोस में जेता।—चरण० बानी, भा०२, पृ० २०८।

फेरना
क्रि० स० [सं०प्रेरणा प्रा० पेरन; अथवा हिं० 'फिर' से व्युत्पन्न नामिक धातु] १०एक ओर से दूसरी ओर ले जाना। भिन्न दिशा में प्रवृत्त करना। गति बदलना। घुमाना। मोड़ना। जैसे,—गाडी़ पश्चिम जा रही थी उसने उसे दक्खिन की ओर फेर दिया। उ०—(क)। मैं ममता मन मारि ले घठ ही माहीं घेर। जब ही चालै पीठ दै आँकुस दै दै फेर।—कबीर (शब्द०)। (ख)। तिनहिं मिले मन भयो कुपथ रत फिरै तिहारे फेरे।—तुलसी (शब्द०)। (ग)। सुर तरु रुख सुरबेलि पवन जनु फेरइ।—तुलसी (शब्द०)।संयो क्रि०—देना।—लेना। २. पीछे चलाना। जिधर से आता हो उसी ओर भेजना या चलाना। लौटाना। वापस करना। पलटाना। जैसे,— वह तुम्हारे यहाँ जा रहा था, मैंने रास्ते ही से फेर दिया। उ०—जे जे आए हुते यज्ञ में परिहै तिनको फेरन।—सूर (शब्द०)। संयो० क्रि०—देना। ३. जिसके पास से (कोई पदार्थ)। आया हो उसी के पास पुनः भेजना। जिसने दिया हो उसी को फिर देना। लौटाना। वापस करना। जैसे,—(क)। जो कुछ मैंने तुम से लिया है सब फेर दूँगा। (ख)। यह कपडा अच्छा नहीं है, दूकान पर फेर आओ। (ग)। उनके यहाँ से जो न्योता आवेगा वह फेर दिया जायगा। उ०—दियो सो सीस चढा़य ले आछी भाँति अएरि। जापै चाहत सुख लयो ताके दुखहिं न फेरि।— बिहारी (शब्द०)। संयो० क्रि०—देना। ४. जिसे दिया था उससे फिर ले लेना। एक बार देकर फिर अपने पास रख लेना। वापस लेना। लौटा लेना। जैसे,— (क)। अब दूकानदार कपडा़ नहीं फेरेगा। (ख)। एक बार चीज देकर फेरते हो। संयो क्रि०—लेना। ५. चारों ओर चलना। मंडलाकार गति देना। चक्कर देना। घुमाना। भ्रमण करना। जैसे, मुगदर फेरना, पटा फेरना, बनेठी फेरना। मुहा०—माला फेरना =(१)। एक एक गुरिया या दाना हाथ से खिसकाते हुए माला को चारों ओर घुमाना। माला जपना। (एक एक दाने पर हाथ रखते हुए ईश्वर या किसी देवता का नाम या मंत्र कहते जाते है जिससे नाम या मंत्र की संख्या निर्दिष्ट होती जाती है)। उ०—कबिरा माला काठ की बहुत जतन का फेरु। माला फेरो साँस की जामें गाँठ न मेरू।—कबीर (शब्द०)। (२)। बार बार नाम लेना। रट लगाना। धुन लगाना। जैसे,—दिन रात इसी की माला फेरा करो। ६. ऐंठना। मरोड़ना। जैसे,—पेंच को उधर फेरो। ७. यहाँ से वहाँ तक स्पर्श कराना। किसी वस्तु पर धीरे से रखकर इधर उधऱ ले जाना। छुलाना या रखना। जैसे,—घोडे़ की पीठ पर हाथ फेरना। उ०—अवनि कुरंग, विहग्र द्रुम डारन रूप निहारत पलक न प्रेरत। मगन न डरत निरखि कर कमलन सुभग सरासन फेरत।—तुलसी (शब्द०)। संयो० क्रि०—देना।—लेना। मुहा०—हाथ फेरना =(१)। स्पर्श करना। इधर उधऱ छूना। (२)। प्यार से हाथ रखना। सहलाना। जैसे, पीठ पर हाथ फेरना। (३)। हथियाना। ले लेना। हजम करना। उडा़ लेना। जैसे, पराए माल पर हाथ फेरना। ८. पोतना। तह चढ़ना। लेप करना। जैसे, कलई फेरना, रंग फेरना, चूना फेरना। मुहा०—पानी फेरना = धो देना। रंग बिगाड़ना। नष्ट करना। ९. एक ही स्थान पर स्थिति बदलना। सामना दूसरी तरफ करना। पार्श्व परिवर्तित करना। जैसे,—(क) उसे उस करवट फेर दो। (ख) वह मुझे देखते ही मुँह फेर लेता है। संयो० क्रि०—देना।—लेना। १. स्थान वा क्रम बदलना। उलट पलट या इधर उधर करना। नीचे के ऊपर या इधर का उधर करना। जैसे, पान फेरना। ११. पलटना। और का और करना। बद- लना। भिग्न करना। विपरीत करना। विरुद्ध करना। जैसे, मति फेरना, चित्त फेरना। उ०—(क) फेरे भेख रहै भा तपा। धूरि लपेटे मानिक छपा। —जायसी (शब्द०)। (ख) सारद प्रेरि तासु मति फेरी। माँगेसि नींद मास षठ केरी।—तुलसी (शब्द०)। १२. माँजना। बार बार दोहराना। अभ्यस्त करना। उदधरणी करना। जैसे, पाठ फेरना। १३. चारों ओर सब के सामने ले जाना। सब के सामने ले जाकर रखना। घुमाना। जैसे, जनवासे में पान फेरना। उ०—फेरे पान फिरा सब कोई। लागा व्याहचार सब होई।—जायसी (शब्द०)। १४. प्रचारित करना। घोषित करना। जैसे, डौंडी़ फेरना। १५. चलाकर चाल ठीक करना। घोडे़ को आदि को ठीक चलने की शिक्षा दिना। चाल चलाना। निकालना। जैसे,—वह सवार बहुत अच्छा घोडा़ फेरता है। उ०—फेरहिं चतुर तुरँग गति नाना।—तुलसी (शब्द०)।

फेरनि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० फेरना] फेरने का कार्य या स्थिति। उ०—आनँद घन सम सुंदर टेरनि। इत उत वह हेरनि, पट फेरनि।—नंद० ग्रं०, पृ० २७६।

फेर पलटा
संज्ञा पुं० [हिं० फेर + पलटा ] गोना। द्विरागमन।

फेरफार
संज्ञा पुं० [हिं० फेर] १. परिवर्तन। उलट फेर। उलट पलट। जैसे,—इसमें इधर बहुत फेरफार हुआ है। २. अंतर। बीच। फर्क। ३. टालमटूल। बहाना। उ०—भानु सो पढ़न हनुमान गयो भानु मन अनुमानि सिसुकेलि कियो फेरफार सो।—तुलसी (शब्द०)। ४. घुमाव फिराव। पेंच। चक्कर जैसे, फेरफार की बात।

फेर बदल
संज्ञा पुं० [हिं०फेर + अ० बदल] परिवर्तन।

फेरव (१)
वि० [सं०] १. धूर्त। कपटी। चालबाज। २. हिंस्र। दुःख पहुँचानेवाला।

फेरब (२)
संज्ञा पुं० १. श्रृगाल। गीदड़। २. राक्षस।

फेरवट
संज्ञा स्त्री० [हिं० फेरना] १. फिरने का भाव। २. लपेटने में एक एक बारा का घुमाव। फेरा। ३. घुमाव फिराव। पेच। चक्कर जैसे, फेरवट की बात। ४. फेरफार। अंतर। फर्क। †५. दे० 'फेरौरी'।

फेरवा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० फेरना] सोने का वह छल्ला जो तार को दो तीन बार लपेटकर बनाया जाता है। लपेटुआ।

फेरवा † (२)
संज्ञा पुं० दे० 'फेरा'।

फेरा
संज्ञा पुं० [हिं० फेरना] १. किसी स्थान या वस्तु के चारों ओर गमन। परिक्रमण। चक्कर। जैसे,—वह ताल के चारो ओर फेरा लगा रहा है। उ०—चारि खान में भरमता कबहुँ न लगता पार। सो फेरा सब मिट गया सतगुरु के उपकार।—कबीर (शब्द०)। क्रि० प्र०—करना।—लगाना। २. लपेटने में एक बार का घुमाव। लपेट। मोड़। बल। जैसे,—कई फेरे देकर तग्गा लपेटा गया है। क्रि० प्र०—करना।—डालना।—लगाना। ४. इधर उधर से आगमन। घूमते फिरते आ जाना या जा पहुँचना। जैसे,—वे कभी तो मेरे यहाँ फेरा करेंगे। उ०— (क) पींजर महँ जो परेवा घेरा। आप मजार कीन्ह तहँ फेरा।—जायसी (शब्द०)। (ख) जहँ सतसंग कथा माधव की सपनेहु करत न फेरो।—तुलसी (शब्द०)। ५. लौटकर फिर आना। पलटकर आना। जैसे,—इस समय तो जा रहा हूँ, फिर कभी फेरा करूँगा। उ०—कहा भयो जो देश द्वारका कीन्हों जाय बसेरो। आपुन ही या ब्रज के कारन करिहैं फिरि फिरि फेरो।—सूर (शब्द०)। ६. आवर्त। घेरा। मंडल। †७. भिक्षा माँगना।

फेराफेरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फेरना] हेराफेरी। इधर का उधर। क्रमपरिवर्तन। उलट।

फेरि पु ‡
अव्य० [हिं० फिर] पुनः। दुबारा। उ०—दास इते पर फेरि बुलावत यों अब आवत मेरी बलैया।—दास (शब्द०)। मुहा०—फेरि फेरि = बार बार। उ०—हरे हरे हेरि हेरि हँसि हँसि फेरि कहत कहा नीकी लगत।—देव (शब्द०)।

फेरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फेरना] १. दे० 'फेरा'। २. दे० 'फेर'। ३ परिक्रमा। प्रदक्षिणा। भाँवरी। जैसे—सोमवती की फेरी। क्रि० प्र०—डालना।—पडना।—देना। मुहा०—फेरी पड़ना = भाँवर होना। विवाह के समय वर कन्या का साथ साथ मंडपस्तंभ, अग्नि की परिक्रमा करना। ४. योगी या फकीर का किसी बस्ती में भिक्षा के लिये बराबर आना। उ०—(क) आशा को ईंधन करूँ मनसा करूँ भभूत। जोगी फिरि फेरी करूँ यों बनि आवै सूत।—कबीर (शब्द०)। (ख) रूप नगर दृग जोगिया फिरत सो फेरी देत। छबि मनि पावत हैं पल झोरि भरी लेत।—रसनिधि (शब्द०)। क्रि० प्र०—देना।—लगाना। ५. कई बार आना जाना। चक्कर। उ०—न्योते गए नँदलाल कहूँ सुनि बाल बिहाल बियोग की घेरी। ऊतर कौनहूँ के पद्माकर दै फिरि कुंजगलीन में फेरी।—पद्माकर (शब्द०)। ६. किसी वस्तु को बेचने के लिये उसे लादकर गाँव गाँव गली गली घूमना। भाँवरी। ७. वह चरखी जिसपर रस्सी पर ऐंठन चढा़ई जाती है।

फेरीवाला
संज्ञा पुं० [हिं० फेरी + वाला] घूम घूम कर सौदा बेचनेवाला व्यापारी।

फेरु
संज्ञा पुं० [सं०] गीदड़।

फेरूआ †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'फेरवा'।

फेरौरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० फेरना] टूटे फूटे खपरैलों को छाजन से निकालकर उनके स्थान में नए नए खपरैल रखने की क्रिया।

फेल (१)
संज्ञा पुं० [अ० फेल] कर्म। काम। कार्य। जैसे, बदफेल, बुरा फेल। क्रि० प्र०—करना।—होना।

फेल (२)
वि० [अं० फे़ल] अकृतकार्य। जिसे कार्य में सफलता न हुई हो। असफल। जैसे, इम्तहान में फेल होना। क्रि० प्र०—करना।—होना।

फेल (३)
संज्ञा पुं० [सं०] जूठा अन्न। उच्छिष्ट [को०]।

फेल (४)
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का वृक्ष जिसे बेपार भी कहते हैं। वि० दे० 'बेपार'।

फेलक
संज्ञा पुं० [सं०] खाकर छोडा़ हुआ अन्न आदि। उच्छिष्ट [को०]।

फेला, फेलि, फेलिका, फेली
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'फेलक' [को०]।

फेलुक
संज्ञा पुं० [सं०] अडकोष। वृषण। मुष्क [को०]।

फेलो
संज्ञा पुं० [अं०फेलो] सभासद। सभ्य। जैसे, विश्वविद्या- लय का फेलो।

फेल्ट
संज्ञा पुं० [अं० फेल्ट] नमदा। जमाया हुआ ऊन। जैसे, फेल्ट की टोपी।

फेस
संज्ञा पुं० [अं०फेस] १. चेहरा। मुँह। २. सामना। ३. टाइप का वह ऊपरी भाग जो छपने पर उभरता है। ४. घडी़ का सामने का बाग जिसपर सूई और अंक रहते हैं।

फेसना पु †
क्रि० स० [सं० पेपण ] दे० 'पीसना'। उ०—सुलेमान जमसेद नूँ, फेस गयो जम फाक।—बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० ४४।

फेहरिस्त
संज्ञा स्त्री० [अ० फेहरिस्त] दे० 'फिहरिस्त'।

फैंसी
वि० [अं० फैन्सी ] १. देखने में सुंदर। अच्छी काट छाँट या रंगढंग का। रुपरंग में मनोहर। जैसे, फैंसी छाता,। फैंसी धोती। २. दिखाऊ। जो ऊपर से देखने में सुंदर पर टिकाऊ न हो। तड़क भड़क का।

फैंट, फैंटा पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'फेंटा'। उ०—(क) आतुर न होहु हाहा नेकु फैंड छोरि वैठो मोहि वा विसासी को है व्योरो बुझिबो घनो।—रसखान, पृ० ४६। (ख) कठ फूल बागो, फैंटा फूल फूल गाछी।—नंद ग्रं०, पृ० ३७९।

फैकल्टी
संज्ञा स्त्री० [अं०] विश्वविद्यालय के अंतर्गत किसी विद्याया शास्त्र के पंडितों और आचार्य का समाज या मंडल। विद्वत्समिति। विद्वन्मंडल। जैसे, फैकल्टी आफ ला। फैकल्टी आफ मेडिसिन, फैकल्टी आफ सायन्स।

फैक्टरी
संज्ञा स्त्री० [अं०फैक्टरी] कारखाना।

फैज
संज्ञा पुं० [अ० फैज] १. वृद्धि। लाभ। २. फल। परिणाम। मुहा०—अपने फैज को पहुँचना =अपने कर्म का उचित फल पाना।

फैदम
संज्ञा पुं० [अं० फैदम] गहराई की एक नाप जो छह फुट की होती है। पुरसा।

फैन (१)
संज्ञा पुं० [अं० फै़न] पंखा। जैसे, इलेक्ट्रिक फैन।

फैन † (२)
संज्ञा पुं० [सं० फण] दे० 'फण'। उ०—सो अपने बिले तें वह बाहिर निकरि कै फैन नँवाय कै श्री गुँसाई जी को दंडवत कियो।—दो सौ बावन, भा० १, पृ० २९५।

फैन पु † (३)
संज्ञा पुं० [सं० फेन] दे० 'फेन'। उ०—दुग्ध फैन सम सैन रमा मनो ऐन सुहाई।—नंद ग्रं०, पृ० २०४।

फैमिली
संज्ञा स्त्री० [अं० फैमिली] परिवार। उ०—फैमिली के साथ होगे ?—संन्यासी, पृ० १७२।

फैयाज
वि० [अ० फैयाज] उदार।

फैयाजी
संज्ञा स्त्री० [अं०फैयाज + फा़० ई(प्रत्य०)] उदारता उ०—यह क्षण हमें मिला है नहीं नगर सेठों की फैयाजी से।—हरी घास०, पृ० ६२।

फैर †
संज्ञा स्त्री० [अं० फायर] बंदूक, तोप आदि हथियारों का दगना। क्रि० प्र०—करना।—होना।

फैल पु (१) †
संज्ञा पुं० [अ० फेल] काम। कार्य। उ०—शैल तजि बैल तजि फैल तजि गैलन में, हेरत उमा को यों उमापति हितै रहे।—पद्माकर (शब्द०)। २. क्रीडा। खेल। ३ नखरा। मकर। क्रि० प्र०—करना।—मचाना।

फैल पु (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रसृत, वा प्रहित, प्रा० पयल्ल] १. फैला हुआ। २. विस्तृत। लंबा चौडा़। २. फैलाव। विस्तार।

फैलाना
क्रि० अ० [सं० प्रहित वा प्रसृत, प्रा० पयल्ल+हिं० ना (प्रत्य०)] १. लगातार स्थान घेरना। यहाँ से वहाँ तक बराबर रहना। जैसे,—जंगल नदी के किनारे से पहाड़ तक फैला है। संयो० क्रि०—लाना। २. अधिक स्थान छेंकना। ज्यादा जगह घेरना। अदिक व्यापक होना। विस्तृत होना। पसरना। संकुचित या जोडे़ स्थान में न रहना। अधिक बडा़ या लंबा चौडा़ होना। इधर उधर बढ़ जाना। जैसे,—(क) खूब फैलकर बैठना। (ख) गरमी पाकर लोहा फैल जाता है। उ०— पाँव धरै जित ही वह बाल तहीं रँग लाल गुलाल सौ पैलौ।—शंभु (शब्द०) ३. मोटा होना। स्थुल होना। मोटाना। जैसे,—उसका बदन फैल रहा है।४. आवृत करना। छाना। व्यापक होना। मरना। व्यापना। दुर तक रखा या पड़ा रहना। जैसे, धुले फैलना, जाल फैलना। उ०—फुलि रहे, पलि रहे, फैलि रहे, फबि रहे, झपि रहे, झलि रहे, झुकि रहे, झुमि रहे।— पद्माकर (शब्द०)। ५. संख्या बढ़ना। बढ़ती होना। बृद्धि होना। जैसे, कारवार फैलना। उ०—फले फुले फैले खल, सीदे साधु पल पल, बाती दीप मालिका ठठाइयत सुप है— तुलसी (शब्द०)। ६. इकट्ठा न रहना। छितराना। बिख- रना। अलग अलग दुर तर इधर उधर पड़ा रहना। जैसे,—(क) हाथ से गिरते ही माला के दाने इधर उधर फैल गए। (ख) सिपाहियों को देखते ही डाकु इधर उधर फैल गए। ७. किसी छेद या गड्डे का और बड़ा हो जाना या बढ़ जाना। अधिक खुलना। जैसे, मुँह फैलना। ८. मुड़ा न रहना। पूरा तनकर किसी ओर बढ़ना। जैसे,—फाड़े के तनाव से हाथ फैलता नहीं है। ९. प्रचार पाना। चारों ओर पाया जाना या होना। क्रमशः बहुत से स्थानों में विद्यमान होना या मिलना। बहुतायत से मिलना। जैसे,—आंदोलन फैलना, बीमारी फैलना, प्लेग फैलना। गोभी अभी फैली नहीं है। १०. इधर उधर दुर तर पहुँचना। जैसे, सुगंध फैलना, स्याही फैलना, खबर फैलना। ११. प्रसिद्ध होना। बहुत दुर तक ज्ञात या विदित होना। मशहुर होना। जैसे, यश फैलना, नाम फैलना, वात फैलना। उ०—(क) राव रतनसेन के कुमार को सूजस फैलि रह्यो पुहुमी में ज्यों प्रवाह गंगा पथ को।—मतिराम (शब्द०)। (ख) अब तो बात फैलि गई जानत सब कोई।—गीत (शब्द०)। १२. आग्रह करना। हठ करना। जिद करना। १३. भाग का ठीक ठीक लग जाना। तसकीन दुरुस्त उतरना।

फैलसुफ
संज्ञा पुं० [यु० फिलसफ (=दार्शनिक) १. फिजुल खर्च। २. ज्ञानी। विद्धान्। ३. धुर्त। मक्कार [को०]।

फैलसुफी
संज्ञा स्त्री० [हिं० फैलसूफ] १. फिजूल खर्ची। २. ज्ञान। विद्वत्ता (को०)। ३. धुर्तना। मक्कारी (को०)।

फैलाना
क्रि० स० [हिं० फैलना] १. लगातार स्थान घिरवाना। यहाँ से वहाँ तक बराबर बिछाना, रखना या ले जाना। जैसे,—उसने अपना हाता नदी के किनारे तक फैला लिया है। संयो० क्रि०—देना। डालना।—लेना। २. अधिक स्थान घिरवाना। विस्तृत करना। पसारना। विस्तार बढ़ाना। अधिक बड़ा या लंबा चौड़ा करना। इधर उधर बढ़ाना। जैसे, तार फैलाना, आटे की लोई फैलाना। ३. संकुचित न रखना। सिमटा हुआ, लपेटा हुआ या तह किया हुआ न रखना। पसारना। जैसे, सुखने के लिये कपड़ा फैलाना। उड़ने के लिये पर फैलाना। ४. व्यापक करना। छा देना। भर देना। दुर तक रखना या स्थापित करना। जैसे,—(क) यहाँ क्यों कूड़ा फैलारखा है। (ख) चिड़ियों को फँसाने के लिये जाल फैलाना। ५. इकट्ठा न रहने देना। बिखेरना। अलग अलग दुर तक कर देना। जैसे,—बच्चे के हाथ में बताशे मत दो, इधर उधर फैलाएगा। ६. बढ़ाना। बढ़ती करना। बृद्धि करना। जैसे, कारवार फैलाना। ७. किसी छेद या गड्ढे को और बड़ा करना या बढ़ाना। अधिक खोलना। जैसे, मुँह फैलाना, छेद फैलाना। ८. मुड़ा न रखना। पूरा तानकर किसी ओर बढ़ाना। जैसे,—(क) हाथ फैलाओ तो दें। (ख) पैर फैलाकर सोना। ९. प्रचलित करना। किसी वस्तु या बात को इस स्थिति में करना कि वह जनता के बीच पाई जाय। इधर उधर विद्यमान करना। जारी करना। जैसे, विद्रोह फैलाना, वीमारी फैलाना। उ०—राज काज दरबार में फैला- वहु यह रत्न।—हरिश्चंद्र (शब्द०)। १०. इधर उधर दुर तक पहुँचाना। जैसे,—सुगंध फैलाना, स्याही फैलाना। ११. प्रसिद्ध करना। बहुत दुर तक ज्ञात या विदित कराना। चारों ओर प्रकट करना। जैसे, यश फैलाना, नाम फैलाना। १२. आयोजन करना। विस्तृत विधान करना। धुमधाम से कोई बात खड़ी करना। जैसे, ढग फैलाना, ढोंग फैलाना, आडंबर फैलाना। १३. गणित की क्रिया का विस्तार करना। १४. हिसाब किताब करना। लेखा लगाना। बिधि लगाना। जैसे, ब्याज फैलाना, हिसाब फैलाना, पड़ता फैलाना। १५. गुणा भाग के ठीक होने की परीक्षा करना। वह क्रिया करना जिससे गुणा या भाग के ठीक होने या न ठीक होने का पता चल जाय।

फैलाव
संज्ञा स्त्री० [हिं० फैलाना] १. विस्तार। प्रसार। २. लंबाई चौड़ाई। ३. प्रचार।

फैलावट
संज्ञा स्त्री० [हिं० फैला + वट (प्रत्य०)] दे० 'फैलाव'। उ०—देखती हुँ कि सामने सिर्फ फैलावट है, फैलावट।—सुखदा, पृ० १०।

फैशन
संज्ञा पुं० [अं० फैशन] १. ढंग। धज। तर्ज। वजह्। चाल। उ०—(क) फैशन ने तो बिल और टोटल के इतने गोले मारे कि बंटाधार कर दिया।—भारतेंदु ग्रं०, भा०१, पृ० ४७६। २. रीति। प्रथा। चलन। उ०—केवल प्रेम और भ्रातृभाव के प्रदर्शन और आचरण में ही काव्य का उत्कर्ष मानने का जो एक नया फैशन टाल्सटाय के समय से चला है वह एकदेशीय है।—रस०, पृ० ६४। यौ०—फैशनपरस्त। फैशनपरस्ती। फैशनबाज। फैशनबाजी।

फैसल
संज्ञा पुं० [अ० फैसल] दे० 'फैसला'।

फैसला
संज्ञा पुं० [अ० फैसलह्] १. वादी प्रतिवादी के बीच उपस्थित विवाद का निर्णय। दो पक्षों में किसकी बात ठीक है इसका निबटेरा। २. किसी व्यवहार या अभियोग के संबंध में न्यायालय की व्यवस्था। किसी मुकदमे में अदालत की आखिरी राय। क्रि० प्र०—करना।—सुनाना।—होना।

फैसिज्म
संज्ञा पुं० [अं० फासिज्म] दे० 'फासिज्म'।

फोँक (१)
संज्ञा पुं० [सं० पुङ्ख] तीर के पीछे की नोक जिसके पास पर लगाए जाते हैं और जिसे रोंदे पर चढ़ाकर चलाते हैं। इस नोक पर गड्ढा या खड्डी बनी रहती है जिसमें धनुष की डोरी बैठ जाती है। उ०—(क) परिमल लुब्ध मधुप जह बैठत उड़ि न सकत तेहि ठाँते। मनहुँ मदन के हैं शर पाए फोंक बाहरी घातें।—सुर (शब्द०)। (ख) शोभन सिँगार रस की सी छींट सोहे फाँक कामशर की सी कहों युगतिनि जोरि जोरि।—केशव (शब्द०)। (ग) समर में अरि-गज-कुंभन में हनो तीर फोंक लौ समात वीर ऐसो तेजधारी है।—गुभान (शब्द०)। (घ्) बान करोर एक मुँह छुटहिं। बाजहिं जहाँ फोंक लहि फुटहिं।— जायसी (शब्द०)।

फोँक (२)
वि० [देश०] दलालों की बोली में 'चार'।

फोँकलाय
वि० [देश०] चौदह। (दलाल)।

फोँका
संज्ञा पुं० [सं० पुङ्ख या हिं० फुँकना] १. लंबा और पोला चोंगा। फोपी। २. मटर आदि पीली डंठलवाले शस्यों की फुनगी। ३. दे० 'फुका'। क्रि० प्र०—लगाना।—मारना।—देना।—करना। ४. दे० 'सरफोका'।

फोँका गोला
संज्ञा पुं० [हिं० फोंक + गोला] तोप का लंबा गोला।

फोँदना पु
संज्ञा पुं० [हिं० फुँदना] फुँदना। उ०—ता पर कलसा फुलनि के फोंदना बिराजें।—छीत०, पृ० २७।

फोँदा पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'फुँदना', 'फुँदना'। गावत मलार सुराग रागिनी गिरिधरन लाल छबि सोहनो। पंच रँग वरन वरन पाटहि पवित्रा विच विच फोंदा गोहनो।—सुर (शब्द०)।

फोँफर †
वि० [अनु०] १. पोला। सावकाश। २. फोक। निःसार। खोख।

फोँफी †
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. गोल लंबी नली। छोटा चोंगा। २. बाँस की नली जिससे सोनार, लोहार आदि आग धौंकते हैं। ३. नाक में पहनने की पोली कील। छुँदी।

फोँक (१)
संज्ञा पुं० [सं० स्फोट या सं० वल्कल, हिं० बोकला, फोकला] १. सार निकल जाने पर बचा हुआ अंश। वह वस्तु जिसका रस या सत निकाल लिया गया हो। सीठी। २. भुसी। तुष। वह वस्तु जिसमें छिलका ही छिलका रह गया हो, असल चीज निकल गई हो। ३. बिना स्वाद की वस्तु। फीकी या नीरस चीज।

फोक (२)
संज्ञा पुं० [देश०] एख तृण जिसका साग बनाकर लोग खाते हैं। सूक्ष्मपुष्पी। विशेष—यह मारवाड़ की ओर होता है तथा रेचक और ठंढा माना जाता है। वैद्यक में यह रक्तपित्त और कफ का नाशक कहा गया है।

फोकट
वि० [हिं० फोक] तुच्छ। जिसका कुछ मुल्य न हो। निःसार। व्यर्थ। उ०—(क) खल प्रबोध जग सोध मन को निरोध कुल सोध। करहिं ते फोकट पचि मरहिं सपनेह सुख न सुबोध।—तुलसी (शब्द०)। (ख) कलि में न विराग न ज्ञात कहुँ सब लागत फोकट झुँठ फीको।—तुलसी (शब्द०)। (ग) जोरत ये नाते नेह फोकट फीको। देह के दाहक गाहक जी को।—तुलसी (शब्द०)। (घ) करम कलाप परिताप पाप साने सब ज्यों सुफुल फले रुख फोकट फरनि। दभ लोभ लालच उपासना बिनासिनी के सुगति साधन भई उदर भरनि।—तुलसी (शब्द०)। मुहा०—फोकट का =(१) बिना परिश्रम का। (२) बिना मूल्य का। मुफ्त। जैसे,—क्या यह फोकट का है जौ यो ही दे दें। फोकट में = बिना श्रम और औऱ व्यय के। मुफ्त में। यों ही।

फोकरा पु
वि० [हिं० फोक] बेकार। निस्तार। तुच्छ। उ०— जो कोई गाहक लेत प्यार ताकौ भागै सौकरा। सुंदर वस्तु सत्य यह यौं ही और बात सब फोकरा।—सुंदर ग्रं०, भा० २, पृ० ९१४।

फोकला †
संज्ञा पुं० [सं० वल्कल, हिं० बोकला] [स्त्री० पोकलाई] किसी फल आदि के ऊपर का छिलका।

पोकलाई पु ‡
संज्ञा स्त्री० [सं० वल्कल, हिं० फोकला] छिलका या निस्तार वस्तु। उ०—जैसी भाँति काठ धुन लागै बहुरी रहै फोकलाई।—मलुक० बानी, पृ० १९।

फोकस
संज्ञा पुं० [अं० फोकस] १. वह विंदु जहाँपर प्रकाश की छितराई हुई किरनें एकत्र हों। इस विंदु पर ताप और प्रकाश की मात्रा अधिक हो जाती है जैसे उन्नतोदर वा आतशी शीशे में दिखाई पड़ता है। २. फोटो लेने के लिये लेंस द्वारा उस वस्तु की छाया को, जिसका छायाचित्र लेना है, नियत स्थान पर स्थित रुप से लाने की क्रिया। क्रि० प्र०—लेना।

फोग पु
संज्ञा, पुं० [देश०] एक प्रकार का क्षुप। एक पौधा। दे० 'फोक (२)'। उ०—(क) करहा नीखुँ जउ, चरइ, कटालउ नइ फोग। नागर बेलि किहाँ लहइ, थारा थोबड़ जोग।— ढोला०, दु०, ४२८। (ख) फोग केर काचर फली, पापड़ गेघर पात।—बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० ६७।

फोगट पु
वि० [हिं० फोकट] दे० 'फोकट'। उ०—घड़ियक करे प्रभु दिस घुँस लिखमण दिस धरे। फोगट दुहुँ ओडा पेर चक्री जिम फिरे।—रघु० रु०, पृ० १२८।

फोट
संज्ञा पुं० [सं० स्फोट] दे० 'स्फोट'।

फोटक
वि० [हिं०] दे० 'फोकट'।

फोटा †
संज्ञा पुं० [?] टीका। बिंदी।

फोटो
संज्ञा पुं० [अं० फोटो] फोटोग्राफी के यंत्र द्वारा उतारा हुआ चित्र। छायाचित्र। प्रतिबिंब। क्रि० प्र०—उतारना।—खींचना। मुहा०—फोटो लेना = फोटोग्राफो के यंत्र द्वारा किसी का फोटो या छायाचित्र खींचना।

फोटोग्राफ
संज्ञा पुं० [अं० फोटोग्राफ़] फोटो। छायाचित्र। दे० 'फोटो'।

फोटोग्राफर
संज्ञा पु० [अं० फोटोग्राफर] फोटोग्राफी का काम करनेवाला।

फोटोग्राफी
संज्ञा स्त्री० [अं० फोटोग्राफी़] प्रकाश की किरनों द्वारा रासायनिक पदार्थों में उत्पन्न कुछ परिवर्तनों से सहारे वस्तुओं की आकृति या प्रतिकृति उतारने की क्रिया। प्रकाश की सहायता से चित्र उतारने की कला या युक्ति। विशेष—यह काम संदुक के आकार के एक यंत्र के सहारे से किया जाता है जिसे 'केमरा' कहते हैं। इसके आगे की ओर बीच में गोल लंबा चोंगा सा निकला रहता है जिसमें एक गोल उन्नतोदर शीशा लगा रहता है जिसे लेंस कहते हैं। दुसरी ओर एक शीशा और एक किवाड़ होता है जो खटके से खुलना और बंद होता है। केमरे के बीच का बाग माथी की तरह होता है जो यथेच्छ घटाया और बढ़ाया जा सकता है। लेंस के सामने चोंगे के बंद करने का ढक्कन होता है। केमरे के भीतर अँधेरा रहता है औऱ उसमें सिवाय आगे के लेंस की ओर से और किसी ओर से प्रकाश आने का मार्ग नहीं होता है। जिसे वस्तु की प्रतिकृति लेनी होती है वह सामने ऐसे स्थान पर होती है जहाँ उसपर सूर्य का प्रकाश अच्छे प्रकार पड़ता हो। उसके सामने कुछ दुर पर केमरे का मुँह उसकी ओर करके रखते हैं। पिर लेंस का ढक्कन खोलकर चित्र लेनेवाला दुसरी ओर के द्वार को खोलकर सिर पर काला कप़ड़ा (जिसमें कहीं से प्रकाश न आवे) डालकर देखता है कि उस वस्तु की प्रतिकृति ठीक दिखाई देती है कि नहीं। इसे फोकस लेना कहते हैं। इसके बाद लेंस के सामने के ढक्कन को फिर बंद कर देते हैं और दुसरी ओर लकड़ी के बंद चौकठे में रखे प्लेट को, जिसमें रासयानिक पदार्थ लगे रहते हैं, बड़ी सावधानी से, जिसमें प्रकाश उसे स्पर्श न करने पाए लगा देते हैं, फिर लेंस के मुँह को थोड़ी देर के लिये खोल देते हैं जिसमें प्लेट पर उस पदार्थ की छाया अंकित हो जाय। ढक्कन फिर बद कर दिया जाता है और अंकित प्लेट बड़ी सावधानी से बंद चौखटे में बंद करके रख दिया जाता है। उस प्लेट को अँधेरी कोठरी में ले जाकर लाला लालटेन के प्रकाश में रासयनिक मिश्रणों में कई बार डुबाते हैं और अंत में फिटकरी के पानी में डालकर ठंढे पानी की धार उसपर गिराते हैं। इस क्रिया से प्लेट काले रंग का हो जाता है और उसपर पदार्थ अंकित दिखाई पड़ने लगता है, इसे निगेटिव कहते हैं। इसी निगेटिव पर रासायनिक पदार्थ लगे हुए कागज के टुकड़ों को अँधेरी कोठरी के भीतर सटाकर प्रकाश दिखाते ओर रासायनिक मिश्रणों में धोते हैं। इस प्रकार कागज पर प्रतिकृति अंकित हो जाती है। इसी को फोटो कहते हैं। प्रकाश के प्रभाव से वस्तुओं के रंगों में परिवर्तन होता हैं।इस बात का कुछ कुछ ज्ञान लोगों को पहले से था। चमड़ा सिझाते समय सूर्य का प्रकाश पाकर चमड़े का रंग बदलता हुआ बहुत से लोग देखते थे। सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इटली के एक मनुष्य को, जिसका नाम पोर्टी था, वृक्ष के सघन पत्तों में से होकर सूर्य की किरणों का प्रकाश छनते देखकर उत्सकुता हुई। उसने अपने घर की कीठरी की दावार में एक छोटा सा छेद किया। फिर बाहर की ओर दीपक जलाकर दुसरी ओर एक पदार्थ टागकर परीक्षा करने लगा। दीपशिखा उसे पर्दे पर उलटी लटकी दिखाई पड़ी। वह इस प्रकार दुसरे पदार्थों की प्रतिकृतियाँ भी पर्दें पर लाने का यत्न करने लगा। सुबीते के लिये उसने एक नतोदर शीशा उस छेद में लगा दिया। उसी समय फ्रांस देश के एक और वैज्ञानिक ने परीक्षा करके नाइट्रेट अफ सिलवर नामक रासायनिक मिश्रण बनाया जो यद्यपि सफेद होता है तथापि सूर्य की किरन पड़ते ही धीरे धीरे काला होने लगता है। सन १७२० में स्विट्जरलैंड के एक विद्वान् चाल्स ने अँधेरी कोठरी में नाइट्रेट आफ सिलवर के सहारे से चित्र बनाने की चेष्टा की। चित्र तो खिंच गया पर स्थायी न हो सका। बहुत से वैज्ञानिक चित्र को स्थायी करने की चेष्टा करते रहे। अंत को सौ बरस पीछे, एमन्योपस नामक एक वैज्ञानिक की सहायता से डगर साहेब ने पारे के रासायनिक मिश्रण द्वारा चित्र को स्थायी करने में सफलता प्राप्त की। डगर ने चित्र को पहले 'पोटास ब्रोमाइट में डुबा डुबाकर देखा पर अंत मे उसे 'हाइपो सल्फाइट सोडा' द्वारा सफलता हुई। इसी समय एक अंग्रेज ने गैलिक एसिड और नाइट्रेट आफ सिलवर की सहायता से कागज पर चित्र छापने की विधि निकाली। धीरे धीरे यह विद्या उन्नति करती, गई और सन् १८५० में प्लेट पर चित्र लिए जाने लगे। १८७२ में डा० मैडाक्ष ने जेलेटीन की सहायता से प्लेट बनाने की प्रथा जारी की जो उत्तरोत्तर उन्नत होकर अबतक प्रचलित है। अब आर्द्र प्लेट का बहुत कम व्यवहार होता है, प्रायः सब जगह शुष्क प्लेट काम में लाया जाता है।

फोड़ना
क्रि० स० [सं० स्फोटन, प्रा० फोडन] १. खरी या करारी वस्तुओं को दबाब या आघात द्वारा तोड़ना। खरी वस्तुओं को खंड खंड करना। दरकाना। भग्न करना। विदीर्ण करना। जैसे, (क) घड़ा फोड़ना, चने फोड़ना, बरतन फोड़ना, चिमनी फोड़ना, पत्थर फोड़ना। (ख) अकेला चना माड़ नहीं फोड़ सकता। संयो० क्रि०—डालना।—देना। यौ०—तोड़ना फोड़ना। मुहा०—उँगलियाँ फोड़ना = उँगलियों की खींच या मोड़कर उनके जोड़ो को खटखट बुलाना। उँगलियाँ चटकाना। विशेष—इस क्रिया या प्रयोग खरी या करारी वस्तुओं के लिये होता है, चमड़ें लकड़ी आधि चीमड़ वस्तुओं के लिये नहीं। २. ऐसी वस्तुओं को आघात या दबाव से विदीर्ण करना जिनके भीतर या तो पोला हो अथवा मुलायम या पतली चीज भरी हो। जैसे, कटहल्, फोड़ना, फोड़ा फोड़ना, सिर फोड़ना। उ०—सुर रहै रस अधिक कहे नहिं गुलर को सो फल फोरे।—सुर (शब्द०)। मुहा०—आँख फोड़ना = आँख नष्ट करना। आँख को ऐसा कर डालना कि उससे दिखाई न दे। ३. केवल आघात या दबाब से भेदन करना। धक्के से दरार डालकर उस पार निकल जाना। जैसे, —(क) पानी बाँध फोड़कर निकल गया। (ख) गोली दीवार फोड़कर निकल गई। उ०—(क) पाहन फोरि गंग इक निकली चहुँ दिसि पानी पानी। तेहि पानी दुइ परबत बुड़े़ दरिया लहर समानी—कबीर (शब्द०)। (ख) ब्रह्मरंध्र फोरि जीव यों मिल्यो बिलोकि जाय। गेहु चुरि ज्यों चकोर चंद्र में मिल्यो उड़ाय।—केशव (शब्द०)। विशेष—किसी धारदार वस्तु (तलवा, तीर भाला) के चुभ या धँसकर उस पार होने को फोड़ना नहीं कहेंगे। ४. शरीर में ऐसा बिकार या दोष उत्पन्न करना जिससे स्थान स्थान पर घाव या फोड़े हो जायँ। जैसे,—पारा कभी मत खाना, शरीर फोड़ देगा। ५. जुड़ी हुई वस्तु के रुप में निकालना। अवयव, जाड़ या वृदिध के रुप में प्रकट करना। अंकुर, कनेखे, शाखा आदि निकालना। जैसे, पौधे का कनखे या शाखा फोड़ना। ६. शाखा के रुप में अलग होकर किसी सीध में जाना। जैसे,—नदी कई शाखाएँ फोड़कर समुद्र में मिली है। ७. पक्ष छुड़ाना। एक पक्ष से अलग करके दुसरे पक्ष में कर लेना। जैसे,—उसने हमारे दो गवाह फोड़ लिए। ८. साथ छुड़ाना। संग में न रहने देना। जैसे,—हम लोग साथ ही साथ चले थे तुम इन्हें कहाँ फोड़कर ले चले ? ९. भेदभाव उत्पन्न करना। मैत्री या मेल जोल से अलग कर देना। फुट डालकर अलग करना। १०. गुप्त बात सहसा प्रकट कर देना। एकबारगी भेद खोलना। जैसे, बात फोड़ना, भंडा फोड़ना।

फोड़ा
संज्ञा पु० [सं० स्फोटक वा पिडिका, प्रा० फोड़] [स्त्री० फोड़िया] एक प्रकार का शोथ या उभार जो शरीर में कहीं पर कोई दोष संचित होने से उत्पन्न होता है तथा जिसमें जलन और पीड़ा होती है तथा रक्त सड़कर पौब के रुप में हो जाता है। व्रण। आफसे आप होनेवाला उभरा हुआ घाव। विशेष—सुश्रुत के अनुसार व्रण या घाव दो प्रकार के होते हैं—शारीर और आंगतुक। चरक संहिता में भी निज और आगंतुक ये दो भेद कहे गए है। शरीर वा निज व्रण वह घाव है जो शरीर में आपसे आप भीतरी दोष के कारण उत्पन्न होता है। इसी को फोड़ा कहते है। वैद्यक के अनुसार वात, पित्त, कफ या सन्निपात के दोष से ही शरीर के किसी स्थान पर शारीर व्रण या फोड़ा होता है। दोषों के अनुसार व्रण के भी वातज, पित्तज, कफज, तीन भेद किए गए हैं। वातज व्रण कड़ा या खुरखुरा, कृष्णवर्ण, अल्पस्रावयुक्त होता है और उसमें सुई चुभने की पीड़ा होती है। पित्तजव्रण बहुत दुर्गंधयुक्त होता है औऱ उसमें दाह, प्यास और पसीने के साथ ज्वर भी होता है। कफज व्रण पीलापन लिए गीला, चिपचिपा और कम पीड़ावाला होता है।

फोड़िया
संज्ञा पुं० [हिं० फोड़ा, वा सं० पीडिका] छोटा फोड़ा। फुनसी।

फोत †
वि० [अ० फौत] खत्म। समाप्त। उ०—इन लोगों की दिल्लगी में मेरा मतलब फोत हुआ जाता है।—श्रीनिवास ग्रं०, पृ० ४७।

फोता
संज्ञा पुं० [फा० फोतह्] १. पटुका। कमरबंद। २. पगड़ी। सिरबद। ३. वह रुपया जो प्रजा उस भूमि या वित्त के लिये जो उसके अधिकार या जोत में हो राजा वा जिमींदार को दे। पोत। उ०—साँचो सो लिखवार कहावै। काया ग्राम मसाहत करिकै जमा बाँधि ठहरावै। मन्मथ करे कैद अपनी में जान जहतिया लावै। माँड़ि माँड़ि खलिहान क्रोध को फोता भजन भरावै।—सुर (शब्द०)। ४. थैली। कोष। थैला। ५. अंडकोश।

फोतेदार
संज्ञा पुं० [फा० फोतह्दार] १. खजांची। कोषाध्यक्ष। २. तहबीलदार। रोकड़िया।

फोन
संज्ञा पुं० [अं० टेलिफोन का संक्षिप्त रुप] दे० 'टेलिफोन'। उ०—रेड़ियो, तार औ फोन, वाष्प, जल, वायुयान। मिट गया दिशावधि का जिनसे व्यवधान मान।—ग्राम्या, पृ० ८८।

फोनोग्राफ
संज्ञा पुं० [अ० फोनाग्राफ] एक यंत्र जिसमें पूव में गाए हुए राग, कही हुई बातें ओर बजाए हुए बाजों के स्वर आदि चुड़ियों में भरे रहते हैं औऱ ज्यों के त्यों सुनाई पड़ते हैं। विशेष—यह संदुक के आकार का होता है। इसके भीतर चक्कर लगे रहते हैं जो चाबी देने से आपसे आप घुमने लगते है इसके बीच में एख खुँटी या धुरी होती है जिसकी एक नोक संदुक के ऊपर बीच में निकली रहती है। यत्र के दुसरे ओर किनारे पर एक परदा होता है जिसके छोर पर सुई लगी रहती है। इसी परदे पर बजाते समय एक चोंगा लगा दिया जाता है। चुड़ियाँ जिनपर गीत, राग या कही हुई बातें अंकित रहती हैं रोटी के आकार की होती है। उनपर मध्य से आरंभ करके परिधि तक गई महीन रेखाओं की कुंडलिया होती है। इन चुड़ियों में आवाज इस प्रकार अंकित की जाती या भरी जाती है—एक यंत्र होता है जिसके एक सिरे पर चोंगा और दुसरे सिरे पर सुई लगी रहती है। गाने, बजाने या बोलनेवाला चोंगे की ओर बैठकर गाता बजाता, या बोलता है। उस शब्द से वायु में लहरियाँ उत्पन्न होकर चोंगे के दुसरे सिरे पर की सुई को संचालित करती हैं। इसी समय चुड़ी भी घुमाई जाती है और उसपर बोले हुए शब्द, गाए हुए राग या बाजे की ध्वनि के कंपनचिह्न सुई द्वारा अंकित होते जाते हैं। जब फिर उसी प्रकार का शब्द सुनना होता है तब वही चुड़ी फोनग्राफ में संदुक के बीच में निकली हुई कील में लगा दी जाती है और किनारे के परदे में लगी सुई चुड़ी की पहली या आरंभ की रेखा पर लगा दी जाती है। कुंजी देने से भीतर के चक्कर घुमने लगते हैं जिससे चुड़ी कील के सहारे नाचती है और सुई लकीरों पर घुमकर चोंगे में उसी प्रकार के वायुतरंग उत्पन्न करती है जिस प्रकार के चुड़ी में अकित हुए थे। ये ही वायुतरंग उस कल में लगे हुए पुर्जों को हिलाते हैं जिससे चोंगे में से होकर चुड़ी में भरे हुए शब्दों या स्वरों की प्रति- ध्वनि सुनाई देती है। यह ध्वनि कुछ धीमी होती है और धातु की झनझनाहट और सुई की खरखराहट के कारण कुछ दुषित हो जाती है। फिर भी सुननेवाले को पूर्व के शब्दों और स्वरों का बोध पूरा पूरा होता है। फोनोग्राफ में स्वरों का उच्चारण व्यंजनों की अपेक्षा अधिक स्पष्ट होता है और व्यंजनों में 'स' और 'ज' का उच्चारण इतना अस्फष्ट होता है कि उनमें कम भेद जान पड़ता है। शेष व्यंजन कुछ स्पष्ट होने पर भी अपना बोध कराने के लिये पर्याप्त होते हैं। इस यत्र के आविष्कारक अमेरिका के प्रसिद्ध वैज्ञानिक ऐडिसन साहब थे।

फोनोटोग्राफ
संज्ञा पुं० [अं० फो़नोटोग्राफ] एक यंत्र जिसके द्वारा बोलनेवाले के शब्दों से उत्पन्न वायुतरंगों का अंकन होता है। विशेष—यह यंत्र एक पीपे के आकार का होता है। पीपे का एक मुँह तो बिलकुल खुला रहता है और दुसरी ओर कुछ यत्र लगे रहते हैं। यंत्र में एक पतला परदा होता है जिसपर एक पतली सूई लगी रहती है। इसी सूई से शब्द द्वारा उत्पन्न वायुतरंगें चुड़ी पर अंकित होती हैं। वि० दे० 'फोनाग्राफ'।

फोपल
वि० [हिं० पोपला] जिस वस्तु का भीतरी हिस्सा बिलकुल खाली हो। जैसे, फोपला बाँस। उ०—केवल फोपल नाम बज्यो कछु बासहु नाहीं।—दीन० ग्रं०, पृ० ४९।

फोया
संज्ञा पुं० [सं० फाल (=रुई का)] फोह। फाहा। रुई का गाले का टुकड़ा। रुई का एक लच्छा।

फोरना पु † (१)
क्रि० स० [हिं०] दे० 'फोड़ना'। विशेष—इस शब्द के अन्य अर्थ और उदाहरण के लिये देखिए 'फोड़ना' शब्द।

फोरना पु (२)
क्रि० स० [सं० स्फुरण ?] हिलाना डुलाना। मथना। उ०—सुर असुर मिलि फोरय। जै चवत चंद कविंदर्य।—पृ० रा०, २।१०९।

फोरमैन
संज्ञा पुं० [अ० फो़रमैन] कारखानों में कारीगरों और काम करनेवालों का सरदार वा जमादार। जैसे, प्रेस का फोरमैन, लोहारखाने का फोरमैन।

फोर्ट
संज्ञा पुं० [अं० फो़र्ट] किला। दुर्ग।

फोलियो
संज्ञा पुं० [सं० फो़लियो] कागज के तख्ते का आधा भाग।

फोहरिया †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'फुहार'। उ०—हमरे देसवा बादर उमड़ै, नान्हीं परै फोहरिया।—धरम० श०, पृ० ३५।

फोहा
संज्ञा पुं० [सं० फाल (=रुई का)] रुई के गाले का छोटा टुकड़ा। फाहा।

फोहार पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० फुहार] दे० 'फुहार'। उ०—जहँ फुलन की लागी फोहार। जहं अनहद बाजै बहु प्रकार।— भक्ति प०, पृ० ४११।

फोहारा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'फुहारा', 'फुहार'।

फौँदा पु
संज्ञा पुं० [हिं० फुंदा] फुँदना। उ०—फूलन के आभूषण, फूलन के बसन बिराजत, फूलन के फौदा, फूलन के उरहार।— नंद०, ग्रं०, पृ० ३८०।

फौआरा †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'फुहारा'।

फौक पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० फोक] दे० 'फोंक' (१)। उ०—नख फोंके मनि गन कलित ललित आँगुरी तीर। तो कर सोभा के सदन मानौ मदन तुनीर।—स० सप्तक, पृ० ३६५।

फौकना ‡
क्रि० अ० [अनु०] डींग मारना। बढ़ बढ़कर बातें करना।

फौज
संज्ञा स्त्री० [अ० फौ़ज] १. झुड। जत्था। २. सना। लशकर। उ०—(क) सार बहै लोहा झरै टुटै जिरह जँजीर। अविनाशी की फौज में माडी दास कबीर।—(शब्द०)। (ख) सुनि बल मोहन बैठि रहसि में कीनो कछु विचार। मागध मगध देश ते आयो साजे फौज अपार।—सुर (शब्द०)। (ग) गौं मारिहउँ भुप दौउ भाई। अस कहि सनमुख फौज रेंगाई।—तुलसी (शब्द०)।

फौजदार
संज्ञा पु ० [अ० फौ़ज + फा़० दार (प्रत्य०)] १. सेना का प्रधान। सेनापति। २. सेना का छोटा अफसर।

फौजदारी
संज्ञा स्त्री० [अ० फौ़ज + फा़० दारी (प्रत्य०)] १. लड़ाई झगड़ा। मारपीट। क्रि० प्र०—करना।—होना। २. वह अदालत या न्यायालय जहाँ ऐसे मुकदमों का निर्णय होता है जिनमें अपराधो को दड मिलता है। कंटकशोधन दंडनियम। विशेष—कौटिल्य के अर्थशास्त्र में न्यायशासन के दो विभाग दिखाई पड़ते हैं—धर्मस्थीय औऱ कंटकशोधन। कंटकशोधन अधिकरण में आजकल के फौजदारी के मामलों का विवरण है और धर्मस्थीय में दीवानी के। स्मृतियों में दंड और व्यवहार ये दो शब्द मिलते हैं।

फौजी
वि० [अ० फौज + फा० ई(प्रत्य०)] फौज संबंधी। सैनिक। जैसे, फौजी आदमी, फौजी कानुन।

फौत
वि० [अ० फ़ौंत] नष्ट। मृत। गत। मुहा०—मतलब फौत होना = कार्य नष्ट होना।

फौती (१)
वि० [अ० फौ़त] १. मृत्यु संबंधी। मृत्यु का। जैसे,—फौ़ती रजिष्ठर। २. मरा हुआ। मृत।

फौती (२)
संज्ञा स्त्री० १. मरने की क्रिया। मृत्यु। २. किसी के मरने की सूचना जो म्युनिसिपैल्टौ आदि की चौकी पर लिखाई जाती है।

फौतीनामा
संज्ञा पुं० [अ० फौ़त + फा़० नामह्] १. मृत व्यक्तियों के नाम और पते की सूची जो म्युनिसिपैल्टियों आदि की चौकी पर तैयार की जाती है और म्युनिसिपैल्टी के प्रधान कार्यालय में भेजी जाती है। २. मृत सिपाही की मृत्यु की वह सूचना जो सेनाविभाग की ओर से उसके घर के लोगों के पास भेजी जाती है।

फौद पु ‡
संज्ञा स्त्री० [अ० फौ़ज] दे० फौज। उ०—(क) निस्सरिअ फौद अणवरत, कत तत परिगणना पारके।—कीर्ति०, पृ० ८८। (ख) असी हजार फौद चलि आई। गढ़ि ढहाए सभ गर्द मिलाई।—संत० दरिया, पृ० ११।

फौरन
क्रि० वि० [अ० फौ़रन्] तुरंत। तत्काल। चटपट।

फौरी
वि० [अ० फौ़री] तात्कालिक। जल्दी का [को०]।

फौलाद
संज्ञा पुं० [फा़० पोलाद] एक प्रकार का कड़ा और अच्छा लोहा जिसके हथियार बनाए जाते हैं। खेड़ी।

फौलादी (१)
वि० [फा़० फौलादी] १. फौलाद का बना हुआ। जैसे, फोलादी जिरह। २. दृढ़। कठिन। मजबुत। जैसे, फौलादी बदन।

फौलादी (२)
संज्ञा स्त्री० बल्लम की छड़। भाले की लकड़ी।

फौवारा
संज्ञा पुं० [अ० फौआरह्] दे० 'फुहारा'।

फ्याहुर
संज्ञा पुं० [सं० फेरु] गीदड़। श्रृगाल।

फ्यूज
संज्ञा पुं० [अं० फ्यु़ज] प्रचंड ताप से गल या पिघल जाना।

फ्युडेटरी चीफ
संज्ञा पुं० [अ० फ्युडेटरी चीफ़] वह राजा जो किसी बड़े राजा या राज्य के अधीन हो और उसे कर देता हो। करद राजा। सामंत राजा। मांडलिक।

फ्युडेटरी स्टेट
संज्ञा पुं० [अ० फ्युढ़ेटरी स्टेट] वह छोटा राज्य जो किसी बड़े राज्य के अधीन हो और उसे कर देता हो। करद राज्य।

फ्रंट
संज्ञा पुं० [अ० फ्रंट] युद्धक्षेत्र। लड़ाई का मैदान। मोर्चा।

फ्रांक
संज्ञा पुं० [अं० फ्रांक] फ्रांस का एख चाँदी का सिक्का। जो प्रायः अँगरेजी। ९। पेनी मुल्य का होता है। एक पेनी प्रायः तीन पैसों के बराबर मूल्य की होती है।

फ्रांटियर
संज्ञा पुं० [अं० फ्रांटियर] सरहद। सीमांत। जैसे,— फ्रांटियर प्राविन्स।

फ्रांस
संज्ञा पुं० [अं० फ्रांस] योरप का एक प्रसिद्ध देश जो स्पेन के उत्तर में है।

फ्रांसीसी
वि० [अं० फ्रांस] १. फ्रांस देश का। फ्रांस देश में उत्पन्न। २. फ्रांस देश में रहनेवाला। फ्रांस देशवासी।

फ्राक
संज्ञा पुं० [अं० फ्रा़क] लंबी आस्तीन का ढीला ढाला कुरता जिसे प्रायः बच्चों को पहनाते हैं। यौ०—गंजी फ्राक = बनियान।

फ्रिस्केट
संज्ञा स्त्री० [अं० फ्रिस्केट] लोहे की चददर का बना हुआ चौखटा जो हाथ से चलाए जानेवाले प्रेस के डाले में जड़ा रहता है।विशेष—छापने के समय कागज के तख्ते को डाले पर रखकर इसी चौखटे से ऊपर से बंद कर देते हैं, फिर डाले को गिराकर प्रेस में दबाते हैं। कागज के तख्ते पर इन जगहों पर जो फ्रिस्केट के छेद से खुली रहती है मैटर छप जाता है और शेष अंश ढँके रहने से सादा रहता है।

फ्री
वि० [अं० फ्री] १. स्वतत्र। जिसपर किसी की दाब न हो। २. कर या महसुल से मुक्त। मुक्त। जैसे, स्कुल, फ्री पढ़ना।

फ्री ट्रेड
संज्ञा पुं० [अं० फ्री़ट्रेड] वह वाणिज्य जिसमें माल के आने जाने पर किसी प्रकार का कर या महसुल न लिया जाय।

फ्रीमेसन
संज्ञा पुं० [अं० फ्रामेसन] फ्रीमेसनरी नाम के गुप्त संघों का सभ्य।

फ्रीमेसनरी
संज्ञा स्त्री० [अ० फ्रीमेसनरी] एक प्रकार का गुप्त संघ या सभा जिसकी शाखा प्रशाखाएँ युरप, अमेरिका तथा संसार के उन सब स्थानों में हैं जहाँ युरोपिन हैं। यह भारत में भी है। विशेष—इस सभा का उद्देश्य समाज की रक्षा करनेवाले सत्य, दान, औदार्य, भ्रातृभाव आदि का प्रचार कहा जाता है। फ्रिमेसनों की सभाएँ गुप्त हुआ करती है और उनके बीच कुछ ऐसे संकेत होते हैं जिनसे वे अपने संघ के अनुयायियों को पहचान लेते हैं। ये संकेत, कोनिया, परकार, आदि राजगीरों के कुछ औजार के चिह्न कहे जाते हैं। प्राचीन काल में युरोप में उन कारीगरों या राजगीरों की इसी नाम की एक संस्था थी जो बड़े बड़े गिरजे बनाया करते थे। इन्हीं संकेतों के कारणः जो असली कारीगर होते थे वे ही भरती हो पाते थे। इसी आदर्श पर सन् १७१७ ई० में फ्रोमेसन संस्थाएँ स्थापित हुई जिनका उद्देश्य अधिक व्यापक रखा गया।

फ्रेंच (१)
वि० [अं० फ्रेंच] फ्रांस देश का।

फ्रेंच (२)
संज्ञा स्त्री० फ्रांस की भाषा।

फ्रेंच (३)
संज्ञा पुं० फ्रांस का निवासी।

फ्रेंच पेपर
संज्ञा पुं० [अं० फ्रेच पेपर] एक प्रकार का हलका पतला और चिकना कागज।

फ्रेम
संज्ञा पुं० [अं० फ्रे़म] चौकठा।

फ्लाईब्वाय
संज्ञा पुं० [अं० फ्लाईब्वाय] प्रेस में वह लड़का जो प्रेस पर से छपे हुए कागज जल्दी से झपटकर उतारता है और उनपर आँख दौड़ाकर छपाई की त्रुटि की सूचना प्रेसमैन को देता है।

फ्लूट
संज्ञा पुं० [अं० प़्लूट] बंसी की तरह का एक अँगरेजी बाजा जो फुँककर बजाया जाता है।

फ्लैग
संज्ञा पुं० [अं० प़्लैग] झंडा। पताका।

प़्लैट
संज्ञा पुं० [अं० प़्लैट] किसी बड़ी इमारत का एक भाग।