विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/गा

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गांग (१)
वि० [सं० गाङ्न] गंगा संबंधी । गंगा का ।

गांग (२)
संज्ञा पुं० १. भीष्म । २. कार्तिकेय । ३. सोना । ४. धतूरा । ५. मेघनिःसृत जल । वर्षा का पानी । ६. गंगा या नदी का किनारा । ७. हेलसा मछली । ८. लंबा और बड़ा तालाब । सागर ।

गांगट
संज्ञा पुं० [सं० गाङ्गट] १. केकड़ा । २. एक प्रकार की मछली [को०] ।

गांगटक, गांगटेय
संज्ञा पुं० [सं० गाङ्गटक, गाङ्गटेय] दे० 'गांगट' ।

गांगायनि
संज्ञा पुं० [सं० गाङ्गायनि] १. भीष्म । २. कार्तिकेय । ३. एक प्रवरकार ऋषि ।

गांगिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० गाङ्ग] गंगा की एक धारा जो बंगाल में गौड़ नगर के पास गंगा से मिलती है ।

गांगी
संज्ञा स्त्री० [सं० गाङ्गी] दुर्गा [को०] ।

गांगेय (१)
वि० [सं० गाङ्गेय] १. गंगा संबंधी । गंगा का । २. गंगा में स्थित । गंगातट पर स्थित ।

गांगेय (२)
संज्ञा पुं० १. भीष्म । २. कार्तिकेय । ३. हेलसा मछली । ४. कसेरू । भद्रमोथा । ५. सोना । ६. धतूरा । ७. दक्षिण का एक राजवंश । विशेष—यह पहले कोल्हापुर के पास गंगवाड़ी नामक स्थान में राज्य करता था । प्रगल्भ के पुत्र कोलाहल ने कोलाहलपुर या कोल्हापुर बसाया था । पीछे बहुत पीढ़ियों के बाद कामा- र्णव नामक राजा ने चालुक्य राजा बालादित्य से कलिंग राज्य जीता । इस वंश का राज्य ११ वीं शताब्दी तक विद्यमान था । इसी वंश के राजा अनंग भीमदेव ने जगन्नाथ का प्रसिद्ध मंदिर बनवाया था ।

गांगेयी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० गाङ्गेयी] हेलसा नाम की मछली ।

गांगेरुक
संज्ञा पुं० [सं० गाङ्गेरुक] गोरख इमली का बीज ।

गांगेरूका
संज्ञा स्त्री० [सं०गाङ्गेरुका] १. नागवल्ली । २. एक प्रकार का क्षुद्र अन्न [को०] । पर्या०—गांगेरुकी । नागबला । झषा । हस्वगवेधुका । खरवल्ल- रिका । विश्ववेदा । गोरक्षतंडुली ।

गांगेष्ठी
संज्ञा स्त्री० [सं० गाङ्गेष्ठी] कटशर्करा नाम की एक प्रकार की लता [को०] ।

गांग्य
वि० [सं० गङ्गय] गंगा संबंधी ।

गांजिकाय
संज्ञा पुं० [सं० गाञ्जिकाय] बत्तख पक्षी [को०] ।

गांडाली
संज्ञा स्त्री० [सं० गाण्डाली] एक प्रकार का तृण जिसे गांडी भी कहते है ।

गांडिव
संज्ञा पुं० [सं० गाणिडव] दे० 'गांडीव' [को०] ।

गांडी
संज्ञा पुं० [सं० गाण्डी] गैंडा । खड्ग । गंडक [को०] । यौ०—गांडीमय = दे० 'गांडीव' ।

गांडीर
वि० [सं० गाण्डीर] गंडीर संबंधी । गंडीर का [को०] ।

गांडीव
संज्ञा पुं० [सं० गाणडीव] अर्जुन के धनुष का नाम । विशेष—महाभारत में लिखा है कि पहले इसे ब्रह्मा ने बनाकर सोम को दिया था । सोम ने वरूण को दिया; और अग्नि के प्रार्थना करने पर वरुण ने अर्जुन को दिया । यौ०—गांडीवधन्वा । गांडीवधर । गांडीवी = अर्जुन ।

गांडीवी
संज्ञा पुं० [सं० गाण्डीविन्] १. अर्जुन । २. अर्जुन वृक्ष ।

गांडू †
वि० [हिं० गाँड़] दे० 'गाँडू' ।

गांतु
संज्ञा पुं० [सं० गान्तु] १. चलनेवाला । पथिक । २. गायक [को०] ।

गांत्रो
संज्ञा स्त्री० [सं० गान्त्री] बैलगाड़ी । गंत्री रथ [को०] ।

गांदिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० गान्दिनी] १. अक्रूर की माता जो काशी- राज की कन्या तथा श्वफल्क की भार्या थी । २. गंगा । यौ०—गांदीनीसुत = (१) भीष्म पितामह । (२) कार्तिकेय । (३) अक्रूर ।

गांदी
संज्ञा स्त्री० [सं० गान्दी] दे० 'गांदिनी' ।

गांधर्व (१)
वि० [सं० गान्धर्व] [वि० गांधर्वी] १. गंधर्व संबंधी । २. गंधर्व देशोत्पन्न । ३. गंधर्व जाति का ।

गांधर्व (२)
संज्ञा पुं० १. सामवेद का उपवेद जिसमें सामगान के स्वर, ताल आदि का वर्णन है । गंधर्व विद्या । गंधर्व विद्या । गंधर्व वेद । २. गान विद्या । संगीत शास्त्र । ३. वह मंत्र जिसका देवता गंधर्व हो । ४. भारतवर्ष का एक भाग या उपद्वीप । विशेष—इसे गंधर्व द्वीप भी कहते थे । यहाँ के लोग गाने बजाने में बड़े चतुर होते थे । इसमें कन्या और वर परस्पर मिलकर विवाह करते थे । स्त्रियाँ रूपवती होती थीं । इस देश के घोड़े अच्छे होते थे । यह देश हिमालय के प्रांत भाग में माना जाता था । ५. आठ प्रकार के विवाहों में से एक । विशेष—इसमें वर और कन्या परस्पर अपनी इच्छा से अनुराग- पूर्वक मिलकर पतिपत्नीवत् रहते हैं । मनु के अनुसार क्षत्रियों के लिये गांधर्व विवाह विहित है । ६. घोड़ा । अश्व । ७. गंधर्व ।

गांधर्ववेद
संज्ञा पुं० [सं० गान्धर्ववेद] १. सामवेद का उपवेद । वि० दे० 'गांधर्व'—१ । २. संगीत शास्त्र ।

गांधर्विक
वि० [सं० गान्धार्विक] संगीत शास्त्र में कुशल । गांधर्व वेद जाननेवाला ।

गांधर्वी
संज्ञा स्त्री० [सं० गान्धर्वी] १. दुर्गा । २. वाणी । गिरा । सरस्वती (को०) ।

गांधार
संज्ञा पुं० [सं० गान्धार] १. सिंधु नद के पश्चिम का देश । विशेष—यह पेशावर से लेकर कंधार तक माना जाता था । इस देश की सीमा भिन्न भिन्न समयों में बदलती रही है । हुयनच्वांग के समय में इस देश के अंतर्गत सिंधु नद से लेकर जलालाबाद तक और स्वात से कालाबाग तक का प्रदेश था । ऋग्वेद में यहाँ अच्छी भेड़ों का होना लिखा है । गांधारी इस देश की कन्या थी । २. [स्त्री० गान्धारी] गांधार देश का रहनेवाला व्यक्ति । ३. गांधार देश का राजा या राजकुमार । ४. संगीत में सात स्वरों में तीसरा स्वर । विशेष—इसकी दो श्रृतियाँ है—रौद्री और क्रोधा । इसकी जाति वैश्य, वर्ण, सुनहला, देवता, सरस्वती, ऋषि चंद्रमा, छंद त्रिष्टुभ, वार मगल; ऋतु वसंत और स्थान दोनों हाथ हैं । इसकी आकृति अग्नि की और संतान हिंडोल राग है । इसका अधिकार शाल्मली द्वीप में है । इसका प्रयोग करुण रस में होता है । नाभि से उठकर कंठ और शीर्ष में लगकर अनेक गंधों को ले जानेवाली वायु से इसकी उत्पत्ति होती है । यह स्वर बकरे की बोली से लिया गया है । इसके दो भेद होते हैं— शुद्ध और कोमल । इस स्वर का ग्रहस्वर बनाने से निम्न- लिखित प्रकार से स्वरग्राम होता है ।—गांधार—स्वर । तीव्र मध्यम—ऋषभ । कोमल धैवत—गांधार । धैवत—मध्यम । निषाद—पंचम । कोमल ऋषभ—धैवत । कोमल गांधार— निषाद । कोमल गांधार को ग्रहस्वर बनाने से स्वरग्राम इस प्रकार होता है—गांधार कोमल—स्वर । मध्यम—ऋषभ । पंचम ।—गांधार । कोमल धैवतमध्यम । कोमल निषाद— पंचम । स्वर—धैवत । ऋषभ—निषाद । ५. संपूर्ण जाति का एक राग । विशेष—य़ह प्रातः काल १ दंड से ५ दंड तक गाया जाता है । हनुमत के मत से यह भैरव राग का पुत्र है और किसी के मत से दीपक राग का पुत्र है । ६. एक संकर राग जो कई रागों और रागिनियों को मिलाकर बनाया जाता है । ७. संगीत के तीन स्वरग्रामों में से एक । विशेष—इसमें नंदा, विविशाखा, सुमुषी, विचित्रा, रोहिणी, सुषा और आलापिनी ये सात मूर्च्छनाएँ हैं और जिसका व्यवहार स्वर्गलोक में नारद द्वारा होता है । इसके अधिष्ठाता देवता शिव कहे गए हैं । ८. गंधरस नामक सुंगध द्रव्य । ९. सिंदूर (को०) ।

गांधार पंचम
संज्ञा पुं० [सं०] एक षा़ड़व राग । विशेष—यह मंगलीक राग है और अदभुत हास्य तथा करुण रस में इसका प्रयोग होता है । इसमें ऋषभ नहीं लगता । म, प, ध, नि, स, ग, म इसका सरगम है । इसमें प्रसन्न मध्यम अलंकार और काकली का संचार होना आवश्यक है । इसे केवल गांधार भी कहते हैं ।

गांधार भैरव
संज्ञा पुं० [सं० गान्धार भैरव] एक राग का नाम । विशेष—यह राग देवगांधार के मेल से बनता है । इसमें सातों स्वर लगते हैं और यह प्रातः काल गाया जाता है । इसका सरगम यह है—ध, नि, स, रि, ग, म, प, ध ।

गांधारि
संज्ञा पुं० [सं० गान्धारिः] गांधार राजकुमार । दुर्योधन का मामा । शकुनि [को०] ।

गांधारो
संज्ञा स्त्री० [सं० गान्धारी] १. गांधार देश की स्त्री या राज कन्या । २. धृतराष्ट्र की पत्नी या दुर्योधन की माता का नाम । विशेष—यह गांधार देश के राजा सुबल की कन्या थी । शिव ने इन्हें सौ पुत्र होने का वर दिया था । धृतराष्ट्र की पत्नी होने पर इन्होंने पति को अंधा देख अपनी आँखों पर भी पट्टी बाँध ली थी । २. मेघ राग की पाँचवीं रागिनी । विशेष—यह संपूर्ण जाति की रागिनी है और दिन के पहले पहर में गाई जाती है । रि, ध, नि, प, म, ग, रि, स इसका सरगम है । कोई कोई इसे हिंडोल राग की रागिनी मानते हैं । कुछ लोगों का मत है कि यह धनाश्री और स्वराष्टक को मिलाकर बनाई गई हैं । कोई इसे सारस्वत और धनाश्री से मिलकर बनी हुई बतलाते हैं । ४. तंत्र के अनुसार एक नाड़ी । ५. जैनों के एक शासन देवता । ६. पार्वती की एक सखी का नाम । ७. जवासा । ८. गाँजा ।

गाँधारेय
संज्ञा पुं० [सं०] दुर्योधन [को०] ।

गांधिक
संज्ञा पुं० [सं० गान्धिक] १. गंधी । २. गाँधी नामक कीड़ा । ३. गंधद्रव्य । ४. लिपिकार । लेखक (को०) ।

गांधी
स्त्री० [सं० गान्धिक] १. हरे रंग का एक छोटा कीड़ा । विशेष—यह वर्षा काल में धान के खेतों में अधिक होता है । इससे धान के पौधों को बड़ी हानि पहुँचाती है । इसमें एक तीव्र दुर्गध होती है । रात को यह चिराग के सामने भी उड़कर पहुँचता है और इसके आते ही खटमल की तरह की एक असह्य दु्र्गंध उठती है । २. एक घास । †३. हींग । ४. किराने की व्यापारी । ५. वैश्यों की एक जातीय उपाधि या अल्ल । ६. महात्मा गांधी । अग्रेजों के शासन से भारत को स्वतंत्रता दिलानेवाला एक प्रमुख नेता । इनका पूरा नाम मोहनदास कर्मचंद गांधी था । ये गुजराती थे । इनका जन्म २ अक्टूबर, १८६९ और निधन ३० जनवरी, १९४८ को एक व्यक्ति द्वारा गोली मारे जाने के कारण हुआ । यौ०—गांधी टोपी = श्वेत खददर की किश्तीनुमा टोपी । गाँधी वाद = गांधी जी के विचारों के आधार पर स्थापित या पोषित मत ।

गांभीर्य
संज्ञा पुं० [सं० गाम्भीर्य] १. गहराई । गंभीरता । २. स्थिरता । अचंचलता । ३. हर्ष, क्रोध, भय आदि मनोवेगों से चंचल न होने का गुण । शांति का भाव । धीरता । ४. किसी विषय की गूढ़ता । गहनता । जटिलता ।

गाँइँ †पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० गाय] दे० 'गाय' । उ०—तब माता ने गाँइँ को दूध दियो तो इत कछूक पियो ।—दे० सौ० बावन०, भा०२, पृ० ४२ ।

गाँइँ †
संज्ञा पुं० [सं० ग्राम, हिं० गाँव] दे० 'गाँव' । उ०—सहर मुलक सब गँवई गाँई ।—घट०, पृ० ३५१ ।

गाँकर
संज्ञा स्त्री० [सं० अङ्कार + कर, पुं० हिं० अंगाकरी, अँगाकरि] १. अंगाकड़ी । बाटी । लिट्टी । २. अरहर की लिट्टी ।

गाँग पु
संज्ञा स्त्री० [सं० गङ्ग] दे० 'गंगा' । उ०—गाँग जउँन जौ लहि जल तौ लहि अम्मर माथ ।—जायसी ग्रं० (गुप्त०), पृ० १५ ।

गाँगट
संज्ञा पुं० [सं० गाङ्गट] केकड़ा ।

गाँगन
संज्ञा स्त्री० [? या देश०] एक प्रकार की फोड़िया ।

गाँछना †
क्रि० स० [सं० गुत्सन] गूँधना । गाँथना । जैसे—माला गाँछना, नारा गाँछना ।

गाँज
संज्ञा पुं० [फा० गंज] १. राशि । ढेर । अंबार । २. डंठल, खर, लकड़ी आदि का वह ढेर जो तले ऊपर रखकर लगाया गया हो । जैसे,—लकड़ी का गाँज, खर का गाँज, पयाल का गाँज इत्यादि ।

गाँजना
क्रि० स० [हिं० गाँज, फा० गंज] १. राशि लगाना । ढेर करना । २. घास, लकड़ी, डंठल आदि को तले ऊपर रखकर ढेर लगाना ।

गाँजा
संज्ञा पुं० [सं० गञ्जा] भाँग की जाति का एक पौधा । विशेष—यह देखने में भाँग से भिन्न नहीं होता, पर भाँग की तरह इसमें फूल नहीं लगते । नैपाल की तराई, बंगाल आदि में यह भाँग के साथ आपसे आप उगता है; पर कहीं कहीं इसकी खेती भी होती है । इसमें बाहर फूल नहीं लगते, पर बीज पड़ते हैं । वनस्पति, शास्त्रविदों का मत है कि भाँग के पौधे के तीन भेद होते है—स्त्री, पुरुष और उभयलिंगी । इसकी खेती करनेवालों का यह भी अनुभव है कि यदि गाँजे के पौधे के पास या खेत में भाँग के पौधे हो, तो गाँजा अच्छा नहीं होता । इसलिये गाँजे के खेत से किसान प्रायः भाँग के पौधे उखाड़कर फेंक देते हैं । गाँजे के पौधे से एक प्रकार का लासा भी निकलता है । यद्यपि नीचे के देशों में यह यह लासा उतना नहीं निकलता तथापि हिमालय पर यह बहुतायत से निकलता है और इसी से चरस बनती है । हिंदुस्तान में गाँजा खाया नहीं जाता; लोग इसमें तमाकू मिलाकर इसे चिलम पर पीते हैं; पर अँगरेजी दवाओं में इसका सत्त काम में लाया जाता हैं । गाँजे की कई जातियाँ है—बालूचर, पहाड़ी, चपटा, गोली, भँगेरा इत्यादि । बालूचर के तैयार होने पर उसे काटकर और पूला बनाकर पैरों से रौंदते हैं । इस प्रकार तले ऊपर रखकर वैद्यक में गाँजे को कडुवा, कसैला, तीता और उष्ण लिखा है और उसे कफनाशकत, ग्राही, पाचक और अग्निवर्धक माना है । यह नशीला और पित्तोत्पादक होता है । इसके रेशे मजबूत होते हैं और सन की तरह सुतली बनाने के काम में आते हैं । नैपाल आदि पहाड़ी देशों में इन रेशों से एक प्रकार का मोटा कपड़ा भी बुनते हैं जिसे भँगरा कहते हैं । पर्या०—गंजा । गंजिका । बज्रदारु । भंगा । भारिता । गजाशन । मत्कुणारि । मातुली । गंजाकिनी । मादिनी । शुक्राशन । जया । विजया । तुरंत—आनंदा । हर्षिणी ।

गाँझी
संज्ञा स्त्री० [देश०] भेड़ । उ०—दादू गाँझी ज्ञान है मंजन है सब लोक । राम दूध सब भरि रहयाँ, ऐसा अमृत पोख ।— दादू०, पृ० १५१ ।

गाँठ
संज्ञा स्त्री० [सं० ग्रन्थि, पा० गंठि] [विं० गँठीला] १. रस्सी, डोरी तागे आदि में पड़ी हुई मुद्धी की उलझन जो खिंचकर कड़ी और दृढ़ हो जाती है । वह कड़ा उभार जो तागे, रस्सी, डोरी आदि में उनके छोरों को कई फेरे लपेटकर या नीचे ऊपर निकालकर खींचने से बन जाता है । गिरह । ग्रंथि । जैसे,—रस्सी में गाँठ पड़ गई है । क्रि० प्र०—खोलना ।—डालना ।—देना ।—पड़ना ।— बाँधना ।—लगाना । यौ०—गाँठ गँठीला = गाँठों से भरा हुआ । गाँठवाला । जिसमें उलझन और गाँठ हो । मुहा०—गाँठ खुलना = उलझन मिटना । किसी भारी समस्या का समाधान होना । कोई भारी प्रश्न हल होना । गाँठ खोलना या छोरना = उलझन मिटाना । अड़चन दूर करना । कठिनाई मिटाना । उ०—कहनि रहनि एक विरति विवेक नीति वेद बुधसंमत पथन निरवान की । गाँठि विनु गुन की कठिन जड़ चेतन की छोरी अनायास साधु सोधक अपान की ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ३१५ । (मन या हृदय की) गाँठ खोलना = (१) खोलकर कोई बात कहना । मन में कोई बात गुप्त न रखना । मन में रखी हुई बात कहना । (२) अपनी भीतरी इच्छा प्रकट करना । (३) अपना हौसला निकलना । लालसा पूरी करना । (मन में) गाँठ गकड़ना या करना = भेद मानना । अतर रखना । बुरा मानना । खिंचा रहना । बैर मानना । कोना रखना । गाँठ पर गाँठ पड़ना = (१) उलझन बढ़ती जाना । किसी बात का उत्तरोत्तर कठिन होता जाना । मामला पेचीला होता जाना । (२) मनमोटाव बढ़ता जाना । द्वेष बढ़ता जाना । मन में गाँठ = चित्त में बुरा भाव । द्वेष भाव । वैर । मन में गाँठ रखना = जी में बुरा मानना । वैर मानना । मन या हृदय में गाँठ पड़ना = आपस के संबंध में भेद पड़ना । मनमोटाव होना । वैर होना । द्वेष होना । उ०— (क) मन को मारों पटकि के टूक टूक उड़ि जाय । टूटे पाछे फिर जुरै, बीच गाँठि पड़ि जाय ।—कबीर (शब्द०) । (ख) दृग उरझन टूटत कुटुम जुरत चतुर सँग प्रीति । परति गाँठ दुर्जन हिये दई नई यह रीति ।—बिहारी (शब्द०) । २. अंचल, चददर या किसी कपड़े की खूँट में कोई वस्तु (जैसे, रुपया) लपेटकर लगाई हुई गाँठ । उ०—राम गाइ औरन समुझावै हरि जाने बिन विकल फिरैं । एकादशी व्रतौं नहिं जानै ज्ञान गमाये मुगुध फिरै ।—कबीर (शब्द०) । मुहा०—किसी की गाँठ कटना = (१) गाँठ में बँधी वस्तु का चोरी जाना । जेब कतरा जाना । (२) सौदे में जट जाना । अधिक दाम दे देना । ठगा जाना । गाँठ कतरना या काटना = (१) गाँठ काटकर रुपया निकाल लेना । जेब कतरना । (२) मूल्य से अधिक लेना । लूटना । ठगना । गाँठ करना = (१) संग्रह करना । इकट्ठा करना । अपने पास रख लेना । उ०—रहा द्रव्य तब कीन न गाँठी । पुनि कत मिलैं लच्छ जो नाठी ।—जायसी (शब्द०) । (२) याद रखना । गाँठ का = पास का । पल्ले का । जैसे—तुम्हारी गाँठ का रुपया लगे तो मालूम हो । गाँठ का पूरा = धनी । मालदार । जैसे— गाँठ का पूरा, मति का हीन । गाँठ खोलना = थैली या जेब से रुपया निकालना । पास का खर्च करना । गाँठ जोड़ना = विवाह आदि के समय स्त्री पुरुष के कपड़ों के पल्ले को एक में बाँधना । गँठजोड़ा करना । ग्रंथिबंधन करना । किसी के साथ गाँठ जोड़ना = किसी के साथ ब्याह करना । गाँठ में = पल्ले में । पास में । जैसे—गाँठ में कुछ है कि यों ही बाजार चले । उ०—राजा पदुमावति सों कहा । साँठ नाठ कछु गाँठ न रहा ।—जायसी (शब्द०) । (कोई बात) गाँठ में बाँधना = अच्छी तरह याद रखना । स्मरण रखना । सदा ध्यान में रखना । उ०—कहल हमारा गाँठी बाँधो, निसि बासरहि होहु हुसियारा । ये कलि के गुरु वड़ परपंची, डारि ठगौरी सब जग मारा ।—कबीर (शब्द०) । गाँठ से = पास से । जैसे—गाँठ से लगाना पड़े तो मालूम हो । ३. गठरी । बोरा । गट्ठा । जैसे—गेहूँ की गाँठ, चावल की गाँठ । मुहा०—गाँठ करना = (१) गाँठ में बाँध लेना । (२) बटोरना । जमा करना । ४. अंग का जोड़ । बंद । जैसे—पैर की गाँठ, हाथ की गाँठ, उँगली की गाँठ । मुहा०—गाँठ उखाड़ना—किसी अंग का अपने जोड़ पर से हट जाना । जोड़ उखड़ना । ५. ईख, बाँस आदि में थोड़े थोड़े अंतर पर कुछ उभड़ा हुआ कड़ा स्थान जिसमें गंडा या चिह्न पड़ा रहता है और जिसमें से कनखे निकलते है । पोर । पर्व । जोड़ । ६. गाँठ के आकार की जड़ । ऊँटी । गुत्थी । जैसे—हल्दी की गाँठ । ७. घास का वह बोझ जिसे एक आदमी उठा सके । गट्ठा । ८. एक गहना जो कटोरी के आकार का होता है और जिसकी बारी में छोटे छोटे घुँघरू लगे रहते हैं । इसे रेशम में गूँथकर स्त्रियाँ हाथों की कुहनी में लटकाती है ।

गाँठकट
संज्ञा पुं० [हिं० गाँठ+ काटना] [स्त्री० गाँठकटी] १. वह चोर जो पल्ले में बँधे हुए रुपए काटकर उड़ा लेता हो । गिरहकट । २. उचित से अधिक मूल्य पर सौदा बेचनेवाला । ठग ।

गाँठकतरा
संज्ञा पुं० [हिं० गाँठ + कतरना] दे० 'गाँठकट' ।

गाँठगोभी
संज्ञा स्त्री० [हिं० गाँठ + गोभी] गोभी का एक भेद । विशेष—इसके पौधे को पेड़ी में जड़ से चार पाँच अंगुल पर एक गाँठ पड़ती है जो धीरे धीरे बढ़कर खरबूजे के आकार की हो जाती है । यह गाँठ गूदेदार होती है और इसकी तरकारी बनाई जाती है ।

गाँठदार
वि० [हिं० गाँठ + दार (प्रत्य०)] जिसमें बहुत गाँठें हों । गठीला ।

गाँठना
क्रि० स० [सं० ग्रन्थन, पा० गणठन] १. गाँठ लगाना । सीकर, मु्र्री लगाकर या बाँधकर बाँधकर मिलाना । साटना । २. फटी हुई चीजों को टाँकना या उसमें चकती लगाना । मरम्मत करना ।गूथना । जैसे, जूता गाँठना, गुदड़ी, गाँठना । ३. मिलाना । जोड़ना । ४. तरतीब देना । क्रमबद्ध करना । जैसे—मनसूबा गाँठना, मजमून गाँठना । मुहा०—मतलब गाँठना = काम निकालना । अपना प्रयोजन सिद्ध करना । ५. अपनी ओर मिलाना । अनुकूल करना । पक्ष में करना । निर्धारित करना । नियत करना । मुकर्रर करना । जैसे— तुम अपने मन में हमें तंग करना गाँठ लिया है । ८. दबाना । दबोचना । गहरी पकड़ पकड़ना । जैसे—पंजा गाँठना, सवारी गाँठना । ९. वश में करना । वशीभूत करना । दाँव पेंच पर चढ़ाना । १०. वार को रोकना । आघात को किसी वस्तु पर लेना ।

गाँठि †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'गाँठ' । उ०—पाछे वा मुरारीदास वा पातरि की गाँठि बाँधि सिरहाने धरि सोबते ।—दो सौ बावन०, भा० १, पृ० १४३ ।

गाँठी
संज्ञा स्त्री० [हिं० गाठ] १. एक आभूषण जिसे स्त्रियाँ हाथों की कुहनी में पहनती हैं । वि० दे० 'गाँठ' । २. भूसे या डंठल का छोटा टुकड़ा । विशेष—इसमें गाँठ ही गाँठ होती है । यह किसी काम का नहीं होता, बैल भी इसे नहीं खाते । खलिहान में इसे लोग बेकाम का समझकर फेंक देते हैं ।

गाँड़
संज्ञा स्त्री० [सं० गर्त, प्रा० गड्ड] १. पाखाने का मुकाम । शरीर का वह इंद्रिय जिससे मेल बाहर निकलता है । गुदा । पर्या०—गुद । अपान । पायु । गुह्य । मुहा०—गाँड़ की खबर न होना = सुध या चेत न होना । सावधानी न होना । गफलत होना । किसी बात की जानकारी न होना । गाँड़ की खबर न रखना = बेसुध रहना । अचेत रहना । होश में न रहना । असावधान रहना । गाफिल रहना । किसी बात से अनजान रहना । गाँड़ की खबर न रहना = होश हवास न रहना । जानकारी न रहना । गाँड़ की राह या रास्ते निकलना = (१) किसी वस्तु का न पचकर ज्यों का त्यों पाखाने से निकल जाना । (२) निकल जाना । जाता रहना । खो जाना । गाँड़ के नीचे तले गंगा बहना = अधिक ऐश्चर्य होना । अत्यंत धन होना । गाँड़ खोल देना = (१) दबकर बात मान लेना । डर से किसी की बात मान लेना । अधीन हो जाना । (२) चापलूसी करना । ठकुरसुहाती करना । गाँड़ खोले फिरना = (१) नंगा फिरना । (२) बच्चों की तरह अनजान बना रहना । बचपन की अवस्था में रहना । जैसे—कल वह मेरे सामने गाँड़ खोले फिरता था; आज बड़ा पंडित बना है । गाँड गंजीफा खेलना = (१) चित्त संकट में पड़ना । डर और घबराहट होना । (२) तंग होना । हैरान होना । गाँड़ गरदन की सुध या खबर न रखना = बेहोश रहना । अचेत रहना । असावधान रहना । गाफिल रहना । गाँड़ गरदन एक हो जाना = (१) थककर लथपथ हो जाना । थककर होश हवास खो देना । (२) बेहोश हो जाना । बेसुध हो जाना । आपा खोना । (३) संडमुसंड हो जाना । बहुत मोटा हो जाना । गाँड़ गले में आना = (१) संकट में पड़ना आफत में फँसना । (२) तंग आना । ऊब जाना । आजिज आना । हैरान होना । गाँड़ घिसना या रगड़ना = (१) बड़ा उद्योग करना । बहुत प्रयत्न करना । बड़ी दौड़ धूप करना । कड़ी मेहनत करना । कठिन परिश्रम करना । जैसे,—१० रुपया महीने पर कौन गाँड़ घिसने जायगा । (२) चापलूसी करना । ठकुरसुहाती कहना । खुशामद करना । गाँड़ घिसवाना = (१) बड़ी खुशामद कराना । बड़ी चापलूसी कराना । (२) नाकों चने चबवाना । बहुत तंग करना । गाँड़ चलना = दस्त आना । पेट चलना । गाँड़ चाटना = चापलूसी करना । खुशामद करना (बाजारू) । गाँड़ चिरना= दे० 'गाँड़ फटना' । गाँड़ जलना = (१) बुरा लगना । न सुहाना । (२) डाह उत्पन्न होना । ईर्ष्या होना । गाँड़ धोना = आबदस्त लेना । किसी की गाँड़ धोना = चापलूसी करना । खुशामद करना । गाँड़ धोने न आना = कुछ ढंग न आना । कुछ भी शऊर न होना । गाँड़ फटना = (१) डर लगना । भय होना । (२) डर के मारे घबराहट होना । गाँड़ फटकर हौदा या हौज होना = भयभीत होना । आतंकसे घबरा जाना । सहस जाना । गाँड़फाड़ या गाँडमार = (१) भयानक । डरावना । (२) कठिन । विकट । दुष्कर । गाँड़ फाड़ना = (१) डराना । धमकाना । भय दिलाना । (२) दिक करना । सताना । नाक में दम करना । (३) कठिन काम लेना । अत्यंत अधिक श्रम कराना । गाँड़ में गू होना = पास पैसा होना । पास में धन होना । (किसी की) गाँड़ में घुसा रहना = चापलूसी करना । साथ साथ लगा फिरना । खुशामद करना । गाँड़ में घुस जाना = दूर हो जाना । निकल जाना । जैसे, चार लात देंगे सब बदमाशी गाँड़ में घुस जायगी । गाँड़ में चटखनी, चिउँटी या पतिंगी लगाना = (१) बुरा लगना । न सुहाना । नागवार गुजरना । (२) डाह होना । जलन होना । गाँड़ में थूकना या थूक लगाना = (१) नीचा दिखाना । कलकित करना । धब्बा लगाना । अपमानित करना । इज्जत उतारना । (२) झिपाना । लज्जित करना । गाँड़ मराना = (१) गुदामैथुन कराना । प्रकृतिविरुद्ध मैथुन कराना । (२) हानि सहना । नुकसान उठाना । (३) चापलूसी करना । खुशामद करना । दुर्व्यवहार और दुर्वचन सहना । गाँड़ मारना = (१) लौड़ेबाजी करना । (२) तंग करना । दुःख देना । सताना । (३) बहुत अधिक काम लेना । कठिन परिश्रम लेना । गाँड़ में उँगली करना = (१) छेड़ना । छकाना । (२) तंग करना । दिक करना । हैरान करना । सताना । गाँड़ में मिरचे लगना = बुरा लगना । न सुहाना । खलना । गाँड़ में लँगोटी न होना = कपड़े बिना नंगे फिरना । अत्यंत दरिद्र होना । २. किसी वस्तु के नीचे का वह भाग जिसके बल पर वह खड़ी रह सके या रखी जा सके । पेंदी । तला । तली ।

गाँडर
संज्ञा स्त्री० [सं० गणडाली] १. मूँज की तरह की एक घास जिसकी पत्तियाँ बहुत पतली और हाथ सवा हाथ लंबी होती है । बीरन । खस । उ०—सो मैं कुमति कहौ केहि भाँती । बाजु सुराग कि गाँडर ताँती ।—तुलसी (शब्द०) । विशेष—जड़ से इसके अंकुर गुच्छो में निकलते हैं । यह घासतराई में तथा ऐसे स्थानों पर होती है जहाँ पानी इकट्ठा होता है । नैपाल की तराई में तालों और झीलों के किनारे यह बहुत उपजती है । इसकी सूखी जड़ जेठ असाढ़ से पनपती है और उसमें से बहुत में अंकुर निकलते हैं जो बढ़ते जाते हैं । कुआर के महीने में बीच से पतली पतली सीकें निकलती हैं, जिनके सिरे पर छोटे छोटे जीरे लगते हैं । किसान सीकों को निकालकर उनसे झाड़ू पंखे टोकरियाँ आदि बनाते हैं और पौधों को काटकर उनसे छप्पर छाते हैं । इस घास की जड़ सुगंधित होती है और उसे संस्कृत में उशीर तथा फारसी में खस कहते हैं । यह पतली, सीधी और लंबी होती है और बाजारों में खस के नाम से बिकती है । खस का अतर निकाला जाता है और उसकी टट्टियाँ भी बनती हैं । खस के नैचे भी बाँधे जाते हैं । २. एक प्रकार की दूब जिसमें बहुत सी गाँठे होती हैं । गंडदूर्वा । विशेष—यह जमीन पर दूर तक फैलती और जगह जगह जड़ पकड़ती जाती है । पशु इसे बड़े चाव से खाते हैं । यह कड़ुई, कसैली और मीठी होती है, दाह, तृषा और कफ पित्त को दूर करती है तथा रुधिर के विकार को हरती है । भावप्रकाश में इसे लोहद्राविणी अर्थात् लोहे को गलानेवाली लिखा है ।

गाँडा (१)
संज्ञा पुं० [सं० काण्ठ या खण्ड [स्त्री० गेंड़ी] १. किसी पेड़ पौधे या डंठल का वह खंड जो उससे काट लिया गया हो । जैसे लकड़ी का गाँडा, ईख का गाँडा । २. ईख का वह छोटा टुकड़ा जिसे पत्थर या लकड़ी के कोल्हू में डालकर पेरते हैं । गंडेरी । ३. ईख । उ०—निगम के भाँड़े कत बोलत हैं बचन बाँडे काहे को पाँडे गांड़ें हाथिन सों खात है ।— हनुमान (शब्द०) ।

गाँडा (२)
संज्ञा पुं० [सं० गण्ड = गंडा । चिह्न] वह मेड़ या चबूतरा जो आटा पीसने की चक्की के चारों ओर इसलिये बनाया जाता है कि आटा गिरकर इधर उधर न फैले । मेंडरी ।

गाँडी
संज्ञा स्त्री० [सं० गण्ड] एक प्रकार की घास जो चौपायों के चरने के काम आती है । विशेष—यह घास हिसार और भीर में होती है । भैंसे इसे बड़े चाव से खाती हैं । यह सुखाकर रखी जाती है और दस महीने तक बनी रहती है । इसकी जड़ में एक प्रकार की सुगंध होती है । य़ह अच्छी धरती में, जहाँ गेहूँ होता है, उपजती है । इसे घोड़े भी खाते हैं ।

गाँडू
वि० [हिं० गाँड़] जिसे गाँड़ मराने की लत हो । २. निकम्मा । ३. जिसमें हिम्मत न हो । डरपोक । बुजदिल । असाहसी ।

गाँती
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'गाती' ।

गाँथना पु
क्रि० स० [सं० ग्रन्थन] १. गूथना । गूँधना । उ०— गुरु के बचनफूल हियगाँथे । देखउँ नयन चढ़ावउँ माथे ।— जायसी (शब्द) । (ख) सोहत मउर मनोहर माँथे । मंगलमय मुकतामणि गाँथे ।—तुलसी (शब्द०) । २. मोटी सिलाई करना । गाँठना । जोड़ना ।

गाँदला पु †
वि० [हिं० गँदला] दे० 'गदला' । उ०—सागर गहरा गाँदला अगनि बिंब असरालु । प्राण०, पृ० २३७ ।

गाँधी
संज्ञा पुं० [सं० गन्धिक] १. वह जो इत्र और सुगंधित तेल आदि बेचता हो । गंधी । २. गुजराती वेश्यों की एक जाति ।

गाँन पु
संज्ञा पुं० [सं० गान] दे० 'गान' । उ०—दधि दूब हरद भरि कनक थाल बहु गाँन करत प्रबिसंघ । बाल ।—ह० रासो, पृ०, ३२ ।

गाँम पु
संज्ञा पुं० [सं० ग्राम] दे० 'गाम' । उ०—बीस गाँम कवि चंद प्रति करी कुँअर बगसीस । एक बाजि साजति सजहि दियौ सु संभरि ईस ।—पृ० रा०, ६ ।१७८ ।

गाँमी पु
वि० [हि० गाँम + ई (प्रत्य०) ] गँवार । अशिष्ट । उजड्ड़ । उ०—साहाब सुकर फुरमाँन दिय गाँमी छलबल लग्गया । कड्ढी सु लच्छि आहुपट्ठपति मुख चहुआन विलग्गया—पृ० रा०, २४४१ ।

गाँवँ
संज्ञा पुं० [सं० ग्राम] दे० 'गाँव' ।

गाँव
संज्ञा पुं० [सं० ग्राम, पा० गाम, प्रा०, गावँ] [वि० गँवार] वह स्थान जहाँपर बहुत से किसानों के घर हों । छोटी बस्ती । खेड़ा । मुहा०—गाँव गिरावँ = (१) देहात । (२) जमींदार । गाँव गँवई = देहात । गाँव मारना = डाका मारना । डाका ड़ालना । उ०—जिमींदार सुता ताके उभै भाई रहे आपस में बैर, गाँव मारयो सब छीजिए ।—प्रिया (शब्द०) । यौ०—गाँव पंचायत = ग्राम की पंचायत । गाँव सभा = ग्राम की सभा ।

गाँवटी †
संज्ञा स्त्री० [हि० गाँव + टी (प्रत्य०)] गाँव । पुरवा । उ०—कुराज्य था, कुशासन था परंतु गाँवटी पंचायतें बनी हुई थीं ।—झँसी०, पृ०, १३ ।

गाँस
संज्ञा स्त्री० [हि० भाँसना] रोक टोक । बाधा । प्रतिरोध । बंधन । उ०—सब गाँस फाँस मिटाय दास हुलास ज्ञान अखंड़ के । नहिं नास तेहि इतिहास सुनि सो आदि अंत प्रचंड़ के (शब्द०) । क्रि० प्र०—करना ।—देना ।—रखना । २. बैर । द्वेष । ईर्ष्या । मनोमालिन्य । उ०—बिथुरय़ो जावक सौति पग, निरखि हँसी महि गाँस । सकल हँसौंही लखि लियौ आधी हँसी उसास ।—बिहारी (शब्द०) । क्रि० प्र०—रखना । धरना ।—पकड़ना । गहना । मुहा०गाँस निकलाना = बैर निकालना । ३. हृदय को गुप्त बात । भेद की बात । रहस्य । उ०—(क) जोबन दान लेहिंगे तुम सों । चतुराई मिलवति है हम सों । इनकी गाँस कहा री जानो । इतनी कही एक जिय मानो ।— सूर (शब्द०) । (ख) बहू बात साँची याकी गाँस एक और सुनो साधु को न हँसे कोऊ यह मैं बिचारी है ।—प्रिया (शब्द०) । ४. गाँठ फंदा । गठन । बनावट । जमावट । उ०—इतने सबै तुम्हारे पास । निरखि न देखहु अंग अंग सब चतुराई को गाँस ।—सूर (शब्द०) । ५. तीर या बर्छी् का फल । हथियार की नोक । उ०—कोटिन मनोज की बनीज जाके आगे पुनि दबति कलानिधि की खोज को न काढी़ हैँ । रघुनाथ हेरि सोई हरखि हरिननैनी गहै गाँस पैनी रीझबतरस बाढी़ है ।—रघुनाथ (शब्द०) । †६वश । अधिकार । शासन । मुहा०—गाँस में करना या रखना = अधिकार में रखना । देखरेख में रखना । शासन में रखना । उ०—निर्गुन कौन देश को बासी । .......पावेगो पुनि कियो आपनी करेगो गाँसी । सुनत मौन ह्वै रह्यौ बावरो सूर सबै मति नासी ।—सूर (शब्द०) । ७. देखरेख । निगरानी ।

गाँसना
क्रि० स० [हिं०] १. गँसने का सकर्मक रूप । एक दुसरे से लगाकर कसना । गूथना । २. सालना । छेदना । चुभोना । आरपार करना । ३. रस्सी, या सूत के बाते बुनते समय उसे ठोंक ठोंककर ताने में कसना, जिससे बुनावट घनी हो । ठस करना । गठुना । कसना । मुहा०—बात को गाँसकर रखना = मन में बैठाकर रखना । हृदय में जमाना । स्मरण रखना । मन में लिए रहना । उ०—तुम वह बात गाँस करि राखि हमको गई भुलाइ । ता दिन कह्यो नहीं मैं जानौ मानि लई सति भाइ ।—सूर (शब्द०) । †४इधर उधर न जाने देना । देखरखे में रखना । वश में रखना । अपने मन का न होने देना । शासन में रखना । रोकना । ५. पकड़ में करना । वश में करना । दबोचना । ६. ठूसना । भरना । ७. जहाज का छेद बंद करना ।

गाँसी
संज्ञा स्त्री० [हि० गाँस] १. तीर या बरछी आदि का फल । हथियार की नोक । जैसे—प्रीतम के उर बीच भए दुलही को बिलास मनोज की गाँसी ।—मतिराम (शब्द०) । मुहा०—गाँसी लगना = तीर लगना । उ०—फाँस से फुलेल लागे गाँसी सी गुलाल लागे गाज अरगजा लागे चोवा लागे चहकन ।—(शब्द०) । २. गाँठ । गिरह । ३. कपट । छलछंद । ४. मनोमालिन्य ।

गाँहक
संज्ञा पुं० [सं० ग्राहक] दे० 'गाहक' ।

गा पु †
क्रि० अ० [सं० गत, प्रा० गअ] गया । उ०—जो जो गा सतसंग में सों सो बिगरा जाय ।—पलटू०, भा० २,पृ०३९ ।

गाइ †
संज्ञा स्त्री० [हि० गाय] दे० 'गाय' उ०—ठाढे़ गाइ गहन के काज किए फिरत ग्वलिन कौ साज ।—नंद० ग्रं०, पृ० २९७ ।

गाइड़ पु
संज्ञा पुं० [अ०] आगे आगे रास्ता बतलाने वाला । पथ प्रद- शर्क । रहनुमा २. वह पुरुष जो कीसी स्थान में विदेशियों के साथ रहकर उन्हें वहाँ के प्रसिद्ध प्रसिद्ध स्थलों और वस्तुऔं को दिखलाता हो । ३. वह पुस्तक जिसमें किसी विशेष संस्था या कार्यविभाग के नियम आदि लिखे हों ।

गाइना पु
वि० [सं० गयनं] गानेवाला । गायक । उ०—पंड़ित भटठ, कवि गाइना नृप सौदागिर वार हुआ ।—पृ० रा० २७ ।२८ ।

गाउँ †पु
संज्ञा पुं० [हि० गाँव] दे० 'गाँव' । उ०—नंद गाउँ नीको लागतरी ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३३० ।

गाउन
संज्ञा पुं० [अ०] १. एक प्रकार का लंबा ढीला पहनावा जो प्रायः युरोप, अमेरिका आदि देशों की स्ञियाँ पहनती हैं । २. एक तरह का चोगा जो कई आकार और प्रकार का होता । है और जिसके पहनने के अधिकारी ईसाई धर्म के आचार्य, ग्रैजुएट, बड़े न्यायाधीश अथवा कुछ अन्य विशिष्ट लोग ही समझे जाता हैं ।

गाऊघप्प
वि० [हिं० खाऊ + गप्प] १. दूसरे के माल को हड़प लेनेवाला । जमामार । २. बहुत खर्च करनेवाला । बहुत उड़ानेवाला ।

गाकरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० गाँकरी] अंगाकड़ी । लिट्टी ।

गागर †
संज्ञा स्त्री० [सं० गर्गर] गगरी । घड़ा । मुहा०—गागर में सागर भरना = (१) अल्प स्थान में या छोटी जगह में बहुत अधिक का समावेश कर देना । (२) संक्षिप्त पदावली या वाक्ययोजना में अत्यधिक भावों या अर्थों का समावेश करना ।

गागरा †
संज्ञा स्त्री० [हिं० गागर] दे० 'गगरा' । २. भंगियों की एक जाति ।

गागरि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० गागरी] दे० 'गागरी' । उ०—ऊपर तैं दधि, दूध, सीसन गागरि गन ढरैं ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३३४ ।

गागरी †
संज्ञा स्त्री० [सं० गर्गर, पा० गग्गर] घड़ा । गगरी । उ०— (क) कदम तीर ते मोहिं बुलायो गठि गठि बातैं बानति । मटकति गिरी गागरी सिर तें अब ऐसी बुधि ठानति ।—सूर (शब्द०) । (ख) लो यह लतिका भी भर लाई, मधु मुकुल नवल रस गागरी ।—लहर, पृ०, १९ ।

गाच
संज्ञा पुं० [अ० गाज़] बहुत महीन जालीदार सूती कपड़ा जिसपर रेशमी बेल बूटे बने रहते हैं । फुलवर ।

गाछ
संज्ञा पुं० [सं० गच्छ] १. छोटा पेड़ । पौधा । उ०—जम्यो जुगति में गाछ अनाहद धुनि सुनि मिटि जंजाल री ।—भीखा० श०, पृ० ३६ । २. पेड़ । वृक्ष । ३. एक प्रकार का पान जो उत्तरी बंगल में होता है ।

गाछमरिच
संज्ञा स्त्री० [हिं० गाछ + मिर्च] मिर्च की जाकि का एक प्रकार का वृक्ष ।

गाछी
संज्ञा स्त्री० [हिं० गाछ + ई (प्रत्य०)] १. पेड़ों का कुंज । बाग । २. खजूर की नरम कोंपल जिसे लोग पेड़ कट जाने पर सुखाकर रख छोड़ते हैं और तरकारी के काम में लाते हैं । ३. बोरा जो बैल आदि पशुओं की पीठ पर बोझ लादने के लिये रखा जाता है । खुरजी ।

गाज (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० गर्ज, प्रा० गज्ज] १. गर्जन । गरज । शोर । उ०—(क) कबिर सूता क्या करै सूतें होय अकाज, ब्रह्मा को आसन डिग्यो सुनी काल की गाज ।—कबीर (शब्द०) । (ख) नंदराय के चौक में खड़े करत सब गाज । जय जय करि चिचियाइए तबै मिलत ब्रजराज ।—सुकवि (शब्द०) । यौ०—गाजा बाजा = धूम धड़क्का । २. बिजली गिरने का शब्द । वज्रपात ध्वनि । जैसे,—गाज्यो कपि गाज ज्यों बिराज्यो ज्वाल जालयुत भाजे धीर बीर अकुलाइ उठयो रावनो ।—तुलसी (शब्द०) । ३. बिजली ।बज्र । उ०—गाज्यो कपिराज रघुराज की सपथ करि मूँदे कान जातुधान मानो गाजे गाज के ।—तुलसी (शब्द०) । क्रि० प्र०—पड़ना । मुहा०—गाज पड़ना = वज्रपात होना । बिजली गिरना । उ०— मानहुँ परी स्वर्ग हुत गाजा । फाटी धरति आइ यो बाजा ।— जायसी (शब्द०) । किसी पर गाज पड़ना = आफत आना । ध्वंश होना । नाश होना । उ०—जो सत पूछसि गंध्रब राजा । सत पर कबहुँ परै नहिं गाजा ।—जायसी (शब्द०) । (किसी बात पर) गाज पड़े = नष्ट हो । दूर हो । न रह जाय । उ०—(क) गाज परै ऐसी लाज पै जो भरि लोचन देति न मोहिं निहारन (शब्द०) । (ख) गाज परै ब्रज को बसिबौ तुमहुँ, सखि, देखति हौ बरजोरी ।—दूलह (शब्द०) । (किसी को कोसने या किसी बात में अनिंच्छा प्रकट करने के लिये इस मुहावरे का प्रयोग स्त्रियाँ बहुत अधिक करती हैं) । गाज मारना = (१) बिजली गिरना । वज्रपात होना । (२) आफत आना । उ०—दैव कहा सुनु बड़रे राजा । देवाहि । अगुमन मारा गाजा ।—जायसी (शब्द०) ।

गाज (२)
संज्ञा पुं० [अनु० गजगज] पानी आदि का फेन । फेन । झाग । क्रि० प्र०—उठना । छूटना ।—छोड़ना ।—निकलना ।—फेंकना ।

गाज (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० काच] काँच की चूड़ी ।

गाजना
क्रि० अ० [सं० गर्जन, प्रा० गज्जन] १. शब्द करना । हुंकार करना । गरजना । चिल्लाना । उ०—(क) सैन मेघ अस दुहुं दिसि गाजा । स्वर्ग के बीज बीजु अस बाजा ।—जायसी (शब्द०) । (ख) उनई आय दुहुँ गल गाजे । हिंदू तुरुक दोऊ सम बाजे ।—जायसी (शब्द०) । २. हर्षित होना । खुश होना । प्रसन्न होना । मुहा०—गलगाजना= हर्पित होना ।

गाजनी पु
वि० स्त्री० [सं० गजन, हिं० गंजना] लज्जित करनेवाली । पराजित करनेवाली । गजनेवाली । उ०—सब ही कों मनमथ, सब तिय जानति नीके कै रस बस आनंदघन सौतिन गाजनी गाई ।—घनानंद०, पृ०, ५८४ ।

गाजर
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक पौधे का नाम जिसकी पत्तियाँ धनिए की पित्तियों से मिलती जुलती, पर उससे बहुत बड़ी होती हैं । विशेष—इसकी जड़ मूली की तरह, पर अधिक मोटी और कालिमा लिए भंटे की तरह गहरे लाल रंग की होती है । पीले रंग की भी गाजर होती है । यह खाने में बहुत मीठी होती है । यह गरम होती है और घोड़े की बहुत खिलाई जाती है । छोटी और नरम जड़ों को गरीब लोग और बच्चे बड़े चाव से खाते हैं । इसकी जड़ को सुखाकर उसके आटे का हलुआ बनाया जाता है जो पुष्ट माना जाता है । काछी लोग इसे अपने खेतों में कातिक अगहन में बोते हैं । इसकी तरकारी, अचार और मुरव्बे भी बनाए जाते हैं । मुहा०—गाजर मूली समझना = तुच्छ समझना ।

गाजरघोट
संज्ञा पुं० [देश०] गंजा नाम की कँटीली झाड़ी । वि० दे० 'कंजा' ।—१ ।

गाजा
संज्ञा पुं० [फा० गाजह्] मुँह पर मलने का एक रोगन । पाउड़र । क्रि० प्र०—मलना । लगाना ।

गाजी
संज्ञा पुं० [अ० गाजी] १. मुसलमानों में वह वीर पुरुष जो धर्म के लिये विधार्मियों से युद्ब करे । २. बहादुर । वीर । जैसे—साहि के सिवाजी गाजी सरजा समत्थ महा मदगल अफजलै पंजाब पटक्यो ।—भूषण (शब्द०) ।

गाजिमर्द
संज्ञा पुं० [अ० गाजी + फा० मर्द] १. वह जो बहुत बड़ा योद्धा या वीर हो । २. घोड़ा । अश्व । (बोलचाल) ।

गाजीमियाँ
संज्ञा पुं० [अ० गाजीमियाँ] सालार समऊद गजी । बाले मियाँ । विशेष—यह महमूद गजनवी का भानजा था । हिंदुओ को कफिर समझकर उनसे लड़ने के लिये यह अवध तक आया था, पर आरंभ ही में श्रावस्ती (सहेतमहेत) के जैन राजा सुह्वददेव या सुहेलदेव के हाथ से बहराइच में मारा गया था ।

गाटर (१)
संज्ञा स्त्री० [पुहिं० गटई = गला] जुआठे की वह लकड़ी जिसके इधर उधर बैल जोते जाते हैं ।

गाटर (२)
संज्ञा पुं० [हि० गाटा ?] १. दे० 'कट्टा' । २. छोटा खेत । गाटा ।

गाटर (३)
संज्ञा पुं० [अ० गार्टर] लोहे की लंबी और मोटी धरन जिसे दीवारों पर ड़ालकर छत पाटी जाती हैं ।

गाटा
संज्ञा पुं० [हि० कट्ठा] १. खेत का छोटा टुकड़ा । छोटा खेत । गाटर । २. पयाल दाने की बैलों की नधाई ।

गाठरो पु †
संज्ञा स्त्री० [हि० गठरी] दे० 'गठरी' । उ०—कस करि बाँधी गाठरी उठ करि चालो बाद ।—कबीर सा० सं०, पृ०, ९१ ।

गाड
संज्ञा पुं० [अ० गाँड़] १. देवता । २. ईश्वर । खुदा । विशेष—जर्मन भाषा में इस शब्द का उच्चारण गाँट्ट है, जेसे— 'आख मीन गाँट्ट (ओ मेरे ईश्वर) ।—श्री चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी 'उसने कहा था' ।

गाड़
संज्ञा स्त्री० [स० गर्त, प्रा०, गड्ढ, मिलाओ अ० गार] १. गड़हा । गड्ढा । उ०— (क) रुधिर गाड़ भरि-भरि जमेउ ऊपर ऊपर धूरि उड़ाइ । जिमि अँगार रासीन पर मृतक धूम रह छाइ ।— तुलसी (शब्द०) । (ख) वेई गाड़ि गाड़ै परी उपटयो हार हियै न । आन्यो मोरि मतंग मनु मानि गरेरनि मैन ।—बिहारी (शब्द०) । (ग) चित चंचल जग कहत है मो मति सो ठहरै न । या ठोढी़ की गाड़ परि थिर होइ सो निकरै न ।—श्रृ० सत० (शब्द०) । २. पृथिवी के अंदर खोदा हुआ वह गड्ढा जिसमें अन्न रखा जाता है । ३. कोल्हाड़ में वह गड़्ढा जिसमें बचा खुचा रस निचोड़ने के लिये ईख की खोई ड़ालते हैं और ऊपर से पानी छिड़क देते हैं । इसके चारों ओर हाथ डेढ़ हाथ ऊँची दीवार होती है और अंदर से यह खूब लिपा पुता रहता है । इसके एक ओर छोटा सा छेद होता है जिसमें से होकर खोई से रस निचुड़ता है । ४. नील आदि के कारखाने में वह गड्ढा जिसमें पानी बरा रहता है । ५. कुएँ की ढाल ।भगाड़ । ६. वह छिछला गड्ढा जिसमें से पानी शीघ्र बह जाता है । खत्ता । ७. खेत की मेंड़ । बाढ ।

गाड़ना
क्रि० स० [हि० गाड़ा = गढ्डा से नामिक धातु] १. पृथ्वी में गड्ढा खोदकर किसी चीज को उसमें ड़ालकर ऊपर से मिट्टी ड़ाल देना । जमीन के अंदर दफनाना । तोपना । जैसे,—रुपया गाड़ना, मुरदा गाड़ना । २. पृथ्वी में गड्ढा खोदकर उसमें किसी लंबी चीज के एक सिरे का कुछ भाग डालकर उसे खड़ा करना । जमाना । जैसे,—बाँस गाड़ना, लट्ठा गाड़ना । पेड़ गाड़ना । ३. किसी नुकीली चीज को नोक के बल किसी चीज पर ठोंककर जमाना । धँसाना । जैसे,—खूँटी गाड़ना । कील गाड़ना । ४. गुप्त रखना । छिपाना । जैसे,—वह जो चीज पाता है, गाड़ रखना । मुहा—गाड़ गूड़ देना = दफनाना । गाड़ना । उ०—गला घोटकर कहीं गाड़गूड़ देतीं ।—प्रेमघन, भा०, १९१ ।

गाडर †
संज्ञा स्त्री० [सं० गड्डरी या गड्डरिका] १. भेड़ उ०—(क) स्वामी होनी सहज है दुर्लभ होनी दास । गाडर लाये ऊन को लागी चरन कपास ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) मतिराम कहै कारबार के कसैया केते गाड़र से मूडे जग हाँसी की प्रसंग भी ।—मतिराम (शब्द०) । २. दे० 'गाँडर' ।

गाड़रू †
संज्ञा पुं० [सं० गारुड़ी] दे० 'गरुड़ी' ।

गाडव
संज्ञा पुं० [सं०] मेघ । बादल [को०] ।

गाड़ा (१)पु †
संज्ञा पुं० [सं० गान्त्री = बैलगाड़ी] गाड़ी । छकड़ा । बैलगाड़ी । उ०—कुंड़ल कान कंठ माला दै ध्रुव नंद अति सुख पायो । सीधे बहुत सुरासुर नंद गाड़ा भरि पहुँ चायों ।—सूर (शब्द०) ।

गाड़ा (२)
संज्ञा पुं० [सं० गर्त, प्रा०, ग़ड्ड] १. वह गड्ढा जिसमें आगे लोग छिपकर बैठ रहते थे और शत्रु, चोर, ड़ाकू आदि का पता लेते थे । पहले गाँवों में ऐसे गड्ढे रहा करते थे । मुहा०—गाड़े बैठना = (१) घात में बैठाना ।(२) चौकी या पहरे पर बैठना । गाड़ा बैठाना = चौकी बैठाना । पहरा बैठाना । २. वह खत्ता या गड्ढा जो कोल्हू के नीचे रहता है और जिसमें तेल या रस जमा करने के लिये बरतन रखा रहता है ।

गाड़ी
संज्ञा स्त्री० [सं० गान्त्री या शकट, प्रा० सगड़] १. घूमनेवाले पहियों के ऊपर ठहरा हुआ लकड़ी, लोहे आदि का ढाँचा । एक स्थान से दूसरे स्थान पर माल असबाब या आदमियों को पहुंचाने के लिय़े एक यंत्र । यान । शकट । उ०—(क) गाड़ी के स्वान की नाई काया मोह की बड़ाई छिनाहिं तजि छिन भजत बहोरि हौं ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) लीक—लीक गाड़ी चलै, लीकहिं चलै कपूत ।—(शब्द०) । क्रि० प्र०—चलाना = हाँकना । विशेष—इसे घोड़े, बैल आदि पशु खींचते पशु खींचते हैं और आदमियों के बैठने या माल असबाब आदि रखने के लिये इसपर स्थान बना रहता है । आदमियों को चढानेवाली गाड़ी की सवारी गाड़ी और माल असबाब लादने की गाड़ी को छकड़ा, सग्गड़, आदि कहते हैं । सवारी गाड़ी कई प्रकार की होती है; जैसे, रथ, बहल, बहली, एक्का, टाँगा, बग्घी, जोड़ी, फिटन, टमटम आदि । मुहा०—गाड़ी भर = बहुत सा । ढेर का ढेर । गाड़ी जोतना = गाड़ी में घोड़े जोतना । चलने के लिये गाड़ी तैयार करना । गाड़ी छूटना = गाड़ी का रवाना हो जाना । विशेष—ऐसा प्रायः ऐसी गाड़ियों के ही संबंध में बोलते हैं जिनका संबंध सर्वसाधारण से होता है और जिनके आने जाने का समय नियत होता है । रेलगाड़ी छूटना, बस, या मोटर छूटना आदि । २. रेलगाड़ी । मुहा०-गाड़ी काटना = (१) किसी ड़िब्बे का ट्रेन से अलग होना । (२) चलती गाड़ी में से माल चोरी जाना ।

गाड़ीखाना
संज्ञा पुं० [हिं० गाड़ी + खाना] वह स्थान जहाँ गाड़ियाँ रखी जाती हों ।

गाड़ीवान
संज्ञा पुं० [हिं० गाड़ी + वान (प्रत्य०)] १. गाड़ी हाँकनेवाला । २. कोचवान ।

गाड़ू पु
वि० [हिं०] दे० 'गाँड़' । उ०—खण यक चूप भै रहउ गारि गाड़ू दे तबही ।—कीर्ति० पृ०, ४२ ।

गाढ़ (१)
वि० [सं० गाढ] १. अधिक । बहुत । अतिशय । २. दुढ़ । मजबूत । उ०—अजहूँ न लक्ष्मी चंद्रगुप्तहि गाढ़ आलिंगन करै ।—भारतेंदु ग्रं०, भा०, १. पृ०, १६३ । २. घना । गाढ़ा । उ०—आसा हि के खंभ दोय गाढ़ कै धरत है ।—भारतेंदु ग्रं०, भा०, १, पृ०, ४५२ । ४. गहरा । अथाह । ५. विकट । कठिन । दुरूह । दुर्गम । उ०—क्षेत्र अगम गढ़ गाढ़ सुहावा । समनेहुं नहिं प्रतिपच्छिन पावा ।—तुलसी (शब्द०) ।

गाढ़ (२)
संज्ञा पुं० [सं० गाढ़] १. कठिनाई । आपत्ति । संकट । उ०— (क) जहँ—जहँ गाढ़ परै संतन पर सकल काम तजि होहु सहाई ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) डसी मरी माई श्याम भु्अंगम कारे । मोहन मुख मुसुकानि मनहुं विप जाते मरे सो मारे ।... निर्विष होत नहीं कैसेहुं करि बहुत गुणी पचि हारे । सूरश्याम गारुड़ी बिना को सो सिर गाढ़ उतारै ।—सूर (शब्द०) । क्रि० प्र०—पड़ना । मुहा०—गाढे़ में पड़ना = संकट में पड़ना । आपत्तिग्रस्त होना । उ०—एक परे गाढे़, एक ड़ाढ़त ही काढ़े एक देखत हैं ठाढें, कहैं पावक भयावनी ।—तुलसी (शब्द०) । २. जुलाहों का करघा ।

गाढ़ा (१)
वि० [सं० गाढ़] [वि० स्त्री० गाढ़ी] १. जो पानी की तरह पतला न हो । जिसमें जल के समान बहनेवाले अंश के अतिरिक्त ठेस अंश भी मिला हो । जिसकी तरलता घनत्व लिए हो । जैसे,—गाढ़ा दूध, गाढ़ा रस, गाढ़ी स्याही, गाढ़ा शरीर । मुहा०—गाढ़ी छनना = (१) खूब भाँग का पिया जाना । (२) गहगड़ड़ नशा होना । २. जिसके सूत परस्पर खूब मिले हों । ठस । मोटा (कपड़े आदि के लिये) जैसे,—गाढी बुनावत, गाढ़ा कपड़ा । २. घनिष्ट । गहरा । गूढ़ । जैसे,—गाढ़ी मित्रता ।मुहा०—गाढ़ी छनना = (१) गहरी मित्रता होना । अत्यंत हेल मेल होना । गूढ़ प्रेम होना । जैसे,—आजकल उन दोनों की खूब गाढ़ी छनती है । (२) घुल घुलकर बातें होना । गुप्त सलाह होना । (३) लागा डाँट होना । विरोध होना । ४. बढ़ा चढ़ा । घोर । कठिन । विकट । प्रचंड । कट्ठर । दुरूह । जैसे, गाढ़ी मेहनत । उ०—द्विज देवता घरहि के बाढ़े । मिले न कबहुँ सुभट रन गाढे़ ।—तुलसी (शब्द०) । मुहा०—गाढे़ की कमाई = बहुत मेहनत से कमाया हुआ धन । अत्यंत परिश्रम से उपार्जित धन । गाढे़ का साथी या संगी— संकट के समय का मित्र । विपत्ति के समय सहारा देनेवाला । उ०—दस्तगीर गाढे़ कर साथी । बहु अवगाह दीन तेहि हाथी ।—जायसी (शब्द०) । गाढे़ दिन = संकट के दिन । विपत्ति काल । मुसीबत का वक्त । गाढे़ में = विपात्ति के दिनों से । संकट के समय में । जैसे,—मित्र वही जो गाढे़ में काम आवे ।

गाढ़ा (२)
संज्ञा पुं० [सं० गाढ] १. एक प्रकार का मोटा और भद्दा सूती कपड़ा जिसे जुलाहे बुनते हैं और गरीब आदमी पहनते हैं । २. मस्त हाथी ।

गाढावटी
संज्ञा स्त्री० [सं०] भारतीय शतरंज का एक भेद [को०] ।

गाढ़े पु †
क्रि० वि० [हिं० गाढ़ा] १. दृढ़ता से । जोर से । उ०—मैं गोरस लै जात अकेली काल्हि कान्ह बहियाँ गही मेरी । हार सहित अंचरा गह्यो गाढे़ एक कर गह्यो मटुकिया मेरी ।—सूर (शब्द०) । २. अच्छी तरह । भली भाँति । खूब । उ०— लाडिली के कर की मेंहदी छबि जात कही नहिंशभुहु जू पर । भूलिहू जाहि बिलोकत ही गड़िगाढे़, रहे आति ही दृग जूपर ।—शंभु (शब्द०) ।

गाणपत (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० गाणपती] १. गणपति संबंधी । २. सेना में गण के नायक से संबद्ध ।

गाणपत (२)
संज्ञा पुं० एक संप्रदाय जो गणेश की उपासना करना है ।

गाणपत्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. गणेश का उपासक । २. गणेश की उपासना । ३. सेना की टुकड़ी का नायक ।

गाणिक्य
संज्ञा पुं० [सं०] गणिकाओं का समूह [को०] ।

गाणितिक
संज्ञा पुं० [स०] गणित विद्या का जानकर । गणितज्ञ [को०] ।

गाणेश
संज्ञा पुं० [सं०] गणेश का उपासक [को०] ।

गात
संज्ञा पुं० [सं० गात्र, पा० गत्त] १. शरीर । अंग । उ०— बैठे देख कुशासन जटा मुकुट कृश गात ।—तुलसी (शब्द०) । २. लज्जा का अंग । गुप्तांग । जैसे,—गात दिखाना । ३. स्तन । कुच । मुहा०—गात उमगना = छाती उठाना । कुच निकलना । ४. गर्भ । मुहा०—गात से होना = गर्भवती होना ।

गातलीन
संज्ञा पुं० [अ० गाटलिन] जहाज में की एक डोरी जो मस्तूल के ऊपर एक चरखी में लगी रहती है और रीगिन उठाने में काम आती है ।

गातव्य
वि० [सं०] गाने योग्य । गेय [को०] ।

गाता (१)
संज्ञा पुं० [सं० गातु > गातु, गातू (गाता)] १. गानेवाला । गवैया । उ०—जयति रन अजिर गंधर्व गन गर्वहर फेरि किय राम गुन गाथ गाता ।—तुलसी (शब्द०) । २१. गंधर्व । देव गायक (को०) ।

गाता (२)
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'गत्ता' ।

गातानुगतिक
वि० [सं०] दे० 'गतानुगतिक' ।

गाती
संज्ञा स्त्री० [सं० गात्री या गात्रिका] १. वह चद्दर जिसे प्राचीन काल में लोग अपने शरीर पर लपेटते थे और अब भी साधु लोग अपने गले में बाँधे रहते हैं । स्त्रियाँ बच्चों के गले में अब भी गाती बाँधती हैं । उ०—सारी सुभग काछ सह दिय । पाटंबर गाती सब दिये । एकन जाइ दूर हरि पाये । सैन देइ राधिका बुलाये ।—सूर (शब्द०) । क्रि० प्र०—कसना ।—बाँधना ।—लगाना । मुहा०-गाती मारना = गाती बाँधना । २. चद्दर या आँगोछा लपेटने का एक ढंग जिसमें उसे शरीर के चारों ओर लपेटकर गले में बाँधते हैं ।

गातु
संज्ञा पुं० [सं०] १. कोयल । २. भौंरा । ३. गंधर्व । ४. गवैया । गानेवाला । ५. गान । ६. चलनेवाला । पथिक । ७. पृथ्वी ।

गात्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. अंग । देह । शरीर । २. हाथी के अगले पैरों का ऊपरी भाग । ३. शरीर का कोई अंग या अवयब (को०) ।

गात्रक
संज्ञा पुं० [सं०] शरीर [को०] ।

गात्रकर्षण
संज्ञा पुं० [सं०] शरीर का कृश या कमजोर होना [को०] ।

गात्रगुप्त
संज्ञा पुं० [सं०] श्रीकृष्ण के एक पुत्र का नाम जो लक्षणा या लक्ष्मणा के गर्भ से उत्पन्न हुए थे ।

गात्रभंगा
संज्ञा स्त्री० [सं० गात्रभङ्गा] केवाँच । कौंच ।

गात्रमार्जनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] आँगोछा । तौलिया [को०] ।

गात्ररुह
संज्ञा पुं० [सं०] बाल रोआँ । रोम [को०] ।

गात्रयष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दुबला पतला शरीर । २. शरीर [को०] ।

गात्रलता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'गात्रयष्टि' ।

गात्रवत्
संज्ञा पुं० [सं०] श्रीकृष्ण के एक पुत्र का नाम जो लक्षणा के गर्भ के उत्पन्न हुए थे । गात्रगुप्त ।

गात्रवर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] स्वरसाधन की वह प्रणाली जिसमें साती स्वरों में से प्रत्येक का उच्चारण तीन बार करते हैं । जैसे— सा सा सा, रे रे रे, ग ग ग आदि ।

गात्रविद
संज्ञा पुं० [सं० गात्रबिन्द] श्रीकृष्ण के एक पुत्र जो लक्षण के गर्भ से उत्पन्न हुए थे ।

गात्रसंकोचनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] साही नामक जंतु [को०] । विशेष—यह उछलते या छलाँग मारते समय अपने शरीर को सिकोड़ लेता है ।

गात्रसमित
वि० [सं० गात्रसम्मित] तीन महीने के ऊपर का (गर्भ) । (गर्भ) । जिसका शरीर बन गया हो ।

गात्रसौष्ठव
संज्ञा पुं० [सं०] शरीर की सुंदरता । देह की सुघराई ।

गात्रानुलेपनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] उबटन । अगरग [को०] ।

गात्रावरण
संज्ञा पुं० [सं०] शरीर ढकनेवाली वस्तु । कवच । जिरह- बख्तर [को०] ।

गाथ (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. गान । २. स्तोत्र ।

गाथ (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० गाया] १. यश । प्रशंसा । उ०—उत्तम गाथ सताथ जबै धनु श्री रघुनाथ जो हाथ कै लीनो ।—केशव (शब्द०) । २. कथा । वृत्तांत । हाथ । उ०—गुरु शिष के संवाद की कहौं अब गाथ नबीन । पेखि जाहि जिज्ञासु जन, होत विचार प्रवीन ।—निश्चल (शब्द०) ।

गाथक
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० गाथिका] गानेवाला । गायक ।

गाथा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. स्तुति । २. वह श्लोक जिसमें स्वर का नियम न हो । ३. प्राचीन काल की एक प्रकार की ऐतिहासिक रचना जिसमें लोगों के दान, यज्ञादि का वर्णन होता था । ४. आर्या नाम का वृत्ति । ५. एक प्रकार की प्राचीन भाषा जिसमें संस्कृत के साथ कहीं कहीं पाली भाषा के विकृत शब्द भी मिले रहते हैं । ६. श्लोक । ७. गीत । ८. कथा । वृत्तात । हाल । ९. बारह प्रकार के बौद्ध शास्त्रों में चौथा । १०. पारसियों के कारण धर्मग्रंथ का एक भेद । जैसे,—गाथा अह्रवैति गाथा उष्टवैति इत्यादि ।

गाथाकार
संज्ञा पुं० [सं० गाथा + √ कृ > कार (शब्द०)] १. प्राकृत की गाथा रचनेवाला व्यक्ति । २. स्तुति काव्य का रचयिता । ३. गायक । गवैया ।

गाथिक
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० गाथीका] दे० 'गाथक' [को०] ।

गाथी
संज्ञा पुं० [सं० गाथिन्] १. सामवेद गानेवाला । २. वह व्यक्ति जो गायन से परिचित हो [को०] ।

गाद †
संज्ञा संज्ञा [सं० गाध = जल के नीचे का तल] १. तरल पदार्थ के नीचे बैठी हुई गाढ़ी चीज । तलछट । मुहा०—गाद बैठना = (१) तलछट बैठना । (२) कीट जमना । २. तेल का चीकट । कीट । ३. गाढ़ी चीज । जैसे, —गोंद, राब ।

गादड़ (१) †
वि० [सं० कातर या कदर्य, प्रा० कादर] कायर । डरपोक । भीरु ।

गादड़ (२)
संज्ञा पुं० १. वह बैल जो मारने पर भी न चले । २. [स्त्री० गादड़ी] गीदड़ । सियार ।

गादड़ (३)
संज्ञा पुं० [सं० गड़ुर] भेड़ा । मेढ़ा । मेष ।

गादर (१) †
वि० [सं० कातर या कदर्य, प्रा०, कादर] १. डरपोक । भीरु । कायर । २. सुस्त । मट्ठर ।

गादर (२) †
वि० [हि० गदरना] गदराया हुआ ।

गादर (३)
संज्ञा पुं० १. वह बैल जो जोतने पर मारने से भी आगे न बढ़े । २. [स्त्री० गादरि, गादरी] गीदड़ । उ०—तहाँ भूप देखेउ अस सपना । पकरेउ पैर गादरी अपना । भूप छुड़ायों चाहत निज पग । तजत न गादरि पकरि जो पग रग ।— निश्वल (शब्द०) ।

गादह पु
संज्ञा पुं० [सं० गर्दभ, प्रा० गद्दभ, गद्दह] दे० 'गदहा' । उ०—जइ करहउ खोड़उ हुवइ गादह दीजइ दग्ग ।—ढोला०, दू० ३३३ ।

गादा
संज्ञा पुं० [सं० गाधा = दलदल] १. खेत का वह अन्न जो अच्छी तरह न पका हो । अधपका अन्न । गद्दर । जैसे,—मटर का गादा, बाजरे का गादा । २. बे पकी फसल । कच्ची फसल । ३. महुए का फूल जो पेड़ से टपका हो । उ०—गुर गोरस महुआ कइ गादा । एनहूँ काँ मुँह धोई दादा ।—लोकोक्ति । ४. हरा महुआ ।

गादी
संज्ञा स्त्री० [हिं० गद्दी] एक पकवान का नाम । यह एक छोटी टिकिया होती है जिसमें इलायची, चिरौजी और गरी मिलाकर पूर भरा रहता है । २. दे० 'गद्दी' । उ०—गह धरती रिणमल जिण गादी । विग्रहिया खागे समवादी ।—रा० रू०, पृ० १४ ।

गादुर
संज्ञा पुं० [सं० कातर, प्रा० कादर = डरपोक] चमगादर । उ०—पानी रहे मच्छ औ दादुर, टाँगे रहे बने मँह गादुर ।— सं० दरिया, पृ० ६ ।

गाध (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्थान । जगह । २. जल के नीचे का स्थल । थाह । ३. नदी का बहाव । पूल । ४. लोभ । लिप्सा ।

गाध (२)
वि० [वि० स्त्री० गाधा] १. जिसे हलकर पार कर सकें । जो बहुत गहरा न हो । छिछला । पायाब । २. थोड़ा । स्वल्प । जैसे,—तो गति अगाध सिंधु, गाल मति मेरी वह असाधुता को राधे अपराध सिंधु क्षमा कीजिये । देव (शब्द०) ।

गाधा
संज्ञा स्त्री० [सं०] गायत्री स्वरूपा महादेवी ।

गाधि
संज्ञा पुं० [सं०] विश्वामित्र के पिता का नाम । विशेष—ये कुशिक राजा के पुत्र थे । हरिवंश में लिखा है कि कुशिक ने इंद्र के समान पुत्र प्राप्त करने के लिये तपस्या की तब इंद्र के अंश से विश्वामित्र उत्पन्न हुए । यौ०—गाधिनगर । गाधिपुर । गाधिनंदन । गाधितनय । गाधि- पुत्र । गाधिसुअन ।

गाधिपुर
संज्ञा पुं० [सं०] कान्यकुब्ज । कन्नौज ।

गाधय
संज्ञा पुं० [सं०] विश्वामित्र ।

गाधया
संज्ञा स्त्री० [सं०] गाधि की कन्या सत्यवती जो भार्गवपुत्र ऋचीक की पत्नी थी ।

गान
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० गेय, गेतव्य] १. गाने की क्रिया । संगीत । गाना । यौ०—गानाविद्या = संगीत कला । २. गाने की चीज । गीत । ३. ध्वनि । आवाज । शब्द (को०) । ४. स्तवन । प्रशंसन । बखान (को०) । ५. गमन । चलना [को०] ।

गानना पु
क्रि स० [सं० गान] गाना । गान करना । उ०— संकर नीके जानत सारद नारद गानत । तातै सबै जगतगुरु गोपिन गुरु करि मानत ।—नंद० ग्रं०, पृ० ४१ ।

गाना (१)
क्रि० स० [सं० गान] १. ताल, स्वर के नियम के अनुसार शब्द उच्चारण करना । आलाप के साथ ध्वनि निकालना ।जैसे,—गीत गाना, मलार गाना । २. मधुर ध्वनि करना । जैसे,—तूती क गाना, कोयल का गाना । ३. वर्णन करना । विस्तार के साथ कहना । उ०—द्विजदेवजू देखि अनोखी प्रभा चलि चारन कीरति गायो करैं । चिरजीवो वसंत सदा द्विजदेव प्रसूनन की झरि लायो करैं । द्विजदेव (शब्द०) । मुहा०—अपनी अपनी गाना = अपनी अपनी बात सुनाना । अपना दुखड़ा रोना । अपनी ही गाना = अपनी ही बात कहते जाना । अपना ही हाल कहना । अपना ही विचार प्रकट करना । अपने ही मतलब की बात करना । जैसे, तुम तो अपनी ही गाते हो, दूसरे की सुनते नहीं । ४. स्तुति करना । प्रशंसा करना । बखान करना । जैसे,—(क) सब लोग उसका गुन गाते हैं । (ख) वह जिससे पात है, उसकी गात है । उ०—(क) गाइये गणपति जगबंदन ।— तुलसी (शब्द०) । (ख) द्विजदेव जू देखि अनोखी प्रभा अलि चारन कीरति गायो करैं ।—द्विजदेव (शब्द०) । मुहा०—गाना बजाना = आमोद प्रमोद करना । उत्सव मनाना । जैसे,—सब लोग गाते बजाते अपने घर गए ।

गाना (२)
संज्ञा पुं० १. गाने की क्रिया । गान । २. गाने की चीज । गीत । जैसे,—कोई अच्छा गाना सुनाओ ।

गानिनी, गानिली
संज्ञा स्त्री० [सं०] बच ।

गानी
वि० [सं० गानिन्] १. गानेवाला । जानेवाला [को०] ।

गाफल †
वि० [अ० ग़ाफ़िल] दे० 'गाफिल' । उ०—अकबर साह गाफल गुमान सूँ भास्यौ । तहबर खाँन हाथ सब राजबोझ धारयौ ।—रा० रू०, पृ० १०१ ।

गाफिल
वि० [अ० ग़ाफ़िल] [संज्ञा ग़फ़लत] १. बेसुध । बेखबर । २. असावधान । बेपरवाह ।

गाब
संज्ञा पुं० [देश०] एक पेड़ । विशेष—इसके फल से एक प्रकार का चिपचिपा रस निकलता है जो नाव के पेंदे में लगाया जाता है और जाल में माँझा देने के काम में आता है ।

गाबर पु
संज्ञा पुं० [सं० गज + वर, प्रा० गय + वर] दे० 'गैयर' । उ०—उषट्टै घटें गाबरं तुंड तुट्टै ।—पृ० रा०, १ । ४५४ ।

गाबलीन
संज्ञा स्त्री० [अं० केबुल + लेड] एक औजार जिससे जहाज पर पाल चढ़ाया जाता है । सिंजालपारी । विशेष—इसमें चरख पर चढ़ी हुई एक मोटी रस्सी होती है, जो झटके से ऊपर चढ़ती है ।

गाभ
संज्ञा पुं० [सं० गर्भ, पा० गब्भ] १. पशुओं का गर्भ । मुहा०—गाभ डालना = (१) गर्भ गिराना । गर्भ फेंकना । बच्चा ढालना । (२) अत्यंत भयभीत होना । २. दे० 'गाभा' । ३. बरतन का साँचा जिसपर गोबरी की तह न चढ़ाई गई हो । ४. वृक्ष, पेड़ आदि का हीर । उ०—(क) चंदन गाभ की भुजा सँवारी । जनों सो बेल कमल पीनारी ।— जायसी (शब्द०) । (ख) आय जुरी भौंरन की पाँती । चंदन गाभ बास की माँती ।—जायसी (शब्द०) ।

गाभा
संज्ञा पुं० [सं० गर्भ, प्रा० गब्भ] [वि० गाभिन] १. नया निकलता हुआ मुँहबंधा पत्ता जो नरम और हलका रंग का होता है । नया कल्ला । कोंपल । उ०—ऐपन की ओप इंदु कुंदन की आभा चंपा केतकी की गाभा जीत जोतिन सों जटियत ।—देव (शब्द०) । २. केले आदि के डंठल के अंदर का भाग । पेड़ के बीच का हीर । २. लिहाफ, रजाई आदि के अंदर की निकाली हुई पुरानी रूई । गुद्दड़ । भरतवालों के साँचे के अंदर का भाग । ५. कच्चा अनाज । खड़ी खेती ।

गाभिन
वि० स्त्री० [सं० गार्भिणी, प्रा० गाव्भिण] दे० 'गाभिनी' ।

गाभिनी
वि० स्त्री० [सं० गार्भिणी, प्रा, गाब्भिणी] जिसके पेट में बच्चा हो । गर्भिणी । विशेष—इस शब्द का प्रयोग चौपायों के लिये अधिक होता है, मनुष्यों के लिये कम ।

गाम (१)
संज्ञा पुं० [सं० ग्राम, पा० गाम] गाँव । उ०—गाम तो है नंद गाम तहाँ की हौं प्यारी ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३६९ ।

गाम (२)
संज्ञा पुं० [फ़ा०] पग । कदम । डग ।

गामचा
संज्ञा पुं० [फ़ा०] घोडे़ के पैर का वह भाग जो सुम और टखने के बीच में होता है । यह चार अंगुल के लगभग होता है ।

गामजन
वि० [फ़ा०] चलनेवाला । गमन करनेवाला [को०] ।

गामत
संज्ञा स्त्री० [सं० गमन] निकास ।—(जहाज) । मुहा०—गामत होना = पानी का टपकना या रसना ।

गामभोजक
संज्ञा पुं० [पा० गाम + सं० भोजक] ग्रामणी । मुखिया ।—हिंदु० सभ्यता, पृ० २९३ ।

गामरू पु
वि० [हिं०] गमन करनेवाला । उ०—मन नितंब पर गामरू तरफरात परि लंक । बर बेनी नीगिनि हन्यौ खर बीछी को डंक ।—स० सप्तक; पृ० २३६ ।

गामिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्राचीन काल की एक प्रकार की नाव । विशेष—यह नाव ९६ हाथ लंबी, १२ हाथ चौड़ी और ९ हाथ ऊँची होती थी और समुद्रों में चलती थी । ऐसी नाव पर यात्रा करना अशुभ और दुःखदायी समझा जाता था ।

गमिय पु
वि० [सं० ग्रामिक, प्रा० गामिय] 'गामी' । उ०— बुल्यौ बर गामिय गुज्ज गवार । कहै सुरतानप सेन उबार ।— पृ० रा०, १२ । १३९ ।

गामी (१)
वि० [सं० ग्रामीन्] [वि० स्त्री० गामिनी] १. चलनेवाला । चालवाला । जैसे,—गाजगामिनी, हंसगामी, रथगामी । उ०— कठिन भूमि कोमल पद गामी । कौन हेतु बन बिचरहु स्वामी ।—तुलसी (शब्द०) । २. गमन करनेवाला । संभोग करनेवाला । रमण करनेवाला । जैसे,—परस्त्रीगामी, वेश्या— गामी इत्यादि ।

गामी (२)पु
वि० [सं० ग्रामीन्] १. ग्राम का निवासी । २. गँवार । मूर्ख । उ०—गामी गवार मैवात पति राजराज सह्मौ मिरै ।— पृ० रा०, १५ । २१ ।

गामुक
वि० [सं०] जानेवाला ।

गायंतिका
संज्ञा स्त्री० [सं० गायन्तिका] हिमालय पर का एक स्थान जिसका इल्लेख महाभारत के उद्योग पर्व में है ।

गाय
संज्ञा स्त्री० [सं० गो] १. सींगवाला एक मादा चौपाय जिसके नर को साँड़ या बैल कहते हैं । विशेष—गाय बहुत प्राचीन काल से दूध के लिये पाली जाती है । भारतवासियों को यह अत्यंत प्रिय और उपयोगी है । इसके दूध और घी से अनेक प्रकार की खाने की चीजें बनाई जाती हैं । गाय बहुत सीधी होती है; बच्चा भी उसके पास जाय, तो नहीं बोलती । मुहा०—गाय की तरह काँपना = (१) बहुत डरना । (२) थर थर काँपना । थर्राना । गाय का बछिया तसे और बछिया का गाय तले करना = (१) हेरी फेरी करना । इधर उधर करना । (२) काम निकालने के लिये कुछ का छुछ प्रकट करना । २. बहुत सीधा सादा मनुष्य । दीन मनुष्य । जैसे,—वह बेचारा तो गाय है; किसी से नहीं बोलता ।

गायक
संज्ञा पुं० [सं०] [ स्त्री० गायकी] गानेवाला गवैया ।

गायकवाड़
संज्ञा पुं० [मरा० गायकवाड] बरौदा के महाराजाओं की उपाधि । बड़ौदा नरेशों की अपाधि ।

गायकी
संज्ञा स्त्री० [सं० गायक] १. गाने की क्रिया या भाव । गाने का तौर तरीका । २. गाने का काम । ३. दे० 'गायिका' ।

गायगोठ
संज्ञा स्त्री० [हिं० गाय + गोठ] गायों के रहनेवाला बाड़ा । गोशाला ।

गायण पु
संज्ञा पुं० [सं० गायन, प्रा० गायण] दे० 'गायन' ।

गायणी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० गायन, प्रा० गायण + हिं० ई (प्रत्य०)] गाने का धंधा करनेवाली स्त्री । उ०—गहकैं गायणी जी गावैं धवल मंगल गीत ।—र० रू०, पृ० ७१ ।

गायत
वि० [अ० गा़यत] बहुत अधिक । हद से ज्यादा । अत्यंत । जैसे,—वह गायत दरजे का पाजी है ।

गायत
संज्ञा स्त्री० १. उद्देश्य । मतलब । सबब । २. अंत । सीमा । छोर । किनारा [को०] ।

गायताल (१)
संज्ञा पुं० [हिं० गाय + तल] १. बैलों में निकृष्ट । निकम्मा चौपाया । २. निकम्मा और रद्दी चाज । गई गुजरी चीज ।

गायताल (२)
वि० निकम्मा । रद्दी । यौ०—गायताल खाता या गैतल खाता = गई बीती रकम का लेखा । बट्टा खाता । मुहा०—गायताल लिखना = बट्टे काते डालना । गया गुजरा समझना । जैसे,—टूटे मणि मालै निर्गुण गायताल लिखै पोथिन ही अंक मन कलह बिचारही ।—गुमान (शब्द०) । गायताल खाते लिखना या डालना = बट्टे काते में डालना । गया गुजरा समझना । गायताल खाते में जाना = बट्टे खाते में जाना । हजम होना । हड़प होना । गया गुजरा होना । जैसे,—इतना रुपया जो हमने तुम्हें दिया, सब गायताल खाते में गया ।

गायत्र
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० गायत्री] गायत्री छंद ।

गायत्री (१)
संज्ञा पुं० [सं० गायत्रिन्] [स्त्री० गायत्रिणी] १. खैर का पेड़ । २. उदगाता । साम का गायक ।

गायत्री (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक वैदिक छंद का नाम । विसेष—यह छंद तीन चरणों का होता है और प्रत्येक चरण में आठ—आठ अक्षर होते हैं । इसके आर्षी दैवी, आसुरी, प्राजापत्या, याजुषी, साम्नी, आर्ची और ब्रह्मी आठ भेद हैं, जिनमें क्रमशः २४, १, १५, ८, ६, १२, १८ और ३६ वर्ण होते हैं । प्रत्येक भेद के पिपीलिका, मध्य, निचृत्, यवमध्या भूरिक, विराट और स्वराट आदि अनेक भेद होते हैं । २. एक पवित्र मंत्र का नाम जिसे सावित्री भी कहते हैं । विशेष—हिंदूधर्म में यह मंत्र बडे़ महत्व का माना जाता है । द्विजों में यज्ञोपवीत के समय वेदारंभ संस्कार करते हुए आचार्य इस मंत्र का उपदेश ब्रह्मचारी को करता है । इस मंत्र का देवता सविता और ऋषि विश्वामित्र हैं । मनु का कतन है कि प्रजापति ने आकर उकार और मकार वर्णों, भूः, भुवः और स्वः तीन व्यहृतियों तथा सावित्री मंत्र के तीनों पादों को ऋक्, यजुः और सामवेद से यथाक्रम निकाला है । इस सावित्री मंत्र के भिन्न विद्वानों ने भिन्न भिन्न अर्थ किए हैं और ब्राह्मणों, उपनिषदों से लेकर पुराणों और तंत्रों तक में इसके महत्व का वर्णन है । सावित्री मंत्र यह है—तत्सवितुर्वरेण्य । भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् । ३. खैर । ४. दुर्गा । ५. गंगा ।६. छह अक्षरों की एक वर्णवृत्ति । इसके तनुमध्या, शशिवदना आदि अनेक भेद हैं ।

गायन
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० गायनी] १. गानेवाला । गवैया । गायक । २. गाने का व्यवसाय करनेवाला । विशेष—मनु ने गायन के अन्नभक्षण का निषेध किया है । ३. गान । गाना । ४. कार्तिकेय ।

गायनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] गाने का धंधा करनेवाली स्त्री ।

गायब (१)
वि० [अ० ग़ायब] लुप्त । अंतर्धान । क्रि० प्र०—करना ।—होना । यौ०—गायब गुल्ला = ऐसा लुप्त कि फिर पता न लगे । मुहा०—गायब करना = चुरा लेना । उड़ा लेना । जैसे,—वह देखते ही देखते चीज गायब कर लेता है । गायब होना = चोरी जाना ।

गायब (२)
संज्ञा पुं० [अ०] शतरंज खेलने का एक प्रकार । विशेष—इसमें शतरंज की बिसात से परोक्ष में बैठकर खेलते हैं । इस खेल में बिसात या तो किसी कोठरी में अथवा अन्यत्र आड़ में बिछी रहती है अथवा खेलाड़ी बिसात की ओर पीठ करके बैठते हैं ऐर दूसरे आदमी उनके आज्ञानुसार मुहरों को चलते हैं । क्रि० प्र०—खेलना ।

गाय बगला
संज्ञा पुं० [हिं० गाय + बगला] एक प्रकार का बगला । विशेष—यह धान के खेतों में होता है । यह पशुओं के झुंड के साथ रहता है और उनके कीड़ों को खाता है । इसे सुरखिया बगला भी कहते हैं ।

गायबानर
क्रि० वि० [अ० गायबानह्] १. गुप्त रीति से । २. पीठ पीछे । अनुपस्थिति में ।

गायरौन †
संज्ञा पुं० [सं० गोरोचन] गोरोचन ।

गायिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. गानेवाली स्त्री । २. एक मात्रिक छंद । विशेष—इसके पादों में क्रमशः १२ + १८ और १२ + २० मात्राएँ होती हैं और प्रत्येक चरण के अंत में गुरु तथा बीस बीस मात्राओं के पीछे एक जगण होता है । बीस मात्राओं के पीछे यदि चार लघु आ जायँ, तो भी दोष नहीं माना जाता । जैसे,—आदौ बारा मत्ता दूजे द्वै नौ सजाय मोद लहो । तीजै भानू कीजै चौथे बीसे जु गायिनी सुकति कहो ।

गारंटी
संज्ञा स्त्री० [अं०] प्रतीत । विश्वास । वचन । आश्वासन । उ०—इस बात की गारंटी मुझसे लो ।—संन्यासी, पृ० २९२ ।

गार (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० गाली] गाली । उ०—बिन औसर न सुहाय तन चंदन लीपै गार । औसर की नीकी लगै मीत सौ सौ गार ।—रसनिधि (शब्द०) ।

गार (२)
संज्ञा पुं० [अ० ग़ार] १. गहरा गड्ढा । गर्त । खड्ड । २. गुफा । कंदर ।

गार (३)पु
संज्ञा पुं० [सं० आगार] दे० 'आगार' । उ०—दार गार सुत पति इनकार (कहो) कवन आहि सुख ।—नंद० ग्रं०, पृ० ४२ ।

गार (४)पु
संज्ञा पुं० [हिं० गारा] दे० 'गारा' । उ०—कंठी माला काठ की तिलक गार का होय ।—कबीर० बानी, पृ० ३५ ।

गार (५)
प्रत्य० [फ़ा०] करनेवाला । जैसे,—खिदमतगार ।

गारड †
संज्ञा पुं० [अं० गार्ड] दे० 'गार्ड' । उ०—इच्छा कर्म सँजोगी इन्जिन गारड आप अकेला है ।—श्यामा०, पृ० ११४ ।

गारड़्
संज्ञा पुं० [सं० गारुडी] दे० 'गारुडी' । उ०—तुम्ह गारडू मैं विष का माना । काहे न जिवावौ मेरे अमृत दाता ।—कबीर ग्रं०, पृ० ११४ ।

गारत
वि० [अ० ग़ारत] नष्ट । बरबाद । मटियामेट । ध्वस्त । क्रि० प्र०—करना ।—होना ।

गारत्त पु
संज्ञा पुं० [सं० गर्त] दे० 'गर्त' । उ०—प्रविस क्यो गारत्त गिरि, जय जय बचन सरीर हुआ ।—पृ० रा०, १ । १९८ ।

गारद
संज्ञा स्त्री [अ० गार्ड] १. सिपाहियों का झुंड जो एक अफसर के मातहत हो । २. सिहाहियों का झुंड जो किसी व्यक्ति या वस्तु की रक्षा के लिये अथवा किसी असानी को भागने से रोकने के ल्ये नियत हो । पहरा चौकी । उ०— जब अँधेरा हुआ, तब हम लोगों की निगरानी के लिये जो गारद थी, वह डबल कर दी गई ।—द्विवेदी (शब्द०) । मुहा०— गारद बैठना = पहरा बैठना । हिफाजत या निगरानी के लिये सिपाही होना । गारदबै ठाना = पहरा बैठाना । चौकी बैठाना । हिफाजत या निगरानी के लिये सिपाही नियत करना । गारद में करना = पहरे में करना । हवालात में बंद करना । हाजत में कतरना । गारद में डालना या छोड़ना = हवालात में देना । हाजत में करना । पहरे में करना । गारद में देना = हवालात में बंद करना । गारद में रखना = पहरे में रखना । हवालात में रखना । नजरबंद रखना ।

गारना (१)
क्रि० स० [सं० गालन = निचोड़ना] १. दबाकर पानी या रस निकालना । निचोड़ना । उ०—गीले कपडे़ उसने देह से उतारे, उनके भली भाँति गारा, देहको पोंछा; पीछे उन्हीं कपडों को पहन लिया ।—अयोध्या (शब्द०) । २. (दूध) दूहना । जैसे, गाय गारना । ३. पानी के साथ घिसना जिसमें उसका अंश पानी में मिले । जैसे,—चंदन गारना । उ०—बिन औसर न सुहाय तन चंदन लीपै गार । औसर की नीकी लगै मीता सौ सौ गार ।—रसनिधि (शब्द०) । पु ४. निकालना । त्यागना । दूर करना । उ०—मार दई अरविंदन की तऊ मानत नाहिं न औगुन गारे । गारी दई पछितानि भरी अब लाज गहो कछु नंददुलारे ।—(शब्द०) ।

गारन (२) †पु
क्रि० स० [सं० गल] १. गलाना । घुलाना । मुहा०—तन या शरीर गारना = शरीर गलाना । शरीर के कष्ट दोना । तप करना । उ०—ब्रज युवतिन मन हरयो कन्हाई ।— रास रंग रस मन रुचि आन्यो निसि बन नारि बुलाई । तब तन गारि बहुत श्रम कीन्हों सो फल पूरन दैन । बेनुनाद रस विवस कराई सुनि धुनि कीनो गौन ।—सूर (शब्द०) । १. नष्ट करना । बरबागद करना । खोना । उ०—आछो गात अकारथ गारयो । करी न भक्ति श्यामसुंदर सों जन्म हुआ ज्यों हारयो ।—सूर (शब्द०) ।

गारभेली
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का जंगली फालसा । विशेष—इसका पेड़ बहुत छोटा होता है और यह उत्तर और पूर्व भारत तता हिमालय की तराई में चार हजार फीट की ऊँचाई तक होता है । इसकी छाल भूरे हरे रंग की होती है और इसकी डालियों के रेशे से रस्सियाँ बनाई जाती हैं । यह कातिक, अगहन में फूलता और पूस से बैसाख तक फलता है । फल देहातियों के खैने के काम आता है ।

गारहस्थ पु
संज्ञा पुं० [सं० गार्हस्थ्य] गार्हस्थ्य । गृहस्थी । उ०— केचित् गारहस्थ बहु भाँती । पुत्र कलत्र बँधे दिन राती ।—सुंदर० ग्रं०, भा० १, पृ० ८९ ।

गारा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० गारना] मिट्टी अथवा चूने, सुर्खी आदि को पानी में सानकर बनाया हुआ लसदार लेप जिससे ईटों की जोड़ाई होती है । यौ०—चूने गारे का काम = पलस्तर का काम । गच का काम ।

गारा (२)
संज्ञा पुं० [देश०] संकीर्ण जाति का एक राग जो दोपहर को गाया जाता है ।

गारा (३)
संज्ञा पुं० [देश०] वह नीची भूमि जिसमें पानी बहुत दिन न टिके ।

गारा कान्हड़ा
संज्ञा पुं० [देश०] संपर्ण जाति का एक राग जो संध्या के उपरांत गाया जाता है ।

गारि पु
संत्रा स्त्री० [सं० गालि] दे० 'गालि' । उ०—दीपक जोर लै चली बाट मैं, छबि सों बड़ौ करि देति गारि ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३५३ ।

गारित्र
संज्ञा पुं० [सं०] धान्य । चावल । [को०] ।

गारिय पु
संज्ञा स्त्री० [सं० गालि] दे० 'गाली' । उ०—गारिय सुदीन उग्गार हत्थ, विरच्यो सु वाहि पत्थर समथ्थ ।—प० रासो, पृ० ४० ।

गारी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० गालि] १. गाली । दुर्वचन । उ०—नारी गारी बिनु नहिंबोले पूत करै कलकानी । घर में आदर कादर को सों खीझत रैन बिहानी ।—सूर (शब्द०) । २०. कलंक- जनक आरोप । चरित्र संबंधी लांचन । मुहा०—गारी आना, पड़ना, लगाना = कलंक लगाना । लांछन लगाना । दाग लगाना । बदनामी होना । उ०—लोचन लालाच भारी । इनके लए लाज या तन की सबै श्याम सों हारी । बरजत गात पिता पति बांधव अरु कुल गारी । तदपि रहत न नंदनंदन बिनु कठिन प्रकृति हठ धारी ।—सूर (शब्द०) । †गारी देना = दे० 'गारी बकना' । उ०—चंगुल चेहरा कइलन खेत । बुलबुल अइलन गारी देत । ए बुलबुल तूँ काहें गारी दाल/?/अपने केत क भूसी ल/?/हमरी मजुरी द/?/(बच्चों के गीत) गारी बकना = अपशब्द, अश्लील शब्द कहना । लांछित करना । गारी लगाना = कलंकित करना । दाग लगाना । विं० दे० 'गाली' । ३. एक गीत जो विवाह आदि में स्त्रियाँ भोजन के समय गाती हैं । उ०—जेंवत देहिं मधुर धुनि गारी । लै लै नाम पुरुष अरु मारी ।—तुलसी (शब्द०) । क्रि० प्र०—गाना ।—देना ।

गारुड़ (१)
संज्ञा पुं० [सं० गारुड़] १. जिस मंत्र का देवता गरुड़ हो । साँप का विष उतारने का मंत्र । उ०—आवति लहरि बिरहा की को हरि बेगि हकारै । सूरदास गिरिधर जो आवहिं हम सिर गारुड़ डारैं ।—सूर (शब्द०) । २. सेना की एक व्यूहरचना जिसमें सेना को गरुड़ के आकार की बनाते हैं । इसे गरुडव्यूह भी कहते हैं । ३. मरकट । मणि । पन्ना । ४. सुवर्ण । सोना । ५. एक अस्त्र का नाम । गारुत्मक । ६. गरुड़ पुराण ।

गारुड़ (२)
वि० [वि० स्त्री० गारुडी] गरुड़ संबंधी । गरुड़ का ।

गारुड़ि
संज्ञा पुं० [सं० गारुडि] १. संगीत शास्त्र में आठ प्रकार के तालों में से एक । २. गरुड़ी । उ०—तब सरूप गारुड़ि रघुनायक मोहि जिआएउ जन सुख दायक ।—मानस, ६ । ९३ ।

गारुड़िक
संज्ञा पुं० [सं० गारुडिक] १. साँप का विष झाड़नेवाला । गारुड़ी । २. मंत्र साँप पकड़नेवाला । सँपेरा ।

गारुड़ी
संज्ञा पुं० [सं० गारुडिन] मंत्र से साँप का विष उतारनेवाला । साँप झाड़नेवाला । उ०—(क) चले सब गारुड़ी पछिताइ । नेकहू नहिं मंत्र लागत समुझि काहु न जाइ ।— सूर (शब्द०) । (ख) डसी री माई श्याम भुअंगम कारे । आनहु बेगि गारुड़ी गोविंद जो यहि विषहि उतारै ।—सूर (शब्द०) । २. साँप पकड़नेवाला । सँपेरा ।

गारूत्मत (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. मरकत । पन्ना । २. गरुड़ जी का अस्त्र । गारुड़ ।

गारुत्मत (२)
वि० गरुड़ संबंधी या गरुड़ का ।

गारुरि † गारुरी †
संज्ञा पुं० [सं० गारुडि] दे० 'गारुड़ि' । उ० — कच विषधर सरवर डसा, मूरि न गारुरि संग । नख सिक सेतीं लहरि जनु, बिथुरि गई सू अंग ।—चित्रा०, पृ० ४७ । (ख) जाँवत गुनी गारुरी आए । ओझा बैद सयान बोलाए ।— जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० २०० ।

गारो (१)
संज्ञा पुं० [सं० गर्व] १. गर्व । घमंड । अहंकार । अभिमान । उ०—देखत बल दूरि करयो मेघनाद गारो । आपुनि भयो सकुचि सूर बंधन ते न्यारो ।—सूर (शब्द०) । (ख) सुनि खग कहत अंब औंगी रहि समुजि प्रेम पथ न्यारो । गएते प्रभु पहँचाई फिरे पुनि करत करम गुन गारो ।—तुलसी (शब्द०) २. मान । प्रतिष्ठा । उ०—जो मेरे लाल खिझावै । सो अपनो कियो फल पावै । तोहि दैहौं देस निकारो । ताको ब्रज नाहिन गारो ।—सूर (शब्द०) । ३. गृह । निवास । घर ।

गारो (२)
संज्ञा पुं० [देश०] १. एक पहाड़ी का नाम जो आसाम के दक्षिण पश्चिम में है । २. एक जंगली जाति जो गारो पहाड़ी में रहती है ।

गारौ पु
संज्ञा पुं० [सं० गौरव या सं० गरु] गौरव । गुरुता । उ०— जिन्ह घर कंता ते सुखी तिन्ह गारौ औ गर्व ।—जायसी ग्रं० पृ० १५२ ।

गार्ग (१)
वि० [सं०] १. गर्ग संबंधी । २. गर्ग द्वारा निर्मित, या कथित ।

गार्ग (२)
संज्ञा पुं० संगीत में एक ताल [को०] ।

गार्गि
संज्ञा पुं० [सं०] गर्ग मुनि का सूत्र [को०] ।

गार्गी
संज्ञा स्त्री० [सं०] गर्ग गोत्र में उत्पन्न एक प्रसिद्ध ब्रह्मवादिनी स्त्री । इसकी कथा बृहदारणयक उपनिषदृ में है । गार्गी वाचक्नवी । २. दुर्गा । ३. याज्ञावल्क्य ऋषि की एक स्त्री का नाम ।

गार्गीय
वि० [सं०] १. गार्ग का रचा हुआ । २. गर्ग संबंदी [को०] ।

गार्गेय
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० गार्गेयी] १. गार्ग गोत्र का पुरुष । २. गार्ग रचित ग्रंथ [को०] ।

गार्ग्य
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० गार्गी] १. गार्ग गोत्र में उत्पन्न पुरुष । २. एक प्रचीन वैयाकरण जिनके मत का उल्लेख यास्क और पाणिनि ने किया है । निरुक्त टींकाकार दुर्गासिंह के अनुसार सामवेद के पदपाठ की रचना इन्हीं ने की थी । इनकी बनाई एक स्मृति भी है ।

गार्जर
संज्ञा पुं० [सं०] गाजर [को०] ।

गार्जियन
संज्ञा पुं० [अं०] देखभाल करनेवाला व्यक्ति । संरक्षक । अभिभावक । उ०—मेरे गार्जियन की हैसियत से इस प्रकार की सूचना प्राप्त करने के संबंध में उनकी उत्सुकता स्वाभाविक है ।—पर्दें०, पृ० ६४ ।

गार्ड
संज्ञा पुं० [अं०] १. पहरा देनेवाला । मनुष्य । रक्षक । यौ०—बाडीगार्ड । २. रेल का वह प्रधान उत्तरदाता कर्मचारी जो ट्रेन की रक्षा के लिये पीछे ब्रेक में रहा करता है । इसके आज्ञानुसार इंजन का ड्राइवर गाड़ी रोकता और चलाता है । ३. निगरानी रखनेवाला मनुष्य । निरीक्षक । जैसे, इमतिहान का गार्ड ।

गार्डेन
संज्ञा पुं० [अं०] बाग । बगीचा । यौ०—कंपनी गार्डेन । गार्डेन पार्टी । गार्डेन सिटी । गार्डेंन सुपरिटेंडेंट । गार्डेन हाउस ।

गार्डेन पार्टी
संज्ञा स्त्री० [अं०] वह भोज जो नगर के बाहार किसी बाग बगीचे में दिया जाय ।

गार्दभ
वि० [सं०] गर्दभ संबंधी । गदेह का [को०] ।

गाद्धर्य
संज्ञा पुं० [सं०] तृष्णा । लोभ । लालच [को०] ।

गार्ध्र (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० गार्ध्री] गृध्र संबंधी [को०] ।

गार्ध्र (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. लालच । लोभ । २. तीर । बाण । [को०] । यौ०—गार्ध्र पक्ष, गार्ध्र वासा = वह बाण जिसमें गिद्ध के पंख लगे हों ।

गार्भ
वि० [सं०] १. गर्भ संबंधी । गर्भ का । २. गर्भ से उत्पन्न । गर्भज । ३. गर्भ के लिये हितकर [को०] ।

गार्ह
वि० [सं०] १. गृह अथवा गृहपति के लिये उचित । २. गृह संबंधी [को०] ।

गाहपत (१)
वि० [सं०] गृहपति संबंधी [को०] ।

गार्हपत (२)
संज्ञा पुं० [सं०] गृहपति होने की स्थिति या भाव । गृह- पतित्व [को०] ।

गार्हपत्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. दे० 'गार्हपत्याग्नि' । २. गार्हपत्य अग्नि के रखने का स्थान । ३. साग्निक गृहस्थ [को०] ।

गार्हप्रत्याग्नि
संज्ञा स्त्री० [सं० गार्हपत्य + अग्नि] छह प्रकार की अग्नियों में से पहली और प्रधान अग्नि । विशेष—परिवार में पीढ़ी दर पीढी इस अग्नि को रखने का विधान है । यज्ञों में पात्रतपन आदि कर्म इसी अग्नि में किए जाते थे । श्रौतसूत्र के अनुसार अग्निहोत्र ग्रहण करने वाले के लिये इस अग्नि का रखना अत्यंतावश्यक है । साधारण भोजन पकाने से लेकर संस्कार तक सभी कृत्य इसी अग्नी में किए जाते हैं । शास्त्रानुसार प्रत्येक गृहस्थ को इस अग्नि की रक्षा करनी चाहिए ।

गार्हमेध
संज्ञा पुं० [सं०] पंचयज्ञ आदि गृहस्थों के कर्तव्य कर्म ।

गार्हस्थिक
वि० [सं० गार्हस्थ] गृहस्थ जीवन संबंधी । विशेष—यह शब्द संस्कृत व्याकरण से असाधु है पर हिंदी में इस शब्द का प्रयोग प्रचलित है ।

गार्हस्थ्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. गृहस्थाश्रम । २. गृहस्थ के मुख्य कृत्य । पंच महायज्ञ ।

गार्हस्थ्य विज्ञान
संज्ञा पुं० [सं० गार्हस्थ्य + विज्ञान] वह विज्ञान जिसमें गृह संबंधी बातों का विवरण रहता है । जैसे,—घर की व्यवस्था, भोजन आदि की तैयारी की पूरी जानकारी, बच्चों का पालन पोषण आदि ।

गाल (१)
संज्ञा पुं० [सं० गल्ल] १. मुँह के दोनों ओर ठुड्डी और कनपटी के बीच का कोमल भाग जो आँखों के नीचे होता हैं । गंड । कपोल । जैसे,—लाल गुलाल सो लीना मुठी भरि बाल के गाल की ओर चलाई ।—दाव (शब्द०) । मुहा०—गाल फुलाना = (१) गर्वसूचक आकृति बनाना । अभिमान प्रकट करना । जैसे,—सो भलु मनु न खाब हम भाई । बचन कहहिं सब गाल फुलाई ।—तुलसी (शब्द०) । (२) रूठकर न बोलना । रूठना । रिसाना । उ०—दोउ एक संग न होइ भुआलू । हँसब ठठाइ फुलाउब गालू ।—तुलसी (शब्द०) । गाल बजाना = (१) डींग मारना । बढ़ बढ़कर बातें करना । उ०—(क) वृथा मरहु जनि गाल बजाई । मनमोदकन कि भूख बुझाई—तुलसी (शब्द०) । (ख) बलवान है स्वान गली अपनी तोहि लाज न गाल बजावत सोहै ।—तुलसी (शब्द०) ।—(२) व्यर्थ बकवाद करना । मिथ्या प्रलाय करना । उ०—कबीर वर्णहिं फेरि के अवरण भई छिनार । बैठी आपु अतीत ह्वै कियो अनंत भतार । कबीर बठी शेष ह्वै बिना रूप की राँड़ । गाल बजावै नेति कहि कियो भतारहि भाँड़ ।—कबीर (शब्द०) । गाल में जाना = मुँह में पड़ना । काल के गाल में जाना = मृत्यु के मुख में पड़ना । मरना । गाल में भरना = खाने के लिये मुँह में रखना । गाल करना = (१) डींग हाँकना । बढ़ बढ़कर बातें करना । सीटना । उ०—मूढ़ मृषा जनि मारेसि गाला । राम बैर होइहै अस हाला ।—तुलसी (शब्द०) (२) व्यर्थ बकवाद करना । बड़बड़ाना । मिथ्या कल्पना । उ०—क्यों न मारे गाल बैठो काल डाढ़न बीच ।—तुलसी (शब्द०) । २. बड़बड़ाने का स्वभाव । बकवाद करने की लत । मुँहजोरी । उ०—हँस कह रानि गाल बड़ तोरे । दीन्ह लखन सिख अस मन मोरे ।—तुलसी (शब्द०) । मुहा०—गाल करना = (१) बोलने में शंका संकोच न कराना । मुँहजोरी करना । मुँह से अंडबंड निकालना । उ०—कत सिख देइ हमहिं कोउ माई । गालु करब केहि कर बल पाई ।— तुलसी (शब्द०) । (२) बढ़ बढ़कर बातें करना । डींग मारना । जैसे,—वह मघवा बलि लेतु है नित करि करि गाल । गिरि गोवर्द्ध न पूजिये जीवन गोपाल—सूर (शब्द०) । ३. मध्य । बीच । जैसे,—वे पर्वत के गाल में उड़ते दीखते हैं ।— वायुसागर (शब्द०) । ४. उतना अन्न जितना एक बार मुँह में डाला जाय । फंका । ग्रास । जैसे,—एक गाल मार लें तो चलें । मुहा०—गाल मारना = ग्रास मुख में रखना । कौर मुँह में डालना । ५. वह मुट्ठी भर अन्न जो चक्की में पीसने के लिये एक बार डाला जाता है । झींक । ६. मुँह । जैसे,—काल के गाल में जाना ।

गाल (२)
संज्ञा पुं० [देश०] तमाकू की एक जाति ।

गालगूल पु †
संज्ञा पुं० [हिं० गाल + अनु०] व्यर्थ बात । गपशप अनाप शनाप । अडबंड बात । उ०—हरहि जनि जन्म जाय गालगूल गपत । कर्मकाल गुन सुभाव सबके सीस तपत † ।— तुलसी (शब्द०) ।

गालन
संज्ञा पुं० [सं०] १. निचोड़ना । २. किसी तरल पदार्थ को एक बर्तन से दूसरे बर्तन में इस तरह डालना कि उसका मैल पहले ही बर्तन में रह जाय । ३. पिघलना । गल जाना [को०] ।

गालना (१)पु
क्रि० स० [सं० गालन] दे० 'गलाना' ।—उ०— यहुतन जालौ, यहु गालौं करवत सीस चढ़ाऊँ रे राम ।— दादू०, पृ० ५२० ।

गालना (२)पु
क्रि० स० [हिं० गाल] बोलना । कहना ।

गालना (३)पु
क्रि० स० [सं० गाल = फेंकना, दूर करना] छोड़ना । त्याग करना । उ०—सज्जण दुज्जण के कहे भड़िक न दीजइ गालि । हलिवइ हलिवइ छंडियइ जिम जल छडइ पालि ।— ढोला, दू० १९९ ।

गालबंद
संज्ञा पुं० [हिं० गाल + बंद] एक प्रकार का बंधन जिसमें चमड़े के तस्मे को किसी काँटी में फँसाकर अटकाते हैं ।— (जहाजी) । क्रि० प्र०—बाँधना ।

गालमसूरी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक पकवान या मिठाई । उ०—अरु तैसहि गालमसूरी । जेहि खातहिं मुख दुख दूरी ।—सूर (शब्द०) ।

गालव
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक ऋषि का नाम । विशेष—महाभारत के अनुसार ये विश्वामित्र जी के अंतेवासी थे । विद्या समाप्त कर समावर्तन के समय इन्होंने अपने गुरु विश्वामित्र जी ने इनके हठ से चिढ़कर आठ सौ श्यामकर्ण घोड़े माँगे । गालव जी ने राजा ययाति के पास जाकर उनसे आठ सौ श्यामकर्ण घोड़ों के लिये याचना की; पर ययाति के यहाँ भी आठ सौ श्यामकर्ण घोड़ें नहीं थे; अतः ययाति ने उन्हें अपनी कन्या, जिसका नाम माधवी था, देकर कहा— गालव जी, आप इस कन्या को ले जाइए; और जो दो सौ श्यामकर्ण घोड़े दे, उसे इससे एक पुत्र उत्पन्न कर लेने दीजिए । इस प्रकार आप आठ सौ श्यामकर्ण घोड़े लेकर अपने गुरु को गुरुदक्षिण दे दीजिए । गालव जी माधवी को लेकर हर्य्यशव राजा के पास गए; और हर्य्यशव ने दो सौ श्याम कर्ण घोड़े देकर उससे एक संतान उत्पन्न की । इसी तरह वे उसे दिवोदास और उशीनर के पास ले गए; और उन लोगों ने भी दो दो सौ घोड़े देकर उस कन्या से एक एक पुत्र उत्पन्न किया । अब गालव जी को कोई राजा ऐसा न मिला जो उन्हें शेष दो सौ घोड़े देकर माधवी से एक और पुत्र उत्पन्न करता । अंत को गलाव जी छह सौ घोड़े और माधवी को लेकर विश्वामित्र जी के आश्रम पर लौट गए और उन्होंने उनसे सब हाल कहा । विश्वामित्र जी ने उन छह सौ घोड़ों को ले लिया और उस कन्या से एक पुत्र उत्पन्न कर गालव जी को गुरुदक्षिणा के ऋण से मुक्त किया । हरिवंश में इन्हें विश्वा- मित्र जी का पुत्र लिखा है । २. एक प्रसिद्ध वैयाकरण जिनका मत पाणिनि ने अष्टाध्यायी में उद्धृत् किया है । ३. लोध का पेड़ । श्वेत लोध्र । ४. तेंदु का पेड़ । ५. एक स्मृतिकार ।

गालवि
संज्ञा पुं० [सं०] गालव के पुत्र प्राशंगवत् । इन्होंने कुणिगर्ग की एक वृद्धा कन्या से विवाह किया था ।

गाला (१)
संज्ञा पुं० [हिं० गाल = ग्रास] १. धुनी हुई रुई का गोला जो चरखे में कातने के लिये बनाया जाता है । पुनी । २. वह रूई जो कपास के डोडे के फटने पर उसमनें से निकलती है ।— (पंजाब) । मुहा०—रूई का गाला = बहुत उज्वल । सफेद । धौला । गाला सो = बहुत उजला । सफेद । धौला ।

गाला (२) †
संज्ञा पुं० [हिं० गाल] १. बड़बड़ाने की लत । अंडबंड बकने का स्वभाव । मुँहजोरी । कल्लेदराजी । २. ग्रास । कौर ।

गालि
संज्ञा स्त्री० [सं०] गाली [को०] ।

गलित
वि० [सं०] १. अर्क की तरह खींचा अथवा निचोड़ा हुआ । २. गलाया हुआ [को०] ।

गालिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] तंत्र की एक मुद्रा ।

गालिब
वि० [अ० गालिब] १. जीतनेवाला । बड़ जानेवाला । विजयी । श्रेष्ठ । जैसे,—गुल पर गालिब कमल हैं कमलन पर सु गुलाब ।—पद्माकर (शब्द०) । मुहा०—(किसी पर) गालिब आना या होना = जीतना । आगे बढ़ जाना । २. उर्दू के एक प्रसिद्ध कवि का उपनाम । विशेष—इनका पूरा नाम मिर्जा असदुल्ला खाँ था । संवत् १८५३ में इनका जन्म और मृत्यु संवत् १९२६ में हुई थी । पहले इन्होंने अपना उपनामा 'असद' रखा था । गालिब मुख्यतः फारसी के कवि थे । फारसी में इनकी कई पुस्तकें हैं । उर्दू में इनका एक ही दीवान है । फिर भी उर्दू के कवियों में ये सर्वश्रेष्ठ माने जाते है । पद्य के साथ इनका उर्दू गद्य भी आदर्श माना जाता है । इनके गद्यग्रंथों में 'उर्दू—ए—मुअल्ला' जिसमें इनके पत्रों का संग्रह है, तथा 'औद—ए—हिंदी' है ।

गालिबन
क्रि० वि० [अ० गालिबन्] संभवतः । बहुत संभव है ।

गालिम पु
वि० [अ० गालिब] प्रबल । दृढ़ । प्रचंड । बलवान् । विजयी ।—गेरि के ग्रस्यो है३ गजराज गोड़ गोटयो ग्राह, गालिम गँभीर नीर चाह्यो सो गिरायो है ।—रघुराज (शब्द०) ।

गाली
संज्ञा स्त्री० [सं० गालि] १. निंदा या कलंकसूचक वाक्य । फूगड़ बात । दुर्वचन । यौ०—गाली गलौज । गाली गुफ्ता । क्रि० प्र०—उगलना ।—देना ।—बकना ।—सुनना ।—सुनाना । मुहा०—गाली खाना = दुर्वचन सुनना । गाली सहना । गाली देना = दुर्वचन कहना । गालियों पर उतरना = गालियों देने लगना । गालियाँ बकने पर उतारू होना । गालियों पर मुँह खोलना = गाली बकना आरंभ करना । २. कलंकसूचक आरोप । जैसे,—ऐसा मत कहो; तुम्हीं को गाली पड़ती है । क्रि० प्र०—पड़ना ।—लगना । ३. विवाह आदि में गाया जातेवाला एक प्रकार का रस्मी गीत जो अश्लील होता है । क्रि० प्र०—गाना ।

गालीगलौज
संज्ञा स्त्री० [हिं० गाली + अनु० गलौज] परस्पर गाली प्रदान । तू तू मैं मैं । दुर्वचन । क्रि० प्र०—करना होना ।

गालीगुफ्ता
संज्ञा पुं० [हिं० गाली + फ़ा० गफ्तार = कहना] १. परस्पर गाली प्रदान । तू तू मैं मैं । गालियों की लड़ाई । २. गाली । दुर्वचन । क्रि० प्र०—करना ।—देना ।—बकना ।—होना ।

गालू
वि० [हिं० गाल + ऊ (प्रत्य०)] १. व्यर्थ बढ़ बढ़कर बाते करनेवाला । गाल बजानेवाला । बकवादी । २. डींग हाँकनेवाला । शेखीबाज ।

गालोडित (१)
वि० [सं०] १. नशे में चपर । २. बीमार । अस्वस्थ । ३. मूर्ख [को०] ।

गालोडित (२)
संज्ञा पुं० १. परीक्षण । जाँच । २. अनुसंधान [को०] ।

गालोड्य
संज्ञा पुं० [स०] १. कमलगट्टा । २. एक प्रकार का अनाज ।

गाल्हना पु
क्रि० अ० [सं० गल्प = बात] बात करना । बोलना । उ०—अठपहरे अरस मैं ऊभोई आहे । दादू पसे तिनके आला गल्हाए ।—दादू (शब्द०) ।

गाल्ही पु
संज्ञा स्त्री० [पं० गल] वार्ता । बातचीत । उ०—गुभयूँ गाल्ही कंनि ।—दादू०, पृ० १२९ ।

गाव
संज्ञा पुं० [सं० गो । तुल० फ़ा० गाव] गाय । बैल । यौ०—गावकुशी । गावजबान । गावदुम । गावतकिया । गावखाना गावपछाड़ । नीलागाव ।

गावकुशी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] गोघात । गोवध ।

गावकुस
संज्ञा पुं० [सं० ग्रीवा = गला + कुश = फाल] लगाम (डिं०) ।

गावकोहान
संज्ञा पुं० [फ़ा०] वह घोड़ा जिसकी पीठ पर बैल की तरह कूबड़ निकला हो । (ऐसा घोड़ा दोषी माना जाता है ।)

गावखाना
संज्ञा पुं० [फ़ा० गाव + खानह्] गोशाला । खरक । धारी ।

गावखुर्द
वि० [फ़ा० गावखुर्द] १. गुम । हड़प । गायब । लापता । २. नष्ट भ्रष्ट । बरबाद । मुहा०—गारखुर्द होना = (१) बरबाद होना । नष्ट भ्रष्ट हो जाना । चौपट हो जाना । (२) गायब होना । लापता होना । उड़ जाना । जैसे—देखते ही देखते किताब यहाँ से गावखुर्द हो गई ।

गावघप, गावघप्प
वि० [फ़ा० गाव + हिं० घप, घप्प] १. दूसरे का मालमता हजम कर जानेवाला । २. बड़े पेटवाला (आदमी) ।

गावचेहरा
वि० [फ़ा० गावचेहरह्] गाय बैल के चेहरे जैसा ।

गावजबाँ
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० गाबज़बाँ] दे० 'गावजबान' ।

गावजबान
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० गावज़बान] एक बूटी । विशेष—यह फारस देश के गीलान प्रदेश में होती है । इसकी पत्तियाँ मोटी, खुर्दरी और हरे रंग की होती हैं, जिनपर बैल की जीभ की तरह छोटे छोटे सफेद रंग के उभरे हुए दाने होते हैं । इसके फूल लाल रंग के छोटे छोटे होते हैं । यह पत्ती हकीमों की दवा के काम आती है इसकी प्रकृति मात- दिल होती है और ज्वर खाँसी आदिमें दी जाती है । मनजनुल् अदविया में लिखा है कि इस देश में इसे संखाहुली कहते हैं और यह पटने के पास होती है । पर संखाहुली की पत्ती गावजबान की पत्ती से नहीं मिलती ।

गावजोर
वि० [फ़ा० गावजोर] बलशाली या बलवान, जो दाव पेंच न जानता हो । केवल बल का प्रयोग करनेवाला ।

गावजोरी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० गावजोरी] १. सबसे लड़ने की इच्छा । बलप्रदर्शन । २. हाथापाई । भिड़ंत ।

गावड़ पु
संज्ञा स्त्री० [सं० ग्रीवा] गला । गर्दन । (डिं०) । क्रि० प्र०—करना ।

गावड़ा पु †
संज्ञा पुं० [सं० ग्राम, हिं० गाँव + ड़ा (प्रत्य०)] ग्राम । गाँव ।

गावड़ियाँह पु
वि० [हिं० ग्राम] ग्रामवासी । गाँव का रहनेवाला । उ०—झूसर भारन झल्लरी गोधाँ गावड़ियाँह ।—बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० १५ ।

गावण पु †
संज्ञा पुं० [सं० गायन] गायन । गाना ।

गावणहार
वि० [सं० गायन + हिं० हार (प्रत्य०)] गानेवाला । गवैया । उ०—गावणहार माँडइ (अ) र गाई । रहास कइ सम- यइ वंसली वाई ।—वी० रासो, पृ० ५ ।

गावतकिया
संज्ञा पुं० [फ़ा०] बड़ा तकिया जिसे कमर लगाकर लोग फर्श पर बैठते हैं । मसनद ।

गावदश्ती
संज्ञा पुं० [फ़ा०] जंगली बैल ।

गावदी
वि० [फ़ा०] कुंठित बुद्धि का । अबोध । नासमझ । बेवकूफ । कूढ़मग्ज । जड़ ।

गावदुंबाल (१)
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] गाय की पूँछ ।

गावदुंबाल (२)
वि० गाय की पूँछ की तरह चढ़ाव उतार ।

गावदुम
वि० [फ़ा०] १. जो ऊपर से बैल की पूँछ की तरह पतला होता आया हो । जिसका घेरा एक ओर मोटा दूसरी ओर बराबर पतला होता गया हो । २ चढ़ाव उतार । ढालुवाँ ।

गावदुमा
वि० [फ़ा० गावदुम] दे० 'गावदुम' ।

गावदोश
संज्ञा पुं० [फ़ा०] दूध दुहने का बरतन ।

गावदोशा
संज्ञा पुं० [फ़ा० गावदोशह्] दे० 'गावदोश' ।

गाहदोश्ना
संज्ञा पुं० [फ़ा० गावदोश्नह्] दे० 'गावदोश' ।

गावन पु
संज्ञा पुं० [हिं० गाना] १. गाने की क्रिया । २. गाने का ढंग । यौ०—गावनगार ।

गावना पु †
क्रि० अ० [सं० गायन] दे० 'गाना' । उ०—देइ गारि रनिवासहिं प्रमुदित गावइ हो ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ४ ।

गावनिया
वि० [हिं० गावना + इया (प्रत्य०)] गानेवाला । उ०— गावनिया के मुख बसौं, सोता के मैं कान ।—कबीर सा०, पृ० ९२ ।

गावपछाड़
संज्ञा स्त्री० [हिं० गाव = गरदन + पछाड़] कुश्ती का एक दाँव जिसमें प्रतिद्वंद्वी को गर्दन पकड़कर पटकते हैं ।

गावपैकर
वि० [फ़ा०] साँड़ जैसे विशाल या भारी भरकम शरीरवाला ।

गावबहल
संज्ञा पुं० [फ़ा०] कुश्ती का एक दाँव या पेंच । गावपछाड़ ।

गावल
संज्ञा पुं० [हिं० गौं = घात] दल्लाल ।

गावली
संज्ञा स्त्री० [हिं० गौं = घाव] दल्लाली का धन । (दलाल) ।

गावलाणि
संज्ञा पुं० [सं०] संजय का नाम जो धृतराष्ट्र का मंत्री औ सारथी था ।

गावश्मारी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] पशुगणना [को०] ।

गावसुमा
संज्ञा पुं० [फ़ा० गावसुमह्] दे० 'गावसुम्मा'

गावसुम्मा
संज्ञा पुं० [हिं० गाव + सुम = खुर] वह घोड़ी जिसका सुम या खुर फटा हो । विशेष—इस प्रकार के घोड़े को रखना लोग अच्छा नहीं समझते ।

गावार पु
संज्ञा पुं० [हिं० गँगार] गँवार । उ०—समझि देख साकत गावार ।—कबीर० ग्रं०, पृ० २९४ ।

गावी
संज्ञा स्त्री० [?] जहाज में ऊपर का पाल । विशेष—इसके कई भेद हैं । अगले को तिर्कट, निचले को बड़ा और पिछले को कलमी कहते हैं । इसके ऊपर का पाल साबर, उससे ऊपर का ताबार और ताबार के ऊपर का सवाई कहलाता है ।

गास पु
संज्ञा पुं० [सं० ग्रास] संकट । दुःख । आपत्ति । उ०—अजहुँ नाहिं डरात मोहन बचे कितने गास । तब कह्यौ हरि चलहु सब मिलि मारि करहु बिनास ।—सूर (शब्द०) ।

गासिया
संज्ञा पुं० [अ० गाशिया] जीनपोश । उ०—पग में पुरट पैजन परे हैकल सुहीरन के जड़े । चामर सड़ाके अति प्रभा के गासिया मखमल मड़े ।—रघुराज (शब्द०) ।

गाह (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. गहन । दुर्गम । २. वह जो अवगाहन करे । अवगाहन करनेवाला मनुष्य ।

गाह (२)
वि० गाहन या अवगाहन करनेवाला [को०] ।

गाह (३)
संज्ञा पुं० [सं० ग्राह] १. ग्राहक । गाहक । उ०—खल अग अगुन साधु गुन गाहा ।—उभय अपार उदधि अवगाहा ।—तुलसी (शब्द०) । २. पकड़ । घात । गौं । उ०—पाय सों पाप को नेउर टारि रची लखि वे कियो गाहैं ।—बेनी (शब्द०) । ३. ग्राह । मगर ।

गाह (४)
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] १. स्थान । जगह । २. समय । काल । यौ०—गाहबगाह, गाहे गाहे या गाहैमाहे = कभी कभी । समय समय पर । जब तब । कभी कभी । उ०—चना खाते मियाँ जुलाहे । डाढ़ी हिलती गाहबगाहै ।—भारतेदु ग्रं०, भा० १, पृ० ६६१ । ३. अवसर । बारी ।

गाहक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] अवगाहन करनेवाला ।

गाहक (२)
संज्ञा पुं० [ग्राहक; प्रा० गाहक] १. लेनेवाला । खरीदने— वाला । खरीददार । मोल लेनेवाला जैसे-(क) धन्य नर नारि जे निहारि बिनु गाहक हूँ आपने मन मोल बिनु बीके हैं ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) कर लै सुँधि सराहि कै सबै रहे मौन । गंधी अंध ! गुलाब को गवईँ गाहक कौन?—बिहारी (शब्द०) । मुहा०—जी या प्राण का गाहक = प्राण लेनेवाला । मार डालने की ताक में रहनेवाला । २. कदर करनेवाला । चाहनेवाला । ढूँढ़नेवाला । इच्छुक । अभिलाषी । प्रेमी । उ०—(क) हम तो प्रेम प्रीति के गाहक भाजी साग चखाइए ।—सूर (शब्द०) । (ख) हो मन राम नाम को गाहक । चौरासी लख जिया जेनि में भटकत फिरत अनाहक ।—तुलसी (शब्द०) । (ग) गुन ना हेरानो गुन गाहक हेरानो है ।—(शब्द०) ।

गाहकताई पु
संज्ञा स्त्री० [सं० ग्राहक + ता ताति (प्रत्य०)] कदर दानी । चाह । उ०—कह कपि तव गुन गाहकताई । सत्य पबनसुत मोहिं सुनाई ।—तुलसी (शब्द०) ।

गहाकी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० गाहक] १. खरीददारी । २. बिक्री । मुहा०—गाहकी पटना = सौदा पटना । ३. गाहक होने का भाव या स्थिति ।

गाहकी (२)
संज्ञा पुं० ग्राहक । खरीददार ।

गाहटना
क्रि० स० [सं० गाह] १. मथना । बिलोना । २. नष्ट भ्रष्ट करना । उ०—गोढ़वाड़ घर गाहटे, पहला पाली मार ।— रा०, रू०, पृ० २८७ ।

गाहन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० गाहित] १. गोता लगाने की क्रीया । स्नान । २. अवगाहन । थाह लेना । उ०—आदि अंत गाहन किया, माया ब्रह्म विचार ।—दादू०, पृ० ३३७ । ३. विलो- डना । मथना । ४. छानने का काम करना । छानना (को०) ।

गाहना
क्रि० स० [सं० गाहन = अवगाहन] १. डूबकर थाह लेना । अवगाहन करना । २. मथना । विलोड़ना । हलचल मचाना । क्षुब्ध करना । उ०—ब्रजराज तिनके और तौ ब्रजराज के परताप । जिन साह के तल गाहि के निज साहिबी करि थाप ।—सूदन (शब्द०) । ३. धान आदि के डंठल को दाँते समय एक डंडे से उठाकर गिरना, जिसमें दाना नीचे झड़ जाय । ओहना । उ०—कहो तुम्हारो लागत काहे । कोटिन जतन कहौ जो ऊधो नाहिं बककिहौ वाहे । वाहे तो अपने जी मेरी तू सत ले मन चाहे । । यह भ्रम तो अबहीं मिटि जैहैं ज्यों पयार के गाहे । काशी के लोगन लै सिखयो जो समुझो या माहे । सूर श्याम बिहरत ब्रज अंदर जीजतु है मुख चाहे ।—सूर (शब्द०) । ४. जहाज आदि की दरारों में सन आदि ठूसकर भरना । कालपट्टी करना ।—(जहाज) । ५. खेत में दूर दूर पर जोताई करना । ६. घूमना । फिरना । चलना । उ०—ब्रज बन गैल गन्यारनि गाहत । लरत फिरत ज्यों ज्यों सुख चाहत ।—घनानंद, पृ० १९० ।

गाहा पु
संज्ञा स्त्री० [सं० गाथा, प्रा० गाहा] १. कथा । वर्णन । चरित्र । वृत्तांत । उ०—(क) करन चहौं रघुपति गुन गाहा । लघु मति मोर चरित अवगाहा ।—तुलसी (शब्द०) (ख) । मज्जहिं प्रात समेत उछाहा । कहैं परस्पर हरि गुन गाहा ।—तुलसी (शब्द०) । २. आर्या छंद का एक नाम ।विशेष—इसके चारों पदों में क्रमशः १२, १८, १२, और १५ मात्राएँ होती हैं । वि० दे० 'आर्या' । जैसे,—रामचंद्रपद पद्मं, वृंदारक वृंदाभिवंदनीय । केशव मति भूतनया, लोचनं चंचरीकायते ।

गाहित
वि० [सं०] १. गाहन किया हुआ । उ०—पवन मंद मृदु गंध प्रवाहित । मधु मकरंद सुमन सर गाहित । २. प्रविष्ट । पैठा हुआ (को०) ।

गाहिता
वि० [सं० गाहितृ] [वि० गाहित्री] १. गाहन करनेवाला । १. पैठनेवाला । ३. मथनेवाला । विलोड़न करनेवाला । ४. विनाशक [को०] ।

गाही
संज्ञा स्त्री० [हिं० गाहना] १. फल आदि गिनने का एक मान जो पाँच पाँच का होता है । पाँच वस्तुओं का समूह । मुहा०—गाही के गाही = बहुत अधिक । २. पाँच की संख्या की राशि ।

गाहू
संज्ञा स्त्री० [हिं० गना] उपगीति छंद का एक नाम । वि० दे० 'उपगीति' ।

गिंदर
संज्ञा पुं० [देश०] एक कीड़ा जो फसल को बहुत हानि पहुँचाता है ।

गिंदुक
संज्ञा पुं० [सं० गिन्दुक, गेन्दुक] १. गेंद । कंदुक । २. गेंदुक नामक वृक्ष [को०] ।

गिंजना
क्रि० अ० [हिं० गींजना का अक० रूप] किसी चीज (विशेषतः कपड़े) का हाथ लगने या अधिक उलटे पुलटे जाने के कारण सिकुड़ जाना अथवा मैला या खराब हो जाना । गींजा जाना ।

गिजाई (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०गृञ्जन = विषाक्त मांस] एक प्रकार का कीड़ा जो बरसात में पैदा होता है । ग्वालिन । घिनौरी । उ०—चित्रकेतु गज वैं जनमा । रानी सकल गिंजाई बन मा । पग तर पीसि गई मरि जोई । विष दै बदला लीन्हेनि सोई—विश्राम (शब्द०) । विशेष—यह लगभग दो अंगुल से चार अंगुल तर लंबा होता है । कनखजूरे की भाँति इसके भी बहुत से पैर होते हैं । एक ही स्थान पर इसके ढेर के ढेर पड़े मिलते हैं । कभी कभी कोई कीड़ा एक दूसरे की पीठ पर सवार भी देखा जाता है, इससे इसे घोड़सवार भी कहते हैं । यदि कोई पशु धोखे से इसे खा जाय, तो वह तुरंत मर जाता है । ये कीड़े वर्षा के आरंभ में पैदा होतो हैं, और ऐसा कहा जाता है कि हाथिया नक्षत्र के बरसने पर मर जातै हैं ।

गिंजाई (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० गींजना] गींजने की भाव या क्रिया ।

गिंड़नी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का साग जिसकी पत्तियाँ दो दो अंगुल लंबी और जौ भर चौड़ी होती हैं । विशेष—इसका डंठल हरा होता है और उसकी गाँठों पर सफेद सफेद फूलों के गुच्छे लगते हैं । फूल झड़ जाने पर छोटे छोटे बीज पड़ते हैं ।

गिंडुआ
संज्ञा पुं० [हिं० गिंडुरी] तकिया ।

गिंडुरी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'इँडुरी' ।

गिंदौड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० गेंद] [स्त्री० गिंदौड़ी] बहुत मोटी रोटी के आकार में गलाकर ढाली हुई चीनी । विशेष—इसका व्यवहार प्रायः विवाह आदि शुभ कार्यों में बिरदरी मे बाँटने के लिये होता है ।

गिंदौरा पु †
संज्ञा पुं० [हिं० गिंदौड़ा] [स्त्री० गिंदौरी] दे० 'गिंदौड़ा' । उ०—पेठापाक जलेबी पेरा । गोंद पाग तिनगरी गिंदौरा ।— सूर (शब्द०) ।

गिंमार पु
वि० [हिं० गमार, गँवार] दे० 'गँवार' । उ०—मारवणी तू अति चतुर, हीयइ चेत गिंमार ।—ढोला०, दू० ६३ ।

गिआन पु †
संज्ञा पुं० [सं० ज्ञान] दे० 'ज्ञान' । उ० †एहि बिधि चीन्हहु करहु गिआनू—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० १२५ ।

गिउ पु
संज्ञा पुं० [सं० ग्रीवा] गला । गरदन । उ०—अब जो फाँद परा गिउ, तब रोए का होय ?—जायसी (शब्द०) ।

गिचपिच
वि० [अनु०] १. जो साफ या क्रम से न हो । एक में मिलजुला । अस्पष्ट । २. बहुत सटाकर लिखा हुआ ।

गिचपिचा (१)
संज्ञा स्त्री० [अनु०] दे० 'कचपचिया' ।

गिचपिचा (२)
वि० [अनु०] दे० 'गिचपिच' ।

गिचपिचिया
संज्ञा स्त्री० [अनु०] दे० 'कचपचिया' ।

गिचिर पिचिर
वि० [अनु०] दे० 'गिचपिच' ।

गिजई (१)
संज्ञा पुं० [देश०] सलमे के काम का एक प्रकार का तार ।

गिजई (२) †
संज्ञा स्त्री० [सं० गृञ्जन] गिंजाई या कनसलाई नाम का बरसाती कीड़ा (पूरब) । वि० दे० 'गिंजाई' ।

गिजागिजा
वि० [अनु०] [वि० स्त्री० गिजगिजी] १. ऐसा गीला और मुलायम जो अच्छा न मालूम हो । जैसे,—कच्ची मोटी रोटी दाँत के नीचे गिजगिजी लगती है । २. जो छूने में मांसल मालूम हो । जैसे,—पैर के नीचे कुछ गिजगिजा सा मालूम हुआ, देखा तो मरा साँप था ।

गिजा
संज्ञा स्त्री० [अ० ग़िजा] वह जो खाया जाय । भोजन । खाद्यवस्तु । खोराक । उ०—और खाना जो कि हो खुश का तेरी सो कर गिजा ।—कविता कौ०, भा०४, पृ० १० ।

गिजाइयत
संज्ञा स्त्री० [अ० गिजाइयत] आहार गुण । पोषकता । अन्नतत्व [को०] ।

गिजाई (१)
वि० [अ० गिजा + फा० ई (प्रत्य०)] १. आहार संबंधी । २. जो आहार के रूप में हो [को०] ।

गिजाई † (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० गिंजाई] दे० 'गिजई' ।

गिटकिरी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'गिट्टी' ।

गिटकिरी (२)
संज्ञा स्त्री० [अनु०] तान लेने में विशेष प्रकार से स्वर का काँपना जो बहुत अच्छा समझा जाता है ।—(संगीत) । क्रि० प्र०—निकालना । लेना ।

गिटकौरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० गिट्टी या गिटकिरी] पत्थर या गेरू का गोल छोटा टुकड़ा । कंकड़ी ।

गिटगिरी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० गिटकिरी] दे० 'गिटकिरी' । उ०— कोऊ तराने गावत, कोउ गिटगिरी भरै जहँ ।—प्रेमघन०, भा०१, पृ० २०१ ।

गिटपिट
संज्ञा स्त्री० [अनु०] निरर्थक शब्द ।मुहा०—गिटपिट करना = (१) टूटी फूटी या साधारण अँगरेजी । भाषा बोलना । (२) किसी बात का साफ साफ न कह पाना । यौ०—गिटपिट बानी, गिटपिट बोली, गिटपिट भाषा = अँगरेजी ।

गिट्ट पु
संज्ञा पुं० [हिं० गिट्टा] भाग । खंड । उ०—एक नाली दुई गिट्टे करे ।—प्राण०, पृ० २४ ।

गिट्टक (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० गिट्टा] १. चिलम के नीचे रखने का कंकड़ । २. चंगल । ३. लकड़ी या लोहे आदि का छोटा और मोटा टुकड़ा ।

गिट्टक (२)
संज्ञा पुं० [अनु०] गिटकरी लेन में स्वर या तान का वह सबसे छोटा भाग जो केवल एक कंप में निकलती है । दाना ।—(सगीत) ।

गिट्टा
संज्ञा पुं० [सं० गिरिज; हिं० गेरू + टा (प्रत्य०)] चिलम का कंकड़ । केकड़ा ।

गिट्टी
संज्ञा स्त्री० [हिं० गिट्टा] १. गेरू या पत्थर के छोटे छोटे टुकड़े जो प्रायः सड़क, नींव या छथत आदि पर बिछाकर कूटे जाते हैं । २. मिट्टी के बरतन का टूटा हुआ छोटा टुकड़ा । ३. चिलम की गिट्टक । ४. बादले या तागे की लपेटी हुई रील । फिरकी ।

गिठुआ
संज्ञा पुं० [देश०] जुलाहे का करघा । अड्डा ।

गिठुरा †
संज्ञा पुं० [हिं० गेंठुरा] दे० 'गेंठुरा' ।

गिड़गिड़ाना
क्रि० अ० [अनु०] आवश्यकता से अधिक विनीत और नम्र होकर कोई बात या प्रार्थना करना ।

गिड़गिडाहट
संज्ञा स्त्री० [हिं० गिड़गिड़ाना] १. विनती । चिरौरी । २. गिड़गिड़ाने का भाव ।

गिड़नी पु
संज्ञा पुं० [देश०] तालों में होनेवाला एक प्रकार का साग ।

गिड़राज पु
संज्ञा पुं० [सं० ग्रहराज] सूर्य ।—(डिं०) ।

गिड्डा †
वि० [देश०] नाटा । ठिंगना ।

गिणना पु †
क्रि० स० [हिं० गिनना] दे० 'गिनना' । उ०— गिण शत्रु मित्र मारण गवण, शत्रुदास ऊदास उर ।— रघु० रू०, पृ० ९ ।

गितार
संज्ञा पुं० [अं० गिटार] एक बाजा जिसमें छह तार होते हैं और जो उँगलियों से बजाया जाता हैं ।

गिद
संज्ञा पुं० [सं०] रथपालक देवता ।

गिद्दा
संज्ञा पुं० [हिं० गीत] एक प्रकार का चलना गीत जिसे स्त्रियाँ गाती है । नकटा ।

गिद्ध
संज्ञा पुं० [सं० गृध्र] एक प्रकार का बड़ा मांसाहारी पक्षी । विशेष—इसकी छोटी बड़ी कई जातियाँ होती है । सबसे बड़ा गिद्ध प्राय । तीन फुट लंबा होता और प्रायः बकरियों, मुर्गियों तथा दूसरी पालतू चिड़ियों को उठा ले जाता है । यह पक्षी प्रायः मरे हुए जीवों का मांस खाता है; इसो से कवियों ने रणस्थल में गिद्धों का दृश्य प्रायः दिखालाया है । इसकी आँखें बहुत तेज होती हैं और यह आकाश में बहुत उँचा उड़ सकता है । इसके शरीर का रंग मटमैला होता है और पैरों में उँगलियों तक पर होते हैं । इसका किसी मनुष्य के शरीर पर मँड़राना या मकान पर बैठना अशुभ माना जाता है । २. एक प्रकार का बड़ा कनकौवा या पतंग । ३. छप्पय छंद का ५२ वाँ भेद ।

गिद्धराज
संज्ञा पुं० [हिं० गिद्ध + राज] जटायु ।

गिद्धि पु
संज्ञा पुं० [हिं० गिद्ध] दे० 'गिद्ध' । उ०— ड़हकंत डक्क डाइन डरान । गहकंत गिद्धि सिद्धनिय थान ।—पृ०, रा०, १ । ६६१ ।

गिध पु
संज्ञा पुं० [हिं० गिद्धु] दे० 'गिद्ध' । उ० —एक जीव को ठाड़े कीना । काग गिद्ध को हुकुम करि दीना ।—कबीर सा०, पृ०, ३६२ ।

गिनगिनाना (१) †
क्री० अ० [अनु० गन गन = काँपना] १. अधिक बल लगते समय शरीर का काँपना । जैसे, —वह पत्थर पकड़ कर घंटों गिनदगिनाता रहा, पर पत्थर न हटा । २. रोमांच होना । रोंगटे खड़े होना ।

गिनगिनाना (२)
क्रि० स० [हिं० गिन्नी, घिरनी = चक्कर] पकड़ कर घुमाना या चक्कर देना । झुकझोरना । उ०— बिल्ली ने चूहे को गिनगिना डाला ।

गिनती
संज्ञा स्त्री० [हिं० √ गिन + ती (प्रत्य०)] १. वस्तुओँ को समूह से तथा एक दूसरी से अलग अलग करके उनकी संख्या निश्चित करने की क्रिया । गणना । शुमार । उ०— गिनती गनिबे तें रहे छत हू अछत समान ।—बिहारी (शब्द०) । क्रि० प्र०— करना । गिनना । मुहा०—गिनती में आना या होना = किसी कोटी में समझा जाना । कुछ समझा जाना । कुछ महत्व का समझा जाना । उ०— जिन भूपन जग जीति बाँधि यम अपनी बाँह बसायो । तेरी काल कलेऊ कीन्हें तू गिनती कब आयो ।—तुलसी (शब्द०) । गिनती कराना = किसी कोटि के अंतर्गत समझा जाना । जैसे,—बह बिद्वानों में अपनी गिनती कराने के लिये मरा जाता है । गिनती गिनाने या करने के लिये = नाम मात्र के लिये । कहने सुनने भर को । जैसे,— गिनती गिनाने के लिये वे भी थोड़ी देर आकर बैठ गए थे । गिनती होना = किसी महत्व का समझा जाना । कुछ समझा जाना । जैसे,—वहाँ बड़े बड़ों का गुजर नहीं । तुम्हारी क्या गिनती है ? २. संख्या । तादाद । जैसे—ये आम गिनती में कितने होंगे । मुहा०— गिनती के = बहुत थोड़े । संख्य़ा में बहुत कम । जैसे,— वहाँ गिनती के आदमी आए थे । ३. उपस्थिति की जाँच जो प्रायः नाम बोल बोलकर की जाती है । हाजिर ।— (सिपाही) । मुहा०— गिनती पर जाना = हाजिरी देने या लिखाने जाना । ४. एक से सौ तक की अंकमाला । जैसे— स्लेट पर गिनती लिख— कर दिखाओ । क्रि० प्र०—आना ।

गिनना
क्रि० सं० [सं० गणन] १. वस्तुओँ को समूह से तथा एक दूसरी से अलग अलग करके उनकी संख्या निश्चित करना । गणना करना । शुमार करना ।संयो०— जाना ।— ड़ालना ।—देना ।—रखना । —लेना । मुहा०— गिन गिनकर सुनाना या गलियाँ देना । = बहुत अधिक गालिय देना । गिन गिनकर मारना या लगाना = खूब पीटना । गिर गिनकर दिन काटना = बुहत कष्ट से समय बिताना । गिन गिनकर पैर रखाना = बहुत धीरे धीरे और सावधानता से चलना । गिन देना = तुरत हिसाब चुकता करना । तुरंत रुपए गिन देना । जैसे-देखा ? एक फटकार पर उसके रुपए गिन दिए । गिने गिनाए = थोड़े से । संख्या में बहुत कम । दिन गिनना = (१) आशा में समय बिताना । सुख की प्राप्ति या दुःख की निवृत्ति के अवसर की ऊब ऊबकर प्रतिक्षा करना । उ०— दिन औधि के कौ लौं गिनौं सजनी अँगुरीन के पोरन छाले परे । —ठाकुर (शब्द०) । (२) किसी प्रकार कालक्षेप करना । २. गणित करना । हिसाब लगाना । जैसे,—ज्योतिषी ने गिन गिनाकार कह दिया है कि मुहूर्त इच्छा है ।३. कुछ महत्व का समझना । मान करना । प्रतिष्ठा करना । कुछ समझना खातिर में लागा । जैसे —वाहाँ तुम्हारे ऐसों की गिनता कौन है ?

गिनवाना
क्रि० सं० [हिं० गिनना का प्रे० रूप] १. दे० 'गिनाना' । २. गिनती पढ़ाना या सिखाना (छोटे बच्चों को) । ३. दूसरों की दृष्टि में ऊँचा उठाना । संमान करवाना । संमान का पात्र होना । ४. दंभ या अहंकार से दूसरों के द्वारा अपनी प्रतिष्ठा कराना ।

गिनान पु
संज्ञा पुं० [सं० ज्ञान] दे० 'ज्ञान' । उ०—ब्रह्मवैवर्त सहसं अठार । केवल गिनान कथि भक्ति सार ।—पृ०, रा०, १ । ३६ ।

गिनाना
क्रि० स० [हिं० गिनना का प्रे० रूप] गिनने का काम दूसरे से कराना ।

गिनी (१)
संज्ञा स्त्री० [अ०] सोने क एक सिक्का जिसका व्य़वहार इंग्लैड़ में सन् १६६३ में आरंभ हुआ था और सन १८१३ से जिसका बनना बंद हो गया । यह २१ शिलिंग (लगभग १५ । । रुपए) मूल्य की होती थी । विशेष— यह सिक्का पहले पहल अफ्रीका महाद्विप के गिनी नामक देश से आए हुए सोने से बनाया गय़ा था, इसी से इसका यह नाम पड़ा । भारत में प्रायः लोग आजकल के प्रचलित पाउँड़ या सावरेन को ही भूल से गिनी कहा करते हैं ।

गिंनी (२)
संज्ञा स्त्री० [अ० गिनी ग्राम] एक प्रकार की विलांयती बारहमासी धास । विशेष— यह पशुओं के लिये वहुत बलवर्धक और आरोग्यकारक होती है । इसे गौओं और भैसों को खिलाने से उनका दूध बहुत बढ़ जाता है और घोड़ों को खिलाने से उनका बल बहुत बढ़ जाता है । यह घास सभी प्रकार की जमीन में भली भाँति हो सकती है पर क्षार या सीड़वाली जमीन में अच्छी नहीं होती । यद्यपि यह बीजों से भी बोई जा सकती है, तथापि जड़ो से बोना अधिक उत्तम समझा जाता है । यदिवर्षा ऋतु के आरंभ में यह थोड़ी सी भी बी दी जाय तो बहुत दूर तक फैल जाती है । इसके लिये घोंड़े की सड़ो हुई लीद की खाद बहुत अच्छी होती है । यदि इसपर उचित ध्यान दिया जाय तो साल में इसकी छह फसलें काटी जा सकती हैं ।

गिनीगवट
संज्ञा स्त्री० [अं०] एक प्रकार की लंबी घास । विशेष— यह अफ्रीका के गिनी नामक देश में होती है । अब यह भारत में भी लगाई गई है और खूब होती है ।

गिनीगोल्ड़
संज्ञा पुं० [अं०] वह सोना जिसमें ताँबा मिला हो ।

गिनीग्रास
संज्ञा स्त्री० [अं०] दे० 'गिनीगवट' ।

गिन्नी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० घिरनी] घुमाने या चक्कर खिलाने की क्रिया । चक्कर । मुहा०— गिन्नी खाना = चक्कर मारना ।—(पतंग के लिये प्रायः बोलते हैं ।) गिन्नी खिलाना = चक्कर देना ।

गिन्नी (२)
संज्ञा स्त्री० [अं० गिनी] दे० 'गिनी' ।

गिब्बन
संज्ञा पुं० [अं०] एक प्रकार का बंदर जो सुमात्रा जावा आदि द्वीपों में होता है । विशेष— इसके पूँछ और गालों की थैलियाँ नहीं होतीं । इसको बाँहें बहुत लंबी होती हैं और प्रायः जमीन तक पहुचती हैं । इसकी आकृति मनुष्य से बहुत मिलती जुलती होती है । किसी किसी जाति के गिब्बन थोड़ा बहुत गाते भी सुने गए हैं ।

गिम पु
संज्ञा पुं० [सं० ग्रीवा] गाला । गरदन ।

गिमटी (१)
संज्ञा स्त्री० [अं० डिमटी] एक प्रकार का मजबूत सूती कपड़ा । विशेष—इसकी बुनावट में बेल बूटे होते हैं और यह प्रायः बिछाने के काम में आता है ।

गिमटी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० गुमटी] गोलाकार या चौकोर कोठरी या कमरा जो रेलवे लाईन के किनारे बना होता है । विशेष— ऐसे कमरे बहुधा उन जगहों पर बने होते हैं और आवाजाही अधिक होती है । गाड़ियों के आने जाने पर झंड़ी दिखानेवाला रेलवे कर्मचारी वर्षा और धूप से बचने के लिये इसका उपयोग करता है ।

गिमार पु
संज्ञा पुं० [हिं० गमार या गबाँर] दे० 'गँवार' । उ०— इण रुति साहिबा ना चलइ चालइ तिके गिमार । —ढोला०, दू०, २४९ ।

गिय पु
संज्ञा पुं० [सं० ग्रीवा] दे० 'गिउ' । उ०— जोहि कारन गिय काथरि कंथ । जहाँ सो मिलै जाउ तेहि पंथा ।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ०, २१७ ।

गियान पु
संज्ञा पुं० [सं० ज्ञान] दे० 'ज्ञान' । उ०— सेवक लिए प्रेम जल झारी, खारिका ब्रह्म गियान ।—धरम०, पृ०, ३० ।

गियानी
वि० [हिं० ज्ञानी] दे० 'ज्ञानी' । उ०— हम लोग मूरख ठहरे और तुम गियानी ।— मैला०, पृ०, १२ ।

गियाह
संज्ञा पुं० [सं० हय?] एक प्रकार का धोड़ा । ताड़ के पके फल के रंग का अश्व । कियाहु । उ०— हाँसल भौंर, गियाब बखाने ।—जायसी (शब्द०) ।

गिरंट
संज्ञा पुं० [अ०] १. एक रेशमी कपड़ा जो प्रायः गोट लगाने के काम में आता है । ग्वारनट । २. एक प्रकार की साधारण सूती मलमल जो बस्ती जिले में बनती है ।

गिरंथ पु
संज्ञा पुं० [सं० ग्रंथ] दे० 'ग्रथ' । उ०— सुनियत बेद गिरंथ पुकारत, जिन मति जान बिचारी ।—जग० श०, पृ०, ११६ ।

गिरंद पु
संज्ञा पुं० [फ़ा० गीर] फंदा । उ०— दे० गिरंद गिरँदा हूवा वे जिंद आसाडी छीनी है ।—घनानंद, पृ०, १८० ।

गिरंदा
वि० [हिं० गिरंद] फंदा डालनेवाला । पकड़नेवाला ।

गिरंम पु
वि० [?] भारी । उ०— तरकस पंच गिरंग तीन प्रति षगत तीन सह । —पृ०, रा०, ९ । २५ ।

गिरँद पु
संज्ञा पुं० [सं० गिरीन्द्र] दे० 'गिरींद्र' । उ०— उरजलताँ लागौ असुर, गिरँद दुहूँ बल आप ।—रा०, रू०, पृ०, २६१ ।

गिरंदा पु
वि० [हिं० गिरंदी] फंदा लगानेवाला । बंधन बाँधनेवाला । उ०— दे गिरँद गिरंदा हूवा बे जिंद आसाड़ी छोनी है ।—घनानंद, पृ०, १८० ।

गिर
संज्ञा पुं० [सं० गिरि] पहाड़ पर्वत । उ०— जहँ यह गिरि गोबरधन सोहै । इंद्र बराक या आगे को है ।—नंद० ग्रं०, पृ०, १९० । २. संन्यासियों के दस भेदों में से एक । ३. काठियावाड़ देश का भैंसा ।

गिरई
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की मछली जो सौरी मछली से छोटी होती है ।

गिरगट
संज्ञा पुं० [हिं० गिरागिट] दे० 'गिरगिट' उ०— माया की मकड़ी ने जाल बिछाया । गो के जो गिरगट ने सैन सुनाया ।—संत तुरसी०, पृ०, ८८ ।

गिरगिट
संज्ञा पुं० [सं० कृकलास या गलगति] छिपकली की जाति का प्रायः एक बालिश्त लंबा एक जंतु । उ०— गिरगिट छंद धरइ दुख तेता । खन खन रात पीन खन सेता ।—जायसी (शब्द०) । विशेष—यह सूर्य की किरणों की सहायता से अपने शरीर के अनेक रंग बदल सकता है । इसका चमड़ा सदा बहुत ठंढा रहता है और यह कीड़े मकोड़े खाता है । गिर्गिटान । गिरदौना । मुहा०— गिरगिट की तरह रंग बदलना = बहुत जल्दी संमति या सिद्धांत बदल देना । कभी कुछ कभी कहना और करना ।

गिरगिटान †
संज्ञा पुं० [हिं० गिरगिट] दे० 'गिरगिट' ।

गिरगिटुटी
संज्ञा स्त्री० [?] समस्त उत्तर भारत, चीन और आस्ट्रेलिया तक पाया जानेवाला एक प्रकार का छोटा पेड़ जिसकी छाल खाकी रंग की होती हैं । विशेष—इसकी पत्तिय़ाँ छोटी, पतली और गहरे हरे रंग की होती हैं, जिनका ऊपरी भाग बहुत चमकीला होता है । गरमी और बरसात में इसमें सफेद रंग के बहुच सुगंधित फूल लगते हैं और जाड़े में एक प्रकार के छोटे फूल लगते हैं, जिनका रंग पकने पर लाल या गहरा नारंगी होता है । इसकी लकड़ी मुलायम होती है ओर चीड़ के स्थान में काम आती है । यह बृक्ष बागों में शोभा के लिये लगया जाता है और लोग इसकी टहनियों से दतुअन का काम लेते हैं । बरमावाले कभी कभी चंदन के स्थान में इसकी सुगंधित छाल का भी व्यवहार करते हैं ।

गिरगिरी
संज्ञा स्त्री० [अनु०] लड़कों का एक खिलौना जो चिकारे या सारंगी के ढंग का होता है । उ०— फूले बजावत गिरगिरी गार मदन भेरि घहराइ आपार संतन हित ही धूल ड़ोल ।— सूर (शब्द०) ।

गिरजा (१)
संज्ञा पुं० [देश०] कीड़े मकोड़े खानेवाला एक प्रकार का पक्षी । विशेष— यह पंजाब और राजपूताने के आतिरिक्त सारे भारत में पाया जाता है । यह प्रायः सिंघाड़े के तालाबों के आसपास रहती है और ऋतुपारिवर्तन के अनुसार अपना स्थान भी बदला करता है । य़ह बहुत तेज उड़ता है और इसका शब्द बहुत धीमा और विचित्र होता है । यह वृक्षों पर घोंसला बनाता है । इसके स्वादिष्ट मांस के लिये लोग इसका शिकार करते हैं ।

गिरजा (२)
संज्ञा पुं० [पुर्त० इग्रेंजा] ईसाइयों का प्रार्थना मंदिर ।

गिरजा (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० गिरिजा] दे० 'गिरजा' ।

गिरजाघर
संज्ञा पुं० [हिं० गिरजा + घर] ईसाइयों का प्रार्थना- मंदिर । गिरजा ।

गिरझ पु
संज्ञा स्त्री० [सं० गृद्ध] मादा गिद्ध । गिद्धिनी । उ०— गिरझ आतें ले चाली, जाण पतंग डोर ।—नट० पृ०, १७१ ।

गिरद पु
अव्य० [फ़ा० गिर्द] दे० 'गिर्द' । उ०—लई सौरई अरु साडौ़रो । लूटे गाँव गिरद के औरो ।—लाल (शब्द०) ।

गिरदा †
संज्ञा पुं० [फ़ा० गिर्द] १. घेरा । चक्कार । २. तकिया । गेड़ुआ । बालिश । उ०— भनै रघुराज कोई गादी गिरदा पै चढैं, कोई गोद गेरे हरे हरे लपटाइ कै ।—रघुराज (शब्द०) । ३. काठ की थाली जिसमें हलवाई लोग मिठाई रखते हैं । ४. वह कपड़ा दो दरबार के समय राजाओं के हुक्के के नीचे बिछाया जाता है । ४. ढाल । फरी । ६. ढोल या खँजड़ी का मेड़रा ।

गिरदाइय पु
संज्ञा पुं० [फ़ा० गिदाँब] घेरा । आलर्त । उ०— दस हथ्था परिमाँन पीठ छत्ती गिरदाइय ।—पृ० रा०, २४ । ३३४ ।

गिरदागिरद
क्रि० वि० [हिं० गिर्दागिर्द] दे० 'गिर्दागिर्द' ।

गिरदाना †
संज्ञा पुं० [हिं० गिरगिट] गिरगिट । उ०— मछली मुख जस केंचुआ मुसवन मुँह गिरदान । सर्पत मुँहें गहेजुवा जाति सबन की जान ।—कबीर (शब्द०) ।

गिरदानक
संज्ञा पुं० [फ़ा० गिर्द] करगाह की लकड़ी जो लपेटन में उसे घुमाने के लिये लगी रहती है ।— (जुलाहे) ।

गिरदाना
संज्ञा पुं० [फ़ा गिर्द] लगभग एक हाथ की लंबी चौपहल लकड़ी जो तूर के छेद में पड़ी रहती है ।— (जुलाहे) ।

गिरदाब
संज्ञा पुं० [फ़ा गिर्दाब] जलावर्त । भँवर । उ०— गया होश बिस तिस करें ताब में, ड़ूब्या ज्यों पड़ गम के गिरदाब में ।—दक्खिनी, पृ० १४४ ।

गिरदालो
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० गिर्द] वह लंबी अँकुसी जिससे गला— हुआ कच्चा लोहा समेट समेटकर एकत्र किया जाता है ।— (लोहार) ।

गिरदावर
संज्ञा पुं० [फ़ा० गिर्दावर] दे० 'गिर्दावर' ।

गिरदावरी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] १. गिरदावर का काम । २. गिरदावर का पद ।

गिरद्द पु
संज्ञा पुं० [फ़ा० गिर्द] दे० 'गर्द' । उ०— गिरददं उ़ड़ी भाँन अंधार रैनं । गई सूधि सुझझै नहीं गभिझ नैनं ।— पृ० रा०, ५ । ६५ ।

गिरदध
अव्य० [फ़ा० गिर्द] । घेरा । उ०— पंगह सुबीर गढ़ करि गिरद्ध । सर्वरी परस चंदा सरद्ध ।—पृ० रा०, २६ । ४२ ।

गिरधर
संज्ञा पुं० [सं० गिरि + धर] १. वह जो पहाड़ को धारण करे । पहाड़ उठानेवाला व्यक्ति । २. कृष्ण । वासुदेव । यौ०— गिरधर गोपाल = कृष्ण जी ।

गिरधारन पु
संज्ञा पुं० [सं० गिरि + धारण] दे० 'गिरधर' ।

गिरधारा पु
वि० [सं० गिरि + धार] दुर्गम पहाड़ी मार्ग । पहाड़ की चोटी पर का सकरा और संकटपूर्ण मार्ग । उ०— जाइ तहाँ का संजम कीजै, विकट पंथ गिरधारा ।—दादू०, पृ० ५०६ ।

गिरधारी पु
संज्ञा पुं० [हिं० गिरिधारी] दे० 'गिरधर' ।

गिरना
क्रि० अ० [सं० गलन = गिरना] १. आधार या अवरोध के अभाव के कारण किसी चीज का एकदम ऊपर से नीचे आ जाना । रोक या सहारा न रहने के कारण किसी चिज का अपने स्थान से नीचे आ रहना । जैसे,—छत पर से गिरना हाथ में से गिरना, कुएँ में गिरना, आँख से आँसू गिरना ओस, पानी या ओले गिरना । संयो० क्रि०—जाना ।—पड़ना । २. किसी चीज का खड़ा न रह सकना या जमीन पर पड़ जाना । जैसे—मकान का गिरना, घोड़े का गिरना, पेड़ का गिरना । यौ०— गिरना पड़ना । जैसे; —वह गिरते पड़ते किसी प्रकार घर पहुँचा । ३. अवनति या घटाव पर होना । ह्रासोन्मुख होना । जैसे,— किसी जाति या देश का गिरना । ४. किसी जलधारा का किसी बड़े जलाशय में जा मिलना । जैसे,— नदी का समुद्र में गिरना, मोरी का कुंड़ में गिरना । ५. शक्ति, स्थिति, प्रतिष्ठा या मूल्य आदि का कम या मंदा होना । जैसे—किसी मनुष्य का (किसी की दुष्ट या समाज में) गिर जाना, बीमारी के कारण शरीर का गिर जाना, भाव या बाजरा गिरना । यौ०—गिरे दिन = दरिद्रता या दुर्दशा का समय । ६. कियी पदार्थ की लेने के लिये बहुत चाव या तेजी से आगे बढ़ना । टूटना । जैसे,—कबूतर पर बाज गिरना, माल पर खरीदनेवालों का गिरना, य़ात्रियों पर ड़ाकुओं का गिरना । ७. जीर्ण या दुर्बल होने अथवा इसी प्रकार के अन्य कारणों से किसी चीज का अपने स्थान से हट, निकल या झड़ जाना । जैसे—दाँत गिरना, सींग गिरना, बाल गिरना, (चोट खाया हुआ) नाखून गिरना, गर्भ गिरना । ८ . किसी ऐसे रोग का होना जिसके बिषय में लोगों का विश्वास हो कि उसका वेग ऊपर की ओर से नीचे को आता या होता है । जैसे—नजला गिरना, फजिल गिरना । ९. सहसा उपस्थित होना । प्राप्त होना । जैसे—(क) तुम यहाँ कहाँ आ गिरे ? (ख) आज बहुत सा काम आ गिरा । विशेष—इस अर्थ में इसमें पहले 'आना' क्रिया लगती है । १०. युद्ध में काम आना । लड़ाई में मारा जाना । खेत रहना । जैसे—उस लड़ाई में दो सौ आदमी गिरे । ११. कबूतर का किसी दूसरे की छतरी पर चला जाना ।—(कबूतर बाज०) । १२. बरसाना । १३. घायल होकर गिरना । १४. हारना । १५. खाट पर जमीन पकड़ना पड़ना । खाट पकड़ना बीमार होना । १६. किसी वस्तु के लिये बहुत अधिक लोलुपता दिखाना । १९. उत्साहहीन होना । मंद होना । यौ०—गिरता पड़ता = (१) कठिनाई से । (२) ल़ड़खड़ाता हुआ । गिर पड़ कर = दे० 'गिरता पड़ता' । गिरा पड़ा = छूटा हुआ । जमीन पर पड़ा हुआ । मुहा०—गिर कर सौदा करना = दबकर या दबाव के साथ सौदा करना या मामसा हल करना ।

गिरनार
संज्ञा पुं० [सं० गिरी + नार (= नगर)] [वि० गिरनारी] जौनियों का एक पवित्र तीर्थ । विशेष—यह गुजरात में जूनागढ़ के निकट एक पर्वत पर है । इसे पुराणों में रैवतक पर्वत कहते हैं ।

गिरनारी
वि० [हिं० गिरनार] गिरनार पर्वत का निवासी ।

गिरनाली
वि० [हिं० गिरनार] दे० 'गिरनारी' ।

गिरफ्त
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० गिरफ़त] १. पकड़ने का भाव । पकड़ । २. पकड़ने की क्रिया । ३. हिसाब किताब में गलती पकड़ना । ४. आपत्ति । एतराज । ५. अधिकार । कब्जा । ६. चंगुल । पंजा । ७. हस्तक । दस्ता । मुहा०—गिरफ्त करना = कोई दोष निकालना या आपत्ति करना ।

गिरफ्तगी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० गिरफ़तगी] १. गिरफ्त । पकड़ । २. आवाज का बैठ जाना । ३. उदासीनता । उदासी ।

गिरफ्तार
वि० [फ़ा० गिरफ़तार] १.जो पकड़ा कैद किया या बाँधा गया हो । २. ग्रसा हुआ । ग्रस्त ।

गिरफ्तारी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० गिरफ्तारी] १. गिरफ्तार होने का भाव । कैद । २. गिरफ्तार होने की क्रिया । मुहा०—गिरफ्तारी निकलना = किसी के गिरफ्तार होने का परवाना या वारंट निकलना ।

गिरबाँन पु
संज्ञा पुं० [सं० गीर्वाण] देक्ता । सुर ।

गिरबान पु
संज्ञा पुं० [फ़ा० गरीबाना] गर्दन । गला । उ०—खजर असिपुत्रिय लरत, धरत सिख गिरबान ।—प० सो०, पृ०, ७२ ।

गिरबूटी
संज्ञा स्त्री० [सं० गिरि + हिं० बूटी] अँगूर शेफा ।

गिरमा पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० गराँव] रस्सी । ड़ोरी । बंधन । उ०— इची खिची गिरमा गसी गैया लो तुअ साथ ।—श्यामा०, पृ० १६७ ।

गिरमिट (१)
संज्ञा पुं० [अ० गिमलेट = ब़ड़ा बरमा] (लकड़ी में छेद करने का) बड़ा बरमा ।—(बढ़ई) ।

गिरमिट (२) †
संज्ञा पुं० [अ० एग्रेमेंट = इकरारनामा] १. वह पत्र जिसमें किसी प्रकार की शर्त लिखी हो; विशेषतः वह पत्र जिसपर कुलियों से उन्हें उपनिवेशों में काम करने के लिये भेजने के समय हस्ताक्षर कराया दाता था । इकरारनामा । शर्तनामा । क्रि० प्र०—करना ।—लिखना ।—होना । २. कोई काम करने की स्वीकृति या प्रतिज्ञा । इकरार ।

गिरमिटिया
संज्ञा पुं० [हिं० गिरमिट] अंग्रेजी शासन काल में शर्त के साथ किसी उपनिवेश में गया हुआ भारतीय मजदूर । यौ०—गिरमिटिया प्रथा ।

गिरराज पु
संज्ञा पुं० [सं० गिरिराज] गोवर्धन पर्वत ।

गिरवर पु
संज्ञा पुं० [सं० गिरि + वर] बड़ा पहाड़ । यौ० —गिरवरधारी—गिरधर । श्रीकृष्ण ।

गिरवाँ पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० गराँव] रस्सी । ड़ोरी । उ०—जैसे कसाई के हाथ की गिरवाँ से गसो गँया कातर नैनों से पीछे देखती जाती हो ।—श्यामा०, पृ०, १५५ ।

गिरवाँण पु
संज्ञा पुं० [सं० गीर्वाण] दे० 'गीर्वाण' । उ० —तहक नीसाँण गिरवाँण हरखाण तन, चिताँ सरसाण रँभगाण चालै ।—रघु० रू०, पृ०, २९ ।

गिरवाणी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० गीर्वाण] देवी । उ०—तस जंत्र जंत्री ताणिया, वरमालगह गिरवाणिया ।—रघु० रू०, पृ० २२१ ।

गिरवान (१)पु †
संज्ञा पुं० [सं० गीर्वाण] देवता । देव । सुर । उ०— तेरे गुन गान सुनि गिरवान पुलकित सजल विलोचन विरंचि हरि हर के ।—तुलसी (शब्द०) ।

गिरवान (२)पु
संज्ञा पुं० [फ़ा० गरेबान] १. अंगे या कुरते का वह गोल भाग जो गर्दन के चारों और रहता है । कालर । २. गर्दन । गला । उ० —नेही सनमुख जुरत ही तेहिं मन की गिरवान । बाहत हैं रनबावरे तेरे दृग किरवान ।—रसनिधि (शब्द०) ।

गिरवाना
क्रि० सं० [हिं० गिराना] गिराने की प्रेरणा करना गिराने का काम किसी दूसरे से कराना ।

गिरवी
[फ़ा०] गिरो रखा हुआ । बंधक । रेहन । यौ०—गिरवीदार, गिरवीनामा, गिरवीजब्ती, गिरवीगठा = रेहन । बंधक । क्रि० प्र०—करना ।—मरना ।—रखना ।

गिरवीदार
संज्ञा पुं० [फ़ा०] वह व्यक्ति जिसके यहाँ कोई वस्तु बंधक रखी हो ।

गिरवीनामा
संज्ञा पुं० [फ़ा०] वह पत्र जिसमें गिरों की शर्तें लिखी हों । रेहननामा ।

गिरवोपत्र
संज्ञा पुं० [हिं० गिरवी + पत्र] दे० 'गिरवीनामा' ।

गिरस्त †
संज्ञा पुं० [सं० गृहस्थ] दे० 'गृहस्थ' ।

गिरस्ता †
संज्ञा स्त्री० [वि० गृहस्थ, हिं० गिरस्त + ई (प्रत्य०)] दे० 'गृहस्थी' । उ०—फिर गिरस्ती में लोग लगे—कुछ काल के अनंतर उन्हें एक कन्या और हुई ।—श्यामा०, पृ०, ४७ ।

गिरह
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] १. गाँठ । ग्रंथि । क्रि० प्र०—देना ।—बाँधना ।—मारना ।—लगाना । २. जेब । कीसा । खरीता । यौ०—गिरहकट । ३ । दो पोगों के जुड़ने का स्थान । ४. एक गज का सोलहवाँ भाग जो सवा दो इंच के बराबर होता है । ५. कुस्ती का एक पेंच । ६. कलैया । उलटी । उ०—ऊँचा चितै सरहियत गिरह कबूतर लेत । दृग झलकित मुलकित बदन तन पुलकित कोहि हेत ।—बिहारी (शब्द०) । क्रि० प्र०—खाना ।—मारना ।—लगाना ।—लेना । यौ०—ग्रिरहबाज्ञ । मुहा०—गिरह खोलना = गाँठ खोलना । मनसे मैल दूर करना । मन से बुराई दूर करना । गिरह पड़ना = गाँठ पड़ना । भेद पैदा होना । उ०—पड़ न पावे गिरह किसी दिल में ।— चोखे, पृ० ३६ । गिरह बाँधना या बाँघ लेना = गाँठ में बाँध लेना । मन मे बैठा लेना । उ०—ले गिरह बाँध दिल गिरह खोलें ।—चोखे० पृ० ३६ ।

गिरहकट
वि० [फ़ा०] [गिरह = जेब या गाँठ + हिं० काटना] जेब या गाँठ में बँधा हुआ माल काट लेनेवाला ।

गिरहदार
वि० [फ़ा०] जिसमें गाँठ हो । गाँठवाला । गँठीला ।

गिरहबाज
संज्ञा पुं० [फ़ा० गिरहबाज] एक जाति का कबूतर जो उड़ते उड़ते उलटकर कलैया खा जाता है और फिर उड़ते लगता है । इसे लोटन कबूतर भी कहते हैं ।

गिरहबाज उड़ी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० गिरहाबाज + उड़ी = कलैया] वह उलटी कलैया जो कसरत करनेवाला कबूतर की तरह उलटकर लगाते हैं ।

गिरहर †
वि० [हिं० गिरना + हर (प्रत्य०)] जो गिरनेवाला हो । जो गिरने के लिये तैयार हो । पतनोन्मुख ।

गिरहस्त पु
संज्ञा पुं० [सं० गृहस्थ] दे० 'गृहस्थ' उ०—हस्ति घोर औ कापर सबहि दीन्ह नौ साजु । भै गिरहस्त लखपती, घर घर मानहिं राजु ।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ०, ३४६ ।

गिरही पु †
संज्ञा पुं० [सं० गृहिन्] जो घरबारवाला हो । गृहस्थ । उ०—बाटे बाटे सब कोइ दुखिया क्या गिरही बैरागी । शुक्राचार्य दुख ही के कारण गरभै माया त्यागी ।—कबीर (शब्द०) ।

गिराँ
वि० [फ़ा० गराँ] १. जिसका दाम अधिक हो । महँग । २. भारी । वजनी । हलका का उलटा ३. जो भला न मालूम हो । अप्रिय । क्रि० प्र०—गुजरना ।

गिराँया †
संज्ञा पुं० [सं० ग्रँवेय, हिं० गारँब] दे० 'गराँव' ।

गिराँव (१)
संज्ञा पुं० [सं० ग्रँवेय, हिं० गराँव] दे० 'गराँव' ।

गिराँव (२) †
संज्ञा पुं० [सं० ग्राम] गाँव । यौ०—गाँव गिराँव ।

गिरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह शक्ति जिसकी सहायता से मनुष्य बातें करता है । बोलने की ताकत । २. जिह्वा । जीभ । जबान । उ०—पीर थके अरु मीर थके पुनि धीर थके बहु बोलि गिरा तै ।—सुंदर ग्रं०, भा०, २, पृ० ६६० । ३. बोल । वचन । वाणी । कलाम । ४. सरस्वती देवी । यौ०—गिरापति । गिरापितु । ५. सरस्वती नदी । ६. भाषा । बोली । ७. कविता । शायरी ।

गिराधव
संज्ञा पुं० [सं०] ब्रह्मा [को०] ।

गिराना
क्रि० सं० [हिं० गिरना का सक० रूप] १. किसी चीज का आधार या अवरोध आदि हटाकर उसे उपने स्थान पर से नीचे डाल देना । पतन करना । जैसे, छत पर से पत्थर गिराना, हाथ से छड़ी गिराना, आँख से आँसू गिराना । २. किसी चीज को खड़ा न रहने देकर जमीन पर ड़ाल देना । जैसे,—खभा गिराना, मकान गिराना । ३. अवनत करना । घटाना । ह्रास करना । जैसे,—विलासप्रियता ने ही उस जाति को गिरा दिया । ४. किसी जलधारा या प्रवाह को किसी ढाल की और ले जाना । जैसे,—नाली गिराना, मोरी गिराना । ५. शक्ति, प्रतिष्ठा, मूल्यया स्थिति आदि में कमी कर देना । जैसे,—(क) बीमारी ने उसे ऐसा गिराया कि वह छह महीने तक किसी काम का न रहा । (ख) व्यापारियों ने माल खरिदना बंद करके बाजार गिरा दिया । ६. जीर्णा या दुर्बल करके अथवा इसी प्रकार के किसी उपाय से किसी चीज को उसके स्थान से हटा या निकाल देना । जैसे,—(क) दो महीने बाद उसने गर्भ गिरा दिया । यह दवा तुम्हारे सब दाँत (या बाल) गिरा देगी । ७. कोई ऐसा रोग उत्पन्न करना जिसके विषय में लोगों का यह विश्वास हो कि उसका वेग ऊपर से नीचे आता या होता है । जैसे, तुम्हारी यह लापरवाही जरूर नजला गिरावेगी । ८. सहसा उपस्थित करना । अचानक सामने ला रखना । जैसे,—यह झमेला तुमने हमारे सिर ला गिराया । विशेष—इस अर्थ में इसमें पहले 'लाना' क्रिया लगती है । ९. युद्ध में प्राण लेना । लड़ाई में मार ड़ालना । जैसे,—उसने पाँच आदमियों की गिराया ।

गिरानी
संज्ञा० स्त्री० [फ़ा० गरानी] १. मूल्य का अधिक होना । महँगापन । महँगी । २. अकाल कहत । ३. कमी । अभाव । टोटा । ४. किसी चीज का विशेषतः पेट का भारीपन । उ०— रसनिधि प्रेम तबीब यह दियो इलाज बताय । छबि अजबाइन चख दृगन विरह गिरानी जाय ।—रसनिधि (शब्द०) ।

गिरापति
संज्ञा पुं० [सं०] ब्रह्मा । उ०—ईस न गनेश न दिनेश न धनेश न सुरेश सुर गौरि गिरापति नहिं जपने ।—तुलसी (शब्द०) ।

गिराब
संज्ञा पुं० [अ० ग्रेप] तोप का वह गोला जिसमें छोटी छोटी गोलियाँ या छर्रे भी रहते हैं ।

गिराव
संज्ञा पुं० [हिं० गिरना + आव(प्रत्य०)] गिरने की क्रिया या भाव । पतन । गिरावट ।

गिरावट
संज्ञा स्त्री० [हिं० √ गिर + आवट (प्रत्य०)] १. ह्रास । पतन । २. न्यूनता । कसी । ३. अवनति । अपकर्ष । ४. मान या पद की मर्यादा में दोष या बाधा होना ।

गिरावना पु †
क्रि० सं० [हिं० गिराना] दे० 'गिराना' ।

गिरास पु
संज्ञा पुं० [सं० ग्रास] दे० 'ग्रास' ।

गिरासना पु †
क्रि० सं० [हिं० गिरास + ना (प्रत्य०)] दे० 'ग्रसना' । उ०— परी रेणु होइ रबिहिं गिरासा । मानुष पंख लेहिं फिरि बासा ।—जायसी (शब्द०) ।

गिरासी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्राचीन जाति । विशेष— यह जाति गुजरात देश में रहती थी । इस जाति के लोग बड़े फसादी और ड़ाकू होते थे ।

गिराह पु †
संज्ञा पुं० [सं० ग्राह] ग्राह या मगर नामक जलजंतु ।

गिरि (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. पर्वत । पहाड़ । २. दशनामी संप्रदाय के एक प्रकार के संन्यासी । विशेष—ये अपने नामों के पीछे उपाधि की भाँति 'गिरि' शब्द लगाते हैं । (जैसे—नारायण गिरि, महेश गिरि आदि) । इनमें कुछ लोग मठधारी महंत होते हैं और कुछ जमींदारी तथा अनेक प्रकार के व्यापार करते हैं । इनमें से कुछ लोग वैष्णव हो गए हैं, जो गिरि वैष्णव कहलाते हैं । ये विबाह नहीं करते । ३. परिव्राजकों की एक उपाधि । ४. तात्रिक संन्यासियों का एक भेद । ५. पारे का एक दोष जिसका शोधन यदि न किया जाय, तो खानेवाले का शरीर जड़ हो जाता है । ६. आँख का एक रोग जिसमें ढेंढर या टेटर निकल आता है और आँख कानी हो जाती है । ७. गेंद [को०] ।८. मेघ । बादल [को०] । ९. आठ की संख्या [को०] । १० . शिला । चट्टान [को०] ।

गिरि (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० गिरि] १. निगलने की क्रिया । २. चुहिया । मूषिका [को०] ।

गिरिकंटक
संज्ञा पुं० [सं० गिरिकण्टक] वज्र ।

गिरिकंदर
संज्ञा पुं० [सं० गिरिकन्दर] पहाड़ की गुफा [को०] ।

गिरिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. शिव । महादेव । २. वह जो पर्वत से उत्पन्न हो । ३. गोंद [को०] ।

गिरिकच्छप
संज्ञा पुं० [सं०] पहाड़ की गुफा में रहनेवाला कछुआ [को०] ।

गिरिकदंब, गिरिकदंबक
संज्ञा पुं० [सं० गिरीकदम्ब, गिरिकदम्बक] एक प्रकार का कदंब [को०] ।

गिरिकदली
संज्ञा स्त्री० [सं०] पहाड़ी केला [को०] ।

गिरिकर्णिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १४. अपराजिता लता । २. चिचिड़ा । अपामार्ग । ३. पृथ्वी [को०] ।

गिरिकर्णी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अपराजिता या कोयल नाम की लता । २. जवासा ।

गिरिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] चुहया । मुसटी । २. पुरुवंशी वसु राजा की स्त्री जिसकी कथा महाभारत में है ।

गिरिकाण
वि० [सं०] गिरी नामक रोग के कारण जिसकी एक आँख नष्ट हो गई हो [को०] ।

गिरिकानन
संज्ञा पुं० [सं०] पहाड़ के ऊपर लगा हुआ बाग [को०] ।

गिरिकुहर
संज्ञा पुं० [सं०] पहाड़ा की खोह या गुफा [को०] ।

गिरिकूट
संज्ञा पुं० [सं०] पहाड़ की चोटी या शिखर [को०] ।

गिरिक्षिप
संज्ञा पुं० [सं०] अक्रूर के एक भाई का नाम ।

गिरिगुड़
संज्ञा पुं० [सं०] गेंद । कंदुक [को०] ।

गिरिगुहा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पहाड़ की गुफा । उ०— प्रथमगि देवन्ह गिरिगुहा राखे रुचिर बनाई ।—मानस, ४ । १२ ।

गिरिचर (१)
वि० [सं०] पर्वत पर चलने या रहनेवाला [को०] ।

गिरिचर (२)
संज्ञा पुं० तस्कार । चोर [को०] ।

गिरिज (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. शिलाजीत । २. लोहा । ३. अबरक । अभ्रक । ४. गेरू । ५. एक प्रकार का पहाड़ी महुआ ।

गिरिज (२)
वि० पहाड़ से उत्पन्न ।

गिरिजा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] नगाधिराज हिमालय की कन्या, पार्वती । गौरी । यौ०— गिरिजाधब गिरिजापति = महादेव । शंकर । गिरिजाकुमार, गिरिजातनय, गिरिजानन्दन, गिरिजासुत = (१) कार्तिकेय । (२) गणेश । गंगा । ३. चकोतरा । ४. पहाड़ी केला । ५. चमेली ।

गिरिजा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० गिरजा] दे० 'गिरजा (२)' ।

गिरजागृह
संज्ञा पुं० [सं०] पार्वतीमंदिर । उ०— सर समीप गिरजागृह सोहा ।—मानस, १ । २८ ।

गिरिजाघर
संज्ञा पुं० [हिं० गिरजाघर] दे० 'गिरजाघर' ।

गिरिजामल
संज्ञा पुं० [सं०] अभ्रक ।

गिरिजारमन
संज्ञा पुं० [सं० गिरिजारमण] शंकर । महादेव । शिव । उ० — चरित सिंधु गिरिजारमन वेद न पावहिं पारु ।—मानस, १ । १०३ ।

गिरिजाल
संज्ञा पुं० [सं०] पर्वत ता विस्तार या पर्वतश्रेणी [को०] ।

गिरिजाबीज
संज्ञा पुं० [सं०] गंधक ।

गिरिज्वर
संज्ञा पुं० [सं०] वज्र ।

गिरित
वि० [सं०] १. खाया हुआ । भक्षित । २. निगला हुआ [को०] ।

गिरित्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. महादेव । शिव । २. समुद्र । बिशेष— जब इंद्र ने पर्वतों के पर काटे थे, तब मैनाक पर्वत समुद्र में जा छिपा था । इसी से समुद्र का यह नाम पड़ा ।

गिरिदाँन पु
संज्ञा पुं० [फा़० गर्दन] दे० 'गरदन' । उ०— उंच कहर कंधान छोट गिरिदाँन लंब भुअ ।—पृ० रा०, ८ । ५५ ।

गिरिदुर्ग
संज्ञा पुं० [सं०] पहाड़ा पर बना हुआ किला । विशेष— मनु ने इस प्रकार का दुर्ग बड़ा उपयोगी बतलाया है ।

गिरिदुहिता
संज्ञा स्त्री० [सं० गिरिदुहितृ] पार्वती [को०] ।

गिरिद्द पु
अव्य० [फ़ा० गिर्द] दे० 'गिर्द' । उ०— गिरिद्द डोरि रेशमं सुपंच रंगयं भ्रमं ।—पृ०, रा०, १७ । ५२ ।

गिरिद्वार
संज्ञा पुं० [सं०] दर्रा [को०] ।

गिरिधर
संज्ञा पुं० [सं०] श्रीकृष्ण ।

गिरिधरन पु
संज्ञा पुं० [सं० गिरिधरण] श्रीकृष्ण ।

गिरिधातु
संज्ञा पुं० [सं०] गेरू ।

गिरिधारन पु
संज्ञा पुं० [सं० गिरधारण] श्रीकृष्ण ।

गिरिधारी
संज्ञा पुं० [सं० गिरिधारिन्] श्रीकृष्ण ।

गिरिध्वज
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्र ।

गिरिनंदिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० गिरिनन्दिनी] १. पार्वती । २. गंगा । ३. गदी ।

गिरिनगर
संज्ञा पुं० [सं०] १. गिरनार पर्वत पर बसा हुआ नगर जो जैनियों का एक पवित्र तीर्थ है । २. पुराण के अनुसार रैवतक पर्वत [को०] ।

गिरिनदी
संज्ञा स्त्री० [सं०] पहाड़ी नदी [को०] ।

गिरिनाइक
संज्ञा पुं० [सं० गिरि + नायक] गिरिराज । गोवर्धन पर्वत । उ०—तिन करि सेवित सब सुखदाइक । धन्य धन्य गोधन गिरिनाइक ।—नंद ग्रं०, पृ० २९७ ।

गिरिनाथ
संज्ञा पुं० [सं०] महादेव । शिव । उ०— कछु दिन तहाँ रहे गिरिनाथा ।—तुलसी (शब्द०) ।

गिरिनिंब
संज्ञा पुं० [सं० गिरिनिम्ब] बकायन ।

गिरिपथ
संज्ञा पुं० [सं०] दो पहाड़ों के बीच का संकीर्ण मार्ग । दर्रा [को०] ।

गिरिपीलु
संज्ञा पुं० [सं०] फालसा ।

गिरिपुष्पक
संज्ञा पुं० [सं०] १. पथरफोड़ नाम का पौधा । २. शिलाजीत [को०] ।

गिरिप्रस्थ
संज्ञा पुं० [सं०] पहाड़ के ऊपर का चौरस मैदान । पठार [को०] ।

गिरिप्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] सुरा गाय ।

गिरिफदार †
वि० [फ़ा० गिरफ्तार] दे० 'गिरफ्तार' । उ०— अजी करना है उसके गिरिफदार ।—मैला०, पृ० २९६ ।

गिरिबरधर पु
संज्ञा पुं० [हि० गिरिवघर] दे० 'गिरिवरधर' । उ०—गोपीनाथ गोबिंद गोपसुत गुनी गीतप्रिय गिरिबरधर रसाल के ।—घनानंद, पृ० ३६५ ।

गिरिबांधव
संज्ञा पुं० [सं० गिरिबान्धव] महादेव । शिव [को०] ।

गिरिबूटी
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की वनस्पति जो औषध के काम में आती है । संगबूटी । अगूरशेफा । वि० दे० 'अगूरशेफा' ।

गिरिभव
वि० [सं०] पर्वत से उत्पन्न । गिरिजात । उ०— सत्य कहेहु गिरिभव तनु एहा । हठ न छूट छुटै बरु देहा ।— मानस १ । ८० ।

गिरिभिद्
संज्ञा पुं० [सं०] पखानभेद ।

गिरिमल्लिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] कुटज । कुरैया ।

गिरिमान
संज्ञा पुं० [सं०] हाथी । विशालकाय एवं शक्तिशाली हाथी [को०] ।

गिरिमृत
संज्ञा स्त्री० [सं०] गेरू ।

गिरिमृद्धव
संज्ञा पुं० [सं०] गेरू (को०) ।

गिरियक, गिरिंयाक
संज्ञा पुं० [सं०] गेंद [को०] ।

गिरिराज
संज्ञा पुं० [सं०] १. बड़ा पर्वत । २. हिमालय । ३. गोवर्द्धन पर्वत । ४. मेरु ।

गिरिवर
संज्ञा पुं० [सं०] गिरिराज । उ०— मूक होइ बाचाल पंशु चढै़ गिरिवर गहन ।—मानस, १ । १ ।

गिरिवरधर
संज्ञा पुं० [सं०] श्रीकृष्ण ।

गिरिवर्तिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की पहाड़ी हंसिनी । बतख [को०] ।

गिरिवर्य
संज्ञा पुं० [सं०] गिरिवर । हिमालय । उ०— दिए तुमने भारत को दिव्य न जाने कितने नए विचार । तुम्हारे श्रृगों से गिरवर्य । विविध धर्मों का हुआ प्रचार ।—सागरिका, पृ० ७ ।

गिरिव्रज
संज्ञा पुं० [सं०] १. केकय देश की राजधानी । २. जरासंध । की राजधानी, जिसे पीछे, राजगृह कहते थे ।

गिरिश
संज्ञा पुं० [सं०] महादेव । शिव [को०] ।

गिरिशाल
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का बाज पक्षी ।

गिरिशालिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] अपराजिता लता ।

गिरिशिखर
संज्ञा पुं० [सं०] पहाड़ की चोटी । गिरिकूट [को०] ।

गिरिशृंग
संज्ञा पुं० [सं० गिरिश्रृङ्ग] १. पहा़ड़ की चोटी । २. गणेश [को०] ।

गिरिसंभव (१)
संज्ञा पुं० [सं० गिरिसम्भव] एक प्रकार का पहाड़ी चूहा [को०] ।

गिरिसंभव (२)
वि० पहाड़ या पर्वत से उत्पन्न । उ०— सुनत बचन बिहँसे रिषय गिरिसंभब तव देह । नारद का उपदेसु सुनि कहहु बसेउ किसु गोह ।—मानस , १ । ७८ ।

गिरिसानु
संज्ञा पुं० [सं०] पठार । अधित्यका [को०] ।

गिरिसार
संज्ञा पुं० [सं०] १. लोहा । २. शिलाजीत । ३. राँगा । ४. मलय पर्वती ।

गिरिसुत
संज्ञा पुं० [सं०] मैनाक पर्वत ।

गिरिसुता
संज्ञा पुं० [सं०] पार्वती ।

गिरिस्ती
संज्ञा स्त्री० [सं० गृहस्थ, हि० गिरिस्न + ई (प्रत्य०)] दे० 'गृहस्थी' ।

गिरिस्रवा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पहाड़ी नदी [को०] ।

गिरिही पु
संज्ञा पुं० [सं० गृही] दे० 'गृही' । उ०— होइ गिरिही पुनि होइ उदासी । अंतकाल दुनहूँ बिसवासी ।—जायसी ग्र० (गुप्त), पृ० ३३१ ।

गिरिंद्र
संज्ञा पुं० [सं० गिरिन्द्र] १. बड़ा पर्वत । २. हिमालय । ३. शिव । ४. आठ की संख्या [को०] ।

गिरी
संज्ञा स्त्री० [हि० गरी] १. वह गूदा जो बीज को तोड़ने पर उसके अंदर से निकलता है । जैसे—बादाम, अखरोट या खरबूजे आदि की गिरी । २. दे० 'गिरी' । ३. दे० 'गरी' ।

गिरीयक
संज्ञा पुं० [सं०] गेंद । कंदुक [को०] ।

गिरीश
संज्ञा पुं० [सं०] १. महादेव । शिव । २. हिमालय पर्वत । ३. सुमेरु पर्वत । ४. कैलाश पर्वत । ५. गोवर्धन पर्वत । ६. कोई बड़ा पहाड़ । ७. बृहस्पाति (को०) ।

गिरेबान
संज्ञा पुं० [फ़ा० गरेबान] गले में पहनने के कपड़े का वह भाग जो गरदन के चारों ओर रहता है ।

गिरेवा
संज्ञा पुं० [सं० गिरि अथवा सं० ग्रावन् ग्रावा] १. छोटी पहाड़ी । टीला । २. चढ़ाई का रास्ता ।

गिरेश
संज्ञा पुं० [सं० गिरा + ईश] १. ब्रह्मा । २. विष्णु ।

गिरैयाँ (१) †
संज्ञा स्त्री० [हिं० गेराँव का अल्पा० ] छोटा या पतला गेराँव । उ०— तिय जानि गिरैयाँ गहो बनमाल सो ऐंच लला इँच्यों आवत है ।— पद्माकर (शब्द०) ।

गिरैयाँ (२) †
वि० [हिं० गिरना] गिरनेवाला । पतनोन्मुख । जो गिरने को हो ।

गिरैया** †
वि० [हिं० गिरना + ऐया (प्रत्य०)] गिरनेवाला ।

गिरों** †
वि० [हिं० गिरो] दे० 'गिरो' ।

गिरो
वि० [फ़ा० गिरौ] रेहन । बंधक । गिरवी । क्रि० प्र०—करना ।—धरना ।—रखना । यौ०— गिरो गाठ = रेहन ।

गिरोह
संज्ञा पुं० [फ़ा० गिरोह या गुरोह] समूह । समुदाय । जमात । जनसमूह । दल । गोल [को०] ।

गिरोही
संज्ञा पुं० [हिं० गिरोह + ई (प्रत्य०)] समूह का आदमी । जमात का आदमी संगी । साथी [को०] ।

गिर्गिट
संज्ञा पुं० [हिं० गिरगिट] दे० 'गिरगिट' ।

गिर्जा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'गिरजा' । (प्रार्थनामंदिर) ।

गिर्जाघर
संज्ञा पुं० [हिं० गिरजा + घर] दे० 'गिर्जा' ।

गिर्द
अव्य० [फ़ा०] आसपास । चारों ओर । उ० — माया लता रह दुर्म गिर्द है बिबिधरचा फुलवारी ।—सं० दरिया, पृ० १३४ । यौ०— इर्द गिर्द । मुहा०—गिर्द होना = पास होना । पहुँचना । उ०—आदमी की आवाज कान में और हम लठ ले के गिर्द हुए ।—सैर कु०, भा० १, पृ० १४ ।

गिर्दाब
संज्ञा पुं० [फ़ा०] भँवर ।

गिर्दावर
संज्ञा पुं० [फ़ा०] १. घूमनेवाला । दौरा करने वाला । २. घूम घूमकर काम की जाँच करनेवाला । यौ०—गिर्दावर कानूनगो = कलक्टरी मुहकमे का वह छोटा अफसर जो गाँवों में घूम घूमकर पटवारियों या लेखपालों के कागजों की जाँच करता है ।

गिलंका †
संज्ञा स्त्री० [देश०] परिहास । मजाक । दिल्लगी ।

गिलंदाजी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० गिलअंदाजी] १. सड़क बाँध आदि पर मिट्टी ड़ालना । २. पुश्ताबंदी ।

गिल (१)
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] १. मिट्टी । २. गारा । यौ०—कहगिल । गिलकारी ।

गिल (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. मगर । घड़ियाल । २. जंबीर नीबू ।

गिल (३)
वि० भक्षण करनेवाला । निगलनेवाला ।

गिलकना पु
क्रि० सं० [सं० गिल] भक्षण करना । निगलना । उ० — गिलकी सत कंतरि, कृष्ण उरंधरि, साज सबं करि जुझारं ।— पृ० रा०, ९ । ११० ।

गिलकार
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] गारा या पलस्तर करने वाला व्यक्ति । राज ।

गिलकारी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] गारा लगाने या पलस्तर करने का काम ।

गिलकिया
संज्ञा स्त्री० [देश०] नेनुवाँ या घियातोरी नाम की तरकारी ।

गिलगिल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] नाक नामक जलजंतु । नक्र ।

गिलगिल (२)पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० गिलगिलिया] दे० 'गिलगिलिया' । उ० — पल भषनहार पच्छी अपार । गिलगिल बिहार करिट ड़ार ड़ार ।—सुजान०, पृ० २२ ।

गिलगिलिया
संज्ञा स्त्री० [अनु० ] सिरोही नाम की चिड़िया । विशेष— यह आपस में बहुत लड़ती है । इसे कहीं कहीं किलहँटी और मैना भी कहते है ।

गिलगिली
संज्ञा पुं० [देश०] १. घोड़े की एक जाति । २. गुदगुदी । ३. मंद सुरसुराहट या खुजली जो किसी अंग के हल्के हल्के स्पर्श से होती है ।

गिलग्राह
संज्ञा पुं० [सं०] नक्र । गिलगिल [को०] ।

गिलजई
संज्ञा स्त्री० [देश०] अफगानिस्तान में रहनेवाली एक जाति । बिशेष—इस जाति के लोग अच्छे शूर वीर होते हैं ।

गिलट
संज्ञा पुं० [अं० गिल्ड़ = सोना चढ़ाना] १. सोना चढ़ाने का काम । २. एक प्रकार की बहुत हलकी और कम मूल्य की धातु, जिसका रंग संफेद और चमकीला होता है और जिससे जेवर और बरतन बनते हैं ।

गिलटी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० ग्रन्थि] १. चेप की गोल छोटी गाँठ । बिशेष—यह शरीर के अंदर संधिस्थान में होती है । कुहनी, बगल, गरदन और घुटने में तथा पेडू और रान के बीच में एक से अधिक गाँठें होती हैं । २. एक प्रकार का रोग । विशेष—इसमें या तो संधिस्थान की इन्हीं गाँठों में से कोई एक गाँठ सूज या फूल जाती है अथवा शरीर के किसी अन्य भाग में कोई गाँठ उत्पन्न हो जाती है । भावप्रकाश के अनुसार इनकी उत्पत्ति का कारण मांस, रक्त या मेद आदि को दूषित हो जाना है । गिलटी में प्रायः बहुत पीड़ा होती है, और कभी कभी उसके चीरने तक की नौबत आ जाती है । यदि निकलने के साथ ही गिलटी को सेंक दिया जाय, तो वह दब भी जाती है । क्रि० प्र०—उभरना ।— निकलना ।—बैठना ।

गिलटी (२) †
संज्ञा स्त्री० [देश०] कहकर मुकरना या पलटना ।

गिलण (१) पु
वि० [हिं० गिलना] निगलनेबाला ।

गिलण पु
संज्ञा [फ़ा० गर्दन] गर्दन ।

गिलन (१)
संज्ञा पुं० [अ० गैलन] १. अँगरेजी नाप । विशेष— यह १० पाउँड़ । (प्रायः ५ सेर) का होता है और ससे प्रायः तरल पदार्थ नापे जाते हैं । २. टीन आदि का वह बरतन जिससे इतना पदार्थ नापा़ जाता हो ।

गिलन (२)
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० गिलित] निगलना । लीलना ।

गिलना
क्रि० सं० [सं० गिरण अथवा गिलना] १. किसी चीज को बिना दाँतो से तोड़े गले में उतार जाना । निगलना । उ०— (क) बेणु के राज्य में औषधी गिलि गई होइहैं सकल किरपा तुम्हारी ।—सूर (शब्द०) । (ख) तिमिर तरुन तरनिहि मकु गिलई । गगन मगन मकु मेघहिं मिलई ।—तुलसी (शब्द०) । (ग) कोरक सहित अगस्तिया लख्यौ राहु अवतार । कला कलाधर की गिली जनु उगिलत यहि बार ।— गुमान (शब्द०) । २. मन ही में रखना । प्रकट न होने देना । उ०— कोधौं हमहिं देख उठि जैहैं की उठि हसको मिलिहैं । कीधौं बात उधारी कहैगी की मन ही मन गिलिहै ।—सूर (शब्द०) ।

गिलबिला (१)
वि० [अनु०] १. बहुत कोमल । पिलापिला । जैसे,—गिलाबिला फोड़ा । २. अस्पष्ट भाषण या उच्चारण करनेवाला ।

गिलबिला † (२)
संज्ञा पुं० [देश०] मुसलमान ।

गिलबिलाना
क्रि० अ० [अनु०] १. अस्पष्ट वचन बोलना । अस्पष्ट उच्चारण से कुछ कहना । २. व्याकुल होकर बोलना । या असंबद्ध प्रलाप करना ।

गिलबा पु
[अ० ग़ल्बह] कोलाहल । हल्लागुल्ला । शोर ।

गिलम (१)
संज्ञा पुं० [फा० गिलीम = कंबल] १. ऊन का बना हुआ नरम और चिकना कालीन । २. बहुत मोटा मुलायम गद्दा या बिछौना । जैसे,—(क) झालरनदार झुकि झूमत बितान बिछे गहब गलीचा अरु गुलगुली गिलमैं । —पद्माकर (शब्द०) । (ख) चीर के चीन नबीनन सों गिलमैं गुलजार हजार बिछाई ।—गुमान (शब्द०) ।

गिलम (२)
वि० कोमल । नरम । मुलायम ।

गिलामाँ
संज्ञा पुं० [अ० गिलमा, गुलाम का बहु०] इस्लाम धर्म के अनुसार वे सुंदर बालक जो बहिश्त में धर्मात्माओं की सेवा और भोग विलास के लिये रहते हैं ।

गिलमिल
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का कपड़ा जो पुराने जमाने में बनता था । उ०— बादला दरिआई नौरँग साई जरकस काई झिलमिल है । ताफता कलंदर बाफता बंदर मुसजर सुंदर गिलमिल है ।—सूदन (शब्द०) ।

गिलसुर्ख
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० गिलसुर्ख] गेरू ।

गिलहरा (१)
संज्ञा पुं० [देश०] १. एक प्रकार का कपड़ा । विशेष— यह कपड़ा सूत का बनता है और इसमें मोटा मोटी धारियाँ होती हैं ।२. [स्त्री० गिलहरी] बाँस की फट्टियों आदि का बना हुआ एक पात्र, जिसमें पान रखा जाता है । बेलहरा ।

गिलहरी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० गलहरी, कलहरी] एक प्रकार का छोटा जानवर जो एशिया, युरोप और उत्तरी अमेरिका में बहुत अधिकता से होता है । विशेष—गिलहरी की कई जातियाँ होती हैं और यह आकार में चुहे से लेकर बिल्ली तककी होती है यह प्रायः छोटे फल और दाने खाती है और पेड़ों पर रहती है । इसके कान लबे और नुकीले होते हैं और दुम घने और मुलायम रोयों से ढकी होती है । इसकी पीठ पर कई रंग की धारियाँ भी होती हैं । इसकी दुम के रोएँ से रंग भरने की कूँची बहुत अच्छी बनती है । यह बहुत चंचल होती है ओर बड़ी सरलता से पाली जा सकती है । यह अपने पिछले पैरों के सहारे बैठकर अगले पैरों से हाथों की तरह काम ले सकती है । इसकी चंचलका बहुत भली मालूम होती है । एक बार में यह तीन से चार तक बच्चे दे सकती है । इसे कहीं कहीं चिखुरी या गिलाई भी कहते हैं ।

गिला
संज्ञा पुं० [फ़ा० गिलह्] १. उलाहना । उ०—खरिकहू नहिं मिले कहै कह अनमिले करन दे गिले तू दिनन थोरी ।— सूर (शब्द०) । २. शिकायत । निंदा ।

गिलाई
संज्ञा स्त्री० [हि० गिलहरी] दे० 'गिलहरी' ।

गिलाजत
संज्ञा स्त्री० [अ० ग़लाज़त] १. गंदगी । मल । २. अपवित्रता । ३. गाढ़ापन ।

गिलाँण पु, गिलाँणी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० ग्लानि] ग्लानि ।

गिलाँन पु, गिलाँनी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० ग्लानि] ग्लानि ।

गिलान †
संज्ञा स्त्री० [सं० ग्लानि] ग्लानि । घृणा । नफरत । उ०— लखि दरिद्र विद्वान कों जग जन करै गिलान ।—दीन० ग्रं०, पृ० ७९ ।

गिलाफ
संज्ञा पुं० [अ० गिलाफ़] १. कपड़े की बनी हुई बड़ी थैली जो तकिए, लिहाफ आदि के ऊपर चढ़ा दी जाती है । खोल । २. बड़ी रजाई । लिहाफ । ३. म्यान ।

गिलाय
संज्ञा स्त्री० [सं० गिरि = चुहिया] गिलहरी ।

गिलायु
संज्ञा पुं० [सं०] एक रोग । विशेष—इसमें गले के अदर आँवले की गुठली के आकार की एक गाँठ ही जाती है । इसमें बहुत पीडा़ होती है और रोगी के गले में कोई जीज अटकी हुई मालूम होती है । इस रोग में शत्रु चिकित्सा कराने की आवश्यकता होती है ।

गिलार पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० गला] गला । गर्दन ।

गिलारि पु
संज्ञा पुं० [?] नृसिंह । उ०—खंभा मैं प्रगटयो गिलरि ।—कबीर ग्रं०, पृ० २१४ ।

गिलारी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० गिलइरी] दे० 'गिलहरी' ।

गिलाव †
संज्ञा पुं० [हिं० गिलावा] दे० 'गिलावा' ।

गिलावा †
संज्ञा पुं० [फ़ा० गिल + आब] वह गीली मिट्टी जिससे राज लोग ईट जोड़ते है । गारा । उ०— होरा ईटें कपूर गिलावा । औ नग लाय स्वर्ग लय लावा ।— जायसी (शब्द०) ।

गिलास
संज्ञा पुं० [अं० ग्लास] १. एक गोल लंबा पीने का बरतन । पानपात्र । विशेष— यह पेंदी की और कम और मुँह की और कुछ अधिक चौड़ा होता है और इसमें पानी दूध आदि तरल पदार्थ पीते हैं । २. आलूबालू या ओलची नाम का पेड़ । विशेष— इसका फल बहुत मुलायम और स्वादिष्ट होता है । यह सावन में केवल १५*-२० दिन तक फलता है । यह कश्मीर का फल है जिसे अग्रंजी में चेरी कहते हैं । वि० दे० 'आलू वालू' ।

गिलित
वि० [सं०] निगला हुआ । भक्षित [को०] ।

गिलिम
संज्ञा स्त्री० [हिं० गिलम] दे० 'गिलम' । उ०—गिलिम गलीचे दूध फेन को लजाए हैं ।—ऱघुराज (शब्द०) ।

गिली
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'गुल्ली' । उ०—खेलत हौ लाल संग गयो उठि दाँव लै कै भारी खैंच गिली देखि मंदिर में श्याम हैं ।—प्रिया० (शब्द०) ।

गिलेफ †
संज्ञा पुं० [हिं० गिलाफ] दे० 'गिलाफ' ।

गिलोंणा †, गिलोंना †
क्रि० सं० [हिं० गीला] गीला करना ।

गिलोंणा †, गिलोंना †
क्रि सं० [हिं० घालना] १. मिश्रित करना । मिलाना । २. गूँधना । सानना ।

गिलोइ पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० गिलोय] दे० 'गिलोय' । उ०— अमर खर्ग पवि तरुन तरु, अमर जुनास गिलोई । अमर देव के देव हरि, प्रभु सम अमर न कोइ ।—नंद०, ग्रं०, पृ०, ७० ।

गिलोड़ी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० घिलोड़ी] १. घी, गुड़ और आटे से बनाई जानेवाली मोटी रोटी । २. घी रखनी का धातुपात्र ।

गिलोय
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] गुरुच । गुड़ूची । उ०— नीब की छाल चिरायता, आनै फेर गिलोय ।—इंद्रा०, पृ०, १५१ ।

गिलोल
संज्ञा स्त्री० [हिं० गुलेल] दे० 'गुलेल' ।

गिलोला
संज्ञा पुं० [फ़ा० गुलेला] मिट्टी का बना हुआ छोटा गोला जो गुलेल से जाता है । उ०— तेरी कंठसिरी के नवल मुकता फल न तिनके् गिलोला काम करतु बनाय कै ।— गुमान (शब्द०) ।

गिलौंदा †
संज्ञा पुं० [हिं० गुलैदा] दे० 'गुलैदा' ।

गिलौरी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक या कई पानों का बीड़ा जो साधारण बीड़े से कुछ भिन्न और तिकोना, चौकोना तथा कई आकार का होता है । क्रि० प्र० — बनाना । यौ०— गिलौरोदान ।

गिलौरीदान
संज्ञा पुं० [हिं० गिलौरी + दान] पान रखने का डिब्बा । पानदान । पनडब्बा ।

गिल्टी
संज्ञा स्त्री० [हिं० गिलटी] दे० 'गिलटी' ।

गिल्यान पु
संज्ञा स्त्री० [सं० ग्लानि] दे० 'ग्लानि' । उ०— ताके मन उपजी गिल्यान । मैं कीन्हीं बहु जिय की हान ।—सूर (शब्द०) ।

गिल्ला †
संज्ञा पुं० [हिं० गिला] दे० 'गिला' ।

गिल्ली
संज्ञा स्त्री० [हिं० गुल्ली] दे० 'गुल्ली' ।मुहा०— गिल्लियाँ गढना = बितंड़ावाद करना । व्यर्थ बकवाद करना ।

गिव पु
संज्ञा पुं० [सं० ग्रीवा] गरदन । गला । उ०— चूरहीं गिव अभरन औ हारू । अब काकहँ हस करव सिंगारू ।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० २१० ।

गिवार पु
वि० [हिं० गँवार] दे० 'गँवार' । उ०— नराँ नारा सुरा नार, जूज जीत लीधजार । धपे न कोता बुधार है गिवार है गिवार ।—रघु रू०, पृ०, १३६ ।

गिष्ण
संज्ञा पुं० [सं०] १. सामवेद का गानेवाल । यज्ञों में सामवेद के मंत्र को सबिधि गानेवाला मनुष्य । २. गवैया । गायक ।

गिष्णु
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'गिष्ण' ।

गींजना
क्रि० सं० [हिं० मींजना] १. कीसी कोमल पदार्थ, विशेषतः कपड़े, फूल आदि को इस तरह दबाना या मलना जिसमें वह खराब हो जाय । उ०—गींजी फूल माल सी लसत सेज परी हाथ ऐसी सुकुमारी ऐसे मींजि मारियतु है । —रधुनाथ (श्बद०) । २. खाने के पदार्थ को भददे ढंग से एक दूसरे में मिलाना । सानना ।

गींद पु
संज्ञा स्त्री० [सं० गिन्दुक, हिं० गंद] दे० 'गेद १' । उ०— अपणी भारी गींद चलाँऊँ ।—कबीर ग्रं०, पृ० १७७ ।

गी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वाणी । बोलने की शक्ति । २. सरस्वती देवी ।

गाउ पु †
संज्ञा पुं० [सं० ग्रीवा] गरदन । उ०— दीरध नैन तीख तहँ देखा । दीरध गीउ कंठी निति रेखा । —जायसी, (शब्द०) ।

गीज पु
संज्ञा पुं० [डि०] आँख का मैल । कीचड़ा् । उ०— आँखि मैं गीज रु नाक में सेड़ौ ।—सुंदर ग्रं०, भा० २, पृ० ४३६ ।

गीजड़ पु
संज्ञा पुं० [ड़ि०] आँख का मैला । कीचड़ ।

गीठम
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का घटिया सादा कालीन या गलीचा ।

गीड़ †
संज्ञा पुं० [सं० किट्ट अथवा हिं० कोट = मैल] आँख का कीचड़ या मल ।

गीड़र
संज्ञा पुं० [हिं० कीट ?] कीचड़ [को०] ।

गीणाना पु
क्रि० सं० [हिं० गिनना] दे० 'गिनना' । उ०— मइला राजा धारउ कीसउ हो बेसास, तो हूँ दासी करि गिणी ।— बी० रासो, पृ० ३७ ।

गीत (१)
संज्ञा पुं० [सं०] वह वाक्य, पद या छंद यो गाया जाता हो । गाने की चीज । गाना । विशेष— संगीत शास्त्र के अनुसार जो वाक्य धातु और मात्रायुक्त हो वही गीत कहलाता है । गीत दो प्रकार का होता है— वैदिक और लौकिक । वैदिक गीत को साम कहते हैं । (दे० 'साम') सारा मामवेद ऐसे ही हीतों से भरा हुआ है । लौकिक गित भी दो भागों में विभक्त है— मार्ग और देशी । शुद्ध राग और रागिनियाँ मार्ग के अंतर्गत हैं और आजकल के चलते गाने (दादरा, टप्पा, गजल, ठुमरी, आदि) देशी कहलाते हैं । गीत के दो भेद और हैं—यंत्र और गातू । स्वर निकालनेवाले (बीन, सितार, हारमोनियम आदि) बाजों से उत्पन्न ध्वनिसमूह या गीत को यंत्र और मनुष्य के गले से निकले हुए गातृ कहते हैं । पर साधारण बोलचाल में यंत्र को कोई गीत नहीं कहता, केवल गातृ को गीत कहते हैं । क्रि० प्र०—गाना । मुहा०—गीत गाना = बड़ाई करना । प्रशंसा करना । जैसे,— जिससे चार पैसा पाते हैं उसके गीत गाते हैं । अपनी ही गीत गाना = अपना ही वृत्तांत कहना । अपनी ही बात कहना, दूसरे की न सुनना । २. बड़ाई । यश । उ०—गीध मानो गुरु, कपि भालु माने मीत कै, पुनीत गीत साके सब साहेब समत्थ के ।—तुलसी ग्रं०, पृ० २०४ । ३. वह जिसका यश गाया जाय ।

गीत (२)
वि० १. गाया हुआ । २. घोषित । कथित [को०] ।

गीतक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. गीत । गाना । २. प्रशंसा [को०] ।

गीतक (२)
वि० १. गीत गानेवाला । २. गीत बनानेवाला [को०] ।

गीतकार
संज्ञा पुं० [सं०] गीत लिखनेवाला । गीतों की रचना करनेवाला [को०] ।

गीतकीर्ति
वि० [सं०] बहुत प्रसिद्ध । विख्यात [को०] ।

गीतक्रम
संज्ञा पुं० [सं०] संगीत में एक प्रकार की तान ।

गीतगोविंद
संज्ञा पुं० [सं० गीतगोविन्द] जयदेव कृत संस्कृत का प्रसिद्ध गीत काव्य ।

गीतप्रिय (१)
वि० [सं०] गीतों का प्रेमी । गीतों में रुचि रखनेवाला [को०] ।

गीतप्रिय (२)
संज्ञा पुं० १. शिव । २. श्रीकृष्ण । उ०—गोपीनाथ गोविंद गोपसुत गुनी गीताप्रिय गिरिबरधर रसाल के ।— घनानंद, पृ० ३६५ ।

गीतप्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] कार्तिकेय की एक मातृका का नाम ।

गीतभार
संज्ञा पुं० [सं०] गीत की प्रथम पंक्ति जो टेक के रूप में होती है । टेक । उ०—देखता हूँ मरना ही भारत की नारियों का एक गीतभार है ।—लहर, पृ० ७१ ।

गीतमोदी
संज्ञा पुं० [सं० गीतमोदिन्] किन्नर [को०] ।

गीतशास्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] संगीत विद्या [को०] ।

गीता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह ज्ञानमय उपदेश जो किसी बड़े से माँगने पर मिले । जैसे,—रामगीता, शिवगीता, अनुगीता, उत्तरगीता आदि । २. भगवदगीता । ३. संकीर्ण राग का एक भेद । ४. २६ मात्रा का एक छद जिसमें १४ और १२ मात्राओं पर विराम होता है । उ०—मन बावरे अजहूँ समझ संसार भ्रम दरियाउ । इहि तरन को यहीं छोड़ कै कछु नाहिं और उपाय ।—(शब्द०) । ५. वृतांत । कथा । हाल । उ०— सीता गीता पुत्र की सुनि सुनि भी अचेत । मनो चित्र की पुत्रिका कन क्रम बचन समेत ।—केशव (शब्द०) ।

गीतातीत
वि० [सं०] १. जो गाया न जा सके । गान के परे । २. जिसका वर्णन न किया सके । अकथनीय [को०] ।

गीतायन
संज्ञा पुं० [सं०] गायन के साधन, मृदंग, वीमा, बाँसुरी आदि [को०] ।

गीति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. गान । गीत । २. आर्या छंद के भेदों में से एक जिसके विषम चरणों में १२ और सम चरणों में १८ मात्राएँ होती हैं । इसे उदगाहा या उदगाथा भी कहते हैं । ३. एक साम मंत्र (को०) ।

गीतिका
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक मात्रिक छंद जिसके प्रत्येक चरण में २६ मात्राएँ होती है, १४ तथा १२ यति होती है और अंत में लघु गुरु होते हैं । उ०—धन्य श्री वसुदेव देवकि, पुत्र करि जिन पाइया । धन्य यशुमति नंद जिन पय प्याय गोद खिलाइया ।—(शब्द०) । २. एक वर्णिक, छंद जिसके प्रत्येक चरण में सगण, जगण, जगण, भगम, रगण, सगण और लघु गुरु होते है । ३. गीत । गान । गायन ।

गीतिकाव्य
संज्ञा पुं० [सं०] ऐसा काव्य जो गीति प्रधान अथवा गेय हो और आत्मपरक हो । उ०—गीति काव्य और गेय काव्य दोनों एक ही वस्तु नहीं हैं ।—पौद्दार अभि० ग्रं०, पृ० १६७ ।

गीतिनाट्य
संज्ञा पुं० [सं०] ऐसा नाटक जिसमें काव्य की प्रधानता हो । काव्य नाटक । उ०—यह दृश्य काव्य गीतिनाटय के ढंग पर लिखा गया है ।—करुणालय, (सूचना) ।

गीतिरूपक
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का रूपक जिसमें गद्य कम और पद्य या गान अधिक होता है । २. काव्यरूपक (को०) ।

गीती
वि० [सं० गीतिन्] गाकर पाठ करनेवाला । गाकर पढ़ने— वाला [को०] ।

गीत्यार्या
संज्ञा पुं० [सं०] एक छंद जिसके प्रत्येकत चरण में ५ नगण और एक लघु होता है । इसे अचलधृति भी कहते हैं ।

गीथा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. गीत । गाना । २. वचन । वाणी [को०] ।

गीथिन पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० गिहथिन] गिरस्तिन । गिरस्ती सँभालनेवाली स्त्री० ।

गीथिनी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० गृहस्थ] गृहास्थिनी । गृहिणी । घरनी । उ०—पलटू भूली गीथिनी कहूँ भात कहुँदाल ।— पलटू०, भा० १, पृ० १०४ ।

गीद पु
संज्ञा पुं० [हिं० गीध] दे० 'गाध' । उ०—रज्जब पहुँचै गीद ज्यों अति चलते कै पाय ।—रज्जब०, पृ० १७ ।

गीदड़ (१)
संज्ञा पुं० [सं० गृध्र = लुब्ध या फा० गीदी] [स्त्री० गीदड़ी] सियार । शृगाल । भेड़िए या कुत्ते की जाति का एक जानवर जो लोमड़ी से मिलता जुलता होता है । विशेष—यह झुड़ों में रहता है और एशिया तथा अफ्रिका में सर्वत्र पाया जाता है । दिन में यह माँद में पड़ा रहता है और रात को झुंड के साथ निकलता है और छोटे छोटे जंतु जैसे, भेड़ मुर्गी, बकरी आदि पकड़कर खाता है । कभी कभी यह मुर्दे तथा मरे हुए जीवों की लाश खाकर ही रह जाता है । यह कुत्ते के साथ जोड़ा खा जाता है । गीदड़ बहुत डरपोक समझा जाता है । यौ०—गीदड़ भबकी = मन में डरते हुए भी ऊपर से दिखाऊ साहस या क्रोध प्रकट करने की क्रिया । मुहा०—गीदड़बोलना = बुरा शकुन होना । किसी स्थान पर गीदड़ बोलना = उजाड़ होना । निर्जन होना ।

गीदड़ (२)
वि० डरपोक । असाहसी । बुजदिल ।

गीदडरूख
संज्ञा पुं० [हिं० गीदड़ + रूख = वृक्ष] मझोले कद का एक प्रकार का पेड़ जो समस्त उत्तर, मध्य और पूर्व भारत में अधिकता से होता है । विशेष—इसकी पत्तियाँ छोटी, बड़ी और कई आकार—प्रकार की होती हैं और अधिकता से पशुओं के चारे के काम में आती हैं । गरमी के आरंभ में इसका पतझड़ हो जाता है । चैत से जेठ तक इसमें बहुत छोटे छोटे लंबोतरे और लाल रंग के फूल होते हैं । इसमें बेर से कुछ छोटे गोल फल भी लगते हैं जो देहात में खाने के काम आते हैं ।

गीदर
संज्ञा पुं० [हिं० गीदड़] [स्त्री० गीदरी] दे० 'गीदड़' ।

गीदी
वि० [फ़ा०] जिसे साहस न हो । डरपोक । कायर । उ०—गीदी काया देख भुलाया दीनन से क्यों डरता है ।— कबीर श०, पृ० १७ । २. बेहया । निर्लज्ज ।

गीध
संज्ञा पुं० [सं० गृध्र, प्रा० गिद्ध] १. गृध्र । सिद्ध । २. जटायु नामक गिद्ध । उ०—तबहि गध धावा करि क्रोधा ।— मानस, ३ ।२३ ।

गीधना †पु
क्रि० अ० [सं० गृध्र = लुब्ध अथवा सं०/?/गृध्] १. एक बार कोई अनुकूल काम होते देख सदा उसके प्रयत्न में रहना । एक बार कोई लाभ उठआकर सदा उसका इच्छुक रहना । परचना । उ०—(क) कौन भाँति रहिहै बिरद अब देखिबी मुरारि । बीधे मोसों आय के गीधे गीदहि तार ।— बिहारी (शब्द०) । (ख) गीध्यों आय ढीठ हैम तस्कर ज्यों अहि आतुर मति मंद ।—सूर (शब्द०) २. ललचना । लोभवश होना ।

गीधराज
संज्ञा पुं० [सं०] जटायु । उ०—मरत सिखावन देइ चले, गीधराज मारीच ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ११० । (ख) गीधराज सै भेंट भइ बहु बिधि प्रीति बढ़ाइ । गोदावरी निकट प्रभु रहे पर्नगृह छाइ ।—मानस, ३ ।७ ।

गीबत †
संज्ञा संज्ञा [अ० गीबत] १. अनुपस्थिति । गैरहाजिरी । २. पिशुनता । चुगुल खोरी । चुगली ।

गीर पु (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० गिर् गी] वाणी । उ०—कुंज तजि गुंजत गहीर गीर तीर तीर रह्यो रंगभौन भरि भौंरन की भीर सों ।—देव (शब्द०) ।

गीर (२)
प्रत्य० [फ़ा०] १. पकड़नेवाला । जैसे,—राहगीर । अपने अधिकार में रखनेवाला । जैसे,—जहाँगीर [को०] ।

गीरथ
संज्ञा पुं० [सं०] १. बृहस्पति का एक नाम । २. जीवात्मा ।

गीरवाण, गीरवान पु
संज्ञा पुं० [सं० गीर्वाण] देवता । सुर । उ०—चहूँ ओर सब नगर के लसत दिवालय चारु । आसमान तजि जनु रह्यौ गीरवान परिवारु ।—गुमान (शब्द०) ।

गीर्ण
वि० [सं०] १. वर्णित । कहा हुआ । २. निगला हुआ ।

गीर्ण
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वर्णन । स्तुति । १. निगलने की क्रिया ।

गोर्देवी
संज्ञा स्त्री० [सं०] सरस्वती । शारदा ।

गीर्भाषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'गीर्वाणी' [को०] ।

गीर्लता
संज्ञा स्त्री० [सं०] बड़ी मालकगनी ।

गीर्वाण
संज्ञा पुं० [सं०] देवता । सुर । उ०—गद्यो गिरा गीर्वाणन सों गुनि बहुरि बतावहु बाता ।—विश्राम (शब्द०) ।

गीर्वाणकुसुम
संज्ञा पुं० [सं०] लवँग । लौंग ।

गीर्वाणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] देववाणी । संस्कृत [को०] ।

गोर्वि
वि० [सं०] निगलनेवाला [को०] ।

गीला (१)
वि० [हिं० गलना] [वि० स्त्री० गीला] भीगा हुआ । तर । नम । उ०—पग द्वै चलत ठठकि रहै ठाढ़ी मौन धरे हरि के रस गीली ।—सूर (शब्द०) ।

गीला (२)
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की जंगली लता ।

गीलापन
संज्ञा पुं० [हिं० गीला + पन (प्रत्य०)] गीला होने का भाव । नमी । तरी ।

गीली
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का ऊँचा पेड़ । बरमी । विशेष—इसके हीर की लकड़ी चिकनी, भारी, मजबूत और सुर्खी लिए पीले रंग की होती है और मेज, कुरसियाँ आदि बनाने के काम में आती है । इसका पेड़ हिमालय की तराई में अधिकता से होता है ।

गील्लना पु
क्रि० सं० [हिं० निगलना] निगलना । ग्रसना । उ०— चंद कइ भोलइ तोहि गिल्लसइ राह ।—बी० रासो०, पृ० ७२ ।

गीव पु
संज्ञा पुं० [सं० ग्रीवा] दे० 'गिउ', 'ग्रीवा' ।

गीवा †पु
संज्ञा पुं० [सं० ग्रीवा] ग्रीवा । गरदन । उ०—राते स्याम कंठ दुइ गीवा । तेहि दुइ फंद डरौं सुठि जीवा ।—जायसी (शब्द०) ।

गीष्पति
संज्ञा पुं० [सं०] १. बृहस्पति । २. विद्वान् । पंडित ।