विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/कि

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किं
अव्य० [सं० किंम्] दे० 'किम' ।

किंकनी किकणीका
संज्ञा स्त्री० [सं० किङ्कणी, किङ्गणीका] १. करधनी । २. एक प्रकार का खट्टा अंगूर [को०] ।

किंकनी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० किङ्किणी] दे० 'किंकणी' । उ०—काछनी किंकनी कटि पीतांबर की चटक (मटक) कुंडल किरन रवि रथ की अटक ।—नंद०, ग्रं०, पृ० ३६३ ।

किंकर
संज्ञा पुं० [सं० किङ्कर] [स्त्री० किङ्करी] १. दास । सेवक । नौकर ।—आगे बढ़ बोला में प्रभुवर, किंकरकर लेगा यह कार्य ।—साकेत, पृ० ३९३ । २. राक्षसों की एक जाति जिसको हनुमान जी ने प्रमदा वन को उजाड़ने समय मारा था ।

किंकरता
संज्ञा स्त्री० [सं० किङ्करता] सेवा । दासता । उ०—किंकरता करि रह्ययौ प्रकृति—पंकज—चरनन की ।—काश्मीर० पृ० ४ ।

किंकरी
संज्ञा स्त्री० [सं० किङ्करी] सेविका । उ०—तटिनी, यह तुच्छ किंकरी, सुख से क्यो न, बता वहीं मरी?—साकेत, पृ० ३४९ ।

किंकतव्याविमढ़
वि० [सं०] जिसे यह न सुझ पड़े कि अब क्या करना चाहिए । हक्का बक्का । भौचक्का । घबराया हुआ ।

किंकिणिका
संज्ञा स्त्री० [सं० किंङ्कणीका] दे० 'किंकणी' [को०] ।

किंकणी
संज्ञा स्त्री० [सं० किङ्कणी] १. क्षुद्र घंटिका । करधनो । जेहर । कमरकम । २. एक प्रकार की खट्टी दाख । ३. कंटाय का पेड़ । विकंकत वृक्ष ।

किंकिन पु
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'किंकणी' । मंद गयंद की चाल चलै कटि किंकन नेवर धुनि बाजै ।—मति० ग्रं०, । पृ० ३४९ ।

किंकिनि
संज्ञा स्त्री० [सं० किंङ्कणी] दे० 'किंकिणी' । उ०— घंट किंकिनि मुरलि बाजै संख धुनि मान मन ।—चरण० बानी, भा २, पृ० १२२ ।

किंकिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० किंकणी] दे० 'किंकणी' । उ०—रसना काँची किंकिनी सुत्र मेखला जाल ।—अनेकार्थ०, पृ० ३३ ।

किंकिर
संज्ञा पुं० [सं० किङ्कर] १. हाथी का मस्तक । २. कोकिल । ३. भौंरा । ४. घोड़ा । ५. कामदेव । उ०—नंददास प्रेमी स्याम परसि पद पंकज कही, काल्हि तै जु काँमरि भरि किंकिर बुलावै ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३६० । ६. लाल रंग ।

किंकिरा
संज्ञा स्त्री० [सं० किङ्किरा] रुधिर । खून [को०] ।

किंकिरात
संज्ञा पुं० [सं० किङ्किरात] १. अशोक का पेड़ । २. कटसरैया । ३. कामदेव । ४. सुआ । तोता ।

किंकिरि
संज्ञा स्त्री० [सं० किङ्किरः] कोयल [को०] ।

किंकिरि
संज्ञा पुं० [सं० किङ्किरिन्] विकंकत का वृक्ष [को०] ।

किंगरई
संज्ञा पुं० [देश०] लाजवंत की जाति का एक कँटीला पौधा । विशेष—इसकी पत्तियों के सींके ७—८.इंच लंबे और इनमें लगी हुई पत्तियाँ १/४ इंच लंबी होती हैं । यह असाढ़सावन में फूलता है । फुलू पहले लाल रहते है, फिर सफेद हो जाते हैं । इसकी पत्तियाँ और बीज दवा के काम में आते हैं । इसकी लकड़ी का कोयला बारूद बन ने के काम में आता है । यह भारतवर्ष में सर्वत्र होता हैं ।

किंगरि पु
संज्ञा स्त्री० [हि० किंगरी] दे० 'किंगरी' । उ०— किंगरिय गहि दिन रैन बजैहों ।—माधवानल०, पृ० २०१ ।

किंगरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० किंगिरी] दे० 'किंगिरि' । उ०—तजा राजा राजा भा जोगी । और किंगरी कर गहे वियोगी ।— जायसी० ग्रं० (गुप्त) पृ० १२६ ।

किंगाना पु
क्रि० अ० [हिं०] शब्द करना । बोलना । उ०— भुली सारस सद्दहड़ जाप्रभु करह किंगाह । धाई धाई थल चढ़ो, पग्गे दाधी माय ।—ढोला०, दु० ३८८ ।

किंगिरी
संज्ञा स्त्री० [सं० किन्नरी] छोटा चिकारा । छोटी सारंगी जिसे बजाकर एक प्रकार के जोगी भीख माँगते हैं । उ०— किंगिरी गहे जो हुत बैरागी । मरती बार वही धुन लागी ।—जायसी (शब्द०) ।

किंगोरा
संज्ञा पुं० [देश०] दारुहल्दी की जाति की ४—५ हाथ ऊँची एक कंटीली झाड़ी जो जमीन पर दुर तक नहीं फैलती, सीधि ऊपर जाती है । विशेष—इसकी पत्तियाँ ४—५ अँगुल लंबी होती है जिनके किटालों पर दुर दुर दाँत होते हैं । इसमें छोटे छोटे फूल और लाल या काली फलियाँ लगती हैं जो खाई जाती है इसमें भी वे ही गुण हैं जो दारुहल्दी में हैं । इसे किलमोरा और चित्रा भी कहते हैं ।

किंचन
संज्ञा पुं० [सं०] १. थोड़ी वस्तु । असमग्र वस्तु । २. पलाश ।

किंचन्य
संज्ञा पुं० [सं० किन्ञ्चन्य] धन । संपत्ति [को०] ।

किंचित् (१)
वि० [सं० किञ्चत] कुछ । अल्प । जरा सा । यौ०—किचिन्मात्र = थोड़ी भी ।

किंचित् (१)
क्रि० वि० कुछ । थोड़ा ।

किंचिन् पु
अव्य० [सं० किन्चित्] थोड़ा । स०—रान प्रलान प्रकाशिया बे, मिटिया संशय किंचित लौं जिन जानिया बै, तिन सहज पिछान्या सोह ।—राम० धर्म०, पृ० २६ ।

किंचिलिक
संज्ञा पुं० [सं० किञ्चलिक] केंचुआ नाम काल कीड़ा ।

किंचिलुक
संज्ञा पुं० [सं० किञ्चिलुक] केंचुआ [को०] ।

किंज, किजल
संज्ञा पुं० [सं० किञ्ज, किञ्जल] दे० 'किजल्क' [को०] ।

किंजल्क (१)
संज्ञा पुं० [सं० किञ्जल्क] १. पद्यकेशर । कमलकेशर । २. कमल के फूल का पराग । ३. नागेश्वर ।

किंजल्क (२)
वि० [सं०] कमल के केशर के रंग का । पीला । उ०—घन- श्याम काम अनेक छबि लोकाभिराम मनोहरं । किंजल्क बसन किशोर मूरति भूरि गुण करुणाकरं ।—तुलसी (शब्द०) ।

किंडरगार्टन
संज्ञा पुं० [जर्मन] एक जर्मन विद्वान् की निकाली हुई शिक्षाप्रणाली, जिसने एक बगीचे में छोटे छोटे बच्चों के लिये स्कूल खोल रखा था और अनेक प्रकार की ऐसी साम्रग्रियाँ इकट्ठी की थीं जिनसे बच्चों का मनबहलाव भी होता था और अंकों और अक्षरों आदि का अभ्यास भी होता था । विशेष—यह प्राणाली अब बहुत से देशों से प्रचलित हो गई है और इसके अनुसार बच्चों को रंग बिरंगी गोलियों और लकड़ियों आदि के द्वारा शिक्षा दी जाने लगी है ।

किंतु
अव्य० [सं० किन्तु] १. पर । लेकिन । परंतु । जैसे,— हमारी इच्छा तो नहीं है किंतु तुम्हारे कहवे से चलते हैं । विशेष—जहाँ एक वाक्य के विरुद्ध दुसरे वाक्य की योजना होती है, वहाँ इस अव्य का प्रयोग होता है । १. वरन् । बल्कि । जैसे—ऐसे लोगों पर क्रोध न करना चाहिए, किंतु दया दिखानी चाहिए । उ०—हो सकता है कि कुछ लोग हमारे इस कथन पर किसी कारण कुछ किंतु परंतु करते हुए नाक भौं सिकोड़े ।—रस० क०, पृ० ३ ।

किंतुघ्न
संज्ञा पुं० [सं० किन्तुघ्न] ज्योतिष में ग्यारह करणो में से एक ।

किंदुबिल्व
संज्ञा पुं० [सं० किन्दुबिल्वि] बंगाल का एक गाँव जो अजय नदी के किनारे पर है और जहाँ गीतगोविंद के रचयिता वैष्णव कवि जयदेव उत्पन्न हुए थे ।

किंनर पु
संज्ञा पुं० [सं० किन्नर] दे० 'किन्नर' ।

किंपच, किंपचान
वि० [सं० किम्पच, किम्पचान] कंजूस [को०] ।

किंपराक्रम
वि० [सं० किम्पराक्रम] अल्प या न्यून शक्तिवाला [को०] ।

किंपाक
संज्ञा पुं० [सं० किम्पाक] १. वृक्ष । उ०—बैरी रा भीठा वचन, फल मीठा किंपाक । वे खाधाँ वे मानियाँ, हुवा कृतांत खुराक ।—बाकी० ग्रं०, भा०१, पृ० ६६ । विशेष—इसका फल देखने में सुंदर और खाने में स्वादु होता हैं, किंतु जहरीला होने से प्राणघातक हैं । २. महाकाल लता । माकाल । ३. कारस्कर वृक्ष ।

किंपुनः
अव्य० [सं० किम्पुनः] १. किंतना अधिक । २. कितना कम [को०] ।

किंपुरुख पु
संज्ञा पुं० [सं० किम्पुरुष] दे० 'किंपुरुष' ।

किंपुरुष
संज्ञा पुं० [सं०] १. किन्नर । २. दोगला । वर्णसंकर । नीच । हिंदू शास्त्रों के अनुसार जंबू द्वीप के नौ खंडी में से एक खंड । विशेष—यह हिमालय और हेमकूट के मध्य में माना गया है । ४. अग्नीध्र के नौ पुत्रों मे से एक पुत्र का नाम, जो किंपुरुषखंड का राजा था । ५. प्राचीन काल की एक मनुष्य जाति । विशेष—रामायण में लिखा है कि किंपुरुष लोग जंगल, पहाड़ों में झोपड़े बनाकर रहते थे और फल, पत्ते खाकर निर्वाह करते थे ।

किंप्रभाव
वि० [सं०] क्या कुछ या न कुछ शक्तिवाला [को०] ।

किंवहुना
क्रि० वि० [सं०] अधिक या विस्तार से क्या ।

किंभूत
वि० [सं०] किस प्रकार या प्रकृतिवाला [को०] ।

किंरूप
वि० [सं० किम् + रूप] किस रूप आकारवाला [को०] ।

किंवदंती
संज्ञा स्त्री० [सं० किंवदन्ती] अफवाह । खबर । उड़ती खबर । जनरव ।

किंवर
संज्ञा पुं० [सं०] घड़ियाल [को०] ।

किंवराटक
वि० [सं० किंवराटक] अमितव्ययी । अपव्ययी । फिजूलखर्च [को०] ।

किंबा
अव्य० [सं०] या । या तो । अथवा । यदि वा ।

किंविद
वि० [सं०] कुछ या न कुछ जाननेवाला [को०] ।

किंव्यापार
वि० [सं०] अल्प या न कुछ व्यापारवाला [को०] ।

किंशारु
संज्ञा पुं० [सं०] १. बाण । शर । २. कंक नामक पक्षी । ३. जौ, गेहूँ आदि अन्य की बाल के दूँड़ [को०] ।

किंशील
वि० [सं० किम् + शील] किस शील या प्रकृतिवाला [को०] ।

किंशुक
संज्ञा पुं० [सं०] १. पलाश । ढाक । टेसू । विशेष—पलाश के फूल सुग्गे की चोंच की तरह कुछ कुछ टेढ़ें और लाल होते हैं । इसी से पलाश का यह नाम पड़ा । २. तूत का पेड़ ।

किंशुलक, किंशुलुक
संज्ञा पुं० [सं०] किंशुक [को०] ।

किंसुक
संज्ञा पुं० [सं० किंशुक] दे० 'किंशुक' । उ०—नंद लाल कहियै कहा लह्यो अपूरब हार । गुनबिहीन किंसुकनि की तिन मधि मुकुट सुधार ।—मति०, ग्रं०, पृ० ४४६ ।

किंसुव पु
संज्ञा पुं० [सं० किंशुक] पलाश । इ०—श्रोन छिछ उछरंत सुभट सुम्भति जनि किंसुब ।—पृ० रा० १३ ।१४२ ।

कि (१)
क्रि० वि० [सं० किंम्] किस प्रकार? कैसे? उ०—जगदंबा जहँ अवतरी, मो पुर वरणि कि जाय । ऋद्धि सिद्धि संपत्ति सुख, नित नूतन अधिकाय ।—तुलसी (शब्द०) ।

कि (२)
अव्य० [फा० कि] १. एक संयोजक शब्द जो कहना, वर्णन करना, देखना, सुनना इत्यादि क्रियाओं के बाद उनके विषयवर्णन के पहले आता है । जैसे,—(क) उसने कहा कि मैं नहीं जाऊँगा । (ख) राम ने देखा कि आगे एक साँप पड़ा है । (ग) जब उसने सुना कि उसका भाई मर गया, तब वह भी सन्यासी हो गया । २. तत्क्षण । त्काल । तुरंत । जैसे,—(क) मै जानै ही को था कि वह आ गया । (ख) चुपचाप बैठो, उठे कि मारा । (ग) तुम यहाँ से हुटे कि चीज गई । ३. या । अथवा । जैसे,—तुम आम लोगो कि इमली । उ०—सुंदर बोलत आवत बैन । ना जानौं तिहि समय सखी री, सब तन स्रवन कि नैन ।—सूर०, १० ।१८०४ ।

किआह पु
संज्ञा पुं० [सं० कियाह] १. ताड़ के पके फल के रंग का घोड़ा । २. लाल रंग का घोड़ा । उ०—लील समुद चाल जग जाणौ । हासुल भवँर कियाह बखाणै—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० १५० ।

किक
संज्ञा स्त्री० [अं०] ठोकर । पाँव का आघात ।

किकान पु
संज्ञा पुं० [सं० के कारण] घोड़ा । अश्व । उ०— जसवंत साजवान । चड्ढ़े किकान करि करि गराज ।—सूदन (शब्द०) ।

किक
संज्ञा पुं० [सं०] १. नीलकंठ पक्षी । २. नारियल ।

किकियान पु
संज्ञा पुं० [सं० केकाण = केकाण देश का घोड़ा] घोड़ा । उ०—चलहि कलापि कमान चलत घनवान है । परत सत्रु रणभूमि फुट्टि किकियान है ।—प० रासो०, पृ० ८ ।

किकियाना
क्रि० अ० [अनु०] १. कीं कीं या कें क का शब्द करना । २. चिल्लाना । ३. रोना । चीखना ।

किकोरी
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का पौधा ।

किक्यान पु
संज्ञा पुं० [सं० केकाण = केकाण देश का घोड़ा] एक प्रकार का घोड़ा । उ०—प्रदंहृ सहस सुभग किक्यान । कनक भसै नग जरै पलान ।—नंद ग्रं०, पृ० २२१ ।

किचकिच
संज्ञा स्त्री० [अनु० मू०] १. व्यर्थ का वाद विवाद । व्यर्थ की बकवाद । २. झगड़ा । तकरार । जैसे, ।—दिन रात की कचिकिच अच्छी नहीं । क्रि० प्र०—करना ।—मचना ।—मचाना ।—होना ।

किचकिचाना
क्रि० अ० [हिं० किचकिच से नासिक धातु] १. (क्रोध से) दाँत पीसना । जैसे—तुम तो व्यर्थ ही किचकिचाया करते हो । २. भरपूर बल लगाने के लिये दाँत पर दाँत रखकर दबाना । जैसे—उसने किचकिचाकर पत्थर उभाड़ा तब उभड़ा । ३. दाँत पर दाँत रखकर दबाना । जैसे—उसने किचकिचाकर काट लिया ।

किचकिचाहट
संज्ञा पुं० [हिं०] किचकिचावे का भाव ।

किचकिची
संज्ञा स्त्री० [हिं०] किचकिचाहट । दाँत पीसने की अवस्था । मुहा०—किचकिची बाँधना = (१) क्रोध से दाँत पीसना । (२) भरपूर बल लगाने के लिये दाँत पर दाँत रखकर दबाना ।

किचपिच
वि० [हिं० गिचपिच] दे० 'गिचपिच' ।

किचड़ाना
क्रि० अ० [हिं० कीचड़ से नामिक नाम०] (आँख का) कीचड़ से भरना । कीचड़ से युक्त होना । जैसे—आँख किचड़ाई है ।

किचन
संज्ञा पुं० [अं०] रसोईघर । उ०—यही हमारा ड्राइंग रूम है, यही बेड रूम और किचन भी यही हैं ।—संयासी, पृ० १०३ ।

किचल
संज्ञा पुं० [देश०] कीड़ा । उ०—नरम लकड़ी किचल पकड़ी ।—दक्खिनी०, पृ० ४६७ ।

किचर—पिचर पु
वि० [हिं० गिचपिच] दे० 'गिचपिच' ।

किछु पु †
संज्ञा—वि० [हिं० कुछ] दे० 'कुछ' । उ०—धनि राजा तोर राज बिसेखा । जेहि कि रजाउरि सब किछु देखा ।—जायसी ग्रं०, पृ० ३४५ ।

किछौ पु
क्रि० वि० [हिं० किछु + औ (प्रत्य०)] कुछ भी । उ०— बरनि सिंगार न जानेऊँ नखसिल जैस अभोग । जग तस किछौ न पवौं उपमा देऊँ ओहि जोग ।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० १९९ ।

किटकिट
संज्ञा पुं० [अनु, मु० अथवा सं० किटकिटाय] वादविवाद । किचकिच ।

किटकिटाना
क्रि० अ० [हिं० 'किटकिट' से नामिक धातु] १. क्रोध से दाँत पीसना । २. दाँत के नीचे कंकड़ की तरह कड़ा लगना । जैसे,—दाल बिनी नहीं गई है, किटकिटाती है ।

किटकिना
संज्ञा पुं० [सं० कृतक] १. वह दस्तावेज जिसके द्वारा ठेकेदार अपने ठेके की चीज का ठीका अपनी ओर से दूसरे असामियों को देता है २. सोनारों का ठप्पा जिसपर ठोककर चाँदी सोने के पशों या तारों पर कुछ चित्र या बेलबूटे उभारते हैं । ३ चाल । चालाकी । यौ०—किटकिनेवाजी = चालबाजी ।

किटकिनाबाज
संज्ञा पुं० [हिं० किटकिना + फा० बाज] किफायत से काम करनेवाला । चालाक । अल्पव्ययी ।

किटकिनादार
संज्ञा पुं० [हिं० किटकिना + फा० दार (प्रत्य०)] वह पुरुष जो किसी वस्तु को ठेकेदार से ठेके पर ले ।

किटकिनेदार
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'किटकिनादर' ।

किटकिरा
संज्ञा पुं० [हिं० किटकिना] दे० 'किटकिना' ।

किटि
संज्ञा पुं० [सं०] वाराह । सुअर [को०] ।

किटिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] चमड़े या बाँस का बना कवच ।

किटिभ
संज्ञा पुं० [सं०] १. केशकीट । जूँ । २. खटमल (को०) ।

किटिभकुष्ठ
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का कोढ़ जिसमें चमड़ा सूखे फोड़े के समान काला और कड़ा हो जाता है ।

किटिम
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का कुष्ठ रोग [को०] ।

किट्ट
संज्ञा पुं० [सं०] १. धातु की मैल । २. तेल इत्यादि में नीचे बैठी हुई मैल । ३. जमी हुई मैल ।

किट्टक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'किट्ट' [को०] ।

किट्टाल
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक ताम्रपात्र । २. लोहे का मोरचा [को०] ।

किटि्टम
संज्ञा पुं० [सं०] पानी जो साफ न हो [को०] ।

किड़कना
क्रि० अ० [अनु०] चुपके से चला जाना । खिसकना ।

किणकिण,
संज्ञा पुं० [अनु०] (किंकिणी की) मधुर ध्वनि । उ०— कण कण कर कंकण प्रिय किण् किण् रव किंकिणी ।— गीतिका, पृ० ८ ।

किण
संज्ञा पुं० [सं०] १. घट्ठा । २. खुंरड । ३. मस्सा । ४. लकड़ी का कीड़ा । घुन [को०] ।

किणायक पु
वि० [हिं० किन + एक ?] किसी । उ०—क्यण सगाई वंश, मिल्याँ सचाँ दोषण मिटैं । किणयक समैं कवेस, थपियों सशपण उत्थपै ।—रघु०, रू०, पृ,० १६ ।

किण्व
संज्ञा पुं० [सं०] शराब में खभीर उठाने के लिये व्यवहृत् एक प्रकार का बीज [को०] ।

किण्वी
संज्ञा पुं० [सं० किण्विन्] घोड़ा [को०] ।

कित पु †
क्रि० वि० [सं० कुत्र, प्रा० कुत्थ] १. कहाँ । २. किस ओर । किंधर ।

कितक पु †
क्रि० वि० [सं० कियत्क] कितना । किस कदर ।

कितकु पु †
वि० [सं० कति] कितना । उ०—कितकु होत है कंटक जैसे । चरनमध्य कसकत है कैसे ।—नंद ग्रं०,—पृ० २३३ ।

कितना (१)
वि० [सं० कियत् से हिं०] [स्त्री० कितनी] १. किस परिमाण मात्रा या संख्या का? (प्रश्नवाचक) जैसे,—(क) तुम्हारे पास कितने रुपए है ? (ख) यह घी तौल में कितना है? यौ०—कितना एक (परिमाण या मात्रा) = कितना । किस परिमाण या मात्रा का । जैसे—कितना एक तेल खर्च हुआ होगा? कितने एक = किस संख्या में । जैसे,—कितने एक आदमी तुम्हारे साथ होंगे । २. अधिक । बहुत ज्यादा । जैसे—यह कितना बेहया आदमी है ।

कितना (२)
क्रि० वि० १. किस परिमाण या मात्रा में? कहाँ तक? जैसे—तुम हमारे लिये कितना दौड़ोगे? २. अधिक । बहुत ज्यादा । जैसे—कितना समझाते हैं पर वह नहीं मानता ।

कितनी
वि० [हिं० 'कितना' का स्त्री०] अनेक । उ०—यौ ही कितनियों को इस दामिनी की एक चमक दमक... । प्रेमघन०, भा०२, पृ० १२२ ।

कितनीक पु
वि० [कितनी + एक] कितनी एक । उ०—द्रव्य की तो कितनीक बात है ।—दो सौ बावन०, भा०१, पृ० १५४ ।

कितनोक पु
वि० [हिं० कतना + एक, ब्रज कितनो + एक] उ०— चापासाई सों पूछी जो करज कितनोक भयो है ।—दो सौ बावन, भा०१, पृ० १५३ ।

कितमक पु
संज्ञा पुं० [फा० किसमत] कर्ता । भाग्य । विधि । उ०—पूरब जनम तणइ सराप, कितमक लीब्या सो भोगवी, विण भोग्या नहीं छूट सी पाप ।—बी० रासो, पृ० ३१ ।

कितव
संज्ञा पुं० [सं०] १. जुआरी । २. धूर्त । छली । ३. उन्मत्त । पागल । ४. खल । दुष्ट । ५. धतूरा । ६. गोरोचन ।

कितहुँ
सर्व० [सं० कुत्रापि अथवा हिं० कित + हुँ (प्रत्य०)] कहीं भी । उ०—चल्यौ गयौ तहँ विप्र क्षिप्रगति कितहुँ न अटक्यो ।—नंद०, ग्रं०, पृ० २०४ ।

किता (१)
संज्ञा पुं० [अ० क़िता] १. सिलाई के लिये कपड़े की काट छाँट । ब्योंत । क्रि० प्र०—करना ।—होना । २. काट छाँट । ढंग । चाल । जैसे—(क) चोपी अच्छे किते की है । (ख) यह तो अजीबो किते का आदमी है । ३. संख्या अदद । जैसे—दस किता मकान, चार किता खेत । पाँच किता दस्तावेज । ४. विस्तार का एक भाग । सतह का हिस्सा । ५. प्रदेश । प्रांगण । भूभाग ।

किता (२)
वि० [हिं कितना का संक्षिप्त रूप] दे० 'कितना' । उ०— किता हुआ दिग्ग कवी समुझणहार मशेष—रघु० रू०, पृ० ११ ।

किताब
संज्ञा स्त्री० [वि० किताबी] १. पुस्तक । ग्रंथ । २. रजिस्टर । बहीखाता । ३. कुरान । उ०—ज्ञानी मोर अपरबल ज्ञाना । बेद किताब भरन हम साना—कबीर सा०, पृ० ८०७ । यौ०—किताबखाता = पुस्तकालय । लाइब्रेरी । किताबफोरश = पुस्तकें बेचनेवाला । पुस्तकों का दूकानदार । पुस्तकविक्रेता । किताबवाला = जो लिखी बातों की प्रमाण मानता है । अनुभव को प्रमाण मानेवाला । उ०—किताबवालों को इन्हीं दोंनों में बाँध लिया—कबीर सा०, पृ० ९६४ ।

किताबत
संज्ञा स्त्री० [अ०] लिखापढ़ी । करना । प्रतिलिपि करना (को०) ।

किता बत
वि० [अ० किताब] १. किताब के आकार का । २. किताब संबंधी । यौ०—किताबी इल्म = पुस्तकीय ज्ञान । किताबी कीड़ा = (१) वह कीड़ा जो पुस्तकों को चाट जाता है । (२) वह व्यक्ति जो सदा पुस्तक ही पढ़ता रहता है । किताबी चेहरा=वह चेहरा जिसकी आकृति लंबाई लिए हो । लंबौतरा चेहरा ।

कितिक पु †
वि० [हिं० कितक] दे० 'कितक' 'कितना' । उ०— कितिक बरस द्वारवति बसे ।—नंद०, ग्रं०, पृ० २१९ ।

किते पु
वि० [हिं० किता] कितना । अनिश्चित सख्या । उ०— अबले रे मनुस मानुसन सों देव दैत्य आगे किते ।—हम्मीर रा०, पृ० १०६ ।

कितेक पु
वि० [सं० केयदेक] १. कितना । २. जिसकी संख्या निश्चित न हो । असंख्य । बहुत । उ०—किरवान वज्र सों विपक्ष करिबे को डर आनि के कितेक आए सरन की गैल हैं ।—भूषण ग्रं०, पृ० ४६ ।

कितेब पु
संज्ञा स्त्री० [अं० किताब] किताब । कुरान शरीफ । उ०—बेद कितेब ते भेद न्यारा रहा, वहाँ तो आप हैं एक सोई—कबीर रे०, पृ०, १२ ।

कितेबा पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० कितेब] दे० 'किताब' । उ०— ना खुदा कुरान कितेबाँ न खुदा नमाजे ।—संतवाणी०, भा०१, पृ० १५२ ।

कितेवा पु
संज्ञा पुं० [अ० किताब] किताब या कुरान । उ०— कितेवा पढंता तरुक्का अनंता ।—कीर्ति०, पृ० ४० ।

कितै पु †
क्रि० वि० [सं० कुत्र, प्रा० कुत्थ] कहाँ । किस जगह । उ०—किसी शंभु को दै राजपुत्री कितै ।—केशव (शब्द०) ।

कितो (१
पु † वि० [सं० कियत्] [स्त्री० किती] कितना । उ०— किती न गो कुल कुलबधू, काहि न केहि सिख दीन?—बिहांरी (शब्द०) ।

कितो (२) पु †
क्रि० वि० 'कितना' ।

किंतौ पु
वि० [हिं० कितना] दे० 'कितना' । उ०—एक अंड कौ भार सु कितै । परबतु सेस धरे सिर तितो ।—नंद० ग्रं०, पृ० २८२ ।

कितोऊ
वि० [हिं० कितौ + उर (प्रत्य०)] कितना हो । उ०—कहै श्री हरिदास पिंजरा के जिनावर सों, तरफटाइ रह्यो उड़िवे को कितौउ करि ।—पोद्दार अधि०, ग्रं०, पृ० ३९० ।

कित्त पु
क्रि० वि० [हिं० कित] दे० 'कित' । उ०—मुहमद चारिउ मीत मिल, भए जो एकै चित्त । एहि जग साथ जो निबहा, ओहि जग बिछुरन कित्त ।—जायसी ग्रं०, पृ० ९ ।

कित्ता †
वि० [हिं० कितना का संक्षिप्त रूप] दे० 'कितना' ।

कित्ति पु
संज्ञा स्त्री० दे० [सं० कीर्ति] 'कीर्ति' । उ०—कित्ति लद्ध सूर संगाम, धम्म पराअण हिअअ, विपअ काम नह दीन जंपइ ।—कीर्ति०, पृ० ध । (ख) सत्ता को सपूत भावसिंह भूमिपाल जाकी कित्ति जौन्ह कात जगत चित्त चाव है ।—मति० ग्रं०, पृ० ३६९ । यौ०—कित्तिपाल पु = यश क रक्षा करनेवाला । कित्तिवल्लिं पु = कीर्तिवल्ली । किर्ति रूपी लता ।—तिहुअन खेत्तहि काञि तस, कित्तिवल्ली पसरेइ ।—कीर्ति०, पृ० ४ ।

कित्तिम पु
वि० [सं० कृत्रिम, प्रा कित्तिम] कृत्रिम । उ०—काजरे चांद कलङ्क । लज्ज कित्तिम कपट तारुन्न ।—कीर्ति०, पृ० ३४ ।

कित्तौ पु
वि० [हिं० कितो] दे० 'कितना' । उ०—कितौ गढ़ रण- थँभ राव जिस पँह गर्वाए ।—हम्मी रा०, पृ० ५६ ।

किंतौक पु
वि० [हिं० कित्तौ + क] दे० 'कितेक, कितक' । उ०— सुमुंद कितौ गरुअत्त अप्प भुज जोर हिलोरिय । कित्तौक सबल मेरु गिरि कमठ होइ पिट्ठङ वेलिय ।—पृ— पृ० रा०, १ ।७८० ।

कित्थाँ
वि० [हिं०] कहाँ । किस स्थान परा । उ०—इत्या उत्थां जित्था कित्थां, हूँ जीवा तो नाल वे । मीयां भैड़ा आव असाड़े, तू लालौ सिर लालवे ।—दादू०, पृ० ५१३ ।

क्रित्य पु
संज्ञा स्त्री० [सं० कीर्ति या कृत्य] कीर्ति । यश । उ०—षट्टी सहस अरि पवँग कवी चंदह कह कित्यौ ।—पृ० श०, ४ ।१८ ।

किथौं
क्रि० वि० [हिं० तुल० पं० कित्ये] १. कैसे । क्यों । किसी प्रकार । २. कहीं । उ०—है अनि बारीकु षोजु नहि दरसै नदरि किथौं ।—सुदंर०, ग्रं० भा०१, पृ० २७६ ।

किदारा
संज्ञा पुं० [हिं० केदारा] दे० 'केदारा' ।

किधन पु
क्रि० वि० [देश०, तुल० हिं० किधर] तरफे । उ०—हलू लाजती आई मैना किंधन, कही यूँ जो ऐ तू है शीरी जबाँ ।—दक्खिनी०, पृ० ८४ ।

किधर
क्रि० वि० [हिं०] किस ओर । किस तरफ । जैसे,—तुम आज किधर गए थे । मुहा०—किधर आया किधर गया = किसी के आने आने की कुछ भी खबर नहीं । जैसे—हम तो चारपाई पर बेसुध पड़े थे, जानते ही नहीं कौन किधर आया गया । किधर का चाँद निकला? = यह कैसी अनहोना बात हुई? यह कैसी बात हुई जिसकी कोई आशा न थी । विशेष—जब किसी से कोई ऐसी बात बन पड़ती है जिसकी उससे आशा, नहीं थी, या कोई मित्र अचानक लिये जाता है, तब इस वाक्य का प्रयोग होता है । किधर जाऊँ, क्या करुँ = कौन सा उपाय करूँ? कोई उपाय नहीं सुझता ।

कीधौ पु
अव्य० [हिं०] अथवा । वा । या तो । न जाने । उ०— अब है यह पर्ण कुटी किधौ ओर यह लक्ष्मण होय नहीं?—केशव (शब्द०) ।

किन (१)
सर्व० [हिं०] किस; का बहुवचन । उ०—अक्रूर कहावत क्रूरमति बात करत बनि साधु अति । किन नाम कीन्ह तुव दान पति है नितही नादान पति ।—गोपाल (शब्द०) ।

किन पु (२)
क्रि० वि० [सं० किम + न] क्यों न । उ०—(क) बिनु हरि भक्ति मुक्ति नहिं होई । कोहि उपाय करो किन कोई ।— सूर (शब्द०) । (ख) बिगरी बात बैन नहीं लाख करो किन कोय । रहिमन बिगरे दूध को मथे माखन होय ।—रहीम (शब्द०) ।

किन (३) पु
संज्ञा पुं० [सं० किण] किसी वस्तु के लगने चुभने वा रगड़ पहुँचने का चिह्न । दाग । घट्ठाल । उ०—ध्वजकुसि अंकुश कंजयुत बन फिरत कंटक किन लहे ।—तुलसी (शब्द०) ।

किनका
संज्ञा पुं० [सं० कणिका] [स्त्री० अल्पा० किनकी] १. छोटा दाना । अन्न का टूटा हुआ दाना । २. चावल आदि के दाने का महीन टुकड़ा जो कुटने से अलग हो जाता है । खुद्दी । उ०—जो कोई होइ सत्य का किनका सोहम को पति माई ।— कबीर श०, भा० ३ पृ० २ ।

किननाट पु
संज्ञा पुं० [अनु०] किन्नाट । आवाज । उ०—वपु नंषत षुपरिय किनन किन नाट कुरंगिय । गगन गगन तौय रंग छलन छिक्किय उछरंगिय ।—पृ० रा०, १० ।२८३ ।

किनमिन
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. धीमा अव्यक्त शब्द । अनुध्वनि । २. आनाकानी । ननुनच । उ०—दीवारों से लगे खड़े होंगे चुप छान और छप्पर । झरती होती खामोशी से औलाती भी किनमिन कर ।—मिट्टी०, पृ० ६४ । क्रि० प्र०—करना ।

किनर पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० किंगरी] दे० 'किंगरी' । उ०—मुरली बेनु किनर एह बाजे गोपिन्ह रंग मनाया ।—सं० दरिया, पृ० १०३ ।

किनर मिनर
संज्ञा स्त्री० [देश०] बहाना । आना कानी ।

किनरिया †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'किनारी' उ०—ऊँची अचटिया जरद किनरिया, लगी नाम की डोरी ।—कबीर श०, पृ० ५५ ।

किनवानी †
संज्ञा स्त्री० [देश०] छोटी छोटी बुँदों की वर्षा । फुहार । झड़ी ।

किनहा †
वि० [सं० किर्ण ( = घुन या कीड़ा), हिं० किन (प्रत्य०)] (फल) जिसमें कीड़े पड़े हों ।

किनाँ पु
अव्य० [देश०] या । अथवा । उ०—कहि सूवा किम आवियउ, किहिमक कारण कथ्थ । तू मालवणी मेल्हियउ किनाँ अम्हीणइ सथ्थ । ढोला—दू० ४०१ ।

किना पु
संज्ञा पुं० [सं० कण, हिं० कन] दे० 'कन, कण' । उ०— यह मन चचल चोर अन्याई भक्ति न आवत एक किना ।— गुलाल० पृ० १२९ ।

किनाअत पु
संज्ञा पुं० [अ० कनाअत] संतोष । उ०—काफ किनाअत सुख घना आनंद अशाधा ।—चरण० बानी०, पृ० ११२ ।

किनात पु
संज्ञा पुं० [अ० कनाअत] संतोष । वासना का त्याग । उ०— फाका जिकर किनात दे तीनों बात जगीर ।—पलटू० पृ० १४ ।

किनाती
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक चिड़िया । विशेष—यह तालों के किनारे रहती है और इसकी चोंच हरी तथा सिर और कंठ सफेद होता है । यह मई और सितंबर के बीच अंडा देती है ।

किनार पु †
संज्ञा पुं० [हिं० किनारा] दे० 'किनारा' ।

किनारदार
वि० [फा० किनारा + दार (प्रत्य०)] (कपड़ा) जिसमें किनारा बना हो । जैसे—किनारदार धोती ।

किनारपेंच
संज्ञा पुं० [हिं० किनारा + पेंच] डोरियाँ जो दरी के ताने के दोनों ओर लगी रहती हैं । विशेष—ये डोरियाँ दरी के ताने बाने से कुछ अधिक मोटी होती है और ताने के रक्षार्थ लगाई जाती हैं ।

किनारा
संज्ञा पुं० [फा० किनारह] किसी अधिक लंबाई और कम चौड़ाईवाली वस्तु के वे दोनों भाग या प्रांत जहाँ से चौड़ाई समाप्त होती हो । लंबाई के बल की कोर । जैसे,—(क) थान या कपड़े का किनारा । (ख) थान किनारे पर कटा है । २. नदी या जलाशय का तट । तीर । मुहा०—किनारा दिखाना = छोर या सिरा दिखाना । उ०—बह रहे हैं बिपत लहर में हम अब दया का दिखा किनारा दें ।— चुपतं०, पृ० ४ । ३. समान या कम असमान लंबाई चौड़ाईवाली वस्तुके चारों ओर का वह भाग जहाँ से उसके विस्तार का अंतहोता हो । प्रांत । भाग । जैसे—खेत का किनारा चौकी का किनारा । ४. [स्त्री० किनारी] कपड़े आदि में किनारे पर का वह भाग जो भिन्न रंग या बुनावट का होता है । हाथिया । गोटा । बार्डर ।—किनारादार या किनारेदार । ५. किसी ऐसी वस्तु का सिरा या छोर जिसमें चौ़ड़ाई न हो । जैसे, तागे का किनारा । पार्श्व । बगल । मुहा०—किनारा करना = अलग होना । दूर होना । परित्याग करना । छोड़ देना । उ०—जिनके हित परलोक बिगारा ते सब जिअतै किहिन किनारा ।—विश्राम (शब्द०) । किनारा काटना = (१) अलग करना । (२) अलग होना । किनारा खींचना = किनारे होना । अलग होना । दूर होना । हटना ।

किनारी
संज्ञा स्त्री० [फा० किनारा] सुनहला या रु हला पतला गोटा जो कपड़ों के किनारे पर लगाया जाता है ।

किनारीवारो पु
वि० स्त्री० [हिं० किनारी + बारी] जिसमें किनारो लगी हो (साड़ी) । उ०—कुंदन के आँग माँग मोतिंन सँवारी सारी सोहत किनारीवारी केसरि के रंग की ।—मति० ग्रं०, पृ० ४१९ ।

किनारे
क्रि० वि० [हिं० किनारा] १. किनारे पर । तट पर । २. अलग । दूर । मुहा०—किनारे करना = दूर करना । अलग करना । हटाना । किनारे न जाना = दूर रहना । अलग रहना । बचना । जैसे— हम ऐसे काम के किनारे नहीं जाते । किनारे कर लेना = अलग कर लेना । उ०—यदि अपने भावों को समेटकर मनुष्य अपने हृदय को शेष सृष्टि के किनारे कर ले या या स्वार्थ की पशुवृत्ति में ही लिप्ति रखे तो उसकी मनुष्यता कहाँ रहेगी ।—रस०, पृ० ८ । किनारे किनारे जाना = (१) तीर तीर होकर जाना ।(२) अलग होकर जाना । किनारे न लगना = पाम न फटकना । निकट न जाना । दूर रहना । जैसे—कभी बीमार पड़ोगे तो कोई किनारे न लगेगा । कनारे बैठना = अलग होना । छोड़कर दूर हटना । जैसे—हम अपना काम कर लेंगे तुम किनारे बैठी । किनारे रहना = दूर रहना । बचना । जैसे—तुम ऐसी बातों से किनारे रहते हैं । किनारे लगना = (१) (नाव को) किनारे पर पहुँचाना (२) (किसी कार्य का) समाप्ति पर पहुँचाना । समाप्त होना । किनारे लगाना = (१) (नाव को) किनारे पर पहुँचना या भिड़ाना । (२) किसी कार्य को) समाप्ति पर पहुँचाना । पूरा करना । निर्वाह करना । जैसे— जब इस काम को हाथ में ले लिया है, तब किनारे लगाओ । किनारे होना = अलग होना । दूर हटना । संबंध छोड़ना । छुट्टी पाना । मतलब न रखना । जैसे—तुम तो ले देकर किनारे हो गए हमारा चाहे जो हों । विशेष—इस शब्द का प्रयोग विभक्ति का लोप करके प्रायः किया जाता है । जैसे—(क) नदी के किनारे चलो । (ख) वह किनारे किनारे जा रहा है । यौ०—किनारी बाफ = किनारी या गोटा बन नेवाला ।

किनिं (१) पु
सर्व० [हिं० किन] सं० 'किन' । उ०—जितहिं धरयौ ही तितहिं न पायो । जसुमति जिय धौं किनि बिरमायौं ।—नंद० ग्रं०, पृ० २४२ ।

किंनी (२) पु
क्रि० वि० दे० 'किन' उ०—तुम । सब रहो री हौं ही उत्तर दैहों चले किनि जाउ ढोटा वाइ बाबरी गाँऊ—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० १९० ।

किन्नर (१)
संज्ञा पुं० [सं० किन्नर किन्नर] [स्त्री० किन्नरी] एक प्रकार के देवता । विशेष—इनका मुख धोड़े के समान होता है और ये संगीत में अत्यंत कुशल होते हैं । ये लोग पुलस्त्य ऋषि के वशंज माने जाते हैं । पर्या०—तुरंगमुख ।—किंपुरुष—गीतमोदी ।

किंन्नर (२)
संज्ञा पुं० [देश०] तकरार । विवाद । दलील ।

किन्नर (३) †पु
संज्ञा पुं० [सं० कन्दर] गुफा । खोह । कंदर । उ०— कपि कुल विपन रीछ गिर किन्नर, सुर गुर सरग समावै— रघु० रू०, पृ० १९१ ।

किन्नरि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० किन्नरी] एक बाजा । उ०—गोमुख, किन्नर, झाँझ, बीच बिच मधुर उपंगा ।—नंद०, ग्रं०, पृ० ३८२ ।

किन्नरी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. किन्नर की स्त्री । २. किन्नर जाति की स्त्री ।

किन्नरी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० किन्नरी = वीणा] १. एक प्रकार का तँबूरा २. किंगरी । सारंगी ।

किन्ना पु
संज्ञा स्त्री० [सं० कन्या] कन्या । पुत्री (डिं०) ।—उ०—किन्ना ब्याहे कोडलो, जू किन्यावल लेबै ।—रघु०, रू०, पृ० २८२ ।

किप्पाट पु
संज्ञा पुं० [सं० कपाट] कपाट । दरवाजा । उ०—काम धाम रिम राह स्याम जिम धाम पित्थपत्ति । पत्त लत्त दिय रोस फटि्ट किप्पाट थाट भजि ।—पृ० रा०, ५ । २८ ।

किफायत
संज्ञा स्त्री० [अ० किफायत] १. काफी या अलम् होने का भाव । २. कमखर्ची । थोड़े में काम चलाने की क्रीया । जैसे— खर्च में किफायत करो । ३. बचत । जैसे—ऐसा करने से ५०) की किफायत होगी । ४. कम दाम । थोड़ा मूल्य । जैसे—अगर किफायत में मिले तो हम यहीं कपड़ा ले लें । यौ०—किफायत का=थोड़े दाम का । सस्ता ।

किफायती
वि० [अ० किफायत] कम खर्च करनेवाला । सभाँलकर खर्च करनेवाला ।

किबर पु
संज्ञा पुं० [अ० किब्र = बड़ाई, श्रेष्ठता] १. बड़प्पन । उच्चता । २. गर्व । उ०—न माने प्यास हौर भूख नाले के सुख दुःख । किबर हौर कीना जर पाक इसते सीना ।—दक्खिनी०, पृ० ५२ ।

किबरिया
संज्ञा पुं० [अ० किब्रियह्] १. बड़प्पन । महत्व । २. ईश्वर । परमात्मा । उ०—इस आदत से नफश कुशी से हुए आरी, बेबंदगी दीदार न हो किबरिया बारी ।—कबीर मं०, पृ० २६३ ।

किबलई
संज्ञा स्त्री० [अ० किबलई] पश्चिम दिशा ।—(लश०) ।

किबलनुमा पु
संज्ञा पुं० [अ० किबलह् + फा० नुमा] दे० 'किबला- नुमा' । उ०—सब ही तन समुहाति छन, चलति सबन दै पीटि । वाही तन ठहराति यह किबलनुमा लौं दीठि ।— बिहारी (शब्द०) ।

किबला
संज्ञा पुं० [अ० किबलह्] १. जिस ओर मुख करके मुसलमान लोग नमाज पढ़ते या प्रार्थना करते हैं । पश्चिम दिशा । मक्का । उ०—मन करि मक्का किबला करि देही । बोलन हार परस गुरु एही ।—कबीर ग्रं०, पृ०—३१५ । यौ०—किबातानुमा । ३. पूज्य व्यक्ति । ४. पिता । बाप । यौ०—किबानाआलभ ।

किबलाआलम
संज्ञा पुं० [अ० किबलाआलम] १. सारा संसार जिसकी प्रार्थना करे । ईश्वर । २. बादशाह । सम्राट् । राजा ।

किबलागाह, किबलागाही
संज्ञा पुं० [अ०] पिता । बाप ।

किबलानुमा
संज्ञा पुं० [अ० किबलह् + फा० नुमा] पश्चिम दिशा को बातानेवाला एक यंत्र जिसका व्यवहार जहाजों पर मल्लाह करते थे । विशेष—इसमें एक सुई ऐसी लगा देते थे जो पश्चिम ही की ओर रहती थी । आजकल के ध्रुवदर्शक यंत्रों में पश्चिम को विशेष रूप से निर्दिष्ट नहीं करते ।

किबाड़ि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० कपाट या कपाटी, कपाटिका प्रा० कवाड] दे० 'किवाड़' । उ०—सा धन ऊभी टेकि किवाड़ी । रतन कुंडल सिर तिलक लीलाड़ ।—बी० रासो, पृ० ५४ ।

किबाड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० किवाड़ का स्त्री०] किवाड़ । किवाड़ या पल्ला । उ०—काँच की किबाड़ियों से..... ।—प्रेमघन०, भा०२, पृ० १११ ।

किबार
संज्ञा पुं० [सं० कपाट, प्रा० कवाल] दे० 'किवाड़' । उ०— फूलन के महल बने फूलन विताप तने, फलन छज्जे, झरोखा, फूलन किबार हैं । नंद०, ग्रं०, पृ० ३८० ।

किबलिनुमा
संज्ञा पुं० [अ० किबलह् + फा० नुमा] दे० 'किबलनुमा' उ०—उनके नेत्र किबिंलनुमा की भाँति मेरे ही ऊपर छा गए ।—श्यामा०, पृ० १२३ ।

किबो पु
क्रि० स० [हिं०] करना । रचना । उ०—तन किबो सिस्टी का करता, देषत जगत भुलाना ।—रामनंद०, पृ० ३५ ।

किब्र
संज्ञा पुं० [अ०] १. महत्व । २. बड़प्पन । उ०—सो कबीर उसे कहते हैं जिसमें किब्र (गौरव) हौवै—कबीर मं०, पृ० ४२० । २. अभिमान । गर्व । उ०—होर इबादत में काहिल बख्शाता है होर किब्र व कीना, बुग्ज व हिर्स, हवा व बखीली व तुंबी व शाहबत यो तमाम फेल नफश अंम्मारा के हैं ।—दक्खिनी०, पृ० ३९६ ।

किब्रिया
संज्ञा स्त्री० [अ० किब्रियह्] १. महत्ता । बड़प्पन । उ०— तू है करतार किब्रिया बारी, तेरा है हुक्म सब जगह जारी ।— कबीर सा०, पृ० ९७९ । २. ईश्वर । परमात्मा ।

किब्ल पु
क्रि० वि० [अ० कब्ल] पहले । पूर्व ।उ०—मगर कम से कम अब के पीछे किसी नुकसान पर इतना रंज न होगा । जितना चंद साल किब्ल हो सकता था ।—प्रेम० गो०, पृ० ६४ ।

किब्ल ए हाजात
संज्ञा पुं० [अ० किब्ला—ए—हाजात] इच्छा पूर्ण करनेवाला । जरूरतों को पूरा करनेवाला व्यक्ति । उ०—दर उसका यकीं किब्लए हाजात है । रवाँ कफिला रोज और रात है ।—दक्खिनी०, पृ० २१३ ।

किम्
वि०, सर्व [सं०] १. क्या? २. कौन सा? यौ०—किमपि = कोई भी । कुछ भी । उ०—(क) ताते गुप्त रहौं जग माहीं । हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं ।—तुलसी (शब्द०) (ख) अति हरख मन, तन पुलक, लोचन सजल कह पुनि रमा । का देहुँ तोहि त्रिलोक मँह, कपि, किमपि नहि बाणी समा ।—तुलसी (शब्द०) ।

किमखाब
संज्ञा पुं० [फा० कमख्वाब] एक कपड़ा । उ०—सो अमर दिया तेरे अमल कूँ । किमखाब दिया जबून कमल कूँ ।— दक्खिनी०, पृ० १७१ ।

किमरिक
संज्ञा पुं० [अँ० कैंब्रिक] एक चिकना सफेद कपड़ा जो नैनसुख की तरह होता है । विशेष—यह पहले सन के सूत का ही बनता था और बड़ा ही मजबूत होता था । अब कपास के सूत का भी बनने लगा है ।

किमाछ †
संज्ञा पुं० [सं० कपिकच्छु, हिं० केवाँच] दे० 'केवाँच' ।

किमाम
संज्ञा पुं० [अ० किवाम] शहद के समान गाढ़ा किया हुआ शरबत । खमीर । जैसे—सुरती का किमाम ।

किमार
संज्ञा पुं० [अ० किमार] जुआ का खेल । द्यूतक्रीड़ा ।

किमारखाना
संज्ञा पुं० [अ० किमार + फा० खानह्] वह घर जहाँ लोग जुआ खेलते हैं । जुआघर ।

किमारबाज
वि० [अ० किमार+ फा० बाज] जुआरी ।

किमारबाजी
संज्ञा स्त्री० [अ० किमार + फा० बाजी] जुए का खेल ।

किमाश
संज्ञा पुं० [अ० किमाश] १. तर्ज । ढंग । वजा । जैसे,— वह न जाने किस किमाश का आदमी है । २. गंजीफे का एक रंग, जिसे ताज भी कहते हैं ।

किमि
क्रि० वि० [सं० किम्] कैसे ? किस प्रकार ? किस तरह? उ०—किमि सहि जाति अकख तोहि पाहीं । प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं ।—तुलसी (शब्द०) ।

किमियाकार पु
संज्ञा पुं० [हिं० कोमियागर अथवा हिं० कीमिया + सं० कार (प्रत्य०)] दे० 'किमियागर' । उ०—बेद बिपिन बूटी बचन हरिजन किमियाकार । खरी जरी तिनके कने खोटी गहत गँवार ।—विश्राम (शब्द०) ।

किम्मत (१)पु †
संज्ञा स्त्री० [अ० हिकमत] १. चतुराई । होशियारी । उ०—हारिए न हिम्मत सुकीजै कोटि किम्मत को आपति में पति राखि धीरज को धरिए—(शब्द०) । २. वीरता । बहादुरी ।

किम्मत (२)पु †
संज्ञा स्त्री० [अ० कीमत] कीमत । मूल्य । —जिसके थे परदे चिक, किम्मत जर भारी के ।—नट०, पृ० ११२ ।

कियंकर पु
संज्ञा पुं० [सं० किङ्कर] किंकर । सेवक । उ०—त्रय ताप सँताय दुखाय दुखंकर पाप कियंकर तार लगा ।—राम० धर्म०, पृ० ३०२ ।

कियत
वि० [सं० कियत्] कितना । उ०—राम से प्रीतम की प्रीति रहित जीउ जाय जियत । जेहि सुख सुख मानि लेत सुख सो समुझ कियत ।—तुलसी (शब्द०) ।

किवारथ पु
वि० [सं० कृतार्थ] कृतार्थ । उ०—श्री हरि नाम सँभारि, काम अभिराम कियारथ । अरथ धरम अपवण, दियण जगच्यार पदारथ ।—रा०, रू०, पृ० ३ ।

कियारी
संज्ञा स्त्री० [सं० केदार] १. खेतों या बगीचों में थोड़े थोड़े अंतर पर दो पतले मेड़ों के बीच की भूमि, जिसमें बीज बोए या पौधे लगाए जाते हैं । क्यारी । २. खेत का एक विभाग । ३. खेतों के वे विभाग जो सिंचाई के लिये बरहों या नालियों के बीच की भूमि में फावड़े से पतले मेंड़ डालकर बनाए जाते हैं । ४. एक बड़ा कड़ाह, जिसमें समुद्र की खारा पानी नमक नीचे बैध्ने के लिये भरते हैं । ५. (सुनारों की बोली में) चारपाई ।

कियावर (१)पु
वि० [सं० क्रियापर, प्रा० कियावर] कर्मकुशल । कर्मपरायण ।

कियावर (२)पु
संज्ञा पुं० [सं० कियावली] कर्म । कृत्यसमूह । उ०— सार कियावर डैर सकोई । क्रत सम विक्रम भोजन कोई ।— रा०, रू०, पृ० १५ ।

कियाह
संज्ञा पुं० [सं०] लाल रंग का घोड़ा ।

किरंटा
संज्ञा पुं० [अ० क्रिश्चियन] छोटे दरजे का क्रिस्तान । केरानी । (एक तुच्छाव्यंजक शब्द) ।

किर (१)पु
अव्य० [सं० किल] मानों । उ०—ऊँचा डूगर विखम थलु, लागा किर तारेहि ।—ढोला०, दू० ६४८ ।

किर (२)
संज्ञा पुं० [सं०] सुअर । वाराह [को०] ।

किरकाँट
संज्ञा पुं० [सं० कृकलास] गिरगिट । छिपकली की जाति का एक जंतु । उ०—कबहुक भरिया समुँद सा, कबहुक नाहीं छांट । जल छरिया इतउत रता, ते कहिए किर काँट ।—संत वाणी०, १ ।१ ।३२ ।

किरका †
संज्ञा पुं० [सं० कर्कट = कंकड़ी] छोटा टुकड़ा । कंकड़ । किरकिरी । उ०—गर्व करत गोबर्धन गिरि की । पर्वत माँह आई वह किरको ।—सूर (शब्द०) ।

किरकिटी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० कर्कट] धूल या तिनके आदि का कण जो आँख में पड़कर पीड़ा उत्पन्न करता है । उ०—मैं हो जान्यौ लोयननि, जुरत दाढ़ि है जोति । को हो जानत दीठि, को दीठि किरकीटी होति ।—बिहारी (शब्द०) ।

किरकिन
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का दानेदार चमड़ा जो घोड़ा या गधे का होता है । एक प्रकार का कीमुख्त ।

किरकिरा (१)
वि० [सं० कर्कट] कंकरीला । कंकड़दार । जिसमें महीन और कड़े रवे हों । मुहा०—किरकिरा हो जाना = रंग में भंग हो जाना । आनंद में विघ्न पड़ना । बात बिगड़ जाना ।

किरकिरा (२)पु
संज्ञा पुं० [सं० कृकल] शरीर में स्थित पाँच वायुओं में से एक, जो पाचन क्रिया में सहायिका होती है । उ०—व्यान वायु अरु किरकिरा कूरम बाई जीत । नाग धनंजय देवदत्त दशबाई रणजीत ।—कबीर सा०, पृ० २८० ।

किरकिरा (३)
संज्ञा पुं० [सं० कर्कट] लोहारों का एक औजार जिससे बड़ो और मोटे लोहे में छेद किया जाता है ।

किरकिराना
क्रि० अ० [हिं० किरकिरा से नामिक धातु] १. किरकिरी पड़ने की सी पीड़ा करना । जैसे—आज आँख किरकिराती है । २. दे० 'किटकिटाना' ।

किरकिराहट
संज्ञा स्त्री० [हिं० किरकिरा + हट (प्रत्य०)] १. किरकिराने की सी पीड़ा । आँख में किरकिरी पड़ जाने की सी पीड़ा । २. दाँत के नीचे कँकरीली वस्तु के पड़ने का शब्द । ३. किटकिटापन । कंकरीलापन । जैसे,—कत्थे को और छानों, अभी इसमें किरकिराहट हैं ।

किरकिरी
संज्ञा स्त्री० [सं० र्ककर] १. धूल या तिनेक आदि का कण जो आँख में पड़कर पीड़ा उत्पन्न करता है । जैसे,—आँख में किरकिरी पड़ गई है । २. अपमान । हेठी । जैसे,—आज तो उनकी बड़ी किरकिरी हुई । उ०—अगर अल्लारखी का जिक्र छेड़ा और वह बिगड़ गए तो बड़ी किरकिरी होगी ।— फिसाना०, भा०३, पृ० १६ ।

किरकिल (१)
संज्ञा पुं० [सं० कृकलास] गिरदान । गिरगिट ।

किरकिल (२)पु
संज्ञा स्त्री० [सं० कृकर या कृकल] शरीरस्थ दस वायुओं में से वह वायु जिससे छींक आती है । उ०—किरकिल छींक लगावे भाई ।—विश्राम (शब्द०) ।

किरकिला (१)
संज्ञा पुं० [सं० कृकर] एक पक्षी जो आकाश से मछलियों पर टूटता है । दे० 'किलकिला' ।

किरकिला (२)
संज्ञा पुं० [सं० कृकलास] १. कृकलास । गिरगिट । २. शरीस्थ वायुविशेष । उ०—कुरम सेस किरकिला धनंजय देवदत्त कहँ देखो ।—कबीर श०, भा०२, पृ० ६६ ।

किरकी (१) †
संज्ञा स्त्री० [सं० किङ्कणी] एक प्रकार का गहना ।

किरकी (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. किनकी । जरा सा कण । २. तिनका । तिनके का टुकड़ा । उ०—करनी की कीरकी नहीं कथनी कथै अपार । या बानाँ क्यों पाईए साहिब को दीदार ।—राम० धर्म०, पृ० २७९ ।

किरच
संज्ञा स्त्री० [प्रा० किलिच] १. एक प्रकार की सीधी तलवार जो नोक के बल सीधी भोंकी जाती है । २. नुकीला टुकड़ा (जैसे काँच आदि का) । नुकीला रवा । छोटा नुकीला टुकड़ा उ०—(क) काँच किरच बदले शठ लेहीं । कर ते डारि परस मणि देहीं ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) लग्गे सु टोप उड्डिय किरच ।—पृ० रा०, ७ ।१५७ ।

किरचा
संज्ञा स्त्री० [हिं० किरच] दे० 'किरच' । उ०—गिरिधर- धीरता के किरिचा करत हैं ।—घनानद, पृ० २१० ।

किरचिया
संज्ञा पुं० [देश०] एक पक्षी । विशेष—यह बगले से छोटा होता है । इसके पंजे की झिल्ली सुनहले रंग की होती है ।

किरची
संज्ञा पुं० [देश०] १. एक प्रकार का मुलायम रेशम, जो बंगाल में होता है । २. रेशम का लच्छा ।

किरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. ज्योति की अति सूक्ष्म रेखाएँ जो प्रवाह के रूप में सूर्य, चंद्र, दीपक आदि प्रज्जवलित पदार्थों से निकलकर फैलती हुई दिखाई पड़ती है । रोशनी की लकीर । प्रकाश की रेखा या धारा । २. अनेक प्रकार की दृश्य अदृश्य तरंगों की धाराएँ जो अंतरिक्ष से आती या यंत्रों की सहायता से उत्पन्न की जाती है; जैसे एक्स रे, अल्फा रे, अल्ट्रावायलेट रे, आदि । पर्या०—अंशुकर । दीधित । मयूख । मरीचि । रश्मि । यौ०—किरणपति । किरणमाली । २. सूर्य (को०) । धूलिकण । रजःकण (को०) ।

किरणकेतु
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य ।

किरणपति
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य । रश्मिमाली ।

किरणमाली
संज्ञा पुं० [सं० किरणमालिन्] सूर्य ।

किरणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्राचीन नदी का नाम जिसका उल्लेख स्कंद पुराण के काशी खंड में हुआ है [को०] ।

किरतंत पु
संज्ञा पुं० [सं० कृतान्त] कृतान्त । यमराज । उ०—सत्त मंत को दिष्षयत, रज मय के दीसतं । तामश के पिष्षे प्रवल, क्रोध कलहु कितंत ।—पृ० रा० ६ । ५२ ।

किरतम पु
वि० [सं० कृत्रिम] बनावटी । दिखाऊँ । उ०—ताका मरम भक्त नहिं जाना । किरतम वर्ता से मन माना ।—कबीर सा०, ४८२ ।

किरतब पु
संज्ञा पुं० [सं० कर्तव्य] काम । कर्म । कृतित्व । उ०—बाँस बड़ा डेरा बज बिना बडेरा होय । सेषावत सिवसिंघ सो, किरतब बड़ो न होय ।—शिखर०, पृ० ५२ ।

किरतास
संज्ञा पुं० [करतास] कागज । उ०—कलम यक हात और यक हात किरतास बैठा हैरत जदा.....परदे के है पास ।—दक्खिनी०, पृ० २५० ।

किरतिम पु
वि० [सं० कृत्रिम] कृत्रिम । माया ।—नामै चाँद सूर दिन राती । नामै किरतिम की उतपाती ।—भीखा श०, पृ० २३ ।

किरती
संज्ञा स्त्री० [सं० किर्ति] व्यास की माता का नाम । सत्यवती । उ०—किरती सुख ब्यास बखानिए जी ।—कबीर रे०, पृ० ४४ ।

किरन
संज्ञा पुं० [सं० किरण] १. किरण । रोशनी की लकीर । मुहा०—किरन फूटना = सूर्योदय होना । २. कलाबत्तू या बादले की बनी हुई एक प्रकार की झालर जो बच्चों या स्त्रियों के कपड़ों में लगाई जाती है ।

किरनकेतु पु
संज्ञा पुं० [सं० किरणकेतु] सूर्य । उ०—जयति जय सत्रु कटि केसरी सत्रुहन सत्रु तम तुहिन हर किरनकेतू ।—तुलसी (शब्द०) ।

किरना (१)
क्रि० अ० [सं० √ कृ = किर्] बिखरना । इधर उधर होना । विमुख होना । उ०—अब तो ऐसियै जिय आई प्रीतम के पन ते क्यों किरीहौ ।—घनानंद, पृ० ४७४ ।

किरना (२)
क्रि० स० बिखेरना । फैलाना । इधर उधर करना ।

किरनाकर
संज्ञा पुं० [सं० किरण + आकर] किरणमाली । सूर्य । उ०—मकर आदि सक्रमन किरन बाढ़ै किरनाकर । यौं सोमेस कँआर जोति छिन छिन अति आगर ।—पु०, रा०, ५ ।२ ।

किरनि पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० किरण] दे० 'किरण' । उ०—कुसुम धूरि धूँधरि मधि चाँदनि, चँद किरनि रही छाइ ।—नंद, ग्रं०, पृ० ३९३ ।

किरनीला
वि० [हिं० किरन + ईला (प्रत्य०)] किरणवाला । प्रकाशमान । उ०—चमकीले किरनीले शास्त्रों काट रहे तुम श्यामल तिलमिल ऊषा का मरघट साजोगे? यही लिख सकें चार पहर में? चलों छिया छी हों हो अंतर में ।—हिम कि० पृ० १२ ।

किरनीलापन
संज्ञा पुं० [हिं० किरनीला+ पन (प्रत्य०)] उज्वलता । प्रकाशित होने का भाव । उ०—अंधकार है तो 'किर- नीलेपन' को अगवानी संभव है, अँधकार है तो कीमत का तेरे उज्वल विमल विभव है ।—हिम कि० पृ० १३१ ।

किरपन पु
वि० [संज्ञा कृपण] कंजूस । मक्खीचूस । बखील । उ०— क्या किरपन मुंजो की माया नाव न होव न पूँसे से ।—सुंदर ग्रं०, भा०१, पृ० २३ ।

किरपा पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० कृपा] दे० 'कृपा' । उ०—तूम किरपा करि करौ लाल मेरे कौं टीको—नंद ग्रं०, पृ० १९४ ।

किरपान पु
संज्ञा स्त्री० [सं० कृपाण] दे० 'कृपाण' ।

किरपाल पु
वि० [सं० कृपालु] दे० 'कृपाल' ।

किरपिन पु
पुं० [सं० कृपण] दे० 'कृता' । उ०—तनिक विसारँ नाँहि कनक ज्यों किरपिन पाई ।—पलटू०, भा १, पृ०, ४२ ।

किरम पु
संज्ञा पुं० [सं० कृमि] ३. दे० 'किरिमदाना' । २. कीट । कीड़ा ।

किरमई
संज्ञा स्त्री० [सं० कृमि] एक प्रकार की लाख । लाख का एक भेद ।

किरमाल (१)—पु †
संज्ञा पुं० [सं० करवाल] तलवार । खङ्न ।

किरमाल (२)पु
संज्ञा पुं० [सं० किरणमालिन्, किरणमाल] सूर्य । उ०—नाम लियाँ थी मानवाँ सरकै कलुष विसाल । मह जैसे मेटै तिमिर, रसम रसम किरमाल—रघु० रू०, पृ० ३४ ।

किरमाला
संज्ञा पुं० [सं० कृतमाल] अमिलताश । किरवारा ।

किरमिच
संज्ञा पुं० [अ० कैनवास, हिं० किरमिज] एक प्रकार का मोटा विलायती कपड़ा । विशेष—यह महीन टाट की तरह होता है और इससे परदे, जूते, बैग आदि बनते हैं ।

किरनिज
संज्ञा पुं० [सं० कृमि + ज] [वि० किरमिजी] १. एक प्रकार का रंग । किरमदाने का चूर्ण । बुकनी किया हुआ किरिमदाना । हिरमजी । दे० 'किरिमदाना' । २. किरमिजी रंग का घोड़ा । वह घोड़ा, जिसका रंगा हिरमिजी के समान लाल हो ।

किरमिजी
वि० [सं० कृमिज] किरमिज के रंग का । किरिमदाने के रंग का लाल । मटमैलापन लिए हुए करौदिया रंग का । दे० 'किरिमदाना' ।

किरयात
संज्ञा पुं० [सं० किरात] चिरायता ।

किरराना (१)पु †
क्रि० अ० [हिं० कढ़िलना या अनु०] तड़पना । छटपटाना । उ०—मन मृत्तक सो जाणियै घायल ज्यूँ किर- राय । रामदास रहै हरि सुमिरत दिन जाय ।—राम० धर्म०, पृ० १९४ ।

किरराना (२)
क्रि० अ० [अनु०] १. दाँत पीसना । २. क्रोध से दाँत पीसना । ३. किर्र किर्र शब्द करना ।

किरराना (३)पु
क्रि० अ० [हिं० कुररना = कुलेल करना या बोलना या अनु०] बोलना । उ०—पनवारो चंपति को आनो । देखि सुआ सारो किररानो ।—लाल (शब्द०) ।

किरवाँन पु
संज्ञा पुं० [सं० कृपाण, प्रा० किबाण] तलवार । कृपाण । उ०—किरवाँन चलाय समार हरयौ ।—ह० रासो, पृ० १४६ ।

किरवान पु
संज्ञा पुं० [सं० कृपाण, प्रा० किवाण] दे० 'कृपाण' । उ०—(क) खंड हनौ किरवान जब, परेउ भूमि चहुवान ।— प०, रासो०, पृ० ९४ । (ख) सत्ता को सपूत राव, सगर को सिंह सोहै जैलवार जगत करेरी किरवान की ।—मति० ग्रं०, पृ० ३७७ ।

किरवार (१)पु
संज्ञा पुं० [सं० करवाल] तलवार । खङ्न । उ०—रन समुद्र बोहति को छियो । करिया सो किरवारो लियो ।— केशव (शब्द०) ।

किरवार (२)
संज्ञा पुं० [सं० कृतमाल] अमलताश । उ०—कमल मूल किरवार कसेरू । काच नून कर मूल कसेरू ।—सूदन (शब्द०) ।

किरवारा †
संज्ञा पुं० [सं० कृतमाल] अमलताश ।

किरसतान †
संज्ञा पुं० [सं० अं० क्रिश्चियन, हिं० क्रिस्तान] दे० 'क्रिस्तान' । उ०—अब तक सारा देश मुसलमान किरसतान हो गया होता ।—रंगभूमि, भा०२, पृ० ४९५ ।

किरसन पु
संज्ञा पुं० [सं० कृष्ण] दे० 'कृष्ण' । उ०—मस्त अकड़ को किरसन सरका मुरली बजाना हमना साजे ।—दक्खिनी०, पृ० ३८७ ।

किरसुन पु
संज्ञा पुं० [सं० कृष्ण] दे० 'कृष्ण' । उ०—उहै धनुक किरसुन पहँ अहा । उहै धनुक राधौ कर गहा ।—जायसी (शब्द०) ।

किराँची
संज्ञा स्त्री० [अं० केरोच] १. दो या चार पहियों की गाड़ी को माल असवाव ढोने के काम में आती है । वह बैलगाड़ीजिसपर अनाज, भूसा, आदि लादा जाता है । २. मालगाड़ी का डब्बा ।

किराठ
संज्ञा पुं० [सं०] व्यापारी । बनिया [को०] ।

किराड़ पु
संज्ञा पुं० [सं० किराट] वणिक । व्यापारी । उ०—गोली सौ गणका जसी, सम सो चोर किराड़ ।—बाँकी०, ग्रं०, भा०, २, पृ० ६० ।

किराड पु
संज्ञा पुं० [प्रा०] किनारा । तट । उ०—घाट किराडू पारकर लोद्रा लौ जालेर, पुंगल गढ़ आबू सहित मंडोबर अजमेर ।—पृ० रा०, १२ । ४२ ।

किरात (१)
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० किरातिनी, किरातिन, किरातो] १. एक प्राचीन जंगली जाति । उ०—मिलहिं किरात, कोल बनवासी । वैषानस, बटु, गृही उदासी ।—तुलसी (शब्द०) । २. एक देश का प्राचीन नाम ।—बृहत्संहिता, पृ० ८५ । विशेष—यह हिमालय के पूर्वीय भाग तथा उसके आसपास में माना जाता था । वर्तमान भूटान, सिकिम, मनीपुर, आदि इसी देश के अंतर्गत माने जाते थे । ३. चिरायता । ४. साईस । ५. वामन । बौना (को०) । ६. शिव (को०) ।

किरात (२)
संज्ञा स्त्री० [अ० किरात] १. जवाइरात की एक तौल जो लगभग चार जौ के बराबर होती है । २. एक आउँस का चौबीसवाँ भाग । ३. एक बहुत छोटा सिक्का या धातुखंड जिसका मूल्य पाई से भी कम होता था ।

किरातक
संज्ञा पुं० [सं०] १. चिरायता । २. किरात जाति का व्यक्ति [को०] ।

किरातपति
संज्ञा पुं० [सं०] शिव ।

किरातार्जुनीय
संज्ञा पुं० [सं०] भारविकृत १८ सर्गों का एक महाकाव्य ।

किराताशी
संज्ञा पुं० [सं०] गरुड़ ।

किराति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. गंगा । २. दुर्गा । पार्वती [को०] ।

किरातिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. चिरायता । २. किरात जाति का व्यक्ति [को०] ।

किरातिनि
संज्ञा स्त्री० [हिं० किरात का स्त्री०] दे० 'किरातिनी' । उ०—येह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि बिहसि उठी मतिमंद । भूषन सजति बिलोकि मृग मनहु किरातिनि फंद ।—मानस२ ।२६ ।

किरातिनो
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. किरात जाति की स्त्री । २. जटामासी ।

किराती
संज्ञा स्त्री० [सं०] किरात जाति की स्त्री । २. दुर्गा । ३. स्वर्ग की गंगा । ४. कुट्टिनी । ५. चवँर डोलनेवाली । चमरधारिणी ।

किरान पु †
क्रि० वि० [अ० किरान] पास । निकट । नजदीक । उ०—ततखन सुनि महेश मन लाजा । भाट किरान ह्वै बिनवा राजा ।—जायसी (शब्द०) ।

किराना
संज्ञा पुं० [सं० क्रयण] पंसारी की दुकान पर बिकनेवाली चींजें । जैसे मिर्च मसाला, नमक आदि ।

किराना (२)
क्रि० स० [सं० कीर्ण] दे० 'केराना' ।

किरानी
संज्ञा पुं० [हिं० किराना+ ई (प्रत्य०)] १. अंग्रेजी दफ्तर का क्लार्क या लिपिक । २. यूरेशियन ।

किराया
संज्ञा पुं० [अ० किरा, फा० किरायह्] वह दाम जो दूसरे की कोइ वस्तु काम में लाने के बदले उस वस्तु के मालिक को दिया जाय । भाड़ा । क्रि० प्र०—उतरना । उतारना ।—करना ।—चढ़ना ।—चुकाना ।—देना ।—लेना । यौ०—किरायादार = किराये पर लेने वाले व्यक्ति । मुहा०—किराया उतरना = किराया वसूल होना । किराया उतारना = भाड़ा वसूल करना । किराए करना = भाड़े पर लेना । जैसे—एक गाड़ी किराए कर लो । किराए पर देना = अपनी वस्तु को दूसरे के व्यवहार के लिये कुछ धन के बदले में देना । किराए पर लेना = दूसरे की वस्तु का कुछ दाम देकर व्यवहार करना ।

किरायेदार
संज्ञा पुं० [फा० किरायह् दार] वह जो किसी की कोई वस्तु भाड़े पर ले । कुछ दाम देकर किसी दूसरे की वस्तु कुछ काल तक काम में लानेवाला ।

किरार (१)
संज्ञा पुं० [देश०] एक नीच जाति ।

किरार (२) †
संज्ञा पुं० [प्रा० किराड] किनारा । तट । करार ।

किराव †
संज्ञा पुं० [हिं० केराव] दे० 'केराव' ।

किरावल
संज्ञा पुं० [तु० करावल] १. वह सेना जो लड़ाई का मैदान ठीक करने के लिये आगे जाय । २. बंदूक से शिकार करनेवाला आदमी ।

किरासन
संज्ञा पुं० [अं० केरोसिन] करोसिन तेल । मिट्टी का तेल ।

किरि
संज्ञा पुं० [सं०] १. सुअर । बाराह । २. बादल [को०] ।

किरिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्याही या मसि रखने का पात्र । मसि- पात्र । दावत [को०] ।

किरिच
संज्ञा स्त्री० [सं० कृति अथवा प्रा० किलिच = लकड़ी का छोटा टुकड़ा] कड़ी वस्तु का छोटा नुकीला टुकड़ा । दे० 'किरच' । उ०—चूरत महागिरि शिखर परि विद्युत किरिच रंचक अली ।—प्रेमघन०, भा०१, पृ० ११९ । यौ०—किरिच का गोला = एक प्रकार का जहाजी गोला जिसके भीतर लोहे के टुकड़े, किलें या छर्रे भरे रहते है । यह गोला शत्रु के जहाज का पाल फाड़ डालने या रस्सियों और मस्तूल को काट कर गिरा देने की इच्छा से फेंका जाता है ।

किरिट
संज्ञा पुं० [सं०] दलदली खजूर का फल [को०] ।

किरिन पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० किरण, हिं० किरन] दे० 'किरण' । उ०—जानहु सुरूज किरिन हुति काढ़ी । सुरूज करा घाटि वह बाढ़ी ।—जायसी ग्रं०, (गुप्त), पृ० १५३ ।

किरिनि पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० किरण, हिं० किरन, पु † किरिन] दे० 'किरण' । उ०—सुरूज किरिनि जस गगन विसेखी । जमुना माँझ सुरसुती देखी ।—जायसी ग्रं०, (गुप्त०), पृ० १८६ ।

किरिपा पु
संज्ञा स्त्री० [सं० कृपा] दे० 'कृपा' । उ०—करूसुदिबस्टि और किरिपा हिछा पूजै मोरि ।—जायसी ग्रं० (गुप्त) पृ० २३२ ।

किरिम पु
संज्ञा पुं० [सं० कृमि] दे० 'कृमि' । यौ०—किरिमकुंड ।

किरिमदाना
संज्ञा पुं० [सं० कृमि + हिं० दाना] किरमिज नामक कीड़ा । किरमिजी । विशेष—ये एक प्रकार के छोटे छोटे कीड़े होते हैं जो थूहड़ के पेड़ों पर फैलते है । ये इतने छोटे होते हैं कि लगभग ७० हजार कीड़े तौल में आध सेर होते हैं । मादा कीड़ों को इकट्ठा कर सुखा लेते हैं और उन्हे पीस कर रँगने के काम में लाते है । इसी बुकनी को किरमिजी या हिरमिजी कहते हैं । इसका रंग हलका और मटमैला लाल होता है ।

किरिया पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० क्रिया] १. शपथ । सौगंध । कसम । उ०—मामी काली किरिया, किसी से कहना मत ।—मैला०, पृ० ६९ । क्रि० प्र०— खाना ।—देना ।—दिलाना ।—धरना ।— रखना । यौ०—किरिया कसम = शपथ । सौंगंध । २. कर्तव्य । काम । ३. मृत व्यक्ति के हेतु श्राद्धादि कर्म । मृतकर्म । यौ०—किरियाकरम = (१) क्रिया कर्म । मृतककर्म । (२) दुर्दशा ।

किरिरना †
क्रि० अ० [हिं० या० अनुध्व] दे० 'किचकिचाना' ।

किरिरा
संज्ञा स्त्री० [हिं० क्रीड़ा] दे० 'क्रीड़ा' । उ०—किरिरा काम केलि मनुहारी । किरिरा जेहिं नहिं सो न सुनारी ।—जायसी ग्रं० पृ० ३३४ ।

किरिसना
क्रि० अ० [सं० कृश से नामिक धातु] कृश या दुबला होना ।

किरिसित
वि० [कृशि] कृश या दुर्बल ।

किरिस्तान
संज्ञा पुं० [अं० क्रिश्चियन] १. ईसाई । २. विधर्मी । उ०—आधे पुराने पुरानहिं माने, आधे भये किरिस्तान हौ दुइ- रंगी ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ५०० ।

किरिसी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० कृषि] दे० 'कृषि' । उ०—वेदे होम जग्यं एहु माखे और कि किरिसी धर बारा ।—सं० दरिया, पृ० १२४ ।

किरोट
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का शिरोभूषण । मुकुट । विशेष—यह माथें में बाँधा जाता था और इसका व्यवहार प्राचीन राजा पगड़ी के स्थान पर करते थे । इसके ऊपर मुकुट भी कभी कभी पहनते थे । यौ०—किरोटधारी = राजा । किरीटमाली = अर्जुन । २. एक वर्णवृत्त वा सवैया जिसमें ८ भगण होते हैं । जैसे,—भा बसुधा—तल पाप महा तब धाय धरा दइ देव सभा जहँ । आरत नाद पुकार करी सुनि बाणि भी नभ धीर धरो तहँ । लै नर देह हतौं खल पुंजन थापहुँ गो नय पाथ मही महँ । यों कहि चारि भुजा हरि माथ किरीट धरे जनमें प्रहमी महँ ।

किरीटित
वि० [सं०] किरीट नामक शिरोभूषण से सज्जित । उ०— जन्मभूमि, प्रिय मातृभूमि की शीर्षरत्न, शत स्वागत । हिम सौंदर्य किसीटित जिसका शारद मस्तक उन्नत । —प्रातिपा, पृ० १३५ ।

किरीटी (१)
संज्ञा पुं० [सं० किरीटिन्] १. इंद्र । २. अर्जुन । ३. राजा ।

किरीटी (२)
वि० कोई किरीटधारी । जो किरीट पहने हो ।

किरीरा पु
संज्ञा स्त्री० [सं० क्रीडe, हिं०] दे० 'क्रीड़ा' उ०— हँसहि हँस ओर कहि किरीरा । चुनहि रतन मुकुताहल हीरा ।—जायसी (शब्द०) ।

करोड़
वि० [हि० करोड़] 'करोड़' । उ०—दिल्ली सै बनारस के परे तक किरोड़ों आदमी हिंदी बोलनेवाले हैं । —श्रीनिवास ग्र०, पृ०, ९ ।

किरोध पु †
संज्ञा पुं० [सं० क्रोध + हि० कुरेध, कुरोध] दे० क्रोध' । उ०— तुम बारी पिउ दुहुँ जग राजा । गरब किरोध ओहि पै छाजा ।—लायसी (शब्द०) ।

किरोर †
संज्ञा पुं० [हि० किरोड़] दे० 'करोड़' ।

किरोलना
क्रि० स० [अनु०] करोदना । खुरचना ।

किरौना †
संज्ञा पुं० [हि० कीरा + औना (प्रत्य०)] क्रीड़ा ।

किर्च पु
संज्ञा स्त्री० [हि० किरच] दे० 'किरच' ।

किर्तकिर्त पु
वि० [सं० कृचकृत्य] दे० 'कृतकृत्य०' । उ०— चहुँ जुग किर्तकिर्त कियो तुम जेहि सुकर सिर थापे हो । भोखा० श०, पृ० ३२ ।

किर्तनिया
संज्ञा पुं० [हि० कीर्तन + इया(प्रत्य०)] कीर्तन करनेवाला आदमी । भगवान का गुणानुवाद करनेवाला भक्त । २. प्रशंसक व्यक्ति । यश गा नेवाला पुरुष ।

किर्तिम पु
वि० [सं० कृत्रिम, प्रा० किर्तिम] दे० 'कृत्रिम' । उ०— चीन्हहु किर्तिम आदि सत्य असत्य बिचारहू । छाँड़ि देहु बकयादि खोजहु अविकल पुरुष कहँ ।—कबीर सा० पृ० ३९४ ।

किर्तृम पु
वि० [सं० कृत्तिम] दे० 'कृत्रिम' । दूजा करम भरम है किर्तृम ज्यों दर्पब में छाहीं । —कबीर श०, भा० १. पृ० ५१ ।

किर्द
संज्ञा पुं० [फा०] १. काम काज । कार्य़ । १. धंधा । पेशा ।

किर्दगार
संज्ञा पुं० [फा० कर्दगार] ईश्वर । उ०—ऐ साहब सत्तार ऐ किर्दगार । के ऐ खालिक खल्क परवरदिगार ।—दक्खिनी०, पृ० २३५ ।

किर्न पु
संज्ञा स्त्री० [हि० किरन] दे० 'किरण' । उ०— बसे सब माहि तन धारी । रवी किर्न मूल विस्तारी । —संत तुरसी०, पृ०६२ ।

किर्म पु
संज्ञा पुं० [सं० कृमि] दे० 'कृमि' । उ०— तुचा ते ऊन औ किर्म ते पाट है पाट अंबर सोई मनै भावै ।—कबीर रे०, पृ०, २२ ।

किर्म (२)
संज्ञा पुं० [फा० तुलनीय, सं० कृमि] कीट । कीड़ा । यौ०— किर्मखुर्दा = कीड़ा लगा हुआ । कीड़ा खाया हुआ । किर्मपीला = रेशम का कीड़ा । किर्मशबताब = खद्योत । जुगुनूँ ।

किर्मि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. भवन । २. विस्तृत कक्ष । बहुत से लोगों के बैठने के लिये बना हुआ कमरा । ३. सोने या लोहे की मूर्ति । ४. पलाश वृक्ष [को०] ।

किर्मिज
संज्ञा पुं० [सं० कृमिज] १. एक प्रकार का रंग । किरिम दाने या चूर्णा । बुकनी किया हुआ किरिमदाना । हिरमिजी । वि० दे० 'किरिमदाना' । २. किरमिजि रग का घोड़ा ।

किर्मी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'किर्मि' [को०] ।

किर्मीर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] राक्षस जिसे भीमसेन ने मारा था । यौ०—किर्मीरजित् । किर्मीरनिषूदन । किर्मोरभिद् । किर्मोरसूदन = भीमसेन । २. नारंगी का पेड़ । ३. चितकबरा रंग (को०) ।

किर्मीर (२)
वि० [सं०] चितकबरा ।

किर्याणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] जंगली शूकरी [को०] ।

किर्र
संज्ञा पुं० [अनु०] दो बाँसों की रगड़ से या बैलगाड़ी के चलते समय पहिए से निकलनेवाली ध्वनि । उ०— मेले का किर्र किर्र घोर कल कल........ । प्रेमघन० भा०, २. पृ० ३८ ।

किरंना (१) †
क्रि० सं० [अनुघ्व०] किर्र किर्र की आवाज करना जो दाँत के बराबर रगड़ से, आँसों की रगड़ से, बिना तेल लगे पहियों के चलने पर धुरों आदि से होती है ।

किर्रना † (२)
क्रि० अ० किर्र किर्र की आवाज होना ।

किर्रा
संज्ञा स्त्री० [सं० कोर्ण] एक प्रकार की छेनी जिससे धातु की नक्काशी । में पत्तियाँ और ड़ालियाँ बनाई जाती है ।

किर्राना †
क्रि० अ०, क्रि० स० [अनुध्व०] दे० 'किर्रना' ।

किर्षि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० कृषि] दे० 'कृषि' । उ०—एक क्रिया करि किर्षि निपावत आदि रु अंत ममत्व बंध्यौ है । —सुंदर ग्रं०, भा० ३. पृ० ६४० ।

किलंगी
संज्ञा स्त्री० [फा० कलँगी] कलंगी । उ०—कंठौ माला कड़ा किलंगी सतगुर अरपण लाऊँ । दिखण दिशारी मंगाय फाँवरिया अपने हाथ ओढ़ाऊँ ।—राम०, धर्म०, पृ०१ ।

किलंज
संज्ञा पुं० [सं० किलञ्ज] १. चटाई । २. पतला तख्ता । [को०] ।

किल (१)
क्रि० वि० [सं०] निश्चय ही । अवश्य । उ०—(क) कै श्रोणित कलित कपास यह किल कापालिक काल को ।— केशव (शब्द०) । (ख) फूटे किल कनक—भास रवि-शशि- उड़ुगण । अकाश ।—आराधना पू० ३६ ।

किल (२)पु
संज्ञा स्त्री० [हि० कील] लोहे को काँटीनुमा चीज । किल्ली । उ०— व्यास जोति जगजोति तह सिद्ध महूरत ताव । दैवजोग सेसह सिरह किल किल्लित सु ग्राव । —पृ० रा०, ३ । १६ ।

किल (३)
संज्ञा पुं० [सं०] खेल । क्रीड़ा । [को०] ।

किलक (१)
संज्ञा स्त्री० [हि० किलकना] १. किलकने की क्रिया । हर्षध्वनि करने की क्रिया । आनंदसूचक शब्द । हर्ष- ध्वानि । किलकार । उ०—माँ, फिर एक किलक दूरागत, गूँज उठी कुटिया सूनी ।—कामायनी, पृ०, ।

किलक (२)
संज्ञा स्त्री० [फा० किलक] एक प्रकार का नरकट जिसकी कलम बनती है ।

किलकन
संज्ञा स्त्री० [हि० किलक] किलकिला । किलकारी ।

किलकना
क्रि० अ० [सं० किलकिला] १. किलकिल शब्द करने आनंद प्रकट करना । किलकार मारना । हर्षध्वनि करना । उ०—(क) तुलसी निहारि कपि भालु किलकत ललकत लखि ज्यों कंगाल पातरी सुनाज की ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) गहि पलका की पाटी ड़ोलै । किलकि किलकि दसननि दुति खोलौ ।— लाल (शब्द०) । (ग) प्र?त? आँसू ढ़ुलकाकर भी खिली पंखु— ड़ियाँ पकज किलके ।—हिम त०, पृ०, ३६ ।

किलकाना
क्रि० अ० [अ० कलक, हि० किलक] व्याकुल होना । दुखी होना । उ०—बिछुरि परी सहचरिन संग तें ड़ोलत वन किलकाइ रे । —घनानंद, पृ० ५३७ ।

किलकार
संज्ञा स्त्री० [हि० किलक] बह गंभीर और अस्पष्ट स्वर जिसे लोग आनंद और उत्साह के समय मुँह से निकालते हैं । हर्षध्वनि । उ०—कलरव करते किलकार रार ये मौन मूक तुण तरुदल पर । तकते अपलक निश्चल सोए उड़ उड़ पँख- ड़ियों पर सुंदर ।—युग०, पृ० ९० ।

किलकारना
क्रि० अ० [अनु०] किलकार भरना । चिड़ियों का प्रसन्नतापुर्वक बोलना । चहचहाना । उ०—खग कुल किलकार रहे थे, कलहंस कर रहे कलरव । —कामायनी, पृ, २८४ ।

किलकारी
संज्ञा स्त्री० [हि० किलकना] वह गंभीर और अस्पष्ट स्वर जिसे लोग आनंद के समय मुँह से निकालते हैं । हर्षध्वनि । क्रि० प्र०— देना ।—मारना । उ०—चले हनुमान मारि किलकारी ।—तुलसी (शब्द०) ।

किलकिंचित
संज्ञा पु० [सं० किलकिञ्चत्] संयोग शृंगार के ११ हावों में से एक, जिसमें नायिका एक ही साथ कई एक भावों को प्रगट करती है । जैसे,—(क) सी करति ओठन बसी- करति आँखिन रिसौंही सी हँसी करति भौंहनि हँसी करति ।—देव (शब्द०) । (ख) कहति, नटाति, खिझति, मिलति, खिलति—लजि जात । भरे भौन में करत हैं नेनन ही सो बात ।—बिहारी (शब्द०) ।

किलकिल (१)
संज्ञा स्त्री० [अनु०] झगड़ा । लड़ाई । वादविवाद । किटकिट । जैसे,—रोज की किलकिस अच्छी नहीं । यौ०—दाँता । किलकिल ।

किलकिल (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. आनद या हर्षसूचक ध्वनि । किलकारी । २. शिव [को०] ।

किलकिला (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] हर्षध्वनि । आनंदसूचक । शब्द । किलकारी । उ०— लाँघि सिधु एहि पारहिं आवा । शब्द किलकिला कपिन सुनावा ।—तुलसी(शब्द) ।

किलकिला (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० कूकल] मछली खानेवाली एक छोटी चिड़िया । उ०— मेरे कान सुजान तुव नैन किलकिला आइ । हृदय सिंधु ते मीन मन, तुरत पकरि लै जाइ । —रसानिधि (शब्द०) । विशेष—जिस पानी में मछलियाँ होती है, उस पानी के ऊपर लगभग १० हाथ की ऊचाई पर उड़ती रहती है । मछली को देखकर अचानक उसपर टूटती है और उसे पकड़कर उड़ जाती है ।

किलकिला (३)
संज्ञा पुं० [अनुध्व०] समुद्र का वह भाग जहाँ की लहरैं भयंकर शब्द करती हों । उ०— पुनि किलकिला समुद्र मँह आई । गा धीरज देखत डर खाई ।—जायसी (शब्द०) ।

किलकिला (४)
वि० घूँघरवाला । कुंचित । ऊ०—बरस बावीस कौ बाली, बेस दंत कवाड़या, सिर किलकिला केस— बी० रासी पृ०, ।

किलकिलाना
क्रि० अ० [हि० किलकिला] १. आनंदसूचक शब्द करना । हर्षध्वानि करना । उ०— चली चमुचहुँ ओर शोक कछु बनै न बरनत भीर । किलकिलात कसमसत कोलाहल होत नीगविघि तीर । —तुलसी (शब्द०) । २. अस्पष्य शब्दों में चिल्लाना । हल्लागुल्ला करना । ३. वादविवाद करना । झगड़ा करना ।

किलकिलाहट
संज्ञा स्त्री० [हि० किलकिलाना] किलकिलाने का शब्द ।

किलकिलित
संज्ञा पुं० [सं०] आनंद, हर्ष आदि का व्यंजन शब्द [को०] ।

किलको
संज्ञा स्त्री० [फा० किलक = नरकट या कलम] बढ़इयों का एक औजार , जिससे वे नाप के अनुसार काठ पर निशान करते हैं ।

किलकैया (१)
संज्ञा पुं० [देश०] नहरुए के ढ़ंग का एक प्रकार का रोग, जिसमें चौपायों के खुरों में कीड़े पड़ जाते है ।

किलकैया (२)
संज्ञा पुं० [हि० किलकना] किलकनेवाला ।

किलक्क पु
संज्ञा स्त्री० [हि० किलक] दे० 'किलक' । उ०— धड़कै उर कातर सोर धुखै । मच हक्क किलक्क अनेक मुखै ।— रा०, रु०, पृ०, ३४ ।

किलचिया
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का बहुत छोटा बगला जो सारे भारत में पाया जाता है

किलटा
संज्ञा पुं० [देश०] बेंत का टोकरा । बिशेष—यह इस युक्ति से बना रहता है कि इसमें रखी हुई वस्तु का भार ढ़ोनेवाले के कंधों ही पर पड़ता है । इसे पहाड़ी लोग लेकर उँचाई पर चढ़ते है ।

किलना (१)
क्रि० अ०[सं० कीलन] कीलन होना । कीला जाना । ३. वश में किया जाना । गति में अवरोध होना । जैसे,—शत्रु, की जीभ किल गई ।

किलना (२)
संज्ञा पुं० [हि० किलनी का पुं०] १. बड़ी किलनी । २. नर किलनी ।

किलनी
संज्ञा स्त्री० [सं० कोट, हिं०, कीड़ा + नी (प्रत्य०)] एक प्रकार का छोटा कीड़ा जो गाय, बैल, कुर्ते, बिल्ली आदि पशुओँ के शरिर में चिपटा रहता है और उनका रक्त पीता है । किल्लि ।

किलबिलाना
क्रि० अ० [अनुध्व० अथवा हि० कुलबुलाना] दे० 'कुलबुलाना' ।

किलाविष पु
संज्ञा ० पुं० [सं० किल्विष] दे० 'किल्विष' । उ०— काया यह तौ अहै खाक की, किलाविष अहै समोई । उ०—जग० बानी० पृ०, ३२ ।

किलम पु
संज्ञा पुं० [देश०] यवन । उ—किलम गयद चढ़ियों हिलकारै । अठी जद़ड भड़ धीर उचारो ।—रा० रु० पृ० २२६ ।

किलमी
संज्ञा पुं० [देश०] १ जहाज का पिछला खंड़ । २ पिछले खंड़ के मस्तूल का बादवान ।

किलमोरा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की दारूहल्दी, जिसकी झड़ियाँ हिमालय पर कोसों फैली हुई मिलती है । दे० 'दारूहल्दी' ।

किलवाँक
संज्ञा पुं० [देश०] काबुल देश का एक प्रकार का घोड़ा । उ०— काबिल के किलवाँक कच्छ दच्छी दरियाई । उम्मट के ह्वबसान जंगली जाति अलाई । सूदन (शब्द०) ।

किलवा †
संज्ञा पुं० [देश०] बड़ा फावबड़ा या बड़ी कुदाल । (रुहेलखंड़) ।

किलवाई †
संज्ञा स्त्रौ० [देश०] एक बड़ा पाँचा या लकड़ो की फरुई जिससे सूखी घास या पयाल इकट्ठा करते हैं ।

किलवाना
क्रि० सं० [हि० किलवा का प्रि० रूप] १ कील ठोकवाना । कील लगवाना या जड़वाना । २ तंत्र या मंत्र द्बारा किसी भूत प्रेत के विध्नकारी कृत्य को रोकवा देना । जादू या टोना करा देना ।

किलवारी †
संज्ञा स्त्री० [सं० कर्ण] पतवार । कन्ना । वह ड़ाँड़ा जिससे छोटी छोटी नावों में पतवार का काम लेते है ।

किलविष पु †
संज्ञा पुं० [सं० किल्विष] दे० 'किल्वष' । उ०— दुख बिनाशन अघहरन किलविष काटण हारू । संतोष सरोवर पर्वतै वर्षे अम्रित धारु । —प्राण० पृ०, २६८ ।

किलविषी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० कील्विष] पापी । अपराधी । उ०— मन मलीन कलि किलविषी होत सुनत जासु कृत काज । सो तुलसी कियो आपुनो रघुबीर गरीब निवाज । तुलसी (शब्द०) ।

किलहँटा
संज्ञा पुं० [पा० गिलाट या हि० कलह? या अनु०] [स्त्री० किलहँटी] एक प्रकार की चिड़िया जो आपस में बहुत लड़ती है । सिरोही ।

किलहटी
संज्ञा स्त्री० [हि० किलहँटा] दे० 'किलहँटा' ।

किला
संज्ञा पुं० [अ० किलाअ] १ लड़ाई के समय बचाव का एक सुदुढ़ स्थान । दुर्ग । गढ़ । क्रि० प्र०— टूटना ।—तोड़ना ।— बाँधना ।—ले लेना । यो०— किलेदार=दुर्गपति । गढ़पति । किलेदारी=दुर्ग की अध्यक्षता । किलबंदी=किला बाँधने का काम । मुहा०—किला फतेह करना=महा कठिन काम कर लेना । अत्यंत विकट कार्य करने में सफलता प्राप्त करना । किला टूटना=किसी बड़ी भारी कठिनता या अड़चन का दूर होना । किसी दु?साध्य कार्य का पूरा होना । २ विशाल और सुदुढ़ पक्का मकान ३ शतरंज के खेल में वह सुरक्षित स्थान जहाँ बादशाह शह से बचा रहता है । मुहा०—किला बाँधना=शतरंज के खेल में बादशाह को किसी घर में सुरक्षित रखना, जिससे प्रतिपक्षी जल्दी मात न कर सके ।

किलाट
संज्ञा पुं० [सं०] खटाई ड़ालकर फाड़ा हुआ दुध । छेना ।

किलाटी
संज्ञा पुं० [सं०किलाटिन्] बाँस । कीचक [को०] ।

किलात
संज्ञा पुं० [सं०] बौना ।

किलाना
क्रि० सं० [हि०] दे० 'किलवाना' ।

किलाबंदी
संज्ञा स्त्री० [अ० किला+फा० बंदी] १ दुर्गनिर्माण । १ व्यूहरचना । सेना की श्रोणियों की विशेष नियमानुसार खड़ा करना । ३ शतरंज में बादशाह की सुरक्षित घर में रखना । क्रि० प्र०— करना ।—होना ।

किलाया
संज्ञा पुं० [हि०] हाथी की गरदन पर पर पड़ी हुई रस्सी, जिसपर महावत पाँव रखता है । किलावा । उ०— कुंजर किलाए आह करि तन समकि तरवारन लिस्यौ ।—पदमाकर ग्रं० पृ०, १७७ ।

किलाव पु
संज्ञा पुं० [पुं० कुलावा] कोढ़ा या बंधन । वि० दे० 'कुलावा' । उ०—कंचन किलाव लगाय कल पट्टी बधिय चंद भट । तिहि वेर कन्ह चहआन चष रूप प्रगटि आति षित्रि— वट— पृ० रा०, ५ । ५७ ।

किलावा (१)
संज्ञा पुं० [?] सोनारों का एक औजार ।

किलावा (२)
संज्ञा पुं० [फा० कलाब] हाथी के गले में पड़ा हुआ रस्सा या बंधन जिसमें पैर फँसाकर महावत हाथी को चलने आदि का इशारा करते है ।

किलास (१)
संज्ञा पुं० [सं०] कुष्ट रोग । चर्मरोग [को०] ।

किलास (२)
वि० कुष्ठी । कुष्ठ रोग से ग्रस्त (को०) ।

किलास †
संज्ञा पुं० [अ० क्लास] दे० 'क्लास' ।

किलासी
वि० [सं० किलासिन्] कुष्ठ । किलास रोगवाला (को०) ।

किलिंच
संज्ञा पुं० [सं०किलिञ्च] १ हरी लकड़ी या पतला तख्ता । २ चटाई [को०] ।

किलिंज, किलिंजक
संज्ञा पुं० [सं० किलिञ्ज, किलिञ्जक] दे० किलिंच । [को०] ।

किलिक
संज्ञा स्त्री० [फा०] एक प्रकार का नरकट, जसकी कलम बनती है ।

किलिन
संज्ञा पुं० [अं० कोल] जहाज के पीछे का वह स्थान जहाँ बाहरी तख्ते मुड़कर मिलते है । जहाज के पेंदे का वह छोर जो पिछाड़ी की ओर होता है । केदास की मोड़ ।

किलिम
संज्ञा पुं० [सं०] देवदारु वृक्ष [को०] ।

किलेस पु †
संज्ञा पुं० [सं० क्लेश] दे० 'क्लेश' । उ०— मास छ सात रहे उस देस । थोरा सौदा बहुत किलेस । —अर्ध० पृ० ४२ ।

किलोमीटर
संज्ञा पुं० [अं०] दूरी की एक अंतराष्ट्रीय माप, जो मील के प्राय? पंच प्रष्टमांश के बराबर होती है ।

किलोर पु
संज्ञा पुं० [सं० कल्लोल] खेल । आनंद । उछल कूद । उ०—मै गुण तीनि पाँच तत्व मैं ही में दश दिशि चहुँ ओर मै निहरूप धरे नाना बिधि निशि दिन करत किलोर ।—कबीर सा०, पृ०, ३८८ ।

किलोल
संज्ञा पुं० [सं० कल्लोल] दे० 'कल्लोल' 'कलोल' ।

किलोवा
संज्ञा पुं० [बरमी] एक प्रकार का लंबा बाँस । बिशेष—यह बरमा में पेगू और मर्तबान के जंगलों में होता है । इसकी लंबाई ६० से १२० फुट तथा घेरा ५ से ८ इंच तक होता है । इसका रंग खाकी होता है और यह नाव के मस्तूल बनाने के काम में अधिक आता है ।

किलोहड़ा पु
संज्ञा पुं० [ड़ि०] छोटि उम्र के बैल । उ०— काढै़ जीभ किलोवखा़ खंध न झालै भार । वांकी० ग्र० भा०, १ पृ० ४१ ।

किलौनी †
संज्ञा स्त्री [हि० किलनी] दे० 'किलनी' ।

किल्की, किल्वी
संज्ञा पुं० [किल्किन्, किल्धिन्] घोड़ा [को०] ।

किल्विख पु
संज्ञा पुं० [सं० किल्वष] दे० 'किल्वष' । उ०—ऐन बृजिन दुकृत दुरित मध मलीन मसि पंक । किल्विख कल्मख कलुष पुनि कस्मल समल कलक । —अनेकाथँ । पृ०, १५ ।

किल्बिष
संज्ञा पुं० [सं०] १. पाप । २. अपराध । ३. बीमारी । ४. विपत्ति । ५,धूर्तता । ठगी । ३. शत्रुता । बैर [को०] ।

किल्बिषी
वि० [किल्विविन्] पापी । पातकी [को०] ।

किल्लत
संज्ञा स्त्री० [सं० किल्लत] १. कमी । न्यूनता । २. संकोच । तंगी । ३. दुर्लम होना । दुर्लभता ।

किल्ला
संज्ञा पुं० [हि० किल] वहुत बड़ी कील या मेख । खूँटा २. लकड़ी की वह मेख जो जाँते के बीचोबीच गडी रहती है और जिसके चारो ओर जाँता घुमता रहता है । कील । मुहा.—किल्ला गाड़कर बैठना=अटल होकर बैठना ।

किल्ला
संज्ञा पुं० [सं० किलअ] दे० 'किला' ।

किल्ली
संज्ञा स्त्री० [हि० कील] १. कील । खूँटी । मेख । उ०— भयो तुँवर मतिहीन करिय किल्ली तै ढिल्लिय ।—चंद (शब्द०) । २. सिटाकिनी । विल्ली । २. किसी कल या पेंच की मुठीया जिसे घुमाने से वह चले । क्रि० प्र० — ऐंठना ।— घुमाना ।—दबाना । मुहा.—किसी की किल्ली किसी के हाथ में होना=किसी का वश किसी पर होना । किसी की चाल किसी के हाथ में होना । जैसे—बह हम से भागकर किधर जायगा, उसकी किल्ली तो हमारे हाथ में है । किल्ली घुमाना या ऐठना=दाव यापेंच चलाना । युक्ति लगाना । जैसे—उसने न जाने कैसी किल्ली ऐठ दी है बहाँ कोई हमारी बात नहीं सुनता ।

किल्विष
संज्ञा पुं० [सं०] १. पाप अपराध । दोष । २. रोग । व्याधि ।

किल्होर †
संज्ञा पुं० [देश०] १. बछड़ा । २. किशोर अवस्था का बालक । उ०— पतला छरहरा क्या ही खूबसूरत किल्होर था ? —रति०, पृ०, १३८ ।

किव पु
अव्य०[अध० किवँ] कैसे । उ०— आज उमाहउ मो घणाउ, ना जाणूँ किव केण । पुरुष परायउ वीर वड़, अहइ फुरक्कि केण ।—ढोला०, दू०, ५१८ ।

किवरिया पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० कपाटिका] छोटा किवाड़ । किवाणी । उ० (क) खुली झिविरिया मिटि अँधयरिया । —धरम०, पृ०, ५३ । (ख) आठ मरातिब दस दर्वाजा, नौं में लगी किवरिया ।—कबीर शा०, भा०, १, पृ०, ५५ ।

किवाँच
संज्ञा पुं० [हि० केवाच] दे० 'केवाँच' ।

किवाट
संज्ञा पुं० [सं० कपाट] दरवाजा । कपाट । किवाड़ । उ०— उठिठी कुँवर प्रथिराज लषि, गयौ महल निज मद्धि । दै किवाट मिलि थाट जुध, मच्यों कलह सभ मद्धि ।—पृ० रा०, ५४४ ।

किवाड़
संज्ञा पुं० [सं० कपाट, प्रा०, कवाड़] [स्त्री किवाड़ी] लकड़ी का पल्ला जो द्बार बंद करने के लिये द्बारा की चौखट में जड़ा जाता है । (एक द्बार में प्राय? दो पल्ले लगए जाते है) । पट । कपाट । उ० —(क) गोट गोट सखि सर गोलि बहराय । बजर किवाड़ पहुँ गिलन्हि लगाय ।—विद्यापति, पृ०, २७९ । (ख) भूत गए रस रीति अनिति किवाड़ न खोले । —कविता को०, भा०, २. पृ०, १०० । क्रि० प्र०— उड़काना । —खोलना ।—अपकाना । —बंद करना । मुहा०.— किशाड़ देना लगाना या भिड़ाना= किवाड़ बंद करना । किवाड़ खटखटाना=किवाड़ खुलवाने के लिये उसके कुंड़ी हिलाना या उसपर आघात करना ।

किवाड़ी
संज्ञा स्त्री० [हि० किवाड़+ई (प्रत्य०)] दे० 'किवाड़' । उ०— दिन बडी़ कठिनाई के साथ बीसने लगे, भूख बुरी होती है, जब कोई व्योंत न रहा, तो घर की कड़ी औरकिवाड़ी तक बेंच दी गई पर ऐसे कितने दिन चल सकता है ।— ठेठ०, पृ०, ४३ ।

किवार पु
संज्ञा पुं० [सं० कपाट, प्रा०, कबाड़,० हि० किवाड़] दे० 'किवाड़' । उ०— ज्यौं मै खोले किवार सौं ही आदि न लवढ़ि गौ गरै ।—घननंद, पृ०, ३९९ ।

किवारी पु
संज्ञा स्त्री० [हि० किवाड़ी] दे० 'किवाड़' । उ०—नाम पान मै कहौं विचारी । जातें छूटै भर्म किवारी । —कबीर सा०, पृ०, ९९५ ।

किशदा
संज्ञा पुं० [फा० किश्ता] एक प्रकार का छोटा शाफतालू । विशेष—इसका मुरब्वा पड़ता है ओर इसकी गुठलिय़ों से चाँदी साफ की जाती है ।

किशनतालू
संज्ञा पुं० [सं० कृष्णतालु] वह हाथी जिसका तालू काला हो । विशेष—ऐसा हाथी अच्छा समझा जाता है ।

किशमिश
संज्ञा पुं० [फा०] [वि० किशमिशी] सूखाया हुआ छोटा लंबा बेदाना अंगूर । सुखाई हई छोटी दाख । वि० दे० 'अंगूर' ।

किशमिशी (१)
वि० [फा०] १. किशमिश का । जिसमें किशमिश हो । २. किसमश के रंग का ।

किशमिशी (२)
संज्ञा पुं० एक प्रकार का आमोआ रंग । विशेष—यह किशमिश के ऐसा होता है और इस प्रकार बनता है—पहले कपड़े को धोकर उसे हड़ के पानी में डुबाते है फिर गेरु देकर हल्दी और उसके उपरांत तुन या अनार की छाल में रंगकर सुखा लेते है । दूसरी रीति यह है कि कपड़े की ईंगुर में रंगकर सुखाते है और कटहल की छाल कुसुम हर- सिगार और तुन के फूलौ के अर्क में उसे रंगते है ।

किशल
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'किशलय' (को०) ।

किशलय
संज्ञा पुं० [सं०] नया निकला पत्ता । कोमल पत्ता । कल्ला । उ०— नूतन किशलय मनहुँ कृशानू ।—तुलसी (शब्द०) ।

किशोर (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० किशोरी] ११. वर्ष से १५ वर्ष तक की अवस्था का । यौ०.—किशोरावस्था ।

किशोर (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. ११ से १५ वर्ष तक की अवस्था का बालक । यौ०.— युगलकिशोर । २. पुत्र । बेटा । जैसे—नंदकिशोर । ६. घोड़े का वछेड़ा । ४. सिंह आदि का बच्चा जो जवान न हो । जैसे, केसरीकिशोर, सिंहकिशोर । ५. सूर्य [को०] ।

किशोरक
संज्ञा पुं० [सं०] १.छोटा बालक । २. किसी जीव का बच्चा । उ०— शशिहि चकोर किशोरक जैसे ।—तुलसी (शब्द०) ।

किशोरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] किसी जानवर की मादा संतान । जैसे, बछेड़ी । २. युक्ती । तरुणी । ३. पुत्री । जैसे, जनककिशोरी बृषमानुकिशोरी ।

किश्त
संज्ञा स्त्री० [फा०] १. शतरंज के खेल में बादशाह का किसी मोहरे की घात में पड़ना । इसे 'शह' भी कहते हैं । २. खेती । कृषि । यौ०.—किश्तकार=किसान । काश्तकार । किश्तकारी =खेती का काम । किसानी । किश्तजार=वह भूभाग जहाँ चारों और हरे भरे खेत हों ।

किश्तवांर
संज्ञा पुं० [फा० किशत=खेत+वार (प्रत्य०)] पटवारियों का एक कागज जिसमें खेतों का नंबर रकबा आदि दर्ज रहता है ।

किश्तिया (१)पु
संज्ञा स्त्री० [फा० किश्ती] दे० 'किश्ती' । उ०— वहे दरिया गुन धैंचो किश्तिया होय पार । —सं० दरिया, पृ० १५२ ।

किश्तिया (२)
वि० [फा० किश्ती+हि० इया (प्रत्य०)] किश्ती के आकार की । जैसे, किश्तिया टोपी ।

किश्ती
संज्ञा स्त्री० [फा०] १. नाव । यौ०.—किश्तीनुमा= नाव के आकार का । २. एक प्रकार की छिछली थाली या लंबी तरतरी जिसमें रखकर किसी को कुछ सौगात देते है । ३. शातरंज का एक मोहरा जिसे हाथी भी कहते है ।

किश्तीनुमा
वि० [फा०] नाव के आकार का । जिसके दोनों किनारे टेढ़े वा धन्वाकार होकर दोनों छोरों पर कोना ड़ालते हुए मिलें । जैसे—किशीनुमा टोपी ।

किष्किंध
संज्ञा पुं० [सं० किष्किन्ध] १. मैसूर के आसपास के देश का प्राचीन नाम । विशेष—राम के समय़ में यह देश बिलकुल जंगल था और यहाँ का राजा था । २. एक पर्वत जो किष्किध देश में है ।

किष्किंधा
संज्ञा स्त्री० [सं०किष्किन्धा] १. किष्किध पर्वतश्रेणी । २. किष्किध पर्वत की गुफा । ३. रामायण का एक कांड़ जिसमें किष्किधा संबंधी राम का चरित्र वर्णीत है ।

किष्किंघ्य
संज्ञा पुं० [सं० किष्किन्ध्य] दे० 'किष्किध' [को०] ।

किष्किंध्या
संज्ञा स्त्री० [सं०किष्किन्ध्या] दे० 'किष्किधा ' [को०] ।

किष्कु (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. २४ या ४२ अंगुल का परिमाण । २. बित्ता । बालिश्त । बिलांद । ३. लंबाई नापने का एक पैमाना [को०] ।

किष्कु (२)
वि० २. घृण्य । गईणीय । २. बुरा (को०) ।

किष्कुपर्वा
संज्ञा पुं० [सं०किष्कुपर्वन्] १. ईख गन्ना । २. नरकट । ३. बाँस [को०] ।

किष्णा पु
संज्ञा पुं० [सं० कुष्ण] दे० 'कृष्णा' । उ०— किष्णा विरह गोपिका भई व्याकुल सु विकल मन ।—पृ० रा०, २ । ३४८ ।

किस (१)
सर्व० [सं० कस्य] 'कौन' का वह रूप जो उसे विभक्ति लगने के पहले प्राप्त होता है । जैसे—किसने, किसको, किसमें इत्यादि ।

किस (२)
वि० 'कौन का वह रूप जो उसे उस समय प्राप्त होता । है जब उसके विशेष्य में विभक्ति लगाई जाती है । जैसे, किस व्याक्ति को, किस वस्तु में । विशेष—इस शब्द के अंत में जब निश्चयार्थक 'ही' लगता है, तब उसका रूप 'किसी' हो जाता है ।

किसत पु
संज्ञा स्त्री० [सं० किस्त] दे० 'किस्त' । उ०— च्यार किसत कीधी चलू ढ़िकखण हंदै राह । —रा०, रु० पृ०, ३५० ।

किसती पु
संज्ञा स्त्री० [फा० किश्ती] दे० 'किश्ती' ।

किसन पु
संज्ञा पुं० [सं० कृष्ण] दे० 'कृष्ण' । उ०— राम किसन कित्ती सरस कहन लगे बहु बार । छुछ्छ आव कवि चंद की सिर चहुवाना भार ।—पृ० रा०, २ । ५८५ । यो०.—किसन दीपायन=कृष्णा द्बैपायन अर्थात् व्यास । उ०— बालमीक रिषराज किसन दीपाय़न धारिय़ । —पृ० रा०, २ । ५८६ ।

किसनई
संज्ञा स्त्री० [हि० किसान+ई] (प्रत्य०) किसान का काम । किसानी । खेती ।

किसना पु (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० कृष्णा] कृष्णा नाम की दक्षिण की एक नदी । उ०—भीमा धुनी पयस्वनी गोदावरी गहीर । ऊँनत भद्रा पूरणा किसना निरसल नीर ।—बाँकी ग्रं० भा०, ३. पृ०, ७३ ।

किसना पु (२)
वि० स्त्री० [सं० कृष्णा] काली । अँधेरी । उ०—उर नभ जितै न ऊगमै, औ संतोष अदीत नर तिसना किसना निसा, मिटे इतै नैह मीत । बाँकी०, ग्रं०, भा०, ३, पृ०, ५४ ।

किसनू पु
संज्ञा पुं० [सं० कृष्ण] कृष्ण । वासुदेव ।

किसब पु
संज्ञा पुं० [अ० कस्ब] १. रोजगार । व्यवसाय । २. कारीगर । कला कौशल । उ०— चाकरी न आकरी न खेती न बनिज भीख जानत न कूर कछू किसब कवारू है ।—तुलसी (शब्द०) ।

किसबत
संज्ञा स्त्री० [अ० किसबत] १. एक थैली जिसमें नाई और जरहि अपने उस्तरे, केची आदि औजार रखते है । २. पोशाक । उ०—रुपा और सौना तुँ एक बार देखत । अकड़ता है क्यों पहन जर तार किसबत । —दक्खिनी०, पृ०, २५५ ।

किसम (१) †
संज्ञा स्त्री० [अं० कसम] दे० 'किसम' ।

किसम (२) †
संज्ञा स्त्री० [अ० किस्म] दे० 'किस्म' । यौ०.,—किसम किसम का=भाँति भाँति का । अनेक प्रकार का ।

किसमत
संज्ञा स्त्री० [अ० किस्मत] दे० 'किस्मत' ।

किसमिस
संज्ञा पुं० [फा० किशमिश] दे० 'किशमिश' ।

किसमिसी
वि० [फा० किशमिशी] दे० 'किशमिशी' ।

किसमी पु
संज्ञा पुं० [अ० कसबी] श्रमजीवी । कुली । मजदूरा । उ०—किसमी, किसान, कुलबनिक, भिखारी, भाट, चाकर, चपल, नट, चोर, चार चेटकी ।—तुलसी (शब्द०) ।

किसल
संज्ञा पुं० [सं०] 'किसलय' । उ०—नव किसल धनुक जनु कनक बेलि । तिरि चलिय जमुन जल कदम केलि । लटके सुबाल बैनिय सुरंग । सोभै सु दुत्ति विच जल तरंग ।—पृ० रा०, २ ।३६४ ।

किसलय
संज्ञा पुं० [सं०] दल । नवपल्लव । नया पत्ता ।

किसलै पु
संज्ञा पुं० [सं किसलय] दे० 'किसलय' । उ०—कंचन गुच्छ विंचित्र सुच्छ जहँ किसलै लाल लखाहीं ।—श्यामा०, पृ० १९८ ।

किसा पु
वि० [सं० कीदृश (कीदृशक?), प्रा० किसउ] दे० 'कैसा' । उ०—दिन दिन जोबन तन खिसइ, लाभ किसा कउ लेसि ।— ढोला दु० १७७ ।

किसान (१)
संज्ञा पुं० [सं० कृषाण प्रा० किसान] १. कृषि या खेती करनेवाला । खेतिहर । २. गाँव में नाई, बारी आदि जिनके घर कमाते हैं उन्हे किसान कहते हैं ।

किसान (२)पु
संज्ञा स्त्री० [सं० कृशानु] आग । ज्वाला । उ०—भूपति के सुनि के बचन, उर में उठी किसान । उठी सभा मृग सिंह ज्यों बुल्लिव नहीं जुबान ।—प० रासों० पृ० ११९ ।

किसानी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० किसान] खेती । कृषि कर्म । किसी का काम । क्रि० प्र०— करना ।—होना ।

किसानी (२)पु
वि० कृषि संबंधी । खेती से संबंध रखनेवाला ।

किसम †
संज्ञा स्त्री० [अ० किस्म] दे० 'किस्म' ।

किसी (१)
सर्व०, वि० [हिं० किस+ ही] हिंदी के प्रश्नार्थक क' शृंखला का वह रूप जो उसे विभक्ति लगने से पहले प्राप्त होता है । जैसे, किसी ने, किसी को, किसी पर आदि ।

किसी (२)
वि० हिंदी के प्रशनार्थक 'क' शृंखला का वह रूप जो उसे उस समय प्राप्त होता है जब उसके विशेष्य में विभक्ति लगाई जाती है । मुहा.—किसी न किसी=कोई न कोई । कोई एक । एक न एक ।

किसीस पु
संज्ञा पुं० [सं० कीशेश] हनुमान । वानरेश । उ०—करा जोड रूप कीस, साम पाय नाम सीस । बाध चाल महावीर, कदियो किसीस ।—रघु० रुप०, पृ० १९५ ।

किसु पु
सर्व० [सं० कल्य, प्रा० कीस, अप किसु] किसका । उ०— नारद कर उपदेश सुनि कहहु बसेउ किसु गेह ।—मानस, १ ।७८ ।

किसुन पु †
संज्ञा पुं० [सं० कृष्ण] श्री कृष्ण ।

किसू पु †
सर्व० [हिं० किसु] दे० किसी' । उ०—अरे हमना किसू के हैं अगर कोई ना हमारा है ।—संत तुरसी०, पृ० ३३ ।

किसेन
संज्ञा पुं० [सं० कृषाण हिं० किसान] दे० 'किसान' । उ०— घण माल ज्युँही असुराण घड़ा । खित आवृत मेन किसेन खड़ा ।—रा०, रू०, पृ० ३३ ।

किसोरि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० किशोरी] दे० 'किशोरी' । उ०— सुनि निकसी नव लाडिली श्री राधा राज किसोरि ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३५३ ।

किसोरी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० किशोरी] दे० 'किशोरी' ।

किस्त
संज्ञा स्त्री० [अ० किस्त] १. ऋण या देन चुकाने का वह ढंग जिसमें सब रुपया एकबारगी न दे दिया जाय, बल्कि उसके कई भाग करके प्रत्येक भाग के चुकाने के लिये अलग अलग समय निश्चित किया जाय । जैसे,—सब रुपए एक साथ न दे सको तो किस्त कर दो । यौ०.—किस्तबंदी । क्रि० प्र०— करना ।—बाँधना । २. किसी ऋण या देन का वह भाग जो किसी निश्चित समय पर दिया जाय । जैसे,—उसके यहाँ एक किस्त लगान बाकी है । यौ०.—किस्तवार । क्रि० प्र०— अदा करना ।—चुकाना ।—देना । ३. किसी ऋण या देन के किसी भाग के चुकाने का निशिच्त समय । जैसे,—दो किस्ते बीत गईँ अभी तक रुपया नहीं आया ।

किस्तबंदी
संज्ञा स्त्री० [अ० किस्त+फा० बंदी] थोड़ा थोड़ा करके रुपया अदा करने का ढंग ।

किस्तवार
क्रि० वि० [फा० किस्तवाक] १. किस्त के ढंग से । किस्त किरत करके । २. हर किस्त पर । जैसे,—वह किस्तवार नजराना लेता है ।

किस्ती पु
संज्ञा [य़फा० किश्ती] दे० 'किशती' । उ०—साहिब किस्ती चही, पठाई मुनसी 'कसबी' ।—प्रेमघन, भा०२, पृ० ४१५ ।

किस्न पु
संज्ञा पुं० [सं० कृष्ण] दे० 'कृष्ण' । उ०—किस्न कै करा चढ़ा ओहि माथे । तब सो छूट अब न नाथे ।—जायसी ग्रं०, (गुप्त) पृ० १९६ ।

किस्म
संज्ञा पुं० [अ० किस्म] १. प्रकार । २. भेद । भांति । तरह । ३. ढंग । तज । चाल । जैसे,—वह तो एक अजीब किस्म का आदमी है ।

किस्मत
संज्ञा स्त्री० [अ० किस्मत] १. प्रारब्ध । भाग्य । नसीब । करम । तकदीर । उ०—यह न थी हमारी किस्मत कि विसाले यार होता । अगर और जीते रहते यही इंतजार होता ।— कविता कौ० । भा०४, पृ० १९ । मुहा०.—किस्मत आजमाना=भाग्य की परीक्षा करना । किसौ कार्य को हाथ में लेकर देखना, कि उसमें सफलता होती है या नहीं । उ०—हम कहाँ किस्मत आजमाने जायँ । तू ही जब खजर आजमा न हुआ ।—गालिब० । किस्मत उलटना= भाग्य खराब हो जाना । सिम्त खुलना=भाग्य अच्छा होना । किस्मत चमकना=भाग्य प्रबल होना । किस्मत जगना या जागना=भाग्य का अनुकूल होना । किस्मत पलटना=भाग्य में परिवर्तन होना । प्रारब्ध का अच्छे से बुरा या बुरे से अच्छा होना । किस्मत फिरना=दे० 'किस्मत पलटना' । किस्मत फूटना=भाग्य का बहुत मंद हो जाना । किस्मत लड़ना= (१) भाग्य की परीक्षा होना । जैसे,—इस समय कई आदमियों की किस्मत लड़ रही हैं, देखें किसे मिलता है । (२) भाग्य खुलना = प्रारब्ध अच्छा होना । जैसे,—उनको किस्मत लड़ गई वे इतने उँचे पद पर पहुँच गए । किस्मत का लिखा पूरा होना = भाग्य का फल मिलना । यौ.—किस्मतवाला = भाग्यवान् । बड़े भाग्यवाला । किस्मत का धनी = जिसका भाग्य प्रबल हो । भाग्यवान् । किस्मत् का हेठा = जिसका भाग्य मंद हो । अभागा । बदकिस्मत । किस्मत का फेर = भाग्य की प्रतिकूलता । किस्मत का लिखा = वह जो भाग्य में लिखा है । करमरेख । २. किसी प्रदेश कावह भाग जिसमे कई जिले हों और जो एक कमिश्नर के अधीन हो । कमिश्नरी ।

किस्मतवर
वि० [अ० किस्मत+फा० वर] भाग्यवान् । उ०—इस दिनिया में आज कौन मुझसे बढ़कर है किस्मतवर ।—ठंड़ा०, पृ० २५ ।

किस्सा
संज्ञा पुं० [अ० किस्सह] १. कहानी । कथा । आख्यान । क्रि० प्र०— कहना ।—सुनना ।—सुनाना, इत्यादि । यौ०.—किस्सा कहानी = झूठी कल्पित कथा । २. वृत्तांत । समा- चार । हाल । जैसे,—उनका किस्सा बड़ा भारी है । क्रि० प्र०— कहना ।—सुनना । मुहा.—कुस्सा कोताह या मुख्तसर = (क्रि० वि०) थोड़े में संक्षेप । में । सारांश । किस्सा नाधना = अपनी बीती सुनाना । अपने कष्ट का वृत्तांत आरंभ करना । जैसे—अब चलो, वे अपना किस्सा नाधेगे तो रात हो जायगी । किस्सा बढ़ाना = किसी वृत्तांत का विस्तार से कहना । ३. कांड । झगड़ा । तकरार । मुहा०.—किस्सा खड़ा करना = कांड खड़ा करना । झगड़ा खड़ करना । किस्सा खतम करना, चुकाना, तमाम करना या पाक करना = (१) झगड़ा मिटाना । झंझट दूर करना । (२) किसी वस्तु या विषय को समूल नष्ट करना । किस्सा खतम होना, चुकना, तमाम या पाक होना = (१) झगड़ा मिटना । (२) किसी वस्तु या विषय का समुल नष्ट होना । किस्सा मोंल लेना = झगड़ा खड़ा करना । किस्सा नाधना = झगड़ा खड़ा करना ।

किस्साकहानी
संज्ञा पुं० [हिं० किस्सा+ कहानी] कल्पित बात । झुठी या मनगढंत बात । निरर्थक चींज ।

किस्सागो
संज्ञा पुं० [फा० किस्सागो] १. कहानी कहनेवाला । २. कहानीकार । कथाकार । उ०—प्रेमचंद पेदायशी किस्सा- गो थे ।—प्रेम० और गोर्की, पृ० २१७ ।

किस्सागांई
संज्ञा स्त्री० [फा किस्सागोई] कहानी कहना । उ०— उनकी वर्णनात्मक प्रवृत्ति में कथककड़ा स्वभाव में किस्सागोई में परिवर्तन आता गया है ।—प्रेम० और गोर्की, पृ० १९८ ।

किह पु (१)
सर्व० [सं० क?] कोई । उ०—दुज खत्रि बेस सुद्रहु वरन तजै न किह तक्कत नयन । बीसल नारद रह भय अकलि लह न कहु निस दिं ।—पृ० चयन रा०, १ ।४१३ ।

किह पु (२)
अव्य० [आ कहँ—कुहिं०, कहो] दे० 'कहौ' । उ०—ते देखी तिण पूछियउ, कुण ए राजकुमारि । किह पीहर किह सासरउ, विगत—इ कहइ विचारि ।—ढोला०, दु० ८९ ।

किहकल
संज्ञा पुं० [देश०] एक चिड़िया ।

किहाँ पु †
क्रि० वि० [हिं०] के यहाँ । उ०—वेदे तीरथ बरत करावे अनबोले किहां धावै । चलते चलते पाँव गिराना रोक्त घर के आवै ।—सं०, दरिया, पृ० १२४ ।

किहिं (१) पु
सर्व० [हिं०] दे० 'किसी' । किसे । उ०—कान्ह के बल मोसौं करी खाती । हरिहे कहा, गोप किहीं बाती ।—नंद०, ग्रं०, पृ० १९१ ।

किहीं (१) पु
सर्व० वि० [सं० कम्+ हिं०] किसको किसो उ०—काह्य न करै अबला प्रबल, किहिं जग काल न खाय ।—ह० रासो, पृ० २८ ।

किहि
सर्व० [हिं०] दे० 'किस' । उ०—तुच्छ; अल्प, लव, सूक्ष्म, तनु, निपट, किशोदर तोर । कहिं बलि एतों मान सचि, राख्यो है किहि ओर ।—नंद०, ग्रं०, पृ० ९७ ।

किहुनी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'कुहनी' ।

कींगरी
स्त्री० [हिं० किंगरी] दे० 'किंगिरी' । उ०—बाजत किंगरी निरबना, सुनि सुनि चित भइ बाबरी, रीझे मन मुल्तान ।—कबीर श०, भा०३, पृ० १९ ।

किहुनी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'कुहनी' ।

कींगरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० किंगरी] दे० 'किंगरी' । उ०—बाजत किंगरी निरबना, सुनि सुनि चित भइ बावरी, रीझे मन मुल्तान ।—कबीर श०, भा०३, पृ० १९ ।

कींच
संज्ञा पुं० [हिं० कीच] दे० 'कीच' । उ०—कुमति कीच चेला भरा गुरू जान जल होय । जनम जनम का मोरचा, पल में डारै धोय ।—कबीर सा०, सं०, भा०१, प० १० ।

की (१)
प्रत्य० [हिं० का] हिं० विभक्ति 'का' का स्त्री० । जैसे,— उसकी गाय ।

का (२)
क्रि० स० [सं० कृत, प्रा०, किय] हिं० 'करना के भूतकालिक रूप 'किया' का स्त्री० । जैसे,—उसने बड़ी सहायता की ।

की (३)
अव्य० [हिं० 'कि' का विकृत रूप] १. क्या । उ०—अपयश योग की जानकी, ममि चारों की कान्हि ।—तुलसी (शब्द०) २ या । या तो । उ०—को मुख पट दीन्हैं रहैं, की यथार्थ भाखंत ।—तुलसी (शब्द०) ।

की (४)
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. वह पुस्तक जिसमें किसी ग्रंथ या पुस्तक के कठिन शब्दों के अर्थ या उनकी व्याख्या की गई हो । कुंजी २. चाबी । ताली ।

कीक
संज्ञा पुं० [अनु०] चीत्कार । चीख । चिल्लाहट । शोरगुल । क्रि० प्र०— देना ।—मारना । उ०—तहुँ काक बिपुल शृगाल गीध बलाक आमिष भखत हैं । योगिनी जमाति कारल काकै देत पल अभितखत हैं ।—रघुराज (शब्द०) ।

कीकट
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० कीकटी] १. मगध देश का प्राचीन वैदिक नाम । विशेष—तंत्र के अनुसार चरणाद्रि (चुनार) से लेकर गुद्धकुट (गिद्धौर तक कीकट देश है । मगध उसी के अंतर्गत है । २. [स्त्री० कीकटी] घोड़ा । ३. प्राचीन काल की एक अनार्य आदि जो कोकट देश में बसती थी ।

कीकट (२)
वि० [वि० स्त्री० कीकटी] १. निर्धन । गरीब । २. लौयो । कृपण । कजुंस ।

कीकना
क्रि० अ० [अनु०] की की करके चिल्लाना । हर्ष, क्रोध या भयसूचक शब्द करना । चीत्कार करना ।

कीकर
संज्ञा पुं० [सं० किङ्कराल] बबूल का पेड़ । उ०—छल कीकर कूँकाटि के बाँधो धीरज बार ।—चरण० बानी, पृ० ९ ।

कीकरी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० कीकर] एक प्रकार । कीकर या बबूल जिसकी पत्तियाँ बहुत महीन महीन होती हैं ।

कीकरी (२)
संज्ञा स्त्री० [हं० कँगूरा] एक प्रकार की सिलाई जिसमें कपड़े को कतरकर लहरदार या कँगूरेदार बनाते हैं । क्रि० प्र०— काढ़ना ।—काटना ।—इनाना ।

कीकश
संज्ञा पुं० [सं०] चांडाल (को०) ।

कीकस (१)
संज्ञा पु० [सं०] १. हड्डी । २. एक कीड़ा । (को०) ।

कीकस (२)
वि० [सं०] कठोर । दृढ़ (को०) ।

कीकसमुख
संज्ञा पुं० [सं०] पक्षी । चिड़िया (को०) ।

कीकसास्य
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'कीकसमुख' (को०) ।

कीका पु
संज्ञा पुं० [सं० कीकट] घोड़ा ।

कीकान †
संज्ञा पुं० [सं० केकाण] १. केकाण देश जो किसी समय घोड़ों के लिये प्रसिद्ध था । २. इस देश का घोड़ा । ३. घोड़ा । अश्व । उ०—हरि जान लसे कीकान इमि उभउ कान उन्नत करे ।—गोपाल (शब्द०) ।

कीगिनी पु
संज्ञा स्त्री० [अनु० या देश०] पक्षियों की बोलि । उ०— प्रथम बानि कीगिनी जो होई । अंडज्ञ बानि समानी सोई ।— कबीर० सा०, पृ० ८८० ।

कीच
संज्ञा पुं० [सं० कच्छ] कीचड़ । कर्दम । पंक । उ०—(क) गगन चढ़ै रज पवन प्रसंगा । कीचहिं मिलै नीच जल संगा । तुलसी (शब्द०) । (ख) पाथर डारे कीच में, उछरि बिगारे अंग ।—(शब्द०) ।

कीचक
संज्ञा पुं० [सं०] १. बाँस, जिसके छेद में घुसकर वायु हू हू शब्द करती है । २. पोला बाँस (को०) । ३. राजा विराट का साला और उसकी सेना का नायक । विशेष—जब पांडव लोग राजा विराट के यहाँ अज्ञातवास करते थे, उस समय कीचक ने द्रौपदी से छोड़छाड़ की थी । इसी पर भीम ने उसे मार डाला था । यौ०—कीचकजित् = भीम ।

कीचड़
संज्ञा पुं० [हिं० कीच+ड़ (प्रत्य०)] १. गीली मिट्टी पानी मिली हुई धूल या मिट्टी । कर्दमपंक । मुहा०—कीचड़ में फँसना = असमंजस में पड़ना । संकट में पड़ना । कठिनाई में पड़ना । २. आँख का सफेद मल जो कभी कभी आँख के कोने पर आ जाता है । क्रि० प्र०— आना ।—निकलना ।—बहना ।

कीचम पु
वि० [हिं० कीच+ प्रा० म (प्रत्य०)] गंदी । मलिन । उ०—सुंदर सदगुरु ब्रह्म मय परि शिष कीचम दृष्टि । सूधी वोर न देखई देषै दर्पन पृष्टि ।—सुंदर ग्रं०, भा०१, पृ० ६७२ ।

कीचर पु †
संज्ञा पुं० [हिं० कीचड़] दे० 'कीचड़' उ०—चोया चित्रअरगजा आसा, कुमकुम कुमति बिसार । धर धर धूर कूर सम काढ़ौ, करमन कीचर धोरी ।—घट०, पृ० २८० ।

कीट (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. रेँगने या उड़ानेवाला क्षुद्र जंतु । कीड़ा । मकोड़ । विशेष—सुश्रुत ने कीटकल्य में इनके जो नाम गिनाए है और उनके काटने और डक मारने आदि से जो प्रभाव मनुष्य के शरीर पर पड़ता है, उसके विचार से उनके चार भेद किए है? बातप्रकृति, जिनके काटने आदि से मनुष्य के शरीर में वात का प्रकोप होता है । पित्तप्रकृति, जिनके काटने से पित का प्रकोप होता है । श्लेष्मप्रकृति, जिनके काटने से कफ कुपित होता है । त्रिदोषप्रकृति, जिनके काटने से त्रिदोष होता है । अगिया (अग्निनमा), ग्वालिन (आवर्तक) आदि को वातप्रकृति; भिड़ भौरा, ब्रह्मनी (ब्रह्माणिका), पताबिछिया या छिउँकी (पत्रवृशिचक), कनखजुरा (शतपादक) मकड़ी, गदहला (गर्दभी) आदि को पित्तप्रकृति तथा काली गोह आदि को श्लेष्मप्रकृति लिखा है । ऊपर की नामावली से स्पष्च है कि कीट शब्द के अंतर्गत कुछ रीढ़वाले जंतु भी आ गए हैं, पर अधिकतर बिना रीढ़वाले जतुओं ही को कीट कहते है । पाशचात्य जीवततत्वविदों ने इन बिना रीढ़वाले जतुओं के बहुत से भेद किए हैं, जिनमें कुछ तो आकारपरिवर्तम के विचार से किए गए हैं, कुछ पंख के विचार से और कुछ मुखाकृति के विचार से । हमारे यहा कीट शब्द के अंतर्गत जिन जीवों को लिया गया हैं, वे सब ऊष्मज और अंडज हैं । ऊष्मज तो सब कीट हैं, पर सब अंडज कीट नहीं हैं । जैसे, पक्षी मछली आदि को कीट नहीं नहीं कह सकते । २. हीनता या तुच्छाताव्यंजक शब्द । जैसे, छिपकीट = तुच्छ हाथी । पक्षिकीट ।

कीट (२)
वि० कड़ा । कठोर [को०] ।

कीट (३)
संज्ञा पुं० [सं० किट्ट] जमी हुई मैल । मल । क्रि० प्र०— जमना ।—लगना ।

कीटक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. कीड़ा । २. मागध जाति का चारण [को०] ।

कीटक (२)
वि० कड़ा । कठोर ।

कीटघ्न (१)
संज्ञा पुं० [सं०] गंधक [को०] ।

कीटघ्न (२)
वि० कृमिनाशक । कीटाणुनाशक ।

कीटज (१)
संज्ञा पुं० [सं०] रेशम । रेशमी वस्त्र । कौशेय [को०] ।

कीटज (१)
वि० कीट से उत्पन्न [को०] ।

कीटजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] लाक्षा । लाख [को०] ।

कीटनामा, कीटपादिका, कीटपादी
संज्ञा स्त्री० [सं०] लाख [को०] ।

कीटभृंग
संज्ञा पुं० [सं० कीटभृङ्न] एक न्याय, जिसका प्रयोग उस समय होता है जब दो या कई वस्तुएँ बिलकुल एक रूप हो जाती हैं । उ०—भइ गति कीटभृंग की नाई । जहँ तहँ मैं देखे रघुराई ।—तुलसी (शब्द०) । विशेष—भृंगया गुहांजनी (जिसे बलमी और भँवरी भी कहते हैं) के विषय में यह प्रवाद प्रसिद्ध है कि वह दूसरे कीड़ों को अपनी बिंल में पकड़ ले जाती है और उन्हें अपने रूप का कर लेती हैं ।

यौ०—कीटभृंगन्याय ।

कीटमणि
संज्ञा स्त्री० [सं०] जुग । खद्योतनू ।

कीटमवार
संज्ञा पुं० [सं० कीहँ, हिं० अवारना] एक संप्रदाय का नाम । उ०—पशिचम ओर शारदा मठ कीटमवार संप्रदाय का क्षेत्र—सिद्धेश्र देवता ।—कबीर मं०, पृ० ६२ ।

कीटमाना
संज्ञा स्त्री० [सं० कीटमातृ] लाख [को०] ।

कीटाणु
संज्ञा पुं० [सं०] अत्यंत छोटा कीड़ा । सुक्ष्मतम कीट । ऐसे छोटे कीड़े जो सूक्ष्मवीक्षण यंत्र से दिखाई पड़ें या उनसे भी न देखे जा सकें । विशेष—ये छोटे छोटे कीड़े आँखों से दिखाई नहीं देते और संख्या तीत परिमाण में पाए जाते हैं । सूक्ष्मदर्शक यंत्र से ही इन्हें देखा जा सकता है । पशिचमी डाक्टरों ने रोगों का कारण किटाणुओं को माना हैं । हैजा, ताऊन आदि रोग इन्हीं के कारण फैलते हैं ।

कीटावपन्न
वि० [सं०] १. कीटाग्रस्त । कीटयुक्त । २. कीड़ा द्वारा खाया हुआ [को०] ।

कीटिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. क्षु्दर कीट । छोटा कीड़ा । २. तुच्छ प्राणी या जीव [को०] ।

कीटात्कर
संज्ञा पुं० [सं०] वल्मीक । बमौट [को०] ।

कीड़ पु
संज्ञा स्त्री० [सं० क्रीड़ा, प्रा० कीड, कील] दे० 'क्रीड़ा' । उ०—अबही परा समुझि कै काँधे पर दुख भार । खेल कीड़ कित पाइब, जब गवनब ससुरार ।—इंद्रा०, पृ० ४१ ।

कीड़ा
संज्ञा पुं० [सं० कीट, , प्रा० कीड] १. कीट । छोटा उड़ने या रेंगनेवाला जंतु । मकोड़ा । जैसे, कनखजूरा, बिच्छू, भिड़ आदि । यौ०—कीड़ा फतिंगा । कीड़ा मकोड़ा । २. कृमि । सूक्ष्म कीट । मुहा०—कीड़े काटना=चुनचुनाहट होना । बैचैनी होना । चंचलता होना । जी उकताना । जैसे, दम भर बैठे नहीं कि कीड़े काटने लगे । कीड़े पड़ना=(१) (वस्तु में) कीड़े उत्पन्न होना । जैसे,—घाव में कीड़े पड़ना । पानी में कीड़े पड़ना (२) दोष होना । ऐब होना । जैसे—इसमें क्या कीड़ें पड़े हैं जो नहीं लेते । कीड़े लगना=बाहर से आकर कीड़ों का किसी वस्तु को खाने या नष्ट करने के लिये घर करना । जैसे—कपड़े कागज आदि में कीड़े लगना । ३. साँप । ४. जूँ । खटमल आदि । ५. थोड़े दिन का बच्चा ।

काड़ाकीड़ी
संज्ञा स्त्री० [सं० क्रीडाक्रीडित] बच्चों का एक खेल । उ०—सामने गाँव के बच्चे कीड़ाकीड़ी का खेल खेल रहे थे ।—फूलो०, पृ० ८ ।

कीड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० कोड़ा का लध्वर्थक स्त्री०] १. छोटा कीड़ा । २. चींटी । पिपीलिका । उ०—कीड़ी के पग नेवर बाजे सो भी साहब सुनता है ।—कबीर श०, भा० १, पृ० ३९ ।

कीतमिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] जेठी मधु । मुलेठी [को०] ।

कीतब पु
वि० [हिं० कीतौया केतौ] कितना ही । उ०—पूजौ याहि भलौ जौ चाहौ । बिनु माँगौ कीतबु सर गाहौ ।—नंद० ग्रं०, पृ० १९० ।

कीतावा पु
वि० [सं० कीयत्, हिं० कितना] कितने ही । बहुतसे । उ०—हरि बिन सर्व भया हैराना । पढ़ि पढ़ि झकत कीताना ।—राम० धर्म०, पृ० ३७३ ।

कीदउँ पु
अव्य० [हिं० कीधौं] दे० 'कीधौं' ।

कीदृक्ष
वि० [सं०] [वि० स्त्री० कीदृक्षी] कैसा (आकार या प्रकृति में) [को०] ।

कीदृश्, कीदृश
वि० [सं०] [वि० स्त्री० कीदृशी] कैसा (रूप या स्वभाव में) [को०] ।

कीन (१)
संज्ञा पुं० [फा़०] १. घृणा । २. शत्रुता ३. मनोमालिन्य । ४. प्रतिशोध । उ०—हर चार तरफ कारे हसद बुगजो कीन का, देखो जिधर को जा के तमाशा है तीन का ।—कबीर म०, पृ० २२३ ।

कीन (२)पु
वि० [फा० कीनवर] शत्रुता या वैमनस्य रखनेवाला । द्वेषी । उ०—जो कोइ कीन जानिहै मोहीं, तेहिका दूरि बहावौं ।—जग० बानी०, पृ० ११ ।

कीन (३)
संज्ञा पुं० [सं०] मांस [को०] ।

कीन (४)पु †
वि० [हिं० करना क्रिया का भूत कृदंत रूप] किया । किया हुआ ।

कीनखाब
संज्ञा पुं० [फा० कमख्पाव] दे० 'कमखाब' ।

कीनना †
क्रि० स० [सं० क्रीणन] खरीदना । मोल लेना । क्रय करना ।

कीनर पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० कींगिरी] दे० 'कींगरी' । उ०—अनहद ताल पखाउज कीनर स्रोना सुमति बिचारा ।—सं० दरिया, पृ० १५५ ।

कीना
संज्ञा पुं० [फा० कीनह्] द्वेष । बैर । शत्रुता । दुश्मनी । उ०— किबर हौर कीना कर पाक इसते सीना ।—दक्खिनी०, पृ० ५२ । क्रि० प्र०— रखना । यौ०—कीनाकश=द्वेष रखनेवाला । मन में मैल रखनेवाला । कीनापरवर=कीना रखनेवाला । कीनावर=मन मै दुर्भाव या द्धेष रखनेवाला ।

कीनार
संज्ञा पुं० [सं०] दुष्ट या बुरा आदमी [को०] ।

कीनाश (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. यम । मृत्युदेवता । २. एक प्रकार का बानर । ३. कसाई । वधिक [को०] ।

कीनाश (२)
वि० १. गरीब । दरिद्र । आकिंचन । २. छोटा । क्षुद्र । ३. थोड़ा । अल्प । ४. धोखे से मारनेवाला । ५. खेती करनेवाला । ६. क्रूर । निर्दय [को०] ।

कीनास
संज्ञा पुं० [सं० कीनाश] १. यम । यमराज ।—(डिं०) । २. एक प्रकार का बंदर । ३. किसान । खेतिहर ।

कीनिया †
संज्ञा पुं० [फा३. कीनह] कपट रखनेवाला । बैर रखनेवाला ।

कीप (१)
संज्ञा स्त्री० [अ० कीफ़०] वह चोंगी जिसे तंग मुँह के बरतन में इसलिये लगाते हैं जिसमें तेल, अर्क आदि द्रव पदार्थ उसमें ढालते समय बाहर न गिरे । छुच्छी ।

कीप (२)पु
संज्ञा पुं० [डिं०] रस । उ०—कजली वन अलगी घणौ, अलगौ सिंहल दोप । किम इण बन लै केहरी, कुंभा थल रौ छीप ।—बाँकी ग्रं०, भा१, पृ० ३५ ।

कीमत
संज्ञा पुं० [अ० कीरत] [वि० कीमती] वह धन जो किसी चीज के बिकने पर उसके बदलें में मिलता है । दाम । मूल्य । क्रि० प्र०— देना ।—पाना । मुहा०—कीमत चढ़ना या बढ़ना = (१) चीज का मँहगी होना । २. महत्व होना । कीमत उतरना = १. चीज का सुलभ या सस्ता होना । २. महत्व घटना । कीमत ठहरना = मूल्य निश्चित होना । दाम तै होना । कीमत ठहराना = मुल्य निश्चित करना । दाम तै करना । कीमत चुकना = (१) दाम देना । (२) दे० कीमत ठहराना' । कीमत लगाना = दाम आँकना । (खरीदनेवाले का) दाम कहना ।

कीमती
वि० [अ० कीमत + फा० ई (प्रत्य)] अधिक दामों का । बहुमूल्य ।

कीमा
संज्ञा पुं० [अ० कीमह्] बहुत छोटे छोटे टुकड़ों में कटा हुआ गोश्त (खाने के लिये) । क्रि० प्र०— करना ।—बनाना । मुहा०—कीमा करना = किसी चीज के बहुत छोटे छोटे टुकड़े करना । उ०—चाहूँ तो अग्नि में दहन कर दूँ चाहूँ तो दीवार में चुन दूँ = चाहूँ तो टुकड़े टुकड़ें काटकर कीमा करूँ और यदि चाहूँ तौ बटुए में चुरा डालूँ ।—कबीर मं०, पृ० ११६ ।

कीमिया
संज्ञा स्त्री० [अ० कीमियह्] १. रासायनिक क्रिया । रसायन । २. सोना चाँदी बनाने की विद्या । ३. वह रसायन जो अक्सीर या अमोघ हो । ४. कार्य सिद्धकरनेवाली युक्ति । यौ०—कीमियागर ।

कीमियागर
वि० [अ० कीमियह+ फा० गर (प्रत्य०)] १. रसायन बनानेवाला । रासायनिक परिवर्तन में प्रवीँण । २. सोना चाँदी बानानेवाला । ३. कार्यकुशल ।

कीमियागरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० कीमियागर+ ई (प्रत्य०)] १. रसायन बनाने की विद्या । २. सोना चाँदी बनाने की विद्या ।

कीमीयासाज
वि० [अ० कीमियह्+ फा० साज] दे० 'कीमियागर' ।

कीमुख्त
संज्ञा पुं० [अ० कीमुख्त] गधे या घोड़े का चमड़ा जो हरे रंग का और दानेदार होता है । इसके जूते बरसात में पहने जाते हैं ।

कीमुख्ती
वि० [अ० कीमुख्त+ फा० ई (प्रत्य०)] कीमुख्त का बना हुआ ।

कीर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. शुक । सुग्गा । तोता । २. ब्याध । बहेलिया । ३. कश्मीर देश । ४. कश्मीर देशवासी । ५. मांस (को०) ।

कीर पु (२)
संज्ञा पुं० [हिं० केवट] कछुवा । केवट । उ०—कड़िया खटकी जाल की आइ पहूँचा कीर ।—कबीर सा० सं०, पृ० ७५ ।

कीरक
संज्ञा पुं० [सं०] १. उपलब्धि । प्राप्ति । २. एक बुद्धा । ३. एक वृक्ष का नाम [को०] ।

कीरणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक नदी का नाम [को०] ।

कीरत पु
संज्ञा स्त्री० [सं० कीर्ति] दे० 'कीरति' । उ०—बलभद्र । कीरत की लीक सुकुमार हैं ।—श्याम०, पृ० २९ ।

कीरतन
संज्ञा पुं० [सं० कीतन] दे० 'कीर्तन' ।

कीरति पु
संज्ञा स्त्री० [सं० कीर्ति] १. दे० 'कीर्ति' । २. । उ०— कुंवरि मनोहरि विजय बड़ि, कीरति अति कमनीय । पावनहार बिरंजि जनु रचेउ न धनु दमनीय ।—तुलसी (शब्द०) ।२. राधिका की माता 'कौर्ति' । यौ०—कीरतिकुमारी = राधा । उ०—पीतपट नंद जसुमति नवनीत दियौ कीरतिकुमारी सुखारी दई बाँसुरी ।—रत्नाकर, भा०२, पृ० । कीरतिनंदिनी = राधा । उ०—रसिक रासि को रूप, तूही कीरतिनंदिनी । रसिया ब्रज को भूप, करि किनी सुख चौ चंदिनी ।—ब्रज० ग्रं०, पृ० २ ।

कीरतनिया
संज्ञा पुं० [हिं० कितनिया] दे० 'कीर्तनिया' ।

कीरम पु
संज्ञा पुं० [सं० कृमि, हिं०, किरम] दे० 'कृमि' उ०— करम किए कीरम हुआ नैन बिहूना सोय ।—सं० दरिया, पृ० १७१ ।

कीरशब्दा
संज्ञा स्त्री० [सं०] चतुर्दश ताल का एक भेद जिसमें तीन आघात, एक खाली और फिर तीन आघात होते हैं ।

कीरा पु †
संज्ञा पुं० [हिं० कीड़ा] दे० 'कीड़ा' । उ०—बर मागत मन भइ नहिं पीरा । गरि न जीहु मुह परेउ न कीरा ।— मानस, २ ।१६२ ।

कीरात
संज्ञा पुं० [अ० कीरात] चार जौ की तौल । किरात ।

कीरि
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्रुति । प्रशसा । २ स्तोत्र [को०] । यौ०—कीरिचोदन = प्रशंसा की प्रेरणा करना । प्रशंसक को बढ़ावा देना ।

कीरिभारा
संज्ञा स्त्री० [सं०] जूँ [को०] ।

कीरी
संज्ञा स्त्री० [सं० कीट अथवा कीटिका] १. महीन कीड़ेछोटे कीड़ी जो गेहूँ, जौ या चने की बाल के भीतर जाकर उसका दूध खा जाते हैं । २. चींटी । कीड़ी । उ०—साई के सब जीव है कीरी कुंजर दोय ।—कबीर (शब्द०) । ३. बहुत छोटे कीड़े । ४. व्याध या बहेलिया की स्त्री ।

कीर्त पु
संज्ञा स्त्री० [सं० कीर्ति] दे० 'कीरति' । उ०—कीर्त बधाऊँ तों नाम न मेरा काहे झुटा पछताऊँ घेरा ।—दक्खिनी०, पृ० १०५ ।

कीर्ण
वि० [सं०] १. फैला हुआ । बिखरा हुआ । उ०—बंधु विदा दो उसी भाव से तुम हमें वन काँटे बने कीर्ण कुंकुम हमें ।—साकेत, पृ० १४४ । २. ठका हुआ (को०) । ३. धारण किया हुआ (को०) । ४. स्थिति (को०) । ५. आहत । चोट खाया हुआ (को०) ।

कीर्णि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बिखेरने या फैलानेवाली स्त्री । २. आच्छा दन या गोपन करनेवाली स्त्री । २. आघात करनेवाली स्त्री [को०] ।

कार्णित
वि० [सं० कीर्ण] अंकित । उत्कीर्ण । उ०—जहाँ तुम्हारे चरण—कमल, चलकर कीर्णित कर जातै है ।—कुकुम, पृ०, ४९ ।

कीर्तन
संज्ञा पुं० [सं०] १. कथन । यशवर्णन । गुणकथन । २. राम संबंधी या कृष्णलीला संबंधी भजन और कथा आदि । यौ०—हरिकीर्तन । नगरकीर्तन । ३. कथन । वर्णन । जैसे, गुण कीर्तन । ४. मंदिर । भवन (को०) ।

कीर्तनकार
संज्ञा पुं० [सं० कीतनकार] कीर्तन करनेवाला भक्त ।

कीर्तना
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कथन । वर्णन । २. प्रसिद्धि । ख्याति [को०] ।

कीर्तनिया
संज्ञा पुं० [सं० + हिं० इया (प्रत्य०)] कृष्ण लीला संबंधी भजन और कथा सुनानेवाला । कीर्तन करनेवाला । उ०— कीर्तनिया सो कोस बिस, संन्यासी सों तास ।— कबीर सा०, पृ० ९२ ।

कीर्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०कीति] १. पुण्य । २. ख्याति । बड़ाई । नामवरी । नेकनामी । यश । यौ०— कीर्तिस्तभ । यश । यौ०— कीर्तिस्तभ । ३. सीता की एक सखी का नाम ४. आर्या छंद के भेदों में से एक । इसमें २४ गुरू और १९ लदु वर्ण होते हैं५. दशाक्षरी वृत्तों में से एक वृत्त, जिसके प्रत्येक चरण में तीन सगण और एक गुरू होता है । जैसे, — शशि है सकलंक खरों री । अकलंकित कीर्ति किशोरी । ६. इकादशाक्षरी वृत्तों में से एक वृत्त, जो इंद्रवज्र के से बनता हैं । इसके प्रथम चरण का प्रथम अक्षर लघु होता है और शेष तीन चरणों के प्रथमाक्षर गुरु होते हैं । जैसे— मुकुंद राधा रमणै उचारो । श्री रामकृष्ण भजिबो सँवारो । गोपाल गोबिंदहिं ते पसारो । ह्वै हैं जबै सिधु भवै उबारो । ७. प्रसाद । ८. शब्द । ९. दीप्ति । १०. मातृका विशेष । ११. विस्तार । १२. कीचड़ । १३. एक ताल (संगीत) । १४. दक्ष प्रजापति की कन्या और घार्म की पत्नी ।

कीर्तित
वि० [सं० कीर्तित] [वि० स्त्री० कीर्तिता] १. कथित । कहा हुआ । वर्णित । २. जिसका यश गाया गया हो । प्रशंसित । ३. कुख्यात । ४. कुख्यात (को०) ।

कीर्तितव्य
वि० [सं०] कीर्तन योग्य (को०) ।

कीर्तिदा
वि० [कीर्ति ( =यश)+ दा ] यशोदा ।

कीर्तिमंत
वि० [सं० कीर्तिमत्] दे० ' कीर्तिमान' । उ०— प्रथमहिं कीर्तिमंत सुत भयौ । बसुदेव ताहि लयै ही गयौ । — नंद० ग्रं० पृ० २२२ ।

कीर्तिमान्
वि० [सं० कीर्तिमत्] यशस्वी । नेकनाम । मशहूर । विख्यात ।

कीर्तिलेखा
संज्ञा स्त्री० [सं० कीर्तिलेखा] कीर्ति की रेखा या चिहन । उ०— और आज गंगा के उत्तरी तट पर विदेह, वज्जि, लिच्छवि और मल्लों का जो गणतंत्र अपनी ख्याति से सर्वोन्नत है वह उन्हीं पूर्वार्जों कीर्तिलेखा हैं । — इंद्र०, पृ० १२५ ।

कीर्तिवंत पु०
वि० [सं० कार्तिमत] दे 'कीर्रिमान्' ।

कीर्तिवान
वि० [हिं० की कीर्तिमान] दे० 'कीरक्तिमान्' ।

कीर्तिशाली
वि० [सं० कीर्तिशालिन्] कीर्तिमान । यशस्वी ।

कीर्तिशेष
वि० [सं० कीर्त्तिशेष] दिवंगत कीर्तिमान् । मरा हुआ यशस्वी । जिसकी कीर्ति ही शेष हो । नामशेष । आलेख्वशेष ।

किर्तिस्तंभ
संज्ञा पुं० [सं० कीर्तिस्तम्भ] १. वह स्तंभ जो किसी की । कीर्ती को स्मरण कराने के लिये बनाया जाय ।२वह कार्य या वस्तु जिसके द्वारा किसी की कीर्ति स्थायी हो ।

कोल (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] लोहे या काठ की मेख । काँटा । परेग । खूँटी । यौ०—कील काँटा = (१) लोहार या बढई का औजार । (२) हरबा हथियार । उ०—सलारो ते पहले ही से कील काँटे से लेस था ।— फिसान०, भा० ३, पृ० ३८३ ।२. वह मढ़ गर्भ योनि में अटक जाता है । ३. नाक में पहिनने का एक छोठा आभूषण, जिसका आकार लौंग के समान होता है । लौंग । ४. मुहासे की मांसकील । ५. स्त्री प्रसंग में एक प्रकार का आसन जिसे 'कीलासन' कहते हैं । ६ जाँते के बीचोबीच का खूँटा जिसके आधार पर वह गड़ा रहता हैं । ७.वह खूँटी जिसपर कुम्हार का चाक घूमता है । ८. आग की लवर । अग्निशिखा । ९. दे० 'कीलक' । १०. भाला (को०) । ११. अस्त्र (को०) । १२. कुहनी धँसान या मारना (को०) । १३. सूक्ष्म कण (को०) । १४. शिव (को०) । १५. जुआरी । १६ एक प्रेत (को०) ।

कील (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] खुगी या देवकवास जो आसाम की गारो पहाड़ियों में होती है ।

कीलक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. खूँटी । कील । २. गौणों और भैसों के बाँधने का खूँटा । ३. तंत्र के अनुसार एक देवता । ४. किसी मंत्र का मध्य भाग । ५. वह मत्र जिससे किसी अन्य मंत्र की शत्कि या उसका प्रभव नष्ट कर दिया जाय । ६. ज्योतिष में प्रभव आदि ६० वर्ष में से ४२ वँर्ष । विशेष— इस वर्ष अमंगलों का नाश होकर सब जगह मंगल और सुख होता है । ७. एक स्तव जो सप्तशती पाठ करने के समय किया जाता हैं । ८. केतु विशेष । यौ०— कील्कन्याय ।

कीलक (
२ पु० संज्ञा स्त्री० [हिं० किलक] दे० 'किलक' । उ०— श्यामाशत्कि श्याम सुदर जू कीलक सब थल मोहै ।— श्यामा० पृ० १६३ ।

कीलन
संज्ञा पुं० [सं०] १. बंधन । रोक । रुकावट । २. किसी मंत्र को कील देने का काम । एक तांत्रिक या मांत्रिक क्रिया ।

कीलना
क्रि सं० [सं० कोलन] १. मेख जड़ना । कील लगाना । २. किसी मंत्र या युत्कि के प्रभाव को नष्ट करना । ३. साँप को ऐसा मोहित कर देना कि वह किसी को काट न सके । ४. अधीन करना । वश में करना । ५. तोप की न/?/ में आगे की ओर से कसकर लकड़ी का कुंदा ठोकना जिसमें तोपचलाई न जा सके ।

कीलमुद्रा
संज्ञा स्त्री० [सं० कील + मुद्रा] दे० 'कीलाक्षर' ।

कीलसंस्पर्श
संज्ञा पुं० [सं० ] एक वृक्ष का नाम (को०) ।

कीला
संज्ञा पुं० [सं कील] १. बड़ी कील । काँटा । शकु । दे० 'कील ६, ७' । उ०— आसे पासे जो फिरे निपट पिसावे सोय । कीला से लगा रहै ताको विघन न होय ।— कबीर सा०, पृ० १२ ।

कोलाक्षर
संज्ञा पुं० [सं० काल + अक्षर] एक प्रकार की बहुत प्राचीन लिपि जिसके अक्षर कील के आकार के होते थे । इस लिपि के ईसा से कई सौ वर्ष पूर्व के कोई लेख बर्बर देश में पाए गए है । उ०— ये लेख मिट्टी की पट्टि काओं पर कीलाक्षरों में लिखे गए हैं ।— भोज० भा० सा०, पृ० १५ ।

कीलाल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. अमृत । २. जल । पाना । उ०— अंभ कमल कीलाल जल पय पुष्कर बन बारि ।— अनेककार्थ०, पृ० ४९ । ३. मधु । शब्द । ४. खुन । रत्क । ५. देवों का एक मधुर पेय पदार्थ । ६. चौपाया । पशु । यौ०—कीलालज = मांस । कीलालधि = समुद्र । कीलालप = (१) भौरा ।(२) राक्षस । प्रेत ।

कीलाल (२)
वि० बंधन हटाने या दूर करनेवाला ।

कीलाली
संज्ञा पुं० [सं० कीलालिन्] बिसतुइया । छिपकली ।

कीलिका
संज्ञा [सं०] १. मनुष्य के शरीर की हड़ि्ड़याँ जो ऋषभ और नारान को छोड़ दूसरे स्नायु सें बँधी हेती हैं । २. एक प्रकार का बाण । ३. धुरी (को०) ।

कीलित
वि० [सं०] जिसमें जड़ी हो । २. मंत्र स्तंभित । कीला हुआ ।

कीलिया
संज्ञा पुं० [हि० कील] मोट के बैलों को हाँकनेवाला । पुरबोलवा । पैरहा ।

कीली
संज्ञा स्त्री० [सं० कील] १. किसी चक्र के ठीक मध्य के छेद में पड़ी हुई वह कील या ड़ंड़ा जिसपर वह चक्र घूमता है । जैसे— पृथ्वी अपनी कीली पर घूमती है, जिससे रात और दिन होता है । २. दे० 'कील'और 'किल्ली' ।

कीवाँ पु०
अव्य० [हिं० किमि] कैसे० उ०— तुझ बाजू खरी वो नामिनी कीवाँ दिल परच वीं । — घनानंद०, पृ० ३८४ ।

कीश
संज्ञा पुं० [सं०] १. बंदर । बानर । लंगूर । यौं०— कोशध्वज । कीशकेतु = अर्जुन । २. चिड़िया । ३. सूर्य ।

कोशपर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] अपाभार्ग नामक पौधा । चिड़ा [को०] ।

कीशपर्णी
संज्ञा पुं०[सं० कीशपर्णिन] अपामार्ग नामक पौधा [को०] ।

कीस (१)
संज्ञा पुं० [सं० कीश] बंदर । वानर । उ०— धन्य कीस जो निज प्रभुकाज । जहुँ वह नावै परिहरिन लाजा— मानस, ६२ ।

कीस (२)
संज्ञा पुं० [फा० कीसह] गर्भ की थैली ।

कीसउ पु०
वि० [सं० कीदृश] कीदृश । कैसा । उ०—राजा कुली महूरत कीसउ महाँ तो ओलग चालस्या आज । — बी० रासो, पृ० ४१ ।

कीसा
संज्ञा पुं० [फा० कीसहू] १. थैली । खीसा । २. जेब । खरीता ।

कीसीव पु०
क्रि० वि० [सं० कीदृश + हव] कैसे । क्यों । कीदृश । उ०— कहहू समझाई कर पेलवी । राजा कीसीव तुँ मागि चितोड़ ।— वी० रासो, पृ० २४ ।