विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/सिध

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सिधंत पु
संज्ञा पुं० [सं० सिद्धान्त] दे० 'सिद्धांत'। उ०—संन्यासी कहावै तो तूँ तोन्यौ लोक न्यास करि, सुंदर परमहंस होइ या सिधंत है।—सुंदर ग्रं०, भा० २, पृ० ६१२।

सिध पु (१)
वि० [सं० सिद्ध] दे० 'सिद्ध'। उ०—कत तप कीन्ह छाड़ि कै राजू। आहर गएउ न भा सिध काजू।—जायसी ग्रं०, पृ० २५८।

सिध (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] चार हाथ की एक लंबी लकड़ी जिसमें सीढ़ी बँधी रहती है।

सिध पु (३)
संज्ञा पुं० [सं० सिद्ध] दे० 'सिद्ध'। जैसे,—सिधवर = श्रेष्ठ सिद्ध।

सिधरी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की मछली।

सिधवर पु
संज्ञा पुं० [सं० सिद्ध + वर] श्रेष्ठ सिद्ध। उच्च कोटि का सिद्ध। उ०—मुनिवर, सुरबर सिधवर जिते। बरषत कुसुम भरे मुद तिते।—नंद० ग्रं०, पृ० ३०९।

सिधवाई †
संज्ञा स्त्री० [हिं० सीधा, सिधवाना] गाड़ी के पहिये निका- लने के समय गाड़ी को उठाए रखने के लिये लगाई हुई टेक। २. दे० 'सिधाई'।

सिधवाना †
क्रि० स० [हिं० सीधा] सीधा करना।

सिधा †
संज्ञा पुं० [सं० सिद्ध का बहुवचन] सिद्घ लोग। उ०— सुनो सिधा काया नगरी हृदय अस्थान।—रामानंद०, पृ० १३।

सिधाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० सीधा] सीधापन। सरलता।

सिधाना पु
क्रि० अ० [सं० सिद्ध (=दूर किया हुआ, हटाया हुआ) + हिं० आता (प्रत्य०)] सिधारना। जाना। गमन करना। प्रस्थान करना। चलना। उ०—(क) लायक हे भृगुनायक सो धनु सायक सौपि सुभाय सिधाए।—तुलसी (शब्द०)। (ख) चाहै न चंप कली की थली मलिनी नलिनी की दिशान सिधावै।—केशव (शब्द०)। (ग) उग्रसेन सब कुटुम लै ता ठौर सिधायो।—सूर (शब्द०)। २. †आगमन होना। आना।

सिधारना (१)
क्रि० अ० [हिं० सिधाना] १. जाना। गमन करना। प्रस्थान करना। बिदा होना। रवाना होना। उ०—(क) हरि बैकुंठ सिधारे पुनि ध्रुव आए अपने धाम। कीन्हों राज तीस षट वर्षन कीन्हे भक्तन काम।—सूर (शब्द०)। (ख) मुदित नयन फल पाइ गाइ गुन सुर सानद सिधारे।—तुलसी (शब्द०)। (ग) सूकर श्वान समेत सबै हरिचंद के सत्य संदेह सिधारे।—केशव (शब्द०)। २. मरना। स्वर्गवास होना। जैसे,—वे तो कल रात्रि में ही सिधार गए। संयो० क्रि०—जाना।

सिधारना पु † (२)
क्रि० स० [सिद्ध + करण] दे० 'सुधारना'। उ०—आँगन हीरन साँजि सँवारो। छज्जनि मैं करि दंत सिधारो।—गुमान (शब्द०)।

सिधि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० सिद्धि] दे० 'सिद्धि'। उ०—कीरतिकूख मँजूष प्रगट भई सुख सोभा सिधि है हो।—घनानंद, पृ० ३५९।

सिधिगुटका
संज्ञा स्त्री० [सं० सिद्धि + गुटिका] दे० 'सिद्धि गुटिका'। उ०—सिधि गुटिका अब मो सँग कहा। भएउँ राग सन हिय न रहा।—जायसी (शब्द०)।

सिधु
संज्ञा पुं० [सं० सीधु] दे० 'सीधु'।

सिधोई †
संज्ञा स्त्री० [हिं० सीधा] दे० 'सिधवाई'।

सिधोसामान †
संज्ञा पुं० [हिं० सीधां + सामान, गुज०] सीधा समान। भोजन सामग्री। सीधा। रसद। उ०—पाछें बजार तें सिधोसामान आयो।—दो सौ बावन०, भा० १. पृ० ११०।

सिध्म (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. कुष्ठ रोग। २. कोढ़ का दाग। ३. खाज। विचर्चिका। खुजली [को०]।

सिध्म (२)
वि० १. सफेद दागवाला। २. श्वेत कुष्ठवाला।

सिध्मपुष्पिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] सेंहुआ। छीप। किलास।

सिध्मल
वि० [सं०] १. छीटा रोगवाला। सेहुँएवाल। २. जिसको कोढ़ हो। कोढ़ के चिह्नों से युक्त (को०)।

सिघ्मला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सूखी मछली। २. एक प्रकार का कुष्ठ रोग (को०)।

सिध्मवान्
वि० [सं० सिध्मवत्] दे० 'सिध्मल' [को०]।

सिध्मा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कुष्ठ कोग। २. कोढ़ का दाग या धब्बा। ३. कासश्वास [को०]।

सिध्य
संज्ञा पुं० [सं०] पुष्य नक्षत्र।

सिध्र (१)
वि० [सं०] १. साधु। श्रेष्ठ। उत्तम। २. त्राता। रक्षक (को०)। ३. सफल। असर करनेवाला।

सिध्र (२)
संज्ञा पुं० १. वृक्ष। पेड़। २. साधु। सत्पुरुष [को०]।

सिध्रक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का वृक्ष।

सिध्रकावण
संज्ञा पुं० [सं०] देवताओं के एक उद्यान का नाम [को०]।

सिन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. शरीर। देह। २. वस्त्र। पहनावा। ३. ग्रास। कौर। ४. कुंभी का पेड़ जो हिमालय की तराई में होता है और जिसकी छाल का काढ़ा आम और अतीसार में दिया जाता है।

सिन (२)
वि० १. काना। एक आँख का। २. सित। श्वेत।

सिन (३)
संज्ञा पुं० [अ०] अम्र। अवस्था। वयस। उ०—कहाँ यह जबानी फिर य सिन।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० ४०८। २. दशन। दंत। दाँत (को०)। यौ०—सिनरसीद = वृद्ध। गतायु। बूढ़ा। सिनरसीदी = बुढ़ौती। बुढ़ापा। वृद्धावस्था। मुहा०—सिन को पहुँचना = सयाना होना। वयस्क होना। सिन या सिन से उतरना = जवानी ढलना।

सिनक
संज्ञा स्त्री० [सं० सिङ्घाणक] कपाल के केशों आदि का मल जो नाक से निकलता हो। रेंट। नेटा।

सिनकना
क्रि० स० [सं० सिंङ्घाणक, हिं० सिनक + ना] जोर से हवा निकाल कर नाक का मल बाहर फेंकना। साँस के झोंके से नाक से रेंट निकालना।

संयो० क्रि०—देना।

सिनट
संज्ञा पुं० [अं० सेनेट] १. शासन का समस्त अधिकार रखनेवाली सभा। २. विश्वविद्यालय का प्रबंध करनेवाली सभा।

सिना
संज्ञा स्त्री० [फा़०] दे० 'सिनान' [को०]। यौ०—सिनाकश = तीरंदाज। धनुर्धर।

सिनान
संज्ञा स्त्री० [फा़० सिनाँ] १. बाण की नोक। अनी। २. बरछा। भाला। ३. बरछी की नोक [को०]।

सिनिवाली पु
संज्ञा स्त्री० [सं० सिनीवाली] एक नदी। दे० 'सिनीवाली'—५। उ०—सिनिवाली, रजनी, कुहू, मंदा, राका, जानु। सरस्वती अरु जनुमती सातो नदी बखानु।—केशव (शब्द०)।

सिनी
संज्ञा पुं० [सं० शिनि] १. एक यादव का नाम जो सात्यकि का पिता था। उ०—सिनि स्यंदन चढ़ि चलेउ लाइ चंदन जदु- नंदन।—गोपाल (शब्द०)। २. क्षत्रियों की एक प्राचीन शाखा।

सिनी (१)
संज्ञा पुं० [सं० शिनि] एक यादव वीर। विशेष दे० 'शिनि'—३। उ०—चलेउ सिनीपति विदित धीर धरनीपति अति मति।—गोपाल (शब्द०)। यौ०—सिनीपति = क्षत्रियों की एक प्राचीन शाखा का प्रधान। विशेष दे० 'शिनि'—३।

सिनी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. 'सिनीवाली'। २. गौर वर्णा की स्त्री (को०)।

सिनीत
संज्ञा स्त्री० [देश०] सात रस्सियों को बटकर बनाई गई चिपटी रस्सी। (लश्करी)।

सिनीवाली
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक वैदिक देवी, मंत्रों में जिसका आह्वान सरस्वती आदि के साथ मिलता है। विशेष—ऋग्वेद में यह चौड़ी कटिवाली, सुंदर भुजाओं और उँगलियोंवाली कही गई है और गर्भप्रसव की अधिष्ठात्री देवी मानी गई है। अथर्ववेद में सिनीवाली को विष्णु की पत्नी कहा है। पीछे की श्रुतियों में जिस प्रकार राका शुक्ल पक्ष की द्वितीया की अधिष्ठात्री देवी कही गई है, उसी प्रकार सिनीवाली शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा की, जब कि नया चंद्रमा प्रत्यक्ष निकला नहीं दिखाई देता, देवी बताई गई है। २. शुक्ल पक्ष की प्रातिपदा। ३. अंगिरा की एक पुत्री का नाम। ४. दुर्गा। ५. मार्कंडेय पूराण में वर्णित एक नदी का नाम।

सिनेट
संज्ञा स्त्री० [अं० सेनेट] दे० 'सिनट'।

सिनेमा
संज्ञा पुं० [अं०] १. वह मकान जहाँ बायस्कोप दिखाया जाता है। २. छाया चित्र। चल चित्र। यौ०—सिनेमाघर, सिनेमा हाउस = वह स्थान जहाँ सिनेमा दिखाया जाय।

सिनेरियो
संज्ञा स्त्री० [अं०] पटकथा। किसी कहानी का नाट्य रूप। उ०—कौन सिनेरियो लिखता और किसे डायलाँग का ठेका मिलाता।—तारिका, पृ० २४।

सिनेह पु †
संज्ञा पुं० [सं० स्नेह] दे० 'स्नेह'। उ०—(क) खत कुमेढ़ा सन बुझल सिनेह।—विद्यापति, पृ० ५६३। (ख) सिनेह और ममता का भूखा।—नई०, पृ० ८१।

सिनो
संज्ञा पुं० [देश०] खेत की पहली जोताई।

सिन्न
संज्ञा पुं० [अ०] दे० 'सिन (३)'।

सिन्नी †
संज्ञा स्त्री० [फा़० शीरीनी] १. मिठाई। २. बताशे या मिठाई जो किसी खुशी में बाँटी जाय। ३. बताशे या मिठाई जो किसी पीर या देवता को चढ़ाकर प्रसाद की तरह बाँटी जाय। क्रि० प्र०—चढ़ाना।—बाँटना।—मानना।

सिपर
संज्ञा स्त्री० [फा़०] वार रोकने का हथियार। ढाल। उ०— तूल झूल, लाल तूल लाल तल तूल नौल डील, तूल नील सैल माथ पै सिपर है।—गिरधर (शब्द०)। मुहा०—सिपर डालना, सिपर फेंकना = लड़ाई में हथियार डाल देना। पराजय स्वीकार कर लेना। सिपर मुँह पर लेना, सिपर लेना = आघात से बचाव के लिये ढाल को आगे करना। यौ०—सिपर अंदाजी = हार मान लेना।

सिपरा
संज्ञा स्त्री० [सं० सिप्रा] दे० 'सिप्रा'।

सिपह
संज्ञा पुं० [फा़०] 'सिपाह' का लघु रूप। सेना। फौज [को०]। यौ०—सिपहगरी, सिपहदार = सेनानायक। सेनापति। सिपहबद, सिपहबुद = सिपहसालार।

सिपहगरी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] सिपाही का काम। युद्ध व्यवसाय।

सिपहसालार
संज्ञा पुं० [फा़०] फौज का सबसे बड़ा अफसर। सेनापति। सेनानायक।

सिपहसालारी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] सेनापातित्व। सिपहसालार का कार्य [को०]।

सिपाई ‡
संज्ञा पुं० [फा़० सिपाही] दे० 'सिपाही'। उ०—कह्यो सिपाई अबहिं चोराई। इतै भागि अब कह सिर नाई।—रघुराज (शब्द०)।

सिपारस ‡
संज्ञा स्त्री० [फा़० सिफारिश] दे० 'सिफारिश'। उ०— इतिय सिपारस आसु किय, देव करण लघु भाय। सुनत भूप परिमाल कहि, बिस्वा लेहु बुलाय।—प० रासो, पृ० ३०।

सिपारसी ‡
वि० [फा़० सिफारिशी] दे० 'सिफारशी'। उ०— सिपारसी डरपुकने सिट्टू बोलैं बात अकासी।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० ३३३।

सिपारह
संज्ञा पुं० [फा़० सिपारह्] दे० 'सिपारा'। उ०—नमै निज साइय पंच बषत्त। सिपारह तीस पढ़ै दिन रत्त।—पृ० रा०, ९।९७।

सिपारा
संज्ञा पुं० [फा़० सिपारह्] मुसलमानों के धर्मग्रंथ कुरान के तीस भागों में से कोई एक। विशेष—कुरान तीस भागों में विभक्त किया गया है जिनमें से प्रत्येक सिपारा कहलाता है।

सिपारी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] सुपारी। डली। छालिया [को०]।

सिपाव
संज्ञा पुं० [फा़० सेहपाव] लकड़ी की एक प्रकार की टिकठी या तीन पायों का ढाँचा जो छकड़े आदि में आगे की ओर अड़ान के लिये दिया जाता है।

सिपावा भाथी
संज्ञा स्त्री० [फा़० सेहपाव + हि० भाथी] लोहारों की हाथ से चलाई जानेवाली धौंकनी।

सिपास
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. धन्यवाद। शुक्रिया। कृतज्ञताप्रकाशन। २. प्रशंसा। बडाई। स्तुति। यौ०—सिपासगुजार, सिपासगो = स्तुतिपाठक। प्रशंसक। सिपास— नामा।

सिपासनामा
संज्ञा पुं० [फा़० सिपासनामह्] १. बिदाई के समय का अभिनंदनपत्र। २. प्रतिष्ठापत्र। मानपत्र।

सिपाह
संज्ञा स्त्री० [फा़०] फौज। सेना। कटक। लश्कर। उ०— अरि जय चाह चले संगर उछाह रेल विविध सिपाह हमराह जदुनाह के।—गोपाल (शब्द०)।

सिपाहगरी, सिपाहगिरी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. सिपाही का काम या पेशा। अस्त्र व्यवसाय। २. शूरता। बहादुरी (को०)।

सिपाहियाना
वि० [फा़० सिपाहियानह्] १. सिपाहियों का सा। सैनिकों का सा। जैसे,—सिपाहियाना ढंग, सिपाहियाना ठाट। २. वीरतापूर्ण। शौर्ययुक्त। बहादुराना (को०)।

सिपाही
संज्ञा पुं० [फा़०] १. सैनिक। लड़नेवाला। शूर। योद्धा। फौजी आदमी। २. कांस्टेबिल। पुलिस। तिलंगा। ३. चपरासी। अरदली।

सिपुर्द ‡
वि० [फा़० सिपुर्द] सौंपा हुआ। हवाले किया हुआ। दे० 'सुपुर्द'।

सिपुर्दगी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. सिपुर्द करना। सौंपना। २. हवालात। हिरासत [को०]।

सिपुर्दा
वि० [फा़० सिपुर्दह्] सौंपा हुआ। हस्तांतरित [को०]।

सिपेद
वि० [फा़०] श्वेत। सफेद [को०]।

सिपेद
संज्ञा पुं० [फा़० सिपेदह्] सफेदी। धवलिमा [को०]।

सिप्पर पु
संज्ञा स्त्री० [फा़० सिपर] दे० 'सिपर'। उ०—झम झमत सिप्पर सेल साँगरु जिरह जग्गो दीसियं। मनु सहित उड़गन नव ग्रहनु मिल जुद्ध रक्कि वरीसियं।—सुजान (शब्द०)।

सिप्पा
संज्ञा पुं० [देश०] १. निशाने पर किया हुआ वार। लक्ष्य- बेध। २. कार्य साधन का उपाय। डौल। युक्ति। तदबीर। टिप्पस। क्रि० प्र०—लगना।—लगाता। मुहा०—सिप्पा लड़ना या भिड़ना = (१) युक्ति या तदबीर होना। अभिसंधि होना। (२) युक्ति सफल होना। इधर उधर की कोशिश कामयाब होना। सिप्पा भिड़ाना या लड़ाना = युक्ति या तदबीर करना। लोगों से मिलकर उन्हें कार्यसाधन में सहायक बनाना। इधर उधरकर कहसुनकर कोशिश करना। जैसे—जगह के लिये उसने बहुत सिप्पा लड़ाया पर न मिली। ३. डौल। सूत्रपात। प्रारंभिक कार्रवाई। मुहा०—सिप्पा जमाना = डौल खड़ा करना। किसी काम की नींव देना। किसी कार्य के अनुकूल परिस्थिति उत्पन्न करना। भूमिका बाँधना।४. रंग। प्रभाव। धाक। क्रि० प्र०—जमना।—जमाना।

सिप्पी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० सीपी] दे० 'सीपी'।

सिप्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. सुधांशु। चंद्र। २. एक सरोवर का नाम। ३. पसीना। प्रस्वेद [को०]।

सिप्रा
संज्ञा पुं० [सं०] १. महिषी। भैंस। २. एक झील। ३. स्त्रियों का कटिबंध। ४. मालवा की एक नदी जिसके किनारे उज्जैन (प्राचीन उज्जयिनी) बसा है। शिप्रा।

सिफत
संज्ञा स्त्री० [अ० सिफत] १. विशेषता। गुण। उ०—जबान बिना क्या सिफत आवै।—पलटू०, पृ० ६३। २. लक्षण। उ०—भला मखलूक खालिक की सिफत समझे कहाँ कुदरत इसी से नेति से पार वेदों ने पुकारा है।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ८५१। ३. स्वभाव। ४. प्रशांसा। स्तुति (को०)। ५. सूरत। शक्ल।

सिफति पु †
संज्ञा स्त्री० [अं० सिफत] गुणगान। स्तुति। प्रशस्ति। उ०—सिफति करौं दिन राति टारे ना टरौंगा।—पलटू०, पृ० ८६।

सिफर
संज्ञा पुं० [अ० सिफ़र, अं० साइफ़र, सिफ़र] १. शून्य। सुन्ना। बिंदी। २. रिक्त, साधारण या तुच्छ व्यक्ति (को०)।

सिफलगी
संज्ञा स्त्री० [अ० सिफ़लह् + फा़० गी] ओछापन। कमीनापन।

सिफला
वि० [अ० सिफ़लह्, सिफ़्लह्] १. नीच। कमीना। २. छिछोरा। ओछा। यौ०—सिफलाकार = निम्न कोटि के काम करनेवाला। सिफ— लाखूँ = 'दे० सिफलामिजाज'। सिफलानवाज = नीचों, छिछोरों को उत्साहित करनेवाला। सिफलापन। सिफलापरवर = सिफलानवाज। सिफलामिजाज = क्षुद्र प्रकृतिवाला। निम्न स्वभाव का।

सिफलापन
संज्ञा पुं० [अ० सिफलह् + हिं० पन (प्रत्य०)] १. छिछोरापन। ओछापन। २. पाजीपन।

सिफा
संज्ञा स्त्री० [अ० शिफ़] दे० 'शिफा'।

सिफात (१)
संज्ञा स्त्री० [अ० सिफात] सिफ्त का बहुवचन। उ०— अलख सबे जापै कहौ लखौ कौन बिधि जाइ। पाक जात की रसिकनिधि जगत सिफात दिखाइ।—स० सप्तक, पृ० १७९।

सिफाती
वि० [अ० सिफा़ती] १. जो सहज या स्वाभाविक न हो। जो अभ्यास आदि से प्राप्त हो। २. सिफत से सबंद्ध। गुण आदि से संबद्ध। उ०—सिफाती सिजदा करै जाती बेपरवाह। दादू०, पृ० ३५०।

सिफारत
संज्ञा स्त्री० [फा़० सिफारत] १. दौत्य। दूत कार्य। २. किसी राज्य का प्रतिविधिमंडल [को०]।

सिफारतखाना
संज्ञा पुं० [फा़० सिफारतखानह्] दूतावास। दूत के रहने तथा कार्य करने का स्थान [को०]।

सिफारश
संज्ञा पुं० [फा़० सिफारिश] दे० 'सिफारिश'। उ०— इस्का लेन देन डेढ़ पौने दो बरस से एक दोस्त की सिफारश पर लाला मदन मोहन के यहाँ हुआ है।—श्रीनिवास ग्रं०, पृ० १६४।

सिफारिश
संज्ञा स्त्री० [फा़० सिफारिश] १. किसी के दोष क्षमा करने के लिये किसी से कहना सुनना। २. किसी के पक्ष में कुछ कहना सुनना। किसी का कार्य सिद्ध करने के लिये किसी से अनुरोध। ३. माध्यम। जरिया। वसीला। ४. नौकरी देनेवाले से किसी नौकरी चाहनेवाले की तारीफ। नौकरी दिलाने के लिये किसी की प्रशंसा। जैसे,—नौकरी तो सिफारिश से मिलती है। ५. संस्तुति। क्रि० प्र०—करना।—होना।

सिफारिशनामा
संज्ञा पुं० [फा़० सिफारिशनामह्] सिफारिशी पत्र या चीठी।

सिफारिशी
वि० [फा़० सिफारिशी] १. सिफारिशवाला। जिसमें सिफारिश हो। जैसे,—सिफारिशी चिट्ठी। २. जिसकी सिफारिश की गई हो। जैसे,—सिफारिशी टट्टू। ३. अनुशंसा या सिफारिश करनेवाला।

सिफारिशी टट्टू
संज्ञा पुं० [फा़० सिफारिशी + हिं० टट्टू] वह जो केवल सिफारिश या खुशामद से किसी पद पर पहुँचा हो।

सिफाल
संज्ञा स्त्री० [फा़० सिफाल] १. मिट्टी का बरतन। मृत्पात्र। २. मिट्टी का ठीकरा [को०]।

सिफालगर
वि० [फा० सिफालगर] मिट्टी के बरतन बनानेवाला। कुम्हार [को०]।

सिफाली
वि० [फा० सिफाली] मिट्टी का। मृत्तिकानिर्मित। मिट्टी का बना हुआ [को०]।

सिफ्त, सिफ्ति पु
संज्ञा स्त्री० [फा़० सिफत] दे० 'सिफत'। उ०— (क) खुदा तुज को शाही सजावार है। सिप्त को तेरी कुछ न आकार है।—दक्खिनी०, पृ० २९९। (ख) भी सुंदर कहि न सकै कोइ तिसनौ जिसदी सिफ्ति अलेर्ष।—सुंदर० ग्रं०, भा० १, पृ० २७५।

सिबिका पु
संज्ञा स्त्री० [सं० शिविका] दे० 'शिविका'। उ०—सिबिका सुभग ओहार उघारी।—मानस, १।३४८।

सिमंत पु
संज्ञा पुं० [सं० सीमन्त] दे० 'सीमंत'। उ०—स्याम के सीस सिमंत सराहि सनाल सरोज फिराइ कै मारो।— मन्नालाल (शब्द०)।

सिम
वि० [सं०] प्रत्येक। संपूर्ण। समग्र। समस्त [को०]।

सिमई
संज्ञा स्त्री० [हि० सिँवई] दे० 'सिवँई,' 'सिवैयाँ'।

सिमट
संज्ञा स्त्री० [हिं० सिमटना] सिमटने की क्रिया या भाव।

सिमटना
क्रि० अ० [सं० समित (=एकत्र) + हिं० ना (प्रत्य०) या देश०] १. दूर तक फैली हुई वस्तु का थोड़े स्थान में आ जाना। सुकड़ना। संकुचित होना। २. शिकन पड़ना। सलवट पड़ना। ३. इधर उधर बिखरी हुई वस्तु का एक स्थान पर एकत्र। होना। बटोरा जाना। बटुरना। इकट्ठा होना। ४. व्यवस्थित होना। तरतीब से लगना । ५. पूरा होना। निबटना। जैसे,—सारा काम सिमट गया। ६. संकुचित होना। लज्जित होना। ७. सहमना। सिटपिटा जाना। संयो० क्रि०—जाना।

सिमटी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का कपड़ा जिसकी बुनावट खेस के समान होती है।

सिमर पु †
संज्ञा पुं० [सं० शाल्मलि?] सेमर, विशेष दे० 'सेमल'। उ०—चंदन भरम सिमर आलिंगल सालि रहल हिय काटे।—विद्यापति, पृ० ९१।

सिमरख ‡
संज्ञा पुं० [फा़० संगर्फ़] दे० 'शिंगरफ'।

सिमरगोला
संज्ञा पुं० [सिमर? + गोला] एक प्रकार की मेहराब।

सिमरन पु
संज्ञा पुं० [सं० स्मरण] याद करना। स्मरण। स्मृति।

सिमरना †
क्रि० स० [सं० स्मरण] दे० 'सुमिरना'। उ०—(क) राम नाम का सिमरनु छोड़िया माजा हाथ बिकाना।—तेग बहादुर (शब्द०)। (ख) सिमरे जो एक बार ताको राम बार बार बिसरे बिसारे नाहीं सो क्यों बिसराइये।—हृदयराम (शब्द०)।

सिमरिख
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की चिड़िया।

सिमल
संज्ञा पुं० [सं० सीर (=हल) + माला] १. हल का जुआ। २. जूए में पड़ी हुई खूँटी।

सिमला आलू
संज्ञा पुं० [हिं० शिमला + आलू] एक प्रकार का पहाड़ी बड़ा आलू। मरबुली।

सिमसिम
वि० [?] साधारण आर्द्रता या शीतलता प्रतीत होना।

सिमाना † (१)
संज्ञा पुं० [सं० सीमान्त] सिवाना। हद।

सिमाना पु (२)
क्रि० स० [हिं० सिलाना] दे० 'सिलाना'। उ०—लाओ बेगि याही छन मन की प्रवीन जानि लायो दुख मानि ब्योंत लई सो सिमाइ कै।—नाभा (शब्द०)।

सिमिटना पु †
क्रि० अ० [सं० समित + हि० ना(प्रत्य०) या देश०] दे० 'सिमटना'। उ०—(क) यह सुनि जहाँ तहाँ ते सिमिटैं आइ होइ इक ठौर।—सूर (शब्द०)। (ख) जलचर वृंद जाल अंतरगत सिमिटि होत एक पास। एकहि एक खात लालच बस नहिं देखत निज नास।—तुलसी (शब्द०)।

सिमृति पु ‡
संज्ञा स्त्री० [सं० स्मृति] दे० 'स्मृति'। उ०—द्रुपद सुता को लज्जा राखी। बेद पुरान सिमृति सब साखी।—लाल कवि (शब्द०)।

सिमेंट
संज्ञा पुं० [अं० सीमेंट] १. एक विशेष प्रकार के पत्थर का विशिष्ट प्रक्रिया से तैयार किया हुआ चूर्णं जो पलस्तर आदि करने के काम में आता है। २. एक प्रकार का लसदार गारा जो सूखने पर बहुत कड़ा और मजबूत हो जाता है।

सिमेटना पु †
क्रि० स० [सं० समित + हिं० ना] दे० 'समेटना'।

सिम्त
संज्ञा स्त्री० [अ०] ओर। तरफ। दिशा। उ०—इस हिंद से सब दूर हुई कुफ्र की जुल्मत, की तूने व रहमत, नक्कारण ईमाँ को हरेक सिम्त बजाया।—भारतेंदु ग्रं० १, पृ० ५३०।

सिय पु
संज्ञा स्त्री० [सं० सीता] सीता। जानकी। उ०—उपदेश यह जेहि तात तुम तें राम सिय सुख पावहीं।—तुलसी (शब्द०)।

सियना पु (१)
क्रि० स० [सं० सृजन] उत्पन्न करना। रचना। उ०— जेहि बिरंचि रचि सीय सँवरि औ रामहिं ऐसो रूप दियो री। तुलसिदास तेहि चतुर बिधाता निज कर यह संजोग सियो री।—तुलसी (शब्द०)।

सियना † (२)
क्रि० स० [सं० सीवन] दे० 'सीना'।

सियर पु
वि० [सं० शीतल, प्रा० सीअल] दे० 'सियरा'। उ०—पदु- मावति तन सियर सुवासा। नैहर राज कंत पर पासा।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० ३४९।

सियरा पु (१)
वि० [सं० शीतल, प्रा० सीअड़] [स्त्री० सियरी] १. ठंढा। शीतल। उ०—(क) श्याम सुपेत कि राता पियरा अबरण बरण कि ताता सियरा।—कबीर (शब्द०)। (ख) सियरे बदन सूखि गए कैसे। परसत तुहिन तामरस जैसे।—तुलसी (शब्द०)। २. कच्चा। ३. छाया। छाँह।

सियरा (२) †
संज्ञा पुं० [सं० श्रृगाल, प्रा० सिआल] सियार। श्रृगाल।

सियराई पु
संज्ञा स्त्री० [सं० शीतल, प्रा० सीअल, हिं० सियरा + ई (प्रत्य०)] शीतलता। ठंढक। उ०—मुकुलित कुसुम नयन निद्रा तजि रूप सुधा सियराई।—सूर (शब्द०)।

सियराना पु
क्रि० अ० [हिं० सियरा + ना] ठंढा होना। जुड़ाना। शीतल होना। उ०—(क) हारन सो हहरात हियो मुकुता सियरात सुवेसर ही को।—पद्माकर (शब्द०)। (ख) पादप पुहुमि नव पल्लव ते पूरि आए हरि आए सियराए भाए ते शुमार ना।—रघूराज (शब्द०)।

सियरी (१)
वि० [सं० शीतल] दे० 'सियरा'। उ०—(क) लोचे परी सियरी पर्यंक पै बीती घरीन खरी खरी सोचै।—पद्माकर (शब्द०)। (ख) खरे उपचार खरी सियरी सियरे तैं खरोई खरो तन छीजै।—केशव (शब्द०)।

सियरी (२)
संज्ञा स्त्री० [फा़० सैरी] तृप्ति। अघाव। शांति। मनस्तोष। तुष्टि। उ०—मैं तुम्हारा दिल लेने के लिये कहती थी। मर्दों की तो कैफियत यह है कि एक दर्जन भर औरतें हों तो भी उनकी सियरी नहीं होती।—सैर०, पृ० २५।

सियह
वि० [फा़०] दे० 'सियाह'। उ०—मुझे तेरी जुल्फों का ध्यान आ गया। जो देखी सियह सिर पै छाई घटा।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ४९०।

सिया
संज्ञा स्त्री० [सं० सीता] सीता। जानकी। उ०—तब अंगद इक बचन कह्यो। तो करि सिंधु सिया सुधि लावै किहिं बल इतो लह्यो।—सूर (शब्द०)।

सियाक
संज्ञा पुं० [अ० सियाक] १. गणित। हिसाब। २. चलाना। ३. बाज के पैर की डोर [को०]।

सियादत
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. सैयद होने का भाव। २. प्रतिष्ठा। बुजुर्गी। ३. सरदारी। अध्यक्षता [को०]।

सियाना † (१)
वि० [सं० सज्ञान, सण्णाण] दे० 'सयाना'। उ०—सो सतगुरु जो होय सियाना।—कबीर सा०, पृ० १६००।

सियाना (२)
क्रि० स० [सं० सीवन] दे० 'सिलाना'।

सियानी †
वि० [सं० सज्ञाना] १. चतुर। बुद्धिमती। अनुभवी। उ०—पाँच सखी मिलि देखन आईं एक ते एक सियानी।—कबीर० सा० सं०, पृष्ठ ३१। २. वयस्का। वयप्राप्त। युवती। उ०—देखते देखते सियानी होने लगी।—फूलो०, पृ० २१६।

सियानोब
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का पक्षी।

सियापा
संज्ञा पुं० [फा़० सियाहपोश] मरे हुए मनुष्य के शोक में कुछ काल तक बहुत सी स्त्रियों के प्रतिदिन इकट्ठा होकर रोने की रीति। मातम। विशेष—यह रिवाज पंजाब आदि पश्चिमी प्रांतों में पाया जाता है।

सियार †
संज्ञा पुं० [सं० श्रृगाल, प्रा० सिआड़] [स्त्री० सियारी, सियारिन] गीदड़। जंबुक।

सियार लाठी
संज्ञा पुं० [देश०] अमलतास।

सियारा (१)
संज्ञा पुं० [सं० सीता (=कर्षणचिह्न), प्रा० सीआ + रा (प्रत्य०)] जुती हुई जमीन बराबर करने का लकड़ी का फावड़ा।

सियारा (२)
संज्ञा पुं० [सं० शीतकाल] दे० 'सियाला'।

सियारी
संज्ञा स्त्री० [सं० श्रृगाली] दे० 'सियार'।

सियाल पु
संज्ञा पुं० [सं० श्रृगाल] श्रृगाल। गीदड़। उ०—चहुँ दिसि सूर सोर करि धावै ज्यों केहरिहिं सियाल।—सूर (शब्द०)।

सियाला (१)
संज्ञा पुं० [सं० शीतकाल] शीतकाल। जाड़े का मौसिम।

सियाला (२)
संज्ञा पुं० [सं० सीता, प्रा० सीया + ला (प्रत्य०)] दे० 'सियारा'।

सियाला पोका
संज्ञा पुं० [हिं० सियारा (=शीतयुक्त, आर्द्र) (?) + पोका (=कीड़ा)] एक बहुत छोटा कीड़ा जो सफेद चिपटे कोश के भीतर रहता है और पुरानी लोनी मिट्टीवाली दीवारों पर मिलता है। लोना पोका।

सियाली (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का विदारी कंद।

सियाली (२)
वि० [सं० शीतकालीन] १. जाड़े के मौसिम की। २. खरीफ की फसल।

सियावड़
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'सियावड़ी'।

सियावड़ी
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. अनाज का वह हिस्सा जो खेत कटने पर खलियान में से साधुओं के निमित्त निकाला जाता है। २. वह काली हाँड़ी जो खेतों में चिड़ियों को डराने और फसल को नजर में बचाने के लिये रखी जाती है।

सियासत (१)
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. देश का शासन प्रबंध तथा व्यवस्था। २. नीति। कूटनीति। राजनीति (को०)। ३. छल। फरेब। धूर्तता। मक्कारी (को०)। ४. डाँट डपट। चेतावनी (को०)। ५. दंड। सजा (को०)।

सियासत (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० शास्त्रि] १. शासन। दंड। पीड़न। २. कष्ट। यंत्रणा। क्रि० प्र०—करना।—होना। यौ०—सियासतगर = दंड देनेवाला। सियासतगाह = (१) दंड देने का स्थान। (२) मक्कारी का अड्डा। सियासतदाँ = नीतिज्ञ। राजनीति में पटु।

सियासी
वि० [फा़०] १. राजनीति संबंधी। राजनीति का। २. राजनीतिज्ञ [को०]।

सियाह (१)
वि० [फा़०] १. दे० 'स्याह'। २. अशुभ। मातमी। यौ०—सियाहकार = दुश्चरित्र। गुनाहगार। सियाहकारी = गुनाह। बुरा काम। सियाहगोश। सियाहचश्म = (१) जिसकी आँखें काली हों। (२) बेवफा। (३) शिकारी चिड़िया। सियाहजबाँ = जिसका शाप तुरंत सिद्ध हो। सियाहदस्त = कंजूस। कृपण। सियाहदाना = (१) स्याहदाना। काला जीरा। (२) धनियाँ। (३) सौंफ का फूल। सियाहपोश = (१) निष्ठुर। क्रूर। (२) गुनाहगार। अपराधी। सियाहपोश = (१) काले कपड़े पहननेवाला। (२) मातम या शोक मनानेवाला। सियाहवक्त = अभागा। बदकिस्मत। सियाहबख्ती = दुर्भाग्य। अभाग्य। सियाहमस्त = मदमत्त। नशे में चूर। सियाहमस्ती = अत्यधिक मस्ती। सियाहरू = (१) पापी। बदकार। (२) काले मुँह का। कृष्णमुख। सियाहसफेद = हित अहित। बुराई भलाई।

सियाह (२)
संज्ञा पुं० [अ०] १. चीख पुकार। बावेला। चिल्लाहट। २. जोर की आवाज। निनाद। ३. रोना पीटना [को०]।

सियाहगोश
संज्ञा पुं० [फा़०] १. काले कानवाला। २. बिल्ली की जाति का एक जंगली जानवर। बनबिलाव। विशेष—इसके अंग लंबे होते हैं, पूँछ पर बालों का गुच्छा होता है और रंग भूरा होता है। खोपड़ी छोटी और दाँत लंबे होते हैं। कान बाहर की ओर काले और भीतर की ओर सफेद होते हैं। इसकी लंबाई प्रायः ४० इंच होती है। यह घास की झाड़ियों में रहता और चिड़ियों को मारकर खाता है। इसकी कुदान पाँच से छह फुट तक की होती है। यह सारस और तीतर का शत्रु है। यह बड़ी सुगमता से पाला और चिड़ियों का शिकार करने के लिये सिखाया जा सकता है। इसे अमीर लोग शिकार के लिये रखते हैं।

सियाहत
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. देश देश घूमना। पर्यटन। २. यात्रा। सफर [को०]।

सियापोश
वि० [फा़० सियाह + पोश] १. काला या नीला कपड़ा पहननेवाला। २. अशुभ या भद्दा पोशाक रहने हुए। उ०— हरवक्त सियाहपोश मूँ में लूको लगाए।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० १५५।

सियाहा
संज्ञा पुं० [फा़० सियाहह्] १. आय व्यय की बही। रोजना- मचा। बही खाता। २. सरकारी खजाने का वह रजिस्टरजिसमें जमींदारी से प्राप्त मालगुजारी लिखी जाती है। ३. वह सूची जिसमें काश्तकारों से प्राप्त लगान दर्ज करते हैं। मुहा०—सियाहा करना = हिसाब की किताब में लिखना। टाँकना। चढ़ाना। सियाहा होना = सियाहा में दर्ज होना। लिखा जाना।

सियाहानवीस
संज्ञा पुं० [फा़०] सियाहा का लिखनेवाला। सरकारी खजाने में सियाहा लिखने के लिये नियुक्त कर्मचारी।

सियाही
संज्ञा स्त्री० [फा़०] दे० 'स्याही'। यौ०—सियाहीचट, सियाहीसोख = सोखता। ब्लाटिंग पेपर।

सिरंग पु
संज्ञा पुं० [हिं० सिर] शीर्ष अंग। दे० 'सिर'। उ०— सेंतीस सहस सज्जे फिरंग। तिन लंब झूल टोपी सिरंग।—पृ० रा०, १३। १८।

सिर (१)
संज्ञा पुं० [सं० शिरस्] १. शरीर के सबसे अगले या ऊपरी भाग का गोल तल जिसके भीतर मस्तिष्क रहता है। कपाल। खोपड़ी। २. शरीर का सबसे अगला या ऊपर का गोल या लंबोतरा अंग जिसमें आँख, कान, नाक और मुँह ये प्रधान अवयव होते हैं और जो गरदन के द्रारा धड़ से जुड़ा रहता है। उ०—उत्थि सिर नवइ सब्ब कइ।—कीर्ति०, पृ० ५०। मुहा०—सिर अलग करना = सिर काटना। प्राण ले लेना। सिर आँखों पर होना = सहर्ष स्वीकार होना। माननीय होना। जैसे,—आपकी आज्ञा सिर आँखों पर है। सिर आँखों पर बिठाना, बैठाना या रखना = बहुत आदर सत्कार करना। (भूत प्रेत या देवी देवता का) सिर आना = आवेश होना। प्रभाव होना। खेलना। सिर उठाना = (१) ज्वर आदि से कुछ फुरसत पाना। जैसे,—जब से बच्चा पड़ा है, तब से सिर नहीं उठाया है। (२) विरोध में खड़ा होना। शत्रुता के लिये संनद्ध होना। मुकाबिल के लिये तैयार होना। जैसे,— बागियों ने फिर सिर उठाया। (३) ऊधम मचाना। दंगा फसाद करना। शरारत करना। उपद्रव करना। (४) इतराना। अकड़ दिखाना। घमंड करना। (५) सामने मुँह करना। बराबर ताकना। लज्जित न होना। जैसे,—ऊंची नीची सुनता रहा, पर सिर न उठाया। (६) प्रतिष्ठा के साथ खड़ा होना। इज्जत के साथ लोगों से मिलना। जैसे,—जब तक भारतवासियों की यह दश है, तब तक सभ्य जातियों के बीच वे कैसे सिर उठा सकते हैं ? उ०—मान के ऊँचे महल मे या जिसे, सिर उठाये जाति के बच्चे घुसे।—चुभते०, पृ० ५। सिर उठाने की फुरसत न होना = जरा सा काम छोड़ने को छुट्टी न मिलना। कार्य की अधिकता होना। सिर उठाकर चलना = इतराकर चलना। घमंड दिखाया। अकड़कर चलना। सिर उतरवाना = सिर कटाना। मरवा डालना। सिर उतारना = सिर काटना। भार डालना। (किसी का) सिर ऊँचा करना = संमान का पात्र बनाना। इज्जत देना। (अपना) सिर ऊँचा करना = प्रतिष्ठा के साथ लोगों के बीच खड़ा होना। दस आदमियों में इज्जत बनाए रखना। सिर औंधाकर पड़ना = चिंता और शोक के कारण सिर नीचा किए पड़ा या बेठा रहना। सिर काढ़ना = प्रसिद्ध होना। प्रसिद्धि प्राप्त करना। सिर करना = (स्त्रियों के) बाल बाल सँवारना। चोटी गूँथना। (कोई वस्तु) सिर करना = जबरदस्ती देना। इच्छा के विरुद्ध सपुर्द करना। गले मढ़ना। सिर कलम करना या काटना = सिर उतारना। मार डालना। सिर का बोझटलना = निश्चिंतता होना। झंझट टलना। सिर का बोझ टालना = बेगार टालना। अच्छी तरह न करना। जो लगाकर न करना। सिर के बल चलना = बहुत अधिक आदरपूर्वक किसी के पास जाना। उ०—जो मिले जी खोलकर उनके यहाँ, चाह होती है कि सिर के बल चले।—चोखे०, पृ० १४। सिर खपाना = (१) सोचने विचारने में बैरान होना। (२) कार्य मे व्यग्र होना। सिर खाली करना = (१) बकवाद करना। (२) माथा पच्ची करना। सोच विचार में हैरान होना। सिर खाना = बकवाद करके जी उबाना। व्यर्थ की बातें करके तंग करना। सिर खुजलाना = मार खाने को जी चाहना। शामत आना। नटखटी सूझना। सिर चकराना = दे० 'सिर घूमना'। सिर चढ़ जाना = (१) मुँह लग जाना (२) गुस्ताख होना। निहायत बे अदब होना। उ०—नवाब साहब ने जो हँसी हँसी में उस दिन जरी मुँह लगाया तो सिर चढ़ गई।—सैर०, पृ० २९। सिर चढ़ा = मुँह लगा। लाड़ला। धृष्ट। सिर चढ़ाना = (१) माथे लगाना। पूज्य भाव दिखाना। आदरपूर्वक स्वीकार करना। सिर माथे लेना। उ०—नृप दूतहिं बीरा दीनौ। उनि सिर चढ़ाइ करि लीनौ।—सुंदर० ग्रं०, भा० १, पृ० १२०। (२) बहुत बढ़ा देना। मुँह लगाना। गुस्ताख बनाना। (३) किसी देवी देवता के सामने सिर काटकर बलि चढ़ाना। सिर घृमना = (१) सिर में दर्द होना। (२) घबराहट या मोह होना। बेहोशी होना। सिर चढ़कर बोलना = (१) भूत प्रेत का सिर पर आकार बोलना। (२) स्वयं प्रकट हो जाना। छिपाए न छिपना। सिर चढ़कर मरना = किसी को अपने खून का उत्तरदायी ठहराना। किसी के ऊपर जान देना। सिर चला जाना = मृत्यु हो जाना। सिर जोड़कर बैठना = मिलकर बैठना। सिर जोड़ना = (१) एकत्र होना। पंचायत करना। (२) एका करना। षड्यंत्र रचना। सिर झाड़ना = बालों में कंघी करना। सिर झुकाना = (१) सिर नवाना। नमस्कार करना। (२) लज्जा से गरदन नीची करना। (३) सादर स्वीकार करना। चुपचाप मान लेना। सिर टकराना = सिर फोड़ना। अत्यंत परिश्रम करना। (किसी के) सिर डालना = सिर मढ़ना। दूसरे के ऊपर कार्य का भार देना। सिर टूटना = (१) सिर फटना। (२) लड़ाई झगड़ा होना। सिर तोड़ना = (१) सिर फोड़ना। (२) खूब मारना पीटना। (३) वश में करना। सिर दर्द के लिये मूँड़ कटाना = छोटी बात के लिये बड़ा नुकसान करना। उ०—रोजमर्रा की जलन से बचने के लिये अलबत्ता ऐसी स्त्री को अलग कर दिया जा सकता है, परंतु वह सिर दर्द के लिये मूँड़ कटाने का इलाज है।—पिँजरे०, पृ० ११४। सिर देना = प्राण निछावर करना। जान देना। सिर धरना = सादर स्वीकार करना। मान लेना। अंगीकार करना।(किसी के) सिर धरना = आरोप करना। लगाना। मढ़ाना। उत्तरदायी बनाना। सिर धुनना = शोक या पछतावे से सिर पीटना। पछताना। हाथ मिलना। शोक करना। उ०—कीन्हे प्राकृत जन गुनगाना। सिर धनि गिरा लगति पछिताना।—मानस, पृ० १०। सिर नंगा करना = (१) सिर खोलना। (२) इज्जत उतारना। सिर नवाना = (१) सिर झुकाना। नमस्कार करना। (२) विनीत बनना। दीन बनना। आजिजी करना। सिर भिन्नाना = सिर चकराना। (अपना सिर) नीचे करना = अप्रतिष्ठा होना। इज्जत बिगड़ना। मान भंग होना। (२) पराजय होना। हार होना। (३) लज्जा होना। सिर पचाना = (१) परिश्रम करना। उद्योग करना। (२) सोचने विचारने में हैरान होना। सिर पटकना = (१) सिर फोड़ना। सिर धुनना। (२) बहुत परिश्रम करना। (३) अफसोस करना। हाथ मलना। सिर पर कफन बाँधकर चलना = प्रति पल मृत्यु के लिये तैयार रहना। सिर पर किसी का न होना = निरंकुश रहना। कोई रोकने टोकनेवाला न होना। उ०— कोई उनके सिर पर तो है नहीं, अपनी आप मुख्तार हैं।— फिसाना०, भा० ३, पृ० ३७। सिर पर आ पड़ना = अपने ऊपर घटित होना। ऊपर आ बनना। सिर पर आ जाना = (१) बहुत समीप आ जाना। (२) थोड़े ही दिन और रह जाना। सिर पर उठा लेना = ऊधम जोतना। धूम मचाना। सिर पर चढ़ जाना = गुस्ताखी करना। बेअदबी करना। मुँह लगाना। उ०— एक दफा तरह दी तो अब सिर पर चढ़ गया।—फिसाना०, भा० ३, पृ० १२५। (अपने) सिर पर पाँव रखना = बहुत जल्द भाग जाना। हवा होना। (किसी के) सिर पर पाँव रखना = किसी के साथ बहुत उद्दंडता का व्यवहार करना। सिर पर धरती या पृथ्वी उठाना = बहुत उत्पात करना। सिर पर पड़ना = (१) जिम्मे पड़ना। (२) अपने ऊपर घटित होना। गुजरना। सिर पर खेलना = जान को जोखों में डालना। सिर पर खून चढ़ना या सवार होना = (१) जान लेने पर उतारू होना। (२) इत्या के कारण आपे में न रहना। सिर पर रखना = प्रतिष्ठा करना। मान करना। सिर पर छप्पर रखना = बोझ से दबाना। दबाव डालना। सिर पर मिट्टी डालना = शोक करना। सिर पर लेना = ऊपर लेना। जिम्मे लेना। सिर पर शैतान चढ़ना = गुस्सा चढ़ना। सिर पर जूँ न रेंगना = ध्यान न होना। चेत न होना। होश न आना। सिर रहना = मान रहना। प्रतिष्ठा बनी रहना। (किसी के) सिर डालना = माथे मढ़ना। आरोपण करना। सिर पर बीतना = सिर पर पड़ना। सिर पर होना = थोड़े ही दिन रह जाना। बहुत निकट होना। (किसी का किसी के) सिर पर होना = संरक्षक होना। रक्षा करनेवाला होना। सिर परहाथ धरना या रखना = (१) संरक्षक होना। सहायक होना। (२) शपथ खाना। सिर पड़ना = (१) जिम्मे पड़ना। भार ऊपर दिया जाना। (२) हिस्से में जाना। सिर पड़ी सहना = अपने जिम्मे आई विपत्ति या झंझट को झेलना। उ०—पक गया जी नाक में दम हो गया, तुम न सुधरे, सिर पड़ी हमने सही।—चोखे०, पृ० ४७। सिर पर हाथ फेरना = प्यार करना। आश्वासन देना। ढारस बँधाना। उ०—बेत रह फेर में पड़े हम हैं, फेरते हाथ क्यों नहीं सिर पर।—चुभते०, पृ० ४। सिर फिरना = (१) सिर घूमना। सिर चकराना। (२) पागल हो जाना। उन्माद होना। (३) बुद्धि नष्ट होना। सिर फोड़ना = (१) लड़ाई झगड़ा करना। (२) कपालक्रिया करना। सिर फेरना = कहा न मानना। अवज्ञा करना। अस्वीकार करना। सिर बाँधना = (१) सिर पर आक्रमण करना। (पटेबाजी)। (२) चोटी करना। सिर गुँथना। (३) घोड़े की लगाम इस प्रकार पकड़ना कि चलते समय घोड़े की गर्दन सीधी रहे। सिर बेचना = सिर देना। फौज की नौकरी करना। सिर भारी होना = सिर में पीड़ा होना। सिर घूमना। सिर मारना = (१) समझाते समझाते हैरान होना। (२) सोचने विचारने में हैरान होना। सिर खपाना। (३) चिल्लाना। पुकारना। (४) बहुत प्रयत्न करना। अत्यंत श्रम करना। सिर मुँड़ाना = (१) बाल बनवाना। (२) जोगी बनना। फकीरी लेना। संन्यासी होना। सिर मुँड़ाते ही ओले पड़ना = आरंभ में ही कार्य बिगड़ना। कार्यारंभ होते ही विघ्न पड़ना। सिर मढ़ना = जिम्मे करना। इच्छा के विरुद्ध सपुर्द करना। सिर रँगना = सिर फोड़ना। सिर लोहू लोहान करना। सिर रहना = (१) किसी के पीछे पड़ना। (२) रात दिन परिश्रम करना। सिर सफेद होना = वृद्धावस्था आ जाना। सिर पर सेहरा होना = किसी कार्य का श्रेय प्राप्त होना। वाहवाही मिलना। सिर सहलाना = खुशामद करना। प्यार करना। सिर से बला टालना = बेगार टालना। जी लगाकर काम न करना। सिर से बोझ उतरना = (१) झंझट दूर होना। (२) निश्चिंचतता होना। सिर से पानी गुजरना = सहने की पराकाष्ठा होना। असह्य हो जाना। सिर घुटाना या घोटाना = सिर मुड़ाना। सिर से पैर तक = आरंभ से अंत तक। चोटी से एड़ी तक। सर्वांग में। पूर्णतया। सिर से पैर तक आग लगना = अत्यंत क्रोध होना। आग बबूला होना। सिर से चलना = बहुत संमान करना। सिर के बल चलना। सिर से सिरवाहा है = सिर के साथ पगड़ी है। अर्थात् सरदार के साथ फौज अवश्य रहेगी। मालिक के साथ उसके आश्रित अवश्य रहेंगे। सिर से कफन बाँधना = मरने के लिये उद्यत होना। सिर से खेलना = सिर पर भूत आना। सिर से खेल जाना = प्राण दे देना। सिर पर सींग होना = कोई विशेषता होना। खसूसियत होना। सुरखाब का पर होना। सिर का पसीना पैर तक आना = बहुत परिश्रम होना। सिर हथेली पर लेना = मृत्यु के लिये हरदम तैयार रहना (किसी का किसी के) सिर होना। (१) पीछेपड़ना। पीछा न छोड़ना। साथ साथ लगा रहना। (२) बार बार किसी बात का आग्रह करके तंग करना। (३) उलझ पड़ना। झगड़ा करना। (किसी बात के) सिर होना = ताड़ लेना। समझ लेना। (दोष आदि किसी के) सिर होना = जिम्मे होना। ऊपर पड़ना। जैसे,—यह अपराध तुम्हारे सिर है।२. ऊपर की और। सिरा। चोटी। ३. किनारा। ४. किसी वस्तु का ऊपरी भाग। ४. सरदार। प्रधान। जैसे, सिर से सिरवाहा। ५. दिमाग। अक्ल। ६. शुरूआत। प्रारंभ।

सिर (२)
संज्ञा पुं० [सं० शिर] पिपरामूल। पिप्पलीमूल।

सिर (३)
संज्ञा पुं० [अ० सिर्र] रहस्य। मर्म। भेद। राज [को०]।

सिरई
संज्ञा स्त्री० [हिं० सिर + ई (प्रत्य०)] चारपाई में सिरहाने की पट्टी।

सिरकटा
वि० [हिं० सिर + कटना] [वि० स्त्री० सिरकटी] १. जिसका सिर कट गया हो। जैसे,—सिरकटी लाश। २. दूसरों के सिर काटनेवाला। अनिष्ट करनेवाला। बुराई करनेवाला। अपकारी।

सिरका
संज्ञा पुं० [फा़० सिरकह्] धूप में पकाकर खट्टा किया हुआ ईख, अंगूर, जामुन, आदि का रस। उ०—(क) भई मिथौरी सिरका बरा। सोंठ लाय के खरसा धरा।—जायसी (शब्द०)। (ख) हे रे कलाली तौं क्या किया। सिरका सातै प्याला दिया।—संतवाणी०, पृ० ३३। विशेष—ईख, अंगूर, खजुर, जामुन आदि के रस को धूप में पकाकर सिरका बनाया जाता है। यह स्वाद में अत्यंत खट्टा होता है। वैद्यक में यह तीक्ष्ण, गरम, रुचिकारी, पाचक, हलका, रूखा, दस्तावर, रक्तपित्तकारक तथा कफ, कृमि और पांडु रोग का नाश करनेवाला कहा गया है। यूनानी मतानुसार यह कुछ गरमी लिए ठंढा और रुक्ष, स्निग्धताशोधक, नसों और छिद्रों में शीघ्र ही प्रवेश करनेवाला, गाढ़े दोषों को छाँटनेवाला, पाचक, अत्यंत क्षुधाकारक तथा रोध का उद् घाटक है। यह बहुत से रोगों के लिये परम उपयोगी है।

सिरकाकश
संज्ञा पुं० [फा़०] अरक खींचने का एक प्रकार का यंत्र।

सिरकाफरोश
वि० [फा़० सिरकह् फरोश] १. सिरका बेचनेवाला। जो सिरका बेचता हो। २. रूखी बातों करनेवाला। बेमुरव्वत [को०]।

सिरकी
संज्ञा स्त्री० [हिं० सरकंडा] १. सरकंडा। सरई। सरहरी। २. सरकंडे या सरई की पतली तीलियों की बनी हुई टट्टी जो प्रायः दीवार या गाड़ियों पर धूप और वर्षा से बचाव के लिये डालते हैं। उ०—विदित न सनमुख ह्वै सकै अँखिया बड़ी लजोर। बरुनी सिरकिन ओट ह्वै हेरत गोहन ओर।—रसनिधि (शब्द०)। ३. बाँस की पतली नली जिसमें बेल बूटे काढ़ने का कलाबत्तू भरा रहता है।

सिरखप (१)
वि० [हिं० सिर + खपना] १. सिर खपानेवाला। २. परिश्रमी। ३. निश्चय का पक्का।

सिरखप (२)
संज्ञा स्त्री० दे० 'सिरखपी'। उ०—जो तुमको यही समझ होती, तो मुझको इतनी सिरखप क्यों करनी पड़ती।— ठेठ०, पृ० ८।

सिरखपी
संज्ञा स्त्री० [हिं० सिर + खपना] १. परिश्रम। हैरानी। २. जोखिम। साहसपूर्ण कार्य।

सिरखिली
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की चिड़िया जिसका संपूर्णं शरीर मटमैला, पर चोंच और पैर काले होते हैं।

सिरखिस्त
संज्ञा पुं० [फा़० शीरखिस्त] एक प्रसिद्ध पदार्थ जो कुछ पेड़ों की पत्तियों पर ओस की तरह जम जाता है और दवा के काम में आता है। यव शर्करा। यवास शर्करा।

सिरखी
वि० [सं० सदूश, प्रा० सरिक्ष, रज० सिरखी] [पुं० सरखा (=सरीखा)] सदृश। समान। सरीखी। उ०—सूली सिरखी सेझड़ी, तो विण जाणे नाह।—ढोला०, दू० १६६।

सिरगनेस †
संज्ञा पुं० [हिं० श्रीगणेश] आरंभ। शुरुआत। उ०— पहले झगड़ा का सिरगनेस दो ही औरतों में होता है।— मैला०, पृ० ७१।

सिरगा
संज्ञा स्त्री० [देश०] घोड़े की एक जाति। उ०—सिरगा समँदा स्वाइ सेलिया सूर सुरंगा। मुखकी पंचकल्यान कुमेता केहरिरंगा।—सूदन (शब्द०)।

सिरगिरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० सिर + गिरि (=चोटी)] १. कलगी। शिखा। २. चिड़ियों के सिर की कलगी।

सिरगोला
संज्ञा पुं० [देश०] दुग्धपाषाण।

सिरघुरई
संज्ञा स्त्री० [हिं० सिर + घूरना (=घूमना), तुल० बँ० घुर] ज्वरांकुश तृण।

सिरचंद
संज्ञा पुं० [हिं० सिर + चंद] एक प्रकार का अर्धचंद्राकार गहना जो हाथी के मस्तक पर पहनाया जाता है। उ०—सिरचंद चंद दुचंद दुति आनंद कर मनिमय बसै।—गोपाल (शब्द०)।

सिरचढ़ा
वि० [हिं० सिर + चढ़ना] मुँहलना। बेअदब। ढीठ।

सिरजक पु
संज्ञा पुं० [सं० सर्जक, हिं० सिरिजन (< सं० √ सृज्> सिरिज + अन (प्रत्य०)] बनानेवाला। रचनेवाला। सृष्टिकर्ता। उ०—अब बंदौं कर जोरि कै, जग सिरजक करतार। रामकृष्ण पद कमल युग, जाको सदा अधार।—रघुराज (शब्द०)।

सिरजन
संज्ञा पुं० [सं० सर्जन, (हिं० सृजन)] निर्माण। रचना। सृष्टि करना। जैसे, सिरजनहार।

सिरजनहार पु
संज्ञा पुं० [हिं० सिरजन + हार (=वाला)] १. रचनेवाला। बनानेवाला। सृष्टिकर्ता। कर्तार। उ०—हे गुसाईं तू सिरजनहारू। तुइ सिरजा एहि समुँद अपारू।—जायसी (शब्द०)। २. परमेश्वर। उ०—माया सगी न मन सगा, सगा न यह संसार। परशुराम यह जीव को, सगा तो सिरजनहार।—रघुराज (शब्द०)।

सिरजना पु (१)
क्रि० स० [सं० सर्जन] रचना। उत्पन्न करना। सृष्टि करना। उ०—जग सिरजत पालत संहरत पुनि क्यो बहुरि करचो।—सूर (शब्द०)।

सिरजना पु (२)
क्रि० स० [सं० सञ्चयन] संचय करना। हिफाजत से रखना।

सिरजित पु
वि० [सं० सर्जित] सिरजा हुआ। रचा हुआ। उ०— तुम जदुनाथ अनन्य उपासी। नहिं मम सिरजित लोक विलासी।—रघुराज (शब्द०)।

सिरताज
संज्ञा पुं० [सं० सिर + फा० ताज] १. मुकुट। शिरोभूषण। २. शिरोमणि। सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति या वस्तु। सबसे उत्कृष्टव्यक्ति या वस्तु। उ०—राम को बिसारिबो निषेध सिरताज रो। राम नाम महामनि फनि जगजाल रे।—तुलसी (शब्द०)। ३. पति। शौहर (को०)। ४. स्वामी। प्रभु। मालिक। उ०— कुंजन में क्रीड़ा करै मनु वाही को राज। कंस सकुच नहिं मानई रहत भयो सिरताज।—सूर (शब्द०)। ५. सरदार। अग्रगण्य। अगुआ। मुखिया। उ०—सूर सिरताज महाराजनि के महाराज जाको नाम लेत है सुखेत होत ऊसरो।—तुलसी (शब्द०)। ६. एक प्रकार का आवरण, पर्दा या नकाब (को०)।

सिरतान
संज्ञा पुं० [हिं० सिर + तान ?] १. आसामी। काश्तकार। २. मालगुजार।

सिरतापा
क्रि० वि० [फा़० सर + ता + पा] १. सिर से पाँव तक। नख से लेकर शिख तक। उ०—केस मेघावरि सिर ता पाहिं।—जायसी (शब्द०)। २. आदि से अंत तक। संपूर्ण। बिलकुल। सरासर।

सिरती †
संज्ञा स्त्री० [हिं० सीर ] जमा जो आसामी जमींदार को देता है। लगान।

सिरत्राण पु
संज्ञा पुं० [सं० शिरस्त्राण] दे० 'शिरस्त्राण'।

सिरदा पु
संज्ञा पुं० [अ० सिजदा] दे० 'सिजदा'। उ०—(क) एका- दशी न रोजा करई। डंडवत करै न सिरदा परई।— पलटू०, भा० ३, पृ० ६०। (ख) कई लाख तुम रंडी छाँड़ी केते बेटी बेटा। कितने बैठे सिरदा करते माया जाल लपेटा।—मलूक०, पृ, १।

सिरदार पु ‡
संज्ञा पुं० [फा़० सरदार] दे० 'सरदार'। उ०—ब्रज परगन सिरदार महरि तू ताकी करत नन्हाई।—सूर (शब्द०)। (ख) सिरदार जूझत खेत मैं। भजि गए बहुत अचेत मैं।—सूदन (शब्द०)।

सिरदारी पुं ‡
संज्ञा स्त्री० [फा़० सरदार + ई (प्रत्य०)] दे० 'सरदारी'। उ०—साहिजहाँ यह चित्त बिचारी। दारा कौ दीन्हीं सिरदारी।—लाल कवि (शब्द०)।

सिरदुआली
संज्ञा स्त्री० [हिं० सिर + फा़० दुवाल] लगाम के कड़ों में लगा हुआ कानों के पीछे तक का घोड़ों का एक साज जो चमड़े या सूत का बना होता है।

सिरनाम पु
वि० [फा़० सरनाम] ख्यात। मशहूर। प्रसिद्ध। उ०— रोम रोम जो अघ भरचौ पतितन मैं सिरनाम। रसनिधि वाहि निबाहिबौ प्रभु तेरोई काम।—स० सप्तक, पृ० २२५।

सिरनामा
संज्ञा पुं० [फा़० सर + नामह् (=पत्र)] १. लिफाफे पर लिखा जानेवाला पता। २. पत्र के आरंभ में पत्र पानेवाले का नाम, उपाधि, अभिवादन आदि। ३. किसी लेख के विषय में निर्देश करनेवाला शब्द या वाक्य जो ऊपर लिख दिया जाता है। शीर्षक। (अं०) हेडिंग। सुर्खी।

सिरनेत
संज्ञा पुं० [हिं० सिर + सं० नेत्री (=धज्जी या डोरी)] १. पगड़ी। पटा। चीरा। उ०—(क) रे नेही मत डगमगै बाँध प्रीति सिरनेत।—रसनिधि (शब्द०)। (ख) अधम उधारन बिरद कौ तुम बाँधौ सिरनेत।—स० सप्तक, पृ० २२६। २. क्षत्रियों की एक शाखा जो अपना मूल स्थान श्रीनगर (गढ़वाल) बताती है। उ०—पुनि सिरनेतन्ह देस सिधारा। कीन्हो ब्याह, उछाह अपारा।—रघुराज (शब्द०)।

सिरपाँव †
संज्ञा पुं० [हिं० सिर + पाँव]दे० 'सिरोपाव'।

सिरपाउ पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'सिरोपाव'। उ०—सिरपाउ भाउ नष्षे सरस्स। को गनै द्रव्य भंडार अस्स।—पृ० रा०, ४।१२।

सिरपाव
संज्ञा पुं० [हिं० सिर + पाँव] दे० 'सिरोपाव'। उ०— कीरतसिंह भी घोड़े और सिरपाव पाकर अपने बाप के साथ रुखसत हुआ।—देवीप्रसाद (शब्द०)।

सिरपेँच, सिरपेच
संज्ञा पुं० [फा़० सर + पेच] १. पगड़ी। २. पगड़ी के ऊपर का छोटा कपड़ा। ३. पगड़ी पर बाँधने का एक आभूषण। उ०—कलगी, तुर्रा और जग सिरपेच सुकुंडल।—सूदन (शब्द०)।

सिरपैंच पु †
संज्ञा पुं० [हिं० सिरपेंच] दे० 'सिरपेच'। उ०—दीठि गई सिरपैंच पै फिर हारी मैं ऐंच। जो उरझी सुरझी न फिर परी पैंचि कै पैंच।—स० सप्तक, पृ० ३७६।

सिरपोश
संज्ञा पुं० [फा़० सरपोश] १. सिर पर का आवरण। टोप। कुलाह। २. बंदूक के ऊपर का कपड़ा। (लश्करी)।

सिरफूल
संज्ञा पुं० [हिं० सिर + फूल] सिर पर पहना जानेवाला स्त्रियों का फूल की आकृति का एक आभूषण। उ०—(क) छतियाँ पर लोल लुरै अलकैं सिरफूल अरुझि सो यौं दुति दै।—मन्नालाल (शब्द०)। (ख) बेनी चुनी चमकै किरनैं सिरफूल लख्यो रवि तूल अनूपमै।—मन्नालाल (शब्द०)।

सिरफेँटा
संज्ञा पुं० [हिं० सिर + फेंटा] साफा। पगड़ी। मुरेठा। उ०—पीरो झग पटुका बिन छोर छरी कर लाल जरी सिरफेंटा।—मन्नालाल (शब्द०)।

सिरबंद
संज्ञा पुं० [हिं० सिर + फा़० बंद] साफा।

सिरबंदी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० सिर + फा़० बेंदी] माथे पर पहनने का स्त्रियों का एक आभूषण।

सिरबंदी (२)
संज्ञा पुं० [हिं० सिर + बंद] रेशम के कीड़े का एक भेद।

सिरबोझी
संज्ञा पुं० [हिं० सिर + बोझ] एक प्रकार के पतले बाँस जो पाटन के काम में आते हैं।

सिरपच्चन †
संज्ञा पुं० [हिं० सिर + पचाना] सिर खपाना। सिर मगजन।

सिरमगजन †
संज्ञा पुं० [हिं० सिर + अ० मग्ज] माथा खोटी। माथा पच्ची। २. सिर खपाना। उ०—बेचारे वृद्ध आदमी को सुबह से शाम तक सिरमगजन करते गुजरता था।—रंगभूमि, भा० २, पृ० ९१९।

सिरमनि पु
संज्ञा पुं० [हिं० सिर + मणि]दे० 'शिरोमणि'।

सिरमुँड़ा
वि० [हिं०] १. जिसका सिर मुँड़ा हो। २. निगुरा। निगोड़ा। स्त्रियों की एक गाली।

सिरमौर
संज्ञा पुं० [हिं० सिर + मौर] १. सिर का मुकुट। उ०— याकें तीर सदा खुलि खेलत राधारमन रसिक सिरमौर। —घनानंद, पृ० ४४३। २. सिरताज। शिरोमणि। प्रधान या श्रेष्ठ व्यक्ति। उ०—सहज सलोने राम लखन ललित नाम जैसे सुने तैसेई कुँअर सिरमौर हैं।—तुलसी (शब्द०)।

सिररुह पु
संज्ञा पुं० [सं० सिरोरुह] दे० 'शिरोरुह'। उ०—बिथुरित सिररुह बरुथ कुंचित बिच सुमन जूथ, मनिजुत सिसु फनि अनीक ससि समीप आई।—तुलसी (शब्द०)।

सिरवा †
संज्ञा पुं० [हिं० सिरा] वह कपड़ा जिससे खलियान में अनाज बरसाने के समय हवा करते हैं। ओसाने में हवा करने का कपड़ा। मुहा०—सिरवा मारना = भूसा उड़ाने के लिये कपड़े आदि से हवा करना।

सिरवार पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० शैवाल] दे० 'सिवार'।

सिरवार † (२)
संज्ञा पुं० [हिं० सीर + कार] जमींदार का वह कारिंदा जो उसकी खेती का प्रबंध करता है।

सिरस
संज्ञा पुं० [सं० शिरीष] शीशम की तरह का लंबा एक प्रकार का ऊँचा पेड़। विशेष—इसका वृक्ष बड़ा किंतु अचिरस्थायी होता है। इसकी छाल भूरापन लिए हुए खाकी रंग की होती है। लकड़ी सफेद या पीले रंग की होती है, जो टिकाऊ नहीं होती। हीर की लकड़ी कालापन लिए भूरी होती है। पत्तियाँ इमली के पत्तियों के समान परंतु उनसे लंबी चौड़ी होती हैं। चैत वैशाख में यह वृक्ष फूलता फलता है। इसके फूल सफेद, सुगंधित, अत्यंत कोमल तथा मनोहर होते हैं। कवियों ने इसके फूल की कोमलता का वर्णन किया है। इसके वृक्ष से बबूल के समान गोंद निकलता है। इसकी छाल, पत्ते, फूल और बीज औषध के काम में आते हैं। इसके तीन भेद होते हैं। काला, पीला और लाल। आयुर्वेद के अनुसार यह चरपरा, शीतल, मधुर, कड़वा, कसैला, हलका तथा वात, पित्त, कफ सूजन, विसर्प, खाँसी, घाव, विषविकार, रुधिरविकार, कोढ़, खुजली, बवासीर, पसीने और त्वचा के रोगों को हरण करनेवाला है। यूनानी मतानुसार यह ठंढा और रूखा है। उ०—(क) बाम विधि मेरो सुख सिरस सुमन ताको छल छुरी कोह कुलिस ले टेई है।—तुलसी (शब्द०)। (ख) फूलों ही के कामवाण हैं, यह सब कहते आते हैं। सिरस फूल से भी मृदुतर, हम उसके बाहु बताते हैं।—महावीरप्रसाद (शब्द०)।

सिरसा
संज्ञा पुं० [सं० शिरीष] दे० 'सिरस'।

सिरसी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का तीतर।

सिरहाना
संज्ञा पुं० [सं० शिरस् + आधान] चारपाई में सिर की ओर का भाग। खाट का सिरा। मुँड़वारी। उ०—छूटी लटैं लटकैं सिरहाने ह्वै फैलि रहयो मुखस्वेद को पानी (शब्द०)।

सिरांबु
संज्ञा पुं० [सं० सिराम्बु] रक्त। खून [को०]।

सिरांचा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का पतला बाँस जिससे कुरसियाँ और मोढ़े बनते हैं।

सिराँह पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० शीतल, प्रा० सीअल, सीअउ, हिं० सियरा] शीतलता। छाँह या छाया जो शीतल है। उ०—रहयौ न काम कछू काहू सों पालत प्रान रावरी आँह। आनँदघन दुखताप मेटियै कृपा सिराँह।—घनानंद, पृ० ५०६।

सिरा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० सिर] १. लंबाई का अंत। लंबाई के दो छोरों में से कोई एक। छोर। टोंक। जैसे,—एक सिरे से दूसरे सिरे तक। २. ऊपर का भाग। शीर्ष भाग। ३. अंतिम भाग। आखिरी हिस्सा। ४. आरंभ का भाग। शुरू का हिस्सा। जैसे,—(क) सिरे से कहो, मैने सुना नहीं। (ख) अब वह काम नए सिरे से करना पड़ेगा । (ग) सिरे से आखीर तक। ५. नोक। अनी। ६. अग्रभाग। अगला हिस्सा। मुहा०—सिरे का = अव्वल दरजे का। पल्ले सिरे का। सिरे का रंग = सबसे प्रधान रंग। जेठा रंग। (रँगरेज)।

सिरा (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. रक्तनाड़ी। २. सिँचाई की नाली। ३. खेत की सिँचाई। ४. पानी की पतली धारा। ५. गगरा। कलसा। डोल।

सिराज
संज्ञा पुं० [अ०] १. सूर्य। २. दीपक। दिया [को०]।

सिराजाल
संज्ञा पुं० [सं०] १. नेत्र का एक रोग। शिराजाल। २. छोटी रक्तनाड़ियों का समूह। नाड़ीजाल [को०]।

सिराजी
संज्ञा पुं० [फा़० शीराज (नगर)] शीराज का घोड़ा। उ०—अबलक अरबी लखी सिराजी। चौधर चाल समँद भल ताजी।—जायसी (शब्द०)।

सिरात
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. रास्ता। सीधा मार्ग। २. नर्क के आरपार बाल से भी पतला और तलवार की धार से भी तेज पुल। विशेष—हदीस के अनुसार इस पुल पर से सभी को कयामत के दिन गुजरना होगा। धर्मात्मा इसपर से पार हो जायँगे और पापी कट मर जायँगे।

सिराना † (१)
क्रि० अ० [हिं० सीरा + ना] १. ठंढा होना। शीतल होना। २. मंद पड़ना। हतोत्साह होना। उमंग न रह जाना। हार जाना। उ०—वज्रायुध जल वरषि सिराने। परयो चरन तब प्रभु करि जाने।—सूर (शब्द०)। ३. समाप्त होना। खतम होना। अंत को पहुँचना। जैसे,—काम सिराना। ४. शांत होना। मिटना। दूर होना। उ०— अब रघुनाथ मिलाऊँ तुमको सुंदरि सोग सिराह।—सूर (शब्द)। ५. व्यतीत होना। बीत जाना। गुजर जाना। उ०—वेई चिरजीवी अमर निधरक फिरौ कहाइ। छिन बिछुरे जिनके न इहि पावस आयु सिराइ।—बिहारी (शब्द०)। ६. काम से छुट्टी मिलना। फुरसत वा अवकाश मिलना।

सिराना (२)
क्रि० स० १. ठंढा करना। शीतल करना। २. जल में डुबाकर शीतल करना। जैसे, मौर सिराना। ३. समाप्त करना। खतम करना। ४. व्यतीत करना। बिताना।

सिरापत्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. अश्वत्थ वृक्ष। पीपल का वृक्ष। २. एक प्रकार की खजूर।

सिराप्रहर्ष
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सिराहर्ष'।

सिरामूल
संज्ञा पुं० [सं०] नाभि।

सिरामोक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] फसद खुलवाना। शरीर का दूषित रक्त निकलवाना।

सिरायत
संज्ञा स्त्री० [अ०] जज्ब होना। प्रवेश करना। घुसना [को०]।

सिरायना
क्रि० स० [हिं० सिराना] दे० 'सिराना'।

सिरार
संज्ञा स्त्री० [हिं० सिरा] वह लकड़ी जो पाई के सिरे पर लगाई जाती है। (जुलाहे)।

सिराल (१)
वि० [सं०] जिसमें बहुत नसें या रेशे हों।

सिराल (२)
संज्ञा पुं० कमरख। दे० 'सिराला' [को०]।

सिरालक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का अंगूर।

सिराला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक प्रकार का पौधा। कमरख का फल। कर्मरंग फल।

सिराली
संज्ञा स्त्री० [हिं० सिर] मयूरशिखा। मोर की कलगी।

सिरालु
वि० [सं०] बहुत शिराओंवाला। सिराल [को०]।

सिरावन (१)
संज्ञा पुं० [सं० सीर (= हल)] जुता हुआ खेत बराबर करने का पाटा। हेंगा।

सिरावन (२)
वि० [हिं० सिराना] १. शीतल करनेवाला। सिरानेवाला। २. संताप या कष्ट दूर करनेवाला।

सिरावना पु †
क्रि० स० [हिं० सिराना] दे० 'सिराना'। उ०— जोइ जोइ भावे मेरे प्यारे। सोई सोइ दैहौं जु रेदुला। कहयौ है सिरावन सीरा। कछु हट न करौ बलबीरा।—सूर (शब्द०)।

सिरावृत्त
संज्ञा पुं० [सं०] सीसा नामक धातु।

सिरावेध, सिरावेधन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सिरामोक्ष' [को०]।

सिराव्यध, सिराव्यधन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सिरामोक्ष' [को०]।

सिराहर्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुलक। रोमांच। २. आँख के डोरों की लाली।

सिरिख पु
संज्ञा पुं० [सं० शिरीष] दे० 'सिरस'।

सिरिन
संज्ञा पुं० [देश] रक्तशिरीष वृक्ष। लाल सिरस।

सिरियारी
संज्ञा स्त्री० [सं० शिरियारी] सुचिष्णक शाक। सुसना का साग। हाथीशुंडी।

सिरिश्ता
संज्ञा पुं० [फा़० सरिश्तह्] विभाग। मुहकमा।

सिरिश्तेदार
संज्ञा पुं० [फा़०] अदालत का वह कर्मचारी जो मुकदमों के कागजपत्र रखता है।

सिरिश्तेदारी
संज्ञा स्त्री [फा़०] सरिश्तेदार का काम या पद।

सिरिस
संज्ञा पुं० [सं० शिरीष, प्रा० सिरिस] दे० 'सिरस'। उ०— विधि केहि भाँति धरौं उर धीरा। सिरिस सुमन कन बेधिय हीरा।—मानस, १।२५८।

सिरी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. करघा। २. कलिहारी। लांगली।

सिरी पु (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० श्री] १. लक्ष्मी। २. शोभा। कांति। ३. रोली। रोचना। उ०—(क) धधकी है गुलाल की धूँधुर में धरि गोरी लला मुख मीड़ि सिरी।—शंभु (शब्द०)। (ख) सोन रूप भल भएउ पसारा। धवल सिरी पोतहिं घर बारा।—जायसी (शब्द०)। विशेष—'श्री' का लाल चिह्न तिलक में रोली से बनाते हैं, इसीलिये रोली को भी श्री या 'सिरी' कहते हैं। ४. ऐश्वर्य। विभव। संपत्ति। समृद्धि। ५. माथे पर का एक गहना। उ०—सुंडा दंड लसै जैसो वैसो रद दरसावै सोहै सभी सीस भारी सिरी कुंभ पर है।—गोपाल (शब्द०)।

सिरीज
संज्ञा पुं० [अं०] मंगल और बृहस्पति के बीच का एक ग्रह जिसका पता आधुनिक पाश्चात्य ज्योतिषियों ने लगाया है। विशेष—यह सूर्य से प्रायः साढ़े अट्ठाइस कोटि मील की दूरी पर है। इसका व्यास १७६० मील का है। इसे निजकक्षा की परिक्रमा में १६८० दिन लगते हैं। १९ वीं शताब्दी में सिसली नामक उपद्वीप में यह ग्रह पहले देखा गया था। इसका वर्ण लाल है और यह आठवें परिमाण के तारों के समान दिखाई पड़ता है।

सिरीपंचमी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० श्रीपञ्चमी] दे० 'श्रीपंचमी'। उ०— दई दई कर सुरति गँवाई। सिरीपंचमी पूजै आई।—जायसी (शब्द०)।

सिरीराग पु
संज्ञा पुं० [सं० श्रीराग] संपूर्ण जाति का एक राग। छह प्रमुख रागों में तीसरा राग। विशेष दे० 'श्रीराग'। उ०— पचएँ सिरी राग भल कियो। छठएँ दीपक उठा बर दियो।—जायसी (शब्द०)।

सिरीस
संज्ञा पुं० [सं० शिरीष, प्रा० सिरीस] दे० 'सिरस'।

सिरोत्पात
संज्ञा पुं० [सं०] एक नेत्ररोग जिसमें आँखों के डोरे अधिक सुर्ख हो जाते हैं [को०]।

सिरोना
संज्ञा पुं० [हिं० सिर + ओना] रस्सी का बना हुआ मेंडरा जिसपर घड़ा रखते हैं। इँडुरी। बिड़वा।

सिरोपाव
संज्ञा पुं० [हिं० सिर + पाँव] सिर से पैर तक का पहनावा (अंगा, पगड़ी, पाजामा, पटका और दुपट्टा) जो राज दरबार से संमान के रूप में दिया जाता है। खिलअत।

सिरोमनि
संज्ञा पुं० [सं० शिरोमणि] दे० 'शिरोमणि'।

सिरोरुह
संज्ञा पुं० [सं० शिरोरुह] दे० 'शिरोरुह'।

सिरोही (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की चिड़िया जिसकी चोंच और पैर लाल और शेष शरीर काला होता है।

सिरोही (२)
संज्ञा पुं० १. राजपुताने में एक स्थान जहाँ की बनी हुई तलवार बहुत ही लचीली और बढ़िया होती है। उ०—तरवार सिरोही सोहती लाख सिकोही बोहती। जिमि सेना द्रोही जोहती लाज अरोही मोहती।—गोपाल (शब्द०)। २. तलवार। असि।

सिर्का
संज्ञा पुं० [फा़० सिरकह्] दे० 'सिरका'।

सिर्फ (१)
क्रि० वि० [अ० सिर्फ़] केवल। मात्र।

सिर्फ (२)
वि० १. एक मात्र। अकेला। २, शुद्ध। खालिस।

सिर्री †
वि० [सं० श्रृणीक] दे० 'सिड़ी'।

सिल (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० शिला] १. पत्थर। चट्टान। शिला। उ०— धोवैं नीर उडप पग धरजै, रज सिल उठी, किसू वनदार।—रघु० रू० पृ० ११०। २. पत्थर की बनी हुई एक प्रकार की चौकोर या लंबोतरी पटिया जिसपर बट्टे से मसाला आदि पीसते हैं। यौ०—सिल बट्टा। ३. पत्थर का गढ़ा हुआ चौकोर टुकड़ा जो इमारतों में लगता है । चौकोर पटिया। ४. काठ की पटरी जिसपर दबाकर रूई की पूनी बनाई जाती है।

सिल (२)
संज्ञा पुं० [सं० शिल] कटे हुए खेत में गिरे अनाज चुनकर निर्वाह करने की वृत्ति। दे० 'शिल', 'शिलोंछ'।

सिल (३)
संज्ञा पुं० [देश०] बलूत की जाति का एक पहाड़ी पेड़ जो हिमालय पर होता है। बंज। मारू।

सिल (४)
संज्ञा पुं० [अ०] तपेदिक। राजयक्ष्मा। क्षय रोग।

सिलक (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० सलग (= लगातार)] १. लड़ी। हार। २. पंक्ति। पाँत।

सिलक (२)
संज्ञा पुं० तागा। धागा।

सिलकी
संज्ञा पुं० [देश०] बेल। उ०—सुरभी सिलकी सदाफल बेल ताल मालूर।—अनेकार्थ० (शब्द०)।

सिलखड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० सिल + खड़िया] १. एक प्रकार का चिकना मुलायम पत्थर जो बरतन बनाने के काम आता है। विशेष—इसकी बुकनी चीजों को चमकाने के लिये पालिश और रोगन बनाने के भी काम में आती है। २. सेतखड़ी खरिया मिट्टी। दुद्धी।

सिलखरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० सिल + खड़िया] दे० 'सिलखड़ी'।

सिलगना क्रि० अ० [हिं० सुलगना] दे०
'सुलगना'। उ०—(क) बिरहिन पै आयौ मनौ मैन दैन तरबाह। जुगनू नाहीं जामुगी सिलगत ब्याहमि ब्याह।—रसनिधि (शब्द०)। (ख) आग भी आतिशदान में सिलग रही है। हवा उस समय सर्द चल रही थी।—शिवप्रसाद (शब्द०)।

सिलप पु †
संज्ञा पुं० [सं० शिल्प] दे० 'शिल्प'। उ०—विश्वकर्मा सुतिहार श्रुति धरि सुलभ सिलप दिखावनो। तेहि देखे त्रय ताप नाशै ब्रजबधू मन भावनो। सूर (शब्द०)।

सिलपची
संज्ञा स्त्री० [फा़० चिलमची] दे० 'चिलमची'।

सिलपट (१)
वि० [सं० शिलापट्ट] १. साफ। २. बराबर। चौरस। क्रि० प्र०—करना। होना ३. घिसा हुआ। मिटा हुआ। ४. चौपट। सत्तानाश।

सिलपट (२)
संज्ञा पुं० [अं० स्लिपर] एड़ी की ओर खुली हुई जूती। चट्टी। चप्पल।

सिलपोहनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० सिल + पोहना] विवाह की एक रीति। उ०—सिंदूर बंदन होम लावा होन लागी भाँवरी। सिलपोहनी करि मोहनी मन हरयौ मूरति साँवरी।—तुलसी (शब्द०)। विशेष—विवाह में मातृकापूजन के समय वर और कन्या के माता पिता सिल पर थोड़ी सी भिगोई हुई उरद की दाल रखकर पीसते हैं। इसी को 'सिलपोहनी' कहते हैं।

सिलफची
संज्ञा स्त्री० [फा़० चिलमची] दे० 'चिलमची'।

सिलफोड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० सिल + फोड़ना] पाषाणभेद। पत्थरचूर नाम का पौधा।

सिलबट्टा
संज्ञा पुं० [हिं० सिल + बट्टा] सिल और बट्टा अर्थात् लोढ़िया।

सिलबरुआ
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का बाँस जो पूरबी बंगाल की ओर होता है।

सिलमाकुर
संज्ञा पुं० [अँ० सेलमेकर] पाल बनानेवाला। (लश्करी)।

सिलवट (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] सुकड़ने से पड़ी हुई लकीर। चुनट। बल। शिकन। सिकुड़न। वली। क्रि० प्र०—डालना।—पड़ना।

सिलवट (२)
संज्ञा पुं० [हिं० सिल + बट्टा] १. दे० 'सिलबट्टा'। २. सिल जिसपर मसाला आदि पीसते हैं।

सिलवाना
क्रि० स० [हिं० सीना का प्रे० रूप] किसी को सीने में प्रवृत्त करन। सिलाना।

सिलसिला (१)
संज्ञा पुं० [अ०] १. बँधा हुआ तार। क्रम। परंपरा २. श्रेणी। पंक्ति। जैसे,—पहाड़ों का सिलासिला। ३. जंजीर। लड़ी। ४. व्यवस्था। तरतीब। जैसे,—कुरसियों को सिलासिले से रख दो। ५. कुलपरंपरा। वंशानुक्रम। ६. संबंध। लगाव। वेश। ८. बेड़ी। शृंखला। निगड।

सिलसिला (२)
वि० [सं० सिक्त] १. भींगा हुआ। आर्द्र। गीला। २. जिसपर पैर फिसले। रपटनवाला। रपटीला। ३. चिकना। मृदु। उ०—बैंदी भाल तमोल मुख, सीस सिलसिले बार। द्दग आँजे राजे खरी, येही सहज सिंगार।—बिहारी (शब्द०)।

सिलसिलाबंदी
संज्ञा स्त्री० [अ० सिलसिला + फा़० बंदी] १. क्रम का बंधान। तरतीब। २. कतारबंदी। पंक्ति बँधाई।

सिलसिलेवार
वि० [अ० सिलासिला + फा़० वार] तरतीबवार। क्रमानुसार।

सिलह
संज्ञा पुं० [अ० सिलाह] हथियार। शस्त्र। उ०—आपु गुसल करि सिलह करि हुवै नगारे दोइ। देत नगारे तीसरे ह्वै सवार सब कोइ।—सूदन (शब्द०)। यौ०—सिलहखाना। सिलहदस्त = शस्त्रपाणि। सशस्त्र। सिलह- दार = (१) दे० 'सिलहपोश'। (२) योद्धा। सिपाही। शस्त्र- जीवी। सिलहदारी = सिपाही का काम या पेशा। सिलहपोश = शस्त्रधारी। हथियारबंद।

सिलहखाना
संज्ञा पुं० [अ० सिलाह + फा़० खानह्] अस्त्रागार। हथियार रखने का स्थान।

सिलहट
संज्ञा पुं० [देश०] १. आसाम का एक नगर। २. एक प्रकार का अगहनी धान। ३. एक प्रकार की नारंगी जो सिलहट (आसाम) में होती है।

सिलहटिया (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की नाव जिसके आगे पीछे दोनों तरफ के सिक्के लंबे होते हैं।

सिलहटिया (१)
वि० [सिलहट + हिं० इया (प्रत्य०)] सिलहट संबंधी। सिलहट का।

सिलहार, सिलहारा
संज्ञा पुं० [सं० शिलकार] खेत में गिरा हुआ अनाज बीननेवाला।

सिलहिला
वि० [हिं० सील, सीड़ + हीला (= कीचड़)] [वि० स्त्री० सिलहिली] जिसपर पैर फिसले। रपटनवाला। रपटीला। कीचड़ से चिकना। उ०—घर कबीर का शिखर पर, जहाँ सिल- हली गैल। पाँय न टिकै पिपीलिका, खलक न लादे बैल।—कबीर (शब्द०)।

सिलही
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का पक्षी।

सिला (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० शिला] दे० 'शिला'। उ०—ह्वैहैं सिला सब चंद्रमुखी परसे पद मंजुल कंज तिहारे। कीन्हीं भली रघुनंदन जू करुना करि कानन को पग धारे।—तुलसी (शब्द०)।

सिला (२)
संज्ञा पुं० [सं० शिल] १. खेत से कटी फसल उठा ले जाने के पश्चात् गिरा हुआ अनाज। कटे खेत में से चुना हुआ दाना। उ०—करौं जो कछु धरौ सचि पचि सुकृत सिला बठोरि। पौठि उर बरबस दयानिधि दंभ लेत अँजोरि।—तुलसी (शब्द०)। क्रि० प्र०—चुनना।—बीनना। २. पछोड़ने या फटकने के लिये रखा हुआ अनाज का ढेर। ३. कटे हुए खेत में गिरे अनाज के दानों को बीन या चुन कर उसी से जीवन निर्वाह करने की वृत्ति अथवा क्रिया। शिलवृत्ति।

सिला (३)
संज्ञा पुं० [अ० सिलह्] १. बदला। एवज। पलटा। प्रतीकार। मुहा०—सिले में = बदले में। उपलक्ष में। २. इनाम। पुरस्कार (को०)। ३. उपहार। तोहफा (को०)।

सिलाई (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० सीना + आई (प्रत्य०)] १. सीने का काम। सूई का काम। २. सीने का ढंग। जैसे,—इस कोट की सिलाई अच्छी नहीं है। ३. सीने की मजदूरी। ४. टाँका। सीवन।

सिलाई † (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक कीड़ा जो प्रायः ऊख या ज्वार के खेतों में लग जाता है। इसका शरीर भूरापन लिए हुए गहरा लाल होता है।

सिलाजीत
संज्ञा पुं० [सं० शिलाजतु] १. पत्थर की चट्टानों का लसदार पसेव जो बड़ी भारी पुष्टई माना जाता है। विशेष दे० 'शिलाजीत'। २. गेरू। गैरिक।

सिलाना (१)
क्रि० स० [हिं० सीना का प्रे० रूप] सीने का काम दूसरे से कराना। सिलवाना।

सिलाना पु (२)
क्रि० स० [हिं० सिराना] दे० 'सिराना'।

सिलाबाक
संज्ञा पुं० [हिं० शिला + पाक] पथरफूल। छरीला। शैलज।

सिलाबी
वि० [हिं० सीड़, सील + फा़० आब(= पानी); अथवा फा़० सैलाबी ?] सीड़वाला। तर।

सिलामा
संज्ञा पुं० [अ० सिलामह्] १. मसाला आदि पीसने की सिल। २. बट्टा। दे० 'सिलौट' [को०]।

सिलारस
संज्ञा पुं० [सं० शिलारस] १. सिल्हक वृक्ष। २. सिल्हक वृक्ष का निर्यास या गोंद जो बहुत सुगंधित होता है। विशेष—यह पेड़ एशियाई कोचक के दक्खिन के जंगलों में बहुत होता है। इसका निर्यास 'सिलारस' के नाम से बिकता है और औषध के काम में आता है।

सिलावट
संज्ञा पुं० [सं० शिला + पटु] पत्थर काटने और गढ़नेवाले। संगतराश। उ०—अली मरदान खाँ को लिखा कि खाती बेलदार और सिलावट भेजकर रस्ता चौड़ा करे।—देवी- प्रसाद (शब्द०)।

सिलासार
संज्ञा पुं० [सं० शिलासार] लोहा।

सिलाह
संज्ञा पुं० [अ०] १. जिरह बकतर। कवच। उ०—जाली की आँगी कसी यों उरोजनि मानो सिपाहो सिलाह किए द्वै।—मन्नालाल (शब्द०)। २. अस्त्र शस्त्र। हथियार।

सिलाहखाना
संज्ञा पुं० [अ० सिलाह + फा़० खानह्] हथियार रखने का स्थान। शस्त्रालय। अस्त्रागार।

सिलाहपोश, सिलाहबंद
वि० [अ० सिलाह + फा़० बंद] सशस्त्र। हथियारबंद। शस्त्रों से सुसज्जित।

सिलाहर
संज्ञा पुं० [सं० शिल + हर] १. खेत में से एक एक दाना अन्न बीनकर निर्वाह करनेवाला मनुष्य। सिला बीननेवाला। सिलहार। २. अकिंचन। दरिद्र।

सिलाहसाज
संज्ञा पुं० [अ० सिलाह + फा़० साज़] हथियार बनानेवाला।

सिलाही
संज्ञा पुं० [अ० सिलाह + ई (प्रत्य०)] शस्त्र धारण करनेवाला। सैनिक। सिपाही।

सिलिंगिया †
संज्ञा स्त्री० [हिं० शिलांग + इया (प्रत्य०)] पूरबी हिमा- लय के शिलांग प्रदेश में पाई जानेवाली एक प्रकार की भेड़।

सिलि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० सिल या सिल्ली] शिला। पत्थर की पटिया। उ०—सुख के माथे सिलि परै, (जो) नाम हृदय से जाय। बलिहारी वा दुःख की पल पल नाम रटाय।—कबीर सा० सं०, पृ० ५।

सिलिप पु (१) †
संज्ञा पुं० [सं० शिल्प] दे० 'शिल्प'। उ०—खेती, बनि विद्या, बनिज, सेवा, सिलिप सुकाज। तुलसी सुरतरु, धेनु, महि, अभिमत भोग बिलास।—तुलसी (शब्द०)।

सिलिप (२)
संज्ञा स्त्री० [अँ० स्लिप] कागज का छोटा टुकड़ा जिसपर कोई संक्षिप्त बात टाँकी जाय या लिखकर कहीं भेजी जाय।

सिलिपर
स्त्री० पुं० [अँ० स्लीपर] दे० 'सिलीपर'।

सिलिया
संज्ञा स्त्री० [सं० शिला] एक प्रकार का पत्थर जो मकान बनाने के काम में आता है।

सिलियार, सिलियारा
संज्ञा पुं० [सं० शिल + हार या हारक] दे० 'सिलाहर'।

सिलिसिलिक
संज्ञा पुं० [सं०] गोंद। लासा।

सिलींध्र
संज्ञा पुं० [सं० शिलीन्ध्र] दे० 'शिलींध्र'।

सिलीपर
संज्ञा पुं० [अं० स्लीपर] १. लकड़ी की वह धरन जिनके ऊपर रेल की पटरी बिछाई जाती है। २. दे० 'स्लीपर'।

सिलीमुख पु
संज्ञा पुं० [सं० शिलीमुख] दे० 'शिलीमुख'। उ०— रावन सिर सरोज बन चारी। चलि रघुबीर सिलीमुख धारी।—मानस, ६।९१।

सिलेक्ट कमिटी
संज्ञा स्त्री० [अं०] वह कमिटी जिसमें कुछ चुने हुए मेंबर या सदस्य होते हैं और जो किसी महत्व के विषय पर विचार कर अपना निर्णय साधारण सभा में उपस्थित करती है।

सिलेट †
संज्ञा स्त्री० [अं० स्लेट] दे० 'स्लेट'।

सिलोंध †संज्ञा स्त्री० [देश०]
एक प्रकार की बड़ी मछली जो भारत और बर्मा की नदियों में पाई जाती है। यह छह् फुट तक लंबी होती है।

सिलोच्च
संज्ञा पुं० [सं० शिलोच्च] एक पर्वत जो गंगा तट पर विश्वामित्र के सिद्धाश्रम से मिथिला जाते समय राम को मार्ग में मिला था। उ०—यह हिमवंत सिलोच्चै नामा। शृंग गंग तट अति अभिरामा।—रघुराज (शब्द०)।

सिलौआ
संज्ञा पुं० [देश०] सन के मोटे रेशे जिनसे टोकरी बनाई जाती है।

सिलौट, सिलौटा
संज्ञा पुं० [हिं० सिल + बट्टा] १. सिल। २. सिल तथा बट्टा।

सिलौटी
संज्ञा स्त्री० [हिं० सिल + औटा (प्रत्य०)] भाँग, मसाला आदि पीसने की छोटी सिल।

सिल्क
संज्ञा पुं० [अं०] १. रेशम। २. रेशमी कपड़ा।

सिल्प पु
संज्ञा पुं० [सं० शिल्प] दे० 'शिल्प'।

सिल्ल
संज्ञा पुं० [अ०] दे० 'सिल'।

सिल्लकी
संज्ञा स्त्री० [सं०] शल्लकी वृक्ष। सलई का पेड़।

सिल्ला
संज्ञा पुं० [सं० शिल] १. अनाज की बालियाँ या दाने जो फसल कट जाने पर खेत में पड़े रह जाते हैं और जिन्हें चुनकर कुछ लोग निर्वाह करते हैं। मुहा०—सिल्ला बीनना या चुनना = खेत में गिरे अनाज के दाने चुनना। उ०—कबिरा खेती उन लई, सिल्ला बिनत मजूर (शब्द०)। २. खलियान में गिरा हुआ अनाज का दाना। ३. खलियान में बरसाने के स्थान पर लगा हुआ भूसे का ढेर जिसमें कुछ दाने भी चले जाते हैं।

सिल्ली (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० शिला] १. पत्थर का सात आठ अंगुल लंबा छोटा टुकड़ा जिसपर घिसकर नाई उस्तरे की धार तेज करते है। हथियार की धार चोखी करने का पत्थर। सान। २. आरे से चोरकर पेड़ी से निकाला हुआ तख्ता। फलक। पटरी। ३. पत्थर की छोटी पतली पटिया। ४. नदी में वह स्थान जहाँ पानी कम और धारा बहुत तेज होती है। (माझी)।

सिल्ली (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० सिल्ला] फटकने के लिये लगाया हुआ अनाज का ढेर।

सिल्ली (३)
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार क जलपक्षी जिसका शिकार किया जाता है। विशेष—यह हाथ भर के लगभग लंबा होता है और तालों के किनारे दलदलों के पास पाया जाता है। यह मछली पकड़ने के लिये पानी में गोता लगाता है।

सिल्ह
संज्ञा पुं० [सं०] १. सिलारस नामक गंधद्रव्य। २. सिलारस का पेड़। यौ०—सिल्हभूमिक = शिलारस वृक्ष। सिल्हसार।

सिल्हक
संज्ञा पुं० [सं०] सिलारस नामक गंधद्रव्य। कपितैल। कपिचंचल।

सिल्हकी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह पेड़ जिससे शिलारस निकलता है। २. कुंदुरु। शल्लकी निर्यास।

सिल्हसार
संज्ञा पुं० [सं०] एक गंधद्रव्य। शिलारस [को०]।

सिव पु
संज्ञा पुं० [सं० शिव] दे० 'शिव'। उ०—सिव सिवता इनही तैं लही।—सूर०, ३।१३। यौ०—सिवरिपु पु = शिवका शत्रु कामदेव। सिवलिंग = दे० 'शिवलिंग'। सिवलिंगी = एक लता। शिवलिंगी।

सिवई
संज्ञा स्त्री० [सं० समिता (=गेहूँ का गुँधा हुआ आटा), या सूत्रिका] गुँधे हुए आटे के सूत के से सूखे लच्छे जो दूध में पकाकर खाए जाते हैं। सिवैयाँ। मुहा०— सिवईं बटना या तोड़ना = गीले आटे को हथेलियों के बीच में रगड़ते हुए सूत के से लच्छे बनाना। सिवैयाँ बनाना। सिवईं पूरना = दे० 'सिवईं बटना'।

सिवक
संज्ञा पुं० [सं०] १. सीनेवाला। २. दरजी।

सिवता पु
संज्ञा स्त्री० [सं० शिवता] शिव का भाव या धर्म। उ०— गंगा प्रगट इनहि तै भई। सिव सिवता इनहीं तै लई।—सूर०, ३।१३।

सिवर
संज्ञा पुं० [सं०] हाथी। हस्ती। गज।

सिवलिंगीं
संज्ञा स्त्री० [सं० शिवलिङ्गी] दे० 'शिवलिंगी'।

सिवस
संज्ञा पुं० [सं०] १. वस्त्र। कपड़ा। २. पद्य। श्लोक।

सिवा पु (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० शिवा] १. पार्वती। दे० 'शिवा'। उ०— रचि महेस निज मानस राखा। पाह सुसमउ सिवा सन भाखा।—मानस, १।३५। २. श्रृगालिन। सियारिन।

सिवा (२)
अव्य० [अ०] अतिरिक्त। छोड़कर। अलावा। बाद देकर। जैसे,—तुम्हारे सिवा और यहाँ कोई नहीं आया।

सिवा (३)
वि० अधिक। ज्यादा। फालतू।

सिवाइ पु
अव्य० [अ० सिवा] 'सिवाय', 'सिवा' (१)।

सिवाई (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की मिट्टी।

सिवाई † (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० सिव (=सीना) + आई (प्रत्य०)] दे० 'सिलाई'।

सिवाती पु
संज्ञा पुं० [सं० स्वाति, हिं० स्वाती] स्वाती नाम का नक्षत्र। उ०—तुरत गरभ रहि जाइ सिवाती चात्रिक पानी।—पलटू०, पृ० ९५।

सिवान
संज्ञा पुं० [सं० सीमान्त] १. किसी प्रदेश का अंतिम भाग जिसके आगे दूसरा प्रदेश पड़ता हो। हद। सरहद। सीमा। २.किसी गाँव के छोर पर की भूमि। गाँव की हद। सीमा। ३. गाँव के अंतर्गत भूमि। ४. फसल तैयार हो जाने पर जमींदार और किसान में अनाज का बँटवारा।

सिवाय (१)
क्रि० वि० [अ० सिवा] अतिरिक्त। अलावा। छोड़कर। बाद देकर। उ०—समुद्र को चंद्रमा के सिवाय और कौन बढ़ा सकता है।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १,पृ० ३८९।

सिवाय (२)
वि० १. आवश्यकता से अधिक। जरुरत से ज्यादा। वेशी। २. अधिक। ज्यादा। ३. ऊपरी। बालाई। मामूली से अतिरिक्त और।

सिवाय (३)
संज्ञा पुं० वह आमदनी जो मुकर्रर वसूली के ऊपर हो।

सिवार
संज्ञा स्त्री० पुं० [सं० शैवाल] पानी में बालों के लच्छों की तरह फैलनेवाला एक तृण। उ०—(क) पग न इत उत धरन पावत उरझि मोह सिवार।—सूर (शब्द०)। (ख) चलती लता सिवार की, जल तरंग के संग। बड़वानल को जनु धरचो, धूम धूमरो रंग।—तुलसी (शब्द०)। विशेष—यह नदियों में प्रायः होता है। इसका रंग हलका हरा होता है। यह चीनी साफ करने तथा दवा के काम में आता है। वैद्यक में यह कसैला, कडुआ, मधुर, शीतल, हलका, स्निग्ध, नमकीन, दस्तावर, घाव को भरनेवाला तथा त्रिदोष को नाश करनेवाला कहा गया है।

सिवाल
संज्ञा स्त्री०, पुं० [सं० शैवाल] दे० 'सिवार'। उ०—नीलांबर नील जाल बीच ही उरझि सिवाल लट जाल में लपटि परयो।—देव (शब्द०)।

सिवाला
संज्ञा पुं० [सं० शिवालय] शिव का मंदिर।

सिवाली
संज्ञा पुं० [सं० शैवाल] एक प्रकार का मरकत या पन्ना जिसका रंग कुछ हलका होता है और जिसमें कभी कभी ललाई की भी कुछ आभा रहती है।

सिवि पु
संज्ञा पुं० [सं० शिवि] एक नरेश। विशेष दे० 'शिवि'। उ०—सिवि दधीचि हरिचंद कहानी।—मानस, २।४८।

सिविका पु
संज्ञा स्त्री० [सं० शिविका] दे० 'शिविका'। उ०—राजा की रजाइ पाइ सचिव सहेली धाइ सतानंद ल्याए सिय सिविका चढ़ाइ कै।—तुलसी (शब्द०)।

सिविर
संज्ञा पुं० [सं० शिविर] दे० 'शिविर'। उ०—बसत सिविर मधि मगध अध सुत। जिमि उड़गन मधि रवि ससि छबि जुत।—गि० दास (शब्द०)।

सिविल
वि० [अँ०] १. नगर संबंधी। नागरिक। २. नगर की शांति के समय देखरेख या चौकसी करनेवाला। जैसे—सिविल पुलिस। ३. मुल्की। माली। ४. शालीन। सभ्य। मिलनसार।

सिविल डिसओबीडिएंस
संज्ञा पुं० [अँ०] दे० 'सविनय कानुन का भंग'।

सिविल नाफरमानी
संज्ञा पुं० [अँ० सिविल + फा० नाफर्मानी] सविनय अवज्ञा। सविनय कानून भंग।

सिविल प्रोसीजर कोड़
संज्ञा पुं० [अँ०] न्यायविधान। जाब्ता दीवानी।

सिविल वार
संज्ञा पुं० [अँ०] दे० 'गृहयुद्ध'।

सिविल सर्जन
संज्ञा पुं० [अँ०] सरकारी बड़ा डाक्टर जिसे जिले भर के अस्पतालों, जेलखानों तथा पागलखानों को देखने का अधिकार होता है।

सिविल सर्विस
संज्ञा स्त्री० [अँ०] ब्रिटिश शासनकाल में अँगरेजी सरकार की एक विशेष परीक्षा जिसमें उत्तीर्ण व्यक्ति देश के प्रबंध और शासन में ऊँचे पद पर नियुक्त होते थे।

सिवीलियन
संज्ञा पुं० [अँ०] १. सिविल सर्विस परीक्षा पास किया हुआ मनुष्य। २. मुल्की अफसर। देश के शासन और प्रबंध विभाग का कर्मचारी।

सिवैयाँ
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'सिवईं'। मुहा०—सिवैयाँ तोड़ना, सिवैयाँ पूरना या बटना = दे० 'सिवईं बटना'।

सिष पु
संज्ञा पुं० [सं० शिष्य] शिष्य। चेला। उ०—ना गुर मिला न सिष भया लालच खेल्या डाव।—कबीर ग्रं०, पृ० २।

सिष्ट (१)
संज्ञा स्त्री० [फा़० शिस्त] बंसी की डोरी। उ०—हस्ती लाय सिष्ट सब ढीला। दौड़ आय इक चाल्हहिं लीला।—जायसी (शब्द०)।

सिष्ट पु † (२)
वि० [सं० सृष्ट] रचित। उ०—सिष्टं धारण धारयं बसुमती।—पृ० रा०, १।१।

सिष्ट पु (३)
वि० [सं० शिष्ट] दे० 'शिष्ट'। उ०—बर्नांश्रम में निष्ट इष्ट रत सिष्ट अदूषित।—श्यामा० (भू०), पृ० ४।

सिष्णासु
वि० [सं०] स्नान का इच्छुक [को०]।

सिष्य पु ‡
संज्ञा पुं० [सं० शिष्य] दे० 'शिष्य'। उ०—पाय रजायसु राय को ऋषिराज बोलाए। सिष्य सचिव सेवक सखा सादर सिर नाए।—तुलसी (शब्द०)।

सिस पु †
संज्ञा पुं० [सं० शिशु] दे० 'सिसु'।

सिसकना
क्रि० अ० [अनु० या सं० सीत् + करण] १. भीतर ही भीतर रोने में रुक रुककर निकलती हुई साँस छोड़ना। जैसे,— लड़का सिसक सिसककर रोता है। २. रोक रोककर लंबी साँस छोड़ते हुए भीतर ही भीतर रोना। शब्द निकालकर न रोना। खुलकर न रोना। उ०—पिय बिन जिय तरसत रहे, पल भर बिरह सताय। रैन दिवस माहिं कल नहीं, सिसक सिसक जिय जाय।—कबीर सा० सं०, पृ० ४४। मुहा०—सिसकती भिनकती = मैली कुचैली और रोनी सूरत की (स्त्री)। ३. जी धड़कना। धकधक्री होना। बहुंत भय लगना। जैसे,—वहाँ जाते हुए जो सिसकता है। ४. उलटी साँस लेना। हिचकियाँ भरना। मरने के निकट होना। ५. (प्राप्ति के लिये) तरसना, रोना। (पाने के लिये) व्याकुल होना। उ०—प्रभुहिं बिलोकि मुनिगन पुलके कहत भूरि भाग भए सब नीच नारि नर हैं। तुलसी सो सुख लाहु लूटत किरात कोल जाको सिसकत सुर विधि हरि हर हैं।—तुलसी (शब्द०)।

सिसकारना (१)
क्रि० अ० [अनु० सी सी + करना] १. जीभ दबाते हुए वायु मुँह से छोड़ना। सीटी का सा शब्द मुँह से निकालना। सुसकारना। सयो० क्रि०—देना। २. जीभ दबाते हुए मुँह से साँस खींचकर 'सी सी' शब्द निकालना। अत्यंत पीड़ा या आनंद के कारण मुँह से साँस खींचना। शीत्कार करना।

सिसकारना (२)
क्रि० स० सुसकार कर या सीटी के शब्द से कुत्ते को किसी ओर लपकाना। लहकारना। संयो० क्रि०—देना।

सिसकारी
संज्ञा स्त्री० [हिं० सिसकारना] १. सिसकारने का शब्द जीभ दबाते हुए मुँह से वायु छोड़ने का शब्द। सीटी का सा शब्द। २. कुत्ते की किसी ओर लपकाने के लिये सीटी का शब्द। ३. जीभ दबाते हुए मुँह से साँस खींचने का शब्द। अत्यंत पीड़ा या आनंद के कारण मुँह से निकला हुआ 'सी सी' शब्द। शीत्कार। क्रि० प्र०—देना।—भरना।

सिसकी
संज्ञा स्त्री० [अनु० सी सी या सं० शीत्] १. भीतर ही भीतर रोने में रुक रुककर निकलती हुई साँस का शब्द। खुलकर न रोने का शब्द। रुकती हुई लंबी साँस भरने का शब्द। क्रि० प्र०—भरना।—लेना। २. सिसकारी। शीत्कार। उ०—भ्रुव मटकावति नैन नचावति। सिंजित सिसकिन सोर मचावति।—पद्माकर ग्रं०, पृ० २२७।

सिसिक्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सींचने की इच्छा। छिड़कने या तर करने की इच्छा [को०]।

सिसिक्षु
वि० [सं०] तर करने, सींचने का इच्छुक [को०]।

सिसियांद
संज्ञा स्त्री० [सं०] मछली की सी गंध। बिसायँध।

सिसिर पु
संज्ञा पुं० [सं० शिशिर] एक ऋतु। दे० 'शिशिर'। उ०— (क) चलत चलत लौ ले चले, सब सुख संग लगाय। ग्रीसम बासर सिसिर निसि, पिय मो पास बसाय।—बिहारी (शब्द०)। (ख) पावस परषि रहे उधरारै। सिसिर समै बसि नीर मझारै।—पद्माकर (शब्द०)।

सिसु पु
संज्ञा पुं० [सं० शिशु] दे० 'शिशु'। उ०—(क) लोचना- भिराम घनस्याम राम रूप सिसु, सखी कहैं सखी सों तू प्रेम पथ पालि री।—तुलसी (शब्द०)। (ख) देवर फूल हन जु सिसु उठी हरखि अँग फूल। हँसी करत औखध सखिनि देह ददोरनि भूल।—बिहारी (शब्द०)।

सिसुघातिनी पु
वि० [सं० शिशुघातिनी] शिशु की हत्या करनेवाली (पूतना)। उ०—सिसुघातिनी परम पापिनी। संतनि को डसनी जु साँपिनी।—नंद० ग्रं०, पृ० २३९।

सिसुता पु
संज्ञा स्त्री० [सं० शिशुता] दे० 'शिशुता'। उ०—(क) श्याम के संग सदा बिलसा सिसुता में सुता म कछू नहीं जान्यो।—देवी (शब्द०)। (ख) छुटी न सिसुता की झलक, झलक्यो जोबन अंग। दीपति देहि दुहून मिलि दिपति ताफता रंग। बिहारी (शब्द०)।

सिसुपाल पु †
संज्ञा पुं० [सं० शिशुपाल] चेदि देश का राजा। विशेष दे० 'शिशुपाल'।

सिसुमार
संज्ञा पुं० [सं० शिशुमार] दे० 'शिशुमार'।

सिसुमार चक्र
संज्ञा पुं० [सं० शिशुमारचक्र] सौर जगत्। दे० 'शिशुमारचक्र'। उ०—एक एक नग देखि अनेकन उडगन वारिय। बसत मनहुँ सिसुमार चक्र तन इमि निरधारिय।—गि० दास (शब्द०)।

सिसृक्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सृष्टि करने की इच्छा। रचने या बनाने की इच्छा।

सिसृक्षु
संज्ञा पुं० [सं०] सृष्ट करने की इच्छा रखनेवाला। रचना का इच्छुक। उ०—जाको मुमुक्षु जे प्रेम बुभुक्षु गुणी यह विश्व सिसृक्षु सदा ही। काल जिघृक्षु सरुक्षु कृपा की स्वपानन स्वक्ष स्वपक्ष प्रिया ही।—रघुराज (शब्द०)।

सिसोदिया
संज्ञा पुं० [सिसोद (स्थान)] गुहलौत राजपूतों की एक शाखा जिसकी प्रतिष्ठा क्षत्रिय कुलों में सबसे अधिक है और जिसकी प्राचीन राजधानी चित्तौड़ थी और आधुनिक राजधानी उदयपुर है। विशेष—क्षत्रियों में चित्तौड़ या उदयपुर का घराना सूर्यवंशीय महाराज रामचंद्र की वंशपरंपरा में माना जाता है। इन क्षत्रियों का पहले गुजरात के वल्लभीपुर नामक स्थान में जाना कहा जाता है। वहाँ से बाप्पारावल ने आकर चित्तौड़ को तत्कालीन मोरी शासक से लेकर अपनी राजधानी बनायी। मुसलमानों के आने पर भी चित्तौड़ स्वतंत्र रहा और हिंदू शक्ति का प्रधान स्थान माना जाता था। चित्तौड़ में बड़े बड़े पराक्रमी राणा हो गए हैं। राणा समर सिंह, राणा कुंभा, राणा साँगा आदि मुसलमानों से बड़ी वीरता से लड़े थे। प्रसिद्ध वीर महारणा प्रताप किस प्रकार अकबर से अपनी स्वाधीनता के लिये लड़े, यह प्रसिद्ध ही है। सिसोद नामक स्थान में कुछ दिन बसने के कारण गुहिलौतों की यह शाखा सिसोदिया कहलाई।

सिस्क पु ‡
वि० [सं० शुष्क] दे० 'शुष्क'। उ०—करत देह को सिस्क।—ब्रज० ग्रं०, पृ० ४७।

सिस्टि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० सृष्टि] दे० 'सृष्टि'।

सिस्न
संज्ञा पुं० [सं० शिश्न] दे० 'शिश्न'।

सिस्य पु
संज्ञा पुं० [सं० शिष्य] दे० 'शिष्य'।

सिह
वि० [फा़०] तीन। त्रय [को०]।

सिहद्दा
संज्ञा पुं० [फा़० सिह या सेह + अ० हद] वह स्थान जहाँ तीन हदें मिलती हों।

सिहपर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] अड़ूसा। वासक वृक्ष।

सिहद
संज्ञा स्त्री० [सं० शीतल] उ०—सिहरने की क्रिया या भाव। सिहरन। उ०—सिकता को रेखाएँ उभारभर जाती अपनी तरल सिहर।—लहर, पृ० २।

सिहरन
संज्ञा स्त्री० [सं० शीनल] कँपकँपी। रोमांच। सिहरने की क्रिया।

सिहरना †
क्रि० अ० [सं० शीत + हिं० ना] १. ठंढ से काँपना। २. काँपना। कंपित होना। ३. भयभीत होना। दहलना। उ०—छनक वियोग कु याद परै अतिसै हिय सिहरत।—व्यास (शब्द०)। ४. रोंगटे खड़े होना।

सिहरा
संज्ञा पुं० [हिं० सिर + हरा या हार] दे० 'सेहरा'।

सिहराना (१)
क्रि० स० [हिं० सिहरना] १. सरदी से कँपाना। शीत से कंपित करना। २. कँपाना। कंपित करना। ३. भयभीत करना। दहलाना।

सिहराना (१)
क्रि० स०, क्रि० अ० दे० 'सहलाना'। २. दे० 'सिहलाना'—१।

सिहरावन †
संज्ञा पुं० [हिं० सिहलाना] दे० 'सिहलावन'।

सिहरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० सिहरना] १. शीतजन्य कंप। ठंढ के कारण कँपकँपी। २. कंप। कँपकँपी। ३. भय। दहलना। ४. जूड़ी का बुखार। ५. रोंगटी खड़े होना। रोमहर्ष। लोमहर्ष।

सिहरू
संज्ञा पुं० [देश०] संभालू। सिंदुवार।

सिहलाना †
क्रि० अ० [सं० शीतल] १. सिराना। ठंढा होना। २. शीत खा जाना। सीड़ खाना। नम होना। ३. ठंढ पड़ना। सरदी पड़ना।

सिहलावन †
संज्ञा पुं० [हिं० सिहलाना] सरदी। ठंढ। जाड़ा।

सिहली
संज्ञा स्त्री० [सं० शीतली] शीतली जटा। शीतली लता।

सिहान
संज्ञा पुं० [सं० सिंहाण] मंडूर। लोहकिट्ट।

सिहाना † (१)
क्रि० अ० [सं० ईर्ष्या, पु० हिं० हिसिषा] १. ईर्ष्या करना। डाह करना। २. किसी अच्छी वस्तु को देखकर इस बात से दुःखी होना कि वैसी वस्तु हमारे पास नहीं है। स्पर्धा करना। उ०—द्वारिका की देखि छबि सुर असुर सकल सिहात।—सूर (शब्द०) ३. पाने के लिये ललचना। लुभाना। उ०—सूर प्रभु को निरखि गोपी मनहि मनहि सिहाति। सूर (शब्द०)। ४. मुग्ध होना। मोहित होना। उ०—सूर श्याम मुख निराख जसोदा मनही मनहिं सिहानी।—सूर (शब्द)। (ख) लाल अलौकिक लरिकई लखि लखि सखी सिहाति—बिहारी (शब्द०)।

सिहाना (२)
क्रि० सं० १. ईर्ष्या की दृष्टि से देखना। २. अभिलाष की दृष्टि से देखना। ललचना। उ०—समउ समाज राज दशरथ को लोकप सकल सिहाहीं।—तुलसी (शब्द०)। ३. अभिलाषुक अथवा मुग्ध होकऱ प्रशंसा करना। उ०—देव सकल सुरपतिहि सिहाहीं। आज पुरंदर सम कोउ नाहीं।—मानस १।३१७।

सिहारना पु †
क्रि० स० [देश०] तलाश करना। ढूँढ़ना। २. जुटाना। उ०—हम कन्यन को ब्याह बिचारौ। इनहि जोग बर तुमहु सिहारौ।—पद्माकर (शब्द०)।

सिहिकना
क्रि० अ० [सं० शुष्क] सूखना। (फसल का)।

सिहिटि †पु
[सं० सृष्टि] दे० 'सृष्टि'।

सिहुंड
संज्ञा पुं० [सं० सिहुण्ड] सेहुँड़ का पेड़। स्नुही। थूहर।

सिहोड़, सिहोर †
संज्ञा पुं० [सं० सिहुण्ड] थूहर। सेहुँड़। स्नुही। उ०—बेगि बोलि, बलि, बरजिए करतूति कठोरे। तुलसी दलि रूँध्यो चहै सठ साखि सिहोरे।—तुलसी (शब्द०)।

सिह्ल, सिह्लक
संज्ञा पुं० [सं०] १. अश्म पुष्प। शैलज। लोहबान। धूप। २. एक वृक्ष का सुगंधित गोंद। गुग्गुल [को०]।

सिह्लकी, सिह्ली
संज्ञा स्त्री० [सं०] सुगंधित गोंदवाला वृक्ष। गुग्गुल का पेड़। २. लोहबान। तुरुष्क [को०]।

सींक
संज्ञा स्त्री० [सं० इषीका] १. मूँज या सरपत की जाति के एक पौछे के बीच का सीधा पतला कांड जिसमें फूल या घूआ लगता है। मूँज आदि की पतली तीली। उ०—सींक धनुष हित सिखन सकुचि प्रभु लीन। मुदित माँगि इक धनुही नृप हँसि दीन।—तुलसी (शब्द०)। विशेष—इस कांड का घेरा मोटी सूई के बराबर होता है और यह कई कामों में आता है। बहुत सी तीलियों को एक में बाँधकर झाड़ू बनाते हैं। २. किसी तृण का सूक्ष्म कांड। किसी घास का महीन डंठल। ३. किसी घास फूस के महीन डंठल का टुकड़ा। तिनका। ४. शंकु। तीली। सूई की तरह पतला लंबा खंड। ५. नाक का एक गहना। लौंग। कील। उ०—जटित नीलमनि जगमगति सींक सुहाई नाक। मनौ अली चंपक कली बसि रस लेत निसाँक।—बिहारी (शब्द०)। ६. कपड़े पर की खड़ी महीन धारी।

सीँकपार
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की बत्तख।

सीँकर
संज्ञा पुं० [हिं० सींक] सींक में लगा फूल या घूआ।

सींका (१)
संज्ञा पुं० (हिं० सींक) पेड़ पौधों की बहुत पतली उपशाखा या टहनी जिसमें पत्तियाँ उगी रहती या फूल लगते हैं। हाँड़ी। जैसे नीम का सींका।

सींका (२)
संज्ञा पुं० [सं० शिक्यक] सिकहर। सीका। विशेष दे० 'छीका'।

सीँकिया (१)
संज्ञा पुं० [हिं० सींक + इया (प्रत्य०)] एक प्रकार का रंगीन कपड़ा सिसमें सींक सी महीन सीधी धारियाँ बिलकुल पास पास होती हैं। जैसे,—सींकिये का पायजामा।

सीँकिया (२)
वि० सींक सा पतला। मुहा०—सींकिया पहलवान = दुबला, पतला आदमी जो अपने को बड़ा बली समझता हो।

सींग
संज्ञा पुं० [सं० श्रृङ्ग] १. खुरवाले कुछ पशुओं के सिर के दोनों ओर शाखा के समान निकले हुए कड़े नुकीले अवयव जिनसे वे आक्रमण करते हैं। विषाण। जैसे,—गाय के सींग, हिरन के सींग। विशेष—सींग कई प्रकार के होते है और उनके योजना भी भिन्न भिन्न उपादानों की होती है। गांय, भैंस आदि के पोले सींग ही असली सींग हैं जो अंडधातु और चूने आदि से संघटित तंतुओं के योग से बने होते हैं और बराबर रहते हैं। बारहसिंगों के सींग हड्डी के होते हैं और हर साल गिरते और नए निकलते हैं। क्रि० प्र०—निकलना।—मारना। मुहा०—सींग कटाकर बछडों में मिलना = बूढ़े होकर बच्चों में मिलना। किसी सयाने का बच्चों का साथ देना। सींग दिखाना = अँगुठा दिखाना। कोई वस्तु न देना और चिढ़ाना। सींग निकलना = (१) चौपाए का जवान होना। (२) इतराना। पागलपन करना। सनकना। सींग पर मारना = कुछ न समझना। तुच्छ समझना। कुछ परवा न करना। सींग पूँछ गिराना = निरीह या दीन होना। अति नम्रता दिखाना। परास्त होना। (कहीं) सींग समाना = कहीं ठिकाना मिलना। शरण मिलना। जैसे,—जहाँ कहीं सींग समाएगी वहाँ। (किसी के सिर पर) सींग होना = कोई विशेषता होना। कोई खसूसियत होना। औरों से बढ़कर कोई बात होना (व्यंग्य)। २. सींग का बना एक बाजा जो फूँककर बजाया जाता है। सिंगी। उ०—सींग बजावत देखि सुकवि मेरे दृग अँटके।—व्यास (शब्द०)। ३. पुरुष की इंद्रिय (बाजारू)।

सींगड़ा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० सींग + ड़ा (प्रत्य०)] १. बारूद रखने का चोंगा। बारूददान। २. एक प्रकार का बाजा जो मुँह से बजाया जाता है। सिंगी। ३. शृंग। सींग। उ०—माथा ऊपर सींगड़ा लंबा नव नव हाथ।—राम० धर्म०, पृ० ७७।

सींगणि †
संज्ञा स्त्री० [सं० शिञ्जनी] प्रत्यंचा। उ०—इक लष सींगणि नव लष बाँन। बेध्या मीन गगन अस्थाँन। बेध्या मीन गगन कै साथ। सति सति भाषंत श्री गोरखनाथ।—गोरख०, पृ० ४५।

सीँगना
क्रि० स० [हिं० सींग] सींग देखकर चोरी के पशु पकड़ना। चोरी के चौपायों की सींग द्वारा शिनाख्त करना।

सीँगर, सीँगरी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का लोबिया या फली जिसकी तरकारी होती है। मोगरे की फली। सींगर। उ०— सूरन करि तरि सरस तोरई। सेमि सींगरी छमकि झोरई। सूर (शब्द०)।

सींगा
संज्ञा पुं० [हिं० सींग] दे० 'सींगी'। उ०—चंगु, चुटुकुल, बाँसी, पुहिल, सींगा, बजा।—वर्ण० पृ० २।

सीँगी
संज्ञा स्त्री० [हिं० सींग] १. हरिन के सींग का बना बाजा जो मुँह से बजाया जाता है। सिंगी। उ०—सींगी संख सेग डफ बाजे। बंसकार महुआ (अर) सुर साजे।—जायसी (शब्द०)। २. वह पोला सींग जिससे जरहि शरीर से दूषित रक्त खींचते हैं। मुहा०—सींगी लगाना या तोड़ना = (१) सींगी से रक्त खींचना। (२) चुंबन करना। (बाजारू)। ३. एक प्रकार की मछली जिसके मुँह के दोनों ओर सींग से निकले रहते हैं। तोमड़ी। उ०—सींगी भाकुर बिनि सब धरी। जायसी (शब्द०)।

सीँघन
संज्ञा पुं० [देश०] घोड़ों के माथे पर दो या अधिक भौंरीवाला टीका।

सीँच
संज्ञा स्त्री० [हिं० सींचना] १. सींचने की क्रिया या भाव। सिंचाई। छिड़काव।

सीँचना
क्रि० स० [सं० सिञ्चन] १. पानी देना। पानी से भरना। आबपाशी करना। पटाना। जैसे,—खेत सींचना; बगीचा सींचना। उ०—अति अनुराग सुधाकर सींचत दाड़िम बीज समान।—सूर (शब्द०)। २. पानी छिड़ककर तर करना। भिगोना। ३. छिड़कना। (पानी आदि) डालना या छितराना। उ०—(क) मार सुमार करी खरी अरी भरी हित मारि। सींच गुलाब घरी घरी अरी बरोहि न बारि।—बिहारी (शब्द०)। (ख) आँच पय उफनात सींचत सलिल ज्यों सकुचाइ।—तुलसी (शब्द०)।

सीँची
संज्ञा स्त्री० [हिं० सींचना] सींचने का समय।

सीँवँ, सीँव पु
संज्ञा पुं० [सं० सीमा] सीमा। हद। मर्यादा। उ०—(क) सुख की सीवँ अवधि आनँद की अवध बिलोकिहौं जाइहौं।—तुलसी (शब्द०)। (ख) सुखनि की सींव सोहै सुजस समूह फैलो मानो अमरावती को देखि कै हैसतु है।—गुमान (शब्द०)। मुहा०—सींव चरना या कौड़ना = अधिकार दिखाना। दबाना। जबरदस्ती करना। उ०—है काके द्वै सीस ईस के जो हठि जन की सींव चरै।—तुलसी (शब्द०)।

सीँवनि पु् †
संज्ञा स्त्री० [हिं० सीना] जोड़ या संधि का स्थान। जोड़ की रेखा या चिह्न। उ०—येडी वाम पाँव की लगावै सींवनि कै बीचि, वाही जोनि ठोर ताहि नीकैं करि जानिए।—सूंदर ग्रं०, भा० १, पृ० ४२।

सीँवा
संज्ञा स्त्री० [सं० सीमा] दे० 'सीमा'। उ०—निरखि सखि सुंदरता की सींवा। अधर अनृप मुरलिका राजति, लटकि रहति अध ग्रीवा।—सूर०, १०।१८०८।

सी
वि० स्त्री० [सं० सम, हिं० सा] सम। समान। तुल्य सदृश। जैसे,—वह स्त्री बावली सी है। उ०—(क) मूरति की सूरति कही न परै तुलसी पै जानै सोई जाके उर कसकै करक सी। तुलसी (शब्द०)। (ख) दुरै न निघरघटौ दिए रावरी कुचाल। विष सी लागति है बुरी हँसी खिसी की लाल।—बिहारी (शब्द०)। (ग) सरद चंद की चाँदनी मंद परति सी जाति।—पद्माकर (शब्द०)। मुहा०—अपनी सी = अपने भरसक। जहाँ तक अपने से हो सके, वहाँ तक। उ०—मैं अपनी सी बहुत करी री।—सूर (शब्द०)।

सी (२)
संज्ञा स्त्री० [अनु०] वह शब्द जो अत्यंत पी़ड़ा या आनंद रसास्वाद के समय मुँह से निकलता है। शीत्कार। सिसकारी। उ०—'सी' करनवारी सेद सीकरन वारी रति सी करन कारी सो बसीकरनवारी है।—पद्माकर (शब्द०)।

सी (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० सीत] बीज की बोआई।

सी † (४)
संज्ञा पुं० [सं० शीत] शीत। दे० 'सीउ'। उ०—माह मास सी पड़यो अतिसार।—बी० रासो, पृ० ६७।

सी पु (५)
संज्ञा स्त्री० [सं० सीता] उ०—अपने अपने को सब चाहत नीको मूल दुहँ को दयालु दहल सी को।—तुलसी ग्रं०, पृ० ५४६।

सी० आई० डी०
संज्ञा पुं० [अँ० क्रिमिनल इनवेस्टिगेशन डिपार्टमेंट का संक्षिप्त रूप] दे० 'क्रिमिनल इनवेस्टिगेशन डिपार्टमेंट'। खुपिया विभाग। जैसे,—सी० आई० डी० ने संदेह पर एक आदमी को गिरफ्तार किया। २. भेदिया। गुप्तचर।

सीअ पु †
संज्ञा पुं० [सं० सीता] सीता। उ०—भयउ मोहु सिव कहा न कीन्हा। भ्रम बस वेषु सीअ कर लीन्हा।—मानस, पृ० ५५।

सीउ पु
संज्ञा पुं० [सं० शीत] शीत। ठंढ। उ०—(क) कीन्हेसि धूप सीउ औ छाहाँ।—जायसी (शब्द०)। (ख) जहाँ भानु तहँ रहा न सीउ।—जायसी (शब्द०)।

सीकचा
संज्ञा पुं० [फा़० सीखचह्] लोहे की छड़। सीखचा।

सीकर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. जलकण। पानी की बूँद। छींटा। उ०—(क) श्रम स्वेद सीकर गुंड मंडित रूप अंबुज कोर।— सूर (शब्द०)। (ख) राम नाम रति स्वाति सुधा सुभ सीकर प्रेम पियासा।—तुलसी (शब्द०)। २. पसीना। स्वेदकण। उ०—आनन सीकर सी कहिए धक सोवत ते अकुलाय उठी क्यों।—केशव (शब्द०)।

सीकर पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० श्रृगाल] स्यार। गीदड़।

सीकर पु (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० श्रृङ्खला] जंजीर। सिकड़ी। उ०—भट भट धरे असी कर में चढ़े सीकर सुंडन मैं लसत।—गि० दास (शब्द०)।

सीकरा पु
संज्ञा पुं० [फा़० शिकरह्] बाज। श्येन। एक शिकारी पक्षी। उ०—सीकरा सो काल है कलसरी सी लपेट लेहै, चंगुल के तले दबे दबे चिचयायगे।—मलूक० बानी, पृ० ३१।

सीकल † (१)
संज्ञा पुं० [देश०] डाल का पका हुआ आम।

सीकल (२)
संज्ञा स्त्री० [अ० सैकल] हथियारों का मोरचा छुड़ाने की क्रिया। हथियार की सफा़ई।

सीकस
संज्ञा पुं० [देश०] ऊसर। उ०—सिंह शार्दुल यक हर जोतिनि सीकस बोइनि धाना।—कबीर (शब्द०)।

सीका (१)
संज्ञा पुं० [सं० शीर्षक] १. सोने का एक आभूषण जो सिर पर पहना जाता है। २. सिक्का।

सीका (२)
संज्ञा पुं० [सं० शिक्या] ऊपर टाँगने की सुतरी आदि की जाली जिसपर दूध, दही आदि का बरतन रखते हैं। छींका। सिकहर।

सीकाकाई
संज्ञा स्त्री० [?] एक प्रकार का वृक्ष जिसकी फलियाँ रीठे की भाँति सिर के बाल आदि मलने के काम में आती हैं। कुछ लोग इसे सातला भी मानते हैं।

सीकार पु
संज्ञा पुं० [सं० सीत्कार] दे० 'सीत्कार'। उ०—चुंबन करत कपोल मुखहि सीकार करावत। हृदय माँझ धँसि जात कुचन पर रोम बढ़ावत।—ब्रज० ग्रं०, पृ० १०३।

सीकारी पु
संज्ञा पुं० [फ्रा़० शिकार] शिकारी। उ०—बड़े बड़े सीकारी जोधा, आगे पग है डारा।—धरम० श०, पृ० २७।

सीकी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० सीका] छोटा सीका या छीका। छोटा सिकहर।

सीकी (२)
संज्ञा पुं० [देश०] १. छेद। सूराख। २. मुँह। मुहँड़ा।

सीकुर
संज्ञा पुं० [सं० शूक] गेहूँ, जौ आदि की बाल के ऊपर निकले हुए बाल के से कड़े सूत। शूक। उ०—गड़त पाँइ जव आइ, बड़ी बिथा सीकुर करत। क्यों न पीर सरसाइ याके हिय भूपति चुभ्यो।—गुमान (शब्द०)।

सीको †
संज्ञा पुं० [सं० शिक्य] दे० 'सीका'।

सीक्रेट (१)
वि० [अँ०] छिपा हुआ। गुप्त। पोशीदा। जैसे, सीक्रेट पुलिस। सीक्रेट कमिटी।

सीक्रेट (२)
संज्ञा पुं० [सं० शिक्षा, प्रा० सिक्खा] १. सिखाने की क्रिया या भाव। शिक्षा। तालीम। २. वह बात जो सिखाई जाय। उ०— (क) मोही मैं रहत रहै मोही सौं उदास सदा सीखत न सीख तन सीख निरधारौ है।—ठाकुर० पृ० १२। ३. परामर्श। सलाह। मंत्रण। उपदेष। उ०—(क) याकी चीख सुनै ब्रज को रे।—सूर (शब्द०)। (ख) मोल्हन कहत सीख मेरी सीस धरु रे।—हम्मीर०, पृ० २०।

सीख (२)
संज्ञा स्त्री० [फा़० सीख] १. लोहे की लंबी पतली छड़। शलाका। तीली। २. वह पतली छड़ जिसमें गोदकर मांस भूनते हैं। ३. बड़ी सूई। सूआ। शंकु। ४. लोहे की छड़ जिससे जहाज के पेंदे में आया हुआ पानी नापते हैं। (लश०)।

सीखचा
संज्ञा पुं० [फा० सीखचह्] १. लोहे की सीख जिसपर मांस लपेटकर भूनते हैं। २. लोहे की छड़। ३. लोहेकी नुकीली छड़। यौ०—सीखचा कबाब=सीखचे पर गोद कर भूना हुआ कबाब।

सीखना पु
संज्ञा स्त्री० [सं० शिक्षण, प्रा० सिक्खण, हिं० सीखना] शिक्षा। सीख।

सीखना
क्रि० स० [सं० शिक्षण, प्रा० सिक्खण] १. ज्ञान प्राप्त करना। जानकारी प्राप्त करना। किसी से कोई बात जानना। जैसे,—विद्या सीखना, कोई बात सीखना। २. किसी कार्य के करने की प्रणाली आदि समझना। काम करने का ढंग आदि जानना। जैसे,—सितार सीखना, शतरंज सीखना। ३. अनुभव प्राप्त करना। संयो० क्रि०—जाना।—लेना।

सीगा (१)
संज्ञा पुं० [अ० सीगह्] १. साँचा। ढाँचा। २. व्यापार। पेशा। ३. पुरुष, काल आदि की दृष्टि से क्रिया का रूप (को०)। ४विभाग। महकमा।यौ०—सीगेवार=ब्योरेवार। ५. एक प्रकार के वाक्य जो मुसलमानों के विवाह के समय कहे जाते हैं।

सीगा (२)
संज्ञा पुं० [अं० सिगार] दे० 'सिगार'।

सीगा पु † (३)
वि० [हिं० सगा] अपना। निकटस्थ। जो पराया न हो। संबंधी। उ०—नेड़ा बेसाँ जाय नित, सीगो मित्र समान।— बाँकी० ग्रं०,भा०२, पृ० ४५।

सीगारा (१)
संज्ञा पुं० [देश०] मोटा कपड़ा।

सीगारा (२)
संज्ञा पुं० [अं० सिगार] दे० 'सिगार'।

सीच पु
संज्ञा स्त्री [?] हाल।

सीचन
संज्ञा पुं० [देश०] खारी पानी से मिट्टी निकालने का एक ढंग।

सीचापू
संज्ञा स्त्री० [सं०] यक्षिणी।

सीछन पु
संज्ञा पुं० [सं० शिक्षण] दे० 'शिक्षण'। उ०—सीछन काज वजीरन को कढ़ै बोल यों एदिलसाही सभा सों।—भूषण ग्रं०, पृ० १३५।

सीज (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० सिद्धि, प्रा० सिज्झि, हिं० सीझ] दे० "सीझ।

सीज (२)
संज्ञा पुं० [देश०] थूहर। सेहुँड़।

सीजना
क्रि० अ० [सं० सिद्धि, प्रा० सिज्झ, हिं० सीज+ना] दे० "सीझना।

सीझ
सीझने की क्रिया या भाव। गरमी से गलाव।

सीझना
संज्ञा स्त्री० [सं० सिद्धि, प्रा० सिज्झ, हिं० सीज, सीझ+ना (प्रत्य०)] १. आँच या गरमी पाकर गलना पकना। चुरना। जैसे,—दाल सीझना, रसोई सीझना। २. आँच या गरमी से मुला- यम पड़ना। ताव खाकर नरम पड़ना। ३. सिद्ध होना। उ०— सबद बिंदौ अबधू सबद बिंदौ सबदे सीझंत काया।—गोरख०, पृ० ४५। ४. सूखे हुए चमड़े का मसाले आदि में भींगकर मुलायम होना। ५. ताप या कष्ट सहना। क्लेश झेलना। ६. कायक्लेश सहना। तप करना। तपस्या करना। उ०— (क) एइ वहि लागि जनम भरि सीझा। चहै न औरहि, ओही रीझा।—जायसी (शब्द०)। (ख) गनिका गीध अजामिल आदिक लै कासी प्रयाग कब सीझे।—तुलसी (शब्द०)। ७. सरदी से गलना। बहुत ठंढ खाना। ८. ऋण का निबटारा होना। ९. मिलने के योग्य होना। प्राप्तव्य होना। जैसे,— (क) बयाना हुआ और तुम्हारी दलाली सीझी। (ख) वह मकान रेहन रख लोगे तो १) सैकड़े का व्याज सीझेगा।

सीट (१)
संज्ञा स्त्री० [अं०] १. बैठने का स्थान। आसन। २. एक आदमी के बैठने की जगह (को०)। ३. किसी सभा, समिति मंडल आदि के सदस्य की संख्या (को०)।

सीट (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० सीटना] सीटनी की क्रिया या भाव। जीट।

सीटना
क्रि० स० [अनु०] डींग मारना। शेखी मारना। बढ़ बढ़ कर बातें करना।

सीट पटाँग
संज्ञा स्त्री० [हिं० सीटना+(ऊट) पटाँग] बढ़ बढ़कर की जानेवाली बातें। घमंड भरी बात।

सीटी
संज्ञा स्त्री० [सं० शीतृ] १. वह पतला महीन शब्द जो ओठों को गोल सिकोड़कर नीचे की ओर आघात के साथ वायु निकालने से होता है। क्रि० प्र०—बजाना। मुहा०—सीटी देना=सीटी के शब्द से बुलाना या और कोई संकेत करना। २. इसी प्रकार का शब्द जो किसी बाजे या यंत्र आदि के भीतर की हवा निकालने से होता है। जैसे,—रेल की सीटी। मुहा०—सीटी देना=(१) सीटी का शब्द निकालना। जैसे,— रेल सीटी दे रही है। (२) सीटी से सावधान करना। ३. वह बाजा या खिलौना जिसे फूँकने से उक्त प्रकार का शब्द निकले। यौ०—सीटीबाज=मुँह से बार बार सीटी की आवाज निकालनेवाला।

सीठ
संज्ञा स्त्री० [सं० शिष्ट, प्रा० सिट्ठ (=शीष)] दे० 'सीठी'।

सीठना
संज्ञा पुं० [सं० अशिष्ट, प्रा० असिट्ठ+हिं० ना (प्रत्य०)] अश्लील गीत जो स्त्रियाँ विवाहादि मांगलिक अवसरों पर गाती हैं। सीठना। विवाह की गाली।

सीठनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० सीठना] विवाह की गाली।

सीठा
वि० [सं० शिष्ट, प्रा० सिट्ठी (=बचा हुआ)] नीरस। फीका। बिना स्वाद का। बेजायक।

सीठापन
[हिं०सीठा+पन] नीरसता। फीकापन।

सीठी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० शिष्ट, प्रा० सिट्ठी (=बचा हुआ)] १. फल, फूल पत्ते आदि का रस निकल जाने पर बचा हुआ निकम्मा अंश। वह वस्तु जिसका रस या सार निचुड़ गया हो। खूद। जैसे,—अनार की सीठी, भाँग की सीठी, पान की सीठी। २. निस्सार वस्तु। सारहीन पदार्थ। ३. नीरस वस्तु। फीकी चीज।

सीठी (२)
वि० स्त्री० दे० 'सीठा'।

सीड़
संज्ञा स्त्री० [सं० शीतल या शीत+प्रा० ड (प्रत्य०)] सील। तरी। नमी।

सीढ़ी
संज्ञा स्त्री० [सं० श्रेणी या देशी सिड्ढी (=सीढ़ी)] १. किसी ऊँचे स्थान पर क्रम क्रम से चढ़ने के लिये एक के ऊपर एक बना हुआ पैर रखने का स्थान। निसेनी। जीना। पैड़ी। २. बाँस के दो बल्लों का बना लंबा ढाँचा, जिसमें थोड़ी थोड़ी दूर पर पैर रखने के लिये डंडे लगे रहते हैं और जिसे भिड़ाकर किसी ऊँचे स्थान तक चढ़ते हैं। बाँस की बनी पैड़ी। क्रि० प्र०—लगाना। यौ०—सीढ़ी का डंडा=पैर रखने के लिये बाँस की सीढ़ी में जड़ा हुआ डंडा। मुहा०—सीढ़ी सीढ़ी चढ़ना=क्रम क्रम से ऊपर की ओर बढ़ना। धीरे धीरे उन्नति करना।३. उत्तरोत्तर उन्नति का क्रम। धीरे धीरे आगे बढ़ने की परंपरा। ४. हैंड प्रेस का एक पुर्जा जिसपर टाइप रखकर छापने का प्लैटेन लगा रहता है। ५. घुड़िया के आकार का लकड़ी का पाया जो खंडसाल में चीनी साफ करने के काम में आता है। ६. एक गराड़ीदार लकड़ी जो गिरदानक की आड़ के लिये लपेटन के पास गड़ी रहती है। (जुलाहे)।

सीत पु † (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० सीता] दे० 'सीता'। उ०—बड़ कँवरि सीत विदेह री रघुनाथ वर राजेस।—रघु० रू०, पृ० ८४।

सीत † (२)
संज्ञा पुं० [सं० शीत] दे० 'शीत'।

सीत † (३)
संज्ञा पुं० [सं० सिक्थ] दे० 'सीथ'। उ०—बड़ा महापरसाद सीत संतन कर छाड़न।—पलटू०, भा० १, पृ० १५।

सीतकर
संज्ञा पुं० [सं० शीतकर] चंद्रमा। उ०—हौं हीं बौरी बिरह बस कै बौरौ सबु गाउँ। कहा जानिए कहत हैं ससिहिं सीतकर नाउँ।—बिहारी र०, दो० ९५।

सीतपकड़
संज्ञा पुं० [हिं० शीत+पकड़ना] एक रोग जो हाथी को शीत से होता है।

सीतपत पु †
संज्ञा पुं० [सं० सीतापति] दे० 'सीतापति'। उ०— प्रारंभै दौलन पुन पाणां पुणै सुवाणां सीतपत।—रघु० रू०, पृ० २४।

सीतमयूख पु
संज्ञा पुं० [सं० शीतमयूख] चंद्रमा। सीतकर। सुधाकर। उ०—घोर अनल कों भखत है सितमयूख सहाय।— दीन० ग्रं०, पृ० १७६।

सीतल ‡
वि० [सं० शीतल] दे० 'शीतल'।

सीतल चीनी
संज्ञा स्त्री० [सं० शीतल+हिं० चीनी] दे० 'शीतलचीनी'।

सीतलपाटी
संज्ञा स्त्री० [सं० शीतल+हिं० पाटी] १. एक प्रकार की बढ़िया चिकनी चटाई। २. पूर्व बंगाल और आसाम के जंगलों में होनेवाली एक प्रकार की झड़ी जिससे चटाई या सीतलपाटी बनती है। ३. एक प्रकार का धारीदार कपड़ा।

सीतल बुकनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० शीतल+बुकनी] १. सत्तू। सतुआ। २. संतों की बानी। (साधु)।

सीतला
संज्ञा स्त्री० [सं० शीतला] दे० 'शीतला'। यौ०—सीतला माई=शीतला माता।

सीता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह रेखा जो जमीन जोतते समय हल की फाल के धँसने से पड़ती जाती है। कूँड़। विशेष—वेदों में सीता। कृषि की अधिष्ठात्री देवी और कई मंत्रों की देवता हैं। तैत्तिरीय ब्राह्मण में सीता ही सावित्री और पाराशर गृह्यसूत्र में इंद्रपत्नी कही गई हैं। २. मिथिला के राजा सीरध्वज जनक की कन्या जो श्रीरामचंद्र जी की पत्न्नी थी। विशेष—इनकी उत्पत्ति की कथा यों है कि राजा जनक ने संतति के लिये एक यज्ञ की विधि के अनुसार अपने हाथ से भूमि जोती। जुती हुई भूमि की कूँड़ (सीता) से सीता उत्पन्न हुईं। सयानी होने पर सीता के विबाह के लिये जनक ने धनुर्यज्ञ किया, जिसमें यह प्रतिज्ञा थी कि जो कोई एक विशेष धनुष को चढ़ावे, उससे सीता का विवाह हो। अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र कुमार रामचंद्र ही उस धनुष को चढ़ा और तोड़ सके इससे उन्हीं के साथ सीता का विवाह हुआ। जब विमाता की कुटिलता के कारण रामचंद्र जी ठीक अभिषेक के समय पिता द्वारा १४ वर्षों के लिये वन में भेज दिए गए, तब पतिपरायण सती सीता भी उनके साथ बन में गईं और वहाँ उनकी सेवा करती रहीं। वन में ही लंका का राजा रावण उन्हें हर ले गया, जिसपर राम ने बंदरों की भारी सेना लेकर लंका पर चढ़ाई की और राक्षसराज रावण को मारकर वे सीता को लेकर १४ वर्ष पूरे होने पर फिर अयोध्या आए और राजसिंहासन पर बैठे। जिस प्रकार महाराज रामचंद्र विष्णु के अवतार माने जाते हैं, उसी प्रकार सीता देवी भी लक्ष्मी का अवतार मानी जाती हैं और भक्तजन राम के साथ बराबर इनका नाम भी जपते हैं। भारतवर्ष में सीता देवी सतियों में शिरोमणि मानी जाती हैं। जब राम ने लोकमर्यादा के अनुसार सीता की अग्नि- परीक्षा की थी, तब स्वयं अग्निदेव ने सीता को लेकर राम को सौंपा था। पर्या०—वैदेही। जानकी। मैथिली। भूमिसंभवा। अयोनिजा। यौ०—सीता की मचिया=एक प्रकार का गोदना जो स्त्रियाँ हाथ में गुदाती हैं। सीता की रसोई=(१) एक प्रकार का गोदना। (२) बच्चों के खेलने के लिये रसोई के छोटे छोटे बरतन। सीता की पँजीरी=कर्पूरवल्ली नाम की लता। ३. वह भूमि जिसपर राजा की खेती होती हो। राजा की निज की भूमि। सीर। ४. दाक्षायणी देवी का एक रूप या नाम। ५. आकाशगंगा की उन चार धाराओं में से एक जो मेरु पर्वत पर गिरने के उपरांत हो जाती है। विशेष—पुराणों के अनुसार यह नदी या धारा भद्राश्व वर्ष या द्विप में मानी गई है। ६. मदिरा। ७. ककहो का पौधा। ८. पातालगारुड़ी लता। ९. एक पर्णवृत्त जिसके प्रत्येक चरण में रगण, तगण, मगण, यगण और रगण होते हैं। उ०—जन्म बीता जात सीता अंत रीता बावरे ! राम सीता राम सीता राम सीता गाव रे। छंजः०, पृ० २०७। १०. सीताध्यक्ष के द्वारा एकत्र किया हुआ अनाज। ११. जैनों के अनुसार विदेह की एक नदी का नाम। १३. हल से जुती हुई भूमि (को०)। १४. कृषि। खेती (को०)। १५. इंद्र की पत्नी (को०)। १६. उमा का नाम (को)। १७. लक्षमी का नाम (को०)।

सीताकुंड
संज्ञा पुं० [सं० सीताकुण्ड] वह कुंड जो सीता देवी के संबंध से पवित्र तीर्थ माना जाता हो। विशेष—इस नाम के अनेक कुंड और झरने भारतवर्ष में प्रसिद्ध हैं। जैसे,—(१) मुगेर से ढा़ई कोस पर गरम पानी का एक कुंड है। इसके विषय में प्रसिद्ध है कि जब देवताओं ने सीता जी की पूजा नहीं स्वीकार की, तब वे फिर अग्निपरीक्षा के लिये अग्निकुंड में कूद पड़ीं। आग चट बुझ गई और उसी स्थान पर पानी का एक सोता निकल आया। (२) भागलपुर जिले में मंदार पर्वत पर एक कुंड। (३) चंपारन जिले में मोतिहारी से छह कोस पूर्व एक कुंड। (४) चटगाँव जिले में एक पर्वत की चोटी पर एक कुंड। (५) मिरजापूर जिले में विंध्याचल के पास एक झरना और कुंड।

सीतागोप्ता
संज्ञा पुं० [सं० सीतागोप्तृ] सीता का रक्षक। जुते हुए खेत का रक्षक [को०]।

सीताजानि
संज्ञा पुं० [सं०] वह जिसकी पत्नी सीता हैं—श्रीरामचंद्र।

सीतातोर्थ
संज्ञा पुं० [सं०] वायुपुराण में वर्णित एक तीर्थ।

सीतात्यय
संज्ञा पुं० [सं०] अर्थशास्त्र के अनुसार किसानों पर होनेवाला जुरमाना। खेती के संबंध का जुरमाना (कौटि०)।

सीताद्रव्य
संज्ञा पुं० [सं०] खेती के उपादान। काश्तकारी का सामान।

सीताधर
संज्ञा पुं० [सं०] हलधर। बलराम जी।

सीताध्यक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] वह राजकर्मचारी जो राजा की निज की भूमि में खेतीबारी आदि का प्रबंध करता हो।

सीतानवमी व्रत
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का व्रत।

सीतानाथ
संज्ञा पुं० [सं०] श्रीरामचंद्र।

सीतापति
संज्ञा पुं० [सं०] (सीता के स्वामी) श्रीरामचंद्र।

सीतापहाड़
संज्ञा पुं० [सं० सीता+हिं० पहाड़] एक पर्वत जो बंगाल के चटगाँव जिले में है।

सीताफल
संज्ञा पुं० [सं०] १. शरीफा। २. कुम्हड़ा।

सीताबट पु
संज्ञा पुं० [सं० सीतावट] दे० 'सीतावट'। उ०—विटप महीप सुरसरित समीप सोहै, सीताबट पेखत पुनीत होत पातकी। बारिपुर दिगपुर बीच बिलसति भूमि, अंकित जो जानकी चरन जलजात की।—तुलसी ग्रं०, पृ० २६२।

सीतायज्ञ
संज्ञा पुं० [सं०] हल जोतने के समय होनेवाला एक यज्ञ।

सीतारमण
संज्ञा पुं० [सं०] (सीता के पति) रामचंद्र जी।

सीतारमन पु
संज्ञा पुं० [सं० सीतारमण] श्रीरामचंद्र।

सीतारवन, सीतारौन ‡
संज्ञा पुं० [सं० सीता+रमण, प्रा० रवण, हिं० रवन, रौन] दे० 'सीतारमण'।

सीतालोष्ट
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सीतालोष्ठ'।

सीतालोष्ठ
संज्ञा पुं० [सं०] जुते हुए खेत की मिट्टी का ढेला (गोभिल श्राद्धकल्प)।

सीतावट
संज्ञा पुं० [सं०] प्रयाग और चित्रकूट के बीच एक स्थान जहाँ वट वृक्ष के नीचे राम और सीता दोनों ठहरे थे।

सीतावन
संज्ञा पुं० [सं०] एक तीर्थ का नाम [को०]।

सीतावर
संज्ञा पुं० [सं०] श्रीरामचंद्र।

सीतावल्लभ
संज्ञा पुं० [सं०] सीतापति। रामचंद्र।

सीतास्वयंवर
संज्ञा पुं० [सं० सीतास्वयम्वर] सीता जी का स्वयंवर। धनुषयज्ञ।

सीताहरण
संज्ञा पुं० [सं०] रावण के द्वारा सीता जी का अपहरण।

सीताहरन पु
संज्ञा पुं० [सं० सीताहरण] दे० 'सीताहरण'।

सीताहार
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का पौधा।

सीतोनक
संज्ञा पुं० [सं०] १. मटर। २. दाल।

सीतोलक
संज्ञा पुं० [पुं०] मटर।

सीतोदा
संज्ञा स्त्री० [सं०] जैनों के अनुसार विदेह की एक नदी का नाम।

सीत्कार
संज्ञा पुं० [सं०] वह शब्द जो अत्यंत पीड़ा या आनंद के समय मुँह से साँस खींचने से निकलता है। सी सी शब्द। सिसकारी।

सीत्कारबाहुल्य
संज्ञा पुं० [सं०] वंशी के छह दोषों में से एक दोष। विशेष—वंशी के छह दोष ये हैं—सीत्कारबाहूल्य, स्तब्ध, विस्वर खंडित, लघु और अमधुर।

सीत्कृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'सीत्कार'।

सीत्य (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. धान्य। धान। २. खेत। कृषिक्षेत्र।

सीत्य (२)
वि० हल की फाल की रेखाओं से युक्त। कृष्ट। जोता हुआ।

सीथ
संज्ञा पुं० [सं० सिक्थ, प्रा० सिथ्थ] पके हुए अन्न का दाना। भात का दाना। उ०—लहि संतन की सीथ प्रसादी। आयो भुक्ति मुक्ति मरयादी।—रघुराज (शब्द०)।

सीथि पु
संज्ञा पुं० [सं० सिक्थ] दे० 'सीथ'।

सीदंतीय
संज्ञा पुं० [सं० सीदन्तीय] एक साम गान।

सीद
संज्ञा पुं० [सं०] ब्याज पर रुपया देना। सूदखोरी। कुसीद।

सीदना
क्रि० अ० [सं० सीदति] दुःख पाना। कष्ट झेलना। उ०— (क) जद्यपि नाथ उचित न होत अस प्रभु सौं करौं ढिठाई। तुलसिदास सीदत निसि दिन देखत तुम्हारि निठुराई।—तुलसी (शब्द०)। (ख) सीदत साधु साधुता सोचति, बिलसत खल, हुलसति खलई है।—तुलसी (शब्द०)।

सीदी
संज्ञा पुं० [देश०] शक जाति का मनुष्य।

सीद्य
संज्ञा पुं० [सं०] आलस्य। काहिली। सुस्ती।

सीद्यमान
वि० [सं०] दुःखी। पीड़ित। उ०—साधु सीद्यमान जानि रीति पाय दीन की।—तुलसी ग्रं०, पृ० २४३।

सींध
संज्ञा स्त्री० [हिं० सीधा] १. ठीक सामने की स्थिति। सन्मुख विस्तार या लंबाई। वह लंबाई जो बिना कुछ भी इधर उधर मुड़े एक तार चली गई हो, जैसे—नाक की सीध में चले जाओ। २. ऋजुता। सरलता। ३. लक्ष्य। निशाना। मुहा०—सीध बाँधना=(१) सड़क, क्यारी आदि बनाने में पहले रेखा डालना। (२) निशाना साधना। लक्ष्य ठीक करना।

सीधा (१)
वि० [सं० शुद्ध, ब्रज० सूधा, सूधो] [वि० स्त्री० सोधी] १. जो बिना कुछ इधर उधर मुड़े लगातार किसी ओर चला गया हो। <col n="2" जो टेढ़ा न हो। जिसमें फेर या घुमाव न हो। अवक्र। सरल। ऋजु, जैसे—सीधी लकड़ी, सीधा रास्ता। २. जो किसी ओर ठीक प्रवृत्त हो। जो ठीक लक्ष्य की ओर हो। मुहा०—सीधा करना=लक्ष्य की ओर लगाना। निशाना साधना, (बंदूक आदि का)। सीधी राह=सुमार्ग। अच्छा आचरण। सीधी सुनाना=(१) साफ साफ कहना। खरा खरा कहना। लगी लिपटी न रखना। (२) भला बुरा कहना। दुर्वचन कहना। गालियाँ देना। सीधा आना=सामना करना। भिड़ जाना। ३. जो कुटिक या कपटी न हो। जो चालबाज न हो। सरल प्रकृति का। निष्कपट। भोला भाला। ४. शांत और सुशील। शिष्ट। भला। जैसे—सीधा आदमी। मुहा०—सीधी आँखों न देखना=(किसी का) सह न सकना। (किसी का) अच्छा न लगना। (किसी की) उपस्थिति खट- कना। उ०—पढ़कर पुस्तक न फाड़ डालनेवालों को भी कदापि सीधी आँखों नहीं देख सकते।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० २८६। सीधी तरह=शिष्ट व्यवहार से। नरमी से। जैसे—(क) सीधी तरह बोलो। (ख) वह सीधी तरह न मानेगा। सीधी अँगुली घो न निकलना=बिना कड़ाई के कार्य का न होना। ५. जो नटखट या उग्र न हो। जो वदमाश न हो। अनुकूल। शांत प्रकृति का। जैसे—सीधा जानवर, सीधा लड़का। यौ०—सीधा सादा=(१) भोला भाला। निष्कपट। (२) जिसमें बनावट या तड़क भड़क न हो। मुहा०—(किसी को) सीधा करना=दंड़ देकर ठीक करना। शासन करना। रास्ते पर लाना। शिक्षा देना। सीधा दिन= अच्छा दिन। शुभ दिन या मुहूर्त। जैसे—सीधा दिन देखकर यात्रा करना। ६. जिसका करना कठिन न हो। सुकर। आसान। सहल। जैसे,— सीधा काम, सीधा सवाल, सीधा ढंग। ७. जो दु्र्बोध न हो। जो जल्दी समझ में आवे। जैसे—सीधी सी बात नहीं समझ में आती। ८. दहिना। बायाँ का उलटा। जैसे,—सीधा हाथ।

सीधा (२)
क्रि० वि० ठीक सामने की और। सम्मुख। मुहा०—सीधा तीर सा=एकदम सीध में।

सीधा (३)
संज्ञा पुं० [सं० असिद्ध, सिद्ध] १. बीना पका हुआ अन्न। जैसे,— दाल, चावल, आटा। २. वह बिना पका हुआ। अनाज जो ब्राह्मण या पुरोहित आदि को भोजनार्थ दिया जाता है। जैसे— एक सीधा इस ब्राह्मण को भी दे दो। क्रि० प्र०—छूना।—देना।—निकालना।—मनसना।

सीधापन
संज्ञा पुं० [हिं० सीधा+पन (प्रत्य०)] सीधा होने का भाव। सिधाई। सरलता। भोलापन।

सीधा सादा
वि० [हिं०] भोला भाला। जैसे—वह बहुतसीधा सादा व्यक्ति है।

सीधु
संज्ञा पुं० [सं०] १. गुड़ या ईख के रस से बना मद्य। गुड़ की बनी हुई शराब। २. मद्य। आसव। मदिरा (को०)।३. अमृत। सुधा। (लाक्ष०)।

सीधुगंध
संज्ञा पुं० [सं० सीधुगन्ध] मौलसिरी। बकुल।

सीधुप
वि० [सं०] मदिरा पीनेवाला। मद्यप। शराबी।

सीधुपर्णी
संज्ञा स्त्री० [सं०] गंभारी। काश्मरी वृक्ष।

सीधुपान
संज्ञा पुं० [सं०] मदिरापान।

सीधुपुष्प
संज्ञा पुं० [सं०] १. कदंब। कदम। २. मौलसिरी बकुल।

सीधुपुष्पी
संज्ञा स्त्री० [सं०] धातकी। धव। धौ।

सीधुरस
संज्ञा पुं० [सं०] आम का पेड़।

सीधुराक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] बिजौरा नीबू। मातुलुंग वृक्ष।

सीधुराक्षिक
संज्ञा पुं० [सं०] कसीस।

सीधुवृक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] थूहर। स्नुही वृक्ष।

सीधुसज्ञ
संज्ञा पुं० [सं०] बकुल का पेड़। मौलसिरी।

सोधे
क्रि० वि० [हिं० सोधा] १. सोध में। बराबर सामने की ओर। सम्मुख। (२) बिना कहीं मुड़े या रुके। जैसे—सीधे वहीं जाओ। ३. बिना और कहाँ हाती हुए। जैसे—सीधे राजा साहब के पास जाकर कही। ४. मुलायामयत स। नरमी स। शिष्ट व्यवहार से। जेस—वह साध रुपया न दगा। ५. शिष्टता का साथ। शाति क साथ। जेस—सीधे बेठो।

सीध्र
संज्ञा पुं० [स०] गुदा। मलद्वार।

सीन (१)
संज्ञा पुं० [अ०] १. दृश्य। दृश्यपट। २. थियेटर के रंगमंच का कोइ परदा जिसपर नाटक का कोइ दृश्य। चात्रत हा। ३. घटनाआ क घाटत हान की जगह। घटनास्थल।—पद्माकर ग्रं०, पृ० १८। यौ०—सोन सोनेरी= रगमच ती दृश्यानुरूप सजावट।

सीन पु (२)
संज्ञा पुं० [फा० सीनह्] दे० 'साना'। उ०—दोऊ तरफ के सुभट हाँकत जुटि गए रिपु सीन सा।—हिम्मत०, पृ० २२। यौ०—सीन साफ=दे० 'सानासाफ'। उ०—सीन साफ मुख नूर बिराजे। शोभा सुंदर बहु विधि छाजै।—सत० दरिया, पृ० १३।

सीनरी
संज्ञा स्त्री० [अ०] प्राकृतिक दृश्य।

सीना (१)
क्रि० स० [सं० सीवन] १. कपड़, चमड़े आदि के दो टुकड़ों का सुई का द्वारा तागा पिराकर जाड़ना। टाका से मिलाना या जाड़ना। टाका मारना। जस—कपड़ साना, जूत साना। उ०—टुकड़ टुकड़ जाड़ जुगत सा सा क अग लिपटाना। कर डारी भला पापन सा लोभ माह म साना। साच समझ आभमाना।—कबरि० श०, भा० १, पृ० ४। सयो० क्रि०—डालना।—दना।—लना। यौ०—सोना पिरोना=सिलाई तथा बेलबूटे आदि का काम करना।

सीना (२)
संज्ञा पुं० [फा० सीनह्] छाती। वक्षस्थल। यौ०—सीनाजार। सीनातीड़। सीनाबद।मुहा०—सीने से लगाना=छाती से लगाना। आलिंगन करना। २. स्तन। चूचुक (को०)।

सीना (३)
संज्ञा पुं० [सं० सीमिक] १. एक प्रकार का कीड़ा जो ऊनी कपड़ों को काट डालता है। सीवाँ। क्रि० प्र०—लगना। २. एक प्रकार का रेशम का कीड़ा। छोटा पाट।

सीनाचाक
वि० [फा० सीनह् चाक] विदीर्णहृदय। शोकाकुल [को०]।

सीनाजन
वि० [फा० सीनह् जन] छाती पीटनेवाला। शोक या मातम मनानेवाला [को०]।

सीनाजनी
संज्ञा स्त्री० [फा० सीनह् जनी] छातीरीटना। मातम करना।

सीनाजोर
वि० [फा० सीनह् जोर] १. अत्याचारी। जालिम। २. विद्रोही। बागी। ३. उद्दंड [को०]।

सीनाजोरी
संज्ञा स्त्री० [फा़० सीनह् जोरी] १. अत्याचार। २. विद्रोह। ३. उद्दंडता। उ०—न कालिदास की चोरी है बल्कि साफ सीनाजोरी है।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० ४३३।

सीनातोड़
संज्ञा पुं० [फा० सीनह्+हिं० तोड़ना] कुश्ती का एक पंच। विशेष—जब पहलवान अपने जोड़ की पीठ पर रहता है, तब एक हाथ से वह उसकी कमर पकड़ता है और दूसरे हाथ से उसके सामने का हाथ पकड़ और खींचकर झटके से गिराता है।

सीनापनाह
संज्ञा पुं० [फा०] जहाज के निचले खंड़ में लंबाई के बल दानो ओर का किनारा। (लश०)।

सीनाबंद
सज्ञा पुं० [फा०] १. आगया। चोली। २. गरेबान का हिस्सा। ३. वह घाड़ी जी अगले पेरा स लंगड़ाता हो।

सीनाबसीना (१)
क्रि० वि० [फा० सीनह् बसानह्] १. छाती से छाती मिलात हुए। २. मुकाबल म।

सीनाबसीना (२)
वि० (मत्र आदि) जो गुरु या वंशपरपरा से क्रमागत हो [को०]।

सीनाबाँह
संज्ञा पुं० [फा० सीनह्+हिं० बाँह] एक प्रकार की कसरत जिसमे छाती पर थाप देते है।

सीनाबाज
वि० [फा० सानह् बाज] १. खुली छाती का। २. चौड़ी छातीवाला [को०]।

सीनासाफ
वि० [फा० सानह् साफ] निश्चल। निष्कपट [को०]।

सीनासपर
वि० [फा० सानह् सिपर] डटकर मुकाबला करनेवाला। छाता तानकर लड़नेवाला [को०]।

सीनियर
वि० [अ०] १. बड़ा। वयस्क। २. श्रेष्ठ। पद में ऊँचा। जैसे—सानयर मबर; सीनियर परीक्षा।

सीनी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] तश्तरा। थाली।

सीप
संज्ञा पुं० [सं०शुक्त, प्रा० सुत्ति] १. कड़े आवरण के भीतर बंद रहनवाला शंख घघि आदि को जाति का एक जलजंतु जो छीट तालाबा ओर झीली से लेकर बड़े बड़े समुद्रों तक मे पाया जाता है। शुक्ति। मुक्तामाता। मुक्तागृह। सीपी। सितुही। विशेष—तालों के सीप लंबोतरे होते हैं और समुद्र के चौखूंटे विषम आकार के और बड़े बड़े होते हैं। इनके ऊपर दोहरे संपुट के आकार का बहुत बड़ा आवरण होता है जो खुलता और बंद होता है। इसी संपुट के भीतर सोप का कीड़ा, जो बिना अस्थि और रीढ़ का होता है, जमा रहता है। ताल के सीपों का आवरण ऊपर से कुछ काला या मैला तथा समतल होता है, यद्यपि ध्यान से देखने से उसपर महीन महीन धारियाँ दिखाई पड़ती हैं। इस आवरण का भीतर की ओर रहनेवाला पार्श्व बहुत ही उज्ज्वल और चमकीला होता है, जिसपर प्रकाश पड़ने से कई रंगों की आभा भी दिखाई पड़ती है। समुद्र के सीपों के आवरण के ऊपर पानी की लहरों के समान टेढ़ी धारियाँ या लहरियाँ होती हैं। समुद्र के सोपों में ही मोती उत्पन्न होते हैं। जब इन सीपों की भीतरी खोली और कड़े आवरण के बीच कोई रोगोत्पादक बाहरी पदार्थ का कण पहुँच जाता है, तब जंचु रक्षा के लिये उस कण के चारों ओर आवरण ही की शंख धातु का एक चमकीला उज्वल पदार्थ जमने लगता है जो धोरे धीरे कड़ा पड़ जाता है। यही मोती होता है। समुद्री सीप प्रायः छिछले पानी में चट्टानों में चिपके हुए पाए जाते हैं। ताल के सीपों के संपुट भी कीड़ों को साफ करके काम में लाए जाते हैं। बहुत से स्थानों में लोग छोटे बच्चों को इसी से दूध पिलाते हैं। २. सीप नामक समुद्री जलजंतु का सफेद कड़ा, चमकीला आवरण या संपुट जो बटन, चाकू के बेंट आदि बनाने के काम में आता है। ३. ताल के सीप का संपुट जो चम्मच आदि के समान काम में लाया जाता है। ४. वह लंबोतरा पात्र जिसमें देवपूजा या तर्पण आदि के लिये जल रखा जाता है। अरघा।

सीपज पु
संज्ञा पुं० [हिं० सीप+सं० ज] सीप से उत्पन्न, मोती ! सीपिज। उ०—सीपज माल स्याम उर सोहै बिच बघनह छबि पावै री।—सूर०, १०।१३९।

सीपति पु
संज्ञा पुं० [सं० श्रीपति] विष्णु।

सीपर ‡
संज्ञा पुं० [फा० सिपर] ढाल। उ०—मेरे मन की लाज इहाँ लौ हठि प्रिय पान दए हैं। लागत साँगि विभीषण ही पर, सीपर आपु भए हैं।—तुलसी (शब्द०)।

सीपसुत पु
संज्ञा पुं० [हिं० सीप+सुत] मोती। उ०—देखि माई हरि जू की लोटनि।.... परसत आनन मनु रबि कुंडल अंबुज स्त्रवत सीपसुत जोटनि।—सूर०, १०।१८७।

सीपारा
संज्ञा पुं० [फा० सीपारहू] कुरान का एक भाग। विशेष—कुराम में कुल तीस भाग हैं जिनमें प्रत्येक को सीपार (सिपारह भी) कहते हैं [को०]।

सीपिज पु
संज्ञा पुं० [हिं० सीपी+सं० ज] मोती। उ०—लाला हौं वारी तेरे मुख पर।...कुटिल अलक मोहन मन विहँसत भूकुटि विकट नैननि पर। दमकति द्वै द्वै दँतुलिया विहँसति मनौ सीपिज घरु कियो वारिज पर।—सूर (शब्द०)।

सीपी
संज्ञा स्त्री० [सं० शुक्ति ?, हि० सीप] दे० 'सीप'।

सीबी
संज्ञा स्त्री० [अनु० सी सी] वह शब्द जो पीड़ा या अत्यंत आनंद के समय मुँह से साँस खीचने से उत्पन्न होता है। सी सी शब्द। सिसकारी। शीत्कार उ०—नाक चढ़ै सीबी करै जितै छबीली छैल। फिरि फिरि भूलि वहै गहै पिय कँकरीली गैल।— बिहारी (शब्द०)।

सीभा †
संज्ञा पुं० [देश०] दहेज।

सीमत
संज्ञा पुं० [सं० सीमन्त] १. स्त्रियों की माँग। २. अस्थि- संघात। हडि्डयों का संधिस्थान। हडि्डयों का जोड़। विशेष—सुश्रुत के अनुसार इनकी संख्या १४ है। यथा—जाँघ में १, वंक्षण अर्थात् मूत्राशय तथा जंघा के संधिस्थान में १, पैर में ३. दोनों बाहों में ३-३, त्रिक या रीढ़ के नीचे के भाग मे १. और मस्तक में १। भावप्रकाश के अनुसार हडि्डयों का संधिस्थान सीया रहता है; इसलिये इसे 'सीमंत' कहते हैं। ३. हिंदुओं में एक संस्कार जो प्रथम गर्भस्थिति के चौथे, छटे या आठवें महीने में किया जाता है। दे० 'सीमंतोन्नयन'।

सीमंतक
संज्ञा पुं० [सं० सीमन्तक] माँग निकालने की क्रिया। २. ईंगुर। सिंदूर जिसे स्त्रियाँ माँग के बीच में लगाती हैं। ३. जैनों के सात नरकों में से एक नरक का अधिपति। ४. नरकावास। ५. एक प्रकार का मानिक या रत्न।

सीमंतकरण
संज्ञा पुं० [सं० सीमन्तकरण] माँग निकालना या काढ़ना [को०]।

सीमंतमणि
संज्ञा पुं० [सं० सीमन्तमणि] चूड़ामणि [को०]।

सीमतनी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० सीमन्तिनी] स्त्री। नारी। सीमंतिनी।

सीमंतवान्
वि० [सं० सीमन्तवत्] [स्त्री० सीमंतवंती] जिसे माँग हो। जिसकी माँग निकली हो।

सीमंतित
वि० [सं० सीमन्तित] माँग निकाला हुआ। जैसे—सीम- तित केश।

सीमंतिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० सीमन्तिनी] स्त्री। नारी। विशेष—स्त्रियाँ माँग निकालती हैं, इससे उन्हें सीमंतिनी कहते हैं।

सीमंतोन्नयन
संज्ञा पुं० [सं० सीमन्तोन्नयन] द्विजों के दस संस्कारों में से तीसरा संस्कार। विशेष—गर्भस्थिति के तीसरे महीने में पुसवन संस्कार करने के पश्चात् चौथे, छटे या आठवें महीने में यह सस्कार करने का विधान है। इसमें बधू की माँग निकाली जाती है। कहते हैं, इस संस्कार के द्वारा गर्भस्थ संतान के गर्भ में रहने के दोषों का निवारण होता है।

सीम पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० सीमा] सीमा। हद। पराकाष्ठा। सर- हद। मर्यादा। मुहा०—सीम चरना या काँड़ना=अधिकार दबाना। दबाना। जबरदस्ती करना। उ०—हैं काके द्वै सीस ईस के जो हठि जन की सीम चरै।—तुलसी (शब्द०)। सीम चाँपना=हददबाना। उ०—सीम कि चापि सकै कोइ तासू। बड़ रखवार रमापति जासू।—मानस, १।११६।

सीम (२)
संज्ञा स्त्री० [फा०] १. धन दौलत। २. रजत। चाँदी [को०]। यौ०—सीमकश। फजूलखर्च। अपव्ययी।सीमतन=सुंदर। गौर।

सीमक
संज्ञा पुं० [सं०] सीमा। हद [को०]।

सीमल
संज्ञा पुं० [सं० शाल्मलि] दे० 'सेमल'।

सीमलिंग
संज्ञा पुं० [सं० सीमलिङ्ग] सीमा का चिह्न। हद का निशान।

सीमांत
संज्ञा पुं० [सं० सीमान्त] १. सीमा का अंत। वह स्थान जहाँ सीमा का अंत होता हो। जहाँ तक हद पहुँचती हो। सरहद। २. गाँव की सीमा। ३. गाँव के अंतर्गत दूर की जमीन। सिवाना।

सीमांतपूजन
संज्ञा पुं० [सं० सीमान्तपूजन] १. वर का पूजन या अगवानी जब वह बारात के साथ गाँव की सीमा के भीतर पहुँचता है। २. ग्राम की सीमा का पूजन (को०)।

सीमांतप्रदेश
संज्ञा पुं० [सं० सीमान्तप्रदेश] १. सीमांत या सरहद पर स्थित भूभाग। २. दो देशों के बीच का प्रदेश [को०]।

सीमांतबंध
संज्ञा पुं० [सं० सीमान्तबन्ध] आचरण का नियम या मर्यादा।

सीमांतर
संज्ञा पुं० [सं० सीमान्तर] गाँवों की सीमा [को०]।

सीमांतलेख
संज्ञा स्त्री० [सं० सीमान्तलेखा] आखिरी किनारा। अंतिम छोर [को०]।

सीमा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० सीमन्] दे० 'सीमा' २।

सीमा (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. माँग। २. किसी प्रदेश या वस्तु के विस्तार का अंतिम स्थान। हद। सरहद। मर्यादा। ३. आचरण व्यवहार आदि की शिष्टता। मर्यादा। मुहा०—सीमा के बाहर जाना=उचित से अधिक बढ़ जाना। मर्य्रादा का उल्लंघन करना। हद से ज्यादा बढ़ना। ४. खेत, गाँव आदि की सीमा पर का बाँध या मेंड़ (को०)। ५. चिह्न। निशान (को०)। ६. किनारा। तीर। समुद्रतट (को०)। ७. क्षितिज (को०)। ८. उच्चतम या अधिकतम सीमा (को०)। ९. खेच (को०)। १०. ग्रीवा के पृष्ठ भाग में खोपड़ी आदि का जो़ड़ (को०)। ११. अंडकोष (को०)। १२. एक आभूषण।

सीमाकर्षक
संज्ञा पुं० [सं०] पाराशर स्मृति के अनुसार ग्राम की सीमा पर हल जोतने या खेती करनेवाला।

सीमाकृषाण
वि० [सं०] सिवान की खेती करनेलवाल। दे० 'सीमाकर्षक'।

सीमागिरि
संज्ञा पुं० [सं०] सीमा पर स्थित पर्वत (को०)।

सीमाज्ञान
संज्ञा पुं० [सं० सीमा+अज्ञान] सीमा के बारे में ज्ञान का अभाव।

सींमातिक्रमणोत्सव
संज्ञा पुं० [सं०] युद्धयात्रा में सीमा पार करने का उत्सव। विजययात्रा। विजयोत्सव।विशेष—प्राचीन कास में विजयादशमी को क्षत्रिय राजा अपने राज्य की सीमा लाँघते थे।

सीमाधिप
संज्ञा पुं० [सं०] १. पड़ोसी राजा। सीमा प्रदेश का रक्षक या अधिकारी [को०]।

सीमानिश्चय
संज्ञा पुं० [सं०] सीमारेखा या हदबंदी के संबंध में विधिसंमत निर्णय [को०]।

सीमापहारी
वि० [सं० सीमापहारिन्] सीमा के प्रदेश पर अधिकार करनेवाला। सीमा के चिह्न मिटानेवाला।

सीमापाल
संज्ञा पुं० [सं०] सीमा की रखवाली करनेवाला। सीमा- रक्षक।

सीमाबंध
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सीमांतबंध' [को०]।

सीमाब
संज्ञा पुं० [फा०] पारा।

सीमाबदूध
संज्ञा पुं० [सं०] रेखा से घिरा हुआ। हद के भीतर किया हुआ।

सीमाबियत
संज्ञा स्त्री० [फा०] पारद की तरह चंचल होना। अस्थिरता। चंचलता [को०]।

सीमाबी
वि० [फा०] पारे का। पारे से संबंधित [को०]।

सीमावरोध
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य अर्थशास्त्र के अनुसार सीमा स्थिर होना। हदबंदी।

सीमालिंग
संज्ञा पुं० [सं० सीमालिङ्ग] दे० 'सीमलिंग' [को०]।

सीमावाद
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सीमाविवाद' [को०]।

सीमाविनिर्णय
संज्ञा पुं० [सं०] सीमा संबंधी झगड़ों का निपटारा [को०]।

सीमाविवाद
संज्ञा पुं० [सं०] सीमा संबंधी विवाद। सरहद का झगड़ा। अठारह प्रकार प्रकार के व्यवहारों में या मुकदमों में से एक। विशेष—स्मृतियों में लिखा है कि यदि दो गाँवों में सीमा संबंधी झगड़ा हो, तो राजा को सीमा निर्देश करके झगड़ा मिटा डालना चाहिए। इस काम के लिये जेठ का महीना श्रेष्ठ बताया गया है। सीमास्थल पर बड़, पीपल, साल, पलास आदि बहुत दिन टिकनेवाले पेड़ लगाने चाहिए। साथ ही तालाब, कूआँ बनवा देना चाहिए, क्योंकि ये सब चिह्न शीघ्र मिटेवाले नहीं हैं। यौ०—सीमाविवाद धर्म=सीमाविवाद संबंधी नियम या कानून।

सीमावृक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] वह वृक्ष जो सीमा पर हो। हद बतानेवाला पेड़। विशेष—मनुसंहिता में सीमा स्थान पर बहुत दिन टिकनेवाले पेड़ लगाने का विधान है। बहुधा सीमाविवाद सीमा पर का वृक्ष देखकर मिटाया जाता था।

सीमासंधि
संज्ञा स्त्री० [सं० सीमासन्धि] दो सीमाओं का एक जगह मिलान। वह स्थान जहाँ सीमाएँ मिलती हैं।

सीमासेतु
संज्ञा पुं० [सं०] वह पुश्ता, बाँध या मेंड़ जो सीमा का निर्देश करता है। हदबंदी।

सीमिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का वृक्ष। २. दीमक। एक प्रकार का छोटा कीड़ा। ३. दीमकों का लगाया हुआ मिट्टी का ढेर।

सीमिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दीमक या चींटी। २. वल्मीक। विमौट। ३. जीभ के नीचे की फुंसी [को०]।

सीमिया
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. परकायप्रवेश विद्या। २. जादू। इंद्रजाल। नजरबंदी [को०]।

सीमी
वि० [फा०] १. चाँदी जैसा। २. चाँदी का। चाँदी का बना हुआ [को०]।

सीमीक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सीमिक' [को०]।

सीमुर्ग
संज्ञा पुं० [फा० सीमुर्ग] एक विशाल पक्षी जिसका निवास काफ पहाड़ी पर माना गया है [को०]।

सीमेंट
संज्ञा पुं० [अँ०] एक प्रकार के पत्थर का चूर्ण। दे० 'सिमेंट'।

सीमोल्लंघन
संज्ञा पुं० [सं० सीमोल्लङ्घन] १. सीमा का उल्लंघन करना। सीमा को लाँधना। हद पार करना। २. विजययात्रा। विशेष दे० 'सीमातिक्रमणोत्सव'। ३. मर्यादा के विरुद्ध कार्य करना।

सीय पु
संज्ञा स्त्री० [सं० सीता] सीता। जानकी। उ०—राम सीय सिर सेंदुरु देही।—मानस, १।३२५।

सीयक
संज्ञा पुं० [सं०] मालवा के परमार राजवंश के दो प्राचीन राजाओं के नाम जिनमें पहला दसवीं शताब्दी के आरंभ में और दूसरा ग्यारहवीं शताब्दी के आरंभ में था। इसी दूसरे सीयक का पुत्र मुंज था जो प्रसिद्ध राजा भोज का चाचा था।

सीयन †
संज्ञा स्त्री० [सं० सीवन] दे० 'सीवन'।

सीयरा †
वि० [सं० शीतल] दे० 'सियरा'।

सीर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. हल। २. हल जोतनेवाले बैल। ३. सूर्य। ४. अर्क। आक का पौधा।

सीर (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० सीर (=हल)] १. वह जमीन जिसे भू- स्वामी या जमींदार स्वयं जोतता आ रहा हो, अर्थात् जिसपर उसकी निज की खेती होती आ रही हो। २. वह जमीन जिसकी उपज या आमदनी कई हिस्सेदारों में बँटती हो। ३. साझा। मेल। मुहा०—सीर में=एक साथ मिलकर। इकठ्ठा। एक में। जैसे—भाइयों का सीर में रहना।

सीर (३)
संज्ञा पुं० [सं० शिरा (=रक्तनाड़ी)] रक्त की नाड़ी। रक्त की नली। मुहा०—सीर खुलवाना=नश्तर से शरीर से दूषित पक्त निकलवाना। फसद खुलवाना।

सीर †पु (४)
वि० [सं० शीतल, प्रा० सीअड़, हिं० सीड़, सील, सीरा] ठंढ़ा। शीतल। उ०—सीर समीर धीर अति सुरभित बहत सदा मन भायो।—रघुराज (शब्द०)।

सीर (५)
संज्ञा पुं० १. चौपायों का एक संक्रामक रोग। २. पानी की काट। (लश०)।

सीर (६)
संज्ञा पुं० [फा०] लशुन। लहसुन [को०]।

सीरक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. हल। २. शिशुमार। सूस। ३. सूर्य।

सीरक पु (२)
वि० [हिं० सीरा] ठंढा करनेवाला।

सीरक पु (३)
संज्ञा पुं० स्त्री० शीतलता। ठंढक। शैत्य। उ०—देखियत है करुण की मूरति सुनियत है परपीरक। सोइ करौ जो मिटै हृदय को, दाहु परै उर सीरक।—सूर (शब्द०)।

सीरख पु
संज्ञा पुं० [सं० शीर्ष] 'शीर्ष'।

सीरत
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. स्वभाव। प्रकृति। आदत। २. जीवन- चरित। ३. सौजन्य। यौ०—सूरत सीरत=रूप और गुण।

सीरतन
वि० [अ०] स्वभावतः। स्वभाव से। आदत से [को०]।

सीरधर
संज्ञा पुं० [सं०] १. हल धारण करनेवाला। २. बलराम।

सीरध्वज
संज्ञा पुं० [सं०] १. राजा जनक का नाम। विशेष—जब ये पुत्र की कामना से यज्ञभूमि जोत रहे थे तब हल की कूट या रेखा से सीता की उत्पत्ति हुई। इसी से लोग इन्हें 'सीरध्वज' कहने लगे। २. बलराम का नाम।

सीरन
संज्ञा पुं० [देश०] बच्चों का पहनावा।

सीरनी
संज्ञा स्त्री० [फा० शीरीनी] मिठाई।

सीरपाणि
संज्ञा पुं० [सं०] हलधर। बलदेव।

सीरभृत्
संज्ञा पुं० [सं०] १. हलधर। बलदेव। २. हल धारण करनेवाला।

सीरयोग
संज्ञा पुं० [सं०] हल में जुते हुए, बैलों की जोड़ी। २. बैलों को हल में जोतना [को०]।

सीरवाह
संज्ञा पुं० [सं०] १. हल धारण करनेवाला। हलवाहा। २. जमींदार की ओर से उसकी खेती का प्रबंध करनेवाला कारिंदा।

सीरवाहक
संज्ञा पुं० [सं०] हलवाहा। किसान।

सीरष पु
संज्ञा पुं० [सं० शीर्ष] दे० 'शीर्ष'।

सीरा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्राचीन नदी का नाम।

सीरा (२)
संज्ञा पुं० [फा़० शीर] १. पकाकर मधु के समान गाढ़ा किया हुआ चीनी का रस। चाशनी। २. मोहनभोग। हलवा।

सीरा (३)
संज्ञा पुं० [हिं० सिर] चारपाई का वह भाग जिधर लेटने में सिर रहता है। सिरहाना।

सीरा †पु (४)
वि० [सं० शीतल, प्रा० सीअड़] [वि० स्त्री० सीरी] १. ठंढा। शीतल। उ०—सीरी पौन अगिनि सी दाहति, कोकिल अति सुखदाई।—सूर (शब्द०)। २. शांत। मौन। चुपचाप। उ०—दुर्जन हँसे न कोय आपु सीरे ह् वै रहिए।—गिरिधर शब्द०)।

सीरियल
संज्ञा पुं० [अँ०] १. वह लंबी कहानी या दूसरा लेख जो कई बार और कई हिस्सों में निकले। २. वह कहानी या किस्सा जो बायस्कोप में कई बार कई हिस्सों में दिखाया जाय।

सीरी (१)
संज्ञा पुं० [सं० सीरिन्] (हल धारण करनेवाले) बलराम।

सीरी (२)
वि० स्त्री० [सं० शीतल, प्रा० सीअड, सीयड़, हिं० सीरा] दे० 'सीरा'।

सीरीज
संज्ञा स्त्री० [अं० सीरीज] एक ही वस्तु का लगातार क्रम। सिलसिला। श्रेणी। लड़ी। माला। जैसे,—बालसाहित्य सीरीज की पुस्तकें अच्छी होती हैं।

सीरोसा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की मिठाई।

सीलंध
संज्ञा स्त्री० [सं० सीलन्ध] एक प्रकार की मछली। विशेष—वैद्यक में यह श्लेष्मावर्धक, वृष्य, पाक में मधुर और गुरु, वातपित्तहर, हृद्य और आमवातकारक कही गई है।

सील (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० शीतल, प्रा० सीअड़] भूमि में जल की आर्द्रता सीढ़। नमी। तरी।

सील (२)
संज्ञा पुं० [सं० शलाका] लकड़ी का एक हाथ लंबा औजार जिसपर चूड़ियाँ गोल और सुडौल की जाती है।

सील † (३)
संज्ञा पुं० [सं० शील] दे० 'शील'। यौ०—सीलवंत, सीलवान=शीलयुक्त। सुशील।

सील (४)
संज्ञा पुं० [अं०] १. मुहर। मुद्रा। ठप्पा। छाप। २. एक प्रकार की समुद्री मछली जिसका चमड़ा और तेल बहुत काम आता है।

सील (५)
संज्ञा पुं० [सं०] हल [को०]।

सीला (१)
संज्ञा पुं० [सं० शिल] १. अनाज के वे दाने जो फसल कटने पर खेत में पड़े रह जाते हैं जिन्हें तपस्वी या गरीब लोग चुनते हैं। सिल्ला। उ०—(क) कविता खेती उन लई सीला बिनत मजूर।—(शब्द०)। (ख) विष समान सब विषय बिहाई। बसै तहाँ सीला बिनि खाई।—रघुराज (शब्द०)। २. खेत में गिरे दानों को चुनकर निर्वाह करने की मुवियों की वृत्ति।

सीला (२)
वि० [सं० शीतल] [वि० स्त्री० सीली] गीला। आर्द्र। तर। नम।

सीवक
संज्ञा पुं० [सं] सीनेवाला। सिलाई करनेवाला।

सीवड़ो
संज्ञा पुं० [सं० सीमान्त] ग्राम का सीमांत। सिवाना (डिं०)।

सीवन
संज्ञा पुं० [सं०] १. सीने का काम। सिलाई। २. सीने से पड़ी हुई लकीर। कपड़े के दो टुकड़ों के बीच की सिलाई का जोड़। ३. दरार। दराज। संधि। ४. वह रेखा जो अंडकोश के बीचो- बीच से लेकर मलद्वार तक जाती है।

सीवना (१)
संज्ञा पुं० [सं० सीमान्त] दे० 'सिवान'।

सीवना (२)
क्रि० स० [सं० सीवन] दे० 'सीना'।

सीवनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सूई। सूचिका। सूची। २. वह रेखा जो लिंग के नीचे से गुदा तक जाती है। विशेष—सुश्रुत में यह चार प्रकार की कही है—गोफमिश, तुल्लसीवनी, वेल्लित और ऋजु्ग्रंथि। ३. घोड़े का गुदा के नीचे का भाग (को०)।

सीवी
संज्ञा स्त्री० [अनु० सी० सी०] दे० 'सीवी'।

सीव्य
वि० [सं०] सीने लायक। सीने के योग्य [को०]।

सीस (१)
संज्ञा पुं० [सं० शीर्ष] १. सिर। माथा। मस्तक। ३. कंधा। (डि०)। ३. अंतरीप (लश०)।

सीस (२)
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सीसा'।

सीसक
संज्ञा पुं० [सं०] सीसा नामक धातु।

सीसज
संज्ञा पुं० [सं०] सिंदूर।

सीसताज
संज्ञा पुं० [हिं० सीस+फा० ताज] वह टोपी या ढक्कन जो शिकार पकड़ने के लिये पाले हुए जानवरों के सिर चढ़ा रहता है और शिकार के समय खोला जाता है। कुलहा। उ०—तुलसी निहारि कपि भालु किलकत ललकत लखि ज्यों कँगाल पातरी सुनाज की। राम रुख निरखि हरष्यो हिय हनुमान मानों खेलवार खोली सीसताज बाज की।—तुलसी (शब्द०)।

सीसताण
संज्ञा पुं० [सं०] अफगानिस्तान और फारस के बीच का प्रदेश। सीस्तान।

सीसत्रान पु
संज्ञा पुं० [सं० शिरस्त्राण] टोप। कूँड। शिरस्त्राण। उ०—सीसत्रान अवतंसजुत मनिहाटक मय नाह। लेहु हरषि उर सजहु सिर बहु सोभा जिहिं माह।—रामाश्वमेघ (शब्द०)।

सीसपत्र
संज्ञा पुं० [सं०] सीसा धातु।

सीसपत्रक
संज्ञा पुं० [सं०] सीसा धातु।

सीसफूल
संज्ञा पुं० [हिं० सीस+फूल] सिर पर पहनने का फूल के आकार का एक गहना।

सीसम
संज्ञा पुं० [फा़० शीशम] एक वृक्ष। दे० 'शीशम'।

सीसमहल
संज्ञा पुं० [फा० शीशा+अ० महल] वह मकान जिसकी दीवारों में चारों ओर शीशे जड़े हों। शीशे का महल।

सीसर
संज्ञा पुं० [सं०] १. पराशर गृह्यसूत्र के अनुसार सरमा नाम की देवताओं की कुतिया का पति। २. एक बालग्रह जिसका रूप कुत्ते का माना गया है।

सीसल
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का पेड़ जो केवड़े या केतकी की तरह का होता है और जिसका रेशा बहुत काम आता है। रामबाँस।

सीसा (१)
संज्ञा पुं० [सं० सीसक] एक मूल धातु जो बहुत भारी और नीलापन लिए काले रंग की होती है। विशेष—आधुनिक रसायन में यह मूल द्रव्यों में माना गया है। यह पीटने से फैल सकता है, और तार रूप में भी हो सकता है, पर कुछ कठिनता से। इसका रंग भी जल्दी बदला जा सकता है। इसकी चद्दरें, नलियाँ और बंदूक की गोलियाँ आदि बनती हैं। इसका घनत्व ११।३७ और परमाणुमान २०६।४ है। सीसा दूसरी धातुओं के साथ बहुत जल्दी मिल जाता और कई प्रकार की मिश्र धातुएँ बनाने में काम आता है। छापे के टाइप की धातु इसी के योग से बनती है। आयुर्वेद में सीसा सप्त धातुओं में है और अन्य धातुओं के समान यह भी रसौषध के रूप में व्यवहृत होता है। इसका भस्म कई रोगों में दिया जाता है। वैद्यक में सीसा आयु, वीर्य और कांति को बढ़ानेवाला, मेहनाशक, उष्ण तथा कफ को दूर करनेवाला माना जाता है। इसकी उत्पत्ति की कथा भावप्रकाश में इस प्रकार है,—वासुकि एक नाग कन्या को देखकर मोहित हुए थे। उन्हीं के स्खलित वीर्य से इस धातु की उत्पत्ति हुई। पर्या०—सीस। सीसक। गंडपदभव। सिंदूरकारण। वर्ध। स्वर्णादि। यवनेष्ट। सुवर्णक। वध्रक। चिच्चट। जड। भुजंगम। अग। कुरंग। पिरपिष्टक। बहुमल। चीनपिष्ट। त्रपु। महावल। मृदुकृष्णायस। पद्म। तारशुद्धिकर। शिरावृत्त। वयोवंग।

सीसा ‡पु (२)
संज्ञा पुं० [फा़० शीशह्] दे० 'शीशा'।

सीसी (३)
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. पीड़ा या अत्यंत आनंद के समय मुँह से साँस खींचने से निकला हुआ शब्द। शीत्कार। सिसकारी। उ०—सीसी किए ते सुधा सीसी सी ढरकि जाति—(शब्द०)। कि० प्र०—करना। २. शीत के कष्ट के कारण निकला हुआ शब्द।

सीसी † (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० शीशा] दे० 'शीशी'।

सीसों, सीसों †
संज्ञा पुं० [फा़० शीशम] दे० 'शीशम'।

सीसोदिया
संज्ञा पुं० [सिसोद (=स्थान)] दे० 'सिसोदिया'।

सीसोपधातु
संज्ञा पुं० [सं०] सिंदूर। ईंगुर।

सीसौदिया
संज्ञा पुं० [सिसोद स्थान] दे० सिसोदिया।

सीस्तान
संज्ञा पुं० [फा०] अफगानिस्तान और फारस का मध्यवर्ती प्रदेश। सीसताण।

सीस्मोग्राफ
संज्ञा पुं० [अं०] एक प्रकार का यंत्र जिससे भूकंप होने का पता लगता है। विशेष—इस यंत्र से यह मालूम हो जाता है कि भूकंप किस दिशा में, कितनी दूर पर हुआ है, और उसका वेग हल्का था या जोर का।

सीह (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० सीधु (=मद्य)] महक। गंध।

सीह (२)
संज्ञा पुं० [देश०] साही नामक जंतु। सेही।

सीह पु (३)
संज्ञा पुं० [सं० सिंह] दे० 'सिंह'।

सीहगोस
संज्ञा पुं० [फा़० सियहगोश] एक प्रकार का जंतु जिसके कान काले होते हैं। उ०—केसव सरभ सिंह सीहगोस रोस गति कूकरनि पास ससा सूकर गहाए हैं।—केशव (शब्द०)।

सीहुड
संज्ञा पुं० [सं० सीहुण्ड] सेहूँड़ का पेड़। स्नुही। थूहर।