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विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/दा

विक्षनरी से

दांड
वि० [सं० दण्ड] [वि० स्त्री० दांडी] दंड से संवद्ध । छड़ी या दंड से संबंधित [को०] ।

दांडक्य
संज्ञा पुं० [सं० दाण्डक्य] द्वारपाल । छड़ी बरदार । रक्षक । २. एक राजा का नाम [को०] ।

दांडाजिनिक (१)
संज्ञा पुं० [सं० दाण्डाजिनिक] वह जो दंड और अजिन धारण करके अपना अर्थसाधन करता फिरे । साधु के वेश में लोगों को धोखा देनेवाला आदमी ।

दांडाजिनिक (२)
वि० कपटी । छली [को०] ।

दांडिक
संज्ञा पुं० [सं० दाणि्डक] वह जो दंड देने के लिये नियुक्त हो । जल्लाद ।

दांत (१)
वि० [सं० दान्त] १. जिसका दमन किया गया हो । वशीभूत । दबाया हुआ । उ०—तो क्या मैं भ्रम में थी नितांत । संहार- बध्य असहाय दांत ।—कामायनी, पृ० २४० । २. जिसने इंद्रियों को वश में कर लिया हो । जिसका शरीर तप आदि का क्लेश सह सके । ३. जो दाँत का बना हों । ४. दाँत संबंधी ।

दांत (२)
संज्ञा पुं० १. मैनफल । २. पहाड़ पर की बावली । ३. विदर्भ के राजा भीमसेन के दूसरे पुत्र जो दमयंती के भाई थे । ४. दानकर्ता । दाता (को०) । ५. दमनक नाम का वृक्ष (को०) ।

दांतक
वि० [सं० दान्तक] दाँत से निर्मित । हाथीदाँत से निर्मित । हाथीदाँत का [को०] ।

दांता
संज्ञा स्त्री० [सं० दान्ता] एक अप्सरा का नाम । (महाभारत) ।

दांति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. इंद्रियनिग्रह । इंद्रियों का दमन । क्लेश आदि सहने की शाक्ति । २. वश्यता । अधीनता । ३. विनय । नम्रता ।

दांतिक
वि० [सं० दान्तिक] दे० 'दांतक' ।

दांपत्य (१)
वि० [सं० दाम्पत्य] स्त्री पुरुष संबंधी । स्त्री० पुरुष का सा ।

दांपत्य (२)
संज्ञा पुं० १. दंपती से संबंध रखनेवाले अग्निहोत्र आदि कर्म । २. स्त्री पुरुष के बीच का प्रेम या व्यवहार ।

दांभ
वि० [सं० दाम्भ] दे० 'दांभिक' ।

दांभिक (१)
वि० [सं० दाम्भिक] १. दंभयुक्त । वंचक । पाखंडी । आडंबर रचनेवाला । धोखेबाज । २. अहंकारी । घमंडी ।

दांभिक (२)
संज्ञा पुं० १. बगला । वक । २. ढोंगी व्यक्ति ।

दांभिकता
संज्ञा स्त्री० [सं० दाम्भिक + ता] ढोंगपन । आडंबरपन । दिखाऊपन ।

दाँ (१)
संज्ञा पुं० [सं० दाच् (प्रत्य०); जैसे, एकदा] दफा । बार । बारी । उ०—जोरि तुरँग रथ एक दाँ रवि न लेत विश्राम । तैसे ही नित पवन कों चलबे हो ते काम ।—लक्ष्मण सिंह (शब्द०) ।

दाँ (२)
वि० संज्ञा पुं० [फा़०] ज्ञाता । जाननेवाला । जैसे, फारसीदाँ । उर्दूदाँ ।

दाँई
वि० स्त्री० [हिं०] दे० 'दाइँ' ।

दाँई (२)
संज्ञा स्त्री० दे० 'दाईँ' ।

दाँक
संज्ञा स्त्री० [सं० दाङ्क्ष(= चिल्लाना), हिं०, बँ० डाकना] दहाड़ । गरज । किसी प्राणी का भीषण स्वर । उ०—लखन बचन की धाँक सोँ परयो समाज सनाँक । जिमि सिंधुर गण बाँक में परै सिंह की दाँक ।—रघुराज (शब्द०)

दाँकना
क्रि० अ० [हिं० दाँक + ना (प्रत्य०)] गरजना । दहाड़ना ।उ०—जैसे ब्याल बेंग का ढूकै परबीरी ताकै हो । जैसे सिंह आपु मुख निरखै परै कूप में दाँकै हो ।—सूर (शब्द०) ।

दाँग
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. छह रत्ती की तौल । २. दिशा । तरफ ओर । ३. छठा भाग ।

दाँग (२)
संज्ञा पुं० [हिं० डंका] नगाड़ा । डंका । उ०—दान दांग बाजै दरबार । कीरति गई समुंदर पारा ।—जायसी (शबद०) ।

दाँग (३)
संज्ञा पुं० [हिं० डूँगर] १. टीला । छोटी पहाड़ी । २. पहाड़ की चोटी ।

दाँगर
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'डाँगर' ।

दाँगी
संज्ञा स्त्री० [सं० दण्डक(= डंडा)] वह लकड़ी जो जुलाहों की कंघी में लगी रहती है ।

दाँज †
संज्ञा स्त्री० [सं० उदाहार्य्य] बराबरी । समता । जोड़ । तुलना । उ०—(क) जाके रस को इंद्र हु तरसत सुधउ न पावत दाँज ।—देवस्वामी (शब्द०) । (ख) न इंदीबरौ देह की दाँज पावै । गोराई लखे पीत कंजौ लजावै ।—रघुराज (शब्द०) ।

दाँजा †
संज्ञा पुं० [हिं० दाँज] दे० 'दाँज' । यौ०—दाँजारेसी = होड़ाहोड़ी । लागडाँट ।

दाँड़ना
क्रि० स० [सं० दण्डन] १. दंड देना । सजा देना । २. जुरमाना करना ।

दाँड़ा †
संज्ञा पुं० [हिं० डाँड] दे० 'डाड़ा' ।

दाँड़ामेड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० दाँड़ा + मेंड़ा] दे० 'डाँड़ामेड़ा' ।

दाँड़ी (१)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'डाँड़ी' ।

दाँड़ी (२)
संज्ञा स्त्री० दे० 'डाँड़ी' ।

दाँत
संज्ञा पुं० [सं० दन्त] १. अंकुर के रूप में निकली हुई हड्डी जो जीवों के मुँह, तालू, गले ओर पेट में होती है और आहार चबाने, तोड़ने तथा आक्रमण करने, जमीन खोदने इत्यादि के काम में आती है । दंत । विशेष—मनुष्य तथा और दूध पिलानेवाले जीवों में दाँत दाढ़ और ऊपरी जबड़े के मांस में लगे रहते हैं, मछलियों और सरीसृपों में दाँत केवल जबड़ों ही में नहीं तालू में भी होते हैं । पक्षियों में दाँत का काम चोंच से निकलता है, उनके दाँत नहीं होते । असली दाँत मसूड़ों के गड्ढों में जमे रहते हैं । सरीसृप आदि में दाँत का जबड़े की हड्डी से अधिक घनिष्ट लगाव होता है । रीढ़वाले जंतुओं में मुँह को छोड़ स्त्रोत (भोजन भीतर ले जानेवाले नल) में ओर कहीं दांत नहीं होते । बिना रीढ़वाले क्षुद्र जंतुओँ में दाँतों की स्थिति और आकृति में परस्पर बहुत विभिन्नता होती है । किसी के मुँह में, किसी की अँतड़ी में अर्थात् स्त्रोत के किसी स्थान में दाँत हो सकते हैं । केकड़ा, झिंगवा आदि के पेट में महीन महीन दाँत या दंदानेदार हड्डियाँ सी होती हैं । जल के बहुत से कीड़ों में जिनका मुँह गोल या चक्राकार होता है, किनारे पर चारों ओर असंख्य महीन दातों का मंडल सा होता है । मनुष्य और बनमानुष में दंतावलि पूर्ण होती हैं, अर्थात् उनमें प्रत्येक प्रकार के दाँत होते हैं । दाँत तीन प्रकार के होते हैं—(१) चौका या राजदंत वर्ग (सामने के दो बड़े दाँत अर्थात् राजदंत और उनके दोनों पार्श्ववर्ती दाँत), (२) कुकुरदंत या शूलदंत, जो लंबे और नुकीले होते हैं और राजदंत के बाद दो दो पड़ते हैं, (३) चौभड़ जिनका सिरा चौड़ा और चौकोर होता है और जिनसे पीसा या चबाया जाता है । २१ या २२ वर्ष की अवस्था में जब आखिरी चौभड़ या अकिलदाढ़ निकलती है तब ३२ दाँत पूरे हो जाते हैं । बहुत से दूध पिलानेवाले जीवों को दो बार दाँत निकलते हैं । पहले बचपन में जो दूध के दाँत निकलते हैं वे झड़ जाते हैं । पीछे स्थायी दाँत निकलते हैं । दूध के दाँतों और स्थायी दाँतों की संख्या और आकृति में भी भेद होता है । मनुष्य के बच्चे में दूध के दाँत बीस होते हैं । साँप आदि विषधर जंतुओं के दाँत के भीतर एक नली होती है जिसके द्वारा थैली से विष बाहर होता है । पर्या०—रद । दशन । द्विज । खरु । यौ०—दाँत का चौका = सामने के चार दाँतों की लड़ी । मुहा०—दाँत उखाड़ना = (१) दांत मसूड़े से अलग करना । (२) मुँहु तोड़ना । कठिन दंड देना । दाँतों उँगली काटना = दे० 'दाँत तले ऊँगली दबाना' । दाँतकाटी रोटी = अत्यंत घनिष्ट मित्रता । गहरी दोस्ती । घना मेल । जैसे,— राम और श्याम की तो दाँतकाटी रोटी है । दाँत काढ़ना = दे० 'दाँत निकालना' । दाँत किटकिटाना, दाँत किचकिचाना = (१) दाँत पीसना । (२) क्रोध से दाँत पीसना । अत्यंत क्रोध प्रकट करता । दाँत किरकिराना = (क्रि० अ०) नीचे कंकड़ी, रेत आदि पड़ने के कारण दोतों का ठोक न चलना । दाँत किरकिरे होना = हार मानना । हार जाना । हैरान हो जाना । दाँत कुरीदने को तिनका न रहना = पास में कुछ न रह जाना । सर्वस्व चला जाना । दाँत खट्टे करना = (१) खूब हैरान करना । (२) किसी प्रकार की प्रतिद्वंद्विता या लड़ाई में परास्त करना । पस्त करना । जैसे,—मरहठों ने मुगलों के दाँत खट्टे कर दिए । उ०—नूतन नूतन यंत्र प्रस्तुत कर विलायती व्यापारियों के दांत खट्टे करने के लिये शतशः प्रयत्न किए जा रहे हैं ।—निबंधमालादर्श (शब्द०) । दाँत खट्टे होना = हार जाना । पस्त होना । हैरान होना । (किसी पर) दाँत गड़ना † = दे० '(किसी पर) दाँत लगना ।' किसी के दाँतों चढ़ना = (१) किसी के आक्षेप आदि का लक्ष्य होना । किसी को खटकना । (२) बुरी नजर का निशाना बनना । टोंक में आना । हूँस में आना (स्ञि०) । जैसे,—बच्चा लोगों के दाँतों चढ़ा रहता है इसी से कल नहीं पाता । (किसी के) दाँतों चढ़ाना = (१) किसी पर आक्षेप करते रहना । बुरी द्दष्टि से देखना । पीछे पड़ा रहना । (२) नजर लगाना (स्त्रि०) । दाँत चबाना = क्रोध से दाँत पीसना । कोप प्रकट करना । उ०—दाँत चबात चले मधुपुर तें धाम हमारे को ।—सूर (शब्द०) । दाँत जमना = दाँत निकलना । दाँत झड़ना = दाँत का टूटकर गिरना । दाँत झाड़ देना = दाँत तोड़ डालना ।कठिन दंड देना । दाँत टूटना = (१) दाँत का गिरना । (२) बुढ़ा़पा आना । दाँत तले उँगली दबाना = (१) अचरज में आना । चकित होना । दंग रहना । (२) खेद प्रकट करना । अफसोस करना । (३) संकेत से किसी बात का निषेध करना । इशारे से मना करना । विशेष—जब कोई कुछ अनुचित कार्य करने चलता है तब इष्ट मित्र या गुरुजन प्रकट रूप से वारण करनेका अवसर न देख दाँतों के नीचे उँगली दबाकर निषेध करते हैं । दाँत तोड़ना = परास्त करना । पस्त करना । हैरान करना । कठिन दंड देना । उ०—अलादीन के दाँत तोड़ि निज धर्म बचायो ।—राधाकृष्णदास (शब्द०) । दाँत दिखाना = (१) हँसना । (२) डराना । घुड़कना । (३) अपना बड़प्पन दिखाना । दाँत देखना = घोड़े बैल आदि की उम्र का अंदाज करने के लिये उनके दांत गिनना । दाँतों धरती पकड़कर = अत्यंत दरिद्रता और कष्ट से । बड़ी किफायत और तकलीफ से । जैसे,—दाँतों धरती पकड़कर किसी प्रकार दो महीने चलाए । दाँत न लगाना = दाँतों से न कुचलना । जैसे,—दाँत न लगाना, दवा यों उतार जाना । दाँत निकलना = बच्चों के दाँत प्रकट होना । दाँत जमना, दाँत निकालना = (१) दाँत उखाड़ना । (२) ओठों को कुछ हटाकर दाँत दिखाना । (३) व्यर्थ हँसना । जैसे,— क्यों दाँत निकालते हो सीधे बैठो । (४) गिड़गिड़ना । दीनता दिखाना । हा हा खाना । जैसे,—वह दाँत निकाल माँगने लगा, तब कैसे न देते ? (५) मुँह बा देना । टें बोल देना । डर या घबराहट से ठक रह जाना । (किसी वस्तु का) दाँत निकालना = फट जाना । दरार से युक्त होना । उधड़ना । जैसे, जूती का दाँत निकालना, दीवार का दाँत निकालना । दाँत निकोसना = दे० 'दाँत निकालना' । दाँत निपोरना † = दे० 'दाँत निकालना' । दाँत पर न रखा जाना = खटाई के कारण दाँतों को सहन न होना । अत्यंत खट्टा लगना । दाँत पर मैल न होना = अत्यंत निर्धन होना । भुक्खड़ होना । जैसे,—उसके तो दाँत पर मैल भी नहीं वह तुम्हें देगा क्या ? दाँतों पर रखना = चखना । मुँह में डालना । दाँतों पसीना आना = कठिन परिश्रम पड़ना । जैसे,—इस काम में दाँतों पसीना आवेगा । (बच्चे का) दाँतों पर होना = उस अवस्था को पहुँचना जिसमें दाँत निकलनेवाले हों । दाँत पीसना = दाँत पर दाँत रखकर हिलाना । दाँत किटकिटाना । दाँत बँधवाना = हिलते हुए दाँतों को तार से कसवाना । दाँत बजना = सरदी से दाढ़ के हिलने या काँपने के कारण दाँत पर दाँत पड़ना । दाँत खट खट होना । दाँत बजाना = दाँत पर दाँत पीसना । दाँत किटकिटाना । दाँत बनवाना = गिरे हुए दाँतों के स्थान में हड्डी या सीप आदि के नकली दाँत लगवाना । दाँत बैठ जाना = मूर्छा, लकवा आदि में पेशियों की स्तब्धता के कारण दाँत की ऊपर नीचेवाली पांक्तियों का परस्पर इस प्रकार मिल जाना कि मुँह जल्दी न खुल सके । नीचे ऊपर के जबड़ों का सट जाना । दाँत मसमसाना या दांत मीसना = दे० 'दाँत पीसना' । (किसी का) दाँतों में जीभ सा होना = बैरियों के बीच रहना । शत्रुओं से प्रतिक्षण घिरा रहना । दाँतों में तिनका- लेना = दया के लिये बहुत विनती करना । दंड आदि के छुटकारे के लिये बहुत गिड़गिड़ाना । बहुत अधीरता और विनय से क्षमा चाहना । हा हा खाना । (किसी वस्तु पर) दाँत रखना = (१) लेने की गहरी चाह रखना । प्राप्ति के प्रयत्न में रहना । (२) दंश रखना । कीना रखना । किसी के प्रति क्रोध या द्वेष का भाव रखना । बैर लेने का विचार रखना । (किसी वस्तु पर) दाँत लगना = (१) दाँत धँसना । दाँत चुभने का घाव होना । (२) लेने की गहरी चाह होना । प्राप्ति की चिंता होना । जैसे,—जबकि उस चीज पर उसका दाँत लगा है तब वह कब तक रह सकती है । विशेष—बिल्ली आदि शिकारी जानवर जिस जंतु को एक बार मुँह से पकड़ लेते हैं फिर उसे जाने नहीं देते । इसी से यह मुहा० बना है । (किसी वस्तु पर) दाँत लगाना = (१) दाँत धँसाना । (२) लेने की गहरी चाह रखना । प्राप्ति के प्रयत्न में रहना । लेने की घात में रहना । दाँत से दाँत बजना = सरदी के कारण दाढ़ के कँपने से दाँत पर दाँत पड़ना । दाँतों से उठाना = बड़ी कंजूसी से उठाकर रखना । कृपणंता से संचित करना । जैसे,—एक दाना गिरे तो यह दाँतों से उठावे । किसी पर दाँत होना = (१) गहरी चाह होना । लेने या पाने की अत्यंत अधिक इच्छा होना । प्राप्ति की इच्छा होना । जैसे,—जिस वस्तु पर तुम्हारा दाँत है वह कब तक रह सकती है । (२) किसी के प्रति दंश होना । किसी के प्रति क्रोध या द्वेष का भाव होना । किसी से बैर लेने का संकल्प होना । जैसे,—जब कि उसपर तुम्हारा दाँत है तब वह कितने दिनों तक बच सकता है ? (किसी के) तालू में दाँत जमना = बुरे दिन आना । शामत आना । जैसे,—किसके तालू में दाँत जमे हैं जो ऐसी बात मुँह से निकाल सके? २. दाँत के आकार की निकली हुई वस्तु । अंकुर की तरह निकली हुई नुकीली वस्तु जो बहुतों के साथ एक पंक्ति में हो । दंदाना । दाँता । जैसे,—आरी के दाँत, कंधी के दाँत ।

दाँतघुँघुनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दाँत + घुँघुनी] पोस्ते के दाने की घुघनी जो बच्चे का पहला दांत निकलने पर बाटी जाती है ।

दाँतना †
क्रि० अ० [हिं० दाँत] १. दाँतवाला होना । जवान होना (पशुओं के लिये बोलते हैं) । २. किसी हथियार की धार का इस प्रकार कुंठित होना कि वह कहीं उभर आवे और कहीं दब जाय । मुड़कर जगह जगह गुठला हो जाना । जैसे, कुल्हाड़ी का दाँतना ।

दाँतली
संज्ञा स्त्री० [हिं० डाट] डाट । काग ।

दाँता
संज्ञा पुं० [हिं० दाँत] दाँत के आकार का कँगूरा । रवा । अंकुर की तरह निकली हूई नुकीली वस्तु जो बहुतों के साथ एक पंक्ति में हो । दंदाना ।मुहा०—दाँता पड़ना = किसी हथियार की धार में गुठले होने के कारण उभार और गड्ढे हो जाना ।

दाँताकिटकिट
संज्ञा स्त्री० [हिं० दाँत + किटकिट (अनु०)] १. कहा- सुनी । झगड़ा । वागयुद्ध । २. गाली गलौज । क्रि० प्र०—करना ।—मचना ।—होना ।

दाँताकिलकिल
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'दाँताकिटकिट' ।

दाँतिन †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दातन] दे० 'दातून' । उ०—पाछे दोऊ जन दाँतिन करि स्नान करि मंदिर मो कृष्ण भट जाइ भोग सरायो ।—दो सौ बावन०, भा० १. पृ० ४५ ।

दाँतिया
संज्ञा पुं० [?] रेह का नमक । रेह वा सोडा जिसे पीने के तंबाकू में उसे तेज करने के लिये डालते हैं ।

दाँती (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० दात्री] १. हँसिया जिससे घास या फसल काटते हैं । २. वह बड़ा खूँटा जो नाव के घाट पर गड़ा रहता है और जिससे नाव का रस्सा बाँध दिया जाता हैं । डंडा । ३. भिड़ (बरैं) की जाति का एक कीड़ा जो बहुत काला होता है । काली भिड़ ।

दौती (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० दाँत] १. दाँतों की पंक्ति । दंतावलि । बत्तीसी । मुहा०—दाँती बैठना या लगना = जबड़ों का परस्पर सट जाना । ऊपर नीचे के दाँतों का इस प्रकार मिल जाना कि मुँह जल्दी न खुल सके । कच्वा बैठना । २. दो पहाड़ों के बीच की सँकरी जगह । दर्रा ।

दाँती (३)
संज्ञा पुं० [सं० दन्ती] बनैला सुअर । उ०—यही, कभी ससा, साही, हिरन, लूगड़, दाँती गिरा लिया ।—भस्मावृत०, पृ० २५ ।

दाँना (१)
क्रि० स० [सं० दमन] पक्की फसल के डंठलों को बैलों से इसलिये रौंदवाना जिसमें डंठल से दाना अलग हो जाय । दँवरी करना । उ०—इसलिये यदि यंत्र द्वारा अन्न दाँया जाय तो दो ही तीन दिन में सब दाना भी अलग हो जाय ।—खेती की पहली पुस्तक (शब्द०) ।

दाँना † (२)
संज्ञा पुं० [सं० दानव] दानव । दैत्य ।

दाँम पु
संज्ञा पुं० [सं० दाम] माला । उ०—मेचक बरन बर जीवन निवासधर, बकुलनि की लसत सुंदर परम दाँम ।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ४८८ ।

दाँमणी †
संज्ञा स्त्री० [सं० दामिनी] दे० 'दामिनी' । उ०—फौज घटा, खग दाँमणी, बूँद लगऐ सर जेम ।—ढोला०, दू० २५५ ।

दाँयँ
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'दँवरी' ।

दाँयाँ
वि० [हिं० दहिना] दे० 'दायाँ' ।

दाँवँ
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'दावँ' । मुहा०—दाँवँ रोपना = अपने काम या शर्त की याद दिलाना । उ०—दूसरी महरी—अबासी छेड़ती हैं और अपने दँवँ रोपती हैं ।—फिसाना०, भा० ३, पृ० १०८ ।

दाँवनी
संज्ञा स्त्री० [सं० दामिनी] १. दामिनी नाम का गहना । पु २. दे० 'दामिनी' ।

दाँवरी
संज्ञा स्त्री० [सं० दाम] रस्सी । रज्जु । दामरी । डोरी । उ०—दाँवरि लै बाँधन लगी जसुदा ह्नै बेपीर ।—व्यास (शब्द०) ।

दा (१)
संज्ञा पुं० [अनु०] सितार का एक बोल । जैसे,—दा दिर दा ड़ा इत्यादि ।

दा (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. रक्षा । बचाव । २. शोधन । ३. दान । ४. छेद । छेदन । ५. उपताप । ताप [को०] ।

दा (३)
वि० स्त्री० [सं०] देनेवाली । दातृ । (समासांत में प्रयुक्त) ।

दा † (४)
प्रत्य० [पंजाबी] संबंधवाचक प्रत्यय । का ।

दाइ पु
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'दाय' और 'दाँव' । उ०—तू जिन करि री गहर नवल तिय, आन बन्यो भलि दाइ ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३८९ ।

दाइज †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'दाइज' । उ०—दाइज पाइ अनेक विधि, सुत सुतबघुन समेत ।—तुलसी ग्रं,० पृ० ८५ ।

दाइजा †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'दाइजा' । उ०—पाछें वह सबह दाइजा कौ सामान जो हरिदास अपने घर तें ल्याए होते ।—दो सौ बावन०, भा० १, पृ० २७५ ।

दाइम
क्रि० वि० [अ० दायम] सदा । हमेशा । सर्वदा । उ०— हरदम हाजिर होणा बाबा, जब लग जीवै बंदा । दाइम दिल साँई सौं साबित पंच बखत क्या धंधा ।—दादू०, पृ० २५८ ।

दाइल पु
वि० [हिं० दावँ] दावँवाली । उ०—हावनि बहु भावनि करति, मनसिज मन उपजाइ । दाइल वह घाइल करत पाइल पाइ बजाइ ।—स० सप्तक० पृ० ३९५ ।

दाई (१)
वि० स्त्री० [हिं० दायाँ] दाहिनी । जैसे, दाई आँख ।

दाई (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० दाच्(प्रत्य०), हिं० दाँ (प्रत्य०)] बारी । दफा । बार । उ०—तब नहिं जानेहुँ पीर पराई । अब कस रोवहु अपनी दाई ।—विश्राम (शब्द०) ।

दाई (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० धात्री, फा़० दायह्] १. दूसरे के बच्चे को अपना दूध पिलानेवाली स्त्री । धाय । यौ०—दाई पिलाई । २. वह दासी जो बच्चे की देखरेख रखने या उसे खेलाने के लिये रखी जाय । यौ०—दाई खेलाई । ३. वह स्त्री जो स्त्रियों को बच्चा जनने में सहायता देती हो । प्रसूता के उपचार के लिये नियुक्त स्त्री । यौ०—दाई जनाई । मुहा०—दाई से पेट छिपाना = जाननेवालों से कोई बात छिपाना । ऐसे मनुष्य से कोई बात गुप्त रखना जो सब रहस्य जानता हो ।

दाई (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० दादी] १. पिता की माता । दादी । २. बड़ी बूढ़ी स्त्री ।

दाई पु (३)
वि० [सं० दायिन्] दे० 'दानी' ।

दाउँ †
संज्ञा पुं० [हिं० दाँव] दे० 'दाँव' । उ०—सूझ जुआरिहि आपन दाऊँ ।—तुलसी (शब्द०) ।

दाउँ (२)
संज्ञा पुं० [सं० दा>दाच् (प्रत्य०), हि० दावँ] दावँ । दफा ।बार । उ०—ऐस जो ठाकुर किय एक दाऊँ । पहिले रचा मुहम्मद नाऊँ ।—जायसी (शब्द०) ।

दाऊ
संज्ञा पुं० [सं० देव या तात (= पिता, पिता का भाई) हिं० ताऊ, दाऊ] १. बड़ा भाई । २. बलदेव । बलराम । कृष्ण के बड़े भाई । उ०—मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ । सूर०, १० ।२१५ । ३. पिता का बड़ा भाई ।

दाउद
संज्ञा पुं० [अ०] पारसी, ईसाई और मुसलमानों के एक पैगंबर का नाम ।

दाऊदखानी
संज्ञा पुं० [फा़० दाऊदखानी] १. एक प्रकार का चावल । उ०—रायभोग औ काजर रानी । झिन बरूद औ दाऊदखानी ।—जायसी (शब्द०) । २. उत्तम प्रकार का सफेद गेहूँ । दाऊदी गोहूँ । गंगाजली गेहूँ ।

दाऊदिया
संज्ञा पुं० [अ० दाऊद] १. एक प्रकार का गेहूँ । दे०'दाऊदी' । २. गुलदावदी का फूल । ३. एक प्रकार की आतिशबाजी जो छूटने पर दाऊदी फूल की तरह दिखाई पड़ती है । एक प्रकार का कवच ।

दाऊदी (१)
संज्ञा पुं० [अ० दाऊद] एक प्रकार का गेहूँ जिसका छिलका बहुत सफेद और नरम होता है । विशेष—कहते हैं, दिल्ली के बादशाह शाह आलम के एक दरबारी, जिनका नाम दाऊद खाँ था, इस गेहूँ को मिस्त्र देश से लाए थे । यह सबसे अच्छा गेहूँ समझा जाता है ।

दाउदीं (२)
संज्ञा स्त्री [फा़० गुलदाऊदी] दे० 'गुलदाउदी' । उ०—बाहर है चाँदी की विस्तृत, झीनी चादर ! जिसके आर पार दीखते हैं—बैजंती, दाऊदी, गेंदा औ इमली के पेड़ तनावर ।— चाँदनी०, पृ० २५ ।

दाक
संज्ञा पुं० [सं०] १. दान करनेवाला व्याक्ति । दाता । २. यजमान [को०] ।

दाक्खाँ
संज्ञा स्त्री० [सं० द्राक्षा] अंगूरी शराब । उ०—कैसा पान करोगे ? दाक्खाँ, लाजा, गौड़ माध्वीक, मैरेय ?—वैशाली०, पृ० ८

दाक्ष (१)
संज्ञा पुं० [सं०] दक्षिण । दक्षिण दिशा [को०] ।

दाक्ष (२)
वि० दक्ष संबंधी [को०] ।

दाक्षायण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सोना । स्वर्ण । २. आभूषण आदि सुनहरी चीजें । ३. स्वर्णमुद्रा । मोहर । अशरफी । ४. दक्ष द्वारा किया हुआ एक यज्ञ जिसकी कथा शतपथ ब्राह्मण में है ।

दाक्षायण (२)
वि० १. दक्ष से उत्पन्न । २. दक्ष के गोत्र का । ३. दक्ष का । दक्ष संबंधी । जैसे, दाक्षायण यज्ञ ।

दाक्षायणी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १.दक्ष की कन्या । २. अश्विनी आदि नक्षत्र । ३. रोहिणी नक्षत्र । ४. दंती वृक्ष । ५. दुर्गा । ६. कश्यप की स्त्री—अदिति । ७. रेवती नक्षत्र (को०) । ७. दिति का एक नाम जो कश्यप की स्त्री और दैत्यों की माता थी (को०) ।

दाक्षायणी (२)
वि० [सं० दाक्षायणिन्] १. सोने का । सुवर्णयुक्त । २. स्वर्णकुड़लधारी व्याक्ति ।

दाक्षायणीपति
संज्ञा पुं० [सं०] १. चंद्रमा । २. शिव (को०) ।

दाक्षायण्य
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य । रवि [को०] ।

दाक्षाय्य
संज्ञा पुं० [सं०] गिद्ध चिड़िया । गुध्र [को०] ।

दाक्षि
संज्ञा पुं [सं०] दक्ष का पुत्र [को०] ।

दाक्षिकंथा
संज्ञा स्त्री० [सं० दाक्षिकन्था] वाहलीक देश ।

दाक्षिण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक होम का नाम (शतपथ ब्राह्मण) । २. उक्त होम मे प्राप्त दक्षिण (को०) ।

दाक्षिण (२)
वि० १. दक्षिण संबंधी । २. दक्षिणा संबंधी ।

दाक्षिणक
संज्ञा पुं० [सं०] १. दे० 'दाक्षिणिक' । २. वह व्यक्ति जो इष्टापू्र्त आदि यज्ञों द्वारा चंद्रलोक प्राप्त करे [को०] ।

दाक्षिणात्य (१)
वि० [सं०] दक्खिनी । दक्षिण देश का । जैसे, दाक्षिणात्य ब्राह्मण ।

दाक्षिणात्य (२)
स्त्री पुं० १. दक्षिण देश । भारतवर्ष का वह भाग जो विंध्याचल के दक्षिण पड़ता है । दक्षिण खंड । विशेष—इस खंड के अंतर्गत महाराष्ट्र, मलाबार, कोंकण, तैलंग, कर्नाटक इत्यादि प्रदेश हैं । नर्मदा, ताप्ती, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी दक्षिण की प्रधान नदियाँ हैं । दे० 'तामिल', 'तैलंग' और महाराष्ट्र । २. दक्षिण देश का निवासी । ३. नारियल ।

दाक्षिणिक
संज्ञा पुं० [सं०] वह बंधन जो दक्षिणाप्रधान इष्टापूर्त आदि कर्मो को कामनावश करने से होता है (याज्ञवल्कय) ।

दाक्षिण्य (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. अनुकूलता । किसी के हित की ओर प्रवृत्त होने का भाव । प्रसन्नता । २. उदारता । सरलता । सुशीलता । ३. दूसरे के चित्त को फेरने या प्रसन्न करने का भाव । ४. साहित्य में नाटक का एक अंग, जिसमें वाक्य या चेष्टा द्वारा दूसरे के उदासीन या अप्रसन्न चित को फेरकर प्रसन्न करने का भाव दिखाया जाता है ।

दाक्षिण्य (२)
वि० १. दक्षिण का । दक्षिण संबंधी । २. दक्षिणा संबंधी ।

दाक्षी
संज्ञा स्त्री० [सं०] २. दक्ष की कन्या । २. पाणिनि की माता का नाम । यौ०—दाक्षीपुत्र = पाणिनि ।

दाक्षेय
संज्ञा पुं० [सं०] दाक्षीपुत्र पाणिनि [को०] ।

दाक्ष्य
संज्ञा पुं० [सं०] दक्षता । निपुणता । पटुता । कार्य- कुशलता ।

दाख (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० द्राक्षा] १. अंगूर । २. मुनक्का । ३. किशमिश ।

दाख (२)
वि० [सं० दक्ष] दे० 'दक्ष' । उ०—ताकों बिहित बखानहीं, जिनकी कविता दाख ।—मतिराम (शब्द०) ।

दाखनिरबिसी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दाख + निर्विषी?] हर जेवड़ी नाम की झाड़ी जिसकी पत्तियों और जड़ का औषध रूप में व्यवहार होता है । पुरही ।

दाखना † (१)
क्रि० स० [सं० द्रक्षण, दृक्षण] प्रकट करना । दिखाना । उ०—रिण जोधौ रिणछोड़, पड़े खग दाखपराक्रम । पीथल पीठलदास, धार चंद्रभांण सांम ध्रम ।—रा० रू० पृ० २७ ।

दाखना † (२)
क्रि० स० [प्रा० दक्ख(= बतलाना)] बतलाना । बताना कहना । उ०—(क) ढाढी जे साहिब मिलइ, यूँ दाखविया जाइ । आख्याँ सीप विकासियां, स्वात ज बरसउ आइ ।—ढोला०, दू० ११६ । (ख) बहुत दिलासा दाखतै, दाह दिया सिरपाव । सिरपर हुकुम चढ़ाय लौ, कीधौ प्रथम कहाव । रा० रू०, पृ० २७ ।

दाखिल
वि० [फा़० दाखिल] १. प्रविष्ट । घुसा हुआ । पैठा हुआ । उ०—बीच बगाचा के महल दाखिल भयो प्रशंस ।—गुमान (शब्द०) । क्रि० प्र०—करना ।—होना । मुहा०—दाखिल करना = देना । अदा करना । भर देना । जमा करना । जैसे,—उसने तुरंत जुरमाना दाखिल कर दिया । दाखिल होना = अदा कर देना । उपस्थित करना । लाकर जमा करना । २. शरीक । मिला हुआ । जैसे, किसी गरोह में दाखिल होना । ३. पहुँचा हुआ । यौ०—दाखिल खारिज । दाखिल दफ्तर ।

दाखिलखारिज
संज्ञा पुं० [फा़० दाखिलखारिज] किसी सरकारी कागज पर से किसी जायदाद के हकदार का नाम काटकर उसपर उसके वारिस या किसी दूसरे हकदार का नाम लिखने का काम । क्रि० प्र०—करना । होना ।

दाखिलदफ्तर
वि० [फा़० दाखिल दफ्तर] दफ्तर में इस प्रकार डाल रखा हुआ (कागज) जिसपर कुछ विचार न किया जाय । क्रि० प्र०—करना—होना ।

दाखिला
संज्ञा पुं० [फा़० दाखिला] १. प्रवेश । पैठ । २. किसी संस्था, कार्यालय आदि में संमिलित किए जाने का कार्य । ३. वह कागज जिसमें उस वस्तु का ब्योरा लिखा हो जो कहीं दाखिल या जमा की जाय । ४. वह कागज जिसपर किसी वस्तु के जमा होने, भेजे जाने या पाए जाने की मिति आदि टँकी हो ।

दाखिली
वि० [अ० दाखिली] १. भीतरी । आंतरिक । अंदरूनी । २. हार्दिक । दिली [को०] ।

दाखी
संज्ञा स्त्री० [दाक्षी, प्रा० दाखी] दे० 'दाक्षी' ।

दाग (१)
संज्ञा पुं० [सं० दग्ध] १. जलाने का काम । दाह । २. मुतक का दाहकर्म । मुर्दा जलाने की क्रिया । मुहा०—दाग देना = मृतक का दाहकर्म करना । मुरदे का क्रिया कर्म करना । ३. जलन । डाह । उ०—उर मानिक की उरबसी डटत घटत द्दग दाग । झलकत बाहर कढ़ि मनौ पिय हिय को अनुराग ।— बिहारी (शब्द०) । ४. जलने का चिह्व ।

दाग (२)
संज्ञा पुं० [फा़० दाग] [वि० दागी] १. किसी वस्तु के तल पर रंग का वह भेद जो थोड़े से स्थान पर अलग दिखाई पड़ता है । धब्बा । चित्ती । जैसे,—(क) उस बिल्ली की पीठ पर कई रंग के दाग हैं । (ख) कपड़े पर का यह दाग धोबी से छूटेगा । उ०—तुलसी जो मृग मन मरै परै प्रेम पट दाग ।—तुलसी (शब्द०) । क्रि० प्र०—पड़ना ।—लगना । विशेष—इस शब्द का अधिकतर प्रयोग ऐसे धब्बे के लिये होता है जो खटकता या बुरा लगता हो । मुहा०—सफेद दाग = एक प्रकार का कोढ़ जिससे शरीर पर सफेद धब्बे पड़ जाते हैं । फूल । २. निशान । चिह्न । अंक । उ०—मृगनैनी सैनन भजै लखि बेनी के दाग ।—बिहारी (शब्द०) । क्रि० प्र०—पड़ना ।—लगना । यौ०—दागबेल । ३. फल आदि पर पड़ा हुआ सड़ने का चिह्न । ४. कलंक । ऐब । दोष । लांछन । उ०—पुत्र वही मरि जाय जो कुल में दाग लगावै ।—गिरिधर (शब्द०) । क्रि० प्र०—लगना ।—लगाना । ५. जलने का चिह्न ।

दागण †
संज्ञा पुं० [हिं० दागना] दाहकर्म । उ०—पड़ी देह सनेह पेटा, बाप दागण काज बेटा ।—रघु० रू०, पृ० ११६ ।

दागदार
वि० [फा़० दागदार] जिसपर दाग लगा हो । २. धब्बेदार ।

दागना (१)
क्रि० स० [सं० दग्ध, हिं० दाग + ना (प्रत्य०)] १. जलाना । दग्ध करना । उ०—(क) लोग वियोग विषम विष दागे ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) करि कंद को मंद दुचंद भई फिर दाखन के उर दागति हैं ।—पद्माकर (शब्द०) । २. तपे लोहे को छुलाकर किसी के अंग को ऐसा जलाना कि चिह्न पड़ जाय । जैसे, साँड़ दागना, घोड़ा दागना । संयो० क्रि०—देना । ३. किसी धातु के तपे हुए साँचे के छुलाकर अंग पर उसका चिह्व डालना । तप्तमुद्रा से अंकित करना । जैसे, शंख चक्र दागना । ४. किसी फोड़े आदि पर ऐसी तेज दवा लगाना जिससे वह जल या सूख जाय । जैसे, कास्टिक या तेजाब से फुंसी दागना । संयो० क्रि०—देना । ५. भरी हुई बंदूक में बत्ती देना । रंजक में आग लगाना । तोप, बंदूक आदि छोड़ना । जैसे, तोप दागना, बंदूक दागना ।

दागना (२)
क्रि० स० [फा़० दारा] रंग आदि से चिह्न डालना । दाग लगाना । अंकित करना । उ०—कबहुंक बैठि अंश भुज धरि कै पीक कपोलनि दागे ।—सूर (शब्द०) ।

दागबेल
संज्ञा स्त्री० [फा़० दारा + हिं० बेलि] भूमि पर फावड़े या कुदाल से बनाए हुए चिह्व जो सड़क बनाने, नींव खोदने आदि के लिये एक सीध में डाले जाते हैं । उ०—सबके सबबराबर एक कतार में लैनडोरी डालकर और दागबेल लगाकर बनाए गए हैं ।—शिवप्रसाद (शब्द०) ।

दागी
वि० [फा़० दाग] १. जिसपर दाग लगा हो । जिसपर धब्बा हो । २. जिसपर सड़ने का चिह्न हो । जैसे, दागी फल । ३. कलंकित । दोषयुक्त । लाँछित । ४. दंडित । जिसको सजा मिल चुकी हो ।

दाघ
संज्ञा पुं० [सं०] गरमी । ताप । दाह । जलन । उ०—(क) कहलाने एकत रहत अहि मयूर मृग बाघ । जगत तपोबन सो कियो दीरघ दाघ निदाघ ।—बिहारी (शब्द०) । (ख) बादि ही चंदन चारु धिसै घनसार घनों धसि पंक बनावत । बादि उसीर समीर चहै दिन रैनि पुरैनि के पात बिछावत । आपुहिं ताप मिटी द्विजदेव सुदाघ निदाघ कि कौन कहावत । बावरि तू नहिं जानति आज मयंक लजावत मोहन आवत ।— द्विजदेव (शब्द०) ।

दाज †
संज्ञा पुं० [?] १. अँधेरी रात । १. अँधेरा ।

दाजन पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० दग्धन, हिं० दाझन] दे० 'दाझन' ।

दाजना पु (१)
क्रि० अ० [सं० दग्ध या दाहन] १. जलना । २. ईर्षा करना । डाह करना । उ०—दाजन दे दुर जीवन को अरु लाजन दे सजनौ कुल वारे । साजन दे मन को नव नेम निवाजन दे मनमोहन प्यारे । गाजन दे ननदीन 'गुलाब' विराजन दे उर में गुन भारे । भाजन दे गुरु लोगन को डर बाजन दे अब नेह नगारे ।—गुलाब (शब्द०) ।

दाजना (२)
क्रि० स० जलाना । दग्ध करना ।

दाझण †
संज्ञा स्त्री० [सं० दहन] 'दाझन' ।

दाझन पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दहन] जलन । उ०—पूरे सतगुरु के बिना पूरा शिष्य न होय । गुरु लोभी शिष लालची दूनी दाझन सोय ।—कबीर (शब्ज०) ।

दाझना पु
क्रि० अ० [सं० दाहन] जलना । संतप्त होना । उ०— कै बिरहिनि कौं मीचु देद कै आपा दिखलाय । आठ पहर का दाझना मोपै सहा न जाय ।—कबीर (शब्द०) ।

दाझना (२)
क्रि० स० जलाना ।

दाट †
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'डाँट' ।

दाटना (१)
क्रि० स० [हिं० डाँटना] दे० 'डाँटना' ।

दाटना (२)
क्रि० अ० [देश०] प्रतीत होना । उ०—कै रसराज प्रवाह को मारग बेनी बिहार सों यौ द्दग दाटी ।—घनानंद, पृ० ३३ ।

दाडक
संज्ञा पुं० [सं०] १. दाढ़ । डाढ़ । २. दाँत ।

दाडव
संज्ञा पुं० [?] भविष्य ब्रह्मखंड के अनुसार काशी से दो योजन पश्चिम एक ग्राम जिसमें कल्कि भगवान् अधर्मी म्लेच्छों का नाश करके शांतिपूर्वक निवास करेंगे ।

दाड़स
संज्ञा पुं० [हिं० दाढ़] एक प्रकार का साँप ।

दाडिंब
संज्ञा पुं० [सं० दाडिम्ब] दे० 'दाडिम' ।

दाड़िम
संज्ञा पुं० [सं० दाडिम] १. अनार । यौ०—दाड़िम प्रिय = सुआ । तोता । २. इलायची ।

दाडिमपत्रक
संज्ञा पुं० [सं० दाडिमपत्रक] दे० 'दाडिमपुष्पक '[को०] ।

दाडिमपुष्पक
संज्ञा पुं० [सं० दाडिमपुष्पक] रोहितक नामक वृक्ष । रोहेड़ा ।

दाडिमप्रिय
संज्ञा पुं० [सं० दाडिमप्रिय] शुक । सुआ । तोता ।

दाड़िमा
संज्ञा स्त्री० [सं० दाडिमा] अनार । दाडिम ।

दाडिमाष्टक
संज्ञा स्त्री० [सं० दाडिमाष्टक] वैद्यक में एक चूर्ण जिसमें अनार का छिलका पड़ता है ।

दाडिमीसार
संज्ञा पुं० [सं०] दाडिम । अनार [को०] ।

दाड़ी
संज्ञा स्त्री० [सं० दाडिम] दे० 'दाड़िम' ।

दाड्यौ पु †
संज्ञा पुं० [सं० दाडिम] दे० 'दाडिम' । उ०—सुंदर बरिषा अति भई सूकि गई सब साप । नीव फल्यौ बहु भाँति करि लागै दाडयौ दाष ।—सुंदर० ग्रं०, भा० २, पृ० ७६० ।

दाढ़ (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० दंष्ट्र, प्रा० दड्ढ, या दंष्ट्रा, प्रा० दड्डा । मि० सं० दाडक, दाढा] १. जबडे़ के भीतर के मोटे चौड़े दाँत । चौभर । मुहा०—दाढ़ न लगाना = दाँत से न कुचलना । दाढ़ गरम होना = खाना खाने में आना । २. शूकर का दाँत जो आगे निकला रहता है ओर जिससे वह प्रहार करता है । † ३. दाढ़ी । श्मश्रु । (क्व०) ।

दाढ़ (२)
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. भीषण शब्द । गरज । दहाड़ । जैसे, सिंह की दाढ़ । २. चिल्लाहट । मुहा०—दाढ़ मारकर रोना = खूब चिल्ला चिल्लाकर रोना । उ०—रस्सी कटते ही मुर्दा नीचे गिर पड़ा और गिरते ही दाढ़ें मार मार रोने लगा ।—(शब्द०) ।

दाढ़ना पु (१)
क्रि० अ० [सं० दाहन] १. जलना । भस्म होना । २. गरजना । चिल्लाना ।

दाढ़ना पु (२)
क्रि० स० [सं० दाहन] १. जलाना । आग में भस्म करना । उ०—दाढ़ा राहु केतु गा दाधा । सूरज जरा चाँद जर आधा ।—जायसी (शब्द०) । (ख) देखे लोग बिरह दव दाढ़े ।—तुलसी । (शब्द०) । (ग) वेई मलीक निचोल सजे सब देव वहै विरहानल दाढ़ी ।—बेनीप्रवीन (शब्द०) । २. संतप्त करना । दुःखी करना ।

दाढ़ा † (१)
संज्ञा पुं० [सं० दाढा] १. लंबा दाँत या चौभर । दे० 'दाढ़' । २. समूह । झुंड (को०) । ३. आकांक्षा । इच्छा (को०) ।

दाढ़ा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० दाढ़] १. बन की आग । दावानल । क्रि० प्र०—लगना । २. आग । अग्नि । क्रि० प्र०—लगाना । ३. दाह । जलन । मुहा०—दाढ़ा फूँकना = दाह उत्पन्न करना ।

दाढ़ा (३)
वि० दग्ध । जलाया हुआ । पीड़ित ।

दाढ़ा (४)
संज्ञा स्त्री० [हिं० दाढ़ी, तुल० सं० दाढ़ा (= चौभर)] श्मश्रु । दाढ़ी मूँछ ।

दाढाल †
वि० [हिं० दाढ़ + वाला] १. शूरवीर । बहादुर । सुभट ।२. दढ़ियल । उ०—वेढ नत्रीढा वज्जिया दोय पोहर दाढाल ।—रा० रू०, पृ० २७४ ।

दाढ़ाली †
वि० [हिं०] दाढ़ी रखनेवाला । दढ़ियल । दाढ़ीदार । उ०—पाछौ जिकौ आँणियौ पूँगल, देवी थै दाढ़ाली ।— बाँकी० ग्रं०, भा० ३. पृ० १३८ ।

दाढ़िका पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दाढिका] १. दाढ़ी । श्मश्रु । २. दाँत । दंत (को०) ।

दाढ़िजार
संज्ञा पुं० [हिं० दाढ़ीजार] दे० 'दाढ़ीजार' । उ०— अनेक बार में कहीं बुझायहूँ विभीषणं । न मानि दाढ़िजार को कुठार वंश तीक्षर्ण ।—विश्राम (शब्द०) ।

दाढ़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दाढ़] १.चिबुक । २. ठुड्डी और दाढ़ पर के बाल । श्मश्रु । विशेष—दे० 'ढाढ़ी' ।

दाढ़ीजार
संज्ञा पुं० [हिं० दाढ़ी + जलना] वह जिसकी दाढ़ी जली हो । एक गाली, जिसे स्त्रियाँ कुपित होने पर पुरुषों को देती हैं । उ०—खीझति मदोवै सविषाद मेघनाथ देखि बयो लूनियत सब याही दाढ़ो जार को ।—तुलसी (शब्द०) । विशेष—कुछ लोग इस शब्द की व्युप्तत्ति संस्कृत दारी (= दासी, लौंडी) + जार(= उपपति), मानते हैं पर यह ठीक नहीं जान पड़ता ।

दाण †
संज्ञा पुं० [सं० दान] राहदारी । आयातकर । जकात । उ०—जिसमें आबू पर जानेवाले यात्रियों आदि से जो 'दाण' (राहदारी, जगात), मुंडिक (प्रति यात्री से लिया जानेवाला कर), वलावी, (मार्गरक्षा का कर) तथा घोड़े बैल आदि से जो कर लिए जाते थे, उनको माफ करने का उल्लेख है ।—राज० इति०, पृ० ६३० ।

दात पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० दातव्य या सं० दात्र (= दान)] दान । उ०— तुम सब ही के गुरु मानी अति पुर पुर भूतल के सुर तुम्हैं दीजियत दात है ।—हनुमान (शब्द०) ।

दात (२)
संज्ञा पुं० [सं० दाता] दे० 'दाता' । उ०—सतगुरु समानै को सगा सोंध समानै दात ।—कबीर (शब्द०) ।

दात (३)
वि० [सं०] १. विभक्त । कटा हुआ । छिन्न । २. धुला हुआ । स्वच्छ किया हुआ । मार्जित । शुद्ध [को०] ।

दातव †पु
संज्ञा पुं० [सं० दातव्य] दान । उ०—पात सुजस अखियात पयंपै, दातव असमर बात दुवै ।—रघु० रू०, पृ० १९ ।

दातव्य
वि० [सं०] १. देने योग्य । २. लौटाने या वापस करने योग्य (को०) । ३. दान से चलनेवाला (को०) जैसे,—दातव्य औषधालय । ४. जहाँ दान के रूप में या बिना मूल्य या शुल्क के कुछ दिया जाता हो (को०) ।

दातव्य (२)
संज्ञा पुं० १. देने का काम । दान । २. दानशीलता । उदा- रता । उ०—बिन दातव्य द्रव्य नहिं आवै । देश विदेश चहौ फिर आवै । विश्राम (शब्द०) ।

दाता
संज्ञा पुं० [सं० दातृ] १. वह जो दान दे । दानशील । २. देनेवाला । ३. वह जो कज दे । उत्तमर्ण (को०) । ४. उपदेश । शिक्षा (को०) । ५. अभिभावक (को०) । ६. काटनेवाला । वह जो कोई वस्तु काटे (को०) । ७. वह जो कन्या या भगिनी का विवाह में दान करता हो (को०) ।

दातापन
संज्ञा पुं० [सं० दाता + हिं० पन] दानशीलता ।

दातार
संज्ञा पुं० [सं० दातृ का बहु० दातारः] दाता । देनेवाला । उ०—राजन राउर नाम जसु सब अभिमत दातार । फल अनुगामी महिपमनि मन अभिलाष तुम्हार ।—तुलसी (शब्द०) ।

दाति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वितरण । २. दान करने की क्रिया या भाव । ३. छिन्नकरण । विनाश [को०] ।

दाती पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दात्री] देनेवाली । उ०—पतित केश कफ कंठ बिरोघ्यो कल न परै दिन राती । माया मोह न छाड़ै तृष्णा ए दोऊ दुख दाती ।—सूर (शब्द०) ।

दातुन
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्तधावन] दे० 'दतुवन' ।

दातुरी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दातृत्व] दानशीलता । दातृत्व । दान की वृत्ति । उ०—दानी बड़े पै न माँगे बिन ढरै दातुरी ।—घना- नंद०, पृ० १५३ ।

दातून (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्ती] १. दंती की जड़ । २. जमालगोटे की जड़ ।

दातून (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्तधावन] दे० 'दतुवन' ।

दातृता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दानशीलता । देने की प्रवृत्ति ।

दातृत्व
संज्ञा पुं० [सं०] दानशीलता । देने की प्रवृत्त ।

दातोन
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्तधावन] दे० 'दातुन' । उ०—जंगल गया और दातोन के लिये नीम का एक गोजाह लेकर लौटा ।— काले०, पृ० १० ।

दातौन
संज्ञा स्त्री० [सं० दन्तधावन] दे० 'दतुवन' ।

दात्यूह
संज्ञा पुं० [सं०] १. पपीहा । चातक । २. मेघ । बादल । ३. जल के समीप रहनेवाला एक पक्षी । डाहुक (को०) ।

दात्र
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० अल्पा० दात्री] दाँती । हँसिया ।

दात्री (१)
वि० संज्ञा स्त्री० [सं०] देनेवाली ।

दात्री (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] हँसिया । दाँती ।

दात्व
संज्ञा पुं० [सं०] १. दान करनेवाला । व्यक्ति । २. यज्ञ की तैयारी । यज्ञ [को०] ।

दाद
संज्ञा पुं० [सं०] दान [को०] । यौ०—दादद = दाता । दान देनेवाला ।

दाद (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० दद्रू] एक चर्मरोग जिसमें शरीर पर उभरे हुए ऐसे चकत्ते पड़ जाते हैं जिनमें बहुत खुजली होती है । दिनाई । विशेष—दाद विशेषतऋः कमर के नीचे जंघे के जोड़ के आस पास होती है जहाँ पसीना होकर मरता है । वैद्यक में यह १८ प्रकार के कोढ़ों में गिनी जाती है । डाक्टरों की परीक्षा से पता लगा है कि दाद एक प्रकार की सूक्ष्म खुमी है जो जंतुओं के चमड़े पर छत्ता बाँधकर जम जाती है और उन्हीं के रक्त आदि से पलती है । दाद प्रायः बरसात में गंदे पानी के संसर्ग से होती है । दाद दो प्रकार की हीती है,—एक कागजी, दूसरी भैसिया । कागजी दाद का छत्ता पतला और छोटा होता है औरअधिक नहीं फैलता । भैसिया दाद भयकर होती है, इसके छत्ते बड़े और मोटे होते हैं और कभी शरीर भर में फैलते हैं । यौ०—दादमर्दन ।

दाद (३)
संज्ञा स्त्री० [फा़० दाद] इंसाफ । न्याय । उ०—तिनसों चाहत दाद तैं मन पस कौन हिसाब । छुरी चलावत हैं गरे जे बेकसक कसाब ।—रसनिधि (शब्द०) । मुहा०—दादा चाहना = किसी अत्याचार के प्रतिकार की प्रार्थना करना । दाद देना = (१) न्याय करना । उ०—देव तो दयानिकेत देत दादि दीन की पै मेरियै अभाग मेरी बार नाथ ढील की ।—तुलसी (शब्द०) । (२) सराहना । वाह- वाह करना । यौ०—दादख्वाह = न्यायेच्छु । दादख्वाही = न्याय की प्रार्थना । इंसाफ चाहना । दादगर । दादगुस्तर = दे० 'दादगर' दादरस । दादरसी = न्याय पाना ।

दादगर
वि० [फा़०] न्यायी । उ०—कही बेखबर कुछ तुजे नई खबर के हैं पास एक बादशाह दादगर ।—दक्खिनी०, पृ० २१२ ।

दादतलब
वि० [फा़०] न्यायेच्छु । इंसाफ चाहनेवाला । फरियादी [को०] ।

दादनी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. वह जो देना है । वह रकम जिसे चुकाना है । २. वह रकम जो किसी काम के लिये पेशगी दी जाय । अगता । उ०—दादू नूर दादनी, आसिकाँ दीदार ।—दादू०, पृ० ६७ ।

दादमर्दन
संज्ञा पुं० [सं० दद्रु मर्दन] एक प्रकार का चकवँड़ जो हिदुस्तान के बगीचों में प्रायः मिलता है । विशेष—ऐसा कहा जाता है कि यह पेड़ अमेरिका के टापुओँ से लाया गया है, इसी से इसे विलायती चकवँड़ भी कहते हैं । इसकी पत्तियों को पीसकर लगाने से दाद दूर हो जाती है ।

दादरस
वि० [फा़०] १. सहायक । २. फरियाद सुननेवाला । दादगर । उ०—बारे देखे तेरा । यहाँ दादरस कौन । यहाँ आता तेरा फरियादरस कौन ।—दक्खिनी०, पृ० ३४० ।

दादरा
संज्ञा पुं० [?] १. एक प्रकार का चलता गाना । २. दो अर्धमात्राओं का ताल जिसमें केवल एक आघात होता । †+ †+ खाली इस में नहीं होता जैसे,—धा धिन धा ।

दादस
संज्ञा स्त्री० [दादा + सास] ददिया सास । अजिया सास । सास की सास ।

दादा
संज्ञा पुं० [सं० तात] [स्त्री० दादी] १. पितामह । पिता का पिता । आजा । २. बड़ा भाई । ३. बड़े बूढ़ों के लिये आदरसूचक शब्द ।

दादि † (१)
संज्ञा स्त्री० [फा़० दाद ] न्याय । इंसाफ । उ०—(क) लागैगी पै लाज या विराजमान बिरदाई महाराज आजु जो न देत दादि दीन की ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) दई दीन हि दादि सो सुनि सुजन सदन बधाई ।—तुलसी (शब्द०) । (य) कृपसिंधु जन दीन दुवारे दादि न पावत काहे—तुलसी (शब्द०) । क्रि० प्र०—चाहना ।—देना ।—पाना ।—माँगना ।

दादि पु
संज्ञा [सं० दद्रु ] दे० 'दाद' ।

दादी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० दादा] पिता की माता । दादा की स्त्री ।

दादी (२)
संज्ञा पुं० [फा़० दाद] दाद चाहनेवाला । फरियादी । न्याय का प्रार्थी । यौ०—दादी फरियादी ।

दादु पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० दद्रु ] दाद । दिनाई । उ०—ममता दादु कंडु इरषाई । हरख विषाद गरह बहुताई ।—तुलसी (शब्द०) ।

दादुर पु †
संज्ञा पुं० [सं० दर्दुर] १. मेढक । मंडूक । उ०—दादुर धुनि चहुँ ओर सोहाई । वेद पढ़ैं जनु बटु समुदाई ।—तुलसी (शब्द०) । २.दक्षिण भारत के मलय पर्वत से सटा हुआ एक पर्वत । †३. कलश । मुंडेंरा । उ०—ऊँचा दादुर झलमलई । घरि घरि तुलछी वेद पुराण ।—बी० रासो, पृ० ८१ ।

दादुरावृत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं० दर्दुरा + वृत्ति] मेढ़क की तरह बार बार करहने या दुहराने की क्रिया । पुनारवृत्ति । उ०—उपमा तथा उत्प्रेक्षाओं की ऐसी दादुरावृत्ति, अनुप्रास एवं तुकों की ऐसी अश्रांत उपलवृष्टि क्या संसार के किसी और साहित्य में मिल सकती हैं ।—हिं० का० प्र०, पृ० १४७ ।

दादुल †
संज्ञा पुं० [हिं० दादुर] दे० 'दादुर' । उ०—(क) भई हरिता हरितैं सब और । करैं पिक दादुल सागर सोर ।—रसरतन, पृ० २०७ । (ख) सिंघ सियरै प्रीति भई है दादुल सर्प सहाई ।—संत० दरिया, पृ० ११२ ।

दादुल्ल पु
संज्ञा पुं० [सं० दर्दुर, प्रा० दददुल] दे० 'दादुर' । उ०— कहू सारसं सारिसारल्ल सोरं । मनो पावसी बुषटि्ठ दादुल्ल रोरं ।—पृ० रा०, २ ।०७४ ।

दादू †
संज्ञा पुं० [हिं० दादा] १. दादा के लिये संबोधन या प्यार का शब्द । २. 'भाई' आदि के समान एक साधारण संबोधन । ३. एक साधु का नाम जिसके नाम पर एक पंथ चला है । विशेष—ऐसा प्रसिद्ध है कि दादु अहमदाबाद के एक धुनियाँ थे । १२ वर्ष की अवस्था ही में इन्होंने अपना नगर पिरत्याग किया और अजमेर, कल्याणपुर आदि स्थानों में कुछ दिनों रहकर अंत में ३७ वर्ष की अवस्था में जयपुर से बीस कोस पर 'नरैन' (नराणा) नामक स्थान में निवास किया । कहते हैं, यहाँ उन्हें आकाशवाणी हुई, जिसके पीछे ये बहुत दिनों तक गुप्त रहे । कबीरपंथियों में प्रसिद्ध है कि दादू कबरपंथी थे और गुरुपरंपरा में कबीर से छठे थे । दादू ने भी कबीर के समान ही राम नाम के रूप में निर्गुण परब्रह्म की उपासना चलाई है । अकबर के समय में दादू अच्छे पहुँचे हुए साधुओं में गिने जाते थे ।

दादूदयाल
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'दादू'—३ ।

दादूपंथी
संज्ञा पुं० [हिं० दादू + पंथी] दादू नामक साधु का अनुयायी । संत दादू के संप्रदाय का अनुयायी । विशेष—दादूपंथीतीन प्रकार के होते हैं—विरक्त, नागा और विस्तरधारी । विरक्त केवल जलपात्र और कौपीन रखते हैं ।नागे लोग लडा़के होते हैं और राजओं की सेना में भरती होते हैं । बिस्तरधारी गृहस्थ होते हैं ।

दाध पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दाह या, सं० दग्ध, प्रा० दद्ध] जलन । दाह । ताप । उ०—(क) सही न जाय विरह कर दाधा ।—जायसी (शब्द०) । (ख) हाड़ चून भे बिरहै दही । जानै सोइ जो दाध इमि सही ।—जायसी (शब्द०) । (ग) जहँ तहँ भूमि जरी भा रेहू । बिरह की दाध भई जनु खेहू ।—जायसी (शब्द०) । (घ) जेहि तन नेह दाध तेहि दूना ।—जायसी (शब्द०) । विशेष—जायसी ने इस शब्द को कहीं स्त्रीलिंग माना है और कहीं पुलि्लग ।

दाधना पु
क्रि० स० [सं० दाग्ध] जलना । भस्म करना । उ०— दाढा़ राहु केतु गा दाधा । सूरज जरा चाँद जर आधा ।— जायसी (शब्द०) । २. डाहना । पीड़ित करना । उ०—ते यह जिउ ठाढे पर दाधा । आधा निकस, रहा घट आधा ।—जायसी (शब्द०) ।

दाधना पु
क्रि० अ० जलना । संतप्त होना । पीड़ित होना । दाहयुक्त होना । उ०—दाव दाधी मालति सुनत अति दाध्यो तिहि ठाई ।—हिंदी प्रेमगाथा०, पृ० २१५ ।

दाधा
वि० [सं० द्ग्ध, प्रा० दद्ध, दध्ध] [वि० स्त्री० दाधी] दग्ध । जला हुआ । झुलसा हुआ । उ०—(क) जीभ न जीभ विगोयनी, दब का दाधा कुपली मेल्ही । जीभ का दाधा नु पाँगूरई, नाल्ह कहइ सुणजई सब कोई ।बी० रासो, पृ० ३७ ।

दाधिक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का मट्ठा । विशेष—सुश्रुत (उत्तरतंत्र) के अनुसार बीजपूर का रस, घी और इनाक चौगुना दही मिलाने से यह तक्र तैयार होता है । यह गुल्म और प्लीहा तथा शूल का निवारक है । २. दही मिलाकर बोई खाद्य पदार्थ खानेवाला । ३. दधिविक्रेता । दही का व्यवसायी [को०] ।

दाधिक (२)
वि० दही से बना हुआ । दधिमिश्रित [को०] ।

दाधीच, दाधीचि
संज्ञा पुं० १. [सं०] १. दधीचि के वंश का मनुष्य । दधीचि का गोत्रज । २. उक्त गोत्रवालों की उपाधि ।

दान (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. देने का कार्य । जैसे, ऋणदान । २. लेनेवाले से बदले में कुछ न चाहकर या लेकर उदारतावश देने का कार्य । धर्म के भाव से देने की क्रिया । वह धर्मार्थ कर्म जिसमें श्रद्धा या दयापूर्वक दूसरे को धन आदि दिया जाता है । खैरात । क्रि० प्र०—करना ।—देना । यो०—कन्यादान । गोदान । दानपुन्य । दानदहेज । विशेष—स्मृतियों में दान के प्रकरण में अनेक बातों का विचार किया गया है । सबसे अधिक जोर दान ग्रहण कहे गए हैं । ब्राह्मणों में वेदपाठी, वेदपाठियों में वेदोक्त कर्म के कर्ता और उनमें भी शम, दम आदि से युक्त आत्म- ज्ञानी श्रेष्ठ हैं । दानों का विशेष विधान यज्ञ, श्राद्ध आदि कर्मों के पीछे हैं । इस प्रकार का दान अंधे, लूले, लँगडे़, गूँगे आदि विकलांगों को देने का निषेध है । दान के लिये दाता में श्रद्धा होनी चाहिए और उसे लेनेवाले से कुछ प्रयोजनसिद्धि की अपेक्षा न रखनी चाहिए । शुद्धितत्व में दान के छह अंग बतलाए गए हैं—दाता, प्रतिग्रहीता, श्रद्धा, धर्म देश और काल । दान के उत्तम और निकृष्ट होने का विचार इन छह अंगों के अनुसार होता है—अर्थात् दाता के विचार से (जैसे, श्वपच, कुलटा आदि का दिया हुआ), प्रतिग्रहीता के विचार से (जैसे, पतित ब्राह्मण को दिया हुआ), श्रद्धा के विचार से (जैसे, तिरस्कारपूर्वक दिया हुआ), देश के विचार से (जैसे, गंगा के तट पर दिया हुआ), और काल के विचार से (जैसे, ग्रहण के समय का) । इनके अतिरिक्त द्रव्य का भी विचार किया जाता है कि जो धन दान में दिया जाय वह कैसा होना चाहिए । देवल ने लिखा है कि जो धन दूसरे को पीड़ित करके न प्राप्त हुआ हो, अपने परिश्रम से प्राप्त हुआ हो, वही दान के योग्य है । जिस प्रकार दान का फल कहा गया है, उसी प्रकार दान के त्याग का भी फल कहा गया है । याज्ञवल्क्य स्मृति में लिखा है कि 'जो प्रतिग्रह में समर्थ अर्थात् दान लेने का पात्र होकर भी प्रतिग्रह नहीं लेता वह दानियों के जो स्वर्ग आदि लोक हैं उन सबको प्राप्त होता है' । इसी से बहुत से स्थानों के ब्राह्मण प्रतिग्रह कभी नहीं लेते । वेदों ओर स्मृतियों में कहे हुए दानों के अतिरिक्त ग्रहों की शांति आदि के लिये कुछ दान किए जाते हैं जिनका लेना बुरा समझा जाता है । इनमें शनैश्चर का दान सबसे बुरा समझा जाता है जिसमें तेल, लोहा, काला तिल, काला कपडा दिया जाता है । दान के विषय में संस्कृत में अनेक आचार्यों के अनेक ग्रंथ हैं । ३. वह वस्तु जो दान में दी जाय । ४. कर । महसूल । चुंगी । ठेंगा । उ०— (क) तुम समरथ की वाम कहा काहू को करिहौ । चोरी जातीं बेचि दान सब दिन को भरिहौ ।—सूर (शब्द०) । (ख) दानी भए नए माँगत दान सुने जु पै कंस तो बाँधिकै जैहौ ।—रसखान०, पृ० २६ । ५. राजनीति के चार उपायों में से एक । कुछ देकर शत्रु के विरुद्ध कार्यसाधन की नीति । ६. हाथी का मद । उ०—(क) रनित भृंग घंटावली झरत दान मधुनीर । मंद मंद आवत चल्यो कुंजर कुंज समीर ।—बिराही (शब्द०) । (ख) सुरसरि में दिग्गज दान मलिन जलही भर, कंचन के कमलालय हुए तदीय सरोवर ।—महावीरप्रसाद (शब्द०) । (ग) दान देन यौं शोभियत दीन नरनि के हाथ । दान सहित ज्यौं राजहीं मत्त गजन के माथ ।—केशव (शब्द०) । ७. छेदन । कर्तन । खंडन । ८. शुद्धि । ९. एक प्रकार का मधु । १०. रक्षण । पालन (को०) ।

दान (२)
संज्ञा पुं० [फा़०] पात्र । आधार । रखने की वस्तु । समा- सांत में, जैसे कलमदान ।

दानक
संज्ञा पुं० [सं०] कुत्सित दान । बुरा दान ।

दानकाम
[सं०] दान करने की इच्छा रखनेवाला । दानी [को०] ।

दानकुल्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] हाथी का मद ।

दानतोय
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दानवारि'२ ।

दानधर्म
संज्ञा पुं० [सं०] दान देने का धर्म । दान पुण्य ।

दानपति
संज्ञा पुं० [सं०] १. सदा दान देनेवाला । २. अक्रूर का एक नाम जो स्यमंतक मणि के प्रभाव से प्रतिदिन दान दिया करता था । ३. एक दैत्य का नाम ।

दानपत्र
संज्ञा पुं० [सं०] वह लेख या पत्र जिसके द्वारा कोई संपत्ति किसी को प्रदान की जाय । विशेष—प्राचीन काल में दानपत्र ताम्रपत्र आदि पर खोदे जाते थे । अनेक राजाओं के ऐसे दानपत्र मिलते हैं जिनसे बहुत सी ऐतिहासिक बातों का पता लगता है ।

दानपात्र
संज्ञा पुं० [सं०] वह व्यक्ति जो दान पाने के उपयुक्त हो । दान देने के लिये उपयुक्त व्यक्ति ।

दानप्रतिभाव्य
संज्ञा पुं० [सं०] ऋण दिलाने की जमानत । कर्ज की जमानत ।

दानप्रतिभू
संज्ञा पुं० [सं०] वह जामिन जो यह कहे कि 'यादि इसने ब्याज सहित धन न लौटाया तो मैं ही धन दे दूँगा' ।

दानभिन्न
वि० [सं०] राजनीति में दान देकर फोड लिया गया ।

दानलीला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १कृष्ण की वह लीला जिसमें उन्होंने ग्वालिनों से गोरस बेचने का कर वसूल किया था । २. कोई ग्रंथ जिसमें इस लीला का वर्णन किया गया हो ।

दानव
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० दानवी] कश्यप कै वे पुत्र जो 'दनु' नाम्नी पत्नी से उत्पन्नहुए । असुर । राक्षस । विशेष—मायावी दानवों का उल्लेख ऋग्वेद में है । माहभारत के अनुसार दक्ष की कन्या दनु से शंबर, नमुचि, पुलोमा असि- लोमा, केशी, विप्रचित्ति, दुर्जय, अयःशिरा, विरुपाक्ष, महोदर, सूर्य, चंद्र इत्यादि चालीस पुत्र उत्पन्न हुआ । दानवों में जो सूर्य और चंद्र हुए उन्हें देवताओं से भिन्न समझना चाहिए । भागवत में दनु के ६१ पुत्र गिनाए गए हैं । मनुस्मृति में लिखा है कि दानव पितरों से उत्पन्न हुए । मरीचि आदि ऋषियों से पितर उत्पन्न हुए, पितृगणों से देव दानव और देवताओं से यह चराचर जगत् आनुपूर्विक क्रम से उत्पन्न हुआ ।

दानवगुरु
संज्ञा पुं० [सं०] शुक्राचार्य ।

दानवज्र
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत के अनुसार एक प्रकार के अश्व जो देवताओं और गंधर्वों की सवारी में रहते हैं । ये कभी बूढे़ नहीं होते और मन की तरह वेगवान् होते हैं । २. चार वर्णो के क्रम में तृतीय वर्ण अर्थात् वैश्य (को०) ।

दानवारि (१)
संज्ञा पुं० [सं० दानव + अरि] १. विष्णु । २. देवता । ३. इँद्र ।

दानवारि (२)
संज्ञा पुं० [सं० दान + वारि] हाथी का मद ।

दानवी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक दानव की स्त्री । २. दानव जाति की स्त्री । राक्षसी ।

दानवी (२)
वि० [सं० दानवीय] दानवों की । दानव संबंधी । जैसे, दानवी माया ।

दानवीर
संज्ञा पुं० [सं०] दान देने में साहसी पुरुष । वह जो दान देने से न हटे । अत्यंत दानी । विशेष— साहित्य में वीर रस के अंतर्गत चार प्रकार के जो वीर गिनाए गए हैं उनमें एक दानवीर भी है । दानवीरता में त्याग के विषय में उत्साह स्थायी भाव है, याचक आलंबन है; अध्य- वसाय (तीर्थगमन आदि) और दानसमय, ज्ञान आदि उद्दोपन विभाव है; सर्वस्वत्याग आदि अनुभाव तथा हर्ष और धृति आदि संचारी भाव हैं ।

दानवेंद्र
संज्ञा पुं० [सं० दानवेन्द्र] राजा बलि ।

दानशील
वि० [सं०] दानी । दान करनेवाला ।

दानशीलता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दान करने की प्रवृत्ति । उदारता ।

दानशूर
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दानशील' ।

दानशौंड
संज्ञा पुं० [सं० दानशोण्ड] दान करनेवाला । दानशील । [को०] ।

दानसागर
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का महादान जिसका प्रचार वंगदेश में है और जिसमें भूमि, आसन आदि सोलह पदार्थों का दान किया जाता है ।

दानांतराय
संज्ञा पुं० [सं० दानान्तराय] जैनाशास्त्र के अनुसार वह अंतराय या पापकर्म जिसके उदय से दान के योग्य द्रव्य और पात्र पाकर भी मनुष्य को दान करने में विघ्न होते हैं और वह दान नहीं कर सकता ।

दाना (१)
संज्ञा पुं० [फा़०दानह्] १. अनाज का एक बीज । अन्न का एक कण । कन । यौ०— दाना दुनका = अन्न के दो चार कण । थोड़ा सा अन्न । उ०— गली के पूर्व से पश्चिम और पश्चिम से पूर्व दाने दुनके और गिलाजत की खौज में घावे करता ।— अभिशप्त, पृ० ९५ । मुहा०—दाने दाने को तरसना = अन्न का कष्ट सहना । भोजन न पाना । दाने को मुहताज = अत्यंत दरिद्र । दाना बदलना = एक पक्षी का अपने मुँह का दाना दूसरे पक्षी के मुँह में डालना । चारा बाँटना । दाना भराना = चिडियों का अपने बच्चों के मुँह में चारा डालना । २. अनाज । अन्न । जैसे,— तुम तो इतने दुबले हो कि जान पड़ता है, कभी दाना नहीं पात्ते । यौ०—दाना चारा । दाना पानी । क्रि० प्र०—चबाना ।—चाबना ।—भुनाना । ४. कोई छोटा बीज जो बाल, फली या गुच्छे में लगे । जैसे, राई का दाना, पोस्ते का दाना । ५. ऐसे फल के अनेक बीजों में से एक जिसके बीज कडे़ गूदे के साथ बिलकुल मिले हुए अलग अलग निकलें । जैसे, अनार का दाना । विशेष— आम, कटहल, लीची इत्यादि फलों के बीजों को दाना नहीं कहते । ६. कोई छेटी गोल वस्तु जो प्रायः बहुत सी एक में गूँथ, पिरो,या जोड़कर काम में लाई जाती हो । जैस, मोती का दाना । उ०— बरसैं सु बूदैं मुकतान ही के दाने सी ।— पद्माकर (शब्द०) । ७. ऐसी बहुत सी छोटी वस्तुओं (या अंगों) में से एक जिनके एक में गूँथने या जोड़ने से कोई बड़ी वस्तु बनी हो । जैसे, घुँघरू का दाना, बाजूबंद का दाना । ८. माला की गुरिया । मनका । उ०— गले में सोने के बडे़ बडे़ दाने पडे़ हैं ।— प्रताप (शब्द०) । ९. गोल या पहलदार छोटी वस्तुओं के लिये संख्या के स्थान पर आनेवाला शब्द । अदद । जैसे, चार दाने मिर्च, चार दाने अंगूर । १०. रवा । कण । कणिका । जैसे, दानेदार घी या शराब । ११. किसी सतह पर के छोटे छोटे उभार जो टटोलने से अलग अलग मालूम हों । जैसे, नारंगी के छिलके पर के दाने, दानेदार चमड़ा । १२. शरीर के चमडे पर महीन महीन उभार जो खुजलाने या रोग के कारण हो जाते हैं । जैसे, अँभौरी या पित्ती के दाने, चेचक के दाने । १३. बरतन की नक्काशी में गोल उभार (कसेरे) । क्रि० प्र०—देना । मुहा०—दाने का माल = वह बरतन जिसकी नक्काशी उभारी नहीं जाती ।

दाना (२)
वि० [फा़० दाना] बुद्धिमान । अक्लमंद ।

दानाई
संज्ञा स्त्री० [फा़०] अक्लमंदी ।

दानाकेश
संज्ञा पुं० [?] एक प्रकार का जरदोजी का कपड़ा जा चोगे के उपर पहना जाता है ।

दानाचारा
संज्ञा पुं० [फा़० दाना + हिं० चारा] खानापीना । भोजन । आहार । क्रि० प्र०—करना ।

दानाध्यक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] वह जिसके द्वारा दान किया हुआ द्रव्य ब्राह्मणों में बाँटा जाय । राजाओं के यहाँ दान का प्रबंध करनेवाला कर्मचारी ।

दानापानी
संज्ञा पुं० [फा़० दाना + हिं० पानी] १. खान पान । अन्न । जल । क्रि० प्र०—करना । मुहा०—दाना पानी छोड़ना = अन्न जल ग्रहण न करना । न कुछ खाना न पीना । उपवास करना । दाना पानी छूटना = रोग के कारण कुछ खाया पीया न जाना । २. भरण पोषण का आयोजन । जीविका । मुहा०—दाना पानी उठना = जीविका न रहना । ३. रहने का संयोग । जैसे,—जहाँ का दाना पानी होगा वहाँ जायँगे ।

दानाबंदी
संज्ञा स्त्री० [फा़० दाना + बंदी] खड़ी फसल से उपज का अंदाज करने के लिये खेत को नापने का काम ।

दानि पु
संज्ञा पुं० [सं० दानी] उ०— दानि कहउब अरु कृपनाई । होइ कि खेम कुसल रौताई ।— मानस, २ । ३५ ।

दानिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दान करनेवाली स्त्री ।

दानिया
संज्ञा पुं० [सं० दानी] दे० 'दानी' ।

दानिश
संज्ञा स्त्री० [फा़०] समझ । अक्ल । बुद्धि । विवेक । यौ०—दानिशमंद = चतुर । बुद्धिमान । दानिश्मंद = चतुर । उ०— इसके ऊपर नाज करना दानिश्मंद का काम नहीं ।—श्रीनिवास ग्रं०, पृ० ३४ । दानिशमंदी = (१) बुद्धिमत्ता । विद्वत्ता । (२) निपुणता । कुशलता ।

दानिस
संज्ञा स्त्री० [फा़० दानिस्त] १. समझ । बुद्धि । २. राय । संमति ।

दानिस्त
संज्ञा स्त्री० [फा़०] ज्ञान । जानकारी । अक्ल । बुद्धि । समझ । उ०— बंदगी दम दम की भरौं दानिस्त दिखाया । तिनुका ओट पहाड़ है बिन चस्म लगाया ।— पलटू०, भा० ३, पृ० ९२ ।

दानिस्तन
क्रि० वि० [फा़०] जानते हुए । जान बूझकर । उ०— कीजै फहम फना को लैकै नूर तजल्ली अपना । पलटूदास मकाँ हू हू का दीद दानिस्तन सुवना ।— पलटू०, भा० ३, पृ० ९२ ।

दानी (१)
वि० [सं० दानिन्] [वि० स्त्री० दानिनि] जो दान करे । उदार ।

दानी (२)
संज्ञा पुं० दान करनेवाला व्यक्ति । दाता ।

दानी (३)
संज्ञा पुं० [सं० दानीय] १. कर संग्रह करनेवाला । महसूल उगाहनेवाला । दान लेनेवाला । उ०— (क) आय समुंद ठाढ़ भा होइ दानी के रूप ।— जायसी (शब्द०) । (ख) परुसत ग्वारि ग्वार सब जेंवत मध्य कृष्ण सुखकारी । सूर स्याम दधि दानी कहि कहि आनंद घोषकुमारी ।— सूर (शब्द०) । (ग) दानी भए नए माँगत दाम सुनै जु पै कंस तौ बाँधि के जैहो ।— रसखान०, पृ० २६ । २. पर्वतिया नैपालियों की एक जाति ।

दानीपन
संज्ञा पुं० [सं० दानी + हिं० पन] दानशीलता । उ०— मेरे सामने वह क्या सत्यवादी बनेगा और क्या दानीपने का अभिमान करेगा ।— भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० २६९ ।

दानीय (१)
वि० [सं०] १. दान करने योग्य । २. दान लेने या ग्रहण करनेवाला । दान, कर या महसूल लेनेवाला ।

दानीय (२)
संज्ञा पुं० दान ।

दानु (१)
वि० [सं०] १. विजय पानेवाला । विजेता । २. शूर । वीर [को०] ।

दानु (२)
संज्ञा पुं० १. वायु । २. विंदु । बूँद । ३. दानव । ४. संतोष । ५. दान ।६. दाता । दानी । ७. अभ्युन्नति । अभ्यु- दय [को०] ।

दानेदार
वि० [फा़०] जिसमें दाने हों । रवादार । जैसे, दानेदार गुड़ । दानेदार राब ।

दानो पु †
संज्ञा पुं० [सं० दानव] दे० 'दानव' ।

दाप
संज्ञा पुं० [सं० दर्प, प्रा० दप्प] १. अहंकरा । घमंड । अभिमान । गर्व । २. शक्ति । बल । जोर । उ०— रावन बान छुआ नहिं चापा । हारे सकल भूप करि दापा ।—तुलसी(शब्द०) ।३. उत्साह । उमंग । ४. रोब । दबदबा । आतंक । तेज । प्रताप । ५. क्रोध । उ०— सर संधान कीन्ह करि दापा ।— तुलसी (शब्द०) । ६. जलन । ताप । दुःख । उ०— दियो क्रोध करि सिवहि सराप । करौ कृपा जु मिटै यह दाप ।— सूर (शब्द०) ।

दापक
संज्ञा पुं० [सं० दर्पक] दबानेवाला । उ०— सो प्रभु हैं जल थल सब व्यापक । जो है कंस दर्प को दापक ।—सूर (शब्द०) ।

दापन
संज्ञा पुं० [सं०] दान करने की प्रेरणा । दान की प्रेरणा देना [को०] ।

दापना पु
क्रि० स० [हिं० दाप] १. दाबना । दबाना । २. मना करना । रोकना । उ०— मानै न जाय गोपाल के गेह घरी घरी धाय कितेकऊ दापति ।— गोकुल (शब्द०) ।

दापित
वि० [सं०] १. बाधित । जिसे कुछ देने के लिये बाध्य किया गया हो । २. जिसपर अर्थदंड या जुरमाना लगा हो । ३. निर्णीत [को०] ।

दाब
संज्ञा स्त्री० [सं० दर्प, हिं० दाप] १. दबने या दबाने का भाव । एक वस्तु का दूसरी वस्तु पर उस ओर को जोर जिस ओर वह दूसरी वस्तु हो । अपनी ओर को खींचनेवाले जोर का उलटा । चाँप । क्रि० प्र०—पहुँचाना ।— लगाना । २. किसी वस्तु का वह जोर जो नीचे की वसेतु पर पड़े । भार । भोझ । जैसे,—इसपर पत्थर की दाब पड़ी है इसी से यह चिपटा हो गया है । क्रि० प्र०—डालना ।— पड़ना । मुहा०— किसी की दाब तले होना = किसी के वश में या अधीन होना । ३. आतंक । अधिकार । रोब । आधिपत्य । शासन । बडे़ या प्रबल के प्रति छोटे या अधिन का संकोच या भय और छोटे या अधीन के प्रति बडे़ या प्रबल का प्रभुत्व । मुहा०—दाब दिखाना = अधिकार जताना । हुकूमत या डर दिखाना । प्रभुत्व प्रकट करना । दाँब मानना = किसी बडे़ से डरना या सहमना । प्रभुत्व स्वीकार करना । वश में रहना । जैसे,— वह लड़का किसी की दाब नहीं मानता । दाब में रखना = शासन में रखना । जैसे,— लड़के को दाब में रखो, नहीं तो बिगड़ जायगा । दाब में होना = कस में होना । अधीन होना ।

दाबकस
संज्ञा पुं० [हिं० दाब + कसना] लोहारों के छेदने के औजारों (किरकिरा, बरदुआ, आदि) का एक हिंस्सा ।

दाबदार
वि० [हिं० दाब + फा० दार] रोबदार । आतंक रखनेवाला । प्रभावशाली । प्रतापी । उ०— दाबदार निरखि रिसानो दीह दलराय, जैसे गड़दार अड़दार गजराज को ।— भूषण (शब्द०) ।

दाबना
क्रि० स० [हिं० दाब + ना (प्रत्य०)] दे० 'दबाना' ।

दाबा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० दाब] कलम लगाने के लिये पौधों की टहनी को मिट्टी में गाड़ने या दबाने का काम ।

दाबा (२)
संज्ञा पुं० [देश०] आठ नौ अंगुल लंबी एक मछली जो सिंध, संयुक्त प्रदेश और बंगाल की नदियों में पाई जाती है ।

दाबिल
संज्ञा पुं० [हिं० दाब] एक बड़ी सफेद चिड़िया जिसकी चोंच दस बारह अंगुल लंबी और छोर पर पैसे की तरह गोल और चिपटी होती है ।

दाबी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] कटी हुई फसल के बराबर बराबर बँधे हुए पूले जो मजदूरी में दिए जाते हैं ।

दाभ
संज्ञा पुं० [सं० दर्भ] एक प्रकार का कुश । डाभ । उ०— अधरों थी मग दाभ गिरावत । थकित खुले मुख ते बिखरावत ।— शकुंतला, पृ० ८ ।

दाभ्य
संज्ञा पुं० [सं०] शासन के योग्य । जो शासन में आ सके ।

दाम (१)
संज्ञा पुं० [सं० दामन्] १. रस्सी । रज्जु । यौ०— दामोदर । २. माला । हार । लड़ी । उ०—(क) तोहि के रचि रचि बंध बनाए । बिच बिच मुकुता दाम सुहाए ।— तुलसी (शब्द०) । (ख) कहुँ क्रीड़त कहुँ दाम बनावत कहूँ करत शृंगार ।— सूर (शब्द०) । ३. समूह । राशि । ४. लोक । विश्व ।

दाम (२)
संज्ञा पुं० [फा़० मिलाओ सं०] जाल । फंदा । पाश । उ०— लोचन चोर बाँधे श्याम । जात ही उन तुरत पकरे कुटिल ललकनि दाम ।—सूर (शब्द०) ।

दाम (३)
संज्ञा पुं० [हिं० दमड़ी] १. पैसे का चौबीसवाँ या पचीसवाँ भाग । एक दमड़ी का तीसरा भाग । उ०— कुटिल अलक छुटि परत मुख बढ़िगो इतो उदोत । बंक विकारी देत जिमि दाम रुपैया होता ।— बिहारी (शब्द०) । मूहा० —दाम दामभर देना = कौड़ी कौड़ी चुका देना । कुछ (ऋण) बाकी न रखना । दाम दाम भर लेना = कौड़ी कौड़ी ले लेना । कुछ बाकी न छोड़ना । २. वह धन जो किसी वस्तु के बदले में बेचनेवाले को दिया जाय । मूल्य । कीमत । मोल । उ०— बिन दामन हित हाट में नेही सहज बिकात ।— रसनिधि (शब्द०) । क्रि० प्र०—देना । —लेना । मुहा०—दाम उठना = किसी वस्तु की कीमत वसूल हो जाना । बिक जाना । दाम करना = (किसी वस्तु का) मोल ठहराना । मूल्य निश्चित करना । कीमत तै करना । मोल भाव करना । दाम खड़ा करना = कीमत वसूल करना । दाम चुकाना = (१) मूल्य दे देना । (२) कीमत ठहरना । मोल भाव तै करना । दाम देने आना = मूल्य देने के लिये विवश होना । किसी वस्तु को नष्ट करने पर उसका मूल्य देना पड़ना । नुकसानी देना पड़ना । दाम भरना = किसी वस्तु को नष्ट करने पर दंडस्वरूप उसका मूल्य दे देना । नुकसानी देना । डाँड़ देना । दाम भर पाना = सारा मूल्य पा जाना ।३. धन । रुपया पैसा । जैस, दाम करे काम । उ०— कामिहिं नारि पियारे लिमि लोभिहिं प्रिय जिमि दाम ।— तुलसी (शब्द०) ।४. सिक्का । रुपया । उ०— जो पै चेराई राम की करतो न लजाते । तो तू दाम कुदाम ज्यों कर कर न बिकातो ।— तुलसी (शब्द०) । मुहा०—चाम के दाम चलाना = अधिकार या अवसर पाकर मनमाना अधेर करना । दे० 'चाम' । उ०—दिन चारिक तू पिय प्यारे के प्यार सों चाम के दाम चलाया ले री ।—परमेश (शब्द०) । ५. दाननीति । राजनीति की एक चाल जिसमें शत्रु को धन द्वारा वश में करते हैं । उ०— साम दाम अरु दंड बिभेदा । नृप उर बसहिं नाथ कह बेदा ।— तूलसी (शब्द०) ।

दाम (४)
वि० [सं०] देनेवाला । दाता ।

दामकंठ
संज्ञा पुं० [सं० दामकण्ठ] एक गोत्रप्रवर्तक ऋषि का नाम ।

दामक
संज्ञा पुं० [सं०] १. गाड़ी के जुए की रस्सी । २. लगाम । बागडोर ।

दामग्रंथि
संज्ञा पुं० [सं० दामग्रन्थि] राजा विराट का सेनापति । (महाभारत) ।

दामचंद्र
संज्ञा पुं० [सं० दामचन्द्र] द्रुपद राजा के एक पुत्र का नाम ।

दामण †
संज्ञा स्त्री० [सं० दामिनी] दामिनी । बिजली । उ०— चोमास रहे वे भ्रात सुचंगा ताम षटे जस ताजा । देखे राम पयोधर दामण सीत विरह तन साजा ।— रघु०, रू०, पृ० १५६ ।

दामन्
संज्ञा पुं० [सं०] १. रस्सी । २. माला । ३. रेखा । लकीर । जैसे, विद्युत दाम ।

दामन
संज्ञा पुं० [फा़०] १. अंगे, कोट, कुर्ते इत्यादि का निचला भाग । पल्ला । उ०— दृग दरजी बरुनी सुई रेसम डोरे लाल । मगजी ज्यौं मो मन सियौ तुव दामन सौं लाल ।— स० सप्तक, पृ० १९२ । यौ०—दामनगीर । २. पहाड़ों के नीचे की भूमि । पर्वत । ३. बादबान । पाल । क्रि० प्र०— छोडना । ४. नाव या जहाज के जिस ओर हवा का धक्का लगता हो उसके सामने की दिशा । (लश०) ।

दामनगीर
वि० [फा०] १. पल्ले पड़नेवाला । सिर होनेवाला । पीछे पड़नेवाला । ग्रसनेवाला । उ०— अपनो पिंड पोषिबे कारन कोटि सहस जिय मारे । इन पापन ते क्यौं उबरोगे दामनगीर तिहारे ?—सूर (शब्द०) । मुहा०—दामनगीर होना = पीछे लगना । ऊपर आ पड़ना । ग्रसना या घेरना (कष्टदायक वस्तु के लिये) । जैसे,— बला दामनीर होना । २. दावा करनेवाला । दावेदार । उ०—बापुरो आदिलशाह कहाँ कहँ दिल्ली को दामनगीर सिवाजी ।— भूषण (शब्द०) ।

दामनपर्व
संज्ञा पुं० [सं० दामनपर्वन्] दमनक संबंधी पर्व या उत्सव । चैत्र शुक्ला चतुर्दशी का पर्व ।

दामनि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दामिनी] दे० 'दामिनी' । उ०— चहूँ ओर क्रोधंत दामनि अँध्यारी ।—ह० रासो, पृ० २० ।

दामनी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] रस्सी । रज्जु ।

दामनी (२)
संज्ञा स्त्री० [फा़०] वह चौड़ा कपड़ा जो घोड़ों की पीठ पर डाला जाती है । २. दे० 'डामर' ।

दामर (२)
संज्ञा स्त्री० [?] छोटे कान की भेड़ । (गड़ेरिए) ।

दामरि
संज्ञा स्त्री० [सं० दाम] दे० 'दामरी' ।

दामरी
संज्ञा स्त्री० [सं० दाम] रस्सी । रज्जु । उ०— ज्ञान भक्ति दोऊ बिना हरि नहिं बाँधे जात । यहै कहत सी दामरी घटि गइ हरि के गात ।— व्यास (शब्द०) ।

दामलिप्त
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'ताम्रलिप्त' ।

दामांचन
संज्ञा पुं० [सं० दामाञ्चन] घोड़े के पैरों को बाँधने की रस्सी [को०] ।

दामांचल
संज्ञा पुं० [सं० दामाञ्चल] दे० 'दामांचन' ।

दामांजन
संज्ञा पुं० [सं० दामाञ्जन] दे० 'दामांचन' ।

दामा पु (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० दावा] दावानल । उ०— नंद के किसोर ऐसो आजु प्रभु को है कहौ पान करि लीन्हों ब्रज दीन देखि दामा को ।— विश्राम (शब्द०) ।

दामा (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] रस्सी । रज्जु [को०] ।

दामा (३)
संज्ञा पुं० [ देश०] एक प्रकार का पक्षी । कलचिरी ।

दामाद
संज्ञा पुं० [फा़० मिलाओ सं० जामातृ] पुत्री का पति । जमाई । जामाता ।

दामासाह
संज्ञा पुं० [हिं० दाम + साहु(= बनिया)] वह दिवालिया महाजन जिसका जायदाद उसके लहनेदारों के बीच हिस्से के मुताबिक बँट जाय ।

दामासाही
संज्ञा स्त्री० [हि० दामासाह + ई (प्रत्य०)] किसी दिवालिए महाजन की जायदाद में से एक एक लहनेदार को मिलनेवाली रकम का निर्णय ।

दामिन, दामिनि
संज्ञा स्त्री० [सं० दामिनी] दे० 'दामिनी' । उ०— (क) नंददाम प्रभू रस बरषत जहाँ नव धन दामिन के अनुहोरैं ।— नंद० ग्रं०, पृ० ३७८ । (ख) दामिनि दमक रह न धन माही ४ । १४ ।

दामिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बिजली । विद्युत् । उ०— सोहैं साँवरे पथिक पाछे ललना लोनी । दामिनी बरन गोरी लखि सखि तृन तोरी, बीती हैं बय किसोरी जोबन होनी ।— तुलसी ग्रं०, पृ० ३६४ । २. स्त्रियों का एक शिरोभूषण जिसे बेंदी या बिंदिया भी कहते हैं । दाँवनी । उ०—दामिनी सी दामिनी सुभामिनी सँवारि सीस, कहती कुँवर होत कमिनी के क्यों लजात ।— रघुराज (शब्द०) ।

दामी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० दाम] कर । मालगुजारी ।

दामी (२)
वि० कीमती । उ०— होटल में दामी कपड़े पहने हुए पुरुषों की भीड़ लगी हुई थी ।— संन्यासी, पृ० ३३९ ।

दामोद
संज्ञा पुं० [पुं०] अथर्ववेद का एक शाखा का नाम ।

दामोदर
संज्ञा पुं० [सं०] १. श्रीकृष्ण । २. विष्णु । विशेष— इस नाम के तीन भिन्न भिन्न हेतु बतलाए गए हैं । हरिवंश में लिखा है कि यमलार्जुन के गिरने के समय यशोदा ने ताड़ना के लिये श्रीकृष्ण को पेट में रस्सी लगाकर बाँधा था इसी से गोपियाँ उनिहें दामोदर कहने लगीं । यही हेतु सबसे प्रसिद्ध है । विष्णुसहस्रनाम के भाष्यकार ने भी यही व्युत्पत्ति लिखी है । कुछ लोग दाम शब्द से विश्व या लोक का ग्रहण करते हैं— 'जिसके उदर में सारा विश्व हो' । कुछ लोग 'दामाद्दामोदरंविदुः' महाभारत के इस वाक्य के अनुसार दम अर्थात् इंद्रियनिग्रह में अत्यंत उदार या श्रेष्ठ अर्थ करते हैं । ३. एक जैन तीर्थकर का नाम । ४. बंगाल की एक नदी जो छोटा नागपुर के पहाड़ों से निकलकर भागीरथी में मिलती है ।

दायँ पु † (१)
संज्ञा पुं० [हिं० दाँव] दे० 'दावै' ।

दायँ (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'दाईं' ।

दायँ (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० दमन] दाना और भूसा अलग करने के लिये कटी हुई फसलों के डंठलों को बैलों से रौंदवाने का काम । दवँरी । उ०— कटत धान अरु दायँ जात जब फरवारन महँ— प्रेमघन०, भा० १, पृ० ४४ । क्रि० प्र०—जाना ।

दायँ (४)
संज्ञा स्त्री० [?] बराबरी । तुल्यता । दे० 'दाँज' । उ०— विण जुध कारण बाध रै दूजो नावै दार्य ।—बाँकी० ग्रं०, भा० १, पृ० २२ ।

दाय (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. देने योग्य धन । वह धन जो किसी को देने को हो । २. दायजे, दान आदि में दिया जानेवाला धन । ३. वह पैतृक या संबंधी का धन जिसका उत्तराधिकारियों में विभाग हो सके । वारिसों में बाँटा जानेवाला धन या मिल- कियत । दे० 'दायभाग' । विशेष—वह धन जो स्वामी के संबंध निमित्त से ही दूसरे का हो सके, दाय कहलाता है । मिताक्षरा के अनुसार दाय दो प्रकार का है, एक अप्रतिबंध, दूसरा सप्रतिबंध । अप्रतिबंध दाय वह है जिसमें कोई बाधा न हो सके । जैसे, पुत्र पौत्रों का पिता पितामह के धन में स्वत्व । सप्रतिबंध वह है जिसका कोई प्रतिबंधक हो, जिसमें किसी के द्वारा बाधा पड़ सकती हो । जैसे, भाई भतीजों का स्वत्व जो पुत्र के अभाव में होता है, अर्थात् पुत्र का होना जिसका प्रतिबंधक होता है । ४. दान ।५. विभाग । अंश । हिस्सा (को०) ।६. स्थान । जगह (को०) । ७. क्षति । हानि (को०) । ८. खंडन । विभाजन (को०) । ९. सोल्लुंठ भाषण । व्यंग्यपूर्ण कथन (को०) ।

दाय पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० दाव] दे० 'दाव' । उ०— सिर धुनि धुनि पछितात मीजि कर, कोउ न मीत हित दुसह दाय ।—तुलसी (शब्द०) ।

दायक
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० दायिका] देनेवाला । दाता । जैसे, मंगलदायक । उ०— बरनहुँ रघुवर विमल जस जो दायक फल चारि ।— मानस, २ । १ ।

दायज
संज्ञा पुं० [सं० दाय] दे० 'दायजा' ।

दायजा
संज्ञा पुं० [सं० दाय] वह धन जो विवाह में वर पक्ष को दिया जाय । यौतुक । दहेज । उ०— कहूँ सुत ब्याह कहूँ कन्या को देत दायजो रा ।— सूर (शब्द०) ।

दायनी पु
वि० स्त्री० [सं० दायिनी] देनेवाली । उ०—विमल कथा हरिपद दायनी ।—मानस, ७ । ५२ ।

दायभाग
संज्ञा पुं० [सं०] १. पैतृक धन का विभाग । २. बाप दादे या संबंधी की संपत्ति के पुत्रों, पौत्रों या संबंधियों में बाँटे जाने की व्यवस्था । बपौती या वरासत की मिलाकियत को वारिसों या हकदारों में बाँटने का कायदा कानून । विशेष— यह हींदू धर्मशास्त्र के प्रधान विषयों में से है । मनु, याज्ञवल्क्य आदि स्मृतियों में इसके संबंध में विस्तृत व्यवस्था है । ग्रंथकारों और टीकाकारों के मतभेद से पैतृक धनविभाग के संबंध में भिन्न भिन्न स्थानों में भिन्न भिन्न व्यवस्थाएँ प्रच- लित हैं । प्रधान पक्ष दो हैं—मिताक्षरा और दायभाग । मिताक्षरा याज्ञवल्क्य स्मृति पर विज्ञानेश्वर की टीका है जिसके अनुकूल व्यवस्था पंजाब, काशी, मिथिला आदि से लेकर दक्षिण कन्याकुमारी तक प्रचलति है । 'दायभाग' जीमूत- वाहन का एक ग्रंथ है जिसका प्रचार वंग देश में है । सबसे पहली बात विचार करने की यह है कि कुटुंबसंपत्ति में किसी प्राणी का पृथक् स्वत्व विभाग करने के पीछे होता है अथवा पहले से रहता है । मिताक्षरा के अनुसार विभाग होने पर ही पृथक् या एकदेशीय स्वत्व होता है, विभाग के पहले सारी कुटुंबसंपत्ति पर प्रत्येक संमिलित प्राणी का सामान्य स्वत्व रहता है । दायभाग विभाग के पहले भी अव्यक्त रूप में पृथक् स्वत्व मानता है जो विभाग होने पर व्यंजित होता है । मिताक्षरा पूर्वजों की संपत्ति में पिता और पुत्र का समा- नाधिकार मानती है अतः पुत्र पिता के जीते हुए भी जब चाहे पैतृक संपत्ति में हिस्सा बँटा सकते हैं और पिता पुत्रों की सम्मति के बिना पैतृक संपत्ति के किसी अंश का दान, विक्रय आदि नहीं कर सकता । पिता के मरने पर पुत्र जो पैतृक संपत्ति का अधिकारी होता है वह हिस्सेदार के रूप में हाता है, उत्तराधिकारी के रूप में नहीं । मिताक्षरा पुत्र का उत्त- राधिकार केवल पिता की निज की पैदा की हुई संपत्ति में मानती है । दायभाग पूर्वपस्वामी के स्वत्वविनाश (मृत, पतित या संन्यासी होने के कारण) के उपरांत उत्तराधिकारियों के स्वत्व की उत्पत्ति मानता है । उसके अनुसार जब तक पीता जीवित है तब तक पैतृक संपत्ति पर उसका पूर अधिकार है; वह उसे जो चाहे सो कर सकता है । पुत्रों के स्वत्व की उत्पत्ति पिता के मरने आदि पर ही होती है । यद्यपि याज्ञवल्क्य के इस श्लोक में 'भूर्या पितामहोपात्ता' निबंधी द्रव्यमेव वा । तत्र स्यात् सदृशं स्वाम्यं पितुः पुत्रस्य चोभचोः पिता पुत्र का समान अधिकार स्पष्ट कहा गया है तथापि जीमूतवाहनने इस श्लोक से खींच तानकर यह भाव निकाला है कि पुत्रों के स्वत्व की उत्पत्ति उनके जन्मकाल से नहीं, वल्कि पिता के मृत्युकाल से होती है । मिताक्षरा और दायभाग के अनुसार जिस क्रम से उत्तराधिकारी होते हैं वह नीचे दिया जाता हैः मिताक्षरा दायभाग १. पुत्र १. पुत्र २. पौत्र २. पौत्र ३. प्रपौत्र ३. प्रपौत्र ४. विधवा ४ विधवा ५. अविवाहिता कन्या ५अविवाहिता कन्या ६. विवाहिता अपुत्रवती निर्धन कन्या ६. विवाहिता पुत्रविती कन्या ७. विवाहिता पुत्रवती संपन्न कन्या ७. नाती (कन्या का पुत्र) ८. नाती (कन्या का पुत्र) ८. पिता ९. माता९. माता १०. पिता १०. भाई ११. भाई ११. भतीजा १२. भतीजा १२. भतीजा का लड़का १३. दादी १३. बहन का लड़का १४. दादा १४. दादा १५. चाचा १५. दादी १६. चचेरा भाई १६. चाचा १७. परदादी १७. चचेरा भाई १८. परदादा १८. चचेरे भाई का लड़का १९. दाद का भाई १९. दादा की लड़की का लड़का २०. दादा के भाई का लड़का २० पंरदादा २१. परदादा के ऊपर तीन पीढ़ी के और पूर्वज २१. परदादी २२. और सपिंड २२. दादा का भाई २३. समानोदक २३. दादा के भाई का लड़का २४. बंधु २४. दादा के भाई का पोता २५. आचार्य २५. परदादा की लड़की का लड़का २६. शिष्य २६. नाना २७. सहपाठी या गुरुरमाई २७. मामा २८. राजा (यदि संपत्ति ब्राह्मण की न हो । ब्राह्मण की हो तो उसकी जाती में जाय) । २८. मामा का लड़का २९. मामा का पोता ३०. मौसी का लड़का ३१. सकुल्य ३२. समानोदक ३३. और बंधु ३४. आचार्य इत्यादि, इत्यादि । उपर जो क्रम दिया गया है उसे देखने से पता लगेगा कि मिताक्षरा माता का स्वत्व पहले करती है और दायभाग पिता का । याज्ञवल्क्य का श्लोक है— पत्नी दुहितरश्यौव पितरौ भ्रातरस्तथा । तत्सुता गोत्रजा बंधुः शिष्यः सब्रह्मचारिणः । । इस श्लोक के 'पितरौ' शब्द को लेकर मिताक्षरा कहती है कि 'माता पिती' इस समास में माता शब्द पहले आता है और माता का संबंध भी अधिक घनिष्ठ है, इससे माता का स्वत्व पहले है । जीमूतवाहन कहता है कि 'पितरौ' शब्द ही पिता की प्रधानता का बोधक है इससे पहले पिता का स्वत्व है । मिथिला, काशी और बंबई प्रांत में माता का स्वत्व पहले और बंगाल, मदरास तथा गुजरात में पिता का स्वत्व पहले माना जाता है । मिताक्षरा दायाधिकार में केवल संबंध निमित्त मानती है और दायभाग पिंडोदक क्रिया । मिताक्षरा 'पिंड' शब्द का अर्थ शरीर करके सपिंड से सात पीढ़ियों के भीतर एक ही कुल का प्राणी ग्रहण करती है, पर दायभाग इसका एक ही पिंड से संबद्ध अर्थ करके नाती, नाना, मामा इत्यादि को भी ले लेता है । मिताक्षरा और दायभाग के बीच मुख्य मुख्य बातों का भेद नीचे दिखाया जाता हैः (१) मिताक्षरा के अनुसार पैतृक (पूर्वजों के) धन पर पुत्रादि का सामान्य स्वत्व उनके जन्म ही के साथ उत्पन्न हो जाता है, पर दायभाग पूर्वस्वामी के स्वत्वविनाश के उपरांत उत्तराधिकारियों के स्वत्व की उत्पत्ति मानता है । (२)मिताक्षरा के अनुसार विभाग (बाँट) के पहले प्रत्येक सम्मिलित प्राणी (पिता, पुत्र, भ्राता इत्यादि) का सामान्य स्वत्व सारी संपत्ति पर होता है, चाहे वह अंश बाँट न होने के कारण अव्यक्त या अनिश्चित हो । (३)मिताक्षरा के अनुसार कोई हिस्सेदार कुटुंब संपत्ति को अपने निज के काम के लिये बै या रेहन नहीं कर सकता पर दायभाग के अनुसार वह अपने अनिश्चित अंश को बँटवारे के पहले भी बेच सकता है । (४) मिताक्षरा के अनुसार जो धन कई प्राणियों का सामान्य धन हो, उसके किसी देश या अंश में किसी एक स्वामी के पृथक् स्वत्व का स्थापन विभाग (बटवारा) है । दायभाग के अनुसार विभाग पृथक् स्वत्व का व्यंजन मात्र है । (५) मिताक्षरा के अनुसार पुत्र पिता से पैतृक संपत्ति को बाँट देने के लिये कह सकता है, पर दायभगा के अनुसार पुत्र को ऐसा अधिकार नहीं है । (६)मिताक्षरा के अनुसार स्त्री अपने मृत पति की उत्तराधिका- रिणी तभी हो सकती है जब उसका पति भाई आदि कुटुंबियों से अलग हो । पर दायभाग में, चाहे पति अलग हो या शामिल, स्त्री उत्तराधिकारिणी होती है । (७) दायभाग के अनुसार कन्या यदि विधवा, वंध्या या अपुत्रवती हो तो वह उत्तराधिकारिणी नहीं हो सकती । मिताक्षरा में ऐसा प्रतिबंध नहीं है ।याज्ञवल्क्य, नारद आदि के अनुसार पैतृक धन का विभाग इन अवसरों पर होना चाहिए— पिता जब चाहे तब, माता की रजोनिवृत्ति और पिता की विषयनिवृति होने पर, पिता के मृत, पतित या संन्यासी होने पर ।

दायम
क्रि० वि० [अ०] हमेशा । निरंतर । सदा । जन्म भर । उ०— बैठे दिन भरते हैं, दायम दरबार तेरे गैर महल डरते हैं ।— दादू०, पृ० ६८५ ।

दायमी
वि० [अ० दायम + हिं० ई (प्रत्य०)] नित्य रहनेवाला । स्थायी । जो सदा के लिये हो । उ०— खत न पत्तर गलबन् उनकी बिदाई दायमी साबित हो ।— प्रेम० और गोर्की, पृ० ३ ।

दायमुलहब्स
संज्ञा पुं० [अ०] जीवन भर के लिये कैद । कालेपानी की सजा । डामिल ।

दायर
वि० [फा़०] १. फिरता हुआ । चलता हुआ । २. चलता । जारी । मुहा०—दायर करना = मामले मुकदमे वगैरह को चलाने के लिये पेश करना । (व्यवहार या अभियोग) उपस्थित करना । जैसे, मुकदमा दायर करना, नालिश या अपील दायर करना । दायर होना = पेश होना । उपस्थित किया जाना । जैसे, मुकदमा दायर होना ।

दायरा
संज्ञा पुं० [अ० दायरहू] १. गोल घेरा । कुंडल । मंडल । २. वृत्त । ३. कक्षा । ४. मंडली । ५. खंजड़ी । ६. डफली ।

दायाँ
वि० [हिं० दाहिना का संक्षिप्त रूप, बायाँ के अनुकरण पर] दाहिना । मुहा०—दायाँ बोलना = तीतर का दाहिने हाथ की ओर बोलना जो चोरों के लिये अच्छा शकुन समझा जाता है ।

दाया पु (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० दया] दे० 'दया' । उ०— कामरूप जानहि सब माया । सपनेहु जिनके धर्म न दाया ।—तुलसी (शब्द०) ।

दाया (२)
संज्ञा स्त्री० [फा़०] दे० 'दाई' । यौ०—दायागरी ।

दायागत (१)
वि० [सं०] बाँट बखरे में आया हुआ । मौरूसी हिस्से में पड़ा हुआ ।

दायागत (२)
संज्ञा पुं० [सं०] पंद्रह प्रकार के दासों में से एक । वह दास जो दाय के रूप में प्राप्त हुआ हो । वह गुलाम जो वरासत में और चीजों के साथ मिला हो । दे० 'दास' ।

दायागरी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] दाई का पेशा या काम ।

दायाद (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० दायादा] जिसे दाय मिले । जो दाय का अधिकारी हो । जिसे संबंध के कारण किसी की जायदाद में हिस्सा मिले ।

दायाद (२)
संज्ञा पुं० १. दाय पाने का अधिकारी मनुष्य । वह जिसका संबंध के कारण किसी की जायदाद में हिस्सा हो । हिस्सेदार । २. पुत्र । बेटा । ३. सपिंड । कुटुंबी ।

दायादा
संज्ञा स्त्री० [सं०] कन्या ।

दायादी
संज्ञा स्त्री० [सं०] कन्या ।

दायाद्य
संज्ञा पुं० [सं०] दाय । वह चल अथवा अचल संपत्ति जिसपर सपिंड बंधु बांधवों का अधिकार हो [को०] ।

दायाधिकारी
संज्ञा पुं० [सं० दाय + अधिकारिन्] उत्तराधिकारी । वारिस ।

दायापवर्तन
संज्ञा पुं० [सं०] किसी जायदाद में मिलनेवाले हिस्से की जब्ती ।

दायित
वि० [सं०] दिया हुआ । दान किया हुआ ।

दायित्व
संज्ञा पुं० [सं०] १. देनदार होने का भाव । २. जिम्मेदारी । जवाबदेही ।

दायिनी
वि० स्त्री० [सं०] देनेवाली ।

दायी
वि० [सं० दायिन्] [वि० स्त्री० दायिनी] देनेवाला । दाता । विशेष— इस शब्द का प्रयोग अलग कम होता है, समास में उपपद के रूप में होता है । जैसे, शांतिदायी, सुखदायी, कष्टदायी, वरदायी ।

दायेँ
क्रि० वि० [हिं० दायाँ] दाहिनी और को । मुहा०—दायें होना = अनुकूल या प्रसन्न होना ।

दायोपगतदास
संज्ञा पुं० [सं०] वह दास जो वरासत में मिला हो ।

दार (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्त्री । पत्नी । भार्या । यौ०—दारकर्म । दारग्रहण । दारपरिग्रह । विशेष— संस्कृत में यद्यपि यह शब्द पुं० है तथापि हिंदी में स्त्री० ही होता है ।

दार पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० दारु] दे० 'दारु' । उ०— तिलनि माँहि ज्यौं तेल है सुंदर पय मैं घीव । दार माँहि है अग्नि ज्यौं देह माँहि यौं सीव ।— सुंदर ग्रं०, भा० २, पृ० ७८१ ।

दार (३)
संज्ञा स्त्री० [फा़०] सूली । उ०— चढ़ा दार पर जब शेख मंसूर ।— कबूर मं०, पृ० ६०६ ।

दार (४)
संज्ञा स्त्री० [हिं० दाल] दे० 'दाल' । उ०— (क) मूँग दार बिनु बक्कल साजी । केसरि सहित प्रीत रँग राजी ।— रसरतन, पृ० २८८ । (ख) चींटी चावल लै चली, बिंच में मिलि गइ दार ।— कबीर सा०, पृ० ८३ ।

दार (५)
प्रत्य० [फा़०] रखनेवाला । वाला । जैसे,— मालदार, दूकानदार ।

दारक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० दारिका] १. लौंडा । लड़का । उ०— इक कुमार पुनि मुनिन सँग रहियहि रस की बात । सिख्यो कहाँ ऋषि तियन पहँ की दरक ढिग तात ।—विश्राम (शब्द०) । २. पुत्र । बेटा । ३. शावक । छौना (को०) । ४. ग्रामसूकर । सुअर (को०) ।

दारक (२)
वि० [सं०] विदीर्ण करनेवाला । फाड़नेवाला ।

दारकर्म
संज्ञा पुं० [सं० दारकर्मन्] भार्याग्रहण । विवाह ।

दारक्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दारकर्म' [को०] ।

दारग्रहण
संज्ञा पुं० [सं०] विवाह । शादी [को०] ।

दारचीनी
संज्ञा स्त्री० [सं० दारु + चीन] १. एक प्रकार का तज जो दक्षिण भारत, सिंहल और टेनासरिम में होता है । विशेष— सिंहल में ये पेड़ सुगंधितद छाल के लिये बहुत लगाएजाते हैं । भारतवर्ष में यह जंगलों में ही मिलता है और लगाया भी जाता है तो बगीचों में शोभा के लिये । कोंकण से लेकर बराबर दक्षिण की ओर इसके पेड़ मिलते हैं । जँगलों में तो इसके पेड़ बडे़ बडे़ मिलते हैं पर लगाए हुए पेड़ झाड़ के रूप में होते हैं । पत्ते इसके तेजपत्ते ही की तरह के, पर उससे चौडे़ होते हैं और उनमें बीचवाली खड़ी नस के समानांतर कई खड़ी नसें होती हैं । इसके फूल छोटे छोटे होते हैं और गुच्छो में लगते हैं । फूल के नीचे की दिउली छह फाँकों की होती है । सिंहल में जो दारचीनी के पेड़ लगाए जाते हैं उनके लगाने और दारचीनी निकालने की रीति यह है । कुछ कुछ रेतीली करैल मिट्टी में ४-५ हाथ के अंतर पर इसके बीज बोए जाते या कलम लगाए जाते हैं । बोए हुए बीजों या लगाए हुए कलमों को धूप से बचाने के लिये पेड़ की डालियाँ आस पास गाड़ दी जाती हैं । ६. वर्ष में जब पेड़ ४ या ५ हाथ ऊँचा हो जाता है तब उसकी डालियाँ छिलका उतारने के लिये काटी जाती हैं । डालियों में छूरी से हलका चीरा लगा दिया जाता है जिसमें छाल जल्दी उचट आवे । कभी कभी डालियों को छुरी के बेंट आदि से थोड़ा रगड़ भी देते हैं । इस प्रकार अलग किए हुए छाल के टुकड़ों को इकट्ठा करके दबा दबाकर छोटे छोटे पूलों में बाँधकर रख देते हैं । वे पूले दो या एक दिन यों ही पडे़ रहते हैं, फिर छालों में एक प्रकार का हलका खमीर सा उठता है जिसकी सहायता से छाल के ऊपर की झिल्ली और नीचे लगा हुआ गूदा टेढ़ी छुरी से हटा दिया जाता है । अंत में छाल को दो दिन छाया में सुखाकर फिर धुप, दिखाकर रख देते हैं । दारचीनी दो प्रकार की होती है— दारचीनी जीलानी और दारचीनी कपूरी । ऊपर जिस पेड़ का विवरण दिया गया है वह दारचीनी जीलानी है । दारचीनी कपूरी की छाल में बहुत अधिक सुगंध होती है और उससे बहुत अच्छा कपूर निकलता है । इसके पेड़ चीन, जापान, कोचीन और फारमोसा द्वीप में होते हैं और हिंदुस्तान में भी देरहादूल, नीलगिरि आदि स्थानों में लगाए गए हैं । भारतवर्ष, अरब आदि देशों में पहले इसी पेड़ की सुगंधित छाल चीन से आती थी, इसी से उसे दारु + चीनी कहने लगे । हिंदुस्तान में कई पेड़ों की छाल दारचीनी के नाम से बिकती है । अमिलतास की जाति का एक पेड़ होता है जिसकी छाल भी व्यापारी दारचीनी के नाम से बेचते हैं पर वह असली दारचीनी नहीं है । असली दारचीनी आजकल अधिकतर सिंहल से ही आती है । दक्षिण में दारचीनी के पेड़ को भी लवंग कहते हैं यद्यपि लवंग का पेड़ भिन्न है और जामुन की जाति का है । तज और दारचीनी के वृक्ष यद्यपि भिन्न होते हैं तथापि एक ही जाति के हैं । दारचीनी से एक प्रकार का तेल भी निकलता है जो दवा के लिये बाहर बहुत जाता है । २. ऊपर लिखे पेड़ की सुगंधित छाल जो दवा और मसाले के काम में आती है ।

दारण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० दारित] १. चीरने या फाड़ने का काम । चीर फाड़ । विदीर्ण करने की क्रिया । २. चीरने फाड़ने का अस्त्र या औजार । ३. फोड़ा आदि चीरने का काम । ४. वह औषध जिसके लगाने से फोड़ा आपसे आप फूट जाय । विशेष— सुश्रुत में चिलबिल, दंती, चित्रक, कबूतर, गीध आदि की बीट तथा क्षार को दारण औषध कहा है । ५. निर्मली का पौधा ।

दारण † (२)
वि० [सं० दारुण] दे० 'दारुण' । उ०— दारुण कमाँ लूँबिया दोला । आनै लिया दिवालाँ औला ।— रा० रू०, पृ० २५३ ।

दारणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दुर्गा [को०] ।

दारद
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का विष जो दरद देश में होता है । उ०— जाहि जोहि मारद भई मरी परी दुख फंद । ताहि सुधाधर क्यों कहैं दारद भाद चंद ।— स० सप्तक, पृ० २६० । २. पारा । ३. ईंगुर । ४. सागर । समूद्र (को०) ।

दारन पु
वि० [सं० दारुण] दे० 'दारुण' । उ०— पतन कौ कारन लगे बिचारन । प्रबल पवन नहीं नहीं बड़ दारन ।— नंद० ग्रं०, पृ० २५४ ।

दारना पु
क्रि० स० [सं० दारण] १. फाड़ना । विदीर्ण करना । २. नष्ट करना । ध्वस्त करना ।

दारपिरग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] स्त्री का ग्रहण । पाणिग्रहण । विवाह ।

दारबलिभुक्
संज्ञा पुं० [सं० दारबलिभुज्] वक । बगुला पक्षी [को०] ।

दारमदार
संज्ञा पुं० [फा़०] १. आश्रय । ठहराव । २. कार्य का भार । किसी कार्य का किसी पर अवलंबित रहना । जैसे,— इस काम का दारमदार तुम्हारे ऊपर है ।

दारव
वि० [सं०] १. दारु अर्थात् लकड़ी का । लकड़ी का बना हुआ । २. काष्ठ संबंधी ।

दारसंग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] भार्याग्रहण । विवाह ।

दारा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० दारा] स्त्री । पत्नी । भार्या । विशेष— सं० 'दार' शब्द नित्य बहुवचनांत है, अतः उसका प्रथमा का रूप 'दाराः' होता है पर हिंदी में 'दारा' रूप ही स्त्रीलिंग में व्यवहृत होता है ।

दारा (२)
संज्ञा पुं० [?] किनारा (लश०) ।

दारा (३)
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की भारी मछली जो हिंदुस्तान में समुद्र के किनारे पाई जाती है । यह लंबाई में तीन हाथ और तौल में दस ग्यारह सेर होती है ।

दारा (४)
संज्ञा पुं० [फा़०] १. विश्व का नियंता । ईश्वर । २. राजा । नरेश । ३. धनी । मालदार । ४. ईरान का एक बादशाह [को०] ।

दाराई
संज्ञा स्त्री० [फा़०] एक प्रकार का रेशमी कपड़ा जो ग्वारनट की तरह का होता है । दरियाई ।

दाराचार्य
संज्ञा पुं० [सं०दार + आचार्य] पढ़ानेवाला । अध्यापन करनेवाला [को०] ।

दारि पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० दालि] दे० 'दाल' । उ०— दारि गली है भली विधि सों अरु चाउर हैगो सुगंध भरो जू ।— सेवक (शब्द०) ।

दारि (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] विदारण । कर्तन । छेदन [को०] ।

दारि (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० दारिका] दे० 'दारी (२)' । उ०— चंचल सरस एक काहू पै न रहै दारि ।— भूषण ग्रं०, पृ० १२३ ।

दारिउँ
संज्ञा पुं० [सं० दाड़िम] दे० 'दाड़िम' । उ०— बिहँसत हँसत दसन तस चमकै पाहन छर्कि । दारिउँ सरि जो न कइ सका फाट्यो हिया दर्कि ।— जायसी (शब्द०) ।

दारिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बालिका । २. बेटी । पुत्री । कन्या । उ०—ए दारिका परिचारिका करि पालिबी करुनामई ।— तुलसी (शब्द०) ।

दारिगह पु
संज्ञा पुं० [फा़० दरगाह] दे० 'दरगाह' । उ०— दारि- गह वारिगह निमाजगह षोआरगह ।— कीर्ति०, पृ० ५० ।

दारित
वि० [सं०] चीरा या फाड़ा हुआ । विदीर्ण किया हुआ ।

दारिद पु
संज्ञा पुं० [सं० दारिद्रय] दरिद्रता । निर्धनता । उ०— देखत दुख दोख दुरित दाह दारिद दरनि ।— तुलसी (शब्द०) ।

दारिद्र पु
संज्ञा पुं० [सं० दारिद्रय] दे० 'दारिद्रय' ।

दारिद्रय
संज्ञा पुं० [सं०] दरिद्रता । निर्धनता । गरीबी ।

दारिम पु †
संज्ञा पुं० [सं० दाड़िम] दे० 'दाड़िम' । उ०— लसति जु हँसति दसन की जोती । को है दारिम को है मोती ।— नंद० ग्रं०, पृ० १२३ ।

दारिवँ पु
संज्ञा पुं० [सं० दाडिम] दे० 'दाड़म' । उ०— अधर दसन पर नासिक सोभा । दारिवँ देखि सुआ मन लोभा ।— पदमावत, पृ० १०२ ।

दारी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक क्षुद्र रोग, जिसमें पैर के तलवे का चमड़ा कड़ा हो जाता है और चिड़ चिड़ाकर जगह जगह फट जाता है । बेवाई । खरुवा । विशेष— भावप्रकाश में लिखा है कि जो लोग पैदल अधिक चलते हैं उनकी वायु कुपित होकर सूखी हो जाती है, जिससे चमड़ा कड़ा होकर फट जाता है ।

दारी (२)
संज्ञा पुं० [सं० दारिन्] वह पति जिसे कई पत्नियाँ हों । पति (को०) ।

दारी (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० दारिका] दासी । लौंडी । वह लौंडी जिसे लड़ाई में जीतकर लाया गया हो । कुलटा । यौ०—दारीजार ।

दारीजार
संज्ञा पुं० [हिं० दारी + सं० जार] १. लौंड़ी का पति । (गाली) । विशेष—राजा लोग कभी कभी कोई लौंड़ी रख लिया करते थे । जूब उससे अप्रसन्न होते थे तब उसे किसी मनुष्य को दे देते थे और उसके गुजारे के लिये कुछ जागीर दे देते थे । वह मनुष्य उस लौंड़ी का पति बनता था इसी से वह 'दारीजार कहलाताथा । उनसे जो संतान होती थी वह 'दारीजात' कहलती थी । कुछ लोगों का अनुमान है कि 'दारीजार' ही से बिगड़कर 'डाढ़ीजार' शब्द बना है । पर यह अनुमान ठीक नही जँचता । २. दासीपुत्र । लौंड़ीजादा । गुलाम ।

दारु (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. काष्ठ । काठ । लकड़ी । उ०— प्रिय लगिहि अति सबहि मम भनिति राम जस संग । दारु विचारु कि करइ कोउ बंदिय मलय प्रसंग ।—मानस, १ । १० । यौ०—दारुकर्म = दे० 'दारुकृत्य' । दारुकृत्य = लकड़ी का काम । दारुगंधा = विरोजा । दारुगर्भा = कठपुतली । दारुचीनी । दारुपात्र । दारुपुत्रिका । दारुयोषित । दारुवधू । २. देवदारु का वृक्ष । ३. बढ़ई । कारीगर । शिल्पी । ४. पीतल । ५. दानशील व्यक्ति । दाता (को०) ।

दारु (२)
वि० १. दानशील । देनेवाला । २. खंडनशील । टूटने फूटनेवाला । ३. काटनेवाला । विदारण करनेवाला (को०) ।

दारुक
संज्ञा पुं० [सं०] १. देवदारु । २. श्रीकृष्ण के सारथी का नाम । विशेष— ये बड़े कृष्णभक्त थे । सुभद्राहरण के समय इन्होंने अर्जुन से कहा था कि मुझे बाँधकर तब आप सुभद्रा को रथ पर ले जाइए; मैं यादवों के विरुद्ध रथ नहीं हाँक सकता । कृष्ण के स्वर्गवास का समाचार अर्जुन को इन्हों ने दिया था । ३. काठ का पुतला । ४. योगाचार्य जो शिव के अवतार कहे जाते हैं ।— भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ४४७ ।

दारुकदली
संज्ञा स्त्री० [सं०] जंगली कैला । कठकेला ।

दारुका
संज्ञा स्त्री० [सं०] कठपुतली ।

दारुकावन
संज्ञा पुं० [सं०] एक वन का नाम जो पवित्र तीर्थ माना जाता है ।

दारुगंधा
संज्ञा स्त्री० [सं० दारुगन्धा] बिरोजा जो चीड़ से निकलता है ।

दारुचीनी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'दारचीनी' ।

दारुज (१)
वि० [सं०] १ काष्ठ से उत्पन्न । लकड़ी में पैदा होनेवाला । जैसे, दारुज कीट । २. काष्ठनिर्मित । लकड़ी का बना हुआ ।

दारुज (२)
संज्ञा पुं० एक प्रकार का बाजा । मर्दल ।

दारुजोषित पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दारुयोषित] दे० 'दारुयोषित' । उ०— उमा दारुजोषित की नाईं । सबहि नचावत राम गोसाई ।— मानस, ४ । ११ ।

दारुण (१)
वि० [सं०] १. भयंकर । भीषण । घोर । २. कठिन । प्रचंड । विकट । दुःसह । उ०— जा कहँ बिधि दारुण दुख दीन्हा । ताकर मति आगे हर लीन्हा । —तुलसी (शब्द०) । ३. विदारक । फाड़नेवाला । ३. निर्दय । क्रूर (को०) । ४. तीक्ष्ण । तीव्र । तीखा (को०) ।

दारुण (२)
संज्ञा पुं० १. चित्रक वृक्ष । चीते का पेड़ । २. भयानक रस । ३. रौद्र नामक नक्षत्र । ४. विष्णु । ५. शिव । ६. एक नरकका नाम । उ०— आठवाँ दारुण नरक है जेहि देखत भय होश ।— विश्राम (शब्द०) । ७. राक्षस ।

दारुणक
संज्ञा पुं० [सं०] सिर में होनेवाल एक क्षुद्र रोग विसमें चमड़ा रूखा होकर सफेद भूसी की तरह छूटता है । रुसी ।

दारुणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. नर्मदाखंड की अधिष्ठात्री देबी । २. अक्षय तृतीया ।

दारुणारि
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु ।

दारुन पु
वि० [सं० दारुन] दे० 'दारुण' ।

दरुनटी
संज्ञा स्त्री० [सं०] कठपुतली ।

दारुनारी
संज्ञा स्त्री० [सं०] कठपुतली ।

दारुनि †
वि० स्त्री० [सं० दारुण] कठोर । निर्दय । उ०— (क) सासु ननदिया दारुनि, उत्तर जनि देहू हो ।— धरम०, पृ० ४७ । (ख) घर मोरी सासु दारुनि, तो ननद हठीली हो ।— धरम०, पृ० ६४ ।

दारुनिशा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दारुहलदी ।

दारुपत्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] हिंगुपत्री ।

दारुपात्र
संज्ञा पुं० [सं०] काष्ठपात्र । काठ का बरतन । विशेष— मनु ने यतियों को अलावुपात्र (तुमड़ी) और दारुपात्र रखने का विधान किया है ।

दारुपीता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दारुहलदी ।

दारुपित्रिका, दारुपुत्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] कठपुतली ।

दारुफल
संज्ञा पुं० [सं०] पिस्ता ।

दारुमय
वि० [सं०] [वि० स्त्री० दारुमयी] काठ का । काठ का बना हुआ ।

दारुमुच
संज्ञा पुं० [सं०] एक स्थावर विष का नाम ।

दारुमूषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक ओषधि का नाम ।

दारुयोषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दारुयोषित' [को०] ।

दारुयोषित
संज्ञा स्त्री० [सं० दारुयोषित्] कठपुतली ।

दारुयोषिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दारुयोषित' ।

दारुवधू
संज्ञा स्त्री० [सं०] काठ की गुड़िया । कठपुतली [को०] ।

दारुसार
संज्ञा पुं० [सं०] चंदन [को०] ।

दारुसिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दारचीनी ।

दारुहरिद्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दारुहलदी ।

दारुहलदी
संज्ञा स्त्री० [सं० दारुहरिद्रा] आल की जाति का एक मदाबहार झाड़ । विशेष— यह हिमालय के पूर्वी भाग से लेकर आसाम, पूरबी बंगाल और टनासरिम तक होता है । इसमें सफेद फूल गुच्छों में लगते हैं । इसकी जड़ की छाल से बहुत अच्छा पीला रंग निकलता है जिसका व्यवहार दार्जिलिंग, आसाम् आदि के लोग बहुत अधिक करते हैं । इकी जड़ और ड़ंठल का रंग पीला होता है, इसी से इस पौधे को दारुहलदी कहते हैं । वास्तव में यह हलदी की जाति का नहीं है । दारुहलदी के नाम से उसकी जड़ और डंठल के टुकड़े बाजार में बिकते हैं । जड़ गाँठ के रूप में नहीं होती । दारुहलदी दवा के काम में भी आती है । वैद्यक में यह कड़ई, चरपरी, गरम तथा व्रण, प्रमेह, खुजली, चर्मरोग इत्यादि को दूर करनेवाली मानी जाती है । पर्या०—दार्वी । दारुहरिद्रा । द्वितीयाभा । कपोतक । पीतद्रु । कलियक । पचंपदा । पर्जनी । काष्ठा । मर्मरी । पीतिका । पीतदारु । कामिनी । कंटकटेरी । पर्जन्या । पीता । दारुनिशा । कामवती । हेमकांती । निर्दिष्टा ।

दारुहस्त, दारुहस्तक
संज्ञा पुं० [सं०] काठ की करछुल [को०] ।

दारू
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. दवा । औषध । यौ०— दावा दारू । दारू दरमन = चिकित्सा । इलाज । २. मद्य । शराब । ३. बारूद ।

दारूकार
संज्ञा पुं० [फा़० दारू + हिं० कार] शराब बनानेवाला । कलवार ।

दारूड़ा †
संज्ञा पुं० [फा़० दारू + हिं० ड़ा (प्रत्य०)] [स्त्री० दारूड़ी] शराब । मद्य ।

दारैषणा
संज्ञा स्त्री० [सं० दाररा + एषणा] नारी की कामना । जैसे,— लोकैषणा, वित्तैषणा, दारैषणा ।

दारो पु
संज्ञा पुं० [सं० दाडिम, हिं० दारिम, दारिंव, दारिउँ, दारयों] दे० 'दारयों' ।

दारोगा
संज्ञा पुं० [फा़० दारोगह्] १. निगरानी रखनेवाला अफसर । देखभाल रखनेवाला या प्रबंध करनेवाला व्यक्ति । जैसे, दारोगा जैल, दारोगा चुंगी, दारोगा अस्तबल । २. पुलिस का वह अफसर जो किसी थाने पर अधिकारी हो । थानेदार ।

दारोगाई
संज्ञा स्त्री० [फा़० दारोगा] दारोगा का काम या पद ।

दाढर्य
संज्ञा पुं० [सं०] दृढ़ता ।

दार्दुर
वि० [सं०] दर्दुर संबंधी ।

दार्दुर
संज्ञा पुं० १. दक्षिणावर्त शंख का एक भेद । २. जल । पानी (को०) । ३. लाक्षा । लाख (को०) ।

दार्दुरक
वि० [सं०] मेढक संबंधी [को०] ।

दार्दुरिक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] कुम्हार ।

दार्दुरिक (२)
वि० [सं०] दादूर या मेढक संबंधी । मेढक की भाँति । उ०— भगवदीय अंतरंगता के कारण दार्दुरिक असती जिह्वा को रसना और वर्हायित नेत्रों को लोचन बनाने में छीत स्वामी को देर नीहं लगी ।— छीत० (भू०), पृ० १९ ।

दार्भ
वि० [सं०] दर्भ का । कुश या दर्भ संबंधी ।

दारयोँ पु
संज्ञा पुं० [सं० दाडिम] अनार । उ०— नासिका सरोज गंधवाह से सुगंधवाह दारयों से दरसब कैसो बीजुरी सो हास है ।— केशव (शब्द०) ।

दार्वड
संज्ञा पुं० [सं० दार्वण्ड] [स्त्री० दार्वडी] वह जिसका अंडा काठ की तरह कड़ा होता है— मयूर । मोर ।

दार्व
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रदेश का नाम जो कूर्म विभाग के ईखानकोण में आधुनिक काश्मीर के अंतर्गत पड़ता था ।

दार्व (२)
वि० काष्ठनिर्मित । दारुनिर्मित [को०] ।

दार्वट
संज्ञा पुं० [सं०] मंत्रणागृह । दार्वाट [को०] ।

दार्वाघाट
संज्ञा पुं० [सं०] काठ पर आघात करनेवाला कठफोड़वा नाम का पक्षी ।

दार्वाघात
संज्ञा पुं० [सं०] कठफोड़वा पक्षी [को०] ।

दार्वाट
संज्ञा पुं० [सं० तुल० फा़० 'दारबार' से] मंत्रणागृह । वह कोठरी जहाँ एकांत में बैटकर किसी बात का विचार किया जाय ।

दार्विका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दारुहलदी से निकाला हुआ तूतिया । २. बनगोभी । गोजिया ।

दार्विपत्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] गोजिह्वा [को०] ।

दार्वी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दारुहलदी । २. गोजिह्वा । दार्विका (को०) । ३. हरिद्रा । हलदी (को०) । ४. देवदार वृक्ष (को०) । यौ० —दार्वीक्वायोदभव = रसांजन ।

दार्श
वि० [सं०] दर्श संबंधी । अमावस्या को होनेवाला [को०] ।

दार्शनिक (१)
वि० [सं०] १. दर्शन जानननेवाला । २. दर्शन शास्त्र संबंधी ।

दार्शनिक (२)
संज्ञा पुं० दर्शनशास्त्र जाननेवाला मनष्य । तत्वज्ञानी । तत्ववेत्ता ।

दार्षद
वि० [सं०] १. पत्थर पर पीसा हुआ । २. दृषद संबंधी । पाषाणमय । ३. खनिज [को०] ।

दार्षद्वत
संज्ञा पुं० [सं०] कत्यायन श्रौतसूत्र के अनुसार एक यज्ञ जो दृषद्वती नदी के किनारे किया जाता था ।

दार्ष्टांत
वि० [सं० दाष्टन्ति] दे० 'दार्ष्टांतिक' ।

दार्ष्टंतिक
वि० [सं० दार्ष्टान्तिक] दृष्टांत संबंधी । दृष्टांत द्वारा व्यक्त ।

दाल (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० दालि अथवा दल] १. दलों में किया हुआ अरहर, मूँग, उरद, चना, मसूर आदि अन्न जो उबालकर खाया जाता है । दली हुई अरहर, मूँग आदि जो सालन की तरह खाई जाती है । जैसे,— मूँग की दाल क्या भाव है? क्रि० प्र०—दलना । यौ०—दालमोठ । विशेष— दाल टन्हीं अनाजों की होती है जिनमें फलियाँ लगती हैं जौर जिनके बीज दबाने से टूटकर दो दलों या खंडो में हो जाते हैं । जैसे, अरहर, मूँग, उरद, चना, मसूर, मटर । २. हलदी, मसाले के साथ पानी में उबाला हुआ दला अन्न जो रोटी, भात आदि के साथ खाया जाता है । मुहा०— दाल गलना = दाल का अच्छी तरह पककर नरम हो जाना । दाल का सीझना । (किसी की) दाल गलना = (किसी का) प्रयोजन सिद्ध होना । मतलब निकलना । कार्य- सिद्धि के लिये किसी युक्ति का चलना । विशेष— हम मुहा० का प्रयोग निषेधात्मक वाक्य में ही अधिकतर होता है जैसे, वहाँ तुम्हारी दाल नहीं गलेगी, बड़े बड़े उस्ताद हैं । दाल चपाती =(१) दाल रोटी । (२) बच्चों को डराने का एक नाम । दालचप्पू होना = एक दूसरे से लिपटकर एक हो जाना । गुत्थमगुत्था होना । जैसे, दो पतंगों का दालचप्पू होना । दाल दलिया = सूखा रूखा भोजन । गरीबों का सा खाना । दाल भात में मूसर होना = दो के मध्य में अनावश्यक, अप्रिय और अनिच्छित रूप में दखल देना । उ०— एकांत बिहार में यह दाल भात में मूसर कहाँ से आ गाई?— प्रेमघन०, भा० २, पृ० ४३५ । दाल में कुछ काला होना = कुछ खटके या संदेह की बात होना । कुछ बुरा रहस्य होना । किसी बुरी बात का लक्षण दिखाई पड़ना । दाल में नोन = किसी प्रमुख वस्तु में किसी दूसरी वस्तु का उतना ही मेल मिलाना जिससे स्वाद में वृद्धि हो जाय । मात्रानुकूल । ठीक अनुमान । उ०— उतना ही, जितना दाल में नोन पड़ सकता है ।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० २८८ । दाल रोटी = सादा खाना । सामान्य भोजन । आहार । दाल रोटी चलना = खाना मिलना । जीविका निर्वाह होना । दाल रोटी से खुश = खाने पीने से सुखी । खाता पीता । जिसे न अधिक धन हो न खाने पीने का कष्ट हो । जूतियों दाल चँटना = खूब लड़ाई झगड़ा होना । गहरी अनबन होना । आपस में न पटना । ३. दाल के आकार की कोई वस्तु । ४. चेचक, फोडे़, फुंसी आदि के ऊपर का चमड़ा जो सूखकर छूट जाता है । खुरंड । पपड़ी । मुहा०— दाल छूटना = खुरंड अलग होना । दाल बंधना = खुरंड पड़ना । ५. सूर्यमुखी शीशे से होकर आया हुआ किरनों का समूह जो इकट्ठा होकर गोल दाल के आकार का हो जाता है और जिससे आग लग जाती है । मुहा०— दाल बँधना = अक्स का इकट्ठा होकर पड़ना । ६. अंडे की जरदी ।

दाल (२)
संज्ञा पुं० [सं० देवदारु] तुन की जाति का एक पेड़ जो हिमालय पर शिमला तथा आगे पंजाब की ओर होता है । विशेष— इसकी लकड़ी बहुत मजबूत होती है । इसकी धरनें और कड़ियाँ मकानों में लगती हैं, पुल और रेल की सड़कों पर बिछाई जाती हैं तथा और भी बहुत से कामों में आती हैं ।

दाल (३)
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का मधु । पेड़ के खोंडरे में मिलनेवाला शहद । २. कोदो नाम का अन्न ।

दालचीनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दारचीनी] दे० 'दारचीनी' ।

दालदी पु †
वि० [सं० दारिद्रय, दरिद्रता, प्राय दालिद्द] दरिद्र । गरीब । उ०— सबकी दीस दालदी देवी देव अनत । दारिद भंजन एकही सुंदर कमलाकंत ।— सुंदर० ग्रं०, भा० २ पृ० ६९६ ।

दालन
संज्ञा पुं० [सं०] दाँत का एक रोग ।

दालभ्य
संज्ञा पुं० [सं०] एक मुनि का नाम ।

दालमोठ
संज्ञा स्त्री० [हिं० दाल + मोठ (= एक मोटा अन्न जो राजस्थान पंजाब आदि भारत के पच्छिमी भुभाग में ज्यादाहोता है ।)] घी, तेल आदि में नमक, मिर्च के साथ तली हुई दाल जो नमकीन की तरह खाई जाती है ।

दालव
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का स्थावर विष ।

दाला
संज्ञा स्त्री० [सं०] महाकाल नाम की लता ।

दालान
संज्ञा पुं० [फा़०] वह लंबा घर जिसके चारों ओर दीवार न हो, एक दो या तीन ओर खंभे आदि हों । माकन में वह छाई हुई जगह जो चारों ओर से घिरी न हो, एक दो या तीन ओर खुली हो । बारमदा । ओसारा । विशेष— दालान प्रायः मकान के सामने होता है ।

दालि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दाल । २. देवदाली लता । ३. दाड़िम । अनार ।

दालिद पु
संज्ञा पुं० [सं० दारिद्रय] दे० 'दारिद्रय' । उ०— राम जपत दालिद भला, टूटी घर की छाँनि । ऊँचे मंदिर जालि दे जहाँ भगति न सारँगपाँनि ।— कबीर ग्रं०, पृ० ५३ ।

दालिद्र †
संज्ञा पुं० [सं० दारिद्रय] दारिद्रय । दरिद्रता । गरीबी । उ०— सुंदर कहत दुख दारिद्र निकंदनी ।— सुंदर ग्रं०, भा० १ (जी०), पृ० १६९ ।

दालिद्री †
वि० [सं० दारिद्र] दरिद्रतायुक्त । दरिद्र । उ०— आलस निद्रा जा कहँ होई । काम क्रोध दालिद्री सोई ।— कबीर सा०, पृ० ३९ ।

दालिम
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दाड़िम' ।

दालिव †
संज्ञा पुं० [सं० दालिम] दे० 'दालिव' । उ०— सहजें दालिव फुटल अइसन दीन्त ।— वर्ण०, पृ० ५ ।

दाली †
संज्ञा पुं० [सं० दालि] दे० 'दाल' । उ०— मुदगा, दाली घृत की ब्याली । रस के कंदर सुंदर साली ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३०६ ।

दाल्भ्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. दल्भ ऋषि के गोत्र का मनुष्य । २. वृक नामक मुनि । विशेष— इंद्र इनके बंधु थे । इन्होंने चंद्रसेन राजा की गर्भिणी स्त्री की परशुराम के क्रोध से रक्षा की थी ।

दाल्मि
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्र ।

दावँ
संज्ञा पुं० [सं० दाय(=भाग) अथवा सं० प्रत्य० दा दाच्; जैसे एकदा] १. बार । दफा । मरतबा । २. किसी के लिये किसी बात का समय जो कई आदमियों में एक दूसरे के पीछे क्रम से आवे । बारी । पारी । जैसे,— जब तुम्हारा दावँ आवेगा तब जैसा जाहना वैसा करना । उ०— तब नहिं दीनो मो कहँ ठावँ । अब कस रोवत अपने दावँ ।— (शब्द०) । क्रि० प्र०—आना । ३. किसी कार्य के लिये उपयुक्त समय । अवसर । मोका । अनुकूल संयोग । उ०—(क) द्विजदेव की सौं अब चूक मत दावँ, अरे पातकी पपीहा ! तू पियी की धुनि गावै ना ।— द्विजदेव (शब्द०) । (ख) कहैं पदमाकर त्यों साँकरी गली है अति इट उत भाजिबे को दावँ ना लगत है ।— पद्माकर (शब्द०) । क्रि० प्र०—पाना । मिलना । —लगना । मुहा०— दावँ करना = घात लगाना । घात में बैठना । दावँ चूकना = अवसर को हाथ से जाने देना । किसी कार्यसाधन के लिये अनुकूल समय पाकर भी कुछ न करना । मौका खोना । दावँ ताकना = अवसर की ताक में रहना । मौका देखते रहना । दावँ मिलना = दे० 'दावँ लगना' । दावँ लगना = अवसर हाथ में आना । अनुकूल संयोग मिलना । मौका मिलना । दावँ लगना = दे० 'दावँ ताकना' । दावँ लेना = जिसने बुरा व्यवहार किया हो मौका मिलने पर उसके साथ वैसा ही व्यवहार करना । बदला लेना । प्रतिकार करना । उ०— असुर कुपित ह्वै कह्यो बहुत तुम असुर सँहारे । अब लैहों वह दाव छाड़िहौं नहिं बिनु मारे ।— सूर (शब्द०) । ४. कार्यसाधन की युक्ति । उपाय । चाल । मतलब गाँठने का ढंग । मुहा०—दावँ पर चढ़ना = ऐसी स्थिति में होना जिनसे किसी का काम निकल सके । किसी के अभिप्राय साधन के अनुकूल प्रबृत्त होना । इस प्रकार वश में होना कि दूसरा अपना मत- लव निकाल ले । दावँ पर चढ़ाना = मतलब के मुवाफिक करना । कार्यसाधन के लिये अनुकूल करना । दावँ पर लाना = दे० 'दावँ पर चढ़ाना' । दावँ में आना = दे० 'दावँ पर चढ़ना' । ५. कुश्ती या लड़ाई जीतने के लिये काम में लाई जानेवाली युक्ति । चाल । पेंच । बंद । उ०— (क) तब हरि भिरे मल्ल— क्रीड़ा करि बहु विधि दावँ दिखाए ।—सूर (शब्द०) । (ख) झटकि दूर फेकन चहत चलत न कोऊ दावँ (शब्द०) । क्रि० प्र०—करना । यौ० —दावँ पेंच । मुहा०—दावँ पर लाना = कुश्ति में जोड़ को ऐसी स्थिति में करना कि उसपर पेंच हो सके । ६. कार्यसाधन की कुटिल युक्ति । छल । कपट । क्रि० प्र०—चलना । मुहा०— दावँ खेलना = चाल चलना । धोखा देना । दावँ देना = दे० 'दावँ खेलना' । ७. खेल में प्रत्येक खेलाड़ी के खेलने का समय जो एक दूसरे के पीछे क्रम से आता है । खघेलने की बारी । चाल । जैसे,—अब हमारा दावँ है, कौड़ी हस फेकेंगे । मुहा०—दावँ चलना = अपनी बारी आने पर शतरंज की गोटी, ताश के पत्ते आदि को रखना । दावँ फेंकना = अपनी वारी आने पर पासा या जुए की कौड़ी आदि डालना । दावँ पर रखना = रुपया पैसा या कोई वस्तु दावँ फेंकनेवाले के सामने रखना जिसमें यदि वह जीते तो उसे ले जाय और हारे तो उतना दै । बाजी पर लगाना । दावँ लगाना = दे० 'दावँ पर रखना' । ८. पाँसे, जुए की कौड़ी आदि का इस प्रकार पड़ना जिससे जीत हो । जीत का पाँसा या कौड़ी । उ०— दावँ बलराम को देखि उन छल कियो रुक्म जीत्यो कहन लगे सारे । देववाणी भई, जीत भई राम की, ताहु पै मूढ़ नाहीं सँभीरे ।— सूर (शब्द०) । क्रि० प्र०—आना ।—पड़ना । मुहा०—दावँ देना = खेल में हारने पर नियत दंड भोगना यापरिश्रम करना (लड़के) । उ०— तुमरे संग कहो को खेलै दावँ देत नहिं करत रुनैया?—सूर (शब्द०) । दावँ लेना = खेल में हारनेवाले से नियत दंड भोगाना या परिश्रम करना । †९. स्थान । ठौर । जगह । उ०— वह झाड़ी एक पहाड़ के उतार पर थी इससे सिंह को निकलने का दावँ न था ।— गोवाल उपासनी (शब्द०) ।

दावँना
क्रि० स० [सं० दमन] दाना और भूसा अलग करने के लिये कटी हुई फसल के सूखे डंठलों को बैलों से रौंदवाना । दाना झाड़ने के लिये माँड़ना ।

दावँनी
संज्ञा स्त्री० [सं० दामिनी] माथे पर पहनने का स्त्रियों का एक गहना । बंदी ।

दावँरी
संज्ञा स्त्री० [सं० दाम] रस्सी । रज्जु । उ०— दावँरि लै बाँधन लगी जसुदा ह्वै बेवीर । पै गोबंधन बाँधिहै गोपति कों को बीर?— व्यास (शब्द०) ।

दाव (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वन । जंगल । २. वन की आग । ३. आग । अग्नि । ४. जलन । ताप । कष्ट । पीड़ा ।

दाव (२)
संज्ञा पुं० [देश०] १. एक प्रकार का हथियार । २. एक पेड़ का नाम । दे० 'धावरा' ।

दाव (३)
संज्ञा पुं० [हिं० दावँ] १. अवसर । सुयोग । उ०— ले सँभारि सँवारि आपुहिं भिलहि नहिं फिर दाव ।—जग० बानी, पृ० ३५ । †२. रिक्त स्थान । जगह । दावँ । ३. छल । कपट । इष्टसाधन की कुटिल युक्ति या चालबाजी । यौ०—दावपेंच = दावँपेंच । चालबाजी । उ०— सारे दावपेच खुले पेचीदगी आने पर । यार गिरपतार हुआ खून के बहाने पर ।—बेला, पृ० ९१ । मुहा०— दाव पेंच चलना = एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिये चालें चलना । चतुरता की चालें चलना । उ०— वाह किबला, आपके फेजाने सुहवत से हस पोख्ता मगज हो गए हैं ऐसे कच्चे नहीं कि हमपर किसी का दाव पेंच चले ।— फिसाना० भा० १, पृ० ९ । ४. कुअवसर । बुरा मौका । उ०— जिससे सुंदरदास जी के मठ वा असथल को बहुत भारी नुकसान पहुँचने का दाव व संभावना का रूप हो गयै हैं ।— सुंदर ग्रं० (जी०), भा० १ पृ० १८६ ।

दावत
संज्ञा स्त्री० [अ० दअवत] १. ज्योनार । भोज । २. खाने का बुलावा । निमंत्रण । न्योता । क्रि० प्र०—खाना ।—देना । —लेना । यौ०— दावत तवाजा = आदर सत्कार । दावतनामा = निमंत्रण पत्र । निमंत्रण । दावते जंग = युद्ध की चुनौती । रणनिमंत्रण ।

दावदी
संज्ञा स्त्री० [फा़० दाउदी] एक पुष्प । दे० 'गुलदावदी' ।

दावन (१)
संज्ञा पुं० [सं० दमने] १. दमन । नाश । उ०— जातुधान दावन परावन को फल भो ।— तुलसी (शब्द०) । २. हँसिया । ३. एक प्रकार का टेढा छुरा । खुखड़ी ।

दावन (२)
संज्ञा पुं० [फा० दामन] दे० 'दामन' ।

दावना (१)
क्रि० स० [सं० दामन] दे० 'दाँवना' ।

दावना (२)
क्रि० स० [हिं० दावन (= नाश)] दमन करना । नष्ट करना । उ०— सुनु खगपति यह कथा पावनी । त्रिविध ताप भव—दाप—दावनी ।— तुलसी (शब्द०) ।

दावनी
संज्ञा स्त्री० [सं० दामिनी] दे० 'दावँनी' ।

दावर
संज्ञा पुं० [फा०] १. ईश्वर । खुदा । २. न्यायकर्ता । हाकिम । न्यायकारी । उ०— के इस मोहरे के तीन आलम में दावर । है भयी वास्ते कसे कूँ इजाहर ।— दक्खिनी०, पृ० १९६ ।

दावरा
संज्ञा पुं० [देश०] धावरा नाम का पेड़ ।

दावरी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० दाम] दे० 'दावँरी' ।

दावरी (२)
संज्ञा स्त्री० [फा०] १. न्याय । इंसाफ । २. हुकूमत । शासन [को०] ।

दावरीगाह
संज्ञा स्त्री० [फा०] न्यायालय ।

दावाँदोल
वि० [हिं० डाँवाडोल] चंचल । अस्थिर । डावाँडोल । उ०— ऐंद्रजालिक चेतना के स्तंभ दावाँदोल दुनियाँ में अडिग विश्वास के ।— हरी घास०, पृ० १६ ।

दावा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० दाव (= वन)] वन में लगनेवाली आग जो बाँस या और पेड़ों की डालियों के एक दूसरे से रगड़ खाने से उत्पन्न होती है और दूर तक फैलती चली जाती है । उ०— चिंता ज्वाल सरीर बन दावा लगि लगि जाय । प्रगट धुवाँ नहिं देखिए उर अंतर धुधुवाय ।— गिरधर (शब्द०) ।

दावा (२)
संज्ञा पुं० [अ० दा'वा] किसी वस्तु पर अधिकार प्रकट करने का कार्य । किसी वस्तु को जोर के साथ अपना कहना । किसी चीज पर हक जाहिर करना । जैसे,— कल तुम इस मकान ही पर दावा करने लयोगे तो हस क्या करेंगे ? उ०— दावा पातहासन सों कीन्हों सिवराज बीर जेर कीनो देस, हद्द बाँध्यो दहबारे में ।— भूषण (शब्द०) । २. स्वत्व । हक । जैसे,— इस चीज पर तुम्हारा क्या दावा है ।— ३. किसी के विरुद्ध किसी वस्तु पर अपना अधिकार स्थिर करने के लिये न्यायालय आदि में दिया हुआ प्रार्थनापत्र । किसी जायदाद या रुपए पैसे के लिये चलाया हुआ मुकदमा । जैसे, किसी आदमी पर अपने रुपए का दावा करना । क्रि० प्र०—करना ।—होना । मुहा०—दावा जमाना = मुकदमा ठीक करना । हक साबित करना । ४. नालिश । अभियोग । मुहा०— दावा खारिज होना = मुकदमा हारना । हक का सबित न होना । ५. अधिकार । जोर । प्रताप । उ०— गरुड़ को दावा सदा नाग के समूह पर, दावा नाग जूह पर सिंह सिरताज को ।— भूषण (शब्द०) । ६. किसी बात की कहने में वह साहस जो उसकी यथार्थता के निश्चय से उत्पन्न होता है । दृढ़ता । जैसे,— मैंदावे से साथ कहता हूँ कि मैं इस काम को दो दिनों में कर सकता हूँ । ७. दृढ़तापूर्वक कथन । जोर के साथ कहना । जैसे,— उनका तो यह दावा है कि वे एक मिनट में एक श्लोक बना सकते हैं ।

दावाअगन पु †
संज्ञा स्त्री० [स० दावा + अग्नि] दे० 'दावाग्नी' । उ०— दुरग के पुत्र भतीजे और भाई । दावाअगन साह लागै मेध तें सबाई ।— रा० रू०, पृ० ११८ ।

दावागीर
संज्ञा पुं० [सं०]

दावागीर
संज्ञा पुं० [अ० दावा + फ़ा० गीर] दावा करनेवाला । अपना हक जतानेवाला । उ०— साँई बेटा बाप के बिगरे भयो अकाज । हिरनाकुस अरु कंस को गयो दुहुन को राज । गयो दुहुन को राज बाप बेटा के् बिगरे । दुसमन दावागीर भए महिमंडल सिगरे ।—गिरधर (शब्द०) ।

दावाग्नि
संज्ञा स्त्री० [सं०] वन में लगनेवाली आग ।

दावात
संज्ञा स्त्री० [सं० दवात] स्याही रखने का बरतन । मसिपात्र ।

दावादार
संज्ञा पुं० [अ० दावा + फ़ा० दार] दावा करनेवाला । अपना हक जतानेवाला ।

दावानल
संज्ञा पुं० [सं०] वन की आग जो बाँसों या और पेड़ों की दहनियों के एक दूसरे से रगड़ खाने से उत्पन्न होती है और दूर तक फैलती चली जाती है । दनाग्नि । यौ०— दावनलेस = वन में लगनेवाली आग्नि । दावाग्नि । उ०— ज्यौं पियौ कृष्ण दावनलेस । त्यौं पिऊँ गद्द आबूअ देस ।— पृ० रा०, १२ । ७४ ।

दाविनी
संज्ञा स्त्री० [सं० दामिनी] १. बिजली । २. स्त्रियों के माथे पर का एक गहना । बेदी ।

दावित
वि० [सं०] पीड़ित । व्यथित [को०] ।

दावी
संज्ञा पुं० [सं० धव] धव का पे़ड ।

दावीदार
संज्ञा पुं० [अ० दावी + फा० दार] दे० 'दावागीर' [को०] ।

दावेदार
संज्ञा पुं० [अ० दावा + फा० दार] दे० 'दावादार' ।

दाश
संज्ञा पुं० [सं०] १. मछुवा । धीवर । केवट । विशेष— निषाद पुरुष और आयोगव स्त्री से उत्पन्न व्यक्ति को दाश कहते हैं । ये नौका बनाते हैं और कैवर्त या केवट भी कहलाते हैं । यौ०— दाशग्राम = दे० 'दाशपुर' । दाशनंदिनी = सत्यवती । व्यास की माता । २. भृत्य । नौकर । सेवक ।

दाशपुर
संज्ञा पुं० [सं०] १. धीवरों की बस्ती । २. एक प्रकार का मोथा । कैवर्त मुस्तक ।

दाशरथ (१)
वि० [सं०] दशरथ संबंधी ।

दाशरथ (२)
संज्ञा पुं० दशरथ के पुत्र श्रीरामचंद्र ।

दाशरथि
संज्ञा पुं० [सं०] दशरथ के पुत्र श्रीरामचंद्र आदि ।

दाशरात्रिक
सं० [सं०] दशरात्र संबंधी (यज्ञ, कृत्य आदि) ।

दाशार्ण
संज्ञा पुं० [सं०] १. दशार्ण देश । २. दशार्ण देश का निवासी ।

दाशार्ह
संज्ञा पुं० [सं०] दशार्ह के वंश का मनुष्य । यदुवंशी ।

दाशेय (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० दाशेयी] दाश से उत्पन्न ।

दाशेय (२)
संज्ञा पुं० दाश का पुत्र । धीवरपुत्र ।

दाशेयी
संज्ञा स्त्री० [सं०] व्यास की माता सत्यवती [को०] ।

दाशेर
संज्ञा पुं० [सं०] धीवरी की संतति ।

दाशेरक
संज्ञा पुं० [सं०] १. मरु प्रदेश । मारवाड़ । २. मारवाड़ का निवासी ।

दाशौदनिक (१)
वि० [सं०] दशोदन यज्ञ की दक्षिणा ।

दाश्त
संज्ञा स्त्री० [फा०] परवरिश । पालन पोषण । देखरेख । रखवारी ।

दाश्ता
संज्ञा स्त्री० [फा० दाश्तह्] रखेल । उपपत्नी [को०] ।

दाश्व
वि० [सं०] देनेवाला ।

दाषना †
क्रि० स० [देश०] १. कहना । उ०— दाषे सो दस दोष रो निरणों निपट अनूप ।— रघु० रू० पुन् ३२ । २. देखना ।

दास (१)
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० दासी] १. वह जो अपने को दूसरे की सेवा के लिये समर्पित कर दे । सेवक । चाकर । नौकर । विशेष— मन् ने सात प्रकार के दास लिखे हैं— ध्वजाहृत, अर्थात् युद्ध में/?/हुआ; भक्त दास, अर्थात् जो भात या भोजन पर रहे; गृहज, अर्थात् जो घर की दासी से उत्पन्न हो; क्रीत, अर्थात् मोल लिया हुआ, दात्रिम, अर्थात् जिसे किसी ने दिया हो; दंडदास, अर्थात् जिसे राजा ने दास होने का दंड दिया हो; और पैतृक, अर्थात् जो बाप दादों से दाय में मिला हो । याज्ञवल्क्य, नारद आदि स्मृतियों में दास पंद्रह प्रकार के गिनाए गए हैं— गृहजात, क्रीत, दाय में मिला हुआ, अन्नाका- लभृत, अर्थात् अकाल या दुर्भिक्ष में पाला हुआ; आहित, अर्थात् जो स्वामी से इकट्ठा धन लेकर उसे सेवा द्वारा पटाता हो; ऋणदास, जो ऋण लेकर दासत्व के बंधन में पड़ा हो; युद्धप्राप्त, बाजी या जुए में जीता हुआ; स्वयं उपगत, अर्थात् जो आपसे आप दास होने के लिये आया हो; प्रव्रज्यावसित, अर्थात् जो संन्यास से पतित हुआ हो; कृत, अर्थात् जिसने कुछ काल तक के लिये आपसे आप सेवा करना स्वीकार किया हो; भक्तदास; बड़वाहृत्, अर्थात् जो किसी बड़वा या दासी से विवाह करने से दास हुआ हो; लब्ध, जो किसी से मिला हो; और आत्मविक्रेता, जिसने अपने को बेच दिया हो । ब्राह्मण के लिये दास होने का निषेध है, ब्राह्मण को छोड़ और तीनों वर्ण के लोग दास हो सकते हैं । यदी कोई ब्राह्मण लोभवश दासत्व स्वीकार करे तो राजा उसको दंड दे (मनु) । क्षत्रिय और वैश्य दासत्व से विमुक्त हो सकते हैं पर शूद्र दासत्व से नहीं छूट सकता । यदि वह एक स्वामी का दासतव् छोडे़गा तो दूसरे स्वामी का दास होगा । दास उसे सब दिन रहना पड़ंगा क्योंकि दासत्व के लिये उसका जन्म ही कहा गया है । दासों के दो प्रकार के कर्म कहै गए हैं, — शुभ (अच्छे) और अशुभ (बुरे) । दरवाजे पर झाडू देना, मल मूत्र उठाना, जूठा धोना आदि बुरे कर्म माने गए हैं । २. शूद्र । ३. धीवर । ४. एक उपाधि जो शूद्रों के नामों के आवे ।लगाई जाती है । ५. दस्यु । ६. वृत्रासुर । ७. ज्ञातात्मा । आत्मज्ञानी । ८. दानपात्र (को०) । ९. कायस्थों की एक उपाधि (बंगाल) ।

दास (२)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'दासन', 'डामन' । उ०— भा निर्मल सब धरति अकासू । सेज सँवारि गीन्ह भल दासू ।— जायसी (शब्द०) ।

दासक
संज्ञा पुं० [सं०] १. दास । सेवक । २. गोत्रप्रवर्तक एक ऋषि का नाम ।

दासजन
संज्ञा पुं० [सं० दास + जन] भृत्य । सेवक । उ०— बिधिकर, किंकर दासजन अनुचर अनुग पदाति ।— अनेकार्थ०, पृ० ७१ ।

दासता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दास का कर्म । दासत्व । सेवावृत्ति ।

दासत्व
संज्ञा पुं० [सं०] १. दास होने का भाव । २. दास का काम । सेवावृत्ति ।

दासनंदिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० दासनन्दिनी] धीवर की कन्या सत्यवती जो व्यास की माता थी ।

दासन पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'डासन' ।

दासनदासा पु †
संज्ञा पुं० [सं० दासानुदास] दे० 'दासानुदास' । उ०— संन्यासी मनि त्यागै आसा । प्रणवत नानक दासन- दासा ।— प्राण०, पृ० ९२ ।

दासपन
संज्ञा पुं० [सं० दास + पन (प्रत्य०)] दासत्व । सेवाकर्म ।

दासपुर
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का मोथा । कैवर्त मुस्तक ।

दासप्रथा
संज्ञा स्त्री० [सं० दास + प्रथा] वह पुरानी प्रथा जिसके अनुसार दास के रूप में निम्न वर्ग के मनुष्यो का क्रय विक्रय होता । उ०— दासप्रथा दुनिया के बहुत से भागों से बहुत पहिले खतम हो चुकी ।— भा० इ० रू०, पृ० ४६ ।

दासभाव
संज्ञा पुं० [सं० दास्यभाव] भक्ति के ९ भेदों में से एक । उ०— दासभाव सतसंगति लीना । दीन हीन मन होइ अधीना ।— घट०, पृ० २४९ ।

दासमीय (१)
वि० [सं०] दसम देश में उत्पन्न ।

दासमीय (२)
संज्ञा पुं० दसम देश का निवासी ।

दासमेय
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्राचीन जनपद ।

दासा (१)
संज्ञा पुं० [सं० दासी(= वेदी] १. दीवार से सटाकर उठाया हुआ बाँध या पुश्ता जो कुछ ऊँचाई तक हो और जिसपर चीज वस्तु भी रख सके । २. आँगन के चारों ओर दीवार से सटाकर उठाया हुआ चबूत्तरा जो आँगन के पानी को घर या दालन में जाने से रोकने के लिये बनाया जाता है । ३. वह लकड़ी या पत्थर जो दरवाजे के ऊपर दीवार के आर पार रहता है ।४. दीवार की कुर्सी के ऊपर बैठाया हुआ पत्थर ।

दासा (२)
संज्ञा पुं० [सं० दशन] हँसिया ।

दासातन
संज्ञा पुं० [हिं० दासापन] (दासता का) भाव । सेवा- भाव । उ०— पहिले दासातन करै सौ वैराग प्रमान ।— पलटू०, पृ० ४४ ।

दासानुदास
संज्ञा पुं० [सं० दास + अनुदास] सेवक का सेवक । अत्यंत तुच्छ सेवक । विशेष— नम्रता और शिष्टता दिखाने के लिये इस शब्द का व्यवहार अधिक होता है ।

दसायन
संज्ञा पुं० [सं०] दासी का पुत्र [को०] ।

दासि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दासी] दे० 'दासी' । उ०— अधर सुधा के लोभ भई हम दासि तिहारी । ज्यों लुबधी पद कमलनि कमला चंचल नारी ।— नंद० ग्रं०, पृ० २७ ।

दासिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दासी । उ०— कूबरी भई है रानी हम तौ बिगनी हाय, तऊ बिन दामन की दासिका गने रहौ । नागर जू छेम जुत आपु जग कोटिक लौं, चित की लगन जहाँ मगन बने रहौ ।— नट०, पृ० २७ ।

दासी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सेवा करनेवाली स्त्री । टहलनी । लौंडी । २. धीवर या शूद्र की स्त्री । यौ०—दासीपुत्र । ३. काकजंघा । ४. नीलाम्लान । काला कारौठा नाम का पौधा । ५. कटसैरया । ६. वेदी । ७. वेश्या (को०) ।

दासीसुत
संज्ञा पुं० [सं०] विदुर । उ०— तजा सकल पकवान लिया दासीसुत भाजी ।— पलटू०, पृ० ५० ।

दासेय (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० दासेयी] दास से उत्पन्न ।

दासेय (२)
संज्ञा पुं० १. वास । गुलामजादा । २. धीवर ।

दासेयी
संज्ञा स्त्री० [सं०] व्यास की माता सत्यवती ।

दासेर
संज्ञा पुं० [सं०] १. दास । २. कैवर्त । धीवर । ३ ऊँट ।

दासेरक
संज्ञा पुं० [सं०] १. दासीपुत्र । दासेय । २. ऊँट ।

दास्ताँ
संज्ञा पुं० [फा०] दे० 'दास्तान्' । उ०— हाँ, जगत तेरे बिना आबात वैसा ही रहेगा । दूसरों के कान में वह दास्ताँ अपनी कहेगा ।— विश्व०, पृ० ७७ ।

दास्तान्
संज्ञा स्त्री० [फा०] १. वृत्तांत । २. हाल । कथा । किस्सा । ३. वर्णन । बयान ।

दास्तान
संज्ञा पुं० [फा० दास्तान्] कथा । वृत्तांत । उ०— जिसमें खतम हो जाए यहीं से इस दास्तान का बयान ।— प्रेमघन०, भा० २, पृ० ३२३ ।

दास्य
संज्ञा पुं० [सं०] दासत्व । दासपन । सेवा । उ०— द्रव्य के लोभ से दास्य अंगीकार करूँ ।— प्रेमघन० भा० २, पृ० ७४ । विशेष— दास्य, भक्ति के नव भैदों में से एक है ।

दास्यमान्
वि० [सं०] जो दिया जानेवाला हो । जिसे दूसरे को देना हो ।

दास्र
संज्ञा पुं० [सं०] अश्विनी नक्षत्र ।

दाह
संज्ञा पुं० [सं०] १. जलाने की क्रिया या भाव । भस्मीकरण । उ०— भयौ तो दिली कौ पति देखत फनाह आज, दाह मिटि जवौ ते हमीर नरनाह कौ ।— हम्मीर०, पृ० ३७ । २. शव जलाने की क्रिया । मुर्दा फूँकने का काम ।विशेष— शुद्धितत्व में दाहकर्म के विशय में इस प्रकार लिखा है : शव को पुत्रादि श्मशान में ले जाकर रखें और स्नान कर पिंडदान के लिये अन्न पकावें । फिर मृतक के शरीर में घी मलकर उसे मंत्रपाठपूर्वक स्नान करवें, दूसरे नए वस्त्र में लपेटें, और आँख, कान, नाक, मुँह इन सात छेदों में थोड़ा सोना डालें । इतना हो चुकने पर चिंता में अग्नि देनेवाला प्राचीनावीत होकर (जनेऊ के दाहिने कंधे पर डालकर) वायाँ घुटना टेककर बैठे और मंत्र फढ़कर कुश से एक रेखा खींचे । फिर उस रेखा पर कुश बिछावे और दाहिने हाथ में तिलसहित जलपात्र लेकर मृतक का नाम, गोत्र आदि उच्चारण करता हुआ जल को कुश पर गिरा है । इसके अनंतर तिलसहित पिंड लेकर कुश पर विसर्जित करे । जब इतना कृत्य हो जाय तब पुत्रादि चिता तैयार करें । और मुर्दें को उसपर दक्खिन ओर सिर करके लेटा दें । जो सामवेदी हों वे शव का मस्तक उत्तर की ओर रखें । फिर अग्नि हाथ में लेकर आग देनेवाला तीन प्रदक्षिणा करे और दक्खिन ओर अपना मुँह करके शव के मस्तक की ओर आग लगा दे । फिर सात लकड़ियाँ हाथ में लेकर सात प्रदक्षिणा करे और प्रत्येक प्रदक्षिणा में एक एक लकड़ी चिता में डालता जा । जब शव जल जाय तब एक बाँस लेकर चिता पर सात बार प्रहार करे जिससे कपाल फूट जाय । इतना करके फिर वह चिता की ओर न ताके और जाकर स्नान कर ले । ३. जलन । ताप । ४. एक रोग जिसमें शरीर में जलन मालूम होती है, प्यास जगती है और कंठ सुखता है । वैद्यक के मत से यह रोग दाहपित्त के प्रकोप से होता है । विशष— भावप्रकाश में दाह सात प्रकार लिखा है, (१) रक्तजन्य दाह, जिसमें रक्त कुपित होकर सारे शरीर में दाह उत्पन्न करता है । ऐसा जान पड़ता है, मानो सारा शरीर आग से तप रहा है और क्षण क्षण पर प्यास लगती है । (२) रक्तपूर्ण कोष्ठज दाह, जो किसी अंग में हथियार आदि का धाव लगने पर उस धाव से कोष्ट में रक्त जाने से उत्पन्न होता है । (३) मद्यज दाह । (४) तृष्णाविरोधज दाह । (५) धातुक्षयज दाह ।(६) मर्माभिघातज दाह, और (७) असाध्य वाह जिसमें रोगी का शरीर ऊपर से तो ठंढा रहता है, पर भतर भीतर जला करता है । ५. शोक । संताप । अत्यंत दुःख । डाह । ईर्ष्या । ६. चमकती हुई लालिमा । दीप्त लाल रंग । जैसे, आकाश का ।

दाहक (१)
वि० [सं०] जलानेवाला ।

दाहक (२)
संज्ञा पुं० १. चित्रक वृक्ष । चीता । लाल चीता । २. अग्नि । आग ।

दाहकता
संज्ञा स्त्री० [सं०] जलाने का भाव या गुण ।

दाहकत्व
संज्ञा पुं० [सं०] जलाने का भाव या गुण ।

दाहकरण
संज्ञा पुं० [सं० दाह + √ कृ > करण] जलाने की क्रिया । उ०— बौद्धों के दल का जीते ही वह दाहकरण ।— अपरा, पृ० २१४ ।

दाहकर्म
संज्ञा पुं० [सं०] शवदाह कर्म । मुर्दा फूँकने का काम ।

दाहकारक
वि० [सं० दाह + कारक] दे० 'दाहक' ।

दाहकाष्ठ
संज्ञा पुं० [सं०] अगर जिसे सुगंध के लिये जलाते हैं ।

दाहक्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] शवदाह कर्म । मृतक को जलाने का संस्कार ।

दाहज्वर
संज्ञा पुं० [सं०] वह ज्वर जिसमें शरीर में बहुत अधिक जलन मालूम हो ।

दाहन
संज्ञा पुं० [सं०] १. जलाने का काम । २. जलवाने का काम । भस्म कराने की क्रिया ।

दाहना (१)
क्रि० स० [सं० दाह] १. जलाना । भस्म करना । २. संतप्त करना । सताना । दुःख पहुँचाना । उ०— व्याल, अनल, विष ज्वाल तैं राखि लई सब ठौर । विरह अनल अब दाहिहौ हँसि हँसि नंदकिसोर ।— नंद० ग्रं०, पृ० १८० ।

दाहना (२)
वि० [हिं०] दे० 'दाहिना' ।

दाहसर, दाहस्थल
संज्ञा पुं० [सं०] मुर्दा जलाने का स्थान । श्मशान ।

दाहहर, दाहहरण
संज्ञा पुं० [सं०] खस । उशीर ।

दाहा
संज्ञा पुं० [फा० दह(= दस)] १. मुहर्रम के दस दिन जिसके भीतर ताजिया बनता है और दफन किया जाता है । २. ताजिया ।

दाहागुरु
संज्ञा पुं० [सं०] जनाले का अगर ।

दाहानल
संज्ञा पुं० [सं० दाह + अनल] दे० 'दावानल' । उ०— सुन बे बेपरवाह निभाणीं दाहानल बुझदा ।— घनानंद० पृ० ४५९ ।

दाहिन
वि० [सं० दक्षिण] १. दे० 'दाहिना' । २. अनुकूल । उ०— (क) गेलाँ हुँ पुरुब पेसे उतरो न देइ । दाहिन बचन बाम कए लेइ ।— विद्यापति, पृ० ३०७ । (ख) बार बार बिनवों नँद- लाला । मोपै दाहिन होहु कृपाला ।— सूर (शब्द०) ।

दाहिना
वि० [सं० दक्षिण] [वि० स्त्री० दाहिनी] १. उस पार्श्व का जिसके अंगों की पेशियों में अधिक बल होता है । उस ओर का जिस ओर के अंग काम करने में अधिक तप्तर होते हैं । 'बायाँ' का उलटा । दक्षिण । अपसव्य । जैसे, दाहिना हाथ, दाहिना पैर, दाहिनी आँख । मुहा०—दाहिनी देना = दक्षिणावर्त परिक्रमा करना । प्रदक्षिणा करना । उ०— जटा भस्म तनु दहै वृथा करि कमँ बँधावै । पुहुमि दाहिनी देहि कुफा बसि मोहि न पावै ।— सूर (शब्द०) दाहिनी लाना = प्रदक्षिणा करना । उ०— पंचवटी गोदहि प्रनाम करि कुटी दाहिनी लाई ।— तुलसी (शब्द०) ।(किसी का) दाहिना हाथ होना = बड़ा भारी सहायक होना । २. उधर पड़नेवाला जिधर दाहिना हाथ हो । जैसे, दाहिनी दिशा । ३. अनुकूल । प्रसन्न ।

दाहिनावर्त्त पु
वि० [सं० दक्षिणावर्त्त] १. प्रदक्षिणा । २. एक प्रकार का शंख । दे० 'दाक्षिणावर्त' ।

दाहिनी
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'दाहिने' । उ०— सदा भवानी दाहिनी संन्कुच रहैं कवेख ।— प्रेमघन०, भा० २, पृ० ४०२ ।

दाहिने
क्रि० वि० [हिं० दाहिना] दाहिने हाथ की ओर । उसतरफ जिस तरफ दहिना हाथ हो । दाहिने हाथ की दिशा में । जैसे,— तुम्हारे दाहिने जो मकान पडे़ उसी में पुकारना । मुहा०—दाहिने होना = अनुकूल होना । हित की ओर प्रवृत्त होना । प्रसन्न होना । उ०— पुनि बंदौ खल गन सति भाए । जे बिनु काज दाहिने बाएँ ।— तुलसी (शब्द०) ।

दाहिमा
संज्ञा पुं० [सं० दाधिमथ या देश०] १. प्राचीन ब्राह्मण वंश, जिसमें कृष्ण पयहारी ने जन्म लिया था । उ०— दाहिमा वंश दिनकर उदय संत कमल हिय सुख दियो ।— भक्तमाल (श्री०), पृ० ४४० । २. दाहिमा या दाधिमथ नाम का प्रदेश ।

दाही (१)
वि० [सं० दाहिन्] [वि० स्त्री दाहिनी] जलानेवाला । भस्म करनेवाला ।

दाही (२)
वि० [अ०] अक्लमंद । बुद्धिमान । उ०— दाही हजार लख है कोई पेशवा है एक ।—कबीर मं०, पृ० ३२३ ।

दाहु पु
वि० संज्ञा पुं० [सं० दाह] दे० दाह । उ०— मिटि गयौ हेरत हिय को दाहु ।— नंद० ग्रं०, पृ० २२८ ।

दाहुक
वि० [सं०] दे० 'दाही (१)' [को०] ।

दिंक
संज्ञा पुं० [सं० दिङ्क] जूँ नाम का छोटा कीड़ा जो सिर के बालों में पड़ता है ।

दिंक
संज्ञा पुं० [सं० दिण्ड] एक तरह का नाच । उ०— उलथा टेंकी आलम सदिंड । पद पलटि हरुमयी निशंक चिंड ।— केशव (शब्द०) ।

दिंडि
संज्ञा पुं० [सं० दिण्डि] १. शिव का एक नाम । २. एक बाजा । दिंडिर ।

दिंडिर
संज्ञा पुं० [सं० दिण्डिर] प्राचीन काल का एक प्रकार का बाजा ।

दिंडी
संज्ञा पुं० [सं० दिण्डी] उन्नीस मात्राओं का एक छंद । विशेष— इसके अंत में दो गुरु होते हैं और इसमें ९ तथा १० पर विश्राम होता है । इसमें कभी केवल दो चरणों का और कभी चार चरणो का अनुपास होता है । मरठी भाषा में इस छंद का विशेष व्यवहार होता है ।

दिंडीर
संज्ञा पुं० [सं० दिण्डीर] हिंडीर । समुद्रफेन ।

दिअट †
संज्ञा पुं० [हिं० दीपट] दे० 'दीवट' । उ०— तब विज्ञान रूपिनी बुद्धि बिसद घृत पाइ । चित्त दिआ भरि धरै दृढ़ समता दिअटि बनाइ ।— मानस, ७ । ११७ ।

दिअना †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'दीया' ।

दिअरा †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'दीया' ।

दिअला †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'दिया' ।

दिअली
संज्ञा स्त्री० [हिं० दिया(= छोटा कसोरा) का स्त्री० अल्पा०] १. मिट्टी का बना हुआ बहुत छोटा दिया या कसोरे के आकार का पात्र । २. झूल के नीचे की हरे रंग की कटोरी जो कई फाँकों में बँटी होती है । ३. दे० 'दिउली' ।

दिआ
संज्ञा पुं० [सं० दीपक] दे० 'दीया' । उ०— करव प्रकट रूप शिव राती । नहिं कछु चहिअ दिआ धृत दाई ।— मानस, पृ० १२० ।

दिआना †
क्रि० स० [हिं० दिलाना] दे० 'दिलाना' । उ०— सब दिन राजा दान दिआवा । भइ निसि नागमती पहँ आवा ।— जायसी (शब्द०) ।

दिआबत्ती
संज्ञा स्त्री० [हिं० दिआ + बत्ती] दे० 'दियाबत्ती' ।

दाआर †
संज्ञा पुं० [अ० दयार] दे० 'दयार' ।

दिआरा †
संज्ञा पुं० [हिं०] १. दे० 'दयार' । २. दे० 'दियारा' ।

दिआवना पु †
क्रि० स० [हिं० दिआना] दे० 'दिलाना' । उ०— अश्व पीछ कह धरत ? कौन रवि के जिय भावतः राजा के दरबार सभहि सुधि कौन दिआवत ।— भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ६३४ ।

दिआसलाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० दिआ + सलाई] दे० 'दियासलाई' ।

दिउरी † (१)
संज्ञा स्त्री० [प्रा० दिअली] छोटा दीया ।

दिउरी † (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० देवालय] देवस्थान या मंदिर की देहली । उ०— मन तारा केती रहि रानी । दिउरी एक देखि विथकानी ।— इंद्रा०, पृ० ९५ ।

दिउला
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'दिउली' ।

दिउली †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दिअली] १. सूखे घाव के उपर की पपड़ी । खुरंड । खुट्टी । दाल । २. दे० 'दिअली' । ३. मछली के ऊपर से छूटनेवाला छिलका । सेहरा ।

दिक्
संज्ञा स्त्री० [सं०] दिशा । ओर । तरफ । उ०— थोक अशोक कोकनद फूले, मधु के मद भौंरे दिक् भूले ।— आराधना, पृ० ४० ।

दिक (१)
वि० [अ० दिक] १. जिसे बहुत कष्ट पहुँचाया गया हो । हैरान । तंग । जैसे,—यह लड़का बहुत दिक करता है । क्रि० प्र०—करना ।—रहना । —होना । २. अस्वस्थ । बीमार । विशेष— इस अर्थ में इसका प्रयोग तबीयत शब्द के साथ होता है । जैसे,— कई दिनों से उनकी तबीयत दिक है । क्रि० प्र०—रहना ।—होना ।

दिक (२)
संज्ञा पुं० क्षय रोग । तपेदिक ।

दिकचन
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की ऊख जिसका गुड़ बहुत अच्छा बनता है ।

दिकदाह
संज्ञा पुं० [सं० दिग्दाह] दे० 'दिग्दाह' । उ०— ऊकपात दिकदाह दिन फेकरहि स्वान सियार । उदित केतु गत हेतु महि कंपति बारहि बार ।— तुलसी (शब्द०) ।

दिकली †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दाल; विशेषतः चने की दाल ।

दिकाक † (१)
संज्ञा पुं० [अ० दकीक (= बारीक)] किसी चीज का छोटा टुकड़ा । कतरन । धज्जी ।

दिकाक (२)
वि० [अ० दकियानूस] बहुत बड़ा चालाक । खुर्राट ।

दिकोड़ी
संज्ञा स्त्री० [देश०] बरें । हड्डा ।

दिक्क
संज्ञा पुं० [सं०] हाथी का बच्चा ।

दिक्कत
संज्ञा स्त्री० [अ० दिक्कत] १. दिक का भाव । परेशानी । तकलीफ । तंगी । कष्ट । क्रि० प्र०—उठाना । २. कठिनता । मुश्किल । क्रि० प्र०—डालना ।—पड़ना ।

दिक्कन्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] दिशारूपी कन्या । विशेष— पुराणानुसार दिशाएँ ब्रह्मा की कन्याएँ मानी गई हैं । वाराहपुराण में लिखा है कि जिस समय ब्रह्मा सृष्टि करने को चिंता में थे उस समय उनके कान से दस कन्याए निकलीं । ब्रह्मा ने उनसे कहा कि तुम लोगों की जिधर इच्छा हो उधर चली जाओ । तदनुसार सब एक एक दिशा में चली गई । इसके उपरांत ब्रह्मा ने आठ लोकपालों की सृष्टि की और अपनी आठ कन्याओं को बुलाकर प्रत्येक लोकपाल को एक एक कन्या प्रदान की । तदुपरांत वे स्वयं आकाश की ओर चले गए और नीचे ओर उन्होंने शेष को रखा ।

दिक्कर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] महादेव । शिव ।

दिक्कर (२)
वि० [वि० स्त्री० दिक्करिका] युवक । जवान ।

दिक्करवासिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुराणानुसार दिक्कर अर्थात् महादेव में निवास करनेवाली एक देवी ।

दिक्करि
संज्ञा पुं० [सं० दिक्करिन्] दे० 'दिक्करी' । उ०— दंभि न सकत भूमिधर दिक्करि, टुट्टत रद्द फटत नभ चिक्करि ।— पद्माकर ग्रं०, पृ० १० ।

दिक्करिका (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पुराणानुसार एक नदी जो मान सरोवर के वश्चिम में बहता है । विशेष— यह नदी दिग्गजों के क्षेत्र से निकलती है इसी लिये दिक्करिका कहलाती है । संभवतः यह नदी दिकराई नदी है, जो कामरूप देश में बहती है ।

दिक्करिका (२)
वि० युवती । तरुणी । दिक्करी [को०] ।

दिक्करी (१)
वि० [सं०] युवती । जवान । तरुणी [को०] ।

दिक्करी (२)
संज्ञा पुं० [सं० दिक्करिन्] आठो दिशाओं के ऐरावत आदि आठ हाथी । दिग्गज ।

दिक्कांता
संज्ञा स्त्री [सं० दिक्कान्ता] दे० 'दिक्कन्या' ।

दिक्कामिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दिक्कन्या' [को०] ।

दिक्कालातीत
वि० [सं० दिक् + काल + अतीत] दश दिशाओं और भूत, भविष्य, वर्तमान इस त्रिकाल से परे । जो देश और काल के वंधन से मुक्त या परे हो ।

दिक्कुंजर
संज्ञा पुं० [सं० दिक्कुञ्जर] दिग्गज [को०] ।

दिककुमार
संज्ञा पुं० [सं०] जैनियों के अनुसार भवनपति नामक देवताओं में से एक ।

दिकचक्र
संज्ञा पुं० [सं०] आठों दिशाओं का समूह ।

दिकपति
संज्ञा पुं० [सं०] १. ज्योतिष के अनुशार दिशाओं के स्वाची ग्रह । विशेष— ज्योतिष में आठ दिशाओं के स्वामी आठ ग्रहह माने जाते हैं । यथा दक्षिण के स्वामी मंगल, पश्चिम के शनि, उत्तर के बुध, पूर्व के सूर्य, अग्नि कोण के शुक्र, नैऋतकोण के राहु, वायुकोण के चंद्रमा और ईशान कोश के बृहस्पति । २. दे० 'दिक्पाल' ।

दिक्पाल
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुराणानुसार दसों दिशाओं के पालन करनेवाले देवता । यथ, पूर्व के इंद्र, अग्निकोण के वह्नि, दक्षिण के यम, नैऋतकोण के नैऋत, पश्चिम के वरुण, वायुकोण के मरुत, उत्तर के कुबेर, ईशान कोण के ईश, ऊर्ध्व दिशा के ब्रह्मा और अधोदिशा के अनंत । विशेष— दे० 'दिक्कन्या' । २. चौबीस मात्राओं का एक छंद जिसमें १२ मात्राओं पर विराम होता है । इसकी पाँचवीं और सत्रहवीं मात्राएँ लघु होती है । उर्दू का रेख्ता यही है । जैसे,— हरिनाम एक साँचो सब झूठ है पसारा ।

दिक्ष्या पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० दीक्षा] दे० 'दिक्षा' । उ०— सर भज्जन करि आतुर आवहु । दिक्ष्या देउँ ज्ञान जेरि पावहु ।— मानस, ६ । ५६ ।

दिक्शिखा
संज्ञा पुं० [सं०] पूर्व दिशा [को०] ।

दिक्शूल
संज्ञा पुं० [सं०] फलित ज्योतिष के अनुसार कुछ विशिष्ट दिनों में कुछ विशिष्ट दिशाओं में काल का वास जो कुछ विशेष योगिनियों के योग के कारण माना जाता है । विशेष— जिस दिन जिस दिशा में कुछ विशिष्ट योगिनियों के योग के कारण इस प्रकार काल का वास ओर दिकशूल माना जाता है, उस दिन उस दिशा की ओर यात्रा करना बहुत ही अशुभ और हानिकराक माना जाता है । कहते हैं, दिकशूल में यात्रा करने से मनेरथ कभी सिद्ध नहीं होता, आर्थिक हानि होती है, कोई न कोई रोग हो जाता है, और यहाँ तक कि कभी कभी यात्री की मृत्य भी हो जाती है । निम्नलिखित दिशाओं में निम्नलिखित वारों को दिकशूल माना जाता है— पश्चिम  की  और  शुक्र  और  रविवार  को उत्तर  "  "  मंगल  "  बूधवार  को पूर्व  "  "  शनि  "  सोमवार  को दक्षिण  "  "  बृहस्पति वार को किसी किसी के मत से बुध और बृहस्पतिवार को दक्षिण की ओर, बृहस्पतिवार को चारों कोणों की ओर, रवि तथा शुक्रवार को पश्चिम दिशा की ओर शूल होता है । पहले और प्रधान मत के संबंध में यह श्लोक है—'शनौ चन्द्रे त्यजेत् पूर्वम्, दक्षिणस्याम् दिशौ गुरौ । सूर्य शुक्रे पश्चिमाशाम्, बुधे भौमे तथोत्तरे ।' लोगों ने एक चौपाई भी बना ली है जो इस प्रकार है—सोम सनीचर पुरब न चालू । मंगल बूध उत्तर दिस कालू । आदित शुक्र पश्चिम दिस राहु । बीफै दछिन लंक दिस दाहू ।

दिक्साधन
संज्ञा पुं० [सं०] वह उपाय जिससे दिशाओं का ज्ञान हो । जैसे, जिस ओर सूर्य उदय होता हो उस ओर मुँह करकेखडे़ होना और तब यह समझना कि सामने पूरब, पीछे पश्चिम, दाहिनी ओर दक्षिण और बाई और उत्तर है; अथवा कुछ विशेष नियमों के अनुसार धूप में समवृत्त बनाकर और उसमें लकड़ी आदि गाड़कर उस की छाया से दिशा का पता लगाना । सूर्यसिद्धांत आदि प्राचीन ग्रंथों में इस प्रकार दिक्साधन की कई विधियाँ लिखी हैं ।

दिक्सुंदरी
संज्ञा स्त्री० [सं० दिकसुन्दरी] दे० 'दिक्कन्या' ।

दिक्स्वामी
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दिक्पति' ।

दिक्षा †
संज्ञा स्त्री० [सं० दीक्षा] दे० 'दिक्षा' ।

दिक्षागुरु †
संज्ञा पुं० [सं० दीक्षागुरु] दे० 'दिक्षागुरु' ।

दिक्षित †
वि० [सं० दीक्षित] दे० 'दिक्षित' ।

दिखण पु †
संज्ञा पुं० [सं० दक्षिण] दे० 'दक्षिण' । उ०— (क) अंत लघु तगण धननास पत अकास, पिता जम मात दिखणा हरत पेख ।—रघु० रू०, पृ० ५४ । (ख) देस निवाणूँ सजल जल, मीठा बोला लोई । मारु काँमणि दिखणि धर हरि दियइ तउ होइ ।— छोला०, दू० ६६८ ।

दिखाना †
क्रि० अ० [हिं० देखना] दिखाई देना । देखने में आना ।

दिखरादेना पु †
क्रि० स० [हिं०] दे० 'दिखलाना' ।

दिखराना पु
क्रि० स० [हिं०] दे० 'दिखलाना' ।

दिखरावना पु
क्रि० स० [हिं०] दे० 'दिखलाना' । उ०— हो हो करत अरत ही आवत दिखऱावत बरजोरी ।—पौद्दार अभि० ग्रं०, पृ० २६४ ।

दिखरावनी पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दिखलाना] १. दिखाने का भाव या क्रिया । दिखाई । २. दे० 'दिखलावाई' । ३. नवबधू का मुख देखकर बड़ी बूढी स्त्रियों द्वारा दिया जानेवाला उपहार ।

दिखलवाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० दिखलाना] १. वह धन जो दिखल- वाने के बदले में दिया जाय । २. दे० 'दिखलाई' ।

दिखलवाना
क्रि० स० [हिं० दिखलाना का प्रे० रूप] दिखलाने का काम दूसरे से कराना । दूसरे को दिखलाने में प्रवृत्त करना ।

दिखलाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० दिखलाना] १. दिखलाने की क्रिया । २. दिखलाने का भाव । ३. वह धन जो दिखलाने के बदले में दिया जाय ।

दिखलाना
क्रि० स० [हिं० देखना का प्रे० रूप] १. दूसरे को देखने में प्रवृत्त करना । दृष्टिगोचर करना । दिखाना । जैसे,— उन्होंने हमें तुम्हारा मकान दिखला दिया । २. अनुभव कराना । मालूम कराना । जताना । जैसे,— हस तुम्हें इसका मजा दिखला देंगे । संयो० क्रि०—डालना ।—देना ।

दिखलाव
संज्ञा पुं० [हिं० दिखलाना] दे० 'दिखावा' । उ०— अलि ! यह क्या केवल दिखलाव, मूक व्यथा का मुखर भुलाव ।— पल्लव, पृ० ८७ ।

दिखलावा †
संज्ञा पुं० [हिं० दिखलाव] दे० 'दिखावा' ।

दिखवैया † (१)
संज्ञा पुं० [हिं० दिखाना + वैया (प्रत्य०)] दिखलानेवाला ।

दिखवैया (२)
संज्ञा पुं० [हिं० देखना + वैया (प्रत्य०)] देखनेवाला ।

दिखहार पु †
संज्ञा पुं० [हिं० देखना + हार (प्रत्य०)] देखनेवाला ।

दिखाई (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० दिखाना + आई (प्रत्य०)] १. दिखाने का काम । २. दिखाने का भाव । ३. वह धन जो दिखाने के बदले में दिया जाय ।

दिखाई (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० देखना + आई (प्रत्य०)] देखने का काम । २. देखने का भाव । ३. वह धन जो देखने के बदले में दिया जाय ।

दिखाऊ †
वि० [हिं० दिखाना या देखना + आऊ (प्रत्य०)] देखने योग्य । दर्शनीय । २. दिखाने योग्य । ३. जो केवल देखने योग्य हो पर काम में न आ सके । ४. दिखौआ । बनावटी ।

दिखादिखी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० देखना] देखादेखी । सामना । उ०— जे सब होत दिखादिखी भई अमी इक आँक । रहैं तिरीछी डीठि अब ह्वै बीछी का डाँक ।—बिहारी (शब्द०) ।

दिखाना
क्रि० स० [हिं०] दे० 'दिखलाना' ।

दिखाव
संज्ञा पुं० [हिं० देखना + आव (प्रत्य०)] १. देखने का भाव या क्रिया । २. दृश्य । जैसे,— इस जगह का दिखाव बहुत अच्छा है ।

दिखावट
संज्ञा स्त्री० [हिं० देखना + आवट (प्रत्य०)] १. दिखलाने का भाव या ढंग । ऊपरी तड़क भड़क । बनावट ।

दिखावटी
वि० [हिं० दिखावट + ई (प्रत्य०)] जो केवल देखने योग्य हो पर काम में न आ सके । दिखौआ ।

दिखावणहार पु
वि० [हिं० दिखाना + (प्रत्य०) हार (= वाला)] दिखानेवाला । उ०— सतगुरु की महिमा अनँत, अनँत किया उपगार । लोचन अनँत उघाड़िया, अनँत दिखावणहार ।— कबीर ग्रं०, पृ० १ ।

दिखावना पु
क्रि० स० [हिं०] दे० 'दिखाना' ।

दिखावा
संज्ञा पुं० [हिं० देखना + आवा (प्रत्य०)] आडंबर । झूठा- ठाठ । ऊपरी तड़क भड़क ।

दिखैया पु †
संज्ञा पुं० [हिं० देखना + ऐया (प्रत्य०)] देखनेवाला ।

दिखैया (२)
संज्ञा पुं० [हिं० दिखाना + ऐया (प्रत्य०)] दिखानेवाला ।

दिखौआ
वि० [हिं० देखना + औआ (प्रत्य०)] वह जो केवल देखने योग्य हो पर काम में न आ सके । बनावटी । दिखाऊ ।

दिखौवा
वि० [हिं० देखना + औवा (प्रत्य०)] दे० 'दिखौआ' ।

दिग्
संज्ञा पुं० [सं०] सं० 'दिक्' का समस्त—पद—प्रयुक्त रूप । जैसे, दिगगंना, दिगीश, दिग्देवता आदि ।

दिगंगना
संज्ञा स्त्री० [सं० दिगङ्गना] दिशा रूपी कन्याएँ । दिक्कन्या ।

दिगंचल (१)
संज्ञा पुं० [सं० दिक् + अञ्जल] दिशा । दिशा की छोर । दिग्भाग । उ०— नामहीन सौरभ में मज्जित हो, हो उठता उच्छवसित दिगंचल ।—अतिभा, पृ० १२ ।

दिगंचल पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० दृग् + अञ्जल] पलक जो आँखों को ढँकता है । नेत्रपट । उ०— भए विलोचन चारु अचंचल । मनहु सकुचि निमि तजे दिगंचल ।—मानस, १ । २३० ।

दिगंत (१)
संज्ञा पुं० [सं० दिगन्त] १. दिशा की छोर । दिशा की अंत ।२. आकाश की छोर । क्षितिज । ३. चारो दिशाएँ । ४. दसों दिशाएँ । यौ०— दिगंतगामिनी = दिशाओं के छोर तक पहुँचनेवाली उत्कट प्रतीक्षा दिगंतगामिनी अभिलाषा....समुद्र गर्जन में संगीत की, सृष्टि करने लगी ।— आकाश०, पृ० १०१ । दिगंत— फलक = क्षितिज रूपी फलक या पृष्ठभूमि । उ०— हो गया सांध्य नभ का रक्ताभ दिगंत फलक ।—अपरा, पृ० ६५ ।

दिगंत पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० दृग् + अन्त] आँख का कोना । उ०— राचे पितंबर ज्यों चहुंघाँ, कछू तैसिये लाली दिगंतन छाई ।— द्विजदेव (शब्द०) ।

दिगंतर
संज्ञा पुं० [सं० दिगन्तर] दो दिशाओं के बीच की स्थान ।

दिगंबर (१)
संज्ञा पुं० [सं० दिगम्बर] १. शिव । महादेव । २. नंगा रहनेवाला जैन यती । दिगंबर यती । क्षपणक । ३. दिशाओं का वस्त्र—अंधकार । तम । अँधेरा । ४. स्कंद का एक नाम (को०) ।

दिगंबर (२)
वि० दिशाएँ ही जिसका वस्त्र हों अर्थात् नंगा । नग्न ।

दिगंबरता
संज्ञा स्त्री० [सं० दिगम्बरता] नंगापन । नग्नता ।

दिगंबरी
संज्ञा स्त्री० [सं० दिगम्बरी] दुर्गा ।

दिगंश
संज्ञा पुं० [सं०] क्षितिज वृत्त का ३६०वाँ अंश । विशेष— आकाश में ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति जानने के लिये क्षितिज वृत्त को ३६० अंशों में विभक्त कर लेते हैं और जिस ग्रह या नक्षत्र का दिर्गश जानना होता है, उसपर से अधस्स्वास्तिक और खस्वस्तिका को छूता हुआ एक वृत्त ले जाते हैं । यही वृत्त पूर्व से विंदु क्षितिज वृत्त को दक्षिण अथवा उत्तर जितने अंश पर काटता है उतने को उस ग्रह या नक्षत्र का दिगंश कहते हैं ।/?/

दिगंश यंत्र
संज्ञा पुं० [सं० दिगंशयन्त्र] वह यंत्र जिससे किसी या नक्षत्र का दिगंश जाना जाय ।

दिग पु
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दिक्' ।

दिगंदति पु †
संज्ञा पुं० [सं० दिगदन्ति] दे० 'दिग्गज' । उ०— कमठ कोल दिगदंति सकल अँग सजग करह प्रभु काज । चहत चपरि सिव चाप चढ़ावन दसरथ को जुवराज ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ३१६ ।

दिगधिप
संज्ञा पुं० [सं०] दिशा की स्वामी । दिग्पाल [को०] ।

दिगपाल
संज्ञा पुं० [सं० दिक्—दिगपाल] दे० 'दिकपाल' । उ०—(क) चालि अचला अचल घालि दिगपाल बल पालि ऋषिराज के वचन परचंड को ।—केशव (शब्द०) । (ख) दिगपालन की भुवपालन की लोकपालन की किन मातु गई च्वै ।—केशव (शब्द०) ।

दिगभित्ति पु
संज्ञा स्त्री० [दिग्भित्ति] दिशारूपी भीत । उ०— महाराज सिंवराज तव सुघर धुव किर्ति । छबि छटान सों छुवति सी छिति अमंग दिगभित्ति ।—भूषण० ग्रं०, पृ० ७४ ।

दिगर
वि० [फा०] दे० 'दीगर' । उ०— बाबर न बरोबर बादशाह, मन दिगर न दीदम दर दुनी ।—अकबरी०, पृ० ६५ ।

दिगवस्थान
संज्ञा पुं० [सं०] पवन । वायु । हवा [को०] ।

दिगबारन पु
संज्ञा पुं० [सं० दिग्वारण] दिग्गज । दिग्वारण । उ०— कहै 'मतिराम' बल विक्रम बिहद्द सुनि, गरजनि परै दिगवारन बिपत्ति मैं ।—मति० ग्रं०, पृ० ३८६ ।

दिगसिंधुर पु
संज्ञा पुं० [सं० दिक् सिन्धुर] दिशाओं के हाथी । दिग्गज । उ०— चलत कटकु दिगसिंधुर डिगहीं । छुभित पयोधि कुधर डगमगहिं ।—मानस, ६ । ७८ ।

दिगागत
वि० [सं०] दूर से आया हुआ । दूरागत [को०] ।

दिगिभ
संज्ञा पुं० [सं०] दिग्गज ।

दिगीश
संज्ञा पुं० [सं०] दिकपाल । दिशाओं के अधिपति ।

दिगीश्वर
संज्ञा पुं० [सं०] १. आठों दिकपाल । २. सूर्य, चंद्रमा आदि ग्रह ।

दिगेश
संज्ञा पुं० [हिं० दिग + ईश] दे० 'दिगीश' ।

दिग्गज (१)
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार वे आठों हाथी जो आठों दिशाओं में पृथ्वी को दबाए रखने और उन दिशाओं की रक्षा करने के लिये स्थापित हैं । विशेष— दिशाओं के पूर्वादि क्रम से उनके नाम ये हैं—पूर्व में ऐरावत, पूर्वदक्षिण के कोने में पुंडरीक, दक्षिण में वामन, दक्षिणपश्चिम में कुमुद, पश्चिम में अंजन, पश्चिमउत्तर के कोने में पुष्पदंत, उत्तर में सार्वभौभ और उत्तर पूर्व के कोने में सप्रतीक या सुप्रतीक ।

दिग्गज (२)
वि० बहुत बड़ा । बहुत भारी । जैसे, दिग्गज विद्वान्, दिग्गज पंडित ।

दिग्गज्ज पु
संज्ञा पुं० [सं० दिग्गज्] दे० 'दिग्गज' । उ०— डगै कौल दिग्गज अग्गै सुधावै ।—ह० रासो, पृ० ६६ ।

दिग्गयंद
संज्ञा पुं० [सं० दिक् + गजेन्द्र, प्रा० गयंद] दिग्गज । उ०— दिग्गयंद लरखरत, परत दसकंठ मुक्ख भर । सूरबिमान हिंमभानु भानु संघटित परस्पर ।—तुलसी ग्रं०, पृ० १५७ ।

दिग्गह †
संज्ञा पुं० [सं० दिक् + ग्रह (= ग्रहण करनेवाला)] दे० 'दिक्पाल' । उ०— रहत दरगह नृपह दिग्गह जीति विग्रह दुसह जह जह ।—रघु० रू०, पृ० २२९ ।

दिग्गी
संज्ञा स्त्री० [सं० दीर्घिका] दे० 'डिग्गी' ।

दिग्घ पु †
वि० [सं० दीर्घ, प्रा० दिग्घ] १. लंबा । उ०— सिर दिग्घ दिग्घ दंतह सुभग जरजराइ बंगर जरिय— पृ० रा०, ६ । १५५ । २. बड़ा । विशाल । उ०— कहै मतिराम सब थावर जंगम जरा जाकी दिग्ध उदर दरी में दरसत है ।—मतिराम (शब्द०) ।

दिग्जय
संज्ञा स्त्री० [सं०] दिग्विजय ।

दिग्ज्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दिगंश' ।

दिग्दंति पु, दिग्दंती
संज्ञा पुं० [सं० दिग्दन्तिन्] दिग्गज । उ०— मेरु कछू न कछू दिग्दंति न कुंडलि कोल कछू न कछू है ।—भूषण ग्रं०, पृ० ३४ ।

दिग्दर्शक यंत्र
संज्ञा पुं० [सं० दिग्दर्शक यन्त्र] डिबिया के आकार का एक प्रकार का यंत्र जिससे दिशा की ज्ञान होता है । कंपास । कुतुबनुमा । विशेष— इसके बीच में लोहे की एक सुई लगी होती है जिसके मुँह पर चुंबकत्व की शक्ति रहती है जिसके कारण सुई का मुँह सदा उत्तर दिशा की ओर रहता है । इसका विशेष व्यवहार जहाजों आदि में दिशा का ज्ञान प्राप्त करने के लिये होता है । इसे कुतुबनुमा और कंपास भी कहते हैं ।

दिग्दर्शन
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो कुछ उदाहरण स्वरूप दिखलाया जाय । नमूना । २. नमूने दिखाने का काम । ३. अभिज्ञान । जानकारी । ४. दे० 'दिग्दर्शक यंत्र' ।

दिग्दर्शनी
संज्ञा स्त्री० [दिग्दर्शन] दे० 'दिग्दर्शक यंत्र' ।

दिग्दाह
संज्ञा पुं० [सं०] एक दैवी घटना जिसमें सूर्यास्त होने पर भी दिशाएँ लाल और जलती हुई सी दिखलाई पड़ती है । विशेष— इसे लोग अशुभ मानते हैं और समझते हैं कि इसके उपरांत युद्ध, दुर्भिक्ष या रोग आदि होता है । बृहत्संहिता में इसके फल आदि का विस्तृत उल्लेख है ।

दिग्देवता
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दिक्पाल' ।

दिग्दैबत
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दिक्पति' [को०] ।

दिग्द्योतक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दिग्दर्शक यंत्र' ।

दिग्ध (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. विषाक्त वाण । जहर में बुझाया हुआ वाण । २. तेल । ३. अग्नि । ४. प्रबंध । निबंध ।

दिग्ध (२)
वि० [सं०] १. विषाक्त । जहर में बुझा हुआ । २. लिप्त । लिपा हुआ ।

दिग्पट
संज्ञा पुं० [सं० दिक्पट] १. दिशारूपी वस्त्र । उ०— भुजग विभूषण दिग्पट धारी । अर्ध अंग गिरिराज कुमारी ।— सबलसिंह (शब्द०) । २. दिशा रूपी वस्त्र धारण करनेवाला । नंगा । दिगंबर ।

दिग्पति
संज्ञा पुं० [स०] दे० 'दिक्पाल' ।

दिग्पाल
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दिक्पाल' ।

दिग्बल
संज्ञा पुं० [सं०] फलित ज्योतिष के अनुसार लग्न आदि पर स्थित ग्रहों का बल । विशेष— यदि लग्न से दसवें स्थान पर मंगल और रवि हों तो दक्षिण यदि लग्न से सातवें स्थान पर शनि हों तो पश्चिम और यदि चौथे स्थान पर शुक्र और चंद्र हों तो उत्तर दिशा बली मानी जाती है । इसकी सहायता से दिकनिर्णय और दूसरी कई प्रकार की गणनाएँ की जाती है ।

दिग्बली
संज्ञा पुं० [सं० दिग्बलिन्] १. फलित ज्योतिष में वह ग्रह जो किसी दिशा के लिये बली हो । २. वह राशि जिसपर किसी ग्रह का बल हो । विशेष— दे० 'दिग्बल' ।

दिग्भ्रम
संज्ञा पुं० [सं०] दिशाओं का भ्रम होना । दिशा भूल जाना ।

दिग्भ्रांति
संज्ञा स्त्री० [सं० दिग्भ्रान्ति] दे० 'दिग्भ्रम' । उ०— लह- राई दिग्भ्रांति तिमिरजा स्रोतस्विनी कराली ।—अपलक, पृ० ५१ ।

दिग्मंडल
संज्ञा पुं० [सं० दिङ्मण्डल] दिशाओं का समूह । संपूर्ण दिशाएँ ।

दिगराज
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दिक्पाल' ।

दिग्वधू
संज्ञा स्त्री० [सं० दिग्वधू] दिशाओं रूपी वधू या स्त्री । दिगं- गना । उ०— दिग्वधू की पिक वाणी क्षीण दिगंत उदास ।— अनामिका, पृ० ५३ ।

दिग्वसन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दिग्वस्त्र' ।

दिग्वस्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. महादेव । शिव । २. नंगा रहनेवाला । जैन यती । क्षपणक । ३. लग्न ।

दिग्वान्
संज्ञा पुं० [सं०] पहरेदार । चौकीदार ।

दिग्वारण
संज्ञा पुं० [सं०] दिग्गज ।

दिग्वास
संज्ञा पुं० [सं० दिग्वासस्] दे० 'दिग्वस्त्र' ।

दिग्विजय
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. राजाओं का अपनी वीरता दिखलाने और महत्व स्थापित करने के लिये देश देशांतरों में अपनी सेना के साथ जाकर युद्ध करना और विजय प्राप्त करना । यह प्रथा प्राचीन काल में थी । उ०— अश्वमेध करवाय युधि- ष्ठिर कुल को दोष मिटायो । करि दिग्विजय विजय को जग में भक्त पक्ष करवायो ।—सूर (शब्द०) । २. अपने गुण, विद्या या बुद्धि आदि के द्वारा देश देशांतरों में अपनी प्रधानता अथवा महत्व स्थापित करना । जैसे, शंकर दिग्विजय ।

दिग्विजयी (१)
संज्ञा पुं० [सं० दिग्विजयिन्] [स्त्री० दिग्विजयिनी] जिसने दिग्विजय किया हो । दिग्विजयय करनेवाला । उ०— गज अहँकार बढ्यो दिग्विजयी लोभ छत्र करि सीस । फौज असत संगति की मेरी ऐसे हौं मैं ईस ।—सूर (शब्द०) ।

दिग्विजयी (२)
वि० दिग्विजय करनेवाला । सभी देशों पर विजय प्राप्त करनेवाला ।

दिग्विभाग
संज्ञा पुं० [सं०] दिशा । ओर । तरफ ।

दिग्विभवित
वि० [सं०] प्रत्येक दिशा में जिसकी ख्याती हो [को०] ।

दिग्व्याप्त
वि० [सं०] दिशाओं में फैला हुआ [को०] ।

दिग्व्यापी
वि० [सं० दिग्व्यापिन्] [वि० स्त्री० दिग्व्यापिनी] जो सब दिशाओं में व्याप्त हो ।

दिग्व्रत
संज्ञा पुं० [सं०] जैनियों का एक व्रत जिसमें कुछ निश्चित समय के लिये यह प्रण कर लेते हैं कि अमुक दिशा (अथवा दिशाओं) में इतनी दूर से अधिक न जायँगे ।

दिग्शिखा
संज्ञा स्त्री० [सं० दिक्शिखा] पूर्व दिशा ।

दिग्सिंधुर
संज्ञा पुं० [सं० दिक्सिन्धुर] दे० 'दिग्गज' ।

दिग्शूल
संज्ञा पुं० [सं० दिक्शूल] दे० 'दिक्शूल' ।

दिघी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दिग्गी' ।

दिघोंच
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का पक्षी जिसका छाती सफेद, डैने काले और कुछ पर सुनहले होते हैं ।

दिघ्घ पु
वि० [सं० दीर्घ] दे० 'दीर्घ' । उ०— कवि चंद सोर चिहुँ ओर घन दिघ्घ सद्द अंत भौ । संकिय सयल्ल जिम रंक उर इम अरन्य आतक भौ ।—पृ० रा०, ६ । ३०१ ।

दिङ्
संज्ञा पुं० [सं०] दिक् शब्द का समासगत रूप ।

दिङ्नक्क्षत्र
संज्ञा पुं० [सं०] विशेष नक्षत्र जो फलित ज्योतिष में विशिष्ट दिशाओं से संबंद्ध माने जाते हैं । विशेष—फलित ज्योतिष में सात सात नक्षत्र प्रत्येक दिशा से संबंद्ध माने जाते हैं और इन्हीं के अनुसार किसी प्रश्न के अंतर्गत दिशा आदि का ज्ञान प्राप्त किया जाता है । जैसे, यदि किसी की कोई चीज चोरी हो जाय अथवा कोई बालक खो जाय तो चीज के चोरी होने अथवा बालक के खोए जाने के समय का नक्षत्र देखकर यह कहा जा सकता है कि चोर अथवा बालक किस दिशा में है ।

दिङनाग
संज्ञा पुं० [सं०] १. दिग्गज । २. एक बौद्ध नैयायिक आर आचार्य, जो मल्लिनाथ के अनुसार कालिदास से समय में हुए थे और उनके बडे़ भारी प्रतिद्वंद्वी थे ।

दिङ्नारि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वेश्या । रंडी । २. बहुत से पुरुषों से प्रेम करनेवाली स्त्री । कुलटा ।

दिङमंडल
संज्ञा पुं० [सं० दिङमण्डल] दिशाओं का समूह ।

दिङमातङ्ग
संज्ञा पुं० [सं० दिङमातङ्ग] दिग्गज ।

दिङमात्र
संज्ञा पुं० [सं०] उदाहरण मात्र । केवल नमूना ।

दिङमूढ़
वि० [सं०] १. जिसे दिग्भ्रम हुआ हो । जो दिशाएँ भूल गया हो । २. मूर्ख । बेवकूफ ।

दिङमोह
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दिगभ्रम' ।

दिच्छना पु
क्रि० स० [सं० दृश, प्रा० दिट्ठ दिच्छ] देखना । अवलोकना । उ०— रति भोग सुरति तिन सौं सदा कबहूँ आन न दिच्छ त्रिय । षिझि सौति सकल एकत्र भय पुरुषातन तिन बंध किय ।—पृ० रा०, १ । ३७० ।

दिच्छा †
संज्ञा स्त्री० [सं० दीक्षा] दे० 'दीक्षा' ।

दिच्छित पु †
संज्ञा पुं० वि० [सं० दीक्षित] दे० 'दीक्षित' ।

दिजराज पु †
संज्ञा पुं० [सं० द्विजराज] दे० 'द्विजराज' ।

दिजोत्तम पु †
संज्ञा पुं० [सं० द्विजोत्तम] दे० 'द्विजोत्तम' ।

दिट्ठि पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० दृष्टि, प्रा० दिट्ठि] दे० 'दृष्टि' । उ०— दिट्ठि कुतूहल कज्ज/?/तो पइट्ठ दरबार ।—कीर्ति० पृ० ४६ ।

दिठ पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० दृष्टि] दे० 'दीठ' । उ०— एकहि व्यापक वस्तु निरंतर विश्व नहीं यह ब्रम्हा बिलासै । ज्यौं नट मंत्रचि सौं दिठ बाँधत है कछु औरई औरई भासै ।—सुंदर ग्रं०, भा० २, पृ० ५८१ । क्रि० प्र०—बाँधना ।

दिठवन
संज्ञा स्त्री० [सं० देवेत्थान] दे० 'देवोत्थन' (एकादशी) ।

दिठादिठी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दीठ (आम्राडित)] देखादेखी । सामना । उ०— लहि सूतैं घर करु गहत दिठादिठी की ईठि । गड़ी सुचित नाहीं करति करि ललचौंहीं डीठि ।—बिहारी (शब्द०) ।

दिठाना † (१)
क्रि० स० [हिं० दीठ + आना (प्रत्य०)] नजर लगाना । दृष्टि लगाना । डीठ लगानां ।

दिठाना (२)
क्रि० अ० दीठ लगना । नजर लगना ।

दिठार
वि० [हिं०] दृष्टिवाला । दिठियार । आँखोंवाला । देखने की क्षमता रखनेवाला । उ०— आँधर कहै सबै हम देखा । तहाँ दिठार बैठि मुख देखा ।—कबीर (शिशु०), पृ० १६४ ।

दिठियार †
वि० [हिं० दीठ (= दृष्टि) + इयार (प्रत्य०)] देखनेवाला । आँखवाला । जिसे दिखाई देता हो ।

दिठोना
संज्ञा पुं० [हिं० दीठ + ओना (प्रत्य०)] दे० 'दिठौना' । उ०— होत दसगुनो अंकु है दिएँ एक ज्यों बिंदु । दिए दिठोना यों बढ़ी आनन आभा इंदु ।—मति० ग्रं०, पृ० ४५३ ।

दिठौना †
संज्ञा पुं० [हिं० दीठ (= दृष्टी) + औना (प्रत्य०)] बच्चों के माथे में भौं के कोने के समीप लगा हुआ काजल का बिंदु जो दृष्टि का दोष शांत करने को लगाया जाता है । वह बिंदी जी बालकों को नजर से बचाने के लिये लगाई जाती है । क्रि० प्र० —लगाना ।

दिढ़ पु †
वि० [सं० दृढ़, प्रा० डिढ, दिढ] दे० 'दृढ़' । उ०— जोगी बार आव सो जेहि भिख्या कै आस । जौं निरास दिढ़ आसन, कत गवनै केहु पास ।—जायसी ग्रं०, पृ० २६८ ।

दिढ़ता पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० दृढ्ता] दे० 'दृढ़ता' ।

दिढ़ाई पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दिढ़ + आई (प्रत्य०)] दे० 'दृढ़ता' ।

दिढ़ाना पु †
क्रि० स० [सं० दृढ़ + आना (प्रत्य०)] १. पक्का करना । दृढ़ करना । मजबूत करना । २. निश्चित करना । उ० —है दिढाइबे जोग जो ताको करत दिढाव ।—भूषण ग्रं०, पृ० ५८ ।

दिढ़ाव पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दृढता अथवा हिं० दिढ़ + आव (प्रत्य०)] दृढ़ बनना । दृढ़ता युक्त करना । दे० 'दृढ़ता' । उ०— है दिढ़ा- इबे जोग जो, ताको करत दिढ़ाव ।—भूषण ग्रं०, पृ० ५८ ।

दिणंद पु †
संज्ञा पुं० [सं० दिनेंद्र] सूर्य । उ०— निजर परक्खे राठवड़, अकबर तेज दिणंद । जांणे व्योम विमान सम, भोम प्रगट्टच्यौ इंद ।—रा० रू०, पृ० १०९ ।

दिणयर, दिणियर पु †
संज्ञा पुं० [सं० दिनकर; प्रा० दिणयर] दे० 'दिनकर' । उ०—आडा डूँगर भुइँ घणी, ति याँ मिलीजइ एम । मनिहूँ खिणहि न मेल्हियइ, चकवी दिणियर जेम ।—ढोला०, दू० ७२ ।

दित
वि० [सं०] विभक्त । कटा हुआ । छिन्न । खंडित [को०] ।

दितवार †
संज्ञा पुं० [सं० आदित्यवार] दे० 'आदित्यवार' ।

दिति (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कश्यप ऋषि की एक स्त्री जो दक्ष प्रजापति की एक कन्या और दैत्यों की माता थीं । विशेष—जब इनके सब पुत्र (दैत्य) इंद्र और देवताओं द्वारा मारे गए तब इन्होंने अपने पति कश्यप ऋषि से कहा कि अब मैं ऐसा पराक्रमी पुत्र चाहती हूँ जो इंद्र का भी दमन कर सके । कश्यप ने कहा— इसके लिये तुम्हें सौ वर्ष तक गर्भ धारण करना पडे़गा और गर्भकाल में बहुत ही पवित्रतापूर्वक रहना पडे़गा । दिति को गर्भ हुआ और वह ९९ वर्ष तक बहुत पवित्रतापूर्वक रहीं । अंतिम वर्ष में वह एक दिन रात के समय बिना हाथ पैर धोए जाकर सो रहीं । इंद्र ताक में लगे ही थे; इन्हें अपवित्र अवस्था में पाकर उन्होंने इनके ग्रभ में प्रवेश किया और अपने वज्र से जरायु के सप्त टुकडे़ कर डाले । उस समय शिशु इतना जोर से रोया और चिल्लाया कि इंद्र घबरा गए । तब उन्होंने सात टुकडों में से हर एक के फिर सात सात टुकडे टकडे़ किए । ये ही उनचास खंड मरुत् कहलाते हैं । दे० 'मरुत्' । विशेष— इस शब्द में 'पुत्र' वाची शब्द लगाने से 'दैत्य' अर्थ होता है । जैसे, दितिसुत, दितितनय, दितिनंदन । २. तोड़ने या काटने की क्रिया । खंडन । ३. दाता । वह जो देता हो ।

दिति (२)
संज्ञा पुं० राजा । नरेश [को०] ।

दितिकुल
संज्ञा स्त्री० [सं०] दैत्यवंश ।

दितिज
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० दितिजा] दिति से उत्पन्न दैत्य ।

दितिननय
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दितिसुत' [को०] ।

दितिपुत्र
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दितिसुत' [को०] ।

दितिसुत
दैत्य । राक्षस । असुर ।

दित्य (१)
संज्ञा पुं० [सं०] दैत्य ।

दित्य (२)
वि० जो छेदने या काटने के योग्य हो ।

दित्सा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दान करने की इच्छा ।

दित्सु
वि० [सं०] जो दान करना चाहता हो ।

दित्स्य
वि० [सं०] दान करने योग्य । जो दान किया जा सके ।

दिदार †
संज्ञा पुं० [फा० दीदार] दे० 'दीदार' । उ०— मोर तोर एतन दिदार बहुरि नहिं पाइब हो ।—धरम०, पृ० ६३ ।

दिदारी †
संज्ञा स्त्री० [फा० दीदार] दीदारी । दर्शन होना । उ०— यही दिदारी दार है सुनहु मुसाफिर लोग ।—पलटू०, भा० १ पृ० २२ ।

दिदोरा
संज्ञा पुं० [हिं० दिदोरा] दे० 'ददोरा' । उ०— इसकी़ परवा न रही कि ताजा हवा मिलती है या नहीं, भोजन कैसा मिलता है, कपडे़ कितने मैले हैं, उनमें कितने चिलवे पडे़ हुए हैं कि खुजाते खुजाते देह में दिदोरे पड़ जाते हैं ।—काया०, पृ० २८२ ।

दिदृक्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] देखने की अभीलाषा ।

दिदृक्षु
वि० [सं०] जो देखना चाहता है ।

दिगृक्षेण्य
वि० [सं०] दे० 'दिदृक्षेय' ।

दिदृक्षेय
वि० [सं०] दर्शनीय । जो देखने योग्य हो ।

दिद्यु
संज्ञा पुं० [सं०] १. द्योतित वज्र । २. वाण । ३. आकाश । व्योम (को०) ।

दिधि
संज्ञा पुं० [सं०] १. धीरता । धैर्य । २. धारण करने की क्रिया ।

दिधिषु
संज्ञा पुं० [सं०] १. पहले एक बार ब्याही हुई स्त्री का दूसरा पति । २. गर्भाधान करनेवाला मनुष्य ।

दिधषू
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्त्री जिसके दो ब्याह हुए हों । द्विरूढा । २. वह स्त्री या कन्या जिसका विवाह उसकी बड़ी बहन के विवाह के पहले हुआ हो ।

दिधिषूपति
संज्ञा पुं० [सं०] १. दे० 'दिधिषु' । २. वह व्यक्ति जो अपने भाई की विधवा स्त्री से विषयरत हो (को०) ।

दिधीषू
संज्ञा स्त्री० दे० [सं०] 'दिधिषू' [को०] ।

दिन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. उतना समय जिसमें सूर्य क्षितिज के ऊपर रहता है । सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक का समय । सूर्य की किरणों के दिखाई पड़ने का सारा समय । विशेष— पृथ्वी अपने पक्ष पर घूमती हुई सूर्य की परिक्रमा करती है । इस परिक्रमा में इसका जो आधा भाग सूर्य की ओर रहने के कारण प्रकाशित रहता है, उसमें दिन रहता है, बाकी दूसरे भाग में रात रहती है । मुहा०— दिन के तारे दिखाई देना = इतना अधिक मानसिक कष्ट पहुँचना कि बुद्धि ठिकाने न रहे । दिन को दिन रात को रात न जानना या समझना = अपने सुख या विश्राम आदि का कुछ भी ध्यान न रखना । जैसे,—इस काम के लिये उन्होंने दिन को दिन और रात को रात न समझना । दिन चढ़ना = सूर्योदय होना । सूर्य निकलने के उपरांत कुछ समय बीतना । दिन छिपना = सूर्यास्त होना । संध्या होना । दिन डूबना = सूर्य डूबना । संध्या होना । दिन ढलना = संध्या का समय निकट आना । सूर्यास्त होने को होना । दिन दहाडे़ या दिन दहाडे़ = बिलकुल दिन के समय । ऐसे समय जब कि सब लोग जागते और देखते हों । जैसे,— दिन दहाडे़ उनके यहाँ, दस हजार की चोरी हो गई । दिन दोपहर या दिन धौले = दे० 'दिन दहाडे़' । दिन दूना रात चौगुना होना या बढ़ना = बहुत जल्दी जल्दी और बहुत अधिक बढ़ना । खूब उन्नति पर होना । जैसे,— आजकल उनकी जमींदारी दिन दूनी रात चौगुनी हो रही है । उ०— जो दिन दूनी और रात चौगुनी उन्नति करता ही चला जाता ।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० ३१२ । दिन निकलना = दिन चढ़ना । सूर्योदय होना । दिन बूड़ना = दे० 'दिन डूबना' । दिन मुँदना = दे० 'दिन बूड़ना' । दिन होना = दिन निकलना । सूर्य उदय होना । दिन चढ़ना । यौ०— दिन रात = सर्वदा । हर वक्त ।२. उतना समय जितने में पृथ्वी एक बार अपने अक्ष पर घूमती है अथवा पृथ्वी के विशिष्ट भाग के दो बार सूर्य के सामने आने के बीच का समय । आठ पहर या चौबीस घंटे का समय । विशेष— साधारणतः दिन दो प्रकार का माना जाता है—एक नाक्षत्र, दूसरा सौर या सावन । नाक्षत्र उतने समय का होता है जितना किसी नक्षत्र को एक बार, याम्योत्तर रेखा पर से होकर जाने और फिर दुबारा याम्योत्तर रेखा पर आने में लगता है । यह समय ठिक उतना ही है जितने में पृथ्वी एक बार अपने अक्ष पर घूम चुकती है । इसमें घटती बढ़ती नहीं होती, इसी से ज्योतिषी नाक्षत्र दिनमान का व्यवहार बहुत करते हैं । सूर्य को याम्योत्तर पर से होकर जाने और फिर दोबारा याम्योत्तर रेखा पर आने में जितना समय लगता है उतने समय का सौर या सावन दिन होता है । नाक्षत्र तथा सौर दिन में प्रायः कुछ न कुछ अंतर हुआ करता है । यदि किसी दिन याम्योत्तर रेखा पर एक ही स्थान पर और एक ही समय सूर्य के साथ कोई नक्षत्र भी हो तो दूसरे दिन उसी स्थान पर नक्षत्र तो कुछ पहले आ जायगा पर सूर्य कुछ मिनटों के उपरांत आवेगा । यद्यपि नाक्षत्र और सावन दोनों प्रकार के दिन पृथ्वी के अक्ष पर घूमने से संबंध रखते हैं, और नक्षत्र के याम्यो- त्तर पर आने में बराबर उतना ही समय लगता है, तथापि सूर्य याम्योत्तर पर ठीक उतने ही समय में सदा नहीं आता, कुछ कम या अधिक समय लेता है, जिसके कारण सौर दिन का मान भी घटता बढ़ता रहता है । अतः हिसाब ठीक रखने और सुभीते के लिये एक सौर वर्ष को तीन सौ साठ भागों में विभक्त कर लेते हैं और उनके एक भाग को एक सौर दिन मानते हैं । हिंदुओं में दिन का मान सूर्योदय से सूर्योदय तक होता है और प्रायः सभी प्राचीन जातियों में सूर्योदय से सूर्योदय तक दिन का मान होता था । आजकल हिंदुओं और एशिया की दूसरी अनेक जातियों में तथा युरोप के आस्ट्रिया, टर्कि और इटली देश में भी सूर्योदय से सूर्योदय तक दिन माना जाता है । यूरोप के अधिकांश देशों तथा मिस्र और चीन में आधी रात से आधी रात तक दिन माना जाता है । प्राचीन रोमन लोग भी आधी रात से ही दिन का आरंभ मानते थे । आजकल भारतवर्ष में सरकारी कामों में भी दिन का प्रारंभ आधी रात से ही माना जाता है । पर अपनी गणना के लिये योरोप के ज्योतिषी मध्याह्न से मध्याह्न तक दिन मानते हैं । मुहा०— दिन दिन या दिन पर दिन = नित्य प्रति । सदा । हमेशा । हर रोज । ३. समय । काल । वक्त । जैसे,—(क) इतने दिन की रखी हुई चीज इसने खो दी । (ख) भले दिन, बुरे दिन । मुहा०— दिन काटना = समय बितना । किसी तरह समय गुजार देना । दिन गँवाना = वृथा समय खोना । दिन पूरे करना = निर्वाह करना । समय बिताना । दिन बिगड़ना = बुरे दिन होना । विपत्ति का अवसर आना । दिन भुगताना दिन काटना । समय बिताना । यौ०— पतले दिन = नाजुक वक्त । बुरे दिन । खोटे दिन । क्रि० प्र०—बिताना ।—बीतना । ४. नियत या उपयुक्त काल । निश्चित या उचित समय । जैसे,— कोई दिन दिखाकर चलेंगे । (ख) अब इसके दिन पूरे हो गए, यह मरेगा । मुहा०— दिन आना = समय पूरा हो जाना । अंतिम समय आना । दिन धरना = दिन ठहरना । दिन निश्चित करना । बिवाहिता की बिदाई का दिन स्वीकार करना । दिन धराना = दिन स्थिर कराना । दिन निश्चित कराना । मुहूर्त निकलवाना । उ०— अति परम सुंदर पालना गढ़ि ल्याय रे बढै़या ।/?//?/पालनो आन्यो सबहि अति मन मान्यो नीको सो दिन धराइ सखिन मंगल गवाय रंग महल में पोढ्यो है कन्हैया ।—सूर (शब्द०) । दिन पूरे होना या दिन पूरे हो जाना = मृत्यु का समय आना । जिंदगी पूरी होना । उ०— रावी, जिंदगी के दिन तो पूरे हो गए । अब दम के दम का मेहमान है । फिसाना०, भा० ३, पृ० ८७ । ५. विशेष रूप से बिताया जानेवाला काल । वह समय जिसके बीच कोई विशेष बात हो । जैसे, अच्छे या बुरे दिन, गर्भ के दिन, जवानी के दिन । मुहा०— दिन चढ़ना = किसी स्त्री का गर्भवती हेना । दिन पड़ना = कुसमय का आना । बुरा समय आना । दिन फिरना = दुर्भाग्य काल के उपरांत सौभाग्य काल आना । बुरे दिनों के बाद अच्छे दिन आना । उ०— दिन और रात्री का सा अंतत हो जाना = बहुत बड़ा फर्क पड़ जाना । महान अंतर हो जाना । उ०— न स्वर्ग और न पाताल किंतु इसी पृथ्वी के युरोप और भारत ही में दिन और रात्रि का सा अंतर हो गया है ।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० १८५ । दिन को शेर रात को भेड़ = मन में कभी साहस और कभी कम- जोरी होना । कभी साहसी और कभा पस्तहिम्मत होना । दृढ़ता का अभाव होना । उ०— बेगम-ऐसा भी डर किस काम का । दिन को शेर रात को भेड़ ।—फिसाना०, भा० ३, पृ० २२७ । दिन घड़ी (घरी) न देखना = दिन और मुहूर्त का विचार न करना । उ०— पेम पंथ दिन घरी न देखा । तब देखै जब होइ सरेखा ।—जायसी ग्रं०, (गुप्त) पृ० २०६ । दिन घड़ी देना = सुदिन और मुहुर्त बताना । उ०— मरि जो चलै गाँग गति लेई । तेहि दिन घरी कहाँ को देई ।—जायसी ग्रं०, (गुप्त), पृ० २०६ । दिन बहुरना = फिर से अच्छे दिन आना । दिन फिरना । उ०— और उस वक्त जब नवाब साहब ने हुक्का माँगा तो वह तेरी तरफ कनखियों से देख रहे थे । मैंने भाँप लिया कि आ गया दिल । अब लाडो के दिन बहुरे ।—सैर०, पृ० २७ । दिन भरना = दुर्भाग्य का काल बिताना । बुरे दिन काटना । दिन लौटना = दे० 'दिन बहुरना' । दिनों से उतरना = जवानी ढलना । युवावस्था का बीत जाना ।

दिन (२)
क्रि० वि० सदा । हमेशा । दिन—प्रतिदिन । उ०—(क) बावरो रावरो नाह भवानी । दानी बड़ो दिन दिए बिनु बेद बड़ाई भानी ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) गुरु पितु मातु महेसभवानी । प्रणवहुँ दीनबंधु दिन दानी ।—तुलसी (शब्द०) । (ग) हिंडोरे झूलत लाल दिन दूलह दुलहिन बिहारी देखि री ललना ।—हरिदास (शब्द०) ।

दिनअर पु
संज्ञा पुं० [सं० दिनकर, प्रा० दिणअर] सूर्य । दिनकर उ०— (क) कीन्हेसि दिन, दिनअर, ससि राति । कीन्हेसि नखत तराइन पाँती ।—जायसी ग्रं०, पृ० १ । (ख) गहन छूट दिनअर कर ससि सों भएउ मेराव । मँदिर सिंहासन साजा बाजा नगर बधाव ।—जायसी (शब्द०) ।

दिनकंत पु
संज्ञा पुं० [सं० दिन + हिं० कंत (= कांत)] सूर्य ।

दिनकर
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य । २. आक । मंदार । यौ०— दिनकरकन्या । दिनकरतनय = दे० 'दिनकरसुत' । दिनकर- तनया, दिनकरसुता = यमुना ।

दिनकरकन्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] यमुना । उ०— सुससरि सरसइ दिनकर कन्या । मेकल सुता गोदावरी धन्या ।—मानस, २ । १३८ ।

दिनकरसुत
संज्ञा पुं० [सं०] १. यम । २. शनि । ३. सुग्रीव । ४. अश्निनीकुमार । ५. कर्ण ।

दिनकरसुता
संज्ञा स्त्री० [सं०] यमुना ।

दिनकर्ता
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दिनकर' ।

दिनकृत्
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दिनकर' ।

दिनकेशर, दिनकेशव
संज्ञा पुं० [सं०] अंधकार । अँधेरा ।

दिनक्षय
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'तिथिक्षय' ।

दिनचर्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] दिनभर का काम धंधा । दिन भर का कर्तव्य कर्म ।

दिनचारी
संज्ञा पुं० [सं० दिनचारिन्] दिन को चलनेवाला सूर्य ।

दिनज्योति
संज्ञा स्त्री० [सं० दिनज्योतिस्] १. दिन का उजेला । २. धूप । घाम ।

दिनताई पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दीन, हिं० दिन + ताई (प्रत्य०)] दे० 'दीनता' । उ०— नामहिं गहहु रहहु दुनिया में, गहे रहहु दिनताई ।—जग० श०, भा० २, पृ० ८९ ।

दिनताय †
संज्ञा स्त्री० [सं० दीनता, हिं० दिनताई] दे० 'दीनता' उ०— तजहु गर्व गुमान मैं तै हिये रहु दिनताय ।—जग० बानी० पृ० ६९ ।

दिनदानी पु †
संज्ञा पुं० [सं० दिन + दानी] प्रतिदिन दान करनेवाला । रोज देनेवाला । गरीबपरवर ।

दिन दिन
क्रि० वि० [सं० दिनानुदिन] प्रतिदिन । कालक्रम से रोजमर्रा । उ०— दिन दिन सयगुन भूपति भाऊ । देखि सराह महा मुनि राऊ ।—मानस, १ । ३६० ।

दिनदीन पु
वि० [सं० दिन + दीन] दिन दिन दीन । अत्यंत दीन । उ०— ऐसे दिनदीन पै दया न आई दई तोहि । विष भोयो विषम बियोग सर मारतै ।—घनानंद, पृ० ५९ ।

दिनदीप
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य ।

दिनदुःखित
संज्ञा पुं० [सं०] चकवा पक्षी ।

दिनदूलह पु
संज्ञा पुं० [सं० (प्रति) दिन + हिं० दूल्हा] प्रतिदिन दूल्हा । उ०— सुंदर साँवरे तै दिनदूलह चोप चहूँ दिस चौर ढरे जू ।—घनानंद, पृ० १३९ ।

दिनदेव पु
संज्ञा पुं० [सं० दिन + देव] रवि । दिनकर । सूर्य । उ०— दिनदेव दिवाकर दिवाकर दीन दयाल ।—घनानंद, पृ० ४७६ ।

दिननाथ
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य । उ०— चंद जंगावहु कुमुदनी पद्मिनि ही दीननाथ ।—शकुंतला, पृ० ९७ ।

दिननायक
संज्ञा पुं० [सं०] दिन के स्वामी, सूर्य ।

दिननाह पु
संज्ञा पुं० [सं० दिन + नाथ, प्रा० णाह] दे० 'दिननाथ' ।

दिनप
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दिनपति' ।

दिनपति
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य । २. आक । मंदार । ३. दिन या वार के पति । दे० 'दिन' ।

दिनपाकी अजीर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्यक के अनुसार एक प्रकार का अजीर्ण जिसमें एक बार का किया हुआ भोजन आठ पहर में पचता है और बीच में भूख नहीं लगती ।

दिनपात
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'तिथिक्षय' ।

दिनपाल
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य ।

दिनप्रणी
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य [को०] ।

दिनबंधु
संज्ञा पुं० [सं० दिनबन्धु] सूर्य । २. आक । मंदार ।

दिनबल
संज्ञा पुं० [सं०] फलित ज्योतिष में वह राशि जो दिन के समय बली हो । विशेष—फलित ज्योतिष में बारह राशियों में से पाँचवीं, छठी, सातवीं, आठवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं ये छह राशियाँ दिनबल या दिनबली मानी जाती है और बाकी रात्रिबल ।

दिनभृति
संज्ञा पुं० [सं०] रोजही पर काम करनेवाला मजदूर । प्रतिदिन मजदूरी लेकर काम करनेवाला मजूरा ।

दिनमणि
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य । भास्कर । रवि । २. आक । मदार ।

दिनमनि पु †
पुं० [सं० दिनमणि] दे० 'दिनमणि' । उ०— सभा सरवर लोक कोकनद कोकगन, प्रमुदित मन देखि दिनमनि भोर हैं ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ३०७ ।

दिनमयूख
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य । २. आक । मंदार ।

दिनमल
संज्ञा पुं० [सं०] मास । महीना ।

दिनमान
संज्ञा पुं० [सं०] दिन का प्रमाण । दिन का अवधि । सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के समय का मान । विशेष— दिन सदा घटता बढ़ता रहता है, अतः सुभीते के लिये हिसाब लगाकर ये जान लिया जाता है कि कौन दिन कितना बड़ा अर्थात् कितनी घड़ियों और कितने पलों का, होगा । सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के समय का यही मान दिनमन कहलाता है ।

दिनमाली
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य ।

दिनमुख
संज्ञा पुं० [सं०] प्रभात । सबेरा ।

दिनमूर्धा
संज्ञा पुं० [सं० दिनमूर्द्धन्] उदयाचल पर्वत [को०] ।

दिनरत्न
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य । २. आक । मदार ।

दिनराइ पु
संज्ञा पुं० [सं० दिनराज, हिं० दिनराइ] दे० 'दिनराज' ।

दिनराउ पु
संज्ञा पुं० [सं० दिनराज, हिं० राव, राउ] दे० 'दिनराज' । उ०— विधि हरि हरु दिसिपति दिनराऊ । जे जानहि रघुबीर प्रभाऊ ।—मानस, १ । ३२१ ।

दिनराज
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य ।

दिनराव पु
संज्ञा पुं० [सं० दिनराज] सूर्य । उ०— मो भक्तन को यहै सुभाव । जैसे उदित होतु दिनराव ।—नंद ग्रं०, पृ० २५४ ।

दिनरैन पु
क्रि० वि० [सं० दिनरजनी] रातदिन । सदा । हमेशा ।

दिनशेष
संज्ञा पुं० [सं०] दिनांत । सायंकाल । संध्या ।

दिनही †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'दिनाती' ।

दिनांक
संज्ञा पुं० [सं० दिन +अङ्क] दिन का अंक या संध्या । तारीख ।

दिनांड
संज्ञा पुं० [सं० दिनाण्ड] अंधकार । अँधेरा ।

दिनांत
संज्ञा पुं० [सं० दिनान्त] सायंकाल । संध्या । शाम ।

दिनांतक
संज्ञा पुं० [सं० दिनान्तक] अंधकार । अँधियारा ।

दिनांध
संज्ञा पुं० [सं० दिनान्ध] वह जिसे दिन को न सूझे । जैसे,— उल्लू, चमगादड़ आदि ।

दिनांश
संज्ञा [सं०] १. दिन के प्रातःकाल, मध्याह्न और सायंकाल में तीन अंश या विभाग जो इस प्रकार है—प्रातःकाल, संग/?/मध्याह्न, अपराह्न और सायंकाल । इनमें से प्रत्येक अंश क्रमशः सूर्योदय के उपरांत तीन मुहूर्त तक माना जाता है ।

दिना †
संज्ञा पुं० [सं० दिनों] दे० 'दिन' । उ०— बड्डी रैनि तनक से दिना । क्यों मरिए पिय प्यारे बिना ।—नंद ग्रं०, पृ० १३८ ।

दिनाइ †
संज्ञा पुं० [देश०] दाद । विशेष— दे० 'दाद' ।

दिनाई पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० दिन + हिं० आना] कोई ऐसी विषाक्त वस्तु जिसके खाने से थोडे़ ही समय में मृत्यु हो जाय । अंतिम दिन (मृत्युकाल) लानेवाली चीज । उ०— (क) काके सिर पढ़ि मंत्र दियो हम कहाँ हमारे पास दिनाई ।—सूर (शब्द०) । (ख) लगी मिम्म को अतुल दिनाई । तुरतहि मीच समय बिन आई ।—लाल (शब्द०) । (ग) कहै पदमाकर जो कौऊ नर जैसे तैसे, तन देत गंगातीर तजिकै महान शोक । सो तौ देत व्याधै विष दुखन दिनाई देत, पापन के पुंज को पहारन को ठोक ठोक ।—पद्माकर (शब्द०) ।

दिनागम
संज्ञा पुं० [सं०] प्रभात । तड़का । सबेरा ।

दिनाती
संज्ञा स्त्री० [हिं० दिन + आती (प्रत्य०)] १. मजदूरों, विशेषतः खेत में काम करनेवालों का एक दिन का काम । २. मजदूरों की एक दिन की मजदूरी ।

दिनात्यय
संज्ञा पुं० [सं०] संध्या । सूर्यास्त [को०] ।

दिनादि
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दिनागम' ।

दिनाधीश
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य । २. आक । मदार ।

दिनानुदिन
क्रि० वि० [सं० दिन + अनुदिन] दिन दिन । प्रतिदिन रोज व रोज ।

दिनाय
संज्ञा स्त्री० [देश० दिनाइ] दाद का रोग ।

दिनार (१)
संज्ञा पुं० [सं० दीनार] दे० 'दीनार' ।

दिनार † (२)
वि० [सं० दि + हिं० आर (प्रत्य०)] बहुत दिनों का ढेरदिनी । पुराना ।

दिनारु †
वि० [सं० दिनालु] बहुत दिनों का । पुराना ।

दिनार्द्ध
संज्ञा पुं० [सं०] मध्याह्न । दोपहर ।

दिनावा
संज्ञा स्त्री० [देश०] प्रायः हाथ भर लंबी एक प्रकार की मछली जो हिमालय तथा आसाम की नदियों में पाई जाती है । हरद्वार में यह बहुत अधिकता से होती है ।

दिनास्त
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्यास्त । दिनांत । संध्या ।

दिनिअर
संज्ञा पुं० [सं० दिनकर] दे० 'दिनकर' ।

दिनिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] एकत दिन का वेतन या मजदूरी ।

दिनियर पु †
संज्ञा पुं० [सं० दिनकर प्रा० दिणियर] सूर्य ।

दिनी
वि० [हिं० दिन + ई (प्रत्य०)] बहुत दिनों का पुराना । प्राचीन । उ०— भलौ बुद्धि तेरे जिय उपजी । ज्यों ज्यों दिनी भई त्यों निपजी ।—सूर (शब्द०) ।

दिनेर
संज्ञा पुं० [सं० दिनकर, हिं० दिनियर] सूर्य । दिनकर । उ०— अनधन तीन सेर निशि माँहा । हो दिनेर जेहि के तू छाँहा ।—जायसी (शब्द०) ।

दिनेश
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य । उ०— दिनेश वंश मँडनं । महेश चाप खंडनं ।—मानस, ३ । ४ । २. आक । मदार । ३. दिन के अधिपति ग्रह ।

दिनेशात्मज
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य के पुत्र शनि । २. यम । ३. सुग्रीव । ४. कर्ण ।

दिनेशात्मजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. यमुना । २. तापती नदी [को०] ।

दिनेश्वर
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दिनेश' ।

दिनेस
संज्ञा पुं० [सं० दिनेश] दे० 'दिनेश' । उ०— लोल दिनेस त्रिलोचन लोचन करनघंटा सी ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ४६५ ।

दिनोदिन
क्रि० वि० [सं० दिनन्दिन] प्रतिदिन । अनुदिन । उ०— सिर पर बैठा काल दिनोदिन वादा पूजै ।—पलटू०, भा० १, पृ० २० ।

दिनौंधी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दिन + अंध + ई (प्रत्य०)] आँख का एक प्रकार का रोग जिसमें दिन के समय सूर्य की तेज किरणों के कारण बहुत कम दिखाई देता है ।

दिपट
संज्ञा स्त्री० [सं० दीप्ति] दे० 'दीप्ति' । उ०— दिपट पटीजै नभ नखत जटीजै चक्र रतन पटीजै टाटी चुरावान में ।— पजनेस०, पृ० १० ।

दिपति पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० दीप्ति] दे० 'दीप्ति' ।

दिपति पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दीप्ति] चमकना । प्रकाशमान होना । उ०— कोटि भानु दुति दिपत है मोहन छिगुरी छोर । याते बरनी ओट हूँ दृग हेरत वह ओर ।—रसनिधि (शब्द०) ।

दिपाना † (१)
क्रि० अ० चमकना । प्रकाशित होना । दे० 'दिपना' । उ०— कनक कलस मुख चंद दिपाहीं । रहस केलि सन आवाहिं जाहीं ।—जायसी (शब्द०) ।

दिपाना पु (२)
क्रि० स० [हिं० दिपना] दीप्त करना । चमकाना । प्रकाशित करना ।

दिप्त
संज्ञा स्त्री० [सं० दीप्ति] दे० 'दीप्ति' । उ०— राति नहिं तहँ दिवस नाहीं, अजब दिप्त सुहाय ।—जग० बानी, पृ० १२० ।

दिब
संज्ञा पुं० [सं० दिव्य] वह परीक्षा जो निर्दोषता या अपने कथन की सत्यता प्रमाणित करने के लिये कोई दे । जैसे, अग्निपरीक्षा आदि । उ०— (क) काहे को अपराध लगावति कब कीनी हम चोरी ।...जैसे जब चाहो तब तैसे बावन दिब मैं दैहों ।— (शब्द०) । (ख) साँप सभा सावर लबार भए देव दिब दुसह साँसति कीजै आगे ही या तन की ।—तुलसी (शब्द०) ।

दिबि
वि० [सं० दिव्य] दे० 'दिव्य (४)' । उ०— दिबि दृष्टि करि जब देषिए तब सकल ब्रह्म बिलास रे ।—सुंदर ग्रं०, भा० २, पृ० ८३१ ।

दिब्ब †
संज्ञा पुं० [सं० दिव्य] दे० 'दिव्य' । उ०— कहि कै सुओ छोड़ि दई पाती । जानहु दिब्ब छुअत तसि ताती ।—पद्मावत पृ० २७४ ।

दिमंकर †
संज्ञा पुं० [सं० दिवाकर] सूर्य । सहस्ररश्मि । सहस्रार । उ०— रुनक झुनक बाजै आदि अक्षर दिमंकर बजि तार हो ।—कबीर सा०, पृ० ८८ ।

दिमंकर सो
वि० [सं० द्वि + उत्तर + शत] सौं और दो । एक सौ दो । विशेष—इसका व्यवहार पहाडे़ में होता है । जैसे, सत्तरह छके दिमंकर सो — १७ * ३ = १०२ ।

दिमाक पु
संज्ञा पुं० [अ० दिमाग] दे० 'दिमाग' । उ०— बैठयौ बिनोद भरच्यौ दिन दूलह कंत दिली को दिमाक सवाई ।— हम्मीर०, पृ० ९ ।

दिमाकदार पु
वि० [हिं०] दे० 'दिमागदार' । उ०— सोहते सवार सरदार जे दिमाकदार जुद्ध माँहि क्रुद्ध जे अदम्य ठहरात हैं ।—गोपाल (शब्द०) ।

दिमाग
संज्ञा पुं० [अ० दिमाग] १. सिर का गूदा । मस्तिष्क । भेजा । मुहा०— दिमाग खाना या चाटना = व्यर्थ की बातें कहना जिससे किसी के सिर में दर्द होने लगे । बहुत बकवाद करना । जैसे,— आजकल वे रोज सवेरे आकर दिमाग चाटते (या खाते) हैं । दिमाग खाली करना = दिमाग चाटना । ऐसा काम करना जिसमें मानसिक शक्ति का बहुत अधिक व्यय हो । मगजपच्ची करना । जैसे,— उन्हें सब बातें समझाने के लिये हमें घंटों दिमाग खाली करना पड़ा । दिमाग चढ़ना या आस्मान पर होना = बहुत अधिक घमंड होना । अभिमान होना । दिमाग न पाया जाना या न मिलना = दिमाग चढ़ना । दिमाग परेशान करना = दे० 'दिमाग खाली करना ' । दिमाग में खलल होना = मस्तिष्क में ऐसा विकार उत्पन्न होना । जिससे विवेक शक्ति न रह जाय । सिड़ी होना । पागल होना । यौ०— दिमागचट । दिमाग रौशन । २. मानसिक शक्ति । बुद्धि । समझ । जैसे,—(क) उनका दिमाग अच्छा है, सब मामला बहुत जल्दी समझ लेते हैं । (ख) जरा दिमाग लगाओ, कोई उपाय निकल ही आवेगा । मुहा०— दिमाग लड़ाना = बहुत अच्छी तरह विचार करना । खूब सोचना । जैसे,— इस काम में बहुत दिमाग लड़ानें की जरारत है । यौ०— दिमागदार । ३. अभिमान । घमंड । शेखी । क्रि० प्र०—करना ।—रखना ।—होना । मुहा०— दिमाग झड़ना = अहंकार नष्ट होना । अभिमान टूटना । यौ०— दिमागदार ।

दिमागचट
वि० [अ० दिमाग + हिं० चट (= चाटना)] बहुत अधिक बकवाद करके दूसरों को व्याकुल करनेवाला । बक्की ।

दिमागदार
वि० [अ० दिमाग + फा० दार (प्रत्य०)] १. जिसकी मानसिक शक्ति बहुत अच्छी हो । बहुत बडा समझदार । २. अभिमानी । घमंडी ।

दिमागदारी
संज्ञा स्त्री० [अ० दिमाग + फा० दार + ई (प्रत्य०)] १. दिमागदार होना । समझदारी । २. मगरूरी । अभिमान ।

दिमागरौशन
संज्ञा पुं० [अ० दिमाग + फा० रौशन] मगजरौशन । नास । सुँघनी ।

दिमागी
वि० [अ० दिमाग + हिं० ई (प्रत्य०)] १. दिमाग का । दिमाग संबंधी । २. दे० 'दिमागदार' ।

दिमात पु † (१)
संज्ञा पुं०, वि० [सं० द्विमातृ] दो माताओंवाला । वह जिसकी दो माताएँ हों ।

दिमात (२)
वि०, संज्ञा पुं० [सं० दीवान] वह जिसमें दो मात्राएँ हों । दो मात्राओंवाला ।

दिमान पु
संज्ञा पुं० [फा० दीवान] दीवान । मंत्री । उ०— सुदि- मान दूलहजू दिमान खुमान सिंह सुसान में ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० २३ ।

दिमाना पु †
वि० [फा० दीवानह्] [वि० स्त्री० दिमानी] दे० 'दिवाना' । उ०— स्याम सघन घन घेरि कै रस बरस्यो रसखान०, पृ० १९ ।

दिम्मस †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दुरमट] घासदार ढेलों को जमा करके दुरमट से पीटने की क्रिया ।

दियंदा †
वि० [पं०] देनेवाला । उ०— साजा भला समापजैं, दान दियंदा दीह ।—बाँकी० ग्रं०, भा० १, पृ० ४६ ।

दियट
संज्ञा स्त्री० [सं० दीपपट्ट या दीपपृष्ठ या दीपपीठ] दे० 'दीअट' ।

दियत †
संज्ञा स्त्री० [हिं० देना] वह धन जो किसी को मार डालने या अंग भंग करने के बदले में दिया जाय ।

दियना पु (१)
क्रि० अ० [सं० दीप्त] दीप्त होना । दिपना । चमकना । उ०— बाल केलि बात बस झलकि झलमलत सोभा की दीयट मानो रूप दीप दियो है ।—तुलसी ग्रं०, पृ० २७३ ।

दियना † (२)
संज्ञा पुं० [सं० दीप] दे० 'दीआ' ।

दियरा
संज्ञा पुं० [सं० दीप, हिं० दीआ, दीआ (= छोटा कसोरा) + रा (प्रत्य०)] १. एक प्रकार का पकवान जिसे मीठा मिले हुए आटे की लोई बनाकर और उसके बीच में अँगूठे से गड्डाकरके घी या तेल में तलकर बनाते हैं । लोई में अंगूठे से गड्ढा करने पर उसका आकार दीए का सा हो जाता है । २. दे० 'दीया' । २. वह बड़ा सा लुक जो शिकारी हिरनों को आकर्षित करने के लिये जलाते हैं । उ०— सुभग सकल अंग अनुज बालक संग देखि नरनारि रहैं ज्यौं कुरंग दियरे ।— तुलसी ग्रं०, पृ० १९१ ।

दियरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दीया] दे० 'दिया' ।

दियला †
संज्ञा पुं० [हिं० दीया + ला (प्रत्य०)] दे० 'दीया' । उ०— उर दियला राख्यौ जु मैं सरस सनेह भराइ ।—स० सप्तक, पृ० १८२ ।

दियवा †
संज्ञा पुं० [हिं० दीया] दे० 'दीया' ।

दियाँर
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'दीमक' ।

दिया (१)
संज्ञा पुं० [सं० दीपक] दे० 'दिया' । उ०— दिया मँदिर निसि करै अँजोरा । दिया नाहिं घर मूसहिं चोरा ।—जायसी (शब्द०) ।

दिया (२)
क्रि० स० [हिं० देना] 'देना' क्रिया का सामान्य भूतकाल का एकवचन रूप ।

दियानत
संज्ञा स्त्री० [अ० दयानत] दे० 'दयानत' ।

दियानतदार
वि० [अ० दयानत + फा० दार] दे० 'दयानतदार' ।

दियानतदारी
संज्ञा स्त्री० [अ० दयानत + फा० दारी ] दे० 'दयानतदारी' ।

दियाबत्ती
संज्ञा स्त्री० [हिं० दीया + बत्ती] (संध्या के समय) दीया जलाने का काम ।

दियारा
संज्ञा पुं० [फा० दयार (= प्रदेश)] १. नदी के किनारे की वह जमीन जो नदी के हट जाने पर निकल आती है । कछार । खादर । दरिया बरार । २. दयार । प्रदेश । प्रांत । उ०— का बरनउँ धनि देस दियारा । जहँ अस नग उपजा उँजियारा ।— जायसी (शब्द०) ।

दियासलाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० दीया + सलाई] लकड़ी की वह तीली या सलाई जो रगड़ने से जल उठती है । विशेष— यह प्रायः एक अंगुल या इससे कुछ कम लंबी ओर पतली लकड़ी की सलाई होती है जिसके एक सिरे पर गंधक आदि कई भभकनेवाला मसाले लगे होते हैं । इस सिरे को रग- ड़ने से आग निकलती है जिससे सलाई जलने लगती है । जिस सलाई के सिरे पर गँधक लगी होती है वह हर एक कड़ी चीज पर रगड़ने से जल उठती है; पर जिसके सिरे पर अन्य मसाले लगे होते है वह विशिष्ट मसालों से बने हुए तल पर रग- ड़ने से जलती है । इसके अतिरिक्त चिनगारी या आग से इस सिरे का स्पर्श कराने से भी सलाई जल उठती है । छोटी चौकोर डिबिया में दियासलाइयाँ बंद रहती है; और उसी डिबिया के पार्श्व पर वह मसाला लगा होता है जिसपर रगड़ने से सलाई जलती है । लकड़ी एक अतिरिक्त एक प्रकार की मोम की बनी हुई दियासलाई होती है जो अपेक्षाकृत अधिक समय तक जलती रहती है । आजकल वैज्ञानिकों ने कागज आदि की भी सलाई बनाई है । सलाई का व्यवहार दीया जलाने और आग सुलगाने आदि के लिये होता है । क्रि० प्र०—घिसना । —जलाना ।—रगडना । मुहा०—दियालसाई लगाना = आग लगाना । जलाना । जैसे,— यह किताब तो दियालसाई लगाने लायक है ।

दिरंग
संज्ञा स्त्री० [फा० दिरंग, दरंग] देर । विलंब । आलस्य । आलस्य । सुस्ती । उ०— गनीमत है फुरसत करूँ क्या दिरंग । के दुनिया किसी सूँ नहीं एक रंग ।—दक्खिनी० पृ० ८१ ।

दिर
संज्ञा पुं० [अनु०] सितार का एक बोल । जैसे,—दिर दा दिर दारा दारा दा दार दार दा दार । दिर दा दिर दारा दा दिर दारा दा दिर दारा दार दार दा दाय ।

दिरद पु
संज्ञा पुं० [सं० द्विरद] दे० 'द्विरद' ।

दिरम
संज्ञा पुं० [अ० दरहम] १. मिस्र देश का चाँदी का एक सिक्का । दिरहम । २. साढे़ तीन माशे की एक तौल । ३. फारस का एक पुराना सोने का सिक्का ।

दिरमान †
संज्ञा पुं० [फा० दरमानह्] चिकित्सा । इलाज ।

दिरमानी
संज्ञा पुं० [फा० दरमानह् (= चिकित्सा) + ई (प्रत्य०)] वैद्य । चिकित्सक । इलाज करनेवाला । उ०—मैं हरि साधन करै न जानी । जस आमय भेषज कीन्ह तस दोष कहा दिर- मानी ।—तुलसी (शब्द०) ।

दिरहम
संज्ञा पुं० [फा० दरहम] दिरम नाम का सिक्का । दे० 'दिरम' ।

दिराज पु
संज्ञा पुं० [सं० द्विजराज] चंद्रमा । शशि । उ०— दंतन सौं दिग्गज दुरंतर दबाइ दीन्हें, दीपति दिराजु चारु घंटन के नद्द हैं ।—सुजान०, पृ० ८ ।

दिरानी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० देवरानी] दे० 'देवरानी' । उ०— सुनहु जिठानी सुनहु दिरानी अचरज एक भयौ ।—कबीर ग्रं०, पृ० ३०२ ।

दिरियक
संज्ञा पुं० [सं०] कंदुक । गेंद [को०] ।

दिरिस पु †
संज्ञा पुं० [सं० दृश्य] दे० 'दृश्य' ।

दिरेस (१)
संज्ञा पुं० [अं० ड्रेस] १. महीन कपडे़ पर छपी हुई एक प्रकार की छींट । दरेस । २. सँवारने या ठीक करने की क्रिया ।

दिरेस (२)
वि० सँवारा या ठीक किया हुआ । लैस । दुरुस्त ।

दिर्हम
संज्ञा पुं० [फा० दरहम] दे० 'दिरम' ।

दिल
संज्ञा पुं० [फा०] १. कलेजा । मुहा०— दिल उलटना = दे० 'कलेजा उलटना ' । दिन मलना = दे० 'कलेजा मलना' । दिल मसोसकर रह जाना = दे० 'कलेजा मसोसकर रह जाना ' । दिल धुकड़ पुकड़ या धुकुर पुकर करना अथवा होना = दे० 'कलेजा धुकड़ पुकड़ होना' । दिल धक धक करना या होना = दे० 'कलेजा धक धक करना' । २. मन । चित्त । हृदय । जी । यौ०— दिलगीर । दिलगुरदा । दिलचला । दिलचस्प । दिलचोर । दिलजमई । दिलजला । दिलदरिया । दिलदरियाव । दिलदार । दिलवर । दिलरुबा । मुहा०— (किसी से) दिल अटकना = दे० 'जी लगना' । (किसी से) दिल अटकना = दे० 'जी लगाना' । (किसी पर) दील आना = दे० (किसी पर) 'जी आना' । दिल उकताना =दे० 'जी उकताना' । दिल उचटना = दे० 'जी उचटना' । दिल उचाट होना = दे० 'जी उचाट होना' । दिल उठना = दे० 'जी हटना' । दिल उमड़ना = दे० 'जी भर आना' । दिल उलटना =(१) दे० 'जी घबराना' । (२) दे० 'जी मिचलाना' । दिल उठाना = चित्त हटाना । मन फेर लेना । दिल कड़ा करना = हिम्मत बाँधना । साहस करना । चित्त में दृढ़ता लाना । दिल कडुवा करना = दे० 'दिल कड़ा करना' । दिल कबाब होना = दे० 'जी जलना' । दिल करना = दे० 'जी करना' । दिल का कँवल खिलना = चित्त प्रसन्न होना । मन में आनंद होना । दिल का गवाही देना = मन को किसी बात की संभावना या औचित्य का निश्चय होना । इस बात का विचार में आना कि कोई बात होगी या नहीं; अथवा यह बात उचित है या नहीं । जैसे,—(क) हमारा दिल गवाही देता है कि वह जरूर आवेगा । (ख) उनके साथ जाने के लिये हमारा जी गवाही नहीं देता । दिल का गुबार निकलना = दे० 'जी का बुखार निकलना' । दिल का बादशाह =(१) बहुत बड़ा उदार । (२) मनमौजी । लहरी । दिल का बुखार निकालना = दे० 'जी का बुखार निकालना' । दिल का भर जाना = दे० 'जी भर जाना' । दिल की दिल में रहना = दे० 'जी की जी में रहना' । दिल की फाँस = मन की पीड़ा या दुःख । दिल की कली खिलना = चित्त प्रसन्न होना । उ०— शहजादा हुमायूँ फर के दिल की कली खिल गई । मुँहमाँगी मुराद पाई ।—फिसाना०, भा० ३, पृ० १२४ । दिल की सैन बुझाना = मन की मुराद पूरी करना । उ०— बैद कोई ऐसा नहिं जिस्से दिल की सैन बुझाऊँ ।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० १८९ । दिल कुढ़ना = चित्त का दुःखी होना । रंज होना । दिल कुढ़ाना = चित्त को दुःखी करना । रंज करना । दिल कुम्हलाना = चित्त का दुखी वा शोकाकुल होना । मन का सुस्त हो जाना । (किसी के) दिल के दरवाजे खुलना = जी का हाल मालूम होना । मन की बात प्रकट होना । दिल के फफोले फूटना = चित्त का उदगार निकलना । दिल के फफोले फोड़ना = हृदय का उदगार निकालना । किसी को भली बुरी सुनाकर अपना जी ठंढा करना । जली कटी कहकर अपना चित्त शांत करना । दिल को करार होना = चित्त में धैर्य या शांति होना । हृदय का शांत या संतुष्ट होना । दिल को पत्थर करना = मन को कडा करना । मन में शक्ति लाना । उ०— दिल पत्थर करके सोचा ।— किन्नर०, पृ० ३२ । दिल को मसोसना = शोक या क्रोध आदि तीव्र मनोवेगों को मन में ही दबा रखना । चित्त के उदगार को किसी कारणवश निकलने न देना । दिल को लगना = हृदय पर पूरा या गहरा प्रभाव पड़ना । किसी बात का जी में बैठना । चित्त में चुभना । जैसे,— उनकी सब बातें हमारे दिल में लग गई । दिल खट्ट होना = दे० 'जी खट्टा होना' । दिल खटकना = दे० 'जी खटकना' । दिल खींच लेना = मन मोह लेना । किसी का हृदय आकर्षित करना । उ०— क्यों न दिल खींच ले उपज आला, जो कि उपजी कमाल भी कुछ ले ।—चोखे०, पृ० ८ । दिल खुलना = दे० 'जी खुलना' । दिल खिलना = चित्त प्रसन्न होना । मन का प्रफुल्लित होना । दिल खोलकर = दे० 'जी खोलकर' । दिल चलना = दे० 'जी चलना' । दिल चलाना = दे० 'मन चलाना' । दिल चुराना = दे० 'जी चुराना' । दिल जमना । (१) किसी काम में चित्त लगना । ध्यान या जी लगना । जैसे,—तुम्हारा दिल तो जमता ही नहीं, तुम काम कैसे करोगे ? (२) किसी विषय या पदार्थ की ओर से चित्त का संतुष्ट होना । रुचि के अनुकूल होना । जी भरना । जैसे,—(क) जिस चीज पर दिल ही नहीं जमता उसे लेकर क्या करेंगे ? (ख) अगर तुम्हारा दिल जमे तो तुम भी हमारे साथ चलो । दिल जमाना = काम में ध्यान देना । चित्त लगाना । जी लगाना । जैसे—अगर तुम्हें काम करना है तो दिल जमाकर किया करो । दिल जलना = दे० 'जी जलना' । दिल जलाना = दे० 'जी जलाना' । (किसी काम में) दिल जान या दिलो जान से लगना = दे० 'जी जान से लगना' । दिल टूटना या टूट जाना = दे० 'जी टूट जाना' । दिल ठिकाने होना = मन में शांति, संतोष या धैर्य होना । चित्त स्थिर होना । जी ठहराना । दिल ठिकाने लगाना = मन को शांत या संतुष्ट करना । जी को सहारा देना । व्याकुलता दूर करना । दिल ठुकना = दे० 'जी ठुकना' । दिल ठोकना = मन को दृढ़ करना । जी को पक्का करना (क्व०) । दिल डूबना = दे० 'जी डूबना' । दिल तड़पना = चित्त को यों ही, विशेषतः किसी के प्रेम में, बहुत व्याकुल होना । बहुत अधिक घबराहट या बेचैनी होना । उ०—दिल तड़पकर रह गया जब याद आई आपकी ।—(शब्द०) । दिल तोड़ना = हिम्मत तोड़ना । हतोत्साह करना । साहस भंग करना । दिल दहलना = दे० 'जी दहलना' । दिल दुखना = दे० 'जी दुखना' । दिल देखना = किसी के मन की परीक्षा करना । रुचि या प्रवृत्ति का पता लगाना । जी की थाह लेना । मन टटोलना । जैसे,—हमें रुपयों की कोई जरुरत नहीं है; हम तो खाली तुम्हारा दिल देखते थे । दिल देना = आशिक होना । प्रेम करना । आसक्त होना । मुहब्बत में पड़ना । दिल दौड़ना = दे० 'जी दौड़ना' । दिल दौड़ाना = (१) जी चलाना । इच्छा या लालसा करना । (२) ध्यान दौड़ना । चिंतन करना । सोचना । दिल धड़कना = दे० 'कलेजा धड़कना' । दिल पक जाना = दे० 'कलेजा पक जाना' । दिल पकड़ लेना या दिल पकड़कर बैठ जाना = दे० 'कलेजा पकड़ लेना' । दिल पकड़ा जाना = दे० 'जी पकड़ा जाना' । दिल पकड़े फिरना = ममता से व्याकुल होकर इधर उधर फिरना । विकल होकर घूमना । दिल पर नक्श होना = किसी बात का जी में जम जाना । जी में बैठ जाना । हृदयंगम होना । दिल पर मैल आना = मनमोटाव होना । पहले का सा प्रेम या सदभाव न रह जाना । प्रीति भंग होना । जी फट जाना । दिल पर साँप लोटना = दे० 'कलेजे पर साँप लोटना' । दिल पर हाथ रखे फिरना = दे० 'दिल पकड़े फिरना' । दिल पसीजना = दे० 'दिल पिघलना' । दिल पाना = आशय जानना । अंतःकरण की बात जानना । मन की थाह पाना । दिल पीछे पड़ना = दे० 'जी पीछे पड़ना' ।दिल फटना या फट जाना = दे० 'जी फट जाना' । दिल फिरना या फिर जाना = दे० 'जी फिर जाना' । दिल फिका होना = दे० 'जी खट्टा होना' । दिल बढ़ना = दे० 'जी बढ़ना' । दिल बढ़ाना = दे० 'जी बढ़ाना' । दिल बहलना = दे० 'जी बहलना' । दिल बहलाना = दे० 'जी बहलाना' । दिल बुझना = चित्त में किसी प्रकार का उत्साह या उमंग न रह जाना । मन मरना । दिल बुरा होना = दे० 'जी बुरा होना' । दिल बेकल होना = बेचैनी होना । घबराहट होना । दिल बैठा जाना = दे० 'जी बैठा जाना' । दिल झटकना = चित्त का व्यग्र या चंचल होना । मन में इधर उधर के विचार उठना । दिल भर आना = दे० 'जी भर आना' । दिल भरना = दे० 'जी भरना' । दिल भारी करना = दे० 'जी भारी करना' । दिल मसोसना = शोक, क्रोध या किसी दूसरे तीव्र मनोवेग का मन में ही दब रहना । दिल मारना = दे० 'मन मारना' । दिल मिलना = दे० 'जी मिलना' या 'मन मिलना' । दिल में आना = दे० 'जी में आना' । दिल में गड़ना या खुभना = दे० 'जी में गड़ना या खुभना' । दिल में गाँठ या गिरह पड़ना = दे० 'गाँठ' के अंतर्गत मुहा० । 'मन में गाँठ पड़ना' । दिल में घर करना = दे० 'जी में घर करना' । दिल में चुटकियाँ या चुटकी लेना = दे० 'चुटकी लेना' । दिल में चुभना = दे० 'जी में गड़ना या खुभना' । दिल में चोर बैठना = दे० 'मन में चोर बैठना' । दिल में जगह करना = दे० 'जी में घर करना' । दिल में फफोले पड़ना = चित्त को बहुत अधिक कष्ट पहुँचना । मन में बहुत दुःख होना । दिल में फरक आना = सदभाव में अंतर पड़ना । मनमोटाव होना । दिल में बल पड़ना = दे० 'दिल में फरक आना' । दिल में रखना = दे० 'जी में रखना' । दिल मैला करना = चित्त में दुर्भाव उत्पन्न करना । मन मैला करना । दिल रुकना = दे० 'जी रुकना' । (किसी का) दिल रखना = दे० 'जी रखना' । दिल लगना = दे० 'जी लगना' । दिल लगाना = दे० 'जी लगाना' । दिल ललचना = दे० 'जी ललचना' । दिल लेना = (१) किसी को अपने पर आसक्त करना । अपने प्रेम में फँसाना । (२) अंतःकरण की बात जानना । मन की थाह लेना । दिल लोटना = दे० 'जी लोटना' । दिल से उतरना या गिरना = दृष्टि से गिर जाना । प्रिय या आदरणीय न रह जाना । विरक्तिभाजन होना । दिल से = (१) जी लगाकर । अच्छी तरह । ध्यान देकर । (२) अपने मन से । अपनी इच्छा से । दिल से उठना = आपसे आप कोई काम करने की प्रवृत्ति होना । जैसे,—जब तुम्हारे दिल से ही नहीं उठता, तब बार बार कहकर तुमसे कोई क्या काम करावेगा ? दिल से दूर करना = भुला देना । विस्मरण करना । ध्यान छोड़ देना । दिल हट जाना = दे० 'जी फिर जाना' । (किसी का) दिल हाथ में रखना = किसी को प्रसन्न रखना । किसी को मन को अपने वश में रखना । दिल हाथ में लेना = किसी को प्रसन्न करके अपने अधिकार में रखना । वशीभूत रखना । दिल हिलाना = दे० 'जी दहलाना' । दिल ही दिल में = चुपके चुपके । गुप्त भाव से । मन ही मन । दिलो जान से = दे० 'जी जान से' । ३. साहस । दम । जियट । जीवट । मुहा०—दिल दिमाग का (आदमी) = बहुत साहसी और समझदार (आदमी) । यौ०—दिलदार । ४. प्रवृत्ति । इच्छा ।

दिलकश
वि० [फा़०] चित्ताकर्षक । मनमोहक [को०] ।

दिलखुश
वि० [फा़०] मन को प्रफूल्ल रखनेवाला [को०] ।

दिलगीर
वि० [फा़०] १. उदास । २. दुःखी । शोकाकुल ।

दिलगीरी
संज्ञा पुं० [फा़० दिलगीर + ई (प्रत्य०)] १. उदासी । २. रंज । दुःख ।

दिलगुरदा
संज्ञा पुं० [फा़० दिल + गुरदा] हिम्मत । साहस । बहादुरी ।

दिलचला
वि० [फा़० दिल + हिं० चलना] १. साहसी । हिम्मतवाला । दिलेर । २. शूर । वीर । बहादुर । ३. दाता । दानी । उदार । ४. पागल (क्व०) ।

दिलचस्प
वि० [फा़०] जिसमें जी लगे । मनोहर । चित्ताकर्षक ।

दिलचस्पी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. दिल का लगना । २. मनोरंजन ।

दिलचोर
वि० [फा़० दिल + हिं० चोर] जो काम करने से जी चुराता हो । कामचोर ।

दिलजमई
संज्ञा स्त्री० [ फा़० दिल + अ० जमअह् + ई (प्रत्य०)] इतमीनान । तसल्ली । संतोष । क्रि० प्र०—करना ।—कराना ।—रखना ।

दिलजला
वि० [फा़० दिल + हिं० जलना] जिसका जी जला हो । जिसके चित्त को बहुत कष्ट पहुँचा हो । अत्यंत दुःखी ।

दिलजोई
संज्ञा स्त्री० [फा़०] ढारस । सात्वना । दिलजमई [को०] ।

दिलदरिया
संज्ञा पुं० [फा़०] दे० 'दरियादिल' ।

दिलदरियाव
संज्ञा पुं० [फा़०] दे० 'दरियादिल' ।

दिलदार
वि० [फा़०] १. उदार । दाता । २. रसिक । ३. प्रेमी । प्रिय । वह जिससे प्रेम किया जाय ।

दिलदारी
संज्ञा स्त्री० [फा़० दिलदार + ई० (प्रत्य०)] १. उदारता । २. रसिकता । ३. प्रेमिकता ।

दिलदौर
वि० [फा़०] दे० 'दिलदार' ।

दिलपसंद (१)
वि० [फा़०] मनोहर । जो भला मालूम हो ।

दिलपसंद (२)
संज्ञा पुं० १. फूलवर या चूनरी का तरह का एक प्रकार का कपड़ा जिसपर बेल बूटे आदि छपे हुए होते हैं और जो साड़ी आदि बनाने के काम में आता है । २. एक प्रकार का आम ।

दिलफेँक
वि० [फा़० दिल + हिं० फेंकना ] सौंदर्य पर मुग्ध होनेवाला ।

दिलबर
वि० [फा़०] जिससे प्रेम किया जाय । प्यारा । प्रिय ।

दिलबहार
संज्ञा पुं० [फा़० दिल + बहार] खशखाशी रंग का एक भेद ।

दिलरूबा
संज्ञा पुं० [फा़०] १. वह जिससे प्रेम किया जाय । प्यारा । २. एक प्रकार का तंत्रवाद्य ।

दिलवल
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का पेड़ ।

दिलवाना
क्रि० स० [हिं० दिलाना] दे० 'दिलाना' ।

दिलवाला
वि० [फा़० दिल + हिं० वाला (प्रत्य०)] १. उदार । दाता । जो खूब देता हो । २. बहादुर । दिलेर । साहसी ।

दिलवैया
वि० [हिं० दिलवाना + ऐया (प्रत्य०)] दिलवानेवाला । जो दूसरे को दिलाता हो ।

दिलहा
संज्ञा पुं० [हिं० दिल्ला] दे० 'दिल्ला' ।

दिलहेदार
वि० [हिं० दिल्लेदार] दे० 'दिल्लेदार' ।

दिलाना
क्रि० स० [हिं० देना का प्रे० रूप] १. दूसरे को देने में प्रवृत्त करना । देने का काम दूसरे से कराना । दिलवाना । जैसे, रुपया दिलाना, काम दिलाना । २. प्राप्त करना । विशेष—इस अर्थ में इस शब्द का व्यवहार प्रायः ऐसी ही बातों के संबंध में होता है जिनकी प्राप्ति किसी तीसरे व्यक्ति पर निर्भर न हो बल्कि जो स्वयं उसी मनुष्य में उत्पन्न की जा सकें । जैसे, सुध दिलाना, कसम दिलाना, ध्यान दिलाना । संयो० क्रि०—देना ।

दिलावर
वि० [फा़०] १. शूर । बहादुर । जवाँमर्द । २. उत्साही । साहसी ।

दिलावरी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. बहादुरी । शूरता । २. साहस ।

दिलावेज
वि० [फा़० दिल + आवेजज (= लटका लेने वाला)] सुंदर । शुभदर्शन । मनोहर (को०) ।

दिलावेजी
संज्ञा स्त्री० [फा़० दिल + आवेजी] खूबसूरती । सौंदर्य । शोभा [को०] ।

दिलासा
संज्ञा पुं० [फा़० दिल + हिं० आसा] तसल्ली । ढाढस । आश्वासन । धैर्य । प्रबोध । क्रि० प्र०—देना । यौ०—दम दिलासा = (१) तसल्ली । धैर्य । (२) दम बुता । धोखा । फरेब ।

दिली (१)
वि० [फा़० दिल + ई (प्रत्य०)] १. हार्दिक । हृदय या दिल संबंधी । जैसे, दिली मुराद । २. अत्यंत घनिष्ट । अभिन्न हृदय । जिगरी । जैसे, दिली दोस्त ।

दिली पु (२)
संज्ञा स्त्री० [देश० दिल्ली] दे० 'दिल्ली' । उ०—बैठयो विनोद भरयौ दिन दूलह कंत दिलो को दिमाक सवाई ।— हम्मिर०, पृ० ९ ।

दिलीप
संज्ञा पुं० [सं०] १. इक्ष्वाकुवंशी एक ख्यातनाम राजा । विशेष—वाल्मोकि के अनुसार दिलीप राजा सगर के परपोते, भगीरथ के पिता और रघु के परदादा थे । लेकिन कालिदास के रघुवंश के अनुसार इन्हीं राजा दिलीप की स्त्री सुदक्षिणा के गर्भ से राजा रघु उत्पन्न हुए थे । रघुवंश में लिखा है कि राजा दिलीप एक बार स्वर्ग से मत्यं लोक में अपनी स्त्री से मिलने के लिये आते समय स्वर्गीय गौ सुरभि की पूजा करना भूल गए थे । इसलिये उसने उन्हें शाप दिया कि जबतक तुम मेरी नंदिनी की सेवा न करोगे तबतक तुम्हें पुत्र न होगा । जब दिलीप को कोई पुत्र नहीं हुआ तब वशिष्ठ के पास गए और पुत्र पाने की लालसा उनसे व्यक्त की । वशिष्ठ ने कामधेनु के शाप की बात बताई । उनके आदेश से सपत्नीक दिलीप आश्रम रहते हुए सुरभि की पुत्री नंदिनी की सेवा करने लगे । कुछ दिन बीतने पर उनकी परीक्षा लेने के लिये एक बार एक शेर ने नंदिनी को खाना चाहा । दिलीप ने उसकी रक्षा के लिये शेर पर प्रहार करना चाहा पर उनका हाथ अचल हो गया । निराश राजा दिलीप ने शेर से प्रर्थना की कि वह उनको खाकर अपनी क्षुधा मिटाए और नंदिनी को छोड़ दे । शेर के बहुत समझाने बुझाने पर भी वे न माने और अपने आपको उस शेर के आगे डाल दिया । इससे सुरभि उत्पन्न हो गई और सुदक्षिणा के गर्भ से रघु की उत्पत्ति हुई । लिंगपुराण में लिखा है कि ये बड़े बुद्धिमान थे और इन्होंने तानों लोकों और तीनों अग्नियों को जीत लिया था । एक बार एक मुहूर्त के लिये ये स्वर्ग से मर्त्य लोक में भी आए थे । आगे चलकर इन्होंने फिर इसी वंश में ऐलिविलि राजा के घर में जन्म लिया था । हरिवंश के अनुसार भी दिलिप राजा सगर के परपोते और भगीरथ के पुत्र थे । आगे चलकर इन्होंने एक बार फिर इसी वंश में जन्म लिया था । २. चंद्रवंशी राजा कुरु के वंशज एक राजा का नाम ।

दिलीर
संज्ञा पुं० [सं०] भुइँफोड़ । ढिंगरी ।

दिलेर
वि० [फा़०] १. बहादुर । शूरवीर । २. साहसी । दिलवाला ।

दिलेरी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. बहादुरी । वीरता । २. साहस । हिम्मत । क्रि० प्र०—करना ।—दिखाना ।

दिल्लगी
संज्ञा स्त्री० [फा़० दिल + हिं० लगना] १. दिल लगाने की क्रिया या भाव । २. वह व्यापार, घटना या बात आदि जिसकी विलक्षणता आदि के कारण चित्त का विनोद और मनोरंजन हो । केवल चित्तविनोद या हँसने हँसाने की बात । ठट्ठा । ठठोली । मजाक । मखौल । मसखरी । जैसे,—(क) आप आजकल बहुत दिल्लगी करने लगे हैं । (ख) कल रातवाले झगड़े में अच्छी दिल्लगी देखने में आई । (ग) दोनों का सामना होगा तो बड़ी दिल्लगी होगी । मुहा०—किसी बात का दिल्लगी उड़ाना = (किसी बात को) अमान्य और मिथ्या ठहराने के लिये (उसे) हँसी में उड़ा देना । हँसी की बात कहकर टाल देना । उपहास करना । जैसे,—(क) आप तो सब की यों ही दिल्लगी उड़ाया करते हैं । (ख) उन्होंने तुम्हारी किताब की खूब दिल्लगी उड़ाई । दिल्लगी में = केवल दिल्लगी के विचार से । यों ही । हँसी में । जैसे,—मैने उन्हें दिल्लगी में ही यहाँ से जाने के लिये कहा था, पर वे नाराज होकर चले गए ।

दिल्लगीबाज
संज्ञा पुं० [हिं० दिल्लगी + फा़० बाज] वह जो सदा दूसरों को हँसानेवाली बात कहता हो । हँसी या दिल्लगी करनेवाला । मसखरा । ठठोल । हँसोड़ । मखौलिया ।

दिल्लगीबाजी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दिल्लगी + फा़० बाजी] १. दिल्ल्गी करने का काम । २. दे० 'दिल्ल्गी' ।

दिल्ला
संज्ञा पुं० [देश०] किवाड़ के पल्ले में लकड़ी का वह चौखटा जो शोभा के लिये बना या जड़ दिया जाता है । आईना । विशेष—किवाड़ों में शोभा के लिये या तो चौकोर छेद करके उसमें शीशे की तरह लकड़ी का चौकोर टुकड़ा फिर से बैठा देते हैं अथवा पल्ले का ही कुछ अंश काटकर और कुछ उभाड़दार छोड़कर इस प्रकार बना देते हैं कि वह देखने में एक अलग चौकोर टुकड़ा सा जान पड़ता है । इसी को दिल्ला या दिलहा कहते हैं ।/?/

दिल्ली
संज्ञा स्त्री० [देश०] जमुना नदी के किनारे बसा हुआ उत्तरपश्चिम भारत का एक बहुत प्रसिद्ध और प्राचीन नगर जो स्वतंत्र भारत की राजधानी है । विशेष—यह नगर बहुत दिनों तक हिंदू राजओं और मुसलमान बादशाहों की राजधानी था और सन् १९१२ ई० में फिर ब्रिटिश भारत की भी राजधानी हो गया । जिस स्थान पर वर्तमान दिल्ली नगर है उसके चारों ओर १०—१२ मील के घेरे में भिन्न भिन्न स्थोनों में यह नगर कई बार बसा और कई बार उजड़ा । कुछ लोगों का मत है की इंद्रप्रस्थ के मयूर- वंशी अंतिम राजा दिलू ने इसे पहले पहल बसाया था, इसी से इसका नाम दिल्ली पड़ा । यह भी प्रवाद है कि पृथ्वीराज के नाना अनंगपाल ने एक बार एक गढ़ बनवाना चाहा था । उसकी नींव रखने के समय उनके पुरोहित ने अच्छे मुहूर्त में लोहे की एक कील पृथ्वी में गाड़ दी और कहा कि यह कील शेषनाग के मस्तक पर जा लगी है जिसके कारण आपके तोंअर वंश का राज्य अचल हो गया । राजा को इस बात पर विश्वास न हुआ और उन्होंने वह कील उखड़वा दी । कील उखाड़ते ही वहाँ से लहू की धारा निकलने लगी । इसपर राजा को बहुत पश्चाताप हुआ । उन्होंने फिर वही कील उस स्थान पर गड़वाई पर इस बार वह ठीक नहीं बैठी, कुछ ढीली रह गई । इसी से उस स्थान का नाम 'ढीली' पड़ गया जो बिगड़कर दिल्ली हो गया । पर कील या स्तंभ पर जो शिलालेख है उससे इस प्रवाद का पूरा खंडन हो जाता है क्योंकि उसमें अनंगपाल से बहुत पहले के किसी चंद्र नामक राजा (शायद चंद्रगुप्त विक्रमादित्य) की प्रशंसा है । पृथ्विराज रासो के अनुसार अनगपाल के किसी पूर्वपुरुष 'कल्हन' नाम के नरेश ने यह किल्ली गड़वाई और नगर बसाया था । उसके बाद अनंगपाल ने फिर किल्ली गड़वाई (दे० पृथ्वीराज रासो 'दिल्ली किल्ली कथा') । नाम के विषय में चाहे जो हो, पर इसमें संदेह नहीं कि ईसवी पहली शताब्दी के बाद से यह नगर कई बार बसा और उजड़ा । सन् ११९३ में मुहम्मद गोरी ने इस नगर पर अधिकार कर लिया । तभी से यह मुसलमान बादशाहों की राजधानी हो गया । सन् १३९८ में इसे तैमूर ने ध्वंस किया और १५२६ में बाबर ने इसपर अधिकार किया । तब से यहाँ मोगल साम्राज्य की राजधानी हो गई । सन् १८०३ में इसपर अँगरेजों का अधिकार हो गया । पहले अँगरेजी भारत की राजधानी कलकत्ते में थी; पर सन् १९१२ से उठकर दिल्ली चली गई । आजकल वर्तमान दिल्ली के पास एक नई दिल्ली बस गई है ।

दिल्लीवाल (१)
वि० [हिं० दिल्ली + वाल (प्रत्य०)] १.दिल्ली संबंधी । दिल्ली का । २. दिल्ली का रहनेवाला ।

दिल्लीवाल (२)
संज्ञा पुं० दिल्ली का बना हुआ एक प्रकार का देशी जूता ।

दिल्लेदार
वि० [देश० दिलहा + फा़० दार] दिलहेवाला (किवाड़) । जिसमें दिलहा बना या लगा हो ।

दिल्ही †
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'दिल्ली' । उ०—दिल्ही तें परे कोस दोइ पर एक ग्राम है ।—दो सौ बावन०, भा० १, पृ० १३६ ।

दिवंगत
वि० [सं० दिवङ्गत] मृत । स्वर्गीय [को०] ।

दिवंगम
वि० [सं० दिवङ्गम] स्वर्ग जानेवाला । मरनेवाला । जिसकी मृत्यु निकट हो [को०] ।

दिव्
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दिव' ।

दिव
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्वर्ग । २. आकाश (डि०) । ३. वन । ४. दिन । ५. नीलकंठ पक्षी (को०) ।

दिवकार पु
संज्ञा पुं० [सं० दिव (= दिन + कर (= कर्ता)] सूर्य । दिनकर । उ०—गुरुद्रोही औ मनमुखी, नारि पुरुष विविचार । ते चौरासी भरमहीं, जो लगि चँद दिवकार ।—कबीर बी० (शिशु०), पृ० १६६ ।

दिवगृह
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'देवगृह' ।

दिवदाह
संज्ञा पुं० [सं०] १. उत्पात । क्रांति । आकाशदाह [को०] ।

दिवर †
संज्ञा पुं० [सं० द्वि + वर] दे० 'देवर' । उ०—तुम लीजों दिवर हमारे मेरे हाथ अँगूठी भारी ।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ९१४ ।

दिवरा †
संज्ञा पुं० [हिं० दिवर] दे० 'देवर' । उ०—पिय पीतम पागे पराई तिया दिवरा सोऊ डोलत बागन मैं ।—नट०, पृ० १४० ।

दिवराज
संज्ञा पुं० [सं०] स्वर्ग के राजा, इंद्र । उ०—सूरदास प्रभु कृपा करहिंगे शरण चलो दिवराज ।—सूर (शब्द०) ।

दिवरानी
संज्ञा स्त्री० [हिं० देवरानी] दे० 'देवरानी' ।

दिवला
संज्ञा पुं० [सं० दीप, प्रा० दीव + ला (प्रत्य०)] दे० 'दीप' । उ०—येहि तन का दिवला करौं, बाती मेलों जीव । लोहू सीचौं तेल ज्यों, कब मुख देखों पीव ।—कबीर सा०, पृ० १६ ।

दिवली
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'दिउली' ।

दिवस
संज्ञा पुं० [सं०] दिन । वासर । रोज ।

दिवस अंध पु
संज्ञा पुं० [सं० दिवस + हिं० अंध] दे० 'दिवांध' ।

दिवसकर
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य । दिनकर । २. मदार का पेड़ ।

दिवसत्क्षय
संज्ञा पुं० [सं०] दिन का अवसान । सूर्यास्त [को०] ।

दिवसचर
संज्ञा पुं० [सं० दिवाचर] १. श्यामा पक्षी । २. चांडाल ।

दिवसचारी
वि० [सं० दिवाचारिन्] दिन भर घूमनेवाला ।

दिवसनाथ
संज्ञा पुं० [सं० दिवस + नाथ] दे० 'दिवसमर्णि' । २. अर्क वृक्ष ।

दिवसपुष्ट
संज्ञा पुं० [सं० दिवापुष्ट] सूर्य । रवि ।

दिवसमणि
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य ।

दिवसमुख
संज्ञा पुं० [सं०] सबेरा । प्रातः काल ।

दिवसमुद्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक दिन का वेतन । एक दिन की तनख्वाह ।

दिवससंजात
संज्ञा पुं० [सं० दिवससञ्जात] दिन भर का काम । विशेष—मजदूर दिन भर में जितना काम करता था, उसी के अनुसार चंद्रगुप्त के समय में उसको रोजाना मजदूरी दी जाती थी ।

दिवसांतर
वि० [सं०] मात्र एक दिन का ।

दिवसाभिसारिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दिवाभिसारिका' ।

दिवसावसान
संज्ञा पुं० [सं० दिवस + अवसान] दिनांत । संध्या । उ०—दिवसावसान का समय, मेघमय आसमान से उत्तर रही है ।—अपरा०, पृ० १३ ।

दिवसेश
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दिवसेश्वर' ।

दिवसेश्वर
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य [को०] ।

दिवस्पति
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य । २. तेरहवें मन्वंतर के इंद्र का नाम ।

दिवस्पृश्
संज्ञा पुं० [सं०] (वामनावतार में) पैर से स्वर्ग को छूनेवाले, विष्णु ।

दिवांध (१)
वि० [सं० दिवान्ध] जिसे दीन में न सूझे । जिसे दिनौंधो हो ।

दिवांध (२)
संज्ञा पुं० १. दिनौंधी का रोग । २. उल्लू ।

दिवांधकी
संज्ञा स्त्री० [सं० दिवान्धकी] छछूँदर ।

दिवांधिका
संज्ञा स्त्री० [सं० दिवान्धिका] छछूँदर [को०] ।

दिवा
संज्ञा पुं० [सं०] १. दिन । दिवस । २. २२ अक्षरों का एक वर्णावृत्त । एक वृत्त का नाम जिसके प्रत्येक चरण में ७ भगण और १ गुरु होता है । इसेक दूसरे नाम 'मालिनी' और 'मदिरा' भी है । जैसे,—भातस गौरि गुसाँइन को वर राम धनू दुइ खंड कियो । ३. दे० 'दीया' ।

दिवाकर
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य । भास्कर । रवि । २. काक । कौवा । ३. मदार । आक । ४. एक फूल ।

दिवाकीर्ति
संज्ञा पुं० [सं०] १. नापित । नाऊ । नाई । हज्जाम । विशेष—प्राचीन काल में नाइयों को केवल दिन के समय ही नगर आदि में घूमने का अधिकार था, इसी से यह नाम पड़ा । २. चांडाल । ३. उल्लू ।

दिवाकीर्त्य
संज्ञा पुं० [सं०] वह सामगान जो साल भर में होनेवाले गवानयन यज्ञ में विषूव संक्रांति के दिन गाया जाता है ।

दिवाचर
संज्ञा पुं० [सं०] १. पक्षी । चिड़िया । २. चांडाल ।

दिवाचारी
वि० संज्ञा पुं० [सं० दिवाचारिन्] दिन को घूमनेवाला [को०] ।

दिवाटन
संज्ञा पुं० [सं०] काक । कौवा ।

दिवातन † (१)
संज्ञा पुं० [सं० दिवा + तन ?] एक दिन की मजदूरी । एक दिन की तनखाह ।

दिवातन (२)
वि० दिन भर का । रोजाना । प्रति दिन का ।

दिवान
संज्ञा पुं० [फा़० दीवान] दे० 'दीवान' ।

दिवाना † (१)
संज्ञा पुं० [फा़० दीवानह्] [स्त्री० दिवानी] दे० 'दीवाना' ।

दिवाना पु † (२)
क्रि० स० [हिं० देना] दे० 'दिलाना' ।

दिवानाथ
संज्ञा पुं० [सं०] दिन का स्वामी, सूर्य ।

दिवानी (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का पेड़ जो बरमा में अधिकता से होता है । विशेष—इसकी लकड़ी ईंट के रंग की लाल होती है जिसपर भूरी और नारंगी रंग की धारियाँ पड़ी रहती हैं । इससे मेज, कुरसी आदि सजावट के सामान बनाए जाते हैं ।

दिवानी (२)
संज्ञा स्त्री० [फा़० दीवानी] दे० 'दीवानी' । उ०— सूरदास प्रभु मिलि कै बिछुरे ताते भई दिवानी ।—सूर (शब्द०) ।

दिवापुष्ट
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य ।

दिवाभिसारिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह नायिका जो दिन के समय अपने प्रेमी से मिलने के लिये, शृंगार करके, संकेतस्थान में जाय ।

दिवाभीत, दिवाभीति
संज्ञा पुं० [सं०] १. चोर । तस्कर । २. उल्लू । ३. एक प्रकार का कमल जो रात को खिलता है (को०) ।

दिवामणि
संज्ञा पुं० [सं०] १.सूर्य । २. अर्क । मदार ।

दिवामध्य
संज्ञा पुं० [सं०] मध्याह्न । दोपहर ।

दिवार †
संज्ञा स्त्री० [फा़० दीवार] दे० 'दीवार' ।

दिवारात्र
क्रि० वि० [सं०] निरंतर । दिनरात [को०] ।

दिवारी †
संज्ञा स्त्री० [सं० दीपावली] दे० 'दीवाली' । उ०—ग्राम ग्राम जनु बरत दिवारिय ।—प० रासो, पृ० १११ ।

दिवाल (१)
वि० [हिं० देना + वाल (प्रत्य०)] देनेवाला । जो देता हो । जैसे,—यह एक पैसे के दिवाल नहीं है (बाजारू) ।

दिवाल † (२)
संज्ञा स्त्री० [फा़० दीवाल ] दे० 'दीवार' ।

दिवालय †
संज्ञा पुं० [सं० देवालय] दे० 'देवालय' ।

दिवाला
संज्ञा पुं० [हिं० दिया, दिवा + बालना (= जलाना)] १. वह अवस्था जिसमें मनुष्य के पास अपना ऋण चुकाने के लिये कुछ न रह जाय । पूँजी या आय न रह जाने के कारण ऋण चुकाने में असमर्थता । कर्ज न चुका सकना । टाट उलटना । विशेष—जब किसी मनुष्य को व्यापार आदि में बहुत घाटा आता है अथवा उसका ऋण बहुत बढ़ जाता है और वह उस ऋण के चुकाने में अपनी असमर्थता प्रकट करता है तब उसका दिवाला होना मान लिया जाता है । इस देश में प्राचीन काल में अपनी यह असमर्थता प्रकट करने के लिये ऋणि व्यापारी अपनी दूकान का टाट उलट देते थे और उसपर एक चौमुखा दीया जला देते थे जिससे लोग समझ लेते थे कि अब इनके पास कुछ भी धन नहीं बचा और इनका दिवाला हो गया । इसी दिया बालने (जलने) से 'दिवाला' शब्द बना है । राजस्थान में पहले दूकान पर उलटा ताला लगा देते थे । आजकल प्रायः सभी सभ्य देशों में दिवाले के संबंध में कुछ कानून बन गए हैं जिनके अनुसार वह मनुष्य जो अपना बढ़ा हुआ ऋण चुकाने में असमर्थ होता है, किसी निश्चित न्यायालय में जाकर अपने दिवाले की दरखास्त देता है और वह बतला देता है कि मुझे बाजार का कितना देना है और इस समय मेरे पास कितना धन या संपत्ति है । इसपर न्यायालय की ओर से एक मनुष्य, विशेषत; वकील या और कोई कानून जाननेवाला नियुक्त कर दिया जाता है जो उसकी बची हुई सारी संपत्ति नीलाम करके और उसका सारा लहना वसूल करके हिस्से के मुताबिक उसका सारा कर्ज चुका देता है । ऐसी दशा में मनुष्य को अपने ऋण के लिये जेल जाने की आवश्यकता नहीं रह जाती । मुहा०—दिवाला निकलना = दिवाला होना । दिवाला निकालना या मारना = दिवालिया बन जाना । ऋण चुकाने में असमर्थ हो जाना । २. किसी पदार्थ का बिलकुल न रह जाना । जैसे, ज्यौनारवाले दिन उनके यहाँ पूरियों का दिवाला हो गया । क्रि० प्र०—निकलना ।—निकालना ।—मारना ।

दिवालिया
वि० [हिं० दिवाला + इया (प्रत्य०)] जिसने दिवाला निकाला हो । जिसके पास ऋण चुकाने के लिये कुछ न बच गया हो ।

दिवाली (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० दीपावली] दे० 'दीवाली' ।

दिवाली (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] खराद या सान में लपेटने का वह तस्मा जिसे खींचकर उसे चलाते हैं । दयाली ।

दिवालोक
संज्ञा पुं० [सं० दिव + लोक] १. दिन का प्रकाश । २. स्वर्ग के समान या स्वर्गतुल्य लोक । उ०—कहीं भी, इस दिवालोक में घूमते घूमते संध्या तक कहीं न कहीं शरण मिल ही जायगी ।—इरा०, पृ० ६१ ।

दिवावसु
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य [को०] ।

दिवाशय
वि० [सं०] दिन में सोनेवाला [को०] ।

दिवाशयता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दिन को सोने की आदत या बान [को०] ।

दिवास्वप्न
संज्ञा पुं० [सं०] १. दिन में सोना । २. कल्पनाप्रसूत बात । मनोराज्य [को०] ।

दिवास्वाप
संज्ञा पुं० [सं०] १. उलूक । उल्लू । २. दिन की निद्रा । दिन में शयन [को०] ।

दिवि (१)
संज्ञा पुं० [सं० दिव] दे० 'दिव' ।

दिवि (२)
संज्ञा पुं० [सं०] नीलकंठ पक्षी ।

दिवि पु (३)
वि० [सं० दिव्य] दे० 'दिव्य' । उ०—दिवि द्रिस्टि धाजा सेत । सब मर्म होत निकेत ।—सं० दरिया, पृ० ८ । यौ०—दिविद्रिस्टि = दिव्य दृष्टि ।

दिविज
संज्ञा पुं० [सं०] देव । सूर [को०] ।

दिविता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दीप्ति ।

दिविदिवि
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का छोटा पेड़ जो दक्षिण अमेरिका से भारतवर्ष में आया है । विशेष— यह वृक्ष प्रायः धारवार, कनारा, बीजापुर, खानदेश इत्यादि नगरों में अधिकता से उत्पन्न होता है । चमड़ा सिझाने और रँगने के काम में इसकी पत्तियों आदि का व्यवहार होता है ।

दिविर
संज्ञा पुं० [देश०] लेखक । लिपिक । मुंशी । उ०—राजा की सेवा में बहुत से दिविर या लेखक थे जो बहुधा कायस्थ कहलाते थे और जिनको कल्हण ने अत्याचारी कहकर गालियाँ सुनाई हैं ।—हिंदु० सभ्यता, पृ० ५१६ ।

दिविरथ †
संज्ञा पुं० [सं०] १. महाभारत के अनुसार, पुरुवंशी राजा भूमन्यु के पुत्र का नाम । २. हरिवंश के अनुसार अंग देश के राजा दधिवाहन के पुत्र का नाम ।

दिविषत्
संज्ञा पुं० [सं०] १. देव । देवता । २. स्वर्गवासी ।

दिविष्टि
संज्ञा पुं० [सं०] यज्ञ ।

दिविष्ठ
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्वर्ग में रहनेवाले, देवता । २. ईशान कोण के एक देश का नाम जिसका उल्लेख बृहतसंहिता में हैं ।

दिविस्थ
संज्ञा पुं० [सं०] दिविष्ठ । देवता [को०] ।

दिवेश
संज्ञा पुं० [सं०] दिग्पाल ।

दिवैया
वि० [हिं० देना + वैया (प्रत्य०)] देनेवाला । जो देता हो ।

दिवोका
संज्ञा पुं० [सं० दिवोकस्] दे० 'दिवौका' ।

दिवोदास
संज्ञा पुं० [सं०] १. चंद्रवंशी राजा भीमरथ के एक पुत्र का नाम, जिनका उल्लेख काशीखंड और महाभारत में है । विशेष—ये इंद्र के उपासक और काशी के राजा थे और धन्वंतरि के अवतार माने जाते हैं । महाभारत में लिखा है कि ये राजा सुदेव के पुत्र थे और इंद्र ने शंबर राक्षस की १०० पुरियों में से ९९ पुरियाँ नष्ट करके बाकी एक पुरी इन्हीं को दी थी । इनके पिता के शत्रु वीतहव्य के पुत्रों ने युद्ध में इन्हें परास्त किया था । इसपर ये भारद्वाज मुनि के आश्रम में चले गए । वहाँ मुनि ने इनके लिये एक यज्ञ किया जिसकेप्रभाव से इनके प्रतर्दन नामक एक वीर पुत्र हुआ जिसने वीत- हव्य के पुत्रों को युद्ध में मार डाला । सुदास नामक इनका एक पुत्र और था । महादेव ने इन्हीं से काशी ली थी । काशीखंड के अनुसार पहले इनका नाम रिपुजय था । इन्होंने काशी में बहुत तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने इन्हें पृथ्वीपालन करने का वर दिया । नागराज ने अपनी अनंगमोहिनी नाम की कन्या इन्हें दी थी । देवताओं ने इन्हें आकाश से पुष्प और रत्न आदि दिऐ थे, इसी से इनका नाम दिवोदास हो गया । २. हरिवंश के अनुसार ब्रह्मर्षि इंद्रसेन के पौत्र और यघ्रश्व के पुत्र का नाम जो मेनका के गर्भ से अपनी बहन अहल्या के साथ ही उत्पन्न हुए थे । इनके पुत्र मित्रेषु भी महर्षि थे ।

दिवोद्भवा
संज्ञा स्त्री० [सं०] इलायची ।

दिवोल्का
संज्ञा स्त्री० [सं०] दिन के समय आकाश से गिरनेवाला चमकीला पिंड या उल्का ।

दिवौका
संज्ञा पुं० [सं० दिवौकस्] १. वह जो स्वर्ग में रहता हो । २. देवता । ३. चातक पक्षी । ३. मृग । हिरन (को०) । ४. हस्ती । हाथी (को०) । ५. मधुमक्खी (को०) ।

दिव्य (१)
वि० [सं०] १. स्वर्ग से संबंध रखनेवाला । स्वर्गीय । २. आकाश से संबंध रखनेवाला । अलौकिक । ३. प्रकाशमान । चमकीला । ४. बहुत बढ़िया या अच्छा । जो देखने में बहुत ही सुंदर या भला मालूम हो । खूब साफ या सुंदर । जैसे,—(क) उन्होंने एक बहुत दिव्य भवन बनवाया था । (ख) आज हमने बहुत दिव्य भोजन किया है । ४. लोक से परे । लोकातीत (को०) ।

दिव्य (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १.यव । जौ । २. गुग्गुल । ३. आँवला । ४. शतावार । ५. ब्राह्मी । ६. सफेद दूब । ७. हड़ । ८. लौंग । ९. सूअर । १०. तत्ववेत्ता । ११. हरिचंदन । १२. अष्टवर्ग के अंतर्गत महामेदा नाम की औषधि । १३. कपूरकचरी । १४. चमेली । १५. जीरा । १६. धूप में बरसते हुए पानी से स्नान । १७. तीन प्रकार के केतुओं में से एक । वे केतु जिनकी स्थिति भूवायू से ऊपर है । १८. तांत्रिकों के आचार के तीन भावों में से एक जिससे पंच मकार, श्मशान और चिता का साधन विधेय है । १९. आकाश में होनेवाला एक प्रकार का उत्पात । २०. तीन प्रकार के नायकों में से एक । वह नायक जो स्वर्गीय या अलौकिक हो । जैसे, इंद्र, राम, कृष्ण आदि । विशेष—साहित्य ग्रंथों में तीन प्रकार के नायक माने गए हैं दिव्य, अदिव्य और दिव्यादिव्य । दिव्य नायक स्वर्गीय या अलौकिक होते हैं, जैसे, देवता आदि और अदिव्य नायक सांसरिक या लौकिक, जैसे, मनुष्य । दिव्यादिव्य नायक वे होते हैं जो होते तो मनुष्य हैं पर जिनमें गुण देवताओं के होते हैं । जैसे, नल, पुरुरवा, अर्जुन आदि । इसी प्रकार तीन प्रकार की नायिकाएँ भी होती है । २१. व्यवहार या न्यायालय में प्राचीन काल की एक प्रकार की परीक्षा जिसमें किसी मनुष्य का अपराधी या निरपराध होना सिद्ध होता था । क्रि० प्र०—देना । उ०—साँप सभा साबर लकार भए देउँ दिव्य दुसहु साँसति कीजै आगे ही या तन की ।—तुलसी (शब्द०) । विशेष—ये परीक्षाएँ नौ प्रकार की है—घट, अग्नि, उदक, विष, कोष, तंडुल, तप्तमाषक, फूल और धर्मज । इनमें तुला या घट, अग्नि, जल, विष और कोष ये पाँच परिक्षाएँ भारी अप- राधों के लिये; तंडुल चोरी के लिये, तत्पमाषक बड़ी भारी चोरी के लिये और फूल तथा धर्मज साधारण अपराधों के लिये हैं । स्मृतियों आदि में यह भी लिखा है कि ब्राह्मण की तुला से, क्षत्रिय की अग्नि से, वैश्य की जल से और शूद्र की विष से परीक्षा लेनी चाहिए । बालक, वृद्ध, स्त्री और आतुर की परीक्षा भी घट या तुला विधि से ही होनी चाहिए । स्त्रियों की विषपरिक्षा और शिशिर तथा हेमंत में रोगियों की जलपरीक्षा, कोढ़ियों की अग्निपरीक्षा और शराबियों, लंपटों जुआरियों, धूर्तों और नास्तिकों की कोषपरीक्षा कदापि न होनी चाहिए । शीतकाल में जलपरीक्षा, ग्रीष्म में अग्नि- परिक्षा वर्षा में विषपरीक्षा और प्रातःकाल के समय तुला- परीक्षा नहीं होनी चाहिए । धर्मज और घटपरीक्षा सब ऋतुओं में और अग्निपरीक्षा वर्षा, हेमंत और शिशिर में तथा जल- परीक्षा ग्रीष्म में होनी चाहिए । अग्नि, घट और कोषपरीक्षा सबेरे, जलपरीक्षा दोपहर को और विषपरीक्षा रात को होनी चाहिए । बृहस्पति जिस समय सिंहस्थ या मकरस्थ हों अथवा भृगु अस्त हों, उस समय कोई दिव्य या परीक्षा न होनी चाहिए । मलमास में और अष्टमी तथा चतुर्दशी को भी परीक्षा नहीं होनी चाहिए । परीक्षा के दिन से एक दिन पहले परीक्षा देने और लेनेवाले दोनों का उपवास करना चाहिए और कुछ विशिष्ट नियमों के अनुसार राजसभा में सब लोगों के सामने दिव्य या परीक्षा होनी चाहिए । किसी किसी के मत से 'तुलसी' नामक एक और एक प्रकार का दिव्य भी है; पर इसके विषय में कोई विशेष बात नहीं मिलती । तुलापरीक्षा में शोध्य या अभियुक्त को बड़े तराजू पर बैठाकर दो बार अदल बदल कर तौलते थे । दूसरी बार की तोल में यदि वह बढ़ जाता तो शुद्ध और बराबर उतर गया या घट जाता तो दोषी समझा जाता था । अग्निपरीक्षा में तपाए हुए लोहे को अंजली में लेकर सात मंडलों के भीतर धीरे धीरे चलना पड़ता था । यदि हाथ न जलता तो अभियुक्त निर्दोष समझा जाता था । जलपरीक्षा में अभियुक्त को जल में गोता लगाना पड़ता था । गोता लगाने के समय तीन बाण छोड़े जाते थे । तीसरा बाण ठीक उसी समय छूटता था जब अभियुक्त जल में डूबता था । बाण छूटते ही एक आदमी वेग से उस स्थान पर दौड़ जाता था जहाँ बाण गिरता और एक दूसरा आदमी उस बाण को लेकर तुरंत उस स्थान पर दौड़कर आता था जहाँ से बाण छूटा था । यदि इसके वहाँ पहुँचने तक अभियुक्त जल ही में रहता तो वह निर्दोष समझा जाता था । विष- परीक्षा में विशेष मात्रा में विष खिलाया जाता था । यदि विष पच जाता तो अभियुक्त निर्दोष माना जाता था । कोषपरीक्षा में किसी देवता के स्नान का तीन अंजलि जल पिलाया जाता था । यदि १४ दिन के भीतर उक्त देवता के कोप से अभियुक्त को कोई घोर दुःख न होता तो वह निर्दोष या सच्चा माना जाता था । इसी प्रकार की और भी परीक्षाएँ थीं ।२२. शपथ, विशेषतः देवताओं आदि की शपथ । सौगंध । कसम । क्रि० प्र०—देना । २३. यम का एक नाम (को०) ।

दिव्यक
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का साँप । २. एक प्रकार का जंतु ।

दिव्यकट
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत के अनुसार प्राचीन काल का एक देश जो पश्चिम दिशा में था ।

दिव्यकवच
संज्ञा पुं० [सं०] १. अलौकिक तनत्राण । देवताओं का दिया हुआ कवच । २. वह स्तोत्र जिसका पाठ करने से अंगरक्षा हो । जैसे, रामरक्षा, नारायणकवच, देवीकवच ।

दिव्यकुंड
संज्ञा पुं० [सं० दिव्यकुण्ड] कालिका पुराण के अनुसार कामरूप के दक्षिण क्षोभक पर्वत पर स्थित कुंडविशेष [को०] ।

दिव्यक्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] दिव्य के द्वारा परीक्षा लेने की क्रिया । विशेष—दे० 'दिव्य—२१' ।

दिव्यगंध
संज्ञा पुं० [सं० दिव्यगन्ध] १. लौंग । २. गंधक ।

दिव्यगंधा
संज्ञा स्त्री० [सं० दिव्यगन्धा] बड़ी इलायची । २. बड़ी चेच का साग ।

दिव्यगायन
संज्ञा पुं० [सं०] स्वर्ग में गानेवाले, गंधर्व ।

दिव्यचक्षु (१)
संज्ञा पुं० [सं० दिव्यचक्षुस्] १. ज्ञान रूपी नेत्र । ज्ञान- चक्षु । दिव्यदृष्टि । २. अंधा । वह जिसे कुछ भी दिखाई न दे । ३. चश्मा । ऐनक । ४. बंदर । ५. एक प्रकार का गंधद्रव्य । ६. अर्जुन (को०) । ७. ज्योतिषी (को०) ।

दिव्यचक्षु (२)
वि० दिव्य या सुंदर नेत्रोंवाला ।

दिव्यतरंगिणी
संज्ञा स्त्री० [सं० दिव्यतरङि्गणी] कर्नाटकी शैली की एक रागिनी (संगीत) ।

दिव्यता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दिव्य का भाव । २. देवभाव । ३. सुंदरता । उत्तमता ।

दिव्यतेजा
संज्ञा स्त्री० [सं० दिव्यतेजस्] ब्राह्मी बूटी ।

दिव्यदर्शी
वि० [सं० दिव्यदर्शिन्] १. अलौकिक पदार्थों को देखनेवाला । २. ज्योतिष का ज्ञाता [को०] ।

दिव्यदृक्
संज्ञा पुं० [सं० दिव्यद्दश्] ज्यौतिषी [को०] ।

दिव्यदृष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अलौकिक दृष्टि जिससे गुप्त, परोक्ष अथवा अंतिरिक्ष के पदार्थ दिखाई दें । जैसे,—आपने यहीं बैठे बैठे दिव्यदृष्टि से देख लिया कि बरात वहाँ पहुँच गई । (व्यंग्य) । २. ज्ञानदृष्टि ।

दिव्यदेवी
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुराणानुसार एक देवी का नाम ।

दिव्यदोहद
संज्ञा पुं० [सं०] वह पदार्थ जो किसी अभीष्ट की सिद्धि के अभिप्राय से किसी देवता को अर्पित किया जाय ।

दिव्यधर्मी
संज्ञा पुं० [सं० दिव्यधर्मिन्] वह जिसका स्वभाव बहुत अच्छा हो ।

दिव्यनगर
संज्ञा पुं० [सं०] ऐरावती नगरी ।

दिव्यनदी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आकाशगंगा । २. शिवपुराण के अनुसार एक नदी का नाम ।

दिव्यनारी
संज्ञा स्त्री० [सं०] अप्सरा । देववधू ।

दिव्यपंचामृत
संज्ञा पुं० [सं० दिव्य पञ्चामृत ] गाय के घी, दूध, दही, मक्खन या मधु और चीनी इन पाँच चीजों को मिलाकर बनाया हुआ पंचामृत ।

दिव्यपुष्प
संज्ञा पुं० [सं०] करबीर । कनेर ।

दिव्यपुष्पा
संज्ञा स्त्री० [सं०] बड़ा गूमा जिसका पेड़ मनुष्य के बराबर ऊँचा और फूल लाल होता है । बड़ी द्रोणपुष्पी ।

दिव्यपुष्पिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] लाल रंग का मदार ।

दिव्ययमुना
संज्ञा स्त्री० [सं०] कामरूप देश की एक नदि जो बहुत पवित्र मानी जाती है और जिसका माहात्म्य पुराणों में है ।

दिव्यरत्न
संज्ञा पुं० [सं०] चिंतामणि नामक कल्पित रत्न जिसके विषय में ये प्रसिद्ध है कि वह सब कामनाएँ पूरी करता है ।

दिव्यरथ
संज्ञा पुं० [सं०] देवताओं का विमान ।

दिव्यरस
संज्ञा पुं० [सं०] पारद । पारा ।

दिव्यलता
संज्ञा स्त्री० [सं०] मूर्वा लता । मूरहरी । चुरनहार ।

दिव्यवस्त्र (१)
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य का प्रकाश ।

दिव्यवस्त्र (२)
वि० सुंदर और उत्कृष्ट कपड़े पहने हुए । उत्कृष्ट वस्त्र धारण करनेवाला ।

दिव्यवाक्य
संज्ञा पुं० [सं०] देववाणी । आकाशवाणी ।

दिव्यवाह
संज्ञा स्त्री० [सं०] वृषभानु गोप की छह कन्याओं में से एक ।

दिव्यश्रोत्र
संज्ञा पुं० [सं०] वह कान जिससे सब कुछ सुना जाय ।

दिव्यसरित्
संज्ञा स्त्री० [सं०] मंदाकिनी । आकाशगंगा [को०] ।

दिव्यसरिता
संज्ञा स्त्री० [सं० दिव्यसरित्] आकाशगंगा ।

दिव्यसानु
संज्ञा पुं० [सं०] एक विश्वदेव ।

दिव्यसार
संज्ञा पुं० [सं०] साल वृक्ष । साखू का पेड़ ।

दिव्यसूरि
संज्ञा पुं० [सं०] रामानुज संप्रदाय का बारह आचार्य जिनके नाम ये है—(१) कासार, (२) भूत, (३) महत् (४) भक्ति- सार, (५) शठारि, (६) कुलशेखर, (७) विष्णुचित्त, (८) भक्तांघ्रि- रेणु, (९) मुनिवाह, (१०) चतुष्कविंद्र, (११) रामानुज, (१२) गोदादेवा या मधुकर कवि ।—रघुराज (शब्द०) ।

दिव्यस्त्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] दिव्यांगना । अप्सरा ।

दिव्यांगना
संज्ञा स्त्री० [सं० दिव्याङ्गना] देववधू । अप्सरा ।

दिव्यांशु
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य ।

दिव्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आवँला । २. बाँझ ककोड़ा । ३. महामेदा । ४. ब्राह्मी जड़ी । ५. बड़ा जीरा । ६. सफेद दूब । ७. हड़ । ८. कपूर कचरी । ९. शतावर । १०. तीन प्रकार की नायिकाओं में से एक । देवलोकीय नायिका । देवांगना । स्वर्गीय या अलौकिक नायिका । जैसे, पार्वती, सीता, राधिका आदि । दे० 'दिव्य' (नायक) ।

दिव्यादिव्य
संज्ञा पुं० [सं०] तीन प्रकार के नायकों में से एक । वह मनुष्य का/?/नायक जिसमे/?/के भी गुण हों । जैसे,/?//?//?/आदि । विशेष—दे० 'दिव्य' (नायक) ।

दिव्यादिव्या
संज्ञा पुं० [सं०] तीन प्रकार की नायिकाओं में से ऐक । वह इहलौकिक नायिक जिसमें स्वर्गीय स्त्रियों के भी गुण हों । जैसे, दमयंती, उर्वशी, उत्तरा आदि ।

दिव्याश्रय
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत के अनुसार एक प्राचीन पुण्यक्षेत्र जहाँ पूर्व काल में भगवान् विष्णु ने तपस्या की थी । कुरुक्षेत्र का दर्शन करके बलदेव जी यहीं से होते हुए हिमालय गए थे ।

दिव्यासन
संज्ञा पुं० [सं०] तंत्र के अनुसार एक प्रकार का आसन ।

दिव्यास्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. देवताओं का दिया हुआ हथियार । २. शंत्रों द्वारा चलनेवाला हथियार ।

दिव्येलक
संज्ञा पुं० [सं०] सुश्रुत के अनुसार एक प्रकार का साँप ।

दिव्योदक
संज्ञा पुं० [सं०] वर्षा का पानी । बरसा हुआ पानी ।

दिव्योपपादुक
संज्ञा पुं० [सं०] बिना माता पिता के उत्पन्न देवता ।

दिव्यौषध
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दिव्यौषधि' ।

दिव्यौषधि
संज्ञा स्त्री० [सं०] मैनसिल ।

दिश् (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] दिशा । दिक् ।

दिश् (२)
संज्ञा पुं० एक देवता जो कान के अधिष्ठाता माने जाते हैं ।

दिशा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. नियत स्थान के अतिरिक्त शेष विस्तार । ओर । तरफ । जैसे,—जिस दिशा में घोड़ा भागा था उसी दिशा में वह भी चला । २. क्षितिजवृत्त के किए हुए चार कल्पित विभागों में से किसी एक विभाग की ओर का विस्तार । विशेष—दिशा का ठीक ठीक ज्ञान प्राप्त करने के लिये क्षितिज वृत्त चार भागों में बाँटा गया है, जिनको पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण कहते हैं । प्रत्येक दिशाओं के बीच में एक कोण भी होता है । पूर्व और दक्षिण के बीच के कोण को अग्निकोण, दक्षिण और पश्चिम के बीच के कोण को नैऋत्य, पश्चिम और उत्तर के बीच के कोण को/?/बायव्य कोण और उत्तर पूर्व के बीच के कोण को ईशान कोण कहते हैं । जिस और सूर्य उदय होता है उस ओर मुँह करके यदि खड़े हों तो सामने की ओर पूर्व, पीछे पश्चिम, दाहिनी ओर दक्षिण और बाईं ओर उत्तर होता है । इसके अतिरिक्त दो दिशाएँ और भी मानी जाती हैं—एक सिर के ठीक ऊपर की ओर और दूसरी पैर के ठीक नीचे की ओर जिन्हें क्रमशः ऊर्ध्व और अधः कहते हैं । वैशेषिक का मत है कि वास्तव में दिशा एक ही है, काम चलाने के लिये इसके भेद कर लिये गए हैं । संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और विभाग इसके गुण हैं । पर्या०—कुसुम । काष्ठा । आशा । हरित् । निवेशिनी । गो । दिश् । दिक् । ३. दस की संख्या । ४. रूद्र की एक स्त्री का नाम । ५. दे० 'दिसा' ।

दिशाकाश
संज्ञा पुं० [सं० दिश् + आकाश] दिशाएँ और आकाश । उ०—लौटी लेकर रचना उदास, ताकता हुआ मैं दिशकाश ।—अपरा, पृ० १७३ ।

दिशागज
संज्ञा पुं० [सं०] दिग्गज ।

दिशाचक्षु
संज्ञा पुं० [सं० दिशाचक्षुस्] पुराणानुसार गरुड़ के एक पुत्र का नाम ।

दिशाजय
संज्ञा पुं० [सं०] दिग्विजय ।

दिशापाल
संज्ञा पुं० [सं०] दिक्पाल ।

दिशाभ्रम
संज्ञा पुं० [सं०] दिशाओं के संबंध में भ्रम होना । दिग्भ्रम ।

दिशावकाश
संज्ञा पुं० [सं० दिशा + अवकाश] दो दिशाओं के बीच का अंतराल [को०] ।

दिशावकाशव्रत
संज्ञा स्त्री० [सं०] जैनियों का एक प्रकार का व्रत जिसमें वे प्रातः काल यह निश्चय कर लेते हैं कि आज हम अमुक दिशा में इतनी दूर तक जायँगे ।

दिशावधि
संज्ञा स्त्री० [सं०] दिशा की सीमा । क्षितिज । उ०— दिशावधि में पल विविध प्रकार, अतल में मिलते तुम अविकार ।—पल्लव, पृ० १२९ ।

दिशाशूल
संज्ञा पुं० [सं० दिशा + शूल] दे० 'दिकशूल' ।

दिशासूल
संज्ञा पुं० [सं० दिशा + शूल] दे० 'दिक्शूल' ।

दिशि
संज्ञा स्त्री० [सं० दिश्] दे० 'दिशा' ।

दिशिनियम
संज्ञा पुं० [सं० दिशि + नियम] दे० 'दिशावकाशक व्रत' ।

दिशेभ
संज्ञा पुं० [सं० दिशा + इभ] दिग्गज ।

दिश्य
वि० [सं०] दिशा संबंधी । दिशाविशेष संबंधी उ०—कहलाकर दिश्य संपदा, हम चारों सुख से पली सदा ।—साकेत, पृ० ३२७ ।

दिष्ट (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. भाग्य । २. उपदेश । ३. दारुहरिद्रा । दारुहलदी । ४. काल । ५. वैवस्वत मनु के एक पुत्र का नाम ।

दिष्ट (२)
वि० १. नियत । उद्दिष्ट । निश्चित । २. कथित । प्रति पादित । ३. पादिष्ट । आदेशप्राप्त ।

दिष्ट पु (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० दृष्टि] दे० 'दृष्टी' । उ०—तुव दिष्ट कुटिल कराल, म्हाँ परिग सोक बिसाल ।—प० रासो, पृ० ११ ।

दिष्टबंधक
संज्ञा पुं० [सं० दृष्टि + बन्धक] किसी पदार्थ को बंधक या रेहन रखने का एक प्रकार जिसमें रुपए का केवल सूद दिया जाता है, रेहन रखे हुए पदार्थ की आय या भोग आदि से रुपए देनेवेला का कोई संबंध नहीं रहता । वह रेहन जिसमें चीज पर रूपए देनेवाले का कोई कब्जा न हो, उसे सिर्फ सूद मिलता रहे ।

दिष्टवान पु
संज्ञा पुं० [सं० दृष्टिमत्] दृष्टि । देखने का ढंग । उ०—दिष्टवान मैं ताकर चीन्हा । आद मनुष्य सों जइ छल कीन्हा ।—इंद्रा० पृ० १२५ ।

दिष्टांत
संज्ञा पुं० [सं० दिष्टान्त] मृत्यु । मौत ।

दिष्टि (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. भाग्य । २. उपदेश । ३. उत्सव । ४. प्रसन्नता । ५. लंबाई की एक माप (को०) । ६. आदेश । निर्देश (को०) ।

दिष्टि पु (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० दृष्टि] दे० 'दृष्टि' ।

दिष्णु
वि० [सं०] दाता । देनेवाला [को०] ।

दिसंतर पु† (१)
संज्ञा पुं० [सं० देशान्तर] देशांतर । विदेश । परदेस । उ०—(क) बैल उलटि नाइक कौं लाद्यौ वस्तु माँहि भरि गौंनि अपार । भली भाँति कौ सौदा कीयौ आइ दिसंतर या संसार ।—सुंदर ग्रं०, भा० २, पृ० ५५२ । (ख) स्वाँगी सब संसार है, साधू कोई एक । हीरा दूरि दिसंतरा, कंकर और अनेक ।—संतवाणी०, पृ० ८८ ।

दिसंतर
क्रि० वि० दिशाओं के अंत तक । बहुत दूर तक ।

दिसंबर
संज्ञा पुं० [अं० डिसेंबर] अंग्रेजी साल का बारहवाँ या अंतिम महीना जो इकतीस दिनों का होता है ।

दिस पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० दिश् या दिशा] दे० 'दिशा' ।

दिस (२)
संज्ञा पुं० [सं० दिवस] दिन । दिवस । उ०—अहं अग्नि निस दिस जरै, गुरु से चाहे मान । ताको जम नेवता दियो, होउ हमार मेहमान ।—कबीर सा० सं०, पृ० ४ ।

दिसना पु
क्रि० अ० [सं० दर्शन; प्रा० दंसण, दस्सण, दिस्सण] दे० 'दिखना' । उ०—हुआ क्या वो कह खोल हाली मुँजे, के दिसता है पिंजरा सो खाली मुँजे ।

दिसा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० दिशा] दे० 'दिशा' ।

दिसा (२) †
संज्ञा स्त्री० [सं० दिशा (= ओर)] मलत्याग करने की क्रिया । पैखाने जाना । झाड़ा फिरना । क्रि० प्र०—जाना । फिरना । लगना । होना । यौ०—दिशा फरागत ।

दिसा (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० दशा] दे० 'दशा' ।

दिसाउर पु
संज्ञा पुं० [सं० देश + अपर; प्रा० देसावर, अप० दिसाउर] दे० 'दिसावर' । उ०—हिरणाखी हसिनइ कहद्र, करउ दिसाउर एक ।—ढोला०, दू० २२१ ।

दिसादाह पु
संज्ञा पुं० [सं० दिशा + दाह] दे० 'दिक्दाह' ।

दिसाबल
संज्ञा पुं० [देश०] वैश्यों की एक जाति ।

दिसावर
संज्ञा पुं० [सं० देशान्तर] दूसरा देश । देशांतर । परदेश । विदेश । उ०—दाता तरवर दया फल उपगारी जीवंत । पंषी चले दिसावराँ बिरषा सुफल फलंत ।—कबीर ग्रं०, पृ० ७७ । मुहा०—दिसावर उतरना = जिस स्थान से माल आता हो अथवा जहाँ जाता हो वहाँ का भाव गिरना । विदेश में भाव गिरना । दिसावर चढ़ना = विदेश में बाजार का भाव चढ़ जाना । परदेस में दाम बढ़ जाना ।

दिसावरी
वि० [हिं० दिवासर + ई (प्रत्य०)] विदेश से आया हुआ । बाहर का । बाहरी (माल आदि) ।

दिसाशूल
संज्ञा पुं० [हिं० दिसा + सं० शूल] दे० 'दिक्शूल' ।

दिसासूल
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'दिक्शूल' ।

दिसि पु †
संज्ञा स्त्री० [ सं० दिशा] दे० 'दिशा' । उ०—देस काल दिसि विदिसिह माहीं । कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं ।— मानस, १ । १८५ । यौ०—दिसिविदिसि ।

दिसिटि पु †
संज्ञा स्त्री० [ सं० दृष्टि] दे० 'दृष्टि' ।

दिसित्राता
संज्ञा पुं० [हिं० दिसि + सं० त्राता] दिग्पाल । उ०— लोक लोक प्रति भिन्न विधाता । भिन्न विष्नु सिव मनु दिसित्राता ।—मानस, ७ । ८१ ।

दिसिदुरद पु †
संज्ञा पुं० [सं० दिशिद्विरद] दिग्गज ।

दिसिनायक पु †
संज्ञा पुं० [हिं० दिसि + नायक] दे० 'दिक्पाल' । उ०—चौके सिव विरंचि दिसिनायक रहे मूँदि कर कान ।— तुलसी ग्रं०, पु० ३१६ ।

दिसिप पु
संज्ञा पुं० [हिं० दिसि + सं० प (= रक्षक)] दे० 'दिक्पाल' । उ०—कर जोरे सुर दिसिप विनीता । भृकुटि बिलोकत सकल सभीता ।—मानस, ५ ।२० ।

दिसिपति, दिसिपाल पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'दिक्पाल' । उ०— (क) बिधि हरि हरु दिसिपति दिनराऊ ।—मानस, १ ।३२१ । (ख) अमर नाग किंनर दिसिपाल ।—मानस, २ ।१३४ ।

दिसिराज पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'दिक्पाल' । उ०—विष्णु कहा अस बिहसि तब बोलि सकल दिसिराज ।—मानस, १ ।९२ ।

दिसैया पु †
वि० [हिं० दिसना (= दिखना) + ऐया (प्रत्य०)] १. देखनेवाला । २. दिखानेवाला ।

दिस्टि पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० दृष्टि] दे० 'दृष्टि' । उ०—जहाँ जो ठाँव दिस्टि मँह आवा । दरपन भाव दरस देखरावा ।—जायसी (शब्द०) ।

दिस्टिबंध पु
संज्ञा पुं० [सं० दृष्टिबन्धन] इंद्रजाल । जादू । उ०— राघव दिस्टिबंध कल्हि खेला । सभा माँझ चेटक अस मेला ।—जायसी (शब्द०) ।

दिस्टिवंत पु
वि०, संज्ञा पुं० [सं० दृष्टिवत्] दे० 'दीठवंत' ।

दिस्ता
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'दस्ता' ।

दिस्सा
संज्ञा स्त्री० [सं० दिशा] ओर । तरफ (लश०) ।

दिहंद
वि० [फा़०] दे० 'दिहंदा' ।

दिहंदा
वि० [फा़०] दाता । देनेवाला । विशेष—इसका प्रयोग प्रायः यौगिक शब्दों में के अंत में होता है । जैसे, रायदिहंदा ।

दिहकानियत
संज्ञा स्त्री० [फा़० देहका़नियत] देहातीपन । गँवार- पन [को०] ।

दिहरा †
संज्ञा पुं० [सं० देव + गृह (= हर) (= देवहर)] देवालय । देवमंदिर ।

दिहली
संज्ञा स्त्री० [सं० देहली] दे० 'दहलीज' । उ०—नाल औवल पीसो गाढो, दिहली को तब बालक काढो ।—कबीर सा०, पृ० ५३८ ।

दिहाड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० दिन + हार (प्रत्य०)] १. दुर्गत । बुरी हालत । २. दिन । उ०—रत्ति दिहाड़े तलब तुसाड़ी अक्क्ल इलम उड़ाँदा है ।—घनानंद, पृ० १७७ ।

दिहाड़ी † (१)
संज्ञा पुं० [हिं० दिहरा] दे० 'दिहरा' । उ०—पूजै देव दिहाड़ियाँ महा माई मानैं । परगट देव निरंजना, ताकी सेव न जानैं ।—दादू०, पृ० ५५८ ।

दिहाड़ी (२)
संज्ञा स्त्री० [पंजाबी, हिं० दिहाड़ा + ई (प्रत्य०)] १. दिन । २. दिन भर की मजदूरी ।

दिहात †
संज्ञा स्त्री० [हिं० देहात] दे० 'देहात' ।

दिहाती
वि० [हिं० दिहात + ई] 'देहाती' ।

दिहातीपन
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'देहातीपन' ।

दिहुढ़ी
संज्ञा स्त्री० [सं० देहली] दे० 'डयोढ़ी' ।

दिहुला
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का धान जो पूरब के जिलों में बोया जाता है ।

दिहेज †
संज्ञा पुं० [हिं० दहेज] दे० 'दहेज' ।

दीँ (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'दीमक' ।

दीँ पु (२)
संज्ञा पुं० [अ० दीन] दे० 'दीन' । उ०—दुश्मन है दीं का खाल सिपह मुख ऊपर तेरे । हिंदू से क्या अजब है अगर काफरी करे ।—कविता कौ०, भा० ४, पृ० २४ ।

दीअट
संज्ञा स्त्री [हिं० दीयट] दे० 'दीयट' ।

दीआ
संज्ञा पुं० [सं० दीपक] दे० 'दीया' ।

दीक
संज्ञा पुं० [देश०] जाल में माँजा देने का एक प्रकार का तेल । विशेष—यह तेल काटू या हिजली के पेड़ की छाल से निकलता है और जाल में माँजा देने के काम में आता है । काटू के पेड़ दक्षिण में समुद्र के किनारे मिलते हैं ।

दीकरा
संज्ञा पुं० [देश० स्त्री० दीकरी] संतति । बेटा । वत्स । पुत्र । उ०—सहू दईरा दीकरो लीला लाड़े लोक । दई हूँत छाना दिवस, सै काटै विण सोक ।—बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० २६ ।

दीक्षक
संज्ञा पुं० [सं०] दीक्षा देनेवाला । मंत्र का उपदेश करनेवाला । शिक्षक । गुरु ।

दीक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० दीक्षित] १. दीक्षा देने की क्रिया । २. दे० 'दीक्षांत' । ३. यज्ञोपवीत । उपनयन (को०) ।

दीक्षांत
संज्ञा पुं० [सं० दीक्षान्त] १. वह अवभृत यज्ञ जो किसी यज्ञ के समापनांत में उसकी त्रुटि आदि के दोष की शांति के लिये किया जाता है । २. विश्वविद्यालयों में परीक्षोत्तीर्ण स्नातकों को उपाधि या प्रमाणपत्र प्रदान करने का अवसर । ३. किसी गुरुकुल या विद्यालय में अध्ययन क्रम की समाप्ति । यौ०— दीक्षांत भाषण । दीक्षांतोपदेश = उत्तीर्ण स्नातकों को प्रमाणपत्र देने के अनंतर किसी विशिष्ट विद्वान् या कुलपति द्वारा उन स्नातकों को संबोधित कर दिया जानेवाला उपदेश ।

दीक्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. यजन । यज्ञकर्म । सोमयागादि का संकल्पपूर्वक अनुष्ठान । २. गुरु या आचार्य का नियमपूर्वक मंत्रोपदेश । मंत्र की शिक्षा जिसे गुरु दे और शिष्ट ग्रहण करे । क्रि० प्र०—देना ।—लेना । विशेष— वैदिक गायत्री मंत्र के अतिरिक्त आज कल भिन्न भिन्न देवताओं के बहुत से सांप्रदायिक इष्ट मंत्र तंत्रोक्त रीति के अनुसार प्रचलित हैं । गोतमीय तंत्र, योगिनी तंत्र, रुद्रयामल इत्यादि तंत्र ग्रंथों में दीक्षाग्रहण का माहत्म्य तथा उसके अनेक प्रकार के नियम दिए हुए हैं । विष्णु, शिव, शक्ति, गणेश, सूर्य इत्यादि की उपासना के भेद से वैष्णव, रामतारक, शैव, शाक्त इत्यादि मंत्र प्रचलित हैं, जो शिष्य के कान में कहे जाते हैं । लोगों का साधारण विश्वास है कि विना गुरुमंत्र लिए गति नहीं होती । तंत्रों के अनुसार जिन मंत्रों के अंत में 'हुं० फट्' हो वे पुं० मंत्र, जिनके अंत में 'स्वाहा' हो वे स्त्री मंत्र और जिनके अंत में 'नमः' हो वे नपुंसक मंत्र कहलाते हैं । योगिनी तंत्र में लिखा है कि पिता, मामा, छोटे भाई और शत्रुपक्षवाले से मंत्र न लेना चाहिए । रुद्रयामल तंत्र पति से मंत्र लेने का भी निषेध करता है, पर उससे सिद्ध मंत्र लेने की आज्ञा देता है । शूद्र को प्रणव या प्रणवघटित मंत्र देने का निषेध है । शूद्र को गोवाल महे- श्वर, दुर्गा, सूर्य और गणेश का मंत्र देना चाहिए । ३. उपनयन संस्कार जिसमें आचार्य गायत्री मंत्र का उपदेश देता है । ४. वह मंत्र जिसका उपदेश गुरु करे । गुरुमंत्र । ५. पूजन ।

दीक्षागुरु
संज्ञा पुं० [सं०] मंत्रोपदेष्टा गुरु ।

दीक्षापति
संज्ञा पुं० [सं०] दीक्षा या यज्ञ का रक्षक, सोम ।

दीक्षित (१)
वि० [सं०] १. जिसने सोमयागादि का संकल्पपूर्वक अनुष्ठान किया हो । जो किसी यज्ञ में प्रवृत्त हो । २. जिसने आचार्य से दीक्षा ली हो । जिसने गुरु से मंत्र लिया हो । जिसने दीक्षा ग्रहण की हो ।

दीक्षित (२)
संज्ञा पुं० ब्राह्मणों का एक भेद ।

दीखना
क्रि० अ० [हिं० देखना] दिखाई देना । देखने में आना । दृष्टिगोचर होना । जैसे,— उसे दूर की चीज नहीं दीखती । संयो० क्रि०—पड़ना ।—पाना ।—उ०— पुनि जल दीख रूप निज पावा ।— मानस, १ । १३६ ।

दीखिआ पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० दीक्षा] दे० 'दीक्षा' । उ०— कवन गुरु जिसु दीखिआ दीनि । भरथरि प्रणवै रत्तु प्रवीन ।— प्राण०, पृ० १०० ।

दीगर
वि० [फा०] दूसरा । अन्य ।

दीघ
वि० [सं० दीर्घ, प्रा० दीघ्घ] बड़ा । विशाल । लंबा ।

दीघी
संज्ञा स्त्री० [सं० दीघिंका] बावली । पोखरा तालाब । जैसे, लालदीघी ।

दीच्छा पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दीक्षा] दे० 'दीक्षा' ।

दीठ
संज्ञा स्त्री० [सं० दृष्टि, प्रा० दिट्ठि] १. देखने की वृत्ति या शक्ति । आँख की ज्योति । दृष्टि । उ०— पिय की आरति देखि मेरे जिय दया होत पै तेरी दीठ देखि—देखि डरत ।— नंद०, ग्रं०, पृ० ३६८ । मुहा०— दीठ मारी जाना = देखने की शक्ति न रह जाना । २. देखने के लिये नेत्रों की प्रवृत्ति । आँख की पुतली की किसी वस्तु की सीध में होने की स्थिति । टक । दृकपात । अवलोकन । चितवन । नजर । निगाह । क्रि० प्र०—पड़ना ।—डालना । यौ०— दीठबँद । दीठवंदी । मुहा०—दीठ करना = दृष्टि डालना । ताकना । दीठ चूकना= नजर न पड़ना । दृष्टि का इधर उधर हो जाना । दीठ फिरना = (१) नेत्रों का दूसरी ओर प्रवृत्त होना । (२) कृपादृष्टि न रहना । हित का ध्यान या प्रीति न रहना । चित्त अप्रसन्न या खिन्न होना । दीठ फिरना = कृपा होना । दयादृष्टि होना । उ०— हो गए फेर में पडे़ बरसों । आप की दीठ आज भी न फिरी ।— चुभते०, पृ० २ । दीठ फेकना = नजर डालना । ताकना । दीठ फेरना = (१) नजर हटा लेना । दूसरी ओर ताकना । उ०— जिधर पीठ दे दीठ फेरती, उधर मैं तुम्हें ढीठ, हेरती ।— साकेत, पृ० ३१३ ।(२) कृपादृष्टि न रखना । अप्रसन्न या खिन्न होना । किसी की दीठ बचाना = (१) (किसी के) सामने होने से बचना । आँख के सामने न आना । जान बूझकर न दिखाई पड़ना (भय, लज्जा आदि के कारण) । (२) (किसी से) छिपाना । न दिखाना । उ०— मोहन आपनो राधिका को विपरीत को चित्र विचित्र बनाय कै । दीह बचाय सलोनी की आरसी में चिपकाइ गयो बहराइ कै ।— रसकुसुमाकर (शब्द०) । दीठ बाँधना = इस प्रकार जादू करना कि आँखों को और का और दिखाई दे । इंद्रजाल फैलाना । दीठ लागाना = ताकना । दृष्टि करना । उ०— नहिं लावहिं पर तिय मन दीठी ।— तुलसी (शब्द०) । ३. आँख की ज्योति का प्रसार जिससे वस्तुओं के रूप रंग का बोध होता है । दृकपथ । मुहा०—दीठ पर चढ़ना = (१) देखने में श्रेष्ठ या उत्तम जान पड़ना । निगाह में जँचना । अच्छा लगने के कारण ध्यान में सदा बना रहना । पसंद आना । भाना । (२) आँखों में खटकना । किसी वस्तु का इतना बुरा लगना कि उसका ध्यान सदा बना रहे । दिठ बिछाना = (१) प्रेम या श्रद्धावश किसी के आसरे में लगातार ताकते रहना । उत्कंठापूर्वक किसी के आगमन की प्रतीक्षा करना । (२) किसी के आने पर अत्यंत श्रद्धा या प्रेम से स्वागत करना । दीठ में आना = दिखाई पड़ना । दीठ में पड़ना = दिखाई पड़ना । दीठ में समाना = अच्छा या प्रिय लगने के कारण ध्यान में सदा बना रहना । दीठ से उतरना या गिरना = श्रद्धा, विश्वास या प्रेम का पात्र न रहना । (किसी के) विचार में अच्छा न रह जाना । ४. अच्छी वस्तु पर ऐसी दृष्टि जिसका प्रभाव बुरा पडे़ । नजर । उ०— दूनी ह्वै लागी लगन दिए दिठौना दीठ । —बिहारी (शब्द०) । क्रि० प्र०—लगाना ।—लगाना । मुहा०— दीठ उतारना या झाड़ना = मंत्र के द्वारा बुरी दृष्टि के प्रभाव दूर करना ।दीठ खा जाना = किसी की बुरी दृष्टि के सामने पड़ जाना । टोक में आना । हूँस में आना । (बच्चों के संबंध में आधिक बोलते हैं) । (किसी की) दीठ चढना, दीठ पर चढना = दे० 'दीठ खा जाना' । दीठ जलाना = नजर उतारने के लिये राई लोन या कपड़ा जलाना । विशेष— जब बच्चों को नजर लगने का संदेह स्त्रियों को होता है तब वें टोटके के लिये उसके ऊपर के राई लोन घुमाकर आग में डालती हैं, अथवा जिस किसी को वे नजर लगानेवाला समझती हैं उसकी आँख की बरौनी किसी युक्ति से प्राप्त करके आग में जलाती हैं । ५. देखने में प्रवृत्त नेत्र । देखने के लिये खुली हुई आँख । मुहा०—टीठ उठाना = ताकने के लिये आँख ऊपर करना । दीठ गड़ाना, जमाना = दृष्टि स्थिर करना । एकटक ताकना । दीठ चुराना = (लज्जा या भय से) सामने न आना । जान बूझ कर दिखाई न पड़ना । दीठ जुड़ना = आँख मिलना । साक्षात्कार होना । देखादेखी होना । दीठ जोड़ना = आँख मिलाना । साक्षात्कार करना । देखादेखी करना । दीठ फिसलना = चमक दमक के कारण नजर न ठहरना । आँख में चकाचौंध होना । दिठ भर देखना = जितनी देर तक इच्छा हो उतनी देर तक देखना । जो भरकर ताकना । दीठ मारना = (१) आँख से इशारा करना । पलक गिराकर संकेत करना । (२) आँख के इशारे से रोकना । दीठ मिलना = दे० 'दीठ जुड़ना' । दीठ मिलना = दे० 'दीठ जोड़ना' । दीठ लगना = देखादेखी होने से प्रेम होना । प्रीति होना । उ०— नंददास नँदरानी छबि निरखि बारि पीवत पानी, काहू जिनि दीठ लगे ।— नंद० ग्रं०, पृ० ३३९ । दीठ लड़ना = आँख के सामने आँख होना । घूराघूरी होना । दीठ लड़ाना = आँख के सामने आँख किए रहना । घूरना । ६. देख भाल । देख रेख । निगरानी । क्रि० प्र०—रखना । ७. परख । पहचान । तमीज । अटकल । अंदाज । क्रि० प्र०— रखना । ८. कृपादृष्टि । हित का ध्यान । मिहरबानी की नजर । उ०— बिरवा लाइ न सूखइ दोजै । पावै पानि दीठि सो कीजै ।— जायसी (शब्द०) । ९. आशा की दृष्टि । आसरे में लगी हुई टकटकी । आस । उम्मीद । क्रि० प्र०—लगना ।—लगाना । १०. ध्यान । विचार । संकल्प । उद्देश्य । क्रि० प्र०—रखना ।

दीठना
क्रि० स० [हिं० दीठ + ना (प्रत्य०)] दे० 'देखना' । उ०— काडे़ काठ जो खाइया खात किनहुँ नहिं दीठ ।— कबीर सा० सं०, पृ० ४१ ।

दीठबंद
संज्ञा पुं० [हिं० दीठ + सं० बन्ध] इंद्रजाल की ऐसी माया जिसमें लोगों को और का और दिखाई दे । नजरबंद । जादू ।

दीठबंदी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दीठबंद] इंद्रजाल की ऐसी माया जिससे लोगों को और का और दिखाई दे । नजरबंदी । जादू ।

दीठवंत पु
संज्ञा पुं० [हिं० दीठ + वंत (प्रत्य०)] १. वह जिसे दिखाई देता हो । सुझाखा । २. ज्ञानी ।

दीठि
संज्ञा स्त्री० [सं० दृष्टि, प्रा० दिठ्ठि] दे० 'दृष्टि' । उ०— जखने दुहुक दीठि बिछुड़लि दुहु मने दुख लागु ।— विद्यापति, पृ० ३७ ।

दीठिवंत पु
संज्ञा पुं० [हिं० दीठवंत] दे० 'देठवंत' । उ०— ना वह मिला न बेहरा ऐस रहा भरिपूर । दीठिवंत कहँ नीयरे अंध मूरखहिं दूर ।— जायसी (शब्द०) ।

दीठिमेरावा पु
संज्ञा पुं० [सं० दृष्टि + मिलन] देखादेखी । एक दूसरे को देखना । परस्पर दर्शन । उ०— होइहि एहि बिधि दीठिमेरावा ।— जायसी ग्रं०, पृ० ६९ ।

दीठी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दृष्टि] दृष्टि । नेत्र । उ०— मिलन सार मुसकान बचन मृदु बोली मोठी । पुलकित सीतल गात, सुभट रतनारी दीठी ।— पलटू०, भा० १, पृ० १२ ।

दीत पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० आदित्य, पुं० हिं० आदीत] सूर्य । (डिं०) ।

दीतवार
संज्ञा पुं० [सं० आगदित्यवार] इतवार । रविवार । उ०— माघ सुक्ल द्वितिया सु तिथि, दोतवार मन हर्ष ।—ब्रज० ग्रं०, पृ० ५० ।

दोद पु
संज्ञा स्त्री० [फा०] दर्शन । दीदार । उ०— दीद बरदीद परतीत आवै नहीं, दूरि की आस विश्वास भारी ।—कबीर० रे०, पृ० ५ । यौ०— दीद ए तर = अश्रपूर्ण नेत्र । आर्द्र आखें । दीद बरदीद = देखादेखी । आमने सामने । उ०— दीद बरदीद हम नजरों देखा अजया अमर निसानी ।— कबीर श०, पृ० ६२ । दीदबान = (१) देखमाल करनेवाला व्यक्ति । (२) निगरानी करने के लिये बना ऊँचा स्थान । दीदवानी = निगरानी । देखभाल । उ०— करे घर की सब दीदवानी वही, देवे नेको बद की निशानी वही ।— दक्खिनी०, पृ० ८६ ।

दीदनी पु
वि० [फा़०] देखने योग्य । दर्शनीय । उ०— जो गुप्त और शुनीद है और दीदनी और दीद है ।— कबीर ग्रं०, पृ० ३७१ ।

दीदा (१)
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. दृष्टि । निगाह । नजर । २. दर्शन । अवलोकन । देखादेखी ।

दीदा (२)
संज्ञा पुं० [फा० दीदहु] १. आँख । नेत्र । उ०— अँकिया के नहर सूँ दीदे का पानी, कर ऐसे बागे गम की बागवानी ।—दक्खिनी० पृ० २३७ । मुहा०— दीदा लगना = जी लगना । ध्यान लगना । चित्त रमना । जैसे,— (क) यहाँ इसका दीदा क्यों लगेगा? (ख) काम में उसका दीदा नहीं लगता । दीदे का पानी ढल जाना = बुरे काम के करने में लज्जा न रह जाना । निर्लज्ज हो जाना । दीदे का पानी मरना = निर्लज्ज या बेहया हो जाना । उ०— नजीर के दीदे का तो पानी मर गया है ।— फिसाना०, भा० ३, पृ० ३३६ । दीदे निकलना = क्रोध की दृष्टि से देखना । आँखें नीली पीली करना । दीदाधोई = स्त्री जिसकी आँखों में शर्म न हो । बेशर्म । निर्लज्ज । (स्त्रि०) । दीदे पटम होना = आँखों का फूट जाना । (स्त्रि०) । दीदाफटी = स्त्री जिसकी आँखों में शर्म न हो । निर्लज्ज । (स्त्रि०) । दीदा फूटना = आँखें फूटना । आँखें अंधी होना । दीदे फाड़कर देखना = अच्छी तरह आँख खोलकर देखना । ध्यानपूर्वक देखना । टकटकी बाँधकर देखना । दीदे मटकाना = हाव भाव सहित आँखों की पुतली चमकाना । आँखे चमकाना । २. ढिठाई । संकोच का अभाव । अनुचित साहस । जैसे,— उसका इतना बड़ा दीदा कि वह मर्दों के सामने बात करे—(स्त्रि०) ।

दीदार
संज्ञा पुं० [फा़०] १. सौंदर्य । छवि । २. दर्शन । देखा देखी । साक्षात्कार । उ०— आरजूए चश्मए कौसर नहीं । तिश्नालब हूँ शरबते दीदार का ।— कविता कौ०, भा० ४, पृ० ६ । यौ०— दीदारपरस्त = (१) सौंदर्य देखनेवाला । सूरत और शृंगारप्रेमी । (२) दर्शनाभिलाषी । दीदारबाजी = ताक झाँक । आँखे लड़ाना ।

दीदारी
संज्ञा स्त्री० [फा० दीदार] देखना । दर्शन करना । उ०— नाहक दीदारी है सारी गर न इइक का तीर लगा ।— भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ५६९ ।

दीदारू †
वि० [फा० दीदारू] दर्शनीय । देखने योग्य ।

दीदी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दादा (= बड़ा भाई)] बड़ी बहिन को पुकारने का शब्द । ज्येष्ठ भगिनी के लिये संबोधन शब्द ।

दीधना †
क्रि० स० [सं०] देना । प्रदान करना स०—पूजी विनायक चाल्यी छइ जान । चौरास्या सहू दीधउ छइ पान ।—बी० रासो०, पृ० ११ ।

दीधिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सूर्य, चंद्रमा आदि की किरण । २. उँगली ।

दीन (१)
वि० [सं०] १. दरिद्र । गरीव । जिसकी दशा हीन हो । उ०— दानी हौ सब जगत के तुम एकै मंदार । दारन दुख दुखियान के अभिमत फल दातार । अभिमत फल दातार देवगन सेवैं हित सों । सकल संपदा सोह छोह किन राखत चित सों । बरनै दीनदयाल छाँह तव सुखद बखानी । तोहि सेइ जो दीन रहै तौ तू कस दानी?— दीनदयाल (शब्द०) । २. दुःखित । संतप्त । कातर । उ०— आश्रम देख जानकी हीना । भए विकल जस प्राकृत दीना । — तुलसी (शब्द०) । यौ०— दीनदयाल । दीनबंधु । दीनानाथ । ३. उदास । खिन्न । जिसमें किसी प्रकार का उत्साह या प्रसन्नतान हो । जिसका मन मरा हुआ हो । उ०— (क) नवम सरल सब सन छल हीना । मम भरोस हिय हरष न दीना ।— तुलसी (शब्द०) । (ख) ऐसेई दीन मलीन हुती मन मेरो भयो अब तो अति आरत ।— रसकुसुमाकर (शब्द०) । ४. दुःख या भय से अधीनता प्रकट करनेवाला । नम्र । विनीत । उ०— दीन वचन सुनि प्रभु मन भावा । भुज बिसाल गहि हृदय लगावा ।— तुलसी (शब्द०) ।

दीन (२)
संज्ञा पुं० [सं०] तगर का फूल ।

दीन (३)
संज्ञा पुं० [अ०] मत । मजहब । धर्मविश्वास । यौ०— दीन ए इलाही, दीने इलाही = सम्राट् अकबर द्वारा चलाया हुआ एक पंथ जिसमें हिंदू धर्म तथा अन्य धर्मों की बातों का मिश्रण था । दीनदार । दीन दुखिया = निर्धन । विपन्न । दीन दुनिया = लोक परलोक । दीनदुनी ।

दीन (४)
संज्ञा पुं० [सं० दिन] दे० 'दिन' । उ०— गेल दीन पुनु पलटि न आव ।— विद्यापति, पृ० ३०२ ।

दीनक
वि० [सं०] दुर्दशाग्रस्त । विपन्न । दुःखी [को०] ।

दीनता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दरिद्रता । गरीबी । २. कातरता । आर्तभाव । ३. उदासी । खिन्नता । ४. दुःख से उत्पन्न अधीनता का भाव । नम्रता । विनीत भाव । विशेष— काव्य या रसनिरूपण में दीनता एक संचारी भाव है ।

दीनताई पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दीनता + ई (प्रत्य०)] दे० 'दीनता' ।

दीनत्व पु
संज्ञा पुं० [सं०] दीनता ।

दीनदायाल
वि० संज्ञा पुं० [सं० दीनदयालु] दे० 'दीनदयालु' । उ०— कोमल चित्त अति दिनदयाला ।— तुलसी (शब्द०) ।

दीनदयालु (१)
वि० [सं०] दीनों पर दया करनेवाला ।

दीनदयालु (२)
संज्ञा पुं० ईश्वर का एक नाम ।

दीनदार
वि० [अ० दीन + फा० दार (प्रत्य०)] अपने धर्म पर विश्वास रखनेवाला । धार्मिक । जैसे, दीनदार मुसलमान ।

दीनदारी
संज्ञा स्त्री० [अ० दीन फा० दारी (प्रत्य०)] धर्माचरण ।

दीन दुनिया
संज्ञा पुं० स्त्री० [अ० दीन + फा० दुन्या] धर्म और संसार । उ०— पलटू दुनिया दीन मैं उनसे बड़ा न कोइ । साहिब वही फकीर है जो कोइ पहुँचा होइ ।— पलटू०, भा० १, पृ० ४ । मुहा०— दीन दुनिया से बेखबर होना = न धर्म की परवाह करना और न समाज की । बेहोश होना । उ०— आजादपाशा तमाम शब गशी के आलम में रहे, दीन दुनिया से बेखवर ।—फिसाना०, भा० ३, पृ० १०६ ।

दीनदुनी
संज्ञा स्त्री० [अ० दीन + फा० दुन्या] लोक परलोक ।

दीनबंधु
संज्ञा पुं० [सं० दीनबन्धु] १. दुखियों का सहायक । २. ईश्वर का एक नाम ।

दीनहित
वि० [सं० दीन + हित] दीनों का हित करनेवाला । उ०— मो सम दीन न, दीनहित तुम समान रघुवीर । अस विचारि रघुवंसमनि, हरहु विषम भवभीर ।— मानस, ७ । १३० ।

दीना
संज्ञा स्त्री० [सं०] मूषिका । चुहिया ।

दीनानाथ
संज्ञा पुं० [सं० दीन + नाथ] १. दीनों का स्वामी या रक्षक । दुखियों का रक्षक । दुखिंयों का पालक और सहायक । २. ईश्वर का एक नाम ।

दीनार
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्वर्णभूषण । सोने का गहना । २. निष्क की तौल । ३. स्वर्णमुद्रा । मोहर । विशेष—दीनार नामक सिक्के का प्रचार किसी समय एशिया और यूरोप के बहुत से भागों में था । यह कहीं सोने का, कहीं चाँदी का होता था । देशभेद से इसके मूल्य में भी भेद था । मुसमालनों के आने के बहुत पहले से भारतवर्ष में दीनार चलता था । 'हरिवंश' और 'महावीरचरित्' में दीनार का स्पष्ट उल्लेख है । साँची में बौद्ध स्तूप का जो बड़ा खंडहर है उसके पूर्वद्वार पर सम्राट् चंद्रगुप्त का एक लेख है । उस लेख में 'दीनार' शब्द आया है । अमरकोश में भी दीनार शब्द मौजूद है और निष्क के बरबर अर्थात् दो तोले का माना गया है । रघुनंदन के मत से दीनार ३२ रत्ती सोने का होता था । अकबर के समय में जो दीनार नाम का सोने का सिक्का जारी था उसका मान एक मिसकाल अर्थात् आधे तोले के अंदाज था । हिंदुस्तान की तरह अरब और फारस में भी प्राचीन काल में दीनार नाम का सिक्का प्रचलित था । अरबी फालकी के कोशकारों ने दीनार शब्द को अरबी लिखा है, पर फारस में दीनार का प्रचार बहुत प्राचीन काल में था । इसके अतिरिक्त रोमन (रोमक) लोगों में भी यह सिक्का दिनारियस के नाम से प्रचलित था । धात्वर्थ पर ध्यान देने से भी दीनार शब्द आर्यभाषा ही का प्रतीत होता है । अब प्रश्न यह होता है कि यह सिक्का भारत से फारस, अरब होते हुए रोम में गया अथवा रोम से इधर आया । यदि हरिवंश आदि संस्कृत ग्रंथों की अधिक प्राचीनता स्वीकार की जाय तो दीनार को इसी देश का मानना पडे़गा ।

दीनारी
संज्ञा पुं० [सं० दीनार] लोहारों का ठप्पा ।

दीनी
वि० [अ० दीन + फा० ई (प्रत्य०)] धार्मिक । धर्म संबंधी [को०] ।

दीपंकर
संज्ञा पुं० [सं० दीपङ्कर] बुद्ध के अवतारों में से एक ।

दीप (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. दीया । चीराग । जलती हुई बत्ती । यौ०— दीपकलिका । दीपकिट्ट । दीपकूपी । दीपदान । दीपध्वज । दीपपुष्प । दीपमाला । दीपवृक्ष । दीपशिखा । विशेष— किसी कुल या समुदाय का दीप कहने से उस कुल या समुदाय में श्रेष्ठ का अर्थ सूचित होता है; जैसे, निरखि बदन गरि भूम रजाई । रघुकुल दीपहिं चलेउ लिवाई ।— तुलसी (शब्द०) । २. दस मात्राओं का एक छंद जिसके अंत में तीन लघु फिर एक गुरु और फिर एक लघु होता है । जैसे,— जय जयति जगबंद, मुनि मन कुमुद चंद । त्रैलोक्य अवनीप । दशरथ कुलदीप ।

दीप (२)
संज्ञा पुं० [सं० द्वीप] दे० 'द्वीप' । उ०— रामतिलक सुनि दीपदीप के नृप आए उपहार लिए । सीय सहित आसीन सिंहासन निरखि जोहारत हरष हिए ।— तुलसी ग्रं०, पृ० ४०३ ।

दीपक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. दीया । चिराग । यौ०—कुलदीपक = वंश को उजाला करनेवाला पुत्र । २. एक अर्थालंकार जिसमें प्रस्तुत (जो वर्णन का विषय हो) और अप्रस्तुत (जो वर्णन का उपस्थित विषय न हो और उपमान आदि हो) का एक ही धर्म कहा जाता है; अथवा बहुत सी क्रियाओं का एक ही कारक होता है । जैसे,— (क) सोहत भूपति दान सों फल फूलन आराम । इस उदाहरण में प्रस्तुत 'भूपति' और अप्रस्तुत 'आराम' दोनों का एक धर्म सोहत कहा गया है ।(ख) ऋषिहिं देखि हरषै हियो राम देखि कुम्हिलाय । धनुष देखि डरपै महा चिंता चित्त डुलाय । इस उदाहरण में हरखै 'कुम्हिलाय' 'डरपै' आदि क्रियाओं का एक ही कर्ता 'हियो' कहा गया है । विशेष— दीपक चार आदि और प्रधान अलंकारों में से है । तुल्ययोगिता में भी एक धर्म का कथन होता है पर वह या तो कई प्रस्तुतों या कई अप्रस्तुतों का होता है । दीपक में प्रस्तुत और अप्रस्तुत के एक धर्म का कथन होता है । दीपक चार प्रकार का होता है— आवृत्ति दीपक, कारक दीपक, माला दीपक और देहली दीपक । (१) आवृत्ति दीपक में या तो एक ही क्रियापद भिन्न भिन्न अर्थों में बार बार आता है अथवा एक ही अर्थ के भिन्न भिन्न पद आते हैं । जैसे,— (क) बहैं रुधिर सरिता, बहैं किरवानै कढ़ि कोस । बीरन बरहि बरांगना, बरहि सुभट रन रोस । (ख) दौरहिं संगर मत्त गज धावहिं हय समुदाय । (२) कारक दीपक । उ०— ऊपर देखिए । (३) माला दीपक जिसमें एकावली और दीपक का मेल होता है । जैसे,— जग की रुचि ब्रजवास, ब्रज की रुचि ब्रजचंद हरि । हरि रुचि बंसी 'दास', बंसी रुचि मन बाँधिवो । (४) देहली दीपक में एक ही पद दो ओर लगता है । जैसे— ह्वै नरसिंह महा मनुजाद हन्यो प्रहलाद को संकट भारी । इस उदाहरण में 'हन्यो' शब्द दो ओर लगता है— 'मनुजाद हन्यो' और 'भारी संकट हन्यो' । ३. संगीत में छह रागों में से एक । विशेष— हनुमत् के मत से यह छह रागों में दूसरा राग है । यह संपूर्ण जाति का राग है और षड्ज स्वर से आरंभ होता है । इसके गाने का समय ग्रीष्म ऋतु का मध्याह्न है । इसका सरगम यह है— स रे ग म प ध नि स । इसी पाँच रागिनियाँ मानी जाती हैं— देशी, कामोदी, नाटिका केदारी और कान्हड़ा । पुत्र आठ हैं— कुंतल, कमल, कलिंग, चंपक, कुमंभ, राम, लहिल और हिमाल । भरत के मत से दीपक की पत्नियाँ हैं— केदारा, गौरी, गौड़ी, गुर्जरी, रुद्रांणी; और पुत्र हैं कुसुम, टंक, नटनारायचण, विहागरा, किरोदस्त, रभसमंगला, मंगलाष्टक और अड़ाना । ४. एक ताल का नाम जिसमें प्लुत, लघु और प्लुत होते हैं । ५. अजवायन (जो अग्निदीपक होती है) । ६. केसर । कुंकुम । ७. बाज नाम का पक्षी । ८. मयूराशिखा । ९. एक प्रकार की आतिशबाजी ।

दीपक (२)
वि० [स्त्री० दीपिका] १. प्रकाश करनेवाला । उजाला फैलानेवाला । दीप्तिकारक । २. जठराग्नि को दीप्त करने वाला । पाचन की अग्नि को तेज करनेवाला । ३. उत्तेजक । शरीर में वेग या उमंग लानेवाला ।

दीपक (३)
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक डिंगल गीत । छंदविशेष । उ०— तुकां वेलिये गीत री, आद दुतिय चतुरंत । तिय पद दोय दुमेल तुक, दीपक सो दाखंत ।—रघु० रू०, पृ० १०९ ।

दीपकमाला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक वर्णवृत्त का नाम जिसके प्रत्येक चरण में भगण, भगण, जगण और गुरु होता है । जैसे,— भाभज गो कन्या सखी बरी । देखत ही मोरे धनू दरी । मंडप के नीचे अरी अली । दीपकमाला सी लसै लली । २. दीपक अलंकार का एक भेद ।

दीपकलिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दिए की टेम । चिराग की लौ ।

दीपकली
संज्ञा स्त्री० [सं० दीपकलिका] चिराग की टेम । दीप- शिखा । दीए की लौ ।

दीपकवृक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह बड़ा दीवट जिसमें दीप रखने के लिये कई शाखाएँ इधर उधर निकली हों । २. झाड़ ।

दीपकसुत
संज्ञा पुं० [सं०] कज्जल । काजल ।

दीपकाल
संज्ञा पुं० [सं०] दीया बालने का समय । संध्या ।

दीपकावृत्ति
संज्ञा पुं० [सं०] १. दीपक अलंकार का एक भेद । २. पनसाखा ।

दीपकिट्ट
संज्ञा पुं० [स०] कज्जल । काजल ।

दीपकूपी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दीए की बत्ती ।

दीपखोरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दीए की बत्ती [को०] ।

दीपग पु
संज्ञा पुं० [सं० दीपक] दे० 'दीपक' । उ०— दीपग बरत विवेक कौ तौ लौं या चित माहिं । जौ लौं नारि कटाक्ष पट झपको लागत नाहिं ।— ब्रज० ग्रं०, पृ० ८८ ।

दीपगर †
संज्ञा पुं० [सं० दीपगृह] दीयट । दीपाधार ।

दीपचंदी
संज्ञा पुं० [सं० दीपचन्द्रिन्] संगीत का एक 'ताल' या ठेका । उ०— कुछ संगीतज्ञों का कहना है कि 'दिपचंदी' ताल का नीहं ठेके का नाम है ।— पौद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ४३७ ।

दीपत पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दीप्ति] १. कांति । चमक । प्रभा । ज्योति । २. छटा । शोभा । ३. कीर्ति । यश ।

दीपति पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दीप्ति] दे० 'दीप्ति' । उ०— अजरज मोहि हिंदू तुरुक बादि करत संग्राम । इक दीपति सी दीपियत काबा काशी धाम ।— अकबरी०, पृ० ५१ ।

दीपदान
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी देवता के सामने दीपक जलाने का काम जो पूजन का एक अंग समझा जाता है । २. कार्तिक में बहुत से दीपक जलाने का कृत्य जो राधा दामोदर के निमित्त होता है । ३. एक प्रकार का कृत्य जिसमें मरणासन्न व्यक्ति के हाथ से आटे के जलते हुए दीये का संकल्प कराया जाता है ।

दीपदानी
संज्ञा स्त्री० [सं० दीप + आधान] घी, बत्ती आदि दीया जलाने की सामग्री रखने की डिबिया जो पुजा के सामानों में से है ।

दीपध्वज
संज्ञा पुं० [सं०] १. काजल । २. दीवट ।

दीपन (२)
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० दीपनीय, दीपित, दीप्य] १. प्रकाशित । प्रज्वलित या प्रकाशित करने का काम । प्रकाश के लिये जलाने का काम । २. जठराग्नि को तीव्र करने की क्रिया । भूख को उभारने की क्रिया । ३. आवेग उत्पन्न करना । उत्तेजना । जैसे, काम का दीपन ।

दीपन (२)
वि० दीपन करनेवाला । जठराग्निवर्धक । अग्निमांद्य दूर करनेवाला ।

दीपन (३)
संज्ञा पुं० १. तगरमूल । तगर की जड़ या लकड़ी । २. मयूरशिखा नाम की बूटी । ३. कुंकुम । केसर । ४. पलांडु । प्याज । ४. कासमर्द । कसौदा । ६. मंत्र के उन दस संस्कारों में से एक जिनके बिना मंत्र सिद्ध नहीं होता । ७. रसेश्वर दर्शन के अनुसार पारे का सातवाँ संस्कार । विशेष— इस दर्शन को माननेवाले रस या पारे ही को संसार- परपार— प्राप्ति का कारण और रस—शास्त्र को देहवेधपूर्वक मुक्ति का साधन मानते हैं ।

दीपनगण
संज्ञा पुं० [सं०] जठराग्नि को तीव्र करनेवाले पदार्थों का वर्ग । भूख लगानेवाली ओषधियों का वर्ग । विशेष— इस वर्ग के अंतर्गत चीता, धनिया, अजमोदा, जीरा, हाऊ, बेर इत्यादि हैं ।

दीपना (१)पु
क्रि० अ० [सं० दीपन] प्रकाशित होना । चमकना । जगमगाना ।

दीपना (२)
क्रि० स० प्रकाशित करना । चमकाना । उ०— द्वार में दिसान में दुनी में देस देसन में देख्यो दीप दीपन में दीपत दिगंत है ।— पद्माकर (शब्द०) ।

दीपनी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मेथी । २. अजवायन । ३. पाठा ।

दीपनी (२)
वि० [सं०] १. दीप्त करने योग्य । प्रकाशन के योग्य । ३. उत्तेजित करनेवाली । दीप या अभिवृद्ध करनेवाली (ओषधि) ।

दीपनीय (२)
संज्ञा पुं० १. यवानी । अजवायन । २. दे० 'दिपनीय वर्ग' । ३. स्वास्थदायक ओषधि । पुष्टिकर दवा [को०] ।

दीपनीयवर्ग
संज्ञा पुं० [सं०] चक्रदत्त के अनुसार एक ओषधिवर्ग जिसके अंदर्गत पिप्पली, पिप्पलामूल, चव्य, चीता और नागर हैं । ये सब ओषधियाँ कफ और वातनाशक हैं ।

दीपपादप
संज्ञा पुं० [सं०] दीवट ।

दीपपुष्प
संज्ञा पुं० [सं०] चंपकवृक्ष । चंपा ।

दीपमाला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जलते हुए दीपों की पक्ति । जगमगाते हुए दीयों की श्रेणी । (दीवाली में इस प्रकार दीपक जलाकर पंक्ति में रखे जाते हैं) । २. दीपमाला या आरती के लिये जलाई हुई बत्तियों का समूह ।

दीपमालिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दीयों की पंक्ति । जलते हुए प्रदीपों की श्रेणी (जैसी दीवाली में दिखाई देती है) । २. दीवाली । ३. दीपदान या आरती के लिये जलाई हुई बत्तियों की पंक्ति । उ०— दीपमालिका रचि रचि साजत पुहुपमाल मंडली विराजत ।— सूर (शब्द०) ।

दीपमाली
संज्ञा स्त्री० [सं० दीपमालिका] दीवाली । उ०— आनिलि के संग दीपमाली के विलोकिवे को औझकि उझकि जौ न झाँकति झरोखे तें ।— द्विजदेव (शब्द०) ।

दीपवती
संज्ञा स्त्री० [सं०] कालिका पुराण के अनुसार एक नदी जो कामाख्या में है और जिसके पूर्व शृंगार नाम का प्रसिद्ध पर्वत है ।

दीपवर्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] दीए की बत्ती [को०] ।

दीपवृक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १. दीवट । दीयट । २. प्रकाश (को०) ।

दीपशत्रु
संज्ञा पुं० [सं०] पतंग । फतिंगा जो दीपक को बुझा देता है ।

दीपशलभ
संज्ञा पुं० [सं० दीप + शलभ] जुगनू । खद्योत । उ०— दीपशलभ ने जिसे मिचौनी खेल खेलकर हुलसाया ।— वीणा, पृ० ।

दीपशिखा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दीए की टेम । चिराग की लौ । प्रदीपज्वाला । उ०— दीपशिखा सम जुवतिजन मन जनि होसि पतंग ।— तुलसी (शब्द०) । २. दीए का धुआँ या काजल ।

दीपशृंखला
संज्ञा स्त्री० [सं० दीपश्रृङ्खला] दीपकों की कतार । तौयों की पंक्ति [को०] ।

दीपसुत
संज्ञा पुं० [सं०] कज्जल । काजल ।

दीपस्तंभ
संज्ञा पुं० [सं० दीप + स्तम्भ] वह स्तंभ जिसपर दीप बलता हो । दीपाधार । दीवट ।

दीपांकुर
संज्ञा पुं० [सं० दीपाङ्कुर] दीए की टेम । दीपक की लौ [को०] ।

दीपाग्नि
संज्ञा पुं० [सं०] दीए की टेम की आँच । आँच का एक परिमाण जो धूमाग्नि से चौगुना माना जाता है ।

दीपाधार
संज्ञा पुं० [सं० दीप + आधार] दीपक रखने का पात्र या स्थान । दीयट । उ०— दोनों की विवश विह्वलता देख दीपाधार पर जलती दीपशिखा स्तब्ध और निश्चल रह गई ।—अभिशप्त, पृ० ११ ।

दीपान्विता
संज्ञा स्त्री० [सं०] कार्तिक मास की अमावस्या जिसके प्रदोषकाल में लक्ष्मीपूजन और दीपदान आदि होता है । दीवाली ।

दीपाराधन
संज्ञा पुं० [सं०] आरती करने की क्रिया । दीप द्वारा पूजन [को०] ।

दीपालि
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दीपावली' [को०] ।

दीपाली
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दीपावली' [को०] ।

दीपावती
संज्ञा स्त्री० [सं०] दीपक और सरस्वती के योग से उत्पन्न एक रागिनी ।

दीपावलि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दीपश्रेणा । दीयों की पंक्ति । २. दीवाली ।

दीपावली
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दीपों की पंक्ति । २. दीवाली ।

दीपिका (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. छोटा दीया । २. एक रागिनी जो हिंडोल राग की पत्नी मानी जाती है और प्रदोषकाल में गाई जाती है । ३. चाँदनी । चंद्रमा का प्रकाश [को०] ।

दीपिका (२)
वि० स्त्री० १. प्रकाश करनेवाली । उजाला फैलानेवाली २. स्पष्ट कहनेवाली ।

दीपिकातैल
संज्ञा पुं० [सं०] एक आयुर्वेदोक्त तेल जो कान का दर्द दूर करने के लिये कान में टपकाया जाता है । विशेष— इसे प्रस्तुत करने की रीति यह है कि देवदार, सलई या चीड़ की सात आठ अंगुल लंबी लकड़ी ले और उसे सूए आदि से छलनी की तरह चारों ओर छेद डाले । फिर उसमें रेशम लपेटकर तेल में खूब डुबावे और बत्ती की तरह जला दे । इस प्रकार जलती हुई बत्ती में से जो गरम गरम तेल बूँद बूँद गिरे उसे काम में टपकावे ।

दीपित
वि० [सं०] १. प्रकाशित । प्रज्वलित । २. चमकता हुआ । जगमगाता हुआ । ३. उत्तेजित ।

दीपी
वि० [सं० दीपिन्] १. जलनेवाला । दीप्त होनेवाला । द्योतित । २. दीपन करनेवाला [को०] ।

दीपोत्सव
संज्ञा पुं० [सं०] दीवाली ।

दीप्त (१)
वि० [सं०] १. प्रज्वलित । जलता हुआ । २. प्रकाशित । जगमगाता हुआ । चमकता हुआ ।

दीप्त (२)
संज्ञा पुं० १. स्वर्ण । सोना । २. हींग । ३. नीबू । ४. सिंह । ५. सुश्रुत के अनुसार नाक का एक रोग जिसमें नाक से भाप की तरह गरम गरम हवा निकलती है और नयुनों में जलन होती है ।

दीप्तक
संज्ञा पुं० [सं०] १. सोना । सुवर्ण । २. नाक का एक रोग । दे० 'दीप्त'—५ ।

दीप्तकिरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य । २. मदार का पौधा ।

दीप्तकीर्ति
संज्ञा पुं० [सं०] कुमार कार्तिकेय [को०] ।

दीप्तकेतु
संज्ञा पुं० [सं०] १. भागवत के अनुसार दक्षसावर्णि मनु के एक पुत्र का नाम । २. महाभारत में वर्णित एक राजा का नाम ।

दीप्तजिह्वा
वि० [सं०] [वि० स्त्री० दीप्तजिह्वा] चलती जबानवाला । झगड़ालू ।

दीप्तजिह्वा
संज्ञा स्त्री० [सं०] उल्कामुखी । श्रृगाली । मादा गीदड़ । सियारिन । विशेष— गीदड़ के मुँह का अगला भाग कुछ कालापन लिए होता है इसी से उसका नाम उल्का (लुआठा) मुख पड़ा । उल्का जलते हुए पिंड या प्रकाश को भी कहते हैं इसी भ्रम से दीप्त- जिह्वा नाम रखा हुआ जान पड़ता है ।

दीप्तपिंगल
संज्ञा पुं० [सं० दीप्तपिङ्गल] सिंह ।

दीप्तरस
संज्ञा पुं० [सं०] केंचुआ । विशेष— रात को अँधेरे में केचुए के शरीर के रस से एक प्रकार की चमक निकलती हैं इसी से इसका यह नाम पड़ा है ।

दीप्तरोमा
संज्ञा पुं० [सं० दीप्तरोमंन्] एक विश्वेदेव का नाम । (महाभारत) ।

दीप्तलोचन
संज्ञा पुं० [सं०] बील्ली । बिडाल ।

दीप्तलौह
संज्ञा पुं० [सं०] १. तपाया हुआ लाला लोहा । २. काँसा । कांस्य ।

दीप्तवर्ण (१)
वि० [सं०] जिसका शरीर कुंदन की तरह दमकता हुआ हो ।

दीप्तवर्ण (२)
संज्ञा पुं० कार्तिकेय ।

दीप्तशक्ति (१)
वि० [सं०] दे० 'दीप्तवर्ण' ।

दीप्तशक्ति (२)
संज्ञा पुं० कुमार कार्तिकेय [को०] ।

दीप्तांग (१)
वि० [सं० दीप्ताङ्ग] जिसका शरीर चमकता हो ।

दीप्तांग (२)
संज्ञा पुं० मोर । मयूर ।

दीप्तांशु
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य । २. मदार । आक ।

दीप्ता (१)
वि० स्त्री० [सं०] १. प्रकाशित । प्रकाशयुक्ता । चमकती हुई । २. (दिशा) जिसमें सूर्य किसी समय स्थित हो । सूर्य से प्रकाशित । जैसे, दीप्ता दिशा ।

दीप्ता (२)
संज्ञा पुं० १. लांगली वृक्ष । कलियारी । २. ज्योतिष्मती । मालकँगनी । ३. सातला नामक थूहर ।

दीप्ताक्ष (१)
वि० [सं०] जिसकी आँखें चमकती हों ।

दीप्ताक्ष (२)
संज्ञा पुं० बिडाल । बिल्ली ।

दीप्ताग्नि (१)
वि० [सं०] १. जिसकी जठराग्नि बहुत तीब्र हो । जिसकी पाचन शक्ति अत्यंत प्रबल हो । २. जिसकी भूख जगी हो । भूखा ।

दीप्ताग्नि (२)
संज्ञा पुं० अगस्त्य मुनि (जिन्होंने समूद्र को पी लिया था और वातापि नामक राक्षम को पचा डाला था) ।

दीप्ति (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रकाश । उजाला । रोशनी । २. प्रभा । आभा । चमक । द्युति । ३. कांति । शोभा । छवि । जैसे, अंग की दीप्ति । ४. ज्ञान का प्रकाश जिससे विवेक उत्पन्न होता है और अज्ञानांधकार दूर हो जाता है (योग) । ५. लाक्षा । लाख । ६. काँसा । थूहर ।

दीप्ति (२)
संज्ञा पुं० एक विश्वेदेव का नाम (महाभारत) ।

दीप्तिक
संज्ञा पुं० [सं०] शिरशोला । दुग्धषाषाण वृक्ष ।

दीप्तिमान् (१)
वि० [सं० दिप्तिमत्] [वि० स्त्री० दीप्तिमती] १. दीप्तियुक्त । प्रकाशित । चमकता हुआ । २. कांतियुक्त । शोभायुक्त ।

दीप्तिमान् (२)
संज्ञा पुं० सत्यभामा के गर्भ से उत्पन्न श्रीकृष्ण के एक पुत्र का नाम ।

दीप्तोद
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत के अनुसार एक तीर्थ, जिसमें बधूसर नाम की एक नदी है । विशेष— यहाँ परशुराम ने स्नान करके अपना खोया हुआ तेज फिर से प्राप्त किया था । पूर्वकाल में भृगु ने यहीं पर कठोर तपस्या की थी ।

दीप्तोपल
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्यकांत मणि ।

दीप्य (१)
वि० [सं०] १. जो जलाया जाने को हो । प्रज्वलित किय जानेवाला । २. जो जलानेयोग्य हो । ३. जठराग्नि दीपन करनेवाला ।

दीप्य (२)
संज्ञा पुं० १. अजवायन ।२. जीरा । ३. मयूरशिखा । ४. रुद्रजटा ।

दीप्यक
संज्ञा पुं० [सं०] १. अजवायन । २. अजमोदा । ३. मयूर शिखा । ४. रुद्रजटा ।

दीप्यमान
वि० [सं०] चमकता हुआ ।

दीप्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] पिंड खजूर ।

दीप्र (१)
वि० [सं० ] दीप्तिमान् । प्रकाशयुक्त ।

दीप्र (२)
संज्ञा पुं० अग्नि ।

दीबाचा
संज्ञा पुं० [फा० दीबाचहू] पस्तावना । भूमिका । प्राक्कथन [को०] ।

दीबाज
संज्ञा पुं० [अ०] एक प्रकार का बहुत बढिया और उत्तम रेशमी वस्त्र जिसे दीबा भई कहते हैं ।

दीबाशु पु †
संज्ञा पुं० [फा० दीदान] दे० 'दीवान' । उ०— चीन आपु शब्दु निरबानु । गगनंतरि तषति लाय दीबाणु ।— प्राण०, पृ० १०९ ।

दीबो †
संज्ञा पुं० [हिं० देना] दे० 'देना' ।

दीमक
संज्ञा स्त्री० [फा० ] चींटी की तरह का एक छोटा कीडा जिसे जालीदार पर निकलते हैं । यह लकडी आदि में लगकर उसे खोखली और नष्ट कर देता है । बल्मीक । विशेष— इसका धड़ सफेद होता है सिर लाल या नारंगी रंग का होता है । यह दल बाँधकर रहता है । दीमकें गरम देशों में बहुत होती हैं और मिट्टी का घर बनाती हैं जिसकी दीवारें दानेदार पपड़ी की तरह होती हैं । कहीं कहीं ये घर ढूह के आकार के हाथ डेढ़ हाथ ऊँछे होते हैं, और वल्मीक या बमौट कहलाते हैं । चींटियों की तरह ये कीडे़ भी बडे़ नियम और व्यवस्था के साथ रहते हैं । एक दल में अधिक संख्या तो क्लीव कीटों की होती है जो केवल काम करने के लिये होते हैं । कुछ क्लीव कीट लंबे लंबे सिरवाले होते हैं जो सिवाही कहलाते हैं । एक या अधिक स्त्री कीट या रानियाँ होती हैं जिन- का शरीर अँडों से भरे रहने के कारण कभी कभी बहुत फूला दिखाई पड़ता है । इनके अतिरिक्त नर भी होते हैं जो किसी किसी ऋतु में बहुत दिखाई पड़ते हैं और फतिंगों की तरह उड़ते फिरते हैं । ये कीडे़ काष्ठ और जंतुशरीर पर निर्वाह करते हैं । जिस वस्तु पर ये लगते हैं उसे प्रायः मिट्टी की पपड़ी से आच्छादित कर देते हैं और भीतर ही भीतर उसे खाते जाते हैं । बरसात में दीमकें लगती हैं और कागज । लकड़ी आदि को इनसे बचाना कठिन हो जाता है । मुहा०—दीमक खाय = (१) जिसे दीमकों ने खाकर नष्ट कर दिया हो । (२) दीसकों की खाई हुई वस्तु की तरह स्थान स्थान पर खुदा हुआ गड़्ढेदार । जैसे, शीतला के दागवाला चेहरा । दीमक का चाटना = दीमक का (किसी वस्तु को) खाकर नष्ट करना जैसे,— इस किताब के पन्ने दीमकें चाट गई ।

दीमान पु
संज्ञा पुं० [फा० दीवान] राज्यसभा । दे० 'दीवान' । उ०— तुरत सर्व दिमानहि आए ।— प० रासो, पृ० १०४ ।

दीयट
संज्ञा पुं० [हिं० दीपट] दे० 'दीवट' ।

दीयमान
वि० [सं०] जो दीया जानेवाला हो । जिसे किसी को देना हो । जो देने के लिये हो ।

दीया
संज्ञा पुं० [सं० दीपक, प्रा० दीऊ] १. उजाले के लिये जलाई हुई बत्ती । जलीत हुई बत्ती । चिराग । क्रि० प्र० —जलना ।—जलाना । —बलना ।—बालना ।— बूझना ।—बुझाना । मुहा०—दिए का हँसना = दीए की बत्ती से फूल या गुल झड़ना । दीए की बत्ती में चमकते हुए गोल गोल रवे दिखाई पड़ना ।— (इससे विवाह होने, लड़का होने आदि का शुभ शकुन समझा जाता है ।) दीया जलना = दीया जलने का समय होना । संध्या होना । दीया जलाना = दीवाला निकालना । विशेष— पहले जो लोग दीवाला निकालते थे वे टाट उलटकर उसपर एक चौमुखा दीया जलाकर रख देते थे और काम धाम बंद कर देते थे । दीया जलने के समय = संध्या को । शाम को । दीया ठंढा करना = दीया बुझना । (किसी के घर का) दीया ठंढा होना = किसी के मरने से कुल में अंधकार छा जाना । घर में रौनक न रह जाना । दीयटा दिखाना = रेशनी दिखाना । सामने उजाला करना । दीया बढ़ाना = दीया बुझाना । दीया बत्ती करना = जलाने के लिये दीया, बत्ती आदि ठीक करना । रोशनी का सामान करना । चिराग जलाना । दीये बत्ती का समय = संध्या का समय । दीया लेकर ढूँढ़ना = चारों ओर हैरान होकर ढूँढ़ना । बड़ी छानबीन से खोजना । दीये से फूल झड़ना = दीये की जलती हुई बत्ती से चमकते हुए गोल फुचड़े या रबे निकलना । गुल झड़ना । २. [स्त्री० अल्पा० दिवली, दियली] बत्ती जलाने का बरतन । वह बरतन जिसमें तेल भरकर जलाने के लिये बत्ती डाली जाती है । विशेष— दीए प्रायः मिट्टी के बनते हैं । मुहा०— दिए में बत्ती पड़ना = दीया जलने का समय होना । संध्या का समय होना ।

दीयासलाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० दीया + सलाई] लकड़ी की छोटी सलाई या सीक जिसका एक सिरा रगड़ने से जल उठता है । आग जलाने की सीक या सलाई । विशेष— इन सलाइयों का एक सिरा फासफरस, पोटाशियम क्लोरेट आदि रगड़ खाकर जलर उठनेवाले पदार्थों में डुबाया रहता है ।

दीयौ पु
संज्ञा पुं० [सं० द्विप] हाथी । उ०— कि महिष छुट्टि मयमत्त । भरिय दीयो कि दुष्ट कजि ।— पृ० रा०, ५ । ५६ ।

दीरग †
वि० [सं० दीर्घ] दे० 'दीर्घ' । उ०— सतगुर पारस की कनी, दीरग दीखै नहीं ।— दरिया० बानी, पृ० ४ ।

दीरघ पु
वि० [सं० दीर्घ] दे० 'दीर्घ' । उ०— जगत तपोबन सो कियो दीरघ दाध निदाध ।— बिहारी ।

दीरघजिह्वा पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दीर्घजिह्वा] वैरोचन की पुत्री एक राक्षसी । दीर्घजिह्वा । उ०— वैरोचनजा दीरघजिह्वा । सुरपति तेहि लखि लीन्हेसि लिह्वा ।— विश्राम (शब्द०) ।

दीर्घ (१)
वि० [सं०] १. आयत । लंबा । २. बड़ा । (देश और काल दोनों के लिये, जैसे, दीर्घक्षेत्र, दीर्घवस्त्र, दीर्घकाल) । विशेष— कणाद में दीर्घत्व को परिमाणभेद कहा है । सांख्य के मत से दीर्घत्व महत्व का अवस्थांतर है । ३. विस्तृत । फैला हुआ (को०) । ४. ऊँचा (को०) । ५. गहरा । गंभीर । जैसे, दीर्घ श्वास ।

दीर्घ (२)
संज्ञा पुं० १. लता शालवृक्ष । २. माड वृक्ष । ३. रामशर । नर- कट । ४. ऊँट । ५. ताड़ का पेड़ । ६. गुरु या द्विमात्रिक वर्ण । वह वर्ण जिसका उच्चारण खींचकर हो । ह्रस्व का उलटा । विशेष— आ, ई, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ, ये दीर्घ स्वर कहलाते हैं । जिन व्यंजनों में ये लगते हैं वे भी दीर्घ कहलाते हैं, जैसे, का की कू इत्यादि । संगीत में भी दो मात्राओं का नाम दीर्घ है । अ— अ को एक साथ उच्चारण करने में जो काल लगता है वह दीर्घ काल कहलाता है । ७. ज्योतिष में पाँचवी, छठी, सातवीं और आठवीं अर्थात् सिंह, कन्या, तुला और वृश्चिक राशि को दीर्घ राशि कहते हैं ।

दीर्गकंटक
संज्ञा पुं० [सं० दीर्घकण्टक] बबूल का पे़ड ।

दीर्घकंठ (१)
वि० [सं० दीर्घकण्ठ] [वि० स्त्री० दीर्घकंठी] जिसकी गरदन लंबी हो ।

दीर्घकंठ (२)
संज्ञा पुं० १. बगला । बक । २. एक दानव का नाम ।

दीर्घकंठक
वि०, संज्ञा पुं० [सं० दीर्घकण्ठक] दे० 'दीर्घकंधर' ।

दीर्घकंद
संज्ञा पुं० [सं० दीर्घकन्द] मुली ।

दीर्घकंदिका
संज्ञा स्त्री० [सं० दीर्घकन्दिका] मूसली । तालमूली ।

दीर्घकंधर (१)
वि० [सं० दीर्घकन्धर] [वि० स्त्री० दीर्घकंधरी] जिसकी गरदन लबी हो ।

दीर्घकंधर (२)
संज्ञा पुं० बगला पक्षी । बक ।

दीर्घकणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सफेद जीरा ।

दीर्घकर्ण (१)
वि० [सं०] जिसके कान बडे़ बडे़ हों ।

दीर्घकर्ण (२)
संज्ञा पुं० एक जाति का नाम जिसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में है ।

दीर्घकांड
संज्ञा पुं० [सं० दीर्घकाण़्ड] गुंडतृण । गोंदना ।

दीर्घकांडा
संज्ञा स्त्री० [सं० दीर्घकाण्डा] पातालगारुड़ो लता । छिरहिटा । छिरेटा ।

दीर्घकाय
वि० [सं०] बडे़ डोलडोल का । लंबे जौडे़ शरीरवाला ।

दीर्घकाष्ठ
संज्ञा पुं० [सं०] एक सीध में ऊपर को गए पेड़ की लकड़ी । शहतीर [को०] ।

दीर्घकील
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दीर्घकीलक' ।

दीर्घकीलक
संज्ञा पुं० [सं०] अंकोल का पेड़ ।

दीर्घकुल्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] गजपिप्पली ।

दीर्घकूरक
संज्ञा पुं० [सं०] आंध्रप्रदेश में होनेवाला एक प्रकार का धान ।

दीर्घकेश (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० दीर्घकेशी] लंबे बालोंवाला । जिसके लंबे लंबे बाल हों ।

दीर्घकेश (२)
संज्ञा पुं० १. भालू । २. कूर्म विभाग के पश्चिमोत्तर में स्थित एक देश (बृहत्संहिता) ।

दीर्घकोशा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दीर्घकोशिका' [को०] ।

दीर्घकोशिका, दीर्घकोशी
संज्ञा स्त्री० [सं०] शुक्ति नामक जल- जंतू । सूतुही ।

दीर्घकोषिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दीर्घकोशिका' [को०] ।

दीर्घगति
संज्ञा पुं० [सं०] ऊँट (जो लंबे लंबे डग रखता है) ।

दीर्घग्रंथि
संज्ञा स्त्री० [सं० दीर्घग्रन्थि] दीर्घकुल्या । गजपिप्पली [को०] ।

दीर्घग्रंथिका
संज्ञा स्त्री० [सं० दीर्घग्रन्थिका] गजपिप्पली [को०] ।

दीर्घग्रीव (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० दीर्घग्रीवी] जिसकी गरदन लंबी हो ।

दीर्घग्रीव (२)
संज्ञा पुं० १. नील क्रोध पक्षी । सारस । २. कूर्म विभाग के दक्षिण पश्चिम ओर स्थित एक देश (बृहत्संहिता) ।

दीर्घघाटिक (१)
वि० [सं०] लंबी गरदनवाला ।

दीर्घघाटिक (२)
संज्ञा पुं० ऊँट ।

दीर्घच्छद (१)
वि० [सं०] जिसके लंबे लंबे पत्ते हों ।

दीर्घच्छद (२)
संज्ञा पुं० ईख । ऊख ।

दीर्घजंगल
संज्ञा पुं० [सं० दीर्घजङ्गल] एक प्रकार की मछली । बडा झिंगा ।

दीर्घजंघ (१)
वि० [सं० दीर्घजङ्घ] जिसकी लंबी लंबी टाँगे हों ।

दीर्घजंघ (२)
संज्ञा पुं० १. बक । बगला । २. ऊँट ।

दीर्घजिह्व (१)
वि० [सं०] जिसकी लंबी जीभ हो ।

दीर्घजिह्व (२)
संज्ञा पुं० १. सर्प । २. दानवविशेष ।

दीर्घजिह्वा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विरोचन की पुत्री एक राक्षसी जिसे इंद्र ने मारा था । २. मातृ गणों में से एक जो कार्तिकेय की अनुचरी है ।

दीर्घजिह्वी
संज्ञा पुं० [सं० दीर्घजिह्विन्] कुत्ता जिसकी जीभ लंबी होती है ।

दीर्घजीवी
वि० [सं० दीर्घजीविन्] जो बहुत दिनों तक जीए । बहुत काल तक जीवित रहनेवाला ।

दीर्घतपा (१)
वि० [सं० दीर्घतपस्] जिसने बहुत दिनों तक तपस्या की हो ।

दीर्घतपा (२)
संज्ञा पुं० १. हरिवंश के अनुसार आयुपंशीय एक राजा जिन्होंने बहुत काल तक तप किया था । २. अहिल्या के पति गौतम का नाम (को०) ।

दीर्घतमा
संज्ञा पुं० [सं० दीर्घतमस्] एक ऋषि जो उतथ्य के पुत्र थे । विशेष— महाभारत में इनकी कथा इस प्रकार लिखी है । उतथ्य नामक एक तेजस्वी मुनि थे, जिनकी पत्नी का नाम ममता था । ममता जिस समय गर्भवती थी उस समय उतथ्य के छोटे भाई देवगुरु बृहस्पति उसके पास आए और सहवास की इच्छा प्रकट करने लगे । समता न कहा 'मुझे तुम्हारे बडे़ भाई से गर्भ है अतः इस समय तुम जाओ' । बृहस्पति ने नमाना और वे सहवास में प्रवृत हुए । गर्भस्थ बालक ने भीतर से कहा— 'बस करो? एक गर्भ में दो बालकों की स्थिति नहीं हो सकती । जब बृहस्पति ने इतने पर भी न सुना तब उस तेजस्वी गर्भस्थ शिशु ने अपने पैरों से वीर्य को रोक दिया । इसपर बृहस्पति ने कुपित होकर गर्भस्थ बालक को शाप दिया कि दू दीर्घतामस में पड़ (अर्थात् अंधा हो जा)' । बृहस्पति के शाम से वह बालक अंधा होकर जन्मा और दीर्घतमा के नाम से प्रसिद्ध हुआ । प्रद्वेषी नाम की एक ब्राह्मण कन्या से दीर्घतमा का विवाह हुआ, जिससे उन्हें गौतम आदि कई पुत्र हुए । ये सब पुत्र लोभ मोह के वशीभूत हुए । इसपर दीर्घतमा कामधेनु से गोधर्म शिक्षा प्राप्त करके उससे श्रद्धापूर्वक मैथुन आदि में प्रवृत्त हुए । दीर्घतमा को इस प्रकार मर्यादा भंग करते देख आश्रम के मुनि लोग बहुत बिगडे़ । उनकी स्त्री प्रद्वेषी भी इस बात पर बहुत अप्रसन्न हुई । एक दिन दीर्घतमा ने अपनी स्त्री प्रद्वेषी से पूछा कि 'तू मुझसे क्यों दुर्भाव रखथी है ।' प्रद्वेषी ने कहा 'स्वामी स्त्री का भरण पोषण करता है इसी से भर्ता कहलाता है पर तुम अंधे हो, कुछ कर नहीं सकते । इतने दिनों तक मैं तुम्हारा और तुम्हारे पुत्रों का भरण पोषण करती रही, पर अब न करुँगी' । दीर्घतमा ने क्रुद्ध होकर कहा—'ले' आज से मैं यह मर्यादा बाँध देता हूँ कि स्त्री एकमात्र पति से ही अनुरक्त रहे । पति चाहे जीता हो या मरा वह कदावि दूसरा पति नहीं कर सकती । जो स्त्री दूसरा पति ग्रहण करेगी वह पतित हो जायगी । प्रद्वेषी ने इसपर बिगड़कर अपने पुत्रों को आज्ञा दी कि 'तूम अपने अंधे वाप को बाँधकर गंगा में डाल आओ ।' पुत्र आज्ञानुसार दीर्घतमा को गंगा मे डाल आए । उस समय बलि नाम के कोई राजा गंगा- स्नान कर रहे थे । वे ऋषि को इस अवस्था में देख अपने घर ले गए और उनसे प्रार्थना की कि 'महाराज ! मेरी भार्या से आप योग्य संतान उत्पन्न कीजिए ।' जब ऋषि सम्मत हुए तब राजा ने अपनी सुदेष्णा नाम की रानी को उनके पास भेजा । रानी उन्हें अंधा और बुढ्ढा देख उनके पास न गई और उसने अपनी दासी को भेजा । दीर्घतमा ने उस शूद्रा दासी से कक्षीवान् आदि ग्यारह पुत्र उत्पन्न किए । राजा ने यह जानकर फिर सुदेष्णा को ऋषि के पास भेजा । ऋषि ने रानी का सार अंग टटोलकर कहा 'जाओ, तुम्हें आग, बंग, कलिंग, पुंड्र और सुंभ नामक अत्यंत तेजस्वी पुत्र उत्पन्न होंगे जिनके नाम से देश विश्यात होंगे' । ऋग्वेद के पहले मंडल में सूक्त १४० से १६० तक में दीर्घतमा के रचे मंत्र हैं । इनसें कई मंत्र ऐसे हैं जिनसे उनके जीवन की घटनाओं का पता चलता है । महाभारत में उनकी स्त्री के संबंध में जिस घटना का वर्णन है उसका उल्लेख भी कई मंत्रों में है । सूक्त १५७ मंत्र ५ में एक मंत्र है जिसे दीर्घतमा ने उस समय कहा था जब लोगों ने उन्हें एक संदूक में बंद कर दिया था । इस मंत्र में उन्होंने अश्विनी देवल से उद्धार पाने के लिये प्रार्थना की है ।

दीर्घतरु
संज्ञा पुं० [सं०] ताड़ का पेड़ ।

दीर्घता
संज्ञा स्त्री० [सं०] लंबाई । बड़ाई ।

दीर्घतिमिषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] ककड़ी । कर्कटी ।

दीर्घतुंडा (१)
वि० स्त्री० [सं० दीर्घतुण्डा] जिसका मुह लंबा हो ।

दीर्घतुंडा (२)
संज्ञा स्त्री० छछूँदर ।

दीर्घतुंडी
वि०, संज्ञा स्त्री० [सं० दीर्घतुण्डी] दे० 'दीर्घतुंडा' [को०] ।

दीर्घतृण
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार की घास जिसके खाने से पशु निर्बल हो जाते हैं । पल्लिवाह तृण । ताम्रपर्णी ।

दीर्घदंड
संज्ञा पुं० [सं० दीर्घदण्ड] दे० 'दीर्घदंडक' ।

दीर्घदंडक
संज्ञा पुं० [सं० दीर्घदण्डक] १. एरंड वृक्ष । अंडी का पेड़ । रेंड । २. ताल वृक्ष । ताड़ का पेड़ (को०) ।

दीर्घदंडी
संज्ञा स्त्री० [सं० दीर्घदण्डी] गोरक्षी । गोरखइमली ।

दीर्घदर्शिता
संज्ञा स्त्री [सं०] बहुत दूर तक की बात का विचार । परिणाम आदि का विचार करनेवाली बुद्धि । दूरदर्शिता ।

दीर्घदर्शी (१)
वि० [सं० दीर्घदर्शिन्] १. दूर तक की बात सोचनेवाला । बहुत सी बातों का बिचार करनेवाला । दूर तक सब बातों का परिणाम सौचनेवाला । दूरदर्शी । २. विचारवान् ।

दीर्घदर्शी (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. भालू । २. गीध ।

दीर्घदृष्टि (१)
वि० [सं०] १. जिसकी दृष्टि दूर तक जाय । बहुत दूर तक देखनेवाला । २. दूर तक की बात सोचनावाला ।

दीर्घदृष्टि (२)
संज्ञा पुं० गीध ।

दीर्घद्रु
संज्ञा पुं० [सं०] ताड़ का पेड़ ।

दीर्घद्रुम
संज्ञा पुं० [सं०] शाल्मली वृक्ष । सेमर का पेड़ ।

दीर्घद्वार
संज्ञा पुं० [सं०] विशाल देश के अंतर्गत एक जनपद जो गंडकी नदी के किनारे माना जाता था ।

दीर्घनाद (१)
वि० [सं०] जिससे भारी शब्द निकले । जिसकी आवाज दूर तक फैले ।

दीर्घनाद (२)
संज्ञा पुं० १. शंख । २. कुक्कुट । मुर्गा (को०) । ३. श्वान (को०) ।

दीर्घनाल
संज्ञा पुं० [सं०] १. दीर्घरोहिष । रोहिस धास । २. गोंदला घास । गुंड तृण । ३. ज्वार । यवनाल ।

दीर्घनिद्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] मृत्यु । मौत । मरण ।

दीर्घनिश्वास
संज्ञा पुं० [सं० दीर्घनिःश्वास] लंबी साँस जो दुःख या शोक के आवेग के कारण ली जाती है ।

दीर्घपक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] कलिंग पक्षी ।

दीर्घपटोलिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार का लताफल ।

दीर्घपत्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. राजपलांडु । लाल प्याज । २. विष्णु- कंद । ३. हरिदर्भ । एक प्रकार का कुश । ४. कुचला । कुपीलु । ५. एक प्रकार ईख (सुश्रुत) । दे० 'दीर्घपत्रक' ।

दीर्घपत्रक
संज्ञा पुं० [सं०] १. लाल लहसुन । २. एरंड । रेंड़ । अंडी । ३. बेतस । बेत । ४. हिज्जल । समुद्रफल । ५. करील । टेटी का पेड़ । ६. जलमधूक । जल महुआ ।

दीर्घपत्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. केतकी । २. जंगली जामुन का पेड़ जो छोटा और नदियों के किनारे होता है । ३. चित्रपर्णी । ४. शालपर्णी ।

दीर्घपत्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सफेद वच । २. घृतकुमारी । घीकुआर । ३. शालपर्णी । सरिवन । ४. श्वेत पुनर्नवा । सफेद गदहपुरना ।

दीर्घपत्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पलाशी लता । बौंरिया पलाश । वह पलाश जो लता के रूप में फैलता है । २. महाचंचु शाक । बड़ा चेना ।

दीर्घपर्ण
वि० [सं०] जिसके लंबे लंबे पत्ते हों ।

दीर्घपर्णी
संज्ञा स्त्री० [सं०] पिठवन । पुश्निपर्णी ।

दीर्घपर्व
संज्ञा पुं० [सं० दीर्घपर्वन्] लंबी पोरवाला, इक्षु । ईख आदि ।

दीर्घपल्लव
संज्ञा पुं० [सं०] सन का पेड़ ।

दीर्घपाद (१)
वि० [सं०] लंबी टाँगवाला ।

दीर्घपाद (२)
संज्ञा पुं० १. कंकपक्षी । २. सारस ।

दीर्घपादप
संज्ञा पुं० [सं०] १. ताड़ का पेड़ । २. सुपारी का पेड़ ।

दीर्घपृष्ठ
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० दीर्घपृष्ठि] सर्प । साँप ।

दीर्घप्रज्ञ (१)
वि० [सं०] दूरदर्शी ।

दीर्घप्रज्ञ (२)
संज्ञा पुं० द्वापर के एक राजा बृषपर्व्वा का नाम जो असुर के अवतार थे ।

दीर्घफल
संज्ञा पुं० [सं०] अमलतास ।

दीर्घफलक
संज्ञा पुं० [सं०] अगस्त का पेड़ ।

दीर्घफला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जतुका लता । पहाड़ी नाम की लता । २. लंबा अंगूर ।

दीर्घफलिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कपिल द्राक्षा । लंबा अंगूर । २. जतुका लता ।

दीर्घबाला
संज्ञा स्त्री० [सं०] चमरी । सुरा गाय ।

दीर्घबाहु (१)
वि० [सं०] जिसकी भुजा लंबी हो ।

दीर्घबाहु (२)
संज्ञा पुं० १. शिव के एक अनुचर का नाम (हरिवंश) । २. धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम ।

दीर्घमारुत
संज्ञा पुं० [सं०] हाथी ।

दीर्घमुख
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक यज्ञ का नाम । २. शिव का एक दास । ३. हाथी ।

दीर्घमूल
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार की बेल । मोरट लता । २े. वेना की तरह की एक पीली घास । लामज्जक तृण । ३. विल्वांतर वृक्ष ।

दीर्घमूलक
संज्ञा पुं० [सं०] मूलक । मूली ।

दीर्घमूला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सालपर्णी । सरिवन । २. श्यामा लता । कालीसर ।

दीर्घमूली
संज्ञा स्त्री० [सं०] धमासा ।

दीर्घयज्ञ (१)
वि० [सं०] जिसने बहुत काल तक यज्ञ किया हो ।

दीर्घजज्ञ (२)
संज्ञा पुं० अयोध्या के एक राजा का नाम जो द्वापर में हुए थे (महाभारत) ।

दीर्घरंगा
संज्ञा स्त्री० [सं० वीर्घरङ्गा] हरिद्रा । हलदी [को०] ।

दीर्घरत (१)
वि० [सं०] जो बहुत देर तक मैथुन में रत रहे ।

दीर्घरत (२)
संज्ञा पुं० कुत्ता ।

दीर्घरद (१)
वि० [सं०] जिसके निकले हुए लंबे दाँत हों ।

दीर्घरद (२)
संज्ञा पुं० सूअर । शूकर ।

दीर्घरसन
संज्ञा पुं० [सं०] सर्प । साँप ।

दीर्घरागा
संज्ञा स्त्री० [सं०] हरिद्रा । हलदी ।

दीर्घरोमा
संज्ञा पुं० [सं० दीर्घरोमन्] १. भालू । २. शिव के एक अनुचर का नाम ।

दीर्घरोहिष
संज्ञा पुं० [सं०] बड़ी जाति की रोहिस घास । विशेष— यह घास मालवा, राजपूताना और मध्यप्रदेश में बहुत होती है । इसमें से बहुत अच्छी सुगंध निकलती है जो नीबू की सुगंध से मिलती जुलती जुलती होती है । इसकी जड़ से एक प्रकार का तेल निकाला जाता है ।

दीर्घरोहिषक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दीर्घरोहिष' [को०] ।

दीर्घलोचन (१)
वि० [सं०] बड़ी आँखवाला ।

दीर्घलोचन (२)
संज्ञा पुं० १. शिव के एक अनुचर का नाम । २. धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम ।

दीर्घवंश
संज्ञा पुं० [सं०] नरसल । नरकट ।

दीर्घवक्त्र (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० दीर्घवक्त्रा] लंबे मुँहवाला ।

दीर्घवक्त्र (२)
संज्ञा पुं० हाथी ।

दीर्घवच्छिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] कुंभीर । घड़ियाल ।

दीर्घवर्चिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] घड़ियाला । कुंभीर [को०] ।

दीर्घवल्ली
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बड़ा इंद्रायन । महेंद्रवारुणी । २. पातालगारुड़ी लता । छिटा । ३. पलाशी लतर । बौंरिया पलाश ।

दीर्घवृंत
संज्ञा पुं० [सं० दीर्घवृन्त] १. श्योनाक वृक्ष । सोनापाठा । २. २. लताशाल ।

दीर्घवृंतक
संज्ञा पुं० [सं० दीर्घवृन्तक] दे० 'दीर्घवृंत' [को०] ।

दीर्घवृंता
संज्ञा स्त्री० [सं० दीर्घवृन्ता] इंद्रचिर्मिटी लता ।

दीर्घवृंतिका
संज्ञा स्त्री० [सं० दीर्घवृन्तिका] एलापर्णी ।

दीर्घशर
संज्ञा पुं० [सं०] ज्वार । जुन्हरी ।

दीर्घशाख
संज्ञा पुं० [सं०] १. सन का पेड़ । २. शाल । साखू का पेड़ ।

दीर्घशाखिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] नीलाम्ली नाम का क्षुप [को०] ।

दीर्घशिंबिक
संज्ञा पुं० [सं० दीर्घशिम्बिक] क्षव । एक प्रकार की राई ।

दीर्घशूक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का धान ।

दीर्घशूक्क
संज्ञा पुं० [सं०] राजा का अन्न । राजान्न [को०] ।

दीर्घश्रवा
संज्ञा पुं० [सं० दीर्घश्रवस्] दीर्घतमा ऋषि के एक पुत्रजिन्होंने अनावृष्टि होने पर जिविका के लिये वाणिज्य कर लिया था । इस बात का उल्लेख ऋग्वेद में है ।

दीर्घश्रुत
वि० [सं०] १. जो दूर तक सुनाई पड़े । २. जिसका नाम दूर तक विख्यात हो ।

दीर्घसक्थ
वि० [सं०] लंबी जाँघोंवाला [को०] ।

दीर्घसक्थि
संज्ञा पुं० [सं०] शकट । गाड़ी [को०] ।

दीर्घसत्र (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. यावज्जीवन कर्तव्य आग्निहोत्र । २. एक यज्ञ जो बहुत दिनों में समाप्त होता था । ३. एक तीर्थ का नाम (महाभारत) ।

दीर्घसत्र (२)
वि० जिसने दीर्घसत्र यज्ञ किया हो ।

दीर्घसुरत
संज्ञा पुं० वह जो देर तक रति करता हो । कुत्ता ।

दीर्घसूक्ष्म
संज्ञा पुं० [सं०] प्राणयाम का एक भेद ।

दीर्घसूत्र
वि० [सं०] दे० 'दीर्घसूत्री' ।

दीर्घसूत्रता
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रत्येक कार्य में बिलंब करने का स्वाभाव । हर एक काम में देर लगाने की आदत ।

दीर्घसूत्री
वि० [सं० दीर्घसूत्रिन्] प्रत्येक कार्य में विलंब करनेवाला । हर एक काम में जरूरत से ज्यादा देर लगानेवाला । प्रत्येक कार्य में अधिक समय बितानेवाला । देर से काम करनेवाला ।

दीर्घस्कंध
संज्ञा पुं० [सं० दिर्घस्कन्ध] ताड़ का पेड़ ।

दीर्घस्वर
संज्ञा पुं० [सं०] द्बिमात्रिक स्वर । दे० 'दीर्घ' ।

दीर्घा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पिठवन । पुश्निपर्णी । २. ८८ हाथ लंबी ४४. हाथ चौड़ी और ४४ हाथ ऊँची नाव (युक्ति- कल्पतरु) । ३. घर के बाहर ऊँचा सा बैठने का स्थान । गैलरी ।

दीर्घाकार
वि० [सं०] दीर्घ आकार का । बड़े आकारवाला [को०] ।

दीर्घाध्वग
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो लंबी मंजिल चलता हो । हरकारा । धावन [को०] ।

दीर्घायु (१)
वि० [सं० दीर्घायुस्] जिसकी आयु बड़ी हो । बहुत दिनों तक जीनेवाला । दीर्घजीवी । चिरंजीवी ।

दीर्घायु (२)
संज्ञा पुं० १. सेमर का पेड़ । २. कौवा । काक । ३. मारकंडेय ऋषि । ४. जीवन वृक्ष ।

दीर्घायुध
संज्ञा पुं० [सं०] १. कुंभास्त्र । २. सूअर । शूकर । ३. साही नाम का जंतु जिसके शरीर में लंबे लंबे काँटे होते हैं (को०) ।

दीर्घायुष्य
संज्ञा पुं० [सं०] लंबी उम्र । बड़ी आयु [को०] ।

दीर्घालर्क
संज्ञा पुं० [सं०] सफेद मदार ।

दीर्घास्य (१)
वि० [सं०] बड़े मुँहवाला ।

दीर्घास्य (२)
संज्ञा पुं० १. हाथी । २. शिव के एक अनुचर का नाम । ३. पश्चिचमोत्तर दिशा में स्थित एक देश (बृहत्संहिता) ।

दीर्घाहन
संज्ञा पुं० [सं०] ग्रीष्मकाल जिसमें दिन बड़ा होता है ।

दीर्घिका
संज्ञा पुं० [सं०] १. बावली । छोटा जलाशय । छोटा तालाब । विशेष— किसी किसी के मत से ३०० धनुष लंबे जलाशय को दीर्घिका कहते हैं । २. हिंगुपत्नी । ३. ३२ हाथ लंबी । ४. हाथ चौड़ी और ३१/७ हाथ उँची नाव (युक्ति कल्पतरु) ।

दीर्घिर्वारु
संज्ञा पुं० [सं०] लंबी लकड़ी । डँगरी ।

दीर्ण
वि० [सं०] १. फटा हुआ । विदारित । दरका हुआ । २. भयभीत । डरा हुआ (को०) ।

दील †
संज्ञा पुं० [फा० दिल] दे० 'दिल' । उ०— दील कर झोली मन कर तुमा ।—रामानंद० पृ० ५० ।

दीली
संज्ञा स्त्री० [हिं० दिल्ली] दे० 'दिल्ली' । यौ०—दीलौपत्ति = दिल्लीपति । दिल्ली का स्वामी । उ०— समरसिंध मेवार दंड देवार अजर जर । दीलोपत्ति अनङ्ग लरन अड्डी सुनलोह लरि ।—पृ० रा०, ७ । २४ ।

दीवँक †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दीमक] दे० 'दीमक' ।

दीवट
संज्ञा स्त्री० [सं० दीपपट्ट० प्रा० दीवट्ट दीवठ्ठ] पीतल, लकड़ी आदि का डंडे के आकार का आधार जिसपर दीया रखा जाता है । दोपाघार । चिरागदान ।

दीवड़ा †
संज्ञा पुं० [सं० दीप + हिं० ड़ा (प्रत्य०)] दे० 'दीपक' । उ०— सप्तलोक समान पूरिय ले जाके घर लक्ष्मी कुँआरी चंद्र सुरज दीवड़ै ।—दक्खिनी०, पृ०, २९ ।

दीवला †
संज्ञा पुं० [हिं० दीवा + ला (प्रत्य०)] [स्त्री० दिवली, दियली] दीया । दीपक । उ०— सा बाला प्री चिंतवई खिण खिण रयणि विहाइ । तिण हर हार पर- ट्ठव्यउ, ज्यूँ दीवलउ बुझाइ ।—ढ़ोला०, दू०, ५७८ ।

दीवली †
संज्ञा स्त्री० [सं० दीपावलि] दे० 'दिपावली' । उ०— दीवल्याँ कई आगही, धूरि दसरावै चाल्यो राव ।— बी० रासी, पृ० १०९ ।

दीवाँन पु
संज्ञा पुं० [फा० दीवान] राज्यसभा । सभा दीवान । उ०— यह जानि साहि दीवाँन किय, खाँन बहत्तरि इक्क हुव ।—ह० रासी पृ०, ६४ ।

दीवा † (१)
संज्ञा पुं० [सं० दीपक] दीपक । दीया । उ०— मथि करि दिपक कोजिये, सब घटि भया प्रकास । दादू दिवा हाथि करि, गया निरंजन पास ।—दादू०, पृ० ७ ।

दीवा (२)
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'धव' ।

दीवाण †
संज्ञा पुं० [र० दीवान] १. दीवान । प्रधान मंत्री । २. आत्मा । (लाक्ष०) उ०— दादू गाफिल छोबतैं आहे मंझि मुकाम । दरागह मैं दीवाण तत, पसे न बैठी पांण ।— दादू० पृ० ८८ ।

दीवाना
संज्ञा पुं० [अ०] १. राजा या बादशाह के बैठने की जगह । राजसभा । दरबार । कचहरी । यौ०—दिवान आम । दिवान खास । २. मंत्री । वजीर । राज्य का प्रबंध करनेवाला प्रधान । उ०— भक्त ध्रुव की अटल पदवी राम के दीवान ।—(शब्द०) । यौ०— दीवानखालसा । ३. गजलों के संग्रह की पुस्तक । ४. एक प्रकार का बड़ा सोफा जिस पर सोया जा सके ।

दीवान आम
संज्ञा पुं० [अ०] १. आम दरबार । ऐसा दरबार जिसमें राजा या बाजशाह से सब लोग मिल सकते हैं । २. वह स्थान या भवन जहाँ आम दरबार लगाता हो ।

दीवाना आलम
संज्ञा पुं० [अ०] दे० 'दीवान आम' ।

दीवानखाना
संज्ञा पुं० [फा० दिवान खानह्] घर का वह बाहरी हिस्सा या कमरा जहाँ बड़े आदमी बैठते और सब लोगों से मिलते हैं । बैठक ।

दीवानखालसा
संज्ञा पुं० [अ० दीवाना खालसह्] वह अधिकारी जिसके पास राजा या बादशाह की मुहर रहती है ।

दीवानखास
संज्ञा पुं० [अ० दीवानखास] १. खास दरबार । ऐसी सभा जिसमें राजा या बादशाह मंत्रियों तथा चुने हुए प्रधान लोगों के साथ बैठता है । २. वह जगह या मकान जहाँ खास दरबार होता हो ।

दीवानगी
संज्ञा स्त्री० [फा०] पागलपनु । दीवानापन [को०] ।

दीवाना
वि० [फा०] [वि० स्त्री० दीवानी] पागल । सिड़ी । विक्षिप्त । मुहा०— किसी के पीछे दीवाना होना = किसी के लिये हैरान होना । किसी (वस्तु या व्यक्ति) के लिये व्यग्र होना ।

दीवानापन
संज्ञा पुं० [फा० दीवाना +हिं० पन (प्रत्य०)] पागलपन । सिड़ीपन । विक्षिप्तता ।

दीवानी (१)
संज्ञा स्त्री० [फा०] ४. दीवाना का पद । दीवान का ओहदा । २. वह अदालत जिसमें दो फरीकों के बीच किसी तरह की हकीयत का फैसला हो । वह न्यायाल जो सपंत्ति आदि संबंधी स्वत्व का निर्णय करे । व्यवहार संबंधी न्यायालय ।

दीवानी
वि० स्त्री० [फा० दीवाना] पगली । बावली ।

दीवार
संज्ञा स्त्री० [फा०] १. पत्थर ईंट मिट्टी आदि को नीचे ऊपर रखकर उठाया हुआ परदा जिससे किसी स्थान को घेर कर मकान आदि बनाते हैं । भीत । मुहा०— दीवार उठाना = दीवार बनाना । भीत खड़ी करना दीवार खड़ी करना = दीवार बनाना । २. किसी वस्तु का घेरा जो ऊपर उठा हो । जैसे, टोपी को दीवार जूते की दीवार, चूल्हे की दीवार ।

दीवारगीर
संज्ञा स्त्री० [फा०] दीया आदि रखने का आधार जो दीवार में लगाया जाता है । ल०— सुवर्णमय दीवारगीर तथा मोतियों की झलर बनाओ ।—कबीर मं० पृ०, ४५० ।

दीवारगीरी
संज्ञा स्त्री० [फा० दीवारगीर] एक प्रकार का छपा हुआ कपड़ा जो दीवार में लगाया जाता है । पिछवाई ।

दीवाल
संज्ञा स्त्री० [फा०] दे० 'दीवार' ।

दीवालदंड
संज्ञा पुं० [फा० दीवाल + हिं० दंड] एक प्रकार की कसरत या दंड़ जो दीवार पर हाथ टिकाकर करते हैं ।

दीवाला
संज्ञा पुं० [हिं० दिवाला] दे० 'दिवाला' ।

दिवाली
संज्ञा स्त्री० [सं० दीपावली] कार्तिक को अमावास्या को होनेवाला एक उत्सव जिसमें संध्या के समय घर में भीतर बाहर बहुत से दीपक जलाकर पक्तियों में रखे जाते हैं और लक्ष्मी का पूजन होता है । विशेष— जिस दिन प्रदोष काल में अमावास्या रहेगी उसी दिन दीवाली होगी ओर लक्ष्मी का पूजन किया जायागा । यदि अमावस्ता लगातार दो दिन प्रदोषकाल में पड़े तो दूसरे दिन की रात को दीवाली मानी जायगी और वह रात सुखरात्रिका कहलावेगी । यदि अमावास्या प्रदोषकाल में पड़े ही न, तो पहले दिन लक्ष्मीपूजा और दुसरे दिन दीपदान होगा क्योंकि पार्वण श्राद्ध उसी दिन होगा । दीवाली के दिन लोग जुआ खेलना भी कर्तव्य समझते हैं ।

दीवि
संज्ञा पुं० [सं०] नीलकंठ नाम का पक्षी ।

दीवी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दीवी] दीवट । चिरागदान ।

दीसना
क्रि० अ० [सं० दृश् (=देखना); प्रा० दीसना] दिखाई देना । दिखाई पड़ना । दिखाई पड़ना । दृष्टिगोचर होना । उ०— (क) बिदुसन प्रभृ विराटमय दीसा ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) जट मुकुट गंग दीसाहि उतंग । सोभंत चंद लिल्लाट रंग ।—पृ०, रा०, ७ । १० ।

दीसरना
क्रि० अ० [सं० दृश० प्रा० दीस] दे० 'दिसना' । उ०— परतष ही दीसरै प्राणी, पिरभू भजण तणों परताप ।— रघु० रू०, पृ० २३ ।

दीसहना पु †
क्रि० अ० [सं० दृश; प्रा० दीस] दिखाई पड़ना । दृग्गोचर होना । उ०— जत गरल कंठ दीसहति बीय । जिम चित्त प्रगट संसारनीय ।—पृ० रा०, ७ । ९ ।

दीहंध
संज्ञा पुं० [सं० दिवस आ० दीह + सं० अन्ध] वह जो दिन में देख न सके । उलूक । उल्लू ।

दीह पु (१)
वि० [सं० दीर्घ, प्रा० दीह] लंबा । बड़ा । उ०— बहु तामहँ दीह पताक लसैं । जनु घूम में अग्नि की ज्वाल बसै ।— केशव (शब्द०) ।

दीह पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० दिवस, प्रा० दिअस, दिअह, दीह] दिन । दिवस । उ०— सोवै खाय करै नहिं सुकृत, खोवै दीह खलीता ।—रघु० रू०, पृ० १६ ।

दीहड़ा, दिहाड़ा
संज्ञा पुं० [सं० दिवस; प्रा० दीह + ड़ा (प्रत्य०)] दिन । दिहाड़ा । उ०— पढै़ सु कवि जो वंस प्रवाड़ा । हुवै वतीत आव दीहाड़ा ।—रा०, रू०, पृ०, १२ ।