विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/ला

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लांगल
संज्ञा पुं० [सं० लाङ्गल] १. खेत जोतने का हल। २. हल के आकार का काष्ठ (को०)। ३. एक प्रकार की मजबूत लकड़ी जो मकानों के बनाने में काम आती है (को०)। ४. फल तोड़ने का एक प्रकार का/?/जिसके सिरे पर एक जाली बँधी रहती है (को०)। ५. चंद्रमा का अर्धान्नत शृंग। ६. शिश्न। लिंग। ७. एक प्रकार का फूल। ८. एक प्रकार का चावल (को०)। ९. ताड़ का पेड़।

लांगलक
संज्ञा पुं० [सं० लाङ्गलक] सुश्रुत के अनुसार हल के आकार का वह घाव जो भगंदर रोग में गुदा में शस्त्र चिकित्सा करके किया जाता है।

लांगलकी
संज्ञा स्त्री० [सं० लाङ्गलकी] कलियारी नाम का जहरीला पौधा।

लांगलग्रह
संज्ञा पुं० [सं० लाङ्लगह] खेतिहर। किसान।

लांगलचक्र
संज्ञा पुं० [सं० लाङ्गलचक्र] फलित ज्योतिष में एक प्रकार का चक्र जिसकी सहायता से खेती के संबंध में शुभाशुभ फल जाने जाते हैं। इसका आकार इस प्रकार का होता है—/?/

लांगलदंड
संज्ञा पुं० [सं० लाङ्गलदणड] हरिस। हल का लट्ठा [को०]।

लांगलध्वज
संज्ञा पुं० [सं० लाङ्गलध्वज] बलराम।

लांगलपद्धति
संज्ञा स्त्री० [सं० लाङ्गलपद्धति] कूँड़। हल जोतने से बनी रेखाएँ [को०]।

लांगलफाल
संज्ञा पुं० [सं० लाङ्गलफाल] हल का फाल। हल के अग्रभाग में लगी लोहे की नोक [को०]।

लांगलमार्ग
संज्ञा पुं० [सं० लाङ्गलमार्ग] दे० 'लांगलपद्धति' [को०]।

लांगला
संज्ञा स्त्री० [सं० लाङ्गला] नारियल का पेड़ [को०]।

लांगलाख्य
संज्ञा पुं० [सं० लाङ्गलाख्य] कलियारी नाम का जहरीला पौधा।

लांगलि
संज्ञा पुं० [सं० लाङ्गलि] १. कलियारी नाम का जहरीला पौधा। २. मजीठ। ३. जलपीपल। ४. पिठवन। ५. कौंछ। केवाँच। ६. गजपीपल। ७. चव्य। चात्र। ८. महाराष्ट्री या मराठी नाम की लता। ९. ऋपभक नाम की अष्टवर्गीय ओषधि।

लांगलिक
संज्ञा पुं० [सं० लाङ्गलिक] एक प्रकार का स्थावर विष।

लांगलिका
संज्ञा स्त्री० [सं० लाङ्गलिका] दे० 'लांगलि'।

लांगलिकी
संज्ञा स्त्री० [सं० लाङ्गलिकी] कलियारी।

लांगलिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० लाङ्गलिनी] कलियारी। कलिहारी।

लांगली (१)
संज्ञा पुं० [सं० लाङ्गलिन्] १. श्री बलराम जी। नारि- यल। २. सर्प। साँप।

लांगली (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० लाङ्गली] १. पुराणानुसार एक नदी का नाम। २. कलियारी। ३. मजीठ। ४. पिठवन। ५. कौंछ। केवाँच। ६. जलपीपल। ७. गजपीपल। ८. चव्य। चाब। ९. महाराष्ट्री नाम की लता। १०. ऋषभक नाम की अष्ट- वर्गीयि औषधि।

लांगलीश
संज्ञा पुं० [सं० लाङ्गलीश] एक शिवलिंग का नाम।

लांगलीशाक
संज्ञा पुं० [सं० लाङ्गलीशाक] जलपीपल।

लांगलीषा
संज्ञा स्त्री० [सं० लाङ्गलीषा] हल का लट्ठा। हरिस।

लांगुल
संज्ञा पुं० [सं० लाङ्गुल] १. पूछै। दुम। २. शिश्न। लिंग।

लांगुली
संज्ञा पुं० [सं० लाङ्गुलिन्] १. बंदर। २. ऋषभ नामक ओषधि। ३. पिठवन। ४. कौछ। केवाँच।

लांगुलीका
संज्ञा स्त्री० [सं० लाङ्गुलीका] पृश्निपर्णी। पिठवन।

लांगूल
संज्ञा पुं० [सं० लाङ्गूल] १. दुम। पूँछ। २. शिश्न। लिंग। ३. धान्यकोष्ठ। धान्यागार (को०)। यौ०—लागूलचालन, लागूलविक्षेप = (१) दुम हिलाना। (२) पूँछ फटकारना।

लांगूला
संज्ञा स्त्री० [सं० लाङ्गूला] १. केवाँच। कौंछ। २. पिठवन। पृश्निपर्णी।

लांगूली (१)
संज्ञा पुं० [लाङ्गूलिन्] बंदर। वानर।

लांगूली (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० लाङ्गूली] १. ऋषभक नाम की अष्टवर्गीय ओषधि। २. पिठवन। पृश्निपर्णी। लांगुलिका। लांगू लका। ३. केवांच। कौंछ।

लांचुल
संज्ञा पुं० [सं० लाञ्चुल] धान्य। धान।

लांछन
संज्ञा पुं० [सं० लाञ्छन] १. चिह्न। निशान। २. दाग। ३. चंद्रमा का धब्बा (को०)। ४. आख्या। नाम (को०)। ५. भूमि- सीमाकन। अंकन (को०)। ६. दोष। कलंक। जैसे,—तुम तो यों ही सबकों लांछन लगाया करते हो। क्रि० प्र०—लगाना।

लांछना
संज्ञा स्त्री० [सं० लाञ्छना] दे० 'लांछन'।

लांछनित पु
वि० [सं० लाञ्छन] जिसे लांछन लगा हो। कलंकित। दोपयुक्त। लांछित।

लांछित
वि० [सं० लाञ्छित] १. चिह्नित। अंकित। २. अभिहित।नामक। ३. अंलकृत। सज्जित। ४. कलंकित। जिसे लांछन लगा हो [को०]।

लांठनी
संज्ञा स्त्री० [सं० लाणठनी] पुंश्चली। कुलटा। असती [को०]।

लांतकज
संज्ञा पुं० [सं० लान्तकज] जैनियों के एक प्रकार के देवताओं का गण।

लांतव
संज्ञा पुं० [सं० लान्तव] जैनों के अनुसार सातवें स्वर्ग का नाम।

लांपट्य
संज्ञा पुं० [सं० लाम्पट्य] १. लंपट होने का भाव। लंपटता। २. व्यभिचार।

लाँक (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० लक (= डंठल या बाल)] १. जौ, गेहूँ, चने, अरहर इत्यादि के पके और कटे हुए पौधों का समूह जो झाड़ने के वास्ते एकत्र हो। ताजी कटी हुई फसल। २. भूसा।

लाँक (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० लंक] १. कमर। कटि। उ०—लगै लाँक लोयन भरे लोयन लेति लगाय।—बिहारी (शब्द०)। क्रि० प्र०—डालना।—लगाना। २. परिमाण। मिकदार।

लाँग
संज्ञा स्त्री० [सं० लाङ्गूल (= पूँछ)] धोती का वह भाग जो दोनों जाँघों के नीचे से निकालकर पीछे की और कमर से खोंस लिया जाता है। काछ। जैसे,—धोती का लाँग। क्रि० प्र०—कसना।—बाँधना।—मारना।—लगाना।

लाँगड़ो
संज्ञा पुं० [सं० लाङ्गूल] हनुमान जी। (डिं०)।

लाँग प्राइमर
संज्ञा पुं० [अं०] छापेखाने में एक प्रकार की टाइप जिसका आकार आदि इस प्रकार का होता है लाँग प्राइमर।

लाँघना
क्रि० स० [सं० लङ्घन] १. किसी चीज के इस पार से उस पार जाना। डाँकना। नाँघना। जैसे,—लड़के को लाँघकर मत जाया करो। २. किसी वस्तु को उछलकर पार करना। जैसे,— यह नाला तो तुम यों ही लाँघ सकते हो। संयो० क्रि०—जाना।

लाँघनी उड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० लाँघना + उड़ी (= कुदान)] मालखंभ की एक कसरत जो साधारण उड़ी के ही समान होती है। इसमें विशेषता यह है कि इसमें बीच का कुछ स्थान कूद या लाँघकर पार किया जाता है।

लाँच
संज्ञा स्त्री० [देश०] रिशवत। घूस। उत्कोच।

लाँजी
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का धान।

लाँझि †
संज्ञा स्त्री० [हिं० लाँघना] बाधा। उल्लंघन।

लाँड़ †
संज्ञा पुं० [लिङ्ग, हिं० लंड] दे० 'लंड'।

लाँबा †
वि० [सं० लम्बक] दे० 'लंबा'। उ०—(क) चारहि हैं खुर बाके गरो अति लाँबों सो मूँड़ उठावत है।—सीताराम (शब्द०)। (ख) सत योजन लाँबो अरु ऊँची।—गिरधर (शब्द०)। (ग) लाँबी डग भरी ठौर ठौर गिर परी राम, देखौ जेहि घरी देख रही मुख रूप को।—हृदयराम (शब्द०)। (घ) लहलही लाँबी लटैं लपटी सुलंक पर।—पद्माकर (शब्द०)।

ला (१)
संज्ञा पुं० [अं० लॉ] १. वे राजनियम या कानून जो देश या राज्य में शांति या सुव्यवस्था स्थापित करने के लिये बनाए जायँ। २. ऐसे राजनियमों या कानुनों का संग्रह। व्यवहारशास्त्र। धर्मशास्त्र। कानून। जैसे,—हिंदू लॉ। महमडन लॉ।

ला (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. ग्रहण या प्राप्ति की क्रिया। २. देना। प्रदान [को०]।

ला (३)
अव्य० [अ०] न। बिना। नहीं। जैसे,—लाइलाज, लाइल्म, लापरवा आदि।

लाइ पु †
संज्ञा पुं० [सं० अलात (= लुक), प्रा० अलाय] अग्नि। उ०—(क) तब लंक हनुमत लाइ दई।—केशव (शब्द०)। (ख) ज्यों ज्यों बरसत घोर घन घनघमंड गरुवाइ। त्यों त्यों परति प्रचंड अति नई लगन की लाइ।—पद्माकर (शब्द०)।

लाइक
वि० [अ० लाइक़] दे० 'लायक'।

लाइची
संज्ञा स्त्री० [सं० एला + फ़ा० ची ('च' प्रत्य०)] दे० 'इलायची'।

लाइट
संज्ञा स्त्री० [अं०] प्रकाश। दीप्ति। रोशनी। उजाला।

लाइट हाउस
संज्ञा पुं० [अं०] एक प्रकार का स्तंभ या मीनार जिसके सिरे पर एक बहुत तेज रोशनी रहती है जिसमें जहाज चट्टान आदि से न टकरायं, या और किसी प्रकार की दुर्घटना न हो। प्रकाशस्तंभ।

लाइन
संज्ञा स्त्री० [अं०] १. कतार। अवली। २. पंक्ति। सतर। ३. रेखा। लकीर। ४. रेल की सड़क। ५. घरों की वह पंक्ति जिनमें सिपाही रहते हैं। बारिक। लैन। ६. व्यवसाय क्षेत्र। पेशा। जैसे,—(क) डाकटरी लाइन अच्छी है, उसमें दो पैसे मिलते हैं। (ख) अनेक नवयुवक पत्रकार का काम करना चाहते हैं। राष्ट्रीय विद्यापीठों, गुरुकुलों के कितने ही स्नातक इस लाइन में आना चाहते हैं।

लाइन क्लियर
संज्ञा पुं० [अं०] रेलवे में संकेत या पत्र जो किसी रेलगाडी के ड्राइवर को यह सूचित करने के लिये दिया जाता हे कि तुम्हारी जाने के लिये रास्ता साफ है। (बिना यह संकेत या पत्र पाए वह गाड़ी आगे नहीं बढ़ा सकता।) क्रि० प्र०—देना।—पाना।—मिलना।

लाइफ
संज्ञा पुं० [अं० लाइफ़] जीवन। जिंदगी। यौ०—लाइफ इन्श्योरेंस = जीवन बीमा। विशेष दे० 'बीमा'। लाइफ बॉय। लाइफबेल्ट = एक प्रकार की पेटी जो डूबने से बचाने के काम आती। लाइफबोट।

लाइफ बॉय
संज्ञा पुं० [अं० लाइफ़बॉय] एक प्रकार का यंत्र जो ऐसे ढंग से बना होता है कि पानी में डूबता नहीं, तैरता रहता है और डूबते हुए व्यक्ति के प्राण बचाने के काम में आता है। तरेंदा। विशेष—यह कई प्रकार का होता है और प्रायः जहाजों पर रखा रहता है। यदि दैवात् कोई मनुष्य पानी में गिर पड़े तो यह उसकी सहायता के लिये फेंक दिया जाता है। इसे पक्ड़ लेने से मनुष्य डूबता नहीं।

लाइफ बोट
संज्ञा स्त्री० [अं० लाइफ़ बोट] एक प्रकार की नाव जो समुद्र में लोगों के प्राण बचाने के काम में लाई जाती है। जीवनरक्षक नौका। विशेष—ये नावें विशेष प्रकार की बनी हुई होती हैं और जहाजों पर लटकती रहती हैं। जब तूफान या अन्य किसी दुर्घटना से जहाज के डुबने की आशंका होती है, तब ये नावें पानी में छोड़ी जाती हैं। लोग इनपर चढ़कर प्राण बचाते हैं।

लाइब्रेरी
संज्ञा स्त्री० [अं०] १. वह स्थान जहाँ पढ़ने के लिये बहुत सी पुस्तकें रखी हों। पुस्तकालय। २. वह कमरा या भवन जहाँ पुस्तकों का संग्रह हो। पुस्तकालय।

लाइलाज
वि० [अ०] १. जिसकी चिकित्सा न हो सके। जिसका उपचार न हो। असाध्य। २. जिसका कोई उपाय न हो। दुष्कर [को०]।

लाइल्म
वि० [अ०] १. इल्म रहित। अशिक्षित। विद्याविहीन। २. नावाकिफ। अपरिचित। अनजान [को०]।

लाइसेंस
संज्ञा पुं० [अं०] दे० 'लैसंस'।

लाई † (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० लावा, हिं० लावा] उबाले हुए धान को सुखाकर गरम बालू में भूनने से बनी हुई खीलें। धान का लावा।

लाई (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० लाना (= लगाना)] छिपी शिकायत। चुगली। निंदा। क्रि० प्र०—लगाना। यौ०—लाई लुतरी = (१) चुगली। शिकायत। (२) वह जो इधर उधर दूसरों की चुगली खाती फिरती हो। एक से दूसरे की निंदा करनेवाली। चुगुलखोर (स्त्री)।

लाई (३)
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] १. एक प्रकार का रेशमी कपड़ा। २. एक प्रकार की ऊनी चादर। ३. शराब की तलछट।

लाऊ
संज्ञा पुं० [हिं० अलाबू] लौकी। कद्दू। घिआ। विशेष दे० 'घिया'।

लाक
संज्ञा पुं० [अं० लॉक] ताला।

लाक अप
संज्ञा पुं० [अं० लॉक अप] हवालात। जैसे, अभियुक्त लाक अप में रखा गया है।

लाकड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० लकड़ी] दे० 'लकड़ी'।

लाकर
संज्ञा पुं० [अं० लॉकर] सुरक्षा की दृष्टि से बंकों में ग्राहकों की मूल्यवान् वस्तुओं के रखने का स्थान।

लाकरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० लकड़ी] दे० 'लकड़ी'।

लाकिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] तांत्रिकों के अनुसार एक योगिनी का नाम।

लाकुच
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'लकुच'।

लाकुटिक (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० लाकुटिकी] लाठी या दंड धारण करनेवाला [को०]।

लाकुटिक (२)
संज्ञा पुं० [सं०] अनुचर। सेवक। पहरेदार [को०]।

लाकेट
संज्ञा पुं० [अं०] वह लटकन जो घड़ी की या और किसी प्रकार की पहनने की जंजीर में शोभा के लिये लगाया जाता है और नीचे की ओर लटकता रहता है।

लाक्षकी
संज्ञा स्त्री० [सं०] सीता का एक नाम।

लाक्षण †
वि० [सं०] १. लक्षण संबंधी। लक्षण का। २. लक्षणों का जानकार।

लाक्षणिक (१)
वि० [सं०] १. जिससे लक्षण प्रकट हो। २. लक्षण संबंधी। ३. शब्द की लक्षणा शक्ति द्वारा गम्य वा प्राप्त (को०)। ४. जो मुख्य न हो। अप्रधान। गौण (को०)। ५. पारिभाषिक (को०)।

लाक्षणिक (२)
संज्ञा पुं० १. वह छंद जिसके प्रत्येक चरण में ३२ मात्राएँ हों। २. वह जो लक्षणों का ज्ञाता हो। लक्षण जाननेवाला। ३. वह अर्थ जो शब्द की अभिधा शक्ति द्वारा व्यक्त न हो अपितु शक्ति द्वारा व्यक्त हो (को०)। ४. पारिभाषिक शब्द लक्षणा (को०)।

लक्षिण्य
वि० [सं०] १. लक्षणों का जानकार। लक्षण बतानेवाला। २. लक्षण संबंधी [को०]।

लाक्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] लाख। लाह।

लाक्षागृह
संज्ञा पुं० [सं०] लाख का वह घर जिसे दुर्योधन ने वारणावत में पांडवों को जला देने की इच्छा से बनवाया था। विशेष—दुर्योधन की इस दुर्भावना की सूचना पाकर आग लगने से पहले ही पांडव लोग इस घर से निकल गए थे।

लाक्षातरु
संज्ञा पुं० [सं०] पलास का वृक्ष।

लाक्षातैल
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्यक में एक प्रकार का तेल जो साधारण तेल, हल्दी और मजीठ आदि डालकर पकाने से बनता है। यह दाह और ज्वर का नाशक माना जाता है।

लाक्षादि तैल
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्यक में एक प्रकार का तेल। विशेष—साधारण तेल में लाख, दूध या दही, लाल चंदन, असगंध, हलदी, दारु हलदी, मुलेठी, कुटकी, रेणुका आदि ओषधियाँ पकाने से लाक्षादि तैल बनता है। यह जीर्णज्वर और राजयक्षमा आदि रोगों को दूर करनेवाला और बलवधक माना जाता है।

लाक्षाप्रसाद
संज्ञा पुं० [सं०] पठानी लोध।

लाक्षाप्रसादन
संज्ञा पुं० [सं०] लाल लोध।

लाक्षाभवन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'लाक्षागृह' [को०]।

लाक्षारक्त
वि० [सं०] लाक्षा से रंजित। लाक्षा से रँगा हुआ [को०]।

लाक्षारस
संज्ञा पुं० [सं०] महावर, जो पानी में लाख औटाकर बनाते हैं।

लाक्षावृक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १. ढाक। पलास। २. कोशाम्र। कोसम।

लाक्षिक
वि० [सं०] १. लाक्षा संबंधी। लाख का। २. लाख का बना हुआ। लाखी।

लाख (१)
वि० [सं० लक्ष, प्रा० लक्ख] १. सौ हजार। उ०—लाखन हू की भीर से आँखि वहीं चलि जाहिं। (शब्द०)। २. (लक्षणा से) बहुत अधिक। गिनती में बहुत ज्यादा। मुहा०—लाख टके की बात = अत्यंत उपयोगी बात।

लाख (२)
संज्ञा पुं० सौ हजार की संख्या जो इस प्रकार लिखी जाती है।—१,००,०००।

लाख (३)
क्रि० वि० बहुत। अधिक। जैसे,—तुम लाख कहो, मैं एक न मानूँगा। मुहा०—लाख से लीख होना = अत्यधिक से अत्यल्प हो जाना। सब कुछ से कुछ न रह जाना। उ०—बहुतक भुवन सोह अँतरीखा। रहे जो लाख भए ते लीखा।—जायसी (शब्द०)। लाख का घर राख होना = लाख रुपए का घर या खानदान नाश होना।

लाख (४)
संज्ञा स्त्री० [सं० लाक्षा] १. एक प्रकार का प्रसिद्ध लाल पदार्थ जो पलास, पीपल, कुसुम, बेर, अरहर आदि अनेक प्रकार के वृक्षों की टहनियों पर कई प्रकार के कीड़ों से बनता है। लाह। विशेष—एक प्रकार के बहुत छोटे कीड़े होते हैं, जिनकी कई जातियाँ होती हैं। ये कीड़े या तो कुछ वृक्षों पर आपसे आप हो जाते हैं या इसी लाल पदार्थ के लिये पाले जाते हैं। वृक्षों पर ये कीड़े अपने शरीर से एक प्रकार का लसदार पदार्थ निकालकर उससे घर बनाते हैं और उसी में बहुत अधिक अंडे देते हैं। कीड़े पालनेवाले बैसाख और अगहन में वृक्षों की शाखाओं पर से खुरचकर यह लाल द्रव्य निकाल लेते हैं और तब इसे कई तरह से साफ करके काम में लाते हैं। इससे कई प्रकार के रंग, तेल, वारनिश और चूड़ियाँ, कुमकुमे आदि द्रव्य बनते हैं। चमड़ा भी इसी से तैयार होता है। लाख केवल भारत में ही होती है; और कहीं नहीं होती। यहीं से यह सारे संसार में जाती है। यहाँ इसका व्यवहार बहुत प्राचीन काल से, संभवतः वैदिक काल से, होता आया है। पहले यहाँ इसमें कपड़े और चमड़े आदि रँगते थे और पैर में लगाने के लिये अलता या महावर बनाते थे। वैद्यक में इसे कटु, स्निग्ध, कपाय, हलकी, शीतल, बलकारक और कफ, रक्तपित्त, हिचकी, खाँसी, ज्वर, विसर्प, कुष्ठ, रुधिरविकार आदि को दूर करनेवाली माना है। पर्या०—कीटजा। रक्तमातृका। अलक्तक। जतुका। २. लाल रंग के वे बहुत छोटे छोटे कीड़े जिनसे उक्त द्रव्य निकलता है। इसकी कई जातियाँ होती हैं।

लाखना (१)
क्रि० अ० [हिं० लाख + ना (प्रत्य०)] लाख लगाकर बरतन या और किसी चीज में का छेद बंद करना। उ०—शील तो सिधारयो तब संग न सिधारी जब तऊ भलो आजहू लौं फूटो घट लाखनो।—हृदयराम (शब्द०)।

लाखना पु † (२)
क्रि० स० [सं० लक्षण] लख लेना। जान लेना। समझ लेना। उ०—सुनि कै महादेव कै भाखा। सिद्ध पुरुष राजैं मन लाखा।—जायसी (शब्द०)।

लाखपती
संज्ञा पुं० [सं० लक्षपति] दे० 'लखपती'।

लाखा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० लाख] १. लाख का बना हुआ एक प्रकार का रंग जिसे स्त्रियाँ सुंदरता के लिये होठों पर लगाती हैं। क्रि० प्र०—जमाना।—लगाना। २. गेहूँ के पौधों में लगनेवाला एक रोग जिससे पौधे की नाल लाल रंग की होकर सड़ जाती है। गेरुआ। कुकुहा। विशेष—यह एक प्रकार के बहुत ही सूक्ष्म लाल रंग के कीड़ों का समूह होता है। इसे गेरुआ या कुकुहा भी कहते हैं।

लाखा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० लाख (= लक्ष)] एक प्रसिद्ध भक्त जो मारवाड़ देश का निवासी था।

लाखागृह
संज्ञा पुं० [सं० लाक्षागृह] दे० 'लाक्षागृह'।

लाखिराज
वि० [अ० लाखिराज] (भूमि) जिसका लगान न देना पड़ता हो। जिसपर कर न हो। जैसे,—लाखिराज जमीन।

लाखिराजी
संज्ञा स्त्री० [हिं० लाखिराज + ई (प्रत्य०)] वह भूमि जिसपर कोई लगान न हो।

लाखी (१)
वि० [हिं० लाख + ई (प्रत्य०)] लाख के रंग का। मटमैला लाल।

लाखी (२)
संज्ञा पुं० मटमैला लाल रंग। लाख का सा रंग।

लाखी (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं० लाख] लाख के रंग का घोड़ा।

लाग
संज्ञा स्त्री० [हिं० लगना] १. संपर्क। संबंध। लगाव। ताल्लुक। जैसे,—(क) इन दोनों में कहीं से कोई लाग तो नहीं मालूम होती। (ख) यह डंडा अधर में बेलाग खड़ा है। २. प्रेम। प्रीति। मुहब्बत। ३. लगावट। लगन। मन की तत्परता। उ०—बरणत मान प्रवास पुनि निरखि नेह की लाग।—पद्माकर (शब्द०)। ४. युक्ति। तरकीब। उपाय। ५. वह स्वाँग आदि जिसमें कोई विशेष कौशल हो और जो जल्दी समझ में न आवे। जैसे,—किसी के पेट या गर्दन के आर पार (वास्तव में नहीं, बल्कि केवल कौशल से) तलवार या कटार गई हुई दिखलाना। ६. प्रतिस्पर्धा। प्रतियोगिता। चढ़ा ऊपरी। यौ०—लाग डाँट। ७. बैर। शत्रुता। दुश्मनी। झगड़ा। क्रि० प्र०—मानना।—रखना। ८. जादू। मंत्र। टोना। ९. वह चेप जिससे चेचक का अथवा इसी प्रकार का और टीका लगाया जाता है। १०. वह नियत धन जो विवाह आदि शुभ अवसरों पर ब्राह्मणों, भाटों, नाइयों आदि को अलग अलग रस्मों के संबंध में दिया जाता है। ११. धातु को फूँककर तैयार किया हुआ रस। भस्म। १२. दैनिक भोजन सामग्री। रसद। (बुंदेल०)। १३. भूमिकर। लगान। उ०—अपनी लाग लेहु लेखो करि जो कछु राज अंश को दाम।—सूर (शब्द०)। १४. एक प्रकार का नृत्य। उ०—अरु लाग धाउ रायरंगाल।—केशव (शब्द०)।

लाग पु (२)
क्रि० वि० [हिं० लौं] पर्यंत। तक। उ०—मासेक लागचलत तेहि बाटा। उतरे जाइ समुद्र के घाटा।—जायसी (शब्द०)।

लागडाँट (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० लाग (= वैर) + डाँट] १. शत्रुता। दुश्मनी। बैर। २. प्रतिस्पर्धा। प्रतियोगिता। चढ़ाऊपरी।

लागडाँट (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० लग्नदण्ड] नृत्य की एक क्रिया।

लागत
संज्ञा स्त्री० [हिं० लगना] वह खर्च जो किसी चीज की तैयारी या बनाने में लगे। कोई पदार्थ प्रस्तुत करने में होनेवाला व्यय। जैसे,—(क) इस मकान पर (१०,०००) लागत आई है। (ख) तुम्हारा यह लिहाफ कितनी लागत का है ? (ग) तुमसे हम लागत भर लेंगे, मुनाफा नहीं लेंगे। क्रि० प्र०—आना।—बैठना।—लगाना।

लागना पु (१)
क्रि० अ० [हिं० लगना] दे० 'लगना'।

लागना पु (२)
संज्ञा पुं० [हिं० लगना] १. वह जो किसी की टोह में लगा रहता हो। २. शिकार करनेवाला। अहेरी। उ०— पाँचवँ नग सो तहँ लागना। राजपंखि पेखा गरजना। जायसी (शब्द०)।

लागर
वि० [फ़ा० लाग़र] दुर्बल। क्षीण [को०]।

लागरी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० लाग़री] दुर्बलता। क्षीणता। कमजोरी [को०]।

लागि पु † (१)
अव्य० [हिं० लगना] १. कारण। हेतु। २. निमित्त। लिये। खातिर। वास्ते। उ०—(क) जे देव देवी सेइ अति हित लागि चित सनमानि कै। ते यंत्र मंत्र सिखाय राखत सबनि सो पहिचानि कै।—तुलसी (शब्द०)। (ख) तुमहिं लागि धरिहौं नर देहा।—तुलसी (शब्द०)। ३. से। द्वारा। उ०—आहि जो मारै बिरह कै आगि उठै तेहि लागि। हंस जो रहा सरीर महँ पाँख जरा गा भागि।—जायसी (शब्द०)।

लागि पु (२)
क्रि० वि० [हिं० लग या लौं] तक। पर्यंत। उ०— घन अमराउ लाग चहुँ पासा। उठा भूमि हुत लागि अकासा।—जायसी (शब्द०)।

लागुडिक
वि० [सं०] १. लट्ठबंद। लाठी बाँवे हुए। २. पहरेदार [को०]।

लागू † (१)
वि० [हिं० लगना] १. जो लग सकता हो या लगने योग्य हो। प्रयुक्त होने योग्य। चरितार्थ होनेवाला। जैसे,—वही नियम यहाँ भी लागू है।

लागू (२)
संज्ञा पुं० [सं० लग्नक] प्रेमी। उ०—साँवलिया मेरे मन को लागू नित इत आवै।—घनानंद, पृ० ४८२।

लागे †
अव्य० [हिं० लगना] वास्ते। लिये। उ०—पुत्र शरीर परा तब आगे। रोवत मृषा जीव के लागे।—जायसी (शब्द०)।

लाघरक
संज्ञा पुं० [सं०] हलीमक नामक रोग।

लाघरकोलस
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का पांडु रोग। दे० 'लाघरक' [को०]।

लाघव
संज्ञा पुं० [सं०] १. लघु होने का भाव। लघुता। हलकापन या छोटापन। २. थोड़ा होने का भाव। कमी। अल्पता। ३. हाथ की सफाई। फुर्ती। तेजी। जैसे, हस्तलाघव। ४. नपुंसकता। ५. आरोग्यता। नीरोगता। तंदुरुस्ती। ६. विवेक का अभाव। विवेकहीनता (को०)। ७. महत्वहीनता। कुछ महत्व का न होना (को०)। ८. चपलता। चंचलता। जैसे, बुद्धिलाघव (को०)।

लाघव
अव्य० [सं०] फुरती से। जल्दी से। सहज में। उ०—अति लाघव उठाय धनु लीन्हा।—तुलसी (शब्द०)।

लाघवकारी
वि० [सं० लाघवकारिन्] क्षुद्र। अपमानजनक। अशोभन।

लाघविक
वि० [सं०] लघु। छोटा [को०]।

लाघवी पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० लाघव + ई (प्रत्य०)] फुर्त्ती। शीघ्रता।

लाघवी (२)
संज्ञा पुं० [सं० लाघविन्] जादूगर [को०]।

लाचार (१)
वि० [फ़ा०] १. जिसका कुछ वश न चलता हो। विवश। मजबूर। २. असहाय। अशक्त। दीन दुखी।

लाचार (२)
क्रि० वि० विवश होकर। मजबूर होकर।

लाचारी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] लाचार होने का भाव। मजबूरी। विवशता।

लाची
संज्ञा स्त्री० [हिं० इलायची] दे० 'इलायची'। उ०—करत प्रनामासीस पान लाची त्यों वितरित।—प्रेमघन०, भा० १, पृ० ३३।

लाचीदाना
संज्ञा पुं० [हिं० इलायची + दाना] खाली चीनी की एक प्रकार की मिठाई जो छोटे छोटे गोल दानों के आकार की होती है। कभी कभी इसके अंदर सौंफ या इलायची का दाना भी भरा होता है। इलायची दाना।

लाछन पु
संज्ञा पुं० [सं० लाञ्छन] दे० 'लांछन'।

लाछो पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० लक्ष्मी, प्रा० लच्छि, लछ् छी, बँग० लक्खी (लाखी ?)] लक्ष्मी।

लाज (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० लज्जा] लज्जा। शर्म। हया। क्रि० प्र०—आना।—करना। मुहा०—लाज रखना = प्रतिष्ठा बचाना। आबरू खराब न होने देना। लाज से गठरी होना या गड़ जाना = अत्यंत शर्मिंदा होना। लज्जा के कारण नीचे सिर किए रहना।

लाज (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. खस। उशीर। २. पानी में भीगा हुआ चावल। ३. धान का लावा। खील।

लाजक
संज्ञा पुं० [सं०] धान का भूना हुआ लावा। लाई।

लाजना पु †
क्रि० अ० [हिं० लाज + ना (प्रत्य०)] लज्जित होना। शरमाना। उ०—(क) ये अरुन अधर लखि लखि बिवाफल लाजै।—प्रताप (शब्द०)। (ख) जेहि तुरंग पर राम बिराजे। गति बिलोकि खगनायक लाजे।—तुलसी (शब्द०)।

लाजपेया
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह माँड़ जो खोई या लावा उबालने से निकले। इसका व्यवहार रोगियों को पथ्य देने में होता है।

लाजभक्त
संज्ञा पुं० [सं०] खोई या लावा का पकाया हुआ भात, जो रोगियों को पथ्य में दिया जाता है।

लाजमंड
संज्ञा पुं० [सं० लाजभण्ड] लावा का माँड़। दे० 'लाजपेया' [को०]।

लाजवंत पु
वि० [हिं० लाज + वंत (प्रत्य०)] [वि० स्त्री० लाजवंती] जिसे लज्जा हो। शर्मदार। हयादार। उ०—लाजवंत तब सहज सुभाऊ। निज गुन निज मुख कहसि न काऊ।—मानस, ६।२९।

लाजवंती
संज्ञा स्त्री० [सं० लज्जावती, हिं० लजालू] लजालू नाम का पौधा। छुईमुई।

लाजवर्त
संज्ञा पुं० [फ़ा० लाजवर्द] दे० 'लाजवर्द'। उ०—जनु लाजवर्त शिला जटित चुन्नीन राजी सोहती।—प्रेमघन०, भा० १, पृ० ११७।

लाजवर्द
संज्ञा पुं० [फ़ा०] १. एक प्रकार का प्रसिद्ध कीमती पत्थर जिसे संस्कृत में 'राजवर्तक' कहते हैं। रावटी। विशेष—यह जंगाली रंग का होता है और इसके ऊपर सुनहले छीटे होते है। यह वातज रोगों के लिये बलकारी और उन्माद आदि रोगों में उपकारी माना जाता है। आँखों में सुरमा लगाने के लिये इसकी सलाई भी बनती है जो बहुत अधिक गुणकारी मानी जाती है। २. विलायती नील जो गंधक के मेल से बनता और बहुत बढ़िया होता है।

लाजवर्दी
वि० [फ़ा०] लाजवर्द के रंग का। हलका नीला।

लाजवाब
वि० [फ़ा०] १. जिसके जोड़ का और कोई न हो। अनुपम। बेजोड़। २. जो कुछ जवाब न दे सके। निरुत्तर। चुप। खामोश। क्रि० प्र०—करना।—होना।

लाजशक्त
संज्ञा पुं० [सं०] खोई या लावा का सत्तू।

लाजहोम
संज्ञा पुं० [सं०] प्राचीन काल का एक प्रकार का होम जिसमें खोई या धान का लावा आहुति में दिया जाता था।

लाजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. चावल। २. भूनकर फुलाया हुआ धान। खील। लावा। उ०—अच्छत अंकुर रोचन लाजा। मंजुल मंजरि तुलसि विराजा।—तुलसी (शब्द०)। यौ०—लाजाहुति = विवाह में एक प्रकार का होम जो धान के लावे से होता है। लाजाहोम = लाजहोम।

लाजिक
संज्ञा पुं० [अं०] १. तर्क। २. तर्कशास्त्र।

लाजिम
वि० [अ० लाज़िम] १. जो अवश्य कर्त्तव्य हो। २. उचित। मुनासिब। वाजिब। ३. सबद्ध। लगा हुआ। सटा हुआ (को०)।

लाजिमा
वि० [अ० लाज़िमह्] १. आवश्यक वस्तु। जरूरी सामान। २. अनिवार्य। लाजिमी [को०]।

लाजिमी
वि० [अ० लाज़िम + ई (प्रत्य०)] जो अवश्य कर्तव्य हो। जरूरी। आवश्यक।

लाट (१)
संज्ञा पुं० [अं० लार्ड] १. किसी प्रांत या देश का सबसे बड़ा शासक। गवर्नर।

लाट (२)
संज्ञा पुं० [अं० लाँट] बहुत सी चीजों का वह विभाग या समूह जो एक ही साथ रखा, बेचा या नीलाम किया जाय। यौ०—लाटवंदी।

लाट (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं० लट्ठा ?] लकड़ी, पत्थर या किसी घातु का बना हुआ मोटा और ऊँचा खँभा। जैसे,—अशोक की लाट, कुतुब साहब की लाट, तालाब के बीच में की लाट, कोल्हू के बीच की लाट, आदि।

लाट (४)
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्राचीन देश जहाँ अब भड़ौच, अह- मदाबाद आदि नगर है। गुजरात का एक भाग। २. इस देश के निवासी। ३. एक अनुप्रास जिसमें शब्द ओर अर्थ एक ही होते हैं, पर अन्वय में हेरफेर होने से वाक्यार्थ में भेद हो जाता है। ('शाब्दस्तु लाटानुप्रासी भेदे तात्पर्य मात्रतः।'—मम्मट, काव्यप्रकाश)। ४. वह लंबा बाँध जो किसी मैदान के पानी के बहाव को रोकने के लिये बनाया जाता है। ५. फटा पुराना कपड़ा या गहना (को०)। ६. कपड़ा। वस्त्र (को०)। ७. बालकों जैसी भाषा (को०)। ८. शिक्षित व्यक्ति (को०)।

लाटक
वि० [सं०] [वि० स्त्री० लाटिका] लाट देश संबंधी।

लाटपत्र
संज्ञा पुं० [सं०] दारचीनी।

लाटपर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] दारचीनी।

लाटरी
संज्ञा स्त्री० [अं० लॉटरी] एक प्रकार की योजना जिसका आयोजन विशेषकर किसी सार्वजनिक कार्य के लिये धन एकत्र करने के निमित किया जाता है और जिसमें लोगो को किस्मत आजमाने का मौका मिलता है। विशेष—इसमें एक निश्चित रकम के टिकट बेचे जाते है और यह घोषणा की जाती है कि एकत्र धन में से इतना धन उन लोगों को बाँटा जायगा जिनके नंबर या नाम की चिटें पहले निकलेगी। टिकट लेनेवालों के नाम या नंबर को चिटें किसी संदूक आदि में डाल दी जाती है और कुछ निर्वाचित विशिष्ट व्यक्तियों की उपस्थिति में वे चिटें निकाली जाती हैं। जिनके नाम की चिट सबसे पहले निकलती है, उसे पहला पुरस्कार अर्थात् सबसे बड़ी रकम दी जाती है। इस प्रकार पहले निकलनेवालों में निशिचत धन यथाक्रम बाँट दिया जाता है। इसके लिये सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है।

लाटा †
संज्ञा पुं० [देश०] १. भूने हुए महुओं और तिलों को कूटकर बनाए हुए लड्डू। २. भुना हुआ महुआ।

लाटानुप्रास
संज्ञा पुं० [सं०] वह शब्दालकार जिसमें शब्दों की पुन- रुक्ति तो होती है, परंतु अन्वय में हेरफेर करने से तात्पर्य भिन्न हो जाता है। जैसे,—पीय निकट जाके नहीं, धाम चाँदनी ताहि। पीय निकट जाके, नहीं घाम चाँदनी ताहि। दे० 'लाट (४)—३'।

लाटिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. साहित्य में चार प्रकार की रचनाओं में से एक प्रकार की रचना या रीति जिसमें वैदर्भी और पांचाली दोनों ही रीतियों का कुछ कुछ अनुसरण किया जाता है। इसमें छोटे छोटे पद ओर छोटे छोटे समास हुआ करते हैं। २. एक प्राकृत बोली (को०)।

लाटी † (१)
संज्ञा स्त्री० [अनु० लट लट (=गाढ़ा या चिपचिपा होना)] १. वह अवस्था जिसमें मुँह का थूक और होंठ सूख जाते हैं। उ०—सूखहिं अधर लागि मुँह लाटी। जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी।—तुलसी (शव्द०)। क्रि० प्र०—लगना।

लाटी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. लाटिका रीति। २. एक प्राकृत बोली (को०)।

लाटीय
वि० [सं०] दे० 'लाटक' [को०]।

लाठ † (१)
संज्ञा पुं० [अं० लाट] दे० 'लाट'।

लाठ † (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० लट्ठा] दे० 'लाट'।

लाठी
संज्ञा स्त्री० [सं० यष्ठी, प्रा० लट्ठी] वह लंबी और गोल बड़ी लकड़ी जिसका व्यवहार चलने में सहारे के लिये अथवा मारपीट आदि के लिये होता है। डंडा। लकड़ी। क्रि० प्र०—बाँधना।—मारना।—रखना।—लगाना। मुहा०— लाठी चलना =लाठियों की मारपीट होना। लाठी चलाना =लाठी से मारना। लाठी से मारपीट करना। लाठी बाँधना =लाठी लिए रहना। दंड धारण करना।

लाठी चाज
संज्ञा पुं० [हिं० लाठी + अं० चार्ज] भीड़ को हटाने के लिए पुलिस द्रारा लाठी चलाना।

लाड़
संज्ञा पुं० [सं० लालन] बच्चों का लालन। प्यार। दुलार। क्रि० प्र०—करना।—लड़ाना। यौ०—लाड़चाव।

लाड़लड़ा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का साँप जो प्रायः वृक्षों पर रहा करता है।

लाड़लड़ैता
वि० [हिं० लाड़ + लड़ाना + ऐता (प्रत्य०)] जिसका बहुत अधिक लाड़ हो। प्यारा। दुलारा। उ०—तुम रानी वसुदेव गेहनी हौं गंवारि ब्रजवासी। पठै देहु मेरो लाड़लड़ैतो वारौं ऐसी हाँसी।—सूर (शब्द०)।

लाड़ला
वि० [हिं० लाड़ = ला (प्रत्य०)] [वि० स्त्री० लाड़ली] जिसका लाड़ किया जाय। प्यारा। दुलारा।

लाड़ा †
संज्ञा स्त्री० [हिं० लाड़] [स्त्री० लाड़ी, लाड़ो] वर। दूल्हा।

लाड़िक
संज्ञा पुं० [सं०] १. भृत्य। दास। नौकर। २. लड़का [को०]।

लाड़ू †
संज्ञा पुं० [हिं० लड्डू] १. लड्डू। मोदक। २. दक्षिणी नारंगी।

लाढ़िया
संज्ञा पुं० [देश०] वह दलाल जो दूकानदार से मिला रहता है और ग्राहकों को धोखा देकर उसका माल बिक- वाता है।

लाढ़ियापन
संज्ञा पुं० [हिं० लाढ़िया = पन (प्रत्य०)] १. लाढ़िया का काम। २. धूर्तता। चालाकी। धोखेबाजी।

लात (१)
स्त्री० स्त्री० [देशो लता, लत्तिया ?] १. पैर। पाँव। पद। उ०—तेहि अंगद लात उठाई। गहि पद पटक्यो भूमि भँवाई।—तुलसी (शब्द०)। २. पैर से किया हुआ आघात या वार। पदाघात। पादप्रहार। मुहा०—लात खाना = (१) पैरों कों ठोकर या मार सहना। (२) मार खाना। लात चलाना = लात से मारना। लात से आघात करना। लात जाना = गौ भैस आदि का दूध देते समय दूहनेवाले को लात मारकर दूर हट जाना। बिसुकना। लात मारना = तुच्छ समझकर छोड़ देना। त्याग देना। जैसे,—(क) हम ऐसी दौलत को लात मारते हैं। (ख) तुमने जान बूझकर रोजी को लात मारी है। लात मारकर खड़ा होना = बहुत अधिक रुग्णावस्था से, विशेषतः स्त्रियों का प्रसव के उपरांत, नीरोग होकर चलने फिरने के योग्य होना।

लात (२)
वि० [सं०] गृहीत। प्राप्त [को०]।

लातर † (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० लतरी] पुराना जूता।

लातर † (२)
वि० [देश०] लालची। (बच्चों के लिये प्रयु्क्त)।

लातरी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० लात + री] लतरी। पुराना जूता।

लाति
संज्ञा स्त्री० [सं०] लेना। प्राप्त करना [को०]।

लातीनी
संज्ञा स्त्री० [अ०] रूमियों की प्रचोन भाषा ! लैटिन भाषा [को०]।

लाथ †
संज्ञा पुं० [देश०] व्याज। बहाना।

लाद
संज्ञा स्त्री० [हिं० लादना] १. किसी को बैल या गाड़ी पर रखकर एक स्थान से दूसरे स्थान को ले जाने का कार्य। लादने की क्रिया। यौ०—लाद फाँद = लादने की क्रिया। २. मिट्टी का वह ढोंका जो पानी निकालने की ढेंकी के दूसरी ओर लगा रहता है। ३. पेट। उदर (जिसमें अँतड़ी आदि भरी रहती है)। मुहा०—लाद निकलना = पेट फूलकर आगे निकलना। तोंद निकलना। ४. आँत। अँतड़ी। जैसे,—उसने पेट में ऐसी छुरी मारी कि लाद निकल पड़ी।

लादना
क्रि० स० [सं० लब्ध, प्रा० लद्ध (= प्राप्त) + हिं० ना (प्रत्य०)] १. किसी चीज पर बहुत सी वस्तुएँ रखना। एक पर एक चीजें रखना। जैसे,—गाड़ी पर असबाब लादना। २. गाड़ी या पशु को भार से युक्त करना। ढोने या ले जाने के लिये वस्तुओं को भरना। जैसे,—बैल लादना, गाड़ी लादना। यौ०—लादना फाँदना = लादना और रखना। ३. किसी के ऊपर किसी बात का भार रखना। जैसे,—तुम सब काम मुझ पर ही लादते चले जाते हो। संयो० क्रि०—देना। ४. कुश्ती लड़ते समय विपक्षी को अपनी पीठ या कमर पर उठा लेना। (पहल०)। संयो० क्रि०—लेना।

लादावा
वि० [अ०] जिसका कोई दावा न रह गया हो। जोअधिकार से रहित हो गया हो। जैसे,—उसने अपने लड़के को ला दावा कर दिया है। (कानून)। मुहा०—ला दावा लिखना = यह लिखना कि अमुक वस्तु पर अब हमारा कोई दावा या अधिकार नहीं रह गया। दस्तवरदारी लिखना।

लादिया
संज्ञा पुं० [हिं० लादना + इया (प्रत्य०)] वह जो किसी चीज पर बोझ लादकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाता हो।

लादी
संज्ञा स्त्री० [हिं० लादना] १. कपड़ों की वह गठरी जो घोबी गदहे पर लादता है। २. वह गठरी जो किसी पशु पर लादी जाती है।

लाधना †पु
क्रि० स० [सं० लव्ध, प्रा० लद्ध + हि० ना (प्रत्य०)] प्राप्त करना। हासिल करना। पाना। उ०—(क) इन सम काहु न शिव अबराधे। काहु न इन समान फल लाधे।—तुलसी (शब्द०)। (ख) छिन छिन परसत अंग मिलावत प्रेम प्रगट ह्वै लाधा।—सूर (शब्द०)।

लानंग
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का अंगूर। विशेष—यह कुमाऊँ और देहरादून में अधिकता से होता है। इससे अर्क निकाला जाता है और एक प्रकार की शराब बनाई जाती है।

लान (१)
संज्ञा पुं० [अं० लाँन] हरी घास का बड़ा मैदान जिसपर गेंद आदि खेलते हैं। उ०—कहीं चमन, तो कहीं लान।— प्रेमधन०, भा० २., पृ० १७६।

लान (२)
संज्ञा स्त्री० [अ०] धिक्कार। फटकार [को०]।

लान टेनिस
संज्ञा पुं० [अं०] गेंद का एक खेल जो छोटे से मैदान में खेला जाता है।

लानत
संज्ञा स्त्री० [अ० लअनत, लानत] धिक्कार। फटकार। भर्त्सना। उ०—हजार लानत उस दिल पर जिसमें कि इश्के दिलदार न हो।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २., पृ० ५६९। यौ०—लानत मलामत = धिक्कार और फटकार। जैसे—मामूली बात पर इतनी लानत मलामत, ठीक नहीं। मुहा०—लानत बरसना = लज्जित होना। तिरस्कृत होना। लानत की बौछार = अत्यधिक तिरस्कार। लानत भेजना = ठुकरा देना। धिक्कारना।

लानती
संज्ञा पुं० [हिं० लानत + ई (प्रत्य०)] वह जो सदा लानत मलामत सुनने का अभ्यस्त हो। सदा फिटकार सुननेवाला। वह जो तिरस्कार करने लायक हो।

लाना (१)
क्रि० अ० [हिं० लेना + आना, ले आना] १. कोई चीज उठाकर या अपने साथ लेकर आना। कोई चीज उप जगह पर ले जाना, जहाँ उसे ग्रहण करनेवाला हो; अथवा जहाँ ले जानेवाला रहता हो। ले आना। जैसे,—(क) जरा वह किताब तो लाना। (ख) आप जब जाते हैं, तब कुछ न कुछ लाते हैं। (ग) उनकी स्त्री मैके से बहुत सा धन लाई है । संयो० क्रि०—देना। २. प्रत्यक्ष करना। उपस्थित करना। सामने रखना। जैसे,—(क) अब आप यह नया रंग लाए हैं। (ख) वह जब आता है, तव नया रूप लाता है। (ग) अब वह उनपर मुकदमा लावेगा। ३. उत्पन्न करना। पैदा करना। देना या सामने रखना। जैसे,—इस साल ये पेड़ बहुत फल लाए है।

लाना (२)
क्रि० स० [हि० लाय (= आग) + ना (प्रत्य०)] आग लगाना। जलाना। उ०—(क) कंत वीसलोचन बिलोकिए कुमत फल, ख्याल लंक लाई कपि राँड की सी झोपड़ी।— तुलसी (शब्द०)। (ख) गोपद पयोधि करि होलिका ज्यौ लाय लंक, निपट निशंक पर पुर गलबक भो।—तुलसी (शब्द०)।

लान पु † (३)
क्रि० स० [हिं० लगाना] लगाना। उ०—(क) राम कुचरचा करहिं सब सीतहिं लाइ कलंक।—तुलसी (शब्द०)। (ख) लै परजंक निसंक नवेली को लाय गरे से लगे गहि गूमन।—शंभु (शब्द०)। मुहा०—लाना लगाना या लाने लगाना = ऋण के बदले में कोई पदार्थ दे देना या ले लेना।

लाने पु †
अव्य० [हि० लाना (=लगाना)] वास्ते। लिये। (बुंदेल०)। उ०—तू अलबेली अकली डरै किन, क्यौं डरौं मेरी सहाय के लान। हे सखि संग मनोभव सी भट कान लौं बान सरासन ताने।—पद्माकर (शब्द०)।

लाप
संज्ञा पुं० [सं०] १. संलाप। बोलना। बात करना। २. कलरव। चहचहाना। उ०—लाप के प्रलाप उनमाद के सँताप व्याधि, पापिन की आप नेकु बोगि सुधि लहियौ।—धनानंद, पृ० ५९२।

लापता
वि० [अ० ला (=बिना) + हिं० पता] १. जिसका पता न लगे। जो कहीं मिल न रहा हो। खोया हुआ। २. गुप्त। गायब। क्रि० प्र०—करना।—रहना।—होना।

लापनिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] गपशप। बातचीत। वार्तालाप [को०]।

लापरवा
वि० [अ० ला + फा़० परवाह] [संज्ञा स्त्री० लापरवाई] १. जिसे किसी बात की परवा न हो। बेफिक्र। २. जो सावधानी से न रहता हो। असावधान।

लापरवाह
वि० [फा़०] दे० 'लापरवा'।

लापरवाही
संज्ञा स्त्री० [अ० ला + फा़० परवाह] १. लापरवा होने का भाव। बेफिक्री। २. असावधानी। प्रमाद। क्रि० प्र०—करना।—दिखलाना।—होना।

लापसी †
संज्ञा स्त्री० [सं० लप्सिका] दे० 'लपसी'। उ०—लुचुई ललित लापसी सोहै। स्वादु सुबास सहज मन मोहे।—सूर (शब्द०)।

लापिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की पहेली या बुझौवल [को०]।

लापी
वि० [सं० लापिन्] १. आलापी। बोलनेवाला। २. पछतानेवाला [को०]।

लापु (१)
संज्ञा पुं० [सं० आलाप] दे० 'लाप'। उ०—चित धरि पितु वानी सूरज मानी कर जोरैं करि लापु।—सुजान० पृ० २६।

लापु (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक बनौषधि। रुद्रवंती। रुदंती। २. एक औजार [को०]।

लाप्य
वि० [सं०] कथनीय। कहने योग्य बोलने योग्य [को०]।

लाँब, लाबक
संज्ञा पुं० [सं०] लवा मामक पक्षी जिसका प्राय शिकार करते हैं [को०]।

लाबर पु †
वि० [सं० लपन (=बकना)] दे० 'लबार'। उ०— काल्हि के लाबर बीस बिसे परौं बीस बिसे व्रत ते न टरौं जू—केशव (शब्द०)।

लाबु
संज्ञा पुं० [सं०] लौकी। कद्दू [को०]।

लाबुकायन
संज्ञा पुं० [सं०] जैमिनि द्रारा उल्लिखित एक प्राचीन दार्शनिक विद्धान् [को०]।

लावुकी
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की वीणा [को०]।

लाबू
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'लाबु'।

लाभ
संज्ञा पुं० [सं०] १. मिलना। प्राप्ति। लब्धि। २. फायदा मुनाफा। नफा। ३. उपकार। भलाई। ४. सुख। प्रसन्नत (को०)। ५. विजय। परिग्रहण। वश। पकड़ (को०)। ६. प्रत्यक्ष ज्ञान। अनुभूति (को०)। ७. गड़ा हुआ धन। निखार निधि (को०)। ८. धन संपत्ति (को०)। यौ० —लाभकारी। लाभदायक।

लाभक
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्राप्ति। लब्धि। २. मुनाफा। फायदा नफा [को०]।

लाभकर, लाभकारक
वि० [सं०] जिससे लाभ होता हो। फलदायक लाभदायक। फायदेमंद।

लाभकारी
वि० [सं० लाभकारिन्] [वि० स्त्री० लाभकारिणी] फायदा करनेवाला। गुण करनेवाला। फायदेमंद।

लाभक्षायिक
संज्ञा पुं० [सं०] जैनों के अनुसार वह अनंत लाभ जो समस्त कर्मों का क्षय या नाश हो जाने पर आत्मा की शुद्धता के कारण प्राप्त होता है।

लाभदायक
वि० [सं०] जिससे लाभ हो। गुणकारी। फायदेमंद।

लाभमद
संज्ञा पुं० [सं०] जैनों के अनुसार वह मद जिससे मनुष्य अपने आपको लाभवाला और दूसरे को हीनपुण्य समझे।

लाभलिप्सा
संज्ञा स्त्री [सं०] लाभ की प्रबल तृष्णा [को०]।

लाभलिप्सु
वि० [सं०] १. लालची। लोभी। २. लाभेच्छु। लाभ का इच्छुक [को०]।

लाभस्थान
संज्ञा पुं० [सं०] फलित जयोतिष के अनुसार जन्मकुंडल में लग्न से ग्यारहवाँ स्थान, जिसे देखकर यह निश्र्चय किया जाता है कि धन, संपत्ति, संतान, आयु और विद्या आदि कैसी रहेगी।

लाभांतराय
संज्ञा पुं० [सं० लाभान्तराय] वह अंतराय कर्म जिसके उदय होने से मनुष्य के लाभ में विघ्न पड़ता है।

लाभालाभ
संज्ञा पुं० [सं० लाभ + अलाभ] फायदा और नुकसान। हानि और लाभ।

लाभ्य
वि० [सं०] लाभ के योग्य। प्राप्ति के योग्य [को०]।

लाम (१)
संज्ञा पुं० [फा़० लार्म] १. सेना। फौज। मुहा०—लाम पर जाना = लड़ाई पर जाना। मोर्चें पर जाना। लाम बाँधना = चढ़ाई के लिये सेना तैयार करना। २. बहुत से लोगों का समूह। मुहा०—लाम बाँधना = (१) बहुत से लोगों को एकत्र करता। (२) बहुत सा सामान जमा करना।

लाम † (२)
क्रि० वि० [सं० लम्ब] फासले पर। दूर।

लाम (३)
संज्ञा पुं० [अ०] अरबी का एक अक्षर।

लामकाफ
संज्ञा पुं० [अ० लाम काफ़] गाली गलौज। अपशब्द। उ०—लामकाफ वे कहैं इमान को नाहीं डरते।—पलटू०, पृ० १८।

लामज
संज्ञा पुं० [सं० लामज्जक] एक प्रकार का तृण। विशेष—यह तृण उत्तर प्रदेश, पंजाब और सिंध में प्रायः बारहो महीने पाया जाता है। यह खस की तरह का और कुछ पीले रंग का होता है; इसलिये इसे 'पीलाबाला' भी कहते हैं। इसकी जड़ के पास का भाग मोटा होता है और उसपर रोएँ होते हैं। इसका डंठल सीधा होता है, जिसपर चिकने, पतले और लंबे पत्ते होते हैं। वैद्यक में इसे उत्तेजक, आमदात में पसीना लानेवाला, रुधिर को साफ करनेवाला, अजीर्ण, खाँसी आदि दूर करनेवाला और विशूचिका तथा ज्वर में लाभकारी माना जाता है।

लामज्जक
संज्ञा पुं० [सं०] १. लामज नामक तृण। वि० दे० 'लामज'। २. खस। उशीर।

लामन ‡
संज्ञा पुं० [सं० लम्बन] १. लटकना। झूलना। २. लहँगा। ३. स्त्रियों की साड़ी का निचला भाग।

लामय
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की घास जो प्रायः ऊसर भूमि में पाई जाती है।

लामा (१)
संज्ञा पुं० [ति०] तिब्बत या मंगोलिया के बौद्धों का धर्मा- चार्य, जो अनेक अंशों में उनका राजनीतिक शासक भी होता है। ऐसा धर्माचार्य सदा साधु और विरक्त हुआ करता है और मठों में रहता है।

लामा (२)
संज्ञा पुं० [पेरू देश की भाषा] घास खाने और पागुर करनेवाला एक जंतु जो ऊँट की तरह का होता है। विशेष—आकार में यह जंतु ऊंट से कुछ छोटा होता है और इसकी पीठ पर कूबड़ नहीं होता। यह दक्षिणी अमेरिका में पाया जाता है। यह बहुत चपल, बलवान् और शीघ्रगामी होता है। इसे जब तक हरी घास मिलती है तब तक पानी की कोई आवश्यकता नहीं होती। इसकी सब उँगलियाँ अलग अलग होती हैं और प्रत्येक उँगली में एक छोटा मजबूत खुर होता है। इसके रोएँ बहुत मुलायम होते हैं और इसकी खाल का चरसा बहुत अच्छा होता है; इसीलिये कुत्तों की महायता से इसका शिकारकिया जाता है। जब कोई इसे छेड़ता है तब यह उसपर थूक देता है, जिसका कुछ विपैला प्रभाव होता है। जंगली दशा में इसे 'ग्वाना' और पालतू दशा में 'लामा' कहते हैं।

लामा (३)
वि० [सं० लम्ब] [वि० स्त्री० लामी] दे० 'लंवा'। उ०—(क) ऊधो हरि काहे के अंतर्यामी। अजहुँ न आइ मिलै इहि औसर अवधि बतावत लामी।—सर (शब्द०)। (ख) लामी लूम लसत लपेटि पटकत भट देखो देखो लखन लरनि हनुमान की।— तुलसी (शब्द०)।

लामी
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का फल जो प्रायः बलिश्त डेढ़ बालिश्त लंबा होता है और दिल्ली तथा राजपूताने की ओर पाया जाता है। इसकी तरकारी बनाई जाती है।

लामें ‡
क्रि० वि० [हिं० लाम (=दूर)]। अंतर पर। फासले पर। उ०—बूटी के तार में मिलल? कि तोहें ले गैली। लामें लामें जे बहुत सान बुझावत बाट?।—लेग अली (शब्द०)। यौ०—लामें लामें = दूर दूर से। फासले से।

लाय पु
संज्ञा स्त्री० [सं० अलात, प्रा० अलाय] १. लपट। ज्वाला २. आग। अग्नि। उ०—कबीर चित चंचल किया चहुँ दिसि लागी लाय। हरि सुमिरन हाथें घड़ा लीजे वेगि बुझाय।— कबीर (शब्द०)।

लायक (१)
वि० [अ० लायक्] १. उचित। ठीक। वाजिब। २. उपयुक्त। मुनासिब। जैसे,—लड़के के लायक टोपी चाहिए। उ०— देखि सिवर्हि सुरतिय मुसुकाहीं। बर लायक दुलहिनि जग नाहीं।—तुलसी (शब्द०)। ३. सुयोग्य। गुणवान्। सब बातों में अच्छा। जैसे,—(क) उनके घर के सभी लड़के बहुत लायक हैं। (ख) अब तुम सयाने हुए; कुछ लायक बनो। उ०— सो हम तो सिर बैठन लायक श्रेष्ठ सदा।—गिरधर (शब्द०)। ४. समर्थ। सामर्थ्यवान्। उ०—(क) सब दिन सब लायक भयो गायक रघुनायक गुनग्राम को।—तुलसी (शव्द०)। (ख) बहुनायक हौ सब लायक हौ सब प्यारिन के रस को लहिए।— रघुनाथ (शब्द०)।

लायक पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० लाजा] धान का भूना हुआ लावा। लाजक। उ०—बरषा फल फूलन लायक की। जनु है तरुनी रति नायक की।—केशव (शब्द०)।

लायकी
संज्ञा स्त्री० [अ० लायक + ई (प्रत्य०)] १. लायक होने का भाव या धर्म। २. सुयोग्यता। काबिलियत। जैसे,—यह आपकी लायकी है, जो जाप ऐसा कहते हैं।

लायची
संज्ञा स्त्री० [सं० एला] दे० 'इलायची'।

लायन † (१)
संज्ञा पुं० [हिं० लगाना (= बदले में देना)] वह वस्तु जो नगद रुपए लेकर उसके बदले में किसी के पास रखी या उसे दी जाय। बेची या रेहन रखी हुई चीज।

लायन † (२)
संज्ञा पुं० [देश०] विवाह में कन्या पक्ष की और से वर को मिलनेवाला सामान।

लायल
वि० [अं०] राजभक्त।

लायलटी
संज्ञा स्त्री० [अं०] राजभक्ति।

लार (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० लाला] १. वह पतला लसदार थूक जो कोई बहुत कडु ई खट्टी आदि चीज खाने या मुँह में कोई दवा आदि लगाने पर तार के रूप में निकलता है। मुहा०—मुँह में लार आना = दे० 'मुँह से लार टपकना'। मुँह से लार टपकना = किसी चीज को देखकर उसके पाने की परम लालसा होना। मुँह में पानी भर आना। २. कतार। पंक्ति। ३. लासा। लुआब। उ०—सो मुख चूमनि महरि यशोदा दूघ लार लपटानी हो।—सूर (शब्द०)।

लार (२)
क्रि० वि० [ ? मि० मरा० लैर (= पीछे)] साथ। पीछे। उ०—(क) सत्ती जरि कोइला भई मूए मरे की लार। जउँ वह जरती राम सों साँचे सँग भरतार।—दादू (शब्द०)। (ख) अंधे अंधा मिल चले दादू वाँधि कतार। कूप पड़े हम देखनाँ अंधे अंधा लार।—दादु (शब्द०)। (ग) जो निर्गुण सुमिरन करै दिन में सौ सौ बार। नगर नायका भत करै जरै कौन की लार।—कबीर (शब्द०)। मुहा०—लार लगाना = फँसाना। बझाना। उ०—(क) षट दरसन पाखंड न्यावने भरमि परचो संसार। वेद पुरान सब मिलि गावैं कर्म लगायो लार।—कबीर (शब्द०)। (ख) जन्म जन्म के दूत तिरोवन कोनहिं लार लगाए।—सूर (शब्द०)।

लारी
संज्ञा स्त्री० [अं० लाँरी] यात्रियों के आवागमन के काम आनेवाली बड़ी मोटरगाड़ी। बस [को०]।

लारू पु †
संज्ञा पुं० [हिं० लाड़ू] लड्डू।

लार्ड
संज्ञा पुं० [अं०] १. परमेश्वर। ईश्वर। २. मालिक। स्वामी। ३. भूभ्यधिकारी। जमींदार। ४. इंग्लैड के बड़े बड़े जमीदारों और रईसों आदि को मिलनेवाली कतिपय बड़ी उपाधियों का सुचक शब्द, जो उनके नाम के पहले लगाया जाता है। जैसे,—लार्ड कर्जन, लार्ड रीडिंग।

लार्ड सभा
संज्ञा स्त्री० [अं० हाउस आव लार्डस] ब्रिटिश पार्लमेंट की वह शाखा या सभा जिसमें बड़े बड़े तालुकेदारों और अमीरों के प्रतिनिधि होते हैं। इनकी संख्या लगभग ७०० है। इसे हाउस आव लार्डस् कहते हैं।

लाल (१)
संज्ञा पुं० [सं० लालक] १. छोटा और प्रिय बालक। प्यारा बच्चा। २. बेटा। पुत्र। लड़का। उ०—(क) जसुमति माय लाल अपने को शुभ दिन डोल झुलायो। फगुवा दियो सकल गोपिन को भयो सबन मन भायो।—सूर (शब्द०)। (ख) केहिके अब मैं शरणै जावों। बोलौ लाल बहुत दुख पावों।— विश्राम (शब्द०)। ३. प्रिय व्यक्ति। प्यारा आदमी। उ०— (क) आजु यासों बोलि चालि हँसि खेलि लेहु लाल काल्हि ऐसी ग्वारि लाऊँ काम की कुमारी सी।—केशव (शब्द०)। (ख) बरनत कबि जोहै मुग्धा के भेदन में ललिता ललित सों प्रघट लाल लखि लेहु।—रघुनाथ (शब्द०)। ४. प्रणयी। प्रेमी। उ०—(क देत जताए प्रगट जो जावक लागौ भाल। नव नागरि के नेह सों भले बने हौ लाल।—रसनिधि (शब्द०)। (घ) मेरेई उर गड़ि गए तेरेई द्दग लाल। जनि पतियाउ लखौ इन्है दरपन लैकै लाल।—रसनिधि (शब्द०)।विशेष—इस शब्द का प्रयोग प्रायः कविता और बोलचाल में किसी प्रिय व्यक्ति के लिये संबोधन के रूप में होता है। ४. श्रीकृष्ण चंद्र का एक नाम। उ०—सुमन कुंज विहरत सदा दै गलवाँही माल। वंदौं चरन सरोज नित जुगुल लाडिली लाल।—मन्नालाल (शब्द०)।

लाल (२)
संज्ञा पुं० [सं० लालन] दुलार। लाड़। प्यार। उ०— जो बन सायर मुझते रसिया लाल कराय। अब कबीर पाँजी परे पंथी आवहिं जाय।—कबीर (शब्द०)।

लाल (३)
संज्ञा पुं० [सं० लाला] पतला थूक जो प्रायः बच्चों और वृद्धों के मुँह से बहा करता है। लाला। लार।

लाल पु † (४)
संज्ञा स्त्री० [सं० लालसा] लालसा। इच्छा। अभिलाषा। चाह। उ०—(क) मुभ्र कलाई अति बनी सुभ्रजघ गज चाल। सोरह शृंगार वरन के करहिं देवता लाल।—जायसी (शब्द०) (ख) सुर नर गंध्रव लाल कराहीं। उलटे चलहिं स्वर्ग कहँ जाहीं।—जायसी (शब्द०)।

लाल (५)
संज्ञा पुं० [फा़०] मानिक या माणिक्य नाम का रत्न। विशेष दे० 'मानिक'। उ—(क) कंचन के खंभ मयारि मरुवा- डाँडी खचि हीरा विच लाल प्रबाल।—सूर (शब्द०)। (ख) यह ललित लाल कैधौं लसत दिग्भामिनि के भाल को।— केशव (शब्द०)। (ग) कुंदन सीद यह बाल कौं हीरा लाल लगाइ। रतन जटित की दुति तबै लीला द्दग सरसाइ।— रसनिधि (शब्द०)। (घ) नख नग जाल लाल अंगुलि प्रबाल माल नूपुर मराल ये अनूप रव नाँउड़े।—देव (शब्द०)। मुहा०—लाल उगलना = बहुत अच्छी और प्यारी बातें कहना। मीठी और सुंदर बातें कहना।

लाल (६)
वि० १. मानिक, बीरबहुटी या लहू आदि के रंग का। रक्त वर्ण। सुर्ख। उ०—(क) लोचन लाल विसाल चारु मंदार माल गर।—गोपालचंद्र (शब्द०)। (ख) फूल फूले हैं क्या ही रंगीले। कोई ऊजरो कोई लाल पीले।—सं० शाकुं० (शब्द०)। (ग) कौन दियो यह भाल मैं लाल गुलाब को फूल कहौ कहँ पायौ।—मिश्विमेध (शब्द०)। यौ०—लाल अंगारा या लाल भभूका = जो जलने आदि के कारण अंगारों की तरह लाल रंग का हो गया हो। ताप के कारण बहुत अधिक लाल। लाल बिंब = बहुत अधिक लाल। २. जिसका चेहरा क्रोघ के मारे तमतमा गया हो। जिसके चेहरे से गुस्सा मालूम होता हो। बहुत अधिक कुद्ध। जैसे,—बातों बातों में लाल क्यों होते हो ? मुहा०—लाल आँखें निकालना या दिखाना = क्रोघ से आँखें लाल करना। गुस्से से देखना। लाल पड़ना या होना = क्रुद्ध होना। नाराज होना। उ०—दशरथ लाल ह्वै कराल कछु लाल परि, भाषत भयोई नेनु रावणै न गनहौं।—पद्माकर (शब्द०)। लाल पीले होना = गुस्सा होना। क्रोध करना। उ०—हैं हैं ! एक बारगी इतने लाल पीले हो गए।—हरिश्चंद्र (शब्द०)। लाल हो जाना = क्रोध में भर जाना। गुस्से में होना। लाल होना = क्रुद्ध होना। नाराज होना। ३. (चौसर के खेल में गोटी) जो चारो ओर से घूमकर बिलकुल बीच के खाने में पहुँच गई हो, और जिसके लिये कोई चाल बाकी न रह गई हो। ४. (चौसर के खेल में खिलाड़ी) जिसकी सब गोटियाँ बीच के घर में पहुँच गई हों और जिसे कोई चाल चलना बाकी न रह गया हो। (ऐसा खिलाड़ी जीता हुआ समझा जाता है।) ५. जो खेल में औरों से पहले जीत गया हो (खेलाड़ी)। मुहा०—लाल होना = (१) बहुत अधिक संपत्ति पाकर संपन्न होना। निहाल होना। जैसे, उस मकान में गड़ा हुआ खजाना पाकर वह लाल हो गया। (२) चौसर आदि के खेल में जीत जाना।

लाल (७)
संज्ञा पुं० एक प्रसिद्ध छोटी चिड़िया। लालमुनी। रायमुनी। उ०—(क) तूती लाल कर करे सारस झगर तोते तीतर तुरमनी बटेर गाहियत हैं।—रघुनाथ (शब्द०)। (ख) लालन को पिंजरा कर लाल लिए प्रति कुंजन कुंजन ज्वै रहे।—जसवंत (शब्द०)। विशेष—इसका शरीर कुछ भूरापन लिए लाल रंग का होता है और जिसपर छोटी छोटा सफेद बुंदकियाँ पड़ी रहती है। यह बहुत कोमल और चंचल होता है और इसकी बोली बहुत प्यारी होती है। लोग इसे प्रायः पालते है। इसकी मादा को 'मुनियाँ' कहते हैं। २. चौपायों के मुँह का एक रोग।

लाल अंबारी
संज्ञा स्त्री० [हिं० लाल + अंबारी] एक प्रकार का पटुआ जिसके बीज दवा में काम आते हैं। २. पटसन की जाति का एक प्रकार का पौधा जिसे पटवा भी कहते हैं। विशेष दे० 'पटवा'।

लाल अगिन
संज्ञा पुं० [हिं० लाल + अगिन] प्रायः एक बालिश्त लंबा भूरे रंग का एक प्रकार का अगिन पक्षी। विशेष—इस पक्षी का गला नीचे की ओर सफेद होता है। यह मघ्य भारत तथा उड़ीसा में अधिकता से पाया जाता है; और घास फूस से प्याले के आकार का घोंसला बनाकर उसमें चार तक अंडे देता है।

लाल आलू
संज्ञा पुं० [हिं० लाल + आलू] १. रतालू। २. अरुई।

लाल हलायची
संज्ञा स्त्री० [हिं० लाल + इलायची] बड़ी इलायची। विशेष दे० 'इलायची'।

लालक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] विदूषक [को०]।

लालक (२)
वि० [सं०] लाड़ प्यार करनेवाला [को०]।

लाल कच्चू
संज्ञा पुं० [हिं० लाल + कच्चू] गजकर्ण आलू। बंड़ा।

लाल कलमी
संज्ञा पुं० [हिं० लाल + कलमी] चाँदनी या गुल- चाँदनी नाम का पौधा या उसका फूल।

लालकीन
संज्ञा पुं० [चीनी० नानकिङ्] एक प्रकार का वस्त्र। विशेष दे० 'नानकीन'।

लाल घास
संज्ञा स्त्री० [हिं० लाल + घास] गोमूत्र नामक तृण।

लाल चंदन
संज्ञा पुं० [हिं० लाल = चंदन] एक प्रकार का चंदन। रक्त चंदन। देवी चंदन।विशेष—लाल चंदन का पेड़ कद में छोटा होता है और यह मैसूर प्रांत तया अरकाट में बहुतायत से पाया जाता है। इसके ऊपर की लकड़ी सफेद और हीर की लकड़ी कुछ कालापन लिए लाल होती है। इसे घिसने से बहुत ही लाल रंग और अच्छी सुगंध निकलती है। यह भी चंदन की तरह माथे पर लगाया जाता हौ। विशेष दे० 'चंदन'।

लालच
संज्ञा पुं० [सं० लालसा] [वि० लालची] कोई पदार्थ, विशेषतः धन आदि प्राप्त करने की इतनी अधिक और ऐसी कामना जो कुछ भद्दी और बेढंगी हो। कोई चीज पाने की बहुत बुरी तरह इच्छा करना। लोभ। लोलुपता। जैसे,—हर काम में बहुत ज्यादा लालच करना ठीक नहीं है। कि० प्र०—आना।—करना।—छाना।—पकड़ना।—बढ़ना।— मरना ।—होना। मुहा०—लालच देना = किसी के मन में लालच उत्पन्न करना। जैसे,—उसने लड़के को मिठाई का लालच देकर उसके सब गहने ले लिए।

लाल चकवी
संज्ञा पुं० [सं० लालिक] भैंसा। (डिं०)।

लालचहा †
वि० [हिं० लालच + हा (प्रत्य०)] जिसे बहुत अधिक लालच हो। लालची। लोभी। उ०—घुघुरुन को सोर सुने सकुचै पिय होत ज्यौं ज्यौं अति लालचहा।—मन्नालाला (शब्द०)।

लालचाँच
संज्ञा पुं० [हिं० लाल + चोंच] शुक। तोता। (डिं०)।

लालची
वि० [हिं० लालच + ई (प्रत्य०)] जिसे बहुत अधिक लालच हो। लोभी।

लाल चीता
संज्ञा पुं० [हिं० लाल + चीता] लाल फूल का चित्रक या चीता। विशेष दे० 'चीता'।

लाल चीनी
संज्ञा पुं०[हिं० लाल + चीनी] एक प्रकार का कबूतर, जिसका सारा शरीर सफेद और सिर पर लाल छिटकियाँ होती हैं।

लालटेन
संज्ञा स्त्री० [अं० लैटर्नं] किसी प्रकार का वह खाना आदि जिसमें तेल का खजाना और जलाने के लिये बती लगी रहती है; और जिसके चारों ओर, तेज हवा और पानी आदि से बचाने के लिये शीशा या इसी प्रकार का और कोई पारदर्शी पदार्थ लगा रहता है। कंडील। विशेष—इसका व्यवहार प्रकाश के लिये ऐसे स्थानों पर होता है, जहाँ या तो प्रकाश को प्रायः एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने की अवश्यकता होती है और या ऐसी जगह स्थायी रूप से रखने के लिये होता है, जहाँ चारों ओर से हवा आया करती हो।

लामड़ी
संज्ञा पुं० [हिं० लाल (=रत्न) + ड़ी (प्रत्य०)] लाल रंग का एक प्रकार का नगीना जो प्रायः नथों और वालियों आदि में मोती के दोनों ओर लगाया जाता है।

लाल दाना
संज्ञा पुं० [हिं० लाल + दाना] लाल रंग का पोस्ते का दाना। लाल खसखस। (पूरब)।

लालन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. अत्यंत स्नेह करना। प्रेंमपूर्वक बालकों का आदर करना। लाड़। प्यार। यौ०—लालन पालन। ३. एक प्रकार का चूहा जो विपैला होता है (को०)।

लालन (२)
संज्ञा पुं० [हिं० लाला] १. प्रिय पुत्र। प्यारा बच्चा। उ०—भूख लगी ह्वै है लालन के लावो वेगि बुलाई।—सूर (शब्द०)। २. कुमार। बालक। उ०—भाल के लाल में बाल बिलोकत ही भरि लालन लोचन लीन्हे।—केशव (शब्द०) दे० 'लाल'।

लालन (३)
क्रि० अ० लाड़ करना। प्यार करना। उ०—लालन जोग लखन लघु लोने। भेन भाइ आस अहहि न होने।—तुलसी (शब्द०)।

लालन (४)
वि० [सं०] प्यार करनेवाला। दूलार करनेवाला [को०]।

लालन † (५)
संज्ञा स्त्री० [देश०] चिरौंजी। प्रियाल।

लालना पु
क्रि० स० [सं० लालन] दुलार करना। लाड़ करना। प्यार करना। उ०—(क) चाहि चुचुकारि चूमि लालन लावत उर तैसे फल पावत जैसे सुबीज बए हैं।—तुलसी (शब्द०)। (ख) कल्पवेलि जिमि बहुबिधि लाली। सींचि सनेह सलित प्रतिपाली।—तुलसी (शब्द०)।

लालनीय
वि० [सं०] लालन करने योग्य। दुलार या प्यार करने लायक।

लालपरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० लाल + परी] शराब। मदिरा।

लालपानी
संज्ञा पुं० [हिं० लाल + पानी] शराब। मद्य।

लाल पिलका
संज्ञा पुं० [हिं० लाल + पिलका] लाल रंग का एक प्रकार का कबूतर जिसकी दुप और डैने सफेद होते हैं।

लालपेठा
संज्ञा पुं० [हिं लाल + पेठा] कुम्हडा़।

लाल बुझक्कड़
संज्ञा पुं० [हिं० लाल + बूझना] बातों का अटकल- पच्चू मतलब लगानेवाला। वह जो कोई बात जानता तो ना हो, पर यों ही अंदाज हो। (व्यंग्य)।

लालवेग
संज्ञा पुं० [हिं० लाल + तु० वेग] १. लाल रंग का एक प्रकार का परदार कीड़ा। २. मुसलमान भंगियों और मेहतरों के एक कल्पित पीर का नाम।

लालवेगी
संज्ञा पुं० [हिं० लालवेग + ई (प्रत्य०)] वह जो लालबेग का अनुयायी हो। भंगी। मेहतर।

लालभरेंडा
संज्ञ पुं० [हिं० लाल + भरेंड़ा ?] एक प्रकार का छोटा झाड़। उँदरवीबी। विशेष—यह झाड़ भारत के गरम प्रांतों में उत्पन्न होता है। इसके बीजों में से तेल निकलता है, जो गठिया के रोग में काम आता है। इसको उँदरवीबी भी कहते हैं।

लालमन
संज्ञा पुं० [हिं० लाल + मणि] १. श्रीकृष्ण। उ०— कीन्हे चरित लालमन जोई। सुमिरि सुमिरि अब आवत रोई।—विश्राम (शब्द०)। २. एक प्रकार का तोता जिसका सारा शरीर लाल, डैने हरे, चोंच गुलाबी और दुम काली होती है।

लालमिर्च
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'मिर्च'—२।

लालमी
संज्ञा पुं० [देश०] खरबूजा।

लालमुहाँ
संज्ञा पुं० [हिं० लाल + मुँह] एक प्रकार का निनावाँ जिसमें मुँह के अंदर छाले पड़ जाते है और उसका रंग लाल हो जाता है।

लालमुनी
संज्ञा पुं० [हिं०] लाल पक्षी। विशेष दे० 'लाल'। उ०— ते अपने अपने मिलि निकसी भाँति भली। मनु लाल मुनिन की पाँति पिंजर दूरि चली।—सूर (शब्द०)।

लालमुरगा
संज्ञा पुं० [हिं० लाल + मुरगा] १. एक प्रकार का पक्षी जिसका शिकार किया जाता है। यह दो फुट से अधिक लंबा होता है। २. मयूरशिखा। ३. गुल मखमली नामक पौधा।

लालमूली
संज्ञा स्त्री० [हिं० लाल + मूली] शलजम। सलगम।

लालरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० लाल + री] दे० 'लालड़ी'। उ०—(क) छबि होती भली गजमोती के बीच जौ होती बड़ी बड़ी लालरिया।—रसकुसुमाकर (शब्द०)। (ख) लाल की बेंदुली लालरी की लरिया जुत आइ निछाबरि कीने।—भिखारी ग्र०, भा० १, पृ० ९८।

लाललाडू
संज्ञा पुं० [हिं० लाल + लाडू (=लड्डू)] दक्षिण भारत मे होनेवाली एक प्रकार की नारंगी।

लालशक्कर
संज्ञा स्त्री० [हिं० लाल + शक्कर] बिना साफ की हुई चीनी। खाँड़।

लालस (१)
वि० [सं०] १. चंचल। २. लोलुप। ३. किसी वस्तु की तीव्र कामनावाला। ४. लीन। तल्लीन [को०]।

लालस (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. लालसा। उ०—लालस चिंता गुन कथन स्मृति उद्वेग प्रलाप।—भिखारी ग्रं०, भा० १, पृ० १५५। २. तल्लीनता [को०]।

लालसक
वि० [सं०] दे० 'लालस' [को०]।

लालसफरी
संज्ञा पुं० [हिं० लाल + सफरी ?] अमरूद।

लालसमुद्र
संज्ञा पुं० [हिं० लाल + समुद्र] दे० 'लालसागर'।

लालसर
संज्ञा पुं० [हिं० लाल + सर] एक प्रकार का पक्षी जिसकी गरदन और सिर लाल रंग का होता है, छाती चितकबरी और पीठ काली होती है तथा डैना सुनहरे रंग का होता है।

लालसा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. किसी पदार्थ को प्राप्त करने की बहुत अधिक उत्कंठा या अभिलाषा। बहुत अधिक इच्छा या चाह। लिप्सा। उ०—एक लालसा बड़ि उर माँही। सुगम अगम सुजात कहि नाहीं।—तुलसी (शब्द०)। २. उत्सुकता। ३. वह अभिलाषा जो गर्भिणी स्त्री के मन में गर्भावस्था में उत्पन्न होती है। दोहद। विशेष दे० 'दोहद'। ४. किसी से कुछ माँगना या चाहना। ५. दुःख। अनुताप। खेद (को०)। ६. एक छंद का नाम (को०)।

लालसा
वि० लोल। चंचल।

लालसाग
संज्ञा पुं० [हिं० लाल + साग] मरसा नाम का साग।

लालसागर
संज्ञा पुं० [हिं० लाल + सागर] भारतीय महासागर का वह अंश जो अरब और अफ्रिका के मध्य में पड़ता है, और जो बाव एल मंदव से स्वेज तक फैला हुआ है। लाल समुद्र। रेड सी (अं०)। विशेष—यह सागर प्रायः १४०० मील लंबा है और इसकी अधिक से अधिक चौड़ाई २३० मील है। इसके किनारों पर बहुत से छोटे छोटे टापु और प्रवालद्रीप हैं, जिनके कारण जहाजों को इसमें से होकर आने जाने में बहुत कठिनता होती है। पहले यह भूमध्यसागर से अलग था; पर स्वेज की नहर खुद जाने से यह उससे मिल गया है। इसके पानी में कुछ ललाई झलकती है; इसी से इसे लाल सागर कहते हैं।

लाससिखा †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'लालशिखी'।

लालशिखी †
संज्ञा पुं [हिं० लाल + शिखा] अरुणचूड़। मुर्गा। उ०—प्रात उठी रतिमान भटू धुनि लालसिखी की हिये खटकी है।—मन्नालाल (शब्द०)।

लालसिरा
संज्ञा स्त्री० [हिं० लाल + सिरा (=सिर)] एक प्रकार की बत्तख जिसका सिर लाल होता है।

लालसी पु
वि [सं० लालसा + ई (प्रत्य०)] अभिलाषा करनेवाला। इच्छा करनेवाला। उत्सुक। उ०—सो हरि के पद के हम लालसी माया कि है न जहाँ प्रभुताई।—रघुराज (शब्द०)।

लालसीक
संज्ञा पुं० [सं०] १. गिलगिला। पिच्छिल। २. रसयुक्त वस्तु। सूप। शोरबा (को०)।

लाला (१)
संज्ञा पुं० [सं० लालक] १. एक प्रकार का संबोधन जिसका व्यवहार किसी का नाम लेते समय उसके प्रति आदर दिखलाने के लिये किया जाता है। महाशय। साहब। जैसे,—लाला गुरदयाल आज यहाँ आनेवाले हैं। विशेष—इस शब्द का व्यवहार प्रायः पश्चिम में खत्रियों, और बनियों आदि के लिये अधिकता से होता है। मुहा०—लाला भइया करना = किसी को आदरपूर्वक संबोधन करना। इज्जत के साथ बातचीत करना। २. कायस्थ जाति या कायस्थों का सूचक एक शब्द। यौ०—लाला भाई = कायस्थ। ३. छोटे प्रिय बच्चे के लिये संबोधन। प्रिय व्यक्ति, विशेषतः बालक। उ०—आनँद की निधि मुख लाला को, ताहि निरखि निसिवासर सो तो छबि क्योंहूँ न जाति बखानी।—सूर (शब्द०)।

लाला (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] मुँह से निकलनेवाली लार। थूक।

लाला (३)
संज्ञा पुं० [फा़०] पोस्ते का लाल रंग का फूल जिसमें प्रायः काली खसखस पैदा होती है। गुले लाला। उ०—कोऊ कहै गुल लाला गुलाल की कोऊ कहै रँग रोरी के आब की।—द्रिज (शब्द०)।

लाल (४)
वि० [हिं० लाल] लाल रंग का। विशेष दे० 'लाल'। उ०— (क) पारथ भयो विलोचन लाला। लाखि अनर्थक धर्म भुवाला।—सबल (शब्द०)। (ख) केकी के काकी कका कोक कीकका कोक। लोल लालि लोलै लली लाला लीला लोल।—केशव (शब्द०)।

लाला (५)
संज्ञा पुं० [सं० लाला या लालायित] १. दे० 'लाले'। २. संकट। आफत।

लालाक्लिन्न
वि० [सं०] लार से भीगा हुआ [को०]।

लालाटिक (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री लालाटिकी] ललाट संबंधी। २. भाग्याधीन। ३. निम्न। नीच। निकम्मा। बेकार। ४. सावधान। दत्तचित्त [को०]।

लालाटिक (२)
संज्ञा पुं० १. स्वामी के कार्य में दतचित्त सेवक। २. बेकार या बेपरवाह व्यक्ति। ३. एक प्रकार का आलिंगन [को०]।

लालाटी
संज्ञा स्त्री० [सं०] ललाट [को०]।

लालाध
संज्ञा पुं० [सं०] गश। मूर्छा [को०]।

लालापान
संज्ञा पुं० [सं०] (बच्चों द्रारा) अपना अँगूठा चूसना [को०]।

लालाप्रमेह
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का प्रमेह जिसमें मुँह की लार की तरह तार बँधकर पेशाब होता है।

लालाभक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार एक नरक का नाम। विशेष—कहते हैं, जो लोग बिना देवताओं आदि को भोग लगाए अथवा बिना अतिथियों को भोजन कराए आफ भोजन कर लेते हैं, वे इसी नरक में जाते हैं।

लालामेह
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'लालाप्रमेह'।

लालायित
वि० [सं०] १. जिसके मुँह में बहुत अधिक लालच के कारण पानी भर आया हो। ललचाया हुआ। २. जिसका बहुत अधिक लालन किया गया हो। दुलारा।

लालालु
वि० [सं०] दे० 'लालायित'।

लालाविष
संज्ञा पुं० [सं०] वह जंतु जिसके मुँह की लार में विष हो। जैसे,—मकड़ी आदि।

लालासव
संज्ञा स्त्री० [सं० लालास्त्रव] मकडी़। (डिं०)।

लालास्राव
संज्ञा पुं० [सं०] १. गुँह से लार बहना। २. मकड़ी।

लालास्राव
संज्ञा पुं० [सं०] १. मुँह से थूक या लार गिरना। २. मकड़ी का जाला।

लालिक
संज्ञा पुं० [सं०] भैंसा। महिष।

लालिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] विनोदपूर्ण उत्तर [को०]।

लालित (१)
वि० [सं०] १. जिसका लालन किया गया हो। दुआरा हुआ। लड़ाया हुआ। प्रिय। प्यारा। २. जो पाला पोसा गया हो। उ०—मुझसे ही विद्रोह कर चले मेरे ये लालित इंद्रियगण।—प्रपलक, पृ० ७७।

लालित (२)
संज्ञा पुं० १. प्रसन्नता। आनंद। २. प्रेम। प्रियता। दुलार [को०]।

लालितक
संज्ञा पुं० [सं०] प्रिय या दुलारा व्यक्ति [को०]।

लालित्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. ललित होने का भाव। सौंदर्य। सुंदरता। सरसता। मनोहरता। जैसे,—आपकी भाषा में बहुत अधिक लालित्य होता है। २. शृंगारिक चेष्टा। हाव भाव। विभ्रम (को०)।

लालिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुंश्चली या कामुक स्त्री। दुश्चरित्रा ओरत।

लालिमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] लाली। ललाई। अरुणता। सुर्खो।

लाली (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० लाल + ई (प्रत्य०)] १. लाल होने का भाव। अरुणता। लालपन। सुर्खी। २. इज्जत। पत। आबरू। जैसे,—(क) आज आपकी ही कृपा से उनकी लाली रह गई। (ख) मेरी लाली तुम्हारे हाथ है। विशेष—कभी कभी खाली 'लाली' और कभी कभी 'मुँह की लाली' भी बोलते हैं। ३. पीसी हुई ईटें जो चूने में मिलाई जाती हैं। सुरखी।

लाली (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] आसाम की एक नदी का नाम।

लाली (३)
संज्ञा स्त्री [सं० लालिन्] वह व्यक्ति जो स्त्रियों को बहकाकर कुमार्ग की ओर प्रवृत्त करना हो।

लाली (४)
वि० दुलार करनेवाला। प्यार करनेवाला [को०]।

लाली (५)
संज्ञा स्त्री० [सं०] भूत प्रेत आदि से आविष्ट होना [को०]।

लालील
संज्ञा पुं० [सं०] अग्नि। आग।

लालुका
संज्ञा स्त्री० [सं०] गले में पहनने का एक प्रकार का हार।

लाले
संज्ञा पुं० [सं० लाला या लालायित] लालासा। अभिलाषा। इच्छा। अरमान। जैसे,—हमें तो आपके देखने के ही लाले है। मुहा०—किसी चीज के लाले पड़ना = किसी चीज के देखने या पाने के लिये बहूत तरसना। किसी चीज के अप्राप्य या पहुँच के बाहर होने के कारण बहुत अधिक लालायित होना। २. आफत। विपत। संकट। विशेष—इस शब्द का प्रयोग सदा बहुवचन में होता है।

लालो पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'लाले'।

लालोलाल
वि० [हिं० लाल + लाल] आनंदमग्न। मस्त। सुर्खरू। उ०—रामसिंह गाडी़ ले जाते थे, माल अधिक बिकता था। आजकल लालोलाल हैं।—काले०, पृ० २१।

लाल्य
वि० [सं०] लालन करने योग्य। दुलार करने लायक।

लाल्हा †
संज्ञा पुं० [हिं० लाल साग (=मरसा)] मरसा नामक साग। उ०—चौलाई लाल्हा अरु पोई। मध्य मेलि निवुआनि निचोई।—सूर (शब्द०)।

लाव (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. लवा नामक पक्षी। विशेष दे० 'लवा'। २. लौंग। ३. काटना या खंडित करना।

लाव (२)
वि० १. काटनेवाला। खंडित करनेवाला। २. अवचयन करने- बाला। चयनकर्ता। एकत्र करनेवाला। ३. नष्ट भ्रष्ट या विध्वस्त करनेवाला [को०]।

लाव † पु (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं० लाय (=आग)] १. अग्नि। आग। आँच। २. लौ। लगन।

लाव (४)
संज्ञा स्त्री० [देश० या सं० रज्जु] १. वह मोटा रस्सा जिससे चरसा खींचत या इसी प्रकार का और कोई काम करते हैं। रस्सा। लास। मुहा०—लाव चलाना = चरसे के द्रारा कूएँ से पानी खींचकर खेत सींचना।२. रस्सी। डोरी। रज्जु। उ०—फिरि फिरि चितउत ही रहतु टुटी लाज की लाव। अंग अंग छबि झौर में भयौ भौर की नाव।—बिहारी (शब्द०)। ३. उतनी भूमि जितनी एक दिन में एक चरसे से सींची जा सके।

लाव (५)
संज्ञा पुं० [हिं० लगाना] वह ऋण जो किसी की चीज अपने पास बंधक रखकर उसे दिया जाय। मुहा०—लाव उठाना = (१) चीज बंधक रखकर रुपया उधार देना। (२) किसानों को उनके कष्ट के समय ऋणस्वरूप धन देना। तकावी बाँटना।

लावक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. लवा पक्षी। उ०—तीतर लावक पदचर जूया। बरनिन जाइ मनोज वरूथा।—तुलसी (शब्द०)। २. काटने या खंड करनेवाला व्यक्ति (को०)। ३. वह जो अवचयन करे। काटकर इकट्ठा करनेवाला। कटैया (को०)।

लावक (२)
संज्ञा पुं० [देश०] १. चावल की जाड़े की फसल। २. चरसा। ३. मीट खींचने में बैलों के एक बार जाने और आने का काल।

लावज (१)
संज्ञा पुं० [सं०] बहुत प्राचीन काल का एक प्रकार का बाजा जिसपर चमड़ा मढ़ा हुआ होता था।

लावज (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सुंघनी। नस्य। २. लवणसमुद्र।

लावण
वि० [सं०] १. जिसका संस्कार लवण द्रारा हुआ हो। २. लवण का। नमकीन। उ०—लावण लाँडु अरी पकवाँन। सेना सहित राज जीमीयौ।—बी० रासो, पृ० १११।

लावणसैंधव
वि० [सं० लावण सैन्धव] समुद्रतट पर स्थित [को०]।

लावणा
संज्ञा पुं० [देश०] वैश्यों की एक जाति।

लावणिक (१)
वि० [सं०] १. जिसका लवण द्रारा संस्कार हुआ हो। २. लवण संबंधी। नमक का। ३. लावण्ययुक्त। मनोहर। सुंदर (को०)।

लावणिक (२)
संज्ञा पुं० १. वह जो नमक बेचता हो। २. नमक का सौदागर। ३. वह पात्र जिसमें नमक रखा जाता है। नमकदान।

लावण्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. लवण का भाव या धर्म। नमकपन। २. अत्यंत सुंदरता। नमक। लोनाई। उ०—जटा मुकुट सुरसरित सिर लोचन नलिन विशाल। नीलकंठ लावण्य निधि सोह बालविधु भाल।—तुलसी (शब्द०)। ३. शील की उत्तमता। स्वभाव का अच्छापन। यौ०—लावण्यकलित = रूपसंपन्न। सौंदर्ययुक्त। लावणकांति = सौंदर्य की दीप्ति वा प्रभा। लावण्यनिधि = सौंदर्य वा शोभ के समुद्र वा खजाना। लावण्यमय = सौंदर्ययुक्त। प्रिय। सुंदर लावण्यलक्ष्मी, लावण्यश्री = अत्यंत शोभा। आतिशय सौंदय।

लावण्यवान्
वि० [सं० लावण्यवत्] सौंदर्यंयुक्त। प्रिय। सुंदर [को०]।

लावण्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] ब्राह्मी नाम की बूटी।

लावण्यार्जित (१)
संज्ञा पुं० [सं०] स्त्रोधन। वह धन जो विवाहित स्त्री को सास, ससुर आदि से प्राप्त हो [को०]।

लावण्यार्जित (२)
वि० सुंदरता के कारण प्राप्त। लोनाई के माघ्यम से अर्जित।

लावदार (१)
वि० [हिं० लाव (=आग) + फा़० दार (प्रत्य०)] (तोप) जो छोड़ी जाने या रंजक देने के लिये तैयार हो। उ०—लावदार रक्खो किएँ सवै अराबौ एहु। ज्यौं हरिफ आवै नजरि तवै धड़ाधड़ देहू।—सूदन (शब्द०)।

लावदार (२)
संज्ञा पुं० तोप में बत्ती लगानेवाला। तोप छोड़नेवाला। तोपची। उ०—किते जजालदार आवदार लावदार हौ। कितो निसानवान सान के भरे तैयार हौ।—सूदन (शब्द०)।

लावन †
संज्ञा पुं० [हिं० लाव (=अग्नि)] जलाने के काम आनेवाले पदार्थ। ईंधन। जैसे लकड़ी, कौयला आदि।

लावनता पु
संज्ञा स्त्री० [सं० लावण्य + ता (प्रत्य०)] बहुत अधिक सौंदर्य। सुंदरता। खुबसूरती। नमक। उ०—तुलसी तेहि अवसर लावनता दसचारि नव तीनि एकीस सबै।—तुलसी (शब्द०)।

लावना (१)—पु †
क्रि० स० [हिं० लाना] । उ०—(क) विप्र कह्मौ धन लावनो करन सुता को ब्याह। यहि थल चोर चुराय लिए भयो भोर दुख दाह।—रघुराज (शब्द०)। (ख) जाहि अधप पापी हम चीन्हा। तेहि तब ढिग लावन मन कीन्हा। विश्राश्र (शब्द०)। (ग) कीन्हेसि मधु लावइ लेइ माखी। कीन्हेसि भँवर पंखि अरु पाँखी।—जायसी (शब्द०)।

लावना
क्रि० स० [हिं० लगाना] १. लगाना। स्पर्श कराना। उ०—(क) लावत मैन सुगध लख्यौ सब सौरभ की तन देत दसी है।—रघुनाथ (शब्द०)। (ख) तुलसिदास कह रूप देखावहु। मेरे शीश पानि निज लावहु।—रघुराज (शब्द०)। (ग) मेरे अंग सहत सुगंध सो सही है सदा लाबन न देन और ऐसे हैं सुधर्मी।—रघुनाथ (शब्द०)। (घ) सो मोहि लेइ मँगावई लावइ भूख पिआस। जउँन होत अस बइरी केहि काहू कर आस।—जायसी (शब्द०)। २. जलाना। आग लगाना। उ०—बहुरि इंद्रजित ब्रह्मअस्त्रकृत हनुमत बंधन गायो। सभागमन रावण समुझावन लावन लक गनायो।—रघुराज (शब्द०)।

लावनि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० लावण्य] सौंदर्य। लावण्य। सुंदरता। नमक। उ०—(क) कोट काम लावनि बिहारी जा देखत सब दुख नसंत।—स्वामी हरिदास (शब्द०)। (ख) सुंदर मुख की बलि बलि जाऊँ। लावनि निधि गुणनिधि सोभानधि निरखि निरखि जीवत सब गाऊँ।—सूर (शब्द०)।

लावनि (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'लावनी'।

लावनिता पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० लखनि (=लावण्य) + ता (प्रत्य०)] दे० 'लावनता'।

लावनी
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. गाने का एक प्रकार का छंद। २. इस छंद का एक प्रकार जो प्रायः चंग बजाकर गाया जाता है। इसे ख्याल भी कहते हैं। ३. इस प्रकार का कोई गीत।

लावनीबाज
संज्ञा पुं० [हिं० लावनी + फा़० बाज] लावनी गाने या रचनेवाला। लावनी का प्रेमी।

लावन्य पु
संज्ञा पुं० [सं० लावण्य] दे० 'लावण्य'। उ०—कृस्ननाम लावन्य भरचो है। मधुरिम सार सकेलि घरचौ है।—घनानंद, पृ० २५१।

लावबाली (१)
संज्ञा पुं० [अ० लाउवाली] १. वह जिसे किसी प्रकार की चिंता आदि न हो। लापरवाह। बेफिक्र। २. वह जिसके विचार, धार्मिक द्दष्टि से, बहुत ही स्वतंत्र और उच्छूंखल हों। ३. वह जो सदा निकम्मा घूमा करता हो। आवारा।

लावबाली (२)
संज्ञा स्त्री० लावबाली होने का भाव। लावबालीपन।

लावर
वि० [सं० लपन (=बकना)] दे० 'लाबर'। उ०—भकुआ भरंगी अरु हिलसी हरामजादे लावर दगैल स्यार आँखिन दिखाए तैं।—ठाकुर०, पृ० २७।

लावल्द
वि० [फा़०] जिसके बाल बच्चे न हो। निःसंतान।

लावल्दी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] लावल्द या निःसंतान होने का भाव या अवस्था।

लावा (१)
संज्ञा पुं० [सं० लाबक] लबा नामक पक्षी। विशेष दे० 'लवा'। उ०—गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा। जनु सचान वन झाटेउ लाबा।—तुलसी (शब्द०)।

लावा (२)
संज्ञा पुं० [सं० लाजा] भूना हुआ धान, ज्वार, बाजरा या रामदाना आदि जो भुनने के कारण फूलकर फूट जाता है और जिसके अंदर से सफेद गूदा बाहर निकल आता है। यह बहुत हलका और पथ्य समझा जाता है और प्रायः रोगियों को दिया जाता है। खील। लाई। फुल्ला। क्रि० प्र०—फूटना।—भूनना। यौ०—लावा परछन।

लावा (३)
संज्ञा पुं० [अं०] राख, पत्थर और धातु आदि मिला हुआ वह द्रव पदार्थ जो प्रायः ज्वालामुखी पर्वतों के मुख से विस्फोट होने पर निकलता है।

लावाक्षक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का धान।

लावाणक
संज्ञा पुं० [सं०] प्रचीन काल के एक देश का नाम जो मगध के पास था।

लावा परछन
संज्ञा पुं० [हि० लावा + परछना] विवाह के समय की एक रीति। विशेष—इसमें वर के आगे कन्या खड़ी की जाती है और उसके हाथ में एक डलिया दी जाती है। कन्या का भाई उसी डलिया में धान का लावा डालता है। हवन और सप्तपदी इसके बाद होती है।

लावारा †
वि० [हिं०] आवारा।

लावारिस
संज्ञा पुं० [अ०] १. वह मनुष्य जिसका कोई उत्तरधिकारी या वारिस न हो। २. वह संपत्ति जिसका कोई अधिकारी या स्वामी न हो। (क्व०)।

लावारिसी
वि० [अ० लावारिस] (संपत्ति) जिसका कोई अधिकारी न हो।

लाविक
संज्ञा पुं० [सं०] भैंसा। महिष [को०]।

लाविका
संज्ञा स्त्री० [सं० लावा] १. लवा नामक पक्षी। २. भैंस।

लावु †
संज्ञा पुं० [सं०] लौप्रा। कद् दू। घिआ।

लाव्य
वि० [सं०] लवाई के लायक। काटने योग्य [को०]।

लाश
संज्ञा स्त्री० [फा०] किसी प्राणी का मृतक देह। लोथ। मुरदा। शव। मुहा०—लाश उठना=मुर्दा उठना। मौत होना। लाश पर लाश गिरना=लोथ पर लोथ गिरना। लड़ाई में शबों का ढेर लग जाना।

लाशा (१)
वि० [फा० लाशह्] दुर्बल। क्षणि। कृशकाय [को०]।

लाशा (२)
संज्ञा पुं० मुरदा। लोथ। शव [को०]।

लाष पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० लक्ष] लाख की संख्या वा अंक। दे० 'लाख'।

लाष पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० लाक्षा] लाख नामक लाल द्रव्य। लाह। उ०—लाष भवन बैठार दुष्ट ने भोजन में विष दीन्हो। सूर (शब्द०)। विशेष दे० 'लाख (४)'। यौ०—लापभवन=लखाधर। लाक्षागृह।

लाषना पु †
क्रि० स० [हिं०] दे० 'लखना'।

लाषुक
संज्ञा पुं० [सं०] लोभी। लालची।

लास (१)
संज्ञा पुं० [सं० लास्य] १. एक प्रकार का नाच। दे० 'लास्य'। ललित नृत्य। २. मटक। उ०—लास भरी भौंहन विलास भरे भाल मृदु हास भरे अधर सुधारस घुरे परैं।—देव (शब्द०)।

लास (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. जूस। रसा। शोरबा। २. उछलकूद। स्वच्छंद क्रीड़ा (को०)। ३. लास्य। एक नृत्य, विशेषतः स्त्रियों का (को०)।

लास (३)
संज्ञा पुं० [?] उस छड़ के दोनों कोने जिसे पाल बाँधने के लिये मस्तूल में लटकाते हैं। (लश०)। मुहा०—लास करना=चलती हुई नाव को रोकने के लिये डाँडों को बहते हुए पानी में बेड़े बल में ठहराना। (लश०)।

लासक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. मयूर। मोर। २. नाचनेवाला। नचनिया। नर्तक। ३. मटका। घड़ा। ४. शिव का एक नाम। (को०)। ५. आलिंगन करना (को०)। ६. इमारत की सबसे ऊँची मंजिल पर बना हुआ कक्ष (को०)। ७. एक अस्त्र का नाम (को०)।

लासक (२)
वि० १. चमकानेवाल। दीप्तिकारक। २. इधर उधर करता हुआ। क्रीड़ारत (को०)।

लासकी
संज्ञा स्त्री० [सं०] नटी। नाचनेवाली स्त्री। नर्तकी।

लासन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. नाचना। क्रीड़ा करना। २. इधर उघर संचालन करना [को०]।

लासन (२)
संज्ञा पुं० [अ० लैशिंग] जहाज बांधने का मोटा रस्सा। लहासी। क्रि० प्र०—खोलना।—बाँधना।—लगाना। मुहा०—लासन देना=मस्तूल के चारों ओर रस्सी लपेटना। कौड़ी लेना। (लश०)।

लासा
संज्ञा पुं० [हिं० लस] १. कोई लसदार या चिपचिपी चीज। चेप। लुआब। उ०—(क) नाम लगि ल्याय लासा ललितवचन कहि व्याध ज्यौं विषय विहंगनि बझावौ।—तुलसी (शव्द०)। (ख) चितवनि ललित लकुट लासा लटकनि पिय कापै अलक तरंग।—सूर (शब्द०)। २. एक विशेष प्रकार का चिपचिपा पदार्थ जो बहेलिए लोग चिड़ियों को फँसाने के लिये बरगद और गूलर के दूध में तीसी का तेल पकाकर बनाते हैं। विशेष—इस लासे को प्रायः वे लोग वृक्षों की डालियों पर लगा देते है; और जव पक्षी उनपर आकर बैठते हैं, तब उनके परों में यह लग जाता है, जिससे वे उड़ नहीं सकते। उस समय बहेलिए उन्हें पकड़ लेते हैं। मुहा०—लासा लगाना=किसी को फेसाने के लिये किसी प्रकार का लालच या धोखा देना। फंदे में फँसाना। लासा होना= हरदम साथ लगे रहना। पीछा न छोड़ना।

लासानी
वि० [अ०] जिसका काई सानी या जोड़ न हो। अनुपम। अद्वितीय। बेजोड़।

लास पु
संज्ञा पुं० [सं० लास्य] दे० 'लास्य'। उ०—तांडव लासि ओर अंग को गनें जे जे रुचि उपजत जा के।—स्वा० हरिदास (शब्द०)।

लासिक
वि० [सं०] नर्तक। नाचनेवाला [को०]।

लासिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. नर्तकी। २. पुंश्चली। दुश्चरित्रा। वेश्या। ३. एक नाटयभेद। एक उपरूपक [को०]।

लासी (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] जूँ की तरह का एक प्रकार का काला कीड़ा जो गेहूँ के पेड़ो से लगकर उन्हे निकम्मा कर देता है।

लासी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'लसी' या 'लस्सी'।

लासु पु
संज्ञा पुं० [सं० लास्य] दे० 'लास्य'।

लास्फोटनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] छेदने का औजार। गिलमिट। बरमा [को०]।

लास्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. नृत्य। नाच। २. नाच या नृत्य के दो भेदों में स एक। वह नृत्य जो भाव और ताल आदि के सहित हो, कोमल अंगों के द्वारी हो और। जसके द्वारा शृंगार आदि कोमल रसों का उद्दीपन होता हो। विशेष—साधरणतः स्त्रियों का नृत्य ही लास्य कहलाता है। कहते है, शिव और पर्वती ने पहले पहल मिलकर नृत्य किया था। शिव का नृत्य तांडव कहलाया और पार्वती का 'लास्य'। यह लास्य दो प्रकार का कहा गया है—छुरित और यौवत। साहित्यदर्पण में इसके दस अंग बतलाए गए हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—गेयपद, स्थितपाठ, आसीन, पुष्पगंडिका, प्रच्छेदक, त्रिगूढ़, सैंधबाख्य, द्विगूढ़क, उत्तमीत्तमक और युक्तप्रयुक्त। ३. नट। अभिनेता। नर्तक (को०)।

लास्यक
संज्ञा पुं० [सं०] नृत्य। नाच [को०]।

लास्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] नाचनेवाली। नर्तकी [को०]।

लाह पु (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० लाक्षा] लाख। चपड़ा। लाही। उ०— जाकी बाँकी वीरता सुनत सहमत धीर जाकी आँच अजहु लसत लंक लाह सी।—तुलसी (शब्द०)।

लाह (२)
संज्ञा पुं० [सं० लाभ, हिं० लाख] लाभ। फायदा। नफा। उ०—(क) दावा धरि पाहरू को आवागौन मिसि ताके भानु ससि अभिमति लाहा में फिरत हैं।—चरण (शव्द०)। (ख) सारहि सव्द विचारिए सोइ सब्द सुख देय। अनसमझा सब्देक है कछू न लाहा लेय।—कबीर (शब्द०)। (ग) लहि जीवनमूरि को लाह अली वै भले जुग चारि लौं जीवो करैं।—द्विजदेव (शब्द०)। (घ) मैं तुमसों कहि राखत हौं यह मान किए कछु ह्वै है न लाहे।—रघुनाथ (शब्द०)।

लाह (३)
संज्ञा स्त्री० [? या सं० लाभ] चमक। आभा। कांति। दीप्ति। उ०—सीसफूल बेनी बेंदी बेसरि और बीरनि मैं हीरनि की लाह में हँसनि छवि छहरी।—देव (शब्द०)।

लाहन †
संज्ञा पुं० [देश०] १. वह महुआ जो मद्य खींचने के उपरांत देग में बच रहता है। यह प्रायः पशुओं को खिलाया जाता है। २. जूमी और महुए को मिलाकर उठाया हुआ खमीर। ३. किसी प्रकार के पदार्थ का खमीर। ४. वे पेय ओपधियाँ जो गौओं को बच्चा होने पर दी जाती हैं। ५. अनाज ढोने की मजदूरी।

लाहल
संज्ञा पुं० [अ० लाहौल] दे० 'लाहौल'। उ०—लाहल पारख शब्द के जो परखे सो पाक। तामें जो हल्ला करै सोई होइ हलाक।—कबीर (शब्द०)।

लाहिक
वि० [अ० लाहिक] युक्त होनेवाला। मिलनेवाला [को०]।

लाहीक
संज्ञा पुं० [अ० लाहिकह्] किसी शब्द के अंत में लगनेवाला अक्षर या शब्द। प्रत्यय [को०]।

लाही † (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० लाक्ष, हिं० लाख, लाह] १. लाल रंग का वह छोटा कीड़ा जो वृक्षों पर लाख उत्पन्न करता है। विशेष दे० 'लाख'। २. इससे मिलता जुलता एक प्रकार का कीड़ा जो प्रायः माघ फागुन में पुरवा हवा चलने पर उत्पन्न होता है और फसल को बहुत हानि पहुँचाता है।

लाही (२)
वि० लाह के रंग का। मटमैलापन लिए लाल। उ०— तनसुख सारी, लाही अँगिया, अतलस अँतरौटा, छबि, चारि चारि चूरी पहुँचीनि पहुँची षमकि बनी नकफूल जेब मुख बीरा चोका कौधें सभ्रम भूली।—स्वा० हरिदास (शव्द०)।

लाही (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं० लावा] धान, बाजरे आदि के भूने हुए दाने। लावा। लाजा। खील। यौ०—लाही का सत्तू=धान की खीलों को पीसकर बनाया हुआ सत्तू जो बहुत हलका होता है और प्रायः रोगियों को पथ्य के रूप में दिया जाता है।

लाही (४)
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. सरसों। २. काली सरसों। ३. तीसरी बार का साफ किया हुआ शोरा।

लाहु पु
संज्ञा पुं० [सं० लाभ] नफा। फायदा। प्राप्ति। लाभ। उ०—(क) हानि कुसंग सुसंगति लाहू। लोकहु, बेद बिदित सब काहू।—तुलसी (शब्द०)। (ख) मूकनि बचन लाहु मानो अंधनि लहे हैं विलोचन तारे।—तुलसी (शब्द०)।

लाहूत
संज्ञा पुं० [अ०] १. संसार। दुनिया। जगत्। मर्त्य लोक। २. समाधि। ब्रह्मलीनता की अवस्था [को०]।

लाहौर
संज्ञा पुं० [देश०] भारत के पश्चिम पंजाब का एक प्रख्यात एवं प्राचीन नगर जो अब पाकिस्तान में है।

लाहौरी नमक
संज्ञा पुं० [हिं० लाहौरी+नमक] सैंधव लवण। सेंधा नमक। विशेष दे० 'नमक'।

लाहौल
संज्ञा पुं० [अ०] एक अरबी वाक्य का पहला शव्द जिसका व्यवहार प्रायः भूत, प्रेत आदि को भगाने या घृणा प्रकट करने के लिये किया जाता है। पूरा वाक्य यह है—'लाहौल बला कूब्बत इल्ला बिल्लाह।' इसका अर्थ है—ईश्वर के सिवा और किसी में कोई सामर्थ्य नहीं। मुहा०—लाहौल पढ़ना=(१) उक्त वाक्य का उच्चारण करना। (२) बहुत अधिक घृणा प्रकट करना।

लाह्वा
संज्ञा स्त्री० [सं०] उल्लू पक्षी।

लिंग
संज्ञा पुं० [सं० लिङ्ग] १. वह जिससे किसी वस्तु की पहचान हो। चिह्न। लक्षण। निशान। २. न्याय शास्त्र में वह जिससे किसी का अनुसान हो। साधकहेतु। जैसे,—पर्वत में आग है, वहाँ धूम होने के कारण—यहाँ धूम अग्नि का लिंग है; अर्थात् धूम से अग्नि के होने का अनुमान होता है। विशेष—लिंग चार प्रकार के होते हैं—(क) संबद्ध; जैसे,—धूम अग्नि के साथ संबद्ध है। (ख) न्यस्त; जैसे,—सींग गाय के साथ है। (ग) सहवर्तो; जैसे,—भाषा मनुष्य के साथ है। और (घ) विपरीत; जैसे भला बुरे के साथ है। ३. सांख्य के अनुसार मूल प्रकृति। विशेष—विकृति फिर प्रकृति में लय को प्राप्त होती है; इसी से प्रकृति को लिंग कहते हैं। ४. पुरुष का चिह्नविशेष जिसके कारण स्त्री से उसका भेद जाना जाता है। पुरुष की गुप्त इंद्रिय। शिश्न। पर्या०—उपस्य। मदनांकुश। मोहन। कंदर्पमुषल। शेफस्। मेढ़। घ्वज। साधन। ५. शिव की एक विशेष प्रकार की मूर्ति। ६. एक पुराण का नाम। विशेष—लिंग पुराण में लिखा है कि शिव के दो रूप हैं। निष्क्रिय और निर्गुण शिव अलिंग हैं और जगत्कारण रूप शिव लिंग हैं। अलिंग शिव से ही लिंग शिव की उत्पत्ति हुई है। शिव को लिंगी भी कहते है; और वह इसलिये कि लिंग या प्रकृति शिव की ही है। इस प्रकार लिंग जगत्कारण रूप शिव का प्रतीक है। पद्मपुराण में शिव के इस रूप के संबंध में यह कथा है—एक बार मंदराचल पर ऋषियों ने बड़ा भारी यज्ञ किया। वहाँ उन्होंने यह चर्चा छेड़ी कि ऋषियों का पूज्य देवता किसे बनाना चाहिए। अंत में यह निश्चय हुआ कि शिव, विष्णु और ब्रह्मां तीनों के पास चलकर इसका निर्णय करना चाहिए। सब ऋषि पहले शिव के पास गए। पर उस समय वे पार्वती के साथ क्रोड़ा कर रहे थे; इससे नंदी ने द्वार पर उन्हें रोक दिया। ऋपियों को प्रतीक्षा करते बहुत काल बीत गया। इसपर भृगु ऋषि ने कोप करके शाप दिया—हे शिव ! तुमने कामक्रीड़ा के वशीभूत होकर हमारा अपमान किया, इससे तुम्हारी मूर्त्ति योनि लिंग रूप होगी और तुम्हारा नैवेद्य कोई ग्रहण न करेगा'। पर इस कथा के संबंध में यह ध्यान रखना चाहिए कि पद्मपुराण वैष्णावों का पुराण है। किसी समय जगत्कारण के रूप में देवता या ईश्वर की उपासना के लिये लिंग का ग्रहण प्राचीन मिस्र, अरब, यहूद, यूनान और रोम आदि देशों में भी था। प्राचीन यूनानी लिंग को 'फेलस' कहते थे। यहूदियों में 'बाल' देवता की प्रतिष्ठा लिंग रूप में ही थी। बाबुल के खंडहरों में मंदिरों के अंदर बहुत से 'लिंग' निकलते हैं, जो भारतीयों के शिवलिंग से बिल्कुल मिलते है। पर प्राचीन आर्यों में इस प्रकार की उपासना का पता नहीं लगता। वैदिक समय में कुछ अनार्य जातियों में 'लिंगापूजा' प्रचलित थी, इसका कुछ अभास वेद के एक मंत्र में मिलता है। उसमें 'शिश्नदेवाः' के प्रति उपेक्षा का भाव प्रकट किया गया है। पर कब से वह शिव की प्रतिमा के रूप में गृहीत हुआ, इसका ठीक पता नहीं। इसके अतिरिक्त 'मोहनजोदड़ों' और हरप्पा की खोदाई से प्राप्त अवशेषों में लिंग या उससे मिलते जुलते आकार की उपास्य मूर्तियाँ मिली हैं। ६. व्याकरण में वह भेद जिससे पुरुष और स्त्री का पता लगता है। जैसे,—पुल्लिंग, स्त्रीलिग। ७. मीमांसा में छह् लक्षण जिनके अनुसार लिंग का निर्णय होता है। यथा—उपक्रम, उपसंहार अभ्यास, अपूर्वता, अर्थवाद और उपपत्ति। ८. अठारह पुराणों में से एक। विशेष दे० 'लिंगपुराण'। ९. जाति। यह दो प्रकार को हीती है—पुरुष तथा स्त्री (को०)। १०. वेदांत दर्शन के अनुसार सूक्ष्म शरीर। विशेष दे० 'लिंगदेह' (को०)। ११. धब्बा। निशान। दाग (को०)। १२. संज्ञा का मूल रूप। प्रातिपदिक (को०)। १३. कार्य। विपाक। परिणाम। फल (को०)। १४. उपाधि (को०)। १५. एक प्रकार का सकेत या संबंध (संयोग, वियोग, साहचर्य आदि) जो किसी शब्द के किसी विशिष्ट अर्थ का द्योतन करने में सहायक होता है। अर्थद्योतक शक्ति (को०)। १६. प्रमाण। सबूत (को०)। १७. छद्म चिह्न, निशान या वेप (को०)। १८. रोग का निदान (को०)। १९. ईश्वर का प्रतीक चिह्न। देवमूर्ति (को०)।

लिंगक
संज्ञा सं० [सं० लिङ्गक] कपित्थ वृक्ष। कैथ।

लिंगजीत्री †
संज्ञा पुं० [सं० लिङ्गज्योति] एक विशेष प्रकार से गढ़ा हुआ शिवलिंग। ज्योतिलिंग।

लिंगदेह
संज्ञा पुं० [सं० लिङ्गदेह] वह सूक्ष्म शरीर जो इस स्थूल शरीर के नष्ट होने पर भी संस्कार के कारण कर्मों का फल भोगने के लिये जीवात्मा के साथ लगा रहता है। (अध्यात्म)। विशेष—इसमें ज्ञावेंद्रियों और कमेंद्रियों की सब वृत्तियाँ रहती हैं, केवल उनके स्थूल रूप नहीं रहते। इस देह में सत्रह तत्व माने गए हैं—१० इंद्रियाँ, मन, ५. तन्मात्र और बुद्धि। उ०—लिंग- देह नृप को निज गेह। दस इंद्रिय दासी सों नेह।—सूर (शब्द०)।

लिंगधर
वि० [सं० लिङ्गधर] जो केवल चिह्न धारण किए हो। ढोंगी [को०]

लिंगधारी
वि० [सं० लिङ्गधारिन्] चिह्न धारण करनेवाला।

लिंगन
संज्ञा पुं० [सं०] आलिंगन। छाती से लगाना [को०]।

लिंगनाश
संज्ञा पुं० [सं० लिङ्गनाश] १. अंधेरा, जिसमें वस्तु की पहचान न हो सके। तिमिर। अंधकार। २. आँखों का एक रोग जिसमें आँखों के सामने कभी अँधेरा, कभी लाल पीला आदि दिखाई पड़ता है। नीलिका नामक रोग। विशेष—सुश्रुत के अनुसार आँख के चौथे पटल में विकार होने से यह रोग होता है। वात, पित्त और कफ के भेद से यह रोग तीन प्रकार का कहा गया है। ३. शिश्न का नाश (को०)। ४. उस चिह्न का न रहना जिससे कोई वस्तु जानी जाय। परिचायक निशान, लक्षण आदि का नाश (को०)।

लिंगपरिवर्तन
संज्ञा पुं० [सं० लिङ्गपरिवर्तन] दे० 'लिंगविपर्यय'।

लिंगपीठ
संज्ञा पुं० [सं० लिङ्गपीठ] वह आधार जिसपर शिवलिंग स्थापित होता है। जलहरी। अरघा [को०]।

लिंगपुराण
संज्ञा पुं० [सं० लिङ्गपुराण] अठारह पुराणों में से एक जिसमें शिव का माहात्म्य और लिंग की पूजा की महिमा वर्णित है। विशेष—इसकी श्लोकसंख्या ११,००० है। ब्रह्मा इसके मुख्य वक्ता हैं। इसमें शिव ही ब्रह्मा और विष्णु दोनों के अधिष्ठान कहे गए हैं। शिव जी ने अपने मुख से १८ अवतारों का वर्णन किया है। यह एक सांप्रदायिक पुराण है। जिस प्रकार विष्णु ने अपने उपासक अंबरीष राजा की रक्षा की थी, उसी ढंग पर इसमें शिव द्वारा परम शैब दधीचि की रक्षा की कथा लिखी गई है। पहले पद्मकल्प की सृष्टि की उत्पत्ति की कथा देकर फिर वैवस्वत मन्वंतर के राजाओं की वंशावली श्रीकृष्ण के समय तक कही गई है। योग और अध्यात्म्य की दृष्टि से लिंगपूजा का गुह्याथ मा बताया गया है।

लिंगप्रतिष्ठा
संज्ञा स्त्री० [सं० लिङ्गप्रतिष्ठा] शिवलिंग की स्थापना [को०]।

लिंगवर्धन (१)
वि० [सं० लिङ्गवर्धन] पुरुषेंद्रिय को उत्तेजित करनेवाला [को०]।

लिंगवर्धन (२)
संज्ञा पुं० कपित्थ। कैथ [को०]।

लिंगवर्धिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० लिङ्गवर्धिनी] अपामार्ग। चिचड़ा।

लिंगवर्धी
वि० [सं० लिङ्गवर्धिन्] दे० 'लिंगवर्धन' [को०]।

लिंगवस्तिरोग
संज्ञा पुं० [सं० लिङ्गवस्ति रोग] लिंगार्श नामक रोग।

लिगवान् (१)
संज्ञा पुं० [सं० लिङ्गवत्] १. चिह्नवाला। लक्षणवाला। २. जिसमें शब्द के कई लिंग हों। ३. शिवलिंग धारण करनेवाला। जैसे, जंगम आदि।

लिंगवान् (२)
संज्ञा पुं० शैवों का लिंगायत नामक संप्रदाय।

लिंगविपर्यय
संज्ञा पुं० [सं० लिङ्गविपर्यय] १. व्याकरण में लिंग का परिवर्तन। २. मानव का पुरुष से स्त्री या स्त्री से पुरुष हो जाना।

लिंगवेदी
संज्ञा स्त्री० [सं० लिगङ् वेदी] शिवलिंग का आधार। जल- हरी। अरघा [को०]।

लिंगवृत्ति
संज्ञा पुं० [सं० लिङ्गवृत्ति] वह जो केवल बाहरी चिह्न या वेश बनाकर अपनी जीविका पैदा करता हो। आडंबरी। ढकोसलेबाज।

लिंगशरीर
संज्ञा पुं० [सं० लिङ्गशरीर] दे० 'लिंगदेह'।

लिंगशास्त्र
संज्ञा पुं० [सं० लिङ्गशास्त्र] व्याकरण में लिंगविवेचन का प्रकरण। लिंगानुशासन [को०]।

लिंगशोफ
संज्ञा पुं० [सं० लिङ्गशोफ] शिश्नेंद्रिय का शोथ या सूजन [को०]।

लिंगस्थ
संज्ञा पुं० [सं० लिङ्गस्थ] ब्रह्मचारी। (मनुस्मृति)।

लिंगांकित
संज्ञा पुं० [सं० लिङ्गाङ्कित] एक शैव संप्रदाय। वि० 'लिंगायत'।

लिगाख्य
संज्ञा पुं० [सं० लिङ्गाख्य] सांख्य मतानुसार सृष्टि का एक उपभेद [को०]।

लिंगाग्र
संज्ञा दे० [सं० लिङ्गाख्य] शिश्नेंद्रिय का अगला भाग। मणि [को०]।

लिंगानुशासन
संज्ञा पुं० [सं० लिङ्गानुशासन] लिंगविवेचन शास्त्र। लिंगशास्त्र (व्याकरण)।

लिंगायत
संज्ञा पुं० [सं० लिङ्गायत] एक शैव संप्रदाय जिसका प्रचार दक्षिण में बहुत है। विशेष—इस संप्रदाय के लोग शिव के अनन्य उपासक हैं और सोने या चाँदी के संपुट में शिवलिंग रखकर बाहु या गले में पहने रहते हैं। ये लोग 'जंगम' भो कहलाते हैं। इनके आचार और संस्कार भी औरों से विलक्षण होते हैं।

लिंगार्चन
संज्ञा पुं० [सं० लिङ्गार्चन] शिवलिंग का पूजन।

लिंगार्श
संज्ञा पुं० [सं० लिङ्गार्शस्] जननेंद्रिय का एक रोग।

लिंगालिका
संज्ञा स्त्री० [सं० लिङ्गालिका] एक प्रकार का छोटा चूहा [को०]।

लिंगिक
संज्ञा स्त्री० [सं० लिङ्गिक] लँगड़ापन [को०]।

लिंगिनी
संज्ञा पुं० [सं० लिङ्गिनी] १. एक लता जिसे पँच- गुरिया कहते हैं और जो वैद्यक में कटु, उष्ण दुर्गंधनाशक तथा रसायन कही गई है। २. धर्मध्वजी या आडंबर करनेवाली स्त्री।

लिंगी (१)
वि० [सं० लिङ्गिन्] १. चिह्नवाला। निशानवाला। २. किसी चिह्न को धारण करने का अधिकारी (को०)। ३. जिसका मन और काम समान हो। विचार और कार्य में एक सा (को०)। ४. चिह्नित। अकित (को०)। ५. सूक्ष्म शरीरी वा लिंगदेही (को०)। ६. बाहरी रूपरंग या वेश बनाकर काम निकालनेवाला। आडंबरी। धमब्बजी।

लिंगी (२)
संज्ञा पुं० १. वर्णिलिंगी। ब्रह्मचारी। २. शिवलिंग का पूजक। ३. दंभी या छली व्यक्ति। ४. हाथी। ५. कारण। मूल। ६. परमात्मा। ७. एक शैव संप्रदाय [को०]।

लिंगेंद्रिय
संज्ञा पुं० [सं० लिङ्गेन्द्रिय] पुरुषों की मूत्रेंद्रिय।

लिंट
संज्ञा पुं० [अं०] तूतिए में रँगा हुआ मुलायम कपड़ा या फलालीन जी धाव में मरहम लगाकर इसलिये भर दी जातीहै, जिसमें मुँह एकवारगी बंद न हो जाय और मवाद न रुके।

लिंटर, लिंटल
संज्ञा पुं० [अं० लिंटेल] लोहे की छड़ों का जाल बाँधकर, उनके बीच इकहरी ईंटों की जोड़ाई तथा सीमेंट की ढलाई से बनी छत आदि जिसमें नीचे धरम आदि की आवश्यकता नहीं पड़ती [को०]।

लिंदु
वि० [सं० लिन्दु] पिच्छिल। फिसलनवाली। जिसपर फिसलन हो [को०]।

लिंप
संज्ञा पुं० [सं० लिम्प] १. शिव का एक गण। २. लीपना। लेप करना [को०]।

लिंपट
वि० संज्ञा पुं० [सं० लिम्पट] कामी। कामुक [को०]।

लिंपाक
संज्ञा पुं० [सं० लिम्पाक] १. एक प्रकार का नीबू। २. खर। गदहा।

लिंपि
संज्ञा स्त्री० [सं० लिम्पि] दे० 'लिपि' [को०]।

लिंफ
संज्ञा पुं० [अं०] शीतला का चेप जो टोका लगाने के काम में आता है।

लिए
हिंदी का एक कारक चिह्न जो संप्रदान में आता है, और जिस शब्द के आगे लगता है, उसके अर्थ या निमित्त किसी क्रिया का होना सूचित करता है। जस,—मैं तुम्हारे लिए आम लाया हूँ। यह चिह्न शब्द के संबंध कारक रूप 'का' के साथ लगता है। जैसे,—उसके लिए। बहुत से लोग इसको व्युत्पत्ति संस्कृत 'कृति' से बताते हैं, पर 'लग्न और 'लग्ग' शब्द से इसका अधिक लगाव जान पड़ता है। पुरानी काव्यभाषा विशेषतः अवधी में 'लगि' और 'लाग' रूप बराबर मिलते हैं यह प्रायः 'लिये' भी लिखा जाता है।

लिकिन
संज्ञा पुं० [देश०] मटियाले रंग की एक बड़ी चिड़िया जिसकी टाँगें हाथ हाथ भर की और गरदन एक बालिश्त की होती है।

लिकुच
संज्ञा पुं० [सं०] बड़हर का पेड़। लकुच। चुक्र।

लिक्खाड़
संज्ञा पुं० [हिं० लिखना {हिं० लिक्ख+आड़(प्रत्य०)}] बहुत लिखनेवाला। भारी लेखक। (व्यंग्य या विनोद)।

लिक्किडेटर
संज्ञा पुं० [अं०] वह अफसर जो किसी कंपनी या फर्म का कारबार उठाने, उसकी ओर से मामला मुकदमा लड़ने या दूसरे आवश्यक कार्य करने के लिये नियुक्त किया जाता है।

लिक्किडेशन
संज्ञा पुं० [अं०] संमिलित पूँजी से चलनेवाली कंपनी या फर्म का कारबार बंद कर उसका संपत्ति से लेहनदारों का देना निपटाना और बचा हुई रकम को हिस्सेदारों में बाँट देना। जैसे,—वह कपनी लिक्किडेशान में चली गई। क्रि० प्र०—जाना।

लिक्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. यूकांड। जूँ का अंडा। लीख। २. एक परिमाण जो कई प्रकार का कहा गया है; जैसे,—कहीं चार अणुओं की लिक्षा कही गई है, कहीं आठ बालाग्र की। (८ परमाणु=रज। ८ रज=बालाग्र)। ६ लिक्षा का एक सर्षप (सरसों या राई) माना गया है।

लिक्षिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] लीख। जूँ [को०]

लिखंत पु †
संज्ञा पुं० [सं० लेख] भाग्य का लिखा। विधाता का लिखा। विधाता का लेख। भाग्य की बात। उ०—तजी है पीतम ने प्रीति मेरी, सखी ये लीला लिखंत की है।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ८थ८।

लिखक
संज्ञा पुं० [सं०] लेखक [को०]।

लिखत
संज्ञा स्त्री० [सं० लिखित] १. लिखी हुई बात। लेख। लिपिबद्ध विषय। यौ०—लिखत पढ़त। मुहा०—लिखत पढ़त होना=लिखा पढ़ी होना। लेख के रूप में पक्का होना। २. लिखित पत्र। ३. दस्तावेज।

लिखधार पु
संज्ञा पुं० [हिं० लिखना+धार (प्रत्य०)] लिखनेवाला। मुहरिंर या मुंशी। उ०—साँचो सो लिखधार कहावै। काया ग्राम मसाहत करिकै जमा बाँधि ठहरावै।—सूर (शब्द०)

लिखन
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. लिपि या लेख। लिखावट। २. लिखित पत्र। दस्तावेज (को०)। ३. चित्रांकन। चित्रकारी (को०)। ४. कर्म की रेखा। भाग्य में निश्चित बात।

लिखना
क्रि० स० [सं० लिखन] १. किसी नुकोली वस्तु से रोखा के रूप में चिह्न करना। अंकित करना। २. स्याही में डूबी हुई कलम से अक्षरों की आकृति बनाना। अक्षर अंकित करना। लिपिबद्ध करना। यौ०—लिखना पढ़ना। लिखापढ़ी। लिखालिखी=दे० 'लिखापढी'। उ०—लिखालिखी की है नहीं, देखा देखि की बात।—कबीर सा०, पृ० ८५। मुहा०—किसी के नाम लिखना=यह लिखना कि अमुक वस्तु किसी के जिम्मे है। जैसे,—१००) तुम्हारे नाम लिखे हैं। लिखना पढ़ना=विद्योपार्जन करना। विद्या का अभ्यास करना। जैसे,—वह लड़का कुछ लिखता पढ़ता नहीं। लिखा पढ़ा= शिक्षित। ३. रंग से आकृति अंकित करना। चित्रित करना। चित्र बनाना। तसबीर खींचना। जैसे,—चित्र लिखना। उ०—देखी चित्र लिखी सी ठाढ़ी।—सूर (शब्द०)। ४. पुस्तक, लेख या काव्य आदि की रचना करना। जैसे,—यह पुस्तक किसकी लिखी है ? संयो० क्रि०—डालना।—देना।—लेना।

लिखनी †
संज्ञा स्त्री० [सं० लेखनी] १. कलम। २. भाग्यलिपि। प्रारब्ध। होनी। ३. लिखन की क्रिया या भाव [को०]।

लिखवाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० लिखना] दे० 'लिखाई'।

लिखवाना
क्रि० स० [हिं० लिखाना] दे० 'लिखाना'।

लिखवार, लिखहार पु
संज्ञा पुं० [हिं० लिखना] दे० 'लिखधार'।

लिखाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० लिखना] १. लेख। लिपि। २. लिखने का कार्य। ३. लिखने का ढंग। लिखावट। यौ०—लिखाई पढ़ाई=विद्याभ्यास।

४. लिखने की मजदूरी।

लिखाना
क्रि० स० [सं० लिखन] अंकित कराना। लिपिबद्ध कराना। दूसरे के द्वारा लिखने का काम कराना। संयो० क्रि०—डालना।—देना।—लेना। मुहा०—लिखाना पढ़ाना=(१) शिक्षा देना। तालीम देना। (२) लेखबद्ध कराना।

लिखापढ़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० लिखना+पढ़ना] १. पत्रव्यवहार। चिट्ठियों का आना जाना। परस्पर लेखों द्वारा व्यवहार होना। जैसे,—(क) लिखापढ़ी करके उनसे यह बात तै कर लो। (ख) इसके बारे में बहुत दिनों तक लिखापढ़ी होती रही। २. किसी विषय को कागज पर लिखकर निश्चित या पक्का करना। जैसे,—पहले लिखापढ़ी करके तब रुपए दीजिए। क्रि० प्र०—करना।—होना।

लिखार †
संज्ञा पुं० [हिं० लिखना] १. दे० 'लिक्खाड़'। २. दे० 'लिखधार'।

लिखारी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० लिखना] दे० 'लिखना'।

लिखावट
संज्ञा स्त्री० [हिं० लिखना+आवट (प्रत्य०)] १. लिखे हुए अक्षर आदि। लेख। लिपि। जैसे,—तुम्हारी लिखावट तो किसी से पढ़ी ही नहीं जाती। २. लिखने का ढंग। लेख- प्रणाली।

लिखास
संज्ञा स्त्री० [हिं० लिखना+आस (प्रत्य०)] लिखने की उतावली। उ०—तब एक सज्जन ने मेरी लिखास और युग की धारणा की दूरी को इन शब्दों में मुझे लिखा था—आदमी बड़े भले हो।—हिम० (दो शब्द), पृ० ५।

लिखित (१)
वि० [सं०] लिखा हुआ। लिपिबद्ध किया हुआ। अंकित।

लिखित (२)
संज्ञा पुं० १. लिखी हुई बात। लेख। विशेष—व्यवहार (मामले, मुकदमे) में 'लिखित' चार प्रकार के प्रमाणों में से एक है। साक्षियों में भी एक 'लिखित' साक्षी होते हैं। अर्थी जिसे लाकर लिखा दे, वह लिखित साक्षी होगा। (मिताक्षरा)। २. रचना, लेख या पुस्तक आदि। ३. लिखी हुई सनद। प्रमाण- पत्र। ४. एक स्मृतिकार ऋषि। ५. चित्र। तसवीर (को०)।

लिखितक
संज्ञा पुं० [सं० लिखित] एक प्रकार के प्राचीन चौखूँटे अक्षर जो खुतन (मध्य एशिया) में पाए गए शिलालेखों में मिलते हैं।

लिखितव्य
वि० [सं०] आलेखन के योग्य। लिखने योग्य [को०]।

लिखता
संज्ञा पुं० [सं० लिखितृ] चित्रकार। चितेरा [को०]।

लिखेरा
संज्ञा पुं० [हिं० लिखना] लिखनेवाला। लेखक।

लिख्य
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'लिख्या' [को०]।

लिख्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जूँ का अंडा। लीख। १. एक परिमाण। विशेष दे० 'लिक्षा'।

लिगदी
संज्ञा स्त्री० [देश०] कमजोर छोटी घोड़ी।

लिगु
संज्ञा पुं० [सं०] १. मन। २. मूर्ख। ३. मृग। ४. भूप्रदेश।

लिचेन
संज्ञा पु० [देश०] एक प्रकार की घास जो पानी में होती है।

लिच्छवि, लिच्छिवि
संज्ञा पुं० [सं०] एक इतिहासप्रसिद्ध राजवंश जिसका राज्य किसी समय में नैपाल, मगध और काशल मे था। विशेष—प्राचीन संस्कृत साहित्य में क्षत्रियों की इस शाखा का नाम 'निच्छवि' या 'निच्छिवि' मिलता है। पाली रूप 'लिच्छवि' है। मनुस्मृति के अनुसार लिच्छवि लोग व्रात्य क्षत्रिय थे। उसमें इनकी गणना झल्ल, मल्ल, नट, करण, खश और द्रविड़ के साथ की गई है। ये 'लिच्छवि' लोग वैदिक धर्म के विरोधी थे। इनकी कई शाखाएँ दूर दूर तक फैली थीं। वैशालीवाली शाखा में जैन तीर्थंकर महावीर स्वामी हुए और कोशल की शाक्य शाखा में गौतम बुद्ध प्रादुर्भूत हुए। किसी समय मिथिला से लेकर मगध और कोशल तक इस वंश का राज्य था। जिस प्रकार हिंदुओं के संस्कृत ग्रंथों में यह वंश हीन कहा गया है, उसी प्रकार बौद्धों और जैनों के पालि और प्राकृत ग्रंथों मे यह वंश उच्च कहा गया है। गौतम बुद्ध के समसामयिक मगध के राजा बिंबसार ने वैशाली के लिच्छाव लोगों के यहाँ संबंध किया था। पीछे गुप्त सम्राट् ने भी लिच्छवि कन्या से विवाह किया था।

लिट्
वि० [सं०] लेहन करनेवाला। जैसे, मधुलिट् (समासांत में प्रयुक्त)।

लिटरेचर
संज्ञा पुं० [अं०] साहित्य। वाङ् मय। जैसे,—इग्लिश लिटरेचर।

लिटरेरी
वि० [अं०] साहित्य संबंधी। साहित्यिक। जैसे,—लिटरेरी कानफरेंस।

लिटाना
क्रि० स० [हिं० लेटना] लेटने की क्रिया कराना। दूसरे को लेटने में प्रवृत्त कराना।

लिटोरा †
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'लिसोड़ा'।

लिट्ट
संज्ञा पुं० [देश०] [स्त्री० अल्पा० लिट्टी] मोटी रोटी जो बिना तवे के आग ही पर सेंकी जाय। अगाकड़ी। वाटी।

लिठोर
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का नमकीन पकवान।

लिड़ार (१) †
संज्ञा पुं० [देश०] श्रृगाल। गीदड़।

लिड़ार (२)
वि० [देश०] डरपोक। कायर। बुजदिल। उ०—त्रिशुद्ध होहु शुद्ध को विरुद्ध बात ना कहौ। न बाचिहौ घरै घुसे लिड़ार हान ना चहौ।—केशव (शब्द०)।

लिड़ौरी †
संज्ञा स्त्री० [देश०] अनाज के वे दाने जो पीटने के पीछे बाल में लगे रह जाते हैं। भुंडारी। दाबरी। पकूरी। चित्तो। विशेष—यह शब्द रबी का फसल के लिये बोला जाता है।

लिप
संज्ञा पुं० [सं०] लेपन। लेप करना [को०]।

लिपटना
क्रि० अ० [सं० लिप्त] १. एक वस्तु का दूसरी को घेरकर उससे खूब सट जाना। किसी वस्तु से दृढ़तापूर्वक जा लगना। वेष्ठित करके संलग्न होना। चिमटना। जैसे,—साँप का पैर से लिपटना, बच्चे का माँ से लिपटना, लता का पेड़ से लिपटना।संयो० क्रि०—जाना। २. इस प्रकार लग जाना कि जल्दी न छूटे। चिपकना। ३. गले लगना। आलिंगन करना। जैसे,—वह उससे लिपटकर रोने लगा। ४. किसी काम में जी जान से लग जाना। तन्मय होकर प्रवृत्त होना। जैसे,—जिस काम में लिपटता हूँ, उसे पूरा करके छोड़ता हूँ। ५. दखल देना। हस्तक्षेप करना।

लिपटाना
क्रि० स० [हिं० लिपटना का स० रूप] १. एक वस्तु को दूसरी वस्तु से खूब सटाना। संलग्न कराना। चिमटाना। २. किसी को हाथों से घेरकर अपने शरीर से खूब सटाना। आलिं- गन करना। गले लगाना। उ०—कान्ह के कानन आँगुरी नाइ रही लपटाइ लवंगलता सी।—पद्माकर (शब्द०)। ३. परचाना।

लिपड़ा (१)
संज्ञा पुं० [देश०] लुगड़ा। कपड़ा। (कलदर)। विशेष—कलदर भालू नचाकर जब उससे लोगों से कपड़ा माँगने को कहते हैं, तब 'लिपड़', 'लिपड़ा' कहते हैं।

लिपड़ा (२)
वि० [हिं० लेप] लेई की तरह गीला और चिपचिपा।

लिपड़ी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० लिपड़ा] लेई की तरह गोला और चिप- चिपा पदार्थ। जैसे,—हलुवा पानी अधिक होने से लिपड़ी हो गया।

लिपड़ी (२)
संज्ञा स्त्री० [अँ० लिवरी] दे० 'लिबड़ी'।

लिपना
क्रि० अ० [सं० लिप्] १. किसी रंग या गीली वस्तु की पतली तह से ढक जाना। पोता जाना। जैसे,—सारा घर गोबर से लिप गया। यौ०—लिपा पुता=स्वच्छ। साफ। झक। २. रंग या गीली वस्तु का फैल जाना। जैसे,—हाथ पड़ने से कागज पर स्याही लिप गई। संयो० क्रि०—जाना। यौ०—लिपा पुता=जिसपर धब्बे आदि हों। बदरग।

लिपवाना
क्रि० स० [हिं० लीपना] लीपने का काम दूसरे से कराना। दूसरे को लीपने में प्रवृत्त करना।

लिपस्टिक
संज्ञा स्त्री० [अं०] ओठ रँगने की लाली। मोम इत्यादि में रंग मिलाकर बनी हुई एक बत्तो जिसे स्त्रियाँ ओठों पर रगड़कर उसे लाल करतो है। उ०—उसमें से एक गुलाबी रंग की साड़ी से सुसज्जित, पौडर की चमक और लिपस्टिक की रंगीनी से सुशोभित रमणी तथा चार पुरुषों ने उतरकर भीतर प्रवेश किया।—सन्यासी, पृ० १३२।

लिपाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० लिपना] १. किसी रंग या घुली हुई गीली वस्तु की तह फैलाने की क्रिया या भाव। २. दीवार या जमीन पर घुली हुई मिट्टी या गोबर की तह फैलाना। लेपना। पोताई। ३. लीपने की मजदूरी।

लिपाना
क्रि० स० [हिं० लीपना] १. रंग या किसी गीली वस्तु की तह चढ़वाना। पुताना। २. दीवार या जमीन पर सफाइ के लिये धुली हुई मिट्टी या गोबर की तह चढ़वाना। मिट्टी, गोबर आदि का लेप कराना। उ०—जागी महरि पुत्र मुख देख्यो आनँद तूर बजायो हो। कंचन कलस होय द्विज पूजा चंदन भवन लिपायो हो।—(शब्द०)। संयो० क्रि०—डालना।—देना।—लेना।

लिपि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अक्षर या वर्ण के अंकित चिह्न। लिखा- वट। २. अक्षर लिखने की प्रणाली। वर्ण अंकित करने की पद्धति। जैसे,—ब्राह्मी लिपि, खरोष्ट्री लिपि, अरबी लिपि। ३. लिखे हुए अक्षर या बात। लेख। जैसे—भाग्यलिपि। उ०—जिनके भाल लिखी लिपि मेरी सुख की नहीं निसानी।—तुलसी (शब्द०)। ४. लेप। लेपन (को०)। ५. चित्रकारी। रेखांकन (को०)। ६. बाह्य आकृति। गढ़न (को०)।

लिपिक
संज्ञा पुं० [सं०] लेखक। कर्णिक। क्लार्क [को०]।

लिपिकर
संज्ञा पुं० [सं०] १. लेखक। लिखनेवाला। २. रँगाई पुताई का काम करनेवाला (को०)। ३. उत्कीर्ण। करनेवाला। नक्काश (को०)।

लिपिकर्म
संज्ञा पुं० [सं० लिपिकर्मन्] अंकन। लिखाई। चित्रकारी [को०]।

लिपिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] लिपि। लिखावट। दे० 'लिपि'।

लिपिकार
संज्ञा पुं० [सं०] लिखनेवाला। लेखक। दे० 'लिपिकर'।

लिपिज्ञ
वि० [सं०] जो लिख सकता हो। लिपि का जानकार [को०]।

लिपिज्ञान
संज्ञा पुं० [सं०] लिखने की कला [को०]।

लिपिन्यास
संज्ञा पुं० [सं०] लेखनकला अथवा लिखने की क्रिया [को०]।

लिपिफलक
संज्ञा पुं० [सं०] पत्थर, तख्ती, धातुपत्र आदि जिनपर अक्षर खोदे जायँ।

लिपिबद्ध
वि० [सं०] लिखा हुआ। लिखित।

लिपिशाला
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह शाला जहाँ लिखना सिखाया जाता हो। लेखन विद्यालय।

लिपिशास्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] विभिन्न लिपियों के लिखने की विद्या।

लिपिसंनाह
संज्ञा पुं० [सं० लिपिसन्नाह] मणिबंध या कलाई पर पहनने का एक पट्टा [को०]।

लिपिसज्जा
संज्ञा स्त्री० [सं०] लिखने का उपकरण। लिखने का सामान [को०]।

लिप्त
वि० [सं०] १. जिसपर किसी गीली वस्तु (जैसे,—घुली मिट्टी, चंदन आदि) की तह चढ़ी हो। जिसपर लेप किया गया हो। लिपा हुआ। पुता हुआ। चर्चित। २. जो लीपा गया हो। जिसकी पतली तह चढ़ी हो। ३. गाढ़ा लगा हुआ। खूब संलग्न। ४. खूब तत्पर। लीन। अनुरक्त। फँसा हुआ। जैसे,—विषय भोग में लिप्त। ५. जहरीला किया हुआ। विषाक्त किया हुआ। जैसे,—वाण का फल (को०)। ६. खाया हुआ। भाक्षित (को०)। क्रि० प्र०—करना।—होना।

लिप्तक
संज्ञा पुं० [अं०] विष में बुझाया हुआ तीर। जहरीला तीर [को०]।

लिप्तवासित
वि० [सं०] सिक्त और सुवासित [को०]।

लिप्तहस्त
वि० [सं०] किसी वस्तु से लिपटे या रँगे हुए हाथोंवाला [को०]।

लिप्ता
संज्ञा स्त्री० [सं०] ज्योतिष के अनुसार काल का एक मान जो एक मिनट के बराबर होता है।

लिप्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] लेप। लेपन [को०]।

लिप्तिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'लिप्ता' [को०]।

लिप्सा
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्राप्ति की कामना। लालच। लोभ। २. चाह। इच्छा। आकांक्षा।

लिप्सित
वि० [सं०] इच्छित। अभिलपित। आकांक्षित [को०]।

लिप्सितव्य
वि० [सं०] प्राप्त करने के योग्य। अभिलषणीय। जो प्राप्त करने योग्य हो [को०]।

लिप्सु
संज्ञा पुं० [सं०] लाभ की इच्छा। रखनेवाला। लोलुप। लोभी। लालची। जैसे,—यशोलिप्सु।

लिफाफ
संज्ञा पुं० [अ० लिफ़ाफ़ा] शव का आच्छादन। कफन [को०]।

लिफाफा
संज्ञा पुं० [अ० लिफ़ाफ़ह्] १. कागज की बनी हुई चौकोर खोली या थैली जिसके अंदर चिट्ठी या कागजपत्र रखकर भेजे जाते हैं। जैसे,—लिफाफे में बंद करके चिट्ठी डाल देना। मुहा०—लिफाफा खुल जाना=भेद खुल जाना। छिपी हुई बात का प्रकट हो जाना। २. ऊपरी आच्छादन। सजावट की पोशाक। दिखावटी कपड़े लत्ते। जैसे,—आज तो खूब लिफाफा बदलकर निकले हो। मुहा०—लिफाफा बदलना=भड़कदार कपड़े पहनना। ३. ऊपरी आडंबर। झूठी तड़क भड़क। मुलम्मा। कलई। मुहा०—लिफाफा खुल जाना=असली रूप प्रकट हो जाना। लिफाफा बनाना=(१) ठाठ बाट बनाना। (२) आडंबर करना। ढकोसला रचना। ४. खोल। थैला (को०)। ५. शवाच्छादन वस्त्र। कफन (को०)। ६. जल्दी नष्ट हो जानेवाली वस्तु। दिखाऊ चीज। काजू भोजू चाज।

लिफाफिया
वि० [अ० ल़िफ़ाफ़ा+इया (प्रत्य०)] तड़क भड़क वाला। दिखाऊ। कमजोर। निस्तत्व।

लिबड़ना (१)
क्रि० अ० [देश०] सन जाना। लथपथ होना। लिभड़ना।

लिबड़ना (२)
क्रि० स० दे० 'लिभड़ना'।

लिबड़ी
संज्ञा स्त्री० [अ० लिवरी, तुल० हिं० लुगड़ी] कपड़ा लत्ता। यौ०—लिबड़ी बरताना या बारदाना=निर्वाह का सामान। असबाब। जैसे,—अपना लिबड़ो बरताना उठाओ, और चल दो।

लिबरल (१)
वि० [अं०] उदार नीतिवाला।

लिबरल (२)
संज्ञा पुं०— १. इंग्लैड का एक राजनीतिक दल जिसकी नीति अधीनस्थ देशों की व्यवस्था के संबंध में तथा अन्य राज्यों के साथ व्यवहार करने में उदार कही जाती है। २. (स्वतंत्रता- प्राप्ति के पूर्व का) भारत का एक राजनीतिक दल जो बहुत ही सौम्य उपायों से अपने देश को स्वतंत्र करना चाहता था।

लिबास
संज्ञा पुं० [अ०] पहनने का कपड़ा। आच्छादन। पहनावा। पोशाक। उ०—तुमने यह कुसुम बिहग लिबास, क्या अपने सुख से स्वर्य बुना ?—युगांत, पृ० ५०।

लिबिंकर
संज्ञा पुं० [सं० लिविङ्कर] प्रचिलिपि करनेवाला। लेखक [को०]।

लिबि
संज्ञा स्त्री० [सं०] लिपि। लिखावट।

लिभड़ना (१)
क्रि० अ० [हिं० लिबड़ना] दे० 'लिबड़ना'। उ०— अपनी छाती पर कत्था चून से लिभड़ी हुई उँगलियों का छापा लिए हुए पावे पान के शौकीनों को फिर भी घूर रहे थे।— नई०, पृ० ९६।

लिभड़ना (२)
क्रि० स० लथपथ करना। इधर उधर लेप देना। सान देना।

लिमुवा ‡
संज्ञा पुं० [हिं० नीबू, निबुआ] नीबू। उ०—गोई के आँगना मे एक पेड़ लिमुवा, ओ मोरे दाई पँछी करत हँय बसेर।—शुक्ल० अभि० ग्रं० (साहित्य), पृ० १४३।

लियाकत
संज्ञा स्त्री० [अ० लियाकत] १. योग्यता। पात्रता। काबिलियत। २. गुण। हुनर। ३. सामर्थ्य। समाई। हौसला। ४. शील। शिष्टता। भद्रता।

लियानत पु
संज्ञा स्त्री० [अ० लियामत, या लअनत, ला'नत] दे० 'लानत'। उ०—बड़ा काम फरमा जो मुजकूँ सजे, है इस काम ते भोत लियानत मुजे।—दक्खिनी०, पृ० २८९।

लिलाट पु †
संज्ञा पुं० [सं० ललाट] दे० 'ललाट'। उ०—जीउ काढ़ि भुँइ धरौ लिलाटू।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० २८५।

लिलाना पु
क्रि० अ० [हिं०] अनुरोध करना। रिरिया कर बात करना। खीस निकालना। उ०—लाभ कवन पैहो इत आइ। तहँ बिधि कहतु लिलाइ लिलाइ।—नंद० ग्रं०, पृ० २७३।

लिलाम †
संज्ञा पुं० [पुर्त० लीलाम] दे० 'नीलाम'। उ०—किसी भाई का लिलाम पर चढ़ा हुआ बैल लेने में जो पाप है, वही इस समय तुम्हारी गाय लेने में है।—गोदान, पृ० १०।

लिलार पु †
संज्ञा पुं० [सं० ललाट] १. भाल। माथा। मस्तक। उ०—लेखनि लिलार की परेखनि मुरति है।—घनानंद, पृ० २३। २. कूएँ का वह सिरा जहाँ मोट का पानी उलटते हैं।

लिलारी †
संज्ञा पुं० [हिं० नील, लील+कार] नीलगर। रँगरेज।

लिलाही
संज्ञा पुं० [देश०] हाथ का बटा हुआ देशी सूत।

लिलोही †
वि० [सं० लल (=चाह करना)] लालची। अति लोभी। उ०—बूझिबे की जक लागी है कान्हहि केशव कै रुचि रूप लिलोही।—केशव (शब्द०)।

लिव पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] लगन। लौ।

लिवर
संज्ञा पुं० [अं०] दे० 'लीवर' [को०]।

लिवाना (१)
क्रि० स० [हिं० लेना का प्रे० रूप] १. लेने का काम दूसरे से कराना। ग्रहण कराना। थमाना। पकड़ाना। उ०—सूरदास भीषम परतिज्ञा शस्त्र लिवाऊँ पैज करी।—सूर (शब्द०)।

लिवाना (२)
क्रि० स० [हिं० लान का प्रेर० रूप] लाने का काम दूसरे से कराना। जैसे,—लकड़ी मजदूर से लिवा लाना। विशेष—इस क्रि० का प्रयोग संयोज्य क्रिया 'लाना' के साथ होता है। संयो० क्रि०—लाना। मुहा०—लिवा लाना=साथ ले आना।

लिवाल
संज्ञा पुं० [हिं० लेना+वाला] खरीदनेवाला। लेनेवाला।

लिवि
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'लिपि' [को०]।

लिवैया † (१)
संज्ञा पुं० [हिं० लेना] लेनेवाला।

लिवैया (२)
संज्ञा पुं० [हिं० लाना] लानेवाला।

लिष्ट
वि० [सं०] लघुताप्राप्त। संकुचित [को०]।

लिष्व
संज्ञा पु० [सं०] नर्तक। नाचनेवाला।

लिसान
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. जिह्वा। रसना। जीभ। २. भाषा। बोली। जबान [को०]।

लिसोड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० लस (=चिपचिपाहट)] मझोले डील का एक पेड़। विशेष—इसके पत्ते कुछ गोलाई लिए होते हैं। इसके फल छोटे बेर के बराबर होते हैं और गुच्छों में लगते हैं। पकने पर इसमें लसदार गूदा हो जाता है, जो गोंद की तरह चिपकता हैं। यह गूदा हकीम लोग खाँसी में देते हैं। पत्ते बीड़ी (तंबाकू की) के ऊपर लपेटने के काम में आते है। छाल के रेशे से रस्से बटे जाते हैं। अंदर की लकड़ी मजबूत होती है और किश्ती तथा खेती के सामान बनाने के काम की होती है। इसके फूलों को तरकारी और कच्चे फल के अचार भी बनाते हैं। इसे 'लभेरा' और 'लिटोरा' भी कहते हैं। पर्या०—श्लेष्मांतक। भूकर्बुदार।

लिस्ट
संज्ञा स्त्री० [अं०] फेहरिस्त। तालिका। फर्द।

लिह (१)
संज्ञा पुं० [सं०] चाटना।

लिह (२)
वि० चाटनेवाला। जैसे,—अम्रंलिह।

लिह (३) पु
वि० [सं० लेह्य] वह व्यंजन जिसका स्वाद जीभ के द्वारा हो। उ०—चारि प्रकार विचित्र सुव्यंजन। भक्ष्य, भोज्य, चुस, लिह, मनरंजन।—नंद० ग्रं०, पृ० ३०२।

लिहा
संज्ञा स्त्री० [अ०] वल्कल। छाल। बकला।

लिहाज
संज्ञा स्त्री० [अ० लिहाज] १. व्यवहार या बरताव से किसी बात का ध्यान। कोई काम करते हुए उसके संबंध में किसी बात का ख्याल। जैसे,—(क) उसकी तंदुरुस्ती के लिहाज से मैंने उसे हलका काम दिया। (ख) दवा में मैंने खाँसी का लिहाज भी रखा है। क्रि० प्र०—करना।—रखना। २. कृपापूर्वक किसी बात का ध्यान। मेहरबानी का खयाल। कृपादृष्टि। ३. किसी को कोई बाते अप्रिय या दुःखदायी न हो, इस बात का खयाल। मुरव्वत। मुलाहजा। शील संकोच। जैसे,—काम बिगड़ने पर वह कुछ भी लिहाज न करेगा। ४. पक्षपात। तरफदारी। ५. बड़ों के सामने ढिठाई आदि न प्रकट हो, इस बात का ध्यान। संमान या मर्यादा का ध्यान। अदब का खयाल। जैसे,—बड़ों का लिहाज रखा करो। ६. लज्जा। शर्म। हया। क्रि० प्र०—आना।—करना।—रखना। मुहा०—लिहाज उठना या टूटना=लिहाज न रहना। मर्यादा, संमान आदि का ध्यान न रहना। उ०—अब लिहाज टूट गया। शर्म मंजिलों दूर है।—फिसाना०, भा० ३, पृ० १४८।

लिहाजा
अव्य० [अ० लिहाजा] अतः। अतएव। इसलिये।

लिहाड़ा
वि० [देश०] १. नीच। वाहियात। गिरा। २. खराब। निकम्मा।

लिहाड़ी † (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] उपहास। विडंबना। निंदा। क्रि० प्र०—करना।—होना। मुहा०—लिहाड़ी लेना=(१) उपहास करना। ठठ्ठा करना। बनाना। (२) निंदा करना।

लिहाड़ी पु (२)
वि० [हिं० लेना ?] लेनेवाला। उच्चारण करनेवाला। उ०—चाके कुल में भक्त मम नाम लिहाड़ी होय। एक एक शत आपनी पीढ़ी तारत सोय।—(शब्द०)।

लिहाफ
संज्ञा पुं० [अ० लिहाफ़] १. रात को सोते समय ओढ़ने का रूईदार कपड़ा। भारी रजाई। †२. मोटा चदरा। ३. झूल (हाथी या घोड़े की)।

लिहित पु
वि० [सं० लिह] चाटता हुआ। उ०—उन्नत कंध कटि खीन विशद भुज अंग अग प्रति सुखदाई। सुभम कपोल नासिका, नैन छबि अलक लिहित घृत पाई।—सूर (शब्द०)।

लीक (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० लिख्] १. लंबा चला गया चिह्व। लकीर। रेखा। क्रि० प्र०—खींचना। मुहा०—लीक करके=दे० 'लोंक खींचकर'। उ०—आगम निगम पुरान कहत करि लीक।—तुलसी (शब्द०)। लीक खींचना= (१) किसी बात का अटल और दृढ़ होना। इस प्रकार स्थिर किया जाना कि न टले। (२) मर्यादा बंधना। व्यवहार का प्रतिबंध या नियम स्थापित होना। हद या कायदा मुकर्रर होना। (३) साख बँधना। प्रतिष्ठा स्थिर होना। उ०—हरि चरनारबिंद तजि लागत अनत कहूँ तिनकी मति काँची। सूरदास भगवंत भजन जे तिनकी लोक चहूँ दिसि खाँची।—सूर (शब्द०)। लीक खोंचकर=इस बात की दृढ़ प्रतिज्ञा करके कि ऐसा ही होगा। निश्चयपूर्वक। जोर देकर। उ०— सूर श्याम तेरे बस राधा, कहति लीक मैं खाँची।—सूर (शब्द०)। २. गहरी पड़ी हुई लकीर। ३. गाड़ी के पहिए से पड़ी हुई लकीर।उ०—लीक लीक गाड़ी चलै लीकै चलै कपूत।—(शव्द०)। ४. चलते चलते बना हुआ रास्ते का निशान। ढुर्री। जैसे,— यही लोक पकड़े सीधे चले जाओ। मुहा०—लीक पकड़ना=ढुर्री पर चलना। पगडंडी पर होना। लोक पीटना=पुराने निकले हुए रास्ते पर चलना। चली आती हुई प्रथा का ही अनुसरण करना। बँधी हुई रीति या प्रणाली पर ही चलना। लोक लोक चलना=दे० 'लोक पीटना'। ५. महत्व या प्रतिष्टा। मर्यादा। नाम। यश। उ०—दंपति धरम आचरन नीका। अजहुँ गाव श्रुति जिन्हकैं लोका।—तुलसी (शब्द०)। ६. बँधी हुई मर्यादा। लोकव्यवहार की बंधा हुई सीमा या व्यवस्था। लोकनियम। उ०—नँदनदन केदज नेह मेह जिन लोक लोक लापी।—सूर (शब्द०)। ७. बँधा हुई विधि। रीति। प्रथा। चाल। दस्तुर। ८. हद। प्रतिबध। ९. कलंक की रेखा। धब्बा बदनामी। लाछन। उ०— तिहि देखत मेरी पट काढ़त लोक लगा तुम काज।—सूर (शब्द०)। १०. गिनती के लिये लगाया हुआ चिह्न। गिनती। गणना। उ०—बारिदनाद जेठ सुत तासू। भट मह प्रथम लोक जग जासू।—तुलसी (शब्द०)।

लीक (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] मटियाले रंग की एक चिड़िया जो बत्तख से कुछ छोटी होती है। २. दे० 'लोख'।

लीक्का
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'लिक्षा' [को०]।

लीख
संज्ञा स्त्री० [सं० लिक्षा] १. जूँ का अंडा। २. लिक्षा नामक परिमाण।

लीग
संज्ञा स्त्री० [अं०] १. सघ। सभा। समाज। जैसे,—मुसलिम लीग। लीग आफ नेशन्स। २. एक नाप वा दूरी जो जल पर साढ़े तीन और स्थल पर तीन मील की होती है (को०)।

लीगल रिमेंबरेंसर
संज्ञा पुं० [अं०] वह अफसर जो सरकार के कानूनी कागजपत्र रखता है और कानूनी सलाह देता है। विशेष—अंग्रेजी शासन में कलकत्ता, बंबई और युक्त प्रदेश (उत्तर प्रदेश) में लीगल रिमेंबरेंसर होते रहे हैं जो प्रायः सिविलियन होते थे। इनका दर्जां ऐडवोकेट जनरल के बाद है। इनका काम सरकारी मामले मुकदमों के कागजपत्र रखना और तैयार करना है और सरकार को कानूनी सलाह देना है।

लीचड़
वि० [देश०] १. सुस्त। काहिल। निकम्मा। २. जल्दी न छोड़नेवाला। चिमटनेवाला। ३. जिसका लेन देन ठीक न हो।

लीचर पु
वि० [देश०] चिमटनेवाला। जल्दी न छोड़नेवाला। दे० 'लोचड़'। उ०—बाहुक सुबाहु नीच लीचर मरीच मिलि मुँह पीर केतुजा कुरोग जातुधान हैं।—तुलसी (शब्द०)।

लीची
संज्ञा स्त्री० [चीनी लीचू, लूचू] एक सदाबहार पेड़ और उसका फल जो खाने में बहुत मोठा होता है। विशेष—इसकी पत्तियाँ छोटी छोटी हीती है; फल गुच्छों में लगते और देखने में बहुत सुंदर होते हैं। छिलके के ऊपर कटावदार दाने से उभरे होते हैं। गूदा सफेद खोली की तरह बीज से चिपका रहता है, पर बहुत जल्दों छूटकर अलग हो जाता है। यह पेड़ चीन से आया है और बंगाल तथा बिहार में अधिक होता है।

लीज
संज्ञा पुं० [अं० लीज] दे० 'लीस'।

लीझी (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. देह में मले हुए उबटन के साथ छूटी हुई मैल की बत्ती। २. वह गूदा या रेशा जिसका रस चूस या निचोड़ लिया गया हो। सीठी।

लीझी (२)
वि० १. नीरस। निस्सार। २. निकम्मा। उ०—श्री रघुराज कहे कह रीझो भई तनु लीझो अर्जों दशा एती।—रघुराज (शब्द०)।

लीडर
संज्ञा पुं० [अं०] अगुआ। मुखिया। नेता। २. अग्रलेख। किसी समाचारपत्र में संपादक का लिखा हुआ प्रधान या मुख्य लेख। संपादकीय अग्रलेख। जैसे,—संपादक महोदय ने इस विषय पर जोरदार लीडर लिखा है। ३. किसी कथन की असमाप्ति आदि का बोधक एक टाइप जिममें तीन विदियाँ रहती हैं। (मुद्रण)।

ली़डर आफ दी हीउस
संज्ञा पुं० [अं०] पार्लमेंट या व्यवस्थापिका सभा का मुखिया जो प्रधान मंत्री या मंत्रिमंडल का बड़ा सदस्य, विशेषकर स्वराष्ट्र सदस्य, होता है और जिसका काम विरोधी पक्ष का उत्तर देना और सरकारी कामों का समर्थन करना होता है। प्रांतीय शासन में यही मुख्य मंत्री होता है।

लीडिंग ओर्टिकल
संज्ञा पुं० [अं०] किसी समाचारपत्र में संपादक का लिखा हुआ प्रधान या मुख्य लेख। संपादकीय अग्रलेख। जैसे,—इस पत्र के लीडिंग आर्टिकल बहुत गवेषणापूर्ण होते हैं।

लीढ
वि० [सं०] चाटा हुआ। आस्वादित [को०]।

लीथो
संज्ञा पुं० [अं० लीथो (=पत्थर)] पत्थर का छापा, जिसपर हाथ से लिखकर अक्षर या चित्र छापे जाते हैं।

लीथोग्राफ
संज्ञा पुं० [अं० लीथोग्राफ] दे० 'लीथो'।

लीथोग्राफर
संज्ञा पुं० [अं० लीथोग्राफ] वह जो लीथीग्राफी का काम करता हो। लीथो का काम करनेवाला।

लीथोग्राफी
संज्ञा स्त्री० [अं० लीथोग्राफी] लीथो की छपाई में एक विशेष प्रकार के पत्थर पर हाथ से अक्षर लिखने ओर खींचने की कला।

लीद
संज्ञा स्त्री० [देश०। तुल० सं० लेण्ड (लेंड़)] घोड़े, गधे, ऊँट और हाथी आदि पशुओं का मल। घाड़े आदि का षुरीष। मुहा०—लीद करना=घोड़े आदि का मलत्याग करना।

लीन
वि० [सं०] १. लय को प्राप्त। जो किसी वस्तु में समा गया हो। २. तन्मय। मग्न। डूबा हुआ। ३. बिलकुल लगा हुआ। तत्पर। जैसे,—कार्य में लीन होना। ४. ख्याल में डूबा हुआ। घ्यानमग्न। अनुरक्त। उ०—अति ही चतुर सुजान जानमनि वा छवि पै भइ मैं लीना।—सूर (शब्द०)। ५. किसी के सहारे टिका हुआ (को०)। ६. लुप्त। छिपा हुआ (को०)। ७. अपने रूप का त्याग करके मिला हुआ। घुला हुआ। जैसे, जल में नमक (को०)।

क्रि० प्र०—करना।—होना।

लीनता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. तन्मयता। तत्परता। २. ऐसा संकुचित होकर रहना जिसमें किसी को दुःख न पहुँचे। (जैन)।

लीनो टाइप मशीन
संज्ञा स्त्री० [अं०] एक प्रकार की कल या यंत्र जिसमें अक्षरो की कंपोज होने के समय लाइन की लाइन ढलकर निकलती है। विशेष—आजकल हिंदुस्तान में बड़े बड़े अँगरेजी अखबार इसी मशीन से कंपोज होते हैं।

लीपना
क्रि० स० [सं० √ लिप् > लेपन] १. घुले हुए रंग, मिट्टी, गोबर या और किसी गीली वस्तु को पतली तह चढ़ाना। पोतना। २. सफाई के लिये जमीन या दीवार पर घुलो हुई मिट्टी या गोबर फेरना। पोतना। यौ०—लोपना पोतना=सफाई करना। मुहा०—लोप पोतकर बराबर करना=किसी काम को बिगाड़ना। चौपट करना। चौका लगाना। सत्तानाश करना।

लीफ्लेट
संज्ञा पुं० [अं० लोफलेट] पुस्तिका। पर्चा।

लीबर, लीभर
संज्ञा पुं० [देश० लिबड़ना, लिभड़ना] कीचड़। गंदगी। मैल।

लीम
संज्ञा पुं० [देश०] १. एक प्रकार का चीड़ का पेड़ जिसमें से तारपीन या अलकतरा निकलता है। २. एक प्रकार की चिड़िया।

लीमू
संज्ञा पुं० [फा०] नीबू [को०]।

लीर †
संज्ञा स्त्री० [देश०] कपड़े की धज्जी। चीर [को०]। यौ०—लीर कथीर=कपड़े की चीर या धज्जी।

लील (१) †
संज्ञा पुं० [सं० नील] नील।

लील (२)
वि० नीला। नीलवर्ण का। नीले रंग का। उ०—लोलांबुज तनु लील वसन मणि चितयो न जात धूम के भोरे।—सूर (शब्द०)।

लीलकंठ †
संज्ञा पुं० [सं० नीलकण्ठ] दे० 'नीलकंठ'।

लीलक (१)
देश० पुं० [हिं० लील] वह हरा चमड़ा जो जूतों की नोक पर लगाया जाता है।

लीलक (२)
वि० नीला।

लीलगऊ †
संज्ञा स्त्री० [हिं० नील+गऊ] नील गाय।

लीलगर †
संज्ञा पुं० [हि० नील+गर] रंगसाज। नीलगर। रंगरेज।

लीकना
क्रि० सं० [सं० गिलन या लीन] गले के नीचे पेट में उतारना। मुँह में लकर पेट में डालना। निगलना। खा जाना। उ०—(क) बालधी विसाल विकराल ज्वालमाल मानो लंक लीलिबे का काल रसना पसारी है।—तुलसी (शब्द०)। (ख) बीच गए सुरसा मिली और सिंहिका नारि। लीलि लियो हनुमत तेहि, चढे़ उदर कहँ फारि।—केशव (शव्द०)। संयो० क्रि०—जाना।—लेना।

लीलया
क्रि० वि० [सं०] १. खेल में। २. सहज में ही। बिना प्रयास।

लीलयैव
क्रि० वि० [सं० लीलया+एव] खेल में ही। सहज में ही। उ०—राचंमद्र कटि सों पट बाँध्यो। लीलयैव हर को धनु साध्यो।—केशव (शब्द०)।

लीलहि पु
क्रि० वि० [हिं० लीला] खेल खेल में। बिना प्रयास के। सहज में। उ०— (क) अति उतंग गिरि पादप लीलहिं लेहिं उठाइ।—मानस, ६। १। (ख) अति उतंग गरु सैलगन लीलहिं लेहिं उठाइ।—तुलसी (शब्द०)।

लीलांग
वि० [सं० लीलाङ्ग] सुंदर अंगोंवाला [को०]।

लीलांचित
वि० [सं० लीलाञ्चित] रम्य। सुंदर [को०]।

लीलांबुज
संज्ञा पुं० [सं० लीलाम्बुज] दे० 'लीलाकमल' [को०]।

लीला (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह व्यापार जो चित्त की उमंग से केवल मनोरंजन के लिये किया जाय। केलि। क्रीड़ा। खेल। जैसे,—वाललीला। २. शृंगार की उमंगभीरी चेष्टा। प्रेम का खेलवाड़। प्रेमविनोद। ३. नायिकाओँ का एक हाव जिसमें वे प्रिय के वेश, गति, वाणी आदि का अनुकरण करती हैं। ४. सौंदर्य। सुंदरता। (को०)। ५. रहस्यपूर्ण व्यापार। विचित्र काम। जैसे,— यह ईश्वर की लीला है जो ऐसे स्थान में ऐसा सुंदर पेड़ होता है। ६. मनुष्यों की मनोरंजन के लिये किए हुए ईश्वरावतारों का अभिनय। चरित्र। जैसे,—रामलीला, कृष्ण- लीला। ७. बारह मात्राओं का एक छंद जिसके अंत में एक जगण होता है। ८. एक वर्णवृत्त जिसके प्रत्येक चरण में भगण, नगण और एक गुरु होता है। ९. चौबीस मात्राओं का एक छंद जिसमें ७+७+७+३ के विराम से २४ मात्राएँ और अंत में सगण होता है।

लीला (२)
संज्ञा पुं० [सं० नील] १. स्याह रंग का घोड़ा। उ०— लीले, सुरंग, कुमैत श्याम तेहि परदे सब मन रंग।— (शब्द०)। २. गोदना।

लीला (३)
वि० नीला। उ०—कटि लहँगा लीलो वन्यो धौं को जो देखि न मोहे।—सूर (शब्द०)।

लीलाकमल
संज्ञा पुं० [सं०] कमल का फूल जिसे क्रीड़ा के लिये हाथ में लिए हों।

लीलकलह
संज्ञा पुं० [सं०] प्रणयकलह। प्यार की लड़ाई [को०]।

लीलागृह
संज्ञा पुं० [सं०] क्रीडागृह। आमोदभवन। प्रमोदभवन [को०]।

लीलाचतुर
वि० [सं०] क्रीड़ाकुशल। सुंदर [को०]।

लीलातनु
संज्ञा पुं० [सं०] खेलवाड़ के लिये धारण किया हुआ रूप [को०]।

लीलातामरस
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'लीलाकमल' [को०]।

लीलादग्ध
वि० [सं०] बिना प्रयास के जला हुआ। सहज ही जला हुआ [को०]।

लीलानटन
संज्ञा पुं० [सं०] आनंद मात्र के लिये किया जानेवाला नृत्य [को०]।

लीलानृत्य
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'लीलानटन' [को०]।

लीलापुरुषोत्तम
संज्ञा पुं० [सं०] श्रीकृष्ण।विशेष— राम और कृष्ण इन दो प्रधान अवतारों में राम मर्यादा- पुरषोत्तम कहलाते हैं और कृष्ण लीलापुरुषोत्म।

लीलाब्ज
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'लीलाकमल' [को०]।

लीलाभरण
संज्ञा पुं० [सं०] केवल लीला वा शौक के लिये पहना हुआ गहना [को०]।

लीलामनुष्य
संज्ञा पुं० [सं०] छद्यमानव। नकली आदमी [को०]।

लीलामय
वि० [सं०] क्रीड़ा के भाव से भरा हुआ। क्रीड़ायुक्त।

लीलामात्र
संज्ञा पुं० [सं०] खेल कूद। केवल खेलवाड़ (को०)।

लीलायित
संज्ञा पुं० [सं०] १. क्रीड़ाविनोद। आमोद प्रमोद। २. कार्य जो सहजसाध्य हो [को०]।

लीलारति
संज्ञा स्त्री० [सं०] आमोद प्रमोद। मनबहलाव [को०]।

लीलारविंद
संज्ञा पुं० [सं० लीलारविन्द] दे० 'लीलाकमल' [को०]।

लीलावज्र
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्र के वज्र के समान एक शस्त्र [को०]।

लीलावती (१)
वि० स्त्री० [सं०] क्रीड़ा करनेवाली। विलासवती।

लीलावती (२)
संज्ञा स्त्री० १. प्रसिद्ध ज्योतिर्विद भास्कराचार्य की पत्नी का नाम जिसने लीलावती नाम की गणित की एक पुस्तक बनाई थी। पीछे भास्कराचार्य ने भी इस नाम की एक गणित की पुस्तक बनाई। २. संपूर्ण जाति की एक रागिनी जिसमें सब शुद्ध स्वर लगते हैं। यह रागिनी ललित, जयतश्री और देशकार से मिलकर बनी कही गई है। कोई कोई इसे दीपक राग की पुत्रवधू कहते हैं। ३. एक छद जिसके प्रत्येक चरण में १०, ८ और १४ के विराम से ३२ मात्राएँ होती हैं और अंत में एक जगण होता है। ४. दुर्गा का एक नाम (को०)। ५. सुंदरी स्त्री। सौंदर्यशील महिला (को०)। ६. कामुकी या विलासप्रिय औरत (को०)। ७. मय दानव की पत्नी का नाम (को०)।

लीलावान्
वि० [सं० लीलावत्] १. क्रीड़ापूर्ण। २. सुंदर। रमणीय [को०]।

लीलावापी
संज्ञा स्त्री० [सं०] जलविहार के लिये निर्मित बावली [को०]।

लीलावेश्म
संज्ञा पुं० [सं०] लीलागृह। आमोदगृह [को०]।

लीलाशुक
संज्ञा पुं० [सं०] पालतू तोता [को०]।

लीलासाध्य
वि० [सं०] सहज ही होनेवाला। बिना प्रयास किया जानेवाला [को०]।

लीलास्थल
संज्ञा पुं० [सं०] क्रीड़ा करने का स्थान।

लाली
वि० स्त्री० [सं० नील] नीले रंग की। नीली। उ०— बंदन शिरताटंक गंड पर रतन जटित मणि लीली।—सूर (शब्द०)।

लीलोद्यान
संज्ञा पुं० [सं०] १. देववन। नंदनवन। २. क्रीड़ा वा खेलकूद का उपवन। आमोद प्रमोद करने का बाग [को०]।

लीव
संज्ञा स्त्री० [अं०] छुट्टी। अवकाश। जैसे,—प्रिविलेज लीव। फरलो लीव।

लीवर
संज्ञा पुं० [अं० लिवर] १. युकृत। जिगर। विशेष दे० 'यकृत'। २. किसी भारी वस्तु को सरलता से उठाने का यंत्र (को०)। ३. किसी मशीन, ताले या घड़ी आदि में लगा वह पुरजा जो किसी दूसरे पुरजे को उठाता गिराता है (को०)।

लीस
संज्ञा पुं० [अं० लीज] जमीन या दूसरी किसी स्थावर संपत्ति के भोगमात्र का अधिकारपत्र जो किसी को जीवनपर्यत या निश्चित काल के लिये दिया जाय। पट्टा। जैसे,— (क) १९०३ में निजाम ने सदा के लिये अँगरेजी सरकार को बरार का लीस लिख दिया। (ख) यह अपना मकान लीस पर देनेवाला है। क्रि० प्र०—देना।—लेना।—लिखना ।

लुंग
संज्ञा पुं० [सं० लुङ्ग] मातुलंग वृक्ष।

लुंगा
संज्ञा पुं० [देश०] १. पंजाब में धान रोपने की एक रीति। माच। २. दे० 'लुँगाड़ा'।

लुंगी (१)
संज्ञा स्त्री० [बरमी। मि० हिं० लँगोट या लाँग] १. धोती के स्थान पर कमर में लपेटने का छोटा टुकड़ा। तहमत। विशेष— इस देश में मुसलमाल, मदरासी और बरमी लोग इस प्रकार कमर में कपड़ा लपेटते हैं, जिसमें पीछे लाँग नहीं बाँधी जाती। क्रि० प्र०—बाँधना।—मारना। २. कपड़े का टुकड़े जो प्रायः खारुए का होता है और जो हजामत बनाते समय नाई इसलिये पैर पर आगे डाल देता है जिसमें बाल उसी पर गिरें। ३. लाल रंग का एक मोटा कपड़ा। खारुवा।

लुंगी (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक बड़ी चिड़िया। विशेष— यह हिमालय के जंगलों में, कुमाऊँ से लेकर नैपाल और भूटान तक, तालों के किनारे पाई जाती है। इसकी लंबाई सवा या डेढ़ हाथ क लगभग और आकृति मोर की सी होती है। इसका अगला भाग काला और लाल होता है। सफेद चित्तियाँ भी होती हैं। चोंच भूरे रंग की होती है । जाड़े के दिनों में यह मैदान में उतर आते हैं और कीड़े मकोड़े खाकर रहती है। कुत्तों की सहायता से लोग इसका शिकार करते हैं।

लुंगुष
संज्ञा पुं० [सं० लुङ्गुष] नीबू। छोलँग [को०]।

लुंच, लुंचन
संज्ञा पुं० [सं० लुञ्च, लुञ्चन] १. चुटकी से पकड़कर झटके के साथ उखाड़ना। नोचना। उत्पाटन। जैसे,—केश- लुंचन। २. जैन यतियों की एक क्रिया जिसमें उनके सिर के बाल नोचे जाते हैं। ३. काटना। तराशना। अलग करना। दूर करना। क्रि० प्र०—करना।—होना।

लुंचना
संज्ञा स्त्री० [सं० लुञ्चना] संक्षिप्त भाषण [को०]।

लुंचित
वि० [सं० लुञ्चित] उखाड़ हुआ। नोचा हुआ। उत्पाटित।

लुचितकेश
संज्ञा पुं० [सं० लुञचित केश] जैन यति, जो अपने सिर के बाल नोचे रहते हैं।

लुंचित मूर्धज
वि० [सं० लुञ्चित मूर्धज] दे० 'लुंचित केश' [को०]।

लुंज
वि० [सं० लुञ्चन (=काटना, उखाड़ना)] १. बिना हाथ पैर का। जिसके हाथ पैर बेकाम हो गए हों। लँगड़ा लूला। उ०—ए ऊधो, कहियो माधव सो मदन मारि कीन्हों हम लुंजै।—सूर (शब्द०)। २. बिना पत्ते का पेड़। ढूँठ। उ०— पात बिनु कीन्हें ऐसी भाँति गन बेलिन के परत न चीन्हे जैसे लरजत लुंज हैं।—पद्माकर (शब्द०)।

लुंटक
संज्ञा पुं० [सं० लुण्टक] एक शाक [को०]।

लुंटा
संज्ञा स्त्री० [सं० लुण्टा] १. चोरी। लूट। २. लोटना। लुंठन। [को०]।

लुंटाक (१)
वि० [सं० लुण्टाक] [वि० स्त्री० लुंटाकी] चुरानेवाला। लूटनेवाला। डाका मारनेवाला।

लुंटाक (२)
संज्ञा पुं० १. चोर। तस्कर। २. काक। कौआ [को०]।

लुंटि
संज्ञा स्त्री० [सं० लुण्टि] दे० 'लुंठ' [को०]।

लुंटित
वि० [सं० लुंण्ठित] दे० 'लुंठित' [को०]।

लुंठक
संज्ञा पुं० [सं० लुण्ठक] चोर। लुटेरा।

लुंठन
संज्ञा पुं० [सं० लुण्ठन] [वि० लुण्ठित] १. लुढ़कना। २. लूटना। चुराना।

लुंठना पु
क्रि० स० [सं० लुण्ठन] लूटना।

लुंठा
संज्ञा स्त्री० [सं० लुण्ठा] दे० 'लुंटा' [को०]।

लुंठाक
संज्ञा पुं० [सं० लुण्ठाक] दे० 'लुंटाक' [को०]।

लुंठि
संज्ञा स्त्री० [सं० लुण्टि] चोरी। लूटपाट [को०]।

लुंठी
संज्ञा स्त्री० [सं० लुण्ठी] १. घोड़े का लोटना। २. दे० 'लुंठि'। ३. लुढ़कना। लुढ़कने की क्रिया या भाव [को०]।

लुंड (१)
संज्ञा पुं० [सं० लुण्ड] चोर।

लुंड (२)
संज्ञा पुं० [सं० रुण्ड] बिना सिर का धड़। कबंध। रुंड। उ०— लुंड मुंड बिनु चल्यो प्रचंडा। तब प्रभु काटि किए युग खंडा।—विश्राम (शब्द०)।

लुंडमुंड
वि० [सं० रण्ड+मुण्ड] १. जिसका सिर, हाथ, पैर आदि कटे हों, केवल धड़ का लोथड़ा रह गया हो। २. बिना हात पैर का। लँगड़ा लूला। ३. बिना पत्ते का ढूँठ (पेड़)। ४. योंही गठरी की तरह लपेटा हुआ।

लुंडा (१)
वि० [सं० रुण्ड] [वि० स्त्री० अल्पा० लुंडी] १. जिसकी पूँछ और पर झड़ गए हों या उखाड़ लिए गए हों। (पक्षी)। २. जिसकी पूँछ पर बाल न हों। (बैल)।

लुंडा (२)
संज्ञा पुं० [सं० लुण्डिका] साफ किए हुए लपेटे सूत की पिंडी। कुकड़ी।

लुंडिका
संज्ञा स्त्री० [सं० लुण्डिका] १. न्यायसारिणी। सदाचार। सद्व्यहार। २. पिंडी। कुकड़ी [को०]।

लुंडी (१)
वि० स्त्री० [हिं० लुंडा] जिसकी पूँछ या पर झड़ गए हों।

लुंडी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० लुण्डिका] लपेटे हुए सूत की पिंडी या गोली।

लुंडी (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० लुण्डी] न्यायसारिणी। विवेकपूर्ण व्यवहार। सद्व्यवहार [को०]।

लुंबिका
संज्ञा स्त्री० [सं० लुम्बिका] एक प्रकार का बाजा।

लुंबिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० लुम्बिनी] कपिलवस्तु के पास का एक वन या उपवन जहाँ गौतम बुद्ध उत्पन्न हुए थे।

लुँगाड़ा
संज्ञा पुं० [देश०] शोहदा। लफंगा। लुच्चा।

लुँडियाना †
क्रि० स० [हिं० लुंडी] सूत या रस्सी आदि को पिंडी के रूप में लपेटना।

लुआठ †
संज्ञा पुं० [सं० लोककाष्ठ] दे० 'लुआठा'।

लुआठा
संज्ञा पुं० [सं० लोक (=चमकना, प्रज्वलित होना)+ काष्ठ] [स्त्री० अल्पा० लुआठी] वह लकड़ी जिसका एक छोर जलता हुआ हो। सुलगती हुई लकड़ी। चुआती।

लुआठी
संज्ञा स्त्री० [हिं० लुआठा की स्त्री० अल्पा०] सुलगती या दहकती हुई लकड़ी।

लुआब
संज्ञा पुं० [अ०] लसदार गूदा। चिपाचपा गूदा। लासा। जैसे,—बिहीदाने का लुआब।

लुआबदार
वि० [अ० लुआब+फ़ा० दार] १. लसदार। चिपचिपा। २. जिसमें लसदार गूदा हो।

लुआर †
संज्ञा स्त्री० [सं० लुक(=जलना)+हिं० आर (प्रत्य०); या हिं लौ+आर] दे० 'लू'।

लुकंजन पु †
संज्ञा पुं० [सं० लोकाञ्जन] वह अंजन जिसे आँख में आँज लेने से आँजनेवाला सबको देखता है, पर उसे कोई नहीं देखता। उ०— वीतिवे ही सु तो बीति चुकी अब आँजती हौ केहि काज लुकंजन।—पद्माकर (शब्द०)।

लुकंदर ‡
वि० [हिं० लुकना] छिपनेवाला।

लुक
संज्ञा पुं० [हिं० लोक(=चमकना)] १. वह लेप जिसे फेरने से वस्तुओं (मिट्टी के बरतन आदि) पर चमक आ जाती है। चमकदार रोगन। वार्निश। क्रि० प्र०—फेरना। २. आग की लपट। लौ। ज्वाला। ३. स्फुलिंग। चिनगारी।

लुकटी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० लुक] वह लकड़ी जिसका एक सिरा जल रहा हो या जल चुका हो। लुआठा। चुआती।

लुकदार
वि० [हिं० लुक+फ़ा० दार] चमकदार। वार्निश किया हुआ। जिसपर लुक फेरा गया हो।

लुकना
क्रि० अ० [सं० लुक(=लोप)] ऐसी जगह हो रहना, जहाँ कोई देख न सके। आड़ में होना। गुप्त स्थान में हो रहना। छिपना। उ०— कार्तिक के द्यौस कहूँ आई न्हाइबे को वह गोपिन के सग जऊ नेसुक लुकी रही।—द्विजदेव (शब्द०)। क्रि० प्र०—जाना।—रहना। मुहा०—लुक छिपकर=गुप्त रूप से। अप्रकट में। किसी के देखने में नही। जैसे,—लुक छिपकर बहुत से लोग शराब पीते हैं।

लुकमा
संज्ञा पुं० [अ० लुक़मह्] ग्रास। कौर। निवाला।

लुकमान
संज्ञा पुं० [अ०] एक बहुत बड़े हकीम और वैज्ञानिक जिनकी चर्चा कुरान में आई है।

लुकसाज
संज्ञा पुं० [हिं० लुक (=चमकीला रोगन)+फ़ा० साज] एक प्रकार का चमड़ा जो सिझाया और चमकीला किया हुआ होता है।

लुकाछिपी
संज्ञा स्त्री० [हिं० लुकना+छिपना] एक प्रकार का खेल। आँखमिचौनी।

लुकाट
संज्ञा पुं० [सं० लकुच] एक प्रकार का पेड़ जिसके फल आमड़े के बराबर और खाने में खटमीठे होते हैं।

लुकांठ † (१)
संज्ञा पुं० [सं० लुक(=चमकना)+काष्ठ] दे० 'लुआठ'।

लुकाठ (२)
संज्ञा पुं० [सं० लकुच] दे० 'लुकाट'।

लुकाना (१)
क्रि० स० [हिं० लुकना] ऐसी जगह करना जहाँ कोई देख न सके। आड़ में करना। छिपाना। उ०— चाँपी पूँछ लुकावत अपनी जुवतिन को नहिं सकत दिखाए।—सूर (शब्द०)।

लुकाना (२) †
क्रि० अ० लुकना। छिपना। उ०—मानी महिष कुमुद सकुचाने। कपटी भूप उलूक लुकाने। —तुलसी (शब्द०)।

लुकार पु
संज्ञा पुं० [हिं० लुक] दे० 'लुकाठा'।

लुकारी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० लुक] फूस का पूला या लकड़ी जिसका एक छोर जलता हो। मशाल की तरह जलती हुई लकड़ी।

लुकेठा †
संज्ञा पुं० [हरिं० लुक] जलती हुई लकड़ी। लुआठा। उ०— कबहुँ प्रवेश करत घर जब हीं। मारहिं नारि लुकेठन तब हीं।—रघुराज (शब्द०)।

लुकोना पु
क्रि० स० [हिं० लुकाना] दे० 'लुकाना'।

लुक्क ‡
संज्ञा पुं० [सं० लोक(=चमकना)] दे० 'लुक'।

लुक्कायित
वि० [सं०] लुका हुआ। छिपा हुआ। अंतर्हित। अदृश्य।

लुख
संज्ञा स्त्री० [देश०] शर या सरपत की तरह की एक घास।

लुखरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] लोखरी।

लुखिया
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. धूर्त स्त्री। चालबाज औरत। २. पुंश्चला। छिनाल। ३. वेश्या। रंडी।

लुगड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० लूगा] दे० 'लुगरा'।

लुगड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० लूगा] दे० 'लुगरी'।

लुगत
संज्ञा पुं० [अ० लुगअत] १. शब्दकोश। अभिधान। जैसे,— लुगत किशोरी। २. शब्द। यौ०—लुगतदाँ=अत्यधिक शब्दों का जानकार। लुगतनवीस= कोशकार। शब्दकोश तैयार करनेवाला।

लुगदा
संज्ञा पुं० [देश०] [स्त्री० अल्पा० लुगदी] गीली वस्तु का गोला या पिंड। लौदा।

लुगदी
संज्ञा स्त्री० [देश०] गीली वस्तु (जैसे,—कीचड़, सना हुआ आटा) का पिंडा या गोला। छोटा लोंदा। जैसे,—भाँग की लुगदी।

लुगरा † (१)
संज्ञा पुं० [हिं० लूगा+डा० (प्रत्य०)] १. कपड़ा। वस्त्र। २. ओढ़नी। छोटी चादर। उ०— पीरे पीरे आँचर स्वेत लुगरा लहर लेत लहँगा की लुगी लाल रंगी रँगहेरा की।— देव (शब्द०)। ३. फटा पुराना कपड़ा। लत्ता।

लुगरा † (२)
संज्ञा पुं० [देश०] पीठ पीछे बुराई करनेवाला। चुगलखोर।

लुगरी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० लुगरा] फटी पुरानी धोती।

लुगरी † (२)
संज्ञा पुं० [देश०] पीठ पीछे की हुई निंदा। चुगली।

लुगाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० लोग] स्त्री। औरत। उ०— (क) लगलगा बातनि अलग लग लगी आवै लोगन की लंग ज्यों लुगाइन की लागरी।—देव (शब्द०)। (ख) औध तजी मग वास के रूष ज्यों पंथ के साथ ज्यों लोग लुगाई।—तुलसी (शब्द०)। २. पत्नी। जोरू।

लुगात
संज्ञा पुं० [अ० लुगअत] १. लुगत का बहुवचन। २. शब्द- संग्रह। शब्दकोश। जैसे, नूर उल् लुगात।

लुगी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० लूगा] १. छोटा कपड़ा। २. फटी पुरानी धोती। २. लहेंगे का संजाफ या चौड़ा किनारा। उ०—पीरे अँचरान स्वेत लुगरा लहरि लेत लुगी लहँगा की रँगी रंगी रंगहेरा की।—देव (शब्द०)।

लुगुरा †
संज्ञा पुं० [हिं० लूगा] दे० 'लुगरा'।

लुग्गा ‡
संज्ञा पुं० [हिं० लूगा] दे० 'लूगा'। उ०— चूर चूर देख्यो जब सुग्गा। शकुनि नैन पोंछत लै लुग्गा।—गोपाल (शब्द०)।

लुघड़ना
क्रि० अ० [सं० लुण्ठन] दे० 'लुढ़कना'।

लुचकना
क्रि० स० [सं० लुञ्चन (=नोचना खसोटना)] दूसरे के हाथ से झटका देकर ले लेना। झटके से छीनना। जैसे,—वह मेरे हाथ से मिठाई लुचककर ले गया। संयो० क्रि०—लेना।

लुचरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० लुचुई+री (प्रत्य०)] दे० 'लुवुई'।

लुचवाना
क्रि० स० [सं० लुञ्चन] नोचवाना। उखड़वाना। चोंथवाना।

लुचुई †
संज्ञा स्त्री० [सं० रुचि, मा० लुचि] मैदे की पतली और मुलायम पूरी। लूची। उ०— लुचुई पूरि सुहारी पूरी। इक तो ताती औ सुठ कँवरी।—जायसी (शब्द०)।

लुच्चा
वि० [हिं० लुचकना] [वि० स्त्री० लुच्ची] १. दूसरे के हाथ से वस्तु लुचककर भागनेवाला। चाई। २. दुराचारी। कुमार्गी। कुचालो। ३. खोटा। कमीना। लफंगा। शोहदा। बदमाश।

लुच्ची (१)
वि० स्त्री० [हिं० लुच्चा] खोटी या बदमाश (औरत)।

लुच्ची (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० रुचि, मा० लुचि] दे० 'लुचुई'।

लुज्जा
संज्ञा पुं० [देश०] समुद्र में वह स्थल जो बहुत गहरा हो। (लश०)।

लुटंत पु ‡
संज्ञा स्त्री० [हिं० लूट] लूट।

लुटकना
क्रि० अ० [सं० लडन(=झूलना)] दे० 'लटकना'। उ०— गजगाह निहारि निगाह पुरै मुकुता लर पायन लौं लुटकैं।— गोपाल (शब्द०)।

लुटना (१)
क्रि० अ० [सं० √ लुट्(=लुटना)] १. दूसरे के द्वारा लूटाजाना। डाकुओं के हाथ धन खोना। जैसे,—रास्ते में बहुत से मुसाफिर लुट गए। मुहा०—घर लुठना=घर का माल चोरी जाना या अपहृत होना। २. तबाह होना। बरबाद होना। सर्वस्व खोना। ३. बलि जाना। न्यौछावर होना। मुग्ध होना। संयो० क्रि०—जाना।

लुटना पु (२)
क्रि० अ० [सं० लुण्ठन] दे० 'लुठना'।

लुटरना
क्रि० अ० [हिं० लोटना] दे० 'लुढ़कना'। २. लोटना।

लुटरा
वि० [हिं० लटूरा] [वि० स्त्री० लुटुरी] घूँघरदार। कुंचित।

लुटाना
क्रि० स० [हिं० लूटना का प्रेर० रूप] १. दूसरे को लूटने देना। डाकुओं आदि को छीन लेने देना। जैसे,— तुम रात को टल गए और हमारा माल लुटा दिया। ३. मुफ्त में देना। बिना पूरा मूल्य लिए दे देना। जैसे,—तुम्हारा माल है, चाहे योंही लुटा दो। ३. बरबाद करना। व्यर्थ फेंकना या व्यय करना। ४. मुट्ठी भर भर चारों ओर इसलिये फेंकना जिसमें जो चाहे, सो ले। बहुतायत से बाँटना। स्वच्छंद वितरण करना। सवको बिना रोक टोक देना। अंधाधुध दान करना। जैसे,—बरात में उसने खूब रुपए लुटाए। संयो० क्रि०—देना।

लुटावना पु †
क्रि० स० [हिं० लुटना का प्रेर० रूप] दे० 'लुटाना'।

लुटिया
संज्ञा स्त्री० [हिं० लोटा+इया (प्रत्य०)] जल भरने या रखने का धातु का छोटा बरतन। छोटा लोटा।

लुटेरवा †
संज्ञा पुं० [हिं० लुटेरा] एक प्रकार की पक्षी।

लुटेरा
संज्ञा पुं० [हिं० लूटना+एरा (प्रत्य०)] जबरदस्ती छीन लेनेवाला। डर दिखाकर या मार पीटकर दूसरे का माल ले लेनेवाला। लूटनेवाला। डाकू। दस्यु।

लुट्टुर (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] वह भेड़ जिसके कान छोटे हों। (गड़ेरिए)।

लुट्टुर † (२)
वि० [हिं० लटूरा] घूँघराला (केश)।

लुठन
संज्ञा पुं० [सं०] किसी वस्तु के लुढ़कने, ढरकने और लोटने की क्रिया या भाव [को०]।

लुठना पु
क्रि० अ० [सं० लुठन] १. भूमि पर पड़ना। सारा शरीर पृथ्वी से लगाए हुए पड़ना। लोटना। उ०— राम सखा ऋषि बरबस भेंटा। जनु महि लुठत सनेह समेटा।—तुलसी (शब्द०)। २. पृथ्वी पर नीचे ऊपर फिरते हुए बढ़ना या गमन करना। लुढ़कना।

लुठाना पु
क्रि० स० [हिं० लुटना] १. भूमि पर या नीचे डालना। लोटाना। उ०— माथो चरणारविंद ऊपर लुठाय रघुराय सु उठाय कियो छाती सों लगावनों।— हृदयराम (शब्द०)। २. लुढ़काना।

लुठित (१)
वि० [सं०] लुढ़का हुआ। जमीन पर लेटा या ढरका हुआ जैसे,—भूलुठित [को०]।

लुठित (३)
संज्ञा पुं० जमीन पर लोटना। भूमि पर लोटना। जैसे, घोड़े आदि का [को०]।

लुड़कना (१)
क्रि० अ० [सं० लुठना] दे० 'लुढ़कना'।

लुड़कना (२)
क्रि० स० [हिं० लुढ़कना का प्रेर० रूप] दे० 'लुढ़काना'।

लुड़की
संज्ञा स्त्री० [हिं० लोंदा] दे० 'लुदकी'।

लुड़खुड़ाना
क्रि० अ० [सं० लड(=लना)+अनु० खड़] दे० 'लड़खड़ना'।

लुढ़क †
संज्ञा स्त्री० [अनु०] लुढ़कने की क्रिया वा भाव।

लुढ़कना
क्रि० अ० [सं० लुठन, हिं० लुठना+क] १. जमीन पर नीचे ऊपर फिरते हुए बढ़ना या चलना। गेंद की तरह नीचे ऊपर चक्कर खाते हुए गमन करना। ढुलकना। जैसे,—पहाड़ की चोटी से एक पत्थर लुढ़कता हुआ आया। संयो० क्रि०—जाना। पड़ना। २. गिरकर नीचे ऊपर होते हुए गमन करना। जैसे,—सँभलकर खड़े होना; नहीं तो लुढ़क पड़ोगे। संयो० क्रि०—जाना।—पड़ना। मुहा०—लुढ़कना पुड़कना=गिरना पड़ना। जैसे,—लुढ़कते पुढ़कते किसी तरह आ गया।

लुढ़काना
क्रि० स० [हिं० लुढ़कना] जमीन पर इस प्रकार चलाना कि नीचे ऊपर होता हुआ कुछ दूर बढ़ता जाय। इस प्रकार फेंकना या छोड़ना कि चक्कर खाते हुए कुछ दूर चला जाय। ढुलकाना। जैसे,—गेंद लुढ़काना, टाल पर से पत्थर लुढ़काना। संयो० क्रि०—देना।

लुड़ना (१)
क्रि० अ० [सं० लुठन] १. लुढ़कना। २. गिरना। उ०— बरही मुकुट लुढ़त अवनी पर नाहिन निज भुज भरतु।—सूर (शब्द०)।

लुढ़ना † (२)
क्रि० सं० [हिं०] लोढ़ना। चयन करना। (फूल)।

लुढ़ाना पु
क्रि० स० [हिं० लुढ़ना का प्रेर०] १. दे० 'लुढ़काना'। उ०— (क) माखन खाय खवावत ग्वालन जो उबरयो सो दियो लुढ़ाइ।—सूर (शब्द०)। (ख) मियाँ जोड़े पली पली और खुदा लुढ़ावें कुप्पा। (कहावत)। †२. चयन कराना फूल आदि। चुनने में लगाना।

लुढ़ियाना
क्रि० स० [हिं० लुंडी या लोढ़िया] गोल बत्ती की तरह उभरी हुई सिलाई करना। गोल तुरपना। संयो० क्रि०—देना।

लुतरा
वि० [देश०] [वि० स्त्री० लुतरी] १. इधर की उधर लगानेवाला। पीठ पीछे निंदा करके झगड़ा लगानेवाला। चुगुलखोर। २. नटखट। शरारती।

लुतरी
वि० स्त्री० [हिं० लुतरा] झगड़ा लगानेवाली। चुगलखोर (स्त्री)।

लुत्ती †
संज्ञा स्त्री० [हिं० लूका] लुआठी। लूती। क्रि० प्र०—लगाना।

लुत्थ, लुत्थि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० लोष्ठ या लोठ] दे० 'लोथ'।

लुत्फ
संज्ञा पुं० [अ० लुत्फ़] १. कृपा। दया। अनुग्रह। मेहरबानी। २. भलाई। खूबी। उत्तमता। ३. मजा। आनंद। ४. स्वाद। जायका। ५. रोचकता।क्रि० प्र०—आना।—मिलना। मुहा०—लुत्फ उठाना=मजा पाना।

लुत्मा
संज्ञा पुं० [अ०] थप्पड़। झापड़। तमाचा [को०]।

लुथ्थ, लुथ्थि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'लोथ'।

लुदकी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० लोंदा] १. दही में बनी हुई भाँग। लुड़की। २. घोड़े की एक प्रकार की चाल।

लुदरा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का धान जो अगहन के महीने में तैयार होता है और जिसका चावल बहुत दिनों तक रह सकता है।

लुनना
क्रि० स० [सं० लवन(=काटना), लून(=कटा हुआ)+ हिं० ना (प्रत्य०)] १. खेत की तैयार फसल काटना। खेत काटना। उ०— (क) अनबोए लुनना नहीं बोए लुनना होय।— कबीर (शब्द०)। (ख) करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा। बया सो लुनिय, लहिय जो दीन्हा।—तुलसी (शब्द०)। २. दूर करना। हटाना। नष्ट करना। उ०— कस्तूरी अगर सार, चोवा रस घनसार दीपक हजार ते अँध्यार लुनियत है।—देव (शब्द०)।

लुनाई (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० लोना+आई (प्रत्य०)] लावण्य। सुंदरता। सलोनानपन। खूबसूरती। उ०—(क) टूटे हरा हियारा पै परे पदमाकर लीक सी लंक लुनाई।—पद्माकर (शब्द०)। (ख) राख्यो न रूप कछू विधि के घर ल्याई है लूटि लुनाई की ढेरी।—देव (शब्द०)।

लुनाई † (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० हिं० लुनना+आई (प्रत्य०)] १. फसल कटाई। २. फसल काटने की मजदूरी।

लुनेरा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० लुनना] खेत की फसल काटनेवाला। लुननेवाला।

लुनेरा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० लोन] एक जाति जिसे लोनिया या नोनिया भी कहते हैं। यह जाति पहले नमक निकालती थी।

लुन्ही
संज्ञा स्त्री० [देश०] मँजकर तैयार लपेटी हुई पाई।(जुलाहे)।

लुपना पु
क्रि० अ० [सं० लुप्] छिपना। गुप्त होना। उ०— एक दोय तीन लुपैं, लुत्पोपमा हैं आठ तिनकौ उदाहरण ही सों पहिचानिए।—दूलह (शब्द०)।

लुप्त (१)
वि० [सं०] १. छिपा हुआ। गुप्त। अंतर्हित। २. गायब। अदृश्य। ३. नष्ट। ४. टूटा हुआ। भग्न (को०)। ५. व्याकरण में लोप। अदर्शन (को०)। ६. उपेक्षित। त्यक्त (को०)। ७. लुटा हुआ। जो लूट लिया गया हो (को०)। क्रि० प्र०—करना।—होना। यौ०—लुप्तधर्मक्रिय=जिसने अपना धार्मिक कर्तव्य छोड़ दिया हो । लुप्तपद=(वाक्यादि) जिसमें शब्द न हों। लुप्तपिंडोदकक्रिय= जिस (मृत) की तर्पण, श्राद्ध आदि क्रिया न होती हो। श्राद्धतर्पणादि से वंचित। लुप्तप्रतिज्ञ= वचनभंग करनेवाला। जिसने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी हो। लुप्तप्रतिभ=जिसकी प्रतिभा लुप्त हो गई हो।

लुप्त (२)
संज्ञा पुं० [सं०] चोरी का माल। चौर्य का धन।

लुप्तोपमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह उपमा अलंकार जिसमें उसका कोई अंग (जैसे,— उपमेय, धर्म, वाचक शब्द) लुप्त हो, अर्थात् न कहा गया हो।

लुबध पु
वि० [सं० लुब्ब] लोलुप। दे० 'लुब्ध'। उ०— काम लुबध बोली सब का मनि।—पृ० रा०, १। ४१०।

लुबरी
संज्ञा स्त्री० [अं० लुब(=लासा)] किसी तरल पदार्थ के नीचे की बैठी हुई मैल। तरौंछ। गाद।

लुबुध पु ‡ (१)
वि० [सं० लुब्ब] दे० 'लुब्ध'। उ०— ब्याध बिशिख बिलोक नहिं कल गान लुबुध कुरंग।—तुलसी (शब्द०)।

लुबुध (२)
संज्ञा पुं० लुब्धक। अहेरी। बहेलिया।

लुबुधना †
क्रि० अं० [हि० लुबुध+ना(प्रत्य०)] लुब्ध होना। मोहित होना। लुभाना। उ०— बोन नाद सुनि लुबुधे मृग ज्यों त्यों भइ दसा हमारी।—सूर (शब्द०)। (ख) भैवर न उड़हिं जो लुबुधे वासा।— जायसी (शब्द०)। संयो० क्रि०—जाना।

लुबुधा पु
वि० [सं० लुब्ध, या लुब्धक] १. लोभी। लालची। २. चाहनेवाला। इच्छुक। प्रेमी। उ०— घालि नैन ओहि राखिय, पल नहिं कीजिय ओट। पेम क लुबुधा पाव ओ ह, काह सो बड़ का छाट।—जायसी (शब्द०)।

लुब्ध (१)
वि० [सं०] १. लोभयुक्त। प्रबल आकांक्षायुक्त। अत्यंत राग- युक्त। लुभाया हुआ। ललचाया हुआ। २. तन मन की सुध भूला हुआ। मोहित। उ०— जाके पदकमल लुब्ध मुनि मधुकर निकर परम सुगति हू लोभ नाहिन।—तुलसी (शब्द०)।

लुब्ध (२)
संज्ञा पुं० १. व्याघ। बहेलिया। लुब्धक। २. कामुक (को०)।

लुब्धक
संज्ञा पुं० [सं०] १. पशु पक्षियों को लालच दिखाकर पकड़ लेनेवाला। व्याध। बहेलिया। शिकारों। उ०— सूरदास प्रभु सों मेरी गति जनु लुब्धक कर मीन तरयो।— सूर (शब्द०)। २. उत्तरी गोलार्ध का एक बहुत तेजवान तारा। (आधुनिक)। ३. लालची आदमी। लोभी व्यक्ति (को०)। ४. वह व्यक्ति जो अत्यंत रागी वा कामुक हो (को०)। ५. पिछला भाग। पीछे का हिस्सा (को०)।

लुब्धना पु
क्रि० अ० [सं० लुब्ध] दे० 'लुबुधना'।

लुब्धापति
संज्ञा स्त्री० [सं०] केशव के अनुसार प्रोढ़ा नायिका का चतुर्थ भेद। वह प्रौढ़ा नायिका जो पति और कुल के सब लोगों की लज्जा करे। यथा,— सो लुब्धापति जानिए केशव प्रगट प्रमान। कनि करै कुलपति सबै प्रभुता प्रभुहि समान।—केशव (शब्द०)।

लुब्व
संज्ञा पुं० [अं०] १. बुद्धि। अक्ल। २. तत्व या सार भाग। ३. विशुद्ध। खालिस। ४. मग्ज। मींगी। गिरी [को०]।

लुब्बलुबाब
संज्ञा पुं० [अं० लुब्बे लुबाब] १. गूदा। सार। २. किसी बात का तत्व। सारांश।

लुभाना (१)
क्रि० अ० [हि० लोभ+आना (प्रत्य०)] १. लुब्धहोना। अत्यंत रागयुक्त होना। मोहित होना। आकर्षित होना। रीझना। उ०— कूबरी के कौन गुन पै पहे कान्ह लुभाइ।—सूर (शब्द०)। २. लालसा करना। लालच में पड़ना। ३. तन मन की सुध झूलना। मोह में पड़ना। संयो० क्रि०—जाना।

लुभाना (२)
क्रि० स० २. लुब्ध करना। अत्यंत रागयुक्त करना। अपने ऊपर गहरा प्रेम उत्पन्न कराना। मोहित करना। रिझाना। २. प्राप्त करने की गहरी चाह उत्पन्न करना। ललचाना। जैसे,—उसकी कारीगरी ने हमें लुभा लिया। २. सुध बुध भुलाना।— भ्रांत करना। मोह में डालना। उ०— सूर हरि की प्रबल माया देति मोहिं लुभाय।—सूर (शब्द०)। संयो० क्रि०—लेना।

लुभित
वि० [हि० लुभाना] १. क्षुब्ध। २. मुग्ध। मोहित। ३. लुब्ध। ललचाया हुआ [को०]।

लुर (१)
वि० [फा०] उजड्ड। घामड़। मूर्ख। बुद्धिहीन [को०]।

लुर ‡ (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] गुर। शऊर। समझ।

लुरकना †
क्रि० अ० [सं० लुलन(=झूलना)] अधर में टँगकर हिलना। डोलना। नोचे को ओर झुकना। लटकना। झूकना।

लुरका
संज्ञा पुं० [हि० लुरकना(=लटकना)] झुपका।

लुरकी (१)
संज्ञा स्त्री० [हि० लुरकना(=लटकना)] कान में पहनने की बाली। मुरको। उ०— देव जगामग जातन का लर मोतिन की लुरकीन सों नाधी।— देव (शब्द०)।

लुरकी (२)
संज्ञा स्त्री० [हि० लोंदा] दे० 'लुदकी'।

लुरना पु †
क्रि० अ० [सं० लुलन(=झूलना)] १. ऊपर से नीचे तक चली आई हुई वस्तु का इधर उधर हिलना ड़ोलना। लटकना। झूलना। लहरना। उ०— (क) छतियाँ पर लोल लुरैं अलकै सिर फूल अरुझि सों यों दुति है।— (शब्द०)। (ख) झपकैं पलकैं बिथुरी अलकैं अरु हार लुरै मुकुता गल में।— सुंदर (शब्द०)। २. ढल पड़ना। झुक पड़ना । टूट पड़ना। ३. कहीं से एकबारगी आ जाना। उ०— ब्रह्म की बिझूति, करतू त विश्वकर्मा की, साहिबी सकल पुरहूत की लूरै परी।— (शब्द०)। संयो० क्रि०—पड़ना। ४. आकर्षित होना। लुभा जाना। लट्टू होना। प्रवृत्त होना। उ०— संग ही संग बसौ उनके, अँग अंगन देव तिहारे लुरी है।— देव (शब्द०)। संयो० क्रि०—पड़ना।

लुरियाना † (१)
क्रि० अ० [हि० लुरना] १. प्रेमपूर्वक स्पर्श करना या अंग रखना। प्यार करना। २. एकाएक आ पड़ना। दे० 'लुरना'—३।

लुरियाना (२) †
क्रि० सं० [हिं०] लुंडी करना। लपेटना।

लुरी
संज्ञा स्त्री० [हि० लेरुवा(=बछड़ा?)] वह गाय जिसे बच्चा दिए थोड़े ही दिन हुए हों। उ०—लाडिली लीली कलोरी लुरी कहँ लाल लुके कहाँ आगा लगाइकै।— केशव (शब्द०)।

लुलन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० लुलित] लटकते हुए इधर उधर हिलना डोलना। आदोलित होना। झूलना।

लुलना पु
क्रि० अ० [सं० लुलन] लटकते हुए हिलना डोलना। झूलना। लहराना। दोलित होना।

लुलाप
संज्ञा पुं० [सं०] महिष। भैसा [को०]। यौ०—लुलापकंद=महिषकंद। लुलापकांता=भैंस।

लुलाय
संज्ञा [सं०] दे० 'लुलाप' [को०]। यौ०—लुलायकंद=महिषकंद। लुलायकांता। लुलायकेतु।

लुलायकांता
संज्ञा स्त्री० [सं० लुलायकान्ता] भैंप।

लुलायकेतु
संज्ञा पुं० [सं०] शिव का एक गण [को०]।

लुलित
वि० [सं०] १. लटकता या झूलता हुआ। आंदोलित। २. छितराया हुआ। अस्तव्यस्त (को०)। ३. लटका हुआ। बिखरा हुआ। जैसे, केश। ४. कुचला, दबा या चोट खाया हुआ (को०)। ५. थकामादा। क्लांत (को०)। ७. सुंदर। शानदार (को०)। यौ०—लुलितकुड़ल=हिलते हुए कु़ड़लोंवाला। लुलितपल्लव= हिलते हुए पत्तावाला। लुलितमंडन=अस्तव्यस्त आभरणवाला।

लुवार †
वि० [हि० लू] गरमी के दिनों की तपी हुई गरम हवा। तप्त वायु। लू। क्रि० प्र०—चलना।

लुशई
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की चाय जो आसाम और कछार में होती है।

लुशभ
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'लुषभ' [को०]।

लुष
संज्ञा पुं० [सं०] निषाद और चाणकी से उत्पन्न संतति [को०]।

लुषभ
संज्ञा पुं० [सं०] मत्त वारण। मस्त हाथी [को०]।

लुस्त
संज्ञा पुं० [सं०] धनुष का छोर या सिरा [को०]।

लुहँगी †
संज्ञा स्त्री० [सं० लोहाड़्ग] लोहा जड़ी हुई लाठा। ऐसी लाठी जिसके मोटे सिरे पर लोहा जड़ा रहता है। लोहबदा।

लुहना पु
क्रि० अ० [सं० लुभन] लुभाना। ललचना। मोहित होना। उ०— अरि कै वह आजु अकेली गई खरिकै हरि के गुन रूप लुही।— देव (शब्द०)।

लुहनी †
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का अगहनी धान जिसका चावल बहुत दिन रह सकता है।

लुहार
संज्ञा पुं० [सं० लौहकार, प्रा० लोहार] [स्त्री० लुहरिन, लुहारी] १. लोहे का काम करनेवाला। लोहे की चीजें बनानेवाला। २. वह जाति जो लोहे की चीजें बनाती है।

लुहारिन
संज्ञा स्त्री० [हि० लुहार+इन (प्रत्य०)] लुहार जाति की स्त्री।

लुहारी
संज्ञा स्त्री० [हि० लुहार] १. लुहार जाति की स्त्री। २. लोहे की वस्तु बनाने का काम। जैसे,— वह लुहारी सीख रहा है।

लुहुर †
संज्ञा स्त्री० [सं० लघु, हि० लहुरा] छोटे कानोंवाली भेड़। (गड़ेरिए)।

लूँण पु †
संज्ञा पुं० [सं० लवण, प्रा० लूण] नमक। लवण।

लूँबरी
संज्ञा स्त्री० [हि० लोमड़ी] दे० 'लोमड़ी'।

लू
संज्ञा स्त्री० [सं० लुक(=जलना); हिं० लौ(=लपट)] गरमी के दिनों की तपी हुई हवा। गरम हवा का लपट या झोंका। तप्त वायु। क्रि० प्र०—चलना।—बहना। मुहा०—लू मारना या लगना=शरीर में तपी हवा लगने से ज्वर आदि उत्पन्न होना।

लूक (१)
संज्ञा पुं० [सं० लुक] एक प्रकार का जलता हुआ पिंड दो आकाश से गिरता हुआ कभी कभी दिखाई पड़ता है। टूटा हुआ तारा। विशेष दे० 'उल्का'। उ०—(क) दिन ही लूक परन विधि लागे।— मानस, ६। ३१। (ख) लूक न असनि केतु नहिं राहू।— मानस, ६। ३१।

लूक (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० लुक(=जलना)] १. अग्नि को ज्वाला। आग की लपट। २. पतली लकड़ी जिसका छोर दहकता हुआ हो। जलती हुई लकड़ी। लुत्ती। उ०— दोउ लियो ठीक विचारि, इक लूक लीन्हो बारि।— रघुराज (शब्द०)। मुहा०—लूक लगाना=जलती लकड़ी या बत्ती छुलाना। आग लगाना। उ०— मारि मुलूक में लूक लगायों।— लाल (शब्द०)। ३. गरमी के दिनों की तपी हवा। तप्त वायु का झोंका जो शरीर में लपट की करह लगे। लू। उ०—ए ब्रजचंद्र ! चलौ किन वा ब्रज, लूकैं बसंत की ऊकन लागों।— पद्माकर (शब्द०)। ४. टूटा हुआ तारा। उल्का। लूक। उ०— सुमारि राम तरीके तोयनिधि लंक लूक सो आया।—तुलसी (शब्द०)।

लूकट पु
संज्ञा पुं० [हि० लूक] जलत हुई लकड़ा। लूक। लुकाठी।

लूकना पु (१)
क्रि० सं० [हि० लूक+ना] आग लगाना। जलाना। उ०— हिय अंदर रावरो मंदिर है तेहि या बिरहानल लूकिए ना।— (शब्द०)।

लूकना पु ‡ (२)
क्रि० अ० [सं० √ लुक्] दे० 'लुकना'। उ०— लूकि केते रहे, धूकि, केते गए चूकि कंते दए, सूकि केते चहे।—सूदन (शब्द०)।

लूका (१)
संज्ञा पुं० [सं० लुक (=जलना)] [स्त्री० अल्पा०, लूकी] १. अग्नि की ज्वाला। आग की लौ या लपट। उ०— नखत अका- सहि चढ़े दिपाई। तत तत लूका परहिं दिखाई।—जायसी (शब्द०)। २. चिनगी। चिनगारी। स्फुलिंग। ३. पतली लकड़ी जिसका छोर दहकता हो। लकड़ी जिसके एक सिरे में आग हो। लुत्ता। मुहा०—लूका लगाना=आग छुलाना। आग लगाना। जलाना। मुँह में लूका लगाना=मुँह जलाना। तिरस्कार करना। (स्त्रियों की गाला)।

लूका (२)
संज्ञा पुं० [देश०] मछली फँसाने का एक प्रकार का जाल।

लूका (३)
संज्ञा पुं० [अं० लूकस] बाइबिल का लूकस नामक संत।

लूकी †
संज्ञा स्त्री० [हि० लूका] १. आग की चिनगारी। स्फुलिंग। उ०— हिया फाट वह जब ही कूकी। परैं आँसु सब होइ होइ लूकी।— जायसी (शब्द०)। २. पतली लकड़ी या तिनके का टुकड़ा जिसका सिरा जलता हो। लूका। मुहा०—लूकी लगाना=आग लगाना। जलाना।

लूक्ष
वि० [सं०] रूक्ष। रूखा [को०]।

लूखा पु
वि० [सं० लुक्ष या (लूक्ष=रूक्ष, रूखा)] बिना चिकनाहट का। रूखा। उ०—मना मनोरथ छाँड़ि दे तेरा किया न होय। पानी में घी नीकसै लूखा खाइ कोय।— कबीर (शब्द०)।

लूगड़ †
संज्ञा पुं० [हिं० लूगा] १. वस्त्र। कपड़ा। २. ओढ़नी। चादर।

लूगा †
संज्ञा पुं० [देश०] १. वस्त्र। कपड़ा। उ०— रोटी लूगा नीके रोखै आगेहु की बेद भाषैं भली ह्नैहै तेरो ताते आनँद लहत हौं।— तुलसी (शब्द०)। २. धोती।

लूघर पु †
संज्ञा पुं० [हि० लूका] जलती हुई लकड़ी। लुकारी।

लूधा
संज्ञा पुं० [देश०] कब्र खोदनेवाला। गोरकन। (ठग)।

लूट
संज्ञा स्त्री० [हिं० लूटना] १. बलात् अपहरण। किसी के माल का जबरदस्ती छीना जाना। किसी की धन संपत्ति या वस्तु का बलपूर्वक लिया जान। डकैती। जैसे,— (क) दगे में बाजार की लूट हुई।— (ख) सिपाहियों की लूट का माल खूब मिला। क्रि० प्र०—करना।—पड़ना।—मचना।—होना। यौ०—लूट खसोट=(१) छीना झपटी। लूटमार। (२) शोषण। लूटखूँद, लूटमार, लूटपाट=लोगों को मारने पाटने और उनका धन छीनने का व्यापार। डकैती और दंगा। २. लूटने से मिला हुआ माला। अपहृत धन। जैसे, —लूट में सब सिपाहियों का हिस्सा लगा।

लूटक
संज्ञा पुं० [हि० लूट+क (प्रत्य०)] १. जबरदस्ती छीननेवाला। लूटनेवाला। २. डाकू। लुटेरा। ३. कांति हरनेवाला। शोभा में बढ़ जानेवाला। उ०— असनि सरासन लसत, सुचि सर कर, तून कटि मुनिपट लूटक बसन के।— तुलसी (शब्द०)।

लूटखूँद
संज्ञा स्त्री० [हि० लूटना+खूँदना] लोगों को मारने और उनका धन छीनने का व्यापार। डाका और दंगा। लूटमार।

लूटना
क्रि० सं० [सं० लुट् (=लूटना)] १. बलात् अपहरण करना। जबरदस्ती छीनना। भय दिखाकर, मार पटिकर या छीन झपटकर ले लेना। जैसे,—रास्ते में डाकुओं ने सारा माल लूट लिया। उ०— (क) केशव फूलि नचैं भ्रकुटी, कटि लूटि नितंब लई बहु काली।—केशव (शब्द०)। (ख) जानी न ऐसी चढा चढ़ी में केहि धौं कटि बीच ही लूटि लई सी।— पद्माकर (शब्द०)। (ग) चोर चख चोरिन चलाक चित चोरी भयो, लूटि गई लाज, कुल कानि को कटा भयो।—पद्माकर (शब्द०)। संयो० क्रि०—लेना। यौ०—लूटना पाटना। लूटना मारना। मुहा०—लूट खाना=दूसरे का धन किसी न किसी प्रकार ले लेना।२. बरबाद करना। तबाह करना। ३. धोखे से या अन्यायपूर्वक किसी का धन हरण करना। अनुचित रीति से किसी का माल लेना। जैसे,— कचहरी में जाओ, तो अमले लूटते हैं। मुहा०— (किसी को) लूट खाना=किसी का धन अनुचित रीति से ले लेना। किसी का माल मारना। ४. बहुत अधिक मूल्य लेना। वाजिब से बहुत ज्यादा कीमत लेना। ठगना। जैसे,— वह दूकानदार ग्राहकों को खूब लूटता है। ५. मोहित करना। मुग्ध करना। वशीभूत करना। मन हाथ में करना। उ०— छूटी घुँघरारी लट, लूटी है बधूटी बट, टूटी चट लाज तेंन जूटी परी कहरैं।— दीनदयाल (शब्द०)। ५. भोग करना। भोगना। जैसे,—सुख लूटना, आनंद लूटना। विशेष— इस क्रिया का प्रयोग सुख या आनंद का भोग करने के अर्थ में भी सुख, आनंद, मोज आदि कुछ शब्दों के साथ होता है। जैसे,—आनंद लूटना सुख लूटना।

लूटि पु †
संज्ञा स्त्री० [हि० लूटना] दे० 'लूट'। उ०— गए कंचुकि बैद टूटि लूटि हिरदय सो पाई। करति मनहि मन सेव निकट रथ दयो देखाई।—सूर (शब्द०)।

लूत (१)
संज्ञा पुं० [इबरानी] यहूदियों के एक पुराने पैगंबर का नाम।

लूत (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० लूता] मकड़ी। ऊर्णनाभ। उ०— लगे लूत के जाल ए, लखी लसत रहि भौन।— मतिराम (शब्द०)।

लूत (३)
वि० [फा०] नग्न। नंगा [को०]।

लूत (४)
वि० [सं०] छिन्न। खंड़ित। टूटा हुआ। विभक्त।

लूता (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मकड़ी। ऊर्णनाभ। २. फफोले की तरह की फुंसी जो, कहते हैं, मकड़ो के मूतने से निकलती है। वुक्का। मर्मव्रण। विशेष— वैद्यक के ग्रंथों में 'लूता' रोग कई प्रकार का कहा गया है और कई प्रकार की विषैली मकड़ियों की चर्चा है। जैसे,— त्रिमड़ला, श्वेता, कपिला, रक्तलूता इत्यादि। विष के संबंध में कहा गया है कि मकड़ी के थूक, नख, मूत्र, रज, शुक्र और पुरीष के द्वारा विष का संचार होता है। लूता रोग यदि अच्छा न हो, तो आदमी मर जाता है। ३. पिपीलिका। च्यूँटी।

लूता (२)
संज्ञा पुं० [हि० लूका] [स्त्री० अल्पा० लूती] लकड़ी जिसका एक सिरा जलता हो। लूका। लुआठा। उ०— सोवत मनसिज आनि जगायो पठै सँदेस स्याम के दूते। बिरह समुद्र सुखाय कौन बिधि किरचक योग अग्नि के लूते।— सूर (शब्द०)। मुहा०—लूता लगाना=आग लगाना।

लूतांततु
संज्ञा पुं० [सं० लूतातन्तु] मकड़ी का जाला [को०]।

लूतात
संज्ञा पुं० [सं०] चींटा [को०]।

लूतापट्ट
संज्ञा पुं० [सं०] मकड़ी का अंड़ा [को०]।

लूतायम
संज्ञा पुं० [सं० लूता+आमय] मकड़ी फरने का रोग। वृक्का। लूता रोग [को०]।

लूतामर्कट, लूतामर्कटक
संज्ञा पुं० [सं०] १. वनामानुष। २. एक प्रकार की चमेली [को०]।

लूतिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] लूता। मकड़ी [को०]।

लूती (१)
संज्ञा स्त्री० [हि० लूता] पतली लकड़ी जिसका एक सिरा जलता हो। लुआठी। मुहा०—लूती लगाना=आग लगाना।

लूती (२)
वि० [अ०] १. धृष्ट। बेहया। ढीठ। २. स्वेच्छाचारी। धर्म अधर्म का विचार न करनेवाला। ३. अप्राकृतिक व्यभिचार करनेवाला। गुदामैथुन करनेवाला। ४. लूत द्वारा प्रवर्तित संप्र- दाय या वंश का [को०]।

लून (१)
वि० [सं०] १. छिन्न। कटा या लुना हुआ। २. चयन किया हुआ। जैसे,— फूल। ३. क्षत। घायल। आहत। ५. विध्वस्त। नष्ट। ५. कतरा हुआ [को०]।

लून (२)
संज्ञा पुं० [सं० लवण, प्रा० लूण] दे० 'लोन'।

लून (३)
संज्ञा पुं० [सं०] पूँछ। लूम [को०]।

लूनक (१)
संज्ञा पुं० [हि० लोना] १. सज्जी खार। २. अमलोनी का साग।

लूनक (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. विभाजन। २. व्रण। घाव। ३. भेद। प्रकार। जाति। ४. एक जानवर [को०]।

लूनक (३)
वि० [सं०] कटा हुआ। विभाजित [को०]।

लूनना पु †
क्रि० सं० [हि०] दे० 'लुनना'।

लूप (१)
संज्ञा पुं० [सं०] लांगूल। पूँछ। दुम।

लूम (२)
संज्ञा पुं० संपूर्ण जाति का एक राग जिसमें सब शुद्ध स्वर लगते हैं। इसके गाने का समय रात ११ दंड़ से १५ दंड़ तक है। यह मेघ राग का पुत्र कहा गया है। (हनुमत)।

लूम (३)
संज्ञा स्त्री० [देश०] कलाबत्तू की लच्छी।

लूम (४)
संज्ञा पुं० [अं० लूम] कपड़ा बनने का करघा। जैसे, हैंडलूम, पावरलूम।

लुमड़ी †
संज्ञा स्त्री० [सं० लोमश] दे० 'लोमड़ी'।

लूमना पु
क्रि० अ० [सं० लम्बन (=दोलन)] लटकना। झूलना। लहराना। उ०—(क) लपकि चढ़े हरि तासु पै लूमि डहड़ही ड़ार। कियो सदंब कंदबु हूँ नाथ कृपा आगार।—व्यास (शब्द०)। (ख) जूमि जूमि बरसाती तरिवर लहरत तहँ लता रहीं लूमि लूमि।—देवस्वामी (शब्द०)।

लूमर
वि० [देश०] सयान। जवान। युवा। (व्यंग या तिरस्कार) जैसे,— इतने बड़े लूमर हुए, कुछ शऊर न आया।

लूमविष
संज्ञा पुं० [सं०] ऐसा जंतु जिसकी पूँछ में विष होता है। पूँछ से डंक मारनेवाला जंतु [को०]।

लूर ‡
संज्ञा पुं० [?] गुर। गुन। शऊर।

लूरना पु
क्रि० अ० [सं० लुलन(=झूलना)] दे० 'लुरना'। उ०—सिरसि जटा कलाप पानि सायक चाप उरसि रुचिर बनमाल लूरति।—तुलसी (शब्द०)।

लूला
वि० [सं० लून (=कटा हुआ)] [पु० स्त्री० लूली] १. जिसका हाथ कटा गया हो। बिना हाथ का। लुंजा। टुंडा। २. बेकाम। असमर्थ। उ०— कोकिल केकी कुलाहत हूल उठी उर में, मति की गति लूली।—(शब्द०)।

लूलुक
संज्ञा पुं० [सं०] मंडूक। मेंढक [को०]।

लूलू
वि० [देश०] मूर्ख। बेवकूफ। उजड़्ड। उल्लू। बुद्धिहीन। मुहा०—लूलू बनाना=(१) बेवकूफ बनाना। बातों में मूर्ख प्रमाणित करना। (२) उपहास करना।

लूसन
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का फलदार पेड़।

लूह †
संज्ञा स्त्री० [सं० लुत(=जलहा)+हिं० लौ(=लपट)] दे० 'लू'।

लूहरा †
संज्ञा स्त्री० [हि० लूह] दे० 'लू'। उ०— ऊँचे ते गर्व गिरावत क्रोध सो जो बहि लूहर लावत भारे।—केशव (शब्द०)।