विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/इ

विक्षनरी से
Jump to navigation Jump to search


देवनागरी वर्णामाला में स्वर से अंतर्गत तीसरा बर्ण । इसका उच्चारणस्थान तालु और प्रयत्न विवृत है । ई इसका दीर्घ रूप है ।

इंक
संज्ञा स्त्री०[अं०] स्याही । मसी । रोशनाई । विशेष— यह मुख्यत? दो प्रकार की होती है—लिखने की और छापने की । लिखने की स्याही कमीस, हइ, माजु आदि को औटाकार बनती है और छापने की स्याही राल, तेल काजल इत्यादि को घोंटकर बनाई जाती है । यौ०—इंक पाट = स्याही रखने का बर्तन । मसीपात्र । दावात । इंक पैड = स्याही लगी एक छोटी सी गददी जिससे रबर की मुहर आदि पर स्याही लगाई जाती है ।

इंकदेबल
संज्ञा पु० [अं०] छापेखाने में स्वाही देने की चौकी । विशेष—यह दो प्रकार की होती है— (१) सिंपुल (सादी)=यह सिर्फ एक चिकनी और साफ लोहे की ढली हुई चौकी होती है । (२) सिलिंड्रिकल (बेलनदार)=लोहे की एक साफ और चिकनी चौकी होती है जिसके एक ओर लोहे का एक बेलन लगा होता है । बेलन के पीछे एक प्रकार की नाली सी बनी रहती है जिसनें कुछ पेंच लगे होते हैं और स्याही भरी रहती है । उन पेंचों को कसने और ढीला करने स्याही आवश्यकता- नुसार कम वा अधिक आती है और पिसकर बराबर हो जाती है । बेलनवाली चोकी में स्याही देनेवाले को अधिक मलने का परिश्रम नहीं करना पड़ता ।

इंकमैंन
संज्ञा पुं० [अं०] छापेखाने में मशीनपर स्याही देनेवाला मनुष्य । स्याहीवान ।

इंकरोलर
संज्ञा पुं० [अं०] छापेखाने में स्याही देने का बेलन । विशेष—यह तीन प्रकार का होता है—(१) लकड़ी का मोटा बेलन जिसपर कंबल, बनात वगैरह लपेटकर ऊपर से चमड़ा मढ़ते हैं । यह बेलन पत्थर के छापे में काम देता है । (२) लकड़ी का बेलन जिसपर रबड़ ढालकर चढ़ाते है । यह बहुत कम काम में आता है । (३) तीसरे प्रकार का बेलन गराड़ीदार लकडी़ पर गला हुआ गुड़ और सरेस चढ़ाकर बनाते हैं । यही अधिक काम में आता है ।

इंग (१)
संज्ञा पुं० [सं० इङ्ग=इशारा, चिह्म] १. चलना । हिलना । डुलना । २. इशारा । ३. निशान । चिह्वन । ४. हाथी का दाँत । उ०—बंक लगे कुच बीच नखक्षत देखि भईं दुग दुनी लजारी । मानों बियोग बराह हन्यो युग शैल की संधिनि इंगवै डारी ।—केशव (शब्द०) । अंग द्बारा भावों की अभिव्यक्ति । भावों की आंगिक अभिव्यक्ति (को०) । ६. ज्ञान (को०) । ७. पृथिवी । भूमि (को०) ।

इंग (२)
वि० १. गतिशील । हिलता हुआ । चल । २. विस्मयकारक । आश्चर्यजनक [को०] ।

इंगन
संज्ञा पुं० [सं० इङ्गन] [वि० इंगित] चलना । काँपना । २. हिलना । डोलना । ३. इशारा । संकेत । ४. ज्ञान । जानकारी (को०) ।५. चलाना (को०) । ६. हिलाना डुलाना (कौ०) ।

इंगनी
संज्ञा स्त्री० [अं० मैंगनीज] एक प्रकार का मोर्चा जो धातुओं में आक्सीजन के मिलने से पैदा होता है । विशेष—इंगनी भारतवर्ष में राजस्थान, मैसूर, मध्यप्रांत और मद्रास की खानों से निकलती है । यह काँच के हरेपन को दूर करने और काँच का लुक करने के काम आती है । यह अब एक प्रकार का सफेद लोह्वा बनाने के काम में भी आती है जिसे अँगरेजी में 'फेरो मैंगनीज' कहते है ।

इंगल पु, इंगला पु
संज्ञा स्त्री० [सं० इडा] हठयोग के अनुसार इडा नाम की एक नाड़ी । उ०— तीर चलै जो इंगल माँही । उत्तिम संमत जो चलि जाहीं ।—सं० दरिया, पृ० २७ । (ख) इंगला पिंगला नाता कर ले सुषमन के घर मेला । —रामानंद० पृ० ३६ । (ग) इंगला पिंगला सुखमन नारी । शून्य सहज में बसहिं० मुरारी ।—सूर (शब्द०) । विशेष—यह नाडी़ बाईं ओर होती है । इसका काम बाइँ नाक केनथने से श्वास निकालना और बाहर करना है । यह शब्द इस नाड़ी के साथ की ही दूसरी नाड़ी "पिंगला' की समध्वन्यात्मकता पर बना है । इस नाड़ी को 'चंद्र नाड़ी' कहते हैं । हठयोग के स्वरोदय में इसका विवरण है ।

इंगलिश (१)
वि० [अं०] १. इंगलैंड देश संबंधी । अँगरेजी । २. पेंशन (सिपाहियों की भाषा) ।

इंगलिश (२)
संज्ञा स्त्री० अँगरेजी भाषा ।

इंगलिशमैन
संज्ञा पुं० [अं०] इंगलैंड निवासी व्यक्ति । अँगरेज ।

इंगलिस्तान
संज्ञा पुं० [अं० इंगलिश+फा० स्तन= जगह, तुल० सं० स्थान] अँगरेजों का देश । इंगलैंड ।

इंगलिस्तानी
वि० [अं० इंगलिश+फा० स्तानी] अँगरेजी । इंगलैंड देश का । उ०—इंगलिस्तानी और दरियाई कच्छी ओलंदेजी । औरहु बिबिध जाति के बाजी नकत पवन की तेजी ।— रघुराज० (शब्द०) ।

इंगलैंड
संज्ञा पुं० [अं०] अँगरजों का देश । इंगलिस्तान ।

इंगार पु
संज्ञा पुं० [सं० इड़गाल] दे० 'अंगार' । उ०—देही कण इंगार जू तपै, राजर मांथ भयउ उगतउ भाण ।—बी० रासो०, पृ० १२ ।

इंगालकर्म
संज्ञा पुं० [सं० अड़गारकर्म] जैनमतानुसार वह व्यापार जो अग्नि से हो । जैसे,—लोहारी, सीनारी ईट बनाना, कोयला बनाना ।

इंगित (१)
संज्ञा पुं० [सं०इड़िगत] १. ह्वदय के अभिप्राय को व्य़क्त करनेवाली आंगिक चेष्टा । २. संकेतचिह्नन । इशारा । ।उ०—तरुगण अपनी शाखाओं से इंगित करके उसे दिखाते मार्ग ।—कानन०, पृ० ५७ । ३. अभिप्राय । मन का विचार या भाव (को०) । ४. हिलना डोलना । चलन (को०) ।

इंगित (२)
वि० १. हिलका हुआ । २. चलित । कंपित ।

इंगितकोविद
वि० [सं० इड़िगतकोविद] आंगिक चेष्टा द्बारा आंतरिक भावों को जानने में उनकी अभिव्याक्ति में कुशल [को०] ।

इंगितज्ञ
वि० [सं० इ़ड़िगतज्ञ] दे० 'इंगित कोबिद' [को०] ।

इंगु
संज्ञा पुं० [सं० इड़गु] एक रोग [को०] ।

इंगुद
संज्ञा पुं० [सं० इड़गुद] दे० 'इंगुदी' ।

इंगुदी
संज्ञा स्त्री० [सं०इड़गुदी] १. हिगोट का पेड़ । उ०— बिलसत निब विशाल इंगुदी अरु आमलकी ।—श्यामा, पृ०, ३९ । २. ज्योतिष्मती वृक्ष । मालकँगनी । ३. हिगोट की गरी (को०) ।

इंगुर पु †
संज्ञा पुं० [हि०] दे० 'ईगुर' ।

इंगुरौटी
संज्ञा स्त्री० [हि० ईंगुर+औटी (प्रत्य०)] वह डिबिया या पात्र जिसमें सौभाग्यवती स्त्रियाँ ईगुर रखती हैं । सिंधौरा ।

इंगुल
संज्ञा पुं० [सं० इड़गुल] दे० 'इंगुदी' [को०] ।

इंच
संज्ञा स्त्री० [अं०] १. एक फुट का बारहवाँ हिस्सा । तीन आड़े जव की लंबाई । तस्सू । २. अत्यल्प । बहुत थोड़ा । उ०— इन महात्माओं के ध्यान में यह बात नहीं आती कि ऐसी दलीलों से उनकी अभ्रांतिशीलता एक इंच भी कम नहीं हीती ।— सरस्वती (शब्द०) ।

इंचाक
संज्ञा पुं० [सं० इञ्चाक] एक, प्रकार का मत्स्य । जल- वृश्चिक [को०] ।

इंचार्ज
वि० [अं०] किसी कार्य या विभाग की देखभाल करनेवाला । किसी कार्य या विभाग की जिम्मेदारी वहन करनावाला [को०] ।

इंच्छया पु
संज्ञा स्त्री [सं० इच्छा] दे० 'इच्छा' । उ०— न तहाँ इंच्छया ओं अंकार । न तहाँ नाभि न नालि तार ।—रामानेद०, पृ०, ८ ।

इंछ पु
संज्ञा स्त्री० [सं० इच्छा] आकांक्षा । इच्छा ।

इंछना पु
क्रि० सं० [हिं० इंछ+ना (प्रत्य.)] दे० 'इच्छना' । उ०—पुनि तिनकी पद पंकज रज अज अजहूँ छिछै । उद्धौ बुद्बि विशुद्धनु सौं पुनि सौ रह इंछै ।—नंद० ग्र० पृ०, ४१ ।

इंछा पु
संज्ञा स्त्री० दे० 'इच्छा' । उ०—बर सजोग मोहि मेरवहु कलस जाति हौं मानि । जोहि दिन इंछा पूजै बेगि चढ़ावौं आनि ।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० २५० ।

इंजन
संज्ञा पुं० [अं० एंजिन] १.कल पेंच । २. भाप या बिजली से चलनेवाला यंत्र । ३. रेलवे द्नेन में वह गाड़ी जो सबसे आगे रहती है और सब गड़ियों को खींचती है । उ०— इच्छा कर्म संय़ोगी इंजन गारड आप अकेला है ।—प्रेमघन०, भा०, २. पृ० ४०३ । यौ०.—इंजनड़्राइवर = इंजन को चलानेवाला व्यक्ति ।

इंजर पु
संज्ञा पुं० [देश.] दे० 'समुंदरफल' ।

इंजीनियर
संज्ञा पुं० [अं० एंजीनियर] १. य़ंत्र की बिद्या जाननेवाला । कलों का बनाने या चलानेवाला । २. शिल्प विद्या में निपुण । विश्वकर्मा । ३. वह अफसर दिसके निरीक्षण में सरकारी सड़कें, इमारतें और पुल इत्यादि बनते है ।

इंजीनियरिंग
संज्ञा स्त्री० [अं०] १. इंजीनियर का कार्य । यंत्रादि के नीर्माण का काम । २. लोहे के कल पुर्ज आदि बनाने का काम [को०] ।

इंजील
संज्ञा स्त्री० [यु०] १. सुसमाचार । २. ईसाइयों की धर्म पुस्तक । बाइबिल ।

इंजेक्शन
संज्ञा पुं० [अं०] वह द्रव्य औषध जो सूई द्बारा शरीर में प्रविष्ट कराया जाय । उ०— ड़ाक्टरों ने इंजेकशन लेने के लिये कहा ।—संन्यासी, पृ० १६९ । क्रि० प्र०—चढ़ाना । —देना ।—लेना ।

इंट्रैस
संज्ञा पुं० [अं० एट्रैंस] १. द्बार । दरवाजा । फाटक । २. अंग्रेजी पाठशालाओं की एक श्रोणी ।

इंड़ पु
संज्ञा पुं० [सं० अंड] दे० 'अंड' । उ०— ध्यावै इंड़ करै चौचंदा । आपु देखि ओर सहज अनंदा ।—कबीर सा०, पृ०९०६ ।

इंड़ज पु
वि० [सं० अंडज] अंडा । अंडे के आकार का । उ०— तिहि रानी पूरब क्रम गत्तिय । इंडज आक्रति हड़ड प्रसूतिय ।— पू० रा०, ५७ । १९६ ।

इंडस्ट्रियल
वि० [अं०] उद्योग धंधा संबंधी । शिल्प । संबधी । औद्योगिक । जैसे,—इंड़स्ट्रियल कानफरेंस ।

इंड़स्ट्री
संज्ञा स्त्री० [अं०] उद्योगधंधा । शिल्प ।

इंडियन
वि०, पुं० [अं०] हिंदुस्तान निवासी । भारतीय [को०] ।

इंडिया
संज्ञा पुं० [यू० अं०] हिदुस्तान । भारतवर्ष ।

इंडियाआफिस
संज्ञा पुं० [अं० इंड़िया आँफि़स] ब्रिटिश शासनकाल में भारत संबंधी कार्य या व्यवस्था के लिये स्थापित लंदन स्थित एक कार्यालय । भारत और पकिस्तान के स्वतंत्र होने पर इस कार्यालय की सभी महत्वपूर्णा सामग्री यथाप्राप्त दोनों देशों में बाँट दी गई ।

इंडीक
संज्ञा पुं० [सं०] कलमतराश चाकू [को०] ।

इंडेक्स
संज्ञा पुं० [सं०] (पुस्तक के) विषयों की आक्षरक्रम से बनी हुई सूची । बिषयानुक्रमणिका । अनुक्रमणिका ।

इंडेंट
संज्ञा पुं० [अं०] माल मँगाने के समय भेजी जानेवाली माल की वही सूची जो किसी व्यापारी के पास माल की माँग के साथ भेजी जाती है ।

इंड़ोर्स
क्रि० सं० [अं० एंडोर्स] चेक या हुंडी आदि पर रूपए देने या पाने के संबंध में हस्ताक्षर करना ।

इंडोली
संज्ञा स्त्री० [देश.] एक औषध का नाम ।

इंड़्र
संज्ञा पुं० [सं०] हाथ की सुरक्षा के लिये मूज का दस्ताना [को०] ।

इंतकाम
संज्ञा पुं० [अं० इंतकाम] अपकार काब दला । बदला [को०] ।

इंतकाल
संज्ञा पुं० [अं० इंतकाल] १. मृत्यु । मौत । परलोकवास । २. एक जगह से दूसरी जगह जाना । ३. किसी जायदाद या संपत्ति का एक के अधिकार से दूसरे के अधिकार में जाना । यौ०.— इंतकाल जायदाद = रेहन, वय आदि के कारण संपत्ति का दूसरे के हाथ जाना ।

इंतखाब
संज्ञा पुं० [अं० इतखाब] १. खसरा या खतौती आदि के किसी लेख की बाजाब्ते कराई हुई नकल । २. चुनना या छाँटना । ३. चुनाव [को०] ।

इंतजाम
संज्ञा पुं० [अं० इंतजा़म] प्रबंध । बंदोबस्त । व्यवस्या ।

इंतजार
संज्ञा पुं० [अं० इंतजार] प्रतीक्षा । बाट जोहना । रास्ता देखना । अगोरना । क्रि० प्र०— करना ।—होना ।

इंतशार
संज्ञा पुं० [अं०] १. चिंता । परेशानी । उद्बिग्नता । २. बिखरने की स्थिति । बिखराव [को०] ।

इंतहा
संज्ञा पुं० [अं०] १. समाप्ति । अंत । उ०— इब्तिदा में ही मर गए सब यार । इशक की कौन इंतहा लाया । —कविता कौ० भा०, ४ पृ० १३३ । २. हद । पराकाष्ठा । मुहा०—हंतहा करना = हद कर देना । अति कर देना । यौ०.—इंतहापसंद = अति को पसंद करनेवाला । अतिवादी ।

इंतहाई
वि० [सं०] अत्याधिक । हद दर्जै का । उ०— इंतहाई इश्त- शाल पैदै करनेवाले हालत का सिलसिला वे दलील में बाँधने लगे ।—भस्मावृत० पृ० ३९ ।

इंथिहा
संज्ञा पुं० [सं०] ज्योतिष का एक पारिभाषिक शब्द । मुंया । मुथहा [को०] ।

इंदंबर
संज्ञा पुं० [सं०] नीला कमल । इंदोवर [को०] ।

इंद (१) पु
संज्ञा पुं० [सं० इंद्र, प्रा० इंद] दे० 'इद्र' । उ०— बावरो हुतो रहो यह मंद । बलि बलि तुम कहुँ करिहैं । इंद । नंद ग्रं०, पृ० ३१३ ।

इंद (२)
क्रि० वि० [अ०] १. समीप । नजदीक । २. पर । किंतु [को०] ।

इंदउँ
संज्ञा पुं० [देश.] दे० 'इंदुर' । उ०—प्रेम खटोलना कसि कसि बाँध्यौ बिरह बान तिहिं लागू हो । तिहि चढ़ि इंदउँ करत गँवसियाँ अंतरि जमवा जागी हो ।—कबीर ग्रं०, पृ० ११२ ।

इंदका
संज्ञा पुं० [सं० इन्दका] भृगशिरा नक्षत्र के ऊपर रहनेवाला नक्षत्रेश [को०] ।

इंदर पु
संज्ञा दे० [सं० इन्द्र] दे० 'इंद्र' । उ०—मुनि जन इंदर झूलि सब, झूले गौरि गनेस—संतबानी, भा० १, पृ० १८ । यौ०.—इंदर का अखाडा = अप्सराओं, परियों का जमावड़ा । उ०—हमको 'नासिख' राजा इंदर का अखाड़ा चाहिए ।— कविता कौ०, भा० ४, पृ० ३५४ ।

इंदराज
संज्ञा पुं० [इंदिराज०.] बहीखाता । लेखाजोखा या पंजिका में लिखा जाना [को०] ।

इंदव (१)
संज्ञा पुं० [सं० एन्द्रव] १. एक छंद का नाम । इसके प्रत्येक चरण में आठ भगण और दो गुरु होते हैं । इसे मत्तगयंद और मालती भी कहते हैं ।

इंदव (२)
संज्ञा पुं० [सं० इन्दु] चंद्रमा ।

इंदवभाल पु
संज्ञा पुं० [हिं० इंदव+भाल] चंद्रभाल शिव । उ०— हरि न बनायौ सुरसरी कीजौ इंदवभाल ।—रहीम०, पृ० १ ।

इंदवान पु
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्र+वाण=आयुध] शक्र का धनुष । इंद्र धनुष । उ०—वर गजिय ब्योम रजि इंदवान । गहि काम चाप जनु दिय निसान ।—पृ० रा०, ५७ । ९५ ।

इंदिंदिर
संज्ञा पुं० [सं० इन्दिन्दिर] भ्रमर । भौंरा [को०] ।

इंदिअ पु
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्द्रय, प्रा० इंदिय] दे० 'इंद्रिय' । उ०—इंदिअ दारुन जतहि हटिय ततहि ततहि धावे ।— विद्यापति, पृ० ३७२ ।

इंदिया
संज्ञा पुं० [अ०] १. संमति । राय । विचार । मंशा । २. आकांक्षा । इच्छा [को०] ।

इंदिरा
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्दिरा] १. लक्ष्मी । विष्णुपत्नी । उ०—सती विधात्री इंदिरा देखी अमित अनूप ।—मानस १ । ५५ । २. कुआर के कृष्ण पक्ष की एकादशी । ३. शोभा । कांति । उ०—शरद इंदिरा के मंदिर की मानो कोई गैल रही ।— कामायनी, पृ० ९८ । यौ०.—इंदिरामंदिर = (१) विष्णु । (२) इंदीवर । नील कमल । इंदिरारमण=लक्ष्मीरमण । विष्णु [को०] ।

इंदिरालय
संज्ञा पुं० [सं० इन्दिरालय] नीलकमल [को०] ।

इंदिवर, इंदीवर
संज्ञा पुं० [सं० इन्दिवर, इन्दीवर] १. नील कमल । नीलोत्पल । उ०—स्वर्गंगा में इंदीवर की, या एक पंक्ति कर रही हास । कामायनी, पृ० १५२ । २. कमल ।

इंदीवरिणी
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्दीवरिणी] कमलिनी [को०] ।

इंदीवरी
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्दीवरी] शतमूली [को०] ।

इंदीवार
संज्ञा पुं० [सं० इन्दवार] दे० 'इंदीवर' [को०] ।

इंदु
संज्ञा पुं० [सं० इन्दु] १. चंद्रमा । २. कपूर । ३. एक प्रकार की संख्या । ४. मृगशिरा नक्षत्र । इस नक्षत्र का देवता चंद्र है ।यौ०—इंदुकमल = श्वेतकमल । इंदुकिरीट, इंदुभूषण=शिव । इंदुनंदन, इंदुपुत्र = चंद्रमा । इंदुलोक = चंद्रलोक । इंदुवासर = सोमवार ।

इंदुक
संज्ञा पुं० [सं० इन्दुक] अश्मंतक का वृक्ष [को०] ।

इंदुकर
संज्ञा पुं० [सं० इन्दुकर] चंद्रमा की किरण । उ०—जलविहार विचार कर विद्याधरों की बालिका; आ गई हैं क्या, कि ये हैं इंदुकर की जालिका ।—कानन०, पृ० ४२ ।

इंदुकला
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्दुकला] १. चंद्रमा की कला । २. चंद्रमा की किरन । उ०—भाल लाल बेंदी ललन, आखत रहे बिराजि । इंदुकला कुज में बसी, मनौ राहु भय भाजि ।—बिहारी र०, दो० ६९० । ३. अमृत । पीयूष (को०) । ४. सोमलता । सोम (को०) । ५. गुडूची गुरुच (को०) ।

इंदुकलिका
संज्ञा पुं० [सं० इन्दुकलिका] १. चंद्रमा की कला या चंद्रमा की किरण । २. केतकी का पौधा [को०] ।

इंदुकांत
संज्ञा पुं० [सं० इन्दुकान्त] चंद्रकांत नामक मणि [को०] ।

इंदुकांता
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्दुकन्त] केतकी । इंदुकलिका । २. निशा । रात्रि [को०] ।

इंदुक्षय
संज्ञा पुं० [सं० इन्दुक्षय] १. चंद्रमा का क्षीण होना या न दिखाई देना । २. नए चाँद का दिन [को०] ।

इंदुज
संज्ञा पुं० [सं० इन्दुज] चंद्रमा का पुत्र । बुध [को०] ।

इंदुजनक
संज्ञा पुं० [सं० इन्दुजनक] १. चंद्रमा का पिता समुद्र । अत्रि नामक ऋषि [को०] ।

इंदुजा
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्दुजा] सोमोदभवा । नर्मदा नदी ।

इंदुपर्णी
संज्ञा स्त्री० [सं इन्दुपर्णो] पँजीरी नाम का पौधा [को०] ।

इंदुपुष्पिका
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्दुपुष्पिका] कलियारी या जांगली नाम का पौधा [को०] ।

इंदुबधू पु
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्द्रवधू] दे० 'इंद्रवधू' । उ०—ज्यों ज्यों परसे लान तन त्यों त्यों राखति गोइ । नवल बधू लाजन ललित इंदुबधू सी होइ ।—मतिराम ग्रं, पृ० ४४६ ।

इंदुभ
संज्ञा पुं० [सं० इन्दुभ] १. कर्कराशि । २. मृगशिरा नक्षत्र [को०] ।

इंदुभा
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्दुभा] जलकमलिनी की एक जाति [को०] ।

इंदुभृत्
संज्ञा पुं० [सं० इन्दुभृत्] शिव [को०] ।

इंदुमंडल
संज्ञा पुं० [सं० इन्दुमण्डल] चंद्रमा का घेरा या परिधि [को०] ।

इंदुमणि
संज्ञा पुं० [सं० इन्दुमणि] १. चंद्रकांत मणि । २. मोती [को०] ।

इंदुमती
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्दुमती] १. पूर्णिमा । २. राजा अज की पत्नी जो विदर्भ देश के राजा की बहिन थी । ३. राजा चंद्र- विजय की पत्नी । उ०—चंद्रविजय नृप रहयो तहाँ ही । रानी इंदुमती रति छाहीं । (शब्द०) ।

इंदुमान्
संज्ञा पुं० [सं० इन्दुमत्] अग्नि [को०] ।

इंदुमूखो
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्दुमुखी] एक लता [को०] ।

इंदुमौलि
संज्ञा पुं० [सं० इन्दुमौलि] शिव । इंदुभूषण [को०] ।

इंदुर
संज्ञा पुं० [सं० इन्दुर] चूहा । मूसा ।

इंदुरत्न
संज्ञा पुं० [सं० इन्दुरत्न] मुक्ता । मोती ।

इंदुरेखा, इंदुलेखा
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्दुरेखा, —लेखा] १. चंद्रमा की कला । इंदुकला । २. सोमलता । ३. अमृता । ४. गुडूची [को०] ।

इंदुलतलब
क्रि० वि० [अ०] माँगने पर या जरूरत पड़ने पर [को०] ।

इंदुलोहक, इंदुलौह
संज्ञा पुं० [सं० इन्दुलोहक,—लौह] चाँदी रजत [को०] ।

इंदुवदना
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्दुवदना] एक वृत्त जिसके प्रत्येक चरण में भ ज स न ग ग (/?/) होता है । उ०—इंदुबदना बदत जाउँ बलिहारी । जान मोहिं दे घर हिं सत्वर बिहारी ।—(शब्द०) । २. इंदुतुल्य मुखवाली स्त्री [को०] ।

इंदुवधू
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्दुवधू] 'इंद्रवधू' ।

इंदुवल्ली
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्दुवल्ली] सोमलता [को०] ।

इंदुवार
संज्ञा पुं० [सं० इन्दुवार] १. वर्ष कुंडली के सोलह योगों में से एक । जब तीसरे, छठे, नवें और बारहवें घर में क्रूर ग्रह हों, तब यह योग होता है । यह शुभ नहीं है । २. सोमवार का दिन [को०] ।

इंदुव्रत
संज्ञा पुं० [सं० इन्दुव्रत] चांद्रायण नाम का एक व्रत ।

इंदूर
संज्ञा पुं० [सं० इन्दूर] चूहा । मूसा ।

इंद्र (१)
वि० [सं०] १. एश्वर्यावान् । विभूतिसंपन्न । २. श्रेष्ठ । बड़ा । यौ०.—देवेंद्र । नरेंद्र । यादवेंद्र । योगींद्र । दानवेंद्र । सुरेंद्र ।

इंद्र (२)
संज्ञा पुं० १. एक सर्वप्रमुख वैदिक देवता जिसका स्थान अंतरिक्ष है जो और पानी बरसाता है । यह देवताओं का राजा माना गया है । शौर्य, युद्ध और वैभव का वह सर्वश्रेष्ठ वैदिक देव है । ऋग्वेद में सबसे अधिक सूक्यों द्वारा इंद्र के शौर्य, वीर्य, पराक्रम और सोमपान आदि का वर्णन किया गया है । ऋग्वेदयुगीन वैदिक यज्ञों में भी उसका इत्पंत प्रमुख स्थान है । विशेष—इसका वाहन ऐरावत और अस्त्र वज्र है । इसकी स्त्री का नाम शचि और सभा का नाम सुधर्मा है, जिसमें देव, गंधर्व और अप्सराएँ रहती हैं । इसकी नगरी अमरावती और वन नंदन है । उच्चैःश्रवा इसका घोड़ा और मातलि सारथी है । वृत्र, त्वष्टा, नमुचि, शंवर, पण, वलि और विरोचन इसके शत्रु हैं । जयंत इसका पुत्र है । यह ज्येष्ठा नक्षत्र और पूर्व दिशा का स्वामी है । पुराण के अनुसार एक मन्वंतर में क्रमशः चौदह इंद्र भोग करते हैं जिनके नाम ये है—इंद्र । विश्वभुक् । विपश्चित् । विभु । प्रभु । शिखि । मनोजव । तेजस्वी । बलि । अदभुत । त्रिदिव । सुशांति । सुकीर्ति । ऋत धाता । दिवस्पति । वर्तमान काल में तेजस्वी इंद्र कर रहे हैं । पर्या०—मरुत्वान् । मघवा । बिडौजा । पाकशासन । वृद्धश्रवा । शुनासीर । पुरहूत पुरंदर । विष्णु । लेखर्षभ । शक्र । शतमन्यु । दिवस्पति । सुत्रामा । गोत्रभिद् । वज्री । वासव । वृत्रहा । वृषा । वास्तोष्पति । सुरपति । बलाराति । शचीपति । जभभेदी । रहिहय । स्वराट् । नमुचिसूदन । सक्रंदन । दुश्च्यवन । राषाह । मेघवाहन । आखंडल । सहस्त्राक्ष । ऋभुक्ष । महेंद्र । कौशिक । पूतव्रतु । विश्वंभर । हरि । पुरर्दशा । शतधृति । पृतनाषाड् । अहिद्विष । वज्रपाणि । देवराज । पर्वतारि । पर्यप्य । देवाधिप । नाकनाथ । पूर्वदिक- पति । पुलोमारि । अर्ह प्राचीन । बहि । तपस्तक्ष ।यो.—इंद्र का अखड़ा = (१) इंद्र की समा जिसमें अप्सराएँ नाचती हैं । (२) बहुत सजी हुई सभा जिसमें खूब नाच रंग होता हो । इंद्र की परी = (१) अप्सरा । (२) बहुत सुंदरी स्त्री । इंद्रसभा=इंद्र का अखाड़ा । उ०—इंद्रसभा जनु परिगै डीठी ।—जायसी ग्रं०, पृ० १८ । २. बारह आदित्यों में से एक । सूर्य । ३. बिजली । ४. राजा । मालिक । स्वामी । ५. ज्येष्ठा नक्षत्र । ६. चौदह की संख्या । ७. ज्योतिष में विष्कु भादिक २७ योगों में से २६वाँ । ८. कुटज वृक्ष । ९. रात । १०. छप्पय छंद के भेदों सें से एक । ११. दाहिनी आँख की पुतली । १२. व्याकरण आदि के आचार्य का नाम । १३. जीव । प्राण । १४. श्रेष्ठ या प्रधान व्यक्ति [को०] । १५. मेघ । बादल (को०) । १६. भारतवर्ष का एक भाग (को०) । १७. परमेश्वर (को०) । १८. वनस्पतिजन्य एक प्रकार का जहर [को०] ।

इंद्रक
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रक] गोष्ठी का स्थान । सभागृह [को०] ।

इंद्रकर्मा
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रकर्मन्] विष्णु [को०] ।

इंद्रकांत
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रकांत] चौमंजिले भवन की एक मंजिल या मरातिब [को०] ।

इंद्रकार्मुक
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रकार्मुक] इंद्रायुध । इंद्रधनुष [को०] ।

इंद्रकील
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रकील] १. संदराचल का एक नाम । २. चट्टान [को०] । ३. इंद्र की ध्वजा [को०] । ४. कँटिया । किल्ली [को०] ।

इंद्रकुंजर
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रकुञ्जर] इंद्र का हाथी । ऐरावत [को०] ।

इंद्रकूट
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रकूट] एक पर्वत का नाम [को०] ।

इंद्रकूट (१)
वि० [सं० इन्द्रकृष्ट] वर्षा से अपने आप उत्पन्न होनेवला [को०] ।

इंद्रकृष्ट (२)
संज्ञा पुं० वर्षा के जल से अपने आप पैदा होनेवाली फसल [को०] ।

इंद्रकेतु
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रकेतु] इंद्र की ध्वजा [को०] ।

इंद्रकोश, इंद्रकोष
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रकोश,—कोष] १. मचान । २. चारपाई । ३. बालखाना । छज्जा । ४. नागदंत । खूँटी [को०] ।

इंद्रकोष्ठ
संज्ञा पुं० दे० 'इंद्रकोश' ।

इंद्रगिरि
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रगिरि] महेंद्र नाम का पर्वत [को०] ।

इंद्रगुरु
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रगुरु] देवगुरु बृहस्पति [को०] ।

इंद्रगोप
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रगोप] बीरबहूटी नाम का कीड़ा ।

इंद्रगोपक
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रगोपक] दे० 'इंद्रगोप' ।

इंद्रचंदन
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रचन्दन] श्वेतचंदन । हरिचंदन [को०] ।

इंद्रचाप
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रचाप] दे० 'इंद्रधनुष' ।

इंद्रचिर्भिटी
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्द्रचिर्भिटी] इंद्रयण । एक लता- विशेष [को०] ।

इंद्रच्छंद
संज्ञा पुं० [सं०इन्द्रच्छन्द] एक हजार आठ मोतियों की माला जो चार हाथ लंबी होती थी । विशेष—इसका एक नाम 'इंद्रच्छद' भी है ।

इंद्रज
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रज] बालि नामक वानर जो इंद्र का पुत्र था [को०] ।

इंद्रजतु
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रजतु] शिलाजीत [को०] ।

इंद्रजव
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रयव] कुड़ा । कौरैया का वृक्ष । विशेष—ये बीज लंबे—लंबे जव के आकार के होते हैं और दवा के काम में आते हैं । एक एक सींके में हाथ हाथ भर की लंबी दो दो फलियाँ लगती हैं, जिनके दोनों छोर आपस में जुड़े रहते हैं । फलियों के अंदर रुई या घूवा होता है जिसमें बीज रहते हैं । इसके पेड़ में काँटे भी होते हैं । यह मलरोधक, पाचक और गरम है तथा संग्रहणी और खूनी बवासीर में फायदा करता है । त्वचा के रोगों पर भी यह चलता है ।

इंद्रजाल
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रजाल] १. मायाकर्म । जादूगरी । तिलस्म । उ०—सो नर इंद्रजाल नहिं भूला ।—मानस, ३ । ३३ । विशेष—यह तंत्र का भी अंग है । २. एक प्रकार का रणचातुर्य । ३. अर्जुन का एक शस्त्र (को०) ।

इंद्रजालिक
वि० [सं० इन्द्रजालिक] इद्रजाल करनेवाला । जादूगर ।

इंद्रजाली
वि० [सं० इन्द्रजालिन्] [वि० स्त्री० इंद्रजालिनी] इंद्रजाल करनेवाला । मायावी । जादूगर । उ०—यौं न कहौं कटि नाहि तौ कुच हैं किहि आधार । परम इंद्रजाली मदन बिधि को चरित अपार ।—भिखारी ग्रं०, भा० २, पृ० १६१ ।

इंद्रजित् (१)
वि० [सं० इन्द्रजित्] इंद्र को जीतनेवाला ।

इंद्रजित् (२)
संज्ञा पुं० रावण का पुत्र, मेघनाद ।

इंद्रजीत पु
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रजित्] दे० 'इंद्रजित्' । उ०—इंद्रजीत आदिक बलवाना ।—मानस, ६ । ३३ ।

इंद्रजौ पु
संज्ञा पुं० [हिं० इन्द्रजव] दे० 'इंद्रजव' ।

इंद्रतरु
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रतरु] १. अर्जुन नाम का वृक्ष । २. कुटज का पौधा [को०] ।

इंद्रतापन
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रतापन] १. मेघगर्जन । बादलों का गरजना । २. एक दानव का नाम [को०] ।

इंद्रतूल, इंद्रतूलक
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रतूलस —तूलक] वह सूत जो वायु में उड़ याज । २. रुई की ढेरी या समूह [को०] ।

इंद्रदमन
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रदमन] १. बाढ़ के समय नदी के जल का किसी निश्चित कुंड, ताल अथवा वट या पीपल के वृक्ष तक पहुँचना । यह एक पर्व समझा जाता है । २. बाणासुर का एक पुत्र । ३. मेघनाद का एक नाम ।

इंद्रदारु
संज्ञा पुं० [सं० इंद्रदारु] देवदारु ।

इंद्रद्युति
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रद्युति] श्वेतचंदन [को०] ।

इंद्रद्रुम
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रुम] १. अर्जुन वृक्ष । २. कुटज [को०] ।

इंद्रद्वीप
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रद्वीप] भारतवर्ष के नौ खंड़ों में एक का नाम [को०] ।

इंद्रधनु
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रधनुष, प्रा, इंद्रधणु] दे० 'इंद्रधनुष' । उ०—भरी धमनियाँ सरिताओं सी, रोष इंद्रधनु उदय हुआ ।— नागयज्ञ, पृ० ९५ ।

इंद्रधनुष
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रधनुष] १. सात रंगों का बना हुआ एक अर्धवृत्त जो वर्षाकाल में सूर्य के विरुद्ध दिशा में आकाश में देख पड़ता है । जब सूर्य की किरणें बरसते हुए जल से पार होती हैं, तब उनकी प्रतिच्छाया से इंद्रधनुष बनता है ।

इंद्रध्वज
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रध्वज] १. इंद्र की पताका । २. भाद्रपद शुक्ला द्वादशी को वर्षा और खेती की वृद्धि के लिये होनेवाला एक पूजन जिसमें राजा लोग इंद्र को ध्वजा चढ़ाते और उत्सव करते हैं । ३. प्राचीन भारत में प्रचलित एक उत्सव जिसमें वैदिक देव इंद्र की आराधना होती थी ।

इंद्रनील
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रनील] नीलमणि । नीलम । उ०—इंद्रनील मणि महाचषक था सोमरहित उलटा लटका ।— कामायनी पृ० २४ ।

इंद्रनेत्र
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रनेत्र] १. १००० की संख्या । २. इंद्क की आँख [को०] ।

इंद्रपर्णी
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्द्रपर्णी] दे० 'इंद्रपुष्पा' [को०] ।

इंद्रपर्वत
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रपर्वत] १. महेंद्र पर्वत । २. एक काला पहाड़ (को०) ।

इंद्रपुरोहिता
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्द्रपुरोहिता] पुष्य नक्षत्र ।

इंद्रपुष्पा
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्द्रपुष्पा] करियारी । कलिहारी ।

इंद्रप्रस्थ
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रप्रस्थ] एक नगर जिसे पांडवों ने खांडव वन जलाकर बसाया था यह आधुनिक दिल्ली के निकट है ।

इंद्रप्रहरण
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रप्रहरण] वज्र (को०) ।

इंद्रफल
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रफल] इद्रजव ।

इंद्रभगिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्द्रभगिनी] पार्वती [को०] ।

इंद्रभाष
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रभाष] संगीत में इंद्रताल के छः भेदों में से एक ।

इंद्रभेषज
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रभेषज] सोंठ [को०] ।

इंद्रमंडल
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रमण्डल] अभिजित से अनुराधा तक के सात नक्षत्रों का समूह ।

इंद्रमख
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रमख] इंद्र की प्रसन्नता के निमित्त किया जानेवाला एक यज्ञ [को०] ।

इंद्रमद
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रमद] पहली वर्षा के जल से उत्पन्न विष जिसके कारण जोंक और मछलियाँ मर जाती हैं ।

इंद्रमह
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रमह] १. दे० 'इंद्रमख' । २. वर्षा ऋतु । यौ०—इंद्रमहकामुक = श्वान । कुत्ता ।

इंद्रलुप्त
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रलुप्त] खल्वाट होने का रोग । गांज रोग ।

इंद्रलुप्तक
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रलुप्तक] दे० 'इंद्रलुप्त' ।

इंद्रलोक
संज्ञा पुं० [सं० इंद्रलोक] स्वर्ग । उ०—चढ़े अस्त्र लै कृष्ण मुरारी । इंद्रलोक सब लाग गोहारी ।—जायसी ग्रं०, पृ० ११३ ।

इंद्रवंशा
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रवंशा] १२ वर्णों का एक वृत्त जिसमें दो तगण, एक जगण और एक रगण होते हैं । उ०—ताता जरा देखु विचारि कै मनै । को मार को देत सुखै दुखै जनै । संग्राम भारी करु आज बान सों । रे इंद्रवंशा लर कौरवान सों ।—छंद०, पृ० १७२ ।

इंद्रवज्रा
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रवज्रा] एक वर्णावृत्त का नाम जिसमें दो तगण, एक जगण और गुरु होते हैं । उ०—ताता जगो गोकुल नाथ गावो । भारी सबै पापन को नसावों । साँची प्रभू काटहिं जन्मबेरी । है इंद्रवज्रा यह सीख मेरी । छंद०, पृ० १५७ ।

इंद्रवधू
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्द्रवधू] बीरबहूटी नाम का कीड़ा ।

इंद्रवल्ली
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्द्रवल्ली] इंद्रायन ।

इंद्रवस्ति
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्द्रवस्ति] जाँघ की हड्डी ।

इंद्रवारु
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रवारुणी] इंद्रायन । इंद्रारुन ।

इंद्रवारुणी
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्द्रवारुणी] इंद्रायन ।

इंद्रवृद्ध
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रवृद्ध] [स्त्री० इन्द्रवृद्धा] एक प्रकार की फुंसी ।

इंद्रव्रत
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रव्रत] वह राजा जो अपनी प्रजा को उसी तरह भरा पूरा रखे जैसे इंद्र पानी बरसाकर जीवों को प्रसन्न करता है ।

इंद्रशक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्द्रशक्ति] शची । इंद्राणी [को०] ।

इंद्रशत्रु
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रसारथि] १. मातलि । २. वायु । पवन [को०] ।

इंद्रसावर्णी
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रसावर्णी] चौदहवें मनु का नाम ।

इंद्रसुत
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रसुत] इंद्र के पुत्र (१) जयंत । (२) बालि । (३) अर्जुन वृक्ष (को०) ।

इंद्रसुरस
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रसुरस] निर्गुंडीया सिंदुवार का पौधा [को०] ।

इंद्रसेन
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रसेन] राजा बलि का एक नाम ।

इंद्रसेनानी
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रसेनानी] कार्तिकेय [को०] ।

इंद्रस्तोम
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रास्तोम] १. इंद्र की प्रसन्नता के निमित्त यज्ञ । २. इंद्र की प्रार्थना [को०] ।

इंद्रा
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्द्रा] तुषार । हिम [को०] ।

इंद्राग्निधूम
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्राग्निधूम] तुषार । हिम [को०] ।

इंद्राणिका
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्द्राणिका] निर्गुंडी [को०] ।

इंद्राणी
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्द्राणी] १. इंद्र की पत्नी, शची । २. बड़ी इलायची । ३. इंद्रायन । ४. दुर्गा देवी । ५. बाई आँख की पुतली । ६. सिंधुवार वृक्ष । संभालू । निर्गुंडी ।

इंद्रानी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्द्राणी] दे० 'इंद्राणी' ।

इंद्रानुज
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रानुज] विष्णु, जिन्होंने वामन अवतार लिया था । उपेंद्र ।

इंद्रायण
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'इंद्रायन' । उ०—कटु इंद्रायण में सुंदर फल, मधुर ईख में एक नहीं ।—कविता कौ०, भा०, २, पृ० १५१ ।

इंद्रायन
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्राणी] एक लता जो बिलकुल तरबूज की लता की तरह होती है । इनारू । उ०—इंद्रायन दाड़िम विषम जहाँ न नेकु विवेक ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ६६६ । विशेष—सिंध, डेरा इस्माईलखाँ, सुलतान, बहावलपुर तथा दक्षिण और मध्य भारत में यह आपसे आप उपजती है । इसका फल नारंगी के बराबर होता है जिसमें खरबूजे की तरह फाँके कटी होती हैं । पकने पर इसका रंग पीला हो जाता है । लाल रंग का भी इंद्रायन होता है । यह फल विषैला और रेचकहोता है । अँगरेजी और हिंदुस्तानी दोनों दवाओं में इसका सत काम आता है । यह फल देखने में बड़ा सुंदर पर अपने कड़ुए- पन के लिये प्रसिद्ध है । मुहा०—इंद्रायन का फल = देखने में अच्छा पर वास्तव में बुरा । सूरतहराम । खोटा ।

इंद्रायुध
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रायुध] १. वज्र । २. इंद्रधनुष । उ०— कादंबरी में वर्णित इंद्रायुध से क्या डीलडौल में कम था ?— किन्नर०, पृ० ३४ ।

इंद्रावरज
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रावरज] विष्णु । उपेंद्र [को०] ।

इंद्रावसान
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्द्रवसान] रेगिस्तान । मरुभूमि [को०] ।

इंद्राशन
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्द्रशन] १. भाँग । सिद्धि । विजया । २. गुंजा । घुंघची । चिरमिटी ।

इंद्रासन
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रासन] १. इंद्र का सिंहासन । इंद्रपद । २. राजसिंहासन । उ०—माँझ ऊँच इंद्रासन साजा । गंध्रबसेन बैठ तहँ राजा । जायसी ग्रं०, पृ० १८ । ३. पिंगल में ठगण के पहले भेद की संज्ञा, जिसमें पाँच मात्राएँ इस क्रम से होती हैं—एक लघु और दो गुरु, जैसे,—'पुजारी' ।

इंद्रिजित पु
संज्ञा वि० [सं० इन्द्रियजित्] दे० 'इंद्रियजित्' । उ०—देखि कै उमा कौं रुद्र लज्जित भए मैं कौन यह काम कीनौ । इंद्रिजित हौं कहावत हुतौ आपु कौं समुझि मन माहिं ह्वै रहयौ खीनौ ।—सूर० ८ । १० ।

इंद्रिय
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्द्रिय] १. वह शक्ति जिससे बाहरी विषयों का ज्ञान प्राप्त होता है । वह शक्ति जिससे बाहरी वस्तुओं के भिन्न भिन्न रूपों का भिन्न भिन्न रूपों में अनुभाव होता है । २. शरीर के वे अवयव जिनके द्वारा यह शक्ति विषयों का ज्ञान प्राप्त करती है । विशेष—सांख्य ने कर्म करनेवाले अवयवों को इंद्रिय मानकर इद्रियों के दो विभाद किए हैं—ज्ञानेंद्रिय और कर्मेंद्रिय । ज्ञानेंद्रिय वे हैं जिनसे केवल विषयों के गुणों का अनुभव होता है । ये पाँच है चक्षु (जिससे रूप का ज्ञान होता है), श्रोत्र (जिससे शब्द का ज्ञान होता है ।), नासिका (जिससे गंध का ज्ञान होता है), रसना (जिससे स्वाद का ज्ञान होता है) और त्वचा (जिससे स्पर्श द्वारा कड़े और नरम आदि का ज्ञान होता है) । इसी प्रकार कर्मेंद्रियाँ भी, जिनके द्वारा विविध कर्म किए जाते हैं, पाँच हैं—वाणी (बोलने के लिये), हाथ (पकड़ने के लिये) पैर (चलने के लिये), गुदा (मलत्याग करने के लिये), उपस्थ (मूत्रत्याग करने के लिये) । इसके अतिरिक्त उभयात्मक अंतरेंद्रिय 'मन' भी माना गया है जिसके मन, बुद्धि, अहंकार और .चित चार विभाग करके वेदांतियों ने कुल १४ इंद्रियाँ मानी हैं । इनके पृथक् पृथक् देवता कल्पित किए हैं, जैसे, कान के देवता दिशा, त्वचा के वायु, चक्षु के सूर्य, जिह्वा के प्रचेता, नासिका के अश्विनीकुमार, वाणी के अग्नि, पैर के विष्णु, हाथ के इंद्र, गुदा के मित्र, उपस्थ के प्रजापति, मन के चंद्रमा, बुद्धि के ब्रह्मा, चित्त के अच्युत, अहंकार के शंकर । न्याय के मत से पृथ्वी का अनुभव घ्राण से, जल का जिह्वा से, तेज का चक्षु से, वायु का त्वचा से और आकाश का कान से होता है । यौ०—इंद्रियघात । इंद्रियजन्य । इंद्रियजित् । इंद्रियदमन । इंद्रियनिग्रह । इंद्रियसंयम । इंद्रियार्थ । इंद्रियासक्त । ३. लिंगेंद्रिय । ४. पाँच की संख्या । ५. वीर्य । ६. कुश्ती के एक पेंच का नाम ।

इंद्रियगोचर (१)
वि० [सं० इन्द्रियगोचर] इंद्रियों के ग्रहण के योग्य या ज्ञेय । इंद्रियों का विषय होने योग्य ।

इंद्रियगोचर (२)
संज्ञा पुं० इंद्रियों का विषय [को०] ।

इंद्रियग्राम
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रियग्राम] इंद्रियों का समूह [को०] ।

इंद्रियज
वि० [सं० इन्द्रियज] इंद्रियों के संयोग से होनेवाला । इंद्रियजन्य । उ०—आरंभ में मनुष्य की चेतनसत्ता अधिकतर इंद्रियज ज्ञान की समष्टि के रूप में रही ।—रस०, पृ० २० ।

इंद्रियजित्
वि० [सं० इन्द्रियजित्] जिसने इंद्रियों को जीत लिया हो । जो इंद्रियों को वश में किए हो । जो विषयासक्त न हो । उ०—नीतिनिपुण मंत्रणाकुशल थे वे रहस्यरक्षक इंद्रियजित् ।—स्वप्न, पृ० ३९ ।

इंद्रियनिग्रह
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रियनिग्रह] इंद्रियों को दबाना । इंद्रियों के वेग को रोकने का नियम ।

इंद्रियबोधन
वि० [सं० इन्द्रियबोधन] इंद्रिय को जाग्रत या क्रिया- शील करनेवाला [को०] ।

इंद्रियलोलुप
वि० [सं० इन्द्रियलोलुप] इंद्रिय की तुष्टि के लिये व्याकुल [को०] ।

इंद्रियवज्री
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्द्रिय+वज्र] वाजीकरण क्रिया का एक भेद ।

इंद्रियवध
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रियवध] इंद्रियों का अपने अपने विषय में आसक्त न होना [को०] ।

इंद्रियवृत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्द्रियवृत्ति] इंद्रियों का कार्य [को०] ।

इंद्रियसंनिकर्ष
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रियसन्निकर्ष] ज्ञानेंद्रियों का अपने अपने विषयों या मन से संपर्क ।

इंद्रियसुख
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रियसुख] विषयानंद । विषयसुख [को०] ।

इंद्रियस्वाप
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रियस्वाप] इंद्रियों को अपने विषयों का ज्ञान न होना । २. जड़ता । ३. प्रलय [को०] ।

इंद्रियागोचर
वि० [सं० इन्द्रियागोचर] इंद्रियों द्वारा अग्राह्य या इंद्रियों का अविषय । अज्ञेय [को०] ।

इंद्रियातीत
वि० [सं० इन्द्रियातीत] १. इंद्रियों से परे । इंद्रिया- गोचर । अज्ञेय [को०] ।

इंद्रियायतन
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रियायतन] इंद्रियों का आयतन या निवास । शरीर । देह । २. आत्मा [को०] ।

इंद्रियाराम
वि० [सं० इन्द्रियाराम] इंद्रियलोलुप । विषयासक्त [को०] ।

इंद्रियार्थ
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रियार्थ] इंद्रियों का विषय । वे विषय जिनका ज्ञान इंद्रियों द्वारा होता है; जैसे,—रूप ।

इंद्रियार्थवाद
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रियार्थ+वाद] वह मत जिसके अनुसार बुद्धि—व्यापार—वर्जित इ द्रियज सुख ही सब कुछ है और उसी की निष्पत्ति काव्य का प्रधान गुण है । उ०—कीट्स की कल्पना बहुत ही तत्पर थी .... वे अपने इद्रियार्थवाद के लिये प्रसिद्ध हैं ।—चिंतामणि, भा० २, पृ० १३८ ।

इंद्रियासंग
संज्ञा पुं० [सं० अन्द्रियाशङ्ग] इंद्रियों और उनके विषयों के प्रति आसक्ति का अभाव । अनासक्ति । संन्यास । वैराग्य [को०] ।

इंद्रियासक्त
वि० [सं० इन्द्रियासक्त] इंद्रियाराम । इंद्रियलोलुप [को०] ।

इंद्रो पु
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्द्रिय] दे० 'इंद्रिय' । उ०—इंद्री सब न्यारी परीं, सुख लुटति आँखिं । सुरदास जे संग रहैं, तेऊ मरै झाँखि ।—सूर०, १० । २४०७ ।

इंद्रीजीत पु
वि० [सं० इन्द्रियजीत्] दे० 'इंद्रियजित्' । उ०—प्रति अनन्य गति इंद्रीजीता । जाको हरि बिनु कतहुँ न चीता ।—तुलसी ग्रं०, पृ० १० ।

इंद्रीजुलाब
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रिय+फा० जुलाब] वे औषधियाँ जिनसे पेशाब अधिक आता है । इसके लिये पानी मिला हुआ दूध, शोरा, सिलखड़ी आदि वस्तुएँ दी जाती हैं ।

इंद्रया पु
संज्ञा स्त्री० [सं० इन्द्रिय] दे० 'इंद्रिय' ।

इंद्रेज्य
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रेज्य] देवगुरु वृहस्पति [को०] ।

इंध (१)
वि० [सं० इन्ध] प्रकाशक । दीपक ।

इंध (२)
संज्ञा पुं० १. जलावन । ईंधन । २. परमात्मा [को०] ।

इंधन
संज्ञा पुं० [सं० इन्धन] १. जलाने की लकड़ी । जलावन । उ०—पान क सए सोना क टंका, चंदन क मूल इंधन बिका ।— कीर्ति०, पृ० ६८ । २. वासना (को०) ।

इंशा
संज्ञा स्त्री० [अ० इंशा] १. इबारत । बयान । २. पत्र लिखने की कला सिखानेवाली पुस्तक । चिट्ठियों की किताब [को०] ।

इंसाफ
संज्ञा पुं० [अ० इन्साफ] [वि० मुंसिफ] १. न्याय । अदल । यौ०—इंसाफपसंद—न्याय चाहनेवाला । क्रि० प्र०—करना ।—होना । २. फैसला । निर्णय ।

इंस्टिट्यूट
संज्ञा स्त्री० [अ० इन्स्टटयुट] संस्था । सभा । समाज ।

इंस्ट्रूमेंट
संज्ञा पुं० [अं० इन्स्ट्रूमेन्ट] १. औजार । यंत्र । २. साधन ।

इंस्पेक्टर
संज्ञा पुं० [अं० इन्स्पेक्टर] १. देखभाल करनेवाला । निरीक्षक ।

इँगरेज पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अँगरेज' । उ०—आयो अँगरेज मुलक रै ऊपर ।—बाँकी० ग्रं० भा०, ३, पृ० १०४ ।

इँगरेजी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'अँगरेजी' । उ०—फारसी की छार सी उड़ाय इँगरेजी पढ़ मानो देवनागरी का नाम मिटावेंगे ।— कविता कौ०, भा० २, पृ० १०३ ।

इँगुरौटी
संज्ञा स्त्री० [सं० इंगुर+औटा (प्रत्य०)] वह डिबिया जिसमें सौभाग्यवती स्त्रियाँ ईंगुर या सिंदूर रखती हैं । सिंधोरा ।

इँगुवा
संज्ञा पुं० [सं० इंङ्गुद] हिंगोट का पेड़ और फल । गोंदी ।

इँचना पु
क्रि० अ० [हिं० खिंचना] किसी ओर आकर्षित होना खिंचना । उ०—(क) भौंहनु त्रासति मुँह नटति आँखिनु सौं लपटातु । ऐंचि छुड़ावति कर इँची आगैं आवति जाति ।— बिहारी र०, दो० ६८३ । (ख) आवति आँख इँची खिंची भौंह भयो भ्रम आवतु है मति यापै ।—रघुनाथ (शब्द०) ।

इँटकोहरा
संज्ञा पुं० [हिं० ईंट+प्रोहरा (प्रत्य०)] ईंट का फूटा टुकड़ा । ईंट की गिट्टी ।

इटाई †
संज्ञा स्त्री० [हिं० ई०ट] एक प्रकार का पंडुक । पेडुकी ।

इँडहर
संज्ञा पुं० [सं० पिष्ट + हिं० हर (प्रत्य०)] उर्द की दाल से बना हुआ एक सालन । उ०— अमृत इँडहर है रस सागर । बेसन सालन अधिकौ नागर । — सूर० १० । १२१३ । विशेष— यह इस रीति से बनता है? उर्द और चने की दाल एक साथ भिगो देते हैं, फिर दोनों की पीठी पीसते हैं । पीठी में मसाला देकर उसके लंबे लंबे टुकडे बनाते हैं । इन टुकडों को पहले अदहन में पकाते हैं, फिर निकालकर उनके और छोटे छोटे टुकडे करते हैं । अंत में इन टुकडों को घी में तलते हैं और रसा लगाकर पकाते हैं ।

इँडुआ पु †
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'इँडुवा' ।

इँडुरी पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० कुण्डली] गुँडरी । बिडई । बिडवा । गेंडुरी ।

इँडुआ पु †
संज्ञा पुं० [सं० कुण्डल] कपडे की बनी हुई छोटी गोल गद्दी जिसे बोझ उठाते समय सिर के ऊपर रख लेते हैं । गेंडुरी ।

इँणि पु
सर्व० [देश०] दे० 'इन' । उ०— साई दे दे सज्जना, रातइ इँणि परि रुँन ।—ढोला०दू०३७७ ।

इँदारा †
संज्ञा पुं० [सं० अन्धु, या सं० ईद = जल + घर= धारण करने वाला] कूँआ । कूप ।

इँदारुन
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रवारुणी] इंद्रायन । माहर ।

इंदुआ
संज्ञा पुं० [देश०] इँडुरी । गेंडुरी । बेंड्डरी ।

इँदोर पु
संज्ञा पुं० [सं० इन्द्रवारुणी ] दे० 'इँदाऊन' । उ०— बहुत जतन भेख रचो बनाय बीन हरि भजन इँदोधन पाय । — गुलाल०, पृ० ५ ।

इँधरौडा
संज्ञा पुं० [ सं० इन्धन +हिं० औडा़सं० आलय] ईंधन रखने कीकोठरी । इंधनगृह । गोठौला ।

इंनारुन पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'इँदारुन' । उ०— बिनु हरि भजन इँनारुन के फल तजत नहीं करुआई । — तुलसी ग्रं०पृ० ५४६ ।

इ (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. कामदेव । २. १०० की संख्या [को०] ।

इ (२)
अव्य० क्रोध, तिरस्कार, सहानुभूति, संबोधन, आश्चर्य दु?ख आदि का व्यंजक अव्यय [को०] ।

इकंक पु
क्रि० वि० [सं० एक, प्रा०इक्क +सं० अंक] निश्चय । अवश्य । उ०— राम तिहारे सुजस जग, कीन्हो सेत इकंक ।—भिखारी ग्रं० भा० २, पृ०५७ ।

इकंग (१)पु
वि० [सं० एकाङ्ग] एकतरफा । एक ओर का । उ०— दुखी इकंगी प्रीति सौं, चातक, मीन, पतंग । घन जल दीप न जानहीं, उनके हिय को अंग । —रसनिधि (शब्द०) ।

इकंग (२)पु
संज्ञा पुं० शिव । सहादेव । अर्धनारीश्वर ।

इकंग (३)पु
क्रि० वि० मिश्रित । एक में मिला । उ०— गरल अमृत इकंग करि राखै । भिन्न भिन्न कै बिररै चाखै । — नंद ग्रं० पृ० ११८ ।

इकंत पु
वि० [सं० एकान्न] दे० 'एकांत' ।

इक पु
वि० [हिं०] दे० 'एक' । उ०— इक करहिं दाप न चाप सज्जन बचन जिमि टारै टरै । — तुलसी ग्रं० पृ० ५३ ।

इकआँक पु
क्रि० वि० [सं० एक, प्रा० इक्क +हिं० आँक ] निश्चय । निश्चय करके । अवश्य । उ०— जे तब होत दिखा- दिखी, भईँ अमी एक आँक । दगैं तिरीछी दीठि अब ह्वै बीछी को डाँक । — बिहारी र०, दो० ६१५ । (ख) यदपि लौंग ललितौं तऊ तूं न पहिरि इक आँक । सदा साँक बठियै रहै रहै चढी सी नाँक । — बिहारी र, दो०६८५ ।

इकइस पु
वि० [हिं० ] दे० 'इक्कीस' ।

इकचोबिया †
संज्ञा पुं० [हिं० इक + चोब ] एक चोब अर्थात् बल्लीवाला तंबु या डेरा । वह तंबू जिसमें एक ही चोब लगती हो (बोल०) ।

इकछत पु
वि० [सं० एकच्छत्र] दे० 'एकछत्र' उ०— जो नर इकछत भूप कहावै । सिंहासन ऊपर बैठे जतहीं चँवर ढूरावै । चरण० बानी०, पृ० ९४ ।

इकजोर पु
क्रि० वि० [सं० एक + हिं० जोरना= जोडना ] इकट्ठा । एक साथ । उ०— देखु सखिचारु चंद्र इकजोर । निरखति बैठि नितंबिनि पिय सँग सार सुता की ओर ।— सूर (शब्द०) ।

इकट
संज्ञा पुं० [सं०] सरकंडे का गोफा या कोपल [को०] ।

इकटक
क्रि० वि० [हिं० एकटक] एक दृष्टि से । लगातार । बिना दृष्टि हटाए । उ०— इकटक प्रतिबिंब निरखि पुलकत हरि हरषि हरषि, लै उछंग जननी रसभंग जिय बिचारी । — तुलसी ग्रं० पृ० २८१ ।

इकटग पु
क्रि० वि० [हिं० ] दे० 'इकटक' । उ०— इकटग ध्यान रहै त्यौ लागै छाकि परे हरि रस पीवैं ।— दादू० बानी, पृ० ५९६ ।

इकट्ठा
वि० [सं० एकस्थउ प्रा० इकट्ठा] एकत्र । जमा । क्रि० प्र० — करना । होना ।

इकठा पु
वि० [हिं० ] दे० 'इकट्ठा' । उ०— तौ ये नाना कर्म विचित्र । इकठे रहन न पावै मित्र । — नंद० ग्रं० पृ० २३६ ।

इकठाईं पु †
वि० [एक + ठाई = स्थान ] एक स्थान पर या एकत्र । उ०— जब सब गाइ भई इकठाई । — सूर०, १० । ६१४ ।

इकठैन †
वि० [हिं० इकठा] इकट्ठा । एकत्र । उ०— सुनत हीं सब हाँकि ल्याए गाइ करि इकठैन ० — सूर०, १० । ४२७ ।

इकठोर
वि०[हिं० इक + ठौर = स्थान] एक स्थान पर पर । एकत्र । उ०— (क) जेंवत कान्ह नंद इकठौरे । — सुर० १० २२४ (ख) जब पाँडे इत उत कहुँ गए । बालक सब इकठौरे भए । सूर०,७ ।२ ।

इकजाल पु
संज्ञा पुं०, वि० [हिं० ] दे० 'एकडाल' ।

इकतन पु †
क्रि० वि० [हिं० इक + तन = ओर, तरफ] एक तरफ । एक ओर । उ०— इकतन नर एकतन भई नारी । खेल मच्यौ ब्रज कैं बिच भारी । — सूर०, १० । २९०१ ।

इकतर पु
वि० [हिं०] दे० 'एकत्र' । उ०— (क) मन औ पवन होत जब इकतर नाहीं बीच बराव । — जग ० बानी, पृ० ७५ । (ख) दई बडाई ताहि पंच यह सिगरे जानी । दे कोल्हू में पेरि, करी हैं इकतर घानी । —गिरिधर (शब्द०) । (ग) प्रथमहि पत्र चमेली आनै । ताको कूटि लेइ रस छानै । कूट सोहागा मनसिल लीजै । मीठे तेल में इकतर कीजै । — (शब्द०) ।

इकतरा पु
संज्ञा पुं० [सं० एकान्तर] वह ज्वर जो जाडा देकर एक दिन छोड दूसरे दिन आता है । अँतरिया । उ०—बड दुख होई इकतरौ आवै । तीन उपास न बल तन खावै ।—लाल (शब्द०) ।

इकता पु
संज्ञा स्त्री० [ हिं०] दे० 'एकता' । उ०— इकता कारज हेतु की हेतु कहत सु कबिंद । परम पदारथ चारहु श्री राधा गोबिंद । पद्माकर ग्रं०,पृ० ६९ ।

इकताई पु
संज्ञा स्त्री [सं० एकता या फा० यकता+हिं०ई (प्रत्य०)] १. एक होने का भाव । एकत्व । सिखे आपने दृगनसैं इकताई की बात । जूरी डीठ इक सँग रहै, जद्दपि जुदे दिखात ।—सं० सप्तक,पृ २ ।९ ।२. अकेले रहने की इच्छा,स्वभाव या बान । एकांतसेविता । अली गई अब गरबई इकताई मुकुताई । भली भई ही अमलई जो पीदई दिखाई ।स० सप्तक, पृ०२८४ ।

इकताना पु
वि० [सं० एकतान या हिं० एक+तान=खिंचाव] एक रस । एक सा । स्थिर । अनन्य । उ० ऐसे हि देखते रहौं, जन्म सफल करि मानों । प्यारे की भावती, भावती के प्यारे जुगल किसोर जानों । पलौं न टरौं छिन इत न होउँ रहौं इकतानो ।— हरिदास (शब्द०) ।

इकतार (१)पु
वि० [हिं० एक+तार] बराबर । एकरस । समान । उ०हरि के केसन सों सटी लखत खौर इकतार । मानहुँ रवि की किरन कछू छीन लई अँधियार । व्यास (शब्द०) ।

इकतार (२)
क्रि० वि० लगातार । उ०—आकिंचन इंद्रियदमन रमन राम इकतार । तुलसी ऐसे संत जन बिरले या संसार । तुलसी ग्रं०,पृ० १२ ।

इकतारा
संज्ञा पुं० [हिं० एक+तारा] १. एक बाजा । एक प्रकार का तानपूरा या तबूरा । विशेष—इसकी बनावट इस प्रकार होती है : चमडे से मढा हुआ एक तूंबा बाँस के एकक छोर पर लगा रहता है । तुंबे के नीचे जो थोडा सा बाँस निकला रहता है उससे एक तार तूंबे के चमडे पर की घोडियाँ या ठिकरी पर से होता हुआ बाँस के दूसरे छोर पर एक खूँटि में बँधा रहता है । इस खूँटी को ऐंठकर तार को ढीला करते और कसते हैं । बजानेवाला इस तार को तर्जनी से हिला हिलाकर बजाता है । प्राय? साधु इसे बजा बजाकर भीख माँगते है । २. एक प्रकार का हाथ से बुना जानेवाला कपडा । विशेष—ईसके प्रत्येक वर्ग इंच में २४ ताने के और आठ बाने के तागे होते हैं । बुन जाने पर कपडा धोया जाता है औऱ उसपर कुंदी की जाती है । इसका थान ६ गज लंबा और ११ इंच चौडा होता है ।

इकताला (१) पु
[ हिं० एकताला] प्रथम ताल अर्थात् प्रथम दिवस । उ०—इकताला रै चै सुद । आद उदे नवारत ।—रा० रू०,पृ० २७९ ।

इकताला (२)
संज्ञा पुं० दे० 'एकताला' ।

इकतीयार पु
संज्ञा पुं०[अ० इख्तियार] अधिकार । अख्तियार । उ०—बंदे बंदगी इकतीयार । साहिब रोष धरो कि पियार । कबीर ग्रं०,पृ ३०७ ।

इकतीस (१)
वि०[सं० एकत्रिंशत्; पा० एकतीस] तीस और एक ।

इकतीस (२)
संज्ञा पुं० तीस और एक की संख्या । इकतीस का अंक ।

इकतृत पु †
संज्ञा स्त्री [सं० एकत्रिति] इकट्ठे रहने की स्थिति । जमाव । उ०—भाँति भाँति के मनुजन के नित रहति इकतृत । प्रेमघन, भा० १, पृ० ११ ।

इकत्र पु
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'एकत्र' । उ०—मनहुँ सिंगार इकत्र ह्मै बँध्यौ बार के बेस । भारतेंदु ग्रं०,भा० १, पृ० ३८८ ।

इकदाम
संज्ञा पुं०[ अ० इकदाम] १. किसी अपराध के करने की तैयारी या चेष्टा । २. संकल्प । इरादा । ३. कदम बढाना (को०) । ४. आगे बढना (को०) । यौ०—इकदाम ए जुर्म = अपराध करने की चेष्टा या कोशिश ।

इकन्नो
संज्ञा स्त्री०[हिं०] दें 'एकन्नी' ।

इकपेचा
संज्ञा पुं०[हिं० एक+फा०पेचह्] एक प्रकारर की पगडी जिसकी चाल दिल्ली आगरे में बहुत है ।

इकबारगी
क्रि वि० [हिं०] दे० 'एकबारगी' । उ०—बहुत भए इकबारगी, तिनको गुंफ जु होय । तहि समुच्चय कहत हैं, कबि कोबिद सब कोय ।मतिराम ग्रं०,पृ० ४१८ ।

इकबाल
संज्ञा पुं० [अ० इकबाल]दे० 'एकबाल' ।उ०—राजाऔं की रक्षा उनका इकबाल है । काया०,पृ०१८६ ।

इकबाल दावा
संज्ञा पुं० [अ० इकबालदावा] मुद्दई के दावे का स्वीकरण । मुद्दई के दावे को अंगीकार करना ।

इकबालमंद
वि० [अ० इकबाल+फा०+मन्द] प्रतापशाली । भाग्यवान् [को०] ।

इकबालो गवाह
संज्ञा पुं०[अ० इकबाल+फा० ई(प्रत्य०)+गवाह] किए हुए अपराध को स्वीकार करनेवाला । जुर्म मंजूर करनेवाला ।

इकबाली बयान
संज्ञा पुं०[हिं० इकबाली+फा० बयान] वह साक्षी या गवाही जिसमें अपराध स्वीकार किया जाय ।

इकबीस †
संज्ञा पुं०[ हिं०] दे० 'एकइस' । उ०—इकबीसे बार नछत्रौ अवनी कीन्हीं पोइस धार करूर । रघु० रू०,पृ० २५८ ।

इकरंग पु
वि० [हिं०] दे० 'एकरंग' । उ०—छिरकि छिरकि घनस्याम सब इकरंग कियो है ।नद ग्रं०,पृ० ३८६ ।

इकरदन पु
संज्ञा पुं०[सं० एक, प्रा० इक्क+सं० रदन] दे० 'एकरदन' ।

इकरस पु
वि० [सं० एक+रस] एकरंग । समान । बराबर । उ०— जो कटू अब का प्रिति न हममें । रहत न कोउ इकरस हरदम में । विश्राम (शब्द०) ।

इकराजी पु
वि०[सं० एक+राजा+हिं ई (प्रत्य०)] एक शासक वाला । एक राजा से युक्त । उ०—दादू नगरी चैन तब जब इकराजी होइ ।—दादू० बानी, पृ० १२४ ।

इकराम
संज्ञा पुं० [अ० इकराम] १. दान । पारितोषिक । २. इज्जत । माहात्म्य । आदर । प्रतिष्ठा । ३. अनुग्रह । कृपा (को०) । यौ०—इनाम इकराम । इज्जत इकराम ।

इकरार
संज्ञा पुं० [अ० इकरार] १. प्रतिज्ञा । वादा । २. कोई काम करने की स्वीकृति ।

इकरारनामा
संज्ञा पुं० [अ० इकरार+फा नामह्] स्वीकृति पत्र । प्रतिज्ञापत्र ।

इकलस पु
वि० [हिं०] दे० 'इकरस' । उ०—खंड खंड निज नां भया, इकलस एकै नर ।—दादू० बानी,पृ० १०३ ।

इकला पु
वि० [हिं०] दे० 'अकेला' ।

इकलाई (१)
संज्ञा स्त्री [हिं० एक+लाई या लोई=पर्त] एक पाट का महीना दुपट्टा या चद्दर ।उ०(क) आसपास आनन के फबन फबी है कैसी कुंचित कुसुंभी कोरदार इकलाई की ।— पद्माकर ग्रं०,पृ० ३१४ ।(ख) दुपट्टा दूलाई चादरैं इकलाई कटिबंद बर । कंचुकी कुलहिया ओढनी अंगवस्त्र धोती अबर । सूदन (शब्द०) ।

इकलाई (२)
संज्ञा पुं० [हिं० इकला+ई (प्रत्य०)] अकेलापन ।

इकलोम
संज्ञा पुं०[अ० इकलीम] १. पृथिवी ।भूखंड । २. राज्य । ३. संसार की आबाद भूमि का सातवाँ हिस्सा [को०] ।

इकले पु
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'अकेले' । उ० इकले प्रान पियारे पाए । देखि हरष भरे नयन सिराए । नंद ग्रं०,पृ०१७२ । यौ०—इकले दुकले = अकेले दुकेले ।

इकलो
वि० [हिं०] दे० 'इकला' या 'अकेला' । उ०—तब याकौ पिता मरचो । तब यह घर में इकलो रहे । दो सौ बावन, पृ० १९ ।

इकलोईकडाही
संज्ञा स्त्री [हिं० एक+लोई] वह कडाही जो एक ही लोई या तवे की बनी हो, अर्थात जिसके पेंदे में जोडन हो ।

इकलौता
संज्ञा पुं० [हिं० इकला+सं० पुत्र, प्रा० ऊत] [स्त्री० इकलौती] १. वह लड़का जो अपने माँ बाप का अकेला हो । वह लडका जिसके और भाई बहिन न हों ।२. एकमात्र । अकेला । उ०—तो इन्हें इकलौता बुद्धिमान मान लेना पडता है ।— प्रेमधन०, भा०२, पृ० ८० ।

इकल्ला पु
वि० [सं० एकल=एकाकी, प्रा० एगल्ल, एकल्ल, इकल्ल] १. अकेला । एकाकी । उ०—रणधीर इकल्ला है और अपने पास इतनी सेना है । —श्रीनिवास ग्रं०,पृ १०७ ।

इकवाई
संज्ञा स्त्री [हिं० एक+वाह] १. एक प्रकार की निहाई जो संदान या अरन के आकार की होती है । भेद इतना ही होता है की संदान में दोनों और हाथे या कौर निकले रहते हैं और इसमें एक ही और । भारतवालों की इकवाई की एक कोर लंबी नोक होती है और दूसरी कोर सपाट चौडी होती है जिसके किनारे तीखे होते हैं ।२. जो संख्या में तीन हो । तीन (दलाल) ।

इकस पु †
संज्ञा स्त्री [हिं०] दे० 'अकस' ।

इकसठ (१)
वि० [सं० एकषष्ठि, पा० एकसट्ठि] साठ और एक ।

इकसठ (२)
संज्ञा पुं० वह अंक जिससे साठ और एक काबोध हो । ६१ ।

इकसर पु
वि० [हिं० एक+सर(प्रत्य०)] अकेला । एकाकी ।

इकसार †पु
वि० [सं० एक, हिं० इक+सं० सदृश,प्रा० सरिस,सारिस] एक सा । समान । बराबर । उ०—उनयौ मेघ घटा चहुँ दिश तें वर्षन लगौ अखंडित धार । बूडौ मेरु नदी सब सूकी झर लागौ निसदन इकसार । सुंदर ग्रं०, भा० पृ० ५३१ ।

इकसीर
संज्ञा स्त्री [अ०] दे० 'अकसीर' ।

इकसूत पु
वि० [सं० एकश्रुत (=लगातार) या एकसुत्रित] १. एक साथ । इकट्ठा । एकत्र । उ०—देखि के निकसे दोऊ और जे सखियाँ हुतीं । ते सबै तुरतै दौरीं बाहरी ह्मै इकसुती । गुमान (शब्द०)

इकहरा
वि० [हिं०] [वि० स्त्री० इकहरी] दें० 'एकहरा' ।

इकहाइ पु, इकहाई पु
क्रि० वि० [हिं०, एक+हाई (प्रत्य०))] १. एक साथ । फोरन ।उ०—(क) यह सुनी रनिन के बदन भे प्रसत्र हरखाई । ज्यों सूरज के उदय ते खिलत कमल इकहाई ।— (शब्द०) । (क) सीत भीत हरषदि तें उठै रोम इकहाइ । ताहि कहत रोमांच है सुकबीन के समुदाई । पद्माकर ग्रं०,पृ० १६८ । २. एकदम । अचानक ।

इकहाउ पु
क्रि० वि० [हिं० एक+हाऊ (प्रत्य०)] दें 'इकहाइ' । उ०—त्यों पदमाकर झोरी झमाई सु दौरीं सबै हरि पै इकहाउ । पदमाकर ग्रं०,पृ०१५५ ।

इकांत पु
वि० [सं० एकान्त] दे० 'एकांत' ।

इकाई
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'एकाई' ।

इकार
संज्ञा पुं०[सं०] स्वर वर्ण 'इ' ।

इकारांत
संज्ञा पुं० [सं० इकरान्त] वह शब्द जिसके अंत मे इकार हो । वह शब्द जिसक अंत ' ई' से हो ।

इकोस पु
वि० [हिं०] दें० 'इक्कीस' । उ०तुलसी तेहि अवसर लावनिता दस, चारि नौ, तीनि, इकीस सबै । तुलसी ग्रं०, पृ० १५६ ।

इकेला पु
वि० [हिं०] दे० 'अकेला' ।उ०—देहरी बैठी मेहरी रौवे द्वारे लौ संग माइ । मरहट लगि लब लोग कुटूंब मिलि हंस इकेला जाइ । कबीर ग्रं०,पृ० २८५ ।

इकेले पु
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'अकेले' । उ०—भोजन करि कै इकेले ही गादि तकियान के उपर बिराज हते । —दो सौ बावन०, भा०२,पृ० १५ ।

इकैठ पु
वि० [सं० एकस्थ, प्रा० इकट्ठा] इकट्ठा । एकत्र ।

इकोतर पु
वि० [हिं०] दे० 'एकोत्तर' । उ०—और इकोतर नामहिं पावै । तुम कहँ जीत हंस घर आवै । कबीर सा०, पृ १६ ।

इकोतरसै पु
वि० [हिं०] दे० 'एकोतर सो' । उ०—इकोतर सै पुरिषा नरकहि जाई । सति सति भाषंत श्री गोरखराई । गोरख०पृ० ५६ ।

इकौंज
संज्ञा पुं०[सं० एक+वंध्या, प्रा० बज्झा, हिं०बाँझ; या सं० एक+जा; या सं० काकवंध्या>काकबज्झा>ककौंज्झा>इकौंजा] वह स्त्री जिसको एक ही पुत्र या एक ही कन्या उत्पन्न हुई हो । वह स्त्री जो एकबार जनकर बाँझ हो जाय । काकवंध्या ।

इकौना †
संज्ञा पुं०[हिं०एक+बना] बिना छाँटा हुआ अन्न । बिना चुना हुआ अनाज ।

इकौसी पु
वि० स्त्री [सं० एक+बासी] [वि० पुं० इकौसा] एकांत में रहनेवाला । अकेली । उ०—अलबैली सुजान के कौतुक पै अति रीझि इकौसी ह्मै लाज थकै ।—घनानंद,पृ० ३३ ।

इकौसे पु
क्रि०वि० [हिं०] पृथक् । जुदा । अलग ।

इकौसो पु †
वि० [सं० एक+आवास या अवकाश(=स्थान), अप० ओसास] एकांत । निराला । उ०—मेरो है इकौसो वास जातै हरि दास, लेवो सुखरसि, करो चीठी दीजै जाय कै । प्रिया (शब्द०) ।

इक्क पु
वि० [अप०] दे० 'एक' । उ० —इक्क मथ्यो बिना धाइ हत्थौं करैं । —सुजान०,पृ० २० ।

इक्कट
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का सरकंडा जिसकी चटाइयाँ बनती हैं [को०] ।

इक्कबाल
संज्ञा पुं० [अ० इकबाल] १. ताजक ज्योतिष के मत से एक ग्रहयोग । विशेष—जब किसी के जन्म के समय ग्रह कंटक (१,४,७ १०) या पनकर (२,५,८,११) में हों; अर्थात् ३, ६, ९ और १२ में कोई ग्रह न हो तब यह राज्य और सुख को बढानेवाला योग होता है । २. अभ्युदय । बढती ।

इक्का (१)
वि०[सं० एक] १. एकाकी । अकेला । २. अनुपम । बेजोड ।

इक्का (२)
संज्ञा पुं० १. एक प्रकार की कान की बाली जिसमें एक मोती होता है । २. वह योद्धा जो लडाई में अकेला लडे । उ०— कूदि परे लंका बीच इक्का रघुबर के । —मानकवि (शब्द०) । ३. वह पशु जो अपना झुंड छोडकर अलग हो जाय । ४. एक प्रकार का दो पहिए घोडा गाडी जिसमें एक ही घोडा जोता जाता है । ५. तास का वह पत्ता जिसमें किसी रंग की एक ही बूटी हो । यह पत्ता और सब पत्तों को मार देता है । जैसे,— पान का इक्का । ईंट का इक्का ।

इक्कादुक्का
वि० [हिं० इक्का+दुक्का] अकेला दुकेला । जैसे,—'कोई इक्का दुक्का आदमी मिले तो बैठा लेना' ।

इक्कावन †
वि० [हिं०] दे० 'इक्यावन' ।

इक्कावान †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'एक्कावान' ।

इक्कासी †
वि० [हिं०] दे० 'इक्यासी' ।

इक्की †
संज्ञा स्त्री [सं० एक+ई (प्रत्य०)] ताश का एक पत्ता जिसमें एक बूटी हो । एक्का ।

इक्कीस (१)
वि० [सं०एकविंश; प्रा० एक्कवीस, अप० इक्कवीस] बीस और एक ।

इक्कीस (२)
संज्ञा पुं० बीस और एक की संख्या या अंक जो इस तरह लिखी जाती है—२१ ।

इक्यावन (१)
वि० [सं० एकपंचाशत्, प्रा० एक्कावन्न] पचास और एक ।

इक्यावन (२)
संज्ञा पुं० पचास और एक की संख्या जो इस तरह से लिखी जाती है —५१ ।

इक्यासो (१)
वि० [सं० एकाशीति, प्रा० एक्कासि] अस्सी और एक ।

इक्यासी (२)
संज्ञा पुं० अस्सी और एक की संख्या या अंक जो इस तरह लिखी जाती है —८१ ।

इक्षना पु
क्रि०स० [हिं० इच्छना] दे० 'इच्छना' । उ०—लष्षन उद्धल, सुभट बर, ते इक्षत घमसान । —प० रा०,पृ० १३४ ।

इक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १. ईख । गन्ना । दे० 'ईख' ।२. कोकिला नाम का एक वृक्ष (के०) ।३. मनोरथ । इच्छा (को०) । यौ०—इक्षुकांड । इक्षुगंधा । इक्षुतुल्या । इक्षुदंड । इक्षुपत्रा ।इक्षुप्रमेह । इक्षुमती । इक्षुमेह । इक्षुरस । इक्षुविहारी । इक्षुविकार ।

इक्षुकंद
संज्ञा पुं० [सं० इक्षुकन्द] कूष्मांड । कुम्हडा [को०] ।

इक्षुक
संज्ञा पुं० [सं०] ईख [को०] ।

इक्षुकांड
संज्ञा पुं०[सं०इक्षुकांण्ड] १. ईख का डंठल । २. काँस । ३. मूँज । ४. रामसार ।

इक्षुकांत
संज्ञा [सं० इक्षुकांत] छमंजिली इमारत का एक भेद या श्रेणी [को०] ।

इक्षुकीय
वि० [सं०] [वि० स्त्री० इक्षुकीया] जहाँ ईख अधीक पैदा होती हो [को०] ।

इक्षुकुट्टक
संज्ञा पुं० [सं०] वह व्यक्ति जो इकट्ठा करता हो । गन्ना एकत्र करनेवाला व्यक्ति [को०] ।

इक्षुगंध
संज्ञा पुं०[सं० इक्षुगंध] १. छोटा गोखरू । २. काँस ।

इक्षुगंधा
संज्ञा स्त्री [सं० इक्षुबन्धा] १. गोखरू । २. कोकिलाक्ष । तालमखान । ३. काँस । ४. सफेद बिदारी कंद ।

इक्षुगंधिका
संज्ञा स्त्री० [सं०इक्षुगन्धिका] भूमिकूष्मांड [को०] ।

इक्षुज (१)
संज्ञा पुं० [सं०] वह पदार्थ जो ईख के रस से बने । विशेष—प्राचिनों के अनुसार इसके छह भेद हैं—फाणित (जूमी या शीरा); मत्स्ययंडी (राब); गुड; खंडक (खाँड); सिता (चीनी) और सितोपल (मिश्री) ।

इक्षुज (२)
वि० ईख के रस से बना हुआ [को०] ।

इक्षुतुल्या
संज्ञा स्त्री [सं०] ज्वार या बाजरे के प्रकार का एक पौधा जिसका रस मिठा होता है । काँस ।

इक्षुदंड
संज्ञा पुं० [सं० इक्षुदंड] ईख का डंठल । ईख ।

इक्षुदर्भ
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री इक्षुदर्भा] एक प्रकार का तृण ।

इक्षुनेत्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. ईख का एक भेद । ईख की गाँठो पर होनेवाला आँख का आकार [को०] ।

इक्षुपत्र
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० इक्षुपत्रा] १. ज्वार । मक्का । २. बाजरा ।

इक्षुपाक
संज्ञा पुं० [सं०] गुड या राब [को०] ।

इक्षुप्र
संज्ञा पुं० [सं०] रामशर । शर ।

इक्षुप्रमेह
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का प्रमेह । इक्षुमेह । मधुमेह । विशेष— इस रोग में मुत्र के साथ मधु या शक्कर जाती है । इसके रोगी के मुत्र पर चींटियाँ और मक्खियाँ बहुत बैठती हैं । मुत्र के अंशो को रासायनीक क्रिया द्वारा अलग करने पर उसमें चीनी का अंश मिलता है ।

इक्षुबालिका
संज्ञा स्त्री [सं०] कास या मूँज [को०] ।

इक्षुभक्षिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] ईख पेरने की मशीन, कल या यंत्र [को०] ।

इक्षुमती
संज्ञा स्त्री [सं०] एक नदी जिसमें कुरुक्षेत्र में होना लिखा है ।

इक्षुमालिनी
संज्ञा स्त्री०[ सं०] एक नदी जो इंद्र पर्वत से निकलती है ।

ईक्षुमूल
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का ईख । बाँसी । २. ईख की जड या मुल [को०] ।

इक्षुमेह
संज्ञा पुं० [सं०] इक्षुप्रमेह । मधुप्रमेह । मधुमेह ।

इक्षुमेही
वि० [सं० इक्षुमोहिन्] मधुमेह का रोगी [को०] ।

इक्षुयंत्र
संज्ञा पुं०[सं० इक्षुयंत्र] ईख पेरने का मशीन । कोल्हू [को०] ।

इक्षुयष्टि
संज्ञा स्त्री [सं०] ईख [को०] ।

इक्षुर
संज्ञा पुं०[ सं०] १. गोखरू । २. तालमखान । ३. गन्ना [को०] ।

इक्षुरस
संज्ञा पुं० [सं०] १. ईख का रस । २. कास । ३. राब [को०] ।

इक्षुरसवल्लरी
संज्ञा स्त्री [सं०] क्षीरविदारी । दूधविदारी । महाश्वेता ।

इक्षुरसोद
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार सात समुद्र में से एक जो ईख के रस का है ।

इक्षुवण
संज्ञा पुं० [सं०] ईख का डंठल [को०] ।

इक्षुवल्लरी
संज्ञा स्त्री [सं०] १. पीले रंग की ईख । २. क्षीरकंद । क्षीरविदारी [को०] ।

इक्षुवाटिका
संज्ञा स्त्री [सं०] १. ईख की एक जाति । पुंड्रक । पौंढा । २. ईख का खेत या फारम [को०] ।

इक्षुविकार
संज्ञा पुं० [सं०] गुड, राब आदि ईख के रस के छह रूप । २. कोई भी मिठा पदार्थ [को०] ।

इक्षुविदारी
संज्ञा स्त्री [सं०] विदारीकंद ।

इक्षुवेष्टन
संज्ञा पुं० [सं०] गन्ने की एक किस्म [को०] ।

इक्षुशर
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का कास और उसका जंगल [को०] ।

इक्षुशाकट
संज्ञा पुं० [सं०] गत्रा बोने लायक खेत [को०] ।

इक्षुसमुद्र
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणोक्त सात महासमुद्रों में एक नाम । [को०] ।

इक्षुसार
संज्ञा पुं० [सं०] इक्षुविकार । गुड आदि [को०] ।

इक्ष्वाकु (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सुर्यवंश का एक प्रधान राजा । यह पुराणों में वैवस्वत मनु का पुत्र कहा गया है । रामचंद्र इसी के वंश के थे । २. इक्ष्वाकु के वंश का व्यक्ति (को०) । यौ०—इक्षाकुनंदन, इक्षाकुवंशी = इक्ष्वाकु के पुत्र ।

इक्ष्वाकु (२)
संज्ञा स्त्री कड़वी लौकी । तितलौकी ।

इक्ष्वरि
संज्ञा पुं० [सं०] ईख का दुश्मन—कास [को०] ।

इक्ष्वालिका
संज्ञा स्त्री [सं०] १. नरकट । नरकुल । २. सरपत । मूँज । ३. कास ।

इखद पु
वि० [सं० ईषत्] दे० 'ईषत' ।

इखपाय
संज्ञा पुं० [अ० इख्पाय] प्रकट न करना । गोपन । छिपाव [को०] । यौ०—इखपाये जुर्म, इखपाये वारदात = कानून में किसी पुरुष का किसी ऐसी घटना को छिपाना जिसका प्रकट करनान नियमा- नुसार उसका कर्तव्य हो ।

इखरना †
क्रि० अ०[हि० बिखरना का अनु०] बिखरना । इधर उधर गिरना । विशेष—इस शब्द का प्रयोग 'बिखरना' शब्द के साथ होता है । यौ०—इखरना बिखरना = इधर उधर हो जाना । किसी भी वस्तु का इतस्तत?हो जाना (बोल०) ।

इखराज
संज्ञा पुं० [अ०] १. निकास । खर्च । २.बहिष्कार [को०] ।

इखलाक
संज्ञा पुं० [अ० अखलाक] व्यवहार । आचरण । उ०— उनका जितना सदाचार और इखलाक है, सब मर्दो को बनाया हुआ । ज्ञानदान, पृ० ११७ ।

इखलाकी
वि० [हिं० इखलाक] आचरण या व्यवहार संबंधी । व्यावहारिक । उ०—'मसायाब का इखलाकी पहलु भी होता है ।'—गोदान, पृ०३९ ।

इखलास
संज्ञा पुं० [अ० इखलास] १. मेलमिलाप । मित्रता । उ०— तु जा सुजानहि पास । हमसो करैं इखलास । सूदन (शब्द०) । २. प्रेम । भक्ती । प्रीति । उ०—कुल आलम इके दीदम अखाहे इखलास । बद अमल बदकार तुई पाक यार पास ।—दादू (शब्द०) ।३. संबंध । साबिका । क्रि० प्र०—जोडना । = बढाना ।

इखु पु
संज्ञा पुं० [सं०इषु] 'इषु' । उ०—अमर अधिप बारन बरन दुसर अंत अगार । तुलसी इखु सह रागधर तारन तरन अधार ।—स० सप्तक, पृ० १९ ।

इख्तियार
संज्ञा पुं० [अ० इख्तियार] १. अधिकार । २. अधिकारक्षेत्र । ३. सामर्थ्य । काबु । जैसे,—यह बात हमारे इख्तियार के बाहर कि है । ४. प्रभुत्व । स्वत्व ।जैसे,—इस चीज पर तुम्हारा कुछ इख्तियार नहीं है । ५. स्वीकार । ग्रहण । मंजुर । उ०— सख्त काफिर थी जिसने पहले मीर, मजहने इश्क इख्तियार किया ।—कविता कौ०, भा० ४, पृ० १३१ । क्रि० प्र०—करना=स्वीकार करना । अपनाना । ग्रहण करना । उ०—और पेशा भी दूसरे का इख्तियार नहीं कर सकता है ।— भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० २४९ । यौ०—इख्तियारे समाअत = विचार करने का अधिकार ।

इख्तिलाफ
संज्ञा पुं० [अ० इख्तिलाफ] १. विरोध । विभेद । विभिन्नता । अंतर । फर्क । २. अनबन । बिगाड । यौ०—इख्तिलाफे राय = विचारवैमत्य । मतभेद ।

इगारह पु
वि० [हिं०] दे० 'ग्यारह' । उ०—सत जो धरै सो खेलन हारा । ठारि इगारह जाइ न मारा ।—जायसी ग्रं०, पृ० १३७ ।

इगारहों
वि० [हिं० इगारह] एकादश की संख्यावाला । दस और एक की संख्यावाला । उ०—सभा सभासद निरखि पद पकरि उठायो हाथ । तुलसी कियो इगारहों बसनवेष जदुनाथ ।— तुलसी ग्रं०, पृ० ११७ ।

इग्यारस पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० एकादश] दे० 'एकादशी' । उ०—पाहण वरत इग्यारस पारस सामँत कुसुम कंज सामीर । रघु० रू०, पृ०२५५ ।

इग्यारह पु †
वि० [हिं०] दे० 'ग्यारह' ।

इग्यारी पु †
संज्ञा स्त्री [हिं०] दे० 'अग्यारी' ।

इचकना †
क्रि० अ० [देश०] क्रोध से दाँत या खीस निकालना ।

इचन पु
संज्ञा पुं० [हिं० इचना] खिंचाव । तनाव । ऐंचन । उ०— नीकी नासापुट ही की इचनी अचंभे भरी, मुरिके इचनि सों न क्यों हुँ मन तें मुरै ।—घनानंद,पृ०—३२ ।

इचना पु
क्रि० स० [हिं०] दे० 'ऐं चना' । उ०—डीठि मिचि जात मिचि इचत ना ऐंचि खैंची खिंचत न तसबीर तसबीरगर पै ।—पजनेस०, पृ० ७ ।

इचरज पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'आश्चर्य' । उ०—शिवसूँ उमंग पूछै सगत, इचरज अत आवत यहै ।—रघु० रू०, पृ० ४५ ।

इचिकिल
संज्ञा पुं० [सं०] १. कीचड़ ।२. तालाब या बावड़ी ।३. दलदल [को०] ।

इच्छक (१)
वि० [सं०] कामना या इच्छा करनेवाल ।

इच्छक (२)
संज्ञा पुं० १. नारंगी का वृक्ष । २. गणित में जोड़ी हुई राशि या संख्या । जोड़ [को०] ।

इच्छना पु
क्रि० स० [सं० इच्छ़न] इच्छा करना । चाहना । उ०— इच्छ इच्छ विनती जस जानी । पुनि कर जोरि ठाढ़ भइ रानी ।—जायसी (शब्द०) ।

इच्छा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक मनोवृत्ति जो किसी ऐसी वस्तु की प्राप्ति की ओर ध्यान ले जाती है जिससे किसी प्रकार के सुख की संभावना होती है । कामना । लालसा । अभिलाषा । चाह । ख्वाहिश । विषेष—वेदांत और सांख्य में इच्छा को मन का धर्म माना है । पर न्याय और वैशेषिक में इसे आत्मा (गुण) धर्म या व्यापार माना गया है । पर्या०—आकांक्षा । वांछा । दोहद । स्पृहा । इंहा । लिप्सा । तृष्णा । रुचि । मनोरथ । कामना । अभिलाषा । इषा । छंद । यौ०—इच्छाघात । इच्छाचार । इच्छाचारी । इच्छानुकूल । इच्छा— नुसार । इच्छापूर्वक । इच्छाबोधक । इच्छाभेदी । इच्छाभोजन । इच्छावान् । इच्छाबाधक । इच्छावसु । स्वेच्छा । ईश्वरेच्छा । २. माल की माँग । विशेष—आधुनिक अर्थशास्त्र में माँग या 'डिमांड' शब्द का व्यव- हार जिस अर्थ में होता है, उसी अर्थ में कौटिल्य ने 'इच्छा' का प्रयोग किया है । उसने 'आयुधागाराध्यक्ष' अधिकरण में लिखा है कि आयुधेश्वर अस्त्रों की इच्छा और बनाने के व्यय को सदा समझता रहे । ३. गणित में त्रैराशिक की दूसरी शक्ति । ४. तितिक्षा या इच्छा शक्ति के प्रकट होने की पूर्वावस्था । उ०—वह एक वृत्ति चक्र है जिसके अंतर्गत प्रत्यय, अनुभूति, इच्छा, गति या प्रवृत्ति, शरीरधर्म सबका योग रहता है ।—चिंतामणि, भा०, २, पृ० ८८ ।

इच्छाकृत
वि० [सं०] अपनी इच्छा के अनुसार किया हुआ [को०] ।

इच्छाचारी
वि० [सं० इच्छा+चारिन्] [वि० स्त्री० इच्छाचारिणी] अपनी इच्छा के अनुकूल गति गमन करनेवाला । उ०—चले गगन महि इच्छाचारी ।—मानस, ५ । ३५ ।

इच्छादान
संज्ञा पुं० [सं०] किसी याचक की आकांक्षा परिपूर्ण करना [को०] ।

इच्छानिवृत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] भोग—तृष्णा से विरक्ति । विराग [को०] ।

इच्छानुसारिणोक्रियाशक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] जैनशास्त्रानुसार योग द्वारा प्राप्त एक शक्ति जिससे योगियों के इच्छानुसार कारण के बिना कार्य की सिद्धि हो जाती है । जैसे,—मिट्टी के बिनाघट या बीज के बीना वृक्ष इत्यादि का योगियों की इच्छा से उत्पन्न होना ।

इच्छान्वित
वि० [सं०] लिप्सायुक्त [को०] ।

इच्छाफल
संज्ञा पुं० [सं०] किसी प्रश्न या समस्या का इच्छानुकूल समाधान [को०] ।

इच्छाभेदी
वि० [सं०] इच्छानुसार विरेचन करानेवाला (औषध) । प्रक्रिया भेद से जिसके खाने से उतने ही दस्त आएँ जितने की इच्छा हो । यौ०—इच्छाभेदी वटिका, इच्छाभेटी रस=दे० 'इच्छाभेदी' ।

इच्छाभोजन
संज्ञा पुं० [सं०] १. जिन जिन वस्तुओं की इच्छा हो, उनको खाना । रुचि के अनुसार भोजन । जैसे, आज हमें इच्छाभोजन कराओ । २. भोजन की वह सामग्री जिसे खाने की इच्छा हो । रुचि के अनुसार खाद्य पदार्थ जैसे, इतने दिनों पर आज हमें इच्छाभोजन मिला है ।

इच्छामय
वि० [सं०] रुचि के अनुकूल । जैसै चाहे वैसा । उ०— इच्छामय नरवेष सँवारे ।—मानस, १ । १५२ ।

इच्छामरन
वि० [सं० इच्छा+मरण] अपनी इच्छा के अनुकूल जब चाहे तब मृत्यु प्राप्त करनेवाला । उ०—कामरूप इच्छा मरन ज्ञान बिराग निधान ।—मानस, ७ । ११३ ।

इच्छारूप
वि० [सं०] अपनी इच्छा के अनुकूल जैसा चाहे रूप धारण करनेवाला । कामरूप । उ०—चेहरे बदलने के कारण ही संभवतः इन्हें इच्छारूप और कामचारी कहा गया है ।—प्रा० भा० प०, पृ० ९ ।

इच्छावसु (१)
संज्ञा पुं० [सं०] कुबेर ।

इच्छावसु (२)
वि० अपनी आकांक्षा के अनुकूल जब चाहे जितना धन प्राप्त करनेवाला [को०] ।

इच्छित
वि० [सं०] चाहा हुआ । वांछित । अभिप्रेत । अभीष्ट । उ० इच्छित फल की चाह दिलाती बल तुम्हें ।—करुणा, पृ० १४ ।

इच्छु (१) पु
संज्ञा पुं० [सं० इक्षु] ईख । उ०—इच्छु रसहू ते है सरस चरनामृत औ लवण समूद्र है लोनाई निरवधि कै ।—चरण (शब्द०) ।

इच्छु (२)
वि० [सं०] चाहनेवाला । विशेष—इसका प्रयोग यौगिक शब्द बनाने में ही होता है; जैसे— शुभेच्छु, हितेच्छु ।

इच्छुक
वि० [सं०] चाहनेवाला । अभिलाषी । आकांक्षायुक्त ।

इछना पु
क्रि० स० [हिं०] दे० 'इच्छना' ।उ०—छेल इछहि छोड़ह मोर भीर ।—विद्यापति, पृ० २०२ ।

इछा पु
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'इच्छा' । उ०—शीतल जल के इछा भूमि (क) कर्क्कशता ।—वर्ण०, पृ० १९ ।

इक्षु
वि० [सं० इच्क्षु] दे० 'इच्छुक' । उ०—धर्म तप्पनह पार । न कोऊ दास रहै इछु ।—पृ० रा०, २५ । १७३ ।

इजति पु
संज्ञा स्त्री० [अ० इज्जत] दे० 'इज्जत' । उ०—पति पातसाह की इजति उमरावन की राखी रैया राव भावसिंह की रहति है ।—मतिराम ग्रं०, पृ० ३८९ ।

इजतिराब
संज्ञा स्त्री० [अ० इज्तिराब] व्यग्रता । व्याकुलता । बेचैनी । उ०—मरना बेहतर इस इजतिराब के बदले ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० २०३ ।

इजमत पु
संज्ञा स्त्री० [अ० अजमत] दे० 'अजमत' । उ०—पसू ज्ञान इजमत कूँ देखो अनमुस एकै ठानै ।—चरण० बानी, भा० २, पृ० १४३ ।

इजमाल
संज्ञा पुं० [अ०] [वि० इजमाली] १. कुल । समष्टि । २. किसी वस्तु पर कुछ लोगों का संयुक्त स्वत्व । इस्तराक । साझा । शिरकत । ३. एकत्र करना । इकट्ठा करना (को०) । ४. संक्षेप कथन [को०] ।

इजमाली
वि० [अ०] शिरकत का । मुश्तरका । संयुक्त । साझे का ।

इजरा (१) †
संज्ञा स्त्री० [सं० नि (=नितरा)+जरा (जीर्ण) अथवा हिं० इ+जरा=जीर्णता] वह भूमि जो बहुत दिनों तक जोतने से कमजोर हो गई हो और फिर उपजाऊ होने के लिये परती छोड़ दी जाय ।

इजरा (२)
संज्ञा पुं० [अ० इजराय] दे० 'इजराय' । क्रि० प्र०—इजरा कराना=किसी भी निर्णय या आदेश को प्रचलित और कार्यान्वित कराना ।

इजराय
संज्ञा पुं० [अ०] १. जारी करना । प्रचार करना । २. काम में लाना । व्यवहार । अमल । यौ०—इजराय डिगरी=डिगरी का अमलदरामद होना । डिगरी को कार्यान्वित करना ।

इजलास
संज्ञा पुं० [अ०] १. बैठक । २. वह जगह जहाँ हाकिम बैठकर मुकदमे का फैसला करता है । कचहरी । विचारालय । न्यायालय । अदालत । यौ०—इजलासकामिल=न्यायालय की वह बैठक जिसमें सब जज एक साथ बैठ कर फैसला करें ।

इजहार
संज्ञा पुं० [अ०] जाहिर करना । प्रकट करना । प्रकाशन । उ०—धर्म का यह इजहार । खुदा है खुदा, न वह तिथि वार ।—मधुज्वाल, पृ० ९ । क्रि० प्र०—करना ।—होना । २. अदालत के सामने बयान । गवाही । साक्षी । साखी । उ०— एक दूसरे कैदी के इजहार से स्पष्ट ज्ञा होता है ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० ३, पृ० १०१ । क्रि० प्र०—देना ।=लेना ।—होना । यौ०.—इजहारतहरीरी=लिखी हुई गवाही । लिखित बयान [को०] ।

इजाजत
संज्ञा स्त्री० [अ० इजाजत] १. आज्ञा । हुक्म । २. परवानगी । मजूरी । स्वीकृति ।

इजाफत
संज्ञा स्त्री० [अ० इजाफत] संबंध । साबिका । २. फारसी व्याकरण में छठे कारक का चिह्न [को०] ।

इजाफा
संज्ञा पुं० [अ० इजा़फ़ह] १. बढ़ती । बेशी । वृद्धि । बढ़ोत्तरी । उ०—अपने अँग के जानि कै, जोबन नृपति प्रबीन । स्तन, मन, नैन, नितंब कौ, बड़ौ इजाफा कीन ।—बिहारी र०, दो० २ ।२. बचा हुआ धन । बचत । यौ०—इजाफालगान=लगान का अधिक होना । कर या लगान की बढ़ती ।

इजाबत
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. कबूलियत । स्वीकृति । स्वीकार या मंजूर करना । २. शौच । दस्त । निपटान [को०] ।

इजार
स्त्री० [अ०] पायजामा । सूथन । सुथना । उ०—लसत गूजंरी ऊजरी बिलसत लाल इजार । हिए हजारनि के हरै बैठी बाल बजार ।—मतिराम ग्रं०, पृ० २९२ । क्रि० प्र०—उतारना=नंगा होना । प्रतिष्ठा खोना । इज्जत उतारना । उ०—और आदमी ही डाले है अपनी इजार उतार ।—कविता कौ०, भा० ४, पृ० ३१७ । यौ०—इजारबंद ।

इजारदार
वि० [अ० हजारा+फा़० दार (प्रत्य)] [वि० स्त्री० इजारदारिन] किसी पदार्थ को इजारे वा ठेके पर लेनेवाला । ठेकेदार । अधि कारी । उ०—कहा तुमही हौ ब्रज के इजारदार ।—गीत (शब्द०) ।

इजारबंद
संज्ञा पुं० [अ० इजार+ फा़० बंद] सूत या रेशम का बना हुआ जालीदार बँधना जो पायजामे या लहँगे के नेफे में उसे कमर से बाँधने के लिये पड़ा रहता है । नारा । कमरबंद ।

इजारा
संज्ञा पुं० [अ० इजारह्] १. किसी पदार्थ को उजरत या किराए पर देना । २. ठेका । ३. अधिकार । इख्तियार । स्वत्व । जैसे,—तुम्हारा कुछ इजारा है ? क्रि० प्र०—करना=जिम्मेदारी स्वीकारना । जिम्मेदार होना । उ०—कमँधां चालौ मत करौ, करौ इजारौ आय ।—रा० रू०, पृ० ३१७ ।—देना ।—लेना । यौ०—इजारदार । इजारेदार ।

इजारादारी
संज्ञा स्त्री० [अ० इजारह्+ फा० दारी प्रत्य०] ठेकेदारी स्वत्व । कब्जे में होने की स्थिति । उ०—इसे ही इजारादारी एकाधिपत्य या साम्राज्यवाद कहते हैं ।—मान०, भा० ? पृ० २१२ ।

इजारेदार
वि० [अ० इजारह+फ्रा० दार(प्रत्य०)] दे० 'इजारदार' ।

इजाला
संज्ञा पुं० [अ० इजालह] दूर करना । निवारण करना [को०] ।

इजाला हैसियत उर्फी
संज्ञा स्त्री० [अ० इजालह हैसियत उर्फी़] कोई ऐसा काम करना जिससे दूसरे की इज्जत या आबरू में धब्बा लगे या उसकी बदनामी हो । हतकइज्जती । मानहानि ।

इज्जत
संज्ञा स्त्री० [अ० इज्जत] मान । मर्यादा । प्रतिष्ठा । आदर । उ०—समझते हैं इज्जत को दौलत से बेहतर ।—कविता कौ०, भा० ४, पृ० ५९३ । मुहा०—इज्जत उतारना=मर्यादा नष्ट करना । जैसे,—जरा सी बात के लिये वह इज्जत उतारने पर तैयार हो जाता है । क्रि० प्र०—करना=प्रतिष्ठा या संमान करना ।—खोना= अपनी मर्यादा नष्ट करना । जैसे,—तुमने अपने हाथों अपनी इज्जत खोई है ।—गँवाना=दे० 'इज्जत खोना' ।—जाना > जैसे,—पैदल चलने से क्या तुम्हारी इज्जत चली जायेगी ।—देना=(१) मर्यादा खोना । जैसे,—क्या रुपए के लालच में हम अपनी इज्जत देंगे ? (२) गौरवान्वित करना । महत्व बढ़ाना । जैसे,—बरात में शरीक होकर आपने हमें बड़ो इज्जत दी ।—पाना=प्रतिष्ठा प्राप्त करना । जैसे,—उन्होंने इस दर्बार में बड़ी इज्जत पाई ।—बिगाड़ना=प्रतिष्ठा नष्ट करना । जैसे,—बदमाश भले आदमियों की राह चलते इज्जत बिगाड़ देते हैं ।—रखना=मर्यादा स्थिर रखना । बेइज्जती न होने देना । जैसे,—इस समय १००) देकर आपने हमारी इज्जत रख ली ।—लेना=इज्जत बिगड़ना ।—होना= आदर होना । जैसे,—उनकी चारों तरफ इज्जत होती है । यौ.—इज्जतदार ।

इज्जतदार
वि० [अ० इज्जत+फा० दार (प्रत्य०)] प्रतिष्ठित । माननीय ।

इज्जल
संज्ञा पुं० [सं०] हिज्जल नाम वृक्ष जो जलाशय के समीप अधिक होता है [को०] ।

इज्तिराब
संज्ञा स्त्री० [अ० इज्तिराब] दे० 'इजतिराब' [को०] ।

इज्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. यज्ञ । २. देवपूजा ।

इट
संज्ञा पुं० [सं०] १. बेंत । २. तृण । ३. तृण या बेंत का बना आस्तरण । चटाई [को०] ।

इटली
संज्ञा पुं० [अं०] यूरोप के दक्षिण का एक देश ।

इटसून
संज्ञा पुं० [सं०] चटाई । आस्तरण [को०] ।

इटालिक
संज्ञा पुं० [अं०] दे० 'इटैलिक' ।

इटालियन
संज्ञा पुं० [अं०] १. एक प्रकार का कपड़ा । विशेष—यह पहले इटली से आया था । यह किसी वृक्ष की छाल से बनता है और बहुत चमकीला होता है । इसका रंग प्रायः काला होता है । २. इटली देशवासी व्यक्ति ।

इटैलिक
संज्ञा पुं० [अं०] एक प्रकार का छापा या टाइप जिसमें अक्षर तिरछे होते हैं ।

इट्चर
संज्ञा पुं० [सं०] निर्द्वंद्व घूमनेवाला साँड़ या बैल [को०] ।

इठलाना
क्रि० अ० [देश०] १. इतराना । ठसक दिखाना । गर्वसूचक चेष्टा करना । जैसे,—क्षुद्र मनुष्य थोड़े में ही इठलाने लगते हैं । २. मटकना । नखरा करना । उ०—पाइहैं पकरि तब पाइ है न कैसे हूँ, तू थोर इठलात वे तो अति इठलात हैं ।—केशव (शब्द०) । ३. छकाने के लिये जान बूझकर अनजान बनना । छकाने के लिये जान बूझकर किसी काम को देर में करना । जैसे,—(क) इठलाओ मत, बताओ किताब कहाँ छिपाई है । (ख) इठलाओ मत जैसै कहते हैं, वैसा करो ।

इठलाहट
संज्ञा स्त्री० [हि० इठलाना] इठलाने का भाव । ठसक ।

इठलाहटी
वि० [हि० इठलाहट+ई (प्रत्य)] इठलानेवाली । ठसक वाली । उ०—खरै अदब इठलाहटी, उर उपजावति त्रासु । दुसह संक बिस कौ करै जैसे सोठि मिठासु ।—बिहारी र०, दो० ३६० ।

इठाई पु
संज्ञा स्त्री० [सं० इष्ट, पा० इट्ठ+हिं० आई (प्रत्य०)] १. रुचि । चाह । प्रीति । उ०—खारिक खात न दारौ उदाखन माखन हूँ सह मेटि इठाई ।—केशव (शब्द०) । २. मित्रता । प्रेम ।

इठाना पु
क्रि० सं० [सं०एषण या इषणि] भेजना । पठाना । उ०—चाह जीयै मिलन की सो तौ कहा जात रही, ग्यान ही इठावत है लायौ तू धिगानौ रे ।—ब्रज० ग्रं०, पृ० १३२ ।

इठिमिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] यजुर्वेद से संबद्ध काठक का एक विभाग या अंश [को०] ।

इठे †
क्रि० वि० [सं० इध, प्रा० *इढ, इठ] यहाँ । इस ओर । इधर । उ०—सरधे इठे इठे ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० ५५ ।

इड
संज्ञा पुं० [सं०] अग्नि [को०] ।

इडरहर †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'इंडहर' । उ०—बने अनेक अन्न पकवाना । बरिल इडरहर स्वादु महाना ।—रघुराज (शब्द०) ।

इडविडा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक प्रकार की बकरी । २. बकरी की तरह मेंमियाने की क्रिया [को०] ।

इडा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पृथिवी । भूमि । २. गाय । ३. वाणी । ४. अनलरत प्रार्थना । स्तुति । ५. एक यज्ञपात्र । num>६. आहुति, जो प्रयाजा और अनुयाजा के बीच दी जाती है । ७. एक प्रकार का अप्रिय देवता जो असोमपा है । ८. अन्न । हवि । ९. नभदेवता । १०. दुर्गा । अंबिका । ११. पार्वती । १२. कश्यप ऋषि की एक पत्नी जो दक्ष की पुत्री थी । १३. वसुदेव की एक स्त्री । १४. मनु या इक्ष्वाकु की पुत्री, जो बुध की स्त्री थी, जिससे पुरुरवा उत्पन्न हुआ था । इसे मैत्रावरुणी भी कहा जाता है । १५. ऋतध्वज रुद्र की स्त्री । १६. स्वर्ग । १७. एक नाड़ी जो बाईं ओर है । विशेष—यह नाड़ी पीठ की रीढ़ से होकर नाक तक है । बाईं साँस इसी से होकर आती जाती है । स्वरोदय में चंद्रमा इसका प्रधान देवता माना गया है । प्राचीनों के अनुसार यह प्रधान नाड़ी है ।

इडाचिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] बर्रे । भिड़ [को०] ।

इडाजात
संज्ञा पुं० [सं०] एक सुगंधित द्रव [को०] ।

इडावान
संज्ञा पुं० [सं०] १. यज्ञान्न को खाने का अधिकारी । २. उपाहार । जलपान [को०] ।

इडिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] पृथिवी । धरती [को०] ।

इडिक्क
संज्ञा पुं० [सं०] जंगली बकरा [को०] ।

इडुर
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'इट्चर' [को०] ।

इड़हर
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'इँडहर' ।

इड़ा
संज्ञा स्त्री० [सं० इडा] दे० 'इडा' ।

इण पु
सर्व [सं० एनत, प्रा० एण, इण] दे० 'इस' । उ०—(क) इण रुति साहिब ना चलइ, चालइ तिके गिमार ।—ढोला०, दू० २४९ । (ख) आवैं इण भाषा अमल, वयण सगाई बेस ।—रघु० पु०, पृ० १२ ।

इतः
क्रि० वि० [सं०] १. अतः । इसलिये । २. यहाँ ।३. इस स्थान से । यहाँ से । ४. इधर । इस ओर । ५. इस समय से । अब से [को०] ।

इतःपर
क्रि० वि० [सं०] १. इसके उपरांत । इसके बाद । २. इतने पर । इस पर ।

इत (१) पु †
क्रि० वि० [सं० इतः] इधर । यहाँ । उ०—इततें उत औ उततें इत रहु यम की साँट सँवारी ।—कबीर (शब्द०) । यौ.—इत उत=इधर उधर । उ०—भोजन करत चपल चित, इत उत अवसर पाइ ।—मानस १ । २०३ । (ख) इत उत चितै धँस्यौ मंदिर मैं हरि कौ दरसन पायौ ।—सूर०, १० । ४२७ ।

इत (२) † पु
संज्ञा स्त्री० [सं० ईति] दे० 'ईति' । उ०—सातू इत रो नह सोक लंगर, सुखी सगला लोक ।—रघु० रू०, पृ० १२२ ।

इतकाद
संज्ञा पुं० [अ० एतकाद] दे० 'एतकाद' । उ०—तुम करौ तयारी सब इसवारी, मैं दिल यह इतकाद करयौ ।—सुजान०, पृ० १४ ।

इततक पु
वि० [हिं० इतना+क (प्रत्य०.)] इतना । थोड़ा । उ०— (क) जानै कटा कटाच्छ तिहारे कमलैन मेरों इतनक सो री । सूर०, १० । ३०५ । (ख) सुंदर बिरहिन दुखिन पीव नहीं पावरी । (परि हाँ) इतनक विष अब बाँटि सखी मुहि पावरी ।—सुंदर ग्रं०, भा० १, पृ० ३४१ ।

इतना
वि० [सं० इयान् इयत्, पा० इयन्त प्रा* इयतन अथवा हिं० ई० यह+तना (प्रत्य०)] [स्त्री० इतनी] इप मात्रा का । इस कदर । उ०—(क) इतनासुख जो न समाता अंतरिक्ष में, जल थल में ।—प्राँसू, पृ० ४९ । (ख) जनु इतनी बिरंचि करतूती ।—तुलसी (शब्द०) । मुहा०—इतने में=इसी बीच में । इसी समय । उ०—इतने में रन ठौर रुधिर नदी प्रगटत भई । गज हय सुमट करारे छिन्न अंग ह्वै ह्वै गिरे ।—(शब्द०) ।

इतनो पु †
वि० [हिं०] दे० 'इतना' । उ०—सब कौ न कहैं, तुलसी के मते इतनो जग जीवन को फलु है ।—तुलसी० ग्रं०, पृ० २०६ ।

इतफाक
संज्ञा पुं० [अ० इत्तफा़क] दे० 'इत्तफाक' । उ०—काट जिका कुल ऊबटै, आठवाट इतफाक ।—बाँकी० ग्रं०, भा० १, पृ० ६४ ।

इतबार
संज्ञा पुं० [अ० एतबार] विश्वास । प्रतीति । उ०—(क) सार शब्द से बाँचियो मानौ इतबार ।—कबीर श०, भा० १, पृ० ५० । (ख) ऐसे घर में बसै वाको क्या इतबार ।— कविता कौ०, भा० ४, पृ० ३५ ।

इतबारी
वि० [हिं० इतबार+ई (प्रत्य०)] एतबार के योग्य । विश्वासपात्र । उ०—पोरि न रष्यो पोरिया जे इतबारी धाम ।—पृ० रा०, ६३ । २०४ ।

इतमान
संज्ञा पुं० [अ० इहतिमाम=प्रबंध] इंतजाम । बंदोबस्त । प्रबंध । उ०—ताहि तखत बैठारि धारि सिर छत्र जटित जर चँवर मोरछल ढारि कियो इतमाम आम घर ।—सूदन (शब्द०) ।

इतमीनान
संज्ञा पुं० [अ०] विश्वास । दिलजमई । संतोष । उ०— दिल के लेने को जमानत चाहिए, और इतमीनान जामिन के लिये । कविता कौ०, भा० ४ पृ० ५५९ । क्रि० प्र०—करना । जैसे—तुम अपना हर तरह से इतमीनान कर लो, तब मकान खरीदो (शब्द०) ।—कराना ।—देना ।— होना । जैसे,—'जब तुम्हारी बातों से हमें इतमीनान हो गया' (शब्द०) । यौ०.—इतमीनाने कल्ब=हृदय का विश्वास या संतोष ।

इतमीनानी
वि० [अ० इतमीनान † फा० ई (प्रत्य०)] विश्वासपात्र । विश्वासनीय ।

इतर (१)
वि० [सं०] १. दूसरा । ऊपर । और । अन्य । उ०—बेटा इतर पदार्थों की क्या गणना है, मेरे शरीर का अब रक्त भी शेष नहीं । भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० ५१० । २. नीच । पामर । साधारण । उ०—महि परत सुमन रस फल पराग । जनु देत इतर नृप कर विभाग ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ३४९ ।

इतर (२) †
संज्ञा पुं० [अ० इत्र] दे० 'अतर' ।यौ०.—इतरदान=इत्र रखने का पात्र । इतरफरोश=इत्रविक्रेता ।

इतरतः, इतरत्र
क्रिद् वि० [सं०] १. अन्यथा । व्यतिरिक्त । २. दूसरी जगह पर । अन्य स्थान पर [को०] ।

इतरथा
क्रि० वि० [सं०] अन्यथा [को०] ।

इतराज पु
संज्ञा पुं० [अ० एतराज] दे० 'एतराज' ।

इतराजी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० इतराज+ई (प्रत्य०)] विरोध । विगाड़ । नाराजी । उ०—बड़ौ मीत तुव मिलन कौ, चित राजी कौ चाव । इतराजी मत कर अरे, इत राजी है आव ।—स० सप्तक, पृ० २१९ ।

इतराना
क्रि० अ० [सं० इतर अथवा सं० उत्तरण, हिं० उतराना या देश०] १. सफलता पर फूल उठना । घमंड करना । मदांध होना । उ०—(क) बड़ो बड़ाई नहिं तजै, छोटो बह इतराय । ज्यों प्यादा फरजी भयो, टेढ़ो टेढ़ो जाय ।—कबीर (शब्द०) । (ख) जस थोरेहु धन खल इतराई ।—मानस, ४ । १४ । २. रूप और यौवन का घमंड दिखाना । ठसक दिखाना । ऐंठ दिखाना । इठलाना । उ०—अब काहू के जाउ कहीं जनि आवति हैं युक्ती इतरात । सूर—(शब्द०) ।

इतराहट पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० इतराना] इतराने का भाव । दर्प । घमंड । गर्व । उ०—जीवन के इतराहट सौं अठिलाट अछो टटि ऐंठनि ऐंठि ।—देव (शब्द०) ।

इतरेतर
क्रि० वि० [सं०] परस्पर । आपस में ।

इतरेतरयोग
संज्ञा पुं० [सं०] १. परस्पर संबंध । २. एक प्रकार का द्वंद्व समास जिसमें दो जाति के केवल एक एक व्यक्ति का समावेश होता है । हिंदि में समास का यह भेद नहीं है ।

इतरेतराभाव
संज्ञा पुं० [सं०] न्यायशास्त्र में एक के गुणों का दूसरे में न होना । अन्योन्याभाव । जैसे,—गाय घोड़ा नहीं; क्योंकि गाय के धर्म घोड़े में नहीं हैं ।

इतरेतराश्रय
संज्ञा पुं० [सं०] तर्क में एक प्रकार का दोष । विशेष—जब एक वस्तु कि सिद्धि दूसरी वस्तु की सिद्धि पर निर्भर हो और दूसरी वस्तु की सिद्धि भी पहली वस्तु की सिद्धि पर निर्भर हो, तब वहाँ पर इतरेतराश्रय दोष होता है । जैसे—परलोक की सिद्धि के लिये शरीर से पृथक् असिद्ध जीवात्मा को प्रमाण में लाना या जीवात्मा को शरीरातिरिक्त सिद्ध करने के लिये असिद्ध परलोक को प्रमाण में लाना ।

इतरेद्यु
क्रि० वि० [सं०] दूसरे दिन । अन्येद्य [को०] ।

इतरै पु
क्रि० वि० [सं० इतः पर] इतने में । इसके उपरांत । उ०— इतरै एक आली ले आवी आनन आगलि आदरस ।—बेलि०, दू ८३ ।

इतरौहाँ
वि० [हिं० इतराना+औहाँ (प्रत्य०)] जिससे इतराने का भाव प्रकट हो । इतराना सूचित करनेवाला । उ०—रहे परम पद साधन बीचै परी चाह चकचौंह । रतन खोइ कै कौड़ी पाई चाल चलै इतरौंह ।—देवस्वामी (शब्द०) ।

इतलाक
संज्ञा पुं० [अ० इतलाक] १. जारी करना । इजराय । २. बंधनमुक्त करना । खोलना । ३. बोलना । कथन । ४. वह दफ्तर या बही जिसमें दस्तक और समन आदि के जारी होने और उनके तलबाने के आयव्यय का लेखा लिखा जाता है । यौ०—इतलाकनवीस=वह कर्मचारी जो इतलाक में काम करे या इतलाक का हिसाब रखे ।

इतवत
क्रि० वि० [सं० इतस्ततः, प्रा० इतवतः हिं० इतउत] इधर उधर । उ०—उझकत इतवत देखि चलत ठठकत छवि पावन ।—ब्रज० ग्रं०, पृ० ९२ ।

इतवरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे०'इत्वरी' ।

इतवार
संज्ञा पुं० [सं० आदित्यवार, प्रा० आइत्तवार=ऐतवार] शनि और सोमवार के बीच का दिन । रविवार ।

इतस्ततः
क्रि० वि० [सं०] इधर उधर । यहाँ वहाँ ।

इता पु
वि० [सं० इयत् पा० इसन्त, प्रा० इअतन, हिं० इतन, इतना] इतना । इस मात्रा का । उ०—(क) बड्डा जु बोल मुख नन्हिया, इता बोल सिर पर धरै ।—पृ० रा०, ६४ । १२९ । (ख) साचा मुँह मोड़ै नहीं अर्थ इता ही बूझ ।—दादू०, पृ० ३८५ ।

इताअत
संज्ञा स्त्री० [अ०] आज्ञापालन । ताबेदारी । उ०—'इनकी वैसे ही इज्जत और इताअत करते हैं' । प्रेमघन०, भा० २, पृ० ९२ । क्रि० प्र०—करना ।—मानना ।

इताति
संज्ञा स्त्री० [अ० इताअत] दे० 'इताअत' । उ०—को है जागजाल जो न मानत इताति है ।—तुलसी ग्रं०, पृ० २५५ । क्रि० प्र०—मानना=आज्ञा या हुक्म मानना । उ०—निसि बासर ताकहँ भलो, मानै राम इताति ।—ग्रं०, पृ० ११५ ।

इताब
संज्ञा पुं० [अ०] क्रोध । कोप । गुस्सा [को०] । यौ०.—इताबनामा=कोध, नाराजी या विरोध व्यक्त करनेवाला पत्र ।

इति (१)
अव्य [सं०] समाप्तिसूचक अव्यय ।

इति (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] समाप्ति । पूर्णता । जैसे, अब तुम्हारी पढ़ाई की इति हो गई । २. गति । गमन । ३. ज्ञान (को०) । क्रि० प्र०—करना ।—होना । यौ०.—इतिकर्तव्यता । इतिवृत्ता । इतिहास । इतिश्री ।

इति (३)
क्रि० वि० इस प्रकार । ऐसा । उ०—(क) अचर—चर—रूप हरि सर्वगत सर्वदा बसत, इति बासना धूप दीजै ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ४७९ । (ख) इति बदत तुलसीदास ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ७८ ।

इतिक (१)
वि० [सं०] चलता हुआ । गतिशील [को०] ।

इतिक (२) पु
वि० [हिं०] दे० 'इतेक' । उ०—पन कितौ कहरि क्रप्पन्न होइ । इतिक बिदा सजि चंद कों ।—पृ० रा०, ६१ । ८८९ ।

इतिकथ
वि० [सं०] १. अविश्वसनीय । २. नष्ट । अक्षद्धेय [को०] ।

इतिकथा
संज्ञा स्त्री० [सं०] अविश्वसनीय एवं निरर्थक बात [को०] ।

इतिकरणीय
वि० [सं०] दे० 'इतिकर्तव्य' [को०] ।

इतिकर्तव्य
वि० [सं०] जिसका करना आवश्वक और उचित हो । उ०—केवल प्रचलित प्रणाली का निर्वाह करना मात्र अपना इतिकर्तव्य मानते हैं । प्रेमघन०, भा० २, पृ० ५१ ।

इतिकर्तव्यता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. किसी काम के करने की विधि । परिपाटी । २. कर्म की पराकाष्ठा । कर्तव्य की समाप्ति यापूर्णता । उ०—बस कागजी घुड़दौड़ में है आज इतिकर्तव्यता ।—भारत०, पृ० १२५ । ३. मीमांसा या कर्मकांड में वह अर्थवाद बोधित वाक्य जिसे किसी कर्म की प्रशंसा और उसके करने के विधान का बोध हो ।

इतिमात्र
वि० [सं०] इतना ही । इस प्रकार का ही [को०] ।

इतिय पु
वि० [देश०] दे० 'इतना' । उ०—यों बज्जि सार आतुर इतिय ज्यों डंडूरिय बूँद धर ।—पृ० रा०, १३ । ११९ ।

इतिवत्
क्रि० वि० [सं०] इस प्रकार । इस ढंग से [को०] ।

इतिवृत्त
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुरावृत्त । पुरानी कथा । २. कहानी । किस्सा ।

इतिश्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] समाप्ति । अंत । जैसे,—औरंगजेब से ही मुगलों के राज्य की इतिश्री हुई । उ०—कब से इतिश्री हो चुकी इसके अखिल उत्कर्ष की ।—भारत०, पृ० २ ।

इतिह
क्रि० वि० [सं०] इस प्रकार निश्चय ही [को०] ।

इतिहास
संज्ञा पुं० [सं०] १. बीती हुई प्रसिद्ध घटनाओं और उनसे संबंध रखनेवाले पुरुषों का कालक्रम से वर्णन । तवारीख । उ०—यद्यपि हमें इतिहास अपना प्राप्त पूरा है नहीं ।— भारत०, पृ० ४ । २. वह पुस्तक जिसमें बीती हुई प्रसिद्ध घटनाओं और भूत पुरुषों का वर्णन हो । उ०—अब भी 'लिखित मुनि' का चरित वह लिखित है इतिहास में ।— भारत०, पृ० १० । १. किसी विषय में संबंधित तथ्यों का आदिकाल से वर्तमान समय तक का क्रमबद्ध वर्णन । जैसे— किसी शास्त्र, कला, संस्कृति का इतिहास । २. कथा । वृत्त । उ०—इस अनंत काले शासन का, वह जब उच्छृंखल इतिहास ।—कामायनी, पृ० ३८ । यौ०.— इतिहासकार=इतिहास लिखनेवाला । इतिवृत्त लेखक । इतिहासज्ञ=इतिहास का जानकार । इतिहासवेत्ता= इतिहासज्ञ ।

इते पु
वि० [हिं०] दे० 'इतो' । उ०—इत घटे घटिहै कहा जो न घटै हरि नेह ।—तुलसी ग्रं०, पृ० १५१ ।

इतेका †
वि० [हिं० इ त+एक] इतना एक । इतना ।

इतै
क्रि० वि० [सं० इतः] इधर । इस तरफ । इस ओर । उ०— मोहन मानि मनायौ मेरौ । हौं बलिहारी नंद नँदन की, नैंकु इतै हँसि हेरौ ।—सूर०, १० । २१६ । मुहा०—इतै उत्त=दे० 'इतउत' । उ०—उमंडे जबै सुंडदंडे उछालैं । तबै तोरि तारै इतैउत्त घालैं । पद्माकर ग्रं० पृ० २७९ ।

इतो पु, इतौ पु
वि० [सं० इयत्=इतना] [स्त्री, इती] इतना । इस मात्रा का । निर्दिष्ट मात्रा का । उ०—(क) कुटिल अलक छुटि परत मुख, बढ़िगौ इती उदोत । बंक बिकारी देत ज्यों दाम रुपैया होत ।—बिहारी (शब्द०) । (ख) मेरे जान इन्हें बोलिबे कारन चतुर जनक ठयो ठाठ इतौ री ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ३०८ । (ग) लै लै मोहन, चंदा लै । सूरदास प्रभु इती बात को कत मेरे हठै ।—सूर०, १० । १९५ ।

इतौत पु
क्रि० वि० [हिं० इत+उत] इधर उधर । उठ—चंद उदौत उतौत चितौत चकी सबकी चख चारु चकोरी ।— भिखारी० ग्रं०, भा० १, पृ० १५० ।

इत्कट
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार वृक्ष या घास [को०] ।

इत्किला
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक सुगंध द्रव्य । गोरोचन [को०] ।

इत्त पु
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'इत' । उ०—जा को रहना उत्त घर सो क्यों लोड़ै इत्त । जैसे पर घर पाहुना रहै उठाए चित्त ।— कबीर सा० सं०, पृ० ७७ ।

इत्तन पु
वि० [हिं०] दे० 'इतना' । उ०—इत्तन बचन कह्यौ चर आइय ।—प० रा०, पृ० १२० ।

इत्तफाक
संज्ञा पुं० [अ० इत्तिफाकत] [वि० इत्तफाकिया; क्रि० वि० इत्तफाकन] १. मेल । मिलाप । एका । २. सहमति । मुहा०—इत्तफाक करना=सहमत होना । जैसे,—मै आपकी राय से इत्तफाक नहीं करता । ३. संयोग । मौका । अवसर । जैसे,—इत्तफाक की बात है, नहीं तो आप भी कभी यहाँ आते है? मुहा०—इत्तफाक पड़ना=संयोग उपस्थिति होना । मौका पड़ना । अवसर आना । जैसे,—मुझे अकेले सफर करने का इत्तफाक कभी नहीं पड़ा । इत्तफाक से=संयोगवश । अचानक । अकस्मात् । जैसे,—मै स्टेशन जा रहा था, इत्तफाक से वे भी रास्ते में मिल गए ।

इत्तफाकन्
क्रि० वि० [अ० इत्तिफाकन्] संयोगवश । अचानक । एकाएक ।

इत्तफाकिया
वि० [अ० इत्तिफाकियह] आकास्मिक ।

इत्तफाकी
वि० [अ० इत्तिफाक] दे० 'इत्तफकिया' ।

इत्तला
संज्ञा स्त्री० [अ० इत्तलाअ] सुचना । खबर । उ०—बहरे खुदा जनाब दें हमको ये इत्तला । साहब का क्या जवाब था बाबु ने क्या कहा ।—कविता कौ०, भा०४, पृ० ६२६ । क्रि० प्र०—करना ।—देना ।—होना । मुहा.—इत्तला लिखना=राजकर्मंचारियों किसी बात की सुचना लिखना । यौ०—इत्तलानामा ।

इत्तलानामा
संज्ञा पुं० [अ० इत्तला अ+ फा० नामह] किसी बात की खबर देनेवाला पत्रक । सुचनापत्र ।

इत्तहाद
संज्ञा पु० [अ० इत्तिहाद] मेल मिलाप । एकता । उ०—खुदा गवाह है, मैने हमेशा हत्तहाद की कोशिश की ।—काया०, पृ० ३३४ ।

इत्ता †
वि० [हिं० इतना] इतना । उ०—कड़ेल जवान न होगा तो भला शोरों से इत्ता ठेंगा मुकाबिला कर सकेगा ।—फिसाना०, भा०३,० पृ० १२ ।

इत्तिफाक
संज्ञा पुं० [अ० इत्तिफाक] संयोग । मौका । उ०— 'यह तो कई बार इत्तिफाक हुआ है कि हम पहाड़ की ऊँची चोटी पर है' ।—सैर कु०, पृ० ६२ ।

इत्तिहाम
संज्ञा पुं० [अ०] दोष । तुहमत । क्रि० प्र०—देना ।

इत्तो पु
वि० [हिं०] दे० 'इत्तो' ।

इत्थं
क्रि० वि० [सं० इत्थम्] इस प्रकार से । ऐसे । यों ।

इत्थंकार
क्रि० वि० [सं० इत्थङ्कांरम] इस प्रकार । इस ढंग से [को०] ।

इत्थंभुत
वि० [सं० इत्थम्भुत] इस प्रकार का । ऐसा । २. सत्य । विशवसनीय (कथा) ।

इत्थंविध
वि० [सं०] १. इस प्रकार का । ऐसा । २. इस प्रकार की विशेषता या गुणों से युक्त [को०] ।

इत्थमेव (१)
वि० [सं०] ऐसा ही ।

इत्थमेव (२)
क्रि० वि० इसी प्रकार से ।

इत्थशाल
संज्ञा पुं० [सं; मि० अ०, इत्तिसाल] दे० 'इत्थसाल' [को०] ।

इत्थसाल
संज्ञा पुं० [अ० इत्तिसाल] ताजक ज्योतिष के अनुसार कुंड़ली में १६ योगों में से तीसरा योग जहाँ वेगगामी ग्रह मंदगामी ग्रह से एक अंश में कम हो और वे परस्पर एक दुसरे की देखते हों या संबंध करते हों वहाँ इत्थसाल योग होता है ।

इत्थाँ पु †, इत्थुँपु †, इत्थेपु †
क्रि० वि० [सं० इत?] यहाँ । इस स्थान पर ।

इत्यादि
अव्य० [सं०] इसी प्रकार के अन्य । और । इसी तरह । और दुसरे । वगैरह । उ०—बेटा हमारा धन, आभुषन, बसन इत्यादि सब बलात्कार हर ले गए' ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० ५०८ । विशेष—जहाँ किसी प्रसंग से समान संबंध रखनेवाली बहुत सी वस्तुओं को गिनाने की आवश्यकता होती है, वहाँ लाघव के लिये केवल दो तीन वस्तुओं को गिनाकर 'इत्यादि' लिख देते है जिससे और वस्तुओं का आसान मिल जाता है ।

इत्यादिक
वि० [सं०] इसी प्रकार के अन्य और । ऐसी ही और दुसरे जैसे—राम कृष्ण इत्यादिकों ने भी ऐसा ही किया है । वेशेष—इस शब्द के आगे 'लोग' या इसी प्रकार के और विशेष शब्द प्राय? लुप्त रहते हैं ।

इत्र
संज्ञा पुं० [अ०] १. अतर । पुष्पसार । इतर । उ०—न दी बु एक ने ऐ गुलबदन तेरे पीसनों की, हजारों इत्र खिंचकर तबल ए अत्तार में आए । कविता कौ०, भा०४, पृ० ३७७ । २. सुंगध । खुशबु । ३. सार । सत्त ।

इत्रदान
संज्ञा पुं० [अ० इत्र+ फा० दान] दे० 'अतरदान' ।

इत्रफरोश
संज्ञा पुं० [अ० इत्र+फा० फरोश] अतर बेचनेवाला । गंधी । अत्तार ।

इत्रसाज
संज्ञा पुं० [ इत्र+फा० साज] इत्र बनानेवाला । गंधी [को०] ।

इत्रीफल
संज्ञा पुं० [सं० त्रिफला] एक हकीमी दवा । हड़, बहेड़े, और आँवले का चुर्ण तिगुने शहद में मिलाकर चालीस दिन तक रखा जाता है और फिर व्यवहार में आता है ।

इत्वर (१)
वि० [सं०] १. क्रुरकर्मा । क्रुर । २. निम्न । नीच । ३. यात्री । पथिक [को०] । ४. निर्धन । धर्महीन [को०] ।

इत्वर (२)
संज्ञा पुं० १. षंढ । नपुंसक । २. उत्सर्ग किया हुआ वृष या छुट्टा पशु । खुला हुआ जानवर [को०] ।

इत्वरी
वि० स्त्री० [सं०] १. छिनाल । कुलटा । २. अभिसारिका [को०] ।

इथ पु
अव्य० [सं० अत्र, प्रा० इत्थ] यहाँ । अत्र । उ०—तै इथ नै संतारि दै जो चाहहि सो लेहि ।—भिखारी० ग्रं०, भ०, १, पृ० १६७ ।

इथ्थह पु
अव्य० [हिं०] दे० 'इथ' । उ०—तब लग्ग मेछ इथ्थह प्रवेस ।—पृ० रा०, ६१ ।५९२ ।

इदंतन
वि० [सं० इदन्तन] १. इस समय का । वर्तमान । २. क्षण— स्थायी । क्षणिक [को०] ।

इदंता
संज्ञा स्त्री० [सं० इदन्ता] सादृश्य । एकरूपता । समरूपता [को०] ।

इदंद्र
संज्ञा पुं० [सं० इदन्द्र] वह जो (इस) इदं (=जगत्) को देखता है । परमात्मा [को०] ।

इदबर
संज्ञा पुं० [सं० इदम्बर] नीला कमल । इंदीवर [को०] । इड़म्—सर्व० [सं०] यह ।

इदमित्थं
पद० [सं० इदमित्थम्] यह ऐसा है । ऐसा ही है । ठीक है । उ०—हरि अवतार हेतु जेहि होई । इदमित्थं कहि जाइ न सोई ।—मानस, १ ।१२१ ।

इदराक
संज्ञा पुं० [अ० इद्राक] ज्ञान । बोध । समझबूझ । उ०— गफलत कि यह लोग नहीं यहाँ साहिबे इदराक रहु ।—राम० धर्म०, पृड० ८९ ।

इदानींतन
वि० [सं० इदातीन्तन] १. इस समय का । आधुनिक । २. नवीन । नया ।

इदावत्सर
संज्ञा पुं० [सं०] बृहस्पति की गति के अनुसार प्रत्येक ६० वर्ष में १२ यगु होता है और प्रत्येक युग में पाँच पाँच वर्ष होते हैं । प्रत्येक युग के तीसरे वर्ष को इदावत्सर कहते हैं । विशेष—इनके नाम ये हैं-शुक्ल, भाव, प्रमाथी, तारण, विरोधी, जय, विकारी, क्रोधी, सौम्य, आनंद, सिद्धार्थ और रक्ता इनमें अन्न और वस्त्र के दान का बड़ा माहात्म्य है ।

इद्दत
संज्ञा स्त्री० [अ०] पति के मरने के बाद का ४० दिन का अशौच जो मुसलमान विधिवाओं को होता है और जिसके बीच वे अन्य पुरुष से विवाह नहीं कर सकतीं । विशेष—कहते हैं कि यह इसलिए रखआ गया है जिससे यदि गर्भ हो तो उसका पता चल जाय । यह अवधि तलाक की स्थिति में तीन महीने, पति की मृत्यु पर चार महीने दस दिन और गर्भवती के लिये संतान होने तक भी है ।

इद्ध (१)
वि० [सं०] १. प्रकाशित । ज्योतित । २. प्रकाशमान । चम- कीला । ३. आशचर्यकारक । विस्मयजनक । ४. पालन किया जानेवाला (आदेश) । ५. दीप्त । ६. दग्ध । ७. स्वच्छ । निर्मल [को०] ।

इद्ध (२)
संज्ञा पुं० १. आतप । धाम । २. दीप्ति । कांति । ३. आशचर्य । अचंभा [को०] ।

इद्धदीधिति
संज्ञा पुं० [सं०] अग्नि । आग [को०] ।

इद्धमन्यु
वि० [सं०] भयंकर क्रोधी । अत्यधिक क्रोधयुक्त [को०] ।

इद्धग्नि
वि० [सं०] जिसकी अग्नि निरंतर प्रदीप्त रहती हो [को०] ।

इद्धत्सर
संज्ञा पुं० [सं०] बृहस्पति की गति के अनुसार ६० वर्ष में १२ युग होते हैं और प्रत्येक युग में पाँच वत्सर होते हैं । प्रत्येक युग के पाँचवें व अंतिम वर्ष को इद्वत्सर कहते है । विशेष—इनके नाम ये हैं—प्रजाति, धाता, बृष, व्यय, खर, दुर्मुख, प्लव, पराभव, रोधकृत्, अनल, दुर्मति और क्षय ।

इधक पु †
वि० [सं० अधिक] दे० 'अधिक' ।—उ०—इधक अनुरागकर पुरुष निरजुर अही ।—रघु० रु०, पृ० ५७ ।

इधकार पु †
संज्ञा पुं० [सं० अधिकार] दे० 'अधिकार' । उ०—प्रसध नाम इधकार जग तारे माटी पणों ।-रघु० रु०, पृ० २६ ।

इधर
क्रि० वि० [सं० इतस् या इतर] १. इस और । यहाँ । इस तरफ । उ०—इधर कोई है अभी सजीव हुआ ऐसा मन में अनुमान ।—कामायनी, पृ० ५२ । मुहा०—इधर उधर—=(१) यहाँ वहाँ । इतस्तत? । अनिशिचत स्थान में । जैसे,—लोग विपत्ति के मारे इधर उधर मारे मारे फिरते थे । (२) आसपास । इनारे किनारे । अड़ोस पड़ोस में । जैसे,—तुम्हारे घर के इधर उधर कोई नाई हो तो भेज देना । (३) चारों ओर । सब ओर । जैसे,—मेज के इधर उधर देखो, पुस्तक वहीं कहीं होगी । इधर उधर करना=(१) टाल- मटूल करना । हीला हवाला करना । जैसै,—जब हम अपना रुपया माँगते हैं, तब तुम इधर उधर करते हो । (२) अस्त- व्यस्त करना । उलट पुलट करना । क्रम भंग करना । जैसे,— बच्चे ने सब कागजपत्र इधर उधर कर दिए । (३) तितर बितर करना । भगाना । जैसे,—अकेले उसने २० चोरों को मारकर इधर उधर कर दिया । (४) हटाना । भिन्न भिन्न स्थानों पर कर देना । जैसे,—महाजनों के डर से उसने घर का माल इधर उधर कर दिया । इधर उधर की बात=(१) बाजारू गप । अफवाह । सुनी सुनाई बात । जैसे,— हम ऐसी इधर उधर की बातों पर विश्वास नहीं करते ।(२) बेठिकाने की बात । असंगत बात । व्यर्थ की बकवाद । जैस तुम कोई काम नहीं करते; व्यर्थ इधर उधर की बातें किया करते हो । इधर को उधर करना या लगाना=चुगलीखोरी करना । चवाव करना । एक पक्ष के लोगों की बात दूसरे पक्ष के लोगों से कहना । झगड़ा कराना । इधर की दुनिया उधर होना= अनहोनी बात का होना । असंभव का संभव होना । जैसे,— चाहे इधर की दुनिया उधर हो जाय, पर हम ऐसा कभी नहीं करेंगे । इधर उधर की हाँकना=झूठ मूठ बकना । व्यर्थ समय खोना । जैसे,—तुम इधर में उधर में रहा करते हो; कोई काम तो करते नहीं । इधर उधर से=(१) प्रतिर्दिष्ट स्थान से । अनिशिचत जगह से । जैसे,—यह पुस्तक कहीं इधर उधर से झटक लाए हो । (२) औरों से । दूसरों से । जैसे—(क) जक तक इधर उधर से काम चले, तब तक घोड़ा क्यों मोल लें । (ख) उसे इधर उधर से भोजन मिल ही जाता है; वह रसोई क्यों बनावे । इधर का उधर होना=(१)उलट पुलट होना । अंड बंड होना । बिगड़ना । जैसे,—हवा से सब कागज- पत्र इधर उधर हो गए । (२) टालमटूल होना । हीला- हवाला होना । जैसे,—महीनों से इधर उधर हो रहा है देखें रुपया कब मिलता है । (३) भाग जाना । तितर बितर होना । जैसे,— शेर के आते ही सब लोग इधर उधर हो गए इधर का उधर करना=उलट पलट देना । अस्तव्यस्त करना । क्रम बिगड़ना । इधर का उधर होना=उलट जाना । विपर्यय होना । विपरीत होना । जैसे,—देखते देखते सारा मामला इधर का उधर हो गया । इधर या उधर होना=परस्पर विरूद्ध दो संभावित घटनाओं में से (जेसे,—जीना मरना, हारना या जीतना) किसी एक का होना । जैसे,—जज के यहाँ मुकदमा हो रहा है; दो चार दिन में इधर या उधर हो जायगा । इधर से उधर फिरना=चारों ओर फिरना । जैसे,— तुम व्यर्थ इधर से उधर फिरा करते हो । न इधर का होना न इधर का=(१) किसी ओर का न रहना । किसी पक्ष में न रहना । जैसे,—वे हमारी शिकायत उनसे और उनकी शिकायत हमसे किया करते थे; अंत में न इधर के हुए न उधर के । (२) किसी काम का न रहना । जैसे,—वे इतना पढ़ लिखकर भी न इधर के हुए न उधर के । (३) दो परस्पर विरुद्ध उद्देश्यों में से किसी एक का भी पूरा न होना । जैसे,—वे नौकरी के साथ साथ रोजगार भी करना चाहते थे; पर अंत में न इधर के हुए न उधर के ।

इध्म
संज्ञा पुं० [सं०] १. काठ । लकड़ी । २. यज्ञ की समिधा जो प्राय? पलाश या आम की होती है । यौ०.—इध्मजिह्व=अग्नि । इध्मवाह= अगस्त्य ऋषि का एक पुत्र जो लोपामुद्रा से उत्पन्न हुआ था ।

इध्मपरिवासन
संज्ञा पुं० [सं०] लकड़ी की चैली या टुकड़ा [को०] ।

इध्मप्रवश्चन
संज्ञा पुं० [सं०] कुल्हाड़ी । टाँगी [को०] ।

इध्मभृति
वि० [सं०] इँधन या लकड़ी लानेवाला [को०] ।

इन (१)
सर्व० [हिं०] 'इस' का बहुवचन ।

इन (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य । २. प्रभु । स्वामी । ३. राजा । नरेश (को०) । ४. हस्त नाम का नक्षत्र [को०] ।

इन (३)
वि० १. योग्य । शक्त । क्षम । २. बहादुर । ताकतवर । दृढ़ । ३. गौरवपूर्ण [को०] ।

इनआम
संज्ञा पुं० [अ० इन आम] दे० 'इनाम' । उ०—इन लोगों को एक एक जोड़ा दुशाला इनआम दो ।-भारतेंदु ग्रं०, भा०१, पृ० ५४२ ।

इनकम
संज्ञा स्त्री० [अं०] आय । आमदनी । अर्थागम । यौ०.—इनकम टैक्स ।

इनकमटैक्स
संज्ञा पुं० [अं०] आदमी पर महसूल । आय पर कर । आयकर ।

इनकलाब
संज्ञा पुं० [अ० इनक़लाब] परिवर्तन । उलटफेर । उ०— सुना न कानों से थआ जो हमने वो आँख से इनकलाब देखा ।— शेर०, भा०, पृ० ६९२ । २. क्रांति । राज्यपरिवर्तन । यौ०—इनकलाब जिंदाबाद=क्रांति चिरजीवी हो । इनकलाब हकूमत=राज्यक्रांति । राज्य संबंधी परिवर्तन ।

इनकलाबी
वि० [अ० इनकलाबी] क्रांति या परिवर्तन लानेवाला ।

इनकांत
संज्ञा पुं० [सं० इनकान्त] सूर्यकांत मणि [को०] ।

इनकार
संज्ञा पुं० [अ०] अस्वीकार । नकारना । नामंजूरी । नहीं करना । 'इकरार' का उलटा । क्रि० प्र०—करना ।—होना ।

इनकारी (१)
वि० [अ०] इनकार करनेवाला । अस्वीकृतिसूचक [को०] ।

इनकारी (२)
संज्ञा स्त्री० इनकार या अस्वीकार की स्थिति ।

इनकिशाफ
संज्ञा पुं० [अ० इनकिशाफ] १. गवेषणा । अनुसंधान । २. व्यक्त होना । प्रकट होना । जाहिर होना [को०] ।

इनकिसार
संज्ञा पुं०[अ०] खाकसारी । नम्रता । विनय [को०] ।

इनफार्मर
संज्ञा पुं० [अ० इनफार्मड] वह जो गुप्त रूप से किसी बात का भेद लगाकर पुलिस को बताता है । गोइंदा । भेदिया । जैसे,—वह पुलिस का इनफार्मर है ।

इनफिकाक
संज्ञा पुं० [अ० इनफि़काक] १. रेहन का छुड़ाना । बंधक छुड़ाना । २. मुक्त होना । छूटना (को०) । ३. अलग अलग होना (को०) । यौ०—इनफिकाक रेहन ।

इनफिसाल
संज्ञा पुं० [अ० इनफिसाल] १. वाद का निर्णय होना । फैसला होना । २. फैसला । निर्णय [को०] ।

इनफ्लुएंजा
संज्ञा पु० [अं० इनफ्लुएंजा] सरदी का बुखार जिसमें सिर भारी रहता है, नाक बहा करती है और हरारत रहती है ।

इनसभ
संज्ञा पुं० [सं०] राजसभा । शाही दरबार [को०] ।

इनसान
संज्ञा पुं० [अं०] १. मनुष्य । आदमी । २. सभ्य । सज्जन [को०] ।

इनसानियत
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. मनुष्यत्व । आदमीयत । २. बुद्धि- मानी । बुद्धि । शऊर । ३. भलमनसी । सज्जनता । मुरव्वत ।

इनसानी
वि० [अ० इनसान+फा०. (प्रत्य०.) ] १. मानवीय । मानव संबंधी । २. राज्जनोचित [को०] ।

इनसानीयत
संज्ञा स्त्री० [अ०] दे० 'इनसानियत' [को०] ।

इनसाफ
संज्ञा पुं० [अ० इनसाफ] दे० 'इंसाफ' । उ०—माँ और भाई मालिक से इनसाफ चाहने के लिये विलायत पहुँचे ।—भारतेंदु ग्रं०, भा०१, पृ० ३४९ ।

इनसालवंट, इनसालवेंट
वि० [अं०] वह व्यापारी जो व्यापार में घाटा आने के कारण अपना ऋण चुकाने में असमर्थ हो । दिवालिया । उ०—तो क्या इनसालवेंट होने की दरखास्त देनी पड़ेगी ।—श्री निवास ग्रं०, पृ० ३८१ ।

इनसिदाद
संज्ञा पुं० [अ०] १. बंद होना । रुक जाना । २. निवारण । यौ०—इनसिदादे जुर्म= अपराधों का रुकना । अपराधों का निवारण । खात्मा [को०] ।

इनस्टिट्यूशन
संज्ञा पुं० [अं० इन्स्टिट्यूशन] संस्था । समाज । मंडल ।

इनहिदाम
संज्ञा पुं० [अं०] १. ढहना । गिरना । २. ध्वंस [को०] ।

इनहिसार
संज्ञा पुं० [अ०] निर्भरता । दारोमदार [को०] ।

इनान
संज्ञा पुं० [अ०] बल्गा । बाग । लगाम [को०] । यौ०.—इनाने हुकूमत=शासन की बागडोर । शानसूत्र ।

इनानी
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक वृक्ष । वटपत्री [को०] ।

इनाम
संज्ञा पुं० [अ० इनआम] १. पुरस्कार । बखशिश । उपहार । २. माफी जमीन । यौ०.—इनाम इकराम=इनाम जो कृपापूर्वक या सेबा से प्रसन्न होकर दिया जाय । इनामदार=प्रनाम प्राप्त करनेवाला ।

इनायत
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. कृपा । दया । अनुग्रह । मेहरवानी । उ०—इनायत है तुम पे यह सर्कार की । तुम्हें दूसरी उसने पोशाक दी ।—कविता कौ०, भा०२, पृ० २१३ । २. एहसान । क्रि० प्र०—करना ।—फरमाना ।—रखना । मुहा०—इनायत करना=(१) कृपा करके देना । जैसे,जरा कलम तो इनायत कीजिए । २. रहने देना । बाज रखना । वंचित रखना (व्यंग्य) । जैसे,—इनायत कीजिए, मैं आपकी चीज नहीं लेता ।

इनारा †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'इँदारा' ।

इनारुन †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'इँदारुन' ।

इनारु
संज्ञा पुं० [हिं०] 'इँदारुन' । उ०—मीठा जिसमें जानते थे वह इनारू का फल था ।—भारतेंदु ग्रं०, भा०,२, पृ० २०५ ।

इनेगिने
वि० [हिं० इने=गिने की अनुध्व.+गिनना] १. कतिपय । कुछ । चंद । थोड़े से । २. चुने चुनाए । गिने गिनाए । जैसे,— इस विद्या के जाननेवाले अब इने गिने लोग हैं ।

इनोदय
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्योदय [को०] ।

इनजिन
संज्ञा पुं० [हिं० इंजन] दे० 'इंजन' । उ०—इच्छा कर्म संजोगी इनजिन गारड आप अकेला है ।—श्यामा०, पृ० ११४ ।

इन्टरनैशनल
वि० [अं०] दे० 'अंतर्राष्ट्रीय' । जैसे,—इन्टरनैशनल एग्जिबिशन ।

इंटरमीड़िएट
वि० [अं०] बीच का । मध्य का । मध्यम । जैसे,— इन्टरमीडिएट क्लास उच्चतर माध्यमिक कक्षा ।

इन्टरव्यू
संज्ञा पुं० [अं०] १. व्यक्तियों का आपस में मिलना । एक दूसरे का मिलाप । मुलाकात । साक्षात् वार्तालाप या प्रश्नोत्तर जैसे,—प्रयाग के एक संवाददाता ने उस दिन स्वराज्य पार्टी की स्थिति जानने कि लिये उसके नेता पं० मोतीलाला नेहरू का इटरव्यू किया था । २. परीक्षा अथवा नियुक्ति के लिये किसी समिति के संमुख साक्षात्कार के लिये उपस्थिति होना । क्रि० प्र०—करना ।—लेना । ३. आपस में विचारों का आदान प्रदान । वार्तालाप । जैसे,— समाचार पत्रों में एक संवाददाता और मालवीयजी का जो इन्टरव्यू छपा है, उसमें मालवीय जी ने देश की वर्तमान राज- नीतिक स्थिति पर अपने विचार प्रकट किए हैं ।

इन्नर †
संज्ञा पुं० [सं० अनीर=बिना जल का] पेउस (१० दिन के भीतर ब्याई हुई गाय का दूध) में गुड़, सोंठ चिरौंजी और कच्चा दूध मिलाकर पकाने से वह जम जाता है । इसी जमे हुए दूध को इन्नर कहते हैं ।

इन्याम पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'इनाम' । उ०—राजमती इन्याम दौ । मढ़ी है थानीक चांपानेर ।-बी० रासो, पृ० ९५ ।

इन्वका
संज्ञा स्त्री० [सं०] इल्वला नाम का पाँच तारों का समूह जो मृगशिरा नक्षत्र के ऊपर रहता है ।

इन्वायस
संज्ञा पुं० [अं०] १. व्यापारी द्वारा भेजे हुए माल की सूची जिसमें उस माल के दाम आदि का व्योरा रहता है । बीजक । रघौती । २. चालान का कागज ।

इन्श्योरेंस
संज्ञा पुं० [अं० इन्शयोरेंस] दे० 'बीमा' । जैसे—लाइफ इन्श्योरेंस जीवनबीमा ।

इन्स
संज्ञा पुं० [अ०] दे० 'इनसान' । उ०—बजुज खालिक जिन, इन्स व बशर, उनकी होनहारी की नई किस खबर ।-दक्खिनी०, पृ० ३७४ ।

इन्साइक्लोपीड़िया
संज्ञा पुं० [अं०] दे० 'विश्वकोश' ।

इन्साइक्लोपीड़ियाब्रिटानिका
संज्ञा पुं० [अं०] अँग्रेजी की एक प्रसिद्ध विश्वकोश । उ०—न एतबार हो तो इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका खोलकर देख लीजिए ।-प्रेमघन०, भा० २. पृ० ४१४ ।

इन्सोलिन
संज्ञा स्त्री० [अं०] मधुमेह रोकने की दवा । उ०—सिर्फ एक बार शिमला में इन्सोलिन की सुई लगाई थी ।-किन्नर०, पृ० १५ ।

इन्ह पु †
सर्व [हिं०] दे० 'इन' । उ०—इन्ह कै दसा न कहैउँ बखानी । सदा काम के चेरे जानी ।-मानस, १ ।८५ ।

इन्हन पु
संज्ञा पुं० [सं० इन्धन] दे० 'इधंन' । उ०—ज्ञान अग्नि तामे दियो विषय इन्हन जरि जाय ।-भीखा श०, पृ० १०० ।

इफतरा
संज्ञा पुं० [अं० इफ्तिरह्] १. मिथ्या आरोप । तोहमत । २. व्यर्थ की बात । उ०—बेद कितेब इफतरा भाई दिल का फिकिर न जाई ।-कबीर ग्रं० पृ० १९७ । यौ०.—इफतरा परवाज=कलंक लगानेवाला । तोहमत लगानेवाला ।

इफतार
संज्ञा पुं० [अ० इफ्तार] रोजा खोलना [को०] ।

इफतारी
संज्ञा स्त्री० [अ० इफतारी] वह वस्तु जिसे खाकर रोजा खोला जाता है [को०] ।

इफरात
संज्ञा स्त्री० [अ० इफ़रात] अधिकता । ज्यादती । अधिकाई । कसरत । बहुतायत ।

इफलास
संज्ञा पुं० [अ० इफ्लास] मुफलिसी । तंगदस्ती । गरिबी । दरिद्रता । आवश्यकता । उ०—वह इफसाल अपना छिपाते हैं गोया । जो दौलत से करते है नफरत जियादा ।—कविता कौ, भा० ४, पृ० ६०० ।

इफलासी
संज्ञा स्त्री० [अ० इफलासी] दे० 'इफलास' ।

इफाकत
संज्ञा पुं० [अ० इफा़कत] १. रोगमुक्ति । २. रोग में सुधार होना । स्वास्थ्यलाभ करना [को०] ।

इब पु
अव्य [हिं०] दे० 'अब' । उ०—इब तो मोहि लागी बाई उन निहचल चित लियो चुराई ।-दादू०, पृ० ४७० ।

इबतदा
संज्ञा स्त्री० [अ० इब्तिदह्] दे० 'इब्तिदा' । उ०—जो औव्ल में पैदायश इबतदा, परम आतमा से हुई यह सदा ।— कबीर मं०, पृ० ३८६ ।

इबन
संज्ञा पुं० [अ० इब्न] पूत्र । उ०—तेहि के कोख कीन्ह अवतरा । यूसुफ इबन अमीन दुई बारा ।—हिंदी प्रेमा०, पृ० २३४ ।

इबरत
संज्ञा स्त्री० [अ० इब्रत] १. विचित्रता । अदभुत कार्य । २. चेता वनी । शिक्षा । नसीहत [को०] । यौ०.—इबरतअंगेज=चेतावनी देनेवाला । शिक्षाप्रद । इबरत आमेज=अदभुत । अद्वितीय । अनोखा ।

इबरानी (१)
संज्ञा पुं० [अ० इब्रानी] इब्राहीम नामक पैगंबर के वंशज । यहुदी ।

इबरानी (२)
संज्ञा स्त्री० पैलिस्तान देश की प्राचीन भाषा ।

इबरानी (३)
वि० यहूद या फिलस्तीन देश का । उस देश से संबंधित ।

इबरायनामा
संज्ञा पुं० [फा०] वह पत्र जिसके द्वारा कोई मनुष्य अपने स्वत्व या हक से दस्तबरदार हो । त्यागपत्र ।

इबाराहीम
संज्ञा पु० [अ० इब्राहीम] यहूदी जाति के आदि पुरुष जो इस्लाम धर्म के अनुसार एक पैगंबर माने जाते हैं ।— उ०—नूह की दसवीं पीढ़ी में इबराहीम उत्पन्न हुआ ।— कबीर मं०, पृ० ५२ ।

इबरा पु
संज्ञा स्त्री० [अ० इब्रानी का संक्षिप्त रूप] दे० 'इबरानी' । उ०—इबरी औ अरबी सुर बानी । पारस औ तुरकी मिसरानी ।—हिंदी प्रेमा०, पृ० २३३ ।

इबलीस
संज्ञा पुं० [ए० इब्लीस] शैतान । उ०—खड़ग दीन्ह उन्ह जाइ कहँ देखि डरै इबलीस ।—जायसी ग्रं०, पृ० ३२२ ।

इबा
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. एक तरह का कंबल । २. बड़ा चोगा [को०] ।

इबादत
संज्ञा स्त्री० [अ०] पुजा । आराधना । उ०—उन्हें शौके इबादत भी है और गाने की आदत भी, निकलती हैं दुआएँउनके मुँह से ठुमरियाँ होकर ।—कविता कौ०, भा०, ४, पृ० ६२२ । यौ०.—इबादतखाना ।

इबादतखाना
संज्ञा पुं० [अ० इबादत+ फा० खानह] पूजा करने का स्थान । पूजा गृह । उपासना गृह ।

इबारत
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. लेख । मजमून । उ०—उसके आसपास फारसी में बहुत सी इबारत लिखी थी ।-श्रीनिवास ग्रं०, पृ० १३० । २. लेखशैली । वाक्यरचना । उ०—बस इबारत हो चुकी मतलब प आया चाहिए ।-कविता कौ०, भा० ४, पृ.०० । यौ०—इबारत आराई=आलंकारिक शैली ।

इबारती
वि० [अ० इबारत फा़० ई (प्रत्य०) ] जो इबारत में हो । इबारतसंबंधी । यौ०—इबारती सवाल=वह हिसाब जिसमें राशीकृत अंकों के संबंध में कुछ पूछा जाय ।

इब्तदा
संज्ञा स्त्री० [अ० इब्तिदह्] आरंभ । शुरूआत । उ०—सच य है इन्सान को यूरुप ने हलका कर दिया । इब्तदा डाढ़ी से की औ इँतहा में मूँछ ली ।-कविता कौ०, भा०४, पृ० ६२४ ।

इब्तदाई
वि० इब्तिदह्+फा० ई (प्रत्य०)] आरंभिक ।

इब्तिदा
संज्ञा स्त्री० [अ० इब्तिदह्] १. आरंभ । आदि । शुरू । उ०— इब्तिदा ही में मर गए सब यार । इशक की कौन इंतहा लाया ।—कविता कौ०, भा०४, पृ० १३३ । २. जन्म । पैदाइस । ३. निकास । उठान ।

इब्न
संज्ञा पुं० [अ०] पुत्र । बेटा । लड़का । उ०—थे फरजंद दो उमर इब्न खत्ताब ।—दक्खिनी०, पृ० ३५७ ।

इब्राहीम
संज्ञा पुं० [अ०] दे० 'बराहीम' ।

इब्राहीमी
संज्ञा पुं० [अ०] एक सिक्का जो इब्राहीम लोदी के वक्त में जारी हुआ था ।

इभ (१)
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० अभी या इभ्या] हाथी । उ०—राधे तेरे रूप की अधिकाइ । इभ टूटत अरु अरुन पंगु भए बिधना आन बनाइ ।—सूर०, १० ।२७७६ ।

इभ (२)
क्रि० वि० [सं० इव] इस प्रकार । ऐसे (डिं०) । यौ०.—इभ आनन, इभानन=गणेश । इभकेशर=नागकेशर । इभगंधा=बिषैले फलवाला एक पैधा । इभदंता=एक प्रकार का पौधा । इभपोटा=अल्पवयस्का हाथिनी । इभपोत=कमव्य का हाथी । हभभर—हाथियों का झुंड । इभयुवति= मादा हाथी । हथिनी ।

इभकणा
संज्ञा स्त्री०[सं०] गजपिप्पली । गजपीपल ।

इभकुंभज
संज्ञा पुं० [सं० इभकुम्भ] हाथी का मस्तक ।

इभानीमीलिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विदग्धता । चातुर्य । बुद्धिमत्ता । २. भाँग [को०] ।

इभपालक
संज्ञा पुं० [सं०] १. महावत । २. हाथी रखनेवाला व्यक्ति [को०] ।

इभमाचल
संज्ञा पुं० [सं०] सिंह [को०] ।

इभया
संज्ञा पुं० [सं०] स्वर्णक्षीरी का वृक्ष [को०] ।

इभाख्य
संज्ञा पुं० [सं०] नागकेशर का पौधा [को०] ।

इभी
संज्ञा स्त्री० [सं०] हाथिनी [को०] ।

इभोषणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] गजपिप्पली का पौधा [को०] ।

इभ्य (१)
वि० [सं०] १. जिसके पास हाथी हो । २. धनवान् । धनी । यौ०—इभ्यपुत्र=धनीपुत्र । रईसजादा ।

इभ्य (२)
संज्ञा पुं० १. राजा । २. हाथीवान । महावत । ३. शत्रु ।

इभ्यक
वि० [सं०] संपत्तिशाली । धनी [को०] ।

इभ्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. हाथिनी । सलई का पेड़ ।

इम पु
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'इमि' । उ०—(क) निधरक भई कहति इम लहिए । सा परिकिया लच्छिता कहिए ।—नंददास ग्रं०, पृ० १४९ । (ख) करत मंगलाचार इम नाशात विध्न अनंत ।—सुंदर०, ग्रं०, भा०१, पृ० ४ ।

इमकान
संज्ञा पुं० [अ० इम्कान] १. संभावना । २. ताकत । मक- दूर । बस । काबू । जैसे,—हमने अपने इमकान भर कोशिश कर दी ।

इमकानात
संज्ञा पुं० [अ० इम्कान का बहुं व०] संभावनाएँ । उ०—मेरे दिमाग के उड़ने के ज्यादा इमकानात है ।— दक्खिनी०, पृ० ४६१ । ताकत । शर्क्ति (को०) ।

इमकानी
वि० [अ० इम्कानी] संभावित [को०] ।

इमकोस
संज्ञा पुं० [सं० कोश] तलवार का म्यान ।—(डिं०) ।

इमचार
संज्ञा पुं० [सं० चर१] गुप्तचर । गुप्त दूत ।—(डिं०) ।

इमदाद
संज्ञा स्त्री० [अ० मदद का बहु व.] मदद । सहायता । उ०—दाग कोताही न कर यह वक्त है इमदाद का-शेर०, भा०१, पृ, ६९६ ।

इमदादी
वि० [अ० इमदाद] १. मदद पानेवाला । जैसे,—इमदादी मदरसा=वह मदरसा जिसे सरकार से कुछ द्रव्य की सहायता मिलती हो । २. इमदाद या सहायता के रूप में प्राप्त होनेवाला ।

इमन
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'ईमन' । उ०—मीड़ मधुरतम विधुर इमन की ।—गीतगुंज, पृ० ६२ ।

इमरती
संज्ञा स्त्री० [सं० अमृत] एक मिठाई । विशेष—उर्द की फेटी हुई महीन पीठी और चौरेठे को तीन चार तह कपड़े में, जिसके बीच एक छोटा सा छेग रहता है, रखकर खोलतचे हुए घी की तई में घुमा घुमाकर टपकाते है, जिससे कंगन के आकार की बत्तियाँ बनती जाती है । घी में तल लेने पर इनको चीनी के शीरे में डुबाते हैं ।

इमरतीदार
वि० [हिं० इमरती+फा० दार (प्रत्य०)] जिसमें इमरती की भाँति गोल गोल घेरे या बल पड़े हों । जैसे,— इमरतीदार कंगन ।

इमरित पु
संज्ञा पुं० [सं० अमृत दे. 'अमृत'] उ०—लड़िका वाका महा हरामी इमरित में विष घोरै ।—पलटू०, भा०३, पृ० ५४ ।

इमला
संज्ञा पुं० [अ० इमलाह्] १. वर्तनी । शुद्ध लिखावट । २. बताई हुइ इबारत को सही लिखना [को०] । यौ०.—इसलानवीस=वर्तनी के अनुसार या शुद्ध लेखनेवाला ।

इमलाक
संज्ञा स्त्री० [अ० मुल्क का बहु० व०] संपत्ति । जायदाद [को०] ।

इमली
संज्ञा स्त्री० [सं० अम्ल+ हिं० ई (प्रत्य०)] १. एक बड़ा पेड़ जिसकी पत्तियाँ छोटी छोटी होती हैं और सदा हरी रहती हैं । इसमें लंबी लंबी फलियाँ लगती हैं जिनके ऊपर पतला पर कड़ा छिलका होता है । छिलके के भीतर खट्टा गूदा होता है जो पकने पर लाल और कुछ मीठा हो जाता है । २. इस पेड़ की फली । मुहा०—इमली घोंटना—विवाह के समय लड़के या लड़की का मामा उसको आम्रपल्लव दाँत से खोंटाता है और यथाशक्ति कुछ दक्षिणा भी बाँटता है । इसी रीति को 'इमली घोंटना' कहते हैं ।

इमसाक
संज्ञा पुं० [अ० इम्साक] १. रुकावट । २. आकर्षण । खिंचाव । ३. कंजूसी [को०] ।

इमसाल
संज्ञा पुं० [फा० इमसाल] इस वर्ष [को०] ।

इमाम
संज्ञा पु० [अ०] [वि० इमामी] १. अगुआ । २. पुरोहित । मुसलमानों के धार्मिक कृत्य करानेवाला मनुष्य । ३. अली के बेटों की उपाधि । ४. मुसलमानों की तसबीह या माला का सुमेर ।

इमामजिस्ता
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'इमामदस्ता' । उ०—यह तन कीजै इमामजिस्ता खमीर सबै करि डारिया रे ।-सं० दरिया० पृ० ६९ ।

इमामत
संज्ञा स्त्री० [अ०] इमाम का पद । पेशवाई [को०] ।

इमामदस्ता
संज्ञा पुं० [फा० हावन+दस्तह्] एक प्रकार का लोहे या पीतल का खल बट्टा ।

इमाम
संज्ञा पुं० [अ० अम्मामह्] एक प्रकार की बड़ी पगड़ी । अमामा ।

इमामबाड़ा
संज्ञा पुं० [अ० इमाम+ फा० बारह, हिं० बाड़ा] वह हाता जिसमें शीया लोग ताजिया रखते और उसे दफन करते हैं ।

इमारत
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. बड़ा और हिंदोस्तानी इमारत पूरे वैभव । शानशौकत । उ०—आप में हिंगोस्तानी इमारत पूरे तैर पर मौजूद है ।—प्रेमघन०, भा०२, पृ० ९१ ।

इमारती
वि० [फा०] मकान का । मकान से संबंधित । जैसे,— इमारती समान ।

इमि पु
क्रि० वि० [सं० एवम्] इस प्रकार । इस तरह । ऐसे । उ०— होहिं प्रेम बस लोग इमि राम जहाँ जहँ जाहिं ।—मानस, २ ।१२१ ।

इमोशन
संज्ञा पुं० [अं०] १. सवंग (मनोवै०) । २. भाव । मनोविकार । उ०—अँगरेजी में भाव को इमोशन और फारसी में जजबा कहते हैं ।—रस क०, पृ० ३९ ।

इम्तहान
संज्ञा पुं० [अ०] परीक्षा । जाँच । 'इम्तिहान' । उ०— साफ कब इम्तहान लेते हैं । वह तो दम के जान लेते हैं ।— शेर०, भा०१, पृ० ६७२ ।

इम्तिनाई
वि० [अ०] रोक लगानेवाला [को०] ।

इम्तिनाय
संज्ञा पुं० [अ०] निषेध । रोग मनाही [को०] ।

इम्तियाज
संज्ञा पुं० [अ० इम्तियाज] १. भेद । अंतर । २. विवेक । गुण दोष की पहचान । उ०—देख इकबार चश्म अपना करके बाज । गर तुजे किस बात का है इम्तियाज ।-दक्खिनी०, पृ० २०४ ।

इम्तिहान
संज्ञा पुं० [अ०] १. दे० 'इम्तहान' । २. परख (को०) ।

इम्पीरियल
वि० [अं०] साम्राज्य या सम्राट् संबंधी । राजकीय । शाही । जैसे,—इम्पीरियल सर्विस=राजकीय नौकरी ।

इम्पीरियलगवर्नमेंट
संज्ञा स्त्री० [अ०] साम्राज्य सरकार । बड़ी सरकार । जैसे,—भारत में अंग्रेजी सरकार को भी इंपीरियल गवर्नमेंट अर्थात् बड़ी सरकार कहते थे ।

इम्पीरियलप्रे फरेन्स
संज्ञा पु० [अ० इम्पीरिल प्रेफरेंस] साम्राज्य की वस्तुओं पर उसके अधीनस्थ देश इस प्रकार आयात निर्यातकर बैठाने की नीति जिससे वह दूसरे देशों के मुकाबले में सस्ता माल बेच सके । साम्राज्य की बनी वस्तुओं को प्रशस्तता देना ।

इम्पीरियल सर्विसट्रुप्स
संज्ञा स्त्री० [अं०] अंग्रेजी शासनकाल में वह सेना जो भारत के देशी रजवाड़े भारत सरकार के सहाय- तार्थ अपने यहाँ रखते थे और जिसकी देखभाल ब्रिटिश अफसर करते थे । आपत्काल में सरकार इस सेना से काम लेती थी ।

इम्पोर्ट
संज्ञा पुं० [अ०] पुं० 'आयात' । जैसे,—इम्पोर्ट डयुटी= आयातकर ।

इम्रित पु
संज्ञा पुं० [सं० अमृत] दे० 'अमृत' ।

इयत्
वि० [सं०] इतने विस्तारवाला । इतना बड़ा [को०] ।

इयत्ता
संज्ञा स्त्री० [सं०] सीमा । हद । परिमिति । उ०—तूने अपने ज्ञान की इयत्ता का खूब अच्छा प्रमाण दिया ।-कालिदास, पृ० ६७ ।

इयार पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'यार' । उ०—जग में जीवन थोरा थोरा वो इयार जी ।-सं० दरिया, पृ० १६८ ।

इरखा पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'इर्षा' । उ०—सौतिन्ह कर इरखा नहिं करना । साई संग सदा जिय डरना ।-चित्रा०, पृ० २२४ ।

इरखाना पु
१क्रि० प्र० [सं० ईर्ष्या] ईर्ष्या करना । डाह करना । उ०— उनीदति अलसाति सोवत सधीर चौंकि चाहि चित श्रमित सगर्ब इरखाति है ।—भिखारी०, ग्रं०, भा०१, पृ० १४१ ।

इरण
संज्ञा पुं० [सं०] मरुभूमि । मरुस्थल [को०] ।

इरम्मद (१)
वि० [सं०] १. पीने में रुचि रखनेवाला । २. अग्नि का विशेषण [को०] ।

इरम्मद (२)
संज्ञा पुं० १. मेघज्येति । विद्युत । २. वडवाग्नि [को०] ।

इरशाद
संज्ञा पुं० [अ० इर्शाद] दे० 'इर्शाद' । उ०—देखते ही मुझे महफिल में यह इरशाद हुआ, कौन बैठा है उसे लोग उठते भी नहीं ।—शेर०, भा०१, पृ० ६७७ ।

इरषा पु
संज्ञा स्त्री० [सं० इर्ष्या] दे० ईर्ष्या । उ०—इंदर देखि इरषा मन लायौ । करि कै क्रोध न जल बरसायौ ।—सूर०, ५१२ ।

इरषित पु
वि० [सं० इर्षित्] दे० 'इर्षित' ।

इरसाल
संज्ञा पुं० [अ० इर्साल] १. पेषण । २. उपहार । भेंट ।

इरसी
संज्ञा स्त्री० [देश०] पाहिए की धुरी ।

इरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कश्यप की वह स्त्री जिससे बृहस्पति या उदभिज उत्पन्न हुए । २. भुमि । पृथ्वी । ३. वाणी । वाचा । ४. जल । ५. अन्न । ६. मदिरा । शराब । यौ०—इराक्षीर=क्षीरसागर । इराचर=(१) ओला । करक । (२) जलचर । (३) भूमि से उत्पन्न ।

इराज
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव [को०] ।

इराक
संज्ञा पुं० [अ०] पशिचम एशिया का एक देश ।

इराकी (१)
वि० [अ०] इराक देश का ।

इराकी (२)
संज्ञा पुं० १. घोड़ों की एक जाति । उ०—सुमंडे घुमंडे उमंडे इराकी ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० २८० । २. इराक देश का निवासी ।

इरादतन
अ० [अ०] इरादा करके । विचारपूर्वक । जानबूझकर [को०] ।

इरादा
संज्ञा पुं० [अ० इरादह्] विचार । संकल्प । उ०—बदली जो उनकी आँखें, इरादा बदल गया ।—बेला, पृ० ८३ ।

इरावत (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक पर्वत का नाम । २. एक सर्प का नाम । ३. अर्जुन का एक पुत्र जो नागकन्या उलूपी से उत्पन्न हुआ था । इसका नाम बभ्रु वाहन था । ४. समुद्रा । ५. मेघ ।

इरावत् (२)
वि० तृप्तिदायक । सुखद [को०] ।

इरावती
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कश्यप ऋषि की भद्रमदा नाम की पत्नी से उत्पन्न कन्या, जिसका पुत्र ऐरावत नामक महागज हुआ । २. ब्रह्ना देश की एक नदी । ३. पटपत्री । पथरचट ।

इरिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार का पौधा [को०] ।

इरिण
संज्ञा स्त्री० [सं०] ऊसर । ईरिण [को०] ।

इरिमेद
संज्ञा पुं० [सं०] अरिमेदे । विटखदिर [को०] ।

इरिविल्ला, इरिवेल्लका
संज्ञा स्त्री० [सं०] संनिपात से उत्पन्न सिर की फुंसी ।

इरिषा पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'ईर्ष्या' । उ०—जहँ प्रीतम को करत है कपट अनादर बाल । कछु इरिषा कछु मद लिए सो बिब्बोक रसाल ।—भिखारी० ग्रं०, भा०१, पृ० १४८ ।

इरेश
संज्ञा पुं० [सं०] १. विष्णु । २. गणेश । ३. वरुण । ४. ब्राह्मण । ५. सम्राट [को०] ।

इर्गइ
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० इर्गला] दे० 'अर्गला' ।

इर्तकाब
संज्ञा पुं० [अ० इर्तिकाब] १. पाप करना । २. कोई अपराध करना । यौ०.—इर्तकाबैजुर्म=अपराध करना ।

इर्द गिर्द
क्रि० वि० [अनु० इर्द+ फा० गिर्द] १. चारो ओर । चारो तरफ । २. असपास । इधर उधर । अगल बगल ।

इर्वारु, इर्वालु (१)
वि० [सं०] हिंसक [को०] ।

इर्वारु, इर्वालु (२)
संज्ञा पुं० एक प्रकार की ककड़ी [को०] । यौ०.—इर्वारुशक्तिका=एक प्रकार का खरबूजा ।

इर्वारुक
संज्ञा पुं० [सं०] माँद के अंतर्गत रहनेवाला जानवर [को०] ।

इर्शाद
संज्ञा पुं० [अ०] १. आज्ञा । हुक्म । उ०—यूँ आँख उनकी करके इशारा पलट गई । गोया कि सब से होके कुछ इर्शाद रह गया ।—कविता कौ०, भा०४, पृ० ५४८ । २. पथप्रदर्शन ।

इर्षना पु
संज्ञा स्त्री० [सं० एषणा] प्रबल इच्छा । उ०—छूटी त्रिविध इर्षना गाढ़ी । एक लालसा उर अति बाढ़ी ।—तुलसी (शब्द०) ।

इल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] कर्दम प्रजापति के एक पुत्र का नाम जो वाह्यलीक देश का राजा था ।

इल (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० इला] पृथिवी । धरती । उ०—राक्षस हनि दाढ़े इल गह काढ़े सो थिर माड़े निज खेतम् ।—राम० धर्म०, पृ० १७६ ।

इलजाम
संज्ञा पुं० [अ० इल्जाम] १. दोष । कलंक । अपराध । उ०—मैं इलजाम उनको देता था कुसूर अपना निकल आया ।—शेर०, भा०१, पृ० ४७७ । २. अभियोग । दोषा- रोपण । उ०—चुप रहेंगे हया से वे कब तक, गुस्सा इलजाम से तो आएगा ।—शेर०, भा०१, पृ० ६६० । क्रि० प्र०—लगाना ।—देना ।

इलता
संज्ञा पुं० [देश.] मझोले आकार का एक प्रकार का बाँस जो दक्षिण भारत के मैदानों और पहाड़ों में होता है । इसमें बहुत बड़े बड़े फूल और फल लगते हैं । इसके छोटे छोटे कल्लों से बहुत अच्छा कागज बनता है ।

इलम पु
संज्ञा पुं० [अ० इल्म] दे० 'इल्म' । उ०—दादू अलिफ एक अल्ला का जे पढ़ि जाणै कोई । कुरान कतेबाँ इलम सब पढ़ि करि पूरा होई ।—दादू०, पृ० ४७ ।

इलमास
संज्ञा पुं० [अ०] १. हीरा । २. शीशा [को०] ।

इलय
वि० [सं०] गतिविहीन [को०] ।

इलव
संज्ञा पुं० [सं०] १. हलवाहा । २. गरीब आदमी । ३. किसान । कर्षक ।

इलविला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विश्रवा की स्त्री तृणविंदु की कन्या और कुबेर की माता का नाम । २. पुलस्त्य की स्त्री ।

इलहाक
संज्ञा पुं० [अ० इल्हाक] १. संबंध । मिलना । संयोजन । २. किसी वस्तु को किसी दूसरी वस्तु के साथ मिला देने का कार्य ।

इलहाकदार
संज्ञा पुं० [अ०इल्हाक+फा० दार] वह मनुष्य जिसके साथ वंदोबस्त के वक्त मालगुजारी अदा करने का इकरा- रमाना हो । नंबरदार या लंबरदार ।

इलहाम
संज्ञा पुं० [अ० इल्हाय] इशवर का शब्द । देववाणी । इशवरीय प्रेरणा । आत्मा की आवाज । आत्मिक दृष्टि ।

इलहामी
वि० [अ० इल्हामी] जिसको इलहाम हुआ हो । ईश्वर द्वारा प्रेरित । अंतरात्मा में स्फुरित ज्ञान से संबंद्ध । यौ०.—इलहामी किताब=ईश्वरीय प्रेरणा से रचित पुस्तक । धर्मग्रंथ ।

इला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पृथ्वी । २. पार्वती । ३. सरस्वती । वाणी । ४. बुद्धिमती स्त्री । ५. गौ । धेनु । ६. वैवस्वत मनु की कन्या जो बुध को व्याही थी और जिससे पुरूखा उत्पन्न हुआ था । इड़ा । ७. राजा इक्ष्वाकु की एक कन्या का नामा । ८. कर्दम प्रजापति का एक पुत्र जो पार्वती के शाव से स्त्री हो गया था । ९. एक की संख्या ।

इलाका
संज्ञा पुं० [अ० इलाकछ्] १. संबंध । लगाव । उ०—कैधौं कछू राखै राकापति सों इलाका भारी भूमि की सलाका कै पताका पुन्यगान की ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० २३२ । २. एक से अधिक मौजे की जमिंदारी । राज्य । रियासत । उ०—वह दानपत्र युधिष्ठिर के सबत् १११ का है जो इलाका मैसूर मे मिला है ।—भारतेंदु ग्र, भा०३, पृ० १३५ । यौ०—इलाकेदार ।

इलाचा
संज्ञा पुं० [देश०] एक कपड़ा जो रेशम और सूत मिलाकर बुना जाता है ।

इलाज
संज्ञा पुं० [अ०] १. दवा । औषध । २. चिकित्सा । ३. निवारण का उपाय, युक्ति या तदबीर । उ०—उदर भरन के कारनै प्रानी करत इलाज ।—स० सप्तक, पृ० ३३० ।

इलादा पु
वि० [हिं०] दे० 'अलहदा' । उ०—शब्द पढ़ क्या सुनाता है भेद सबसे इलादा है । संत तुलसी०, पृ० ३६ ।

इलापत्र
संज्ञा पुं० [सं०] एक नाग का नाम ।

इलाम पु
संज्ञा पुं० [अ० ऐलान] १. इत्तलानामा । २. हुक्म । आज्ञा । उ०—ठान्यो न सलाम, भान्यो साहि को इलाम, धूतधाम कै न मान्यो रामसिंह हू को बरजा ।-भूषण ग्रं०, पृ० ५८ ।

इलायची
संज्ञा स्त्री० [सं० एल+ ची, फा० 'च' (प्रत्य०)] एक सदाबहार पेड़ जिसकी शाखाएँ खड़ी और चार से आठ फुट तक ऊँची होती हैं । यह दक्षिण में कनारा, मैसूर, कुर्ग तिरुवांकुर और मदुरा आदि स्थानों के पहाड़ी, जंगलों में आप से आप होता है । यह दक्षिण में लगाया भी बहुत जाता है । विशेष—इलायची के दो भेद होते है, सफेद (छोटी) और काली (बड़ी) । सफेद इलायची दक्षिण में होती है और काली इलायची या बड़ी इलायची नैपाल में होती है, जिसे बँगला इलायची भी कहते हैं । बड़ो इलायची तरकारी आदि तथा नमकीन भोजनों के मसालों में दी जाती है । छोटी इलायची मीठी चीजों में पड़ती है और पान के साथ खाई जाती है । सफेद या छोटी इलायची के भी दो भेद होते हैं—मलाबार की छोटी और मैसूर की बड़ी । मलाबारी इलायची की पत्तियाँ मैसूर इलायची से छोटी होती है और उनकी दूसरी ओर सफद सफेद बारीक रोई होती है । इसका फल गोलाई लिये होता है । मैसुर इलायची की पत्तियाँ मलाबारी से बड़ी होती हैं और उनमों रोईं नहीं होती । इसके लिये तर और छायादार जमीन चाहिए, जहाँ से पानी बहुत दूर न हो । यह कुहरा और समुद्र की ठंढी हवा पाकर खूब बढ़ती है । इसे धूप और पानी दोनों से बचाना पड़ता है । क्वार कार्तिक में यह बोई जाती है, अर्थात् इसकी बेहन डाली जाती है ।१७-१८ महीने में जब पौधे चार फुट के हो जाते है, तब उन्हें खोदकर सुपारी के पेड़ो के नीचे लगा देते हैं और पत्ती की खाद देते रहते हैं । लगाने के एक ही वर्ष के भीतर यह चैत बैसाख में फूलने लगते है और असाढ़ सावन तक इसमें ढोंढ़ी लगती है । क्वार कातिक में फल तैयार हो जाता है और इसके गुच्छे या घौद तोड़ लिए जाते है और दो तीन दिन सुखाकर फलों को मलकर अलग कर लेते हैं । एक पेड़ में पाव भर लगभग इलायची निकलती है । इसका पैड़ १० या १२ वर्ष तक रहता है । कुर्ग से इलायची गुजरात होकर और प्रांतों में जाती थी, इसी से इसे गुजराती इलायची भी कहते हैं । यौ०.—इलायची डोरा=इलायची की ढोंढ़ी ।

इलायचीदाना
संज्ञा पुं० [हिं० इलायची+ फा़ दाना] १. इलायची का बीया या दाना । २. एक प्रकार का मिठाई । चीनी पागा हुआ इलायची या पोस्त का दाना ।

इलायची पंडू †
संज्ञा पुं० [देश.] एक प्रकार का जंगली फल ।

इलावर्त पु
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'इलावृत्त' ।

इलावृतद, इलावृत्त
संज्ञा पुं० [सं०] जंबु द्वीप के नौ खंडो में से एक विशेष—भागवत के अनुसार यह सुमेर पर्वत को घेरे हुए है । इसके उत्तर में नील, दक्षिण में निषध, पशि्चम में माल्यवान् और पूर्व में गंधमादन पर्वत है ।

इलाही (१)
संज्ञा पुं० [अ०] ईशवर । परमेशवर । परमात्मा । भगवान् खुदा । उ०—यह रंग कौन रंगे तेरे सिवा इलाही ।—कविता कौ०, भा०४, पृ० ३१३ ।

इलाही (२)
वि० इशवरसंबंधी । ईश्वरीय । जैसे,—कजाए हलाही । उ०—कौन को कलेऊ धौं करैया भयो काल अरु का पै धौं परैया भयों गजब इलाही है ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० २२८ ।

इलाहीखर्च
संज्ञा पुं० [अ० इलाही+फा० खर्च] फजूल खर्च । अधिक खच्र । बेहिसाब खर्च । अपव्य ।

इलाहीगज
संज्ञा पुं० [अ० इलाही +फा० गज] अकबर का चलाया हुआ एक प्रकार का गज जो ४१ अंगुल (३३३/४ इंच) का होता है और जो अब तक इमारत आदि नापने के काम में आता है ।

इलाहीमुहर (१)
वि० [अ० इलाही +फा० मुँह] ज्यों का त्यों । अछूता । खालिस ।

इलाहीमुहर (२)
संज्ञा स्त्री० अमानत । धरोहर । न्यास ।

इलाहीरात
संज्ञा स्त्री० [अ०] रतजगे की रात ।

इलाहीसन्
संज्ञा पुं० [अ० इलाही+ हिं० रात] अकबर बादशाह का चलाया एक सन् या संवत् ।

इलिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] पृथ्वी [को०] ।

इली
संज्ञा स्त्री० [सं०] छोटी तलवार । कटार [को०] ।

इलीश, इलीष
संज्ञा स्त्री० [सं०] हिलसा मछली ।

इलेक्ट्रिक
वि० [अं०] बिजली संबंधी । बिजली का । यौ०.—इलेक्ट्रिक पावर=बिजली की शक्ति । इलेक्ट्रिक लाइट= बिजली की रोशनी ।

इलेक्ट्रिकल
वि० [अं०] बिजली संबंधी [को०] ।

इलेक्ट्रिसिटो
संज्ञा स्त्री० [अं०] बिजली । विद्युत् [को०] ।

इलेक्ट्रो (१)
संज्ञा पुं० [अं०] बिजली द्वारा तैयार किया हुआ । इलेक्ट्रिक का । जैसे,—इलेक्ट्रो टाइप; इलेक्ट्रो प्रस ।

इलेक्ट्रो (२)
संज्ञा पुं० तसवीर आदि का वह टप्पा या ब्लाक जो बिजली की सहायता से तैयार किया गया हो । यौ०—इलेक्ट्रे टाइप=बीजली दरा किया जानेवाला अंकन या खुदाई का कार्य । इलेक्ट्रोपेथी=बिजली के तरंगसंचार द्वारा किसी रोग की चिकित्सा करने की प्रक्रिया ।

इलेक्ट्रोन
संज्ञा पुं० [अं०] परमाणु (ऐटम) का अवयव जो उसके नाभिक (न्यूक्लियस) का चक्कर लगाता रहता है और जिसमें विद्युत् का ऋणावेश होता है ।

इल्जाम
संज्ञा पुं० [अ०य इल्जाम] आरोप । दोषारोपण । उ०— इल्जाम यह रखा है खिलवत में कहा होता ।—शेर०, भा० १, पृ० ६९५ । क्रि० प्र०—देना ।—लगाना ।

इल्तजा
संज्ञा स्त्री० [अ० इल्तजह] दे० 'इल्तिजा' । उ०—कहीं वह आके मिटा दें न इन्तजार का लुत्फ । कहीं कबूल न हो जाय इल्तजा मेरी ।—शेर०, भा०१, पृ० ५४५ ।

इल्तमास
संज्ञा स्त्री० [अ० इल्तिमास] अनुरोध । प्रार्थना । उ०— (क) सुबह तक शमा सर को धुनती रही । क्या पतंगे ने इल्तमास किया ।—कविता कौ०, भा० ४, पृ० १७२ । (ख) मेरी आप से यही इल्तमास है कि आप उसकी वजारत कबूल करें ।-मान०, भा०१, पृ० १८७ ।

इल्तिजा
संज्ञा स्त्री० [अ० इल्तिजह्] १. निवेदन । प्रार्थना । २. मिन्नत । खुशामद । क्रि० प्र०—करना ।

इल्तिफात
संज्ञा स्त्री० [अ० इल्तिफात] १. कृपा । दया । २. ध्यान देना [को०] ।

इल्तिबास
संज्ञा पुं० [अ०] समानता । सादृश्य [को०] ।

इल्तिवा
संज्ञा पुं० [अ०] [वि० मुल्तबी] किसी कार्य के लिये स्थिर समय का टल जाना । तारीख टलना । विशेष—इस शब्द का प्रयोग अदालती कार्रवाइयों अधिक होता है ।

इल्म
संज्ञा पु० [अ०] [वि० इल्मी] विद्या । ज्ञान । जानकारी । उ०—इल्म और दौलत जहाँ से मिले हासिल करनी चाहिए ।—श्रीनिवास ग्रं०, पृ० १२४ । यौ०—इल्मेअदब=साहित्यशास्त्र । इल्मेइलाही=ब्रह्माविद्या, अध्या त्म । इल्मेगैब=परोक्षविज्ञान । इल्मेनुजूम=ज्योतिष विज्ञान ।

इल्लत
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. रोग । बीमारी । २. बाधा । झंझट । जैसे,—बुरी इल्लत पीछे लगी । ३. लत । व्यसन । उ०— पापों के बढ़ते दिल टूटें इल्लत की सहज लतें छूटें ।—बेला, पृ० ७९ । ४. दोष । अपराध । जैसे,—वह किस इल्लत में गिरफ्तार हुआ था । मुहा०—इल्लत पालना=बुरी आदत डाल लेना । यौ०—इल्लत आफताब=कमल रोग । इल्लत फाइली=निमित्त कारण । इल्लत माही=उपदान कारण ।

इल्लल
संज्ञा पुं० [सं०] एक पक्षी [को०] ।

इल्ला (१)
संज्ञा पुं० [सं० कील] छोटी कडी फुंसी जो चमड़े के ऊपर निकलती है । यह मसे के समान होती है ।

इल्ला (२)
अव्य० [अ० इल्लह्] किंतु । लेकिन । पर । उ०—इल्ला, अब जब कि दोनों एक तीसरे की रिआया है.... । प्रेमघन०, भा० २, पृ० ८९ ।

इल्लिश, इल्लिस
संज्ञा पुं० [सं०] इलीश । हिलसा मछली [को०] ।

इल्ली
संज्ञा स्त्री० [सं० इल्लिका] चींटी आदि के बच्चों का वह पहला रूप जो अंडे से निकलने के उपरांत तुरंत होता है ।

इल्वल
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक दैत्य या असुर का नाम । विशेष—इसका एक नाम आतापि भी थी । यह अपने छोटे भाई वातापि को भेड़ा बनाकर ब्राह्यणों को खिला देता और फिर उसका नाम लेकर बुलाता था । तब वह ब्राह्यण का पेट फाड़कर निकल आता था । इन दोनों अगस्त्य मुनि खाकर पचा गए थे । २. ईल या बाम मछली ।

इल्वला
संज्ञा पुं० [सं०] मृगशिरा नक्षत्र के सिर पर रहनेवाले पाँच तारों का समूह ।

इव
अव्य० [सं०] उपमावाचक शब्द । समान । नाई । तरह । सदृश । तुल्य । जैसे । उ०—निज अघ समुझि न कछु कहि जाई । तपै अवा इव उर अधिकाई ।—मानस, १ ।५८ ।

इवापोरेशन
संज्ञा पुं० [अं० इवैपोरेशन] गरमी पाकर किसी पदार्थ का भाप के रूप में परिवर्तित होना । भाप बनकर उदमन । बाष्पन । बाष्पीभवन । बाष्पीकरण । उच्छोषण ।

इशरत
संज्ञा स्त्री० [अ०] सुख । चैन । आराम । भोग विलास । उ०—फिर वह चर्चे हों फिर वही बातें । दिन हों इशपत के, ऐश की रातें ।—शेर०, भा० १, पृ० ३७७ । यौ०—ऐश व इशरत ।

इशरती
वि० [अ० इशरत+ ई (प्रत्य०)] आरामतलब । बिलासी । उ०—इशरती घर की मुहब्बत का मजा भूल गए ।—कविता कौ०, भा०४, पृ० ६३३ ।

इशा
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. संध्या । २. रात । २. रात की नमाज [को०] ।

इशारत
संज्ञा स्त्री० [अ०] इशारा । संकेत । उ०—न मुझसे बोला न की इशारत न दी तसल्ली न कुछ सँभाला ।-कविता कौ०, भा० ४, पृ० ३२५ ।

इशारा
संज्ञा पुं० [अ० इशारह्] १. सैन । संकेत । चेष्टा । उ०— यूँ आँख इनकी करके इशारा पलट गई । गोया कि लब से होके कुछ इर्शाद रह गया ।—कविता कौ०, भा० ४, पृ० ५४८ । २. संक्षिप्त कथन । उ०—जो इशारे मैं काम हो सक्ता तो मुझको इतने बढ़ाकर कहने सै क्या लाभ ।—श्रीनिवास ग्रं०, पृ० २७२ । ३. बारीक सहारा । सूक्ष्म आधार । जैसे,— एक लकड़ी के इशारे पर यह संदूक ऊपर टिका है । ४. गुप्त प्रेरणा । जैसे,—इन्हीं के इशारे से उसने यह काम किया । यौ.—इशारेबाजी=इशारा करना ।

इशारात
संज्ञा पुं० इशारा का बहुवचन दे० 'इशारा' । उ०—क्या बात कोई उस बुते ऐयार की समझे । बोले है जो हमसे तो इशारात कहीं और ।—कविता कौ०, भा० ४, पृ० २२३ ।

इशिका, इशीका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'इषीका' ।

इश्क
संज्ञा पुं० [इ० इश्क] [वि० आशिक, माशूक] मुहब्बत । चाह । प्रेम । लगन । अनुराग । आसक्ति । उ०—गम बहुत दुनिया में है पर इश्क का गम और है । है इसी आलम में लेकिन उनका आलम और है ।—कविता कौ०, भा० ४, पृ० २२८ । यौ०—इश्कमजाजी=लौकिक प्रेम । वासनायुक्त प्रेम । इश्क- हकीकी=आध्यात्मिक प्रेम । ईश्वर के प्रति प्रेम ।

इश्कबाज
वि० संज्ञा [फा० इश्कबाज] इश्क करनेवाला । प्रेमी । [को०] ।

इश्कबाजी
संज्ञा स्त्री० [अ० इश्क् + फा० बाजी ] प्रेम के चक्कर में पड़ना । उ०—इश्कबाजी बाजिए शतरंज है । चाल नादाँ रह गया दाना चला ।-कविता कौ०, भा० ४, पृ० ५१४ ।

इश्कपेचाँ
संज्ञा पुं० [अ०] एक प्रकार की बेल जिसकी पत्तियाँ सूत की तरह बारीक होती हैं और जिसमें लाल फूल लगते हैं । उ०—(क) दरखतें को सुखाता है लपटना इश्कपेचाँ का ।— कविता कौ०, भा० ४, पृ० ३६४ । (ख) अंत में जब वो इश्कपेचे की बेल पर जाकर बैठा तब मुझे उसके पकड़ने का समय मिला ।—श्रीनिवास, ग्रं०, पृ० ३९२ ।

इश्किया
वि० [अ० इश्कियह्] प्रेमसंबंधी । शृंगारिक ।

इश्तहार
संज्ञा पुं० [अ०] विज्ञापन । नोटिश । जाहिरात । एलान । उ०—शहरों शहरों मुल्कों मुल्कों में उन्हीं का इश्तहार ।— कविता कौ०, भा० ४, पृ० १४१ ।

इश्तहारी
वि० [अ०] विज्ञापित । जिसके लिये नोटिस या सूचना निकाली गई हो [को०] ।

इश्तियाक
संज्ञा पुं० [अ० इश्तियाक] १. शौक । २. इच्छा । अभिलाषा [को०] ।

इश्तियाल
संज्ञा पुं० [अ०] १. दे० 'इश्तियालक' । २. भड़काना । उत्तेजित करनवा । ३. लौ । लपट [को०] ।

इश्तियालक
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. वह सींक जो बत्ती बढ़ाने के लिये दीपक में पड़ी रहती है । टहलवी । २. बढ़ावा उत्तेजना । क्रि० प्र०—देना ।

इश्तिराक
संज्ञा पुं० [अ०] शिकरत । साझेदारी [को०] ।

इश्तिहा
संज्ञा स्त्री० [अ० इश्तिहह] १. चाह । अभिलाषा । २. बुभुक्षा । भूख [को०] ।

इष
संज्ञा पुं० [सं०] १. क्वार का महीना । अश्विन । २. बलवान् व्यक्ति ।

इषण, इषणा पु
संज्ञा स्त्री० [सं० एषणा] प्रबल इच्छा । कामना । ख्याहिश । वासना ।

इषणि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. भेजना । २. अभिलाषा [को०] ।

इषराया
संज्ञा स्त्री० [सं०] उत्कट अभिलाषा । प्रबल इच्छा [को०] ।

इषना पु
संज्ञा स्त्री० [सं० इषणा] दे० 'इषणा' ।

इषव्य
वि० [सं०] बाणविद्या में निपुण [को०] ।

इषित
वि० [सं०] १. चलाया हुआ । २. प्रेषित । ३. उत्तेजित । प्रेरित । ४. तीव्र । प्रचंड [को०] ।

इषीका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. गाँडर या मूँज के बीच की सींक जिसके ऊपर जीरा या भूआ होता है । २. बाण । तीर । ३. हाथी की आँख का डेला ।

इषु
संज्ञा पुं० [सं०] १. बाण । तीर । २. क्षेत्रगणित में वृत्त के अंतर्गत जीवा के मध्यबिंदु से परिधि तक खींची हुई सीधी रेखा । दे० 'शर' । ३. पाँच की संख्या ।

इषुकार
संज्ञा पुं० [सं०] बाण बनाने का काम करनेवाला हो [को०] ।

इषुधर
संज्ञा पुं० [सं०] बाण चलानेवाला व्यक्ति । धनुर्धर [को०] ।

इषूधि
संज्ञा पुं० [सं०] तूण । तूणीर । तरकश ।

इषुधी
संज्ञा पुं० [सं० इषुधि] दे० 'इषुधि' । उ०—नेकु जही दुचितो चित कीन्हों । शूर बड़ी इषुधी धनु दीन्हों ।—केशव (शब्द०) ।

इषध्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] गिड़गिड़ाना । निवेदन करना [को०] ।

इषुपथ
संज्ञा पुं० [सं०] बाण की मार । बाण की पहुँच [को०] ।

इषपुष्पा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार का पौधा [को०] ।

इषुमात्र
संज्ञा पुं० [सं०] धनुष के बराबर लंबा एक माप जो लगभग तीन फुट का होता है ।

इषुमान (१)
वि० [सं० इषुमत <इषुमान्] बाँण चलानेवाला । तीरंदाज । उ०—तब इषुमान प्रधान चलेउ इषुमान ज्ञानधर । देवश्रवा संतान समर पर सान मान हर ।-गोपाल (शब्द०) ।

इषुमान (२)
संज्ञा पुं० वसुदेव का भाई । देवश्रवा का पुत्र ।

इषूपल
संज्ञा पुं० [सं०] किले का फाटक पर रखी जानेवाली एक प्रकार की तोप जिसमें कंकड़ पत्थर डालकर छोड़ जाते थे ।

इष्ट (१)
वि० [सं०] १. अभिलषित । चाहा हुआ । वांछित । जैसे,— (क) परिश्रम से इष्ट फल की प्राप्ति होती है । (ख) हमें वहाँ जाना इष्ट नहीं है । २. अभिप्रेत । जैसे,—ग्रंथकार का इष्ट यह नहीं है । ३. पूजित । ४. अनुकूल । ५. प्रिय । यौ०—इष्टदेव ।

इषू (२)
संज्ञा पुं० १. अग्निहोत्रादि शुभ कर्म । इष्टापूर्त । धर्मकार्य । २. वह देवता । जिसकी पूजा से कामना सिद्ध होती है । इष्टदेव । कुलदेव । ३. अधिकार । वश । जैसे,—उसको देवी का इष्ट है । ४. मित्र । दोस्त । यौ०—इष्टमित्र । ५. पति । ६. रेंड का पेड़ । ७. ईंट ।

इष्टका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. ईंट । यज्ञकुंड बनाने की ईंट ।

इष्टकाचित
वि० [सं०] ईंटों द्वारा निर्मित [को०] ।

इष्टकाचिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] ईंटों की पंक्तिबद्ध जोड़ाई । उ०— इस स्तूप की इष्टकाचिति अपने ढंग की अनूठी है ।—हिंदु० सभ्यता, पृ० ३०९ ।

इष्टकान्यास
संज्ञा पुं० [सं०] शिलान्यास । नींव रखना [को०] ।

इष्टकापथ
संज्ञा पुं० [सं०] १. सुगंधित घास की जड़ । २. ईट द्वारा निर्मित मार्ग [को०] ।

इष्टकाल
संज्ञा पुं० [सं०] फलित ज्योतिष में किसी घटना के घटित होने का ठीक समय ।

इष्टगंध
संज्ञा पुं० [सं० इष्टगन्ध] १. सुंगंधित वस्तु । २. सिकता । बालू [को०] ।

इष्टजन
संज्ञा पुं० [सं०] प्रिय व्यक्ति [को०] ।

इष्टता
संज्ञा स्त्री० [सं०] मित्रता । मिताई । दोस्ती ।

इष्टदेव
संज्ञा पुं० [सं०] आरध्यदेव । पूज्यदेवता । वह देवता जिसकी पूजा से कामना सिद्ध होती हो । कुलदेवता । उ०— लहै बड़ाई देवता इष्टदेव जब होइ ।— तुलसी ग्रं०, पृ० १२९ ।

इष्टदेवता
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'इष्टदेव' ।

इष्टा
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रिया । प्रेमिका [को०] ।

इष्टापत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] वादी के कथन में प्रतिवादी की दिखाई हुई ऐसी आपत्ति जो उक्त कथन में किसी प्रकार का व्याघात या अंतर न ड़ाल सके और जिसे अनुकूल होने से वादी स्वीकार कर ले । जैसे, वादी ने कहा- जीव ब्रह्म है । प्रतिवाद ने कहा— तो ब्रह्म भी जगत की झूठी कल्पना करके झूठा हुआ । वादी— हो, इससे क्या हानि ।

इष्टापूर्त्त
संज्ञा पुं० [सं०] अग्निहोत्र करना, कुआँ, तालाब खुदाना, बगीचा, लगवाना आदि शुभ कर्म । विशेष— वेद का पठनपाठन, अतिथिसत्कार और अग्निहोत्र इष्ट कहलाते हैं; और कुआँ, तालाब खुदाना, देवमंदिर बनवाना, बगीचा लगाना आदि कर्म इष्टापूर्त कहलाते हैं । बड़े बड़े यज्ञों के बंद होने पर इष्टापूर्त्त का प्रचार अधिकता से हुआ है ।

इष्टापूर्ति
संज्ञा पुं० [सं०] १. 'ईष्टापुर्त' । २. काम्य या वांछित की सिद्धि या उपलब्धि ।

इष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. इच्छा । अभिलाषा । २. व्याकरण में भाष्यकार की वह समति जिसके विषय में सूत्रकार ने कुछ न लिखा हो । व्याकरण का वह नियम जो सूत्र और वार्तिक में न हो । ३. यज्ञ । ४. हवि । ५. प्रप्ति तथा सिद्धि के निमित्त होनेवाला प्रयत्न । ६. निवेदन । ७. निमंत्रण (को०) ।

इष्टिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० ' इष्टका' [को०] ।

इष्टिपच
संज्ञा पुं० [सं०] १. कृपण । कंजूस । २. असुर [को०] ।

इष्टिपशु
संज्ञा पुं० [सं०] यज्ञ में बलि दिया जानेवाला पशु [को०] ।

इष्टी पु
वि० [सं० इष्टिन्] इष्टसिद्धि करनेवाला । उ०— इष्टी स्वाँगी बहु मिले हिरसी मिले अनंत । - संतवाणी०, भा० १, पृ० १२४ ।

इष्टु
संज्ञा स्त्री० [सं०] इच्छा । अभिलाषा [को०] ।

इष्म (१)
वि० [सं०] इच्छुक [को०] ।

इष्म (२)
संज्ञा पुं० १. कामदेव । २. वसंत ऋतु । ३. गमन [को०] ।

इष्य
संज्ञा पुं० [सं०] वसत ऋतु ।

इष्व
संज्ञा पुं० [सं०] अध्यात्म की शिक्षा देनेवाला गुरु [को०] ।

इष्वनीक
संज्ञा पुं० [सं०] वाण की अनी । तीर की नोंक [को०] ।

इष्वसन
संज्ञा पुं० [सं०] धनुष [को०] ।

इष्वस्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'इष्वसन' [को०] ।

इष्वास
संज्ञा पुं० [सं०] १. बाण चलाना । २. धनुष । ३. धनुर्धर । ४. योद्धा [को०] ।

इस
सर्व [सं० एष] सर्वनाम 'यह' शब्द का विभक्ति के पहले आदिष्ट रूप जो सममय, स्थान आदि के अनुसार समीपस्य; प्रसंग के अनुसार प्रस्तुत और उल्लेख के अनुसार कुछ ही पहले प्रयुक्त होता हैं । विशेष— जब 'यह' शब्द में विभक्ति लगानी होती है, तब उसे 'इस' कर देते हैं । जैसे, — इसने, इसको, इससे, इसमें ।

इसकंदर
संज्ञा पुं० [यू० इस्कंदर] सिकंदर बादशाह । अलेकजोंड़र । उ०— नग अमोल अस पाँचो समुँद वह दीन्ह । इसकंदर नहिं पाई जोरे समुंद जस लीन ।— जायसी (शब्द०) ।

इसक पु
संज्ञा पुं० [अ० इश्क] दे० 'इश्क' । उ०— याकी करि करि जतन अति अतन तपन अति ताप । गजब हियै समझ्यौ न तब अजब इसक सताप ।— स० सप्तक, पृ० ३७७ ।

इसतरी पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० स्त्री०, हि० इस्त्री] दे० 'स्त्री' । उ०— नारि पुरुष की इसतरी पुरुष नारि का पूत ।— संतवाणी०, भा० १, पृ० ५९ ।

इसनान पु †
संज्ञा पुं० [ सं० स्नान, हिं० असनान] दे० 'स्नान' । उ०— बार बार स्वान जेऊ गंगा इसनान करै न कुटेंव देव होत न अज्ञान है । - सुंदर ग्रं० (जी०) भा० १, पृ० १०४ ।

इसपंज
संज्ञा पुं० [अं० स्पंज] समुद्र में एक प्रकार के अत्यंत छोटे कीड़ों के योग से बना हुआ मुलायम रुई की तरह का सजीव पिंड जिसं में बहुत से छेद होते हैं, जिनमें से होकर पानी आता है । मुर्दा बादल । अब्रे मुर्दा । विशेष— इसपंज भिन्न भिन्न आकार के होते हैं । इनकी सृष्टि दो प्रकार से होती है- एक तो सविमाग द्वारा और दूसरे रजकीट और वीर्यकीट के संयोग में । इसकी आदमी रंग की, रुई के समान मुलायम ठठरी जिसमें बहुत से छेद होते हैं, बाजारों में इसपंज के मनाम से बिकती है । इसमें पानी सोखने की बड़ी शत्कि होती हैं; इसी से लड़के इससे पोंछते और डाक्टर लोग घाव पर का खून आदि सुखाते हैं । पानी सोखने पर यह खूब मुलायम होकर फूल जाता है ।

इसपात
संज्ञा पुं० [सं० अयस्पत्र अथवा पुर्त० स्पेडा] एक प्रकार का कार्बन मिश्रित कड़ा लोहा । फौलाद ।

इसपिरिट
संज्ञा स्त्री० [अं० स्पिरिट] १. किसी प्रकार का सत । २. एक प्रकार का खालिस शराब ।

इसपेशल (१)
वि० [अं० स्पेशल] विशेष । खास ।

इसपेशल (२)
स्त्री० नियत समयों पर चलनेवाली सवारी गाड़ी (रेल, मोटर आदि) के अतिरिक्त विशेष गाड़ी जो किसी विशेष अवसर पर या किसी व्यक्ति की यात्रा के लिये छोड़ी जाती हैं ।

इसबगोल
संज्ञा पुं० [फा० इस्पगगोल, इस्पगोल] चिकित्सा कार्य में प्रयुक्त एक झाड़ी या पौधा । विशेष— यह फारस में बहुत है । पंजाब और सिंध में भी इसकी झाड़ियाँ लगाई जाती हैं । इसमें तिल के आकार के बीज लगते हैं जो भूरे और गुलाबी होते हैं । यूनानी चिकित्सा में इसका व्यवहार अधिक है । यह शीतल, बद्धकारक और रक्तातिसारनाशक हैं । यह बवासीर, नकसीर और रक्तस्राव की बीमारियों में बहुत फायदा करता हैं । अतिसार और सूजाक में भी दिया जाता हैं ।

इसम पु
संज्ञा पुं० [अ० इस्म्] दे० 'इस्म' । उ०— मुअज्जम इसम अँगाली हमेशा । — दक्खिनीन, पृ० ११४ ।

इसमाईल
संज्ञा पुं० [इब०] १. इब्राहीम का बेटा जो हाजिरा नाम्नी दासी से उत्पन्न हुआ था । २. साबार तंत्र में एक योगी का नाम जिसीकी आन प्राय? मंत्रों में दी जाती हैं ।

इसमाईली
संज्ञा पुं० [इब०] शीया मुसलमानों की एक शाखा [को०] ।

इसर पु० †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'ईश्वर' ।

इसराईल
संज्ञा पुं०[इब०] याकूब । पैगंबर का नाम । २. यहूदी । ३.एक देश का नाम ।

इसराईली (१)
संज्ञा पुं०[इब०] याकूब के वंशज । यहूदी [को०] ।

इसराईली (२)
संज्ञा स्त्री० इसरायल की भाषा ।

इसराईल (३)
वि० इसरायल देश संवंधी ।

इसराज
संज्ञा पुं०[अ०] एक प्रकार का सारंगी की तरह का बाजा । उ०— इधर परदादी चंपाकली ने इसराज सँभालकर पीलू का रियाज करना आरंभ किया । — शराबी, पृ १७ ।

इसराफ
संज्ञा पुं०[अ० इसराफ़] फजूलखर्ची । अपव्यय [को०] ।

इसरफील
संज्ञा पुं० [इव० इसरफील] उस फरिरते का नाम जो कयामत के दिन दो बार सुर फूँकेगा । पहली बार जीवित प्राणी मृत जायँगे और दूसरी बार सभी मृत जीवित हो जायँगे [को०] ।

इसरार
संज्ञा पुं०[अ०] १. हठा । जिद । आग्रह । अनुरोध । उ०— तब वबह इनकार और इसरार के लिए के क्य बाकी छोड़ती हैं । —प्रेमघन, भा० २., पृ० २६२ । २. सारंगी की तरह का एक बाजा ।

इसरी पुं †
वि० [हि०] दे० 'ईरवरीय' ।

इसलाम
संज्ञा पुं० [अ० इस्लाम] [वि० इसलामिया] मुसलमानी धर्म । मुहम्मद साहब का चलाया हुआ धर्म । क्रि० प्र०— (कबूल) करना ।

इसलामी
वि० [अ०] इसलामसंबंधी ।

इसलाह
संज्ञा पुं०[रा० इस्लाह] संशोधन । दुरूस्त करना ।

इसवर पुं०
संज्ञा पुं०[सं० ईरवर] दे० 'ईरवर' । उ०— इसवर सीय सेस चढ़े रथ ऊपर । — रघु०, पृ १०९ ।

इसहाक
संज्ञा पुं० [अ० इसहाक] इसलाम धर्म के एक पैगंबर ।

इसा पुं०
वि० [हिं०] दे० 'ऐसी' । उ०— अड़िग इसा है मेरू ज्यों डोलै न ड़ुलाया । — सुंदर ग्रं०, भा० १. पृ० ५१२ ।

इसाई
वि० [हि०] दे० 'ईसाई' ।

इसान पुं०
संज्ञा पुं० [सं० ईशान] दे० 'ईशान' । उ०— हिमवान कहेउ इसान महिमा अगम निगम न जामई ।- तुलसी ग्रं० पृ ३९ ।

इसारत पुं०
संज्ञा स्त्री०[अ० इशारत] संकेत । इशारा । उ०— मुख सों कहयों कछू हाथ की इसारत सों गारी दै दै आपसी किवारी दोऊ दै गई ।— रघुनाथ (शब्द०) ।

इसिम
संज्ञा पुं० [अ० इस्म] दे०, 'इस्म' । उ०— संत सिपाहिक पूत इसिम में दाग न लागै ।— पलटू०, पृ ३४ ।

इसी
सर्व० [हिं० + ही वा ई (प्रत्य०)] 'उस' शब्द पर जोर देने के लिये यह रूप बनाता है ।

इसीका पुं०
संज्ञा स्त्री०[सं० इषीका] दे० 'इषीका' ।

इसे
सर्व [सं० एष?] 'यह' का कर्मकारक और संप्रदानीकारक रूप ।

इसै पुं०
वि० [सं० ईदृश] इस प्रकार । ऐसा ।

इसौ पु
वि० [हिं० ऐसा] ऐसा । इस प्रकार ।

इस्क
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'इरक' । उ०— तब इनकों राग रंग को इस्क लग्यो । — दो सौ बावन०, भा० १, पृ०२८८ ।

इस्कात
संज्ञा पुं० [अ० इस्कात] गिरना । पतान । २. गर्भपात । हमल गिरना ।

इस्कूल पु० †
संज्ञा पुं०[अं स्क्ल] दे० 'स्कूल' । उ०— कथा कहानी सिखन हित इस्कूलन में जाहिं । - प्रेमघम०, भा० १ पृ० १९० ।

इस्ट (१) पुं०
संज्ञा पुं०[सं० इष्ट] दे० 'इष्ट' । उ०— आया घरै दर औरही बयण इष्ट दे बीच०- बाँकी० ग्रं०, भा०,३, पृ० ५७ ।

इस्ट (२)
संज्ञा पुं० [अं०] पूर्व दिशा ।

इस्टाम †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'स्टांप' । उ०—या मेरे अल्लाह, अब मैं क्यों कर कहूँ । इस्टाम के कागज पर लिख दूँ, मुहर कर दूँ ? — सैर०, पृ० ३० ।

इस्टेशन †
संज्ञा पुं०[हिं०] दे० 'स्टेशन' उ०— इस्टेशन से केवल दै ही कोस दूर पर । — प्रेमघन०, भा० १, पृ० ८ ।

इस्तंगी
संज्ञा पुं० [अं० सिट्रग] जहाजों में वह रस्सी जो धिन्नी में लगी होती है और जिससे पाल के किनारे आदि ताने और खींचे जाते हैं । क्रि० प्र०— चाँपना ।

इस्तकबाल
संज्ञा पुं०[अं० इस्तिकबाल] स्वागत । अगवानी । उ०— चमन में सुन खबर आने की इस्तकबाल को चलियाँ- कविता० कौ०, भा० ४, पृ० ४३ ।

इस्तखारा
संज्ञा पुं० [अ०इस्तिखारह्] दैवी सहायता चाहना । ईश्वर सें मंगलकामना करना । उ०— यहाँ नालों से मिलता है पियार । अबस देखै है जाहिद इस्तखार । — कविता कौं०, भा० ४, पृ० ३९ ।

इस्तमरारी
वि० [अ० इस्तिमरारी] सब दिन रहनेवाला । जिस में कुछ अदल न हो । नित्य । अविच्छिन्न । यौ.— इस्तमरारी वंदोबस्त =जमीन का वह बंदोबस्त जिसमें मालगुजारी सदा के लिये मुकर्रर कर दी जाती है । यह बंदोबस्त लार्ड़ कार्नवालिस ने उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में किया था ।

इस्तरी †
संज्ञा स्त्री० [हि० ] दे० 'स्त्री' । उ०— देखों हम दो टोपी दिए । मर्द इस्तरी उनसी जिए ।- कविता कौं, भा४, पृ० ९५ ।

इस्तिंजा
संज्ञा पुं० [अ० इस्तिजह] पेशाब करने कतते मिट्टी के ढेले से इंद्रिय में लगी हुई पेशाब की बूँदों को सुखाने की क्रिया जो मुसलमानों में प्रचलित है । उ०— खड़े होक र इस्तितजा मत करो । — प्रेमघन० भा० २. पृ ९१ । मुहा०—इस्तिंजे का ढेला= अनाहू०त व्यात्कि । तुच्छ मनुष्य । इस्तिंजा लड़ाना= अत्यंत मित्रता होना । दाँतकाटी रोटी होना । इस्तिजा लड़ाना= अत्यंत मित्रता करना ।

इस्तिकलाल
संज्ञा पुं० [अ० इस्तिककलाल] दृढ़ता । मजबूती । संकल्प की दृढ़ता [को०] ।

इस्तिगासा
संज्ञा पुं० [इस्तिगासह्] न्याय के निमित्त किया गया निवेदन । नालिश । फौजदारी का दावा [को०] ।

इस्तिरी
संज्ञा स्त्री० [सं० स्तरी (=तह रकरनेवाली) स्तृ] धोब्री का वह औजार जिससे वह धोने और सुखाने के बाद कपड़े की तक को जमाकर उसकी शिकन मिटाता हैं । इसके नीचे का भाग जो कपड़े पर रगड़ा जाता है, पीतल या लोहे का होता है है । उसके ऊपर एक खोखला (हवादार) स्थान होता है, जिसमें कोयले के अंगारे भरे जाते हैं ।

इस्तिलाह
संज्ञा स्त्री० [अ० ] १.परस्पर सधि करना । २. परिभाषा सिद्ध अर्थ । परिभाषिक शब्दावली [को०] ।

इस्तिस्नाय
संज्ञा पुं०[अ०] १. पृथक् करना । अलग रखना । २. अपवाद होना [को०] ।

इस्तिहकाम
संज्ञा पुं० [अ०] दृढता । स्थिरता । पायदारी [को०] ।

इस्तीफा
संज्ञा पुं० [अ० इस्तीफा] नौकरी छोड़ने की दरख्वास्त । काम छोड़ने का प्रार्थनापत्र । त्यागपत्र । क्रि० प्र०— देना ।

इस्तेदाद
संज्ञा स्त्री०[अ०] विद्या की योग्यता । लियाकता । विद्वत्ता ।

इन्तेमाल
संज्ञा पुं० [अ०] प्रयोग । उपयोग । व्यवहार । क्रि० प्र०—करन । —में आना । —में लाना । —होना ।

इस्त्रि, इस्त्री पुं०
संज्ञा स्त्रीं० [हिं०] दे० 'स्त्री' । उ०— (क) चार बरग जो लिंग के भाषा में नहीं होइ । स्त्री पुंसस नपुंसकहि इस्त्रि नपुंसक जोइ । — पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ५४४ । (ख) बर वृक्ष को इस्त्री भाँवरि दोति हैष— भिखारी० ग्रं०, भा० २, पृ १५७ ।

इस्त्री
संज्ञा स्त्री० [सं० स्तरी, हिं० इस्तिरी] दे० 'इस्तरी' ।

इस्त्रीजित पुं०
वि० [सं० स्त्रीजित्] स्त्रियों का गुलाम । स्त्रीभत्क । उ०— कोउ कहै ये परम धर्म स्त्रीजित पूरी । लछाघव संधान धरें आयुध के सूरे । — नंद० ग्रं० पृ० १८९.

इस्थिर पु
वि० [सं० स्थिर] दे० 'स्थिर' । उ०— (क) कहै कबीर सुनो भाई साधो करो इस्थिर मन ध्यान ।— कबीर श०, भा० ३. पृ २० । (ख) बूढ़ा वार ज्वान नहीं हैं । कोई इस्थिर ।, — पलटू०, भा० १, पृ ५४ ।

इस्नान पुं०
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'स्नान' । उ०— क्या जब क्या तप सयमो क्या ब्रत क्या इस्नान ।—० कबीर ग्रं०, पृ ३२९ ।

इस्पंज
संज्ञा पुं० [हिं० इसपंज] दें० 'इसपंज' ।

इस्पंद
संज्ञा पुं० [फा०] राई । मुहा०—इस्पंद करना = बुरी नजर दूर करने के लिये राई जलाना ।

इस्पीच
संज्ञा स्त्री० [अं० स्पीच] वक्तृता भाषाण । लेक्चर । उ०— करनी कछु नहिं देत जग सिच्छ की इस्पीच । — प्रेमवन०, भा० १. पृ १६१ ।

इस्म
संज्ञा पुं० [अ०] नाम । संज्ञा । यौ.—इस्मनवीसी= (१) गवाहीं की सूची । (२) किसी गवाही, नोकरी या जगह के लिये नामजद करने का कार्य । ३. पटवारी की जगह के लिये जमींदार का किसी व्यात्कि का नाम चुन्ना ।

इस्लाम
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'इसलाम' । उ०— बुतपरस्ती यको तो इस्लाम नहीं कहते हैं । — कविता कौ०, भा० ४, पृ० १२८ ।

इस्लोक
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'श्लोक' । उ०— कथा औ कविता इसेलेक रसरी बटै बकै बाय मुख भारी । - कबीर रे०, भा०, पृ० ५ ।

इस्सर पुं० †
संज्ञा पुं० [हि०] दे० 'ईश्वर' । उ०— (क) आई परा गुरुनाथ गोसाई । पंथ बिच इस्सर का नाई । — इंद्र०, पृ १५५ । (ख) इस्सर पैठें दरिद्र निकसैं । — (लोक०) ।

इह (१)
क्रि० वि० [सं०] इस जगह । इस लोक में । इस काल में । यहाँ ।

इह (२)
संज्ञा पुं० यह संसार । यह लेक । उ०— हृदय के लजगते उजाले निवेदित इह के निवासी । — हरी घास०, पृ० ९६ । यौ.— इहामुत्र ।

इह (३)
सर्व [हिं०] दे० ' यह' । उ०— ते सर छाँड़त अबलन माँही । पुरूषराव इह पौरूष नाहीं । —नंद ग्रं०, पृ० १३५ ।

इहइ
सर्व [हिं० यह + ही] दे० 'यही' ।

इहकाल
संज्ञा पुं० [सं०] इस लोक का जीवन । लौकिक जीवन [को०] ।

इहतिमाम
संज्ञा पुं० [अं०] दे० 'एहतमाम' [को०] ।

इहतिमाल
संज्ञा पुं०[ अं०] [वि० अहतिमाली] १. संभावन । २. संदेह [को०] ।

इहतियाज
संज्ञा पुं० [अं०] १. अभाव । आवरयकता । २. अवसर ।

इहतियात
संज्ञा पुं० [अं०] १. सावधानी । खबरदारी । उ०— दिल के तई गिरह से खोलती नहीं । है जुल्फआ को भी अपने परेशाँ की इहतियात ।— कविता कौ०, भा० ४, पृ १९१ । २. सरक्षा । बचाव । उ०— दागों की अ पन् कयों न करे 'दर्द' परवरिश । हर बागवाँ करे है गुलिस्ताँ की इहतियात ।— कविता कौ०, भा० ४, पृ० १९१ । यौ.— इहतियाती कार्रवाई = अनिष्ट को रोकने के लिये किया जानेवाला प्रयास ।

इहतियातन्
क्रि० वि० [अं०] साववानीपूर्वक [को०] ।

इहतिलाम
संज्ञा पुं० [अं०] स्वप्नदोष [को०] ।

इहलीला
संज्ञा स्त्री० [सं०] इस लोक का जीवत तथा उससे संहद्ध समस्त क्रियाकलाप [को०] ।

इहलोक
संज्ञा पुं० [सं०] यह संसार । जगत् । दुनिया । उ०— किंतु वह शीघ्र ही इहलोक में आने के लिये विवश हुआ । — रंग- भुमि, पृ० ४७३ ।

इहलौकिक
वि० [सं०] इहलोकसंधी । इस लोक का । संसारिक । २. इस लेक में सुख देनेवाला ।

इहवाँ †
क्रि० वि० [सं० इह] इस जगह । यहाँ ।

इहवैं †
क्रि० वि० [सं० इह] यहीं । इस स्थान पर ।

इहसान †
संज्ञा पुं०[अं०] दें० 'एहसान' ।

इहाँ †
क्रि० वि० [हिं०] दें० 'यहाँ ' । उ०— सकहइ करहु किन कोटि उपाया । इहाँ न लागिहि राउरि माया० — मानस, २ । ३३ ।

इहामुत्र
संज्ञा पुं० [सं०] यह लोक और परलोक ।, उ०— स्वर्गादिक की करिय न इच्छा इहामुत्र त्या४गै सुख दोइ । — सुंदर० ग्रं०, भा० १, पृ० ४० ।

इहामृग
संज्ञा पुं० [सं० ईहामृग] दे० 'ईहामृग' ।

इहि पुं०
सर्व [हिं०] दें० 'यह' । उ०— कहन लगे इहि भवन कौन के । — नंद० ग्रं०, पृ० २१४ । २. दे० 'इस' । उ०— तिहुँ काल मैं प्रगट प्रभु प्रगट न इहि कलिकाल । -नंद० ग्रं०, पृ१४३ ।

इहै पुं०
सर्व [हिं०] दे० ' यही' । उ०— धरनी धन धाम सरीर भलो सुरलोकहु चाहि इहै सुख स्वै । — तुलसी ग्रं०, पृ० १२०७ ।