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विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/ति

विक्षनरी से

तिंडुक पु
संज्ञा पुं० [? अथवा कोल (परि०)] तमाल । उ०—कालबंध, तापिच्छ, पुनि, तिंडुक सहज तमाल ।—नंद०, ग्रं०, पृ० १०३ ।

तिंतिड़
संज्ञा पुं० [सं० तिन्तिड] १. इमली का पेड़ या फल । २. इमली की चटनी (को०) । ३. एक राक्षस (को०) ।

तिंतिड़िका
संज्ञा स्त्री० [सं० तिन्तिडिका] १. इमली । २. इमली की चटनी (को०) ।

तिंतिड़ी
संज्ञा स्त्री० [सं० तिन्तिडीक] १. इमली । २. इमली की चटनी (को०) ।

तिंतिड़ीक
संज्ञा पुं० [सं० तिन्तिडोक] १. इमली । २. इमली की चटनी (को०) ।

तिंतिड़िका
संज्ञा स्त्री० [सं० तिन्तिडीका] १. इमली । २. इमली की चटनी (को०) ।

तिंतिड़ीद्यूत
संज्ञा पुं० [सं० तिंन्तिड़ी + द्यूत] एक प्रका का जुआ जो हाथ में इगली के बीज लेकर खेला जाता है [को०] ।

तिंतिरांग
संज्ञा पुं० [सं० तिन्तिराङ्ग] इसपात । वज्रलोह ।

तिंतिलिका
संज्ञा स्त्री० [सं० तिन्तिलिका] दे० 'तिंतिड़िका' ।

तिंतिली
संज्ञा स्त्री० [सं० तिन्तिली] दे० 'तितिड़ी' ।

तिंतिलीका
संज्ञा स्त्री० [सं० तिन्तिलीक] इमली [को०] ।

तिंदिश
संज्ञा पुं० [सं० तिन्दिश] टिंडसी नाम की तरकारी । डेंडसी ।

तिंदु (१)
संज्ञा पुं० [सं०] तेंदू का पेड़ ।

तिंदु पु (२)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तेंदुआ' । उ०—व्याघ्रतिंदु रिछ बाल मँगावह । अवर डोर ईहामृग ल्यावहु ।—प० रासो० पृ० १७ ।

तिंदुक
संज्ञा पुं० [सं० तिन्दुक] १. तेंदु का पेड़ । २. कर्षप्रमाण । दो तोला ।

तिंदुकतीर्थ
संज्ञा पुं० [सं० तिन्दुक तीर्थ] ब्रजमंडल के अंतर्गत एक तीर्थ ।

तिंदुकी
संज्ञा स्त्री० [सं० तिन्दुकी] तेंदू का पेड़ ।

तिंदुकिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० तिन्दुकिनी] आवर्तकी । भगवत बल्ली ।

तिंदुल
संज्ञा पुं० [सं० तिन्दुल] तेंदू का पेड़ ।

तिंस पु
वि० [सं० त्रिंश] दे० 'तीस' । उ०—तिंस सहस हिंदुव चमु, विंस सहस पट्ठान ।—प० रासो०, पृ० १३४ ।

तिँवाल पु
संज्ञा पुं० [हिं० तमाला, तमारा] चक्कर । उ०—आवै लोही ईखियाँ, तन ज्यैँ भड़ा तिंवाल ।—बाँकी० ग्रं०, भा० ३, पृ० २३ ।

ति पु
वि० [सं० तद् या त] वह । ति न नगरि ना नागरी, प्रति पद हंसक हीन ।—केशव (शब्द०) ।

तिअ पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तिय' । उ०—रामचिरत चिंता- मनि चारू । संत सुमति तिअ सुभग सिंगारू ।—मानस १ । ३२ ।

तिआ पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तिया' ।

तिआगी †
वि० [हिं०] दे० 'त्यागी' । उ०—बलि औ बिक्रम दानि बड़ा अहे । हेतिम करन तिआगी कहे ।—जायसी ग्रं०, (गप्त०), पृ० १३१ ।

तिआस पु
सर्व० [हिं० ता] वा । उसे । ज्यों आया स्यों जायसी जम सहहिं तिआस सहाय ।—प्राण०, पृ० २५२ ।

तिआह † (१)
संज्ञा पुं० [सं० त्रिविवाह] १. तीसरा विवाह । २. वह पुरुष जिसका तीसरा ब्याह हो रहा हो ।

तिआह (२)
संज्ञा पुं० [सं० त्रि + पक्ष] वह श्राद्ध जो किसी की मृत्यु के पतालीसवें दिन किया जाता है ।

तिउरा (१)
संज्ञा पुं० [देश०] खेसारी नाम का कदन्न । केसारी ।

तिउरा (२)
संज्ञा पुं० [देश०] एक पौधा जिसके बीजों से तेल निकाला जाता है जो जलाने के काम आता है ।

तिउरी †
संज्ञा स्त्री० [देश०] केसारी । खेसारी ।

तिउरी पु
संज्ञा [हिं०] दे० 'त्योरी' । उ०—तिरछी तिउरी देख तुम्हारी ।—प्रेमघन०, भा० १, पृ० १९१ ।

तिउहार †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'त्यौहार' । उ०—सखि मानैं तिउहार सबू, गाइ देवारी खेलि । हौं का गावौं कंत बिनु, रही द्वार सिर मेलि ।—जायसी (शब्द०) ।

तिए पु
क्रि० विं० [हिं०] दे० 'तितना' । उ०—दियौ अल्हनं अंग इत्तौ प्रकारं । तिए तात के नग्ग लित्रे सुधारं ।—पृ० रा०, २१ । ११६ ।

तिकट पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'टिकठी' । उ०—जाय तन तिकट पर डारा । वदन बन बीच ले मारा ।—संत तुरसी०, पृ० ४८ ।

तिकड़म
संज्ञा स्त्री० [सं० त्रि + क्रम] १. चाल । षड्यंत्र । उ०— मानों श्री ल्लुलाल जी को इसी तिकड़म के हेतु फोर्ट विलियम कालेज में चाकरी मिली थी ।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ८४ । २. तरकीब । उपाय ।

तिकड़मबाज
वि० [हिं० तिकड़म + फा़० बाज] दे० 'तिकड़मी' ।

तिकड़मी
वि० [हिं० तिकड़म] १. तिकड़मबाज । चालाक । होशियार । २. धोखेबाज । धूर्त ।

तिकड़ी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० तीन + कड़ी] १. जिसमें तीन कड़ियाँ हों । २. चारापई आदि की वह बुनावट जिसमें तीन रस्सियाँ एक साथ हों ।

तिकड़ी (२)
वि० तीन कड़ी या लड़ीवाली ।

तिकांतक
संज्ञा स्त्री० [अनु०] सवारी में पशुओं को हाँकने के लिये किया जानेवाला शब्द । विशेष—बच्चे जाँघों के बीच में एक लकड़ी ले जाते हुए पकड़ लेते हैं और उसे घोड़ा मानकर तथा अपने को सवार मानकर 'तिक तिक धोड़ा' कहते हुए खेलते हैं ।

तिकानी
संज्ञा स्त्री० [हिं० तीन + कान] वह तिकोनी लकड़ी जो पहिए के बाहर धुरी के पास पाहिए की रोक के लिये लगी रहती है ।

तिकार †
संज्ञा पुं० [सं० त्रि + कार] खेत की तीसरी जोताई ।

तिकुरा
संज्ञा पुं० [हिं० तीन + कूरा] फसल की उपज की तीन बारबर बराबर राशियाँ जिनमें से एक जमींदार लेता है ।

तिके पु
सर्व० [हिं० ति] वे । उ०—देह जिकण वाताँ औ दोई, तिके सदाई तीखा ।—रघु० रू०, पृ० २४ ।

तिकोन पु (१)
वि० [सं० त्रिकोण] दे० 'तिकोना' । उ०—बाँस पुराना साज सब अटपट सरल तिकोन खटोला रे ।—तुलसी (शब्द०) ।

तिकोन (२)
संज्ञा पुं० दे० 'त्रिकोण' ।

तिकोना (१)
वि० [सं० त्रिकोण] [वि० स्त्री० तिकोनी] जिसमें तीन कोने हों । तीन कोनों का । जैसे, तिकोना टुकड़ा ।

तिकोना (२)
संज्ञा पुं० १. एक प्रकार का नमकीन पकवान । समोसा । २. तिकोनी नक्काशी बनाने की छेनी ।

तिकोना (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'त्योरी' ।

तिकोनिया (१)
वि० [हिं० तिकोन + इया (प्रत्य०)] दे० 'तिकोना' ।

तिकोनिया (२)
संज्ञा स्त्री० तीन कोनोंवाला स्थान । विशेष—यह स्थान प्रायः दो दीवालों के बीच कोने में तिकोना पत्थर या लकड़ी गढ़कर बनाया जाता है जिसपर छोटे मोटे समान रखे जाते हैं ।

तिक्का †
संज्ञा पुं० [फा० तिकह्] मांस की बोटी । लोथ । मुहा०—तिक्का बोट़ी करना = टुकड़े टुकड़े करना । धज्जी धज्जी अलग करना ।

तिक्की
संज्ञा स्त्री० [सं० तृ] १. ताश का वह पत्ता जिसपर तीन बूटियाँ बनी हों । २. गंजीफे का वह पत्ता जिसपर तीन बूटियाँ हो ।

तिक्ख पु
वि० [सं० तीक्ष्ण, प्रा० तिक्ख] १. तीखा । चोखा । तेज । २. तीव्रबुद्धि । तेज । चालाक ।

तिक्खा पु †
वि० [हिं०] तिरछा । टेढ़ा ।

तिक्खे †
क्रि० वि० [हिं०] तिरछे ।

तिक्त (१)
वि० [सं०] तीती । कडुआ । जिसका स्वाद नीम, गुरुच, चिरोयते आदि के समान हो ।

तिक्त (२)
संज्ञा पुं० १. पित्तपापड़ा । २. सुगंध । ३. कुटज । ४. वरुण वृक्ष । ५. छह रसों मे से एक । विशेष—तिक्त छह रसों में से एक है । तिक्त और कटु में भेद यह कि तिक्त स्वाद अरुचिकर होता है; जैसे, नीम, चिरायते आदि का; पर कटु स्वाद चरपरा और रुचिकर होता है । जैसे, सोंठ, मिर्च आदि का । वैद्यक के अनुसार तिक्त रस छेदक, रुचिकारक, दीपक, शोधक तथा मूत्र, मेद, रक्त, वसा आदि का शोषण करनेवाला है । ज्वर, खुजली, कोढ़, मूर्छा आदि में यह विशेष उपकारी है । अमिलतास, गुरुच, मजीठ, कनेर, हल्दी, इंद्रजव, भटकटैया, अशोक, कटुकी, बारियारा, ब्राह्मी, गदहपुरना (पुनर्नवा) इत्यादि तिक्त वर्ग के अंतर्गत हैं ।

तिक्तकंदिका
संज्ञा स्त्री० [सं० तिक्तकन्दिका] बनशट । गंधपत्रा । बनरकचूर ।

तिक्तक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. पटोल । परवल । २. चिरति । चिरायता । ३. काला खैर । ४. इंगुदी । ५. नीम । ६. कुटज । कुरौया । ७. तिक्त रस (को०) ।

तिक्तक (२)
वि० तीता [को०] ।

तिक्तकांड
संज्ञा स्त्री० [सं० तिक्तकाण्ड] चिरायता ।

तिक्तका
संज्ञा स्त्री० [सं०] कटुतुंबी । कड़ुआ कद्द ।

तिक्तगंधा
संज्ञा स्त्री० [सं० तिक्तगन्धा] १. वराहक्रांता । बराही कंद । २. सरसों (को०) ।

तिक्तगंधिका
संज्ञा स्त्री० [सं० तिक्तगन्धिका] १. वराहक्रांता । वराही कंद । २. सर्षप । सरसों (को०) ।

तिक्तगुंजा
संज्ञा स्त्री० [सं० तिक्तगुञ्जा] कंजा । करंज । करंजुआ ।

तिक्तघृत
संज्ञा पुं० [सं०] सुश्रुत के अनुसार कई तिक्त ओषाधियों के योग से बना हुआ एक घृत जो कुष्ट; विषम ज्वर, गुल्म, अर्श, ग्रहणी आदि में दिया जाता है ।

तिक्ततंडुला
संज्ञा स्त्री० [सं० तिक्ततण्डुला] पिप्पली । पीपल ।

तिक्तता
संज्ञा स्त्री० [सं०] तिताई । कड़ुआपन । तीतापन ।

तिक्ततुंडी
संज्ञा स्त्री० [सं० तिक्ततुण्डी] कड़ुई तुरई ।

तिक्ततुंबी
संज्ञा स्त्री० [सं० तिक्ततुम्बी] कडुआ कद्दू । तितलौकी ।

तिक्तदुग्धा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. खिरनी । २. मेढ़ासिंघी ।

तिक्तधातु
संज्ञा स्त्री० [सं०] (शरीर के भीतर की कड़ई धातु, अर्थात्) पित्त ।

तिक्तपत्र
संज्ञा पुं० [सं०] ककोड़ा । खेखसा ।

तिक्तपर्णी
संज्ञा स्त्री० [सं०] कचरी । पेहँटा ।

तिक्तपर्वा
संज्ञा पुं० [सं०] १. दुध । २. हलहुल । हुरहुर । ३. गिलोय । गुर्ध । ४. मुलेठी । जेठी मधु ।

तिक्तपुष्पा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] पाठा ।

तिक्तपुष्पा (२)
वि० जिससे फूल का स्वाद तीखा हो [को०] ।

तिक्तफल
संज्ञा पुं० [सं०] १. रीठा । निर्मल फल । २. यवतिक्ता लता (को०) । ३. निर्मली । कतक वृक्ष (को०) ।

तिक्तफला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. भटकटैया । २. कचरी । ३. खर- बूजा । ४. यवतिक्ता लता (को०) । ५. वार्ता की (को०) ।

तिक्तबीजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] तितलौकी [को०] ।

तिक्तभद्रक
संज्ञा पुं० [सं०] परवल । पटोल ।

तिक्तयवा
संज्ञा स्त्री० [सं०] शंखिनी ।

तिक्तरोहिणिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] तिक्तरोहिणी ।

तिक्तरोहिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] कुटकी ।

तिक्तवल्ली
संज्ञा स्त्री० [स्त्री०] मूर्वा लता । मुर्रा । मरोड़फली । चुरनहार ।

तिक्तवीजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] कड़ुआ कद्दू । तितलौकी ।

तिक्तशाक
संज्ञा पुं० [सं०] १. खैर का पेड़ । २. वरुण वृक्ष । ३. पत्रसंदर शाक ।

तिक्तसार
संज्ञा पुं० [सं०] १. रोहिष नाम की घास । २. खैर का पेड़ ।

तिक्तांगा
संज्ञा स्त्री० [सं० तिक्ताङ्गा] पातालगारुड़ी लता । छिरेटा ।

तिक्ता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कुटकी । कटुका । २. पाठा । ३. यव- तिक्ता लता । ४. खरबूजा । ५. छिकनी नाम का पौधा । नकछिकनी ।

तिक्ताख्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] कड़ुआ कद्दू । तितलौकी ।

तिक्तिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. तितलौकी । २. काकमाची । ३. कुटकी ।

तिक्तिरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] तूमड़ी या महुंअर नाम का बाजा जिसे प्रायः सँपेरे बजाते हैं ।

तिक्ष पु †
वि० [सं० तीक्ष्ण] १. तीक्ष्ण । तेज । २. चोखा । पैना । उ०—धनु वान तिक्ष कुठार केशव मेखला मृगचर्म सों । रघुबीर को यह देखिए रस वीर सात्विक धर्म सों ।—केशव (शब्द०) ।

तिक्षता पु
संज्ञा स्त्री० [सं० तीक्ष्णता] तेजी । उ०—शूर बाजिन की खुरी अति तिक्षता तिनकी हुई ।—केशव (शब्द०) ।

तिक्षि पु
वि० [हिं०] दे० 'तीक्ष्ण' । उ०—गणन्नाय हथ्थं लिए तिक्षि फर्सी । पिनाकी पिनाकं किए आप दर्सी ।—ह० रासो, पृ० ८४ ।

तिख
वि० [सं० त्रि + कर्ष] तीन बार का जोता हुआ । तिबहा (खेत) ।

तिखटी पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'टिकठी' ।

तिखरा
वि० [हिं०] दे० 'तिख' ।

तिखराना †
क्रि० स० [हिं० तिखारना का प्रे० रूप] निखारने का काम दूसरे से कराना ।

तिखाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० तीखा] तीखापन । तीक्ष्णता । तेजी ।

तिखारना †
क्रि० अ० [सं० त्रि + हिं० आखर] किसी बात को दृढ़ या निश्चिचत करने के लिये तीन बार पूछना । पक्का करने के लिये कई बार कहलाना । विशेष—तीन बार कहकर जो प्रतिज्ञा की जाती है, वह बहुत पक्की समझी जाती है ।

तिखूँट पु
वि० [हिं०] दे० 'तिखूँट' । उ०—बेलदार लहरा छबि छूटे । चीनमताले और तिखूँटे ।—भक्ति प०, पृ० १७५ ।

तिखूँटा
वि० [हिं० तीन + खूँट] तीन कोने का । जिसमें तीन कोने हों । तिकोनवा ।

तिगना (१)
क्रि० स० [देश०] देखना । नजर डालना । झाँपना । (दलाली) ।

तिगना (२)
वि० [हिं०] दे० 'तिगुना' ।

तिगुना
वि० [सं० त्रिगुण] [वि० स्त्री० तिगुनी] तीन बार अधिक । तीन गुना ।

तिगुचना
क्रि० स० [हिं०] दे० 'तिगना' ।

तिगून
संज्ञा पुं० [हिं० तिगुना] १. तिगुना होने का भाव । २. आरंभ में जितना समय किसी चीज के गाने या बजाने में लगाया जाय, आगे चलकर वह चीज उसके तिहाई समय में गाना । साधारण से तिगुना । जल्दी पाना या बजाना । वि० दे० 'चौगून' ।

तिग्मंस पु
संज्ञा सं० [हिं०] दे० 'तिग्मांशु' । उ०—मिहिर तिमिरहर प्रभाकर उस्नरिस्म तिग्मंस ।—अनेकार्थ०, पृ० १०२ ।

तिग्म (१)
वि० [सं०] १. तीक्ष्ण । खरा । तेज । प्रखर । उ०—खोल गए संसार नया तुम मेरे मन में, क्षण भर । जन संस्कृति का तिग्म स्फीत सौंदर्य स्वप्न दिखलाकर ।—ग्राम्या, पृ० ४७ । २. तप्त । तप्त करनेवाला (को०) । यौ०—तिग्मकर । तिग्मदीधिति । तिग्ममन्यु । तिग्मरश्मि । तिग्मांशु । ३. प्रचंड । उग्र (को०) ।

तिग्म (२)
संज्ञा पुं० १. वज्र । २. पिप्पली ।—(अनेकार्थ०) । ३. पुरुवंशीय एक क्षत्रिय ।—(मत्स्य) । ४. ताप (को०) । ५. तीक्ष्णता । तीलापन (को०) ।

तिग्मकर
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य ।

तिग्मकेतु
संज्ञा पुं० [सं०] ध्रुववंशीय एक राजा जो वत्सर और सुवीथी के पुत्र थे । (भागवत) ।

तिग्मअंभ
संज्ञा पुं० [सं० तिग्मजन्भ] अग्नि [को०] ।

तिग्मता
संज्ञा स्त्री० [सं०] तीक्ष्णता । तेज । उग्रता । प्रचडंता । उ०—परतंत्रता ने साधारणों को निर्बल और दरिद्र बना दिया है इनसें वह तिग्मता, जो विजयौ जाति में होती है, कभी आ ही नहीं सकती ।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० २८१ ।

तिग्मतेज (१)
वि० [सं० तिग्मतेजस्] १. तीक्ष्ण । तीखा । २. बैठनेवाला । अविष्ट होनेवाला । ३. उग्र । प्रचंड । ४. तेजस्क । तेजस्वी [को०] ।

तिग्मतेज (२)
संज्ञा पुं० सूर्य [को०] ।

तिग्मदोधिति
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य ।

तिग्मद्युति, तिग्मभास
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य [को०] ।

तिग्ममन्यु
संज्ञा पुं० [सं०] महादेव । शिव ।

तिग्ममयूखमाली
संज्ञा पुं० [सं० तिग्ममयूखमालिन्] सूर्य [को०] ।

तिग्मयातना
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रचंड या असह्य पीड़ा [को०] ।

तिग्मरश्मि
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य ।

तिग्मांशु
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य ।

तिघरा †
संज्ञा पुं० [सं० त्रिघट] मिट्टी का चौड़े मुँह का बरतन जिसमें दुध दही रखा जात है । मटकी ।

तिचिया
संज्ञा पुं० [देश०] जहाज पर के वे आदमी जो आकाश में नक्षत्रों को देखते हैं (लश०) ।

तिच्छ पु
वि० [सं० तीक्ष्ण] दे० 'तीक्ष्ण' ।

तिच्छन पु
वि० [सं० तीक्ष्ण] दे० 'तीक्ष्ण' ।

तिच्छना पु
वि० [हिं०] दे० 'तीक्ष्ण' । उ०—कनक काँच ना भेद ज्ञान मैं तिच्छना । अरे हाँ रे पलटू ऊधो से हरि कहैं संत के लच्छना ।—पलटू०, भा० २, पृ० ७७ ।

तिजरा
संज्ञा पुं० [सं० त्रि + ज्वर] तीसरे दिन आनेवाला ज्वर । तिजारी ।

तिजवाँसा
संज्ञा पुं० [हिं० तीजा (= तीसरा) + मास (=महीना)] वह उत्सव जो किसी स्त्री को तीन महीने का गर्भ होने पर उसके कुटुंब के लोग करते हैं ।

तिजहर †
संज्ञा पुं० [हिं०] तीसरा पहर ।

तिजहरिया
संज्ञा पुं० [हिं० तीजा (=तीसरा) + पह] तीसरा पहर । अपराह्न ।

तिजहरी †
संज्ञा पुं० [हिं० तीजा (= तीसरा) + मास (=महीना)] तीसरा पहर । अपराह्न ।

तिजार †
संज्ञा पुं० [सं० त्रि + ज्वर] तीसरे दिन आनेवाला ज्वर ।

तिजारत
संज्ञा स्त्री० [अ०] वाणिज्य । आनेज । व्यापार । रोजगार । सौदागरी ।

तिजरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० तिजार] तीसरे दिन जाड़ा देकर आनेवाल ज्वर ।

तिजिया †
संज्ञा पुं० [हिं० तीजा (= तीसरा)] वह मनुष्य जिसका तीसरा विवाह हो ।

तिजिल
संज्ञा पुं० [सं०] १. चंद्रमा । २. राक्षस [को०] ।

तिजइना पु
क्रि० स० [सं० त्यजन] तजना । छोड़ना । उ०—कइ म्हारह हीरा अपहइ, नहीं तौ गोरी ! तिजहूँ पराण ।—बी० रासो, पृ० ३३ ।

तिजोरी
संज्ञा स्त्री० [अं० ट्रेजरी] लोहे की मजबूत छोटी आलमारी, जिसमें रुपए गहने आदि सुरक्षित रखे जाते हैं ।

तिड़ो
संज्ञा स्त्री० [सं० त्रि (= तीन) ताश का वह पत्ता जिसमें तीन बुटियाँ हो । मुहा०—तिड़ी करना = गायब करना । उड़ा ले जाना । तिड़ी होना = (१) चुपके से चले जाना । गायब होना । (२) भाम जाना ।

तिड़ीबिड़ी †
वि० [देश०] तितर बितर । छितराया हुआ । अस्त- व्यस्त ।

तिड्ड पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'टिड्डी' । उ०—ऊ चालउ के अवर- सणउ कइ फाकउ कइ तिड्ड ।—ढोला०, दू०, ६६० ।

तिण पु † (१)
सर्व० [हिं०] दे० 'तिन' । उ०—चहुँ दिसि दामिनि सघन घन, पीउ तजी तिण वार ।—ढोला०, दू० ३७ ।

तिण पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० तृण] तृण । तिनका ।

तिणा पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तिनका' । उ०—दंत तिणा लीये कहै रे पिय आप दिखाइ ।—सुंदर ग्रं०, भा० २, पृ० ६८२ ।

तित पु (१)
क्रि० वि० [सं० तत्र] १. तहाँ । वहाँ । उ०—श्रीनिवास कों निज निवास छबि का कहियै तित ।—नंद० ग्रं०, पृ० २०२ । २. उधर । उस ओर । उ०—जित देखौं तित श्याममयी है ।—सूर (शब्द०) ।

तित (२)
वि० [हिं० तीत का समासगत रूप] तिक्त । तीता । जैसे, तितलौकी ।

तितउ
संज्ञा पुं० [सं०] १. चलनी । २. छत्र । छाता [को०] ।

तितना †
क्रि० वि० [सं० तति, ततीनि] ततना । उसके बराबर । उ०—तब वाकी सास एक ही बेर वाकी पातरि में परोसे । तितनो ही वह लरिकिनी चरनाभृत मिलाय कै खाँहि ।— दो सौ बावन०, भा० २, पृ० ३८ । विशेष—'जितना' के साथ आए हुए वाक्य का संबंध पुरा करने के लिये इस शब्द का प्रयोग होता है । पर अब गद्य में इसका प्रचार नहीं है ।

तितर पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तीतर' । उ०—हुकुम स्वामि छुट्टत सु इम, मनौं तितर पर बाज ।—पृ० रा०, ५ ।४ ।

तितर बितर
वि० [हिं० तिधर + अनु० बितर] जो इधर उधर हो गया हो । छितराया हुआ । बिखरा हुआ । जो एकत्र न हो । जैसे,—तोप की आवाज सुनते ही सब सिपाही तितर बितर हो गए । २. जो क्रम से लगा न हो । अव्यवस्थित । अस्त व्यस्त । जैसे,—तुमने सब पुस्तकें तितर बितर कर दीं ।

तितरात
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का पौधा जिसकी जड़ औषध के काम में आती है ।

तितरोखी
संज्ञा स्त्री० [हिं० तीतर] एक प्रकार की छोटी चिड़िया ।

तितली
संज्ञा स्त्री० [हिं० तीतर, पू० हिं० तितिल (चित्रित डैनों के कारण)] १. एक उड़नेवाला सुंदर कीड़ा या फतिंगा जो प्रायः बगीचों मे फूलों के पराग और रस आदि पर निर्वाह करता है । विशेष—तितली के छह पैर होते है और मुँह से बाल के ऐसी दो सूंड़ियाँ निकली होती है जिनसे यह फूलों का रस चूसती है । दोनों ओर दो दो के हिसाब से चार बड़े पंख होने है । भिन्न भिन्न तितलियों के पंख भिन्न भिन्न रंग के होते है और किसी किसी में बहुत सुंदर बुटियाँ रहती हैं । पंख के अतिरिक्त इसका और शरीर इतना सूक्ष्म या पतला होता है कि दूर से दिखाई नहीं देता । गुबरेले, रेशम के कीड़े आदि फतिंगों के समान तितली के शरीर का भी रूपांतर होता है । अंडे से निकलने के ऊपरांत यह कुछ दिनों तक गाँठकर ढोले या सूँड़े के रूप में रहती है । ऐसे ढोले प्रायः पौधों की पत्तियों पर चिपके हुए मिलते हैं । इन ढोलों का मुँह कुतरने योग्य होता है और यै पौधों को कभी कभी बड़ी हानि पहुँचाते हैं । छह असली पैरों के अतिरिक्त इन्हें कई ओर पैर होते हैं । ये ही ढोले रूपांतरित होते होते तितली के रूप में हो जाते हैं और उड़ने लगते हैं ।२. एक घास जो गेहूँ आदि के खेतों में उगती है । विशेष—इसका पौधा हाथ सवा हाथ तक का होता है । पत्तियाँ पतली पतली होती हैं । इसकी पत्तियाँ और बीज दवा के काम में आते हैं ।

तितलौआ
संज्ञा पुं० [हिं० तीत + लौआ] कड़ुवा कद्दू ।

तितलौकी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० तीता + लौआ] कटुतुंबी । कड़वा कद्दू ।

तितारा (१)
संज्ञा पुं० [सं० त्रि + हिं० तार] वह सितार की तरह का एक बाजा जिसमें तीन तार लगे रहते हैं । उ०—बाजैं डफ, नगारा, बौन, बाँसुरी सितारा चारितारा त्यों तितारा मुख लावता निसंक हैं ।—रघुराज (शब्द०) ।२. फसल की तीसरी बार की सिंचाई ।

तितारा
वि० तीन तारवाला । जिसमें तीन तार हों ।

तितिंबा
संज्ञा पुं० [अ० तितिम्मह्] १. ढकोसला । २. शेप । ३. लेख का वह भाग जो अंत में उसी पुस्तक के संबंध में लगा देते हैं । परिशिष्ट । उपसंहार ।

तितिक्ष
वि० [सं०] सहनशील । क्षमाशील ।

तितक्ष (२)
संज्ञा पुं० एक ऋषि का नाम ।

तितिक्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सरदी गरमी आदि सहने की सामर्थ्य । सहिष्णुता । २. क्षमा । शांति । उ०—पावें तुमसे आज शत्रु भी ऐसी शिक्षा, जिसका अथ हो दंड और इति दया तितिक्षा ।—साकेत, पृ० ४२२ ।

तितिक्षु
वि० [सं०] क्षमाशील । शांत । सहिष्णु । २. त्यागने की इच्छावाला (को०) ।

तितुक्षु (२)
संज्ञा पुं० पुरुवंशीय एक राजा जो महामना का पुत्र था ।

तिमिभ
संज्ञा पुं० [सं०] १. जुगनू । २. बीरबहूटी [को०] ।

तितिम्मा
संज्ञा पुं० [अ० तिमिम्मह] १. बचा हुआ भाग । अवशिष्ट अंश । २. किसी ग्रंथ के अंत में लगाया हुआ प्रकरण । परिशिष्ट ।

तितिर, तितिरि
संज्ञा पुं० [सं०] तीतर पक्षी [को०] ।

तितिल
संज्ञा पुं० [सं०] १. ज्योतिष में सात करणों में के एक । दे० 'तौतिल' । २. नाँद नाम का मिट्टी का बरतन । ३. तिल की खली (को०) ।

तिती पु
क्रि० वि० [सं० तति, ततीनि] उतनी । उ०—तब श्री हरि वह माया जिती । अंतरध्यान करी तहँ तिती ।—नंद० ग्रं०, पृ० २६७ ।

तितीर्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. तैरने या पार करने की इच्छा । २. तर जाने की इच्छा ।

तितीर्षु
वि० [सं०] १. तैरने की इच्छा करनेवाला । उ०—कवि अल्प, उडुप मति, भव तितीर्षु दुस्तर अपार । कल्पनापुत्र मैं भावी द्रष्टा, निराधार ।—ग्राम्या, पृ० ५८ । २. तरने का अभिलाषी ।

तितुला †
संज्ञा पुं० [देश०] गाड़ी के पहिए का आरा ।

तिते पु †
वि० [सं० तित] उतने (संख्यावाचक) । उ०—अंबर माँझ अमरगन जिते । देखत हैं घट ओटनि तिते ।—नंद० ग्रं०, पृ० २६८ ।

तितेक पु †
वि० [हिं० तितो + एक] उतना । उ०—गोकुल गोपी गोप जितेक । कृष्ण चरित रस मगन तितेक ।—नंद० ग्रं०, पृ० २५९ ।

तितै पु †
क्रि० वि० [हिं० तित + ई (प्रत्य०)] १. वहाँ ही । वहीं । २. वहाँ । ३. उधर ।

तितो पु †
वि० [सं० तावत्] उस मात्रा या परिमाण का ।

तितो (२)
क्रि० वि० उतना ।

तितौ पु
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'तितो' । उ०—(क) जब सब लोक चराचर जितो । प्रलय उदधि मधि मज्जत तितौ ।— नंद०, ग्रं०, पृ० २७१ । (ख) जद्यपि सुंदर सुधर पुनि सगुमौ दीपक देह । तऊ प्रकासु करै तितौ भरियै जितैं सबेह ।— बिहारी र०, दो० ६५८ ।

तित्तिर
संज्ञा पुं० [स्त्री० तित्तिरी] १. तीतर नाम का पक्षी । २. तितली नाम की घास ।

तित्तरि
संज्ञा पुं० [सं०] १. तीतर पक्षी । २. यजुर्वेद की एक शाखा का नाम । दे० वि० 'तैतिरीय' । ३. यास्क मुनि के एक शिष्य जिन्होंने तैत्तिरीय शाखा चलाई थी ।—(आत्रेय अनुक्रमणिका) । विशेष—भागवत आदि पुराणों के अनुसार वैशंपायन के शिष्य मुनियों ने तितर पक्षी बनकर याज्ञवल्क्य के उगले हुए यजुर्वेद को चुँगा था ।

तित्थूँ
अव्य० [पं०] तहाँ । उ०—अहो अहो घनआनँद जात्री तित्थूँ जाँदा है ।—घनानंद०, पृ० १८१ ।

तिथि
संज्ञा पुं० [सं०] १. चंद्रमा की कला के घटने या बढ़ने के अनुसार गिने जानेवाले महीने का दिन । चांद्रमास के अलग अलग दिन जिनके नाम संख्या के अनुसार होते हैं । मिति । तारीख । यौ०—तिथिपक्ष । तिथिवृद्धि । विशेष—पक्षों के अनुसार तिथियाँ भी दो प्रकार की होती हैं । कृष्ण और शुक्ल । प्रत्येक पक्ष में १५ तिथियाँ होती हैं । जिनके नाम ये हैं—प्रतिपदा (परिवा), द्वितीया (दूज), तृतीया (तीज), चतुर्थी (चौथ), पंचमी, षष्ठी (छठ), सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, (ग्यारस), द्वादशी (दुआस), त्रयोदश (तेरस), चतुर्दशी (चौदस), पूर्णिमा या अमावास्या । कृष्णपक्ष की अंतिम तिथि अमावास्या और शपक्लपक्ष की पूर्णिमा कहलाती है । इन तिथियों के पाँच वर्ग किए गए हैं—प्रतिपदा, षष्ठी और एकदशी का नाम जया, द्वितीया, सप्तमी और द्वादशी का नमा भद्रा, तृतीया अष्टमी और त्रयोदशी का नाम जया, चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी का नाम रिक्ता; और पंचमी, दशमी और पूर्णिमा या अमावस्या का नाम पूर्णा है । तिथियों का मान नियत होता है अर्थात् सब तिथियाँ बराबर दंडों की नहीं होती । २. पंद्रह की संख्या ।

तिथिकृत्य
संज्ञा पुं० [सं०] विशेष तिथि पर किया जानेवाला धार्मिक कृत्य [को०] ।

तिथिक्षय
संज्ञा पुं० [सं०] तिथि की हानि । किसी तिथि का गिनती में न आना । विशेष—ऐसा तब होतो है जब एक ही दिन में अर्थात् दो सूर्योंदयों के बीच तीन तिथियाँ पड़ जाती हैं । ऐसी अवस्था में जो तिथि सूर्य के उदयकाल में पड़ती है, उसका क्षय माना जाता है ।

तिथिदेवता
संज्ञा पुं० [सं०] वह देवता जो तिथि का अधिष्ठाता होता है [को०] ।

तिथिपति
संज्ञा पुं० [सं०] तिथियों के स्वामी देवता । विशेष—भिन्न भिन्न ग्रंथों के अनुसार ये अधिपति भिन्न भिन्न हैं । जिस तिथि का जो देवता है, उसका उक्त तिथि को पूजन होता है ।/?/

तिथिपत्र
संज्ञा पुं० [सं०] पत्रा । पंचांग । जंत्री ।

तिथिप्रणी
संज्ञा पुं० [सं०] चंद्रमा ।

तिथियुग्म
संज्ञा पुं० [सं०] दो तिथियों का योग [को०] ।

तिथिवृद्धि
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह तिथि जो दो सूर्योदयों तक चले [को०] ।

तिथ्यर्घ
संज्ञा पुं० [सं०] करण ।

तिदरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० तीन + फा़० दर] वह कोठरी जिसमें तीन दरवाजे या खिड़कियाँ हों ।

तिदारी
संज्ञा पुं० [देश०] जल के किनारे रहनेवाली बतख की तरह की एक चिड़िया । विशेष—यह बहुत तेज उड़ती है और जमीन सूखी घास का धोंसला बनाती है । इसका लोग शिकार करते हैं ।

तिद्वारी
संज्ञा स्त्री० [सं० त्रिद्वार] वह कोठरी जिसमें तीन दरवाजे या खिड़कियाँ हों ।

तिधर †
क्रि० वि० [सं० तत्र] उधर । उस ओर ।

तिधरि पु
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'तिधर' । उ०— जिधरि देखौं नैन भरि तिधरि सिरजनहारा ।—दादू०, ९८ ।

तिधार
संज्ञा पुं० [सं० त्रिधार] एक प्रकार का थूरह (सेंहुड़) हैं । इसे बगीचों आदि की बाढ़ या टट्टी के लिये लगाते हैं । इसे बज्री या नरसेज भी कहते हैं ।

तिधारीकांडवेल
संज्ञा स्त्री० [हिं० तिधारी + सं० काण्डवेल] हड़जोड़ ।

तिनंगा
पुं० [हिं०] दे० 'सिलंगा' । उ०—सार तिनंगा तारयौ ।— पृ० रा०, १० । ३२ ।

तिन † (१)
सर्व० [सं० तेन (= उनसे)] 'तिस' शब्द का बहुवचन । जैसे, तिनने, तिनको, तिनसे इत्यादि । उ०—तिन कवि केशवदास सों कीनों धर्म सनेह ।—केशव (शब्द०) । विशेष—अब गद्य में इस शब्द का व्यवहार नहीं होता ।

तिन (२)
संज्ञा पुं० [सं० तृण] तिनका । तृण । घासफूस । उ०—ह्वै कपूर मनिमय रही मिलति न दुति मुकुताले । छिन छिन खरो बिचच्छनौ लखहि छाय तिन आलि ।—बिहारी (शब्द०) ।

तिनउर
संज्ञा पुं० [सं० तृण + उर या और (प्रत्य०) अथवा सं० तृण + आकार] तिलकों का ढेर । तृणसमूह । उ०—तन तिन- उर भा, झूरौं खरी । भइ बरखा, दुख आगरि जरी ।— जायसी (शब्द०) ।

तिनक
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तिनका' । उ०— लाज तिनक जिमि तोरि ही दीनी ।— नंद० ग्रं०, पृ० १५२ ।

तिनकना
क्रि० अ० [अ० चिनगारी, चिनगी, या अनु०] चिड़- चिड़ाना । चिढ़ना । झल्लाना । बिगड़ना । नारज होना ।

तिनका
संज्ञा पुं० [सं० तृणक] तृण का टुकड़ा । सूखी घास या डाँठी का टुकड़ा । उ०—तिनका सौं अपने जन कौ गुन मानत मेरु समान ।—सूर०, १ । ८ । मुहा०—तिनका दाँतों में पकड़ना या लेना = विनती करना । क्षमा या कृपा के लिये दीनतापूर्वक विनय करना । गिड़गिड़ाना हा हा खना । तिनका तोड़ना = (१) संबंध तोड़ना । (२) वलाय लेना । बलैया लेना । विशेष— बच्चे को नजर न लगे, इसलिये माता कभी कभी तिनका तोड़ती है । तिनके चुनना = बेसुध हो जाना । अचेत होना । पागल ये बावला हो जाना । (पागल प्रायः व्यर्थ के काम किया करने हैं) । उ०—रंजे फिराक में तिनके चुनने की नौबत आई ।— फिसाना०, भा० ३, पृ० २६८ । तिनके चुनवाना = (१) पागल बना देना । (२) मोहीत करना । तिनके का सहारा = (१) थोड़ा सा सहारा ।(२) ऐसी बात जिससे कुछ थोड़ा बुहत ढारस बँधे । तिनके को पहड़ करना = छोटी बात को घड़ी कर डालना । तिनके को पहाड़ कर दिखाना = थोड़ी सी बातको बहुत बढ़ाकर कहना । तिनके की ओट पहाड़ = छोटी सी बात में किसी बड़ी बात का छिपा रहना । सिर से तिनका उतारना = (१) थोड़ा सा एहसान करना । २. किसी प्रकार का थोड़ा बहुत काम करके उपकार का काम करना ।

तिनगना
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'तिनकना' ।

तिनगरी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का पकवान । उ०— पेठा पाक जलेबी पेरा । गोंदपाग तिनगरी गिंदौरा ।— सूर (शब्द०) ।

तिनताग पु
संज्ञा पुं० [हिं० तीन + ताग] तीन तागे (जनेऊ) । उ०— *ब्राह्मन कहिए ब्रह्मरत है ताका बड़ भाग । निहिंत पसु अज्ञानता गर डारे तिन ताग ।— भीखा० श०, पृ० १०१ ।

तिनतिरिया
संज्ञा पुं० [देश०] मनुवा कपास ।

तिनधरा
संज्ञा स्त्री० [देश०] तीन धार की रेती जिससे आरी के दाँत चोखे किए जाते हैं ।

तिनपतिया
वि० [हिं० तीन + पात] तीन पत्ते वाले (वेलपत्र आदि) ।

तिनपहल
वि० [हिं० तीन + पहल] दे० 'तिनपहला' ।

तिनपहला
वि० [हिं० तीन + पहल] [वि० स्त्री० तिनपहली] जिसमें तीन पहल हों । जिसके तीन पार्श्व हों ।

तिनमिना
संज्ञा पुं० [हिं० तिन + मनिया] आला जिसके बीच में सोने का जड़ाऊ जुगनू हो ।

तिनवा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का बाँस । विशेष— यह बरमा में बहुत होता है । आसाम और छोटा नाग- पुर में भी यह पाया जाता है । यह इमारतों में लगता है और चटाइयाँ बनाने के काम में आता है । इसके चोगों में बरमा, मनीपुर आदि के लोग भात भी पकाते हैं ।

तिनष्षना पु
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'तिनकना' । उ०— मुरयौ साहि गोरी महाबीर धीरं । तसब्बी तिनष्षो लिए षिभिझ तीरं — पृ० रा० १३ । ९५ ।

तिनस
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तिनिश' ।

तिनसुना
संज्ञा पुं० [सं०] तिनिश का पे़ड ।

तिनाशक
संज्ञा पुं० [सं०] तिनिश वृक्ष ।

तिनास
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तिनिश' ।

तिनि पु
वि० [हिं०] दे० 'तीन' । उ०—तिहि नारी के पुत तिनि भाऊ । ब्रह्मा बिष्णु महेश्वर नाऊँ ।— कबीर बी०, पृ० ५ ।

तिनिश
संज्ञा पुं० [सं०] सीसम की जाति का एक पेड़ जिसकी पत्तियाँ शमी या खैर की सी होती हैं । विशेष— इसकी लकड़ी मडबूत होती है और किवाड़, गाड़ी आदि बनाने के काम में आती है । इसे तिनास या तिनसुना भी कहते हैं । वैद्यक में यह कसैला और गरम माना जाता है । रक्तातिसार, कोढ़, दाह, रक्तविकार आदि में इसकि छाल, पत्तियाँ आदि दी जाती है । पर्या०— स्यंदन । नेमी । रथद्रु । अतिमुक्तक । चित्रकृत । चक्री । शतांग । शकट । रथिक । भस्मगर्भ । मेषी । जलधर । अक्षक । तिनाशक ।

तिनुक पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तिनुका' । उ०— हम स्वामि काज सामंत मरन तन तिनुक विचारौं ।— पृ० रा०, १२ । १६८ ।

तिनुका
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तिनका' । उ०— टूट जाय ओट तिनुका की रसक रहै ठहराई ।— कबीर श०, भा० २, पृ० २ ।

तिनुवर पु
संज्ञा पुं० [सं० तृणवर] तिनका ।

तिनूका पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तिनका' । उ०— होय तिनूका वज्र वज्र तिनका ह्वै टूठै ।— गिरिधर (शब्द०) ।

तिन्नक
संज्ञा पुं० [हिं० तनिक] १. तुच्छ चीज । २. छोटा लड़का ।

तिन्ना
संज्ञा पुं० [सं०] १. सती नामक वर्णवृत्त । २. रोटी के साथ खाने की रसेदार वस्तु । ३. तिन्नी के धान का पैधा ।

तिन्नी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० तृण, हिं० तिन, अथवा सं० तृणान्न] एक प्रकार का जंगली धान जो तालों में आपसे आप होता है । विशेष— इसकी पत्तियाँ जड़हन का सी ही होती हैं । पौधा तीन चार हाथ ऊँचा होता है । कातिक में इसकी बाल फूटती है जिसमें बहुत लंबे लंबे टूँड़ होते हैं । बाल के दाने तैयार होने पर गिरने लगते हैं, इससे इकट्ठा करनेवाले या तो हटके में दानों को झाड़ लेते हैं अथवा बहुत से पौधों के सिरों को एक में बाँध देते हैं । तिन्नी का धान लंबा और पतला होता है । चावल खाने में नीरस और रूखा लगता है और व्रत आदि में खाया जाता है ।

तिन्नी (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] नीवी । फुफुँती ।

तिन्ह †
संर्व० [हिं०] दे० 'तिन' ।

तिपड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० तीन + पट] कमखाब बुननेवालों के करघे की वह लकड़ी जिसमें तागा लपेटा रहता है और जो दोनों बैसरों के बीच में होती है ।

तिपतास पु †
संज्ञा पुं० [सं० तृप्ति + आशय] तृप्ति प्रदान करनेवाली वस्तु । उ०— काजा सो जाँका कवल वियास । ज्ञान संपूरण है तिपतास ।— प्राण०, पृ० १० ।

तिपति पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० तृप्ति] दे० 'तृप्ति' । उ०— सहस एक रथ साजि दासि विय तिपति इक्क मधि ।— पृ० रा०, १४ । ११९ ।

तिप् तिप्
संज्ञा पुं० [अनु०] तिप् तिप् की ध्वनिपूर्वक टपकने का भाव । उ०— मोर बेला, सिंची छत से ओस की तिप् तिप् पहाड़ी काक ।— हरी घास०, पृ० ३४ ।

तिपल्ला
वि० [हिं० तीन + पल्ला] १. तीन पल्लों का । जिसमें तीन पर्त या पार्श्व हों । २. तीन तागे का । जिसमें तीन तागे हों ।

तिपाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० तीन + पाया] १. तीन पायों की बैठने की ऊँची चौकी । स्टूल । २. पानी के घडे़ रखने की ऊँची चौकी । टिकटी । तिगोड़िया । ३. लकड़ी का एक चौखटा जिसे रँगरेज काम में लाते हैं ।

तिपाड़
संज्ञा पुं० [हिं० तीन + पाड़] १. जो तीन पाठ जोड़करबना हो । उ०— दक्षिण चीर तिपाड़ को लहँगा । पहिरि विविध पट मोलन महँगा ।—सूर (शब्द०) । २. जिसमें तीन पल्ले हों । ३. जिसमें तीन किनारे हों ।

तिपारी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का छोटा झाड़ या पौधा जो बरसात में आपसे आप इधर उधर जमता है । मकोय । परपोटा । छोटी रसभरी । विशेष—इसकी पत्तियाँ छोटी और सिर पर नुकीली होती हैं । इसमें सफेद फूल गुच्छों में लगते हैं । फल संपुट के आकार के एक झिल्लीदार कोश में रहते हैं जिसमें नसों के द्वारा कई पहल बने रहती हैं ।

तिपुर पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'त्रिपुर' (१) । उ०— काली सुर महि- वास तिपुर जित्तिभ महिषासुर ।— पृ० रा०, ६ । ६२ ।

तिपैरा
संज्ञा पुं० [हिं० तीन + पुर] वह बड़ा कुआँ जिसमें तीन चरसे एक साथ चल सकें ।

तिप्त पु
वि० [हिं०] दे० 'तृप्त' (१) । उ०— सी मुक्त तिप्त हरि दर्शन पावै । साध संगति महि हरि लिव लावै ।— प्राण०, वृ० २२४ ।

तिप्ति पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तृप्त' । उ०— तिप्ति संतोषि रहे लिउ लाई । नानक जोती जोति मिलाई ।—प्राण० पृ० १७७ ।

तिफली पु
संज्ञा पुं० [अ० तिफल + फा़० ई (प्रत्य०)] बचपन । उ०— पाबंद हुआ तिफली जवानी व बुढ़ापा ।—कबीर ग्रं०, पृ० १५० ।

तिफ्ल
संज्ञा पुं० [अ० तिफ्ल़्] बच्चा । उ०—कहे आए तिफ्ल मेरे नूर ऐनी । जो यक सोंजन कूँ लाओ होर तागा ।— दक्खिनी०, पृ० ११५ । यौ०— तिक्ख मिजाज = बाल्य प्रकृतिवाला । तिफ्ले अश्क = अश्रु- विंदु । तिफ्ले आतश = चिनगारी । तिफ्ले मकतब = निरक्षर । मर्ख । अनभिज्ञ । अनाड़ी । तिफ्ले शीरख्वार = दुधमुँहा वच्चा । तिफ्लेहिंदु = आँख की पुतली । कनीनिका ।

तिब
संज्ञा स्त्री० [अ०] यूनानी चिकित्सा । हकीमी [को०] ।

तिबद्धी
वि० स्त्री० [हिं० तीन + बाध] (चारपाई की बुनावट) जिसमें तीन बाध या रस्सियाँ एक साथ एक एक बार खींची जायँ ।

तिबाई
संज्ञा स्त्री० [देश०] आटा माड़ने का छिछला बड़ा बरतन ।

तिबारा (१)
वि० [हिं० तीन + बार] तीसरी बार ।

तिबारा (२)
संज्ञा पुं० तीन बार उतारा हुआ मद्य ।

तिबारा (३)
संज्ञा पुं० [हिं० तीन + बार (= दरवाजा)] [स्त्री० तिबारी] वह घर या कोठरी जिस में तीन द्वार हों ।

तिबारी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] तीन द्वारवाला घर या कोठरी । उ०— वह मचलती हुई विसात के बाहर तिबारी में चली आई । पाँसे हाथ में लिए अकबर उसकी और देखने लगे ।— इंद्र०, पृ० ३६ ।

तिवासी
वि० [हिं० तीन + वासी] तीन दिन का बासी (खाद्य पदार्थ) ।

तिबिक्रम पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'त्रिविक्रम' (१) । उ०— तरेई तीर तिबिक्रम, ताकि दया करि दै विदिसा अनिमेखी ।— घनानंद, पृ० १४८ ।

तिबी
संज्ञा स्त्री० [देश०] खेसारी ।

तिब्ब
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. यूनानी चिकित्सा शास्त्र । हकीमी । २. चिकित्सा शास्त्र [को०] । यौ०— तिब्बे कदीम = प्राचीन चिकित्सापद्धति । तिब्बे जदीद = नवीन चिकित्सापद्धति या पाश्चात्य चिकित्सापद्धति ।

तिब्बत
संज्ञा पुं० [सं० त्रि + भोट] एक देश जो हिमालय पर्वत के उत्तर पड़ता है । वेशेष— इस देश को हिंदुस्तान में भोल करते हैं । इसके तीन विभाग माने जाते हैं । छोटा तिब्बत, बड़ा तिब्बत और खास तिब्बत । तिब्बत बहुत ठंढ़ा देश है, इससे वहाँ पेड़ पौधे बहुत कम उगते हैं । यहाँ के निवासी तातारियों के मिलते जुलते होते हैं और अधिकरतर ऊच के कंबल, कपडें आदि बुनकर अपना निर्वाह करते हैं । देश कस्तूरी और चँवर के लिये प्रसिद्ध है । सुरा पाय और कस्तूरी मृग यहाँ बहुत पाए जाते हैं । तिब्बत के रहनेवाले सब महायान शाखा के बौद्ध हैं । बौद्धों के अनेक मठ और महंत हैं । कैलास पर्वत और मान- सरोवर झील तिब्बत ही में हैं । ये हिंतू और बौद्ध दोनों के तीर्थ-स्थान हैं । कुछ लोग 'तिब्बत' को त्रिविष्टप् का अपभ्रंश वतलाते हैं । स्वतंत्र भारत ने इसे चीन को दे दिया और यह देश अब पूर्णतः चीनी शासन में है और वहाँ के प्रमुख दलाई लामा भारत में निवास करते हैं ।

तिब्बती (१)
वि० [हिं० तिब्बत] तिब्बत संबंधी । तिब्बत का । तिब्बत में उत्पन्न । जैसे, तिब्बती आदमी, तिब्बती भाषा ।

तिब्ती (२)
संज्ञा स्त्री० तिब्बत की भाषा ।

तिब्बती (३)
संज्ञा पुं० तिब्बत देश का रहनेवाला ।

तिब्बिया
वि० [अ० तिब्बियहू] तिब्ब संबंधी । हकीमी [को०] ।

तिभुवन पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'त्रिभुवन' । उ०— तुम तिभुवन तिहुँ काल विचार विसारद ।— तूलसी ग्रं०, पृ० ३० ।

तिमंगल पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तिमिंगिल' । उ०—आठ दिसा वित हरे उताला । ताँता जाँण तिमंगल वाला ।— रा० रू०, पृ० २१३ ।

तिमंजिला
वि० [हिं० तीन + अ० मंजिल] [वि० स्त्री० तिमंजिली] तीन खंडों का । तीन मारतिध का । जैसे, तिमंजिला मकान ।

तिम (१)
संज्ञा पुं० [हिं० डिम] नगाड़ा । डंका । दुंदुभी (डि०) ।

तिम पु
अव्य० [हिं०] दे० 'तिमि' । उ०—ता उप्पर चालुक्क बीर बंधी तिम सीमह ।— पृ० रा०, १२ । ३० ।

तिमर
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तिमिर' । उ०— बूझ बिन सूझ पर तिमर लागी ।— तुलसी० श०, पृ० १८ ।

तिमाना †
क्रि० स० [देश०] भिगोना । तर करना ।

तिमाशी
संज्ञा स्त्री० [हिं० तीन + माशा] १. तीन माशे की एकतौल । २. ४ जौ की एक तौल जो पहड़ी देशों में प्रचलित हैं ।

तिमिंगल
संज्ञा पुं० [सं० तिम्ङ्गल] १. समुद्र में रहनेवाला मत्स्य के आकार का एक बड़ा भारी जंतु जो तिमि नामक बडे़ मत्स्य को भी निगल सकता है । बड़ा भारी ह्वैल । उ०— रत्न सौच के वातायन, जिनमें आता मधु मदिर समीर । टकराती होगी अब उनमें तिमिंगलों की भीड़ अधीर ।— कामायनी, पृ०१२ ।

तिमिंगलाशन
संज्ञा पुं० [सं०] १. दक्षिण का एक देशविभाग जिसके अंतर्गत लंका आदि हैं और जहाँ के निवासी तिमिंगल मत्स्य का माँस खाते हैं (बृहसंहिता) । २. उक्त देश का निवासी ।

तिमिंगिल
संज्ञा पुं० [सं० तिमिङ्गिल] दे० 'तिमिंगल' [को०] ।

तिमि (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. समुद्र में रहनेवाला मछली के आकार का एक बड़ा भारी जंतु । विशेष—लोगों का अनुमान है कि यह जंतु ह्वेल है । २. समुद्र । ३. आँख का एक रोग जिसमें रात को सुझाई नहीं पड़ता । रतौंधी । ४. मछली (को०) ।

तिमि पु (२)
अव्य० [सं० तद् + इव = इमि] उस प्रकार । वैसे । उ०— तिमि तिमि मारवणीतणइ तन तरण पउ थाइ । ढोला०, दू० १२ । विशेष— इसका व्यवहार 'जिमि' के साथ होता है ।

तिमिकोश
संज्ञा पुं० [सं०] समुद्र ।

तिमिघाती
संज्ञा पुं० [सं० तिमिघातिन्] मछेरा । मछुआ [को०] ।

तिमिज
संज्ञा पुं० [सं०] मोती [को०] ।

तिमित (१)
वि० [सं०] १. निश्चल । अचल । स्थिर । २. क्लिन्न । भीगा । आर्द । ३. शांत । धीर (को०) ।

तिमित पु (२)
वि० [सं० तम] काला । उ०— नयन सोरज दुहू बह नीर । काजर पखरि पखरि पर चीर । तेहिं तिमित भेज उरज सुबेस ।— विद्यापति, पृ० ३७३ ।

तिमिधार
संज्ञा पुं० [सं० तम + धार] अंधकार । अँधेरा । उ०— मनो कमल मुकलित ललित छयौ सधन तिमिधआ ।—सं० सप्तक, पृ० ३४५ ।

तिमिध्वज
संज्ञा पुं० [सं०] शंवर नामक दैत्य जिसे मारकर रामचंद्र ने ब्रह्मा से दिव्यास्त्र प्राप्त किया था ।

तिमिमाली
संज्ञा पुं० [सं० तिमिमालिन्] समुद्र [को०] ।

तिमिर
संज्ञा पुं० [सं०] १. अंधकरा । अँधेरा । उ०— काल गरज है तिमिर अपारा ।—कबीर सा०, पृ० २ । २. आँख का एक रोग । विशेष— इसके अनेक भेद सुश्रुत मे बतलाए हैं । आँखों से धुँधला दिखाई पड़ना चीजें रंग बिरंग की दिखाई पड़ना, रात को न दिखाई पड़ना आदि सब दोष इसी के अंतर्गत माने गए हैं । ३. एक पेड़ । (वाल्मीकि०) ।

तिमिरजा
वि० स्त्री० [सं० तिमिर + जा] अंधकार से उत्पन्न । उ०— लहराई दिग्भ्रांति तिमिरजा स्रोतस्विनी कराली ।— अपलक, पृ० ५१ ।

तिमिरजाल
संज्ञा पुं० [सं० तिमिर + जाल] अंधकारसमूह । घना अंधकार । उ०— गत स्वप्न निशा का तिमिरजाल नव किरणों से घो लो ।— अपरा, पृ० १९ ।

तिमिरनुद् (१)
वि० [सं०] अंधकार का नाश करनेवाला ।

तिमिरनुद् (२)
संज्ञा पुं० सूर्य ।

तिमिरभिद् (१)
वि० [सं०] अंधकार को भेदने या नाश करनेवाला ।

तिमिरभिद् (२)
संज्ञा पुं० सूर्य ।

तिमिरमय (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. राहु । २. ग्रहण [को०] ।

तिमिरमय (२)
वि० अंधकरायुक्त [को०] ।

तिमिररिपु
सज्ञा पुं० [सं०] सूर्य । भास्कर ।

तिमिरार पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तिमिरारि' । उ०— होइ मधुकर जोगी रस लेई । होइ तिमिरार जोत तोहि देई ।— इंद्रा०, पृ० ७६ ।

तिमिरारि
संज्ञा पुं० [सं०] १. अंधकार का शत्रु । २. सूर्य ।

तिमिरारी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० तिमिराली] अंधकार का समूह । अँधेरा । उ०— मधुप से नैन वर बंधुबल ऐस होठ श्री फल से कुच कच बेलि तिमिरारी सी ।— देव (शब्द०) ।

तिमिरावलि
संज्ञा स्त्री० [सं०] अंधकार का समूह । उ०— तिमि- रावलि साँवरे दंतन के हित मैन धरे मनो दीपक ह्वै ।— सुंदरीसर्वस्व (शब्द०) ।

तिमिर पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तिमिर' । उ०— जथ गुरु तेज प्रचंड तेमिरि पाखंड विहंडन ।— नट०, पृ० ९ ।

तिमिरी
संज्ञा पुं० [सं० तिमिरिन्] एक कोड़ा [को०] ।

तिमिला
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक वाद्य यंत्र [को०] ।

तिमिष
संज्ञा पुं० [सं०] १. ककड़ी । फूठ । २. पेठा । सफेद कुम्हड़ा । ३. तरबूज ।

तिमी
संज्ञा पुं० [सं०] १. तिमि मत्स्य । २. वक्ष की एक कन्या जो कश्यप की स्त्री और तिमिंगलों की माता थी ।

तिमीर
संज्ञा पुं० [सं०] एक पेड़ का नाम ।

तिमुहानी
संज्ञा स्त्री० [हिं० तीन + फा़० मुहाना] १. वह स्थान जहाँ तीन और जाने को तीन फाटक या मार्ग हों । तिर- मुहानी । उ०— त्रिविध त्रास त्रासक तिमुहानी । राम सरूप सिंधु समुहानी ।— मानस, १ । ४० । २. वह स्थान जहाँ तीन ओर से तीन नदियाँ आकर मिली हों ।

तिम्मगत पु
वि० [?] १. अस्तमित । २. प्रखर गतिवाला । उ०— भर विभ्भर स्रग मग हय गहय । राहिय तिम्गत जुद्ध इछ ।— पृ० रा०, ७ । १८१ ।

तिय पु
संज्ञा स्त्री० [सं० स्त्री] १. स्त्री । औरत । उ०— कै ब्रज तिय गन बदनकमल की झलकत झाई ।— भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ४५५ । २. पत्नी । भार्या । जोरू ।

तियतरा †
वि० [सं० त्रि + अन्तर] [स्त्री० तियतरी] वह बेटा जे तीन बेटियों के बाद पैदा हो । तेतर ।

तियरासि
वि० [हिं० तिय + राशि] कन्या राशि । उ०— ससि मीन तीस कटि एक अंस । तियरासि कह्यौ सुभानुसतंस ।— ह० रासो, पृ० २२ ।

तियला
संज्ञा पुं० [सिं० तिय + ला (प्रत्य०)] स्त्रियों का एक पहनावा । उ०—ब्राह्मणियों को इच्छा भोजन करवाय सुथेर तियले पहराय....दक्षिणा दी ।— लल्लू० (शब्द०) ।

तियलिंग पु
संज्ञा पुं० [हिं० तिय + लिंग] दे० 'स्त्रीलिंग' । उ०— धारादिक तियालिंग ए, कवि भाषा के माँहि ।— पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ५३२ ।

तिया (१)
संज्ञा पुं० [सं० त्रि] १. गंजीफे या ताश का वह पत्ता जिस— पर तीन बूटियाँ होती हैं । तिक्की । तिड़ी । २. नक्कीपूर के खेल में वह दाँव जो पूरे पूरे गंडों के गिनने के बाद तीन कौड़ियाँ बचने पर होता है ।

तिया पु (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तिय' । उ०— पुनि चौपर खेलौं कै हिया । जो तिर हेल रहै सो तिया ।— जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० ३३२ ।

तियाग पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'त्याग' । उ०— तीखो खाग तियाग, जिहल बैढ़ो जनमियो ।— बाँकी०, भा० ३, पृ० १२ ।

तियागना पु
क्रि० स० [सं० त्याग + ना (प्रत्य०)] त्याग करना । छोड़ना । उ०— मात पिता सब कुटुँब तियागे, सुरत पिया पर लावे ।— कबीर श०, भा० १, पृ० १०३ ।

तियागी पु †
वि० [सं० त्यागी] त्याग करनेवाला । छोड़नेवाला । उ०— बलि विक्रम दानी बड़ कहे । हातिम करन तियागी अहै ।— जायसी (शब्द०) ।

तिरंग
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तिरंगा' । उ०— फहर तिरंग चक्रदल प्रतिपल । हरता जन मन भय संशय, जय जय है ! —युगपथ, पृ० ८६ ।

तिरंगा
संज्ञा पुं० [हिं० तीत + रंग] तीन रंगोंवाला राष्ट्रीय ध्वज । उ०— आज तिरंगे से रे अँबर रंग तरंगित ।—युगपथ, पृ० ९१ ।

तिरंगा (२)
वि० तीन रंगवाला । तीन रंगों का ।

तिरकट
संज्ञा पुं० [?] आगे का पाल । अगला पाल (लश०) ।

तिरकट गावा सवाई
संज्ञा पुं० [?] आगे का और सबसे उपरी सिरे पर का पाल (लश०) ।

तिरकट गावी
संज्ञा पुं० [?] सिरे पर का पाल । (लश०) ।

तिरकट डोल
संज्ञा पुं० [?] आगे का मस्तूल (लश०) ।

तिरकट तवर
संज्ञा पुं० [?] वह छोटा चौकोद आगे का पाल जो सबसे बडे़ मस्तूल के ऊपर आगे की घोर लगाया जाता है । इसका व्यवहार बहुत धीमी हवा चलने के समय होता है (लश०) ।

तिरकट सवर
संज्ञा पुं० [?] सबसे ऊपर का पाल (लश०) ।

तिरकट सवाई
संज्ञा पुं० [?] आगे का वह पाल जो उस रस्से में बँधा रहता है जो मस्तूल के सहारे के लिये लगाया जाता है (लश०) ।

तिरकना †
क्रि० अ० [अनु०] तड़कना । चटखना । फट जाना ।

तिरकस †
वि० [उ० तिरस्] टेढ़ा ।

तिरकाना
क्रि० स० [अनुध्व०] १. ढीला छोड़ना —(लश०) । २. रस्सी ढीली करना । लहासी छोड़ना (लश०) ।

तिरकुटा
संज्ञा पुं० [सं० त्रिकटु] सोंठ, मिर्च, पीपल इन तीन कडुई ओषधियों का समूह ।

तिरकुटी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'त्रिकुटी' । उ०— झिलिमिलि झलकै नूर तिरकुटी महल में ।— पलटू०, पृ० ९४ ।

तिरकोन पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'त्रिकोण' । उ०— त्रिगुन रूप तिरकोन यंत्र बनि मध्य बिंदु शिवदानी ।— प्रेमघन०, भा० २, पृ० ३४९ ।

तिरखा पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० तृषा] दे० 'तृषा' ।

तिरखित पु
वि० [सं० तृषित] दे० तृषित ।

तिनखूँटा
वि० [सं० त्रि + हिं० खूँट] [वि० स्त्री० तिरखूँटी] जिसमें तीन खूँट या कोने हों । तिकोना ।

तिरगुण पु
वि० [हिं०] दे० 'त्रिगुण' । उ०—नौ गुम सुत संयोग बखानूं तिरगुण गाँठ दवानी ।— कबीर ग्रं०, पृ० १७५ ।

तिरच्छ
संज्ञा पुं० [सं०] तिनिस वृक्ष ।

तिरछई †
संज्ञा स्त्री० [हिं० तिरछा] तिरछापन ।

तिरछ उड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० तिरछा + उड़ना] मालखंभ की एक कसरत जिसमें खेलाड़ी के शरीर का कोई भाग जमीन पर नहीं लगता, एक कंधा झुकाकर और एक पाँव उठाकर वह शरीर को चक्कर देता है । इसे छलाँग भी कहते हैं ।

तिरछन पु
वि० [हिं०] दे० 'तिरछा' । उ०— हँस उबारं भौ भ्रम टारं तरनी तिरछन सो धारिए ।— सं० दरिया०, पृ० १० ।

तिरछा
वि० [सं० तिर्यक् या तिरस्] [स्त्री० तिरछी] १. जो अपने आधार पर समकोण बनाता हुआ न गया हो । जो न बिलकुल खड़ा हो और न बिलकुल आड़ा हो । जो न ठीक ऊपर की ओर गाय हो और न ठीक बगल की ओर । जो ठीक सामने की ओर न जाकर इधर उधर हटकर गया हो । जैसे, तिरछी लकीर । विशेष— 'टेढ़ा' और 'तिरछा' में अंतर है । टेढ़ा वह है जो अपने लक्ष्य पर सीधा न गया हो, इधर उधर मुड़ता या घूमता हुआ गया हो । पर तिरछा वह है जो सीधा तो गया हो, पर जिसका लक्ष्य ठीक सामने, ठीक ऊपर या ठीक बगल में न हो । (टेढ़ी रेखा ~; तिरछी रेखा/) । यौ०— बाँका तिरछा = छवीला । जैसे, बाँका तिरछा जवान । मुहा०—तिरछी टोपी = बगल में कुछै झुकाकर सिर पर रखी टोपी । तिरछी चितवन = बिना सिर फेरे हुए बगल की ओर दृष्टि ।विशेष— जब लोगों की दृष्टि बचाकर किसी ओर ताकना होता है, तब लोग, विशेषतः प्रेमी लोग, इस प्रकार की दृष्टि से देखते हैं । तिछी नजर = दे० 'तिरछी चितवन' । उ०— हुए एक आन में जख्मी हजारों । जिधर उस यार ने तिरछी नजर की ।— कविता कौ०, भा० ४, पृ० २९ । तिरछी बात या तिरछा वचन = कटु वाक्य । अप्रिय शब्द । उ०— हरि उदास सुनि तिरीछे ।— सबल (शब्द०) । २. एक प्रकार का रेशमी कपड़ा जो प्रायः अस्तर के काम में आता है ।

तिरछाई †
संज्ञा स्त्री० [हिं० तिरछा + ई (प्रत्य०)] तिरछापन ।

तिरछाना
क्रि० अ० [हिं० तिरछा] तिरछा होना ।

तिरछापन
संज्ञा पुं० [हिं० तिरछा + पन (प्रत्य०)] तिरछा होने का भाव ।

तिरछी (१)
वि० स्त्री० [हिं० तिरछा] दे० 'तिरछा' ।

तिरछी (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] अरहर के वे अपरिपक्व दाने जिनकी दाल नहीं बन सकती । इनको अलगाने के बाद चूनी बनाकर रोटी बनाते हैं या जानवरों को खिला देते हैं ।

तिरछी बैठक
संज्ञा स्त्री० [हिं० तिरछी + बैठक] मालखंभ की एक कसरत जिसमें दोनों पैर रस्सी की ऐंठन की तरह परस्पर गुथकर ऊपर उठते हैं ।

तिरछे
क्रि० वि० [हिं० तिरछा] तिरछेपन के साथ । तिरछापन लिए हुए ।

तिरछौहाँ
वि० [हिं० तिरछा + औहाँ (प्रत्य०)] [वि० त्रि० तिरछौंही] कुछ तिरछा । जो कुछ तिरछापन लिए हो । जैसे, तिरछौहीं डीठ ।

तिरछौहैँ पु
क्रि० वि० [हिं० तिरछौहाँ] तिरछापन लिए हुए । तिरछेपन के साथ । वक्रता से । जैसे, तिरछौहैं ताकना ।

तिरणिका पु
संज्ञा पुं० [सं० तृण] दे० 'तिनका' । उ०— तिरणिका ओट सिष्ट का करता जुग देषि लुकाना ।— रामानंद०, पृ० १६ ।

तिरतालीस †
वि० [हिं०] दे० 'तैंतालीस' ।

तिरतिराना †
क्रि० अ० [अनु०] बूँद बूँद करके टपकना ।

तिरथ पु
संज्ञा पुं० [सं० तीर्थ] दे० 'तीर्थ' । उ०— पहली भँवरिया बैद पढै़ मुनि ज्ञानी हो । दुसरि भँवरिया तिरथ, जाको निरमल पानी हो ।—कबीर श०, भा० ४, पृ० ४ ।

तिरदंडी पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'त्रिदडी—१' । उ०— नेम अचार करै कोउ कितनौ, कवि कोबिद सब खुक्ख । तिरदंडी सरबंगी नागा, मरै पियास औ भुक्ख ।— पलटू०, भा० ३, पृ० ११ ।

तिरदश पु
संज्ञा पुं० [सं० त्रिदश] दे० 'त्रिदश'—१ । उ०—ताकी कन्या रूक्मिनी मोहे तिरदशे ।— अकबरी०, पृ० ३३४ ।

तिरदेव पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'त्रिदेव' । उ०— निराकार यम तहाँ न जाई । तिरदेवन की कौन चलाई ।— कबीर सा०, पृ० ४१२ ।

तिरन पु
संज्ञा पुं० [हिं० तिरना] तैरने की क्रिया या भाव । उ०— बूडबै कै डर तें तिरन कौ उपाइ करै ।— सुंदर० ग्रं०, भा० २, पृ० ६५५ ।

तिरना
क्रि० अ० [सं० तरण] १. पानी के ऊपर आना या ठहरना । पानी में न डूबकर सतह के ऊपर रहना । उतराना । उ०— जल तिरिया पाहण सुजड़, पतसिय नाम प्रताप ।— रघु० रू०, पृ० २ । २. तैरना । पैरना । ३. पार होना । ४. तरना । मुक्त होना । संयो० क्रि० —जाना ।

तरनी
संज्ञा स्त्री० [देश० या हिं० तिन्नी] १. वह डोरी जिससे घांघरा या धोती नाभि के पास बँधी रहती है । नीवी । तिन्नी । फुबती । २. स्त्रियों के घाघरे या धोती का वह भाग जो नाभि के नीचे पड़ता है । उ०— बेनी सुभग नितंबति डोलत मंदगामिनी नारी । सूथन जघन बाँधि नाराबँद तिरनी पर छबी भारी ।— सूर (शब्द०) ।

तिरप
संज्ञा स्त्री० [सं० त्रि] नृत्य में एक प्रकार का ताल जिसे त्रिसम या तिहाई कहते हैं । उ०— तिरप लेति चपला सी चमकति झमकति भूषण अंग । या छबि पर उपमा कहुँ नाहीं निरषत बिबस अनंग ।—सूर (शब्द०) । क्रि० प्र० —लेना ।

तिरपट †
वि० [देश०] १. तिरछा । टेढ़ा । टिड़बिड़ंगा । २. मुश्किल । कठिन । विकट ।

तिरपटा
वि० [देश०] तिरछा ताकनेवाला । भेंगा । ऐंचाताना ।

तिरपत पु
वि० [हिं०] दे० 'तृप्त' । उ०— दरिया पीवै मीत कर, सो तिरपत हो जाय ।— दरिया० बानी, पृ० ३१ ।

तिरपति पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तृप्ति'—१ । उ०— पायो पानी बुंद चोंच ते तिरपति प्यास न जाई ।— जग० श०, पृ० ९६ ।

तिरपन (१)
वि० [सं० त्रिपञ्चाशत्, प्रा० तिपण्ण] जो गिनती में पचास से तीन और अधिक हो । पचास से तीन ऊपर ।

तिरपन (२)
संज्ञा पुं० १. पचास से तीन अधिक की संख्या का सूचक अंक जो इस प्रकार लिखा जाता है,— ५३ ।

तिरपाई
संज्ञा स्त्री० [सं० त्रिपाद या त्रि + पदी] तीन पायों की ऊँची चौकी । स्टूल ।

तिरपाल
संज्ञा पुं० [सं० तृण + हिं० पालन (= बिछाना)] फूस या सरकंडों के लंबे पूले जो छाजन में खपडों के नीचे दिए जाते हैं । मुठ्ठा ।

तिरपाल (२)
संज्ञा पुं० [अं० टारपालिन] रेगन चढ़ा हुआ कनवस । राल चढ़ाया हुआ टाट ।

तिरपुत पु †
वि० [सं० तृप्त] दे० 'तृप्त' ।

तिरपुटी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० त्रिपुटी] दे० 'त्रिकुटी' । उ०— तिरपुटिय भाल शिल कमल मूर । इह भाँति ताव तप तपनि जूर ।— पृ० रा०, १ । ४८९ ।

तरिपौलिया
संज्ञा पुं० [सं० त्रि० + हिं० पोल (= फाटक)] वह स्थानजहाँ बराबर से ऐसे तीन बडे़ फाटक हों जिनसे होकर हाथी, घोडे़, ऊँट इत्यादि सवारियाँ अच्छी तरह निकल सके । विशेष— ऐसे फाटक किलों या महलों के सामने या बडे़ बाजारों के बीच होते हैं ।

तिरफला
संज्ञा पुं० [सं० त्रिफला] दे० 'त्रिफला' ।

तिरबेनी
संज्ञा स्त्री० [सं० त्रिवेणी] दे० 'त्रिवेणी' ।

तिरबो (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० तिरना] सिंध देश की एक प्रकार की नाव का नाम ।

तिरबो पु † (२)
संज्ञा पुं० [हिं० तरना] तिरने की क्रिया । मुक्ति- प्राप्ति । मोक्ष । उ०— जपैं समुझ नित जाय, सागरभव तिरबो सहल ।— रघु० रू०, पृ० २ ।

तिरभंगी पु
वि० [हिं०] दे० 'त्रिभंगी' । उ०— का चहुआना कित्ति कंत धीरज तिरभंगी ।— पृ० रा०, १ । ७६७ ।

तिरमिरा
संज्ञा पुं० [सं० तिमिर] १. दुर्बलता के कारण दृष्टि का एक दोष जिसमें आँखें प्रकाश के सामने नहीं ठहरतीं और ताकने में कभी अँधेरा, कभी अनेक प्रकार के रंग, और कभी छिटकती हुई चिनगारियाँ या तारे से दिखाई पड़ते हैं । २. कमजोरी से ताकने में जो तारे से छिटकते दिखाई पड़ते हैं, उन्हें भी तरमिरे कहते हैं । ३. तीक्ष्ण प्रकाश या गहरी चमक के मामने दृष्टि की अस्थिरता । तेज रोशनी में नजर का न ठहरना । चकाचौध । क्रि० प्र० —लगना ।

तिरमिरा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० तेल + मिलना] घी, तेल या चिकनाई के छींटे जो पानी, दूध या और किसी द्रव पदार्थ (जैसे, दाल, रसा आदि) के ऊपर तैरते दिखाई देते हैं ।

तिरमिराना
क्रि० अ० [हिं० तिरमिरा] (दृष्टि का) प्रकाश के सामने न ठहरना । तेज रोशनी या चमक के सामने (आँखों का) झपना । चौंधना । चौंधियाना ।

तिरमुहानी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तिमुहानी' ।

तिरलोक
संज्ञा पुं० [सं० त्रिलोक] दे० 'त्रिलोक' । उ०— सकल तिरलोक लौं गावैं ।— घट०, पृ० ३६९ ।

तिरलोकी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० तिरलोक] दे० 'त्रिलोकी' ।

तिरवट
संज्ञा [देश०] एक प्रकार का राग जो तराने या तिल्लाने का एक भेद है ।

तिरवर पु
वि० [हिं० तिरवराना] झिलमिल । चकाचौंध उत्पन्न करनेवाला । उ०— दादू जोति चसकै तिरवरै ।— दादू०, पृ० २४० ।

तिरवराना †
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'तिरमिराना' ।

तिरवा
संज्ञा पुं० [फा़०] उतनी दूरी जहाँ तक एक तीर जा सके ।

तिरवाह †
संज्ञा पुं० [सं० तीर + वाह] नदी के तीर की भूमि ।

तिरवाह (२)
क्रि० वि० किनारे किनारे । तट से

तिरश्चीन
वि० [सं०] १. तिरछा । २. टेढ़ा । कुटिल ।

तिरश्चीन गति
संज्ञा पुं० [सं०] मल्लयुद्ध की एक गति । कुश्ती का एक पैतरा ।

तिरसंकु पु
संज्ञा पुं० [सं० त्रिशङ्कु] दे० 'त्रिशंकु' । उ०— तिरसंगू गेहूँ लहू, दाऊ सम ए जाँन ।— पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ५३४ ।

तिरस्
अ० [सं०] अंतर्धान, तिरस्कार, आच्छादन, तिरछापन आदि अर्थों का बोधक शब्द [को०] ।

तिरसठ (१)
वि० [सं० त्रिषष्ठि, प्रा० तिसठ्ठि] जो गिनती में साठ में तीन अधिक हो । साठ से तीन ऊपर । उ०— तिरसठ प्रकार की राग रागिनी छेड़ी ।— कबीर ग्रं०, पृ० ४३ ।

तिरसठ (२)
संज्ञा पुं० १. वह संख्या जो साठ से तीन अधिक हो । २. उक्त संख्या को सूचित करनेवाला अंक जो इस प्रकार लिखा जाता है—६३ ।

तिरसना †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तृष्णा' । उ०— तिरसना के बस में पड़कर आदमी इसी तरह अपनी जिंदगी चौपट करता है ।— गोदान, पृ० २८५ ।

तिरसा
संज्ञा पुं० [सं० त्रि + हिं० रस?] वह पाल जिसका एक सिरा चौड़ा और एक सँकरा होता है (लश०) ।

तिरसूत पु
संज्ञा पुं० [सं० त्रिसूत्र] तीन तागों का यज्ञोपवीत । यज्ञोपवीत । उ०— ताके परछों पाँय ब्रह्म अपने को पावै । भर्म जनेऊ तोरि प्रेम तिरसूत बनावै ।—पलटू०, भा० १, पृ० ११३ ।

तिरसूल †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'त्रिशूल' । उ०— जो तोको काँटा बुबै, ताहि बोव तू फूल । तोहि फूल को फूल है, वाको है तिरसूल ।— संतवाणी०, पृ० ४४ ।

तिरसूली पु
संज्ञा पुं० [हिं० तिरसूल] दे० 'त्रिशूली' । उ०— महा मोहनी मय माया मोहे तिरसूली ।— नंद०, ग्रं०, पृ० ३८ ।

तिरस्कर
संज्ञा पुं० [सं०] आच्छादक । परदा करनेवाला । ढाँकनेवाला ।

तिरस्करिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १ ओठ । आड़ । परदा । कनात । चिक । ३. वह विद्या जिसके द्वारा मनुष्य अदृश्य हो सकता है ।

तिरस्करी
संज्ञा पुं० [सं० तिरस्करिन्] [स्त्री० तिरस्करिणी] आच्छा- दन । परदा ।

तिरस्कार
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० तिरस्कृत] १. अनादर । अपमान । २. भर्त्सना । फटकार । ३. अनादरपूर्वक त्याग । ४. साहित्य के अंतर्गत एक अर्थालंकार जिसमें गुणान्वित वस्तु में दुर्गुण दिखाकर उसका तिरस्कार किया जाता है । क्रि० प्र० — करना ।—होना ।

तिरस्कार्य
वि० [सं०] तिरस्कार योग्य । तिरस्कृत होने लायक ।

तिरस्कृत
वि० [सं०] १. जिसका तिरस्कार किया गया हो । अनादृत । २. अनादरपूर्वक त्याग किया हुआ । ३. आच्छादित्त । परदे में छिपा हुआ । ४. तंत्र के अनुसार (वह मंत्र) जिसके मध्य में दकार हो और मस्तक पर दो कवच और अस्त्र हों ।

तिरस्क्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. तिरस्कार । आनादर । २. आच्छा- दन । ३. वस्त्र । पहरावा ।

तिरहा †
संज्ञा पुं० [देश०] एक फतिंगा जो धान के फूल को नष्ट कर देना है ।

तिरहुत
संज्ञा पुं० [सं० तीरभुक्ति] [वि० तिरहुतिया] मिथिला प्रदेशजिसके अंतर्गत आजकल बिहार के दो जिले हैं— मुज- फ्फरपुर और दरभंगा । उ०— तिरहुत देस धनौती गाँई ।— घट पृ० ३५१ ।

तिरहुति
संज्ञा स्त्री० [सं० तीरभुक्ति] १. एक प्रकार का गीत जो तिरहूत में गाया जाता है । २. दे० 'तिरहुत' । यौ०— तिरहुतिनाथ = राजा जनक । उ०— देखे सुने भूपति अनेक झूठें झूठें नाम, साँचे तिरहुतिनाथ साखि देति मही है ।— तुसी ग्रं०, पृ० ३१४ ।

तिरहुतिया (१)
वि० [हिं० तिरहुत] तिरहुत का । तिरहुत संबंधी ।

तिरहुतिया (२)
संज्ञा पुं० तिरहुत का रहनेवाला ।

तिरहुतिया (३)
संज्ञा स्त्री० तिरहुत की बोली ।

तिरहुती
वि०, संज्ञा पुं०, स्त्री० [हिं०] दे० 'तिरहुतिया' ।

तिरहेल
वि० [सं० त्रि] क्रम में तीसरा । जो तीसरे स्थान पर हो ।

तिरा
संज्ञा पुं० [देश०] एक पौधा जिसके बीजों से तेल निकलता है । एक तेलहन । तिउरा ।

तिराटी
संज्ञा स्त्री० [सं०] निसोत ।

तिरानबे (१)
वि० [सं० त्रिनवति, प्रा० तिन्नवइ] जो गिनती में नब्बे से तीन अधिक हो । तीन ऊपर नब्बे ।

तिरानबे (२)
संज्ञा पुं० १. नब्बे से तीन अधिक की संख्या । २. उक्त संख्यासूचक अंक जो इस प्रकार लिखा जाता है— ९३ ।

तिराना (१)
क्रि० स० [हिं० तिरना] १. पानी के ऊपर ठहराना । २. पानी के ऊपर चलाना । तैराना । ३. पार करना । ४. उबारना । तारना । निस्तार करना ।

तिराना पु (२)
क्रि० स० [हिं० तिरना] पानी के ऊपर रहना । उतराना । — उ०— पानी पत्थर आज तिराना ।— घट०, पृ० २३३ ।

तिराना (३)
क्रि० अ० [सं० तीर से नामिक धातु] तीर पर या किनारे आ जाना ।

तिरावण पु
संज्ञा पुं० [हिं० तिरना] तिरने की क्रिया या भाव । उ०— सौ धीदाता पलक मैं तिरै, तिरावण जोग ।— दादू०, पृ० ९ ।

तिरास
संज्ञा पुं० [सं० त्रास] दे० 'त्रास' । उ०— कई बार आगे गए छप्पन जहाँ तिरास ।— सहजो० बानी०, पृ० ३३ ।

तिरासना † (१)
क्रि० स० [सं० त्रासन] त्रास दिखाना । डराना । भयभीत करना ।

तिरासना † (२)
क्रि० अ० [सं० तृषित] प्यासा होना । प्यास लगना ।

तिरासी (१)
वि० [सं० त्र्यशीति, प्रा० तियासीति] जो गिनती में अस्सी से तीन अधिक हो । तीन ऊपर अस्सी ।

तिरासी (२)
संज्ञा पुं० १. अस्सी से तीन अधिक की संख्या । २. उक्त संख्यासूचक अंक जो इस प्रकार लिखा जाता है ।— ८३ ।

तिराहा
संज्ञा पुं० [हिं० ती सं० < त्रि + फा़० राह] वह स्थान जहाँ से तीन रास्ते तीन ओर को गए हों । तिरमुहानी ।

तिराही
संज्ञा स्त्री० [हिं० तिराह] तिराह नामक स्थान की बनी कटारी या तलवार ।

तिरि पु
वि० [सं० त्रि] तीन । उ०— पुनि तिहि ठाउँ परि तिरि रेखा ।— जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० १९४ ।

तिरिआ पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तिरिआ' ।

तिरिगत्त पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'त्रिगर्त' । उ०— तिरिगत्त राज तामस बुझ्यौ दिषिय पंग संजोगि मुष ।— पृ० रा०, ६१ । २४५८ ।

तिरिजिह्वक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का पेड ।

तिरिन †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तृण' ।

तिरिम
संज्ञा पुं० [सं०] शालिभेद । एक प्रकार का धान ।

तिरय पु (१)
वि० [सं० तिर्य्यक्] वक्र । कुटिल । उ०— तिरिय वक्र अधचक्र न ऊरध वक्र प्रमान ।— पृ० रा०, ७ । १७० ।

तिरय † (२)
संज्ञा पुं० [सं०] शालिभेद । एक प्रकार का धान ।

तिरिया (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० स्त्री] स्त्री । औरत । उ०— तुम तिरिया मति हीन तुम्हारी ।— जायसी (शब्द०) । यौ०—तिरिया चरित्तर = स्त्रियों का रहस्य या कौशल ।

तिरिया (२)
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का बाँस जो नेपाल में होता है । इसे औला भी कहते हैं ।

तिरिविष्टप पु
संज्ञा पु० [सं० त्रिविष्टप] दे० 'त्रिविष्टप' । उ०— स्वर्ग, नाक, स्वर, द्यौ, त्रिवृदिवि, दिव, तिरिवष्टप होइ ।— नंद० ग्रं०, पृ० १०८ ।

तिरिसना पु
संज्ञा स्त्री० [ईं०] दे० 'तृष्णा' । उ०— लोभ मोह हंकार तिरिसना, संग लीन्हे कोर ।—कबीर श०, भा० ३, पृ० ३१ ।

तिरीछन पु †
वि० [सं० तीक्ष्ण] दे० तीक्ष्ण । उ०— रीषी ध्यान छोरि के ताका । नैन तिरीछन भहुँ अति बाँका ।—सं० दरिया, पृ० ३ ।

तिरीछा पु †
वि० [हिं०] 'तिरछा' ।

तिरीछो पु
वि० [हि०] दे० 'तिरछा' । उ०— आपुन इनके अंतर बरयौ । ऊखल तनक तिरीछो करयौ ।— नंद० ग्रं०, पृ० २५४ ।

तिरीट
संज्ञा पुं० [सं०] १. लोध्र । लौध । २. किरीट ।

तिरीफल
संज्ञा पुं० [सं० स्त्रीफल] दंती वृक्ष ।

तिरीबिरी
वि० [हिं०] दे० 'तिड़ीबिड़ी' ।

तिरेँदा
संज्ञा पुं० [सं० तरण्ड] १. समुद्र में तैरता हुआ पीपा जो संकेत के लिये किसी ऐसे स्थान पर रखा जाता हैं जहाँ पानी छिछला होता है, चट्ठानें होती हैं, या इसी प्रकार की और कोई बाधा होती है । विशेष— ये पीपे कई आकार प्रकार के होते हैं । किसी किसी के ऊपर घंटा या सीटी लगी रहती है । २. मछली मारने की बंसी में कँटिया से हाथ डेढ़ हाथ ऊपर बँधी हुई पाँच छह अंगुल की लकड़ी जो पानी पर तैरती रहती है और जिसके डूवने से मछली के फँसने का पता लगता है । तरेंदा ।

तिरै
संज्ञा पुं० [अनु०] फीलवानों का एक शब्द जिसे वे नहाते हुए हुए हाथियों को लेटाने के लिये बोलते हैं ।

तिरोजनपद
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य अर्थशास्र्त्र के अनुसार अन्य राष्ट्र का मनुष्य । विदेशी ।

तिरोधान
संज्ञा पुं० [सं०] १. अंतर्धान । अदर्शन । गोपन । २. आच्छादन । पर्दा । आवरण । परिधान (को०) ।

तिरोधायक
संज्ञा पुं० [सं०] आड़ करनेवाला । छिपानेवाला । गुप्त करनेवाला ।

तिरोभाव
संज्ञा पुं० [सं०] १. अंतर्धान । अदर्शन । २. गोपन । छिपाव ।

तिरोभूत
वि० [सं०] गुप्त । छिपा हुआ । अदृष्ट । अंतर्हित । गायब ।

तिरोहित
वि० [सं०] १. छिपा हुआ । अंतर्हित । अदृष्ट । उ०— आज तिरोहित हुआ कहाँ वह मधु से पूर्ण अनंत वसंत ?— कामायनी, पृ० १० । २. आच्छादित । ढका हुआ ।

तिरौंछा †
वि० [हिं०] दे० 'तिरछा' । उ०— कठिन बचन सुनि श्रवन जानकी सकी न बचन सहार । तृण अंतर दै दृष्टि तिरौंछी दई नैन जलधार ।— सूर (शब्द०) ।

तिरौंदा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तिरेंदा' ।

तिर्यंच (१)
वि० [सं० तिर्यञ्च] १. तिरछा । टेढ़ा । वक्र । आड़ा [को०] ।

तिर्यंच (२)
संज्ञा पुं० [स्त्री० तिर्यंची] १. पक्षी ।२. पशु । ३. जीव- जगत् या वनस्पति (जैव) ।

तिर्यंचानुपूर्वी
संज्ञा स्त्री० [सं० तिर्यञ्चानुपूर्वी] जैन शास्त्रानुसार जीव की वह गति जिसमें उसे तिर्यग्योनि में जाते हुए कुछ काल तक रहना पड़ता है ।

तिर्यंची
संज्ञा स्त्री० [सं० तिर्यञ्ची] पशु पक्षियों की मादा ।

तिर्गुन
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'त्रिगुण' । उ०—इ कहै ठगा न कोई, लिए है तिर्गुन गाँसी ।—पलटू०, भा० १, पृ० ८३ ।

तिर्देव पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'त्रिदेव' । उ०—कहैं कबीर यह ज्ञान तिर्देव का ।— कबीर रे०, पृ० ३४ ।

तिर्पित पु
वि० [हिं०] दे० 'तृप्त' । उ०— बिन मुंड के बहु करे अरि तिर्पित कियौ त्रिपुरारि है ।— पद्माकर ग्रं०, पृ० २१ ।

तिर्यक् (१)
वि० [सं०] तिरछा । आड़ा । टेढ़ा । विशेष— मनुष्य को छोड़ पशु पक्षी आदि जीव तिर्यक् कहलाते हैं क्योंकि खडे़ होने में उनके शरीर का विस्तार ऊपर की ओर नहीं रहता, आड़ा होता है । इनका खाया हुआ अन्न सीधे ऊपर से नीचे की ओर नहीं जाता, बल्कि आड़ा होकर पेट में जाता है ।

तिर्यक् (२)
क्रि० वि० वक्रतापूर्वक । टेढे़पन के साथ [को०] ।

तिर्यक् (३)
संज्ञा पुं० १. पशु । २. पक्षी [को०] ।

तिर्यक्ता
संज्ञा स्त्री० [सं०] तिरछापन । आड़ापन ।

तिर्यक्त्व
संज्ञा पुं० [सं०] तिरछापन । आड़ापन ।

तिर्यक्पाती
वि० [सं० तिर्यक्वातिन्] [वि० स्त्री० तिर्यक्पातिनी] आड़ा फैलाया या रखा हुआ । बेड़ा रखा हुआ ।

तिर्यक्प्रमाण
संज्ञा पुं० [सं०] चौड़ाई [को०] ।

तिर्यक्प्रेक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] तिरछी चितवन [को०] ।

तिर्यक्भेद
संज्ञा पुं० [सं०] दो सहारों पर टिकी हुई वस्तु का बीच में दबाव पड़ने से टूटना ।

तिर्यकस्त्रोतस्
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जिसका फैलाव आड़ा हो । २. जीव जिसके पेठ में खाया हुआ आहार आड़ा होकर जाता हो । वहजीव जिसका आहार निगलने का नल खड़ा न हो, आड़ा हो । पशु पक्षी । विशेष— पुरणों में जीव सृष्टि के उर्धस्त्रोतस्, तिर्यकस्त्रोतस् आदि कई वर्ग किए गए हैं । भागवत में तिर्यकस्त्रोतस् २८ प्रकार के माने गए हैं— (१) द्विक्षुर (दो खुरवाले)— गय, बकरी, भैंस, कृष्णसार मृग, सूअर, नीलगाय, रुरु नामक मृग । (२) एकक्षुर—गदहा, घोड़ा, खच्चर, गौरमृग, शरम, सुरा- गाय । (३) पंचनख— कुत्ता, गीदड़, भेड़िया, बाघ, बिल्ली, खरहा, सिंह, बंदर, हाथी, कछुवा, मेढक इत्यादि ।(४) जल- चर— मछली । (५) खेचर— गीध, बगला, मोर, हंस, कौवा आदि पक्षी । ये सब जीव ज्ञानशून्य और तमोगुणविशिष्ट कहे गए हैं । इनके अंतःकरण में किसी प्रकार का ज्ञान नहीं बत- लाया गया है ।

तिर्यगयन
संज्ञा पुं० [सं० तिर्यक् + अयन] सूर्य की वार्षिक परिक्रमा [को०] ।

तिर्यगीक्ष
वि० [सं०] तिरछा देखनेवाला [को०] ।

तिर्यगीश
संज्ञा पुं० [सं०] श्रीकृष्ण [को०] ।

तिर्यग्गति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. तिरछी या टेढ़ी चाल । २. कर्मवश पशु योनि की प्राप्ति ।

तिर्यग्गामी (१)
संज्ञा पुं० [सं० तिर्यग्गामिन्] केकड़ा [को०] ।

तिर्यग्गामी (२)
वि० तिरछी या टेढ़ी चाल चलनेवाला [को०] ।

तिर्यग्दिक्
संज्ञा स्त्री० [सं०] उत्तर दिशा [को०] ।

तिर्यग्दिश
संज्ञा स्त्री० [सं०] उत्तर दिशा ।

तिर्यग्यान
संज्ञा पुं० [सं०] केकड़ा ।

तिर्यग्योनि
संज्ञा स्त्री० [सं०] पशुपक्षी आदि जीव । दे० 'तिर्यक्स्त्रोतस्' ।

तिर्यच्
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'तिर्यक्' ।

तिलंगनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० तिल + अंगिनी] एक प्रकार की मिठाई जो चीनी में तिल पागकर बनती है ।

तिलंगसा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का बलूत जो हिमालय पर नैपाल से होकर पंजाब तक होता है । अफगानिस्तान में भी यह पेड़ पाया जाता है । विशेष—इसकी लकड़ी मजबूत होती है, इमारतों में लगती है तथा हल, झप्पान का डंडा आदि बनाने के काम आती है । शिमले के आसपास के जंगलों में इसकी लकड़ी का कोयला फूँका जाता है ।

तिलंगा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० तिलंगाना, सं० तैलङ्ग] १. अंगरेजी फौज का देशी सिपाही । विशेष— पहले पहल ईस्ठ इंडिया कंपनी ने मदरास में किला बनाकर वहाँ के तिलंगियों को अपनी सैन में भरती किया था ।इससे अँगरेजी फौज के देशी सिपाही मात्र तिलंगे कहे जाने लगे । २. सिपाही । सैनिक ।

तिलंगा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० तीन + लंग] एक प्रकार का कनकौवा ।

तिलंगा (३)
संज्ञा पुं० [देश०] [स्त्री० तिलंगी] आग का बड़ा कण । बड़ी चिनगारी ।

तिलंगाना
संज्ञा पुं० [सं० तैलंग] तैलंग देश ।

तिलंगी (१)
संज्ञा पुं० [सं० तैलंग] तिलंगाने का निवासी । तैलंग । उ०— नहिं जालंधर वार बंग चंगी न तिलंगी— पृ० रा०, १२ । १३० ।

तिलंगी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० तीन + लंग] एक प्रकार की पतंग ।

तिलंगी (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं० तिलंगा] आग का छोटा कण । चिनगारी ।

तिलंजुलि
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तिलांजलि' । उ०— लोक लाज की गैल को देहु तिलंजुलि दान ।— श्यामा०, पृ० ९० ।

तिलंतुद
संज्ञा पुं० [सं० तिलन्तुद] तेली [को०] ।

तिल
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रति वर्ष बोया जानेवाला हाथ डेढ़ हाथ ऊँचा एक पौधा जिसकी खेती संसार के प्रायः सभी गरम देशों में तेल के लिये होती है । विशेष— इसकी पत्तियाँ आठ दस अंगुल तक लंबी और तीन चार अंगुल चौड़ी होती हैं । ये नीचे की ओर तो ठीक आमने सामने मिली हुई लगती हैं, पर थोड़ा ऊपर चलकर कुछ अंतर पर होती हैं । पत्तियों के किनारे सीधे नहीं होते, टेढे़ मेढे़ होते हैं । फूल गिलास के आकार के ऊपर चार दलों में विभक्त होते हैं । ये फूल सफेद रंग के होते है, केवल मुँह पर भीतर की ओर बैंगनी धब्बे दिखाई देते हैं । बीजकोश लंबोतरे होते हैं जिनमें तिल के बीज भरे रहते हैं । ये बीज चिपटे और लंबोतरे होते हैं । हिंदुस्तान में तिल दो प्रकार का होता है— सफेद और काला । तिल की दो फसलें होती हैं— कुवारी और चैती । कुवारी फसल बरसात में ज्वार, बाजरे, धान आदि के साथ अधिकतर बोंई जाती हैं । चैती फसल यदि कार्तिक में बोई जाय तो पुस माघ तक तैयार हो जाती है । उदभिद शास्त्रवेत्ताओं का अनुमान है कि तिल का आदिस्थान अफ्रिका महाद्वीप है । वहाँ आठ नौ जाति के जंगली तिल पाए जाते हैं । पर तिल शब्द का व्यवहार संस्कृत में प्राचीन है, यहाँ तक कि जब और किसी बीज से तेल नहीं निकाला गया था, तव तिल से निकाला गया । इसी कारण उसका नाम ही तैल (तिल से निकला हुआ) पड़ गया । अथर्ववेद तक में तिल और धान द्वारा तर्पण का उल्लेख है । आजकल भी पितरों के तर्पण में तिल का व्यवहार होता है । वैद्यक में तिल भारी, स्निग्ध, गरम, कफ-पित्त-कारक, बलवर्धक, केशों को हितकारी, स्तनों में दूध उत्पन्न करनेवाला, मलरोधक और वातनाशक माना जाता है । तिल का तेल यदि कुछ अधिक पिया जाय, तो रेचक होता है । पर्या— हिमधान्य । पवित्र । पितृतर्पण । पापघ्न । पूतधान्य । जटिल । बनोद्भव । स्नेहफल । तैलफल । यौ० —तिलकुट । तिलचट्टा । तिलभुग्गा । तिलशकरी । २. छोटा अंश या भाग जो तिल के परिमाण का हो । मुहा०— तिल की ओझल पहाड़ = किसी छोटी बात के भीतर बड़ी, भारी बात । तिल का ताड़ करना = किसी छोटी बात को बहुत बढ़ा देना । छोटे से मामले को बहुत बड़ा करना या दिखाना । तिल का ताड़ बनना = अतिरंजित होना । उ०— श्रद्धा के उत्साह वचन, फिर काम प्रेरणा मिल के । भ्रांत अर्थ बन आगे आए बने ताड़ थे तिल के ।— कामायनी, पृ० ११० । तिलचावले बाल = कुछ सफेद और कुछ काले बाल । खिचड़ी बाल । तिल चाटना = मुसलमानों के यहाँ विवाह में बिदाई के समय दूल्हे का दुलहिन के हाथ पर रखे हुए काले तिलों का चाटना । विशेष— यह टोटका इसलिये होता है जिसमें दूल्हा सदा अपनी स्त्री के वश में रहे । तिल तिल = थोड़ा थोड़ा । उ०— धरि स्वामि धर्म सुरंग । बढ़ि रहै तिल तिल अंग ।— ह० रासो, पृ० १२३ । तिल धरने की जगह न होना = जरा सी भी जगह खाली न रहना । पूरा स्थान छिका रहना । तिल बाँधना = सूर्यकांत शीशे से होकर आए हुए सूर्य कै प्रकाश का केंद्रीभूत होकर बिंदु के रूप में पड़ना । तिल भर = (१) जरा सा । थोड़ा सा । उ०— रहा चढ़ाउव तोरब भाई । तिल भर भूमि न सकेउ छुड़ाई ।— तुलसी (शब्द०) । † (२) क्षण भर । थोड़ी देर । (किसी के) तिलों से तेल निकालना = किसी से किसी प्रकार रुपया लेकर वही उसके काम में लगाना । ३. काले रंग का छोटा दाग जो शरीर पर होता है । उ०— चिबुक कूप रसरी अलक तिल सु चरस दृग बैल । बारी बयस गुलाब रकी सींचत मन्मथ छैल ।— रसलीन (शब्द०) । विशेष— सामुद्रिक में तिलों के स्थान भेद से अनेक प्रकार के शुभासुभ फल बतलाए जाते हैं । पुरुष के शरीर में दाहिनी ओर और स्त्री के शरीर में बाई और का तिल अच्छा माना जाता है । हथेली का तिल सौभाग्यसूचक समझा जाता है । ४. काली बिंदी के आकार का गोदना जिसे स्त्रियाँ शोभा के लिये गाल, ठुड्ढी आदि पर गोदाती हैं । ५. आँख की पुतली के बीचो बीच की गोल बिंदी जिसमें सामने पड़ी हुई वस्तु का छोटा सा प्रतिबिंब दिखाई पड़ता है ।

तिलकंठी
संज्ञा स्त्री० [सं० तिलकण्ठी] विष्णुकांची । काली कौवाठोंठी ।

तिलक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह चिह्न जिसे गीले चंदन, केसर आदि से मस्तक, बाहु आदि अंगों पर सांप्रदायिक संकेत या शेभा के लिये लगाते हैं । टीका । उ०— छापा तिलक बनाइ करि दगध्या लोक अनेक ।—कबीर ग्रं०, पृ० ४६ । विशेष— भिन्न भिन्न संप्रदायों के तिलक भिन्न भिन्न आकार के होते हैं । वैष्णव खड़ा तिलक या ऊर्ध्व पुंड्र लगाते हैं जिसके संप्रदायानुसार अनेक आकृति भेद होते हैं । शैव आड़ा तिलकया त्रिपुंड्र लगाते हैं । शाक्त लोग रक्त चंदन का आड़ा टीका लगाते हैं । वैष्णवों में तिलक का माहात्म्य बहुत अधिक है । ब्रह्मपुराण में ऊर्ध्व पुंड्र तिलक की बड़ी महिमा गाई गई है । वैष्णव लोग तिलक लगने के लिये द्वादश अंग मानते हैं— मस्तक, पेट, छाती, कंठ, (दोनों पार्श्व) दोनों काँख, दोनों बाँह, कंधा, पीठ और कटि । तिलक प्राचीन काल में शृंगार के लिये लगाया जाता था, पीछे से उपासना का चिह्न समझा जाने लगा । क्रि० प्र० — धारण करना । —धारना ।—लगाना । —सारना । २. राजसिंहासन पर प्रतिष्ठा । राज्याभिषेक । गद्दी । यौ०—राजतिलक । क्रि० प्र०—सारना = राज्य पर अभिषिक्त करना । गद्दी या राजसिंहासन की प्रतिष्ठा देना । उ०— मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा । जातहि राम तिलक तेहि सारा ।— मानस, ५ । ५४ । ३. विवाह संबंध स्थिर करने की एक रीति जिसमें कन्या पक्ष के लोग वर के माथे में दही अक्षत आदि का टीका लगाते और कुछ द्रव्य उसके साथ देते हैं । टीका । क्रि० प्र० —चढ़ना ।—चढ़ाना । मुहा०—तिलक देना = तिलक के साथ (धन) देना । जैसे,— उसने कितना तिलक दिया । तिलक भेजना = तिलक की सामग्री के साथ वर के घर तिलक चढ़ाने लोगीं को भेजना । ४. माथे पर पहनने का स्त्रियों का एक गहना । टीका । ५. शिरो- मणइ । श्रेष्ठ व्यक्ति । किसी समुदाय के बीच श्रेष्ठ या उत्तम पुरुष । विशेष— इसका समास के अंत में प्रयोग बहुधा मिलता है । जैसे, रघुकुलतिलकं । ६. पुन्नाग की जाति का एक पेड़ जिसमें छत्ते के आकार के फूल वसंत ऋतु में लगते हैं । विशेष— यह पेड़ शोभा के लिये बगीयों में लगाया जाता है । इसकी लकड़ी और छाल दवा के काम आती है । ७. मूँज का फूल या घूआ । ८. लोध्र वृक्ष । लोध का पेड़ । ९. मरुवक । मरुवा । १०. एक प्रकार का अश्वत्थ । ११. एक जाति का घोड़ा । घोडे़ का एक भेद । १२. तिल्ली जो पेट के भीतर होती है । क्लोम । १३. सौवर्चल लवण । सोंचर नमक । १४. संगीत में ध्रुवक का एक भेद जिसमें एक एक चरण पचीस पचीस अक्षरों के होते हैं । १५. किसी ग्रंथ की अर्थसूचक व्याख्या । टीका । १६. एक रोग (को०) । १७. पीपल का एक प्रकार या भेद (को०) । १८. तिल का पौधा या फूल (को०) ।

तिलक (२)
संज्ञा पुं० [तुं० तिरलीक का संक्षिप्त रूप] १. एक प्रकर का ढोला ढाला जनाना कुरता जिसे प्रायः मुसलमान स्त्रियाँ सूथन के ऊपर पहनती हैं । उ०— तनिया न तिलक, सुथनिया पगनिया न धामैं धुमराती छाँड़ि सेजिया सुखन की ।— भूषण (शब्द०) । २. खिलअत ।

तिलक कामोद
संज्ञा पुं० [सं०] एक रागिनी जो कामोद और विचित्र अथवा कान्हड़ा कामोद और षड्योग से मिलकर बनी है ।

तिलकुट
संज्ञा पुं० [सं०] १. तिल का चूर्ण । २. एक मिठाई जो तिल के चूर्ण के योग से बनती है ।

तिलकधारी
संज्ञा पुं० [हिं० तिलक + धारी] तिलक लगानेवाला । उ०—दास पलटू कहै तिलकधारी सोई, उदित तिहु लोक रजपूत सोई ।—पलटू०, भा० २, पृ० १६ ।

तिलकना (१)
क्रि० अ० [हि० तड़कना] गीली मिट्टी का सूखकर स्थान स्थान पर पर दरकना या फटना । ताल आदि की मिट्टी का सूखकर दरार के साथ फटना ।

तिलकना पु (२)
क्रि० अ० [हिं०] बिछलना । फिसलना । उ०— करहउ कादिम तिलकस्यह पंथी पूगल दूर ।—ढोला०, दु० २५६ ।

तिलक मुद्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] चंदन आदि का टीका और शंख चक्र आदि का छापा जिसे भक्त लोग लगाते हैं ।

तिलकल्क †
संज्ञा पुं० [सं०] तिल का चूर्णं । तिलकुट ।

तिलकहरू
संज्ञा पुं० [सं० तिलक + हिं० हरू (प्रत्य०)] दे० 'तिलकहार' ।

तिलकहार
संज्ञा पुं० [हिं० तिलक + हार (प्रत्य०)] वह मनुष्य जो कन्या के पिता के यहाँ से वर को तिलक चढ़ाने के लिये भेजा जाता है ।

तिलका
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक वृत्त का नाम जिसके प्रत्येक चरण मे दो सगण (/?/) होते हैं । इसे 'तिल्ला', 'तिल्लाना' और 'डिल्ला' भी कहते हैं । २. कंठ में पहनने का एक आभूषण ।

तिलकार्षिक
संज्ञा पुं० [सं०] तिल की खेती करनेवाला व्यक्ति [को०] ।

तिलकालक
संज्ञा पुं० [सं०] १. देह पर का तिल के आकार का काला चिह्न । तिल । २. सुश्रुत के अनुसार एक व्याधि जिसमें पुरुष की इंद्रिय एक जाती है और उसपर काले काले दाग से पड़ जाते हैं ।

तिलकावल
वि० [सं०] चिह्नों से युक्त । चिह्नोंवाला [को०] ।

तिलकाश्रय
संज्ञा पुं० [सं०] माथा । ललाट [को०] ।

तिलकिट्ट
संज्ञा पुं० [सं०] तिल की खली । पीना ।

तिलकित
वि० [सं०] १. तिलक लगाए हुए । २. जिसको तिलक लगाया गया हो । जैसे, सिंदूर तिलकित भाल । ३. चित्तीदार । बिंदिवाला [को०] ।

तिलकुट
संज्ञा स्त्री० [सं० तिलकट] कूटे हुए तिल जो खाँड़ की चाशनी में पगे हों ।

तिलखली
संज्ञा स्त्री० [सं० तिल + खली] तिल की खली [को०] ।

तिलखा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की चिड़िया ।

तिलचटा
संज्ञा पुं० [हिं० तिल + चाटना] एक प्रकार का झींगुर । चपड़ा ।

तिलचतुर्थी
संज्ञा स्त्री० [सं०] माध मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी [को०] ।

तिलचाँवरी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० तिल + हिं० चाँवरी] दे० 'तिलचावली' ।

तिलचावली (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० तिल + चावल] तिल और चावल की खिचड़ी ।

तिलचावली (२)
वि० स्त्री० जिसका कुछ अँश सफेद और कुछ काला हो । जैसे, तिलचावली दाढ़ी ।

तिलचित्रपत्रक
संज्ञा पुं० [सं०] तैलकंद ।

तिलचूर्ण
तिलकल्क । तिलकुट ।

तिलछना
क्रि० अ० [अनु०] विकल रहना । छटपटना । बेचैन रहना ।

तिलड़ा (१)
वि० [हिं० ती < सं० त्रि + हिं० लड़] [वि० स्त्री० तिलड़ी] जिसमें तीन लड़े हों । तीन लड़ों का ।

तिलड़ा (२)
संज्ञा पुं० [देश०] पत्थर गढ़नेवालों की एक छेनी जिससे टेढ़ी लकीर या लहरदार नक्काशी बनाई जाती है ।

तिलड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० तीन + लड़] तीन लड़ों की माला जिसके बीच में एक जुगनी लटकती है ।

तिलतंडुल
संज्ञा पुं० [सं० तिल + तण्डुल] १. तिल ओर चावल । २. ऐसा मेल जिसमें मिलनेवालों का अस्तित्व स्पष्ट दिखाई दे । यौ०—तिलतंडुल न्याय = दे० 'न्याय' ।

तिलतुंडुलक
संज्ञा पुं० [सं० तिलतण्डुलक] १. भेंट । मिलन । २. आलिंगन । गले से लगना [को०] ।

तिलतैल
संज्ञा पुं० [सं०] तिल का तेल [को०] ।

तिलदानी
संज्ञा स्त्री० [हिं० तिल्ला + सं० आधीन] कपड़े की वह थैली जिसमें दरजी सुई, तागा, अंगुश्ताना आदि औजार रखते हैं ।

तिलद्वादशी
संज्ञा स्त्री० [सं०] किसी विशेष मास की द्वादशी तिथि (जो उत्सव के लिये निश्चित हो) ।

तिलधेनु
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार का दान जिसमें तिलों की गाय बनाकर दान करते हैं ।

तिलपट्टी
संज्ञा स्त्री० [हिं० तिल + पट्टी] खाँड़ या गुड़ में पगे हुए तिलों का जमाया हुआ कतरा ।

तिलपपड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० तिल + पपड़ी] तिलपट्टी ।

तिलपर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] १. चंदन । २. सरल का गोंद । ३. तिल का पत्ता [को०] ।

तिलपर्णिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'तिलपर्णी' ।

तिलपर्णी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. रक्त चंदन । २. एक नदी [को०] ।

तिलपिंज
संज्ञा पुं० [सं० तिलपिञ्ज] तिल का वह पौधा जिसमें फल नहीं लगते । बंझा तिल वृक्ष ।

तिलपिच्चट
संज्ञा पुं० [सं०] तिलों की पीठी । तिलकुटा ।

तिलपीड़
संज्ञा पुं० [सं० तीलपीड] तिल पेरनेवाला, तेली ।

तिलपुष्प
संज्ञा पुं० [सं०] १. तिल का फूल । २. व्याघ्रनख । बघ- नखी । ३. नाक [को०] ।

तिलपुष्पक
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बहेड़ा । २. तिल का फूल (को०) । ३. नाक (क्योंकि इसकी उपमा तिल के फूल से दी जाती है) ।

तिलपेज
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'तिलपिंज' ।

तिलफरा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का छोटा सुंदर सदाबहार वृक्ष । विशेष—यह वृक्ष हिमालय में ५-*६ हजार फुट की उँचाई तक पाया जाता है । इसकी पत्तियाँ गहरे हरे रंग की और चमकीली होती है ।

तिलबढ़ा
संज्ञा पुं० [देश०] चौपायों का एक रोग जिसमें गले के भीतर के मांस के बढ़ जाने से वे कुछ खा पी नहीं सकते ।

तिलबर
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का पक्षी ।

तिलभार
संज्ञा पुं० [सं०] एक देश का नाम ।—(महाभारत) ।

तिलभाविनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] मल्लिका [को०] ।

तिलभुग्गा
संज्ञा पुं० [हिं० तिल + सं० भुक्त] खाँड़ मिले हुए भुने तिल जो खाए जाते हैं । तिलकुठ ।

तिलभृष्ट
वि० [सं०] तिल के साथ भूना या पकाया हुआ । विशेष—महाभारत में तिल के साथ भुनी हुई वस्तु के खाने का निषेद है । स्तृतियों में तिल मिला हुआ पदार्थ बिना देवार्पित किए खाना वर्जित है ।

तिलभेद
संज्ञा पुं० [सं०] पोस्ते का दाना ।

तिलमनिया पु
संज्ञा स्त्री० [सं० तिल + हिं० मनिया] गले में पहना जानेवाला एक आभूषण । उ०—गले तिलमनिया पहुँचि बिराजित बाजुबन फुदन सुधारी री ।—सं० दरिया, पृ० १७० ।

तिलमयूर
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का पक्षी जिसकी देह देह पर तिल के समान काले चिह्न होते हैं ।

तिलमापट्टी
संज्ञा स्त्री० [देश०] दक्षिण में बिलारी और करनूल में होनेवाली एक कपास ।

तिलमिल
संज्ञा स्त्री० [हिं० तिरमिर] चकाचोंध । तिरमिराहट ।

तिलमिलाना
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'तिरमिराना' ।

तिलमिलाहट
संज्ञा स्त्री० [हिं० तिलमिलाना + आहट (प्रत्य०)] तिलमिलाने की क्रिया या भाव । व्याकुलता । बेचैनी ।

तिलमिली
संज्ञा स्त्री० [हिं० तिलमिलाना] तिलमिलाहट ।

तिलरस
संज्ञा पुं० [सं०] तिल का तेल [को०] ।

तिलरा (१)
संज्ञा पुं० [देश०] टेढ़ी लकीर बनाने की छेनी जिसे कसेरे काम में लाते हैं ।

तिलरा † (२)
वि०, संज्ञा पुं० [हिं०] [वि० स्त्री० तिलरी] दे० 'तिलड़ा' ।

तिलरी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तिलड़ी' ।

तिलवट
संज्ञा पुं० [हिं० तिल] तलिपट्टी । तिलपपड़ी ।

तिलवन
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक पौधा जो जंगलों और बगीचों में होता है । विशेष—यह दो प्रकार का होता है—एक सफेद फूल का, दूसरा नीलापन लिए पीले फूल का । इसमें लंबी फलियाँ लगती है । इसके बीज, फूल आदि दवा के काम में आते हैं ।वैद्यक ने तिलवन गरम और वात गुल्म आदि को दूर करनेवाली मानी जाती है । पौली तिलवन आँख के अंजनों में पड़ती है । पर्या०—अजगंधा । खरपुष्पा । सुंगंधिका । काबरी । तुंगी ।

तिलवा
संज्ञा पुं० [हिं० तिल + वा (प्रत्य०)] तिलों का लड्डू ।

तिलशकरो
संज्ञा स्त्री० [हिं० तिल + शकर] तिल और चीनी की बनाई हुई मिठाई । तिलपपड़ी ।

तिलशिखी
संज्ञा पुं० [सं० तिलशिखिन्] तिलमयूर [को०] ।

तिलशैल
संज्ञा पुं० [सं०] तिल का पर्वताकार ढेर जो दान में दिया जात है ।

तिलषिवक
संज्ञा पुं० [?] तेली । उ०—तेली को तिलषिवक कहा जाता था ।—आर्य० भा०, पृ० २९२ ।

तिलसुषमा
संज्ञा पुं० [सं० तिल + सुषमा] सृष्टि के सभी उत्तम पदार्थों से थोड़ा थोड़ा करके एकत्र किया गया सौंदर्यसमूह । उ०—निर्मित सबकी तिलसुषमा से, तुम निखिल सृष्टि में चिर निरुपम ।—युगांत, पृ० ४६ । विशेष—तिलोत्तमा नामक अप्सरा की सृष्टि ब्रह्मा ने इसी प्रकार की थी । सुंद और उपसुंद नाम के दो असुर भाई इसी तिलोत्तमा के लिये आपस में ही लड़कर मर गए ।

तिलस्नेह
संज्ञा पुं० [सं०] तिल का तेल [को०] ।

तिलस्म
संज्ञा पुं० [अ० तिलिस्म] १. जादू । इंद्रजाल । २. अद्भुत या अलौकिक व्यापार । करामात । चमत्कार । ३. द्दष्टिबंध (को०) ४. वह मायारचित विचित्र स्थान जहाँ अजीबी गरीब व्यक्ति और चीजें दिखलाई पड़ें और जहाँ जाकर आदमी खो जाय और उसे घर पहुँचने का रास्ता न मिले । मुहा०—तिलस्म तोड़ना = किसी ऐसे स्थान के रहस्य का पता लगा देना जहाँ जादू के कारण किसी की गति न हो । यौ०—तिलम्म बंद = तिलस्म और जादू के असर में आया हुआ मावारस्ता । तिलस्म बंदो = जादू के असर में आ जाना ।

तिलस्मात
संज्ञा पुं० [अ० तिलिस्म का बहु ब०] मायारचित स्थान । मायाजाल [को०] ।

तिलस्माती
वि० [अ० तिलिस्मात + फा़० ई (प्रत्य०)] १. माया- पूर्ण । तिलस्मी । २. मायावी । जादूगर [को०] ।

तिलस्मी
वि० [श्र० तिलिस्म + फा़० ई० (प्रत्य०)] १. तिलस्म संबंधी । जादू का । २. मायानिर्मित । माया संबंधी (को०) ।

तिलहन
संज्ञा पुं० [हिं० तेल + धान्य] फसल के रूप में बोए जानेवाले पौधे जिनके बीजों से तेल निकलता है । जैसे, तिल सरसों, तीसी इत्यादि ।

तिलांकित दल
संज्ञा पुं० [सं०] तैलकंद ।

तिलांजलि
संज्ञा स्त्री० [सं० तिलाञ्जलि] दे० 'तिलाजली' [को०] ।

तिलांजली
संज्ञा स्त्री० [सं० तिलाञ्जली] मृतक संस्कार का एक अंग । विशेष—हिंदुओं में मृतक संस्कार की एक क्रिया जो मुरदे के जल चुकने पर स्नान करके की जाती है । इसमें हाथ की अँजुली में जल भरकर और उसमें तिल डालकर उसे मृतक के नाम से छोड़ते हैं । मुहा०—तिलांजली देना = बिलकुल त्याग देना । जरा भी संबंध न रखना ।

तिलांबु
संज्ञा पुं० [सं० तिलाम्बु] तिलांजली ।

तिला (१)
संज्ञा पुं० [अ०] सुवर्ण । सोना [को०] ।

तिला (२)
संज्ञा पुं० [अ० तिलाअ] वह तेल जो लिंगेंद्रिय पर उसकी शिथिलता दूर करने के लिये लगाया जाय । लिंगलेप । २. दे० 'तिल्ला' ।

तिलाक
संज्ञा पुं० [अ० तलाक़] १. पति—पत्नी—संबंध का भंग । स्त्री पुरुष के नाते का टूटना । क्रि० प्र०—देना ।—लेना । विशेष—ईसाईयो, मुसलमानो आदि में यह नियम है कि वे आवश्यकता पड़ने पर अपनी विवाहिता स्त्री से एक विशेष नियम के अनुसार संबंध तोड़ देते हैं । उस दशा में स्त्री और पुरुष दोनों का अलग अलग विवाह करने का अधिकार हो जाता है । यौ०—तिलाकनामा । २. परित्याग । त्याग देना । छोड़ देना । उ०—वाहि तिलाक याहि जो खोवै ।—चरण० बानी, पृ० २१० ।

तिलाकर
वि० [अ० तिला+ फा़० कार (प्रत्य०)] सोने की चित्रकारीवाला । उ०—बाद मुद्दत के हैं देहली के फिरे दिन या रव । तख्त ताऊस तिलाकार मुबारक होवे ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ७४७ ।

तिलादानी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तिलदानी' ।

तिलान्न
संज्ञा पुं० [सं०] तिल की खिचड़ी ।

तिलापत्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] काला जीरा ।

तिलावा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० तीन + लावना, लाना?] वह बड़ा कूआँ जिसपर एक साथ तीन पुरवट चल सकें ।

तिलावा (२)
संज्ञा पुं० [अ० तलाअह्] रात के समय कोतवाल आदि का शहर में गश्त लगाना । रौंद ।

तिलिंग
संज्ञा पुं० [सं० तिलिङ्ग] एक देश का नाम [को०] ।

तिलिंगा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तिलंगा' ।

तिलित्स
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का साँप जिसे गोनस भी कहते हैं । २. अजगर (को०) ।

तिंलिया
संज्ञा पुं० [देश०] १. सरपत । २. दे० 'तेलिया' (विष) ।

तिलिस्म
संज्ञा पुं० [अ०] दे० तिलस्म' [को०] ।

तिलिस्मात
संज्ञा पुं० [अ० तिलिस्म का बहु व०] दे० 'तिल- स्मात' [को०] ।

तिलिस्माती
वि० [अ० तिलिस्मात + फा़० ई (प्रत्य०)] दे० 'तिलस्माती' [को०] ।

तिलिस्मी
वि० [अ० तिलिस्म + फा० ई (प्रत्य०)] दे० 'तिलस्मी' [को०] ।

तिली † (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] १. दे० 'तिल' । २. दे० 'तिल्ली' ।

तिली पु (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० तितली का संक्षिप्त रूप] दे० 'तितली' ।

तिलेती
संज्ञा स्त्री० [हिं० तेलहन् + एती (प्रत्य०)] तेलहन की खूँटी जो फसल काटने पर खेत में बच जाती है ।

तिलेदानी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तिलदानी' ।

तिलेगू
संज्ञा स्त्री० [तेलु० तेलुगु] दे० 'तेलगू' ।

तिलोक
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'त्रिलोक' ।

तिलोकपति
संज्ञा पुं० [सं० त्रिलोकपति] विष्णु । उ०—तुलसी विसोक ह्वै तिलोकपति गयो नाम को प्रताप बात विदित है जग में ।—तुलसी (शब्द०) ।

तिलोकी
संज्ञा पुं० [सं० त्रिलोकी] इक्कीस मात्राओं का एक उपजाति छंद जो प्लवंगम और चांद्रायण के मेल से बनता है । इसके प्रत्येक चरण के अंत में लघु गुरु होता है ।

तिलोचन
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'त्रिलोचन' ।

तिलोत्तमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुराणानुसार एक परम रूपवती अप्सरा जिसके विषय में यह कहा जाता है कि ब्रह्मा ने संसार भर के सब उत्तम पदार्थों में से एक एक तिल अंश लेकर इसे बनाया था । विशेष—इसकी उत्पत्ति हिरण्याक्ष के सुंद और उपसुंद नामक दोनों पुत्रों के नाश के लिये हुई थी जिन्होंने बहुत तपस्या करके यह वर प्राप्त कर लिया था कि हम लोग किसी दूसरे के मारने से न मरें; और यदि मरें भी तो आपस में ही लड़कर मरें । इन दोनों भाइयों में बहुत स्नेह था और इन्होंने देवताओं तथा इंद्र को बहुत तंग कर रखा था । इन्हीं दोनों में विरोध कराने के लिये ब्रह्मा ने तिलोत्तमा की सृष्टि की और उसे सुंद तथा उपसुंद के निवासस्थान विंध्या- चल पर भेज दिया । इसी को पाने के लिये दोनों भाई आपस में लड़ मरे थे ।

तिलोदक
संज्ञा पुं० [सं०] वह तिल मिला अँजुली भर जल जो मृतक के उद्देश्य से दिया जाता है । तिलांजली । उ०—पुत्र न रहता, तो क्या होता कौन फिर देता पिंड तिलोदक ।—करुणा०, पृ० १६ ।

तिलोरि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तिलोरी' । उ०—पियरि तिलोरि आव जलहंसा । विरहा पौठि हिएँ कत नंसा ।—जायसी ग्रं०, (गुप्त), पृ० ३६३ ।

तिलोरी (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की मैना जिसे तेलिया मैना भी कहते हैं । उ०—पेडु तिलोरी औ जल हँसा । हिरदय पैठ विरह लग निसा ।—जायसी (शब्द०) ।

तिलोरी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० तल + हिं० औरी (प्रत्य०)] दे० 'तिलौरी' ।

तिलोहरा †
संज्ञा पुं० [देश०] पटसन का रेशा ।

तिलौछना
क्रि० स० [हिं० तेल + औंछना (प्रत्य०)] थोड़ा तेल लगाकर चिकना करना । उ०—पुनि पोंछि गुलाब तिलौछि फुलेल अँगौछे में आछे अँगौछनि कै ।—केशव ग्रं०, पृ० २० ।

तिलौंछा
वि० [हिं० तेल + औंछा (प्रत्य०)] जिसमें तेल का सा स्वाद या रँग हो । जैसे, तिलोंछा फल ।

तिलौनी पु
वि० [हिं० तेल] सुगंधित । उ०—आछी तिलौनी लसै अँगिया गसि चोवा की बेलि बिराजति लोइन ।— घनानंद, पृ० २१३ ।

तिलौरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० तिल + बरी] उदं या मूँग की वह बरी जिसमें कुछ तिल भी मिला हो । विशेष—इसमें नमक भी पड़ा रहता है और यह घी में तलकर खाई जाती है ।

तिल्य (१)
संज्ञा पुं० [सं० डिच] तिल का तेल । उ०—तिल, उड़व, अलसी अनई और चीना के खोतों को क्रमशः तिल्य तैवीन... कहते थे ।—संपूर्णा० अभि० ग्रं०, पृ० २४८ ।

तिल्य (२)
वि० तिल की खेती के योग्य [को०] ।

तिल्लना
संज्ञा पुं० [?] तिलका नाम का वर्णवृत्त ।

तिल्लर
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की औहव चिड़िया जिसे होबर भी कहते हैं ।

तिल्ला (१)
संज्ञा पुं० [अ० तिला] १. कदाचलू या बादले आदि का काम । यौ०—तिल्लदार । २. पकड़ी दुपट्टे या आड़ी आदि का वह अंचल जिसमें कलावत्तू या बादले आदि का काम दिया हो । ३. वह सुंदर पदार्थ जो किसी वस्तु की शोभा बढ़ाने के लिये उसमें जोड़ दिया जाय । (क्व०) । यौ०—बखरा तिल्ला ।

तिल्ला (२)
संज्ञा पुं० दे० 'तिलका' (वर्णवृत्त) ।

तिल्लाना
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'डराना'-१ ।

तिल्ली (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० तिलक, तुलनीय अ० तिहान (=तिल्की)] पेन के भीतर का अवयव जो मांस की पोली गुठली के आकार का होता है और पसलियों कै नीचे पैठ की बाईँ ओर होता है । विशेष—इसका संबंध पाकाशय से होता है । इसमें खाए हुए पदार्थ का विशेष रस कुछ काल तक रहता है । अबतक यह रस रहता है, तबतक तिल्ली फैदकर कुछ बढ़ी हुई रहती है, फिर जब इस रस को रक्त सोच लेता है, तब वह फिर ज्यों की त्वों हो जाती है । तिस्वी में पहुँचकर रक्तकशिकाओं का रंग बैंगली हो जाता है । ज्वर के कुछ काल तक रहने से तिल्ली बढ़ जाती है, उसमें रक्त आधिक आ जाता है और कभी कभी छूने से पीड़ा भी होती है । ऐसी अवस्था में उसे छेदने से उसमें से लाल रक्त निकलता है । ज्वर आदि के कारण बार बार अधिक रक्त आते रहने से ही तिल्ली बढ़ती है । इस रोग में मनुष्य दिन दिन दुबला होता जाता है, उसका मुँह सुखा रहता है और पेट निकल आता है । वैद्यक के अनुसार जब दाहकारक तथा कफकारक पदार्थों के विशेष सेवन से रुधिर कुपित होकरकफ द्वारा प्लीहा को बढ़ाता है, तब तिल्ली बढ़ आती है और मंदाग्नि, जीर्ण ज्वर आदि रोग साथ जग जाने हैं । जवाखार, पलास, का क्षार, शंख की भस्म आदि प्लीहा की आयुर्वेदोक्त औषध हैं । डक्टरी में तिल्ली बढ़ने पर कुनैन तथा आर्सेनिक (संखिया) और लोहा मिली हुई दवाएँ दी जाती है । पर्या०—प्लीहा । पिलही ।

तिल्ली (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० तिल] तिल नाम का अन्न या तेलहन । वि० दे० 'तिल' ।

तिल्ली (३)
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का बाँस जो आसाम और बरमा में ऊँची पहाड़ियों पर होता है । विशेष—ये बाँस पचास साठ फुट तक ऊँचे होते हैं और इसमें बाँठे दुर दुर पर होती है, इससे ये चोंगे बनाने के काम में अधिक आते हैं ।

तिल्ली (४)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तीली' ।

तिल्लोतमाँ पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तिलोत्तमा' । उ०—तिल ऊपर तिल्तोतमाँ वार बई सौ बार ।—बाँकी० ग्रं०, भा० ३, पृ० ३३ ।

तिल्ब
संज्ञा पुं० [सं०] औघ्र । लोघ्र ।

तिल्लक
संज्ञा पुं० [सं०] १. लोध । २. तिलिश ।

तिल्हारी †
संज्ञा स्त्री० [?] झालर की तरह का वह परदा जो घोड़ो के माथे पर उनकी आँखों को मक्खियों से बचाने के लिये बाँधा आता है । नुकता ।

तिबहार पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'त्योहार' । उ०—होली तिवहार की बगंत पञ्चमी है ।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० ११८ ।

तिबाड़ी †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तिवारी' ।

तिव पु
अव्य० [हिं०] दे० 'तिमि' । उ०—उछइ पाँणी ज्युँ माछली जिंव जाँगु तिव उठुछुँ झंबि ।—बी० रासों०, पृ० ४८ ।

तिबइ पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० स्त्री] स्त्री ।

तिबई पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० स्त्री] स्त्री ।

तिबाना पु
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'तेवाना' । उ०—तब जुगहा धन किन्ह तिवाना ।—कबीर सा०, पृ० ७४ ।

तिबार पु
अव्य० [?] तदा । तब । तब बार । उस समय । उ०— सम राज अध्धि षती तिवार । नृपराज एह अदभुत विचार ।—पृ० रा०, २४ । ३१३ ।

तिबारी (१)
संज्ञा पुं० [सं० त्रिपाठी] [स्त्री० तिपराइच] त्रिपाठी । वि० दे०— 'त्रिपाठी' ।

तिबारी पु (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० तिबारा] वह घर या कोठरी जिसमें तीन द्वार हों । उ०—फूलनि के खंभ फूलनि की तिवारी ।— छीत०, पृ० २७ ।

तिवास †
संज्ञा पुं० [सं० त्रिवासर] तीन दिन । उ०—मन फाटै बायक बरै मिटैं सगाई साक । जैसे दूध निवास को उलटि हुआ जो आक ।—कबीर (शब्द०) ।

तिवासी
वि० [हिं०] दे० 'तिबासी' ।

तिविक्रम
संज्ञा पुं० [सं० त्रिविक्रम] दे० 'त्रिविक्रम' । उ०—दुज कनौज लकुल कस्यपी, रतनाकर सुत धीर । बसत तिविक्रम पुर सदा, तरनि तनूजा तीर ।—भूषण ग्रं०, पृ० १८ ।

तिबी
संज्ञा स्त्री० [देश०] खैसारी ।

निशाना पु (१)
संज्ञा पुं० [अ० तशमीअ (=बुरा भला कहना)] ताना । मेहना । क्रि० प्र०—देना ।—मारना । यौ०—ताना निशाना ।

तिशता (२)
वि० [फा़० तिशनह्] १. प्यासा । तृषित । २. अतृप्त । असंतुष्ट । यौ०—तिशना काम = (१) तृषित । (२) असफलमनोरथ । तिशरा किमर = (१) असफलकाम । (२) अभिलाषी । तिशना खूँ = खूब का प्यासा । आन का गाहक । तिश्नह दीदार = दर्शन की तृषा ।

तिशनालन
वि० [फा़० तिशनह लब] १. बहुत प्यासा । तृषित । २. इच्छुक । उ०—मारजू ए चश्मए कौसर नहीं । तिशनालब हुँ शरबते दीदरा का ।—कबीता कौ०, भा० ४, पृ० ६ ।

तिश्नाह पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तृष्णा' । उ०—वहु तरंग तिश्नाह राग बहु ग्रेह कुरंती ।—पृ० रा०, १ ।७६७ ।

तिष पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तृषा' । उ०—जब सूखे तब ही तिष लागै ।—प्राण०, पृ० १५ ।

तिष्टी पु
क्रि० अ० [सं० तिष्ठित] स्थापित । निर्मित । उ०— कोउ कहँ यह काल उपावत कोऊ अहै यह ईश्वर तिष्टी ।— सुंदर० ग्रं० भा० २, पृ० ६१९ ।

तिष्ठदगु
संज्ञा पुं० [सं०] वह काल जिसमें गौएँ चरकर अपने खूँटे पर आ जाती हैं । संध्या । सायंकाल । गोधुली ।

तिष्ठद्धोम
संज्ञा पुं० [सं०] एक होम या यज्ञ जिसमें पुरोहित खड़ा रहकर आहुति प्रदान करता है [को०] ।

तिष्ठना पु
क्रि० अ० [सं० तिष्ठ] ठहरना । उ०—चौदह भुवन एक पति होई । भूत ग्रोह तिष्ठइ नहिं कोई ।—तुलसी (शब्द०) ।

तिष्ठा
संज्ञा स्त्री० [सं०] तिस्ता नाम की बदी जो हिमालय के पास से निकलकर नवाबगंज के पास गंगा से मिलती है ।

तिष्य (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुष्य नक्षत्र । २. पौष मास । ३. कलियुग । ४. अशोक के एक भाई का नाम (को०) ।

तिष्य (२)
वि० १. मांगल्य । कल्याकारी । २. भाग्यवान (को०) । ३. तिष्य नक्षत्र में उत्पन्न (को०) ।

तिष्यक
संज्ञा पुं० [सं०] पौष मास ।

तिष्यकेतु
संज्ञा पुं० [सं०] शिव [को०] ।

तिष्यपुष्पा
संज्ञा स्त्री० [सं०] आमलकी ।

तिष्यफला
संज्ञा स्त्री० [सं०] आमलकी [को०] ।

तिष्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आमलकी । २. दीप्ति । चमक [को०] ।

तिष्षन पु
वि० [सं० तीक्ष्ण] दे० 'तीक्ष्ण' । उ०—लष्ष में पष्षर तिष्षन तेज जे सूर समाज में गान गने हैं ।—तुलसी (शब्द०) ।

तिष्षिय पु
वि० [हिं०] दे० 'तीक्ष्ण' । उ०—असिय मुष्ष दंतलिय तरुन तिष्षिय आधारिय ।—पृ० रा० २ । १५३ ।

तिस † (१)
सर्व [सं० तस्य, पा० तिर्स्स, प्रा० तस्सा, तिस्स] 'ता' का एक रूप जो उसे विभक्ति लगने के पूर्व प्राप्त होता है । जैसे, तिसने, तिसको, तिसके इत्यादि । विशेष—अब इस शब्दप्रकार का व्यवहार गद्य में नहीं होता, केवल 'तिसपर' का प्रयोग होता है । मुहा०—तिस पर = (१) उसके पीछे । उसके उपरांत । (२) इतना होने पर । ऐसी अवस्था में । जैसे,—(क) हमारी चीज भी ले गए, तिसपर हमीं को बातें भी सुनाते हो । (ख) इतना मना किया, तिसपर भी वह चला गया ।

तिस पु (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० तृप] दे० 'तृषा' । उ०—नित हितमय उदार आनँदमन रस बरसत चातक तिस तैं रे ।—घनानंद०, पृ० १६४ ।

तिसखुट †
संज्ञा स्त्री० [हिं० तीसी + खूँटी] तीसी के पौधों के छोटे छोटे डंठल जो फसल कटने पर जमीन में गड़े रह जाते हैं । तीसी की खूँटी ।

तिसखुर
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तिसखुट' ।

तिसटना पु
क्रि० अ० [सं० तिष्ठ] स्थित रहना । उ०—ज्यौरै थोड़ा सैंण जग, वैरी वणा वसंत । तिसटै दिन थोड़ा तिके, आखै अंत असंत ।—बाँकी० ग्रं०, भा० १, पृ० ६६ ।

तिसडी पु †
वि० [हिं० तिस + ड़ी (प्रत्य०)] बैसी । उस तरह की । उ०—नारौ इक वौर उमैं नर में तिसडी न लखी सुपनंतर में ।—रघु० रू०, पृ० १३३ ।

तिसना पु
संज्ञा स्त्री० [सं० तृष्णा] दे० 'तृष्णा' ।

तिसरा †
वि० [हिं० तिसरा] [वि० स्त्री० तिसरी] दे० 'तीसरा' । उ०—सो प्रगटित बिज रूप करि इहि तिसरे अध्याइ ।— बंद० ग्रं०, पृ० २३१ ।

तिसराना
क्रि० स० [हिं० तिसरा से नामिक धातु] तीसरी बार करना ।

तिसराय †
क्रि० वि० [हिं० तिसरा] तीसरी बार ।

तिसरायत
संज्ञा स्त्री० [हिं० तीसरा + आयत (प्रत्य०)] १. तीसरा होने का भाव । गैर होने का भाव । २. मध्यस्थ । बिचला ।

तिसरैत
संज्ञा पुं० [हिं० तीसरा + एत (प्रत्य०)] १. दो आदमियों के झगड़े से अलग एक तीसरा मनुष्य । तठस्थ । मध्यस्थ । २. तीसरे हिस्से का मालिक ।

तिसा पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तृषा' । उ०—तातैं तिसा अनी न बिचारै । विषयन दीन देह प्रतिपारै ।—नंद० ग्रं०, पृ० २१२ ।

तिसाना पु
क्रि० अ० [सं० तृषा] प्यासा होना । तृषित होना । उ०—देखि के विभूति सुख उपज्यो अभूत कोऊ चल्यो मुख माधुरी के लोचन तिसाये हैं ।—प्रिया (शब्द०) ।

तिसाया पु †
वि० [हि० तिसाना] तृषित । प्यासा । उ०—वैगम नै रुहिल्लेषाँ सल्ला में कहाया । सारा कामणाँनी खूँन मेटा का तिसाया ।—शिखर०, पृ० ५७ ।

तिसिया पु
संज्ञा स्त्री० [सं० तृषित, प्रा० तिसिय] तृषित । प्यासा । उ०—या रहनी तैं पैकंबर निपजै, तिसियाँ मरै सँसारा ।—गोरख०, पृ० २१३ ।

तिसी पु
वि० [हिं० तिस + ई (प्रत्य०)] उसी । उ०—लाहो लेता जनम गौ तुय करै तिसी तोथी होई ।—बी० रासो, पृ० ४४ ।

तिसु पु
सर्व० [सं० तस्य, हिं० तिस] उसको । उसे । उ०—जिनि चाखिया तिसु आया स्वादु । नानक बोलै इहु बिसमाद ।— प्राण०, पृ० १३४ ।

तिसो पु
सर्व० [हिं०] दे० 'तिस' । उ०—तक लीजो सोना तिसो पातर वालो प्रेम ।—वाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० ५ ।

तिसूत
संज्ञा पुं० [?] एक दवा का नाम ।

तिसूती (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० तीन + सूत] तीन तीन सूत के ताने बाने से बुना हुआ कपड़ा ।

तिसूती (२)
वि० तीन तीन सूत के ताने बाने से बुना हुआ ।

तिस्टा पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तृष्णा' । उ०—नहिं भोजन नहिं आस नहीं इंद्री की तिस्टा ।—पलटू०, भा० १, पृ० ५६ ।

तिस्ना पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तृष्णा' । उ०—काम क्रोध तिस्ना मद माया । पाँची चोर न छाड़हि काया ।—जायसी ग्रं० (गुप्त०), पृ० २०४ ।

तिस्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] शंखपुष्पी ।

तिस्स
संज्ञा पुं० [सं० तिष्य] राजा अशोक के सगे भाई का नाम ।

तिह पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] तिया । स्त्री । उ०—चंदनद बन्न ज्यौं पाय चिल्ल । तिह नाह पिष्य ज्यौं सुभग सिल्ल ।—पृ० रा०, ३ । ४९ ।

तिहत्तर (१)
वि० [सं० त्रिसप्तत्ति, पा० तिसत्तति, प्रा० तिहत्तरि] जो गिनती में सत्तर से तीन अधिक हो । तीन ऊपर सत्तर ।

तिहत्तर (२)
संज्ञा पुं० १. सत्तर से तीन अधिक की संख्या । २. उक्त संख्यासूचक अंक जो इस प्रकार लिखा जाता है ।—७३ ।

तिहद्दा
संज्ञा पुं० [हिं० तीन + अ० हद्द] वह स्थान जहाँ तीन हदें मिलती हों ।

तिहरा (१)
वि० [हिं०] दे० 'तेहरा' ।

तिहरा (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] [स्त्री० अल्पा० तिहरी] दही जमाने या दूध दुहने का मिट्टो का बरतन ।

तिहराना
क्रि० [हिं० तेहरा] (किसी बात या काम को) तीसरी बार करना । दो बार करके एक बार फिर और करना ।

तिहरी (१)
वि० स्त्री० [हिं०] दे० 'तेहरी' ।

तिहरी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० तीन + हार] तीन लड़ों की माला ।

तिहरी (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं० ती ? + हंडी] दूध दुहने या दही जमाने का मिट्टी का छोटा बरतन ।

तिहबार
संज्ञा पुं० [सं० तिथिवार] पर्व या उत्सव का दिन । त्योहार । वि० दे० 'त्योहार' ।

तिहवारी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'त्योहारी' ।

तिहा
संज्ञा पुं० [सं० तिहन्] १. रोग । २. चावल । ३. धनुष । ४. अच्छाई । सदभाव [को०] ।

तिहाई (१)
संज्ञा पुं० [सं० त्रि + भाग] १. तृतीयांश । तीसरा भाग । तीसरा हिस्सा ।

तिहाई (२)
संज्ञा स्त्री० खेत की उपज । फसल । (पहले खेत की उपज का तृतीयांश काश्तकार लेता था, इसी से यह नाम पड़ा) । उ०—नई तिहाई के अँखुआ खेतन ज्यौं ऊगत ।—प्रेमघन०, भा० १, पृ० ४४ । मुहा०—तिहाई काटना = फसल काटना । तिहाई मारी जाना = फसल का न उपजना ।

तिहाउ †
संज्ञा पुं० [हिं०] १. क्रोध । तेह । २. वैर । बिगाड़ । उ०— हित सों हित रति राम सों रिपु सों बैर तिहाउ । उदासीन सब सों सरल तुलसी सहज सुभाउ ।—तुलसी (शब्द०) ।

तिहानी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक बालिश्त लंबी और तीन अंगुल चौड़ी लकड़ी जिसका काम चूड़ियाँ बनाने में पड़ता है ।

तिहायत (१)
संज्ञा पुं० [हिं० तिहाई (=तीसरा)] दो आदमियों के झगड़े से अलग एक तीसरा आदमी । तिसरैत । तटस्थ । मध्यस्थ ।

तिहायत पु (२)
वि० [हिं०] तीन गुना । उ०—जन रज्जब सुरता बनी लगी तिहाइत तेज ।—रज्जब० बानी, पृ० ५ ।

तिहाना पु
वि० [सं० तृषित] १. प्यासा होना । २. अतृप्त होना । उ०—तदहुं तूँ किछु पीता कि रहता तिहाय ।—प्राण०, पृ० ६८ ।

तिहारा †
सर्व० [हिं०] दे० 'तुम्हारा' ।

तिहारो पु
सर्व० [हिं०] दे० 'तुम्हारा' । उ०—और तुम तो काहू के घर घात आवत नाहीं । ओर आज तिहारो आवनो कैसे भयो ।—दो सौ बावन०, भा० २, पृ० ६३ ।

तिहारौ पु
सर्व० [हिं०] दे० 'तुम्हारा' । उ०—हो पिय, यह कल गीच तिहारौ । महा अनिल के बान अनिवारौ ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३२० ।

तिहाली
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की कपास की बौड़ी ।

तिहाव †
संज्ञा पुं० [हिं० तेह (=गुस्सा, ताव)] १. क्रोध । कोप । २. बिगाड़ । अनवन ।

तिहि
सर्व० [हिं०] दे० 'तेहि' । उ०—कालीदह सौं पकरि ल्याय नाच्यो तिहि सिर पर ।—प्रेमघन०, भा० १, पृ० ६३ ।

तिहों पु
वि० सर्व० [हिं०] दे० 'तेहि' । उ०—अंतरजामी साँवरी, तिहीं बेर गयो आइ ।—नंद०, ग्रं०, पृ० १ ।

तिही पु
सर्व० [हि०] दे० 'तेहि' । उ०—पटुली फनक की तिहौ बानक की बनी मनमोहनी ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३७५ ।

तिहुँलोक
संज्ञा पुं० [हिं० तीन + हूँ (प्रत्य०) + लोक] तीन लोक स्वर्ग, मर्त्य, पातास । उ०—राम रहा तिहँलोक समाई । कर्म भोग भौ खानिं रहाऊ ।—घट०, पृ० २२२ ।

तिहूँ †
वि० [हिं० तीन + हूँ (प्रत्य०)] तीन । तीनी जैसे, तिहूँ लोक ।

तिहुयन पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'त्रिभुवन' । उ०—करिअ विनति सौं एं आयब जन्हि बिनु तिहुयन तीत —विद्यापति, पृ० १६६ ।

तिहैया
संज्ञा पुं० [हिं० तिहाई] १. तीसरा भाग । तृतीयांश । २. तबले मृदंग आदि की वे तीन थापें जिनमें से प्रत्येक थाप अंतिम या समवाले ताल को तीन भागों में बाँटकर प्रत्येक भाग पर दी जाती है और जिसकी अंतिम थाप ठीक समय पर पड़ती है ।

तिहन पु
सर्व० [हिं०] दे० 'तिन' । उ०—तिहन के मरत नहिं मुएउ लाज गहि बनन सिधाएउ ।—अकबरी०, पृ० ६९ ।

ती पु
संज्ञा स्त्री० [सं० स्त्री] १. स्त्री । औरत । उ०—हौं कब आवत ती इतै सखी लियाई घेरि ।—स० सप्तक, पृ० ३७६ । २. जोरू । पत्नी । ३. मनोहरण छंद का एक नाम । भ्रमरा- वली । नलिनी ।

तीअत †
संज्ञा स्त्री० [सं० तृणान्न] शाक । भाजी । तरकारी ।

तीकरा †
संज्ञा पुं० [देश०] बीज से फूटकर निकला हुआ अंकुर । अँखुआ ।

तीकुर
संज्ञा पुं० [हिं० तीन + कूरा (=अंश)] फसल की तह वह बँटाई जिसमें एक तिहाई अंश जमींदार और दो तिहाई काश्तकार लेता है । तिहाई ।

तीक्षण पु
वि० [सं० तीक्ष्ण] दे० 'तीक्ष्ण' ।

तीक्षन पु
वि० [सं० तीक्ष्ण] दे० 'तीक्ष्ण' । उ०—आयस किय तीक्षन अनिय सेम मत्थ श्रगमीन ।—प० रासो, पृ० ३ ।

तीक्ष्ण (१)
वि० [सं०] १. तेज नोक या धारवाला । जिसकी धार या नोक इतनी चोखी हो जिससे कोई चीज कट सके । जैसे, तीक्ष्ण बाण । २. तेज । प्रखर । तीव्र । जैसे, तीक्ष्ण औषध, तीक्ष्ण बुद्धि । ३. उग्र । प्रचंड । तीखा । जैसे, तीक्ष्ण स्वभाव । ४. जिसका स्वाद बहुत चटपटा हो । तेज या तीखे स्वादवाला । ५. जो (वाक्य या बात) सुनेन में अप्रिय हो । कर्ण- कटु । जैसे, तीक्ष्ण वाक्य, तीक्ष्ण स्वर । ६. आत्मत्यागी । ७. निरालस्य । जिसे आलस्य न हो । ८. जो सहन न हो । असह्य ।

तीक्ष्ण (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. उत्ताप । गरमी । २. विष । जहर । ३. इस्पात । लोहा । ४. युद्ध । लड़ाई । ५. मरण । मृत्यु । ६. शास्त्र । ७. समुद्री नमक । करकच । ८. मुष्कक । मोखा । ९. वत्सवभाग । बछनाग । १०. चव्य । चाव । ११. महामारी । मारी । १२. यवक्षार । जवालार । १३. सफेद कुशा । १४. कुंदर गोंद । १५. योगी । १६. ज्योतिष में मूल, आर्द्रा, ज्येष्ठा, अश्विनी और रेवती नक्षत्रों में बुध की गति ।

तीक्ष्णकंटक
संज्ञा पुं० [सं० तीक्ष्णकण्टक] १. धतूरे का पेड़ । २. बबूल का पेड़ । ३. इगुंदी का पेड़ । ४. करील का पेड़ ।

तीक्ष्णकंटका
संज्ञा स्त्री० [सं० तीक्ष्णकंण्टका] एक प्रकार का वृक्ष जिसे कंकारी कहते है ।

तीक्ष्णकंद
संज्ञा पुं० [सं० तीक्ष्णकन्द] पलांडु । प्याज ।

तीक्ष्णक
संज्ञा पुं० [सं०] १. मोखा वृक्ष । २. सफेद सरसों ।

तीक्ष्णकर्मा (१)
संज्ञा पुं० [सं०तीक्ष्णकर्मन्] उत्साही व्यक्ति [को०] ।

तीक्ष्णकर्मा (२)
वि० उत्साही [को०] ।

तीक्ष्णकल्क
संज्ञा पुं० [सं०] तुंबरु वृक्ष ।

तीक्ष्णकांता
संज्ञा स्त्री० [सं० तीक्ष्णकान्ता] कालिकापुराण के अनुसार तारा देवी का नाम ।विशेष—इनका ध्यान कृष्णवर्णा, लंबोदरी और एक जटाधारिणी है । इनके पूजन से अभीष्ट का सिद्ध होना माना जाता है ।

तीक्ष्णक्षोरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] बंसलोचन ।

तीक्ष्णगंध
संज्ञा पुं० [सं० तीक्ष्णगन्ध] १. सहिजन का पेड़ । २. लाल तुलसी । ३. लोबान । ४. छोटी इलायची । ५. सफेद तुलसी । ६. कुंदुरुं नामक गंधद्रव्य ।

तीक्ष्णगंधक
संज्ञा पुं० [सं० तीक्ष्णगन्धक] सहिजन ।

तीत्णगंधा
संज्ञा स्त्री० [सं० तीक्ष्णगन्धा] १. श्वेत वच । सफेद बच । २. कंथारी का वृक्ष । ३. राई । ४. जीवंती । ५. छोटी इलायची ।

तीक्ष्णतंडुला
संज्ञा स्त्री० [सं० तीक्ष्णतण्डुला] पिप्पली । पीपल ।

तीक्ष्णता
संज्ञा स्त्री० [सं०] तीक्ष्ण होने का भाव । तीव्रता । तेजी ।

तीक्ष्णताप
संज्ञा पुं० [सं०] महादेव । शिव ।

तीक्ष्णतेल
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'तीक्ष्णतैल' ।

तीक्ष्णतैल
संज्ञा पुं० [सं०] १. राल । २. सेहुंड़ का दूध । ३. मदिरा । शराब । ४. सरसों का तेल ।

तीक्ष्णत्व
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'तीक्ष्णता' । उ०—इन दोनों के साधारण धर्म कपिलत्व या तीक्ष्णत्व के होने पर यह उपचार होता है कि अग्नि माणवक है ।—संपूर्णा०, अभि० ग्रं०, पृ० ३३६ ।

तीक्ष्णदंत
संज्ञा पुं० [सं० तीक्ष्णदन्त] वह जानवर जिसके दाँत बहुत तेज या नुकीले हों ।

तीक्ष्णदंष्ट्र (१)
संज्ञा पुं० [सं०] बाघ ।

तीक्ष्णद्रंष्ट्र (२)
वि० तेज दाँतोंवाला । जिसके दाँत तेज हों ।

तीक्ष्णदृष्टि
वि० [सं०] जिसकी दृष्टि सूक्ष्म से सूक्ष्म बात पर पड़ती हो । सूक्ष्मदृष्टि ।

तीक्ष्णधार (१)
संज्ञा पुं० [सं०] खड्ग ।

तीक्ष्णधार (२)
वि० जिसकी धार बहुत तेज हो ।

तीक्ष्णपत्र (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. तुंबुरु । धनिया । २. एक प्रकार का गन्ना ।

तीक्ष्णपत्र (२)
वि० जिसके पत्तें में तेज धार हो ।

तिक्ष्णपुष्प
संज्ञा पुं० [सं०] लवंग । लौंग ।

तीक्ष्णपुष्पा
संज्ञा स्त्री० [सं०] केतकी ।

तीक्ष्णप्रिय
संज्ञा पुं० [सं०] जो ।

तीक्ष्णफल (१)
संज्ञा [सं०] तुंबुरु । धनिया ।

तीक्ष्णफल (२)
वि० जिसका फल कड़ुआ हो [को०] ।

तीक्ष्णफला
संज्ञा स्त्री० [सं०] राई ।

तीक्ष्णबुद्धि
वि० [सं०] जिसकी बुद्धि बहुत तेज हो । कुशाग्र बुद्धिवाला । बुद्धिमान ।

तीक्ष्णमंजरी
संज्ञा स्त्री० [सं० तीक्ष्णमञ्जरी] पान का पौधा ।

तीक्ष्णमार्ग
संज्ञा पुं० [सं०] तलवार [को०] ।

तीक्ष्णमूल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. कुलंजन । २. सहिजन ।

तीक्ष्णमूल (२)
वि० जिसकी जड़ में बहुत तेज गंध हो ।

तीक्ष्णरश्मि (१)
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य ।

तीक्ष्णरश्मि (२)
वि० जिसकी किरणें बहुत तेज हों ।

तीक्ष्णरस (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. यवक्षार । जवाखार । २. शोरा ।

तीक्ष्णरस (२)
वि० चरपरे रसवाला [को०] ।

तीक्ष्णलौह
संज्ञा पुं० [सं०] इस्पात ।

तीक्ष्णशूक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] यव । जौ ।

तीक्ष्णशूक (२)
वि० जिसके टूँड पैने हों [को०] ।

तीक्ष्णशृंग
वि० [सं० तीक्ष्णश्रृङ्ग] जिसके सींग पैने या नुकीले हों [को०]

तीक्ष्णसार
संज्ञा पुं० [सं०] लोहा [को०] ।

तीक्ष्णसारा
संज्ञा स्त्री० [सं०] शीशम का पेड़ ।

तीक्ष्णांशु
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य ।

तीक्ष्णा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बच । २. केवाँच । ३. सपंकंकाली वृक्ष । ४. बड़ी मालकँगनौ । ५. अत्यमल्पर्णी लता । ६. मिर्च । ७. जोंक । ८. तारा देवी का एक नाम ।

तीक्ष्णाग्नि
संज्ञा पुं० [सं०] १. अबल जठराग्नि । २. अजीर्ण रोग ।

तीक्ष्णाअ
वि० [सं०] जिसका अगला भाग तेज या नुकीला हो । पैनी नोकवाला ।

तीक्ष्णायस
संज्ञा पुं० [सं०] इस्पात ओहा ।

तीख पु †
वि० [हिं०] दे० 'तीखा' । उ०—अनिल अचल वन मलयज बीस । जेहु छल सीतल सेहु भेल तीख ।—विद्यापति, पृ० १९९ ।

तीखन पु †
वि० [सं० तीक्ष्ण] दे० 'तीक्ष्ण' ।

तीखर
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तीखुर' ।

तीखल
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तीखुर' ।

तीखा (१)
वि० [सं० तीक्ष्ण] [वि० स्त्री० तीखी] १. जसको धार या नोक बहुत तेज हो । तीक्ष्ण । २. तेज । तीव्र । प्रखर । ३. उग्र । प्रचंड । जैसे, तीखा स्वभाव । ४. जिसका स्वभाव बहुत उग्र हो । जैसे,—(क) तुम तो बड़े तीखे दिखबाई पड़ते हो । (ख) यह लड़का बहुत तीखा होगा । ५. जिसका स्वाद बहुत तेज या चरपरा हो । जो वाक्य या बात सुनने में अप्रिय हो । ७. चोखा । बढ़िया । अच्छा । जैसे,—यह कपड़ा उससे तौखा पड़ता है ।

तीखा (२)
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की चिड़िया ।

तीखापन
संज्ञा पुं० [हिं० तीखा + पन] पैनापन । तीक्ष्णता [को०] ।

तीखी
संज्ञा स्त्री० [हिं० तीखा] रेशम फेरनेवालों का काठ का एक औजार जिसके बाच में गज डालकर उसपर रेशम फेरतै हैं ।

तीखुर
संज्ञा पुं० [सं० तवक्षीर] हलदी की जाति का एक प्रकार का पौधा जो पूर्व, मध्य तथा दक्षिण भारत में अधिकता सै होता है । विशेष—अच्छी तरह जोती हुई जमीन में जाड़े के आरंभ में इसके कंद गाड़े जाते है और बीच बीच में बराबरा सिंचाई की जाती है । पुस माघ में इसके पत्ते झड़ने लगते हैं और तब यह पक्का समझा जाता है । उग्र समय इसकी जड़ खोदकरपानी में खूब धोकर कूटते हैं और इसका सत्त निकालते है जो बढ़िया मैदे की तरह होता है । यहीं सत्त बाजारों में तीखुर के नाम से बिकता है और इसका व्यवहार कई तरह की मिठाइयाँ, लड्डु, सैव, जलेबी आदि बनाने में होता है । हिंदु लोग इसकी गणना 'फलाहार' में करते हैं । इसे पानी में घोलकर दूध में छोड़ने से दूध बहुत गाढ़ा हो जाता है, इसलिये लोग इसकी खीर भी बनाते हैं । अब एक प्रकार का तीखुर विलायत से भी आता है जिसे अराख्ट कहते हैं । वि० दे० 'अराख्ट' ।

तीखुल
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तीखुर' ।

तीच्छन पु
वि० [हिं०] दे० 'तीक्ष्ण' । उ०—उत्तमांग नहिं सिंधु- लिय करत न बीच्छत दंत ।—प० रासो, पृ० २ ।

तीछन पु †
वि० [हिं०] दे० 'तीक्ष्ण' । उ०—कनक कामिनी बड़ी दोऊ है तीछन वारा । तब बचिहै तरबूज रहै छूरी से न्यारा ।—पलटू०, भा० १, पृ० ५३ ।

तीछनता पु
संज्ञा स्त्री० [सं० तीक्ष्णता] दे० 'तीक्ष्णता' ।

तीछे पु
वि० [हिं०] दे० 'तिरछा' । उ०—दूरि तें दूर नजीक तें नौरै हि आड़े तें आड़ी है तीछे तें तीछौ ।—सुंदर० ग्रं०, भा० २, पृ० १५७७ ।

तीज
संज्ञा स्त्री० [सं० तृतीया] १. प्रत्येक पक्ष की तीसरी तिथि । २. हरतालिका तृतीया । भादों सुदी तीज । वि० दे० 'हरता- लिका' । उ०—इंद्रावति मन प्रेम पियारा । पहुँचा आइ तीज तेवहारा ।—इंद्रा०, पृ० ९० ।

तीजना पु
क्रि० स० [हिं०] दे० 'तजना' । उ०—मुरखि राजा अपढ़ अयाण हुँ किम चालुँ एछलो ? आ गई गोरी तीजइ पराँण ।— बी० रासो, पृ० ८९ ।

तीजा (१)
संज्ञा पुं० [हिं०तीज] मुसलमानों में किसी के मरने के दिन से तीसरा दिन । विशेष—इस दिन मृतक के संबंधी गरीबों को रोटियाँ बाँटते और कुछ पाठ करते हैं ।

तीजा (२)
वि० [वि० स्त्री० तीजी] तीसरा । तृतीय । उ०—के दिन सिरजे सो सही, तीजा कोई नाहिं ।—रज्जब०, पृ० ३ ।

तीजापन पु
संज्ञा पुं० [हिं० तीेजा + पन (प्रत्य०)] तीसरी अवस्था । उ०—तीजापन में कुटुंब भयौ तब अति अभिमान बढ़ायौ रे ।—सुंदर० ग्रं०, भा० २, पृ० ९९ ।

तीजी पु
वि० स्त्री० [हिं०] दे० 'तीजा (२)' । उ०—ताजी रानी है मनपोई । लज्या कारण न भानौ कोई ।—कबीर सा०, पृ० ५५० ।

तीड़ा पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'टिड्डी' । उ०—तीड़ा करसण सुँपियों, बानरड़ा नूँ बाग ।—बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० ६३ ।

तीड़ी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'टिड्डी' । उ०—मंत्र सकती मंत्र सूँ, ज्यौं तीड़ी ले जाय ।—रा० रू०, पृ० १७९ ।

तीत पु †
वि० [सं० तिक्त] दे० 'तीता' । उ०—करिअ विनति सौं एँ आयब जन्हि बिनु तिहुअन तीत ।—विद्यापति, पृ० १९९ ।

तीतना पु †
क्रि० अ० [हिं०] भीगना । गीला होना । उ०— अलकहि तीतल तँहि अति सोभा । अलिकुल कमल वेदल मुख लोभा ।—विद्यापति, पृ०, ३१९ ।

तीतर
संज्ञा पुं० [सं० तित्तिर] एक प्रसिद्ध पक्षी जो समस्त एशिया और यूरोप में पाया जाता है और जिसकी एक जाति अमेरिका में भी होती है । विशेष—यह दो प्रकार का होता है और केवल सोने के समय को छोड़कर बराबर इधर उधर चलता रहता है । यह बहुत तेज दौड़ता है और भारत में प्रायः कपास, गेहूँ या चावल के खेतों में जाल में फँसाकर पकड़ा जाता है । इसका घोसला जमीन पर ही होता है और इसके अंडे चिकने और धब्बेदार होते हैं । लोभ इसे लड़ाने के लिये पालते, इसका शिकार करते और मांस खाते हैं । वैद्यक में इसके माँस को रुचिकारक, लघु, वीर्य—बल—वर्धक, कषाय, मधुर, ठंढा और श्वास, कास ज्वर तथा त्रिदोषनाषक माना है । भावप्रकाश के अनुसार काले तीतर के मांस की अपेक्षा चितकबरे तीतर का मांस अधिक उत्तम होता है ।

तीता (१)
वि० [सं० तित्त] १. जिसका स्वाद तीखा और चरपरा हो । तित्ता । जैसे, मिर्च । विशेष—यद्यपि प्राचीनों ने तिक्त और कटु में भेव माना है, पर आजकल साधारण बोलचाल में 'तीता' और 'कडुआ' दोनों 'शब्दों' का एक ही अर्थ में व्यवहार होता है । कुछ प्रांतों में केवल 'कडुआ' शब्द का व्यवहार होता है और उसके तात्पर्य भी बहुधा एक ही रस का होता है । जिन प्रांतों में 'तीता' और 'कडुआ' दोनों शब्दों का व्यवहार होता है, वहाँ भी इन दोनों में कोई विशेष भेद नहीं माना जाता । २. कडुआ । कटु ।

तीता (२)
संज्ञा पुं० [देश०] १. खोतने दोने की जमीन का गीलापन । २. ऊपर भूमि । ३. ढेकी या रहट का अगला भाग । ४. ममीरै के झाड़ का एक नाम ।

तीता (३)
वि० [हिं०] भीगा हुआ । गीला । नम ।

तीति पु †
वि० स्त्री० [हिं० तीत] तिक्त । उ०—आजु रुसलिं काति जउँ अँडसबि तीलति होइंति मधु आमिनि रे ।—विद्यापति, पृ० ९८ ।

तीतिर पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तीतर' । उ०—.....तीतिर को नीमक के वास्ते घुमाया करते हैं ।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० ४३ ।

तीती पु
वि० [हिं०] दे० 'तीता' । उ०—उद्धव और सुनी है कवा अब, पाए हैं स्याम वहाँ कोऊ तीती ।—नट०, पृ० ३५ ।

तीतुरी पु †
संज्ञा पुं० [हिं० तीतर] दे० 'तीतर' ।

तीतुरी पु † (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तल्ली' ।

तीतुरी पु (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० तीतर] मादा तीतर । तीतरी । उ०—हंसा हरेई बाजि । तीतुरिय ताँबी साजि ।—ह० रासो, पृ० १२५ ।

तीतुल पु
संज्ञा पुं० [हिं०] [स्त्री० तीतुली] दे० 'तीतर' ।

तीन (१)
वि० [सं० त्रीणि] जो दो और एक हो । जो गिनती में चार से एक कम हो ।

तीन (२)
संज्ञा पुं० १. दो और चार के बीच की संख्या । दो और एक का जोड़ । २. उक्त संख्यासूचक अंक जो इस प्रकार लिखा जाता है—३ । यौ०—तीन ताग = जनेऊ । यज्ञोपवीत । अ०—ना में तीन तान गलि नाँऊँ । ना मैं सुनत करि धोराउँ ।—सुंदर० ग्रं०, भा० १, (भू०), पृ० ४८ । मुहा०—तीन पाँच करना = इधर उधर करना । घुमाव फिराव या हुज्जत की बात करना ।

तीन (३)
संज्ञा पुं० सरयूपारी ब्राह्मणो में तीन गोत्रों का एक वर्ग । विशेष—सरजूपारी ब्राह्मणों में सोलह गोत्र होते है जिनमें से तीन गोत्रवालों का उत्तम वर्ग है और तेरह गोत्रवालों काट कुवरा वर्ग है । मुहा०—तीन तेरह करवा = तितर बितर करना । इधर उधर छितराना या अलग अलग करना । उ०—कियो तीन तेरह अबै चौका चौका लाय ।—हरिश्चंद्र (शब्द०) । व तीन में, व तेरह में = जो किसी गिनती में न हो । उसे कोई पूछता न हो । उ०—कुंभ कान नाम कहाँ पैये मोतें जानराय रुजु हुम मारे हैं न तेरह व तीन में ।—हनुमान (शब्द०) ।

तीन (४)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] तिन्नी का चावल ।

तीनपान
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का बहुत मोटा रस्सा जिसकी मोटाई कम से कम एक फुट होती है (लज०) ।

तीनपाम
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तीनपान' ।

तीनलड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० तीन + लड़ी] गले में पहनने की एक प्रकार की माला जिसमें तीन लड़ियाँ होती हैं । तिलड़ी ।

तिनी पु † (१)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तीन' ।

तीनि पु (२)
वि० [हिं०] दे० 'तीन' । उ०—बर बरनी, तरुनी रँग भीनी । दासीँ बीनि तीनि सत दीनी ।—नंद० ग्रं०,
पृ० २२१ ।

तीनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० तिन्नी] तिन्नी का चावल ।

तीपड़ा
संज्ञा पुं० [देश०] रेशमी कपड़ा बुननेवालों का एक औजार जिसके नीचे ऊपर लकड़ियाँ लगी रहती है जिन्हें बेसर कहते हैं ।

तीमार
संज्ञा स्त्री० [फा़०] रोगी की देखभाल । सेवा शुश्रूषा [को०] ।

तीमारदार
वि० [फा़०] परिचयाँ करनेवाला । उ०—पडिए वर बीमार तो कोई न हो तीमारदार । और अगर मर जाइए तो नौहाख्वाँ कोई न हो ।—कविता कौ०, भा० ४, पृ० ४७१ ।

तीमारदारी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] रोगियों की सेवा शुश्रूषा का काम ।

तीय पु
संज्ञा स्त्री० [सं० स्त्री०] स्त्री । औरत । नारी । उ०—पति देवता तीय जगधन धन गावत बेद पुरान ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० ६७९ ।

तीय पु
वि० [सं० तृतीय] तीसरा ।

तीया (१)पु
संज्ञा स्त्री० [सं० स्त्री०] दे० 'तीय' ।

तीया (२)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तक्की' या 'तिड़ी' ।

तीरंदाज
संज्ञा पुं० [फा़० तीरंदाज] वह जो तीर चलाता हो । तीर चलानेवाला ।

तीरंदाजी
संज्ञा स्त्री० [फा़० तीरदांजी] तीर चलाने की विद्या या क्रिया ।

तीर (३)
संज्ञा पुं० [सं०] १. नदी का किनारा । कूल । तट । उ०— बिच बिच कथा बिचित्र बिभागा । जनु सरि तीर तीर बन बागा ।—मानस, १ । ४० । २. पास । समीप । निकट । विशेष—इस अर्थ में इसका उपयोग विभक्ति का लोप करके क्रियाविशेषण की तरह होता है । ३. सीसा नामक धातु । ४. राँगा । ५. गंगा का तट (को०) । ६. एक प्रकार का बाण (को०) ।

तीर (२)
संज्ञा पुं० [फा़०] बाण । शर । उ०—तीराँ उपर तीर सहि, सेलाँ उपर सेज ।—हम्मीर०, पृ० ४८ । विशेष—यद्यपि पंचदशी आदि कुछ आधुनिक ग्रंथों में तीर शब्द बाण के अर्थ में आया है, तथापि यह शब्द वास्तव में है फारसी का । क्रि० प्र०—चलाना ।—छोड़ना ।—फेंकना ।—लगना । मुहा०—तीर चलाना = युक्ति भिड़ाना । रंग ढंग लगाना । जैसे,—तीर तो गहरा चलाया था, पर खाली गया । तीर फेकना = दे० = 'तीर चलाना' । लगे तो तीर नहीं तो तुक्का= कार्यसिद्धि पर ही साधन की उपयोगिता है ।

तीर (३)
संज्ञा पुं० [?] जहाज का मस्तूल ।

तीर (४)
वि० [हिं० तिरना (=पार करना)] पारंगत । जानकर । उ०—बादशाह करे जिकीर सच्च हिंदु फकीर । ब्रह्मज्ञान में तीर रणधीर आए हैं ।—दक्खिनी०, पृ० ५० ।

तीरकस पु
संज्ञा पुं० [फा़० तीरकश] तरकश । उ०—लिए लगाई तीरकस भारे ।—हम्मीर०, पृ० ३० ।

तीरकारी पु
संज्ञा स्त्री० [फा़० तीर + कारी] बाणों की वर्षा । उ०—भई तीरकारी छुटे नाल बानं । परी सोर की घुँध सुमझे न आनं ।—पृ० रा०, १ । ४५१ ।

तीरगर
संज्ञा पुं० [फा़०] वह जो तीर बनाता हो । तीर बनानेवाला कारीगर । उ०—गुरु कीन्हों इक्कीसवों ताहि तीरगरग जान ।—मनविरक्त०, पृ० २६७ ।

तीरज
संज्ञा पुं० [सं०] किनारे पर का वृक्ष [को०] ।

तीरण
संज्ञा पुं० [सं०] करंज ।

तीरथ
संज्ञा पुं० [सं० तीर्थ] दे० 'तीर्थ' । उ०—तीरथ अनादि पंचगंगा मनीकर्निकादि सात आवरण मध्य पुन्य रूपी घसी है ।—भारतेंदु ग्रं० भा० १, पृ० २८१ । विशेष—तारथ के योगिक शब्दों के लिये दे० 'तीर्थ' के यौगिक शब्द ।

तीरथपति पु
संज्ञा पुं० [हिं० तीरथ + पति] तीर्थराज । प्रयाग ।उ०—माघ मकर गत रबि जब होई । तीरथपतिहि आव सब कोई ।—मानस, १ । ४४ ।

तीरमुक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] गंगा । गंडकी और कौशिकी इन तीन नदियों से घेरा हुआ तिरहुत देश ।

तीरवर्ती
वि० [सं० तीरवर्तिन्] १. तट पर रहनेवाला । किनारे पर रहनेवाला । २. समीप रहनेवाला । पास रहनेवाला । पड़ोसी । ३. तीरस्थ । तीर पर स्थित ।

तीरस्थ
संज्ञा पुं० [सं०] १. नदी के तीर पहुँचाया हुआ मरणासन्न् व्यक्ति । विशेष—अनेक जातियों में यह प्रथा है कि रोगी जब मरने को होता है, तब उसके संबंधी पहले ही उसे नदी के तीर पर ले जाते है; क्योंकि धार्मिक दृष्टि से नदी के तीर पर मरना अधिक उत्तम समझा जाता है । २. तीर पर स्थित । तीर पर बसा हुआ ।

तीरा पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तीर' ।

तीराट
संज्ञा पुं० [सं०] लोध ।

तीरित
वि० [सं०] निर्णय किया हुआ । तै किया हुआ [को०] ।

तीरित (२)
संज्ञा पुं० १. कार्य की पूर्णता या समाप्ति । २. रिश्वत या अन्य साधनों से दंडित होने से बचना [को०] ।

तीरु
संज्ञा पुं० [सं०] १. शिव । महादेव । २. शिव की स्तुति ।

तीर्ण
वि० [सं०] १. जो पार हो गया हो । उत्तीर्ण । २. जो सीमा का उल्लंघन कर चुका हो । ३. जो भीगा हुआ हो । तरबतर ।

तीर्णपदा
संज्ञा स्त्री० [सं०] तालमूल । मुसली ।

तीर्णपदी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'तीर्णपदा' ।

तीर्णप्रतिज्ञ
वि० [सं०] जो अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर चुका हो [को०] ।

तीर्णा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक वृत्त जिसके चरण में एक नगण और एक गुरु (/?/) होता हे । इसको 'सती', 'तिन्न' और 'तरणिजा' भी कहतै हैं । जैसे, नगपती । बनसती । शिव कहौ । सुख लहौ ।

तीर्थंकर
संज्ञा पुं० [सं० तीर्थङ्गर] १. जौनियों के उपास्य देव जो देवताओं से भी श्रेष्ठ और सब प्रकार के दोषों से रहित, मुक्त और मुक्तिदाता माने जाते हैं । इनकी मूर्तियाँ दिगंबर बनाई जाती हैं और इनकी आकृति प्रायः बिलकुल एक ही होती है । केवल उनका वर्ण और उनके सिंहासन का आकार ही एक दूसरे से भिन्न होता है । विशेष—गत उत्सर्पिणी में चौबीस तीर्थकर हुए थे जिनके नाम ये हैं—१. केवलज्ञानी । २. निर्वाणी । ३. सागर । ४. महाशय । ५. विमलनाथ । ६. सर्वानुभूति । ७. श्रीधर । ८. दत्त । ९. दामोदर । १०. सुतेज । ११. स्वामी । १२. मुनिसुव्रत । १३. सुमति । १४. शिवगति । १५. अस्ताग । १६. नेमीश्वर । १७. अनल । १८. यशोधर । १९. कृतार्थ । २०. जिनेश्वर । २१. शुद्धमति । २२. शिवकर । २३. स्यंदन और । २४. संप्रति । वर्तमान् अवसर्पिणी के आरंभ में जो चौबीस तीर्थकर हो गए हैं उनके नाम ये हैं— १. ऋषभदेव । २. अजितनाथ । ३. संभवनाथ । ४. अभिनंदन । ५. सुमतिनाथ । ६. पद्मप्रभ । ७. सुपार्श्वनाथ । ८. चंद्रप्रभ । ९. सुबुधिनाथ । १०. शीतलनाथ । ११. श्रेयांसनाथ । १२. वासुपूज्य स्वामी । १३.विमलनाथ । १४. अनंतनाथ । १५. धर्मनाथ । १६. शांतिनाथ । १७. कुंतुनाथ । १८. अमरनाथ । १९. मल्लिनाथ । २०. मुनि सुव्रत । २१. नमिनाथ । २२. नेमिनाथ । २३. पार्श्वनाथ । २४. महावीर स्वामी । इनमें से ऋषभ, वासुपूज्य और नेमिनाथ की मूर्तियाँ योगाभ्यास में बैठी हुई और बाकी सब की मूर्तियाँ खड़ी बनाई जाती हैं । २. विष्णु (को०) । ३. शास्त्रकर्ता (को०) ।

तीर्थकृत्
संज्ञा पुं० [सं० तीर्थङ्कृत्] १. जैनियों के देवता । जिन । २. शास्त्रकार ।

तीर्थ (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह पवित्र वा पुण्य स्थान जहाँ धर्म- भाव से लोग यात्रा, पूजा या स्नान आदि के लिये जाते हों । जैसे, हिंदुओं के लिये काशी, प्रयाग, जगन्नाथ, गया, द्वारका आदि; अथवा मुसलमानों के लिये मक्का और मदीना । विशेष—हिंदुओं के शास्त्रों में तीर्थ तीन प्रकार के माने गए हैं,— (१) जंगम; जैसे, ब्राह्मण और साधु आदि; (२) मानस; जैसे, सत्य, क्षमा, दया, दाद, संतोष, ब्रह्मचर्य, ज्ञान धैर्य, मधुर भाषण आदि; और (३) स्थावर; जैसे, काशी, प्रयाग गया आदि । इस शब्द के अंत में 'राजा', 'पति' अथवा इसी प्रकार का और शब्द लगाने से 'प्रयाग' अर्थ निकलता है,— तीर्थराज या तीर्थपति = प्रयाग । तीर्थ जाने अथवा वहाँ से लौट आने के समय हिंदुओं के शास्त्रों में सिर मुँडा़कर श्राद्ध करने और ब्राह्मणों को भोजन करने का भी विधान है । २. कोई पवित्र स्थान । ३. हाथ में के कुछ विशिष्ट स्थान । विशेष—दाहिने हाथ के अँगूठे का ऊपरी भाग ब्रह्मतीर्थ, अँगूठे और तर्जनी का मध्य भाग पितृतीर्थ, कनिष्ठा उँगली के नीचे का भाग प्रजापत्य तीर्थ और उँगलियों का अगला भाग देव- तीर्थ माना जाता है । इन तीर्थों से क्रमशः आचमन, पिंडदान, पितृकार्य और देवकार्य किया जाता है । ४. शास्त्र । ५. यज्ञ । ६. स्थान । स्थल । ७. उपाय । ८. अवसर । ९. नारीरज । रजस्वला का रक्त । १०. अवतार । ११. चरणामृत । देव-स्नान-जल । १२. उपाध्याय । गुरु । १३. मंत्री । अमात्य । १४. योनि । १५. दर्शन । १६. घाट । १७. ब्राह्मण । विप्र । १८. निदान । कारण । १९. अग्नि । २०. पुण्यकाल । २१. संन्यासियों की एक उपाधि । २२. वह जो तार दे । तारनेवाला । २३. वैरभाव को त्यागकर परस्पर उचित व्यवहार । २४. ईश्वर । २५. माता पिता । २६. अतिथि । मेहमान । २७. राष्ट्र की अठारह संपत्तियाँ । विशेष—राष्ट्र की इन अठारह संपत्तियों के नाम हैं,—(१) मंत्री, (२) पुरोहित (३) युवराज । (४) भूपति, (५) द्वारपाल, (६) अंतवँसिक, (७) कारागाराध्यक्ष, (८) द्रव्य-संचयकारक, (९) कृत्याकृत्य अर्थ का विनियोजक, (१०) प्रर्देष्टा, (११.) नगराध्यक्ष, (१२) कार्य निर्माणकारक, (१३) धर्माध्यक्ष, (१४) सभाध्यक्ष, (१५) दंडपाल, (१६) दुर्गपाल, (१७) राष्ट्रांतपाल और (१८) अटवीपाल । २८. मार्ग । पथ (को०) । २९. जलाशय (को०) । ३०. साधना । माध्यम (को०) । ३१. स्त्रोत । मूल (को०) । ३२. मंत्रणा । परामर्श । जैसे कृततीर्थ = जो मंत्रणा कर चुका हो । ३३. चात्वाल और उत्कर के बीच का वेदी का पथ (को०) ।

तीर्थ (२)
वि० १. पवित्र । पावन । पूत । २. मुक्त करनेवाला । रक्षक [को०] ।

तीर्थक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. ब्राह्मण । उ०—युवांगचांग कहते हैं कि मिथ्यादृष्टि के तीर्थक भी ऐसा कहते हैं ।—संपूर्णा० अभि० ग्रं०, पृ० ३५४ । २. तीर्थकर । ३. वह जो तीर्थों की यात्रा करता हो ।

तीर्थक (२)
वि० १. पवित्र । २. पूज्य [को०] ।

तीर्थकमंडलु
संज्ञा पुं० [सं० तीर्थकमण्डलु] वह कमंडल जिसमें तीर्थजल हो [को०] ।

तीर्थकर
संज्ञा पुं० [सं०] १. विष्णु । २. जिन । ३. शास्त्रकार (को०) ।

तीर्थकाक
संज्ञा पुं० [सं०] १. तीर्थ का कौवा । २. अत्यंत लोभी व्यक्ति [को०] ।

तीर्थकृत्
संज्ञा पुं० [सं०] १. जिन । २. शास्ञकार [को०] ।

तीर्थचर्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] तीर्थयात्रा [को०] ।

तीर्थदेव
संज्ञा पुं० [सं०] शिव । महादेव ।

तीर्थपति
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तीर्थराज' ।

तीर्थपाद
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु ।

तीर्थपादीय
संज्ञा पुं० [सं०] वैष्णव ।

तीर्थपुरोहित
संज्ञा पुं० [सं०] तीर्थ का पंडा [को०] ।

तीर्थयात्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पवित्र स्थानों में दर्शन स्नानादि के लिये जाना । तीर्थाटन ।

तीर्थराज
संज्ञा पुं० [सं०] प्रयाग ।

तीर्थराजि
संज्ञा स्त्री० [सं०] काशी [को०] ।

तीर्थराजी
संज्ञा स्त्री० [सं०] काशी । विशेष—काशी में सब तीर्थ हैं, इसी से यह नाम पड़ा है ।

तीर्थवाक
संज्ञा पुं० [सं०] सिर के बाल [को०] ।

तीर्थवायस
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'तीर्थकाक' [को०] ।

तीर्थविधि
संज्ञा स्त्री० [सं०] तीर्थ में करणीय कार्य । जैसे, क्षौरकर्म [को०] ।

तीर्थशिला
संज्ञा स्त्री० [सं०] घाट तक जानेवाली पत्थर की सीढ़ियाँ [को०] ।

तीर्थशौच
संज्ञा पुं० [सं०] तीर्थस्थल पर घाट आदि का परिष्कार करने या कराने की क्रिया [को०] ।

तीर्थसेनि
संज्ञा स्त्री० [सं०] कार्तिकेय की एक मातृका का नाम ।

तीर्थसेवी (१)
वि० [सं० तीर्थग्रेविन्] धार्मिक भाव से तीर्थ में रहनेवाला [को०] ।

तीर्थसेवी (२)
संज्ञा पुं० बगुला [को०] ।

तीर्थाटन
संज्ञा पुं० [सं०] तीर्थयात्रा ।

तीर्थिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. तीर्थ का ब्रह्मण । पंडा । २. बौद्धों के अनुसार बौद्धधर्म का विद्धेषी ब्राह्मण । ३. तीर्थकर ।

तीर्थिया
संज्ञा पुं० [सं० तीर्थ + हिं० इया (प्रत्य०)] तीर्थकरों को माननेवाला, जैनी ।

तीर्थीभूत
वि० [सं०] १. पवित्र । शुद्ध । २. पूज्य [को०] ।

तीर्थोदक
संज्ञा पुं० [सं०] तीर्थ का पवित्र जल [को०] ।

तीर्थ्य (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक रुद्र का नाम । २. सहपाठी ।

तीर्थ्य (२)
वि० तीर्थ से संबंधित [को०] ।

तीर्न
संज्ञा पुं० [सं० तीर्ण] दे० 'तीर्ण' ।

तील पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तिल' । उ०—उलटि तीन तेल चरंगे नीर चरंगे बाई । नाद बिंद आँठी पड़िगा मनवा कही न जाई ।—रामानंद०, पृ० १५ ।

तीलखा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की चिड़िया ।

तीला
संज्ञा पुं० [फा़० तीर] तिनका । बिशेषतः बड़ा तिनका ।

तीली
संज्ञा स्त्री० [फा़० ती (= बाण)] १. बड़ा तिनका । औंक । २. धातु आदि का पतला, पर कड़ा तार । ३. करघे में ढरकी की वह ग्रीक जिसमें नरी पहनाई जाती है । ४. तीलियों की वह सुँची जिससे जुलाहे सूत साफ करते हैं । ५. पडवों का वह औजार जिससे वे रेशम लपेटते हैं । इसमें लोहे का एक तार होता है जिसके एक सिरे पर लकड़ी का एक गोल डुकड़ा लगा रहता है ।

तीब पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० स्त्री] स्त्री । औरत ।

तीबइ पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तौव' । उ०—तौवइ कँवद्य सुभंव अरीक । समुद लहरि औहे तब चारू ।—जायसी (शब्द०) ।

तीबन †
संज्ञा पुं० [सं० तेमन (= व्यंजन)] १. पकवान । २. रसेदार तरकारी ।

तीवर
संज्ञा पुं० [सं०] १. समुद्र । २. व्याघा । शिकारी । ३. घोवर । अहुआ । ४. एक वर्णंसंकर अंत्यज आति । विशेष—यह बह्मवैवर्त पुराण के अनुसार राजपूत माता और क्षत्रिय पिता के गर्भ से उचा पराजर के मत से राजपूत माता और चूर्णक पिता के गर्भ से उत्पन्न है । कुछ गौण तीवर और धीवर को एक मानते हैं । स्मृति के अनुसार तौवर को स्पर्श करने पर स्नान करने की आवश्यकता होती है ।

तीव्र (१)
वि० [सं०] १. अतिशय । अत्यंत । २. तीक्ष्ण । तेज । ३. बहुत गरम । ४. नितांत । बेहद । ५. कटु । कडुवा । ६. दुःसह । असह्य । न सहने योग्य । ७. प्रचंड । ८. तीखा । ९. वेगयुक्त । तेज । १०. कुछ ऊँचा और अपने स्थान से बढ़ा हुआ (स्वर) ।विशेष—संगीत में ५ स्वरों—ऋषभ, गांधार, मध्यम, धैवत और निषाद के तीव्र रूप होते हैं । वि० दे० 'कोमल' ।

तीव्र (२)
संज्ञा पुं० १. लोहा । २. इस्पात । ३. नदी का किनारा । ४. शिव । महादेव ।

तीव्रकंठ
संज्ञा पुं० [सं० तीव्रकण्ठ] सूरज । जमीकंद । ओल ।

तीव्रकंद
संज्ञा पुं० [सं० तीव्रकन्द] सुरन [को०] ।

तीव्रगंधा
संज्ञा स्त्री० [सं० तीव्रगन्धा] अजवायन । यवानी ।

तीव्रगंधिका
संज्ञा स्त्री० [सं० तीव्रगन्धिका] दे० 'तीव्रगंधा' ।

तीव्रगति (१)
संज्ञा स्त्री०, पुं० [सं०] वायु । हवा ।

तीव्रगति (२)
वि० तेज चालवाला [को०] ।

तीव्रगामी
वि० [सं० तीव्रगामिन्] [वि० स्त्री० तीव्रगामिदाँ] तेज गतिवाला । तेज चाल का ।

तीव्रज्वाला
संज्ञा स्त्री० [सं०] धव का फूल जिनके फूल से लोग कहते हैं, शरीर में घाव हो जाता है ।

तीव्रता
संज्ञा स्त्री० [सं०] तीव्र का भाव । तीक्ष्णता । तेजी । तीखापन । प्रखरता ।

तीव्रद्युति
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य [को०] ।

तीव्रगधं
संज्ञा पुं० [सं० तीव्रगन्ध] तमोगुण [को०] ।

तीव्रवेदना
संज्ञा पुं० [सं०] अत्याधिक पौड़ा । भयंकर दुःख [को०] ।

तीव्रसंवेग
वि० [सं०] द्दढ़ निश्चयवाला । अटल [को०] ।

तीव्रसब
संज्ञा पुं० [सं०] एक दिन में होनेवाला एक प्रकार का यज्ञ ।

तीव्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. षढज स्वर की चार श्रुतियों में से पहली श्रुति । २. महकारिणी । खुरासानौ अजवायन । ३. राई । ४. बाँडर दूध । ३. तुलसी । ६. बड़ी मालकँधनी । ७. कुटकी । ८. तरवी वृक्ष ।

तीव्रानंद
संज्ञा पुं० [सं० तीव्रानन्द] महादेव । शिव [को०] ।

तीव्रानुराग
संज्ञा पुं० [सं०] १. औधीयों के अनुसार एक प्रकार का अतिचार । परस्त्री या पर पुरुष के अत्यंत अनुराग करना अथवा काम की बुद्धि के लिये अफीम, कस्तूरी आदि खाना । २. अत्यधिक प्रेम (को०) ।

तीस (१)
वि० [सं० त्रिंछति, पा० औआ] जो में/?/के दाइ और इछतौअ के पहले हो । जो दग का जिगुना हो । बौध और/?/। यौ०—तीसों दिन या औग्र बिद = अदा । हमेशा । तीसमार खाँ = बहुत वीर । बड़ा बहादुर (व्यग्य) ।

तीस (२)
संज्ञा पुं० दस की तिनुदां संख्या जो अंकों में इस प्रकार लिखी जाती है—३० ।

तीस (३)
संज्ञा पुं० [?] आमकली । उ०—रंजि बिपन बाटिका तीस द्रुम छाँह रजप्ति तरु ।—पृ०, रा०, २५ ।३ ।

तीसना पु †
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'टीसना' ।

तीसर (१)
वि० [हिं०] दे० 'तीसरा' । उ०—तब शिव तीसर नयन उधारा । चितवत काम भयउ जरि छारा ।—मानस, १ ।८७ ।

तीसर (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० तीसरा] खेत की तीसरी जुताई ।

तीसरा
वि० [हिं० तीन + सरा (प्रत्य०)] १. क्रम मे तीन के स्थान पर पड़नेवाला । जो दो के उपरांत हो । जिसके पहले दो ओर हों । उ०—दूसरे तीसरे पाँचमें सातमें आठमें तो भखा आइवो कीजिए ।—ठाकुर०, पृ० २ । २. जिसका प्रस्तुत विषय से कोई संबंध न हो । संबंध रखनेवालों से भिन्न, कोई और । जैसे,—व हमारी बात, न तुम्हारी बात, तीसरा जो कहे, वही हो । यौ०—तीसरा पहर = दोपहर के बाद का समय । दिन का तीसरा पहर । अपरह्न ।

तीसवाँ
संज्ञा पुं० [हिं० तीस + वाँ(प्रत्य०)] क्रम में तीस के स्थान पर पड़नेवाला । जो उनतीस के उपरांत हो । जिसके पहले उकतीस और हों ।

तीसी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० अलसी] अलसी नामक तेलहन । वि० दे० 'अलसी' ।

तीसी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० तीस + ई (प्रत्य०)] १. फल आदि गनने का एक मान जो तीस गहियों अर्थात् एक सौ पचास का होता है । २. एक प्रकार की छेनी जिससे लोहे की थालियों आदि पर नकाशी करते हैं ।

तीहा † (१)
संज्ञा पुं० [सं० तुष्टि?] १. तसल्ली । आश्वसन । २. धैर्य । धीरता । ३. संतोष ।

तीहा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० तिहाई] तिहाई । जैसे, आधा तीहा । विशेष—इसका प्रयोग समास ही में होता है ।

तुं पु
सर्व० [हिं०] दे० 'तुम' । उ०—तुं धाता करतार तुं भरता हरता देव ।—पृ० रा०, ६ ।२१ ।

तुंग (१)
वि० [सं० तुङ्ग] १. उन्नत । ऊंचा । उ०—सारा पर्वत गाम तुंग सरल सवाहरित देवदारुओं से ढँका जा ।—किन्नर०, पृ० ४२ । २. डग्र । प्रचंड । उ०—तुंग फकीर शाह सुल्तानै सिर सिर हुकुम चलावै ।—प्राण०, पृ० २६३ । ३. प्रधान । मुख्य ।

तुंग (२)
संज्ञा पुं० १. पुन्नाग वृक्ष । २. पर्वत । पहाड़ । ३. नारियल । ४. किंजल्क । कमल का कैसर । ५. शिव । ६. बुध ग्रह । ७. ग्रहों की उच्च राशि । दे० 'उच्च' । ८. एक वर्णवृत्त नाम जिसके प्रत्येक चरण में दो नगण और दो गुरु होते हैं । जैसे,—न नग गहु बिहारी । कहत अहि पियारौ । ९. एक छोटा झाड़ या पेड़ जो सुलेमान पहाड़ तथा पच्छिमी हिमालय पर कुमाऊँ तक होता है । विशेष—इसकी लकड़ी, छाल और पत्नी रँगने और चमड़ा सिझाने के काम में आती है । इसकी लकड़ी से यूरोप में तस- वीरों कै नक्काशीदार चौखटे आदि भी बचते हैं । हिमालय पर पहाड़ी लोग इसकी टहनियों के टोकरे भी बनाते हैं । यह पेड़ तमक या समाक जाति का है । इसे आमी, दरेंगड़ी और एरंडी भी कहते हैं । १०. सिंहासन (को०) । ११. चतुर या निपुण व्यक्ति (को०) । १२. गूथ । झूंड । समूह (को०) ।

तुंगक
संज्ञा पुं० [सं० तुङ्गक] १. पुन्नाग वृक्ष । नागकेसर । २. महाभारत के अनुसार एक तिर्थ । विशेष—पहले यहीं सारस्वत मुनि ऋषियों को वेद पढ़ाया करते थे । एक बार जब वेद नष्ट हो गए, तब अंगिरा के पुत्र ने एक 'औ३म्' शब्द का उच्चारण किया । इस शब्द के उच्चारण के साथ ही भूला हुआ सब वैद उपस्थित हो गया । इस वटवा के उपलक्ष्य में इस स्थान पर ऋषियों और देवताओं के बड़ा भारी यज्ञ किया था ।

तुंगता
संज्ञा स्त्री० [सं० तुङ्गता] उँचाई ।

तुंगत्व
संज्ञा पुं० [सं० तुङ्गत्व] उच्चता । ऊँचाई ।

तुंगनाथ
संज्ञा पुं० [सं० तुङ्गनाथ] हिमालय पर एक शिवलिंग और तीर्थस्थान ।

तुंगनाभ
संज्ञा पुं० [सं० तुङ्गनाथ] सुश्रुत के अनुसार एक कीड़ा जो विषैल जंतुओं में गिनाया गया है । इसके काटने से जलन और पीड़ा होती है ।

तुंगनास
वि० [सं० तुङ्गनास] लंबी नाकवाला [को०] ।

तुंगबाहु
संज्ञा पुं० [सं० तुङ्गवाहु] तलवार के ३२ हाथों में से एक ।

तुगंबीज
संज्ञा पुं० [सं० तुङ्गबीज] पारा [को०] ।

तुंगभद्र
संज्ञा पुं० [सं० तुङ्गभद्र] मतवाला हाथी ।

तुंगभद्रा
संज्ञा स्त्री० [सं० तुङ्गभद्रा] दक्षिण की एक नदी जो सह्याद्रि पर्वत से निकलकर कृष्णा नदी में जा मिली है ।

तुंगमुक
संज्ञा पुं० [पुं० तुङ्गमुख] गैंड़ा [को०] ।

तुंगरस
संज्ञा पुं० [सं० तुङ्गरस] एक प्रकार का गंधद्रव्य [को०] ।

तुंगला
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की छोटी झाड़ी जो पश्चिमी हिमालय में ५००० फुट की उँचाई तक पाई जाती है । विशेष—पढ़वाल में लोग इसकी पत्तियों का तमाकू या सुरती के स्थाव पार व्यवहार करते हैं । इसके फल खट्टे होते हैं और इमली की तरह काम में लाए जाते हैं ।

तुंगवेणा
संज्ञा स्त्री० [सं० तुङ्गवैणा] महाभारत के अनुसार एक नदी जिसका नाम महानदी, (बेण गंगा) आदि के साथ आया है । कदाचित् यह तुंगभद्रा का दूसरा नाम हो ।

तुंगा
संज्ञा स्त्री० [सं० तुङ्गा] १. वंशलोचन । २. शमी वृक्ष । ३. तुंग नामक वर्णवृत्त । ४. मैसूर की एक नदी (को०) ।

तुंगारण्य
संज्ञा पुं० [सं० तुङ्गारण्य] झाँसी से ६ कोस ओड़छा के पास का एक जंगल । इस स्थान पर एक मंदिर है और मेला लगता है । यह बेतवा नदी के तट पर है । उ०—नदी बेतवै तीर जहँ तीरथ तुंगारन्य । नगर ओड़छो तहँ बसै धरनी तल में धन्य ।—केशव (शब्द०) ।

तुंगारन्न पु †
संज्ञा पुं० [सं० तुङ्गारण्य] दे० 'तुंगारण्य' ।

तुंगारि
संज्ञा पुं० [सं० तुङ्गारि] सफेद कनेर का पेड़ ।

तुंगिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० तुङ्गिनी] महा शतावरी । बड़ी सतावर ।

तुंगिमा
संज्ञा स्त्री० [सं० तुङ्गिमन्] तुंगता । ऊँचाई [को०] ।

तुंगी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० तुङ्गी] १. हलदी । २. रात्रि । ३. बनतुलसी । बबई । ममरी ।

तुंगी (२)
वि० [सं० तुङ्गिन्] ऊँचा [को०] ।

तुंगी (३)
संज्ञा पुं ऊँचाई पर स्थित ग्रह [को०] ।

तुंगीनास
संज्ञा पुं० [सं० तुङ्गीनास] दे० 'तुंगनाभ' ।

तुंगीपति
संज्ञा पुं० [सं० तुङ्गीपति] चंद्रमा ।

तुंगीश
संज्ञा पुं० [सं० तुङ्गीश] १. शिव । २. कृष्ण । ३. सूर्य ।

तुंज (१)
संज्ञा पुं० [सं० तुञ्ज] १. वज्र । २. आघात । धक्का (को०) । ३. आक्रमण (को०) । ४. राक्षस (को०) । ५. दान देना (को०) । ६. दबाव । दाब (को०) ।

तुंज (२)
वि० दुष्ट । फितरती । हानिकर [को०] ।

तुंजाल
संज्ञा पुं० [सं० तुरङ्ग + जाल] एक प्रकार का जाल जो घोड़ों के ऊपर उन्हें मक्खियों आदि से बचाने के लिये डाला जाता है । इसके नीचे फुंदने भी लगते हैं ।

तुंजीन
संज्ञा पुं० [सं० तुञ्जीन] काश्मीर देश के कई प्राचीन राजाओं का नाम जिसका वर्णन राजतरंगीनी में है ।

तुंड
संज्ञा पुं० [सं० तुण्ड] १. मुख । मुँह । उ०—दो दो द्दढ़ रह दंड दबाकर निज तुंडों में ।—साकेत, पृ० ४१३ । २. चंचु । चोंच । ३. निकला हुआ मुँह । थूथन । ४. तलवार का अगला हिस्सा । खंग का अग्र भाग । उ०—फुट्टंत कपाल कहुँ गज मुंड । तुट्टत कहुँ तग्वारिन तुंड ।—सूदन (शब्द०) । ५. शिव । महादेव । ६. एक राक्षस का नाम । ७. हाथी की सूँड़ (को०) । ८. हथियार की नोक (को०) ।

तुंडकेरिका
संज्ञा स्त्री० [सं० तुण्डकेरिका] कपास वृक्ष ।

तुंडकेरी
संज्ञा स्त्री० [सं० तुण्डकेरी] १. कपास । २. कुँदरू । बिंबाफल ।

तुंडकेशरा
संज्ञा पुं० [सं० तुण्डकेशरी] मुख का एक रोग जिसमें तालु की जड़ में सूजन होती और दाह पीड़ा आदि उत्पन्न होती है ।

तुंडनाय पु
संज्ञा पुं० [सं०तुण्ड + नाद] तुंडनाद । शुंडाध्वनि । चिंघाड़ । उ०—तुंडनाय सुनि गरजत गुँजरत भौंर ।— शिखर०, पृ० ३३१ ।

तुंडला पु
संज्ञा स्त्री० [सं०तुण्डिल?] पीपर । उ०—कोला, कृष्णा, मागधी, तिग्म, तुंडला होइ ।—नंद० ग्रं०, पृ० १०४ ।

तुंडि
संज्ञा स्त्री० [सं० तुण्डि] १. मुँह । २. चोंच । ३. बिंबाफल । ४. नाभि ।

तुंडिक
वि० [सं० तुण्डिक] तुंडवाला । थूथनवाला [को०] ।

तुंडिका
संज्ञा स्त्री० [सं० तुण्डिका] १. टोंटी । २. चोंच । ३. बिंबाफल । कुँदरू । ४. नाभि (को०) ।

तुंडिकेरी
संज्ञा स्त्री० [सं० तुण्डिकेर] १. कपास वृक्ष । २. तालु में अत्यधिक सूजन का होना [को०] ।

तुंडिकेशी
संज्ञा स्त्री० [सं० तुण्डिकेशी] कुँदरू ।

तुंडिभ
वि० [सं० तुण्डिभ] १. तोंदल । जिसका पेट बड़ा हो । २. तुंदिल । जिसकी नाभि उभरी हुई हो [को०] ।

तुंडिल
वि० [सं० तुण्डिल] १. तोंदवाला । निकले हुए पेटवाला ।२. जिसकी नाभि निकली हुई हो । निकली हुई ढोंढवाला । ढोंढू । ३. बकवादी । मुँहजोर ।

तुंडी (१)
वि० [सं० तुण्डिन] १. मुँहवाला । चोंचवाला । ३. थूथनवाला । ४. सूँड़वाला ।

तुंडी (२)
संज्ञा पुं० १. गणेश । उ०—हिरहर विधि रवि शक्ति समेता । तुंडी ते उपजत सब तेता ।—निश्चल (शब्द) । २. शिव के वृषभ का नाम । नंदी (को०) ।

तुंडी (३)
संज्ञा स्त्री० १. नाभि । ढोढ़ी । २. एक प्रकार का कुम्हाड़ा [को०] ।

तुंडीगुदपाक
संज्ञा पुं० [सं० तुण्डीगुदपाक] एक रोग जिसमें बच्चों की गुदा पक जाती है और नाभि में पीड़ा होती है ।

तुंड़ोरमंडल
संज्ञा पुं० [सं० तुण्डीरमण्डल] दक्षिण के एक देश का नाम । उ०—पुनि तुंडीर मंडल इक देसा । तहँ बिलमंगल ग्राम सुवेसा ।—रघुराज (शब्द०) ।

तुंद (१)
संज्ञा पुं० [सं० तुन्द] पेट । उदर ।

तुंद
वि० [फा़०] १. तेज । प्रचंड । घोर । २. आवेगपूर्ण । पुरजोश (को०) । ३. क्रुद्ध । कुपित (को०) । यौ०—तुंदमिजाल = दे० 'तुंदखू' । ४. शीघ्र । त्वरित । तेज । जैसे,—हवा का तुंद झोंका । यौ०—तुंदरफ्तार, तुंदरी = द्रुंतगामी । बहुत तेज चलनेवाला ।

तुंदकूपिका
संज्ञा स्त्री० [सं० तुन्दकूपिका] नाभि का गढ्ढा [को०] ।

तुंदकूपी
संज्ञा स्त्री० [सं० तुन्दकूपी] नाभि का गड्ढा [को०] ।

तुदंखू
वि० [फा़० तुंदखू] कड़े मिजाज का । गुस्सैल । क्रोधी । उ०—उस तुंदखू सनम से जब से लगा हूँ मिलने । हर कोई मानता है मेरी दिलावरी को ।—कविता कौ०, भा० ४, पृ० ४८ ।

तुंदबाद
संज्ञा स्त्री० [फा़०] आँधी । झक्कड़ । झँझावात [को०] ।

तुंदर
संज्ञा पुं० [फा़०] १. बादल की गरज । मेघगर्जन । २. मधुर स्वरवाली एक प्रसिद्ध चिड़िया । बुलबुल [को०] ।

तुंदि
संज्ञा पुं० [सं० तुन्दि] १. नाभि । २. एक गंधर्व का नाम । ३. उदर । पेट (को०) ।

तुंदिक
वि० [सं० तुन्दिक] १. तोंदवाला । बड़े पेटवाला । तुंदिल । २. बड़ा । विशाल (को०) ।

तुंदिकफला
संज्ञा स्त्री० [सं० तुन्दिकफला] खीरे की बेल ।

तुंदिकर
संज्ञा पुं० [सं० तुन्दिकर] नाभि । ढोंढ़ी [को०] ।

तुंदिका
संज्ञा स्त्री० [सं० तुन्दिका] नाभि ।

तुंदित
वि० [सं० तुन्दित] दे० 'तुंदिक' [को०] ।

तुंदिभ
वि० [सं० तुन्दिभ] दे० 'तुंदिक' [को०] ।

तुंदिल (१)
वि० [सं० तुन्दिल] तोंदवाला । बड़े पेटवाला ।

तुंदिल (२)
संज्ञा पुं० गणेश जी [को०] ।

तुदिलफला
संज्ञा स्त्री० [सं० तुन्दिलफला] १. खीरा । २. ककड़ी [को०] ।

तुंदिलित
वि० [सं० तुन्दिलित] तोंदवाला । तोंदियल [को०] ।

तुंदिलकरण
संज्ञा पुं० [सं० तुन्दिलीकरण] फुलाना । बड़ा करना [को०] ।

तुंदी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० तुन्दी] नाभि ।

तुंदी (२)
वि० [सं० तुन्दिन्] दे० 'तुंदिक' [को०] ।

तुंदी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. तीव्रता । तेजी । २. आवेग । जोश । ३. स्वभाव की तीव्रता । बदमिजाजी । ४. लिंग का उत्थान । ५. कोप । गुस्सा [को०] ।

तुंदैल
वि० [हि० तुंद + ऐल (प्रत्य०)] दे० 'तुंदैला' ।

तुंदेला
वि० [सं० तुन्द + हिं० ऐला (प्रत्य०)] तोंदवाला । बड़े पेटवाला । लंबोदर ।

तुंब
संज्ञा पुं० [सं० तुम्ब] १. लौकी । लौवा । धोया । २. लौवे का सूखा फल । तूँवा । ३. आँवला (को०) ।

तुंबर
संज्ञा पुं० [सं० तुम्बर] १. दे० 'तुंबरु' । २. एक वाद्ययंत्र । तानपूरा । उ०—बिसद जंत सुर सुद्ध तंत्र तुंबर जुत सो है । ह० रासो, पृ० १ ।

तुंबरु
संज्ञा पुं० [सं० तुम्बरु] एक गधर्व ।

तुंबरी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० तुम्बरी] एक प्रकार का अन्न [को०] ।

तुंबरी (२) (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तूँबी' ।

तुंबवन
संज्ञा पुं० [सं०] बृहत्संहिता के अनुसार एक देश जो दक्षिण दिशा में है ।

तुंबा
संज्ञा पुं० [सं० तुम्बा] [स्त्री० अल्पा० तुंबी] १. कड़ुआ कद्दू । गोल कड़आ घीया । २. कड़ुए कददू की खोपड़ी का पात्र । ३. एक प्रकार का जंगली धान जो नदियों या तालों के किनारे आपसे आप होतो है । ४. दुधार गाय (को०) । ५. दूध का बर्तन (को०) ।

तुंबार
संज्ञा पुं० [सं० तुम्बार] तूँबी [को०] ।

तुंबि
संज्ञा स्त्री० [सं० तुम्बि] लौकी [को०] ।

तुंबिका
संज्ञा स्त्री० [सं० तुम्बिका] दे० 'तुंबी' । उ०—पानी माहिं तुंबिका बूड़ी़ पाहन तिरत न लागी बेर ।—सुंदर० ग्रं०, भा० २, पृ० ५१३ ।

तुंबी
संज्ञा स्त्री० [सं० तुम्बी] १. छोटा कड़ुवा कद्दु । छोटा कड़ुवा घीया । तितलौकी । २. ओल कद्दु का खोपड़ा । ओल घीए का बना हुआ पात्र ।

तुंबुक
संज्ञा पुं० [सं० तुम्बुक] कद्दु का फल । घीया ।

तुंबुरी
संज्ञा स्त्री० [सं० तुम्बुरी] १. धनिया । २. कुतिया ।

तुंबुरु
संज्ञा पुं० [सं० तुम्बुरु] १. धनिया । २. एक प्रकार के पौधे का बीज जो धनिया के आकार का पर कुछ कुछ फटा हुआ होता है । विशेष—इसमें बड़ी झाल होती है । मुँह में रखने से एक प्रकार की चुनचुनाहट होती है और लार गिरती है । दाँत के दर्द में इस बीज को लोग दाँत के नीचे दबाते हैं । वैद्यक में यह गरम, कड़ुवा, चरपरा, अग्निदीपक तथा कफ, वात, शूल आदि को दूर करनेवाला माना जाता है । इसे बंगाल में नैपाली धनिया कहते हैं ।एक गंधर्व जो चैत के महीने में सूर्य के रथ पर रहते हैं । विशेष—ये विष्णु के एक प्रिय पार्श्वचर और संगीत विद्या में अति निपुण हैं । ४. एक जिन उपासक का नाम । ५. तानपूरा (को०) ।

तुंदियाना
क्रि० अ० [हिं० तोंद से नामिक धातु] तोंद का बढ़ना ।

तुँदैला
वि० [हिं० तोंदे + ऐला (प्रत्य०)] बड़े पेटवाला । तोंदियल ।

तुँबड़ी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तूँबड़ी' ।

तुँबड़ी (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक छोटा पेड़ जिसकी लकड़ी अंदर से सफेद, नर्म और चिकनी निकलती है । विशेष—इस पेड़ की लकड़ी मकानों मे लगती है । इसकी पत्तियाँ चारे के काम में आती है ।

तुँबर पु
संज्ञा पुं० [हिं०] एक गंधर्व तुंबुरु । उ०—जोगनी जोगमाया जगी नारद तुँबर निहस्सिया । दस एक रुद्र दारिद्र गत दानव तामर हस्सिया ।—पृ० रा०, २ ।१३० ।

तुँबरी पु †
संज्ञा [सं० तुम्ब + हिं० री० (प्रत्य०)] दे० 'तूँबरी' ।

तुअ पु †
सर्व० [हिं०] दे० 'तुव । उ०—संज्ञा आवै गोत्र पुनि, छेम धाम तुअ नाम ।—नंद० ग्रं०, पृ० ८६ ।

तुअना पु †
क्रि० अ० [हिं० चूना, चुवना] १. चूना । टपकना । २. गिर पड़ना । खड़ा न रह सकना । ठहरा न रहना । उ०— निकरै सी निकाई निहारे नई रति रूप लुभाई तुई सी परै ।—सुंदरीसर्वस्व (शब्द०) । ३. गर्भपात होना । बच्चा गिर पड़ना । संयो क्रि०—पड़ना ।

तुअर †
संज्ञा पुं० [सं० तुवरी] अरहर । आढ़की । उ०—और चाँवर सीधे, नए वासन मे बूरा तुअर आदि सर्व सामान घर में हतो सो हरिवंस जी को सर्व वस्तू दिरगई ।—दो सौ वावन०, भा० १, पृ० ७५ ।

तुआर पु
सर्व [हिं०] दे० 'तुम्हारे' । उ०—नाथ तुआरे कुशल कुशल अब लेखिहिं ।—अकबरी०, पृ० ३३७ ।

तुहँ पु
सर्व [हिं०] दे० 'तू' । उ०—अबहिं बारि तुईँ पेम न खेला । का जानसि कस होइ दुहेला,—जायसी ग्रं०, पृ० ७४ ।

तुइ (१)
सर्व० [हिं०] दे० 'तू' ।

तुइ पु (२)
सर्व० [हिं० तू] तुझे । तुझको । उ०—भूलि कुरंगिनी कसि भई मनहुँ सिंघ तुइ डीठ ।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० २३४ ।

तुई (१)
संज्ञा स्त्री० [?] कपड़े पर बुनी हुई एक प्रकार की बेल जिसे दुष्ट स्त्रियाँ दुपट्टों पर लगाती हैं ।

तुई (२)
सर्व० [हिं०] दे० 'तू' ।

तुक (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० टूक (= टुकड़ा)] १. किसी पद्य या गीत का कोई खंड । कड़ी । २. पद्य के चरण का अंतिम अक्षरों का परस्पर मेल । अक्षरमैत्री । अंत्यानुप्रास । काफिया । यौ०—तुकबंदी । मुहा०—तुक जोड़ना = (१) वाक्यों को जोड़कर और चरणों के अंतिम अक्षरों का मेल मिलाकर पद्य खड़ा करना । (२) भद्दा पद्य बनाना । भद्दी कविता करना । तुक बैठाना = दे० 'तुक जोड़ना' ।

तुक (२)
संज्ञा पुं० [सं तर्क] मेल । सामंजस्य । जैसे,—आपकी बात का कोई तुक नहीं है ।

तुकना
क्रि० स० [अनु०] एक अनुकरण शब्द जो 'तकना' शब्द के साथ बोलचाल में आता है । अ०—तकि के तुकि कै सर पावनि को लखि के द्विज देवन शापनि को ।—रघुराज (शब्द०) ।

तुकतुकाना
क्रि० अ० [हिं०] तुक जोड़ते हुए कविता का अम्यास करना । भद्दी तुकें जोड़ना ।

तुकबंद
संज्ञा पुं० [हिं० तुक + बंद (= बाँधना)] तुक बाँधनेवाला । तुक्कड़ । उ०—बहुत से तुकबंद प्रत्येक युग में रहते हैं और जीवन पर्यत इसी भ्रम में बने रहते है कि वे कवि है ।— काव्याशास्त्र, पृ० ७ ।

तुकबंदी
संज्ञा स्त्री० [हिं० तुक + फा़० बंदी] १. तुक जोड़ने का काम । भद्दी कविता करने की क्रिया । २. भद्दा पद्य । भद्दी कविता । ऐसा पद्य जिसमें काव्य के गुण न हों । उ०— बहुत दिनों के बाद आज मेरी चंद पुरानी तुकबंदियाँ संग्रह के रूप में सामने आ रही हैं ।

तुकमा
संज्ञा पुं० [फा़० तुक्कमह्] घुँडी फँसाने का फंदा । मुद्धी ।

तुकांत
संज्ञा पुं० [हिं० तुक + सं० अन्त] पद्य के दो चरणों के अंतिम अक्षरों का मेल । अंत्यानुप्रास । काफिया ।

तुका
संज्ञा पुं० [फा़० तुक्मह्] वह तीर जिसमें गाँसी न हो । वह तीर जिसमे माँसी के स्थान पर घुंडी सी बनी हो । उ०— काम के तुका फूल डोलि डारैं मन औरे किथे डारैं ये कंदबन की डारैं री ।—कविंद (शब्द०) ।

तुकार
संज्ञा पुं० [हिं० तू + सं० कार] अशिष्ट संबोधन । मध्यम पुरुष वाचक अशिष्ट सर्व० का प्रयोग । 'तू' का प्रयोग जो अपमानजनक समझा जाता है । मुहा०—तू तुकार करना = अशिष्ट शब्द से संबोधन करना । 'तू' आदि अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करना ।

तुकारना
क्रि० स० [हिं० तुकार] तूस्तू करके संबोधन करना । अशिष्ट संबोधन करना । उ०—वारैं हों कर जिन हरि को वदन, छुवारी । वारौं वह रसना जिन बोल्यो तुकारी ।— सूर (शब्द०) ।

तुक्कड़
संज्ञा पुं० [हिं० तुक + अक्कड़ (प्रत्य०)] तुक जोड़नेवाला । तुकबंदी करनेवाला । भद्दी कविता बनानेवाला ।

तुक्कल
संज्ञा स्त्री० [फा़० तुक्कह्] एक प्रकार की बड़ी पतंग जो मोटी डोर पर उड़ाई जाती है ।

तुक्का
संज्ञा पुं० [फा़० तुक्कह्] १. वह तीर जिसमें गाँसी के स्थान पर घुंड़ी सी बनी होती है । २. टीला । छोटी पहाड़ी । टेकरी । ३. सीधी खड़ी वस्तु । मुहा०—तुक्का सा = सीधा उठा हुआ । ऊपर उठा हुआ । जैसे,—जब देखो तब रास्ते में तुक्का सी बैठी रहती है ।

तुक्ख पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तुच्छ' । उ०—ज्ञान कथै बहुभेष बनावै इहौ बात सब तुक्ख ।—पलटू०, भा० ३, पृ० ११ ।

तुक्खार
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'तुखार' [को०] ।

तुख
संज्ञा पुं० [सं० तुष] १. भूसी । छिलका । उ०—भटकत पट अद्धैतता अटकत ज्ञान गुमान । सटकत वितरन तें बिहरि फटकत तुख अभिमान ।—तूलसी (शब्द०) । २. अंडे के ऊपर का छिलका । उ०—अंड फोरि किय चेंटुआ तुख पर नौर निहारि । गहि चंगुल चातक चतुर डारेउ बाहर बारि ।— तुलसी (शब्द०) ।

तुखार (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक देश का प्राचीन नाम जिसका उल्लेख अथर्व वेद परिशिष्ट, रामायण, महाभारत इत्यादि में है । विशेष—अधिकांश, ग्रंथों के मत से इसकी स्थिति हिमालय के उत्तरपश्चिम में होनी दी चाहिए । यहाँ के घोड़ें प्राचीन काल में बहुत अच्छे माने जाते थे । २. तुषार देश का नीवासी । विशेष—हरिवंश के अनुसार जब महर्षियों ने बेणु का मंथन किया था, तब इस अधर्रतम असभ्प जाति की उत्पत्ति हुई थी; पर डक्त ग्रंथ में इस जाति का निवासस्थान विंध्य पर्वत लिखा है जो और ग्रंथों के विरुद्ध पड़ता है । ३तुषार देश का घोडा़ । ४. घोड़ा । उ०—(क) तीख तुखार चाँड़ औ बाँके । तरपहि तबहि तापन बिनु हाँके ।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० १५० । (ख) आना काटर एक तुखारू । कहा सो फेरौ भा असावरू ।—जायसी (शब्द०) ।

तुखार (२)
संज्ञा पुं० [सं०]दे० 'तुषार' ।

तुख्म
संज्ञा पुं० [फा़० तुख्म] १. बीज । दाना । २. गुठली (को०) । ३. अंडा (को०) । ४. संतान । औलाद (को०) । ५. वीर्य (को०) । यौ०—तुरुमपाशी = बीजारोपण । खेत में बीज बोना । तुख्म- रेजी = बीज बोया ।

तुख्मी
वि० [फा़० तुख्मी] १. जो बौज बोकर उत्पन्न किया गया हो । २. देशी आम जो कलमी न हो [को०] ।

तुगा
संज्ञा स्त्री० [सं०] वंशलोचन ।

तुगात्क्षोरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] वंशलोचन ।

तुग्र
संज्ञा पुं० [सं०] वैदिक काल के एक राजर्षि का नाम जो अश्विनी कुमारों के उपासक थे । विशेष—इन्होंने द्वीपांतरों के शत्रुओं को परास्त करने के लिये अपने पुत्र भुज्यु को जहाज पर चढ़ाकर समुद्रपथ से भेजा था । मार्ग में जब एक बड़ा तूफान आया और वायु नौका को उलटने लगी, तब भुज्यु ने अश्विनीकुमारों की स्तुति की । अश्विनीकुमारों ने संतुष्ट होकर भुज्यु को सेना सहित अपनी बौका पर लेकर तीन दिनों में उसके पिता के पास पहुँचा दिया ।

तुग्र्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. तुग्र के वंश का पुरुष । तुग्र वंशज । २. तुग्र के पुत्र भुज्यु ।

तुग्र्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] पानी । जल [को०] ।

तुच पु †
संज्ञा पुं० [सं० त्वच्] चमड़ा । छाल । उ०—बहु चील नोचि लै जात तुच मोद मढ़यो सबको हियो ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० २९५ ।

तुचा †
संज्ञा स्त्री० [सं० त्वचा] दे० 'त्वचा' । ऊ०—आधे तन बाँबी चढ़ी आई । सर्प तुचा छाती लपटाई ।—शकुंतला, पृ० १३६ ।

तुचु पु
संज्ञा स्त्री० [सं० तुच] दे० 'त्वचा' । उ०—आँखि नाक जिभ्या तुचु काना । पाँचो इंद्री ज्ञान प्रधाना ।—सं० दरिया, पृ० २६ ।

तुच्छ (१)
वि० [सं०] १. भीतर के खाली । खोखला । निःसार । शून्य । २. क्षुद्र । नाचीज । उ०—जिन्हें तुच्छ कहते हैं, उनसे भागा क्यों, तस्कर ऐसा?—साकेत, पृ० ३८८ । ३. ओछा । खोटा । नीच । ४. अल्प । थोड़ा । ५. शीघ्र । उ०— छिप्र सु सरवर तुच्छ लघु राजा रंभा सोइ ।—अनेकार्थ० पृ० ९८ । ९. छोड़ा हुआ । त्यक्त (को०) । ७. गरीब । दरिद्र (को०) । ८. दयनीय । दुखी (को०) ।

तुच्छ (२)
संज्ञा पुं० १. सारहीन छिलका । भूसी । २. तूतीया । ३. नौल का पौधा ।

तुच्छक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] काले और हरे रंग का मरकत या पन्ना जो शूद्र या बिम्ब कोटि का माना जाता है ।

तुच्छक (२)
वि० शून्य । खाली । रिक्त [को०] ।

तुच्छता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. हीनता । नीचता । २. ओछापन । क्षुद्रता । ३. अल्पता ।

तुच्छदय
वि० [सं०] दयाशून्य । निर्दय [को०] ।

तुच्छना पु
वि० [सं० तक्षण] छीलका । काटना । टराशना । उ०—चहुआन तुच्छ ढढ्ढर वहिए ।—पृ० रा०, १० ।२७ ।

तुच्छत्व
संज्ञा पुं० [सं०] १. हीनता । क्षुद्रता । २. ओछापन ।

तुच्छद्र
संज्ञा पुं० [सं०] रेंड़ का पेड़ ।

तुच्छधान्य
संज्ञा पुं० [सं०] भूसौ । तुष [को०] ।

तुच्छधान्यक
संज्ञा पुं० [सं०] भूसी । तुस ।

तुच्छप्राय
वि० [सं०] महत्वहीन [को०] ।

तुच्छबित पु
वि० [सं० तुच्छ + वित्त] तुच्छ । रुकणय । उ०— इससों इक अधिकै भए तुमहूँ तिनमैं तुच्छबित ।—ब्रज० ग्रं०, पृ० ११० ।

तुच्छा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मील का पौधा । २. तूतीया । ३. गुजराती इलायची । छोटी इलायची । ३. कृष्ण पक्ष की चतुदंदी तिथि (को०) ।

तुच्छातितुच्छ
वि० [सं०] छोटे से छोटा । अत्यंत हीन । अत्यंत क्षुद्र ।

तुच्छीकरण
संज्ञा पुं० [सं० तुच्छ] तुच्छ होने या करने की क्रिया या भाव ।

तुच्छोकृत
वि० [सं० तुच्छ] तुच्छ किया हुआ । उ०—समस्त भावों को तुच्छीकृत करना ।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० १०९ ।

तुच्छय
वि० [सं०] रिक्त । शून्य । व्यर्थ [को०] ।

तुछ पु
वि० [सं० तुच्छ] दे० 'तुच्छ' । उ०—तुछ बुद्धि भट्ट देखत भुल्यौ कवि सुभंति कहै का बरन ।—पृ० रा०, ६ ।९५ ।

तुज (१)
वि० [सं०] दुष्ट । कष्टप्रद [को०] ।

तुज (२)
संज्ञा पुं०दे० 'तुंज' [को०] ।

तुज पु (३)
सर्व० [हिं०] दे० 'तुझ' । उ०—जिम्ने जन्म डारा है तुज कूँ, बिसर गया उनका ध्यान जू ।—दक्खिनी०, पृ० १४ ।

तुजनूँ पु
सर्व० [पं०] तुझे । तुझको । उ०—मैं तैडी लटकन फँद्या क्या तुजमुँ कीया ।—घनानँद, पृ० १७८ ।

तुजीह
संज्ञा स्त्री० [हिं०] धनुष । कमान ।

तुजुक
संज्ञा पुं० [तुं० तुजूक] १. बज्जा । सजावट । २. प्रबंध । व्यवस्था । इंतिजाम । ३. सैन्य—सज्जा । फौज की तरतीब । ४. राजसभा की सजावट । उ०—भूवन भनत तहाँ सरजा सिवाजी गाजौ । तिनको तुजुक देखि नेकहू न लरजा ।—भूषण ग्रं०, पृ० ४४ । ५. आत्मचरित् । जैसे, तुजुक जहाँगीरी ।

तुझ
सर्व० [प्रा० तुज्झं०] 'तू' शब्द का वह रूप जो उसे प्रथमा और षष्ठी के अतिरिक्त और विभक्तियाँ लगने के पहले प्राप्त होता है । जैसे,तुझको, तुझसे, तुझपर, तुझमें ।

तुझे
सर्व० [हिं० तुझ] 'तू' का कर्म और संप्रदान रूप । तुझको ।

तुभझ
सर्व० [हिं०] तुम्हारा । तेरा । साल्ह कुँवर सुहिणइ, मिअइ, सुंबरि सब कर तुभझ ।—ढोला०, पृ० ४४ ।

तुट पु
वि० [सं० ञुट (= दूटवा)] टुकड़ा । लेशमात्र । जरा सा ।

तुटना पु
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'तूटना' । उ०—तुतै दंत जारी । धुरै गै बिहारी । परे भूमि आनं । कलं कूट जानं ।—पृ० रा०, १ ।६४३ ।

तुटि
संज्ञा स्त्री० [सं०] छोटी इलापची [को०] ।

तुटितुट
संज्ञा पुं० [सं०] शिव ।

तुटुम
संज्ञा पुं० [सं०] मूषक । मूस । चूहा [को०] ।

तुट्टना पु
क्रि० अ० [हिं० टूटना] दे० 'तूटना' । उ०—दरिया दधि किय मथन भोम फट्टिय षह तुट्टिय ।—पृ० रा०, १ ।६३९ ।

तुट्ठना पु (१)
क्रि० स० [सं० तुष्ट, प्रा० तुट्ठ + स (प्रत्य०)] तुष्ट करना । प्रसन्न करना । राजी करना ।

तुट्ठना पु (२)
क्रि० अ० तुष्ट होना । प्रसन्न होना । राजी होना ।

तुठना पु
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'तुठना' । उ०—स्नेह तुठौ राजा औलगी मेलही ।—बी० रासो, पृ० ४८ ।

तुड़ताँण पु
क्रि० वि० [सं० स्वरितः] शीघ्र । उ०—अखई माधो- दास रौ, तिण वेक्षा तुड़ताँण ।—रा० रू०, पृ० ३३३ ।

तुड़वाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० तुड़वाना] दे० 'तुडा़ई' ।

तुड़वाना
क्रि० स० [हिं० तोड़वा का प्रे० रूप] तोंड़ने का काम कराना । तोड़ने मे प्रवृत्त करना । तोड़ने देना ।

तुड़ा़ई
संज्ञा स्त्री० [हिं० तुड़ा़ना] १. तुड़ा़ने की क्रिया या भाव । २. तोड़ने की क्रिया या भाव । ३. तोड़ने की मजदूरी ।

तुड़ा़ना
क्रि० स० [हिं० तोड़ने का प्रे० रूप] १. तोड़ने का काम कराना । तुड़वाना । २. बँधी हुई रस्सी आदि को तोड़ना । बंधन छुड़ाना । जैसे,—घोड़ा रस्सी तुड़ा़कर भागा । ३. अलग करना । संबंध तोड़ना । जैसे, बच्चे को माँ से तुड़ा़ना । ४. एक बड़े सिक्के को बराबर मूल्य के कई छोटे छोटे सिक्कों से बदलना । भुनाना । जैसे, रुपया तुड़ा़ना । ५. दाम कम कराना । मूल्य घटवाना ।

तुडुम
संज्ञा पुं [सं० तुरम्] तुरही । विगुल ।

तुणि
संज्ञा पुं० [सं०] तुन का पेड़ ।

तुतरा पु †
वि० [हिं० तोतला] [वि० स्त्री० तुतरी] दे० 'तोतला' । उ०—मन मोहन की तुतरी बोलन मुनिमन हरत सुहँसि मुसकनियाँ ।—सूर (शब्द०) ।

तुतराना पु
क्रिया अ० [हिं० तुतरा + ना (प्रत्य०)] दे० 'तुतलाना' । उ०—श्रवणन नहिं उपकंठ रहत है अरु बोलत तुतरात री ।—सूर (शब्द०) ।

तुतरानि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] तुतलाने की क्रिया या भाव ।

तुतरानी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० तुतरा + ई (प्रत्य०)] तोतली । तुतलाती हुई । उ०—जननि वचन सुनि तुरत उठे हरि कहत बात तुतरानी ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३३७ ।

तुतरी पु
वि० स्त्री० [हिं०] दे० 'तुतली' । उ०—काल ह्वै प्रान सुधा सींचति आरस भरि बोलनि तुतरी ।—घनानंद, पुं० ४३ ।

तुतरौहाँ †पु
वि० [हिं० तुतरा + औहाँ (प्रत्य०)] दे० 'तोतला' ।

तुतला
वि० [हिं०] दे० 'तोतला' । उ०—मा के तन्मय उर से मेरे जीवन का तुतला उपक्रम ।—पल्लव, पृ० १०६ ।

तुतलान
संज्ञा स्त्री० [हिं० तुतलाना] तुतलाने की क्रिया या भाव ।

तुतलाना
क्रि० अ० [सं०त्रुट (= टूटना) या अनु०] शब्दों और वर्णो का अस्पष्ट उच्चारण करना । रुक रुककर टूटे फूटे शब्द बोलना । साफ न बोलना । शब्द बोलने में वर्ण ठीक ठीक मुँह से न निकलाना ।,जैसे,—बच्चों का तुतलाना बहुत प्यारा लगता है । उ०—लागति अनूठी मीठी बानी तुतलान की ।—शकुंतला०, पृ० १४० ।

तुतली
वि० स्त्री० [हिं०] दे० 'तोतली' । उ०—कर पद से चलते देख उन्हे सुनकर तुतली वाणी रसाल ।—सागरिका, पृ० ११३ ।

तुतुई †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तुतुही' ।

तुतु लूम लूल पु
संज्ञा पुं० [अनु०] बच्चों का एक खेल । उ०— मचत कबहुँ झावरि कबहूँ तुतु लूम लूल भल ।—प्रेमघन०, भा० १, पृ० ४७८ ।

तुतुही †
संज्ञा स्त्री० [सं० तुण्ड] १. टोंटीदार छोटी घंटी । छोटी सी झारी जिसमें टोंटी लगी हो । २. एक वाद्य । तुरही ।

तुत्त
सर्व० [सं० त्वत्] तुम । उ०—तिहि वँस भीम अरु ध्रम्म मुत्त । तिहि बंस बली अनगेस तुत्त । २. अग्नि (को०) । ३. पत्थर (को०) ।

तुत्थक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'तुत्थ' ।

तुत्थाजंन
संज्ञा पुं० [सं० तुत्थाञ्जन] तूतिया । नीला थोथा ।

तुत्था
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. नील का पौधा । २. छोटी इलायची ।

तुद (१)
वि० [सं०] आघातकारी । पीड़ादायी । कष्टकर जैसे,— मर्मतुंद । असंतुद ।

तुद (२)पु
संज्ञा पुं० [?] दुःख । उ०—कदन, विधुर, अक, दून, तुद, गहन, ब्रजिन पुनि आहि ।—नंद० ग्रं०, पृ० १०० ।

तुदन
संज्ञा पुं० [सं०] १. व्यथा देने की क्रिया । पीड़न । २. व्यथा । पीड़ा । उ०—कृपादृष्टि करि तुदन मिटावा । सुमन माल पहिराय पठावा ।—विश्राम० (शब्द०) । ३. चुभाने या गड़ाने की क्रिया ।

तुन
संज्ञा पुं० [सं० तुन्न] एक बहुत बड़ा पेड़ जो साधारणतः सारे उत्तरीय भारत में सिंध नदीं से लेकर और भूटान तक होता है । विशेष—इसकी ऊँचाई चालीस से लेकर पचास साठ हाथ तक और लपेट दस बारह हाथ तक होती है । पत्तियाँ इसकी नीम की तरह लंबी लंबी पर बिना कटाव की होती हैं । शिशिर में यह पेड़ पत्तियाँ झाड़ता है । बसंत के आरंभ में ही इसमें नीम के फूल की तरह के छोटे छोटे फूल गुच्छों मे लगते हैं जिनकी पँखुड़ियाँ सफेद पर बीच की घुँडियाँ कुछ बड़ी और पीले रंग की होती है । इन फूलों से एक प्रकार का पीला बसंती रंग निकलता है । झड़े हुए फुलों को लोग इकट्ठा करके सुखा लेते हैं । सूखने पर केवल कड़ी कड़ी घुँडियाँ सरसों के दाने के आकार की रह जाती है जिन्हें साफ करके कूट डालते या उबाल डालते हैं । तुन की लकड़ी लाल रंग की और बहुत मजबूत होती है । इसमें दीमक और धुन नहीं लगते । मेज कुरसी आदि सजावट के समान बनाने के लिये इस लकड़ी की बड़ी माँग रहती है । आसाम में चाय के बकस भी इसके बनते हैं ।

तुनक
वि० [फा़० तुनुक] दे० 'तुमुक' । यौ०—तुनक मिजाज = दे० 'तुनुकमिजाज' । तुमकमिजाजी = दे० 'तुमुकमिजाजी' । तुनकहवास = दे० 'तुनुकहवास' ।

तुनकना
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'तिनकना' । उ०—स्त्रियाँ प्रायः तुनक जाने का कारण सब बातों में निकाल लेती है ।— कंकाल, पृ० १६५ ।

तुनकामौज
संज्ञा पुं० [?] छोटा समुद्र । (लश०) ।

तुनकी
संज्ञा स्त्री० [फा़० तुनुक + ई (प्रत्य०)] एक तरह की खस्ता रोटी ।

तुनतुनी
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. वह बाजा जिसमें तुनतुन शब्द निकले । २. सारंगी ।

तुनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० तुन] तुन का पेड़ ।

तुनीर
संज्ञा पुं० [सं० तूणीर] दे० 'तूणीर' । उ०—हिम कों हरष मरुधरनि कों नीर भो री, जिथरो मदन तीरगन कों तुमीर भो ।—भिखारी० ग्रं०, पृ० १०१ ।

तुनुक
वि० [फा़०] १. सूक्ष्म । बारीक । २. अल्प । थोड़ा । ३. मृदुल । नाजुक । ४. क्षीण । दुबला पतला [को०] । यौ०—तुनुकजर्फ = (१) छिछोरा । लोफर । (२) अकुलीन । कमीना । (३) पेट का हलका । जो भेद खोल दे । (४) जो थोड़ी सी शराब पीकर बहक जाय । (५) जो किसी बड़े आदमी को निकटता या ऊँचा पद पाकर घमंड के कारण आदमी न रहे । तुनुकदिल = बहुत छोटे दिल का । अनुदार ।

तुनुकना
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'तिनकना' । उ०—अंकुर ने तुनुककर कहा ।—इत्यलम्, पृ० १९५ ।

तुनुकमिजाज
वि० [फा़० तुनुकमिजाज] चिड़चिड़ा । शीघ्र क्रोध में आनेवाला । छोटी छोटी बातों पर अप्रसन्न होने वाला । उ०—पिछलगुओं की खुशामद ने हमें इतना अभिमानी और तुनुकमिजाज बना दिया है ।—गोदान, पृ० १५ ।

तुनुकमिजाजी
संज्ञा स्त्री० [फा़० तुनुकमिजाजी] छोटी बातों पर शीघ्र अप्रसन्न होने का भाव । चिड़चिड़ापन ।

तुनुकसब्र
वि० [फा़० तुनुक + अ० सब्र] आतुर । त्वरावान् । बेसब्र । जल्दबाज [को०] ।

तुनुकहवास
वि० [फा़० तुमुक + अ० हवास] तीक्ष्णबुद्धि [को०] ।

तुन्न (१)
संज्ञा पुं० [सं] १. तुन का पेड़ । २. फटे हुए कपड़े का टुकड़ा ।

तुन्न (२)
वि० १. कटा या फटा हुआ । छिन्न । ३. पीड़ित (को०) । ३. चुना हुआ (को०) । ४. आहत । घायल (को०) ।

तुन्नवाय
संज्ञा पुं० [सं०] कपड़ा सीनेवाला । दरजी ।

तुन्नसेवनी
संज्ञा पुं० [सं०] जराहि । वह जो घाव को सीने का काम करता हो [को०] ।

तुपक
संज्ञा स्त्री० [तु० तोप का अल्पा० रूप] १. छोटी तोप । उ०— तुपक तोप जरजाल करारे । भरि भरि मारू गंज गुजारे ।— हम्मीर०, पृ० ३० । २. बंदूक । कड़ाबीन । क्रि० प्र०—चलना । छूटना ।

तुफंग
संज्ञा स्त्री० [तुं० तोप, हिं०, तुपक; अथवा फा़० तुफ़ंग] १. बंदूक । तुपक । हवाई बंदूक । उ०—कोदंड चंड करकटि निषंण । इक चंड भुसुंडी लै तुफंग ।—सुजान०, पृ० ३८ । २. वह लंबी नली जिसमें मिट्टी या आटे की गोलियाँ, छोटे तीर आदि डालकर फूँक के जोर से चलाए जाते हैं । यौ०—तुफंग अंदाज = बंदूकची । निशानेबाज । तुफंगची = (१) बंदूक चलानेवाला । (२) बंदूक रखनेवाला । (३) निशानची । तुफंगेतपुर = कारतूसी बंदूक । तुफंगे दहनपुर = टोपीदार बंदूक । तुफंगे सीजनी = कारतूसी बंदूक जिसमें घोड़ा नहीं होता ।

तुफ
अव्य० [फा़० तुफ़] धिक्कार । धिक् [को०] ।

तुफक
संज्ञा स्त्री० [फा़० तुफक] बंदूक । तुफंग । तुपक ।

तुफान †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तूफान' ।

तुफानी पु
वि० [हिं०] दे० 'तूफानी' । उ०—सासु बुरी ननद तुफानी दे्खि सुहाग हमार जरै ।—पलटू०, भा० ३, पृ० ७६ ।

तुफैल
संज्ञा पुं० [अ० तुफै़ल] द्वारा । कारण । जरिया । यौ०—तुफैल से = के द्वारा ।—की कृपा से ।

तुफैली
संज्ञा पुं० [अ० तुफ़ैली] १. वह व्यक्ति जो बिना निमंत्रण के अथवा किसी निमंत्रण व्यक्ति के साथ किसी के यहाँ जाय । २. आश्रित व्यक्ति । वह जो किसी के सहारे हो [को०] ।

तुबक पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तुपक' । उ०—दल समूह तजि चल्लियै तुबक गही तुर तंच—पृ० रा०, २५ ।६१ ।

तुभना
क्रि० अ० [सं० स्तुभ, स्तोभन (= स्तब्ध रहना, ठक रहना)] स्तब्ध रहना । ठक रह जाना । अचल रह जाना । उ०— टरति न टारे यह छबि मन में चुभी । स्याम सघन पीतांबर दामिनि, अंखियाँ चातक ह्वै जाय तुभी ।—सूर (शब्द०) ।

तुम
सर्व० [सं० त्वम्] 'तू' शब्द का बहुवचन । वह सर्वनाम जिसका व्यवहार उस पुरुष के लिये होता है जिसके कुछ कहा जाता है । जैसे,—तुम यहाँ से चले जाओ । विशेष—संबंध कारक को छोड़ शेष सब कराकों की विभक्तियों के साथ शब्द का यही रूप बना रहता है; जैसे, तुमने, तुमको, तुमसे, तुममें, तुमपर । संबंध कारक में 'तुम्हारा' होता है । शिष्टता के विचार से एकवचन के लिये भी बहुवचन 'तुम' का ही व्यवहार होता है । 'तू' का प्रयोग बहुत छोटों या बच्चों के लिये ही होता है । मुहा०—तुम जानो तुम्हारा काम जाने = अब जिम्मेदारी तुम्हारी है । मन में जो आए सो करो । उ०—और तरफ इस वक्त ध्यान न बटाओ । आगे तुम जानो तुम्हारा काम जाने ।— सैर०, पृ० २८ ।

तुमड़िया पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तुमड़ी' । उ०—हरी बेल की कोरी तुमड़िया सब तीरथ कर आई । जगन्नाथ के दरसन करके, अजहुँ न गई कडुवाई ।—कबीर श०, भा० १, पृ० ४६ ।

तुमड़ी
संज्ञा स्त्री० [सं० तुम्बर + हिं० ई (प्रत्य०)] १. कड़ुए गोल कद्दू का सूखा फल । गोल घीए का सूखा फल । २. सूखे गोल कद्दू को खोखला करके बनाया हुआ पात्र जिसमें प्रायः साधु पानी पीते हैं । ३. सूखे कद्दू का बना हुआ एक बाजा जो मुँह से फूँकर बजाया जाता है । महुवर । विशेष—यह बाजा कद्दू के खोखले पेट में नरकट की दो नलियाँ घुसाकर बनाया जाता है । सँपेरे इसे प्रायः बजाते हैं ।

तुमकना
क्रि० अ० [अनु०] दिखाई देना । प्रकट होना । उ०— एक झोंका वायु से ले, सिर हिलाकर तुमक जाना ।— हिमकि०, पृ० ६४ ।

तुमतड़ाक
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तूमतड़ाक' ।

तुमतराक
संज्ञा पुं० [फा़० तुमतराक़०] १. वैभव । शानशौकत । २. धूमधाम । तड़कभड़क । अहंकार । घमंड [को०] ।

तुमरा
सर्व० [हिं०] [स्त्री० तुमरी] दे० 'तुम्हारा' ।

तुमरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० तूमड़ी] दे० 'तुमड़ी' ।

तुमरू
संज्ञा पुं० [सं० तुम्घुरू] दे० 'तुंबुरु' ।

तुमल पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तुमुल' ।

तुमहियै पु
सर्व० [हिं० तुम] तुम ही । तुम्हीं । उ०—रीझि हँसि हाथी हमैं सब कोऊ देत, कहा रीझि हँसि हाथी एक तुमहियै देत हौ ।—भूषण ग्रं०, पृ० ३९ ।

तुमही
सर्व० [तुम + ही (प्रत्य०)] तुमको ।

तुमाना
क्रि० स० [हिं० तूमना का प्रे० रूप] तूमने का काम कराना । दबी या जमकर बैठी हुई रूई को पुलपुली करके फैलाने के लिये नोचवाना ।

तुमार पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तूमार' । उ०—ये झूलहिं सब हथियार हय लोग बाग तुमार ।—भीखा श०, पृ० ४४ ।

तुमारा पु
सर्व० [हिं०] दे० 'तुम्हारा' । उ०—ताते चलिहै अहार तुमारा । इतना बचन धर्म कहँ हारा ।—कबीर सा०, पृ० ४५५ ।

तुमुती
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की चिड़िया ।

तुमुर
संज्ञा पुं० [सं०] १. दे० 'तुमुल' । २. क्षत्रियों की एक जाति जिसका उल्लेख मत्स्य पुराण में है ।

तुमुल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सेना का कोलाहल । सेना की धूम । लड़ाई की हलचल । २. सेना की बिड़ंत । गहरी मुठभेड़ । ३. बहेड़े का पेड़ ।

तुमुल (२)
वि० [सं०] १. हलचल उत्पन्न करनेवाला । २. शोरगुल से युक्त । ३. भयंकर । तीव्र । उ०—सँग दादुर झींगुर रुदन धुनि मिलि स्वर तुमुल मचावहीं ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० २९८ । ४. अनेक ध्वनियों के मेद से ध्वनित (को०) । ५. क्ष्रुब्ध (को०) । ६. घबराया हुआ । व्यग्र (को०) ।

तुम्ह † (१)
सर्व० [हिं०] दे० 'तुम' । उ०—भल तुम्ह सुवा कीन्ह है फेरा । गाढ़ न जाइ पिरीतम कैरा ।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० २७२ ।

तुम्ह पु (२)
सर्व० [हिं० तुम] तुम्हारा । उ०—आबहु सामि सुलच्छना जीउ बसै तुम्ह नाँव ।—जायसी ग्रं०, पृ० १०१ ।

तुम्हरा पु
सर्व० [हिं०] दे० 'तुम्हारा' । उ०—दुष्ट दमन तुम्हरो अवतार । हे अद्भुत ब्रजराज कुमार ।—नंद० ग्रं०, पृ ३१२ ।

तुम्हारा
सर्व० [हिं० तुम] [स्त्री० तुम्हारी] 'तुम' का संबंध कारक का रूप । उसका जिससे बोलनेवाला बोलता है । जैसे, तुम्हारी पुस्तक कहाँ है? । मुहा०—तुम्हारा सिर = दे० 'सिर' ।

तुम्हें
सर्व० [हिं० तुम] 'तुम' का वह विभक्तियुक्त रूप जो उसे कर्म और संप्रदाय में प्राप्त होता है । तुमको ।

तुय †
सर्व० [हिं०] दे० 'तू' । उ०—लाहो लेता जनम गो तुय करै तिग्री लोथी होई ।—बी० रासो, पृ० ४४ ।

तुया पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तोय' । उ०—तेज उतपत ते हुआ ।—गोरख०, पृ० १५९ ।

तुरंग (१)
वि० [सं० तुरङ्ग] जल्दी चलनेवाला ।

तुरंग (२)
संज्ञा पुं० १. घोड़ा । उ०—गरुड तुरंग तुरंग मन, बहुरि तुरंग तुरंग ।—अनेकार्थ०, पृ० १३३ । २. चित्र । ३. सात की संख्या ।

तुरंगक
संज्ञा पुं० [सं० तुरङ्गक] १. बड़ी तोरई । २. घोड़ा (को०) ।

तुरंगकांता
संज्ञा स्त्री० [सं० तुरङ्गकान्ता] घोड़ी [को०] । यौ०—तुरंगकांतामुख = वाडवानल ।

तुरंगगंधा
संज्ञा स्त्री० [सं० तुरङ्गगन्धा] अश्वगंधा । असगंध [को०] ।

तुंरग गौड़
संज्ञा पुं० [सं० तुरङ्ग + गौड़] गौड़ राग का एक भेद । यह वीर या रौद्र का राग है ।

तुरंगद्विषणी
संज्ञा स्त्री० [सं० तुरङ्गद्विषणी] भैंस । महिषी [को०] ।

तुरंगद्वेषिणी
संज्ञा स्त्री० [सं० तुरर्ङ्गद्वेषिणी] भैंस । महिषी ।

तुरंगप्रिय
संज्ञा पुं० [सं० तुरङ्गप्रिय] जौ । यव ।

तुरंगब्रह्मचर्य
संज्ञा पुं० [सं० तुरङ्गब्रह्मचर्य] वह ब्रह्मचर्य जो स्त्री के न मिलने तक हो [को०] ।

तुरंगम (१)
वि० [सं० तुरङ्गम] जल्दी चलनेवाला ।

तुरंगम (२)
संज्ञा पुं० १. घोड़ा । २. चित्त । ३. एक वृत्त का नाम जिसके प्रत्येक चरख में दो नगण और दो गुरु होते हैं । इसे तुंग और तुंगा भी कहते हैं । उ०—न नग गहु बिहारी । कहत अहि पियारी ।—(शब्द०) ।

तुरंगमी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० तुरङ्गमी] १. असगंध । २. घोड़ी [को०] ।

तुरंगमी (२)
संज्ञा पुं० [सं० तुरङ्गमिन्] घुड़सवार । अश्वारोही [को०] ।

तुरंगमुख
संज्ञा पुं० [सं० तुरङ्गमुख] [स्त्री० तुरंगमुखी] (घोड़े का सा मुँहवाला) किन्नर । उ०—गावै गीत तुरंगमुख, जलरख जल बटियाँह ।—बांकी० ग्रं०, भा० ३, पृ० ९ ।

तुरंगमेध
संज्ञा पुं० [सं० तुरङ्गमेध] अश्वमेध [को०] ।

तुरंगयम
संज्ञा पुं० [सं० तुरङ्गमय] जौ । यव [को०] ।

तुरंगयायी
संज्ञा पुं० [सं० तुरङ्गयायिन्] घुड़सवार [को०] ।

तुरंगरत्क्ष
संज्ञा पुं० [सं० तुरङ्गरक्ष] साईस [को०] ।

तुरंगलीलक
संज्ञा पुं० [सं० तुरङ्गलीलक] संगीत एक ताल में [को०] ।

तुरंगवक्त्र
संज्ञा पुं० [सं० तुरङ्गवक्त्र] (घोड़े का सा मुँहवाला) किन्नर ।

तुरंगवदन
संज्ञा पुं० [सं० तुरङ्गवदन] (घोड़े का सा मुँहवाला) किन्नर ।

तुरंगशाला
संज्ञा स्त्री० [सं० तुरङ्गशाला] घोड़सार । अस्तबल ।

तुरंगसादी
संज्ञा पुं० [सं० तुरङ्गसादिन्] घुड़सवार [को०] ।

तुरंगस्कंध
संज्ञा पुं० [सं० तुरङ्गस्कन्ध] १. घोड़ों की सेना । २. घोड़ों का समूह [को०] ।

तुरंगस्थान
संज्ञा पुं० [सं० तुरङ्गस्थान] घुड़साल । अस्तबल [को०] ।

तुरंगारि
संज्ञा पुं० [सं० तुरङ्गारि] १. कनैर । करवीर । २. भैंसा (को०) ।

तुरंगिका
संज्ञा स्त्री० [सं० तुरङ्गिका] देवदाली । घघरबल । बंदाल ।

तुरंगारूढ
संज्ञा पुं० [सं० तुरङ्गारूढ़] घुड़सवार । अश्वारोही [को०] ।

तुरंगी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० तुरङ्गी] १. अश्वनगंधा । असगंध । २. घोड़ी (को०) ।

तुरंगी (२)
संज्ञा पुं० [सं० तुरङ्गिन्] घुड़सवार [को०] ।

तुरंज
संज्ञा पुं० [फा़० । अ० तुर्ज] १. चकोतरा नींबू । २. बिजौरा नीबू । खट्टी । ३. सूई से काढ़कर बनाया हुआ पान या कलगी के आकार का वह बूटा जो अँगरखों के मोढ़ों और पीठ पर तथा दुशाले के कोनों पर बनाया जाता है । कुंज ।

तुरंजबीन
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] १. एक प्रकार की चीनी जो प्रायः ऊँटकटारे के पोधों पर ओस के साथ खुरासान देश में जमती । है । २. नींबू के रस का शर्बत ।

तुरंत
क्रि० वि० [सं० तुर (= बेग, जल्दी)] जल्दी से । अत्यंत शीघ्र । तत्क्षण । झटपट । फौरन । बिना विलंब के । उ०—रघुपति चरन नाइ सिरु चलेउ तुरंत । अनंत । अगंद बील मयंद नल संग सुभट हनुमंत ।—मानस, ६ ।७४ ।

तुंरता
संज्ञा पुं० [हिं० तुरंत] १. गाँजा (जिसका नशा तुरंत पीते ही चढ़ता है) । २. सत्तू । (जिसे तत्काल खाया जा सकता है) ।

तुरँग पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तुरंग' । उ०—तुरँग चपल चंद्रमंडल बिकल बेला, कुंद है बिफल जहाँ नीच गति बारिए ।—मति० ग्रं०, पृ० ४१७ ।

तुरँज पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे 'तुंरज—२' । उ०—गलगल तुरँज सदा- फर फरे । नारँग अति राते रस भरे ।—जायसी ग्रं० पृ० १३ ।

तुर (१)
क्रि० वि० [सं०] शीघ्र । जल्द । स०—बहु दाबि डारे समर में तुर में तुरंगहि दपटि कै ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० २० ।

तुर (२)
वि० १. वेगवान् । शीघ्रगामी । २. दृढ़ । सबल (को०) । ३. घायल । आहत (को०) । ४. धनी (को०) । ५. अधिक । प्रचुर [को०] ।

तुर (३)
संज्ञा पुं० वेग । क्षिप्रता [को०] ।

तुर (४)
संज्ञा पुं० [सं० तर्कु] १, वह लकड़ी जिसपर जुलाई कपड़ा बुनकर लपेटते जाते हैं । २. वह बेलन जिसपर गोटा बुनकर लपेटते जाते हैं ।

तुर पु (५)
संज्ञा पुं० [? सं० तुरग > तुरअ, तुर] घोड़ा । अश्व । तुरग । उ०—माघ बद्दि पंचमि दिवस चढ़ि चालिए तुर तार ।—पृ० रा०, २५ ।२२५ ।

तुरई (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० तूर(= तुरही बाजा)] एक बेल जिसके लंबे फलों की तरकारी बनाई जाती है । विशेष—इसकी पत्तियाँ गोल कटावदार कदुदू की पत्तियोँ से मिलती जुलती होती हैं । यह पौधा बहुत दिनों तक नहीं रहता । इसे पानी की विशेष आवश्यकता होती है, इससे यह बरसात ही में विशेषकर बोया जाता है और बरसात ही तक रहता है । बरसाती तुरई छप्परों या टट्टियों पर फैलाई जाती है, क्योंकि भूमि में फैलाने से पत्तियों और फलों के सड़ जाने का डर रहता है । गरमी में भी लोग क्यारियों में इसे बोते हैं और पानी से तर रखते हैं । गरमी से बचाने पर यह बेल जमीन ही में फैलती और फलती है । तुरई के फूल पीले रंग के होते हैं और संध्या के समय खिलते हैं । फल लंबे लंबे हाते हैं जिनपर लंबाई के बल उभरी हुई नसों को सीधी लकीर समान अंतर पर होती हैं । मुहा०—तुरई का फूल सा = हलकी वा छोटी मोटी चीज कीतरह जल्दी खतम या खर्च बो जानेवाला । इस प्रकार चटपट चुक जाने या खर्च जानेवाला कि मालूम न हो । जैसे-तुरई के फूल से ये सौ रुपए देखते देखते उठ गए । २. उक्त बेल का फल ।

तुरई (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तुरही' ।

तुरक
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तुर्क' ।

तुरकटा
संज्ञा पुं० [तु० तुर्क + हिं० टा (प्रत्य०)] मुसलमान । (घृणासूचक शब्द०) ।

तुरकान †
संज्ञा पुं० [तु० तुर्क] १. तुर्कों या मुसलमानों की बस्ती । २. दे० 'तुर्क' । उ०—पाथर पूजत हिंदु भुलाना । मुरदा पूज भूले तुरकाना ।—कबीर सा०, पृ०, ८२० ।

तुरकाना
संज्ञा पुं० [तु० तुर्क] [स्त्री० तुरकानी] १. तुर्कों का सा । तुर्को के ऐसा । २. तु्र्कों का देश या बस्ती ।

तुरकानी (१)
वि० स्त्री० [तु० तुर्क + हिं० आनी (प्रत्य०)] तुर्कों की सी ।

तुरकानी (२)
संज्ञा स्त्री० बुर्क की स्त्री ।

तुरकिन
संज्ञा स्त्री० [बु० बुर्क + हिं० इन (प्रत्य०)] १. तुर्क की स्त्री । २. तुर्क जाति की स्त्री । †३. मुसलमानिन । मुसलमान स्त्री ।

तुरकिस्तान
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तुर्कीस्तान' ।

तुरकी (१)
वि० [तु० तुर्की] १. तुर्क देश का । जैसे, तुरकी घोड़ा, तुरका सिपाही । २. तुर्क देश 'बंधी' ।

तुरकी (२)
संज्ञा स्त्री० तुर्कों की भाषा । तुर्किस्तान की भाषा ।

तुरक्क पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तुर्क' । उ०—राए वधिअउँ संत हुअ रोस, लज्जाइअ निज मनहि मन, अस तुरक्क असलान गुण्णइ । कीर्ति०, पृ० १८ ।

तुरग (१)
वि० [सं०] तेज चलनेवाला ।

तुरग (२)
संज्ञा पुं० [स्त्री० तुरगी] १. घोड़ा । २. चित्त ।

तुरगगंधा
संज्ञा स्ञी० [सं० तरगगन्धा] अश्वगंधा । असगंध ।

तुरगगंधा
संज्ञा पुं० [सं०] केशी नामक दैत्य जो कंस की आज्ञा से कृष्ण को मारने के लिये घोड़े का रूप धारण करके गया था ।

तुरगब्रहाचर्य
संज्ञा पुं० [सं०] वह ब्रह्मचर्य जो केवल स्त्री के न मिलने के कारण ही हो ।

तुरगलीलक
संज्ञा पुं० [सं०] संगीत दामोदर के अनुसार एक ताल का नाम ।

तुरगारोह †
संज्ञा पुं० [सं०] घुड़सवार [को०] ।

तुरगारोही
संज्ञा स्त्री० [सं० तुरगारोहिन्] घुड़सवार [को०] ।

तुरगी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १.घोड़ी । २. अश्वगंधा ।

तुरगी (२)
संज्ञा पुं० [सं० तुरगिन्] अश्वारोही । घुड़सवार ।

तुरगुला
संज्ञा पुं० [देश०] लटकन जो कान के कर्णफूल नामक गहने में लटकाया जाना है । झुमका लोलक ।

तुरगोपचारक
संज्ञा पुं [सं०] साईस [को०] ।

तुरण (१)
वि० [सं०] वेगवान् । शीघ्रगामी [को०] ।

तुरण (२)
संज्ञा पुं० शीघ्रता । वेन [को०] ।

तुरत
अव्य० [सं० तुर] शीघ्र । चटपट । तत्क्षण । उ०—दूनी रिश- वत तुरत पचावै ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पु० ६६२ । यौ०—तुरत फुरत = चटपट ।

तुरतुरा †
वि० [सं० त्वरा] [स्त्री० तुरतुरी] १. तेज । जल्दबाज । २. बहुत जल्दी जल्दी बोलनेवाला । जल्दी जल्दी बात करनेवाला ।

तुरतुरिया
वि० [हिं०] दे० 'तुरतुरा' ।

तुरत्त पु
अव्य० [हिं०] दे० 'तुरत' । उ०— कढ़ियै सुवीर बढ़ियै तुरत्त ।—प० रासो, पृ० ८३ ।

तुरन पु
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'तूर्ण' । उ०—सहसा, सत्वर, रभ, तुरा, तुरन बगे के साव ।—नंद० ग्रं०, पृ० १०७ ।

तुरना पु
संज्ञा पुं० [सं० तरुण] तरुणावस्था । जवानी । उ०—वाला काता तुरना काता, बिरधै कात न जाय ।—कबीर श०, पृ०, ४८ ।

तुरनापन पु
संज्ञा पुं० [हिं० तुरना + पन (प्रत्य०)] तरुणावस्था । जवानी । उ०—तुरनापन गइ बीत बुढा़पा आन तुलाने काँपन लागे सीस चलत दोउ चरन पिराने ।—कबीर श० पृ० ३ ।

तुरपई
संज्ञा स्त्री० [हिं० तुरपना] एक प्रकार की सिलाई । तुरपन ।

तुरपन
संज्ञा स्त्री० [हिं० तुरपना] एक प्रकार की सिलाई जिसमें जोड़ों को पहले लंबाई के बल टाँके डालकर मिला लेते हैं; फिर निकले हुए छोर को मोड़कर तिरछे टाँकों से जमा देते है । लुढ़ियावन । बखिया का उलटा ।

तुरपना
क्रि० सं० [हिं० तर (= नीचे) + पर (= ऊपर + ना (प्रत्य०)] तुरपन की सिलाई करना । लुढ़ियाना ।

तुरपवाना
क्रि० सं० [हिं० तुरपना का प्रे० रूप] दे० 'तुरपाना' ।

तुरपाना
क्रि० सं०[हिं० तुरपना का प्रे रूप] दे० 'तुरपाना' ।

तुरपाना
क्रि० स० [हिं० तुरपना का प्रे० रूप] तुरपने का काम दूसरे से कराना ।

तुरबत
संज्ञा स्त्री० [अ० तुर्बत] कब्र । उ०—आसमाँ तुरबत प मेरे शिप्तियाना हो गया ।—भारतेदु ग्रं०, भा० २, पृ० ८५० ।

तुरम
संज्ञा पुं० [सं० तूरम] तुरही ।

तुरमती
संज्ञा स्त्री० [तु० तुरमता] एक चिड़िया जो बाज की तरह शिकार करती है । यह बाज से छोटी होती है ।

तुरमनी
संज्ञा स्त्री० [देश०] नारियल रेतने की रेती ।

तूरय पु
संज्ञा पुं० [सं० तुरग] [स्त्री० तुरी] घोड़ा । उ०—सायक चाप तुरय वनि जति हो लिए सबै तुम जाहू ।—सूर (शब्द०) ।

तुररा पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तुर्रा' । उ०—तापर तुररा सुभत अति कहत सोभ कवि नाथ ।—पृ० रा०, १ ।७५२ ।

तुरल
संज्ञा पुं० [सं० तुरग] घोड़ा । उ०—वणिया गजा तणै सिर वाँनाँ । मिलया तुरल रजी असमाँनाँ ।—रा० रू०, पृ० २२५ ।

तुरस पु
संज्ञा स्त्री० [देश०?] ढाल । उ०—तुरस फट्टि कठि गुरज मुकुठ करि रेष रिषेसर ।—पृ० रा०, ५ ।५१ ।

तुरसी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तुलसी' । उ०—हरि धरन तुरसिय माल । घन पंति सुक्क विसाल ।—पृ० रा०, २ ।३११ ।

तुरही
संज्ञा स्त्री० [सं० तूर] फूँककर बजाने का एक बाजा जो मुँह की ओर पतला और पीछे की ओर चौड़ा होता है ।— उ०—बाजत ताल मृदंग झांझ डफ, तुरही तान नफीरी ।— कबीर श०, भा० २, पृ० १०८ । विशेष—यह बाजा पीतल आदि का बनता है और टेढ़ा सीधा कई प्रकार का होता है । पहले यह लड़ाई में नगाड़े आदि के साथ बजता था । अब इसका व्यवहार विवाह आदि में होता है ।

तुरा पु (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० त्वरा] दे० 'त्वरा' । उ०—तीखी तुरा तुलसी कहतो पै हिए उपमा को समाउ न आयो । मानो प्रतच्छ परब्बत की नभ लीक लसी कपि यों धुकि घायो ।—तुलसी ग्रं० पृ० १९६ ।

तुरा (२)
संज्ञा पुं० [सं० तुरग] घोड़ा ।

तुराई पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० तूल (= रूई) । तूलिका (= गद्दा)] रुई भरा हुआ गुदगुदा बिछावन गद्दा तोशक । उ०—(क) नींद बहुत प्रिय सेज तुराई । लखहु न भूप कपट धतुराई ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) विबिध वचन, उपधान, तुराई । छीरफेन मृदु बिसद सुहाई ।—तुलसी (शब्द०) । (ग) कुस किसलय साथरी सुहाई । प्रभु सँग मंजु मनोज तुराई ।—तुलसी (शब्द०) ।

तुराट पु
संज्ञा पुं० [सं० तुरग] घोड़ा (डिं०) ।

तुराना पु (१)
क्रि० अ० [सं० तुर] घबराना । आतुर होना ।

तुराना पु (२)
क्रि० स० [हिं०] दे० 'तुड़ा़ना' ।

तुराना पु (३)
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'टूटना' । उ०—फिरत फिरत सब चरन तुरानैं ।—कबीर ग्रं०, पृ० २३० ।

तुरायण
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का यज्ञ जो चैत्र शुक्ला । ५ और वैशाख शुक्ला ५. को होता है । २. असंग । विरति । अनासक्ति (को०) ।

तुराव पु
संज्ञा पुं० [हिं० तुरा] जल्दी । शीघ्रता । उ०—गवना चाला तुराव लगो है । जो कोउ रोवै वाको न हँस रे ।— कबीर श०, भा० २, पृ० ९८ ।

तुरावत्
वि० [सं० त्वरावत्] [स्त्री० तुरावती] वेगवाला । वेगयुक्त ।

तुरावती
वि० स्त्री० [सं० त्वरावती] वेगवाली । झोंक के साथ बहने— वाली । उ०—(क) विषम विषाद तुरावति धारा । भय भ्रम भँवर अवर्त अपारा ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) अमृत सरोवर सरित अपारा । ढाहैं कूल तुरावति धारा ।—शं० दि० (शब्द०) ।

तुरावध पु
वि० [हिं० तुरा] त्वरावान् । शीघ्रतायुक्त । उ०— सामंत सितुंग तुरंग तुरावध रावध आवध अग्नि झरे ।— पृ० रा०, १३ ।१३० ।

तुरावान्
वि० [सं० त्वरावान्] दे० 'तुरावत्' ।

तुराषाट्
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्र ।

तुरासाइ
संज्ञा पुं० [सं०] १. इंद्र । २. विष्णु (को०) ।

तुरि (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'तुरी' [को०] ।

तुरि (२)
सर्व० [हिं०] दे० 'तुम्हारा' । उ०—सात जनम तुरि घर वसों एक वसत अकलंक ।—पृ० रा०, २३ ।३० ।

तुरित
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'तुरत' । उ०—गंगाजल कर कलस सौ तुरित मँगाइय हो ।—तुलसी० ग्रं०, पृ० ३ ।

तुरिय पु (१)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तुरग' । उ०—पषरैत तुरिय पषरैत गज्ज । नर कस्से वगतर सिलह सज्ज ।—पृ० रा०, १ ।४४१ ।

तुरिय (२)पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तुरीय' । उ०—सुखित भई तिहि छिन सब ऐसैं । तुरिय अवस्थ पाइ मुनि जैसे ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३०२ ।

तुरिया पु (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तुरीय' । उ०—व्योम अनसूत घर वो बरे भौंहरे माँहिं । सुंदर साक्षी स्वरूप तुरिया विशेषिये ।—सुंदर० ग्रं०, भा० २, पृ० ५९८ ।

तुरिया (२)पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तोरिया' ।

तुरियातीत पु
वि० [सं० तुरीव + अतीत] जो तुरीयावस्था से आगे हो । चतुर्थ अवस्था से आगेवाला । उ०—तुरियातीत ह्लै चित्त जब इक भयो रैन दिन मगन है प्रेम पाणी ।—पल्टू०, भा० २, पृ० २९ ।

तुरी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जुलाहों का तोरिया या तोड़िया नाम का औजार । २. जुलाहों की कूची । हत्थी । ३. चित्रकार की तूलिका (को०) । ४. वसुदेव की एक पत्नी का नाम (को०) ।

तुरी (२)
वि० वेगवाली ।

तुरी (३)
संज्ञा स्त्री० [अ० तुरय(= घोड़ा)] १. घोड़ी । उ०—तुरी अठारह लाख अमीरी बलख की । दिया मर्द ने छोड़ आस सब खलक की ।—पलटू०, भा० २, पृ० ७९ । २. लगाम । बाग ।

तुरी (४)
संज्ञा पुं० [हिं०] १. घोड़ा । २. सवार । अश्वारोही ।

तुरी (५)
संज्ञा स्त्री० [अ० तुर्रा] १. फूलो का गुच्छा । २. मोती की लड़ों का झब्बा जो पगड़ी से कान के पास लटकाया जाता है ।

तुरी (६)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तुरही' ।

तुरी पु (७)
संज्ञा पुं० [सं० तुरीय] चौथी अवस्था । उ०—प्रेम तेल तुरी, बरी, भयो ब्रह्म उँजियार ।—दारिया० बानी, पृ० ६७ ।

तुरीयंत्र
संज्ञा पुं० [सं० तुरीयन्त्र] वह यंत्र जिससे सूर्य की गति जानी जाती है ।

तुरीय
वि० [सं०] चतुर्थ । चौथा । विशेष— वेद में वाणी या वाक् के चार भेद किए गए हैं— परा, पश्यंती, मध्यमा और बैखरी । इसी बैखरी वाणी को तुरीय भी कहते हैं । सायण के अनुसार जो नादात्मक वाणी मूलाधार से उठती है और जिसका निरूपण नहीं हो सकता है, उसका नाम परा है । जिसे केवल योगी लोग ही जानसकते हैं, वह पश्यंती है । फिर जब वाणी बृद्धिगत होकर बोलने की इच्छा उत्पन्न करती है, तब उसे मध्यमा कहते हैं । अंत में जब वाणी मुँह में आकर उच्चरित होती है, तब उसे बैखरी या तुरीय कहते है । वेदांतियों ने प्राणियों की चार अवस्थाएँ मानी हैं—जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय । यह चौथी या तुरीयावस्था मोक्ष है जिसमें समस्त भेदज्ञान का नाश हो जाता है ओर आत्मा अनुपहित चैतन्य या ब्रह्मचैतन्य होती है ।

तुरीयवर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] चौथे वर्ण का पुरुष । शूद्र ।

तुरीयावस्था
संज्ञा पुं० [सं० तुरीय + अवस्था] वेदांतियों के अनुसार चार अवस्थाओं में से अंतिम । वि० दे० 'तुरीय' । उ०—इसी प्रकार तुरीयावस्था (द ट्रांस) नाम की कविता में उन्होंने ब्रह्मनुभूति का वर्णन इस प्रकार किया है ।—चिंतामाणि, भा० २, पृ० ७२ ।

तुरुक पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तुर्क' ।

तुरुकिनी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० तुरूक] तुर्क जाति की स्त्री । तुरकिन । उ०—चरष नाच तुरुकिनी आन किछु काहु न भावइ ।— कीर्ति०, पृ० ४२ ।

तुरुप (१)
संज्ञा पुं० [अं० ट्रंप] ताश का खेल जिसमें कोई एक रंग प्रधान मान लिया जाता है । इस रंग का छोटे से छोटा पत्ता दूसरे रंग कै बड़े से बड़े पत्ते को मार सकता है ।

तुरुप (२)
पुं० [अं० ट्रूप (= सेना)] १. सवारों का रिसाला । २. सेना का एक खंड । रिसाला ।

तुरुप (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तुरपन' । उ०—कसमसे कसे उकसेऊ से उरोजन पै उपटति कंचुकी की तुरुप तिरीछी वेख ।— पजनेस०, पृ० ४ ।

तुरुपना
क्रि० सं० [हिं०] दे० 'तुरपना' ।

तुरुष्क
संज्ञा पुं० [सं०] १. तुर्क जाति । तुर्किस्तान का रहनेवाला मनुष्य । विशेष—भागवत, विष्णुपुराणा आदि में तुरुष्क जाति का नाम आया है जिससे अभिप्राय हिमालय के उत्तर पश्चिम के निवासियों ही से जान पड़ता है । उक्त पुराणों में तुरुष्क राजगण के पृथ्वी भोग करने का उल्लेख हैं । कथासरित्सागर और राजतरंगिणी में भी इस बात का वल्लेख है । २. वह देश जहाँ तुरुष्क जाति रहती हो । तुर्किस्तान । ३. एक गंधद्रव्य । लोबान । ४. तुर्किस्तान का घोड़ा ।

तुरुष्कगौड़
संज्ञा पुं० [सं० तुरुष्क + गौड] दे० 'तुरंगगौड़' ।

तुरुही
संज्ञा स्त्री० [सं० तूर अथवा तूर्य] दे० 'तुरही' ।

तुरै पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तुरय' । उ०—जोबन तुरै हाथ गहि लीजै । जहाँ जाइ तहँ आइ न दीजै ।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० २३४ ।

तुरैया पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तुरई' । उ०—सदा तुरैया फूले नहीं सदा न साहुन होय ।—शुक्ल अभि० ग्रं०, पृ० १५६ ।

तुर्क
संज्ञा पुं० [तु०] १. तुर्किस्तान का निवासी । २. रूम का निवासी । टर्की का रहनेवाला ।

तुर्कचीन
संज्ञा पुं० [तु० तुर्क + फा़० चीन] सूर्य [को०] ।

तुर्कमान
संज्ञा पुं० [फा़० तुर्क] १. तुर्क जाति का मनुष्य । २. तुर्की घोड़ा जो बहुत बलिष्ठ और साहसी होता है ।

तुर्करोज
संज्ञा पुं० [तु० तुर्क + फा़० रोज] सूर्य [को०] ।

तुर्कसवार
संज्ञा पुं० [तु० तुर्क + फा़० सवार] एक विशेष प्रकार का सवार । विशेष—ऐसै सवारों को सिर से पैर तक तुर्की पहनावा पहनाया जाता था ।

तुर्कानी
संज्ञा पुं० [हिं० तुरुक] दे० 'तुर्किन' । उ०—सुनत करा मुसलमानहि कीन्हा । तुर्कानी को का कर दीन्हा ।—कबीर सा०, पृ० ८२२ ।

तुर्किन
संज्ञा स्त्री० [तु० तुर्क + हिं० इन (प्रत्य०)] १. तुर्क जाति की स्त्री । उ०—मू—झौंसी थीं तो तुर्किन, बन गई अहीरिन । खुदाराम, पृ० १४ । तुर्क की स्त्री ।

तुर्किनी
संज्ञा स्त्री० [तु० तुर्क + हिं० इनी (प्रत्य०)] दे० 'तुर्किन' ।

तुर्किस्तान
संज्ञा पुं० [तु० फा़०] तुर्कों का देश । तुर्कि टर्की [को०] ।

तुर्की (१)
वि० [फा़० तुर्क] तुर्किस्तान का । तुर्किस्तान में होनेवाला । जैसे—तुर्की घोड़ा ।

तुर्की (२)
संज्ञा स्त्री० १. तुर्किस्तान की भाषा । २. तुर्को की सी ऐंठ । अकड़ । गर्व । मुहा०—तुर्की तमाम होना = घमंड जाता रहना । शेखी निकल जाना ।

तुर्की (३)
संज्ञा पुं० १. तुर्कीस्तान का आदमी । २. तुर्किस्तान का घोड़ा ।

तुर्की टोपी
संज्ञा स्त्री० [तु० तुर्की + हिं० टोपी] एक प्रकार की टोपी जो लाल, गोल ऊँची और झव्बेदार होती है । विशेष—इस टोपी को तुर्क लोग पहनते थे । इसी से इसका नाम तुर्की टोपी पड़ा ।

तुर्त पु
अव्य० [हि०] दे० 'तुरत' । उ०—जो अनइच्छा होय मम तुर्त होत है नाश ।—कबीर सा०, पृ० २५८ । यौ०—तुर्त फुर्त = जल्दी में । शीघ्रतापूर्वक ।

तुर्फरी
संज्ञा पुं० [सं०] अंकुश का मारनैवाला भाग जो सामने सीधी नोक की ओर होता है । हंता । यौ०—जर्फरी तुर्फरी = बात का बतक्कड़ । प्रलाप ।

तुर्य (१)
वि० [सं०] चौथा । चतुर्थ । यौ०—तुर्य गोख = एक कालसूचक यंत्र । तुर्यवाट् = चार साल का बछड़ा ।

तुर्य (२)
संज्ञा पुं० तुरीयावस्था [को०] ।

तुर्यवाह
संज्ञा पुं० [सं०] चार वर्ष की बछिया या बछड़ा [को०] ।

तुर्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह ज्ञान जिसमें मुक्ति हो जाती है । तुरीय ज्ञान ।

तुर्याश्रम
संज्ञा पुं० [सं०] चतुर्थाश्रम । संन्यासाश्रम ।

तुर्रा (१)
संज्ञा पुं० [अ०] १.घुँघराले बालों की लट जो माथे पर हो । काकुल ।यौ०—तुर्रा तरार = सुंदर बालों की लट । २. पर या फुँदना जो पगड़ी में लगाया या खोंसा जाता है । कलगी । गोशवारा । ३. बादले का गुच्छा यो पगड़ी के ऊपर लगाया जाता है । मुहा०—तुर्रा यह कि = उसपर भी इतना और । सबके उपरांत इतना यह भी । जैसे,—वे घोड़ा तो ले ही गए; तुर्रा यह कि खर्च भी हम दें । किसी बात पर तुर्रा होना = (१) किसी बात में कोई और दूसरी बात मिलाई जाना । (२) यथार्थ बात के अतिरिक्त और दूसरी बात भी मिलाई जाना । हाशिया चढ़ाना । ४. फूलों की लड़ियों का गुच्छा जो दूल्हे के कान के पास लटकता रहता हैं । ५. टोपी आदि में लगा हुआ फुँदना । ६. पक्षियों के सिर पर निकले हुए परों का गुच्छा । चोटी । शिखा । ७. हाशिया । किनार । ८. मकान का छज्जा । ९. मुँहासे का वह पल्ला जो उसके ऊपर निकला होता है । १०. गुलतुर्रा । मुर्गकेश नाम का फूल । जटाधारी । ११. कोड़ा । चाबुक । मुहा०—तुर्रा करना = (१) कोड़ा मारना । (२) कोड़ा मारकर घोड़े को बढ़ाना । १२. एक प्रकार की बुलबुल जो ८ या ९ अंगुल लंबी होती है । विशेष—यह जाड़े भर भारतवर्ष के पूर्वीय भागों में रहती है, पर गरमी में चीन और साइबेरिया की ओर चली जाती है । १३. एक प्रकार का बटेर । ड़ुबकी ।

तुर्रा (२)
संज्ञा पुं० [अनु० तुल तुल(= पानी डालने का शब्द)] भाँग आदि का घूँटा । चुसकी । क्रि० प्र०—देना ।—लेना । मुहा०—तुर्रा चढा़ना या जमाना = भाँग पीना ।

तुर्रा (३)
वि० [फा़० तुर्रह्] अनोखा । अदभुत ।

तुर्वाणि
वि० [सं०] १. फुर्तीला । क्षिप्र । २. विजेता । शत्रुओं को नष्ट या क्षतिग्रस्त करनेवाला [को०] ।

तुर्वसु
संज्ञा पुं० [सं०] राजा ययाति के एक पुत्र का नाम जो देवयानी के गर्भ से उत्पन्न हुआ था । विशेष—राजा ययाति ने विषय भोग से तृप्त न होकर जब इससे इसका यौवन माँगा था, तब इसनै देने से साफ इनकार कर दिया था । इसपर राजा ययाति ने इसे शाप दिया था कि तू अधर्मियों प्रतिलोमाचारियों आदि का राजा होकर अनेक प्रकार के कष्ट भोगेगा । विष्णुपुराण के अनुसार तुर्वसु का पुत्र हुआ बाहु, बाहु, का गोभांनु, गोभानु का त्रैदांब, त्रैशांब का करंधम ओर करंधम का मरुत्त । मरुत्त को कोई संताति न थी, इससे पुरुवंशीय दुष्यंत को पुत्र रूप से ग्रहण किया ।

तुर्श
वि० [फा़०] १. खट्टा । २. रूखा (को०) । ३. कड़ा (को०) । ४. अप्रसन्न (को०) । ५. क्रुद्ब । कुपित (को०) ।

तुर्शरू
वि० [फा़०] तीखे मिजाजवाला । बदामिजाज । उ०— तुशंरूई छोड़ दै औ तल्खगोई तर्क कर ।—कविता कौ०, भा० ४, पृ० १० ।

तुर्शाई †
संज्ञा स्त्री० [फा़० तुर्श + हिं० आई (प्रत्य०)] दे० 'तुर्शी' ।

तुर्शाना
क्रि० अ० [फा़० तुर्श से नामिक धातु] खट्टा हो जाना

तुर्शी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. खटाई । अम्लता । २. रुष्टता । अप्र— सन्नता (को०) ।

तुशंदिंदाँ
संज्ञा स्त्री० [फा़०] घोड़े के दाँतो में कीट या मैल जमने का रोग ।

तुल पु
वि० [सं०] दे० 'तुल्य' । उ०—'हरीचंद' स्वामिनि अभि— रामिनि तुल न जगत मैं जाकी ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ८० ।

तुलक
संज्ञा पुं० [सं०] राजा का सलाहकार । राजमंत्री [को०] ।

तुलकना पु
क्रि० अ० [सं० तुल] बराबरी करना । समता करना । उ०—बंदलला यहि में न मलाकिनि कोने धौ काम कला तुलकी ।—अकबरी०, पृ० ३५१ ।

तुलछी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तुलसी' । उ०—घरि घरि तुलछी वेद पुराण ।—बी० रासो, पृ० ८१ ।

तुलन
संज्ञा पुं० [सं०] १. वजन । तौल । २. तौलना । ३. तुलना करना । समासता दिखाना [को०] ।

तुलना (१)
क्रि० अ० [सं० तुल] १. तौला जाना । तराजू पर अंदाजा जाना । मान का कूता जाना । संयो० क्रि०—बाना । २. तौल या माव में बराबर उतरना । तुल्य होना । उ०—सात सर्ग अपवर्ग सुख धरिय तुला इक अंग । तुले न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ।—तुलसी (शब्द०) । ३. किसी आधार पर इस प्रकार ठहरना कि आधार कै बाहर निकला हुआ कोई भाग अधिक बोझ के कारण किसी ओर को झुका न हो । ठीक अंदाज के साथ टिकना । जैसे, किसी कील पर छड़ी आदि का तुलकर टिकना । बाइसिकिल पर तुलकर बैठना । ४. किसी अस्त्र आदि का इस प्रकार हिसाब से चलाया जाना कि वह ठिक लक्ष्य पर पहुँचे और उतना ही आघात पहुँचावे जितना इष्ट हो । सधना । जैसे, तुलकर तलवार का मारना । ५. नियामित होना । बँधना । अंदाज होना । बँचे हुए मान का अभ्यास होना । उ०—जैसे, दूकान दारों के हाथ तुलै हुए होते है; बितना उठाकर दे देते है, वह प्रायः ठीका होता है । ६. भरना । पूरित होना । ७. गाड़ी कै पहिए का ओंगा जाना । ८. उद्दात बोना । उतारू होना । किसी काम या बात कै लिये बिलकुल तैयार होना । जैसे,— वे इस बात पर तुलै हुए है, कभी न मानेंगे; मुहा०—किसी काम या बात पर तुलना = (१) कोई काम करने के लिये उद्दात होता । (२) जिद पकड़ लेना । हठ करना । उ०— तौलने के लिये भला किसको, तुल गए कह तुली हुई बातें । —चोखे०, पृ० ३२ । तुली हुई बातें कहना = ठिकाने की बातें कहना । पक्की बातें कहना । उ०— तोलने के लिये भला किसकी । तुल गए कह तुली हुई बातें ।—चोखे०, पृ० ३२ ।

तुलना (२)
संज्ञा स्त्री० [सं] १. दो या अधिक वस्तुओं के गुण, मान आदि के एक दुसरे से घट बढ़ होने का विचार । मिलान । तारतम्य । क्रि० प्र०—करना ।—होना । २. सादृश्य । समता । बराबरी । जैसे,—इसकी तुलना उसके साथ नहीं हो सकती । ३. उपमा । ४. तौल । वजन । †५.गहना । गिनती । ६. उठाना । साधना (को०) । ७. आँकना । कूदना । अंदाज लगाना या करना (को०) । ८. परोक्षण करना (को०) ।

तुलनात्मक
वि० [सं०] तुलना विषयक । जिसमें दो वस्तुओं की समानता दिखाई जाय । उ०—मानस, मानुषी, विकासशास्त्र हैं तुलनात्मक, सापेक्ष ज्ञान ।—युगांत, पृ० ६० ।

तुलनी
संज्ञा स्त्री० [सं० तुला] तराजू या काँटे की डाँड़ी में सूई के दोनों तरफ का लोहा ।

तुलबुली
संज्ञा स्त्री० [देश०] जल्दीबाजी ।

तुलबाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० तोलाना, तुलना] १. तौलने की मजदूरी । २. पहिए को औंगने की मजदूरी ।

तुलवाना
क्रि० सं० [हिं० तौलना] [संज्ञा तुलवाई] १. तौल कराना । वजन कराना । २.गाड़ी के पहिए की धुरी में घी, तेल आदि दिलाना । ओंगवाना ।

तुलसारिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] तरकास । तूणीर [को०] ।

तुलसी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक छोटा झाड़ या पौधा जिसकी पत्तियों से एक प्रकार की तीक्ष्म गंध निकलती है । विशेष— इसकी पत्तियों एक अंगुल से दो अंगुल तक लंबी और लंबाई लिए हुए गोल काट की होती हैं । फूल मंदरी के रूप मे पतली सींकों में लगते हैं । अंकुर के रूप में बीज से पहले दो दल फूटते हैं । अभ्दिद् शास्त्रवैत्ता तुलसी को पुदीने की जाति में गिनते हैं । तुलसी अनेक प्रकार की होती है । गरम देशों में यह बहुत अधिक पाई जाती है । अफ्रिका और दक्षिण अमेरिका में इसके अनेक भेद मिलते हैं । अमेरिका में एक प्रकार की तुलसी होती है जिसै ज्वर जड़ी कहते हैं । फसली बुखार में इसकी पत्ती का काढ़ा पिलाया जाता है । भारत वर्ष में भी तुलसी कई प्रकार की पाई जाती है; जैसे, गंभ— तुलसी, श्वेत तुलसी या रामा, कृष्ण तुलसी या कृष्णा, वर्वरी तुलसी या ममरी । तुलसी की पत्ती मिर्च आदि के साथ ज्वर में दी जाती है । बैद्यक में यह गरम, कडुई, दाहकारक, दीपन तथा कफ, वात और कुष्ट आदि को दूर करनेवाली मानी जाती है । तुलसी को वैष्णव अत्यंत पवित्र मानते हैं । शालग्राम ठाकुर की पूजा बिना तुलसीपत्र के नहीं होती । चरणामृत आदि में भी तुलसीदल डाला जाता है । तुलसी की उत्पत्ति के संबंध में ब्रह्मवैवर्त पुराण में यह कथा है—तुलसी नाम की एक गोपिका गोलोक में राधा की सखी थी । एक दिन राधा ने उसे कृष्ण के साथ विहार करते देख शाप दिया कि तू मनुष्य शरीर धारण कर । शाप के अनुसार तुलसी धर्मध्वज राजा की कन्या हुई । उसके रूप की तुलना किसी से नहीं हो सकती थी, इससे उसका नाम 'तुलसी' पड़ा । तुलसी ने बन में जाकर घोर तप किया और ब्रह्मा से इस प्रकार वर माँगा ।—'मैं कृष्ण की रति से कभी तृप्त नहीं हुई हूँ । मैं उन्हीं को पति रूप में पाना चाहती हुँ । ब्रह्मा के कथानानुसार तुलसी ने शंखचूड़ नामक राक्षस से विवाह किया । शंखचूड़ को वर मिला था कि बिना उसकी स्त्री का सतीत्व भंग हुए उसकी मृत्यु न होगी । जब शंखचूड़ ने संपूर्ण देवताओं को परास्त कर दिया, तब सब लोग विष्णु के पास गए । विष्णु ने शंखचूड़ का रूप धारण करके तुलसी का सतीत्व नष्ट किया । इसपर तुलसी ने नारायण के शाप दिया कि 'तुम पत्थर हो जाओं' । जब तुलसी नारायण के पैर पर गिरकर बहुत रोने लगी, तब विष्णु ने कहा, 'तुम यह शरीर छोड़कर लक्ष्मी के समान मेरी प्रिया होगी । तुम्हारे शरीर से गंडकी नदी और केश से तुलसी वृक्ष होगा ।' तब से बराबर शालग्राम ठाकुर की पूजा होने लगी और तुलसी— दल उनके मस्तक पर चढ़ने लगा । वैष्णव तुलसी की लकडी़ की माला और कंठी धारण करते हैं । बहुत से लोग तुलसी शालग्राम का विवाह बड़ी धूमधाम से करते हैं । कार्तिक मास में तुलसी की पूजा घर घर होती है, क्योकि कार्तिक की अमावस्या तुलसी के उत्पन्न होने की तिथि मानी जाती है । २. तुलसीदल ।

तुलसीचौरा
संज्ञा पुं० [सं०] वह वर्गाकार उठा हुआ स्थान जिसमें तुलसी लगाई जाती है । तुलसी वृंदावन ।

तुलसीदल
संज्ञा पुं० [सं०] तुलसीपत्र । तुलसी के पौधे का पत्ता । विशेष—वैष्णव इसे अत्यंत पवित्र मानते हैं और ठाकुर पर चढ़ाकर प्रसाद के रूप में भक्तों में बाँटते है । कहीं कहीं कथा वार्ता आदि में आने के लिये और प्रसाद रूप में तुलसीदल बाँटा जाता है । कहीं कहीं मंदिरों और साधुओं वैरागियों की और से भी तुलसीदल निमंत्रण रूप में समारोहों के अवसर पर भेजा जाता है ।

तुलसीदाना
संज्ञा पुं० [हि० तुलसी + फा़० दाना] एक गहना ।

तुलसीदास
संज्ञा पुं० [सं० तुलसी + दास] उत्तरीय भारत के सर्वप्रधान भक्त कवि जिनके 'रामचरितमानस' का प्रचार हिदुस्तान में घर घर है । विशेष—ये जाति के सरयूपारीण ब्राह्मण थे । ऐसा अनुमान किया जाता है कि ये पतिऔजा के दुबे थे । पर तुलसीचरित नामक एक ग्रंथ में, जो गोस्वामी जी के किसी शिष्य का लिखा हुआ माना जाता है और अबतक छपा नहीं है, इन्हें गाना का मिश्र लिखा है । (यह ग्रंथ अब प्रकाशित हो गया है) । वेणीमाधवदास कृत गोसाई चरित्र नामक एक ग्रंथ भी है जो अव नहीं मिलता । उसका उल्लेख शिवसिंह ने अपने शिवसिंह सरोज में किया है । कहते है, वेणीमाधवदास कवि गोसाई जी के साथ प्रायः रहा करते थे । नाभा जी के भक्तमाल में तुलसीदास जी की प्रशंसा आई है; जैसे—कलि कुटिल जीव निस्तार हित बालमीकि तुलसी भयो ।........रामचरित—रस—मतरहत अहनिशि व्रतधारौ ।भक्तमाल की टीका में प्रियादास ने गोस्वामी जी का कुछ वृत्तांत लिखा है और वही लोक में प्रसिद्ध है । तुलसीदास जी के जन्मसंवत् का ठीक पता नहीं लगता । पं० रामगुलाम द्बिवेदी मिरजापुर में एक प्रसिद्ध रामभक्त हुए हैं । उन्होंने जन्मकाल संवत् १५८९. बतलाया है । शिवसिंह ने १५८३ लिखा है । इनके जन्मस्थान के संबंध मे भी मतभेद है, पर अधिकांश प्रमाणों से इनका जन्मस्थान चित्रकूट के पास राजा— पुर नामक ग्राम ही ठहरता है, जहाँ अबतक इनके हाथ की लिखी रामायण करुकुछ अंश रक्षित है । तुलसीदास के माता पिता के संबंध में भी कहीं कुछ लेख नहीं मिलता । ऐसा प्रसिद्ध है कि इनके पिता का नाम आत्माराम दूबे और माता का हुलसी था । पियादास ने अपनी टीका में इनके संबंध में कई बातें लिखी हैं तो अधिकतर इनके माहात्म्य और चमत्कार को प्रकाट करती है । उन्होने लिखा है कि गोस्वामी जी युवावस्था में अपनी स्त्री पर अत्यंत आसक्त थे । एक दिन स्त्री बिना पूछे बाप के घर चली गई । ये स्नेह से व्याकुल होकर रात को उसके पास पहुँचे । उसने इन्हें धिक्कारा— 'यदि तुम इतना प्रेम राम से करते, तो न जाने क्या हो जाते' । स्त्री की बात इन्हें लग गई और ये चट विरक्त होकर काशी चले आए । यहाँ एक प्रेत मिला । उसने हनुमान जी का पता बताया जो नित्य एक स्थान पर ब्रह्मण के वेश में कथा सुनने जाया करते थे । हनुमान् जी से साक्षात्कार होने पर गोस्वामी जी ने रामचंद्र के दर्शन की अभिलाषा प्रकट की । हनुमान जी ने इन्हें चित्रकूट जाने की आज्ञा दी, जहाँ इन्हें दो राजकुमारों के रूप में राम और लक्ष्मण जाते हुए दिखाई पड़े । इसी प्रकार की और कई कथाएँ प्रियादास ने लिखी है; जैसे, दिल्ली के बादशाह का इन्हें बुलाना और कैद करना, बंदरों का उत्पात करना और बादशाह का तंग आकार छोड़ना, इत्यादि । तुलसीदास जी ने चैत्र शुक्ल ९ (रामनवमी), संवत् १६३१ को रामचरित मानस लिखना आरंभ किया । संवत् १६८० में काशी में असीघाट पर इनका शरीरांत हुआ, जैसा इस दोहे से प्रकट है—संबत सोलह सौ असी असी गंग के तीर । श्रावण शुक्ला सप्तमी तुलसी तज्यो शरीर । कुछ लोगों के मत से 'शुक्ला सप्तमी' के स्थान पर 'श्यामा तीज शनि' पाठ चाहिए क्योंकि इसी तिथि के अनुसार गोस्वामी जी के मंदीर के वर्तमान अधिकारी बराबर सीधा दिया करते हैं, और यही तिथि प्रमाणिक मानी जाती है । रामचरितमानस के अति— रिक्त गोस्वामी जी की लिखी और पुस्तकें ये है—दोहावली, गोतावली, कवितावली या कवित्त रामायण, विनयपत्रिका, रामाज्ञा, रामलला नहुछू, बरवै रामायण, जानकीमंगल, पार्वतीमंगल, वैराग्य संदीपनी, कृष्णगीतावली । इनके अति— रिक्त हनुमानबाहुक आदि कुछ स्तोत्र भी गोस्वामी जो के नाम से प्रसिद्ब है ।

तुलसीद्बेषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] बनतुलसी । बबई । बर्बरी । ममरी ।

तुलसीपत्र
संज्ञा पुं० [सं०] तुलसी की पत्ती ।

तुलसीबास
संज्ञा पुं० [हिं० तुलसी + बास(= महक)] एक प्रकार का महीन धान जो अगहन में तैयार होता है । विशेष—इसका चावल बहुत सुगंधित होता है और कई साल तक रह सकता है ।

तुलसीवन
संज्ञा पुं० [सं०] १. तुलसी के वृक्षों का समूह । तुलसी का जंगल । २. वृंदावन ।

तुलसी विवाह
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु की मूर्ति के के साथ तुलसी के विवाह करने का एक उत्सव । विशेष—हिंदू परिवारों की धार्मिक महिलाएँ कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में भीष्मपंचक एकादशी से पूर्णीमा तक यह उत्सव मनाती हैं ।

तुलसी वृंदावन
संज्ञा पुं० [सं०] तुलसीचोरा [को०] ।

तुलह पु
संज्ञा स्त्री० [सं० तुला + हिं० ह (स्वा,प्रत्य०)] तुला । तराजू । उ०—तुलह न तोली गजह न मापी, पहज न सेर अढ़ाई ।—कबीर ग्रं०, पृ० १५३ ।

तुला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सादृश्य । तुलना । मिलाप । २. गुरुत्व नापने का यंञ । तराजू । काँटा । यौ०—तुलादंड़ । ३. मान । तौल । ४. अनाज आदि नापने का बरतन । भांड । ५. प्राचीन काल की एक तौल जो १०० पल या पाँच सेर के लगभग होती थी । ६. ज्योतिष की बारह राशियों में से सातवीं राशी । विशेष—मोटे हिसाब से दो नक्षत्रों और एक नक्षत्र के चतुर्थांश अर्थात् सवा दो नक्षत्रों की एक राशि होती है । तुला राशि में चित्रा नक्षत्र के शेष ३० दंड तथा स्वाती और विशाखा के आद्य ४५-४५ दंड होते हैं । इस राशी का आकार तराजू लिए हुए मनुष्य का सा माना जाता है । ७. सत्यासत्यानिर्णिय की एक परीक्षा जो प्राचीन काल में प्रचलित थी । वादी प्रातिवादी आदि की एक दिव्य परीक्षा । वि० दे० 'तुलापरीक्षा' । ८, वास्तु विद्या में स्तंभ (खंभे) के विभागों में से चौथा विभाग ।

तुलाई (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० तूला = रूई] वह दोहरा कपड़ा जिसके भीतर रूई भरी ही । रूई से भरा दोहरा कपड़ा जो ओढ़ने के काम में आता है । दुलाई । उ०—तपन तेज तपता तपन तूल तुलाई माह सिसिर सीत क्योंहुँ न घटै बिन लपटे तियनाह ।—बिहारी (शब्द०) ।

तुलाई (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० तुलना] १. तौलने का काम या भाव । २, तौलने की मजदूरी ।

तुलाई (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं० तुलाना] गाड़ी के पहियों को ओँगाने या धुरी में चिकना दिलवाने की क्रिया ।

तुलाकूट
संज्ञा पुं० [सं०] १. तौल में कसर । २. तौल में कसर करनेवाला । डाँड़ी मारनेवाला मनुष्य ।

तुलाकोटि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. तराजू की डंडी के दोनों छोर जिनमें पलड़े की रस्सी बँधी रहती है । २. एक तौल का नाम । ३. अबुँद संख्या । ४. नूपुर । ५. स्तंभ का सिरा या छोर (को०) ।

तुलाकोटी
संज्ञा स्त्री० । [सं०] दे० 'तुलाकोटि' [को०] ।

तुलाकोश
संज्ञा पुं० [सं०] १. तुलापरीक्षा । २. तराजू रखने का स्थान (को०) ।

तुलाकोष
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'तुलाकोश' ।

तुलादंड़
संज्ञा पुं० [सं० तुलादण्ड] तराजू की डाँड़ी या डंडी [को०] ।

तुलादान
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का दान जिसमें किसी मनुष्य की तौल के बराबर द्रव्य या पदार्थ का दान होता है । यह सोलह महादानों में से है । तीर्थो में इस प्रकार का दान प्रायः राजा महाराजा करते हैं ।

तुलाधड
संज्ञा पुं० [सं०] १. तराजू की डंडी । २. तराजू का पलड़ा [को०] ।

तुलाधर
संज्ञा पुं० [सं०] १. व्यापारी । सौदागर । २. तुला राशि । ३. सूर्य [को०] ।

तुलाधार (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. तुला राशि । २. तराजू की रस्सी जिसमें पलड़े बँधे रहते हैं । ३. बनियाँ वणिक् । ४. काशी का रहनेवाला । एक वणिक् जिसने महर्षि । जाजलि को उपदेश दिया था ।—(महाभारत) । ५. काशी निवासी एक व्याध जो सदा माता पिता की सेवा में तत्पर रहता था । विशेष—कृतबोध नामक एक व्याक्ति जब इसके सामने अ या, तब इसने उसका समस्त पूर्ववृत्तांत कह सुनाया । इसपर उस व्याक्ति ने भी माता पिता की सेवा का ब्रत ले लिया ।—(बृहद्धर्मपुराण) ।

तुलाधार (२)
वि० तुला को धारण करनेवाला ।

तुलना पु (१)
क्रि० अ० [हिं० तुलना(= तौल में बराबर आना)] आ पहुँचना । समीप आना निकट आना । उ०—(क) समुद लोक धन चढ़ी विवाना । जो दिन डरै सो आइ तुलाना ।—जायसी (शब्द०) । (ख) अपनो काल आपु ही बोल्यो इनकौ मीचु तुलानी ।—सूर (शब्द०) ।

तुलना † (२)
क्रि० सं० [हिं० तुलना] १. तूलवाना । तौलना । २. बराबरा होना । पूरा उतरना । ३. गाढ़ी के पहियों को औंगाना । गाड़ी के पहियों की धुरी में चिकना दिलाना ।

तुलापरीत्क्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] अभियुक्तों की एक परीक्षा जो प्राचीन काल में अग्निपरीक्षा, बिषपरीक्षा आदि के समान प्रचलित थी । दोषी या निर्दोष होने की दिव्य परीक्षा । विशेष—स्मृतियों में तुलापरीक्षा का बहुत ही विस्तृत विधान दिया हुआ है । एक खुले स्थान में यज्ञकाष्ठ की एक बड़ी सी तुला (तराजू) खड़ी की जाति थी ओर चारों ओर तोरण आदि बाँधे जाते थे । फिर मंत्रपाठपूर्वंक देवताओं का पूजन होता था और अभियुक्त को एक बार तराजू के पलड़े पर बैठाकर मिट्टी आदि से तैल लेते थे । फिर उसे उतारकर दूसरी बार तौलते थे । यदि पलड़ा कुछ झुक जाता था तो अभियुक्त को दोषी समझते थे ।

तुलापुरूषकृच्छ
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का व्रत । विशेष—इसमें पिण्याक (तिल की खली), भात, मट्ठा, जल और सत्तू इनमें से प्रत्येक को क्रमशः तीन तान दिन तक खाकर पंद्रह दिनों तक रहना पड़ता हैं । यम ने इसे २१ दिनों का व्रत लिखा है । इसका पूरा विधान याज्ञवल्कय, हरित आदि स्मृतियों में मिलता है ।

तुलापुरुष
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'तुलाभार' [को०] ।

तुलापुरुषदान
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'तुलादान' ।

तुलाप्रग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] तराजू के पलड़ों की रस्सी [को०] ।

तुलाप्रग्राह
संज्ञा पुं० [सं०] तुलाप्रग्रह ।

तुलाबीज
संज्ञा पुं० [सं०] घुँघची के बीज जो तौल के काम में आते हैं । गुंजाबीज ।

तुलाभवानी
संज्ञा स्त्री० [पुं०] शंकर दिग्विजय के अनुसार एक नदी और नगरी का नाम ।

तुलाभार
संज्ञा पुं० [सं०] सोने जवाहरात का एक पुरुष के तोल का मान जो दान किया जाता था [को०] ।

तुलामान
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह अंदाज या मान जो तौलकर किया जाय । २.बाट । बटखरा ।

तुलामानांतर
संज्ञा पुं० [सं० तुलामानान्तर] तौल में अंतर डालना । कम तौल के बटखरे रखना । हलके बाट रखना । विशेष—कौटिल्य ने इस अपराध के लिये २०० पण दंड लिखा है ।

तुलायंत्र
संज्ञा पुं० [सं० तुलायन्त्र] तराजू ।

तुलायष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] तराजू की दंडी [को०] ।

तुलावा
संज्ञा पुं० [हिं० तुलना] १. वह लकड़ी जिसके बल गाड़ी खड़ी करके धुरी में तेल दिया जाता है और पहिया निकाला जाता हैं । २. वह लकडी़ जिसके सहारे औंगते समय गाड़ी खड़ी की जाती है ।

तुलासूत्र
संज्ञा पुं० [सं०] तराजू के पलड़ों की रस्सी [को०] ।

तुलाहीन
संज्ञा पुं० [सं०] कम तौलना । डाँड़ी मारना । विशेष—चाणक्य ने तौल की कमी में कमी का चार गुना जुरमाना लिखा है ।

तुलि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जुलाहों की कूंची । २. चित्र बनाने की कूँची ।

तुलिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] खंजन की तरह की एक छोटी चिड़िया ।

तुलित
वि० [सं०] १. तुला । हुआ । २. बराबर । समान ।

तुलिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] शाल्मली वृक्ष । सेमर का पेड़ ।

तुलिफला
संज्ञा स्त्री० [सं०] सेमर का वृक्ष ।

तुली (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'तुलि' ।

तुली (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० तुला] छोटा तराजू । काँटा ।

तुली † (३)
संज्ञा स्त्री० [?] तंबाकू । सुरती ।

तुलुव
संज्ञा पुं० [सं०] दक्षिण के एक प्रदेश का प्राचीन नाम जो सह्याद्रि और समुद्र के बीच में माना जाता था । आजकल इस प्रदेश को उत्तर कनाड़ कहते हैं ।

तुलू
संज्ञा स्त्री० [कन्नड़] कर्नाटक में प्रचलित एक उपभाषा ।

तुलू
संज्ञा पुं० [अ० तुलूअ] सूर्य या किसी नक्षत्र का उदय होना ।

तुलूलो
संज्ञा स्त्री० [अनु० तुलतुल] बँधी हुई धार जो कुछ दूर पर जाकर पड़े (जैसे, पेशाब की) । क्रि० प्र०—बँधना ।

तुल्य
वि० [सं०] १. समान । बराबर । २. सद्दश । समरूप । उसी प्रकार का । ३. उपयुक्त । युक्त (को०) । ४. अभिन्न (को०) ।

तुल्यकत्क्ष
वि० [सं०] समान । बराबरी का । उ०—राजशेखर ने अपनी काव्यमीमांसा में इस सहभाव को तुल्यतकक्ष कहकर काव्य को दूसरे प्रकार के लेखों से अलग किया हैं ।—पा० सा० सिं०, पृ० १ ।

तुल्यकर्मंक
संज्ञा पुं० [सं०] (व्याक्ति) जिनका उद्देश्य समान हो [को०] ।

तुल्यकाल
वि० [सं०] समकालिक । एक ही समय का [को०] ।

तुल्यकालीय
वि० [सं०] समकलिक । एक ही समय का [को०] ।

तुल्यकुल्य (१)
वि० [सं०] समान कुल का [को०] ।

तुल्यकुल्य (२)
संज्ञा पुं० रिश्तेदार । संबंधी [को०] ।

तुल्यगुण
वि० [सं०] १. समान गुणवाला । २. समान रूप से अच्छा [को०] ।

तुल्यजातीय
वि० [सं०] एक ही जाति का । समान [को०] ।

तुल्यजोगिता पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तुल्ययोगिता' । उ०— तुल्यजोगिता तहँ धरम जहँ बरन्यन को एक ।—भूषण ग्रं०, पृ० २७ ।

तुल्यतर्क
संज्ञा पुं० [सं०] ऐसा अनुमान जो सत्य के निकट हो [को०] ।

तुल्यता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बराबरी । समता । २. सादृश्य ।

तुल्यदर्शन
वि० [सं०] समान दुष्टि से देखनेवाला । सबके प्रति एक द्दष्टि रखनेवाला [को०] ।

तुल्यनामा
वि० [सं० तुल्यनामन्] एक ही नाम का । समान नाम का [को०] ।

तुल्यपान
संज्ञा पुं० [सं०] स्वजाति के लोगों के साथ मिल जुलकर खाना पीना ।

तुल्यप्रधानव्यंग्य
संज्ञा पुं० [सं० तुल्यप्रधानव्यजड्ग्य] वह व्यंग्य जिसमें वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ बराबर हो ।

तुल्ययोगिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक अलंकार जिसमें कई प्रस्तुतों या अप्रस्तुतों का अर्थात् बहुत से उपमानों का एक ही धर्म बतलाया जाय । जैसे,—(क)अपने अँग के जानि कै जोबन नृपत्ति प्रबीन । स्तन, मन, नैन, नितंब को बड़ो इजाफा कीन ।—बिहारी (शब्द०) । यहाँ स्तन, मन, नयन, नितंब इन प्रसिद्ध उपमेयों का 'इजाफा होना' एक ही धर्म कहा गया है । (ख) लखि तेरी सुकुमारता एरी या जग माँहि । कमल, गुलाब कठोर से किहि को भासत नाहिं (शब्द०) । यहाँ कमल और गुलाब इन दोनों उपमानों का एक ही धर्म कठोरता कहा गया है ।

तुल्ययोगी
वि० [सं० तुल्ययोगिन्] समान संबंध रखेनेवाला ।

तुल्यरूप
वि० [सं०] समरूप । सदृश । एक जैसा [को०] ।

तुल्यलत्क्षण
वि० [सं०] समान लक्षण युक्त [को०] ।

तुल्यवृत्ति
वि० [सं०] समान पेशेवाला [को०] ।

तुल्यशः
क्रि० वि० [सं०] तुल्यतापूर्वक । तुलतापूर्वक [को०] ।

तुल्ल
वि० [सं० तुल्य] दे० 'तुल्य' ।

तुल्वल
संज्ञा पुं० [सं०] एक ऋषि का नाम ।

तुव (१)
सर्व० [हि०] दे० 'तव' ।

तुव पु (२)
सर्व० [हि०] दे० 'तुम' । उ०—थिर रहहु राव इम उच्चरै, न डरि न डरि अब सेख तुव । —ह० रासो, पृ० ५३ ।

तुवर (१)
वि० [सं०] १. कसैला । २. बिना दाढी़ मोछ का । श्मश्रुहीन ।

तुवर (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. कसैला रस । कषाय रस । २. अरहर । ३. एक पौंधा जो नदियों और समुद्र के तट पर होता है । विशेष—इसके फल इमली के समान होते हैं जिनके खाने से पशुओं का दूध बढ़ता है ।

तुवरयावनाल
संज्ञा पुं० [सं०] लाल ज्वार । लाल जुन्हरी ।

तुवरिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १.गोपिचंदन । २. आढ़की । अरहर ।

तुवरी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'तुवरिका' ।

तुवरीशिंब
संज्ञा पुं० [सं० तुवरीशिम्ब] चकवँड़ का पेड़ । पँवार ।

तुवि
संज्ञा स्त्री० [सं०] तूँबी ।

तुशियार
संज्ञा पुं० [देश०] एक झाड़ जो पश्मिम हिमालय में होता हैं । इसकी छाल से रस्सियाँ बनाई जाती हैं । पुरुनी ।

तुष
संज्ञा पुं० [सं०] १. अन्न के ऊपर का छिलका । भूसी ।—उ०— आनँदघन, इनकों सिख ऐसें तुष लै फटके ।—घनानंद, पृ० ५४३ । २. अँडे के ऊपर का छिलका । ३. बहेड़े का पेड़ ।

तुषग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] अग्नि ।

तुषधान्य
संज्ञा पुं० [सं०] छिलकायुक्त अनाज [को०] ।

तुषसार
संज्ञा पुं० [सं०] अग्नि [को०] ।

तुषांबु
संज्ञा पुं० [सं० तुषाम्बु] एक प्रकार की काँजी जी भूसी सहित कूटे हुए जौ को सड़ाकर बनती है । विशेष—वैद्यक में यह अग्निदीपक, पाचक, ह्वदयग्राही और तीक्ष्ण मानी गई है ।

तुषाग्नि
संज्ञा पुं० [हिं०] तुषानल [को०] ।

तुषानल
संज्ञा पुं० [सं०] १. भूसी की आग । घासफूस की आग । करसी की आँच । २.भूसी या घास फूस की आग में भस्म होने की क्रिया जो प्रायश्चित के लिये की जाती हैं । विशेष—कुमारिल भट्ट तुषाग्नि में ही भस्म होकर मरे थे ।

तुषार (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. हवा में मिली भाप जो सरदी से जमकर और सूक्ष्म जलकण के रूप में हवा से अलग होकर गिरती और पदार्थों पर जमती दिखलाई देती है । पाला । २. हिम । बरफ । ३. एक प्रकार का कपूर । चीनियाँ कपूर । ४. हिमा— लय के उत्तर का एक देश जहाँ के घोड़े प्रसिद्ध थे । ५. तुषार देश में बसनेवाली जाति जो शक जाति की एक शाखा थी । ६. ओस (को०) । ७. हलकी वर्षा । फुही (को०) । ८. तुषार देश का घोड़ा (को०) ।

तुषार (२)
वि० छूने में बरफ की तरह ठंढा ।

तुषारकण
संज्ञा पुं० [सं०] ओस की बूँदें । हिमकण [को०] ।

तुषारकर
संज्ञा पुं० [सं०] हिमकर । चंद्रमा । २. कपूर (को०) ।

तुषारकाल
संज्ञा पुं० [सं०] शीत ऋतु । जाड़ा [को०] ।

तुषारकिरण
संज्ञा पुं० [सं०] चंद्रमा [को०] ।

तुषारगिरि
संज्ञा पुं० [सं०] हिमालय पर्वत [को०] ।

तुषारगौर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] कपूर ।

तुषारगौर (२)
वि० १. तुषार जैसा श्वेत । हिम सा धावल । २. तुषार पड़ने से श्वेत [को०] ।

तुषारद्युति
संज्ञा पुं० [सं०] चंद्रमा [को०] ।

तुषारपर्वत
संज्ञा पुं० [सं०] हिमालय पर्वत [को०] ।

तुषारपाषाण
संज्ञा पुं० [सं०] १. ओला । २. बरफ ।

तुषारमर्त्ति
संज्ञा पुं० [सं०] चंद्रमा ।

तुषारर्तु
संज्ञा स्त्री० [सं०] ठंढक का मौसम । शीतकान [को०] ।

तुषाररश्मि
संज्ञा पुं० [सं०] चंद्रमा ।

तुषारशिखरी
संज्ञा पुं० [सं०] हिमालय पर्वत [को०] ।

तुषारशैल
संज्ञा पुं० [सं०] हिमालय पर्वत [को०] ।

तुषारांशु
संज्ञा पुं० [सं०] चंद्रमा ।

तुषारद्रि
संज्ञा पुं० [सं०] हिमालय पर्वत ।

तुषारावृत
वि० [सं० तुषार + आवृत] हिम से घिरा हुआ । हिम से ढँका हुआ । उ०—तुषारावृत अँधेरा पथ था । हिम गिर रहा था । तारों का पता नहीं; भयानक शीत और निर्जन निशीथ ।—आकाश०, पृ० ३५ ।

तुषित
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार के गणदेवता जो संख्या में १२ हैं । मन्वंतरों के अनुसार इनके नाम बदला करते हैं । २. विष्णु । ३. एक स्वर्ग का नाम । [बौद्ध] ।

तुषिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] उपदेवियों का एक वर्ग, जिनकी संख्या बारह या छत्तीस मानी जाती है [को०] ।

तुषोत्थ
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'तुषोदक' ।

तुषोद्क
संज्ञा पुं० [सं०] १. छिलके समेत कूटे हुए जौ को पानी में सड़ाकर बनाई हुई काँजी । तषांबु । २. भूमी को सड़ाकर खट्टा किया हुआ जल ।

तुष्ट
वि० [सं०] १. तोषप्राप्त । तुप्त । संतुष्ट । ३. तुष्ट तुम्हीं में उन्हें देखकर रही, रहुँगी ।—साकेत, पृ० ४०५ । २. राजी । प्रसन्न । खुश । क्रि० प्र०—करना ।—होना ।

तुष्टता
संज्ञा स्त्री० [सं०] संतोष । प्रसन्नता ।

तुष्टना पु
क्रि० अ० [सं० तुष्ट] प्रसन्न होना । उ०—(क) अपर कर्म तुष्टत चिरकाला । प्रेम हे प्रगट होत ततकाला ।— विश्राम (शब्द०) । (ख) नाम खेइ जेहि युवति को नहिं सुहाइ सुनि तासु । राम जानकी के कहे तुष्टत तेहि पर आसु ।—विश्राम (शब्द०) ।

तुष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. संतोष । तुप्ति । २. प्रसन्नता । विशेष—सांख्य में नौ प्रकार की तुष्टियाँ मानी गई हैं, चार आध्यात्मिक और पाँच वाह्य । आध्यात्मिक तुष्टियाँ ये हैं ।— (१) प्रकृति—आत्मा को प्रकृति से भिन्न मानकर सब कार्यो का प्रकृति द्बारा होना मानने से जो तुष्टि होती है, उसे प्रकृति या अंगतुष्टि कहते हैं । (२) उपादान—सैन्यास से विवेक होता है, ऐसा समझ संन्यास से जो तुष्टि होती है, उसे उपादान या सलिलतुष्टि कहते हैं । (३) काल—काल पाकर आप ही विवेक या मोक्ष प्राप्त हो जायगा, इस प्रकार तुष्टि को कालतुष्टि या ओद्यतुष्टि कहते है । (४) भाग्य—भाग्य में होगा तो मोक्ष हो जायगा, ऐसी तृष्टि को भाग्यतुष्टि या वृष्टितुष्टि कहते हैं । इसी प्रकार इंद्रियों के बिषयों से विरक्ति द्बारा जो तुष्टि होती है, वह पाँच प्रकार से होती है; जैसे, यह समझने से कि, (१) अर्जन करने में बहुत कष्ट होता है, (२) रक्षा करना और कठिन है (३) विषयों का नाशा हो ही जाता है, (४) ज्यों ज्य़ों भोग करते है, त्यों त्यों इच्छा बढ़ती ही जाती हैं और (५) बिना दूसरे को कष्ट दिए सुख नहीं मिल सकता । इन पाँचों के नाम क्रमशः पार, सुपार, पारापोर, अनुत्तमांभ और उत्तमांभ हैं । इन नौ प्रकार की तुष्टियों के विपर्यय से बुद्धि की अशक्ति उत्पन्न होती है । वि० दे० 'अशक्ति' । ३. कंस के आठ भाइयों में से एक ।

तुष्टु
संज्ञा पुं० [सं०] कान में पहनने का एक गहना । कर्णमणि [को०] ।

तुष्य
संज्ञा पुं० [सं०] शिव [को०] ।

तुस
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'तुष' ।

तुसाँदे पु
सर्व० [हिं०] दे० 'तुम्हारा' । उ०—रहैं दा तुसाँदे लाल कछू ना कहैंदा है ।—नट०, पृ० ६३ ।

तुसाडी पु †
सर्व० [पुं०] आपकी । उ०—की की खूवी कहै तुसाडी हो हो हो हो होरी है । —घनानंद, पृ० १७६ ।

तुसार
संज्ञा पुं० [सं० तुषार] 'तुषार' । उ०—पूस मास तुसार आयो कंपि जाड़ जनाइया ।—गुलाल०, पृ० ८४ ।

तुसी
संज्ञा स्त्री० [सं० तुस] अन्न के ऊपर का छिलका । भूसी । उ०—ऐसी को ठाली बैठी है तोसी मूँड़ पिरावै । झूठी बात तुसी सी बिनु कन फटकत हाथ न आवै ।—सूर (शब्द०) ।

तुस्त
संज्ञा स्त्री० [सं०] १.धूल । गर्द । २. भूसी [को०] ।

तुस्स पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तुष' । उ०—सत्य असत्य कहो कद एकै कुंदन तुस्स निकारौ ।—राम० धर्म०, पृ० ३७५ ।

तुह पु
सर्ब० [हिं०] दे० 'तुम' । उ०—जौ तुह मिलहु प्रथम मुनीसा । सुनतिउँ सिख तुम्हारि धारि सीसा ।—मानस, १ ।८१ ।

तुहफा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'तोहफा' । उ०—तुहफे, घूस और चंदे के ऐसे बम के गोले चलाए ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० ४७६ ।

तुहमत
संज्ञा स्त्री० [अ०] दे० 'तोहमत' ।

तुहार †
सर्व० [हिं०] दे० तुम्हारा' ।

तुहालै पु
सर्व० [हिं०] दे० 'तुम्हार' । उ०—जग में राम तुहालै जोडै़, हुवो न कोई फेर हुवै ।—रघु० रू०, पृ० १९ ।

तुहिं पु †
सर्व, [हिं० तू + हिं (प्रत्य०)] तुझको ।

तुहिन
संज्ञा पुं० [सं०] १. पाला । कुहरा । तुषार । २. हिम । बरफ । ३. चंद्रतेज । चाँदनी । ४. शीतलता । ठंढ़क । ५. कपूर (को०) । ६. ओस (को०) ।

तुहिनकण
संज्ञा पुं० [सं०] ओसकण । तुषार [को०] ।

तुहिनकर
संज्ञा पुं० [पुं०] १. चंद्रमा । २. कपूर [को०] ।

तुहिनकिरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. चंद्रमा । २. कपूर [को०] ।

तुहिनगिरि
संज्ञा पुं० [सं०] हिमालय पर्वत । उ०—समाचार सुनि तुहिनगिरि गवनें तुरत निकेत ।—मानस, १ ।९७ ।

तुहिनगु
संज्ञा पुं० [सं०] १. चंद्रमा । २ कपूर [को०] ।

तुविनद्युति
संज्ञा पुं० [सं०] १. चंद्रमा । २ कपूर [को०] ।

तुहिनरश्मि
संज्ञा पुं० [सं०] १. चंद्रमा । २ कपूर [को०] ।

तुहिनरुचि
संज्ञा पुं० [सं०] १. चंद्रमा । २. कपूर [को०] ।

तुहिनशैल
संज्ञा पुं० [सं०] हिमालय पर्वत [को०] ।

तुहिनशर्करा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बरफ का टुकड़ा । बरफ ।

तुहिनांशु
संज्ञा पुं० [सं०] १. चंद्रमा । २. कपूर ।

तुहिनाचल
संज्ञा पुं० [सं०] हिमालय पर्वत । उ०—गए सकल तुहिनाचल गेहा । गावहिं मंगल सहित सनेहा ।—मानस, १ ।९४ ।

तुहिनाद्रि
संज्ञा पुं० [सं०] हिमालय पर्वत [को०] ।

तुही पु
सर्व० [हिं०] दे० 'तुहिं' । उ०—आप को साफ कर तुहीं साँई ।—केशव० अमी०, पृ० ९ ।

तुम्हें †
सर्व० [हिं०] दे० 'तुम्हें' ।