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विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/प्र

विक्षनरी से

प्र
संज्ञा पुं० [सं०] एक उपसर्ग जो क्रियाओं में संयुक्त होने पर 'आगे', 'पहले', 'सामने', 'दूर' का अर्थ देता है, विशेषणों में संयुक्त होने पर'अधिक', 'बहुल', 'अत्याधिक' का अर्थ देता है, जैसे, प्रकृष्ठ, प्रमत्त आदि और संज्ञा शब्दों में संयुक्त होने पर 'प्रारंभ' (प्रयाण), 'उत्पत्ति' (प्रभव, प्रपौत्र), 'लंबाई' (प्रवालभूसिक), 'शक्ति' (प्रभु), 'आकांक्षा' (प्रार्थना), 'स्वच्छता' (प्रसन्न जल), 'तीव्रता' (प्रकर्ष), 'अभाव' या 'वियोग' (प्रोषित, प्रपर्ण वृक्ष), आदि का अर्थ देता है।

प्रकंप
संज्ञा पुं० [सं० प्रकम्प] थरथराहट। कँपकँपी।

प्रकंपन (१)
संज्ञा पुं० [सं० प्रकम्पन] १. कँपकँपी। थराथराहट। २. वायु। हवा। ३. महावात। आँधी (को०)। ४. एक नरक का नाम। ५. एक राक्षस का नाम।

प्रकंपन (२)
वि० हिलानेवाला। जो कंप उत्पन्न करे।

प्रकंपमान
वि० [सं० प्रकम्पमान] जो थरथराता हो। अत्यंत हिलता हुआ।

प्रकंपित
वि० [सं० प्रकम्पित] १. काँपता हुआ। कंपायमान। २. हिलता हुआ। ३. कंपित। कँपाया हुआ [को०]।

प्रकंपी
वि० [सं० प्रकम्पिन्] काँपता हुआ। हिलता झूलता हुआ। काँपने या हिलनेवाला [को०]।

प्रकच
वि० [सं०] जिसके सर के बाल खडे़ हों। ऊर्ध्वकेश [को०]।

प्रकट (१)
वि० [सं०] १. जो सामने आया हो। जो प्रत्यक्ष हुआ हो। जाहिर। जैसे,—इस नगर में प्लेग प्रकट हुआ है। २. उत्पन्न। आविर्भूत। जैसे,—इतने में वहाँ एक राक्षस प्रकट हुआ। ३. स्पष्ट। व्यक्त। जाहिर।

प्रकट (२)
अव्य० स्पष्टतः। प्रकाशय रूप से। सबके सामने [को०]।

प्रकटता
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रकट + हिं० ता (प्रत्य०)] स्पष्टता। दृष्टगोचर होने का भाव। उ०—अनैसर्गिक घटा सी छा रही थी। प्रलय घटिका प्रकटता पा रही थी।—साकेत, पृ० ५४।

प्रकटन
संज्ञा पुं० [सं०] प्रकट होने की क्रिया।

प्रकटना
क्रि० अ० [सं० प्रकट + हिं० ना (प्रत्य०)] प्रकट होना प्रादुर्भूत होना। दिखाई देना।

प्रकटित
संज्ञा पुं० [सं०] जो प्रकट हुआ हो। प्रकट किया हुआ।

प्रकटीकरण
संज्ञा पुं० [सं०] प्रकट या अभिव्यक्त होने का भाव। प्रकट करना [को०]।

प्रकटीभवन
संज्ञा पुं० [सं०] अभिव्यक्त होना। जाहिर होना। प्रकट होना।

प्रकथन
संज्ञा पुं० [सं०] व्यक्त करना। घोषित करना। बताना [को०]।

प्रकर
संज्ञा पुं० [सं०] १. अगरु। अगर नामक गंध द्रव्य। २. पुँज। समूह। राशि। ३. खिला हुआ फूल या स्तवक। ४. सहारा। मदद। सहायता। ५. अधिकार। ६. खुब काम करनेवाला। वह जो किसी काम में बहुत होशियार हो। ७. समादर। सत्कार (को०)। ८. अपनयन। अपहरण। नारी अपहरण (को०)। प्रक्षालन। संक्षालन। मार्जन (को०)। ९. रीति। परिपाटी परंपरा (को०)।

प्रकरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. उत्पन्न करना। अस्तित्व में लाना। २. किसी विषय को समझने या समझाने के लिये उसपर वाद विवाद करना। जिक्र करना। वृतांत। ३. प्रसंग। विषय। ४. किसी ग्रंथ के अंतर्गत छोटे छोटे भागों में से कोई भाग। किसी ग्रंथ आदि का वह विभाग जिसमें किसी एक ही विषय या घटना आदि का वर्णन हो । परिच्छेद। अध्याय। ५. वह वचन जिसमें कोई कार्य अवश्य करने का विधान हो। ६. अवसर। काल। समय (को०)। दृश्य काव्य के अंतर्गत रुपक के दस भेदों में से एक। विशेष—साहित्यदर्पण के अनुसार इसमें सामाजिक और प्रेमसंबंधी कल्पित घटनाएँ होनी चाहिए और प्रधानतः शृंगार रस ही रहना चाहिए। जिस प्रकरण की नायिका वेश्या हो वह 'शुद्ध' प्रकरण और जिसकी नायिका कुलवधू हो वह 'संकीर्ण प्रकरण' कहलाता है। नाटक की भाँती इसका नायक बहुत उच्च कोटी का पुरुष नहीं होता; और न इसका आख्यान कोई प्रसिद्ध ऐतिहासिक या पौराणिक वृत्त होता है। संस्कृत के मृच्छकटिक, मालतीमाधव आदि 'प्रकरण' के ही अंतर्गत है।

प्रकरणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रकरण के समान नाटिका।

प्रकरिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रासंगिक कथावस्तु। प्रकरी [को०]।

प्रकरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक प्रकार का गान। २. नाटक में प्रयोजनसिद्धि के पाँच साधनों में से एक जिसमें किसी एक देशव्यापी चरित्र का वर्णन होता है। ३. नाटकीय वेशभूषा (को०)। ४. किसी जमीन का खुलता हिस्सा। आँगन (को०)। ५. चौराहा। चत्वर (को०)। ६. प्रासंगिक कथावस्तु के दो भेदों में से एक। वह कथावस्तु जो थोडे़ काल तक चलकर रुक जाती या समाप्त हो जाती है। प्रासंगिक कथावस्तु का दूसरा भेद 'पताका' है।

प्रकर्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १. उत्कर्ष। उत्तमता। २. अधिकता। बहुता- यत। ३. श्रेष्ठता। सर्वोच्चता (को०)। ४.शक्ति। बल (को०)। ५. विशिष्टता। विशेषता (को०)। ६. विस्तार (को०)।

प्रकर्षक (१)
वि० [सं०] उत्कर्ष करनेवाला।

प्रकर्षक (२)
संज्ञा पुं० कामदेव की आख्या [को०]।

प्रकर्षण
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रकर्ष। उत्कर्ष। महत्ता। वैभव। २. अधिकता। ३. खींचना। अलग करना (को०)। ४. आकु- लता। व्यग्रता। विह्वलता (को०)। ५. हल चलाना। कर्षण (को०)। ६. लंबाई। विस्तार (को०)। ७. कोड़ा। चाबुक (को०)। ८. उधार दिए गए धन का अधिक ब्याज लेना (को०)।

प्रकर्षणीय
वि० [सं०] जो उत्कर्ष करने के योग्य हो। प्रकर्षण के योग्य।

प्रकर्षित
वि० [सं०] १. खींचा हुआ। २. जो (धन आदि) ब्याज के रूप में अधिक प्राप्त या वसूल हो [को०]।

प्रकर्षी
वि० [सं० प्रकर्षिन्] १. उत्कर्षप्राप्त। प्रकर्षयुक्त। २. आगे ले चलनेवाला।

प्रकला
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक कला (समय) का साठवाँ भाग। यौ०—प्रकलाविद् = (१) अबोध। अप्राज्ञ। अज्ञान (२) व्यापारी। वणिक्।

प्रकल्पक
वि० [सं०] उपयुक्त स्थान पर स्थित [को०]।

प्रकल्पना
संज्ञा स्त्री० [सं०] निश्चित करना। स्थिर करना।

प्रकल्पित
वि० [सं०] १. निश्चित किया हुआ। स्थिर किया हुआ। २. बनाया हुआ। निर्मित (को०)।

प्रकल्पिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की प्रहेलिका।

प्रकल्प्य
वि० [सं०] निश्चित करने योग्य। स्थिर करने योग्य [को०]।

प्रकश
संज्ञा पुं० [सं०] १. कशाघात। कोड़ से मारना। २. पीड़ा देना। कष्ट पहुँचाना। ३. दे० 'प्रकशी'।

प्रकशी
संज्ञा स्त्री० [सं०] शूक नामक रोग जिसमें पुरुषों की मूत्तैंद्रिय सूज जाती है और जी इंद्रिय को बढ़ानेवाली ओष- धियों का प्रयोंग करने से होता है।

प्रकांड (१)
संज्ञा पुं० [सं० प्रकाण्ङ] १. स्कंध। वृक्ष का तना। २. शाखा। डाल। ३. वृक्ष। पेड़। ४. बाहु का ऊपरी भाग। बाँह का ऊपरी हिस्सा।

प्रकांड (२)
वि० १. बहुत बड़ा। २. बहुत विस्तृत। ३. उत्तम। उत्कृष्ट। प्रशस्त।

प्रकांडर
संज्ञा पुं० [सं० प्रकाण्डर] वृक्ष। पेड़ [को०]।

प्रकाम (१)
संज्ञा पुं० [सं०] कामना। इच्छा।

प्रकाम (२)
वि० १. यथेष्ट। यथेप्सित। काफी। पूरा। २. कामवासनायुक्त। रसिक। कामुक [को०]। यौ०—प्रकामभुक = इच्छानुकूल खानेवाला। यथेष्ट भोजन करनेवाला।

प्रकामाभिराम
वि० [सं० प्रकाम + अभिराम] अत्यंत सुंदर। अति मनोहर। उ०—आपके 'प्रियप्रवास', 'चोखे चौपदे'— रचनाओं से प्रकामाभिराम पटुता तो प्रकट हो ही चुकी है।—रस क०, पृ० ३।

प्रकाम्योद
संज्ञा पुं० [सं०] एक वैदिक देवता।

प्रकार (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. भेद। किस्म। जैसे,—(क) मनुष्य कई प्रकार के होते हैं। (ख) चार प्रकार के फल। २. तरह। भाँति। जैसे,—इस प्रकार यह काम न होगा। ३. विशेषता। वैशिष्टय। भेद (को०)। ४. सदृशता। समानता। बारबरी।

प्रकार (२) पु
संज्ञा स्त्री० [सं० प्राकार] चहार दीवारी। परकोटा। पोरा। जैसे,—(क) विशद राजमंदिर मणिमंडित मंजुल आठ प्रकार।—रघुराज (शब्द०)। (ख) तीनि प्रकार प्रजा निवसत चौथे मँह रघुकुल बीरा।—रघुराज (शब्द०)।

प्रकारांतर
क्रि० वि० [सं० प्रकार + अन्तर] भिन्न प्रकार से। दूसरी तरह से। अन्य रूप में।

प्रकारी पु
वि० [सं० प्रकार + हिं० ई (प्रत्य०)] प्रकार का। किस्म का। प्रकारवाला। उ०—सुंदर भोज विविध प्रकारी।—नंद० ग्रं०, पृ० २१३।

प्रकाश (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जिसके भीतर पड़कर चीजें दिखाई पड़ती हैं। वह जिसके द्वारा वस्तुओं का रूप नेत्रों को गोचर होता है। दीप्ति। आभा। आलोक। ज्योति। चमक। तेज। विशेष—वैज्ञानिकों के अनुसार जिस प्रकार ताप (ऊष्मा) शक्ति का एक रूप है उसी प्रकार प्रकाश भी। प्रकाश कोई द्रव्य नहीं है जिसमें गुणत्व हो। प्रकाश पड़ने पर भी किसी वस्तु की उतनी ही तोल रहेगी जितनी अँधेरे में थी। प्रकाश के संबंध में इधर वैज्ञानिकों का यह सिद्धांत (विद्युच्चुंबकीय सिदधांत) है कि प्रकाश एक प्रकार की तरंगवत् गति है जो किसी ज्योतिष्मान् पदार्थ के द्वारा ईथर या आकाशद्रव्यमें उत्पन्न होती है और चारों ओर बढ़ती है। जल में यदि पत्थर फेंका जाय तो जहाँ पत्थर गिरता है वहाँ जल में क्षोभ उत्पन्न होता है, जिससे तरंगें उठकर चारों ओर बढ़ने लगती है। ठीक इसी प्रकार ज्योतिष्मान् पदार्थ द्वारा ईश्वर या आकाशद्रव्य में जो क्षोभ उत्पन्न होता है वह प्रकाश की तरंगों के रूप में चलता है। यह आकाशद्रव्य विभु वा सर्वव्यापक पदार्थ है, जो जिस प्रकार ग्रहों और नक्षत्रों के बीच अंतरिक्ष में सर्वत्र भरा है उसी प्रकार ठोस से ठोस वस्तुओं के परमाणुओं और अणुओं के बीच में भी। अतः प्रकाश का वाहक यथार्थ में यही आकाशद्रव्य समझा जाता है। प्रकाशतरंगों की गति कल्पनातीत अधिक है। वे एक सेकड में १८६२७२ मील या ९३१३६ कोस के हिसाब से चलती हैं। प्रकाश की जो करनें निकलती हैं, यद्यापि वे सब की सब एक ही गति से गमन करती हैं तथापि तरंगों की लंबाई के कारण उनमें भेद होता है। तरंगें भिन्न भिन्न लंबाई की होती हैं। इससे किसी एक प्रकार की तरंगों से बनी हुई किरनें दूसरे प्रकार की तरंगों से बनी हुई किरनों से भिन्न होती हैं। यही भेद रंगों के भेद का कारण है। (दे० 'रंग')। जैसे जिस तरंग की लंबाई .००००१६ इंच होती है वह बैंगनी रंग देती है, जिसकी लंबाई .००००२४ इंच होती है वह लाल रंग देती है। इसी प्रकार अनंत भेद हैं, जिनमें से कुछ ही पुराने तत्वविदों ने प्रकाश को कणिकामय वस्तु के रूप में माना था, पर पीछे वह विद्युच्चुंबकीय तरंगों के रूप का माना गया; परंतु प्रकाश संबंधी कुछ घटनाएँ ऐसी हैं जिनका समाधान विद्युच्चुबंकीय तरंग सिदधांत से नहीं हो सकता है। अतः एक दूसरे सिदधांत 'क्वाटम सिदधांत' का सहारा लेना पड़ा है। इस सिदधांत में एक नवीन प्रकार की कणिका का प्रतिपादन हुआ है। इसे 'फोटाँन' नाम दिया गया है। यह कणिका द्रव्य नहीं है। यह पुंजित ऊर्जा है। प्रत्येक फोटाँन में ऊर्जा का परिमाण प्रकाशतंरंग की आवृत्ति का अनुपाती होता है। इस फोटाँन सिदधांत से उन सभी घटनाओं का पूरा पूरा समाधान हो जाता है जिनका विद्युच्चुबंकीय तरंग सिद्घांत से न हो सका था। दूसरे शब्दों में न्यूटन द्वारा प्रतिपादित कणिका सिदधांत का यह नवीन कणिकामय रूप है। २. विकास। स्फुटन। विस्तार। अभिब्यक्ति। ३. प्रकटन। प्रकट होना। गोचर होना। देखने में आना। ४. प्रसिद्धि। ख्याति। ५. स्पष्ट होना। खुलना। साफ समझ में आना। ६. घोड़े की पीठ पर की चमक। ७. हास। हँसी ठट्ठा। ८. किसी ग्रंथ या पुस्तक का विभाग। ९. धूप। घाम। १०. कास्य धातु (को०)।

प्रकाश (२)
वि० १. प्रकाशित। जगमगाता हुआ। दीप्त। २. विकसित। स्फुटित। ३. प्रकट। प्रत्यक्ष। गोचर। ४. अति प्रसिद्ध। ख्यात। सर्वत्र जाना सुना हुआ। ५. स्पष्ट। समझ में आया हुआ।

प्रकाशक (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० प्रकाशिका] १. व्यक्त करनेवाला। प्रकाश करनेवाला। २. द्योतित। ३. प्रसिद्ध। ख्यात। प्रकट।

प्रकाशक (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो प्रकाश करे। जैसे, सूर्य। २. वह जो प्रकट करे। प्रसिद्ध करनेवाला। जैसे, ग्रंथ प्रकाशक, समाचारपत्र प्रकाशक। ३. काँसा। ४. महादेव का एक नाम।। ५. सूर्य (को०)। यौ०— प्रकाशकज्ञाता = तमचुर। मुर्गा।

प्रकाशकर्ता
संज्ञा पुं० [सं० प्रकाशकर्तृ] सूर्य [को०]।

प्रकाशकार
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रकाशक'।

प्रकाशक्रय
संज्ञा पुं० [सं०] खुले आम खरीद [को०]।

प्रकाशता
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रकाश का भाव या धर्म।

प्रकाशधृष्ट
संज्ञा पुं० [सं०] घृष्ट नायक के दो भेदों में से एक। वह नायक जो प्रकट रूप से धृष्टता करे, झूठी सोगंध खाय, नायिका के साथ साथ लगा फिरे, सबके सामने सकोच त्याग कर हँसी ठट्ठा करे, झिड़कने आदि पर भी न माने।

प्रकाशन (१)
वि० [सं०] प्रकाश करनेवाला। चमकीला। दीप्तिवान्।

प्रकाशन (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. विष्णु का एक नाम। २. प्रकाशित करने का काम। प्रकाश मे लाने का काम। ३. किसी पुस्तक के छप जाने पर उसको सर्वसाधारण में प्रचलित करने का काम। जैसे, पुस्तक प्रकाशन। पत्र प्रकाशन। यौ०— प्रकाशनाधिकार = पुस्तकादि के प्रकाशन का शर्तनामा। दे० 'कापीराइट'।

प्रकाशनारी
संज्ञा स्त्री० [सं०] वेश्या। रंडी [को०]।

प्रकाशमान
वि० [सं०] १. चमकता हुआ। चमकीला। प्रकाशयुक्त। २. प्रसिद्ध। मशहूर।

प्रकाशवान्
वि० [सं० प्रकाशवत्] दे० 'प्रकाशमान'।

प्रकाशवाह
संज्ञा पुं० [सं० प्रकाश + वाह] प्रकाश लानेवाला, सूर्य। उ०— विस्तृत कर जन मन पथ, वाहित कर जीवन रथ, बन प्रकाशवाह, हरे अंधकार लोकायन ! —आतिमा, पृ० १३४।

प्रकाशवियोग
संज्ञा पुं० [सं०] केशव के अनुसार वियोग के दो भेदो में से एक। वह वियोग जो सबपर प्रकट हो जाय।

प्रकाशसयोग
संज्ञा पुं० [सं०] केशव के अनुसार संयोग के दो भेदों में से एक। वह संयोग जो सबपर प्रकट हो जाय।

प्रकाशात्मक
वि० [सं०] चमकीला। आभामय [को०]।

प्रकाशात्मा (१)
संज्ञा पुं० [सं० प्रकाशात्मन्] १. सूर्य। २. विष्णु। ३. शिव (को०)।

प्रकाशात्मा (२)
वि० चमकीला। ज्योतिमय [को०]।

प्रकाशित
वि० [सं०] १. जिसमें से प्रकाशं निकल रहा हो। चमकता हुआ। उ०— यह रतन दीप हरि प्रेम की सदा प्रकाशित जग रहै।—भारतेंदु ग्रं०, पृ० ४६३। २. जिसपर प्रकाश पड़ रहा हो। चमकता हुआ। ३. जो प्रकाश में आ चुका हो। विज्ञापित। प्रकट। जैसे,—यह पुस्तक हाल हो में प्रकाशित हई है।

प्रकाशी
संज्ञा पुं० [सं० प्रकाशिन्] वह जिसमें प्रकाश हो। चमकता हुआ।

प्रकाश्य (१)
वि० [सं०] १. प्रगट करने योग्य। जाहिर करने योग्य। २. व्यक्त। प्रकट।

प्रकाश्य (२)
संज्ञा पुं० प्रकाश। ज्योति। चमक।

प्रकाश्य (३)
क्रि० वि० प्रकट रूप से। स्पष्टतया। नाटक में 'स्वगत' का उलटा।

प्रकास पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रकाश] दे० 'प्रकाश'। उ०— पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका।—मानस, ७। ३१। (ख) सो बैष्णव बिना उनके आगे अपनो धर्म कैसे प्रकास करे।— दो सौ बावन०, भा० १, पृ० १०३।

प्रकासक पु
वि०, संज्ञा पुं० [सं० प्रकाशक] दे० 'प्रकाशक'। उ०— (क) सब कर परम प्रकासक जोई। राम अनादि अवधपति सोई।— मानस, १। ११७। उ०— सघन घनै उडुगनि गगनि अगनित करत उदोत। परम प्रकासक पै निसा निसानाथ तै होत।— स० सप्तक, पृ० ३६८।

प्रकासना पु
क्रि० सं० [सं० प्रकाश] प्रकाश करना। प्रकट करना। जाहिर करना। उ०— सुनि उद्धव सब बात प्रकासी। तुम बिन दुखित रहत ब्रजवासी।—विश्राम (शब्द०)।

प्रकासिका पु
वि० स्त्री० [सं० प्रकाशिका] प्रकाशित करनेवाली। प्रकट करनेवाली। उ०— पुन्य प्रकासिका पाप विनासिका हीय हुलासिका सोहत कासिका।—भारतेंदु ग्रं० भा० १, पृ० २८१।

प्रकास्य पु
वि० [सं० प्रकाश्य] दे० 'प्रकाश्य (१)'। उ०— जगत प्रकास्य प्रकासक रामू।—मानस, १। ११७।

प्रकिरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. बिखेरना। छीटना। विकीण करना। २. मिलाना। मिश्रण [को०]।

प्रकिरती पु
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रकृति] दे० 'प्रकृति'—३। उ०— पुरुष प्रकिरती पदवी पाई। सुद्ध सरगुन रचन पसारा है।— कबीर श० भा० १, पृ० ६१।

प्रकीन पु
वि० [सं० प्रकीर्ण] फैला हुआ। उ०— बनि जानि प्रकीन क्रपान बनं।—पृ० रा०, २६। २७।

प्रकीर्ण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. दुगँधवाला करंज। पूतिकरंज। २. अध्याय। प्रकरण। ३. चँवर। ४. पागल। ५. उद्दंड। उच्छृंखल। ६. फुटकर कविता। ७. अनेक प्रकार की फुटकल वस्तुओं का संकलन (को०)। ८. विस्तार। फैलाव (को०)। ९. विकीर्ण करना। बिखेरना। छितराना (को०)।

प्रकीर्ण (२)
वि० १. फैला हुआ। विस्तृत। २. बिखरा हुआ। छित- राया हुआ। अस्तव्यस्त। क्षुब्ध। ३. मिला हुआ। मिश्रित ४. तरह तरह का। अनेक प्रकार का।

प्रकीर्णक
संज्ञा पुं० [सं०] १. चँवर। २. अध्याय। प्रकरण। ३. विस्तार। ४. वह जिसमें तरह तरह की चाजें मिली हों। फुटकर। जैसे, प्रकीर्णक कविता; प्रकीर्णक पुस्तकमाला। ५. पाप जिसके प्रायश्चित का ग्रंथों में उल्लेख न हो। फुटकर पाप। ६. फुटकल संग्रह। ७. तुरंगम। अश्व। घोड़ा। (को०)। ८. घोड़ों के सिर पर लगनेवाली कलगी (को०)।

प्रकीर्णकेशी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दुर्गा।

प्रकीर्तन
संज्ञा पुं० [सं०] १. जोर जोर से कीर्तन करना। २. यश गान करना। ३. घोषणा करना।

प्रकीर्तना
संज्ञा स्त्री० [सं०] नाम निर्दश करना। नामलेना। उल्लेख करना (को०)।

प्रकीर्ति
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रकीर्ति] १. घोषणा। २. प्रसिद्धि। ख्याति।

प्रकीर्तित
वि० [सं०] १. कथित। घोषित। २. प्रथित। प्रसिद्ध। ख्यात। ३. प्रशंसित [को०]।

प्रकीर्य (१)
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० प्रकीर्या] १. दुर्गंधवाला करंज। २. रीठा करज।

प्रकीर्य (२)
वि० [सं०] प्रकिरण के योग्य। बिखेरने योग्य [को०]।

प्रकुंच
संज्ञा पुं० [सं० प्रकुञ्च] आठ तोले या एक पल का मान।

प्रकुंज
संज्ञा पुं० [सं० प्रकृ़ज् ञ] दे० 'प्रकुंच'।

प्रकृथित
वि० [सं०] दूषित। दूषणयुक्त [को०]।

प्रकुपित
वि० [सं०] १. जिसका प्रकोप बहुत बढ़ गया हो। जैसे, प्रकृपित कफ। २. हिलाया हुआ। कंपित। क्षोभित (को०)। ३. जो बहुत क्रुद्ध हो। उ०— पहुँचे पुर में प्रकृपित होकर धन्वी लक्ष्मण चारुचरित्र।—साकेत, पृ० ३८७।

प्रकृप्त
वि० [सं०] दे० 'प्रकुपित'।

प्रकुल
संज्ञा पुं० [सं०] साँचे में ढला हुआ शरीर। सौंदर्ययुक्त शरीर [को०]।

प्रकुष्मांडी
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रकुष्माण्ड़ी] दुर्गा [को०]।

प्रकूष्मांडी
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रकूष्माण्ड़ी] दुर्गा [को०]।

प्रकृत (१)
वि० [सं०] १. जो विशेष रूप से किया गया हो। आरब्ध। २. वास्तविक। यथार्थ। असली। सच्चा। ३ जो बनाया गया हो। पूरा किया हुआ। रचा हुआ। ४. जिसमें किसी प्रकार का विकार न हुआ हो। विकाररहित। अविकृत। ५. प्रकरणप्राप्त। प्रसंगप्राप्त (को०)। ६. अपेक्षित। आकां- क्षित। इच्छित (को०)। ७. स्वभाववाला। प्रकृतिवान्। ८. नियुक्त (को०)।

प्रकृत (२)
संज्ञा पुं० श्लेष अलंकार का एक भेद।

प्रकृतता
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रकृत होने का भाव। २. यथार्थता। असलियत।

प्रकृतत्व
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रकृत होने का भाव। २. यथार्थता। असलियत।

प्रकृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. स्वभाव। मूल या प्रधान गुण जो सदा बना रहे। तासीर। जैसे,— आलू की प्रकृति गरम है। २. प्राणी की प्रधान प्रवृत्ति। न छूटनेवाली विशेषता। स्वभाव।मिजाज। जैसे,— वह बड़ी खोटी प्रकृति का मनुष्य है। ३. जगत् का मूल बीज। वह मूल शक्ति अनेक रूपात्मक जगत् जिसका विकास है। जगत् का उपादान कारण। कुदरत। विशेष— साख्य में पुरुष और प्रकृति से अतिरिक्त और कोई तीसरी वस्तु नहीं मानी गई है। जगत् प्रकृति का ही विकार अर्थात् अनेक रूपों में प्रवर्तन है। प्रकृति की विकृति या परिणाम ही जगत् है। जिस प्रकार एकरूपता या निर्वि- शेषता से परिणाम द्वारा अनेकरूपता की ओर सर्गोन्मुख गतिहोती है उसी प्रकार फिर अनेकरूपता से क्रमशः उस एकरूपता की ओर गति होती है जिसे साम्यावस्था, प्रलयावस्था या स्वरूपावस्था कहते हैं। प्रथम प्रकार की गतिपरंपरा को विरूप परिणाम और दूसरी प्रकार की गतिपरंपरा को स्वरूप परिणाम कहते हैं। स्वरूपावस्था में प्रकृति अव्यक्त रहती है, व्यक्त होने पर ही वह जगत् कहलाती है। इन्हीं दोनों परिणामों के अनुसार जगत् बनता और बिगड़ता रहता है। प्रकृति के परिणाम का क्रम इस प्रकार कहा गया है— प्रकृति के महत्तत्व (बुदि्ध), महत्तत्व से अहंकार अहकार से पंचतन्मात्र (शब्द तन्मात्र, रस तन्मात्र इत्यादि), पंचतन्मात्र से एकादश इंद्रिय (पंच ज्ञानेंद्रिय, पंच कर्मेंद्रिय और मन) और उनसे फिर पंच- महाभूत। इस प्रकार ये चौबीसों तत्व जिनसे संसार बना है प्रकृति ही के परिणाम है। जो क्रम कहा गया है वह विरूप परिणाम का है। स्वरूप परिमाम का क्रम उलटा होता है, अर्थात् उसमें पंचमहाभूत एकादश इंद्रिय रूप में, फिर इंद्रिय तन्मात्र रूप में, तन्मात्र अहंकार रूप में— इसी क्रम से सारा जगत् फिर नष्ट होकर अपने मूल प्रकृति रूप में आ जाता है। विशेष दे०— 'सांख्य')। ४. राजा, आमात्य, जनपद, दुर्ग, कोश, दंड और मित्र इन सात अंगों से युक्त राष्ट्र या राज्य। विशेष— इसी को शुक्रनीति में 'सप्तांग' राज्य' कहा है। उसमें राजा की सिर से, आमात्य की आँख से, मित्र की कान से, कोश की मुख से, दंड़ या सेना की भुजा से, दुर्ग की हाथ से और जनपद की पैर से उपमा दी गई है। ५. राज्य के अधिकारी कार्यकर्ता जो आठ कहे गए हैं। विशेष दे० 'अष्ट प्रकृति'। ५. परमात्मा (को०)। ६. नारी। स्त्री (को०)। ७. स्त्री या पुरुष की जननेंद्रिय (को०)। ८. माता। जननी (को०)। ९. माया (को०)। १०. कारीगर। शिल्पकार। ११. एक छंद जिसमें २१, २१ अक्षर प्रत्येक चरण में हों (को०)। १२. प्रजा (को०)। १३. पशु। जंतु (को०)। १४. व्याकरण में वह मूल शब्द जिसमें प्रत्यय लगते हैँ। १५. जीवनक्रम (को०)। १६.(गणित में) निरूपक। गुणक (को०)। १७। चराचर जगत् (को०)। १८. सृष्टि के मूलभूत पाँच तत्व। पंचमहा भूत (को०)।

प्रकृतिज
वि० [सं०] जो प्रकृति या स्वभाव से उत्पन्न हुआ हो।

प्रकृतिपुरुष
संज्ञा पुं० [सं०] राज्यमंत्री। मंत्री [को०]।

प्रकृतिभाव
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्वभाव। २. संधि का वह नियम जिसमें दो पदों के मिलने से कोई विकार नहीं होता।

प्रकृतिमंडल
संज्ञा पुं० [सं० प्रकृतिमण्डल] राज्य के स्वामी, आमात्य, सुहृद, कोष, राष्ट्र, दुर्ग और बल इन सातों अंगों का समूह। २. प्रजा का समूह।

प्रकृतिमान्
वि० [प्रकृतिमत्] १. स्वाभाविक। नैसर्गिक। सहज। २. सात्विक विचार का [को०]।

प्रकृतिलय
संज्ञा पुं० [सं०] प्रकृति में मिल जाना। प्रलय होना [को०]।

प्रकृतिवशित्व
संज्ञा पुं० [सं०] प्रकृति को अधिकार में लाने या रखने की शक्ति।

प्रकृतिशास्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] वह शास्त्र जिसमें प्राकृतिक बातों (जैसे, जीव, पशु, वनस्पति, भूगर्भ आदि) का विचार किया जाय।

प्रकृतिसिद्ध
वि० [सं०] स्वाभाविक। प्राकृतिक। नैसर्गिक।

प्रकृतिसुभग
वि० [सं०] नैसार्गिक सुंदर। स्वभावतः सुंदर [को०]।

प्रकृतिस्थ
वि० [सं०] १. जो अपनी प्राकृतिक अवस्था में हो। अपने स्वभाव में स्थित। अपनी मामूली हालत में। २. स्वाभाविक। नैसर्गिक।

प्रकृतिस्थ सूर्य
संज्ञा पुं० [सं०] उत्तरायण उल्लंघन करके आया हुआ सूर्य।

प्रकृतीश
संज्ञा पुं० [सं०] प्रकृति अर्थात् प्रजा का स्वामी। राजा। शास्ता [को०]।

प्रकृत्थजीर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] साधारण या स्वाभाविक अजीर्ण।

प्रकृत्या
क्रि० वि० [सं०] प्रकृति से। स्वभावतया [को०]।

प्रकृष्ट
वि० [सं०] १. मुख्य। प्रधान। खास। २. उत्तम। श्रेष्ठ। ३. आकृष्ट। खिंचा हुआ। ४. खींचा या बढ़ाया हुआ। (को०)।

प्रकृष्टता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. उत्तममता। उत्कृष्टता। श्रेष्ठता। मुख्यता। २. दीर्घता (को०)।

प्रकोट
संज्ञा पुं० [सं०] १. शहरपनाह। परिखा। परकोटा। २. धुस्स।

प्रकोथ
संज्ञा पुं० [सं०] सड़ना। दूषित होना [को०]।

प्रकोप
संज्ञा पुं० [सं०] १. बहुत अधिक कोप। २. क्षोभ। ३. चचलता। ४. किसी रोग की प्रबलता। बीमारी का अधिक और तेज होना। जैसे,—आजकल शहर में हैजे का बहुत प्रकोप है। ५. शरीर के वात, पित्त आदि का किसी कारण से बिगड़ जाना जिससे रोग उत्पन्न होता है। जैसे,— उनको पित्त के प्रकोप के कारण ज्वर हुआ है।६. आक्र- मण। हमला (को०)। ७. विद्रोह।

प्रकोपक
संज्ञा पुं० [सं०] किसी भूमि या धन का धर्मात्मा के हाथ से अधर्मी के हाथ में जाना। अधर्मी का लाभ (जिससे जनता को खेद या रोष हो)।

प्रकोपण
वि०, संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रकोपन' [को०]।

प्रकोपन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी के प्रकोप को बढ़ाना। उत्ते- जित करना। २. गुस्सा करना। नाराज होना। बिगड़ना। ३. क्षोभ। ४. वात, पित्त आदि का कोप। विशेष—दे० 'प्रकोप'। ५. चंचलता।

प्रकोपन (२)
वि० [सं०] प्रकोप करानेवाला। क्षुब्ध करनेवाला। प्रकृपित करनेवाला [को०]।

प्रकोपित
वि० [सं०] उत्तेजित किया हुआ। क्षुब्ध। क्रुधित [को०]।

प्रकोष्ठ
संज्ञा पुं० [सं०] १. कोहनी के नीचे का भाग। २. बड़े दरवाजे के पास की कोठरी। सदर फाटक के पास की कोठरी। ३. बड़ा आँगन जिसके चारों ओर इमारत हो।

प्रकोष्ठक
संज्ञा पुं० [सं०] इमारत के सदर फाटक के पास का कक्ष या कमरा [को०]।

प्रकोष्णा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक अप्सरा का नाम।

प्रक्करा पु
संज्ञा पुं० [सं० प्राकार] दे० 'प्राकार'। उ०— वर बिहार प्रक्कार विपन वाटिका विराजिय।—पृ० रा०, १८। १४।

प्रक्खर (१)
वि० [सं०] अत्यंत तीक्ष्ण, तीव्र या उग्र [को०]।

प्रक्खर (२)
संज्ञा पुं० १. घोड़े या हाथी के रक्षार्थ उन्हें पहनाने का कवच। पाखर। अश्वकवच। २. खच्चर। ३. श्वान। कुत्ता [को०]।

प्रक्रंता
वि० [सं० प्रक्रन्तृ] १. उपक्रम करनेवाला। आरंभकर्ता। २. दमन करनेवाला। ३. स्वायत्त करनेवाला। वश में करनेवाला [को०]।

प्रक्रति पु
संज्ञा स्त्री० [हि०] दे० 'प्रकृति'-३। उ०— आदि अगम अविकार एक ईस्वर अविणासी। पछै प्रक्रति तत पंच विविध सुर ईख जवासी।— रा० रू, पृ० ७।

प्रक्रत्ती पु
संज्ञा स्त्री० [हि०] दे० 'प्रकृति'। उ०— प्रक्रती पुरुष्षं।—पृ० रा०, २४। ४०३।

प्रक्रम
संज्ञा पुं० [सं०] १. क्रम। सिलसिला। २. वह उपाय जो किसी कार्य के आरंभ मे किया जाय। उपक्रम। ३. अतिक्रम। उल्लंघन। ४. अवसर। मौका।

प्रक्रमण
संज्ञा पुं० [सं०] १. अच्छी तरह घूमना। खूब भ्रमण करना। २. पार करना। ३. आरंभ करना। ४. अग्रसर होना। आगे बढ़ना।

प्रक्रमणीय
वि० [सं०] प्रक्रम के योग्य। उपक्रम योग्य [को०]।

प्रक्रमभंग
संज्ञा पुं० [सं० प्रक्रमभङ्ग] साहित्य में एक दोष जो उस समय होता है जब किसी वर्णन में आरंभ किए हुए क्रम आदि का ठीक ठीक पालन नहीं होता।

प्रकांत (१)
वि० [सं० प्रक्रान्त] १. आरंभ किया हुआ। २. क्रमश किया हुआ। ३. प्रसंगप्राप्त। प्रकरणप्राप्त। ४. विक्रमशाली। वीर। शूर [को०]।

प्रक्रांत (२)
संज्ञा पुं० १. यात्रारंभ। यात्रा का उपक्रम। २. प्रश्न या वाद का विषय [को०]।

प्रक्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रकरण। २. क्रिया। युक्ति। तरीका। ३. राजाओं का चँवर, छत्र आदि का धारण। ४. प्रकृष्ट कर्म अच्छा कार्य (को०)। ४. उच्च पद या स्थान (को०)। ६. विशेष अधिकार (को०)। ७. ग्रंथ का कोई अध्याय या विभाग। जैसे, उणादि प्रक्रिया (को०)। ८. किसी ग्रंथ का प्रारंभिक परिचयात्मक अंश या अध्याय (को०)। ९. (व्याकरण) शब्द या प्रयोग का साधन या विधि (को०)। १०. (वैद्यक) उपचार में ओषधिनिर्देश। नुसखा (को०)।

प्रक्रीड
संज्ञा पुं० [सं०] क्रीडा। खेलकूद [को०]।

प्रक्लिन्न
वि० [सं०] १. आर्द्र। तर। गीला। २. तुप्त। संतुष्ट। ३. दयार्द्र। ४. सड़ा या गला हुआ [को०]।

प्रक्लिन्नवर्त्म
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक रोग जिसमें आँख की पलकें बाहर से सूज जाती है और आँखों में कीचड़ भर जाता है। विशेष दे०— 'क्लिन्नवर्त्म'। २. वह मार्ग जो जल के कारण गीला हो।

प्रक्लेद
संज्ञा पुं० [सं०] आर्द्नता। नमी। तरी।

प्रक्लेदन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] तर करना। गीला करना। भिगोना।

प्रक्लेदन (२)
वि० आर्द्र करनेवाला [को०]।

प्रक्लेदी
वि० [सं० प्रक्लेदिन्] तर करनेवाला। आर्द या गील करनेवाला [को०]।

प्रक्वण, प्रक्वाण
संज्ञा पुं० [सं०] वीण की ध्वनि [को०]।

प्रक्वाथ
संज्ञा पुं० [सं०] उबलना [को०]।

प्रक्ष पु
वि० [सं० पृच्छक] पूछनेवाला। प्रश्नकर्ता। उ०— कल्प कलहंस कोकि क्षीरनिधि छवि प्रक्ष हिमगिरि प्रभा प्रभु प्रगट पुनीत है।—केशव (शब्द०)।

प्रक्षपण
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रक्षयण' [को०]।

प्रक्षय
संज्ञा पुं० [सं०] क्षय। नाश। बरबादी।

प्रक्षयण
संज्ञा पुं० [सं०] बरबाद करना। नाश करना।

प्रक्षर
संज्ञा पुं० [सं०] घोड़े की पाखर। दे० 'प्रक्खर'।

प्रक्षरण
संज्ञा पुं० [सं०] झरना। बहना।

प्रक्षाम
वि० [सं०] दग्ध। जला या झुलसा हुआ [को०]।

प्रक्षाल
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रायश्चित। २. दे० 'प्रक्षालन'।

प्रक्षालन
संज्ञा पुं० [सं०] १. जल से साफ करने की क्रिया। धोना। २. जल जिससे कोई चीज साफ की जाय (को०)। ३. शुद्ध करने की वस्तु। शुद्धि का साधन (को०)। ४. स्वच्छ या साफ करना (को०)।

प्रक्षालयिता
संज्ञा पुं० [सं० प्रक्षालयितृ] पैर या चरण धोनेवाला विशेषतः अतिथियों के [को०]।

प्रक्षालित
वि० [सं०] धोया हुआ। साफ किया हुआ। २. प्रायश्चित्त किया हुआ (को०)।

प्रक्षाल्य
वि० [सं०] धोने या साफ करने के योग्य।

प्रक्षिप्त
संज्ञा पुं० [सं०] १. फेंका हुआ। २. डाला हुआ। अंदर या भीतर छोड़ा हुआ (को०)। ३. जोड़ा या मिलाया हुआ।(को०)। ४. ऊपर से बढ़ाया हुआ। पीछे से मिलाया हुआ। जैसे,—(क) रामायण में लवकुश कांड प्रक्षिप्त है। (ख) इस पुस्तक में एक प्रकरण प्रक्षिप्त है।

प्रक्षोण (१)
वि० [सं०] १. नष्ट। विध्वस्त। २. अंतर्हित। लुप्त। गायब [को०]।

प्रक्षोण (२)
संज्ञा पुं० नष्ट होने या करने का स्थान। विनाशस्थल [को०]।

प्रक्षीवित
वि० [सं०] मदहोश। नशो में मत [को०]।

प्रक्षुण्ण
वि० [सं०] १. निदंलित। मर्दित। २. चूर्ण किया हूआ। चूरा किया हुआ। ३. अधातित। ४. प्रचीदित। प्ररित [को०]।

प्रक्षेप
संज्ञा पुं० [सं०] १. फेंकना। डालना। २. छितराना। बिखराना। ३. मिलाना। बढ़ाना। ४. वह पदार्थ जो औषध आदि में ऊपर से डाला जाय। ५. गाड़ी या रथ का बक्स (को०)। ६. क्षेपक। प्रक्षिप्त अंश (को०)। ७. वह मूल धन जो किसी व्यापारिक समाज या संस्था का प्रत्येक सदस्य लगा दे। हिस्सेदारों की अलग अलग लगाई हुई पूँजी।

प्रक्षेपण
संज्ञा पुं० [सं०] १. फेंकना। २. ऊपर से मिलाना। ३. जहाज आदि का चलाना। ४. निश्चित करना।

प्रक्षेपणीय
वि० [सं०] प्रक्षेपण के योग्य [को०]।

प्रक्षेपलिपि
संज्ञा स्त्री० [सं०] अक्षर लिखने की एक विशेष रीति।

प्रक्षोभ, प्रक्षोभण
संज्ञा पुं० [सं०] १. घबराहट। बेचैनी। २. कपन। हिलना डुलना (को०)।

प्रक्ष्वेडन
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० प्रक्ष्वेडना] जनरव। १. शोर- गुल। हल्ला। २. लोहे का बाण [को०]।

प्रक्ष्वेडा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अस्पष्ट नाद। कलरव। २. गर्जन। गंभीर नाद [को०]।

प्रक्ष्वेडित (१)
वि० [सं०] कोलाहलयुक्त। शोरगुल से भरा हुआ।

प्रक्ष्वेडित (२)
संज्ञा पुं० अस्पष्ट ध्वनि। रव। कलकल [को०]।

प्रक्ष्वेदन
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० प्रक्ष्वेदना] नाराच। वाण [को०]।

प्रखर (१)
वि० [सं०] १. तीक्ष्ण। प्रचंड। जैसे, सूर्य की प्रखर किरण। २. धारदार। चोखा। पैना। ३. कठोर। कड़ा। रूक्ष (को०)।

प्रखर (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. खच्चर। २. कुत्ता। ३. घोड़े की पाखर।

प्रखरता
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रखर होने की क्रिया या भाव। तेजी।

प्रखल
वि० [सं०] बहुत बड़ा दुष्ट।

प्रखाद
वि० [सं०] खाने या निगलनेवाला [को०]।

प्रख्य (१)
वि० [सं०] १. श्रेष्ठ। वरिष्ट। २. प्रत्यक्ष। व्यक्त। परिस्फुट २. सदृश। समान। तुल्य। (समासांत में प्रयुक्त) जैसे, अमृत- प्रख्य, शशांकप्रख्य [को०]।

प्रख्य (२)
संज्ञा पुं० वृहस्पति। गुरु। सुराचार्य [को०]।

प्रख्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विख्याति। प्रसिद्धि। २. समता। बरा- बरी। ३. उपमा। ४. प्रभा। कांति। दीप्ति (को०)। ५. इंद्रियग्रांह्याता। वेद्यता। गोचरता (को०)।

प्रंख्यात
क्रि० वि० [सं०] १. जिसे सब लोग जानते हों। प्रसिद्ध। मशहूर। विख्यात। २. प्रसन्नतायुक्त। सुखी (को०)। ३. ज्ञापित (को०)।

प्रख्याति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रख्यात होने का भाव। प्रसिद्धि। विख्योति। २. वेद्यता। गोचरता। इंद्रियग्राह्यता (को०)।

प्रख्यान
संज्ञा पुं० [पुं०] १. सूचना। खबर। वृत्त। २. खबर देना। सूचना देना का काम। ३. ग्रहण या अनुभव करना [को०]।

प्रख्यापन
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रसिद्ध करना। ख्यात करना। २. संचारित करना। संचारण। ३. समाचार। सूचना [को०]।

प्रख्यापित
वि० [सं०] जिसको ख्यात किया गया हो। जिसकी प्रसिद्धि की गई हो। जिसके संबंध में कहा गया हो। उ०— वे नए से नए और अधिक भड़कीले, प्रचारित एवं प्रख्यापित वादों से प्रभावित नहीं होते।—शुक्ल अभि० ग्रं०, पृ० १४२।

प्रगड
संज्ञा पुं० [सं० प्रगण्ड] कधे से लेकर कोहनी तक का भाग।

प्रगंडी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दुर्ग आदि का प्राकार जिसपर बैठकर दूर दूर की चीजें देखते हैं। बाहरी दीबार।

प्रगंध
संज्ञा पुं० [सं० प्रगन्ध] दवन पापड़ा।

प्रगट
वि० [सं० प्रकट] दे० 'प्रकट'।

प्रगटन
संज्ञा पुं० [सं० प्रकटन] दे० 'प्रक्टन'।

प्रगटना † (१)
क्रि० अ० [सं० प्रकटन] प्रगट होना। सामने आना। दाहिर होना। उ०—प्रगटत दुरत करत छल भूरी।— मानस, ३। २१।

प्रगटना (२)
क्रि० स० व्यक्त करना। प्रकट करना। उ०—प्रान तजत प्रगटेसि निज देहा।—मानस, ३। २१।

प्रगटाना †
क्रि० स० [सं० प्रकटन, हिं० प्रगटना का सक० रूप] प्रकट करना। जाहिर करना।

प्रगटित
वि० [सं० प्रकटित] दे० 'प्रकटित'। उ०—जो कोउ जोति ब्रह्ममय, रसमय सबकी भाइ। सो प्रगटित निज रूप करि इहि तिसरे अध्याइ।—नंद ग्रं०, पृ० २३१।

प्रगट्टना (१)
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'प्रगटना'। उ०—तिमिर तुलित तुरकान प्रबल दिसि बिदिस प्रगट्टत।—मति० ग्रं०, पृ० ३६७।

प्रगट्टना पु (२)
क्रि० स० दे० 'प्रगटाना'। उ०—'मतिराम' एक दाता निमनि जमजस अमल प्रगट्टियउ।—मति० ग्रं०, पृ० ३६४।

प्रगडउ पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रकट, प्रा० प्रगड, हिं० पगर वा फा० पगाह (=सबेरा)]। यात्रारंभ का समय। सूर्य का प्रकाश। तड़का। सबेरा। पगरा। उ०—पुगल जाइ प्रगडउ करइ, करइ मारवणि दाइ।—ढोला०, दू० ३८७।

प्रगत
वि० [सं०] १. आगे गया हुआ। गत। २. जो पृथक् या दूर हो। अलग। पृथक् [को०]। यौ०—प्रगतजानु, प्रगतजानुक = जिसके घुटने एक दूसरे से अधिक अंतराल पर हों। धनुषाकार आगे की ओर जिसकी जानु निकली हो।

प्रगति
संज्ञा स्त्री० [सं०] आगे बढ़ना। तरक्की। उन्नति [को०]।

प्रगतिवाद
संज्ञा पुं० [सं० प्रगति + वाद] १. वह सिद्धांत जिसमेंसाहित्य को सामाजिक विकास का साधन माना जाता है। २. सामान्य जनजीवन को साहित्य में व्यक्त करमे का सिद्धांत। एक साहित्यिक विचारधारा, जिसमें सामाजिक यथार्थ और मार्क्स के आर्थिक क्षेत्र में प्रतिपादित सिद्धातों के लिये विशेष आग्रह रहता है। विशेष—प्रगतिवाद का आरंभ सन् १९४० के पूर्व ही हो गया था। सामाजिक और आर्थिक उत्पीड़न संबंधो प्रगतिवादी विचारों ने साहित्यकारों को सहज रूप से अपनी ओर आकृष्ट किया, फलतः श्रमिकों, कृषकों और सामाजिक उत्पीड़ितों को केंद्र बनाकर साहित्य की रचना हुई। साहित्यिक विचारधारा के अतिरिक्त प्रगतिवाद जनादोलन के रूप में भी पनपा और सारे संसार को इसने प्रभावित किया। इस रूप में इसने मानवमुक्ति के लिये संघर्ष किया, अव्यावहारिक प्राचीन संस्कारों और रूढ़ियों के निराकरण तथा समाज की वर्गस्थिति को समाप्त करने की चेष्टा की।

प्रगतिवादी (१)
संज्ञा पुं० [सं० प्रगति + वादिन्] प्रगतिवाद का अनुयायी।

प्रगतिवादी (२)
वि० १. प्रगतिवाद के सिद्धांत पर चलनेवावा। प्रगति- वादी विचारधारा को मानेवाला। २. प्रगतिवाद संबंधी। ३. प्रगितवाद के सिद्धांत पर आधृत।

प्रगतिशील
वि० [हिं० प्रगति + सं० शील] १. बराबर आगे बढ़नेवाला। उन्नतिशील। २. सुधारवादी। ३. जो प्रगतिवाद का अनुयायी हो। ४. प्रगतिवाद संबंधी। ५. प्रगतिवाद के सिद्धांत पर आधारित।

प्रगम
संज्ञा पुं० [सं०] पूर्वानुराग। प्रथम प्रेम। प्रेमी और प्रेमिका में अनुराग का प्रथम उदय [को०]।

प्रगमन
संज्ञा पुं० [सं०] वि० प्रगमनीय] १. आगे बढ़ना। २. उन्नति। तरक्की। ३. झगड़ा। लड़ाई। ४. दे० 'प्रगम'। ५. वह भाषण जिसमें कोई अच्छा उत्तर दिया गया हो। अनूठा या माकूल जवाब।

प्रगर्जन, प्रगर्जित
संज्ञा पुं० [सं०] गरजना। गर्जन। चिल्लाहट [को०]।

प्रगल्भ
वि० [सं०] १. चतुर। होशियार। २. प्रतिभाशाली। संपन्न बुदि्धवाला। ३. उत्साही। साहसी। हिम्मती। ४. समय पर ठीक उत्तर देनेवाला। हाजिरजवाब। ५. निर्भय। निडर। ६. बोलने में संकोच न रखनेवाला। बकवादी। ७. गंभीर। भरपूरा। ८. प्रधान। मुख्य। ९. निर्लज्ज। बेहया। धृष्ट। १. उद्धत। जिसमें नम्रता न हो। ११. अभिमानी। १२. पुष्ट। प्रौढ़।

प्रगल्भता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बुदि्धमत्ता। होशियारी। २. प्रतिभा। बुद्धि की संपन्नता। ३. उत्साह। ४. हाजिर- जवाबी। वाक्चातुरी। ५. निर्भयता। संकोच का अभाव। ६. गंभीरता। ७. प्रधानता। मुख्यता। ८. निर्लज्जता। बेहयाई। धृष्टता। ९. उद्धतता। १०. अभिमान। ११. पुष्टता। प्रौढ़ता। १२. बकवाद । व्यर्थ की बाचचीत। १३. सामर्थ्य। शक्ति। अध्यवसाय।

प्रगल्भवचना
संज्ञा स्त्री० [सं०] मध्या नायिका के चार भेदों में से एक। वह नायिका जो बातों ही बातों में अपना दुःख और क्रोध प्रकट करे और उलाहना दे।

प्रगल्भा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दे० 'प्रौढ़ा' (नायिका)। २. धृष्ट स्त्री। कर्कशा स्त्री (को०)। ३. दुर्गा का एक नाम (को०)।

प्रगसना पु †
क्रि० अ० [सं० प्रकाश] प्रकट होना। प्रकाशित होना। व्यक्त होना।

प्रगाढ़ (१)
वि० [सं० प्रगाढ] १. बहुत अधिक। जैसे, प्रगाढ़ संकट। २. गाढ़ा या गहरा। जैसे, प्रगाढ़ निद्रा। ३. कड़ा। कठोर। घना। ४. अच्छी तरह डुबाया या तर किया हुआ (को)। ५. शक्तिशाली। दृढ़ (को०)। ६. बहुत आगे बढ़ा हुआ (को०)।

प्रगाढ़ (२)
संज्ञा पुं० १. तपस्या। तपश्चरण। २. अभाव। कष्ट। दुःख। कठिनाई [को०]।

प्रगाढ़ता
संज्ञा पुं० [सं० प्रगाढता] १. तीव्रता। अधिकता। २. गंभीरता। गहराई। उ०—साहित्यकार के जीवन और साहित्य में वह जितनी प्रगढ़ता से अंतर्भूत रहेगा।—इति० आलो०, पृ० २४। ३. कठिनता। कठिनाई।

प्रगाता
वि०, संज्ञा पुं० [सं० प्रगातृ] गानेवाला। अच्छा गायक।

प्रगामी
संज्ञा पुं० [सं० प्रगामिन्] वह जो गमन करता हो। गंता। जानेवाला।

प्रगायी
वि०, संज्ञा पुं० [सं० प्रगायिन्] अच्छा गानेवाला। उत्कृष्ट गायक। प्रगाता।

प्रगास पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'प्रकाश'। उ०—अजपा जपै जीभ्या बिना यह मूल प्रगास परसि लीजे।—स० दरिया, पृ० ६६।

प्रगासना पु
क्रि० स० [हिं० प्रगासना] प्रकाशित करना। प्रगट करना। उ०—बीसल राम प्रगासता। नाल्ह कहइ जिणि आवइ हो खोडि।—बी० रासो, पृ० ३।

प्रगीत (१)
वि० [सं०] १. गाया हुआ। जो गाया गया हो। २. गायक। गानेवाला [को०]।

प्रगीत (२)
संज्ञा पुं० १. गीत। गाना (को०)। २. आधुनिक काव्यों में लिखे गए वे गीत जो काव्य होने के साथ ही अत्याधिक गेय होते हैं।

प्रगीति
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का छंद।

प्रगुण
वि० [सं०] १. चतुर। दक्ष। होशियार। २. प्रकृष्ट गुणोंवाला। उत्तम गुणवान्। ३. सरल। अकुटिल। सीधा। अनुकूल।

प्रगुणन
संज्ञा पुं० [सं०] १. क्रमयुक्त करना। व्यवस्थित करना। २. सरल या अनुकूल करना [को०]।

प्रगुणित
वि० [सं०] १. व्यवस्थित। समीकृत। २. चिकना या सीधा किया हुआ। अनुकूल किया हुआ [को०]।

प्रगुणी
वि० [सं० प्रगुणिन्] गुणवान्।

प्रगुण्य
वि० [सं०] १. विशेष। अधिक। २. उत्कृष्ट। उत्तम [को०]।

प्रगृहीत
वि० [सं०] १. जो अच्छी तरह ग्रहण किया गया हो। २. जिसका उच्चारण बिना संधि के नियमों का ध्यान रखे किया जाय।

प्रगृह्य (१)
वि० [सं०] १. जो ग्रहण करने के योग्य हो। २. जो बिना संधि के नियमों का ध्यान रखे उच्चारण करने के योग्य हो।

प्रगृह्य (२)
संज्ञा पु० १. स्मृति। २. वाक्य।

प्रगे
क्रि० वि० [सं०] प्रातः। तड़के। सबेरे [को०]। यौ०— प्रगेनिश, प्रगेशय = सुबह होने पर भी जो सोता रहे।

प्रगेतन
वि० [सं०] प्रातःकालीन। सुबह किया जानेवाला [को०]।

प्रग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] १. ग्रहण करने या पकड़ने का भाव या ढंग। धारण। २. लड़ने का एक प्रकार। ३. सूर्य अथवा चंद्रमा के ग्रहण का आंरभ। ४. आदर। सत्कार। ५. अनुग्रह। कृपा। ६. उद्धता। ७. बाग। लगाम। ८. किरण। ९. रस्सी। डोरी। विशेषतः तराजू आदि में बँधी हुई डोरी। १०. नेता। मार्गदर्शक। ११. किसी ग्रह के साथ रहनेवाला छोटा ग्रह। उपग्रह। १२. बाँह। हाथ। १३. बँधुवा। कैदी। १४. कर्णिकार वृक्ष। कनियारी। १५. इंद्रियदमन। इंद्रियनिग्रह। १६. सोना। सुवर्ण। १७. विष्णु। १८. एक प्रकार का अमलतास। १९. नियमन (को०)। २०. घोड़े आदि पशुओं का साधना।

प्रग्रहण
संज्ञा पुं० [सं०] १. ग्रहण करने की क्रिया या भाव। धारण। २. सूर्य आदि के ग्रहण का आरंभ। ३. घोडे़ आदि पशुओं को साधना। ४. तराजू आदि की डोरी। ५. नियमन (को०)। ६. बंधन (को०)। ७. नेतृत्व करना। अगुआ बनना (को०)। ८. लगाम। बाग।

प्रग्राह
संज्ञा पुं० [सं०] १. तराजू आदि की डोरी। २. लगाम। बाग। ३. ग्रहण। धारण। लेना (को०)।

प्रग्रिह पु
संज्ञा पुं० [सं० परिग्रह] दे० 'परिग्रह'।

प्रगीव
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी मकान के चारों तरफ का वह घेरा जो लट्ठे या बाँस आदि गाड़कर बनाया जाता है। २. झरेखा। छोटी खिड़की। ३. अस्तबल। ४. वृक्ष का ऊपरी भाग। ५. आमोद प्रमोद करने का स्थान। रंगभवन। ६. रँग हुआ शिरोगृह या प्रासादशिखर (को०)।

प्रघट पु
वि० [सं० प्रकट, हिं० प्रगट] दे० 'प्रकट'।

प्रघटक
संज्ञा पुं० [सं०] सिद्धांत। नियम। विधि।

प्रघटना पु
क्रि० अ० [हिं० प्रघट + ना] दे० 'प्रगटना'।

प्रघटा
संज्ञा स्त्री० [सं०] किसी शास्त्र के संबंध में जानकारी की प्रारंभिक छोटी छोटी बातें [को०]। यौ०— प्रघटाविद् = प्रघटा का जानकार। साधारण जानकार।

प्रघट्टक (१)
संज्ञा पु० [सं०] १. सिद्धांत। नियम। विधि। २. प्रकरण। परिच्छेद।

प्रघट्टक (२)पु
वि० [सं० प्रकट, हिं० प्रगट, प्रघट] प्रगट करनेवाला। खोलनेवाला। प्रकाश करनेवाला। उ०—भट्ट प्रघट्टक कहुँ न दिखाहीं। द्वैताद्वैत कथा परिछाहीं।—(शब्द०)।

प्रघण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. बरामदा। अलिंद। २. लोहे का मुदगर। ३. ताँबे का घड़ा।

प्रघण (२)
वि० [सं० प्रघन] अत्यधिक। बहुत अधिक। उ०—मह जाय पेखे छाह निरमल प्रघण हिम पाँणी।—रघु रु०, पृ० १६१।

प्रघन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रघण'।

प्रघल पु †
वि० [सं० प्रबल, या प्र + घन] १. उद्दंड। उद्धत। प्रगल्भ। २. अत्यधिक। घना। उ०—प्रघल दल बल रीझ इक पल सकल बगसे स्याम।—रघु०, रू०, पृ० २२८।

प्रघस (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक दैत्य जो रावण की सेना का मुख्य सेनानायक था ओर जिसे हनुमान ने प्रमदावन उजाड़ने के समय मारा था। २. दैत्य। राक्षस। ३. पेटूपन। अधिक भक्षण। खब्बूपन (को०)।

प्रघस (२)
वि० भक्षक। खानेवाला।

प्रघसा
संज्ञा स्त्री० [सं०] कार्तिकेय को एक मातृका का नाम।

प्रघाण
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रघण' [को०]।

प्रघात
संज्ञा पुं० [सं०] १. आघात। मारना। २. युद्ध। संघर्ष। ३. पानी बहने का नल। ४. किसी वस्त्र का हाशिया या किनारा (को०)।

प्रघान
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रघण' [को०]।

प्रघास
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का चातुर्मास्य याग।

प्रघुण
संज्ञा पुं० [सं०] अतिथि। अभ्यागत। पाहुना [को०]।

प्रघूर्ण (१)
वि० [सं०] १. घूमता हुआ। घूमनेवाला। २. चक्कर लगाता हुआ [को०]।

प्रघूर्ण (२)
संज्ञा पुं० अतिथि [को०]।

प्रघोर
वि० [सं०] अति कठिन। बहुत अधिक कठिन।

प्रघोष
संज्ञा पुं० [सं०] १. ध्वनि। शोर। २. प्रबल शोर। जोर की आवाज [को०]।

प्रचंड (१)
वि० [सं० प्रचण्ड] [वि० स्त्री० प्रचंडा] १. बहुत अधिक तीव्र। तेज। बहुत तीखा। उग्र। प्रखर। २. बहुत अधिक वेगवान्। प्रबल। ३. भयंकर। ४. कठिन। कठोर। ५. दुस्सह। असह्य। ६. बड़ा। भारी। ७. पुष्ट। बलवान्। ८. बहुत गरम। ९. प्रतापी। यौ०—प्रचंडघोण = बड़ी नासिकावाला। प्रचंडमूर्ति = भीमकाय। प्रचंडभैरव। प्रचंडसूर्य = प्रज्वलित सूर्य से युक्त।

प्रचंड (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. शिव का एक गण। २. सफेद कनेर।

प्रचंडता
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रचण्डता] १. प्रचंड होने का भाव। तेजी। तीखापन। प्रबलता। उग्रता। २. भयंकरता।

प्रचंडत्व
संज्ञा पुं० [सं० प्रचण्डत्व] दे० 'प्रचंडता'।

प्रचंड भैरव
संज्ञा पुं० [सं० प्रचण्ड भैरव] नाटक एक का भेद। व्यायोग [को०]।

प्रचंडमूर्ति
संज्ञा पुं० [सं० प्रचण्डमूर्ति] वरना वृक्ष।

प्रचंडा
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रचण्डा] १. सफेद दूब जिसके फूल सफेद होते हैं। २. दुर्गा। चंडी। ३. दुर्गा को एक सखी।

प्रचई पु
संज्ञा स्त्री० [सं० परिचय] परिचय देनेवाली वस्तु।

प्रचक्र
संज्ञा पुं० [सं०] वह सेना जो प्रस्थित हो। चली हुई सेना। प्रस्थित चमू [को०]।

प्रचक्षा
संज्ञा पुं० [सं० प्रचक्षस्] बृहस्पति [को०]।

प्रचपल
वि० [सं०] अत्यंत चंचल, अस्थिर या आकुल [को०]।

प्रचय
संज्ञा पुं० [सं०] १. वेदपाठ विधि में एक प्रकार का स्वर जिसके उच्चारण के विधानानुसार पाठक को अपना हाथ नाक के पास ले जाने की आवश्यकता पड़ती है। २. बीजगणित में एक प्रकार का संयोग। ३. समूह। झुंड। उ०—धर्मदास सुनियो चितलाई। लोक प्रचय अब देउँ बताई।—कबीर सा०, पृ० ९९४। ४. राशि। ढेर। ५. वृद्धि। बढ़ती। ६. लकड़ी आदि की सहायता से फूल या फल एकत्र करना।

प्रचर
संज्ञा पुं० [सं०] १. मार्ग। रास्ता। २. रिवाज। रीति। परपरा (को०)।

प्रचरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. विचरण। चलना। फिरना। २. प्रचलित होना। प्रचारयुक्त होना (को०)। ३. प्रारंभ। शुरु- आत (को०)।

प्रचरणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्रुवा [को०]।

प्रचरना पु †
क्रि० अ० [सं० प्रचार] १. प्रचारित होना। चलना। फैलना। उ०—यहू देश में प्रचरो पूरो। नास्तिक वाद भयो सब दूरो।—रघुराज (शब्द०)। २. छा जाना। फेलना। पड़ना। उ०—लुथ्यि कोस पंचह प्रचर परे सुपाइल अंति।—पृ० रा०, १९। ५४४।

प्रचरित
वि० [सं०] १. प्रचलित। चलता हुआ। चालू। अभ्यस्त (को०)। २. गया हुआ (को०)।

प्रचर्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] क्रम। रीति। विधि। सरणि [को०]।

प्रचल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो बहुत अधिक चंचल हो। २. मोर। मयूर।

प्रचल (२)
वि० १. चंचल। अस्थिर। २. प्रचलित। चालू। ३. ठीक चलता हुआ। खूब चलनेवाला [को०]।

प्रचलक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का छोटा कीड़ा।—(सुश्रुत)।

प्रचलन
संज्ञा पुं० [सं०] १. चलन। २. हिलना डोलना। चलना फिरना (को०)। ३. पलायन। अपसरण। विरमण (को०)।

प्रचला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह निद्रा जो बैठे या खड़े हुए मनुष्य को आती है। २. वह पाप कर्म जिसके उदय से ऐसी निद्रा आती है। २. सरट। कृकलास (को०)।

प्रचलाक
संज्ञा पुं० [सं०] १. शराघात। वाण का प्रहार। २. मोर की वर्हि या पूँछ। ३. सर्प। साँप [को०]।

प्रचलाका
संज्ञा स्त्री० [सं०] वर्षा की तीव्र झड़ी [को०]।

प्रचलाकी
संज्ञा पुं० [सं० प्रचलाकिन्] मयूर। मोर [को०]।

प्रचलायन
संज्ञा पुं० [सं०] निद्रा के कारण सिर का झुक पड़ना [को०]।

प्रचलायित
वि० [सं०] १. लुढ़कता हुआ। २. नींद आने के कारण जिसका सिर झुक गया हो [को०]।

प्रचलित (१)
वि० [सं०] १. जारी। चलता हुआ। जिसका चलन हो। जैसे, प्रचलित प्रथा, प्रचलित सिक्का, प्रचलित नाम। २. हिलता या काँपता हुआ (को०)। ३. गतिमय। गतिशील (को०)। ४. विह्वल। आकुल। संभ्रांत (को०)।

प्रचलित (२)
संज्ञा पुं० प्रस्थान। प्रयाण [को०]।

प्रचाय
संज्ञा पुं० [सं०] १. हाथ से कोई चीज इकट्ठा करना। २. राशि। ढेर। ३. वृद्धि। अधिकता। दे० 'प्रचय'।

प्रचायक
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० प्रचायिका] १. वह जो चयन करे। २. वह जो इकट्ठा करे। संग्रह करनेवाला। ३. ढेर लगानेवाला।

प्रचायिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. फूलों का एकत्र करना। पुष्पचयन। २. फुल एकत्र करनेवाली स्त्री [को०]।

प्रचार
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी वस्तु का निरंतर व्यवहार या उपयोग। चलन। रवाज। जैसे,—(क) आजकल अँगरखे का प्रचार कम हो गया है। (ख) इस ग्रंथ का बहुत अधिक प्रचार है। २. प्रसिदि्ध। ३. प्रकाश। ४. घोड़ों की आँख का एक रोग जिसमें आँखों के आसपास का मांस बढ़कर दृष्टि रोक लेता है। यह मांस काट डाला जाता है। ५. जाना। चलना। घूमना (को०)। ६. प्रगट होना। आना (को०)। ७. व्यवहार। आचार (को०)। ८. खेलने का मैदान। अभ्यास करने का स्थान (को०)। ९. चरागाह (को०)। १०. मार्ग। पथ (को०)। ११. सार्वजनिक घोषणा या विज्ञापन। (को०)। १२. गति। संचार। क्रियात्मकता (को०)।

प्रचारक
वि० [सं०] [वि० स्त्री० प्रचारिणी] फैलानेवाला। किसी वस्तु का चलन बढ़ानेवाला। प्रचार करनेवाला।

प्रचारकार्य
संज्ञा पुं० [सं०] व्याख्यानों, उपदेशों, पुस्तिकाओं और विज्ञापनों आदि के द्वारा किसी मत या सिद्धांत के प्रचार करने का ढंग या काम। प्रौपैगंडा। जैसे,—हिंदु महासभा की ओर से हरिहर क्षेत्र के मेले में बहुत अच्छा प्रचार कार्य हुआ।

प्रचारण
संज्ञा पुं० [सं०] १. छितराना। बिखेरना [को०]।

प्रचारान पु †
क्रि० स० [सं० प्रचारण] १. प्रचार करना। फैलाना। २. ललकारना। सामना करने के लिये बुलाना। उ०—इंद्र आय तब असुर प्रचारयौ। कियो युद्ध पै असुर न मारयो।—सूर (शब्द०)। ३. सुलगाना। आग को प्रज्वलित करना। उ०—जोग अगिनि जब हिए प्रचारी। पल मँह कीन्ह भसम रिसि जारी।—चित्रा०, पृ० ५९।

प्रचारित
वि० [सं०] १. फैलाया हुआ। २. प्रचार किया हुआ। ३. जिसका प्रचार किया गया हो।

प्रचारी
वि० [सं० प्रचारिन्] १. घूमने फिरनेवाला। २. दिखाई देनेवाला। २. व्यवहार करनेवाला। चेष्टा करनेवाला [को०]।

प्रचाल
संज्ञा पुं० [सं०] वीणा का वह अंग जहाँ से तूँबा संयुक्त होता है [को०]।

प्रचलित
वि० [सं०] जिसका प्रचलन किया गया हो। जो चलाया गया हो।

प्रचित (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जिसका संग्रह किया गया हो। वह जो चुना गया हो। २. दंडक छंद का एक भेद।

प्रचित (२)
वि० १. चनय किया हुआ। एकत्र किया हुआ। संगृहीत। संग्रह किया हुआ। २. भरा हुआ। परिपूर्ण। ३. अनुदात्त [को०]।

प्रचुर (१)
वि० [सं०] १. बहुत। अधिक। विपुल। जैसे, प्रचुर धन। २. पूर्ण। भरापुरा। जैसे, प्रचुरपुरुष (=जनाकीर्ण)। ३. बड़ा। विशाल (को०)।

प्रचुर (२)
संज्ञा पुं० [सं० प्र० + चुर् (=चोरी)] वह जो चोरी करे। चोर। यौ०—प्रचुरपुरुष = चोर। तस्कर।

प्रचुरता
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रचुर होने का भाव। ज्यादती। अधिकता।

प्रचुरत्व
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रचुरता' [को०]।

प्रचूर पु
वि० [सं० प्रचुर] दे० 'प्रचुर'। उ०—एक तूँ एक तूँ पवन प्रचूरा। एक तूँ एक तूँ फिरत बघूरा।—सुंदर ग्रं०, पृ० ८६८।

प्रचेंन पु
वि० [सं० प्रचण्ड] दे० 'प्रचंड' उ०—सुन श्रवन समझ न बेंन, आवृत्त घाय प्रचेंन।—पृ० रा०, १३ ७४।

प्रचेतसी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कायफल। २. प्रचेता की कन्या।

प्रचेता (१)
संज्ञा पुं० [सं० प्रचेतस्] १. एक प्राचीन स्मृतिकार ऋषि का नाम। २. वरुण का एक नाम। ३. बारहवें प्रजापति का नाम। ४. पुराणानुसार पृथु के परपोते ओर प्राचीनवर्हि के दस पुत्र जिन्होंने दस हजार वर्ष तक समुद्र के भीतर रहकर कठिन तपस्या की और विष्णु से प्रजासृष्टि का वर पाया था। दक्ष उन्हीं के पुत्र थे।

प्रचेता (२)
वि० १. चुनने या चनय करनेवाला। २. बुद्धिमान्। होशियार। चतुर।

प्रचेता (३)
संज्ञा पुं० [सं० प्रचेतृ] सारथि। रथचालक [को०]।

प्रचेय
वि० [सं०] १. जो चयन करने योग्य हो। जो चुनने या संग्रह करने योग्य हो। २. जो ग्रहण करने योग्य हो। ग्राह्य। ३. बुद्धि करने योग्य (को०)।

प्रचेल
संज्ञा पुं० [सं०] पीला चदन।

प्रचेलक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] घोड़ा।

प्रचेलक (२)
वि० बहुत अधिक चलनेवाला।

प्रचोद
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रचोदन'।

प्रचोदक
वि० [सं०] प्रेरणा करनेवाला। उत्तेजित करनेवाला।

प्रचोदन
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रेरणा। उत्तेजना। २. आज्ञा। ३. आज्ञा देना। आदेश देना (को०)। ४. कायदा। कानून। नियम। ५. प्रेषण (को०)।

प्रचोदनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] कंटकारी। भटकटैया [को०]।

प्रचोदित
वि० [सं०] १. जिसे प्रेरणा की गई हो। प्रेरित। जो उत्तेजित किया गया हो। प्रोत्साहित। २. आदिष्ट। आज्ञप्त। निर्देशित (को०)। ३. जिसकी घोषणा की गई हो। घोषित (को०)। ४. प्रेषित (को०)।

प्रचोदिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] कंटकारी। कटेहरी। कटेरी। भटकटैया।

प्रचोदी
वि० [सं० प्रचोदिन्] प्रोत्साहित करनेवाला। प्रोरित करने वाला [को०]।

प्रचौ पु †
संज्ञा पुं० [सं० परिचय] दे० 'परिचय'। उ०—जैमलहरा जाँणता जिसड़ौ, साच प्रचौ पूरियौ सही।—बाँकी० ग्रं०, भा० ३, पृ० १४५।

प्रच्छक
वि० [सं०] पूछनेवाला। प्रश्न करनेवाला।

प्रच्छद
संज्ञा पुं० [सं०] १. कंबल। २. बेठन। लपेटने या आच्छा- दित करने का कपड़ा। ३. चोगा। यौ०—प्रच्छदपट = आच्दादन करने या ढकने का वस्त्र। जैसे, औहार, चादर, आदि।

प्रच्छन
संज्ञा पुं० [सं०] प्रश्न करना। पूछना। जिज्ञासा करना। जानकारी लेना [को०]।

प्रच्छना
संज्ञा स्त्री० [सं०] पूछना। प्रश्न करना।

प्रच्छन्न (१)
वि० [सं०] १. ढका हुआ। लपेटा हुआ। २. छिपा हुआ। गुप्त। गोपनीय। यौ०—प्रच्छन्नतस्कर = गुप्त चोर। प्रच्छनचारी = छिपे तौर से काम करनेवाला। गुप्तचर।

प्रच्छन्न (२)
संज्ञा पुं० [सं०] गुप्त द्वार। छिपा द्वार। चोर दरवाजा। २. झरोखा। खिड़की। गवाक्ष। [को०]।

प्रच्छन्नता
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रच्छन्न होने का भाव। गोपनीयता। छिपाव। उ०—इस प्रच्छन्नता का उदाहरण कविकर्म का एक मुख्य अँग है।—आचार्य०, पृ० १४६।

प्रच्छर्द्दक
वि० [सं०] वमन करानेवाला। जिससे वमन हो। उलटी लानेवाला। वमनकारक [को०]।

प्रच्छर्द्दन
संज्ञा पुं० [सं०] १. साँस की वायु को नाक के रास्ते बाहर निकालना। रेचन। २. वमन। कै। ३. औषधादि जिससे वमन हो। वमन करानेवाली वस्तु (को०)।

प्रच्छर्द्दिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह वस्तु जिससे वमन हो। वमन करानेवाली औषध। २. वमन का रोग। कै।

प्रच्छादक (१)
वि० [सं०] छिपाने, आच्छादित या आवृत्त करनेवाला। ढकनेवाला।

प्रच्छादक (२)
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रच्छेदक' [को०]।

प्रच्छादन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० प्रच्छादित] १. ढाँकने का भाव। ढाँकना।२. छिपाने का भाव। निगूहन। ३. आँख की पलक। ४. उत्तरीय वस्त्र। यौ०—प्रच्छादन पट = दे० 'प्रच्छद पट'।

प्रच्छादित
वि० [सं०] १. ढँका हुआ। आवृत्त। २. छिपा हुआ। गुप्त। गोपित [को०]।

प्रच्छान
संज्ञा पुं० [सं०] १. सुश्रुत के अनुसार घाव चीरने का एक प्रकार। २. घाव चीरना। फस्द लगाना (को०)।

प्रच्छाय
संज्ञा पुं० [सं०] १. घनी छाया। २. घनी छायावाला स्थान [को०]।

प्रच्छालन पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रक्षालन] दे० 'प्रक्षालन'।

प्रच्छालना पु
क्रि० स० [प्रक्षालन] दे० 'पखारना'।

प्रच्छिल
वि० [सं०] शुष्क। सूखा। जलरहित [को०]।

प्रच्छेदक
संज्ञा पुं० [सं०] लास्य के दस अंगों में से एक। प्रियतम को अन्य नायिका में आसक्त जानकर प्रेमविच्छेद के अनुताप से तप्तहृदया नायिका का वीणा के साथ गाना। (नाट्यशास्त्र)।

प्रच्छेदन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० प्रच्छेद्य] छेदने या काटने की क्रिया। छोटे छोटे टुकड़ों में काटना।

प्रच्चय
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रगति। विकास। २. हटना। पीछे हटना। ३. सरण। पतन। पात। भ्रंश [को०]।

प्रच्यवन
संज्ञा पुं० [सं०] १. क्षरण। झरना। बहना या रसना। २. हटना (को०)। ३. हानि (को०)।

प्रच्यावन
संज्ञा पुं० [सं०] वह जिससे प्रच्यवन हो या जिसके द्वारा प्रच्यवन हो [को०]।

प्रच्यावित
वि० [सं०] किसी देश या स्थान से हटाया या भगाया हुआ [को०]।

प्रच्युत
वि० [सं०] १. गिरा हुआ। अपने स्थान से हटा हुआ। २. मार्गच्युत। पथभ्रष्ट (को०)। ३. क्षरित। चूआ हुआ। झरा हुआ (को०)। ४. निर्वासित। देश से निकलता या भगाया हुआ (को०)।

प्रच्युति
संज्ञा स्त्री० [सं०] अपने स्थान से गिरने या हटने का भाव। २. हानि। नुकसान (को०)।

प्रछन पु
क्रि० वि० [सं० प्रच्छन्नम्] छिपे तौर पर। प्रच्छन्न रूप से। गुप्त रूप से। उ०—ताम हंस आयौ समषि कह्यौ अहो शिशिवृत्त। चाहुआन आयौ प्रछन मिलन थान हर सित्त। पृ० रा०, २५। २९३।

प्रछारना पु
क्रि० स० [सं० प्रक्षालन, हिं० प्रच्छालना, प्रछालना] धोना। प्रक्षालन करना। उ०—कनक नार कर त मुख धोवौं, तकि के चरन प्रछारा।—जग० श०, भा० १, पृ० ११।

प्रछालना पु
क्रि० स० [सं० प्रक्षालन] प्रक्षालन करना। धोना। उ०—पुनि उठे तबहि ततकाला। जल में मुख हाथ प्रछाला।—सुंदर० ग्रं०, भा० १, पृ० १३३।

प्रछेद पु †
संज्ञा पुं० [सं० प्रस्वेद] पसीना। प्रस्वेद।

प्रजंक पु
संज्ञा पुं० [सं० पर्यङ्क] पलंग। पर्यंक। उ०—(क) प्रजंक जु जोई तपप्प सु सोई।—पृ० रा०, ६२। ६७। (ख) दुज दिय हथ्थ प्रजंक सँजोइय।—पृ० रा०, ६२। ४६।

प्रजंघ
संज्ञा पुं० [सं० प्रजङ्घ] १. रावण की सेना का एक मुख्य राक्षस जिसे अंगद ने मारा था। २. एक कपि का नाम (को०)।

प्रजंघा
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रजङ्घा] उरु या जाँघ का निचला भाग [को०]।

प्रजंत पु ‡
अव्य० [सं० पर्यन्त] दे० 'पर्यंत'। उ०—राधा जल बिहरति सखियनि सँग। ग्रीव प्रजंत नीर मैं ठाढ़ी, छिरकति जल अपनैं अपनैं रँग।—सूर०, १०। १७५३।

प्रज
संज्ञा पुं० [सं०] पति। खाविंद। शौहर [को०]।

प्रजटी पु
वि० [सं० प्र + जटित] जटित। एकत्रित। सज्जित। उ०—तम तम तामस तमोगुन सी तोयद सी नीलम जटान पाटी जटा प्रजटी सी है।—पजेनस०, पृ० ९।

प्रजन
संज्ञा पुं० [सं०] १. गर्भधारण करने के लिये (पशुओं का) मैथुन। जोड़ा खाना। २. पशुओं के गर्भधारण करने का समय। ३. लिंग। पुरुषेद्रिय। ४. संतान उत्पन्न करने का काम। ५. जनक। जन्म देनेवाला।

प्रजनक
वि० [सं० प्रजनन] [वि० स्त्री० प्रजनिका] उत्पन्न करेनावाला। जन्म देनेवाला। जनक। उ०—पहले जो भावात्मक निस्संग, एक ही ऋषिकंठ से निकला हुआ था, वह बाद को समुदाय के आनंद का प्रजनक हुआ।—गीतिका, (भू०), पृ० १।

प्रजनन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. संतान उत्पन्न करने का काम। २. जन्म। ३. लिंग। पुरुषेंद्रिय (को०)। ४. योनि। ५. शुक्र। वीर्य (को०)। ६. दाई का काम। धात्रीकर्म (सुश्रुत)। ७. जन्म देनेवाला। पिता। जनक। ८. पशुकर्म। जोड़ा खाना (को०)। ९. संतति (को०)।

प्रजनन (२)
वि० प्रजनन करनेवाला। पैदा करनेवाला [को०]।

प्रजनयिता
वि०, संज्ञा पुं० [सं० प्रजनयितृ] दे० 'प्रजनक'।

प्रजनिका
संज्ञा पुं० [सं०] माता।

प्रजनिष्णु
वि० [सं०] १. प्रजनन करनेवाला। उपाजाऊ। २. बढ़नेवाला। जैसे, फसल [को०]।

प्रजनुक
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह जो संतान उत्पन्न करता हो। २. शरीर। देह (को०)।

प्रजनू
संज्ञा स्त्री० [सं०] योनि। भग [को०]।

प्रजन्य पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रर्जन्य] दे० 'प्रर्जन्य-१'। उ०—नीरद, क्षीरद, अंबुवह, बारिद, जलद, प्रजन्य।—नंद० ग्रं०, पृ० ११०।

प्रजय
संज्ञा पुं० [सं०] विजय। जय। जीत [को०]।

प्रजरंत
वि० [सं० प्रज्वत्>प्रज्जलंत्] जलता हुआ। प्रज्वलित।

प्रजरना पु
क्रि० अ० [सं० (प्रत्य०) प्र + हिं० जरना, या सं०/?/प्रज्वल्] अच्छी तरह जलना। उ०—प्रजरति नीर गुलाब के पिय की बात सिराति।—बिहारी (शब्द०)।

प्रजलना पु
क्रि० अ० [सं० प्रज्वलन] दे० 'प्रजरना' ऊ०—(क) जल महि पावक प्रजल्यउ पुंज प्रकाश। कँवल प्रफुल्लित भइले अधिक सुवास।—सुंदर०, ग्रं० भा० १, पृ० ३७८। (ख) खानखाना नवाब दे, खाँड़े आग खिवंत। जलवाला नर प्राजले तृणवाला जीवंत।—अकबरी०, पृ० १४२।

प्रजल्प
संज्ञा पुं० [सं०] १ व्यर्थ की या इधर उधर की बात। गप। २. वह बात जो अपने प्रिय को प्रसन्न करने के लिये की जाय।

प्रजल्पन
संज्ञा पुं० [सं०] बातचीत। गपशप।

प्रजल्पित
वि० [सं०] जिसके विषय में बात की जा चुकी हो (बातचीत)। जो (वार्तालाप) कथित हो। [को०]।

प्रजवन
वि० [सं०] गतिशील। तेज [को०]।

प्रजवित
वि० [सं०] १. प्रेरित। चालित। २. आहत [को०]।

प्रजवी (१)
वि० [सं० प्रजविन्] गतिशील। तीव्र गतिवाला।

प्रजवी (२)
संज्ञा पुं० दूत। चर। संवादवाहक [को०]।

प्रजहित
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुराण। २. गार्हपत्य अग्नि।

प्रजांतक
संज्ञा पुं० [सं० प्रजातक] यम।

प्रजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. संतान। औलाद। २. वह जनसमूह जो किसी एक राजा के अधीन या एक राज्य के अंतर्गत रहता हो। ३. राज्य के निवासी। रिआया। रैयत। ४. प्रजनन। उत्पत्ति। उत्पादन (को०)। ५. शुक्र। वीर्य (को०)। ६. प्राणधारी। प्राण। जीव (को०)। ७. भारतीय गाँवों में छोटी जातियों के वे लोग जो बिना वेतन पाए ही काम करते हैं। विशेष—ऐसे लोगों को कभी किसी उत्सव पर अथवा ब्याह आदि में कुछ पुरस्कार दे दिया जाता है। नाऊ, बारी, भाट, नट, लोहार, कुम्हार, चमार, धोबी इत्यादि की गिनती 'प्रजा' में होती है।

प्रजाकाम
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो पुत्र का अभिलाषी हो। जिसे पुत्र की इच्छा हो। पुत्रेप्सु।

प्रजाकार
संज्ञा पुं० [सं०] प्रजा उत्पन्न करनेवाली, ब्रह्मा। प्रजापति।

प्रजागर
संज्ञा पुं० [सं०] १. विष्णु। २. प्राण। ३. जागरण। जगना। ४. नींद न आने का रोग। ५. सुरक्षा करनेवाला। रक्षक जन (को०)। ६. सावधानी। सतर्कता (को०)।

प्रजागरण
संज्ञा पुं० [सं०] जागना। जागरण [को०]।

प्रजागरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक अप्सरा का नाम।

प्रजागरूक
वि० [सं०] अच्छी तरह जागा हुआ। पुर्णतः सावधान या सचेत [को०]।

प्रजागुप्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रजारक्षण। जनता की रक्षा [को०]।

प्रजातंतु
संज्ञा पुं० [सं० प्रजातन्तु] १. संतान। औलाद। २. वश। कुल। वंशपरंपरा।

प्रजातंत्र
संज्ञा पुं० [सं० प्रजातन्त्र] वह शासनव्यवस्था जिसमें कोई राजा न होता हो, बल्कि राज्यपरिचालन के लिये प्रजा द्वारा कोई एक व्यक्ति चुन लिया जाता हो। वह शासनव्यवस्था जो जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि द्वारा परिचालित हो। विशेष—ऐसी व्यवस्था में उस चुने हुए व्यक्ति को प्रायः राजा के समान अधिकार प्राप्त होते हैं, और वह प्रजा की चुनी हुई किसी सभा या समिति आदि की सहायता से कुछ निश्चित समय तक शासन का सब प्रबंध करता है। गणतंत्र।

प्रजातंत्रवादी
वि० [हिं० प्रजानन्त्र + वादी] प्रजातांत्रिक शासन- व्यवस्था को माननेवाला। प्रजातंत्र का अनुयायी।

प्रजात
वि० [सं०] उत्पन्न [को०]।

प्रजातांत्रिक
वि० [सं० प्रजातान्त्रिक] प्रजातंत्र से संबंधित। प्रजातंत्र का।

प्रजाता
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्त्री जिसको बालक उत्पन्न हुआ हो। प्रसूतिका। जच्चा।

प्रजाति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. उत्पादन। प्रजनन। २. प्रजनन- शक्ति। ३. संतति। संतान। प्रजा [को०]।

प्रजाद
वि० [सं०] संतानदाता। संतति देनेवाला [को०]।

प्रजादा
संज्ञा स्त्री० [सं०] गर्भदा नाम की औषधि जिससे बाँझपन दूर होता है।

प्रजादान
संज्ञा पुं० [सं०] चाँदी। रजत।

प्रजाद्वार
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य का एक नाम। २. प्रजा या संतान उत्पन्न करने का साधन या उपाय।

प्रजाधर
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु [को०]।

प्रजाध्यक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रजापति। २. सूर्य।

प्रजानंती
संज्ञा स्त्री० [सं०] पंडिता। विदुषी [को०]।

प्रजानाथ
संज्ञा पुं० [सं०] १. ब्रह्मा। २. मनु। ३. दक्ष। ४. राजा।

प्रजानिषेक
संज्ञा पुं० [सं०] गर्भाधान [को०]।

प्रजाप
संज्ञा पुं० [सं०] राजा [को०]।

प्रजापति (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सृष्टि को उत्पन्न करनेवाला। वह जिसने सृष्टि उत्पन्न की है। सृष्टिकर्ता। विशेष—वेदों और उपनिषदों से लेकर पुराणों तक में प्रजापति के संबंध में अनेक प्रकार की कथाएँ प्रचलित हैं। वैदिक काल में प्रजापति एक वैदिक देवता थे और वे ब्रह्मा के पुत्र तथा सृष्टिकर्ता माने जाते थे। तैत्तिरीय ब्राह्मण में लिखा है कि ब्रह्मा के पुत्र प्रजापति सृष्टि को उत्पन्न करने के उपरांत माया के वश में होकर भिन्न भिन्न शरीरों में बँध गए थे और देवताओं ने एक अश्वमेध यज्ञ करके उन्हें शरीरों से मुक्त किया था। ऐतरेय ब्राह्मण में लिखा है कि प्रजापति ने अपनी उषा नाम की कन्या के साथ संभोग किया था जिससे मृग नक्षत्र की उत्पत्ति हुई थी और वे स्वयं तथा उषा दोनों मिलकर रोहणी नामक नक्षत्र के रूप में परिवतर्ति हो गए थे। छांदोग्य उपनिषद् में लिखा है की इंद्र ने प्रजापति से सुक्ष्म आत्मज्ञान तथा वैरोचन नेस्थूल आत्मज्ञान प्राप्त किया था। पुरुषमेध यज्ञ में प्रजापति के आगे पुरुष की बलि दी जाती है। पुराणों में ब्रह्मा के पुत्र अनेक प्रजापतियों का उल्लेख है। कहीं ये दस प्रजापति कहे गए हैं—(१) मरीचि। (२) अत्रि। (३) अंगिरा। (४) पुलस्त्य। (५) पुलह। (६) क्रतु। (७) प्रचेता। (८) वशिष्ठ। (९) भृगु। (१०) नारद। और कहीं इन इक्कीस प्रजापतियों का उल्लेख है। (१) ब्रह्मा। (२) सूर्य। (३) मनु। (४) दक्ष। (५) भृगु। (६) धर्मराज। (७) यमराज। (८) मरीचि। (९) अंगिरा। (१०) अत्रि। (११) पुलस्त्य। (१२) पुलह। (१३) क्रतु। (१४) वशिष्ठ। (१५) परमेष्ठी। (१६) विवस्वान्। (१७) सोम। (१८) कर्दम। (१९) क्रोध। (२०) अर्वाक और (२१) क्रीत। २. ब्रह्मा। ३. मनु। ४. राजा। ५. सूर्य। ६. अग्नि। आग। ७. विश्वकर्मा। ८. पिता। बाप। ९. घर का मालिक या बड़ा। वह जो परिवार का पालन पोषण करता हो। १०. एक तारा। ११. जामाता। दामाद। १२. एक प्रकार का यज्ञ। १३. साठ संवत्सरों में से पाँचवाँ संवत्सर। १४. विष्णु का एक नाम (को०)। १५. आठ प्रकार के विवाहों में से एक प्रकार का विवाह। विशेष—दे० 'प्राजापत्य'। १६. लिंगेंद्रिय।

प्रजापति (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] गौतम बुद्ध को पालनेनवाली गौतमी का नाम।

प्रजापाल, प्रजापालक
संज्ञा पुं० [सं०] प्रजा का पालन करनेवाला—राजा।

प्रजापालन
संज्ञा पुं० [सं०] प्रजा का पालन करना [को०]।

प्रजापालि
संज्ञा पुं० [सं०] शिव [को०]।

प्रजापाल्य
संज्ञा पुं० [सं०] राजपद। राजा का पद [को०]।

प्रजायी
वि० [सं० प्रजायिन्] [वि० स्त्री० प्रजायिनी] उत्पन्न करनेवाला। पैदा करनेवाला [को०]।

प्रजायिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] माता।

प्रजारना पु †
क्रि० स० [सं० (प्रत्य०) प्र + हिं० जारना] अच्छी तरह जलाना। उ०—(क) बाजहि ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी।—तुलसी (शब्द०)। (ख) प्रब्बत प्रजारि सो करत छार।—पृ० रा०, ६। ७४। २. उद्दीप्त करना। जलाना। उ०—विकसत नव बल्ली कुसुम निकसत परिमल पाय। परसि प्रजारति बिरह हिय बरसि रहे की वाय।—बिहारी (शब्द०)।

प्रजावती
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. भाई की स्त्री। २. बड़े भाई की स्त्री। ३. प्रियव्रत राजा की स्त्री का नाम। ४. बहुत से लड़कों की माता। वह स्त्री जिसे कई संतानें हों। ५. गर्भवती स्त्री।

प्रजावृद्धि
संज्ञा स्त्री० [सं०] संतानों की बढ़ती। संतातिवृद्धि [को०]।

प्रजाव्यापार
संज्ञा पुं० [सं०] प्रजा का हितचिंतन या देख रेख [को०]।

प्रजासत्ता
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह शासन व्यवस्था जिसमें किसी देश के निवासियों या प्रजा के चुने हुए प्रतिनिधि ही शासन और न्याय आदि का सारा प्रबंध करते हैं। प्रजा द्वारा संचालित राज्यप्रबंध। प्रजातंत्र।

प्रजासत्ताक
वि० [सं० प्रजा + सत्ता + क (प्रत्य०)] दे० 'प्रजातांत्रिक'।

प्रजासत्तात्मक
वि० [सं० प्रजा + सत्ता + आत्मक] प्रजातांत्रिक। प्रजासत्ताक।

प्रजासृक्
संज्ञा पुं० [सं० प्रजासृज्] पितामह। ब्रह्मा [को०]।

प्रजाहित
संज्ञा पुं० [सं०] जल। पानी।

प्रजाहृदय
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का साम [को०]।

प्रजित्
संज्ञा पुं० [सं०] विजेता। विजय करनेवाला।

प्रजिन
संज्ञा पुं० [सं०] हवा। वायु। [को०]।

प्रजीवन
संज्ञा पुं० [सं०] जीविका। रोजी।

प्रजुण पु †
वि० [सं० प्रज्वलित] दे० 'प्रज्वलित'। उ०—प्रजुण बन्ही करे प्राजा।—रघु० रू०, पृ० २०७।

प्रजुरना पु
क्रि० अ० [सं० प्रज्वलन] दे० 'प्रजरना'। उ०—प्रजुरे पतिसाहि सु कोप किय। मनु ज्वाल बिसाल सुघृत्त दियं।— ह० रासो, पृ० ४६।

प्रजुलित पु
वि० [सं० प्रज्वलित] दे० 'प्रज्वलित'। उ०—परति आय चहुँ ओर तें प्रजुलित बेदिन माँह।—शकुतला, पृ० ६०।

प्रजेप्सु
वि० [सं०] संतान की कामनावाला। संतान का इच्छुक। पुत्रेप्सु [को०]।

प्रजेश, प्रजेश्वर
संज्ञा पुं० [सं०] १. राजा। २. प्रजापति।

प्रजेस पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रजेश] दे० 'प्रजेश'। उ०—लगे कहन हरि- कथा रसाला। दक्ष प्रजेस भए तेहि काला।—मानस, ३। ६०। यौ०—प्रजेसकुमारी = दक्षकन्या। सती। उ०—एहि विधि दुखित प्रजेसकुमारी।—मानस, १। ६०।

प्रजोग
संज्ञा पुं० [सं० प्रयोग] दे० 'प्रयोग'।

प्रज्जरना पु
क्रि० अ० [हिं० प्रजरना] जल उठना। भभक उठना। प्रज्वलित होना। उ०—(क) प्रज्जरिग रोस मैंवात इंद।—पृ० रा०, ८। ४। (ख) प्रज्जरिग सोम सुनि श्रवन दूत।—पृ० रा०, ८। ११।

प्रज्जाल पु
वि० [सं० प्रज्वलित] जलता हुआ। प्रज्वलित। धध- कता हुआ। उ०—प्रज्जाल माल हिंचाल हलि कलि कलाप कलि उल्लहिय।—पृ० रा०, ३२। १५४।

प्रज्झटिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक छंद जिसके प्रत्येक चरण में ३६ मात्राएँ होती हैं। इसे पद्धरी, पद्धटिका, प्रज्वलय और प्रज्व- लिया भी कहते हैं।

प्रज्ञ (१)
वि० [सं०] १. जिसकी बुद्धि या ज्ञान प्रकृष्ट हो। मतिमान। २. जानकर। ज्ञाता।

प्रज्ञ (२)
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० प्रज्ञा] विद्वान व्यक्ति। जानकार आदमी।

प्रज्ञता
संज्ञा स्त्री० [सं०] पांडित्य। विद्वत्ता।

प्रज्ञप्त
वि० [सं०] १. ज्ञात। संसूचित। २. निश्चित। निर्धारित। जैसे, बैठने का स्थान (को०)।

प्रज्ञप्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जताने का भाव। ज्ञात कराने की क्रिया या भाव। २. सूचना। ३. संकेत। इशारा। ४. ज्ञान। प्रकृष्ट बुद्धि। ५. दे० 'प्रज्ञप्ती'। ६. प्रतिज्ञा। करारा। कौल (को०)।

प्रज्ञप्ती
संज्ञा स्त्री० [सं०] जैनों की एक विद्यादेवी।

प्रज्ञा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बुद्धि। ज्ञान। ज्ञप्ति। मति। २. एका- ग्रता। ३. सरस्वती। ४. विदुषी। पंडिता (को०)। ५. वासना या संस्कार (को०)।

प्रज्ञाकाय
संज्ञा पुं० [सं०] बौद्धों के आचार्य मंजुघोष का एक नाम।

प्रज्ञाकूट
संज्ञा पुं० [सं०] एक बोधिसत्व का नाम।

प्रज्ञाचक्षु (१)
संज्ञा पुं० [सं० प्रज्ञा + चक्षुस्] १. धृतराष्ट्र। २. बुद्धि- रूपी नेत्र। ज्ञानरूपी नेत्र। ज्ञाननेत्र।

प्रज्ञाचक्षु (२)
वि० १. बुद्धिमान। २. ज्ञानी। ३. सूर। अंधा। क्योंकि उनकी बुद्धी ही आँख का काम करती है (व्यंग्य में भी)।

प्रज्ञात
वि० [सं०] ३. ज्ञात। समझा हुआ। २. विवेचित। ३. स्पष्ट। साफ। ४. प्रसिद्ध। विख्यात [को०]।

प्रज्ञान (१)
संज्ञा पुं० (सं०) १. बुद्धि। ज्ञान। २. चिह्न। निशान। ३. चैतन्य। ४. विद्वान् पुरुष।

प्रज्ञान (२)
वि० विवेकी। ज्ञानवान् [को०]।

प्रज्ञापन
संज्ञा पुं० [सं०] विशेष रूप से कहना या जताना। बतलाना [को०]।

प्रज्ञापन पत्र
संज्ञा पुं० [सं०] शुक्रनीति के अनुसार वह पत्र जो प्राचीन काल में राजा की ओर से याज्ञिकों या ऋत्विजों को बुलाने के लिये भेजा जाता था।

प्रज्ञापारमिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] बौद्ध ग्रंथों के अनुसार दस पार- मिताओं (गुणों की पराकाष्ठा) में से एक जिसे गौतम बुद्ध ने अफने मर्कट जन्म में प्राप्त किया था। उ०—तप की तारुणयमयी प्रतिमा, प्रज्ञापारमिता की गरिमा।—लहर, पृ० ३४।

प्रज्ञामय
संज्ञा पुं० [सं०] विद्वान्। पंडित।

प्रज्ञाल
वि० [सं०] प्रजातला। विद्वान [को०]।

प्रज्ञावाद
संज्ञा पुं० [सं०] विद्वत्तापूर्ण कथन। ज्ञानोक्ति [को०]।

प्रज्ञावान
वि० [सं० प्रज्ञावत्, प्रज्ञावान्] बुद्धिमान। ज्ञानी [को०]।

प्रज्ञावृद्ध
वि० [सं०] बुद्धि में बढ़ाचढ़ा। ज्ञानवृद्ध [को०]।

प्रज्ञासहाय
वि० [सं०] बुदि्धमान। ज्ञानवान्। विद्वान् [को०]।

प्रज्ञाहीन
वि० [सं०] अज्ञानी। मूर्ख [को०]।

प्रज्ञिल
वि० [सं०] बुदि्धमान्। प्रज्ञी [को०]।

प्रज्ञी
वि० [सं० प्रज्ञिन्] [वि० स्त्री० प्रज्ञिनी] प्रज्ञावाला। बुदि्धमान्। ज्ञानी [को०]।

प्रज्वलन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० प्रज्वलनीय, प्रज्वलित] जलने की क्रिया। जलना।

प्रज्वलित
वि० [सं०] १. जलता हुआ। धधकता हुआ। दहकता हुआ। २. द्योतित। दीप्त। चमकीला (को०)। ३. बहुत स्पष्ट। बहुत साफ।

प्रज्वलिया
संज्ञा पुं० [?] एक छंद जिसके प्रत्येक चरण में १६ मात्राएँ होती हैं।

प्रज्वार
संज्ञा पुं० [सं०] १. बुखार की गर्मी। २. एक गंधर्व का नाम।

प्रज्वालन
क्रि० स० [सं०] जलाना। दहकाना।

प्रडीन
संज्ञा पुं० [सं०] १. चारों ओर उड़ना। उड्डयन का एक प्रकार। २. उड़ना। उड़ान [को०]।

प्रण (१)
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिज्ञा, प्रा० पइणणा, या सं० पण (= मोल, बाजी)] किसी काम को करने के लिये किया हुआ अटल निश्चय। प्रतिज्ञा। मुहा०—प्रण पारना = प्रण पूरा करना। प्रतिज्ञा निभाना।

प्रण (२)
वि० [सं०] पुराना। प्राचीन।

प्रणख
संज्ञा पुं० [सं०] नाखून के आगे का भाग।

प्रणत (१)
वि० [सं०] १. बहुत झुका हुआ। २. प्रणाम करता हुआ। ३. नम्र। दीन। ४. वक्र। टेढ़ामेढ़ा (को०)। ५. दक्ष। कुशल (को०)। यौ०—प्रणतकाय = झुके हुए शरीर का। जिसका शरीर नम्र या वक्र हो।

प्रणत (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रणाम करनेवाला व्यक्ति। २. दास। सेवक। ३. भक्त। उपासक। यौ०—प्रणतपाल।

प्रणतपाल
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० प्रणतपालिका] दीनों, दासों या भक्त जनों का पालन करेनावाला। दीनरक्षक।

प्रणतपालक
संज्ञा पुं० [सं०] प्रणतपाल।

प्रणति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रणाम। प्रणिपात। दंडवत। २. नम्रता। ३. विनती। अनुनय।

प्रणदन
संज्ञा पुं० [सं०] जोर की आवाज। गर्जन [को०]।

प्रणदित
वि० [सं०] १. गर्जित। शब्दित। २. गुंजित [को०]।

प्रणधि
संज्ञा पुं० [सं० प्रणिधि] दूत। उ०—प्रणधि, दूत, जासूस ए छबि पावत हलकार।—नंद० ग्रं०, पृ० १०८।

प्रणति पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रणति, या प्रणिपात] दे० 'प्रणिपात'। उ०—सुंदर सतगुरु बंदिए नमस्कार प्रणिपत्ति।—सुंदर० ग्रं०, भा० २, पृ० ६६६।

प्रणमन
संज्ञा पुं० [सं०] १. झुकना। २. प्रणाम करना। दंडवत या नमस्कार करना।

प्रणमना पु
क्रि० स० [सं० प्रणमन] प्रणाम करना। उ०— (क) प्रणमूँ हणुमंत अँजनीपूत।—बी० रासो, पृ० १०१। (ख) सदगुरु प्रणम किशोर सचिव अमेरश सवाई।—रघु० रू०, पृ० ४।

प्रणम्य
वि० [सं०] प्रणाम करने के योग्य। वंदनीय।

प्रणय
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रीतियुक्त प्रार्थना। २. प्रेम। उ०— द्रवित दोनों ही हुए पाकर प्रणय का ताप। —शकु०, पृ० ९। ३. विश्वास। भरोसा। ४. निर्वाण। मोक्ष। श्रद्धा। ६. प्रसव। स्त्री का संतान उत्पन्न करना। ७. इच्छा आकांक्षा (को०)। ८. अनुग्रह। उदारता। दया। कृपा (को०)। ९. नेता। नायक (को०)। १०. निर्देशन। पथप्रदेश (को०)। यौ०—प्रणयकलह। प्रणयकुपित। प्रणयकोप। प्रणाय/?/। प्रमोर्द्र। प्रणयप्रकर्ष = प्रेमाधिक्य। प्रेम का अंतरिक्त। प्रण्यभंग। प्रणयमान = प्रेमजन्य मान या ईर्ष्यादि। प्रणयवचन। प्रणयविघात, प्रणयाविहति = मैत्री टूटना। प्रेम में व्याघात होना।

प्रणयकलह
संज्ञा पुं० [सं०] नायक और नायिका का वह कलह जो प्रेमोदभूत् हो। झगड़ा [को०]।

प्रणयकुपित
वि० [सं०] प्रेमसंबंधी कलह से क्रुद्ध या रुष्ट [को०]।

प्रणयकोप
संज्ञा पुं० [सं०] प्रणयकलह। प्रणयजन्य रूठना। मान [को०]।

प्रणयन
संज्ञा पुं० [सं०] १. रचना। बनाना। करना। २. लिखना। लेखन। निबद्ध करना (को०)। ३. लाना। ले आना (को०)। ४. ले जाना (को०)। ५. वितरण। बाँटना। (को०)। ६. (दंड आदि) देना। लगाना। ७. निर्माण। रचना (को०)। ८. होम आदि के समय अग्नि का एक संस्कार।

प्रणयनीय
वि० [सं०] प्रणयन के योग्य [को०]।

प्रणयभग
संज्ञा पुं० [सं० प्रणयभङ्ग] १. प्रेमसंबंध समाप्त होना प्रीतिभंग। २. अविश्वसनीयता [को०]।

प्रणयविमुख
वि० [सं०] प्रेम से विमुख होना। प्रेमसंबंध न रखना [को०]।

प्रणयाकुल
वि० [सं० प्रणय+ आकुल] प्रेमविह्वल। कामातुर। उ०—श्याम चिरौया का जोड़ा प्रणयाकुल हो रहा था।— भस्मावृत०, पृ० ११।

प्रणयार्थी
वि० [सं० प्रणयार्थिन्] [वि० स्त्री० प्रणयार्थिनी] प्रणय की कामना करनेवाला। प्रेमाभिलाषी। उ०—प्रणयार्थियों की कमी न होने से, उसे उनकी परवाह न थी।—पिंजरे०, पृ० २३।

प्रणयिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] अनुरक्ति। प्रीति। आसक्ति [को०]।

प्रणयिनो
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह जिसके साथ प्रेम किया जाय। प्रेमिका। २. स्त्री। पत्नी।

प्रणयी (१)
[सं० प्रणयिन्] [स्त्री० प्रणयिनी] १. जिसके साथ प्रेम हो। प्रेम करनेवाला। प्रेमी। २. स्वामी। पति। ३. उपा- सक। सेवा करनेवाला। पूजक [को०]।

प्रणयी (२)
वि० [सं०] १. प्रणययुक्त। प्रेमयुक्त प्रेमी। २. घनिष्ठ। जिगरी [को०]।

प्रणव
संज्ञा पुं० [सं०] १. ओंकार। ब्रह्मबीज। ओंकार मंत्र। २. त्रिदेव (ब्रह्मां, विष्णु, महेश)। ३. परमेश्वर। ४. एक प्रकार का मृदंग, पटह या ढोल (को०)।

प्रणवक
संज्ञा पुं० [सं०] प्रणव। ॐकार [को०]।

प्रणवना
क्रि० स० [सं० प्रणमन] प्रणाम करना। नमस्कार करना। श्रद्धा और नम्रतापूर्वक किसी के सामने झूकना। उ०— (क) पुनि प्रणवौं पृथुराज समाना। पर अघ सुनै सहस दस काना।—तुलसी (शब्द०)। (ख) प्रणवौं पवनकुमार खलवनपावक ज्ञानघन।—तुलसी (शब्द०)।

प्रणष्ट
वि० [सं०] दे० 'प्रणाश', 'प्रनष्ट'।

प्रणस
वि० [सं०] जिसकी नासिका बड़ी हो। दीर्धघोण [को०]।

प्रणाडिका, प्रणाडी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'प्रणाली' [को०]।

प्रणाद
संज्ञा पुं० [सं०] १. बहुत जोर से होनेवाला शब्द। २. वह शब्द जो आनंद के साथ मुँह से निकले। आनंदध्वनि। ३. कर्णनाद नाम का रोग जिसमें कानों में तरह तरह की गूँज सुनाई देती है। ४. आर्त पुकार। गुहार (को०)। ५. शोरगुल। चिल्लाहट। हल्ला (को०)। ६. हर्षनाद का स्वर। जयध्वनि (को०)। ७. घोड़े की हिनहिनाहट। हेषा। ह्रेषा (को०)।

प्रणाम
संज्ञा पुं० [सं०] १. झुकना। नत होना। २. श्रद्धा की अभिव्यक्ति करना। हाथ जोड़ना। विनीत होना। ३. लेटकर दंडवत करना [को०]।

प्रणामांजलि
संज्ञा स्त्री० [सं०] दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करना। [को०]।

प्रणामी
संज्ञा पुं० [सं० प्रणामिन्] १. प्रणाम करनेवाला। नमन करनेवाला। झुकनेवाला। २. प्रमाण के साथ दी जानेवाली भेंट।

प्रणायक
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो मार्ग दिखलाता हो। नेता। २. सेनानायक।

प्रणाय्य
वि० [सं०] १. प्रीतिपात्र। प्रिय। २. विश्वस्त। ठीक। दुरुस्त। ३. अवांछित। असंमत। अयोग्य। ४. विरक्त। निस्पृह। ५. साधु [को०]।

प्रणाल
संज्ञा पुं० [सं०] जल निकलने का मार्ग। पनाला।

प्रणालिका
संज्ञा पुं० [सं०] १. पानी निकलने का मार्ग। परनाली। नाली। २. बंदूक की नली।

प्रणाली
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पानी निकलने का मार्ग। नाली। उ०—पर, ओ मानस के जल, मत बह नयन प्रणाली से तू छल छल।—अपलक, पृ० ७। २. रीति। चाल। परिपाटी। प्रथा। ३. पद्धति। ढंग। तरीका। कायदा। ४. द्वारा। ५. परंपरा। ६. वह छोटा जलमार्ग जो जल के दो बड़े भागों को मिलाता हो।

प्रणाश
संज्ञा पुं० [सं०] १. नाश। बरबादी। २. मृत्यु। मौत। ३. भागना। लुप्त होना।

प्रणाशन
संज्ञा पुं० [सं०] १. नाश करने की क्रिया या भाव। २. विनाश। बरबादी।

प्रणाशी
संज्ञा पुं० [सं० प्रणाशिन्] [स्त्री० प्रणाशिनी] नाश करेनावाला। वह जो नष्ट करे।

प्रणिंसित
वि० [सं०] चुंबित [को०]।

प्रणिघान
संज्ञा पुं० [सं०] १. रखा जाना। २. प्रयत्न। ३. समाधि (योग)। ४. अत्यंत भक्ति। अति अधिक उपा- सना। ५. ध्यान। चित्त की एकाग्रता। ६. किसी कर्म के फल का त्याग। ७. अर्पण। ८. भक्ति। उ०—दुस्वर क्या है उसे विश्व में प्राप्त जिसे प्रभु का प्रणिघान।—साकेत, पृ० ३८८। ९. भावी जन्म के संबंध में किसी प्रकार की प्रार्थना। १०. प्रवेश। गति। ११. उपयोग। प्रयोग। व्यवहार।

प्रणिधायी
वि० [सं० प्रणिधायिन्] प्रणिधान करनेवाला। दूत का प्रेषण या नियोजन करनेवाला [को०]।

प्रणिधि
संज्ञा पुं० [सं०] १. भेदिया। गुप्तचर। गोइंदा। २. प्रार्थना। ३. माँगना। ४. भेद लेना। ५. रहस्य जानना (को०)। ५. पीछे पीछे चलनेवाला। अनुगत। अनुचर (को०)। ६. अवधान। ध्यान। सावधानी (को०)। ७. हाथी की हाँकने की एक विधि (को०)। ८. चर या जासूस भेजना [को०]।

प्रणिधेय
संज्ञा पुं० [सं०] १. गुप्तचर भेजना। २. उपयोग प्रयोग। नियोजन [को०]।

प्रणिनाद
संज्ञा पुं० [सं०] गंभीर ध्वनि। घोर निनाद [को०]।

प्रणिपतन
संज्ञा पुं० [सं०] २. प्रणाम। २. पैर पड़ना।

प्रणिपात
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रणाम। २. पैरों पर गिरना।

प्रणिहित
वि० [सं०] १. जिसकी स्थापना की गई हो। स्थापित। २. मिला हुआ। मिश्रित। ३. पाया हुआ। प्राप्त। ४. रखा हुआ। सौंपा हुआ। ५. गुप्त रूप से ज्ञात (को०)। ६. सतर्क। सचेष्ट (को०)। ७. समाधिस्थित। समाधिस्थ (को०)। ८. कृत- निश्चय। कृतसंकल्प (को०)।

प्रणी
संज्ञा पुं० [सं०] ईश्वर।

प्रणीत (१)
वि० [सं०] १. रचित। बनाया हुआ। तैयार किया हुआ। निर्मित। उ०—कोट कलशों पर प्रणीत विहंग है; ठीक जैसे रूप वैसे रंग हैं।—साकेत, पृ० ५। २. संस्कृत। सुधारा हुआ। संशोधित। ३. भेजा हुआ। ४. लाया हुआ। ५. फेंका हुआ। ६. पास पहुँचाया हुआ। ७. जिसका मंत्र से संस्कार किया गया हो। ८. विहित (को०)। ९. (बंद आदि) लगाया हुआ। आरोपित (को०)।

प्रणीत (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जल जिसका मंत्र से संस्कार किया गया हो। २. यज्ञ के मंत्र से संस्कृत की हुई अग्नि। ३. अच्छी तरह पकाया हुआ भोजन।

प्रणीता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह जल जो यज्ञ के कार्य के लिये वेदमंत्रों को पढ़ते हुए कुएँ से निकाला जाता है और मंत्रों के उच्चारण सहित छानकर रखा जाता है। २. वह पात्र जिसमें उपर्युक्त जल रखा जाता है।

प्रणीय
संज्ञा पुं० [सं०] वह वैदिक मंत्र जिससे किसी चीज का संस्कार किया जाय।

प्रणुत
वि० [सं०] स्तुत। प्रशंसित [को०]।

प्रणुत्त (२)
वि० [सं०] १. भगाया या हटाया हुआ। २. निकाला हुआ। निष्कासित [को०]।

प्रणुन्न
वि० [सं०] १. फेंका हुआ। प्रेरित। २. प्रेषित। भेजा हुआ। ३. वाँपता या हिलता हुआ। ४. जो गति में लाया गया हो। ५. भगाया या हटाया हुआ [को०]।

प्रणेजन
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्नान करने का जल। नहाने का पानी। २. स्नान करना। नहाना। ३. धोना। पखारना। प्रक्षालन [को०]।

प्रणेता
संज्ञा पुं० [सं० प्रणेतृ] [स्त्री० प्रणेत्री] १. निर्माण करनेवाला। बनानेवाला। कर्ता। २. रचयिता। लेखक। जैसे, पुस्तकप्रणेता। ३. नेता। अगुआ (को०)। ४. किसी मत या वाद का प्रवर्तक (को०)। ५. वादक (को०)।

प्रणेय
वि० [सं०] १. जिसके लौकिक संस्कार हो चुके हों। २. अधीन। वशवर्ती। ३. जिसका नेतृत्व या पथप्रदर्शन किया जाय (को०)। ४. करने योग्य। अवश्य संपन्न करने योग्य (को०)। ५. ले जाने योग्य। जो ले जाया जाय। प्रापणीय (को०)।

प्रणोद
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रेरण। संचालन। निर्देशन। २. प्रेषण। भेजना [को०]।

प्रणोदित
वि० [सं०] १. प्रेरित। प्रोत्साहित। २. निर्देशित। ३. संचालित। उ०—वीर राजपूत योदधाओं की कहानियों से वह सदा प्रणोदित हुए हैं।—प्रेम० और गोर्कीं, पृ० १०३।

प्रतंग्या पु
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रतिज्ञा] दे० 'प्रतिज्ञा'। उ०—श्री महाराज कै काम चाहै प्रतंग्या के निबाह।—रा० रू०, पृ० १५०।

प्रतचा पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रत्यञ्चा] दे० 'प्रत्यंचा'। उ०— रहैं खुली ही म्यान प्रतंचे नहिं उतरें छन।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० ५२४।

प्रत †
अव्य० [हिं०] दे० 'प्रति'। उ०—श्री राजा धृतराष्ट्र संजे प्रत पूछत है।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ४८३।

प्रतउत्तर पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रति + उत्तर हिं०] जवाब। प्रत्युत्तर। उ०—प्रतउत्तर कर जोर कहि, सुनहु पंगु महराज।—प० रासो, पृ० १७३।

प्रतक्ष पु
वि० [सं० प्रत्यक्ष] दे० 'प्रत्यक्ष'। उ०—अमली समली आरती, जाणि प्रतक्ष उगीयो सूर।—बी० रासो०, पृ० १९।

प्रतग्गू पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'प्रतिज्ञा'। उ०—सूतर खड़ग्गू सार नग्गू जन प्रतग्गू राख ए।—राम० धर्म०, पृ० २८१।

प्रतच्छ पु †
वि० [सं० प्रत्यक्ष] दे० 'प्रत्यक्ष'। उफ०—जान्यो नहिं कहि तप किए इह फल होत प्रतच्छ।—ब्रज० ग्रं०, पृ० ११७।

प्रतछि पु †
वि० [सं० प्रत्यक्ष] दे० 'प्रत्यक्ष'। उ०—प्रतछि बिरह के सुनि अब लक्षिन। चकित होत तहँ बड़े बिचच्छिन।— नंद० ग्रं०, पृ० १६२।

प्रतत
वि० [सं०] १. तन या फैला हुआ। विस्तृत। लंबा चौड़ा। २. आवृत। ढका हुआ।

प्रतित
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विस्तार। फैलाव। २. लता। वल्ली (को०)।

प्रतन
वि० [सं०] पुराना। प्राचीन।

प्रतना पु
संज्ञा स्त्री० [सं० पृतना] चमू। वाहिनी। पृतना। उ०— प्रतना ध्वजनी बाहिनी चमू बरूथिनी ऐन।—अनेकार्थ०, पृ० १०५।

प्रतनु
वि० [सं०] १. क्षीण। दुबला। उ०—प्रतनु शरदिंदु वर, पद्म जलविंदु पर स्वप्न जागृति सुघर।—अपरा, पृ० १२। २. बारीक। सूक्ष्म। ३. बहुत छोटा। अत्यल्प। ४. तुच्छ।

प्रतप
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य की गर्मी। सूर्य का ताप [को०]।

प्रतपत्र
संज्ञा पुं० [सं०] आतपत्र। छाता। छत्र [को०]।

प्रतपन
संज्ञा पुं० [सं०] १. तपाना। तप्त करना। २. उत्ताप। ताप। गरमी।

प्रतपना पु
क्रि० अ० [सं० प्रतपन] तपना। प्रभुत्व स्थापित होना। आतक फैलना। उ०—धूहड़ तणै तखत छत्रधारी। रायपाल प्रतपै रोसारी।—रा० रू०, पृ० १३।

प्रतप्त
वि० [सं०] १. तपाया हुआ। जो बहुत गरम किया गया हो। २. पीडित। जो बहुत सताया गया हो [को०]।

प्रतबंब पु †
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिबिम्ब] दे० 'प्रतिबिंब'। उ०— तरणातप टोप बगत्तरय। प्रतर्बब चमंकत पक्खरयं।—रा० रू०, पृ० ८१।

प्रतमक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का दमा।

प्रतमाली
संज्ञा स्त्री० [देश०] कटारी। (डि०)।

प्रतर
संज्ञा पुं० [सं०] पार करना। तरण करना [को०]।

प्रतर्क
संज्ञा पुं० [सं०] १. तर्क। वाद विवाद। २. अनुमान। सोचना विचारना। ३. शोधना। खोजना।

प्रतर्कण
संज्ञा पुं० [सं०] १. वादविवाद करना। तर्क करना। २. संदेह (को०)। ३. तर्क शास्त्र (को०)।

प्रतर्कना
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रतर्कण] ऊहापोह। संशय। संदेह। तर्क।

प्रतर्क्य
वि० [सं०] तर्कनीय। तर्क करने योग्य। कल्पनीय [को०]।

प्रतदन
संज्ञा पुं० [सं०] १. काशी का एक प्रख्यात राजा। विशेष—यह राजा दिवोदास का पुत्र था और इसका विवाह मदालसा के साथ हुआ था। यह राजा रामचंद्र जी के समय में था। २. एक प्रचीन ऋषि का नाम। ३. विष्णु। ४. ताड़ना। ताड़न। ५. ताड़ना करनेवाला।

प्रतल
संज्ञा पुं० [सं०] १. हाथ की हथेली। पंजा। २. सप्त अधो- लोक में से एक। पाताल के सातवें भाग का नाम।

प्रतष पु
वि० [सं० प्रत्यक्ष] दे० 'प्रत्यक्ष'। उ०—अण भजिया भजिया तणी, दीखै प्रतप दुसाल।—रघु० रू०, पृ० ४१।

प्रतान (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. अपतानक नामक रोग जिसमें बार बार मूर्छा आती है। २. एक प्राचीन ऋषि का नाम। ३. बेल। लता। उ०—ब्रतनी बिसनी बल्लरी बल्ली लता प्रतान। —अनेकार्थ०, पृ० ८८। ४. रेशा या लतातंतु। ५. प्रस्तार। विस्तार (को०)।

प्रतान (२)
वि० [सं०] १. विस्तृत। लंबा चौड़ा। २. रेशेदार। जिसमें रेशे हों।

प्रतानिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] फैलनेवाली लता। वल्ली [को०]।

प्रतानी
वि० [सं० प्रतानिन्] [वि० स्त्री० प्रतानिनी] १. फैलनेवाला। विस्तृत होनेवाला। फैला हुआ। २. रेशेदार। जिसमें रेशे हों [को०]।

प्रताप
संज्ञा पुं० [सं०] १. पौरुष। मरदानगी। वीरता। २. बल, पराक्रम आदि महत्व का ऐसा प्रभाव जिसके कारण उपद्रवी या विरोधी शांत रहें। तेज। इकबाल। ३. मदार का पेड़। ४. रामचंद्र के एक सखा नाम। ५. युवराज का छत्र। ६. ताप। गरमी।

प्रतापन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. पीडन। कष्ट पहुँचाना। २. कुंभी- पाक नरक। ३. विष्णु। ४. शिव (को०)।

प्रतापन (२)
वि० क्लेश देनेवाला। कष्ट देनेवाला।

प्रतापवान् (१)
वि० [सं० प्रतापवन्] [वि० स्त्री० प्रतापवपती] प्रतापयुक्त। जिसमें प्रताप हो। इकबालमंद।

प्रतापवान् (२)
संज्ञा पुं० १. विष्णु। २. शिव का नाम [को०]।

प्रतापस
संज्ञा पुं० [सं०] १. सफेद मदार। २. महान् तपस्वी (को०)।

प्रतापी (१)
वि० [सं० प्रतापिन्] १. प्रतापवान्। इकबालमंद। जिसका प्रताप हो। २. सतानेवाला। दुःखदायी।

प्रतापी
संज्ञा पुं० [सं०] रामचंद्र के एक सखा का नाम। उ०— दुवन प्रताप तहाँ, परम प्रतापी राम वचन उचारे हैं।— रघुराज (शब्द०)।

प्रतारक
संज्ञा पुं० [सं०] १. वंचक। ठग। २. धूर्त। चालाक।

प्रतारण
संज्ञा पुं० [सं०] १. वंचना। ठगी। २. धूर्तता।

प्रतारणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रतारण। वंचना। ठगी।

प्रतारित
संज्ञा पुं० [सं०] जो ठगा गया हो।

प्रतिंचा
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रत्यञ्चा वा पतञ्चिका] धनुष की डोरी। ज्या। चिल्ला।

प्रति (१)
अव्य० [सं०] एक उपसर्ग जो शब्दों के आरंभ में लगाया जाता है और निम्नांकित अर्थ देता है-१. विरुद्ध। विपरीत। जैसे, प्रतिकूल, प्रतिकार। २. सामने। जैसे, प्रत्यक्ष। ३. बदले में। जैसे, प्रत्युपकार, प्रतिहिंसा, प्रति- ध्वनि। ४. हर एक। एक एक। जैसे, प्रत्येक प्रतिदिन, प्रतिक्षण। उ०—कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं। चारु चरित नाना विधि करहीं।—मानस १। १४०। ५. समान। सदृश। जैसे प्रतिनिधि, प्रतिकृति। प्रतिलिपि। ६. मुका- बले का। जोड़ का। जैसे, प्रतिभट, प्रतिवादी, प्रत्युत्तर। इसके अतिरिक्त कहीं कहीं यह उपसर्ग 'ऊपर', 'अंश', 'अग्रभाग' आदि का भी अर्थ देता हैं।

प्रति (२)
अव्य० १. सामने। मुकाबिले में। २. ओर। तरफ। लक्ष्य किए हुए। जैसे, किसी के प्रति श्रद्धा रखना।

प्रति (३)
संज्ञा स्त्री० १. नकल। २. एक ही प्रकार की कई वस्तुओं में अगल अगल एक एक वस्तु। अदद। जैसे,— इस पुस्तक की दस प्रतियाँ ले लो।

प्रतिउत्तर
संज्ञा पुं० [सं० प्रति + उत्तर, प्रत्युत्तर] दे० 'प्रत्युत्तर'। उ०—प्रति उत्तर उड़पति न दिय क्रियाँ क्रोध मन मानि।—प० रासो, पृ० १०।

प्रतिकंचुक
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिकञ्चुक] शत्रु। दुश्मन।

प्रतिक
वि० [सं०] एक कार्षापण में क्रीत। एक कार्षापण मूल्य का [को०]।

प्रतिकर
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रतिशोध। बदला। २. प्रतिरोध। विक्षेप। ३. क्षतिपूर्ति। ४. फैलाव। विस्तीर्णता [को०]।

प्रतिकरणीय
वि० [सं०] १. जिसका प्रतिकार किया जाय। २. जो प्रतिरोध करने योग्य हो [को०]।

प्रतिकर्तव्य
वि० [सं०] १. जो चुकाया जाय (जैसे, ऋण आदि)। २. जिसका प्रतिकार किया जाय। ३. (रोगादि) जिसकी चिकित्सा की जाय [को०]।

प्रतिकर्ता
वि० पुं० [सं० प्रतिकर्तृ] १. प्रतिशोध करनेवाला। प्रतिकार करनेवाला। २. क्षतिपूर्ति करनेवाला [को०]।

प्रतिकर्म
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिकर्मन्] १. वेश। भेस। २. प्रतीकार। बदला। ३. वह कर्म जो किसी दूसरे के द्वारा प्रेरित हो। किसी कार्य के होने पर होनेवाला कार्य। किसी काम के जवाब में होनेवाला काम। ४. शरीर को सँवारना। अंगकर्म।

प्रतिकर्ष
संज्ञा पुं० [सं०] एक स्थान पर करना। एकत्र करना। संयोजन [को०]।

प्रतिकश
वि० [सं०] कशाघात को न माननेवाला (घोड़ा)। सर- कश [को०]।

प्रतिकष
संज्ञा पुं० [सं०] १. नेता। २. सहायक। ३. दूत। वार्ताहर। चर [को०]।

प्रतिकामिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] सपत्नी। सौत।

प्रतिकाय
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुतला। प्रतिरूप मूर्ति। चित्र। २. शत्रु। अरि। ३. लक्ष्य। शरव्य [को०]।

प्रतिकार
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह कार्य जो किसी कार्य को रोकने, दबाने अथवा उसका बदला चुकाने के लिये किया जाय। प्रतीकार। बदला। जवाब। किसी बात का उचित उपाय। जैसे,—(क) छाते से धूप का प्रतिकार हो जाता है। (ख) आप अपने पाप का कुछ प्रतिकार कीजिए। उ०—दाँत पीसकर, ओंठ काटकर करता है वह क्रुद्ध प्रहार। पर हँस हँसकर ही प्रभु सबका करते हैं पल में प्रतिकार।— साकेत, पृ० ३९३। २. चिकित्सा। इलाज। ३. एक प्रकार की संधि जिसमें कृत उपकार के बदले उपकार किया जाय (को०)। ४. साहाय्य। सहायता (को०)।

प्रतिकारक
संज्ञा पुं० [सं०] प्रतिकार करनेवाला। बदला चुकानेवाला।

प्रतिकारी
वि० [सं० प्रतिकारिन्] प्रतिकार करनेवाला। प्रतिरोध करनेवाला [को०]।

प्रतिकार्य
वि० [सं० प्रतिकार्य्य] जो प्रतिकार करने के योग्य हो। जिसका प्रतिकार किया जा सके।

प्रतिकाश
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रतिरूप। प्रतीकाश। २. सादृश्य। तुल्यता [को०]।

प्रतिकितव
संज्ञा पुं० [सं०] जुआरी के मुकाबले में जूआ खेलनेवाला जुआरी। जुआरी का जोड़।

प्रतिकुचित
वि० [सं० प्रतिकुञ्चित] टेढ़ा। झुका हुआ [को०]।

प्रतिकूप
संज्ञा पुं० [सं०] परिखा। खाई।

प्रतिकूल (१)
वि० [सं०] १. जो अनुकूल न हो। खिलाफ। उलटा। विरुद्ध। विपरीत। २. कष्टकर। अरुचिकर (को०)। ३. हठी। दुराग्रही (को०)। यौ०—प्रतिकूलाकारी, प्रतिकूलकृत्, प्रतिकूलचारी = विरुद्ध आचरण या काम करनेवाला। प्रतिकूलदर्शन = जिसका दर्शन अप्रिय वा अशुभ हो। प्रतिकूलप्रवर्ती। प्रतिकूलवाद। प्रति- कूलवृत्ति = विरोधी।

प्रतिकूल (२)
संज्ञा पुं० १. वह जो विरोध या प्रतिकूलता करे। प्रतिपक्षी। विरोधी। २. विरोध। प्रतिरोध (को०)।

प्रतिकूलता
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रतिकूल आचरण। प्रतिकूल होने का भाव या क्रिया। विरोध। विपरीतता।

प्रतिकूलत्व
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रतिकूलता'।

प्रतिकूलप्रवर्ती
वि० [सं० प्रतिकूलप्रवर्तिन्] १. (पोत) जो गलत मार्ग पर हो। २. (जीभ) जो अनुचित बोले [को०]।

प्रतिकूलवाद
संज्ञा पुं० [सं०] विरोध। खंडन। २. शत्रुता [को०]।

प्रतिकूला
संज्ञा स्त्री० [सं०] सौत। सपत्नी।

प्रतिकूलिक
वि० [सं०] शत्रु। विरोधी [को०]।

प्रतिकृत (१)
वि० [सं०] १. जिसका बदला हो चुका हो। जिसके जवाब या बदले में कोई बात की जा चुकी हो। २. जिसका उपाय किया जा चुका हो। जिसके विरुद्ध प्रयत्न किया जा चुका हो।

प्रतिकृत
संज्ञा पुं० १. विरोध। २. हरजाता। क्षतिपूर्ति [को०]।

प्रतिकृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रतिमा। प्रतिमूर्ति। २. तसवीर। चित्र। ३. प्रतिबिंब। छाया। ४. बदला। प्रतीकार। ५. पूजा।

प्रतिकृत्य
संज्ञा पुं० [सं०] जो प्रतिकार करने के योग्य हो।

प्रतिकृष्ट
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो बहुत ही निंदित या बुरा हो। निकृष्ट। २. दो बार का जोता हुआ खेत।

प्रतिकोप
संज्ञा पुं० [सं०] किसी विरोध के प्रति क्रोध का होना [को०]।

प्रतिक्रम
संज्ञा पुं० [सं०] प्रतिकूल कार्य। विपरीत आचार। विपरीत क्रम [को०]।

प्रतिक्रांति
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रति + क्रान्ति] एक क्रांति के विरोध- स्वरूप होनेवाली दूसरी क्रांति। उ०—इस तरह बुशहर की क्रांति दबा दी गई और प्रतिक्रांति का पल्ला भारी रहा।— किन्नर०, पृ० २०।

प्रतिक्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रतिकार। बदला। २. एक ओर कोई क्रिया होने पर उसके परिणामस्वरूप दूसरी ओर होनेवाली क्रिया। ३. सजावट। संस्कार। ४. शमन या निवारण का उपाय।

प्रतिक्रियावादी
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिक्रिया + वादिन्] किसी कार्य के विरोध में कार्य करनेवाला व्यक्ति [को०]।

प्रतिक्रुष्ट
वि० [सं०] दीन। दया करने योग्य [को०]।

प्रतिक्रूर
वि० [सं०] प्रतिकार में क्रूर। अत्यंत निर्दय [को०]।

प्रतिक्रोध
संज्ञा पुं० [सं०] वह क्रोध जो किसी के क्रोध करने पर उत्पन्न हो [को०]।

प्रतिक्षण
क्रि० वि० [सं०] हर दम। हर क्षण। निरंतर।

प्रतिक्षय
संज्ञा पुं० [सं०] रक्षक। रक्षा करनेवाला।

प्रतिक्षिप्त (१)
वि० [सं०] १. रोका हुआ। २. फेंका हुआ। ३. भेजा हुआ। ४. निंदित। ५. अपवादग्रस्त (को०)। ६. बुलाकर वापस किया हुआ (को०)। ७. स्पर्धा के कारण किसी के द्वारा तिरस्कृत (को०)। ८. जिसे क्षति या चोट पहुँचाई गई हो (को०)।

प्रतिक्षिप्त
संज्ञा पुं० ओषधि। दवा [को०]।

प्रतिक्षुत
संज्ञा पुं० [सं०] छींक। छिक्का [को०]।

प्रतिक्षेप
संज्ञा पुं० [सं०] १. फेँकना। २. रोकना। ३. तिरस्कार। ४. होड़। स्पर्धा (को०)।

प्रतिक्षेपण
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रतिक्षेप' [को०]।

प्रतिखुर
संज्ञा पुं० [सं०] वह मूढ़ गर्भ जिसमें बालक हाथ पैर बाहर निकालकर अपने धड़ और सिर से योनि मार्ग को रोक दे।

प्रतिख्यात
वि० [सं०] बहुत प्रसिद्ध।

प्रतिख्याति
संज्ञा स्त्री० [सं०] बहुत अधिक प्रसिदि्ध।

प्रतिगत (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वापस होना। लौटना। २. पक्षियों की एक प्रकार की गति। पक्षियों का आगे पीछे इधर उधर उड़ना।

प्रतिगत (२)
वि० १. लौटा हुआ। जो वापस आया हो। २. भूला हुआ। विस्तृत (को०)। ३. इधर ऊधर या आगे पीछे की ओर उड़ता हुआ (को०)।

प्रतिगमन
संज्ञा पुं० [सं०] वापस जाना। लौटना [को०]।

प्रतिगर्जना
संज्ञा स्त्री० [सं०] किसी गर्जन या हुकार के उत्तर में गरजना [को०]।

प्रतिगर्हित
वि० [सं०] निंदित। अपवादयुक्त [को०]।

प्रतिगामिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रतिगामी होने का भाव। वापस लौटने या पीछे जाने की स्थिति। उ०—प्रगतिवादी बँधुओं की प्रगतिशीलता, जैसा मैं कह चुका, वास्तव में प्रतिगामिता है।—प्र० सा०, पृ० ७६।

प्रतिगिरि
संज्ञा पुं० [सं०] १. छोटा पहाड़। पहाड़ी। २. वह जो देखने में पहाड़ के समान हो।

प्रतिगृह
अव्य० [सं०] प्रत्येक घर में। घर घर [को०]।

प्रतिगृहीत
वि० [सं०] १. जो ले लिया गया हो। अंगीकृत। २. जो ग्रहण कर लिया गया हो। ३. विवाहित (को०)।

प्रतिगृहीता
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्त्री जिसका पाणिग्रहण किया गया हो। धर्मपत्नी।

प्रतिगृह्य
वि० [सं०] जो ग्रहण करने योग्य हो। लेने लायक।

प्रतेगेह
अव्य० [सं०] दे० 'प्रतिगृह'।

प्रतिग्या पु
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रतिज्ञा] दे० 'प्रतिज्ञा'।

प्रतिग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्वीकार। ग्रहण। २. उस दान का लेना जो ब्राह्मण को विधिपूर्वक दिया जाय। इस प्रकार का दान लेना ब्राह्मण के छह कर्मों में से एक है। ३. पकड़ना। अधिकार में लाना। ४. पाणिग्रहण। विवाह। जैसे, दारप्रतिग्रह। ५. ग्रहण। उपराग। ६. स्वागत। अभ्यर्थना। ७. विरोध करना। मुकाबला करना। ८. उत्तर देना। जवाब देना। ९. सेना का पिछला भाग। १०. उगालदान। पीकदान। ११. अनुग्रह। भेंट। उपहार (को०)। १२. श्रवण करना। सुनना (को०)। १३. स्वीकरण (को०)। १४. कर्तन करनेवाला। काटने छाटनेवाला। जैसे, केश- प्रतिग्रह = नापित (को०)। १५. ग्रहण करनेवाला। वह जो ग्रहण करे। ग्रहीता (को०)।

प्रतिग्रहण
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रतिग्रह। विधिपूर्वक दिया हुआ दान भेंट आदि लेना। २. आदान। ग्रहण। स्वीकार (को०)। ३. विवाह। पाणिग्रहण (को०)। ४. पात्र। बर्तन (को०)।

प्रतिग्रही
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिग्रहिन्] प्रतिग्रह लेनेवाला। दान लेनेवाला।

प्रतिग्रहीता
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिग्रहीतृ] १. दान ग्रहण करने या लेनेवाला। प्रतिग्राही। २. पति (को०)।

प्रतिग्राह
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रतिग्रह। ग्रहण करना। लेना। २. पीकदान। उगालदान।

प्रतिग्राहक
वि० संज्ञा पुं० [सं०] प्रतिग्रह लेनेवाला। दान लेनेवाला।

प्रतिग्राही
वि० संज्ञा पुं० [सं० प्रतिग्राहिन्] दान लेनेवाला। उ०— प्रतिग्राही जीवौ नहीं दाता नरकै जाय।—तुलसी ग्रं०, पृ० १४८।

प्रतिग्राह्य
वि० [सं०] ग्रहण करने योग्य। लेने लायक। स्वीकरणीय।

प्रतिघ (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. क्रोध। गुस्सा। २. मारना। ३. मार- पीट। लड़ाई। ४. मूर्छा। बेहोशी। ५. रुकावट। विरोध। बाधा। ६. शत्रु। दुश्मन।

प्रतिघ (२)
वि० १. रुकावट डालनेवाला। बाधक। विरोधी। २. प्रतिकूल। विरुद्ध। शत्रुता करनेवाला।

प्रतिघात
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह आघात जो किसी दूसरे के आघात करने पर किया जाय। २. वह आघात जो एक आघात लगने पर आपसे आप उत्पन्न हो। टक्कर। ३. रुकावट। बाधा। ४. दूरीकरण। निवारण (को०)। ५. मारना। मारण (को०)।

प्रतिघातक
वि०, संज्ञा पुं० [सं०] प्रतिघात करनेवाला। शत्रु। वैरी। प्रतिघाती।

प्रतिघातन
संज्ञा पुं० [सं०] १. जान से मार डालना। प्राणघात। हत्या। २. बाधा। रुकावट। निवारण।

प्रतिघाती (१)
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिघातिन्] [स्त्री० प्रतिघातिनी] प्रतिघात करनेवाला। शत्रु। बैरी। दुश्मन। ढकेलनेवाला। प्रतिद्वंद्वि।

प्रतिघाती (२)
वि० १. मुकाबला करनेवाला। विरोध करनेवाला। प्रतिद्वंद्वि। २. टक्कर मारनेवाला।

प्रतिघ्न
संज्ञा पुं० [सं०] शरीर। बदन।

प्रतिचक्र
संज्ञा पुं० [सं०] शत्रुसेना। परचक्र [को०]।

प्रतिचक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] अवलोकना। देखना।

प्रतिचंद्र
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिचन्द्र] आकाशीय उत्पात। चंद्रा- भास [को०]।

प्रतिचार
संज्ञा पुं० [सं०] बनाव। सजाव। शृंगार। प्रसाधन [को०]।

प्रतिचारित
वि० [सं०] प्रचारित। विज्ञापित। घोषित [को०]।

प्रतिचारी
वि० [सं० प्रतिचारिन्] अभ्यास करनेवाला। मश्क करनेवाला [को०]।

प्रतिचिंतन
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिचिन्तन] फिर से विचार करना। पुनर्विचार।

प्रतिचिकीर्षा
स्त्री० [सं०] प्रतिकार या विरोध करने की इच्छा [को०]।

प्रतिचोदित
वि० [सं०] प्रेरित। उकसाया हुआ। उत्तेजित [को०]।

प्रतिच्छंद
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिच्छन्द] आकार। मूर्ति। प्रतिमा। चित्र [को०]।

प्रतिच्छंदक
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिच्छन्दक] दे० 'प्रतिच्छंद'।

प्रचिच्छदन
संज्ञा पुं० [सं०] आवरण। आच्छादन [को०]।

प्रतिच्छन पु
क्रि० वि० [सं० प्रति + क्षण] प्रत्येक क्षण। हर समय। उ०—साहि तनै सरजा तव द्वार प्रतिच्छन दान की दुंदुंभि बाजै।—भूषण ग्रं०, पृ० २७।

प्रतिच्छन्न
वि० [सं०] १. आवृत। आच्छादित। २. छिपा हुआ। अप्रकट। गुप्त [को०]।

प्रतिच्छवि
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रतिच्छाय। प्रतिबिंब। परछाँई। उ०—अरुण जलज के शोण कोण ये, नव तुषार के बिंदु भरे। मुकुर चूर्ण बन रहे प्रतिच्छवि, कितनी साथ लिए बिखरे।—कामायनी, पृ० ३७९।

प्रतिच्छा पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रतीक्षा] दे० 'प्रतीक्षा'।

प्रतिच्छाया
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. चित्र। तस्वीर। २. मिट्टी पत्थर आदि की बनी हुई मूर्ति। ३. परछाई। प्रतिबिंब।

प्रतिच्छायिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'प्रतिच्छाया' [को०]।

प्रतिच्छायित
वि० [सं०] प्रतिच्छाया युक्त। चित्रित। प्रतिबिंबित। उ०—चिर निराशा नीरधर से, प्रतिच्छायित अश्रु सर में। मधुप मुखर मरंद मुकुलित मैं सजल जलजात रे मन।—कामा- यनी, पृ० २१७।

प्रतिच्छेद
संज्ञा पुं० [सं०] १. बाधा। रुकावट। विरोध। २. छेदन करना। खँडित करना [को०]।

प्रतिछबि
संज्ञा पुं० [सं० प्रति + छबि] दे० 'प्रतिच्छवि'। उ०— तू बहती सरिता के जलपर, देख रहा अपनी प्रतिछबि नर।—मधुज्वाला, पृ० ६६।

प्रतिछाँई
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'प्रतिच्छाया' —३।

प्रतिछाँह
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'प्रतिच्छाया'—३।

प्रतिछाँही
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रति + हिं० छाँह] दे० 'प्रतिछाया'।

प्रतिछाया
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रतिच्छाया] प्रतिबिंब। परछाँहीं।

प्रतिजंघा
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रतिजङ्घ] जाँघ का अगला भाग।

प्रतिजन्म
संज्ञा पुं० [सं०] पुनः जनमना। फिर पैदा होना [को०]।

प्रतिजन्य
वि० [सं०] प्रतिकूल। विरोधी। वैरी। विरुद्ध [को०]।

प्रतिजल्प
संज्ञा पुं० [सं०] परामर्श। संमति। सलाह।

प्रतिजल्पक
संज्ञा पुं० [सं०] १. आदरणीय, अनुकूल या योग्य कथन। परामर्श। २. नम्र पर वक्र उत्तर [को०]।

प्रतिजागर
संज्ञा पुं० [सं०] १. खूब अच्छी तरह ध्यान देना। खूब होशियार रखना। सचेत रहना। सावधान रहना। २. रक्षा।

प्रतिजागरण
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रतिजागर' [को०]।

प्रतिजिह्वा
संज्ञा स्त्री० [सं०] गले के अंदर की घंटी। कौवा। छोटी जीभ।

प्रतिजिह्विका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'प्रतिजिह्वा' [को०]।

प्रतिजीवन
संज्ञा पुं० [सं०] फिर से जन्म होना। नया जन्म।

प्रतिज्ञता
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रतिज्ञ + हिं० या (प्रत्य०)] प्रतिज्ञा लेने का भाव। उ०—जिसके अर्थ बहुत कुछ आत्मत्याग, देशा- नुराग, दृढ़प्रतिज्ञता आदि गुणों की आवश्यकता है।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० २३७।

प्रतिज्ञांतर
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिज्ञान्तर] तर्क में एक निग्रह स्थान। विशेष—दे० 'निग्रहस्थान'।

प्रतिज्ञा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. भविष्य में कोई कर्तव्य पालन करने, कोई काम करने या न करने आदि के संबंद में दृढ़ निश्चय। वह दृढ़तापूर्ण कथन या विचार जिसके अनुसार कोई कार्य करने या न करने का दृढ़ संकल्प हो। किसी बात को अवश्य करने या कभी न करने के संबंध में वचन देना। प्रण। जैसे— भीष्म ने प्रतिज्ञा की थी कि मैं आजन्म विवाह न करूँगा। २. शपथ। सौंगद। कसम। ३. अभियोग। दावा। ४. न्यायमें अनुमान के पाँच खंडों या अवयवों में से पहला अवयव। वह वाक्य या कथन जिससे साध्य का निर्देश होता है। उस बात का कथ जिसे सिद्ध करना हो। ५. स्वीकार। स्वीकरण। अँगीकरण (को०)।

प्रतिज्ञात (१)
वि० [सं०] १. जिसके संबंध में प्रतिज्ञा की जा चुकी हो। स्वीकार किया हुआ। २. करने या हो सकने योग्य। साध्य।

प्रतज्ञित (२)
संज्ञा पुं० प्रतिज्ञा। वादा। वचन [को०]।

प्रतिज्ञातार्थ
संज्ञा पुं० [सं०] वक्तव्य। कथन [को०]।

प्रतिज्ञान
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्वीकृत। स्वीकरण। राजीनामा। २. प्रतिज्ञा। वादा। वचन [को०]।

प्रतिज्ञापत्र, प्रतिज्ञापत्रक
संज्ञा पुं० [सं०] वह पत्र जिसपर कोई प्रतिज्ञत्रा लिखी हो। वह कागज जिसपर शर्तें लिखी हों। इकरारनामा।

प्रतिज्ञापालन
संज्ञा पुं० [सं०] प्रतिज्ञा पूरी करना। प्रण पूरा करना। वचन निभाना [को०]।

प्रतिज्ञाभंग
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिज्ञाभङ्ग] वादा पूरा न करना। वचन न निभाना [को०]।

प्रतिज्ञाविरोध
संज्ञा पुं० [सं०] न्याय के अनुसार एक प्रकार का निग्रहस्थान। दे० 'निग्रहस्थान'।

प्रतिज्ञाविवाहित
वि० [सं०] जिसकी शादी हो गई हो [को०]।

प्रतिज्ञासंन्यास
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का निग्रह स्थान। दे० 'निग्रहस्थान'।

प्रतिज्ञाहानि
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार का निग्रहस्थान। विशेष—दे० 'निग्रहस्थान'।

प्रतिज्ञेय
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो प्रतिज्ञा करने में समर्थ हो। प्रतिज्ञा कर सकने योग्य। २. वह जो स्तुति या प्रशंसा करे। स्तुति करनेवाला। प्रशंसा करनेवाला।

प्रतितंत्र
संज्ञा पुं० [सं० प्रतितन्त्र] अपने मत से विरुद्ध मत का शास्त्र। वह शास्त्र जिसके सिद्धांत अपने शास्त्र के सिद्धांतों के प्रति- कूल हों।

प्रतितंत्रसिद्धांत
संज्ञा पुं० [सं० प्रतितत्रसिद्धान्त] वह सिद्धांत जो कुछ शास्त्रों में हो और कुछ में न हो। जैसे, मीमांसा में 'शब्द' को नित्य माना है, परंतु न्याय में वह अनित्य माना जाता है।

प्रतितर
संज्ञा पुं० [सं०] १. नाव का डाँड़। नाव खेने का बल्ला। २. नाव को खेनेवाला। कर्णधार। केवट।

प्रतिताल, प्रतितालक
संज्ञा पुं० [सं०] संगीत में ताल का एक प्रकार जिसमें कांतार, समरव्य, वैकुंठ और वांछित ये चारों ताल हैं।

प्रतिताली
संज्ञा स्त्री० [सं०] दरवाजे की चाभी। कुंजी। ताली [को०]।

प्रतितुलन
संज्ञा पुं० [सं० प्रति + तुलन] तुलना। समता। संतुलन। सभानीकरण। उ०—जिंदा जातियों के इतिहास में उन दोनों प्रवृत्तियों का प्रतितुलन बराबर होता रहता है। —भा० इ० रू०, पृ० ६०६।

प्रतितूणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार का रोग जिसमें गुदा अथवा मूत्राशय से पीड़ा उठकर पेट तक पहुँचती है।

प्रतिदड
वि० [सं० प्रतिदणड] अविश्वस्त। अविनयी। घृष्ट [को०]।

प्रतिदत्त
वि० [सं०] १. लौटाया हुआ। वापस किया हुआ। २. बदले में दिया हुआ।

प्रतिदान
संज्ञा पुं० [सं०] १. ली या रखी हुई चीज को लोटाना। वापस करना। २. एक चीज लेकर दूसरी चीज देना। परिवर्तन। विनिमय। बदला।

प्रांतदारण
संज्ञा पुं० [सं०] १. संघर्ष। युद्ध। लडाई। २. चोरना। फाडना [को०]।

प्रतिदिवा
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिदिवन्] १. सूर्य। रवि। २. दिवस। दिन [को०]।

प्रतिदूत
संज्ञा पुं० [सं०] वह दूत जो बदले में भेजा जाय [को०]।

प्रतिदृष्ट
वि० [सं०] १. देखा हुआ। अवलोकित। दृष्टिगत। २. प्रसिद्ध। ख्यात [को०]।

प्रतिदृष्टातसम
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिदृष्टन्तसम] न्याय में एक प्रकार की जाति।

प्रतिदेय
वि० [सं०] १. जो प्रतिदान करने योग्य हो। जो बदलने या लौटाने योग्य हो। २. जो (वस्तु आदि) क्रय करके फिर लौटाई जाय (को०)।

प्रतिद्वंद्व
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिद्वन्द्व] १. दो समान व्यक्तियों का विरोध। बराबरवालों का झागड़ा। २. विरोधी। शत्रु (को०)।

प्रतिद्वंद्विता
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रतिद्वन्द्विता] बराबरवाले को लड़ाई। समान बल या बुदिधवाले व्यक्ति का विरोध। अपने से समान व्यक्ति का विरोध। १. प्रतिद्वंद्वी होने का भाव।

प्रतिद्वंद्वी (१)
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिद्वंद्विन्] बराबरी का विरोधी। मुकाबले का लड़नेवाला। शत्रु।

प्रतिद्वंदी (२)
वि० १. प्रतिकूल। विरोधी। २. शत्रुतापूर्ण [को०]।

प्रतिधा
संज्ञा स्त्री० [सं०] आलेख्य [को०]।

प्रातिधान
संज्ञा पुं० [सं०] १. रखना। स्थापित करना। २. निराकरण [को०]।

प्रतिधावन
संज्ञा पुं० [सं०] आक्रमण। हमला [को०]।

प्रतिधि
संज्ञा पुं० [सं०] संध्या के समय पढ़ा जानेवाला एक प्रकार वैदिक स्तोत्र।

प्रतिधुनि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रतिध्वनि] दे० 'प्रतिध्वानि'। उ०— केइ अपनी प्रातिधुनि सों अरें। गारि देहिं बहुरयो हँसि परें। नंद० ग्रं०, २६०।—

प्रतिध्वनि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह शब्द जो (उत्पन्न होने पर) किसी बाधक पदार्थ से टकराने के कारण लौटकर अपनेउत्पन्न होने के स्थान पर फिर से सुनाई पड़ता है। अपनी उत्पत्ति के स्थान पर फिर से सुनाई पड़नेवाला शब्द। प्रति- नाद। प्रतिशब्द। प्रतिश्रुत। गूँज। आबाज। बाजगश्त। जैसे,— (क) दूर की पहाड़ी से मेरी पुकार की प्रतिध्वानि सुनाई पड़ी। (ख) उस गुंबद के नीचे जो कुछ कहा जाय, उसकी प्रतिध्वति बराबर सुनाई पड़ती है। विशेष— वायु में क्षोम होने के कारण लहरें उठती हैं जिनसे शब्द की उत्पत्ति होती है। जब इन लहरों के मार्ग में दीवार या चट्टान आदि की तरह का कोई भारी बाधक पदार्थ आता है तब ये लहरें उससे टकराकर लौटती है जिनके कारण वह शब्द फिर उस स्थान पर सुनाई पड़ता है जहाँ से वह उत्पन्न हुआ था। यदि वायु की लहरों को रोकनेवाला पदाथ शब्द उत्पन्न होने के स्थान के ठीक सामने होता है तब तो प्रतिध्वनि उत्पन्न होने के स्थान् पर ही सुनाई पड़ती है। पर यदि वह इधर उधर होता है तो प्रतिध्वनि भी इधर या उधर सुनाई पड़ती है। यदि लगातार बहुत से शब्द किए जायँ तो सब शब्दों की प्रतिध्वनि साफ नहीं सुनाई पड़ती; पर शब्दों की समप्ति पर अंतिम शब्द की प्रतिध्वनि बहुत ही साफ सुनाई पड़ती है। जैसे, यदि किसी बहुत बड़े तालाब के किनारे या किसी बड़े गुंबद के नीचे खड़े होकर कहा जाय 'हाथी या घोड़ा' तो प्रतिध्वनि में 'घोड़ा' बहुत साफ सुनाई देगा। साधारणतः प्रतिध्वनि उत्पन्न होने में एक सेकेंड का नवाँ अंश लगाता है, इसलिये इससे कम अंतर पर जो शब्द होंगे उनकी प्रतिध्वनि स्पष्ट नहीं होगी। शब्द की गति प्रति सेकेंड लगभग ११२५ फुट है, अतः जहाँ बाधक स्थान शब्द उत्पन्न होने के स्थान से (११२५ का १/१८ वाँ अंश) ३२ फुट से कम दूरी पर होगा, वहाँ प्रतिध्वनि नहीं सुनाई पड़गी ? सबसे अधिक स्पष्ट प्रतिध्वनि उसी शब्द की होती है जो सहसा ओर जोर का होता है। प्रायः बहुत बड़े बड़े कमरों गुंबदों तालाबों, कूपों, नगर के परकोटों, जगलों, पहाड़ों और तरा- इयों अदि में प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती है। किसी किसी स्थान पर ऐसा भी होता है कि एक ही शब्द की कई कई प्रति- ध्वनियाँ होती हैं। २. शब्द से व्याप्त होना। गूँजना। ३. दूसरों के भावों या विचारों आदि का दोहराया जाना। जैस,—उनके व्याख्यान में केवल दूसरों की उक्तियों की प्रतिध्वनि ही रहती है।

प्रतिध्वनित
वि० [सं०] प्रतिध्वनि से परिपूर्ण। गुंजित [को०]।

प्रतिध्वान
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रतिध्वनि'।

प्रतिध्वानित
वि० [सं०] गुंजित। प्रतिध्वनित [को०]।

प्रतिनंदन
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिनन्दन] १. वह अभिनंदन जो आशी- वदि देते हुए किया जाय। २. स्वागत करना (को०)। ३. धन्यवाद देना (को०)। ४. बाधाई देना (को०)।

प्रतिनप्ता
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिनप्तृ] प्रपौत्र। पुत्र का पौत्र [को०]।

प्रतिनमस्कार
संज्ञा पुं० [सं०] नमस्कार के बदले में किया गया नमस्कार। प्रत्यभिवादन।

प्रतिनव
वि० [सं०] नया। ताजा। नूतन [को०]।

प्रतिना
संज्ञा स्त्री० [सं० पृतना] दे० 'पृतना'।

प्रतिनाड़ी
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रतिनाडी] छोटी नाड़ी। उपनाड़ी। विशेष— दे० 'नाड़ी'।

प्रतिनाद
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रतिध्वनि'।

प्रतिनादित
वि० [सं०] गुंजित। प्रतिध्वनित [को०]।

प्रतिनायक
संज्ञा पुं० [सं०] नाटकों और काव्यों आदि में नायक का प्रतिद्वंद्वी पात्र। जैसे, रामायण में राम का प्रतिनायक रावण है।

प्रतिनाह
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का रोग जिसमें नाक के नथनों में कफ रुकने से श्वास चलना बंद हो जाता है।

प्रतिनिधि
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रतिमा। प्रतिमूर्ति। २. वह व्यक्ति जो किसा दूसरे की ओर से कोई काम करने के लिये नियुक्त हो। दूसरों का स्थानापन्न होकर काम करनेवाला। विशेष— (क) हमारे यहाँ प्राचीन काल से धार्मिक कृत्यों आदि के लिये प्रतिनिधि नियुक्त करने की प्रथा है। यदि कोई मनुष्य नित्य या नैमित्तिक आदि कर्म आरंभ करने के उपरांत बीच में ही असमर्थ हो जाय तो वह उसकी पूर्ति के लिये किसी दूसरे व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि स्वरूप नियुक्त कर सकता है। (ख) आजकल साधारणतः सर्व- साधारण की ओर से सभाओं आदि में, विचार प्रकट करने और मत देने के लिये, अथवा किसी राज्य या बड़े आदमी की ओर से किसी बात का निर्णय करने के लिये लोग प्रतिनिधि बनाकर भेजे जाते हैं। ३. जमानतदार। प्रतिभू। जामिन (को०)। ४. प्रतिबिंब (डिं०)। ५. वह वस्तु या द्रव्य जो किसी वस्तु के अभाव में प्रयुक्त हो (को०)।

प्रतिनिधित्व
संज्ञा पुं० [सं०] प्रतिनिधि होने की क्रिया या भाव। प्रतिनिधि होने का काम।

प्रतिनियत
वि० [सं०] १. दृढ़। कंपरहित। स्थिर। २. पूर्वनिश्चित। पहले से तै किया हुआ [को०]।

प्रतिनियम
संज्ञा पुं० [सं०] १. अलग अलग व्यवस्था। २. सामान्य नियम। सामान्य व्यवस्था [को०]।

प्रतिनिर्जित
वि० [सं०] १. स्वकार्यप्रयुक्त। अपने काम में प्रयुक्त। २. जीता हुआ। विजित [को०]

प्रतिनिर्देश
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० प्रतिनिर्देश्य] फिर से कहना। दुबारा कहना [को०]।

प्रतिनिर्यातन
संज्ञा पुं० [सं०] वह अपकार जो किसी अपकार के बदले में किया जाय।

प्रतिनिवर्तन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० प्रतिनवर्तित] १. लौटना। वापस होना। २. निवारण। वारण [को०]।

प्रतिनिवासन
संज्ञा पुं० [सं०] बौद्ध भिक्षुओं के पहनने का एक वस्त्र।

प्रतिनिविष्ट
वि० [सं०] जो स्थिर या दृढ़ हो [को०]।यौ०— प्रतिनिविष्ट मूर्ख = महामूर्ख। जड़मति।

प्रतिनिष्क्रय
संज्ञा पुं० [सं०] बदला [को०]।

प्रतिनोद
संज्ञा पुं० [सं०] पीछे करना। दूर हटाना [को०]।

प्रतिप
संज्ञा पुं० [सं०] राजा शातनु के पिता का नाम।

पतिपक्ष (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. शत्रु। बैरी। दुश्मन। २. प्रतिवादी। उत्तर देनेवाला। ३. सादृश्य। समानता। बरबरी। ४. विरोधी पक्ष। विरुद्ध दल। विरुद्ध पक्ष। दूसरे फरीक की बात।

प्रतिपक्ष (२)
वि० समान। सदृश [को०]।

प्रतपक्षता
संज्ञा स्त्री० [सं०] विरोधिता। बाधा। विरोध।

प्रतिपक्षित
वि० [सं०] १. प्रतिपक्ष का। विरोधी दल में गया हुआ। २. न्याय में (वह हेतु) जो सत्प्रतिपक्ष दोष से युक्त हो [को०]।

प्रतिपक्षी
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिपक्षिन्] विपक्षी। विरोधी। शत्रु।

प्रतिपच्छ पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रातिपक्ष] दे० 'प्रतिपक्ष'।

प्रतिपच्छी पु
संज्ञा पुं० [सं०प्रतिपक्षिन्] दो० 'प्रतिपक्षी'। उ०— प्रतिपच्छी को मान मारि अपनो विस्तारै।—ब्रज० ग्रं०, पृ० ११२।

प्रतिपत्
संज्ञा स्त्री० [सं०] 'प्रतिपद'। यौ०— प्रतिपत्तूर्य = एक प्रकार का वाद्य। नगाड़ा।

प्रतिपत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्राप्ति। पाना। २. ज्ञाना। ३. अनुमान। ४. देना। दान। ५. कार्य रूप मे लाना। ६. प्रतिपादन। निरूपण। किसी विषय का निर्धारण। ७. प्रमाणपूर्वक प्रदर्शन। जो में बैठाना। ८. मानना। स्वीकृति कायल होना। ९. पदप्राप्ति। धाक। प्रतिष्ठा। साख। १०. आदरसत्कार। ११. प्रवृत्ति। १२. निश्चय। दृढ़ विचार। १३. परिणाम। १४. गौरव। १५. ढंग। तरीका (को०)। १६. संवाद (को०)।

प्रतिपत्तिकर्म
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिपत्तिकर्मन्] श्राद्ध आदि में वह कर्म जो सबके अंत में किया जाय। सबके पीछे किया जानेवाला कर्म।

प्रतिपत्तिदक्ष
वि० [सं०] कार्यसंपादन में चतुर [को०]।

प्रतिपत्तिपटह
संज्ञा पुं० [सं०] वह ढोल जिसे बजवाने का अधिकार केवल अभिजात वर्ग के लोगों (सरदारों) को था।

प्रतिपत्तिभेद
संज्ञा पुं० [सं०] संमतिभेद। मतभेद [को०]।

प्रतिपत्तिमान्
वि० [सं० प्रतिपतिमन्] १. प्रतिपत्तियुक्त। बुद्धिमान। २. चतुर। कार्य में दक्ष। ३. प्रसिद्ध। मशहूर। ख्यात [को०]।

प्रतिपत्तिविशारद्
वि० [सं०] चतुर। कुशल [को०]।

प्रतिपत्रफला
संज्ञा स्त्री० [सं०] करेली।

प्रदिपद्
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मार्ग। रास्ता। २. आरंभ। ३. पक्ष की पहली तिथि। प्रतिपदा। परिवा। ४. बुदि्ध। समझ। ५. श्रेणी। पंक्ति। ६. प्राचीन काल का एक प्रकार का बड़ा ढोल। ७. आग्निप्रवेश (को०)। ८. प्रारंभ की श्लोक। शुरू के छंद (को०)। ९. अग्नि की जन्मतिथि।

प्रतिपद
क्रि० वि० [सं०] पद पद पर। प्रत्येक पग पर [को०]।

प्रतिपदा
संज्ञा स्त्री० [सं०] किसी पक्ष की पहली तिथि। प्रतिपद्। परिवा।

प्रतिपदी
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रतिपदा [को०]।

प्रतिपन्न
वि० [सं०] १. अवगत। जाना हुआ। २. अंगीकृत। स्वीकृत। अपनाया हुआ। ३. प्रचंड। ४. प्रमाणित। साबित। निश्चित। स्थापित। निर्धारित। निरूपित। ५. भरा पूरा। ६. शरणागत। ७. संमानित। जिसकी प्रतिष्ठा की गई हो। ८. प्राप्त। जो मिला हो। ९. पराभवग्रस्त। पराभूत। (को०)। १०. आरंभित। जो प्रारंभ किया गया हो (को०)। ११. कृत। किया हुआ (को०)।

प्रतिपन्नक
संज्ञा पुं० [सं०] बौद्ध शास्त्रों के अनुसार श्रोतापन्न, सकृदगामी अनागमी और अहत ये चार पद।

प्रतिपन्नत्व
संज्ञा पुं० [सं०] प्रतिपन्न होने का भाव।

प्रतिपर्ण शिफा
संज्ञा स्त्री० [सं०] मूसाकानी। द्रवंती।

प्रातिपाण
संज्ञा पुं० [सं०] जुए में प्रतिपक्षी का रक्षा हुआ दाँव। बदले में लगाई हुई बाजी।

प्रतिपात
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य के अनुसार किसी क्षति की पूर्ण पूर्ति। नुकसान का पूरा बदला या हरजाना।

प्रतिपादक
वि०, संज्ञा पुं० [सं०] अच्छी तरह समझाने या कहनेवाला। प्रतिपादन करनेवाला। २. प्रतिपन्न करनेवाला। ३. निर्वाह करनेवाला। ४. उत्पादक। उत्पन्न करनेवाला। ५. देनेवाला। प्रदायक (को०)। ६. पुरस्कृत करनेवाला। उन्नायक (को०)।

प्रतिपादन
संज्ञा पुं० [सं०] १. अच्छी तरह समझाना। भली- भाँति ज्ञान कराना। प्रतिपात्ति। २. निष्पादन। निरूपण। किसी बात का प्रमाणपूर्वक कथन। ३. प्रमाण। सबूत। ४. उत्पत्ति। ५. दान। ६. पुरस्कार। ७. वापस करना। प्रत्यर्पण (को०)। ८. आरभण। उपक्रमण (को०)।

प्रतिपादनमान
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य अर्थाशास्त्र के अनुसार बहुत अधिक वेतन या जागीर आदि देकर प्रतिष्ठा बढ़ाना।

प्रतिपादयिता
वि०, संज्ञा पुं० [सं० प्रर्तिपादयितृ] १. अध्यापक। शिक्षक। २. देनेवाला। प्रदाता। ३. प्रतिपादक। निर्देंशक। प्रदर्शक [को०]।

प्रतिपादित
वि० [सं०] १. जिसका प्रतिपादन हो चुका हो। जो अच्छी तरह कह या समझा दिया गया हो। २. जिसका निश्चय हो चुका हो। निर्धारित। निरूपित। ३. जो दिया गया हो। ४. उत्पदित। उदभूत (को०)।

प्रतिपाद्य
वि० [सं०] १. प्रतिपादन के योग्य। निरूपण करने के योग्य। कहने के योग्य। समझाने के योग्य। २. देने के योग्य।

प्रतिपाप (१)
संज्ञा पुं० [सं०] वह कठोर ओर पापरूप व्यवहार जो किसी पापी के साथ किया जाय।

प्रतिपाप (१)
वि० बुराई के बदले बुराई करनेवाला [को०]।

प्रतिपार पु †
संज्ञा पुं० [सं० प्रातिपाल] दे० 'प्रतिपाल'। उ०— ध्रुव जन प्रह्लाद रटत कुती के कुँअर रटत। द्रुपदसुता रटत नाथ, नाथन प्रतिपार री।—नंद ग्रं० पृ० ३२३।

प्रतिपारना पु
क्रि० सं० [सं० प्रतिपालन] प्रतिपालन करना। पालना।

प्रतिपाल
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो पालन करे। पालन या रक्षण करनेवाला। पोषक। रक्षक। उ०— जौ नहिं करतै, भावतो रूप, भूप प्रतिपाल।— सं० सप्तक, पृ० १८४।

प्रतिपालक
संज्ञा पुं० [सं०] १. पालनकताँ। पालन पोषण करनेवाला। पोषक। रक्षक। उ०—बाल बवन नीति प्रतिपालक।—मानस० ५। ५०। २. राजा। गरेश।

प्रतिपालन
संज्ञा पुं० [सं०] १. पालन करने की क्रिया या भाव। पालन। २. रक्षा करन की क्रिया या भाव। रक्षण। उ०— बहु बिधि प्रतिपालन प्रभु कीन्हों। परम कृपालु ज्ञान तोहि दीन्हों।—तुलसी ग्रं०, पृ० ५२४। ३. निर्वाह। तामील।

प्रतिपालना पु †
क्रि० स० [सं० प्रतिपालन] ३. पालन पोषण करना। पालना। उ०— एहि प्रतिपालउँ सबु परिवारू।— मानस, २। १००। २. रक्षा करना। तचाना। ३. निर्वाह करना। तामील करना। उ०— प्रतिपालि आयसु कुशल देखन पाय पुनि फिर आइहौं। —मानस, २। १५१।

प्रतिपालनीय
वि० [सं०] प्रतिपालन के योग्य। प्रतिपाल्य [को०]।

प्रतिपालित
वि० [सं०] १. पालन किया हुआ। २. रक्षित। ३. जिसका अभ्यास किया गया हो (को०)। ४. जिसका अनुगमन या निर्वाह किया गया हो (को०)।

प्रर्तिपाल्य
वि० [सं०] १. पालन करने योग्य। जिसका पालन करना उचित या धर्म हो। २. रक्षा करने के योग्य। जिसकी रक्षा करना उचित हो।

प्रतिपिस्तु
वि० [सं०] किसी वस्तु को पाने के लिये इच्छुक [को०]।

प्रतिपिष्ट
वि० [सं०] १. चूर्णित। निष्पिषित। घर्षित। २. पीड़ित। निदंलित। ३. परस्पर एक दूसरे द्वारा प्रहरित या आघातित (को०)।

प्रतिपुरुष
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह पुरुष जो किसी दूसरे पुरुष के स्थान पर होकर काम करे। प्रतिनिधि। २. वह पुतला जो प्राचीन काल में चोर लोग घुसने के पहले घर मे फेका करते थे। (जब इस प्रतिपुरुष के फकने पर घर के लोग किसी प्रकार का शोर नहीं करतें थे, तब चोर घर में घुसते थे)। ३. सहकारी। वह जो साथ मे काम करे।

प्रतिपुस्तक
संज्ञा स्त्री० [सं०] किसी मूल ग्रंथ की प्रतिलिपि [को०]।

प्रतिपूजक
संज्ञा पुं० [सं०] प्रतिपूजन करनेवाला। अभिवादन करनेवाला।

प्रतिपूजन
संज्ञा पुं० [सं०] अभिवादन प्रत्यभिवादन। साहब सलामत।

प्रतिपूजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रतिपूजन। अभिवादन।

प्रतिपूज्य
वि० [सं०] जो अभिवादन करने पर, अभिवादन किए जाने के योग्य हो।

प्रतिपूरुष
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रतिपुरुष'।

प्रतिपोषक
संज्ञा पुं० [सं०] सहायता करनेवाला। समर्थक। मदद करनेवाला।

प्रतिप्रणाम
संज्ञा पुं० [सं०] प्रणाम के बदले में किया जानेवाला प्रणाम। प्रतिनमस्कार। प्रत्यभिवादन [को०]।

प्रतिप्रत्त
वि० [सं०] प्रत्यर्पित [को०]।

प्रतिप्रदान
संज्ञा पुं० [सं०] १. वापस करना। प्रतिदान। २. वह जो विवाह आदि में दिया हुआ हो [को०]।

प्रतिप्रभ
संज्ञा पुं० [सं०] अत्रि वंश के एक ऋषि का नाम।

प्रतिप्रभा
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रतिबिंब। परछाँही।

प्रतिप्रयाण
संज्ञा पुं० [सं०] वापस होना। लौटना [को०]।

प्रतिप्रश्न
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रश्न के बदले में किसा जानेवाला प्रश्न। २. उत्तर। जवाब (को०)।

प्रतिप्रसव
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी अवसर पर कोई ऐसे काम के लिये स्वच्छदंता जो और अवसरों पर निषिद्ध हो। जिस बात का एक स्थान पर निषेध किया गया हो, उसी का किसी विशेष अवसर के लिये बिधान। किसी बात के लिये एक स्थान पर निषेध और दूसरे स्थान पर आज्ञा। जैसे, रविवार शुक्रवार, द्वादशी को श्राद्ध में तर्पण करने का निषेध है। पर अयन, विषुव, संक्राति या ग्रहण के समय अथवा तीर्थस्थान में रविवार, शुक्रवार, द्वादशी को भी तिल से श्राद्ध करने की आज्ञा है।

प्रतिप्रसूत
वि० [सं०] १. जिसके विषय में और स्थानों में तो निषेध हो पर किसी विशेष स्थान में विधान हो। जिसके सिश्य में प्रतिप्रसव हो। २. पुनः संभावित [को०]।

प्रतिप्रस्थाता
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिप्रस्थातृ] सोमयाजी १६ ऋत्विजों में से छठा ऋत्विज।

प्रतिप्रस्थान
संज्ञा पुं० [सं०] शत्रु या विरोधी पक्ष से मिल जाना [को०]।

प्रतिप्रहार
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रत्याघात' [को०]।

प्रतिप्राकार
संज्ञा पुं० [सं०] दुर्ग के बाहर की ओर का प्राकार। बाहरी परकोटा।

प्रतिप्रिय
संज्ञा पुं० [सं०] प्रत्युपकार। उपकार के बदले की सेवा या कृपा [को०]।

प्रतिप्लवन
संज्ञा पुं० [सं०] पीछे की ओर कूदना या प्लबन [को०]।