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विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/प्रतिफल

विक्षनरी से

प्रतिफल
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रतिबिंब। छाया। २. परिणाम। नतीजा। ३. वह बात जो किसी बात का बदला देने या लेने के लिये की जाय।

प्रतिफलन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रतिफल' [को०]।

प्रतिफला
संज्ञा स्त्री० [सं०] बावची। बकुची।

प्रतिफलित
वि० [सं०] १. प्रातिबिंबित। प्रतिच्छायित। उ०— भगवान मरीचिमाली की किरणें अनेक वस्तुओं पर प्रति- फलित होती हैं।—रसकलश, पृ० १७। २. प्रतिकृत। प्रतिशोधित (को०)।

प्रतिफुल्लक
वि० [सं०] फूला हुआ। पुष्पित। प्रफुल्ल [को०]।

प्रतिबंध
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिबन्ध] १. रोक। रुकवट। अटकाव। २. विघ्न। बाधा। ३. बंदोबस्त। प्रबध। ४. निराशा। आशाभंग। नैराश्य (को०)। ५. संबंध। संपर्क। लगाव (को०)। ६. बधन। बाँधना। बाँधने कि क्रिया या भाव। ८. (दर्शन०) सदा बना रहनेवाला अविच्छेद संबध (को०)।

प्रातिबंधक
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिबन्धक] १. वह जो रोकता हो। रोकनेवाला। २. बाधा डालनेवाला। विघ्न करनेवाला। ३. वृक्ष। पेड़। ४. शाखा (को०)।

प्रतिवंधकता
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रातिबन्धकता] १. रुकावट। रोक। अड़चन। २. विघ्न। बाधा।

प्रातिबधवान्
वि० [सं० प्रातिबन्धवत्] प्रतिबंधयुक्त [को०]।

प्रतिबंधि
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रतिबन्धि] दे० 'प्रतिबंधी'।

प्रतिबंधी (१)
वि० [सं० प्रतिबन्धिन्] १. बाधक। अवरोधक। २. बाँधनेवाला। ३. बाधाओं से ग्रस्त। कठिनाई से भरा हुआ [को०]।

प्रतिबंधी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रतिबन्धी] १. वह आपत्ति या इतराज जो समान रूप से दोनों पर लागू हो। २. आपत्ति। इतराज। विरोध [को०]।

प्रतिबंधु
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रतिबन्धु] वह जो बंधु के समान हो।

प्रतिबद्ध
वि० [सं०] १. बँधा हुआ। २. जिसमें किसी प्रकार का प्रतिबध हो। जिसमें कोई रुकावट हो। ३. जिसमें कोई बाधा डाली गई हो। ४. नियंत्रित। ५. निसर्गतः। संवद्ध या संयुक्त। पूर्णतः अविच्छेद्य। जैसे, धूम और अग्नि (को०)। ६. खचित। जड़ा या पिरोया हुआ (को०)। ७. दूर या अलग किया हुआ। दूरीकृत (को०)। ८. निराश। हताश (को०)।

प्रतिबल (१)
वि० [सं०] १. समर्थ। शक्त। २. बराबर की ताकतवाला। शक्ति में समान।

प्रतिबल (२)
संज्ञा पुं० १. शत्रुसेना के भिन्न भिन्न अंगों का सामना करने की शक्ति या सामान। विशेष— कौटल्य ने लिखा है कि हस्तिसेना का मुकाबला करनेवाली हस्तियत्र, शकटगर्भ, कुंज, प्रास, शल्य आदि से युक्त सेना है। जिस सेना में पाषाण, लकुट (लाठियाँ), कवच, कचग्रहणी आदि अधिक हों, वह रथ सेना के मुकाबले के लिये ठीक है, इत्यादि। २. शत्रु। दुश्मन। बैरी (को०)।

प्रतिबाधक
वि० [सं०] १. बाधा करनेवाला। बाधक। रोकनेवाला। २. कष्ट पहुँचानेवाला। पीड़ा देनेवाला।

प्रतिबाधन
संज्ञा पुं० [सं०] १. विघ्न। बाधा। २. पीड़ा। कष्ट।

प्रतिबाधित
वि० [सं०] १. हटाया या रोका हुआ। निवारित। २. बधित। बाधायुक्त। पीड़ित [को०]।

प्रतिबाधि
वि० [सं० प्रातिबधिन्] १. बाधक। बाधा डालनेवाला। २. विरोधी। शत्रु। प्रतिकूल [को०]।

प्रतिबाहु
संज्ञा पुं० [सं०] १. बाँह का अगला भाग। २. पुराणा- नुसार श्वफल्क के एक पुत्र और अक्रूर के भाई का नाम।

प्रतिबिंब
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिबिम्ब] १. परछाई। छाया। २. मूर्ति। प्रतिमा। ३. चित्र। तसवीर।४. शीशा। दर्पण। उ०— हंसे हँसत अनरसे अनरसत प्रतिबिंबन ज्यों झाँई।—तुलसी (शब्द०)। ५. झलक।

प्रतिबिंबक
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिबिम्बक] परछाईं के समान पीछे पीछे चलनेवाला। अनुगामी।

प्रतिबिंबन
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिबिम्बन] २. प्रतिबिंब करने की क्रिया या स्थिति। २. प्रातिच्छायित होना। ३. तुलना। समता [को०]।

प्रतिबिंबवाद
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिबिम्बवाद] १. वेदांत का वह सिद्धांत जिसके अनुसार यह माना जाता है कि जीव वास्तव में ईश्वर का प्रतिबिंब मात्र है। २. एक साहित्यिक विचारधारा।

प्रतिबिंबित
वि० [सं० प्रतिबिम्बित] १. जिसका प्रतिबिंब पड़ता हो। जिसकी परछाँही पड़ती हो। २. जो परछाँही के कारण दिखाई पड़ता हो। ३. जो झलकता हो। जो कुछ स्पष्ट रूप से व्यक्त होता हो। जिसका आभास मिलता हो।

प्रतिबिंबी पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रतबिम्ब + हिं० ई (प्रत्य०)] दर्पण। शीशा। उ०—प्रतिबिंबी आदरस पुनि मृकुर सुकर तिय लेत।— अनेकार्थ०, पृ० ३६।

प्रतिबीज
वि० [सं०] जिसका बीज नष्ट हो गया हो। जिसकी उत्पन्न करने की शक्ति नष्ट हो गई हो।

प्रतिबुद्ध
वि० [सं०] १. जाग हुआ। २. जो जाना हुआ हो। प्रसिद्ध। ३. जिसकी उन्नति हुई हो। उन्नत। ४. प्रफुल्ल। विकसित (को०)।

प्रतिबुद्धि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. विपरीत बुद्धि। उलटी समझ। २. प्रतिबोध। जागरण (को०)।

प्रतिबेंबु ‡
संज्ञा पुं० [हिं०] छाय़ा। प्रतिबिंब। परछाई। उ०— जेव प्रतिबेंबु सभनि में भासे प्रतिमा को गुन गैऊ।—सं० दरिया, पृ० १४७।

प्रतिबोध
संज्ञा पुं० [सं०] १. जागरण। जागना। २. ज्ञान। समझ। ३. स्मृति या स्मरण।

प्रतिबोधक
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो प्रतिबोध करावे। २. जगानेवाला। ज्ञान उत्पन्न करनेवाला। ४. शिक्षा देनेवाला। ५. तिरस्कार करनेवाला।

प्रतिबोधन
संज्ञा पुं० [सं०] जगाना। ज्ञान उत्पन्न कराना।

प्रतिब्यंब पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'प्रतिबिंब'। उ०— झलकंत बगत्तर टोप झिखै। रस चाह निसा प्रतिर्ब्यब रखै।—रा० रू०, पृ० ३३।

प्रतिभट
संज्ञा पुं० [सं०] १. बराबर का योद्धा। समान शक्तिवाला योद्धा। उ०— जोहि कहुँ नहिं प्रतिभट जग जाता।— मानस, १। १८०। २. वह जिससे युद्ध होता हो। मुकाबला करनेवाला। उ०— प्रतिभट खोजत कतहुँ न पावा।—मानस, १। १८२। ३. शत्रु। वैरी। दुश्मन।

प्रतिभटता
संज्ञा स्त्री० [सं०] वैर। शत्रुता। दुश्मनी।

प्रतिभय (१)
वि० [सं०] भयंकर।

प्रतिभय (२)
संज्ञा पुं० भय। डर।

प्रतिभा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बुदि्ध। समझ। २. वह असाधारण मानसिक शक्ति जिसकी सहायता से मनुष्य आपसे आप, विशेष प्रयत्न किए बिना ही, किसी काम में बहुत अधिक योग्यता प्राप्त कर लेता और दूसरों से आगे बढ़ जाता है। असाधारण बुदि्धबल या योग्यता जिसकी अभिव्यक्ति बहुधा साहित्य, कला या विज्ञान आदि में होती है। यौ०—प्रतिभाशाली। प्रतिभावान्। ३. दीप्ति। चमक। (क्व०)। ४. उपयुक्तता। औचित्य (को०)।

प्रतिभाकूट
संज्ञा पुं० [सं०] एक बोधिसत्व का नाम।

प्रतिभात
वि० १. चमकीला। ज्योतिर्मय। २. ज्ञात। समझा हुआ। उ०— किंतु भूप को हाय न यह कुछ ज्ञात था, काश्यप दर्शन योगमात्र प्रतिभात था।— शकुं०, पृ० ४६।

प्रतिभान
संज्ञा पुं० [सं०] १. बुद्धि। समझ। २. प्रभा। चमक। ३. प्रतीत होना। जान पड़ना (को०)। ४. प्रगल्भता (को०)।

प्रतिभानवान्
वि० [सं०] १. प्रतिभान या प्रतिभायुक्त। २. द्युतिमान्। ३. प्रगल्भ (को०)।

प्रतिभानु
संज्ञा पुं० [सं०] सत्यभामा के गर्भ से उत्पन्न श्रीकृष्ण के एक पुत्र का नाम।

प्रतिभान्वित
वि० [सं०] जिसमें प्रतिभा हो। प्रतिभाशाली।

प्रतिभामुख
वि० [सं०] १. प्रत्युत्पन्न मति।। कुशाग्रबुद्धि। २. धृष्ट। प्रगल्भ [को०]।

प्रतिभावान्
वि० [सं० प्रतिभावन्] १. प्रातिभान्वित। प्रतिभाशाली। जिसमें प्रतिभा हो। २. दीप्तिमान्। चमकदार। ३. प्रगल्भ (को०)।

प्रतिभाशाली
वि० [सं० प्रतिभाशालिन्] [वि० स्त्री० प्रतिभाशालिनी] जिसमें प्रतिभा हो। प्रतिभायुक्त।

प्रतिभाषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. उत्तर। जावब। २. वह जो किसी उत्तर के उत्तर में कहाँ जाय। प्रत्युत्तर। वादी का कथन। मुद्दई का बयान।

प्रतिभासंपन्न
वि० [सं० प्रतिभासम्पन्न] जिसमें प्रतिभा हो। प्रतिभाशाली।

प्रतिभास
संज्ञा पुं० [सं०] १. आकृति। आकार। २. भ्रम। धोखा। मिथ्यज्ञान। ३. प्रकाश। चमक।

प्रतिभासन
संज्ञा पुं० [सं०] जान पड़ना। प्रतीत होना। द्योतित होना। व्यक्त होना।

प्रतिभाहानि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रतिभा की हानि। बुदि्धहीनता। बुदि्ध का अभाव। २. प्रकाश पर द्युति का अभाव। अंधकार। अँधेरा [को०]।

प्रतिभिन्न
वि० [सं०] १. विभक्त। जो अलग हो गया हो। विभाजित। २. जिसका भेदन किया गया हो (को०)।

प्रतिभू
संज्ञा पुं० [सं०] व्यवहार शास्त्र में वह व्यक्ति जो ऋण देनेवाले (उत्तमर्ण) के सामने ऋण लेनेवाले (अधमर्ण) की जमानत करे। जमानत में पड़नेवाला। जामिन। लग्नक।

प्रतिभेद
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रभेद। अंदर। फर्क। २. आविष्कार। रबस्य का स्पष्टीकरण (को०)।

प्रतिभेदन
संज्ञा पुं० [सं०] १. विभाग करना। भेद उत्पन्न करना। २. खोलना। ३. विदार्ण करना। फाड़ना (को०)।

प्रतिभोग
संज्ञा पुं० [सं०] उपभोग।

प्रतिभोजन
संज्ञा पुं० [सं०] विहित आहार [को०]।

प्रतिमंडक
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिमण्डक] शालक राग का एक भेद।

प्रतिमंडल
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिमण्डल] सूर्य आदि चमकते हुए मंडल का घेरा। परिवेश।

प्रतिमंडित
वि० [सं० प्रतिमण्डित] अंलकृत। मंडित [को०]।

प्रतिमंत्रित
वि० [सं० प्रतिमान्त्रित] मंत्र से पवित्र किया हुआ।

प्रतिम
अव्य० [सं०] समान। सदृश। विशेष— इस शब्द का व्यवहार केवल यौगिक में, शब्द के अंत में होता है। जैसे, मेघपतिम = मेघ के समान।

प्रतिमत
संज्ञा पुं० [सं० प्रति + मत] भिन्न मत। विरोधी मत। उ०— यदि हम काव्य संबंधी इन विविध संप्रदायों के उक्त प्रारंभिक निरूपणों को उनका मत मानें तो ये द्वितीय स्थिति के विवेचन प्रतिमत कहे जा सकते है।—न० सा० न० पृ०, पृ० २३।

प्रतिमर्श
संज्ञा पुं० [सं०] सुश्रुत के अनुसार एक प्रकार की शिरो- वस्ति यो नस्य फे पाँच भेदों के अंतर्गत है। विशेष— प्रतिमर्श प्रायः प्रातःकाल सोकर उठने के समय, नहाने धोने, या दिन को सोकर उठने के उपरांत अथवा संध्या समय किया जात है। इसमें ओषधियाँ ड़ालकर पकाया हुआ घी नाक के। नालो में चढ़ाया जाता है जिससे नाक का मल निकल जाता है, दाँत मजबूत होते हैं, आँखों की ज्योति बढ़ती है, और शरीर हलका हो जाता है। भिन्न भिन्न समय के प्रतिमर्श का भिन्न भिन्न परिणाम बतलाया गया है।

प्रतिमल्ल
संज्ञा पुं० [सं०] विरोधी मल्ल। प्रतिस्पर्धी योद्धा [को०]।

प्रतिमा
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी की वास्तविक अथवा कल्पित आकृति के अनुसार बनाई हुई मूर्ति या चित्र आदि। अनुकृति।२. मिट्टी, पत्थर या धातु आदि की बनी हुई देवताओं की मूर्ति जिसकी स्थापना या प्रतिष्ठा करके पूजन किया जाता हो। देवमूर्ति। ३. प्रतिबिंब। छाया। ४. हाथियों के दाँत पर का पीतल या ताँबे आदि का बंधन। ४. तौलने का बाट। बटखरा। माप। ६. प्रतीक। चिह्न (को०)। ७. साहित्य का एक अलंकार जिसमे किसी मुख्य पदार्थ या व्यक्ति की स्थापना का वर्णन होता है। जैसे,—'हौं जीवित हौं जगत में अलि याही आधार। प्रानपिया उनिहार यह ननदी बदन अधार'। इसमें विदेश गए हुए पति के अभाव में नायिका ने पति के समान आकृतिवाली ननद को हो उसका स्थानापन्न बनाया है, इसलिये यह प्रतिमा अलंकार है। यौ०— प्रतिभागत = चित्र या मूर्ति में स्थित। प्रतिमाचंद्र = चंद्रमा का प्रतिबिंब। प्रतिमापरिचारक = मूर्ति की सेवा करनेवाला। पूजारी। प्रतिमापूजन, प्रतिमापूजा = मूर्तिपूजा।

प्रतिमान
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रतिबिंब। परछाँही। २. हाथी का मस्तक। हाथी के दोनों बड़े दाँतों के बीच का स्थान। ३. समानता। बराबरी। ४. दुष्टांत। उदाहरण। ५. प्रतिनिधि। ६. बटखरा। मान। बाट (को०)। ७. विरोधी। शत्रु। दुश्मन (को०)। ८. चित्र। अनुकृति। मूर्ति। प्रतिमा (को०)।

प्रतिमानीकरण
संज्ञा पुं० [सं० प्रातिमान + करण] प्रतिमान स्थिर करना। स्वरूप या व्यवस्था निश्चित करना। कसौटी उपस्थित करना।

प्रतिमाया
संज्ञा स्त्री० [सं०] माया के उत्तर में माया। इंद्रजाल या जादू का जवाबी जादू [को०]।

प्रतिमाला
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्मरण शक्ति का परिचय देने के लिये दो आगामियों का एक दूसरे के पोछे लगातार श्लोक या कविता पढ़ना। विशेष— कभी कभी एक के श्लोक का अंतिम अक्षर लेकर दूसरा उसी अक्षर से आरंभ करनेवाला श्लोक पढ़ता है। उसे अत्यांक्षरी कहते हैं। जो आगे नहीं कह सकता उसकी हार समझी जाती है।

प्रतिमास
अव्य० [सं०] प्रत्येक महीने में। हर महीने।

प्रतिमास्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. महाभारत के अनुसार एक प्राचीन देश का नाम। २. इस देश का निवासी।

प्रतिमित
वि० [सं०] १. जिसका अनुकरण किया गया हो। जिसकी नकल की गई हो। २. जिसकी तुलना की गई हो। ३. प्रतिबिंबित। प्रतिच्छायित [को०]।

प्रतिमुक्त
वि० [सं०] १. पहना हुआ (कपड़ा आदि)। २. जिसका त्याग कर दिया गया हो। जो छोड़ दिया गया हो। ३. जो बँधा हुआ हो। ४. जो फेंका हुआ हो। प्रक्षिप्त (को०)। ५. मुक्त। स्वतंत्र किया हुआ (को०)।

प्रतिमुख (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. नाटक की पाँच अंगसंधियों में से एक जिसमें विलास, परिसर्प नर्म (परिहास), प्रगमन, विरोध, पर्युपासन, पुष्प, वज्र, उपन्यास और वर्णसंहार आदि का वर्णन होता है। २. किसी चीज का पीछे का भाग। ३. प्रश्न का उत्तर (को०)।

प्रतिमुख (२)
वि० १. सामने खड़ा हुआ। संमुख उपस्थित। २. नज- दीक। निकटस्थ। समीप [को०]।

प्रतिमुद्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] मुहर का चिह्न [को०]।

प्रतिमूर्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] किसी की आकृति को देखकर बनाई हुई मूर्ति या चित्र आदि। प्रतिमा।

प्रतिमूषिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार का चूहा।

प्रतिमोक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] मुक्ति। मोक्ष की प्राप्ति।

प्रतिमोक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रतिमोक्ष'।

प्रतिमोचन
संज्ञा पुं० [सं०] १. खोलना। बंधन से मुक्त करना। २. प्रतिकार। बदला (को०)।

प्रतिमोचित
वि० [सं०] बंधनमुक्त। मुक्त किया हुआ [को०]।

प्रतियत्न
संज्ञा पुं० [सं०] १. लालच। प्राप्ति या लाभ की इच्छा। २. उपग्रह। ३. कैदी। बंदी। ४. संस्कार। ५. प्रयत्न। चेष्टा। उद्योग। (को०)। ६. रचना। निर्माण (को०)। ७. प्रतीकार (को०)। ८. निग्रह (को०)।

प्रतियाग
संज्ञा पुं० [सं०] वह यज्ञ जो किसी विशेष उद्देश्य से किया जाय [को०]।

प्रतियातन
संज्ञा पुं० [सं०] बदला लेना। प्रतिशोध [को०]।

प्रतियातना
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रतिमा। मूर्ति। २. तुल्य या समान पीड़ा (को०)।

प्रतियान
संज्ञा पुं० [सं०] लौटना। वापस आना।

प्रतियाम
क्रि० वि० [सं०] प्रत्येक पहर। हर समय। उ०— कामना काम प्रतियाम मानव सहे, विश्व होकर रहे स्वर्ग का सुस्थान।—आराधना,, पृ० ३४।

प्रतियुद्ध
संज्ञा पुं० [सं०] बराबरी का युद्ध।

प्रतियूत
वि० [सं०] संयुक्त। बँधा हुआ [को०]।

प्रतियूथप
संज्ञा पुं० [सं०] शत्रु पक्ष के हाथियों के समूह का नायक [को०]।

प्रतियोग
संज्ञा पुं० [सं०] १. शत्रुता। विरोधी पदार्थों का संयोग। ३. वह जिससे किसी पदार्थ का परिणाम नष्ट हो जाय। मारक। ४. वह उद्योग जो फिर से किया जाय। पुनरुद्योग। ५. सहयोग। सहायता।

प्रतियोगिता
[सं०] १. प्रतिद्वंद्विता। चढ़ा ऊपरी। मुकाबला। २. विशेध। शत्रुता।

प्रतियोगी (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. हिस्सेदार। शरीक। २. शत्रु। विरोधी। बैरी। ३. सहायक। मददगार। ४. साथी। ५. बराबरवाला। जोड़ का। प्रतिद्वंद्वी।

प्रतियोगी (२)
वि० १. मुकाबले का। बराबरी का। २. मुकाबला करनेवाला। सामना करनेवाला।

प्रतियोद्धा
संज्ञा पुं० [सं० प्रतियोद्धृ] १. शत्रु। विरोधी। २. मुकाबिले का। बराबर का लड़नेवाला।

प्रतियोध
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रतियोद्धा' [को०]।

प्रतियोधन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रतियुद्ध' [को०]।

प्रतियोधी
संज्ञा पुं० [सं० प्रतियोधिन्] दे० 'प्रतियोद्धा' [को०]।

प्रतिरंभ
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिरम्भ] दे० प्रतिलंभ' [को०]।

प्रतिरक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] रक्षा। हिफाजत।

प्रतिरक्षा
संज्ञा पुं० [सं०] रक्षा। हिफाजत।

प्रतिरथ
संज्ञा पुं० [सं०] १. बराबरी का लड़नेवाला। वह जो मुकाबला करे, विशेषतः रयी। २. पुराणनुसार यदुवंशी वज्राश्व के पुत्र का नाम।

प्रतिरव
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रतिध्वनि। २. प्राण। ३. झगड़ा। मतभेद [को०]।

प्रतिरसित
संज्ञा पुं० [सं०] प्रतिध्वनि।

प्रतिराज
संज्ञा पुं० [सं०] शत्रु राजा।

प्रतिरात्र
क्रि० वि० [सं०] हर रात। प्रत्येक रात [को०]।

प्रतिरुद्ध
वि० [सं०] १. अवरुद्ध। रुका हुआ। २. फँसा हुआ। अटका हुआ। घिरा हुआ। बाधित।

प्रतिरूप (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रतिमा। मूर्ति। २. तसवीर। चित्र। ३. प्रतिनिधि। ४. वह जो रूप, आकार आदि में किसी के तुल्य हो (को०)। ५. महाभारत के अनुसार एक दानव का नाम।

प्रतिरूप (२)
वि० १. समान। एकरूप। वैसा ही। २. सुंदर। ३. उपयुक्त। अनुकूल। ४. संमुख। सामने। अभिमुख [को०]।

प्रतिरूपक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रतिच्छाया। प्रतिबिंब। २. चित्र। मूर्ति [को०]।

प्रतिरूपक
वि० सं० दे० 'प्रतिरूप'।

प्रतिरोद्धा
वि० [सं० प्रतिरोद्धृ] १. विरोधी। शत्रुता करनेवाला। २. बावा डालनेवाला। रोकनेवाला।

प्रतिरोध
संज्ञा पुं० [सं०] १. विरोध। २. रुकवट। रोक। बाधा। ३. तिरस्कार। ४. प्रतिबिंब। ५. चोरी। डकैती (को०)। ६. प्रतिबंध (को०)। ७. घेरना। घेर लेना (को०)।

प्रतिरोधक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० प्रतिरोधिका] १. वह जो प्रतिरोध करे। रोकने या बाधा डालनेवाला। बाधक। २. चोर, ठग ड़ाकू आदि। ३. विरोधी। वह जो विरोध करे (को०)। ४. घेरने या आवृत करनेवाला।

प्रतिरोधक (२)
वि० रोकनेवाला। अवरोध करनेवाला। बाधक।

प्रतिरोधन
संज्ञा पुं० [सं०] प्रतिरोध करने की क्रिया या भाव।

प्रतिरोधित
वि० [सं०] जो रोका गया हो। जिसमें बाधा डाली गई हो।

प्रतिरोधी (२)
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिरोधन्] दे० 'प्रतिरोधक'।

प्रतिरोपित
वि० [सं०] जो पुनः रोपा गया हो, जैसे पौधा।

प्रतिलंभ
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिलभ्म] १. बुरी चाल। कुरीति। २. दोष। कलंक। इलजाम। ३. प्राप्ति। लाभ। ४. निंदा। दुर्वचन। कुवाच्या। गाली।

प्रतिलक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] लक्ष्म। चिह्न [को०]।

प्रतिलाभ
संज्ञा पुं० [सं०] १. शालक राग का एक भेद। २. लाभ। प्राप्ति। पाना। फिर से प्राप्त करना। उ०— जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई।— मानस ६।

प्रतिलिखित
वि० [सं०] उत्तरित। जिसका उत्तर दिया गया हो [को०]।

प्रतिलिपि
संज्ञा स्त्री० [सं०] लेख की नकल। किसी लिखी हुई चीज की नकल। जैसे,— उस पत्र की एक प्रतिलिपि मेरे पास भी आई है।

प्रतिलोम (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. कमीन मनुष्य। नीच आदमी। २. कौटिल्य के अनसार 'उपाय' में बताई हुई युक्तियों से उलटी युक्ति। कौटिल्य ने इसके १५ भेद बतलाए हैं।

प्रतिलोम (२)
वि० १. प्रतिकूल। विपरीत। २. जो नीचे से ऊपर की ओर गया ही। जो सीधा न हो। उलटा। ३. नीच। ४. अनुलोम का उलटा। ५. वाम। बायाँ (को०)।

प्रतिलोमक (१)
वि० [सं०] विपरीत। उलटा [को०]।

प्रातिलोमक (२)
संज्ञा पुं० उलटा क्रम। विपरीत क्रम [को०]।

प्रतिलोमज
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जिसके पिता और माता दोनों अलग अलग जाति के हों। वर्णसंकर।२. नीच वर्ण के पुरुष और उच्च वर्ण की कन्या से उत्पन संतान। जैसे,— सूत— श्रत्रिय पिता और ब्रह्माणी माता से उत्पन्न। वैदेहिक—वैश्य। चांड़ल—शूद्र। मागध—वैश्य क्षत्रिया । क्षत्ता— शूद्र । आयोगव— वैश्या ।

प्रतिलोम विवाह
संज्ञा पुं० [सं०] वह विवाह जिसमें पुरुष नीच वर्ण का और स्त्री उच्चा वर्ण की हो।

प्रतिवक्ता
वि०, संज्ञा पुं० [सं० प्रतिवक्तृ] १. उत्तर देनेवाला। २. विधि आदि की व्याख्या करनेवाला [को०]।

प्रतिवच
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिवचस्] दे० 'प्रतिवचन' [को०]।

प्रतिवचन
संज्ञा पुं० [सं०] १. उत्तर। जवाब। २. प्रतिध्वनि।

प्रतिवनिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] सपत्नी। सौत [को०]।

प्रतिवत्सर
क्रि० वि० [सं०] प्रत्येक वर्ष। हर साल। प्रति वर्ष।

प्रतिवर्णिक
वि० [सं०] समान रंगवाला। तुल्य। सदृश [को०]।

प्रतिवर्तन, प्रतिवर्त्तन
संज्ञा पुं० [सं०] लौट आना। वापस आना। उ०— दोनों का समुचित प्रतिवर्तन जीवन में शुद्ध विकास हुआ।—कामायनी, पृ० ७६।

प्रतिवर्धी
वि० [सं० प्रतिवर्धन] जोड़। बराबरी का [को०]।

प्रतिवसथ
संज्ञा पुं० [सं०] गाँव। ग्राम।

प्रतिवस्तु
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. समान वस्तु। सदृश वस्तु। २. वह वस्तु जो बदले में दी जाय। ३. (साहित्य में) उपमान। [को०]।

प्रतिवस्तूपम पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'प्रतिवस्तूपमा'। उ०— वाक्यन को जुग होत जहँ, एकै अरथ समान। जुदो जुदो करि भाषिए प्रतिवस्तूपम जान।—भूषण ग्रं०, पृ० ९९।

प्रतिवस्तूपमा
संज्ञा पुं० [सं०] वह काव्यालंकार जिसमें उपमेय और उपमा के साधारण धर्म का वर्णन अलग अलग वाक्यों में किया जाय। जैसे, सोहत भानु प्रताप सो लसत चाप सों शूर ('तापेन भ्राजते सूर्यः शूरश्चापेन राजते'— चंद्रलोक, ५। ४८।) यहाँ दोहे का पूर्वार्ध उपमान वाक्य है और उत्तरादर्ध उपमेय। एक में 'सोहत' और दूसरे में 'लसत' शब्द द्वारा साधारण धर्म कहा गया है।

प्रतिवहन
संज्ञा पुं० [सं०] उलटी ओर ले जाना। विरुद्ध दिशा में ले जाना।

प्रतिवाक
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रतिवाच्] उत्तर। जवाब [को०]।

प्रतिवाक्य (१)
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रतिवचन'।

प्रतिवाक्य (२)
वि० उत्तर देने योग्य। जवाब देने लायक [को०]।

प्रतिवाणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] किसी उत्तर को सुनकर कही हुई बात। प्रत्युत्तर।

प्रतिवात
संज्ञा पुं० [सं०] १. बेल का पेड़। २. विपरीत वायु। सामने की हवा (को०)।

प्रतिवाद
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह बात जो किसी दूसरी बात अथवा सिद्धातं का विरोध करने के लिये कही जाय। वह कथन जो किसी मत को मिथ्या ठहराने के लिये हो। विरोध खंडन। जैसे,—अनेक पत्रों ने उस समाचार का प्रतिवाद किया है। २. विवाद। बहस। ३. उत्तर। जवाब।

प्रतिवादक
संज्ञा पुं० [सं०] प्रतिवाद करनेवाला। वह जो प्रतिवाद करे।

प्रतिवादिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रातिवाद का भाव। २. प्रतिवादी का धर्म।

प्रतिवादी
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिवादिन्] १. वह जो प्रतिवाद करे। प्रतिवाद या खंडन करनेवाला। २. वह जो किसी बात में तर्क करे। ३. वह जो वादी की बात का उत्तर दे। प्रतिपक्षी ४. शत्रु। विरोधी (को०)।

प्रतिवाप
संज्ञा पुं० [सं०] १. ओषधियों का वह चूर्ण जो कीसी काढ़े आदि में डाला जाय। २. कल्क। ३. धातु को भस्म करने का काम। ४. चूर्ण। बुकनी।

प्रतिवार (१)
संज्ञा पुं० [सं०] दूर रखना। रक्षा करना। बचाना [को०]।

प्रतिवार (२)
क्रि० वि० [सं०] प्रतिदिन। रोज रोज [को०]।

प्रतिवारण
संज्ञा पुं० [दे०] १. रोकना। मना करना। २. शत्रु का हाथी (को०)।

प्रतिवारित
वि० [सं०] रोका हुआ। निवारित किया हुआ [को०]।

प्रतिवार्ता
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रत्युत्तर संवाद या समाचार [को०]।

प्रतिवास
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सुगंध। सुवास। खुशबू। २. पड़ोस। समीप का निवास।

प्रतिवासर
क्रि० वि० [सं०] हर दिन। रोज रोज [को०]।

प्रतिवासरिक
वि० [सं०] प्रतिदिन का। नित्य का। दैनिक।

प्रतिवासित
वि० [सं०] जो बसाया गया हो। जो आबाद किया गया हो [को०]।

प्रतिवासिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] पड़ोस का निवास या रहना। प्रति वास का भाव।

प्रतिवासी
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिवसिन्] [स्त्री० प्रतिवासिनी] पड़ोस में रहनेवाला। पड़ोसी।

प्रतिवासुदेव
संज्ञा पुं० [सं०] जैनियों के अनुसार विष्णु या वासु- देव के नौ शत्रु जो नरक में गए थे। इनके नाम इस प्रकार हैं— (१) अश्वग्रीव, (२) तारप, (३) मोदक, (४) मधु, (५) निशुंभ, (६) बलि, (७) प्रह्लाद, (८) रावण ओर (९) जरासंध।

प्रतिवाह
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार अक्रूर के एक भाई का नाम।

प्रतिवाहु
संज्ञा पुं० [सं०] एक यादव का नाम।

प्रतिविध्य
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिविन्ध्य] द्रौपदी के गर्भ से उत्पन्न युधिष्टिर के पुत्र का नाम।

प्रतिविंव
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिविम्व] दे० 'प्रतिबिंब'।

प्रतिविघात
संज्ञा पुं० [सं०] प्रत्याघात। निवारण। रोकना।(को०)।

प्रतिविधान
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रतीकार। उ०— प्रतिविधान मैं कया करूँ बता, इस अनर्थ का भी कहीं पता।—साकेत, पृ० ३१४। २. चौकसी। एहतियात। सावधानी (को०)।

प्रतिविधि
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रतीकार।

प्रतिविधित्सा
संज्ञा स्त्री० [सं०] विरोध या बदले की इच्छा [को०]।

प्रतिविधिस्तु
वि० [सं०] प्रतिकारेच्छु।

प्रतिविरुद्ध
वि० [सं०] विरोधी। विद्रोही [को०]।

प्रतिविशिष्ट
वि० [सं०] १. अत्युत्तम। सर्वोत्तम। २. असाधारण अच्छा या बुरा [को०]।

प्रतिविष
संज्ञा पुं० [सं०] वह वस्तु या पदार्थ जिससे विष का असर दूर हो [को०]।

प्रतिविषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] वितूला। अतिविषा। अतीस।

प्रतिविष्णु
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु के प्रतिद्वंद्वी राजा मुचकुंद का एक नाम।

प्रतिविष्णुक
संज्ञा पुं० [सं०] मुचकुंद नामक फूल का पौधा।

प्रतिविहित
वि० [सं०] निवारित [को०]।

प्रतिवीत
वि० [सं०] आच्छादित। आवृत। ढँका या दबाया हुआ [को०]।

प्रतिवीर
संज्ञा पुं० [सं०] प्रतिपक्षी योद्धा। विरोधी व्यक्ति [को०]।

प्रतिवीर्य
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिवीर्य्य] वह जिसमें प्रतिरोध करने के लिये यथेष्ट बल हो।

प्रतिवृष
संज्ञा पुं० [सं०] शत्रुपक्षीप साँड़। बैल।

प्रतिवेदित
वि० [सं०] जाना या जनाया हुआ। ज्ञात।

प्रतिवेदी
वि० [सं०] जानने समझनेवाला। ज्ञाता।

प्रतिवेल
क्रि० वि० [सं०] हर समय। प्रति काल [को०]।

प्रतिवेश
संज्ञा पुं० [सं०] १. पड़ोस। २. घर के सामने या पास का घर। पड़ोस का मकान।

प्रतिवेशी
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिवोशिन्] [स्त्री० प्रतिवेशिनी] पड़ोस में रहनेवाला। पड़ोसी।

प्रतिवेश्म (१)
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिवेश्मन्] दे० 'प्रतिवेश'।

प्रतिवेश्म (२)
क्रि० वि० [सं०] घर घर। मकान मकान [को०]।

प्रतिवेश्य
संज्ञा पुं० [सं०] पड़ोसी [को०]।

प्रतिवैर
संज्ञा पुं० [सं०] बदला। बैर का प्रतिशोध [को०]।

प्रतिव्यूढ
वि० [सं०] व्यूह बद्ध। अपने अपने निर्धारित क्रम के अनुसार स्थित [को०]।

प्रतिव्यूह
संज्ञा पुं० [सं०] व्यूह का निर्माण। व्यूहन। २. झुंड़। समूह [को०]।

प्रतिशंका
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रतिशङ्कन] वह शंका जो बराबर बनी रहे।

प्रतिशब्द
संज्ञा पुं० [सं०] प्रतिध्वनि। गूँज।

प्रतिशम
संज्ञा पुं० [सं०] १. नाश। २. मुक्ति।

प्रतिशयन
संज्ञा पुं० [सं०] किसी कामना की सिदि्ध की इच्छा से देवता के स्थान पर खाना पीना छोड़कर पड़ा रहना। धरना देना।

प्रतिशयित
वि० [सं०] प्रतिशयन करनेवाला। कामनासिद्धि के लिये धरना देनेवाला [को०]।

प्रतिशाखा
संज्ञा स्त्री० [सं०] शाखा से निकली हुई शाखा। प्रशाखा [को०]।

प्रतिशाप
संज्ञा पुं० [सं०] शाप के बदले में दिया जानेवाला शाप [को०]।

प्रतिशासन
संज्ञा पुं० [सं०] भृत्यु आदि को भेजना। किसी कार्य से सेवक या अपने से छोटे को बुलाकर भेजना। २. आदेश देना। आज्ञा देना। ३. विरोधी शासन या दूसरे का शासन [को०]।

प्रतिशास्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] भृत्यादी द्वारा समाचार भेजना [को०]।

प्रतिशिष्ट
वि० [सं०] १. प्रसिद्ध। विख्यात। २. अस्वीकृत। प्रत्याख्यात। निराकृत। ३. प्रेषित। भेजा हुआ (दूत आदि)।

प्रतिशिष्य
संज्ञा पुं० [सं०] शिष्य का शिष्य।

प्रतिशीन
वि० [सं०] तरल। पिघला हुआ। चूनेवाला। क्षरण- शील [को०]।

प्रतिशीर्षक
संज्ञा पुं० [सं०] निष्क्रय (को०)।

प्रतिशोध
संज्ञा पुं० [सं० प्रति + शोध] वह काम जो किसी बात का बदला चुकाने के लिये किया जाय। बदला। विशेष— संस्कृत में यह शब्द इस अर्थ में नहीं मिलता। हिंदी में बँगला से आया हुआ जान पड़ता है।

प्रतिश्या, प्रतिश्यान
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'प्रतिश्याय'।

प्रतिश्याय
संज्ञा पुं० [सं०] १. जुकाम। सरदी। २. पीनस रोग।

प्रतिश्रम
संज्ञा पुं० [सं०] परिश्रम। मेहनत।

प्रतिश्रय
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह स्यान जहाँ यज्ञ होता है। यज्ञशाला। २. सभा। ३. स्थान। ४. निवास। गृह। घर ५. आसरा। सहारा। आश्रय (को०)। ६. वादा। वचन (को०) ७. सहायता। मदद (को०)।

प्रतिश्रयण
संज्ञा पुं० [सं०] स्वीकृति। मंजूरी।

प्रतिश्रव
संज्ञा पुं० [सं०] १. अंगीकर। स्वीकृति। मंजूरी। २. प्रतिज्ञा। ३. प्रतिध्वनि [को०]।

प्रतिश्रवण
संज्ञा पुं० [सं०] १. श्रवण करना। सुनना। २. प्रतिज्ञा। ३. मजूरी देना। स्वीकार करना। ४. बनाए रखना। रक्षा करना [को०]।

प्रतिश्रुत्
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'प्रतिश्रुति'।

प्रतिश्रुत
वि० [सं०] स्वीकार किया हुआ। मंजूर किया हुआ। प्रतिज्ञात।

प्रतिश्रुति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रतिध्वनि। २. प्रतिज्ञा। इकरार। ३. रजामंदी। मंजूरी। स्वीकृति। अनुमति। ४. वसुदेव के एक पुत्र का नाम।

प्रतिश्रुत्का
संज्ञा पुं० [सं०] एक वैदिक देवता।

प्रतिश्रोता
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिश्रोतृ] अनुमति देनेवाला। मंजूर करनेवाला।

प्रतिषिद्ध
वि० [सं०] जिसके विषय में प्रतिषेध किया गया हो। निषिद्ध। २. खंडित (को०)।

प्रतिषेद्धा
वि०, संज्ञा पुं० [सं० प्रतिषेद्धृ] प्रतिषेध करनेवाला। प्रतिषेधक [को०]।

प्रतिषेध
संज्ञा पुं० [सं०] १. निषेध। मनाही। उ०— प्रतिषेध आपका भी न सुनूँगा रण में।—साकेत, पृ० २१९। २. खंड़न। ३. एक प्रकार का अर्थालंकार जिसमें किसी प्रसिद्ध निषेध या अंतर का इस प्रकार उल्लेख किया जाय जिससे उसका कुछ विशेष अर्थ निकले। जैसे, सिय कंकण को छोरिबो धनुष तोरिबी नाहिं। यहाँ यह तो सिद्ध ही है कि धनुष तोड़ना और बात है; और कंकण खोलना और बात। पर इस कथन से यहाँ यह तात्पर्य है कि आप धनुष तो़ड़ने में वीर हो सकते हैं, पर यह विरता ककण खोलने में काम न आवेगी।

प्रतिषेधक
संज्ञा पुं० [सं०] प्रतिषेध करनेवाला। मान करनेवाला। रोकनेवाला।

प्रतिषेधन
संज्ञा पुं० [सं०] प्रतिषेध करने की क्रिया या स्थिति [को०]।

प्रतिषेधाक्षर
संज्ञा पुं० [सं०] प्रतिषेध या निषेध करनेवाले शब्द या वर्ण [को०]।

प्रतिषेधोपमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] उपमा अलंकार का एक भेद। निषेध द्वारा तुलना [को०]।

प्रतिष्क
संज्ञा पुं० [सं०] दूत। चर।

प्रतिष्कश
संज्ञा पुं० [सं०] १. खुफिया। गुप्तचर। दूत। २. कोड़ा। चाबुक [को०]।

प्रतिष्कष
संज्ञा पुं० [सं०] चाबुक। चमड़े का कोड़ा [को०]।

प्रतिष्कस
संज्ञा पुं० [सं०] चर। दूत [को०]।

प्रतिष्टंभ
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिष्टम्भ] १. स्तब्ध या निश्चल होने की क्रिया या भाव। २. प्रतिबंध। रोक [को०]।

प्रतिष्टब्ध
वि० [सं०] स्तंभित। रुका या रोका हुआ [को०]।

प्रतिष्ठ (१)
वि० [सं०] प्रसिद्ध। प्रख्यात। मशहूर।

प्रतिष्ठ (२)
संज्ञा पुं० जौनियों के अनुसार सुपार्श्व नामक वृत्तार्हत के पिता का नाम।

प्रतिष्ठा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. स्थापना। रखा जाना। २. स्थिति। ठहराव। ३. देवता की प्रतिमा की स्थापना। ४. स्थान। जगह। ५. मानमर्यादा। गौरव। ६. प्रख्याति। प्रसिद्धि। ७. यश। कीर्ति। ८. आदर। सत्कार। इज्जत। ९. मंदिरों की वृत्ति। आश्रय। ठिकाना। १०. यज्ञ की समाप्ति। ११. शरीर। १२. पृथ्वी। १३. व्रत का उद्यापन। १४. एक प्रकार का छंद। १५. चार वर्णों का वृत्त। १६. वह उपहार जो बर का बड़ा भाई वधू को देता है। १७. पैर। पाद (को०)। १८. निवास। घर (को०)। १९. संस्कार विशेष (को०) २०. परिधि। सीमा (को०)।

प्रतिष्ठाता
वि० [सं०प्रतिष्ठातृ] प्रतिष्ठित करनेवाला। नींव डालनेवाला। उ०— स्पितंन जरथुस्त्र, मज्दा मत का प्रति- ष्ठाता उससे पहले ही हुआ था।— प्रा० भा०, प०, पृ०, ७४।

प्रतिष्ठान
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्थापित या प्रतिष्ठित करने की क्रिया। रखना। बैठना। स्थापन। २. देवमूर्ति की स्थापना। ३. जड़। नींव। मूल। ४. पदवी। ५. स्थान। जगह। ६. वह कृत्य जो व्रत आदि की समाप्ति पर किया जाय। व्रत आदि का उद्यापन। ७. संस्थान। ८. कोई व्यापारिक संस्था या संघटन। ९. दे० 'प्रतिष्ठानपुर'।

प्रतिष्ठानपुर
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्राचीन काल का एक नगर। विशेष—यह नगर गंगा यमुना के संगम पर वर्तमान झूँसी नामक स्थान के आस पास था। पहले चंद्रवंशी राजा पुरूरवा की राजधानी यहीं थी। यहाँ समुद्रगुप्त और हर्षगुप्त ने एक किला बनवाया था जिसका गिरा पड़ा अंश अबतक वर्तमान है। २. गोदावरी के तट पर महाराष्ट्र देश का एक प्राचीन नगर जो राजा शालिवाहन की राजधानी था।

प्रतिष्ठापत्र
संज्ञा पुं० [सं०] वह पत्र जो किसी की प्रतिष्ठा का सूचक हो। प्रतिष्ठा करने के लिये दिया जानेवाला पत्र। संमानपत्र।

प्रतिष्ठापन
संज्ञा पुं० [सं०] १. देवता आदि की मूर्ति स्थापित करने का काम। २. स्थापित करना। प्रतिष्ठित करना।

प्रतिष्ठापना
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रतिष्ठापन] स्थापित करना। नींव डालना। स्थापना। उ०— पुराने लोग 'सामान्य' की प्रतिष्ठा- पना उस विरोध के विरुद्ध कर गए थे जो मनुष्य की सर्वभूत सामान्यता को नहीं मानता था।—काव्यशास्त्र, पृ० १४।

प्रतिष्ठापार्यता
वि० संज्ञा पुं० [सं० प्रतिष्ठापयितृ] प्रतिष्ठापन करनेवाला संस्थापक [को०]।

प्रतिष्ठापित
वि० [सं०] जिसका प्रतिष्ठापन किया गया हो [को०]।

प्रतिष्ठावान्
वि० [सं० प्रतिष्ठावत्] जिसकी प्रतिष्ठा हो। इज्जतदार।

प्रतिष्ठिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] आधार। नींव। मूल [को०]।

प्रतिष्ठित (१)
वि० [सं०] १. जिसकी प्रतिष्ठा हुई हो। आदर- प्राप्त। इज्जतदार। जैसे— (क) हिंदी का प्रतिष्ठित पत्र। (ख) चार प्रतिष्ठित सज्जन। २. जिसकी प्रतिष्ठा की गई हो। जो स्थापति किया गया हो। जैसे,— वहाँ शिव जी की एक मूर्ति प्रतिष्ठित की गई है। ३. पूर्ण। परिसमाप्त (को०)। ४. पदाभिषिक्त। पदासीन। ५. निश्चित (को०)। ६. प्राप्त। पाया हुआ (को०)। ७. जीवन में स्थापित। विवाहित (को०)।

प्रतिष्ठित (२)
संज्ञा पुं० १. विष्णु। २. कच्छप। कूर्म (को०)।

प्रतिष्ठिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्थापित करने या होने का भाव या कार्य। प्रतिष्ठान।

प्रतिसंकाश
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिसङ्काश] सादृश्य। तुल्यता [को०]।

प्रतिसंक्रम
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिसङ्क्रम] १. प्रतिच्छाया। प्रतिबिंब। २. प्रलय। नाश [को०]।

प्रतिसंक्रांत
वि० [सं० प्रतिङ्क्रान्ति] प्रतबिंबित [को०]।

प्रतिसंख्या
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रतिसङ्ख्या] १. चेतना। २. सांख्या- नुसार ज्ञान का एक भेद।

प्रतिसंख्यानिरोध
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिसंङ्ख्यानिरोध] वैनाशिक बौद्ध दार्शनिकों के अनुसार बुद्धिपूर्वक भावपदार्थ का नाश।

प्रतिसंगी
वि० [सं० प्रतिसङ्गिन्] साथ लगा रहनेवाला। निरंतर साथ रहनेवाला [को०]।

प्रतिसंचर
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिसञ्चर] १. पुराणानुसार प्रलय का एक भेद। २. पीछे जाना (को०)। ३. सचरण। संचार (को०)। २. नित्य आगमन का स्थान (को०)।

प्रतिसंदेश
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिसन्देश] उत्तर। जवाब [को०]।

प्रतिसंधान
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिसन्धान] १. अनुसंधान। ढूँढना। खोजना। २. साथ साथ जोड़ना। मिलाना। ३. दी युगों का संक्रांति सा संधि काल (को०)। ४. आत्मनियंत्रण। आवेशादि को वशीभूत कर लेना (को०)। ५. स्तवन। स्तुति। प्रशंसा (को०)। ६. स्मृति। स्मरण। अनुचिंतन (को०)। ७. औषधि। उपचार। उपाय (को०)।

प्रतिसंधानिक
संज्ञा पुं० [प्रतिसन्धानिक] राजाओं आदि की स्तुति करनेवाला। मागध।

प्रतिसंधि
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रतिसन्धि] १. वियोग। विछोह। २. अनुसंधान। ढूँढ़ना। ३. पुनर्जन्म (को०)। परिसमाप्ति (को०)। ५. दो युगों का सक्रांति काल (को०)।

प्रतिसंधित
वि० [सं० प्रंतिसन्धित] दृढ़ीकृत। स्थिरीकृत [को०]।

प्रतिसंधेय
वि० [प्रतिसन्धेय] १. प्रतिसंधि के योग्य। अनुसंधेय। २. प्रतीकार्य।

प्रतिसंलयन
संज्ञा पुं० [सं०] पूर्णतः विरक्ति या एकांतवास करना [को०]।

प्रतिसंलीन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रतिसंलयन' [को०]।

प्रतिसंविद्
संज्ञा स्त्री० [सं०] किसी विषय का पूर्ण ज्ञान [को०]।

प्रतिसंवेदक
वि० [सं०] किसी विषय का सांगोपांग ज्ञान करानेवाला। विषय की पूर्ण जानकारी देनेवाला [को०]।

प्रतिसंवेदन
संज्ञा पुं० [सं०] अनुभव। परीक्षण [को०]।

प्रतिसंस्तर
संज्ञा पुं० [सं०] मैत्रीपूर्ण उपचार या आदर संमान [को०]।

प्रतिसंहार
संज्ञा पुं० [सं०] १. वापस लेना। २. कम करना। संक्षिप्त कना। ३. त्यागना। ४. समेटना। मिलाना। समर्पण [को०]।

प्रतिसंहृत्त
वि० [सं०] १. वापस लिया हुआ। २. कम या संक्षिप्त किया हुआ। परीक्षित [को०]।

प्रतिसम
वि० [सं०] १. जो देखने में समान न हो। २. मुकाबले का। बराबरीवाला (को०)।

प्रतिसर
संज्ञा पुं० [सं०] १. सेवक। नौकर। २. सेना का पिछला भाग। ३. ब्याह में पहनने का कंकण। ४. कंकण नाम का गहना। ५. जादू का मंत्र। ६. जख्म का भर आना। ७. माला। ८. प्रातःकाल। सबेरा। ९. रक्षक। देखरेख करनेवाला व्यक्ति (को०)। १०. वह सूत्र जो रक्षा की दृष्टि से मणिबंध या गले में पहना जाता है। रक्षासूत्र [को०]।

प्रतिसर
वि० अनुवर्ती। अस्वतंत्र। पराधीन [को०]।

प्रतिसरण
संज्ञा स्त्री० [सं०] किसी वस्तु परा उसके सहारे उठँघना या लेटना [को०]।

प्रतिसरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सेविका। दासी। २. तस्मा। पट्टी।

प्रतिसर्ग
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुराणानुसार वे सब सृष्टियाँ जो रुद्र, विराटपुरुष, मनु, यक्ष और मरीचि आदि ब्रह्मा के मानसपुत्रों ने उत्पन्न की थी। प्रलय। ३. पुराणों का वह अंश जिसमें प्रतिसर्ग अर्थात् सृष्टि प्रलय का वर्णन होता है (को०)।

प्रतिसर्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक रुद्र का नाम। (वैदिक)। २. विवाह के समय हाथ में बाँधा जानेवाला कगन।

प्रतिसव्य
वि० [सं०] जो सव्य अर्थात् अनुकूल न हो। विपरीत। प्रतिकूल [को०]।

प्रतिसांधानिक
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिसान्धानिक] मागध। प्रति- संधानिक [को०]।

प्रतिसामंत
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिमामन्त] शत्रु। दुश्मन। अरि [को०]।

प्रतिसारण
संज्ञा पुं० [सं०] १. दूर हटाना। अलग करना। २. सूश्रुत के अनुसार एक प्रकार का अग्निकार्य जिसमें गरम घी या तेल आदि की सहायता से कोई स्थान जलाया जाता है। बवासीर, भगंदर, अर्बुद रोगों में यह विधेय है। ३. इस कार्य में प्रयुक्त होनेवाला उपकरण या औजार (को०)। ३. समूड़ों में से बहनेवाला खून बंद करने के लिये, उनकी सूजन दूर करने के लिये अथवा यों ही मुँह साफ करने के लिये किसी प्रकार का चूर्ण या अवलेह आदि लेकर उँगली से दातों या समूड़ों आदि पर मलने की क्रिया। मंजन।

प्रतिसारणीय (१)
संज्ञा पुं० [सं०] सुश्रुत के अनुसार एक प्रकार की क्षारपाकविधि जो कुष्ट, भगदर, दाद, कुष्ठव्रण, झाँई, मुहाँसे और बवासीर आदि में अधिक उपयोगी होती है।

प्रतिसारणीय (२)
वि० [सं०] प्रतिसारण के योग्य। हटाकर दूसरे पर ले जाने के योग्य।

प्रतिसारा
संज्ञा स्त्री० [सं०] बौद्ध तांत्रिकों के अनुसार एक प्रकार की शक्ति जिसका मंत्र धारण करने से सब प्रकार की विघ्न- बाधाओं का दूर होना माना जाता है।

प्रतिसारित
वि० [सं०] १. अपवारित। दूरीकृत। २. मरहम पट्टी किया हुआ [को०]।

प्रतिसारी
वि० [सं०] विरोध या उलटी दिशा में जानेवाला [को०]।

प्रतिसीरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] यवनिका। परदा।

प्रतिसूर्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य का मंडल या घेरा। २. आकाश में होनेवाला एक प्रकार का उत्पात जिसमें सूर्य के सामने एक और सूर्य निकला हुआ दिखाई देता है। ३. गिरगिट।

प्रतिसूर्यक
संज्ञा पुं० [सं०] १. कृकलास। २. दे० 'प्रतिसूर्य' [को०]।

प्रतिसृष्ट
वि० [सं०] १. प्रेषित। भेजा हुआ। २. प्रत्याख्यात। निराकृत। ३. अनुष्ठित। दत्त। प्रदत्त। ३. क्षीव। मत्त। मतवाला [को०]।

प्रतिसेना
संज्ञा स्त्री० [सं०] शत्रु की सेना। दुश्मन की फौज।

प्रतिसोमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] छिरेटा नाम की बेल। महिषवल्ली। छिरहटा।

प्रतिस्कंध
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिस्कन्ध] पुराणानुसार कार्तिकेय के एक अनुचर का नाम।

प्रंतिन्त्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] दूसरे की स्त्री। परकीया। परस्त्री [को०]।

प्रतिनात
वि० [सं०] नहाया हुआ। कृतस्नान। जो नहा चुका हो [को०]।

प्रतिस्नेह
संज्ञा पुं० [सं०] वह प्रभाव जो किसी के प्रेम करने पर व्यक्त हो। प्रेम का प्रतिदान [को०]।

प्रतिस्पंदन
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिस्पनून] स्पंदन। स्फुरण [को०]।

प्रतिस्पर्द्धा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. किसी काम में दूसरे से बढ़ जाने की इच्छा या उद्योग। लाग डाँट। चढ़ा ऊपरी। २. झगड़ा।

प्रतिस्पर्द्धी
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिस्पर्दि्धन्] १. वह जो प्रतिस्पर्धा करे। मुकाबला या बराबरी करनेवाला। २. उद्दंड। विद्रोही।

प्रतिस्पर्धा
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रतिस्पर्द्धा'।

प्रतिस्फलन
संज्ञा पुं० [सं०] फैलाव। विस्तार।

प्रतिस्याय
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रतिश्याय'।

प्रतिस्राव
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का रोग जिसमें नाक में से पीला या सफेद रंग का बहुत गाढ़ा कफ निकलता है।

प्रतिस्वन, प्रतिस्वर
संज्ञा पुं० [सं०] प्रतिध्वनि। प्रतिशब्द [को०]।

प्रतिहंता
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिहन्तृ] १. रोकनेवाला। बाधक। २. मुकाबले में खड़ा होकर मारनेवाला।

प्रतिहत
वि० [सं०] १. अवरुद्ध। रुका या रोका हुआ। २. हटाया हुआ। ३. फेंका हुआ। ३. गिरा हुआ। ५. निराश। ६. कुंठित। जो कोठ हो गया हो। जैसे, दाँत (को०)। ७. अपने शत्रु के द्वारा पीछे हटाया हुआ (सैन्य)। विशेष— कौटिल्य ने प्रतिहत सेना को हताग्रवेग सेना से अच्छा कहा है, क्योंकि यह छिन्न भिन्न भाग को फिर से जोड़कर युद्ध के योग्य हो सकती है। यौ०— प्रतिहतधी, प्रतिहतमति = (१) विरोधी। (२) जिसकी मति अवरुद्ध हो। अवरुद्ध ज्ञान।

प्रतिहित
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. रोकने या हटाने की चेष्टा। २. वह आघात जो किसी के आघात करने पर किया जाय। प्रतिघात। ३. टक्कर। ३. क्रोध। गुस्सा। ५. कुठा। नैराश्य (को०)।

प्रतिहनन
संज्ञा पुं० [सं०] बदले में आघात करना। प्रत्याघात [को०]।

प्रतिहरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. विनाश। बरबादी। २. निवारण। हटाना (को०)।

प्रतिहर्ता
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिहर्तृ] १. यज्ञ में उद्गाता का सहायक। यज्ञादि में १६ ऋत्विजों में से बारहवाँ ऋत्विज। २. वह जो विनाश करे। ३. वह जो निवारण करे या हटावे।

प्रतिहस्त, प्रतिहस्तक
संज्ञा पुं० [सं०] प्रतिनिधि।

प्रतिहार
संज्ञा पुं० [सं०] १. द्वारपाल। दरवान। ड्योढ़ीदार। उ०— प्राण ! प्रतीक्षा में प्रकाश औ, प्रेम बने प्रतिहार।— युगवाणी, पृ० ६१। यौ०— प्रतिहारभूमि = वह स्थान जहाँ प्रतिहार बैठता है। ड्योढ़ी। प्रतिहाररक्षी = द्वाररक्षिका। प्रतिहारी। २. द्वार। दरवाजा। ड्योढ़ी। ३. प्राचीन काल का एक राज- कर्मचारी जो सदा राजाओं के पास रहा करता था और जो राजाओं को सब प्रकार के समाचार आदि सुनाया करता था। बहुधा पढे़ लिखे ब्राह्मण या राजवंश के लाज इस पद पर नियुक्त किए जाते थे। ३. चोबदार। नकीब। ५. सामेवद गान का एक अंग। ६. मायावी। ऐंद्रजालिक। बाजीगर। ७. एक प्रकार की संधि। दे० 'प्रतीहार—२'। ८. इंद्रजाल। बाजीगरी (को०)। ९. हटाना। पीछे करना। निवारण करना (को०)। १०. पुराण के अनुसार परमेष्ठी के पुत्र (को०)।

प्रतिहारक
संज्ञा पुं० [सं०] १. इंद्रजाल दिखानेवाला। बाजीगर। २. वह प्रतिहार जो सामगान करता हो। ३. बुलावा देनेवाला या आमंत्रण करनेवाला राज्याधिकारी। विशेष— शुक्रनीति में लिखा है कि जो मनुष्ट अस्त्र शस्त्र चलाने में कुशल हो, दृढांग हो, आलसी न हो और जो नम्र होकर दूसरों को बुला सके वह इस पद के योग्य होता है।

प्रतिहारण
संज्ञा पुं० [सं०] १. द्वार। दरवाजा। २. द्वार आदि में प्रवेश करने की आज्ञा।

प्रतिहारतर
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुराणानुसार एक प्रकार का अस्त्र जिसका उपयोग दूसरों के चलाए हुए अस्त्रों को निष्फल करने के लिये होता है।

प्रतिहारत्व
संज्ञा पुं० [सं०] ड्योढ़ीदारी। प्रतिहार या द्वारपाल का काम या पद।

प्रतिहारी (१)
संज्ञा पुं० [सं० प्रतिहारिन्] [वि० स्त्री० प्रतिहारिणी] द्वारपाल। डेवढ़ीदार। द्वाररक्षक। उ०— आकर 'लघु कुमार आते हैं' बोली नत हो प्रतिहारी। 'आवै' कहा भरत ने, तत्क्षण आए वे धन्वाधारी।—साकेत पृ० ३७२।

प्रतिहारी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] द्वार की रक्षा करनेवाली महिला। द्वरापालिका [को०]।

प्रतिहार्य (१)
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्रजाल। जादूगरी। बाजीगरी [को०]।

प्रतिहार्य (२)
वि० जिसका प्रतिहार या निवारण किया जाय। जो पीछे हटाया जाय [को०]।

प्रतिहास
संज्ञा पुं० [सं०] १. कनेर। २. सफेद कनेर। ३. हँसी के बदले में हँसी (को०)।

प्रतिहिंसा
संज्ञा स्त्री० [सं०] [वि० प्रतिहिंसित] १. वह हिंसा जो किसी हिंसा का बदला चुकाने के लिये की जाय। बैर निका- लना। २. बैर चुकाना। बदला लेना।

प्रतिहिंसित
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रतिहिंसा' [को०]।

प्रतिहित
वि० [सं०] रखा हुआ। स्थापित [को०]।

प्रतींधक
संज्ञा पुं० [सं० प्रतीन्धक] विदेह नाम का एक देश [को०]।

प्रतीक (१)
वि० [सं०] १. प्रतिकूल। विरुद्ध। २. जो नीचे से ऊपर की ओर गया हो। उलटा। विलोम।

प्रतीक (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. पता। चिह्न। निशान। २. किसी पद्य या गद्य के आदि या अंत के कुछ शब्द लिखकर या पढ़कर उस पूरे वाक्य का पता बतलाना। ३. अंग। अवयव। ४. मुख। मुँह। ५. आकृति। रूप। सूरत। ६. प्रतिरूप। स्थानापन्न वस्तु। वह वस्तु जिसमें किसी दूसरी वस्तु का आरोप किया गया हो। ७. प्रतिमा। मूर्ति। ८. वसु के पुत्र और ओधवान के पिता का नाम। ९. मरु के पुत्र का नाम। १०. परवल। ११. अंश। भाग। हिस्सा (को०)। १२. किसी वस्तु का सामने का हिस्सा (को०)। १३. लालटेन। दीपक (को०)। १४. प्रतिलिपि। प्रतिलेख (को०)।

प्रतीकवाद
संज्ञा पुं० [सं० प्रतीक + वाद] आधुनिक काव्य का एक आंदोलन या सिद्धांत, जिसमें काव्यरचना का मुख्य आधार प्रतीक अनुध्वनिमूलक स्वर आदि होते हैं। विशेष— प्रतीकवाद का आरंभ सन् १८८६ में फ्रांस में कवि जीन मोरेआस के प्रतीकवाद (सिंबोलिज्म) विषयक घोषणा-पत्र के प्रकाशित होने के साथ होता है। यह उन्नीसवीं शताब्दी के स्थूल काव्यसिद्धांतों के विरोध में उतप्न्न हुआ था। प्रतीकवादियों का सिद्धांत था कि प्रतीकों के माध्यम से वे अधिक संवेद्य काव्य का निर्माण कर सकते हैं। अतः यह काव्य स्थूल घटनाओं को गोपन प्रतीतियों के रूप में व्यक्त करता है। प्रतीकवाद आधुनिक युग का प्रमुख साहित्यिक आंदोलन है।

प्रतीकार
संज्ञा पुं० सं० [सं०] १. वह काम जो किसी के किए हुए अपकार का बदला चुकाने अथवा उसे निष्फल करने के लिये किया जाय। प्रतिकार। बदला। उ०— अगर जयनाथ होते तो उन्हें कुछ न कुछ प्रतीकार अवश्य करना पड़ता।—रति०, पृ० १३। २. चिकित्सा। इलाज। दे० 'प्रतिकार'।

प्रतीकारसंधि
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रतीकारसन्धि] कामंदकीय नीति के अनुसार वह संधि जो उपकार के बदले में उपकार करने की शर्त करके की जाय; जैसी राम और सुग्रीव के बीच हुई थी।

प्रतीकार्य
वि० [सं०] जो प्रतीकार के योग्य हो। निष्फल करने के योग्य। बदला चुकाने या व्यर्थ करने के लायक।

प्रतीकाश
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रतिकाश' [को०]।

प्रतीकोपासना
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. किसी विशेष पदार्थ में (जैसे, सूर्य, ईश्वर के नाम, मन इत्यादि) व्यापक ब्रह्म की भावना करके उसे पूजना और यह मानना कि हम उसी ब्रह्म की पूजा करते हैं। २. किसी के प्रतीक की उपासना। प्रतिमादि का पूजन।

प्रतीक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रतीक्षक' [को०]।

प्रतीक्षक
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो प्रतीक्षा करता हो। आसरा देखनेवाला। २. वह जो पूजा अर्चन करता हो। पूजा करनेवाला। पूजक।

प्रतीक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रतीक्षा करना। आसरा देखना। २. कृपादृष्टि। मेहबानी की नजर। ३. अपेक्षा। आशा। उम्मीद (को०)। ४. आदर। संमान। इज्जत (को०)। ५. प्रतिज्ञा, वचन आदि पूर्ण करने (को०)। ६. देखना। ध्यान देना (को०)।

प्रतीक्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. किसी व्यक्ति अथवा काल के आने या किसी घटना के होने के आसरे में रहना। किसी कार्य के होने या किसी के आने की आशा में रहना। आसरा। इंतजार। प्रत्याशा। जैसे,— (क) मैं एक घटे से आपकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ। (ख) वे इस मास की समाप्ति की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उ०— डूब बची लक्ष्मी पानी में, सती आग में पैठ। जिए उर्मिला करे प्रतीक्षा, सहे सभी घर बैठ। —साकेत, पृ० ३१८। २. किसी का भरण पोषण करना। प्रतिपालन। ३. पूजा। ४. संमान (को०)। ५. ध्यान देना। विचार। करना (को०)।

प्रतीक्षित
वि० [सं०] १. जिसकी प्रतीक्षा की जाय। जिसकी इंतजारी हो। २. विचारित। अवलोकित या ध्यान। ३. जिसकी बूजा की जाय। पूजित। आदृत। संमा- नित [को०]।

प्रतीक्षी
संज्ञा पुं० [सं० प्रतीक्षिन्] वह जो प्रतीक्षा करे। प्रतीक्षा करनेवाला।

प्रतीक्ष्य
वि० [सं०] १. जिसकी प्रतीक्षा की जाय। जिसका आसरा देखा जाय। उ०—मिलनावधि ही प्रतीक्ष्य थी।—साकेत, पृ० ३३९। २. दे० 'प्रतीक्षित'।

प्रतीघात
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह आघात जो किसी के आघात करने पर हो। २. वह आघात जो एक आघात लगने पर आपसे आप उत्पन्न हो। टक्कर। ३. रुकांवट। बाधा। दे० 'प्रतिघात'।

प्रतीघ्न
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रतिघ्न'।

प्रतीची
संज्ञा स्त्री० [सं०] पश्चिम देश।

प्रतीचीन
वि० [सं०] १. पश्चिम दिशा का। पश्चिम संबंधी। पश्चिमी। पछाही। २. जिसने मुँह फेर लिया हो। पराङ्मुख।

प्रतीचीपति
संज्ञा पुं० [सं०] १. वरुण। २. समुद्र [को०]।

प्रतीचीश
संज्ञा पुं० [सं०] १. पश्चिम दिशा के स्वामी, वरुण। २. समुद्र (को०)।

प्रतीच्य
वि० [सं०] १. प्रतीची दिशा का। पश्चिमी। २. गायब। लुप्त। अदृष्ट (वैदिक)।

प्रतीच्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुलस्त्य की माता [को०]।

प्रतीच्छक
संज्ञा पुं० [सं०] ग्रहण करनेवाला। ग्राहक [को०]।

प्रतीजना पु
क्रि० स० [हिं०] दे० 'प्रतीजना'। उ०— नाहिं प्रतीजै यहि संसारा। द्रव्यक चोट कठिन कै मारा।—कबीर बी० (शिशु), पृ० ६७।

प्रतीत
वि० [सं०] १. ज्ञात। विदित। जाना हुआ। जैसे,— ऐसा प्रतीत होता है कि इस वर्ष अच्छी वर्षा होगी। २. प्रसिद्ध। विख्यात। मशहूर। ३. प्रसन्न। खुश। ४. संमानित। आदरयुक्त। संमानपूर्ण (को०)। ५. विद्वान्। ज्ञानी (को०)। ६. जिसका दृढ़ निश्चय या संक्ल्प हो (को०)। ७. गया हुआ। प्रस्थित। गत (को०)। ८. विश्वस्त। जिसपर विश्वास किया गया हो (को०)।

प्रतीति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. ज्ञान। जानकारी। २. दृढ़ निश्चय। विश्वास। यकीन। ३. प्रसिद्धि। ख्याति। ४. आनंद। प्रसन्नता। ५. आदर। संमान। ६. प्रस्थान (को०)।

प्रतीत्त
वि० [सं०] परावर्तित। लौटाया हुआ। वापस किया हुआ [को०]।

प्रतीत्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. आराम। २. सांत्वना [को०]।

प्रतीत्यसमुत्पाद
संज्ञा पुं० [सं०] बौद्धों के अनुसार अविद्या, संस्कार, विज्ञान, अमरूप, षडायतन, स्पर्श, वेदना, तृष्णा, उपादान,भय, जाति और दुःख ये बारहों पदार्थ जो उत्तरोत्तर संबद्ध हैं। विशेष— अविद्या से संस्कार, संस्कार से विज्ञान, विज्ञान से नामरूप क्रमशः उत्पन्न होते हैं। यही परंपरा जन्ममरण और दुःख का कारण है। इससे यह 'द्वादश निदान' के नाम से प्रसिद्ध है। इन सबका बोध महात्मा बुद्ध ने बुद्धत्व प्राप्त करने के समय किया था। इन सब निदानों की व्याख्या आदि के संबंध में महायान और हीनयान मतवालों में बहुत मतभेद हैं।

प्रतीनाह
संज्ञा पुं० [सं०] ध्वजा। निशान। झंडा [को०]।

प्रतीप (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रतिकूल घटना। आशा के विरुद्ध फल। २. वह अर्थालंकार जिसमें उपमेय को उपमान के समान न कहकर उलटा उपमान को उपमेय के समान कहते हैं अथवा उपमेय द्वारा उपमान का तिरस्कार वर्णन करते हैं। जैसे,— (क) पायँन से गुललाला जपादल पुंज बँधूक प्रभा बिथरैं हैं। मैथिली आनन से अरविंद कलाधर आरसी जानि परैं है। (ख) पाहन ! जिय जनि गरब धरु हौं ही कठिन अपार। चित दुर्जन के देखिए तोसे लाख हजार। (ग) करत गरबं तू कल्पतरु ! बड़ी सु तेरी भूल। या प्रभू की नीकी नजर तकु तेरे ही तूल। — (शब्द०)। ३. वह जो विरोधी हो। शत्रु। दुश्मन (को०)। ४. शांतनु के पिता और भीष्म के दादा का नाम (को०)।

प्रतीप (२)
वि० १. प्रतिकूल। उलटा। जैसे, प्रतीपगमन, प्रतीपतरण। २. विरोधी (को०)। ३. बाधक (को०)। ४. हठी। जिद्दी (को०)।

प्रतीपक
वि० [सं०] प्रतिकूल। विरुद्ध [को०]।

प्रतीपग
वि० [सं०] विपरीत जानेवाला। प्रतीकूल। विरोधी [को०]।

प्रतीपगति
संज्ञा स्त्री० [सं०] पीछे जाना। प्रतिगमन [को०]।

प्रतीपगमन
संज्ञा पुं० [सं०] पीछे जाना। प्रतीपगति [को०]।

प्रतीपगामी
वि० [सं० प्रतीपगामिन्] १. उलटा जानेवाला। २. विरुद्ध कार्य करनेवाला [को०]।

प्रतीपतरण
संज्ञा पुं० [सं०] धारा के विरुद्ध खेना या तैरना [को०]।

प्रतीपदर्शिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. देखते ही मुँह फेर लेनेवाली नई स्त्री या नववधू। २. नारी। महिला। स्त्री (को०)।

प्रतीपवचन
संज्ञा पुं० [सं०] विरोध। खंडन। प्रतिकूल या विपरीत कथन [को०]।

प्रतीपविपाकी
वि० [सं० प्रतीपविपाकिन्] उलटा फल देनेवाला। जिसका फल उलटा या विपरीत हो [को०]।

प्रतीपी
वि० [सं० प्रतीपिन्] १. विरुद्ध। प्रतिकूल। २. दयारहित। निर्दय [को०]।

प्रतिपोक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] किसी के कथन के विरुद्ध कहना। विरुद्धकथन। खंडन।

प्रतीयमान
वि० [सं०] १. जान पड़ता हुआ। २. व्यंजना द्वारा प्रकट होता हुआ। ध्वनि या व्यंग्य द्वारा प्रकट होता हुआ। जैसे, प्रतीयमान अर्थ।

प्रतीर
संज्ञा पुं० [सं०] किनारा। तट। उ०— पूरी निर्मल नीर से बह रही थी पास ही मानिली। वृक्षाली जिसके प्रतीर पर थी, भूरि प्रभा शालिनी।— शकुं०, पृ०१९।

प्रतीवृता पु
वि० स्त्री० [सं० प्रतिव्रता, पुं० हिं० पतिवृत्ता] दे० 'प्रतिव्रता' उ०— जोगी कहै प्रतीवृता ! सुणेस हुई नच्यंत। प्रीव थारौ आव्यो छइ मास वसंत।—बी० रासो, पृ० ९४।

प्रतीवाप
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह औषध जो पीने के लिये काढे़ आदि में मिलाया जाय। २. दैवी उपद्रव। ३. फेंकने की क्रिया। ४. किसी चीज को बदलने के लिये उसे किसी दूसरी चीज में मिलाना। धातु आदि का मिश्रण करना।

प्रतीवेश
संज्ञा पुं० [सं०] प्रतिवेश। पड़ोस।

प्रतीवेशी
संज्ञा पुं० [सं० प्रतीवेशिन्] पड़ोस में रहनेवाला। पड़ोसी।

प्रतीवेश्य
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार एक प्राचीन देश का का नाम।

प्रतीष्ट
वि० [सं०] स्वीकृत। प्राप्त [को०]।

प्रतीह
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार परमेष्ठी के एक पुत्र का नाम जिसका जन्म सुवर्चला के गर्भ से हुआ था।

प्रतीहार
संज्ञा पुं० [सं०] १. दे० 'प्रतिहार'। २. संधि का एक भेद। वह मेल या संधि जो कोई यह कहकर करता है कि पहले मैं तुम्हारा काम कर देता हूँ पीछे तुम मेरा करना।

प्रतीहारी (१)
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रतिहारी'।

प्रतीहारी (२)
संज्ञा स्त्री० द्वाररक्षिका। प्रतिहारी।

प्रतीहास
संज्ञा पुं० [सं०] कनेर।

प्रतुंदक
संज्ञा पुं० [सं० प्रतुन्दक] जीवक नाम का साग।

प्रतुद
संज्ञा पुं० [सं०] १. वे पक्षी जो अपना भक्ष्य चोंच से तोड़कर खाते हैं। २. कोंचने या भेदन का उपकरण। वह जिससे कोई वस्तु तोड़ी या भेदी जाय (को०)।

प्रतुष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] संतोष। संतुष्टि। तृप्ति [को०]।

प्रतूणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्नायु की दुर्बलता से होनेवाला एक रोग जिसमें गुदा से पीड़ा उत्पन्न हकर अँतडियों तक पहुँचती है।

प्रतूद
संज्ञा पुं० [सं०] एक वैदिक ऋषि का नाम जिनका उल्लेख ऋग्वेद में है।

प्रतूर्ण, प्रतूर्त
वि० [सं०] वेगवान। तीव्र [को०]।

प्रतेक पु
वि० [सं० प्रत्येक] दे० 'प्रत्येक'। उ०— पल्लव पुहुप प्रतेक पैग मैं कछु लगि आवत।— रत्नाकर, भा० १, पृ० १२।

प्रतूलिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] विस्तर। गद्दा। तोशक [को०]।

प्रतोद
संज्ञा पुं० [सं०] १. पैना। औगी। अंकुश। २. चाबुक। कोड़ा। हटर। ३. एक प्रकार का सामगान।

प्रतोली
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह चौड़ा रास्ता जो नगर के मध्य से होकर निकला हो। चौड़ी सडक। शाहराह। राजपथ। २.वीथी। गली। कूचा। ३. दुर्ग का वह द्वार जो नगर की और हो। ४. फोड़ों आदि पर पट्टी बाँधने का एक ढंग। इस ढंग की पट्टी ढोड़ी आदि पर बाँधी जाती है। ५. इस ढंग से बाँधी हुई पट्टी। ६. किले के नीचे होकर जानेवाला रास्ता।

प्रतोष
संज्ञा पुं० [सं०] १. संतोष। तुष्टि। २. पुराणानुसार स्वार्यभू मनु के एक पुत्र का नाम।

प्रतोषना पु
क्रि० स० [सं० प्रतोषण] प्रतोष देना। संतोष देना। समझाना बुझाना। आश्वस्त करना। उ०— राम प्रतोषी मातु सब कहि विनीत बर बैन।—राम०, १। ३६२।

प्रत्त
वि० [सं०] १. प्रदत्त। दिया हुआ। उपहृत। २. विवाह में प्रदत्त [को०]।

प्रत्न
वि० [सं०] १. पुराना। प्राचीन। २. परंपराप्राप्त। परंपरागत (को०)।

प्रत्नतत्व
संज्ञा पुं० [सं०] वह जिसमें प्राचीन काल की बातों का विवेजन हो। पुरातत्व।

प्रत्यंग (२)
संज्ञा पुं० [सं० प्रत्यङ्ग] १. शरीर का कोई अप्रधान या गौण अंग। २. विभाग। खंड। परिच्छेद।३. प्रत्येक अंग। हर एक अवयव। ४. एक अस्त्र का नाम [को०]।

प्रत्यंग (२)
क्रि० वि० प्रत्येक अंग में। हरएक अवयव में [को०]।

प्रत्यंगिरा (१)
संज्ञा पुं० [सं० प्रत्यङ्गिरस्] पुराणानुसार चाक्षुष मन्वंतर के अंगिरस के पुत्र एक ऋषि का नाम।

प्रत्यंगिरा (२)
संज्ञा स्त्री० १. सिरस का पेड़। २. बिसखोपरा। ३. तांत्रिकों की एक देवी का नाम।

प्रत्यंच
संज्ञा स्त्री० [सं० पतञ्चिका] धनुष की डोरी जिसमें लगाकर बाण छोड़ा जाता है। चिल्ला।

प्रत्यंचा
संज्ञा स्त्री० [हिं० प्रत्यञ्च] दे० 'प्रत्यंच'। उ०—वाम पाणि में प्रत्यंचा है, पर दक्षिण में एक जटा।— साकेत, पृ० ३६७।

प्रत्यंचित
वि० [सं० प्रत्यञ्चित] पूजित। अर्चित। सम्मानित [को०]।

प्रत्यंजन
संज्ञा पुं० [सं० प्रत्यञ्जन] १. आँख में अंजन लगाकर उसे अच्छा करना। २. लेपन करना।

प्रत्यंत
संज्ञा पुं० [सं० प्रत्यन्त] १. म्लेच्छों के रहने का देश। २. सीमा (को०)।

प्रत्यंतपर्वत
संज्ञा पुं० [सं० प्रत्यन्तपर्वत] वह छोटा पहाड़ जो किसी बडे़ पहाड़ के पास हो।

प्रत्यक्
क्रि० वि० [सं०] १. पीछे। विपरीत दिशा में। २. पश्चिम। ३. विरोध में (को०)। ४. पहले। पूर्व काल में (को०)।

प्रत्यक पु
वि० [हिं०] दे० 'प्रत्यक्ष'। उ०—औरउ कष्ट करै अतिसै करि प्रत्यक आतम तत्व न पेषै। सुंदर भूलि गयो निज रूपहिं है कर कंकण दर्पण दैषै। —सुंदर ग्रं०, भा० २, पृ० ५८६।

प्रत्यक्चेतन
संज्ञा पुं० [सं०] १. योग के अनुसार वह पुरुष जिसकी चित्तवृत्ति बिलकुल निर्मल हो चुकी हो, जिसको आत्मज्ञान हो चुका हो और जो प्रणव आदि का जप करके अपना स्वरूप पहचानने में समर्थ हो चुका हो। अंतरात्मा। ३. परमेश्वर।

प्रत्यकपर्णी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दैती वृक्ष। मूसाकानी २. अपामार्ग। चिचड़ा।

प्रत्यकपुष्पी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'प्रत्यकपर्णी'।

प्रत्यकश्रेणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दंती वृक्ष। मूसाकानी।

प्रत्यक्ष (१)
वि० [सं०] १. जो देखा जा सके। जो आँखों के सामने हो। उ०— स्वप्न था वह जो देखा, देखूँगी फिर क्या अभी ? इस प्रत्यक्ष से मेरा परित्राण कहाँ अभी।— साकेत, पृ० ३०७। २. जिसका ज्ञान इंद्रियों के द्वारा हो सके। जो किसी इंद्रिय की सहायता से जाना जा सके। ३. सुस्पष्ट। साफ (को०)।

प्रत्यक्ष (२)
संज्ञा पुं० चार प्रकार के प्रमाणों में से एक प्रमाण जो सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। विशेष—गौतम ने न्यायसूत्र में कहा है कि इंद्रिय के द्वारा किसी पदार्थ का जो ज्ञान होता है, वही प्रत्यक्ष है। जैसे, यदि हमें सामने आगे जलती हुई दिखाई दे अथवा हम उसके ताप का अनुभव करें तो यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि 'आग जल रही है'। इस ज्ञान में पदार्थ और इंद्रिय का प्रत्यक्ष संबंध होना चाहिए। यदि कोई यह कहे कि 'वह किताब पुरानी है' तो यह प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है; क्योंकि इसमें जो ज्ञान होता है, वह केवल शब्दों के द्वारा होता है, पदार्थ के द्वारा नहीं, इसिलिये यह शब्दप्रमाण के अंतर्गत चला जायगा। पर यदि वही किताब हमारे सामने आ जाय और मैली कुचैली या फटी हुई दिखाई दे तो हमें इस बात का अवश्य प्रत्यक्ष ज्ञान हो जायगा कि 'यह किताब पुरानी है'। प्रत्यक्ष ज्ञान किसी के कहे हुए शब्दों द्वारा नहीं होता, इसी से उसे अव्यपदेश्य कहते हैं। प्रत्यक्ष को अव्यभिचारी इसलिये कहते हैं कि उसके द्वारा जो वस्तु जैसी होती है उसका वैसा ही ज्ञान होता है। कुछ नैयायिक इस ज्ञान के करण को ही प्रमाण मानते हैं। उनके मत से 'प्रत्यक्ष प्रमाण' इंद्रिय है, इंद्रिय से उत्पन्न ज्ञान 'प्रत्यक्ष ज्ञान' है। पर अव्यपदेश्य पद से सूत्रकार का अभिप्राय स्पष्ट है कि वस्तु का जो निर्विकल्पक ज्ञान है वही प्रत्यक्ष प्रमाण है। नवीन ग्रंथकार दोनों मतों को मिलाकर कहते हैं कि प्रत्यक्ष ज्ञान के करण अर्थात प्रत्यक्ष तीन प्रमाण हैं— (१) इंद्रिय, (२) इंद्रिय का संबंध और (३) इंद्रियसंबंध से उत्पन्न ज्ञान। पहली अवस्था में जब केवल इंद्रिय ही करण हो तो उसका फल वह प्रत्यक्ष ज्ञान होगा जो किसी पदार्थ के पहले पहल सामने आने से होता है। जैसे, वह सामने कोई चीज दिखाई देती है। इस ज्ञान को 'निर्विकल्पक ज्ञान' कहते हैं। दूसरी अवस्था में यह जान पड़ता है कि जो चीज सामने है, वह पुस्तक है। यह 'सविकल्पक ज्ञान' हुआ। इस ज्ञान का कारण इंद्रिय का संबंध है। जब इंद्रिय के संबंध से उत्पन्न ज्ञान करण होता है, तब यह ज्ञान कि यह किताबअच्छी है अथवा बुरी है, प्रत्यक्ष ज्ञान हुआ। यह प्रत्यक्ष ज्ञान ६ प्रकार का होता है —(१) चाक्षुष प्रत्यक्ष, जो किसी पदार्थ के सामने आने पर होता है। जैसे, यह पुस्तक नई है। (२) श्रावण प्रत्यक्ष, जैसे, आँखें बंद रहने पर भी घंटे का शब्द सुनाई पड़ने पर यह ज्ञान होता है कि घंटा बजा। (३) स्पर्श प्रत्यक्ष, जैसे बरफ हाथ में लेने से ज्ञान होता है कि वह बहुत ठंढी है। (४) रसायन प्रत्यक्ष, जैसे, फल खाने पर जान पड़ता है कि वह मीठा है अथवा खट्टा है। (५) घ्राणज प्रत्यक्ष, जैसे, फूल सूँघने पर पता लगता है कि वह सुगंधित है और (६) मानस प्रत्यक्ष जैसे, सुख, दुःख, दया आदि का अनुभव।

प्रत्यक्ष (३)
क्रि० वि० आँखों के आगे। सामने। जैसे, प्रत्यक्ष दिखलाई पड़ रहा है कि उस पार पानी बरसता है।

प्रत्यक्षज्ञान
संज्ञा पुं० [सं०] प्रत्यक्ष दर्शन से प्राप्त ज्ञान। वह ज्ञान जो प्रत्यक्ष दर्शन से प्राप्त हो। चाक्षुष प्रमाण।

प्रत्यक्षता
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रत्यक्ष होने का भाव।

प्रत्यक्षत्व
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रत्यक्षता'।

प्रत्यक्षदर्शन
संज्ञा पुं० [सं०] साक्षी। प्रत्यक्षदर्शी [को०]।

प्रत्यक्षदर्शी
संज्ञा पुं० [सं० प्रत्यक्षदर्शिन्] वह जिसने प्रत्यक्ष रूप से कोई घटना देखी हो। साक्षी। गवाह।

प्रत्यक्षफल
वि० [सं०] जिसका परिणाम स्पष्ट हो। जिसका नतीजा साफ हो।

प्रत्यक्षभोग
संज्ञा पुं० [सं०] किसी वस्तु का उपयोग उसके स्वामी की जानकारी में करना [को०]।

प्रत्यक्षलवण
संज्ञा पुं० [सं०] वह नमक जो भोजन पक चुकने पर बाद में अलग से डालने के लिये दिया जाय। खाद्य पदार्थ में पकने के समय डाले हुए नमक के अतिरिक्त पीछे से दिया जानेवाला नमक। विशेष— शास्त्रों में श्राद्ध आदि अवसरों पर इस प्रकार नमक देने का निषेध है।

प्रत्यक्षवाद
संज्ञा पुं० [सं० प्रत्यक्ष + वाद] वह सिद्धांत जिसमें प्रत्यक्ष प्रमाण को ही माना जाय। इंद्रियजन्य ज्ञान को सत्य माननेवाला सिद्धांत। उ०— इस कठोर प्रत्यक्षवाद की समस्या बड़ी कठिन होती है।— स्कंद०, पृ० ५।

प्रत्यक्षवादी
संज्ञा पुं० [सं० प्रत्यक्षवादिन्] [स्त्री० प्रत्यक्षवादिनी] वह व्यक्ति जो केवल प्रत्यक्ष प्रमाण माने, और कोई प्रमाण न माने। वह मनुष्य जो इंद्रियजन्य ज्ञान को ही सत्य माने, जैसे, चावकि्।

प्रत्यक्षविधान
संज्ञा पुं० [सं०] वह (विधि आदि) जो स्पष्ट हो। वह जिसका विधान प्रत्यक्ष रूप से हो [को० ]।

प्रत्यक्षविहित
वि० [सं०] सीधे या प्रत्यक्ष रूप से उपभुक्त या आस्वाद्य [को०]।

प्रत्यक्षसिद्ध
वि० [सं०] जो प्रत्यक्ष या चाक्षुष प्रमाण से सिद्ध हो। उ०— युवराज ! यह अनुमान नहीं है, यह प्रत्यक्षसिद्ध है। —स्कंद०, पृ० ६।

प्रत्यक्षी
संज्ञा पुं० [सं० प्रत्यक्षिन्] व्यक्तिगत रूप से देखनेवाला साक्षी। प्रत्यक्ष या साक्षात् द्रष्टा। वह व्यक्ति जिसने प्रत्यक्ष रूप से देखा हो [को०]।

प्रत्यक्षीकरण
संज्ञा पुं० [सं०] आँखों से दिखला देना। इंद्रिय द्वारा ज्ञान करा देना। सामने लाकर प्रत्यक्ष करा देना। उ०— इन स्थलों के वर्णन में हमें हाट, बाट, नदी, निर्झर, ग्राम, जनपद इत्यादि न जाने कितने पदार्थों का प्रत्यक्षीकरण मिलता है।—चिंतामणि, भा० २, पृ० ३।

प्रत्यक्षीकृत
वि० [सं०] जिसका प्रत्यक्षीकरण हुआ हो। जो आँखों से देखा गया हो [को०]।

प्रत्यक्षीभूत
वि० [सं०] जिसका ज्ञान इंद्रियों द्वारा हुआ हो। जो प्रत्यक्ष हुआ हो।

प्रत्यग
संज्ञा पुं० [सं०] 'प्रत्यक्' का समासगत रूप।

प्रत्यगत पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रत्यागत] कुश्ती का एक पेच। प्रत्या- गत। उ०— जे मल्लयुद्धहि पेच बत्तिश गतहु प्रत्यगतादि। रघुराज (शब्द०)।

प्रत्यगात्मा
संज्ञा पुं० [सं० प्रत्यगात्मन्] व्यापक ब्रह्म। परमेश्वर।

प्रत्यगाशा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पश्चिम दिशा [को०]। यौ०— प्रत्यगाशापति = पश्चिम दिशा के स्वामी, वरुण।

प्रत्यग्या पु
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रतिज्ञा, प्रतिज्ञा] दे० 'प्रतिज्ञा'। उ०— अचरज देखि राजा तब रहा। मिली प्रत्यग्या जो गुन कहा।—हिंदी प्रेमगाथा, पृ० १८९।

प्रत्यग्र (१)
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणानुसार उपरिचर वसु के एक पुत्र का नाम।

प्रत्यग्र (२)
वि० १. नया। ताजा। २. शुद्ध। पवित्र (को०)।

प्रत्यग्रगंधा
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रत्यग्रगन्धा] स्वर्णयूथिका। सोनजूही।

प्रत्यग्रथ
[सं०] दक्षिण पांचाल या अहिच्छत्र नामक देश। विशेष— दे० 'अहिच्छत्र'।

प्रत्यग्रवय
वि० [सं०] यौवन से परिपूर्ण। जो भरी या चढ़ती जवानी में हो [को०]।

प्रत्यङमुख
वि० [सं०] पश्चिम की ओर मुँह किए हुए [को०]।

प्रत्यच्छ
वि० [सं० प्रत्यज्ञ] दे० 'प्रत्यक्ष'। उ०— श्रीठाकुर जी प्रत्यच्छ मुरारीदास सों वार्ता करते।—दो सौ बावन०, भा० १, पृ० १००।

प्रत्यध्मान
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का वात रोग।

प्रत्यनंतर
वि० [सं० प्रत्यनन्तर] सन्निकट। सनिपवर्ती। प्रत्या- सन्न [को०]।

प्रत्यनीक
संज्ञा पुं० [सं०] १. कविता का वह अर्थालंकार जिसमें किसी के पक्ष में रहनेवाले या संबंधी के प्रति किसी हित या अहित का किया जाना वर्णन किया जाय। जैसे, (क) तो मुख छबि सों हारि जग भयो कलंक समेत। सरद इंदु अरबिंद मुख अरबंदन दुख देत।—मतिराम (शब्द०)। (ख) अपने अँग के जानि कै यौवन नृपति प्रवीन। स्तन मन नैन नितंब को बड़ो इजाफा कीन।—बिहारी (शब्द०)। (ग)तैं जीत्यो निज रूप तें मदन बैर यह मान। बेदत तुव अनुकागिनी, इक सँग पाँचौ बान।— (शब्द०)। २. शत्रु। दुश्मन ३. प्रतिपक्षी। विरोधी। मुकाबला करनेवाला। ४. प्रति- वादी। ५. विघ्न। बाधा।

प्रत्यनुमान
संज्ञा पुं० [सं०] तर्क में वह अनुमान जो किसी दूसरे के अनुमान का खडन करते हुए किया जाय।

प्रत्यपकार
संज्ञा पुं० [सं०] वह अपकार जो किसी अपकार के बदले में किया जाय।

प्रत्यभिज्ञा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह ज्ञान जो किसी देखी हुई चीज को, अथवा उसके समान किसी और चीज को, फिर से देखने पर हो। स्मृति की सहायता से उत्पन्न होनेवाला ज्ञान। २. वह अभेद ज्ञान जिसके अनुसार ईश्वर और जीवात्मा दोनों एक ही माने जाते हैं। ३. कश्मीर का एक शैव दर्शन या शैवाद्वैतवाद। दे० 'प्रत्यभिज्ञादर्शन'।

प्रत्यभिज्ञात
वि० [सं०] जाना हुआ। पहचाना हुआ [को०]।

प्रत्यभिज्ञादर्शन
संज्ञा पुं० [सं०] माहेश्वर संप्रदाय का एक दर्शन जिसके अनुसार भक्तवत्सल महेश्वर ही परमेश्वर माने जाते हैं। विशेष— इस दर्शन में तंतु आदि जड़ पदार्थों को पट आदि कार्यों का कारण न मानकर केवल महेश्वर को सारे जगत् का कारण माना है, औरह कहा है कि जिस प्रकार ऋषि आदि बिना स्त्रीसंयोग के ही मानसपुत्र उत्पन्न करते हैं; उसी प्रकार महादेव भी जड़ जगत् की किसी वस्तु की सहायता के बिना ही केवल अपनी इच्छा से जगत् का निर्माण करते हैं। इस, मत के अनुसार किसी कार्य का कारण महेश्वर के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता। महेश्वर को न तो कोई सृष्टि करने के लिये नियुक्त या उत्तेजित करता है और न उसे किसी पदार्थ की सहायता की आवश्यकता होती है। इसी लिये उसे स्वतंत्र कहते हैं। जिस प्रकार दर्पण में मुख दिखाई देता है, उसी प्रकार जगदीश्वर में प्रतिबिंब पड़ने के कारण सब पदार्थ दिखाई देते है। जिस प्रकार बहुरूपिए तरह तरह का रूप धारण करते हैं उसी प्रकार महेश्वर भी स्थावर जंगम आदि का रूप धारण करते हैं और इसी लिये यह सारा जगत् ईश्वरात्मक है। महेश्वर ज्ञाता और ज्ञान स्वरूप है, इसलिये घट पट आदि का जो ज्ञान होता है, वह सब भी परमेश्वर स्वरूप ही है। इस दर्शन के अनुसार मुक्ति के लिये पूजापाठ और जपतप आदि की कोई आवश्यकता नहीं; केवल प्रत्यभिज्ञा या इस ज्ञान की आवश्यकता है कि ईश्वर और जीवात्मा दोनों एक ही हैं। इस प्रत्यभिज्ञा की प्राप्ति होते ही मुक्ति का होना माना जाता है। इसी लिये इसे प्रत्यभिज्ञा दर्शन कहते हैं। इस दर्शन के अनुसार जीवात्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं माना जाता है। इसी लिये इस मत के लोग कहते हैं कि जिस मनुष्य में ज्ञान और क्रियाशक्ति है वही परमेश्वर है, और जिसमें ज्ञान और क्रियाशक्ति नहीं है, वह परमेश्वर नहीं है। परमेश्वर सब स्थानों में और स्वतः प्रकाशमान है। जीवात्मा में परमात्मा का प्रकाश होने पर भी जबतक यह ज्ञान न हो कि ईश्वर के ईश्वरता आदि गुण हमसे भी हैं; तबतक मुक्ति नहीं हो सकती। यही जीवात्मा और परमात्मा के संबंध में इस दर्शन का सिद्धांत है। पदार्थनिर्णय के संबंध में प्रत्यभिज्ञा दर्शन और रसेश्वर दर्शन के मत आपस में मिलते जुलते हैं।

प्रत्यभिज्ञान
संज्ञा पुं० [सं०] १. सदृश वस्तु को देखकर किसी पहले देखी हुई वस्तु का स्मरण हो आना। स्मृति की सहायता से होनेवला ज्ञान। २. पहचान। स्मारक वस्तु या चिह्न।

प्रत्यभिज्ञेय
वि० [सं०] पहचान के योग्य। प्रत्यभिज्ञान के योग्य। जानने योग्य। उ०— किंतु जो भी हो, निजी तुम प्रश्न मेरे, प्रेय प्रत्यभिज्ञेय।—हरी घास०, पृ० १५।

प्रत्यभियोग
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य अर्थशास्त्र के अनुसार वह अभियोग जो अभियुक्त अपने वादी अथवा अभियोग लगानेवाले पर लगावे। किसी के अभियोग लगाने पर उलटे उसपर अभियोग लगाना। वह अभियोग जो अभियुक्त अभियोग चलानेवाले पर चलावे। मुद्दालेह का मुद्दई पर भी दावा करना। विशेष— व्यवहार शास्त्र के अनुसार ऐसा करना वर्जित है। अभि- युक्त जब तक अपने आपको निर्दोष न प्रमाणित कर ले तब तक उसे वादी पर कोई अभियोग लगाने का अधिकार नहीं है।

प्रत्यभिवाद
संज्ञा पुं० [सं०] वह आशीर्वाद जो किसी पूज्य या बडे़ का अभिवादन करने पर मिले।

प्रत्यभिवादन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रत्यभिवाद'।

प्रत्यमित्र
संज्ञा पुं० [सं०] शत्रु। दुश्मन।

प्रत्यय
संज्ञा पुं० [सं०] १. विश्वास। एतबार। यकीन। उ०— यदि पूरा प्रत्यय न हो तुम्हें इस जन पर, तो चढ़ सकते हैं राजदूत तो घन पर।—साकेत, पृ० २३७। २. प्रमाण। सबूत। उ०—प्रभु की नाममुद्रिका देकर परिचय, प्रत्यय, धैर्य दिया।—साकेत, पृ० ३८९। ३. विचार। खयाल। भावना। ४. ज्ञान। बुद्धि। समझ। ५. व्याख्या। शरह। ६. कारण। हेतु। ७. आवश्यकता। जरूरत। ८. प्रख्याति। प्रसिद्धि। ९. चिह्न। लक्षण। १०. निर्णय। फैसला। ११. संमति। राय। १२. स्वाद। जायका। १३. सहायक। मददगार। १४. विष्णु का एक नाम। १५. वह रीति जिसके द्वारा छंदों के भेद और उनकी संख्या जानी जाय। विशेष— छंदःशास्त्र में ९ प्रत्यय हैं—(१) प्रस्तार, (२) सूची, (३) पाताल, (४) उद्दिष्ट, (५) नष्ट, (६) मेरु, (७) खंड- मेरु, (८) पताका और (९) मर्कटी। १६. व्याकरण में वह अक्षर या अक्षरसमूह जो किसी धातु या मूल शब्द के अंत में, उसके अर्थ में कोई विशेषता उत्पन्न करने के उददेश्य से लगाया जाय। जैसे, 'बड़ा' (शब्द) अथवा 'लड़ना' के 'लड़' (धातु) के अंत में जोड़ा जानेवाला 'आई' शब्दसमूह (जिसके जोड़ने से 'बड़ाई')या 'लड़ाई' 'शब्द' बनता है) प्रत्यय है। विशेष— इसी प्रकार मूर्खता में 'ता' लड़कपन में 'पन', शीतलमें 'ल', दयालु में 'लु', अक्षरशः में 'शः' बिकाऊ में 'आऊ', उठान में 'आन', घुमाव में 'आव' आदि प्रत्यय हैं। उपसर्ग क्रियापदों या शब्दों के आदि में और प्रत्यय अंत में लगता है अतः इसे परसर्ग भी कहते हैं। १७. छेद। छिद्र। रंध्र (को०)।

प्रत्ययकारी
वि० [सं० प्रत्ययकारिन्] विश्वास उत्पन्न करनेवाला। समझदारी से युक्त [को०]।

प्रत्ययकारिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] मुद्रा। मुहर। विश्वासदायक चिह्न [को०]।

प्रत्ययत्व
संज्ञा पुं० [सं०] प्रमाणत्व। उ०— जो असत् है उसका प्रत्ययत्व नहीं है।— संपूर्णानंद अभि० ग्रं०, पृ० ३६१।

प्रत्ययन
संज्ञा पुं० [सं०] प्रतीति होना। प्रतीत होना [को०]।

प्रत्ययप्रतिभू
संज्ञा पुं० [सं०] वह जमानंतदार जो किसी को महाजन से यह कहकर कर्ज दिलावे कि मैं इसे जानता हूँ, यह बड़ा ईमानदार, साधु और विश्वास करने के योग्य है।

प्रत्ययवाद
संज्ञा पुं० [सं० प्रत्यय + वाद] एक दार्शनिक सिद्धांत जिसमें यह माना जाता है कि हमारा समस्त ज्ञान विचारों से उत्पन्न है, भौतिक जगत् के पदार्थों से नहीं। आइडिय- लिज्म। उ०— यह इशारा जर्मन दार्शनिकों के प्रत्ययवाद से मिला जिसके प्रवर्तक कांट थे।— चिंतामणि, भा० २, पृ० ७९।

प्रत्ययसर्ग
संज्ञा पुं० [सं०] सांख्य शास्त्र में महत्तत्व या बुदि्ध से उत्पन्न सृष्टि।

प्रत्ययाधि
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह गिरवी या रेहन जो रुपया वसूल होने के इतमिनान या साख के लिये रखा जाय।

प्रत्ययित
वि० [सं०] १. जिसे विश्वास हुआ हो। विश्वस्त। २. आप्त [को०]।

प्रत्ययी
वि० [सं० प्रत्ययिन्] १. विश्वास करनेवाला। भरोसा रखनेवाला। २. विश्वास करने योग्य। विश्वसनीय [को०]।

प्रत्यरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह नाभि जिसमें चक्र या पहिए की अराएँ दृढ़ करने के लिये जड़ी जाती हैं [को०]।

प्रत्यर्क
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का प्रतिसूर्य।

प्रत्यर्थ (१)
वि० [सं०] उपयोगी। लाभकर।

प्रत्यर्थ (२)
संज्ञा पुं० १. उत्तर। जवाब। २. विरोध। शत्रुता [को०]।

प्रत्यर्थक, प्रत्यर्थिक
संज्ञा पुं० [सं०] शत्रु। विरोधी [को०]।

प्रत्यर्थी
संज्ञा पुं० [सं० प्रत्यर्थिन्] १. प्रतिवादी। मुद्दालेह। २. शत्रु। दुश्मन।

प्रत्यर्पण
संज्ञा पुं० [सं०] मिला हुआ धन किसी को देना। दान में पाया हुआ धन फिर दान करना।

प्रत्यर्पित
वि० [सं०] वापस किया हुआ। लौटाय हुआ [को०]।

प्रत्यवनेजन
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुनः प्रक्षालन। फिर धोना। २. पुनराचमन [को०]।

प्रत्यवमर्श
संज्ञा पुं० [सं०] १. अनुसंधान करना। पता लगाना। अच्छे बुरे का विचार करना।

प्रत्यवमर्शन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रत्यवमर्श'।

प्रत्यवर
संज्ञा पुं० [सं०] जो सबसे अधिक निकृष्ट हो। सबसे खराब। निकृष्टतम।

प्रत्यवरूढि
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'प्रत्यवरोह'- १, - २।

प्रत्यवरोध, प्रत्यवरोधन
संज्ञा पुं० [सं०] बाधा। अड़चन। रोक [को०]।

प्रत्यवरोह
संज्ञा पुं० [सं०] १. अवरोहण। उतरना। २. सीढ़ी। ३. वैदिक काल का एक प्रकार का गृह्य उत्सव जो अगहन मास में होता था।

प्रत्यवरोहण
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रत्यवरोह'।

प्रत्यवलोकन
संज्ञा पुं० [सं०] पर्यवेक्षण। देखना। निरीक्षण। दर्शन। उ०— स्पष्ट ही केवल यात्रा का प्रत्यवलोकन काफी नहीं है।— नदी०, पृ० ८।

प्रत्यवसान
संज्ञा पुं० [सं०] भोजन। खानापीना।

प्रत्यवसित
वि० [सं०] १. खाया पिया हुआ। २. जिसने पुराना (बुरा) जीवन ग्रहण कर लिया हो [को०]।

प्रत्यवस्कंद
संज्ञा पुं० [सं० प्रत्यवस्कन्द] दे० 'प्रत्यवस्कंदन' [को०]।

प्रत्यवस्कंदन
संज्ञा पुं० [सं० प्रत्यवस्कन्दन] व्यवहार शास्त्र के अनुसार प्रतिवादी का वह उत्तर जो वादी के कथन का खंडन करने के लिये दिया जाय। जवाबदावा। जवाबदेही।

प्रत्यवस्थाता
संज्ञा पुं० [सं० प्रत्यवस्थातृ] १. विरोधी। शत्रु। २. प्रतिपक्ष। प्रतिवादी। मुद्दालेह [को०]।

प्रत्यवस्थान
संज्ञा पुं० [सं०] १. हटाना। अलग करना। २. शत्रुता। विरोध [को०]।

प्रत्यवहार
संज्ञा पुं० [सं०] १. संहार। मार डालना। २. प्रलय। विनाश (को०)। ३. लड़ने के लिये तैयार सैनिकों को लड़ने से रोकना।

प्रत्यवाय
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह पाप या दोष जो शास्त्रों में बत- लाए हुए नित्य कर्म के न करने से होता है। २. उलटफेर। भारी परिवर्तन। ३. जो नहीं है उसका न उत्पन्न होना या जो है उसका न रह जाना। ४. विघ्न। बाधा (को०)। ५. पाप (को०)। ६. दुरदृष्ट। दुर्भाग्य (को०)। ७. निर्दिष्ट कर्म के विरुद्ध आचरण (को०)।

प्रत्यवेक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] किसी बात को बहुत अच्छी तरह देखना, समझना या जाँचना। भली भाँति जानना।

प्रत्यवेक्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] बौद्धों में पाँच प्रकार के बोध या ज्ञान में से एक का नाम [को०]।

प्रत्यवेक्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'प्रत्यवेक्षण' [को०]।

प्रत्यश्मा
संज्ञा पुं० [सं० प्रत्यश्मन्] गेरू। गैरिक धातु।

प्रत्यष्ठीला
संज्ञा पुं० [सं०] सुश्रुत के अनुसार एक प्रकार का वात रोग जिसमें नाभि के नीचे पेड़ू में एक गुठली सी हो जाती है जिसमें पीड़ा होती है। यदि गुठली में पीड़ा न हो तो उसे 'वातष्ठीला' कहते हैं। गुठली मलमूत्र के द्वार रोक देती है जिसके कारण रोगी मलमूत्र का त्याग नहीं करसकता। उ०— और जो गाँठ तिरछी प्रट भई होय तो उसको प्रत्यष्ठीला कहते हैं।— माधव०, पृ० १४६।

प्रत्यस्तमय
संज्ञा पुं० [सं०] १. समाप्ति। अंत। खातमा। २. अस्तमन। (सूर्य का) डूबना या अस्त होना [को०]।

प्रत्याकरण
संज्ञा पुं० [सं०] प्रतिक्रिया। प्रत्याख्यान। उ०— शायद इसी का प्रत्याकरण हो जो पीछे गेरे लिये जरूरी हो पड़ता है।— सूखदा, पृ० ५४।

प्रत्याकार
संज्ञा पुं० [सं०] खड्गकोश। म्यान [को०]।

प्रत्याक्रमण
संज्ञा पुं० [सं०] आक्रमण के विरोध में आक्रमण। एक पक्ष से आक्रमण हो जाने के बाद प्रतिक्रिया स्वरूप दूसरे पक्ष से आक्रमण।

प्रत्याख्यात
वि० [सं०] १. अस्वीकृत। २. निषिद्ध। रोका हुआ। ३. अतिक्रमित। आगे बढ़ा हुआ। ४. दूरीकृत। अलग किया हुआ। ५. सूचित। प्रख्यात। ख्यात। प्रसिद्ध [को०]।

प्रत्याख्यान
संज्ञा पुं० [सं०] १. खंडन। २. निराकरण।

प्रत्यागत (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. पैतरे का एक प्रकार। उ०— गत प्रत्यागत में और प्रत्यावर्तन में दूर वे चले गए। — लहर, पृ० ७३। २. कुश्ती का एक पेच।

प्रत्यागत (२)
वि० जो लौट आया हो। वापस आया हुआ।

प्रत्यागति
संज्ञा स्त्री० [सं०] पीछे लौटना। वापस होना [को०]।

प्रत्यागम
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रत्यागमन' [को०]।

प्रत्यागमन
संज्ञा पुं० [सं०] १. लौट आना। वापसी। २. दोबारा आना। तुनरागमन।

प्रत्याघात
संज्ञा पुं० [सं०] १. चोट के बदले की चोट। वह आघात जो किसी आघात के बदले में हो। २. टक्कर।

प्रत्याचार
संज्ञा पुं० [सं०] सद्व्यवहार। अनुकूल व्यवहार [को०]।

प्रत्यादान
संज्ञा पुं० [सं०] पुनः ले लेना। फिर से ले लेना। पुनः- प्राप्ति [को०]।

प्रत्याताप
संज्ञा पुं० [सं०] वह स्थान जहाँ घाम बराबर रहती हो। सूर्यातपयुक्त स्थान [को०]।

प्रत्यादित्य
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रतिसूर्य'।

प्रत्यादिष्ट
वि० [सं०] १. संस्तुत। स्वीकृत। २. अस्वीकृत। निराकृत। ३. पृथक् किया हुआ। अलग किया हुआ। ४. चेताया हुआ। सावधान किया हुआ। ५. घोषित। सूचित। ६. विजित। हराया हुआ [को०]।

प्रत्यादेय
संज्ञा पुं० [सं०] 'आदेय' से उलटा लाभ। वह लाभ जो लौटाना पडै़। विशेष— कौटिल्य ने इसे बुरा कहा है, केवल कुछ विशेष अवस्थाओं में ही ठीक बताया है।

प्रत्यादेयाभूमि
संज्ञा स्त्री० [सं०] कौटिल्य के अनुसार वह भूमि जिसको लौटा देना पडे़।

प्रत्यादेश
संज्ञा पुं० [सं०] १. खंडन। २. निराकरण। ३. आकाशवाणी। ४. आज्ञा। आदेश (को०)। ५. चेतावनी (को०)। ६. निवारण (को०)। ७. शर्मिदा करने, हेय बनाने या हटानेवाला (को०)।

प्रत्याधान
संज्ञा पुं० पुं० [सं०] वस्तुओं को जमा रखने की जगह। वह स्थान जहाँ वस्तुएँ जमा की जायँ। आगार [को०]।

प्रत्याध्मान
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का वात रोग जिसमें पेट फूलता है और नाभि के ऊपर कुछ पीड़ा होती है। उ०— और वही रोग आमाशय में उत्पन्न होय तो उसको प्रत्याध्यान कहते हैं।—माधव०, पृ० १४५।

प्रत्यानयन
संज्ञा पुं० [सं०] वापस लाना। फिर से प्राप्त करना [को०]।

प्रत्यानीत
वि० [सं०] वापस लाया हुआ। पुनः प्राप्त [को०]।

प्रत्यापत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. लौटना। वापसी। वापस होना। २. विरक्ति होना। वैराग्य [को०]।

प्रत्याम्नान (१)
वि० [सं०] प्रतिनिधित्व करनेवाला। प्रतिनिधि [को०]।

प्रत्याम्नाय (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. निगमन। अनुमान वाक्य का पाँचवा अवयव। २. प्रतिनिधि [को०]।

प्रत्याय
संज्ञा पुं० [सं०] राजस्व। कर।

प्रत्यायक
वि० [सं०] विश्वास देनेवाला। विश्वासदायक। २. व्याख्या करनेवाला।

प्रत्यायन
संज्ञा पुं० [सं०] १. (वधू को) घर ले आना। विवाह करना। २. (सूर्य का) अस्त होना। ३. विश्वास पैदा करना। ४. व्याख्या करना [को०]।

प्रत्यायित
संज्ञा पुं० [सं०] वह दूत या प्रतिनिधि जो पूर्णतः विश्वस्त हो [को०]।

प्रत्यारंभ
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुनः शुरू करना। पुनरारंभ। २. निरोध। निषेध। निवारण [को०]।

प्रत्यार्द्र
वि० [सं०] स्वच्छ। नूतन। ताजा [को०]।

प्रत्यालोढ़ (१)
संज्ञा पुं० [सं० प्रत्यालीढ] धनुष चलानेवालों के बैठने का एक प्रकार जिसमें वे धनुष चलाने के समय बायाँ पैर आगे बढ़ा देते हैं और दाहिना पैर पीछे खींच लेते हैं।

प्रत्यालीढ़ (२)
वि० खाया हुआ। भुक्त।

प्रत्यावर्तन
संज्ञा पुं० [सं०] लौट आना। वापस आना। उ०— गत प्रत्यागत में और प्रत्यावर्तन में दूर वे चले गए।—लहर, पृ० ७३।

प्रत्याशा
संज्ञा स्त्री० [सं०] आशा। उम्मेद। भरोसा।

प्रत्याशी
वि० [सं० प्रत्याशिन्] १. आशा करनेवाला। इच्छुक। चाहनेवाला। उ०—स्त्री का हृदय था; एक दुलार का प्रत्याशी, उसमें कोई मलिनता न थी।—तितली, पृ० ८३। २. (चुनाव में) उम्मीदवार।

प्रत्याश्रय
संज्ञा पुं० [सं०] वह स्थान जहाँ आश्रम लिया जाय। पनाह लेने की जगह।

प्रत्याश्वास
संज्ञा पुं० [सं०] पुनः श्वास लना। फिर से साँस लेना [को०]।

प्रत्याश्वासन
संज्ञा पुं० [सं०] ढाढ़स। धैर्य। सांत्वना [को०]।

प्रत्याश्वस्त
वि० [सं०] आश्वासन प्राप्त। आश्वस्त। जिसे सांत्वना दी गई हो [को०]।

प्रत्यासंकलित
संज्ञा पुं० [सं० प्रत्यासङ्कलित] पक्ष और विपक्ष की बातों को मिलाकर विचार करना [को०]।

प्रत्यासंग
संज्ञा पुं० [सं० प्रत्यासङ्ग] संबंध। संयोग। लगाव [को०]।

प्रत्यासत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] निकटता। सामीप्य। नजदीकी। २. दे० 'आसत्ति'। ३. निकट संबंध (को०)। ४. प्रसन्नता। उत्फुल्लता (को०)।

प्रत्यासन्न
वि० [सं०] पास आया हुआ। निकट पहुँचा हुआ। यौ० —प्रत्यासन्नमरण। प्रत्यामन्नमृत्यु = जिसकी मृत्यु निकट हो। जो मरणा सन्न हो।

प्रत्यासर
संज्ञा पुं० [सं०] १. सेना का पिंछला भाग। २. एक के बाद दूसरा व्यूह के क्रम से संयोजित सेना। वह सैन्यस्थिति जिसमें एक के बाद दूसरा ब्यूह हो (को०)।

प्रत्यासार
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रत्यासर'।

प्रत्यास्वर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य जो डूबने के बाद पुनः उगा हो।

प्रत्यास्वर (२)
वि० पुनः लौटनेवाला। जैसे, सूर्य। २. पुनः दीप्त। पुनः द्योतित होनेवाला [को०]।

प्रत्याहत
वि० [सं०] प्रतिरोधित। निवारित। हटाया हुआ [को०]।

प्रत्याहरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. इंद्रियनिग्रह। प्रत्याहार। २. हटाना। पीछे करना। ३. निग्रहण (को०)।

प्रत्याहार
संज्ञा पुं० [सं०] १. योग के आठ अंगों में से एक अंग जिसमें इंद्रियों को उनेक विषयों से हटाकर चित्त का अनुसरण किया जाता है। जैसे, यदि आँखें किसी सुंदर रूप पर बुरे भाव से जा पडें तो उन्हें वहाँ से हटाकर अपने चित्त को शांत करना। इसका अभ्यास बहुत ही कठिन माना जाता है। इंद्रियनिग्रह। उ०— प्रत्याहार धारना ध्यानं, लै समाधि लावै ठिकठौना।— सुंदर ग्रं०, भा २, पृ० ८६२। २. प्रलय। सृष्टि का विनाश (को०)। ३. हटाना। पीछे करना (को०)। ४. संक्षेप। सारसंग्रह (को०)। ५. निग्रह करना। निग्रहण (को०)। ६. व्याकरण में विभिन्न वर्ण- समूह को अभीप्सित रूप से संक्षेप में ग्रहण करने की पद्धति या संकेत। जैसे, 'अण्' से अ इ उ और अच् से समग्र स्वर वर्ण— अ, इ, उ, ऋ, लृ, ओ और औ, इत्यादि।

प्रत्याहूत
वि० [सं०] वापस बुलाया हुआ [को०]।

प्रत्याहृत
वि० [सं०] १. वापस लिया हुआ। फिर से प्राप्त किया हुआ। २. निगृहीत। जिसका निग्रह किया गया हो। ३. हटाया या पीछे खींचा हुआ [को०]।

प्रत्युक्त
वि० [सं०] उत्तिरत। जिसका जबाब दिया गया हो। उत्तर में कहा हुआ [को०]।

प्रत्युक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] जवाब। उत्तर।

प्रत्युच्चार
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रत्युच्चारण'।

प्रत्युच्चारण
संज्ञा पुं० [सं०] पुनरुक्ति। पुनः कथन [को०]।

प्रत्युज्जीवन
संज्ञा पुं० [सं०] मरे हुए व्यक्ति का फिर से जी उठना। पुनर्जीवन।

प्रत्युत (१)
संज्ञा पुं० [सं०] किसी दूसरे के पक्ष का खंडन या अपने पक्ष का मंडन करने के लिये विपरीत भाव। विपरीतता।

प्रत्युत (२)
अव्य० बल्कि। वरन्। इसके विरुद्ध। जैसे,—वे लोग माने नहीं प्रत्युत और भी आगे बढ़ने लगे।

प्रत्युत्क्रम
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह उद्योग जो कोई कार्य आरंभ करने के लिये किया जाय। २. वह आक्रमण जो युद्ध के समय सबसे पहले हो। ३. युद्ध का उपक्रम। लड़ाई की तैयारी (को०)।

प्रत्युत्क्रांति
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रत्युत्क्रान्ति] दे० प्रत्युत्क्रम [को०]।

प्रत्युत्तर
संज्ञा पुं० [सं०] उत्तर मिलने पर दिया हुआ उत्तर। जवाब का जवाब।

प्रत्युत्थान
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी बड़े या पूज्य के आने पर उसके स्वागत और आदर के लिये आसन छोड़कर उठ खड़ा होना। अभ्युत्थान। २. शत्रु आदि का सामना करने के लिये उठकर खड़ा होना (को०)। ३. लड़ाई की तैयारी करना (को०)। ४. किसी काम को करने की व्यवस्था करना (को०)।

प्रत्युत्थित
वि० [सं०] जो मिलने वा सामना करने के लिये उठ खड़ा हुआ हो [को०]।

प्रत्युत्पन्न
वि० [सं०] १. जो फिर से उत्पन्न हुआ हो। २. जो ठीक समय पर उत्पन्न हुआ हो। यौ०— प्रत्युत्पन्नबुद्धि, प्रत्युत्पन्नमति = (१) जो तुरंत ही कोई उपयुक्त बात या काम सोच ले। ठीक समय पर जिसकी बुद्धि काम कर जाय। तप्तर बुद्धिवाला। (२) ठीक समय पर काम देनेवाली बुद्धि। अवसर पड़ते ही उपयुक्त कार्य कर दिखानेवाली बुद्धि। उ०— उसके साथी अपनी हास्योद्दीपक उक्तियों और प्रत्युत्पन्नमति के लिये प्रसिद्ध थे।—अकबरी०, पृ० २३।

प्रत्युत्पन्नार्थ कृच्छ
वि० [सं०] (राज्य या राष्ट्र) जो अर्थ- संकट में पड़ गया हो, अर्थात् जिसके शासन का खर्च आमदनी से न मधता हो।

प्रत्युदाहरण
संज्ञा पुं० [सं०] विरोधी उदारहण। विपरीत उदाहरण [को०]।

प्रत्युद्गत
वि० [सं०] १. आसन से उठकर किसी के आदरार्थ आगे बढ़ा हुआ। २. विरोध में गया हुआ [को०]।

प्रत्युदगति
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'प्रत्युदगमन' [को०]।

प्रत्युदगम
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रत्युदगमन' [को०]।

प्रत्युदगमन
संज्ञा पुं० [सं०] किसी के आने पर उसका स्वागत करने के लिये उठकर खड़ा हो जाना। अभ्युत्थान।

प्रत्युदगमनीय (१)
वि० [सं०] १. सामने या पास रखने योग्य। २. संमान के योग्य। पूज्य।

प्रत्युदमनीय (२)
संज्ञा पुं० एक प्रकार का वस्त्र (अधोवस्त्र ओ० उत्तरीय) जो प्राचीन काल में यज्ञों में या भोजन के समय पहना जाता था।

प्रत्युदगार
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का वायु रोग।

प्रत्युद्धरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. फिर से प्राप्त करना। २. फिर से उठाना [को०]।

प्रत्युद्यम
संज्ञा पुं० [सं०] विरोधी प्रयत्न। प्रतिक्रिया। प्रति- रोध [को०]।

प्रत्युपकार
संज्ञा पुं० [सं०] वह उपकरा जो किसी उपकार के बदले में किया जाय। एक भलाई के बदले में की जानेवाली दूसरी भलाई।

प्रत्युपकारी
संज्ञा पुं० [सं० प्रत्युपकारिन्] उपकार का बदला देनेवाला। वह जो किसी उपकार के बदले में उपकार करे।

प्रत्युपदेश
संज्ञा पुं० [सं०] उपदेश के परिवर्तन में कथित उपदेश। राय के बदले में राय [को०]।

प्रत्युपन्न
वि० [सं०] दे० 'प्रत्युत्पन्न' [को०]।

प्रत्थुपमान
संज्ञा पुं० [सं०] १. सदृश की प्रतिमूर्ति या रूप। उपमान का उपमान। २. उपमान। प्रतिमान [को०]।

प्रत्युपलब्ध
[सं०] पुनःप्राप्त। फिर से प्राप्त [को०]।

प्रत्युपस्थान
संज्ञा पुं० [सं०] पड़ोस। परोस [को०]।

प्रत्युपस्थित
वि० [सं०] १. पहुँचा या अभी आया हुआ। २. उपस्थित [को०]।

प्रत्युप्त
वि० [सं०] १. जटित। खचित। बैठाया हुआ। २. उप्त। बोया हुआ [को०]।

प्रत्युलूक
संज्ञा पुं० [सं०] १. काक। कौआ। २. उलूक के समान एक पक्षी [को०]।

प्रत्युष
संज्ञा पुं० [सं० प्रत्युषः, प्रत्युषस्] प्रभात। तड़का।

प्रत्यूढ
वि० [सं०] १. प्रत्याख्यात। निराकृत। २. तिरस्कृत। उपेक्षित। ३. अतिक्रमित। ४. आच्छादित। आवृत। पिनद्ध [को०]।

प्रत्यूष
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रभात। तड़का। प्रातःकाल। २. सूर्य। ३. एक वसु का नाम।

प्रत्यूह
संज्ञा पुं० [सं०] विघ्न। बाधा। उ०— कहत कठिन समुझत कठिन साधन कठिन बिवेक। होइ घुनाक्षर न्याय जौ, पुनि प्रत्यूह अनेक।—मानस, ७। ११८।

प्रत्येक
वि० [सं०] समूह अथवा बहुतों में से हर एक, अलग अलग। जैसे,— (क) प्रत्येक मनुष्य का यह कर्तव्य है। (ख) प्रत्येक बालक को एक एक नारंगी दो। (ग) प्रत्येक पत्र पर दस्तखत करो।

प्रत्येकत्व
संज्ञा पुं० [सं०] प्रत्येक का भाव या धर्म।

प्रत्येकबुद्ध
संज्ञा पुं० [सं०] एक बुद्ध का नाम। पच्चेक वृद्ध।

प्रथन
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का गुल्म। २. विस्तार। ३. प्रकाश में लाने की क्रिया या भाव। ४. बिखराना। बिखेरना (को०)। ५. फेंकना (को०)। ६. बिखराने या फैलाने का स्थान (को०)।

प्रथम (१)
वि० १. गणना में जिसका स्थान सबसे पहले हो। जो गिनती में सबसे पहले आवे। पहला। आदि का। अव्वल। उ०— एक मोहनहि अगनित तरुति तकति प्रथमहि डीठि अँकवारि मैं भरति कसि।—घनानंद, पृ० ४७६। २. सर्व- श्रेष्ठ। सबसे अच्छा। ३. प्रधान। मुख्य। यौ०—प्रथम पुरुष।

प्रथम (२)
क्रि० वि० [सं०] पहले। पेश्तर। आगे। आदि में।

प्रथमक
वि० [सं०] पहला। प्रथम [को०]।

प्रथमकल्प
संज्ञा पुं० [सं०] १. सबसे अच्छा ढंग या उपाय। २. प्रधान या मुख्य नियम [को०]।

प्रथमकवि
संज्ञा पुं० [सं०] आदि कवि। वाल्मिकी। उ०— प्रथम कवि का ज्यों सुंदर छंद।—कामायनी, पृ० ४५।

प्रथमकल्पिक
वि० [सं०] जो साधना की प्रथम सीढ़ी पर हो [को०]।

प्रथमकारक
संज्ञा पुं० [सं०] व्याकरण में 'कर्ता' (कारक)। विशेष— दे० 'कर्ता'।

प्रथमकुसुम
संज्ञा पुं० [सं०] सफेद फूल के अगस्त का वृक्ष। श्वेत अगस्त।

प्रथमज
वि० [सं०] १. जो पहले उत्पन्न हुआ हो। जिसका जन्म पहले हुआ हो। २. जो सबसे पहले गर्भ से उत्पन्न हुआ हो। ३. बड़ा। ज्येष्ठ।

प्रथमतः
क्रि० वि० [सं० प्रथमतस] पहले से। सबसे पहले।

प्रथमदर्शन
संज्ञा पुं० [सं०] पहली बार देखना [को०]।

प्रथमधार
संज्ञा स्त्री० [सं०] पहली वर्षा। प्रथम दृष्टि [को०]।

प्रथमनवनीत
संज्ञा पुं० [सं०] वह दूध जो गाय के ब्याने के सौ दिन बीत जाने पर दुहा जाता है [को०]।

प्रथमनिर्दिष्ट
वि० [सं०] जिसका उल्लेख या कथन पहले हुआ हो। पूर्वकथित [को०]।

प्रथमपुरुष
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'उत्तम पुरुष'।

प्रथममंगल
संज्ञा पुं० [सं० प्रथममङ्गल] बहुकल्याण या शुभ [को०]।

प्रथमयौवन
संज्ञा पुं० [सं०] युवावस्था का प्रथम चरण। चढ़ती जवानी [को०]।

प्रथमरात्र
संज्ञा स्त्री० [सं०] रात का पहला पहर [को०]।

प्रथमवयस्
संज्ञा पुं० [सं०] बालकाल। बाल्यावस्था [को०]।

प्रथमवयसी
वि० [सं० प्रथमवयसितन] नई उम्र का। छोटी अवस्थावाला [को०]।

प्रथमवसति
संज्ञा स्त्री० [सं०] मूल निवास। मूल स्थान [को०]।

मूलवित्ता
स्त्री० [सं०] पहली स्त्री। पहली पत्नी [को०]।

प्रथमसाहस
संज्ञा पुं० [सं०] प्राचीन व्यवहार शास्त्र के अनुसार एक प्रकार का साहस दंड जिसमें ३५० पण तर जुरमाना होता था। यह दंड साधारण अपराधों के लिये होता था।

प्रथमस्कान
संज्ञा पुं० [सं०] वेदमंत्र उच्चारण करने के समय सबसे नीचा या धीमा स्वर।

प्रथमस्वर
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का सामगान।

प्रथमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मदिरा। शराब। (तांत्रिक)।उ०— (क) कृष्णदेव बलदेव सुज्ञानी। प्रथमा पिवत सदा ज्यों पानी।—निश्चल (शब्द०)। (ख) सकल पिए प्रथमा मतिवारे। पूजन शक्ति मगन मन सारे।—निश्चल (शब्द०)। २. व्याकरण का कर्ता कराक।

प्रथमार्द्ध
संज्ञा पुं० [सं०] पहले का आधा भाग। शुरू का आधा। पूर्वादर्ध।

प्रथमार्ध
संज्ञा पुं० [सं०] पूर्वार्ध। शुरू का आधा।

प्रथमाश्रम
संज्ञा पुं० [सं०] चार प्रकार के आश्रमों में पहला, ब्रह्मचर्याश्रम [को०]।

प्रथमी पु ‡
संज्ञा स्त्री० [सं० पृथिवी] दे० 'पृथ्वी'।

प्रथमेतर
वि० [सं०] पहले के अतिरिक्त। दूसरा [को०]।

प्रथमोदित
वि० [सं०] पहले कहा हुआ। प्रथम कथित [को०]।

प्रथा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. रीति। रिवाज। प्रणाली। नियम। २. ख्याति। प्रसिदि्ध।

प्रथागत
वि० [सं० प्रथा + गत] रीति के अनुसार। परंपरानु- सार। परंपराप्राप्त। उ०— यह धर्म की बेड़ी नहीं है, कदापि नहीं, प्रथागत पतिव्रत भी नहीं।—मान०, भा० १, पृ० ३२२।

प्रथित (१)
वि० [सं०] १. प्रख्यात। मशहूर। २. परंपरागत। रीति के अनुकूल। ३. प्रचलित। ४. दिखाया हुआ। प्रदर्शित (को०)। ५. विस्तृत (को०)।

प्रथित (२)
संज्ञा पुं० १. पुणानुसार स्वारोचिष मनु कै पुत्र का नाम। २. विष्णु (को०)।

प्रथिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] ख्याति। प्रसिदि्ध।

प्रथिमा
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रथिमन्] चौड़ाई। विस्तार। फैलाव [को०]।

प्रथिवी
संज्ञा स्त्री० [सं०] पृथ्वी। धरा [को०]।

प्रथी ‡
संज्ञा स्त्री० [सं० पृथ्वी] दे० 'पृथ्वी'। उ०— प्रथी वायु गेनाय तेजंस लालं।—पृ० रा०, १। ३९४।

प्रथु (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. विष्णु। २. दे० 'पृथु'।

प्रथु पु (२)
वि० [सं० पृथु] स्थूल। दे० 'पृथु'। उ०— प्रथुल, प्रासु, परिणाह, प्रथु, आरत तुंद विशाल।—नंद ग्रं०, पृ० ८७।

प्रथुक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] चिचड़ा [को०]।

प्रथुक पु (२)
वि० [हिं०] दे० 'पृथक'। उ०— अवर पंच सामंत अध। दीनौ प्रयुक पथार।—पृ० रा०, ५८। २६७।

प्रथुरोम पु
संज्ञा स्त्री० [सं० पृथुलोमन्] दे० 'पृथुलोमा'। उ०— सफरी अनमिष मत्स तिमि प्रथुरोमा पाठीन।— अनेकार्थ०, पृ० ८०।

प्रथुल पु
वि० [सं० पृथुल] दे० 'प्रथुल'। उ०— प्रथुल, प्रासु, परिणाह, प्रथु, अरत तुंद विशाल। दीर्घ स्वास जो भरत बलि, का कगून है बाल।—नंद० ग्रं०, पृ० ८७।

प्रथ्वी
संज्ञा स्त्री० [सं० पर्थिवी] दे० 'पृथ्वी'। उ०— तिनकी देह छाया नहि होई। सर्ब प्रथ्वी प्रमानिक सोई।—कबीर सा०, पृ० ९३५।

प्रद
वि० [सं०] देनेवाला। जो दे। दाता। विशेष— इश शब्द का प्रयोग सदा यौगिक शब्दों के अंत में होता है। जैसे, मोक्षप्रद, आनंदप्रद, कामप्रद।

प्रदक्खणाँ पु
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रदक्षिणा] दे० 'प्रदक्षिण'। उ०— दे प्रदक्खणाँ दस्वें चढै़। उस नगरी सम सोझी पडै़।—प्राण०, पृ० २७४।

प्रदक्षिण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] देवपूजन आदि के समय देवमूर्ति आदि को दाहिनी और कर, भक्तिपूर्वक उसके चारों ओर घूमना। परिक्रमा। उ०— उभय धरी मँह दीन्ह मैं सात प्रदक्षिण धाय।— तुलसी (शब्द०)। विशेष— साधारण बोलचाल में इस शब्द के साथ केवल 'करना' क्रिया का ही प्रयोग होता है। पर कहीं कहीं, और विशेषतः कविता में इसके साथ 'लगना', 'देना' आदि क्रियाओं का भी व्यवहार होता है जैसा ऊपर के उदारहण से प्रकट है। यौ०— प्रदक्षिणाक्रिया = परिक्रमा। प्रदक्षिणा। प्रदक्षिणपट्टिका = आँगद। अँगना।

प्रदक्षिण (२)
वि० १. समर्थ। योग्य। २. दाहिनी ओर स्थित (को०)। ३. अनुकूल। विनम्र (को०)। ४. शुभ। मंगल। सुलक्षण (को०)।

प्रदक्षिणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'प्रदक्षिण (१)'।

प्रदक्षिणार्चि
वि० [सं०] जिसकी लपट या ज्वाला दाहिनी ओर हो (अग्नि)।

प्रदग्ध
वि० [सं०] अच्छी तरह दग्ध या जला हुआ [को०]।

प्रदच्छिन पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रदक्षिण] परिक्रमा। प्रदक्षिण। उ०—कीन्ह प्रणाम प्रदच्छिन लाई।— तुलसी (शब्द०)।

प्रदत्त (१)
वि० [सं०] जो दिया जा चुका हो। दिया हुआ।

प्रदत्त (२)
संज्ञा पुं० एक गंधर्व का नाम।

प्रदर
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्त्रियों का एक रोग जिसमें उनके गर्भाशय से सफेद या लाल रंग का लसदार पानी सा बहता है, जिसमें कभी कभी दुर्गंध भी होती है। विशेष— इसमें रोगी स्त्री को वेदना होती है उसका शरीर दिन पर दिन सूखता जाता है। जिसमें स्राव सफेद रंग का होता है उसे श्वेत और जिसमें लाल रंग का होता है उसे रक्त प्रदर कहते हैं। वैद्यक के अनुसार यह रोग मद्यपान, गर्भपात, अदिक मैथुल, शोक, उपवास आदि के कारण होता है। यह रोग प्रायः संतान उत्पन्न होने के उपरांत हुआ करता है। २. बाण। तीर। २. फोड़ने या तोड़ने का भाव। ४. छिद्र। संध। दरार (को०)। ५. सेना का इतस्ततः होना। सेना का अस्तव्यस्त होना (को०)।

प्रदर्प
संज्ञा पुं० [सं०] प्रचंड। अभिमान। अत्यधिक घमंड। उ०— सुंदर प्रदर्प दर्प उन्नत उतंग जुग्म कैधों कुच आकृत अनंग कर ढारे री।— पजनेस०, पृ० ३६।

प्रदर्श
संज्ञा पुं० [सं०] १. रूप। आकार आकृति। २. आदेश। निर्देश [को०]।

प्रदर्शक
संज्ञा पुं० [सं०] १. दिखलानेवाला। समझानेवाला। वह जो कोई चीज देखलावे। जैसे, पथप्रदर्शक। २. वह जो दर्शन करे। दर्शक। ३. गुरु। ४. सिद्धांत। वाद। मत (को०)। ५. अनागतदर्शी। भविष्यवक्ता (को०)।

प्रदर्शन
संज्ञा पुं० [सं०] १. दिखलाने का काम। २. दे० 'प्रदर्शनी। ३. समझाना। ब्याख्या करना (को०)। ४. संकेत। इशारा (को०)। ५. उदाहरण (को०)। ६. भविष्यवाणी (को०)। ७. रूप। आकार (को०)।

पदर्शनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्थान जहाँ तरह तरह की चीजें लोगों को दिखलाने के लिये रखी जायँ। नुमाइश। जैसे, कृषिप्रदर्शनी, शिल्पप्रदर्शनी, कपड़ों की प्रदर्शनी।

प्रदर्शित
वि० [सं०] १. जो दिखलाया गया हो। दिखलाया हुआ। २. समझाया हुआ। सिखाया हुआ। बताया हुआ (को०)।

प्रर्दर्शी
संज्ञा पुं० [सं० प्रदर्शिन्] वह जो देखता हो। दर्शक। २. दिखानेवाला। प्रदर्शक (को०)।

प्रदल
संज्ञा पुं० [सं०] बाण। तीर।

प्रदव
संज्ञा पुं० [सं०] ताप। दाह। ज्वलन [को०]।

प्रदव्य
संज्ञा पुं० [सं०] दावाग्नि [को०]।

प्रदाता (१)
वि० [सं० प्रदातृ] दाता। देनेवाला।

प्रदाता (२)
संज्ञा पुं० १. वह जो खूब दान देता है। बहुत बड़ा दानी। २. इंद्र। ३. वह जो विवाह में कन्यादान करता है (को०)। ४. ४. विश्वेदेवा के अंतर्गत एक देवता का नाम।

प्रदान
संज्ञा पुं० [सं०] देने की क्रिया। देना। उ०— तुम अन्य प्रदान करो, न करो।— अर्चना, पृ० ४४। २. दान। बखशीस। ३. विवाह। शादी। ४. अंकुश। सृणि। ५. वलि। नैवेद्य [को०]। ६. प्रत्याख्यान। खंडन (को०)।

प्रदानक
संज्ञा पुं० [सं०] उपहार। भेंट। दान [को०]।

प्रदानकृपण
वि० [सं०] देने में हीला करनेवाला। कंजूस [को०]।

प्रदानशूर
संज्ञा पुं० [सं०] १. बोधिसत्व का नाम। २. बहुत बड़ा दानी। दानवीर (को०)।

प्रदाय
संज्ञा पुं० [सं०] भेंट। प्रदानक। उपहार [को०]।

प्रदायक
वि०, संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० प्रदायिका] देनेवाला। जो दे।

प्रदायी
वि०, संज्ञा पुं० [सं० प्रदायिन्] [स्त्री० प्रदायिनी] देनेवाला। जो दे।

प्रदाव
संज्ञा पुं० [सं०] दावाग्नि। जंगल की आग।

प्रदाह
संज्ञा पुं० [सं०] १. ज्वर आदि के कारण अथवा और किसी कारण शरीर में होनेवाली जलन। दाह। विशेष— प्रदाह कभी सारे शरीर में, कभी किसी अंग में जैसे, मूत्रेंद्रिय, सिर या फेफडे़, और कभी किसी अंग के बहुत ही थोडे़ अंश में होता है। ज्वर आदि का प्रदाह सारे शरीर में और व्रण आदि होने कसे पहले किसी थोडे़ से स्थान में होता है। शरीर के अंदर किसी प्रकार का आघात या उपद्रव होने, स्नायु में किसी प्रकार की उत्तेजना आदि होने अथवा और किसी प्रकार का आघात होने पर प्रदाह उत्पन्न होता है। कभी कभी जहरीले जानवरों के काटने या अधिक गरमी पहुँचने के कारण भी प्रदाह होता है। जिस स्थान पर प्रदाह होता है उस स्थान पर कभी कभी सूजन आदि भी हो जाती है, या वहाँ से कुछ तरल पदार्थ निकलने लगता है। २. विनाश। बरबादी। विध्वंस। प्रलय (को०)।

प्रदिक्
संज्ञा पुं० [सं०] विशेष प्रकार से पका हुआ मांस।

प्रदिग्ध (२)
वि० स्निग्ध किया हुआ। तेल या घी से चुपड़ा। चिकना किया हुआ।

प्रदिव्य
वि० [सं०] दे० 'दिव्य'। उ०— प्रथम प्रदिव्य मु्द भंजित अभीत छिद्र ध्रुव विक्षमा प्रपन्न गुल प्रतिकर कुंद।—पज- नेस०, पृ० २४।

प्रदिशा
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रदिश्] दो मुख्य दिशाओं के बीच का कोना। कोण। विदिशा।

प्रदिष्ट
वि० [सं०] १. प्रदर्शित। संकेतित। २. निर्देशित। आदेशित। स्थिर किया हुआ। नियत किया हुआ [को०]।

प्रदिष्टाभय
वि० [सं०] जिसे राज्य की ओर से रक्षा का वचन मिला हो। राज्य द्वारा संरक्षित।

प्रदीप
संज्ञा पुं० [सं०] १. दीपक। दीआ। चिराग। २. रोशनी। प्रकाश। ३. वह जिससे प्रकाश हो। ४. संपूर्ण जाति का एक राग जिसे गाने का समय तीसरा पहर है। किसी किसी के मत से यह दीपक राग का एक पुत्र है। विशेष— ग्रंथादि के अंत में लगने पर इसका अर्थ व्याख्या करने या स्पष्ट करनेवाला और वंश या कुलवाचक शब्दों के साथ लगने पर ज्योतित करनेवाला, रोशन करनेवाला अर्थ देता है। जैसे, काव्यप्रकाशप्रदीप, काव्यप्रदीप, वंशप्रदीप, कुलप्रदीप।

प्रदीपक
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० प्रदीपिका] १. प्रकाशक। प्रकाश में लानेवाला। प्रकाशित करनेवाला। २. उद्दीप्त करनेवाला। उकसानेवाला (को०)। ३. नौ प्रकार के विषों में से एक प्रकार का भयंकर स्थावर विष जिसके सूँघने मात्र से मनुष्य मर जाता है। विशेष— यह विष के एक पौधे की जड़ है जिसके पत्ते खजूर के से होते हैं और जो समुद्र के किनारे बहुतायत से पैदा होता है। इसे प्रदीपन भी कहते हैं।

प्रदीपति पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रदीप्ति] दे० 'प्रदीप्ति'।

प्रदीपन
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रकाश करने का काम। उजाला करना। २. उज्वल करना। चमकाना। ३. एक प्रकार काभयंकर विष जिसे प्रदीपक भी कहते हैं। विशेष —दे० 'प्रदीपक'।

प्रदीपन (२)
वि० १. प्रज्वलित करनेवाला। २. प्रकाशित करनेवाला। ३. उत्तेजित करनेवाला। उत्तेजक [को०]।

प्रदीपिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. छोटा दीपक। २. एक रागिनी जो किसी किसी के मत से दीपक राग की स्त्री है। ३. व्याख्या। भाष्य (को०)।

प्रदीप्त
वि० [सं०] १. जलता हुआ। जगमगाता हुआ। जिसमें प्रकाश हो। प्रकाशवान्। प्रकाशित। २. जिसमें दीप्ति हो। उज्वल। चमकदार। चमकीला। ३. उठाया हुआ। फैलाया हुआ (को०)। ४. उत्तेजित। जगाया हुआ (को०)।

प्रदीप्तप्रज्ञ
वि० [सं०] तीक्ष्णबुदि्ध। जिसकी बुदि्ध तेज हो [को०]।

प्रदीप्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. रोशनी। प्रकाश। २. चमक। आभा।

प्रदीषणा पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'प्रदक्षिण'। उ०— धन्य दीहा- ड़उ आज कौ। दैई प्रदीषणा लागइ छइ पाई।— बी० रासो०, पृ० ९६।

प्रदुमन पु
संज्ञा पुं० [अं० प्रद्युम्न] दे० 'प्रद्युम्न'। उ०— कृष्ण के भयो प्रदुमन बारा।—कबीर सा०, पृ० ४७।

प्रदुष्ट
वि० [सं०] १. बिगड़ा हुआ। भ्रष्ट। २. बुरा। दुष्ट। पापी। ३. विषयी। कामुक [को०]।

प्रदूषक
वि० [सं०] १. नष्ट करनेवाला। २. दूषित करनेवाला।

प्रदूषण
संज्ञा पुं० [सं०] १. नष्ट करना। चौपट करना। २. दूषित करना। दोषयुक्त करना (को०)।

प्रदूषित
वि० [सं०] भ्रष्ट। बिगड़ा हुआ। विकृत [को०]।

प्रदृप्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] गर्व। अभिमान। प्रदर्प [को०]।

प्रदेय (१)
वि० [सं०] १. जो देने योग्य हो। दान करने योग्य। देने (या विवाह करने) के योग्य (कन्या)।

प्रदेय (२)
संज्ञा पुं० वह जो कुछ उपहार में दिया जाय। भेंट। नजर।

प्रदेश
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी देश का वह बड़ा विभाग जिसकी भाषा, रीतिव्यवहार, जलवायु, शासनपद्धति आदि उसी देश के अन्य विभागों की इन सब बातों से भिन्न हों। प्रांत। सूबा। २. स्थान। जगह। मुकाम। ३. अँगूठे के अगले सिरे से लेकर तर्जनी के आगले सिरे तक की दूरी। छोटा बित्ता या बालिश्त। ४. अंग। अवयव। ५. सुश्रुत के अनुसार एक प्रकार की तंत्र युक्ति। ६. दीवार। ७. संज्ञा। नाम। ८. दिखाना। निर्देश करना (को०)। ९. व्याकरण में उदाहरण या निदर्शन। उदाहरण या दृष्टांत द्वारा स्पष्टीकरण (को०)।

प्रदेशकारी
संज्ञा पुं० [सं० प्रदेशकारिन्] योगियों का एक संप्रदाय।

प्रदेशन
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो कुछ किसी बडे़ या राजा को उपहार के रूप में दिया जाय। भेंट। नजर। २. परामर्श। उपदेश। सलाह (को०)। ३. दिखलाना। दिखाना (को०)।

प्रदेशनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] अँगूठे के पास की उँगली। तर्जनी।

प्रदेशित
वि० [सं०] दिखालाया हुआ [को०]।

प्रदेशिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'प्रदेशनी'।

प्रदेशी
वि० [सं०] प्रेदश संबंधी। प्रदेश का।

प्रेदशीय
वि० [सं०] प्रदेश का। प्रदेश से संबंधित।

प्रदेष्टा
संज्ञा पुं० [सं० प्रदेष्ट] प्रदेशविशेष के कर की वसूली का प्रबंध करनेवाला और चोर, डाकुओं आदि को दड देकर शांति रखनेवाला अधिकारी। विशेष— इसका कार्य आजकल के कलक्टर के कार्य से मिलता जुलता होता था।

प्रदेह
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह औषध या लेप आदि जो फोडे़ पर, उसे दबाने के लिये लगाया जाय। २. सुश्रुत के अनुसार एक प्रकार का व्यंजन।

प्रदोष (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. संध्याकाल। रजनीमुख। सूर्य के अस्त होने का समय। विशेष— कुछ लोग रात के पहले पहर को भी प्रदोष कहते हैं। २. वह अँधेरा जो संध्या समय होता है। ३. त्रयोदशी का व्रत जिसमें दिन भर उपवास करके संध्या समय शिव का पूजन करके तब भोजन करना होता है। यह व्रत प्रायः पुत्र को कामना से किया जाता है। ४. अव्यवस्था (को०)। ५. बड़ा दोष। भारी अपराध।

प्रदोष (२)
वि० दुष्ट। पाजी।

प्रदोषक
वि० [सं०] प्रदोष काल में उत्पन्न [को०]।

प्रदोहन
स्त्री० पुं० [सं०] दोहन करना। दुहना [को०]।

प्रद्धटिका
संज्ञा स्त्री० [?] दे० 'पज्झटिका'।

प्रद्यु
संज्ञा पुं० [सं०] पुण्य जिससे उत्तम लोक स्वर्ग की प्राप्ति होती है [को०]।

प्रद्युतित
वि० [सं०] घोतित। प्रकाशित। प्रज्वलित [को०]।

प्रद्युम्न (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. कामदेव। कंदर्प। २. श्रीकृष्ण के बडे़ पुत्र का नाम। ३. नड्वला के गर्भ से उत्पन्न मनु के एक पुत्र का नाम। ४. वैष्णवों के अनुसार चतुर्ब्यूहात्मक विष्णु के एक अंश का नाम। (शेष तीन अँशों के नाम वासुदेव, संकर्षण और अनिरुद्ध हैं।)

प्रद्युम्न (२)
वि० अत्यंत बली। बहुत बड़ा वीर।

प्रद्युम्नक
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव। कंदर्प [को०]।

प्रद्योत
संज्ञा पुं० [सं०] १. किरण। रश्मि। दीप्ति। आभा। २. चमक। ३. प्रकाशित करना या होना। ४. एक यक्ष का नाम। ५. उज्जैनी के प्राचीन नरेश का नाम (को०)।

प्रद्योतन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य। २. चमक। दीप्ति। ३. चमकना। द्योतित होना।

प्रद्योतन (२)
वि० चमकीला। चमकनेवाला।

प्रद्रव (१)
वि० [सं०] तरल। द्रव [को०]।

प्रद्रव (२)
संज्ञा पुं० दौड़ना। भागना। पलायन [को०]।

प्रद्राव
संज्ञा पुं० [सं०] १. भागना। दौड़ना। पलायन करना। २. तेजी से दौड़ना या भागना [को०]।

प्रद्रावी
वि० [सं० प्रदाविन्] दौड़नेवाला। भागनेवाला। पलायन- शील [को०]।

प्रद्वार
संज्ञा पुं० [सं०] द्वार के आस पास या आगे का भाग। दरवाजे का अगला भाग।

प्रद्वेष, प्रद्वेषण
संज्ञा पुं० [सं०] १. शत्रुता। बैर। दुश्मनी २. घृणा।

प्रद्वेषी
संज्ञा स्त्री० [सं०] महाभारत के अनुसार दीर्घतमा ऋषि की स्त्री का नाम।

प्रधन
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जिसके पास बहुत अधिक धन हो। २. युद्ध। लड़ाई। ३. दारण। विदारण (को०)। ४. युद्ध में लूट का धन (को०)। ५. विध्वंस। विनाश (को०)।

प्रधमन
संज्ञा पुं० [सं०] १. वैद्यक में वह क्रिया जिसमें कोई औषध या चूर्ण आदि नाक के रास्ते, जोर से सुँघाकर ऊपर चढ़ाया जाय। २. वैद्यक में एक प्रकार की सुँघनी।

प्रधर्ष
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रधर्षण'।

प्रधर्षक
वि० [सं०] १. आक्रमण करनेवाला। कष्ट देनेवाला। सतानेवाला। २. बलात्कार करनेवाला। सतीत्व नष्ट करनेवाला [को०]।

प्रधर्षण
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० प्रधर्षक] १. अपमान। अनादर। २. जबरदस्ती किसी स्त्री का सतीत्व भंग करना। बलात्कार। ३. आक्रमण।

प्रधर्षित
वि० [सं०] १. जिसपर आक्रमण किया गया हो। २. जिसका अनादर किया गया हो। ३. (वह स्त्री) जिसके साथ बलात्कार किया गया हो। ३. उद् दंड। उद्धत। अभि- मानी (को०)।

प्रधा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दक्ष प्रजापति की एक कन्या जो कश्यप को ब्याही गई थी।

प्रधान (१)
वि० [सं०] १. मुख्य। खास। २. सर्वाच्च। श्रेष्ठ।

प्रधान (२)
संज्ञा पुं० १. नेता। मुखिया। सरदार। २. सचिव। मंत्री। वजीर। ३. संसार का उपादान कारण। प्रवृत्ति। ४. बुद्धि। समझ। ५. ईश्वर। परमात्मा। ६. सेनाध्यक्ष। महापात्र। ७. एक राजर्षि का नाम। ८. प्रकृति (को०)।

प्रधानक
संज्ञा पुं० [सं०] सांख्य के अनुसार बुद्धि तत्व।

प्रधानकर्म
संज्ञा पुं० [सं० प्रधानकर्म्मन्] सुश्रुत के अनुसार तीन प्रकार के कर्मों में से एक कर्म जो रोग की उत्पत्ति हो जाने पर किया जाता है।

प्रधानतः
क्रि० वि० [सं० प्रधानतस्] प्रधान रूप से। मुख्य रूप से। मुख्यतया [को०]।

प्रधानता
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रधान होने का भाव, धर्म, कार्य या पद।

प्राधानधातु
संज्ञा पुं० [सं०] शरीर के सब धातुओं में से प्रधान शुक्र और वीर्य।

प्रधानपुरुष
संज्ञा पुं० [सं०] १. राज्य या शासन आदि का प्रमुख व्यक्ति। २. शिव [को०]।

प्रधानसभिक
संज्ञा पुं० [सं०] द्यूतगृह का मुखिया। जुआघर का प्रधान [को०]।

प्रधानमंत्री
संज्ञा पुं० [सं० प्रधानमन्त्रिन्] किसी देश, राज्य या राष्ट्र का वह प्रमुख व्यक्ति जो सभी मंत्रियों से बड़ा होता है तथा शासन का प्रधान संचालक होता है।

प्रधानांग
संज्ञा पुं० [सं० प्रधानाङ्ग] १. मुख्य अवयव। प्रधान अंग। २. राज्य का प्रसिद्ध व्यक्ती [को०]।

प्रधानात्मा
संज्ञा पुं० [सं० प्रधानात्मन्] विष्णु [को०]।

प्रधानाध्यापक
संज्ञा पुं० [सं०] किसी शिक्षासंस्था का मुख्य शिक्षक जो अध्यायन के साथ संस्था की व्यवस्था भी करता है।

प्रधानामात्य
संज्ञा पुं० [सं०] प्रधान मंत्री। मंत्रिसमूह में प्रधानता- प्राप्त मंत्री।

प्रधानी पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० प्रधान + ई (प्रत्य०)] प्रधान का पद या कर्म।

प्रधानोत्तम
संज्ञा पुं० [सं०] १. युद्धेप्सु। वीर। २. लब्धप्रतिष्ठ। अत्यंत प्रसिद्ध। विश्रुत [को०]।

प्रधारण
संज्ञा पुं० [सं०] १. रक्षण। गुप्ति। २. धारण करना [को०]।

प्रधारणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] मस्तिष्क को किसी एक ओर या किसी विषय पर जमाना [को०]।

प्रधावन
संज्ञा पुं० [सं०] १. वायु। हवा। २. धावक। दौड़नेवाला (को०)। ३. मलना। साफ करना (को०)।

प्रधावित
वि० [सं०] दौड़ता हुआ। तीव्र गति से युक्त। उ०— भूले हुए क्लेश को, हो रहे प्रधावित तुम्हारे तीर्थ देश को।—बापू, पृ० १९।

प्रधि
संज्ञा पुं० [सं०] १. पहिए का धुरा। २. कुआँ (को०)। ३. मंडल। चक्र (को०)। ४. खंड। विच्छेद (को०)।

प्रधी (१)
वि० [सं०] प्रकृष्ट बुद्धिवाला। अत्यधिक चतुर [को०]।

प्रधी (२)
संज्ञा स्त्री० प्रकृष्ट मति। उत्कृष्ट बुद्धि [को०]।

प्रधीर
वि० [सं०] धीरधारी। धैर्यवान्। धैर्यशील। उ०—ओछे अंक निकस उरोज उकसन लागे हियरस पीकर को पजन प्रधीरें जे।—पजनेस०, पृ० ५।

प्रधूपित
वि० [सं०] १. तप्त। तपाया हुआ। २. दीप्त। चमकता हुआ। ३. जिसे संताप या दुःख हुआ हो। ४. सुवासित। धूपित (को०)।

प्रधूपिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह दिशा जिधर सूर्य बढ़ रहा हो। २. कुष्टपीड़ित। दुःख में पड़ी हुई नारी (को०)।

प्रधूमित
वि० [सं०] धुएँ से भरा हुआ। भीतर ही भीतर जलनेवाला [को०]।

प्रध्मापित
वि० [सं०] वायु से पूरित किया हुआ। फूँका हुआ। बजाया हुआ [को०]।

प्रध्यान
संज्ञा पुं० [सं०] विशिष्ट ध्यान या चिंतन। गंभीर चिंतन। प्रगाढ़ चिंतन [को०]।

प्रधृष्ट
वि० [सं०] १. धर्षित। अपमानित। तिरस्कृत। २. उद्दंड। घमंडी। उद् धत [को०]।

प्रध्मापन
संज्ञा पुं० [सं०] वायु के आवागमन को ठीक रखने के लिये श्वास नली को ठीक करने का उपचार या प्रक्रिया [को०]।

प्रध्वंस
संज्ञा पुं० [सं०] १. नाश। विनाश। नष्ट हो जाना। २. सांख्य के मत से किसी वस्तु की अतीत अवस्था। विशेष—सांख्य मतवाले यह नहीं मानते कि किसी वस्तु का नाश नहीं होता है। इसलिये वे किसी पदार्थ की अतीत अवस्था को ही प्रध्वंस कहते हैं।

प्रध्वंसक
वि० [सं०] विनाशक। नाश करनेवाला।

प्रध्वंसाभाव
संज्ञा पुं० [सं०] न्याय के अनुसार पाँच प्रकार के अभावों में से एक प्रकार का अभाव। वह अभाव जो किसी वस्तु के उत्पन्न होकर फिर नष्ट हो जाने पर हो।

प्रध्वंसित
वि० [सं०] विनष्ट। बरबाद [को०]।

प्रध्वंसी
संज्ञा पुं० [सं० प्रध्वंसिन्] १. नाश करनेवाला। वह जो नष्ट करे। २. नष्ट होनेवाला। क्षयशील। नाशशील [को०]।

प्रध्वस्त (१)
वि० [सं०] जो नष्ट हो गया हो। जिसका प्रध्वंस हो चुका हो।

प्रध्वस्त (२)
संज्ञा पुं० [सं०] तांत्रिका के अनुसार एक प्रकार का मंत्र।

प्रन पु †
संज्ञा पुं० [सं० प्रण] दे० 'प्रण'।

प्रनत पु †
वि० [सं० प्रणत] दे० 'प्रणत'। उ०—सरनागत आरत प्रनतनि को दै दै अभयपद ओर निबाहैं।—तुलसी ग्रं०, पृ० ४१३। यौ०—प्रनतपाल। प्रनतपालक। प्रनतपालिका = दे० 'प्रणतपाली'।

प्रनति पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रणति] दे० 'प्रणति'।

प्रनप्ता
संज्ञा पुं० [सं० प्रनत्पृ] नाती का पुत्र। परनाती। पनाती [को०]।

प्रनमन पु †
संज्ञा पुं० [सं० प्रणमन] दे० 'प्रणमन'।

प्रनमना पु †
संज्ञा पुं० [सं० प्रणमन] दे० 'प्रणवना'।

प्रनय पु †
संज्ञा पुं० [सं० प्रणय] दे० 'प्रणीय'। उ०—(क) प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी।—मानस, ३। १५। (ख) राव रंक सब एक से लगत प्रनय रस सोत।—भारतेंदु ग्रं०, भा० ३, पृ० ३९८।

प्रनयाम पु †
संज्ञा पुं० [सं० प्राणायम] दे० 'प्राणायाम'। उ०— बैसाख मास फल पूरन जोग जुक्ति प्रनयाम।—भीखा० श०, पृ० ४३।

प्रनर्तित
वि० [सं०] १. कंपायमान किया हुआ। कंपित। २. झुलाया हुआ। ३. नृत्य करता हुआ। नाचता हुआ [को०]।

प्रनव पु †
संज्ञा पुं० [सं० प्रणव] दे० 'प्रणव'।

प्रनवना पु †
क्रि० स० [हिं०] दे० 'प्रणवना'। उ०—(क) प्रवनों दीनबंधु दिनदानी।—मानस, १। १५। (ख) प्रवनों सबनि कपट छल त्यागे।—मानस, १। १४ (ग) प्रथमहिं प्रनऊँ प्रेममय, परम जोती जो आहि।—नंद ग्रं०, पृ० ११७।

प्रनष्ट
वि० [सं०] १. गायब। लुप्त। अदृश्य। २. नष्ट भ्रष्ट। बुरी तरह नष्ट। ३. भगा हुआ। पलायित [को०]।

प्रनाम
संज्ञा पुं० [सं० प्रणाम] दे० 'प्रणाम'। उ०—गुरुहिं प्रनाम मनहिं मन कीन्हा।—मानस, १। २६१ । (ख) कौसल्या कल्यानमय मूरति करत प्रनामु। सगुन सुमंगल काज सुभ कृपा करहिं सिय रामु।—तुलसी ग्रं०, पृ० ९३।

प्रनामी पु † (१)
संज्ञा पुं० [सं० प्रणमिन्] प्रणाम करनेवाला। जो प्रणाम करे।

प्रनामी
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रणाम + हिं० ई (प्रत्य०)] वह धन या दक्षिणा जो गुरु, ब्राह्मण या गोस्वामी आदि को शिष्य या भक्त लोग प्रणाम करने के समय देते हैं। प्रणामी।

प्रनायक
वि० [सं०] १. नेतारहित। नायकविहीन। २. नायकों में श्रेष्ठ या प्रधान [को०]।

प्रनार पु
संज्ञा पुं० [सं० प्रनाल] प्रणाली। पनारा। उ०— कज्जल प्रमान प्रब्बत ठरयो रत्तधार बुठ्ठंत जलु। कंचन प्रनार द्वै सुरश्रविक इह ओपम दीसंत षलु।—पृ० रा०, ७। १४४।

प्रनाल
संज्ञा पुं० [सं०] प्रणाली। पनारा। परनाला। उ०—तनं छिद्र कालं, रुधिंजा प्रनाल। बहै धार षग्गं, निनारंध रग्गं।—पृ० रा०, १। ६४२।

प्रनालिका †
संज्ञा स्त्री० [सं० प्रणाली] रीति। पद्धति। सरणि। प्रणाली। उ०—तब श्रीगुसाई जी आप कृपा करिकै नित्य को तथा बरस दिन कौ सब उत्सवन कौ प्रकार प्रनलिका लिखि पठाए।—दो सौ बावन०, भा० १, पृ० २४८।

प्रनाली पु †
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'प्रणाली'।

प्रनाशन
संज्ञा पुं० [सं० प्रणाशन] दे० 'प्रणाशन'।

प्रनासन
संज्ञा पुं० [सं० प्रणाशन] दे० 'प्रणाशन'।

प्रनिघातन
संज्ञा पुं० [सं०] हत्या। वध [को०]।

प्रनिपात पु †
संज्ञा पुं० [सं०प्रणिपात] दे० 'प्रणिपात'।

प्रनृत्त (१)
वि० [सं०] जो नृत्य करता हो। नाचनेवाला। नर्तक [को०]।

प्रनृत्त (२)
संज्ञा पुं० नाच। नृत्य [को०]।

प्रपंच
संज्ञा पुं० [सं० प्रपञ्च] १. पाँच तत्वों का उत्तरोत्तर अनेक भेदों में विस्तार। संसार। सृष्टि। भवजाल। उ०—विधि प्रपँच गुन अवगुन साना।—तुलसी (शब्द०)। २. एक से उत्तरोत्तर अनेक होने का क्रम। विस्तार। फैलाव। ३. सांसरिक व्यवहारों का विस्तार। दुनिया का जंजाल। उ०—(क) परमारथी प्रपंच वियोगी।—तुलसी (शब्द०)। (ख) सपने होइ भिखारि नृप रंक नाकपति होय।—जागेलाभ न हानि कछु तिमि प्रपंच जिय जोय।—तुलसी (शब्द०)। ४. बखेड़ा। झंझट। झगड़ा। झमेला। उ०—देहु, कि लेहु अजस करि नाहिं। मोहिं न बहुत प्रपंच सुहाहीं।—तुलसी (शब्द०)। ५. आडंबर। ढोंग। छल। धोखा। उ०— रचि प्रपंच भूपहि अपनाई। रामतिलक हित लगन धराई।-- तुलसी (शब्द०)। ६. विपर्यास। प्रतिकूलता। वैपरीत्य (को०)। ७. राशि। संचय। पुंज (को०)। ८. व्याख्या। विस्तार। विश्लेषण (को०)। ९. नाटक में परिहासजनक कथन। असंगत या भोंडा कथन (को०)।

प्रपंचक
वि० [सं० प्रपञ्चक] १. दिखानेवाला। प्रदर्शन करनेवाला २. विकास करनेवाला। ३. सांगोपांग व्याख्या करनेवाला। विस्तार से दिग्दर्शित करानेवाला [को०]।

प्रपंचन
संज्ञा पुं० [सं० प्रपञ्चन] [वि० प्रपंचित] विस्तार बढ़ाना। तूल देना।

प्रपंचबुद्धि
वि० [सं० प्रपञ्चबुद्धि] धूर्त। धोखेबाज [को०]।

प्रपंचवचन
संज्ञा पुं० [सं०] १. आडंबर या ढोंग से भरी बात। २. विस्तृत बातचीत। ब्योरे की बात [को०]।

प्रपंचित
वि० [सं० प्रपञ्चित्] १. जो विस्तृत किया गया हो। फैलाया या विस्तार किया हुआ। २. भ्रमयुक्त। ३. जिससे भूल हुई हो। प्रतारित। जो छला गया हो।

प्रपंची
वि० [सं० प्रपञ्चिन्] १. प्रपंच रचनेवाला। २. छली। कपटी। ढोंगी। आडंबर फैलानेवाला। ३. झगड़ालू। बखेड़िया।

प्रपक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] पक्ष का सिरा या छोर, जैसे, पक्षिव्यूहबद्ध सेना का [को०]।

प्रपतन
संज्ञा पुं० [सं०] १. उड़ जाना। २. नीचे गिरना। पतन। ३. वह स्थान जिसपर से कोई वस्तु गिरे। ४. मृत्यु। नाश। समाप्ति। ५. चट्टान। ६. आक्रमण [को०]।

प्रपतित
वि० [सं०] १. उड़ा हुआ। जो उड़ गया हो। २. गिरा हुआ। नीचे आया हुआ। ३. नष्ट। बरबाद। ४. मरा हुआ। मृत [को०]।

प्रपत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] अनन्य शरणागत होने की भावना। अनन्य भक्ति। उ०—वैष्णव ग्रंथन सकल पढ़ायो। पुनि प्रपत्ति को धर्म सुनायो।—रघुराज (शब्द०)।

प्रपथ
वि० [सं०] शिथिल। थका माँदा।

प्रपथ्य
वि० [सं०] जो विशेष हित करे। अत्यंत हितकर [को०]।

प्रपथ्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] हरीतकी। हड़।

प्रपद
संज्ञा पुं० [सं०] पैर का अगला भाग।

प्रपदन
संज्ञा पुं० [सं०] पहुँच। पैठ। प्रवेश [को०]।

प्रपदीन
वि० [सं०] प्रपद संबंधी। पैर के पंजे का। पैर के अगले भाग से संबंध [को०]।

प्रपन्न
वि० [सं०] १. प्राप्त। २. आया हुआ। पहुँचा हुआ। ३. शरण मे आया हुआ। शरणागत। आश्रित। ४. कष्ट- ग्रस्त। दीन। दुखी (को०)।

प्रपलायन
संज्ञा पुं० [सं०] भाग जाना। पलायन करना [को०]।

प्रपलायित
वि० [सं०] १. भागा हुआ। भग्गू। भगोड़ा। २. पराजित। हारा हुआ [को०]।

प्रपन्नाड़
संज्ञा पुं० [सं० प्रपन्नाड] चक्रपर्दक। चकवँड़।

प्रपर्ण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] गिरा हुआ पत्ता।

प्रपर्ण (२)
वि० (पेड़ आदि)। जो पत्तों से रहित हो [को०]।

प्रपलायी
वि० [सं०] १. भग्गू। भगोड़ा। भागनेवाला [को०]।

प्रपलाश
वि०, संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रपर्ण'।

प्रपा
संज्ञा पुं० [सं०] १. पौसरा। प्याऊ। वह स्थान जहाँ प्यासों को पानी पिलाया जाता है। २. कूप। कूआँ (को०)। ३. जलप्रणाली (को०)। ४. पशुओं के जल पीने का हौज (को०)। ५. यज्ञशाला।

प्रपाक
संज्ञा पुं० [सं०] १. घाव आदि का पकना। २. दाह। जलन। प्रदाह [को०]।

प्रपाठ, प्रपाठक
संज्ञा पुं० [सं०] १. वेद के अध्यायों का एक अंश। २. श्रौत ग्रंथो का एक अंश।

प्रपाणि
संज्ञा पुं० [सं०] १. हस्ताग्र। हाथ का अगला सिरा। २. हथेली [को०]।

प्रपांडु
वि० [सं० प्रपाण्डु] अत्याधिक श्वेत [को०]।

प्रपात
संज्ञा पुं० [सं०] १. पहाड़ या चट्टान का ऐसा किनारा जिसके नीचे कोई रोक न हो। खड़ा किनारा जहाँ से गिरने पर कोई वस्तु बीच में न रुक सके। भृगु। अतट। २. एक प्रकार की उड़ान। ३. एकबारगी नीचे गिरना। ४. ऊँचे से गिरती हुई जलधारा। निर्झर। झरना। दरी। ५. एकाएक। हमला। आकस्मिक आकम्रण (को०)। ६. किनारा। तट (को०)।

प्रपातन
संज्ञा पुं० [सं०] जमीन आदि पर गिराना या नीचे की ओर फेकना [को०]।

प्रपातांबु
संज्ञा पुं० [सं० प्रपाताम्बु] प्रपात का जल। झरने का पानी [को०]।

प्रपाती
संज्ञा पुं० [सं० प्रपातिन्] वह पर्वत या शिला जिसके आगे कोई रोक न हो [को०]।

प्रपाथ
संज्ञा पुं० [सं०] सड़क। मार्ग [को०]।

प्रपादिक
संज्ञा पुं० [सं०] मयूर। मोर।

प्रपान
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्याऊ। पौसला। २. एक पेय (को०)।

प्रपानक
संज्ञा पुं० [सं०] फलों के गूदे, रस आदि को पानी में घोलकर नमक, मिर्च, चीनी आदि देकर बनाई हुई पीने की वस्तु। पन्ना। उ०—अनेक सुंदर और स्वादिष्ट पेय पदार्थों से बने हुए प्रपानक रस का आनंद वह पा सकता है।—रस क०, पृ० १६।

प्रपापालिका
संज्ञा पुं० [सं०] वह स्त्री जो पौसरा चलाती हो [को०]।

प्रपालन
संज्ञा पुं० [सं०] पालन। पोषण। रक्षण [को०]।

प्रपाली
संज्ञा पुं० [सं० प्रपालिन्] बलदेव का एक नाम।

प्रपिता
संज्ञा पुं० [सं० प्रपितामह] दे० 'प्रपितामह'। उ०—हमारा प्रपिता अनभिज्ञतावश माया चक्का में पड़ा डुबकियाँ खा रहा है।—कबीर मं०, पृ० २१५।

प्रपितामह
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० प्रपितामही] १. परदादा। दादा का बाप। बाप का दादा। २. परब्रह्म। ३. कृष्ण (को०)।

प्रपितामही
संज्ञा स्त्री० [सं०] परदादी।

प्रपितृव्य
संज्ञा पुं० [सं०] परदादा का भाई।

प्रपीड़क
संज्ञा पुं० [सं० प्रपीडक] सतानेवाला। बहुत कष्ट देनेवाला। २. पीसने या दबानेवाला।

प्रपीड़न
संज्ञा पुं० [सं० प्रपीडन] [वि० प्रपीडित] १. बहुत अधिक कष्ट देना। २. दबाना। ३. धारक औषध।

प्रपीत
वि० [सं०] वायुपूरित। स्फीत। फैला हुआ [को०]।

प्रपीति
संज्ञा स्त्री० [सं०] पीना। पान करना [को०]।

प्रपीन
वि० [सं०] दे० 'प्रपीत' [को०]।

प्रपील पु
संज्ञा पुं० [सं० पिपीलक] दे० 'पिपीलक'। उ०— सुभंत रोम राजयं। प्रपील पंति छाजयं।—पृ० रा०, २५। ३२६।

प्रपुंज
संज्ञा पुं० [सं० प्रपुञ्ज] बड़ा समूह। भारी झुंड। उ०— विकसित कमलावली चले प्रपुंज चचरीक, गुंजत कल कोमल धुनि त्यागि कंज न्यारे।—तुलसी (शब्द०)।

प्रपुत्र
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० प्रपुत्री] पुत्र का पुत्र। पोता।

प्रपुनाड़
संज्ञा पुं० [सं० प्रपुनाड] दे० 'प्रपुन्नाट'।

प्रपुन्नड़
संज्ञा पुं० [सं० प्रपुन्नड] दे० 'प्रपुन्नाट'।

प्रपुन्नाट
संज्ञा पुं० [सं०] चक्रमर्दक। चकवँड़।

प्रपुन्नाड़
संज्ञा पुं० [सं० प्रपुन्नाड] दे० 'प्रपुन्नाट'।

प्रपुन्नाल
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'प्रपुन्नाट'।

प्रपूरक
वि० [सं०] १. पूरा करनेवाला। पूर्ण करनेवाला। २. संतुष्ट करनेवाला [को०]।

प्रपूरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. भरना। पूर्ण करना। संतुष्ट करना। तुष्ट करना। ३. संबद्ध करना। लगाना। ४. बुझाना। जैसे धनुष [को०]।

प्रपूराण
वि० [सं०] अत्यंत पुराना। बहुत काल का [को०]।

प्रपूरिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] कंटकारी। कटेरी। भटकटैया।

प्रपूरित
वि० [सं०] पूर्ण। भरा हुआ [को०]।

प्रपूर्ण
वि० [सं०] पूर्ण। भरा हुआ। युक्त। उ०—इसलाम कलाओं से प्रपूर्ण जन जनपद।—तुलसी०, पृ० ६।

प्रपूर्वग
संज्ञा पुं० [सं०] १. परब्रह्म। ईश्वर। २. अश्विनीकुमार का नाम [को०]।

प्रपौंडरीक
संज्ञा पुं० [सं० प्रपौणडरिक] पौंडरीक। पुंडरी का पौधा।

प्रपौत्र
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० प्रपौत्री] पड़पोता। पुत्र का पोता। पोते का पुत्र।

प्रपौत्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] पड़पोती। पुत्र का पोती। पोते की पुत्री।

प्रप्यायन
संज्ञा पुं० [सं०] सूजन [को०]।

प्रफुड़ना
क्रि० अ० [हिं० प्र + स्फुटन] दे० 'प्रफुल्लना'।

प्रफुलंद
वि० [हिं० प्रफुलना] दे० 'प्रफुल्ल'। उ०—प्रफुलंद पंकज जाण षटपद हिये यू हरषावियाँ।—रघु रू०, पृ० १२६।

प्रफुलना पु
क्रि० अ० [सं० प्रफुल्ल] फूलना। खिलना। विकसित होना।

प्रफुला पु
संज्ञा स्त्री० [प्रफुल्ल(=खिला हुआ)] १. कुमुदिनी। कुँई। उ०—प्रफुला हार हिए लसै सन की बेदी भाल। राखति खेत खरी खरी खरे उरोजन बाल।—बिहारी (शब्द०)। विशेष—पं० हरिप्रसाद ने इस दोहे का जो संस्कृत अनुवाद आर्या छद में किया है। उसमें यही अर्थ लिया है—लसित कुमुदिनीमाला ग्रामीणा क्षण कुसुमतिलकभाला। उन्नत पयोधरेयं रक्षित बालोत्थिया क्षेत्रम्। २. कमलिनी। कमल। उ०—छूँवैगा जो, तू रे। भवँर कहुँ याको तनक हू। करूँ तोको बंदी पकरि प्रफुला के उदर में।—लक्ष्मणसिंह (शब्द०)।

प्रफुलित पु
वि० [सं० प्रफुल्ल] १. खिला हुआ। कुसुमित। उ०— मुख देखता शोभा एक आवत मनो राजीव प्रकाश। अरुण आगमन देखिकै प्रफुलित भए हुलास।—सूर (शब्द०)। २. प्रफुल्ल। आनंदित। उ०—अँगुरिन मैं अँगुरी कर हिए। प्रफुलित फिरे संग हरि लिए।—लल्लू (शब्द०)। ३. जागृत। उ०—मलयगिरि बासी हू पवन काम अगिनि प्रफुलित करत।—ब्रज० ग्रं०, पृ० १०१।

प्रफुल्त
वि० [सं०] खिला हुआ। विकसित। प्रफुल्ल [को०]।

प्रफुल्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] विकास। प्रफुल्ल होना [को०]।

प्रफुल्ल
वि० [सं०] १. विकासयुक्त। खिला हुआ। विकसित। प्रस्फुटित। जैसे, प्रफुल्ल कुसुम। २. कुसुमित। फूला हुआ। जिसमें फूल लगें हों। ३. खूला हुआ। जो मुँदा हुआ न हो जैसे, प्रफुल्ल नेत्र। ४. प्रसन्न। हँसता हुआ। आनंदित। जैसे, प्रफुल्ल वदन। यौ०—प्रफुल्लनयन। प्रफुल्लनेत्र। प्रफुल्ललोचन। प्रफुल्लवदन।