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नींद
संज्ञा स्त्री० [सं० निद्रा + प्रा० निद्दा] जीवन की एक नित्यप्रति होनेवाली अवस्था जिसमें चेतन क्रियाएँ रुकी रहती हैं और शरीर और अंतःकरण दोनों विश्राम करते हैं। निद्रा। स्वप्न। सोने की अवस्था। वि० दे० 'निद्रा'। उ०—(क) कीन्हेसि भूँख नींद बिसरामा।—जायसी (शब्द०)। (ख) जो करि कष्ट जाइ पुनि कोई। जातहि नींद जुड़ाई होई।—तुलसी (शब्द०)। क्रि० प्र०—आना।—छूटना।—जाना।—लगना। मुहा०—नींद उचटना = नींद का दूर होना। नींद उचाटना = नींद दूर करना। सोने मे बाधा डालना। नींद का दुखिया = बहुत सोनेवाला। सदा सोने का इच्छुक रहनेवाला। नींद का माता = नींद से व्याकुल। नींद से गिर गिर पड़नेवाला। नींद उचाट होना = नींद का खुलने पर फिर न आना। सोने में बाधा पड़ना। नींद टूटना = नींद का छूट जाना। जग पड़ना। नींद खराब करना = सोने का हर्ज करना। निद्रा की दशा न रहना। नींद पड़ना = नींद आना। निद्रा की अवस्था होना। नींद परना पु = नींद आना। उ०—नींद न परै रैन जो आई।—जायसी (शब्द०)। नींद भरना = नींद पूरी करना। सोना। नींद भर सोना = जितनी इच्छा हो उतना सोना। इच्छा भर सोना। उ०—डासत हो सब बीति निसा गई कबहुँ न नाथ नींद भरि सोयो।—तुलसी (शब्द०)। नींद मारना = सोना। नींद लेना = सोना। उ०—(क) नींद न लीन्ह रैन सब जागा। होत बिहान आय गढ़ लागा।—जायसी (शब्द०)। (ख) जब ते प्रीत स्याम सों कीन्हा। ता दिन ते नैननि नेकहु नींद न लीन्हा।—सूर (शब्द०)। नींद संचरना = नींद आना। उ०— द्वादशि में जो पारण करहीं। और शयन जो नींद संचरहीं।—सबलसिंह (शब्द०)। नींद हराम करना = सोना छुड़ा। देना। सोने न देना। नींद हराम होना = सोना छूट जाना। सोने की नौबत न आना।

नींदड़िया पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० नींदड़ी + इया (प्रत्य०)] नींद। निद्रा।

नीदड़ी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० नींद + ड़ी (प्रत्य०)] दे० 'नींद'। उ०— नैन न आवइ नींदड़ी निस दिन तलफत जाय। दादू आतुर बिरहिनी, क्योंकरि रहन बिहाय।—दादू (शब्द०)।

नीदना †
क्रि० स० [सं० निकन्दन] निराना। दे० 'नींदना'।

नींदर, नींदरी †
संज्ञा स्त्री० [सं० निद्रा] दे० 'नींद'। उ०—हौ जँभात अलसात तात तेरी बानि जाति भै पाई। गाइ गाइ हलराइ बोलिहौं सुख नींदरी सुहाई।—तुलसी (शब्द०)।

नींब †
संज्ञा स्त्री० [सं० निम्ब] दे० 'नीम'।

नीअर पु †
अव्य० [सं० निकट, प्रा० नियड] १. निकट। पास। २. समान। तुल्य।

नी
वि० [सं०] नेता। प्रधान। अगुआ। समासांत में प्रयुक्त। जैसे, ग्रामणी, सेनानी, अग्रणी [को०]।

नीक पु † (१)
वि० [सं० निक्त (= स्वच्छ, साफ), फा० नेक] [स्त्री० नीकि] अच्छा। सुंदर। भला। अनुकूल। उ०—(क) अब तुम कही नीक यह सोभा। पै फल सोई भँवर जैहि लोभा।—जायसी (शब्द०)। (ख) गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई।—तुलसी (शब्द०)। मुहा०—नीक लगना = (१) रुचना। भाना। रुचि के अनुकूल जान पड़ना। (२) सजना। सुशोभित होना। नीक लागना पु = दे० 'नीक लगाना' उ०—अब तोहि नीक लाग करु सोई।—मानस, २। ३६।

नीक पु (२)
संज्ञा पुं० अच्छाई। उत्तमता। अच्छापन। उ०—जोई फल देखी सोइ फीका। ताकर काह सराहे नीका।— जायसी (शब्द०)।

नीका (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] सिंचाई के लिये बनी जलप्रणाली [को०]।

नीका (२)
वि० [सं० निक्त (= साफ, स्वच्छ), फा० नेक] [वि० स्त्री० नीकी] अच्छा। उत्तम। बढ़िया। भला। उ०—(क) निज कवित्त केहि लाग न नीका। सरस होउ अथवा अति फीका। —मानस, १। ८। (ख) प्रभु पद प्रीति न सामुझि नीकी। तिन्हहि कथा सुनि लागहि फीकी।—तुलसी (शब्द०)। (ग) आज्ञा करी नाथ चतुरानन करो सृष्टि विस्तार। होरी खेलन की विधि नीकी रचना रचे अपार।—सूर (शब्द०)। मुहा०—नीका लगना= (१) रुचना। भाना। सुहाना। अच्छा मालूम होना। (२) सुशोभित होना। सजना। सोहना।

नीकार
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'निकार' [को०]।

नीकाश
वि० [सं०] तुल्य। समान।

नीके
क्रि० वि० [हिं० नीक] अच्छी तरह। भली भाँति। उ०— (क) नीके निरखि नयन भरि सोभा।—तुलसी (शब्द०)। (ख) माताहिं पितहिं उरिण भए नीके। गुरु ऋण रहा सोच बड़ जी के।—तुलसी (शब्द०)। (ग) सुनि कटु वचन गयो माता पै तब इन ज्ञान दृढ़ायो। हरि की भक्ति करो सुत नीके जो चाहो सुख पायो।—सूर (शब्द०)।

नीको †
वि० [हिं० नीक] दे० नीका'।

नीगने पु
वि० [सं० नगण्य] अनगिनत। संख्यातीत।

नीग्रो
संज्ञा पुं० [अं०] हबशी। निग्रो।

नीच (१)
वि० [सं०] १. जाति, गुण, कर्म या किसी और बात में घटकर वा न्यून। क्षुद्र। तुच्छ। अधम। हेठा। जैसे, नीच आदमी, नीच कुल। यौ०—नीच ऊँच = छोटा बड़ा। बड़े घराने या छोटे घराने का। उ०—नीच ऊँच धन संपति हेरा।—जायसी (शब्द०)। २. जो उत्तम और मध्यम कोटि से घटकर हो। अधम। बुरा निकृष्ट। यौ०—नीच ऊँच = (१) अच्छा बुरा। (२) बुराई भलाई। गुण अवगुण। (३) अच्छा और बुरा परिणाम। हानि लाभ। जैसे,—नीच ऊँच समझकर काम करो। (४) संपद् विपद्। सुख दुःख। सफलता असफलता।

नीच (२)
संज्ञा पुं० १. नीच मनुष्य। क्षुद्र मनुष्य। ओछा आदमी। उ०—नीच निचाई नहिं तजै जो पावै सतसंग। २. चोर नामक गंध द्रव्य। ३. फलित ज्योतिष में वह स्थान जो किसी ग्रह के उच्च स्थान से सातवाँ हो। ४. भ्रमण काल में किसी ग्रह के भ्रमणवृत्त का वह स्थान जो पृथ्वी से अधिक दूर हो। ५. दशार्ण देश के एक पर्वत का नाम।

नीचक
वि० [सं०] १. छोटा। लघु। बोना। २. मद्धिम। जैसे, आवाज। ३. तुच्छ। निकृष्ट। ओछा [को०]।

नीचकदंब
संज्ञा पुं० [सं० नीचकदम्ब] मुंडी।

नीचकमाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० नीच + कमाई] १. निंद्य व्यवसाय। २. तुच्छ काम। खोटा काम। ३. बुरे कामों में पैदा किया धन।

नीचका
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रशस्त गौ। अच्छी गाय।

नीचकी (१)
संज्ञा पुं० [सं० नीचकिन्] [स्त्री० नीचकिनी] १. उच्च। श्रेष्ठ। २. ऊँचा। जिसके पास अच्छी गाएँ हों।

नीचकी (२)
संज्ञा पुं० १. ऊपरी भाग। २. किसी वस्तु का शीर्ष भाग (को०)। ३. बैल का सिर (को०)।

नीचग (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० नीचगा] १. नीचे जानेवाला। २. पामर। ओछा।

नीचग (२)
सज्ञा पुं० पानी। २. फलित ज्योतिष के अनुसार वह ग्रह जो अपने उच्च स्थान से सातवें पड़ा हो।

नीचगा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. नदी। २. नीचवर्णागामिनी स्त्री। नीच के साथ गमन करनेवाली स्त्री।

नीचगामी (१)
वि० [सं० नीचगामिन्] [वि० स्त्री० नीचगामिनी] १. नीचे जानेवाला। २. ओछा।

नीचगामी (२)
संज्ञा पुं० जल।

नीचगृह
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह स्थान जो किसी ग्रह के उच्च स्थान वा राशि से गिनती में सातवाँ पड़े। २. नीच या निम्न कोटि के व्यक्ति का घर। उ०—जो संपदा नीच गृह सोहा।—मानस।

नीचट †
वि० [सं० निश्चय] दृढ़। पक्का।

नीचता
स्त्री० स्त्री० [सं०] १. नीच होने का भाव। २. अधमता। खोटाई। तुच्छता। क्षुद्रता। कमीनापन।

नीचत्व
संज्ञा पुं० [सं०] नीचता।

नीचभोज्य
संज्ञा पुं० [सं०] पलांडु। प्याज [को०]।

नीचयोनि
वि० [सं०] निम्न कुल का [को०]।

नीचवज्र
संज्ञा पुं० [सं०] वैक्रांत मणि।

नीचस्थान
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'नीचगृह'।

नीचा
वि० [सं० नीच] [वि० स्त्री० नीची] १. जिसके तल से उसके आस पास का तल ऊँचा हो। जो कुछ उतार या गहराई पर हो। गहरा। ऊँचा का उलटा। निम्न। जैसे, नाची जमीन, नीचा रास्ता। यौ०—नीचा ऊँचा = कहीं गहरा और कहीं उठा हुआ। जो समतल न हो। नाबराबर। ऊबड़ खाबड़। उतार चढ़ाव। २. ऊँचाई में सामान्य को अपेक्षा कम। जो ऊपर की ओर दूर तक न गया हो। जैसे, नीच पेड़, नीचा मकान। नीची टोपी। विशेष—ऊँचाई निचाई का भाव सापेक्ष होता है। ३. जो ऊपर से जमीन की ओर दूर तक आया हो। अधिक लटका हुआ। जैसे, नीचा अगा, नीची धोती, नीची डाल। ४. जो ऊपर की ओर पूरा उठा न हो। झुका हुआ। नत। जैसे, सिर नीचा करना, झंडा नीचा करना, दृष्टि नीची करना, आँख नीची करना। उ०—(क) जाचक देहिं असीस सीस नीचो करि करि के।—गोपाल (शब्द०)। (ख) रघुनाथ चितै हँसि ठाढ़ी रही पल घूँघट में दृग नीचो करै।—रघुनाथ (शब्द०)। (ग) देवनंदन ने देखा इन बातों के कहते लाज से उसकी आँखे नीची हो गई।— अयोध्यासिंह (शब्द०)। ५. जो चढ़ा हुआ न हो। जो तीव्र न हो। धीमा। मध्यम। जो जोर का न हो। जैसे, नीचा सुर, नीची आवाज। ६. जो जाति, पद, गुण इत्यादि में न्यून या घटकर हो। जो उत्तम और मघ्यम कोटि का न ही। छोटा या ओछा। क्षुद्र। बुरा। मुहा०—नीचा ऊँचा = (१) भल बुरा। (२) भलाई बुराई। गुण अवगुण। अच्छा और बुरा परिणाम। हामि लाभ। (३) संपद विपद। सुख दुःख। बढ़ती घटती। सफलता असफलता। नीचा ऊँचा दिखना या सुझाना = दे० 'ऊँचा नीचा दिखाना'। नीचा ऊँचा सुनाना = दे० 'ऊँचा नीचा सुनाना'। नीचा खाना = (१) तुच्छ बनना। अपमानित होना। हेठा बनना। (२) हारना। परास्त होना। (३) लज्जित होना। झिपना। उ०—चालाकी में अच्छे खासे पट्ठे, दस पंद्रह वर्ष मुंसिफ ओर सदराला रह कहीं कुछ थोड़ा बहुत नीचा खाकर भी आठो गाँठ कुम्मेत हो चुके थे।—हिंदी प्रदीप (शब्द०)। नीचा दिखाना = (१) तुच्छ बनाना। हेठा करना। अवमानित करना। (२) मान भंग करना। दर्प चूर्ण करना। शेखी झाड़ना। (३) परास्त करना। हराना। (४) झिपाना। लज्जित करना। नीचा देखना = दे० 'नीचा खाना'। उ०—कहीं किसी ने देख सुन लिया तौ भी वही बात हुई। जग में नीचा अलग देखना पड़ता है। —अयोध्यासिंह (शब्द०)। नीची दृष्टि करना = सिर झुकाना। सामने न ताकना। (लज्जा संकोच आदि से)। नीची दृष्टि से देखना = तुच्छ या छोटा समझना। मान या प्रतिष्ठा न करना। कदर न करना।

नीचाशय
वि० [सं०] तुच्छ विचार का। क्षुद्र। ओछा।

नीचू † (१)
वि० [हिं० नि + चूना] जो चूए न। जो टपकता न हो। जिसमें पानी ऊपर से या बाहर से रसकर आता वा टपकता न हो।

नीचू † (२)
वि० [हिं० नीचा] दे० 'नीचा'।

नीचे
क्रि० वि० [हिं० नीचा] नीचे की ओर। अधोभाग में। ऊपर का उलटा। उ०—पानख को लिखै पानि नखै तिमि सीस नवाय के नीचेहि जावै।—मतिराम (शब्द०)। विशेष—'ऊपर', 'यहाँ', 'वहाँ' आदि शब्दों के समान इस क्रि० वि० शब्द के साथ पंचमी और षष्ठी की 'से', 'तक', 'का' विभक्तियाँ लगाती हैं। जैसे, नीचे से, नीचे का। मुहा०—नीचे ऊपर = (१) एक के ऊपर दूसरा इस क्रम से। एक पर एक। तले ऊपर। जैसे,—इन सब पुस्तकों को नीचे ऊपर रख दो। (२) ऊपर का नीचे, नीचे का ऊपर। उलट पलट। उथल पथल। अस्त व्यस्त। अव्यवस्थित। जैसे,— इतने दिनों में पुस्तकें लगाकर रखी थीं तुमने उन्हें नीचे ऊपर कर दिया। नीचे गिरना = (१) प्रतिष्ठा खोना। मान मर्यादा गँवाना। (२) पतित होना। (३) कुश्ती में पटका जाना। पछाड़ खाना। नीचे गिराना = (१) पतित करना। मान मर्यादा दूर करना। (२) कुश्ती में पटकना। पछाड़ना। नीचे डालना = (१) फेंकता। गिराना। (२) किसी बात में घटकर करना। पराजित करना। जीतना। नीचे लाना = गिराना। कुश्ती में पछाड़ना। ऊपर से नीचे तक = (१) सब भागों में। सर्वत्र। (२) सर्वांग में। सिर से पैर तक। जैसे,—उसने मेरी ओर ऊपर से नीचे तक देखा।२. घटकर। कम। न्यून। जैसे,—दरजे में वह सबसे नीचे है। ३. अधीनता में। मातहती में। जैसे,—उनके नीचे दस मुहर्रिर काम करते हैं।

नीज †
संज्ञा पुं० [सं० रज्जु ?] रस्सी।

नीजन पु (१)
वि० [सं० निर्जन, प्रा० णिज्जण, णीजण] निर्जन। जनशून्य। सूनसान। उ०—दौरयौ दल साजि महाराज ऋतुराज जानि नीजन मवास, मानिनी जन गरीब से।— देव (शब्द०)।

नीजन पु (२)
संज्ञा पुं० निर्जन स्थान। वह स्थान जहाँ कोई न हो। निराला। एकांत। उ०—मोहिं सकोच सखी जन को नतु नीजन ह्वै उन्है बीजन ढोरौं।—देव (शब्द०)।

नीजू †
संज्ञा स्त्री० [सं० रज्जु] रस्सी। पानी भरने की डोरी।

नीझर पु
संज्ञा पुं० [सं० निझ्रर, प्रा० णिभझर, णीझर] निर्झर। झरना। सोता। उ०—(क) तिस सरवर के तीर, सी हंसा मोती चुनइ। पीवइ नीझर नीर, सोहै हंसा सो सुनइ।—दादू (शब्द०)। (ख) सो हंसा सरनागत जाय। सुंदरि तहाँ पखोरे पाय। पीवइ अमिरित नीझर नीर। बैठइ तहाँ जगत गुरु पीर।—दादू (शब्द०)।

नीठ पु
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'नीठि (२)'। उ०—नीठ बिसासत अप्प भर गहयौ कन्ह चहुआन। गए गेह लै सकल मिलि प्रथीराज अकुलाना।—पृ० रा०, ५। ८५।

नीठि (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० अनिष्टि, प्रा० अनिट्ठि] अरुचि। अनिच्छा। मुहा०—नीठि नीठि करके = (१) ज्यों त्यों करके। बहुत इधर उधर करके। किसी न किसी प्रकार। उ०—नीठि नीठि करि चित्र मंदिर लौं आई बाल चहूँ ओर चाहि कछु चेति कै भजै लगो।—बेनी (शब्द०)। (२) कठिनता से। मुश्किल से। उ०—छूटी लट लट़कति कटि तट लौं चितवति नीठि नीठि करि ठाढ़ी।—केशव (शब्द०)।

नीठि (२)
क्रि० वि० १. ज्यों त्यों करके। किसी न किसी प्रकार। उ०—आई संग आलिन के ननद पठाई नीठि सोहत सुहाई सूही इंड़री सुपट की। कहँ पदमाकर गभीर जमुना के तीर लागी घट भरन नवेली नेह अटकी।—पद्माकर (शब्द०)। २. मुश्किल से। कठिनता से। उ०—(क) चहुँ और चितै संत्रास। अवलोकियो आकास। तहँ शाख बैठो नीठि। तब पर् यो वानर दीठि।—केशव (शब्द०)। (ख) ऐसी सोच सीठी सीठी चीठी अलि दीठी, सुनै मीठी मीठी बातन जो नीके हू मैं नीठि है।—केशब (शब्द०)। (ग) करके मीड़े कुसुन लौं गई विरह कुम्हिलाय। सदा समीपिन सखिन हूँ नीठि पिछानी जाय।—बिहारी (शब्द०)। (घ) चको जकी सी ह्वै रही बूझे बोलति नीठि। कहूँ दीठि लागी लगी, कै काहू की दीठि।—बिहारी (शब्द०)। यौ०—नीठि नीठि = ज्यों त्यों करके। किसी न किसी प्रकार। जैसे तैसे। मुश्किल से। कठिनता से। उ०—(क) नीठि नीठि उठि बैठि हू पिय प्यारी परभात। दोऊ नींद भरे खरे गरे लागि गिरि जात।—बिहारी (शब्द०)। (ख) भौंह उँचै आँचर उलटि मोरि मोरि मुँह मोरि। नीठि नीठि भीतर गई दीठि दीठि सों जोरि।—बिहारी (शब्द०)।

नीठो
वि० [सं० अनिष्ट, प्रा० अनिट्ठ] अनिष्ट। अप्रिय। न सुहानेवाला। न भानेवाला। उ०—छेक उक्ति जहँ दुर्मिल सम जक का समुझावति नीठो ! मिसरी, सूर, न भावति घर की, चोरी को गुड़ मीठो।—सूर (शब्द०)।

नीड़
संज्ञा पुं० [सं० नीड] १. बैठने वा ठहरने का स्थान। २. चिड़ियों के रहने का घोसला। ३. रथ के भीतर का वह स्थान जिसमें रथी बैठता है। रथ में बैठने का मुख्य स्थान। ४. बिछौना। पलंग। खाट (को०)। ५. माँद (कौ०)।

नीड़क
संज्ञा पुं० [सं० नीडक] १. पक्षी। चिड़िया। २. घोसला (को०)।

नीड़ज
संज्ञा पुं० [सं० नीडज] पक्षी।

नीड़ोद् भव
संज्ञा पुं० [सं० नीडोद् भव] पक्षी [को०]।

नीत (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० नीता] १. लाय हुआ। पहुँचाया हुआ। २. स्थापित। ३. प्राप्त। ४. व्यतीत किया हुआ। बिताया हुआ (को०)। ५. गृहीत। ग्रहण किया हुआ। उ०— किधौं मंद गरजनि जलधर, की पग नूपुर रव नीत।—सूर (शब्द०)।

नीत (२)
संज्ञा पुं० १. धन दौलत। २. अनाज [को०]।

नीति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. ले जाने या ले चलने की क्रिया, भाव या ढंग। २. व्यवहार की रीति। आचारपद्धति। जैसे, सुनीति, दुर्नीति। ३. व्यवहार की वह रीति जिससे अपना कल्याण हो और समाज को भो कोई बाधा न पहुँचे। वह चाल जिसे चलने से अपनी भलाई, प्रतिष्ठा आदि हो और दूसरे की कोई बुराई न हो। जैसे,—जाकी घन धरती हरी ताहि न लीजै संग। साई तहाँ न बैठिए जहँ कोउ देय उठाय।—गिरिधर (शब्द०)। ४. लोक या समाज के कल्याण के लिये उचित ठहराया हुआ आचार व्यवहार। लोकमर्यादा के अनुसार व्यवहार। सदाचार। अच्छी चाल। नय। उ०—सुनि मुनीस कह वचन सप्रीती। कस न राम राखहु तुम नीती।—तुलसी (शब्द०)। ५. राजा और प्रजा की रक्षा के लिये निर्धारित व्यवस्था। राज्य की रक्षा के लिये ठहराई हुई विधि। राजा का कर्तव्य। राजविद्या। विशेष—महाभारत में भीष्म ने युधिष्ठिर को नीतिशास्त्र की शिक्षा दी है जिसमें प्रजा के लिये कृषि, वाणिज्य आदि की व्यवस्था, अपराधियों को दंड, अमात्य, चर, गुप्तचर, सेना, सेनापति इत्यादि की नियुक्ति, दुष्टों का दमन, राष्ट्र, दुर्ग और कोश की रक्षा, धनिकों की देखरेख, दरिद्रों का भरण पोषण, युद्ध, शत्रुऔं को वश में करने के साम, दाम, दंड, भेद ये चार उपाय, साधुओं की पूजा, विद्वानों का आदर, समाज और उत्सव, सभा, व्यवहार तथा इसी प्रकार की और बहुत सी बातें आई हैं। नीति विषय पर कई प्राचीन पुस्तकें हैं। जैसे, उशना को शुक्रनीति, कौटिल्य का अर्थशास्त्र, कामंदकीय नीतिसार इत्यादि।६. राज्य की रक्षा के लिये काम में लाई जानेवाली युक्ति। राजाओं की चाल जो वे राज्य की प्राप्ति वा रक्षा के लिये चलते हैं। पालिसी। जैसे, मुद्राराक्षस नाटक में चाणक्य और राक्षस की नीति। ७. किसी कार्य की सिद्धि के लिये चली जानेवाली चाल। युक्ति। उपाय। हिकमत। ८. संबंध (को०)। ९. दान। प्रदान (को०)। यौ०—नीतिकुशल = नीतिज्ञ। नीतिघोष = बृहस्पति के रथ का नाम। नीतिदोष = आचारदोष। नीतिनिपुण, नीतिनिष्ण = नीतिज्ञ। नीतिबीज = कूट संकल्प का मूल। नीतिविज्ञान = दे० 'नीतिशास्त्र'। नीतिविद् = राजनीतिज्ञ। बुद्धिमान्। नीति विद्या = राजनीति शास्त्र। नीतिशास्त्र। नीतिविषय = आचरण का विषय या क्षेत्र। नीतिशतक = भर्तृहरि द्वारा रचित नीति बिषयक १०० श्लोक।

नीतिज्ञ
वि० [सं०] १. नीति जाननेवाला। नीतिकुशल। २. बुद्धिमान् (को०)।

नीतिमान्
वि० [सं० नीतिमत्] [वि० स्त्री० नीतिमती] नीति परायण। सदाचारी।

नीतिशास्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह शास्त्र जिसमें देश, काल और पात्र के अनुसार बरतने के नियम हों। २. वह शास्त्र जिसमें मनुष्य समाज के हित के लिये देश, काल और पात्रानुसार आचार व्यवहार तथा प्रबंध और शासन का विधान हो।

नीदना पु
क्रि० स० [सं० निन्दन] निंदा करना। उ०—सोवत सपने स्याम घन हिलमिलि हरत वियोग। तब ही टरि कितहूँ गई नीदौ नींदन योग।—बिहारी (शब्द०)।

नीधन, नीधना पु
वि० [सं० निर्धन] धनहीन। दरिद्र। उ०— दादू सब जग नीधना धनर्वता नहिं कोइ। सो धनर्वता जानिए जाके राम पदारथ होइ।—दादू (शब्द०)।

नीध्न
संज्ञा पुं० [सं०] १. वलीक। छाजन की ओलती। २. वन। ३. नेमि। पहिए का चक्र या चक्कर। ४. चंद्रमा। ५. रेवती नक्षत्र।

नीप (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. कदंब। २. भूकदंब। ३. बंधूक। दुपहरिया। ४. नीलाशोक। अशोक। ५. पहाड़ का निचला भाग। ६. वृहत्संहिता में वर्णित एक देश का नाम। ७. एक राजा का नाम।

नीप (२)
वि० नीचे की ओर स्थित [को०]।

नीर (३)
संज्ञा पुं० [अं० निप] दो चीजों को बाँधने या गाँठ देने के लिये रस्सी का फेरा या फंदा। मुहा०—नीप लेना = रस्सी में बाँधने के लिये फंदा लगाना।

नीपजना पु
क्रि० अ० [सं० निष्पद्य, प्रा० णीपज्ज] उत्पन्न होना। पैदा होना। निपजना।

नीपना पु †
क्रि० स० [सं० लेपन, हि० लीपना] दे० 'लीपना'।

नीपर
संज्ञा पुं० [अं० निपर] १. लंगर में बँधो हुई रस्सियों में से एक। २. उक्त रस्सी के बंधन को कसने के लिये लगा हुआ डंडा (लश०)।

नीपातिथि
संज्ञा पुं० [सं०] एक वैदिक ऋषि।

नीब †
संज्ञा पुं० [सं० निम्ब, हिं० नीम] दे० 'नीम'।

नीबर †
वि० [सं० निर्बल, आं० णिब्बर] दुर्बल। कमजोर।

नीबी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० नीवी] दे० 'नीवी'।

नीबू
संज्ञा पुं० [सं० निम्बूक, आ० लीमूँ] मध्यम आकार का एक पेड़ या झाड़ जिसका फल भी नीबू कहा जाता और खाया जाता है ओर जो पृथ्वी के गरम प्रदेशों में होता है। विशेष—इसकी पत्तियाँ मोटे दल की और दोनों छोरों पर नुकीली होतो हैं, तथा उनके ऊपर का रंग बहुत गहरा हरा और नीचे का हलका होता है। पत्तियों की लंबाई तीन अंगुल से अधिक नहीं होती। फूल छोटे छोटे और सफेद होते हैं जिनमें बहुत से परागकेसर होते हैं। फल गोल या लंबोतरे तथा सुगंधयुक्त होते हैं। साधारण नीबू स्वाद में खट्टे होते हैं और खटाई के लिये ही खाए जाते हैं। मीठे नीबू भी कई प्रकार के होते हैं। उनमें से जिनका छिलका नरम होता है और बहुत जल्दी उतर जाता है तथा जिनके रसकोश की फाँकें अलग हो जाती हैं वे नारंगी के अंतर्गत गिने जाते हैं। साधारणतः नीबू शब्द ते खट्टे नीबू का ही बोध होता है। उत्तरीय भारत में नीबू दो बार फलता है। बरसात के अंत में, और जाड़े (अगहन, पूस) में। अचार के लिये जाड़े का ही नीबू अच्छा समझा जाता है क्योंकि यह बहुत दिनों तक रह सकता है। खट्टे नीबू के मुख्य भेद ये हैं—कागजी (पतले चिकने छिलके का गोल और लंबोतरा), जंबीरी (कड़े मोटे खुरदरे छिलके का), बिजोरा (बड़े मोटे और ढोले छिलके का), चकोतरा (बहुत बड़ा खरबूजे सा, मोटे और कड़े छलके का)। पैबंद द्वारा इनमें से कई के मीठे भेद भी उत्पन्न किए जाते हैं; जैसे, कवले या संतरे का पेबद खट्टे चकोतरे पर लगाने से मीठा चकोतरा होता है। आजकल नीबू की अनेक जातिगाँ चीन, भारत, फारस, अरब तथा योरप और अमेरिका के दक्षिणी भागों में लगाई जाती हैं। खट्टा नीबू हिंदुस्तान में कई जगह (कुमाऊँ, चटगाँव आदि) जगली भी होता है जिससे सिद्ध होता है कि यह भारतवर्ष से पहले पहल और देशों में फैला। मोठे नीबू या नारंगी का उत्पत्तिस्थान चीन बतलाया जाता है। चीन और भारत के प्राचीन ग्रंथों में नीबू का उल्लेख बराबर मिलता है। फारस और अरब के व्यापारियों द्वारा यह यूनान, इटली आदि पश्चिम के देशों में गया। प्राचीन रोमन लोगों को यह फल बहुत दिनों तक बाहरी व्यापारियों से मिलता रहा और वे इसका व्यवहार सुगंध के लिये तथा कपड़ों को कीड़ों से बचाने के लिये करते थे। मीठे नीबू या नारंगियों का प्रचार तो योरप में और भी पीछे हुआ। पहले पहल ईसा की तेरहदी शताब्दी में रोम नगर में नारंगी के लगाए जाने का उल्लेख मिलता है। पीछे पुर्तगाल आदि देशों में नारगी की बहुत उन्नति हुई।सुश्रुक में जंबीर, नारंग, ऐरावत और दंतशठ ये चार प्रकार के नीबू आए हैं। ऐरावत और दंतशठ दोनों अम्ल कहे गए हैं। जंबीर तो खट्टा है ही। राजनिघट्ट में ऐरावत नारंग का पर्याय लिखा गया है जो सुश्रुत के अनुसार ठीक नहीं जान पड़ता। शायद नागरंग शब्द के कारण ऐसा हुआ है। 'नाग' का अर्थ सिंदुर न लेकर हाथी लिया और ऐरावत को नागरंग का पर्याय मान लिया। तैलग भाषा में चकोतरे को गजनिंबू कहते हैं अतः ऐरावत वही हो सकता है। भावप्रकाश में बीजपूर (बिजौरा) मघुककंटी (चकोतरा), जंबीर (खट्टा नीबू) और निबूक (कागजी नीबू) ये चार प्रकार के नीबू कहे गए हैं। सुश्रुत में जबीर और दतशठ अलग है पर भावप्रकाश में वे एक दूसरे के पर्याय हैं। राजवल्लभ में लिंपाक और मधुकुक्कुटिका ये दो भेद जंबीरी के कहे गए हैं। उसी ग्रंथ में करण वा कन्ना नीबू का भी उल्लेख है। नीचे वैद्यक में आए हुए नीबूओं के नाम दिए जाते हैं— (१) निंबूक (कागजी नीबू)। (२) जंबीर (जंबीरी नीबू, खट्टा नीबू या गलगल)—(क) बृहज्जंबीर, (ख) लिंपाक, (ग) मधुकुक्कुटिका (मीठा जंबीरी या शरबती नीबू)। (३) बीजपूर (बिजौरा)। पर्याय—मातुलुंग, रुचक, फलपूरक, अम्लकेशर, बीजपूर्ण, सुकेशर, बीजक, बीजफलक, जंतुघ्न, दंतुरच्छद, पूरक, रोचनफल। (क) मधुर मातुलुंग या मीठा बिजौरा। इसे संस्कृत में मधुकर्कटिका और हिंदी में चकोतरा कहते हैं। (४) करण या कन्ना नीबू—इसे पहाड़ी नीबू भी कहते हैं—इसे अरबी में कलंबक कहते हैं। निबू या निबूक शब्द सुश्रुत आदि प्राचीन ग्रंथों में नहीं आया है, इससे विद्वानों का अनुमान है कि यह अरबी लीमूँ शब्द का अपभ्रंश है। 'संतरा' शब्द के विषय में डा० हंटर का अनुमान है कि यह 'सिट्रा' शब्द से बना है जो पुर्तगाल में एक स्थान का नाम है। पर बाबर ने अपनी पुस्तक में 'संगतरा' का उल्लेख किया हैं, इससे इस विषय में कुछ ठीक नहीं कहा जा सकता। मुहा०—नीबू निचोड़ = थोड़ा सा कुछ देकर बहुत सी चोजों में साझा करनेवाला। थोड़ा सा संबंध जोड़कर बहुत कुछ लाभ उठानेवाला। नीबू चटाना या नीबू नमक चटाना = निराश करना। ठेंगा दिखाना। विशेष—कहते हैं कि किसी सराय में एक मियाँ साहब रहते थे जो हर समय अपने पास नीबू और चाकू रखते थे। जब सराय में उतरा हुआ कोई भला आदमी खाना खाने बैठता तब आप चट जाकर उसकी दाल में नीबू निचोड़ देते थे जिससे वह भलमनसाहत के बिचार से आपको खाने में शरीक कर लेता था।

नीम (१)
संज्ञा पुं० [सं० निम्ब] पत्ती झाड़नेवाला एक प्रसिद्ध पेड़ जिसके सब अंग कड़वे होते हैं। निंब। विशेष—इसकी उत्पत्ति द्विदलाकुर से होती है और पत्तियाँ डेढ़ दो वित्ते की पतली सीकों के दोनों ओर लगती हैं। ये पत्तियाँ चार पाँच अंगुल लंबी और अंगुल भर चौड़ी होती हैं। किनारे इनके आरी की तरह होते हैं। छोटे छोटे सफेद फूल गुच्छों में लगते हैं। फलियाँ भी गुच्छों में लगती हैं और निबौली कहलाती हैं। ये फलियाँ खिरनी की तरह लंबोतरी होतीं हैं और पकने पर चिपचिपे गूदे से भर जाती हैं। एक फली में एक बीज होता है। बीजों से तेल निकलता है जो कडुएपन के कारण केवल औषध के या जलाने के काम का होता है। नीम की तिताई या कडुवापन प्रसिद्ध है। इसका प्रत्येक भाग कडुवा होता है—क्या छाल, क्या पत्ती, क्या फूल, क्या फल। पुराने पेड़ों से कभी कभी एक प्रकार का पतला पानी रस रसकर निकलता है और महीनों बहा करता है। यह पानी कडुवा होता है। और 'नीम का मद' कहलाता है। नींम की लकड़ी ललाई लिए और मजबूत होती है तथा किवाड़, गाड़ी, नाव आदि बनाने के काम में में आती है। पतली टहनियाँ, दातून के लिये बहुत तोड़ी जाती हैं। वैद्यक में नीम कडुई, शीतल तथा कफ, व्रण, कृमि, वमन, सूजन, पित्तदोष और हृदय के दाह को दूर करनेवाली मानी जाती है। दूषित रक्त को शुद्ध करने का गुण भी इसका प्रसिद्ध है। पर्या०—निंब। नियमन। नेता। पिचुमंद। अरिष्ट। प्रभद्रक। पारिभद्रक। शुकप्रिय शीर्षपर्ण। यवनेष्ट। वाल्वच। धर्दन। हिंगु। निर्यास। पीतसार। रविप्रिय। मालक। यूपारि। पूकमालक। कीकट। विबंध। कैटर्य्य। छर्दिध्न। काकफल। कीरेष्ट। सुमना। विशार्णिपर्ण। शीत। राजभद्रक। महा०—नीम की टहनी हिलाना = गरमी की बीमारी लेकर बैठना। उपदंश या फिरंग रोगग्रस्त होना। (जिसमें लोग नीम की टहनी लेकर धाव पर से मक्खियाँ उड़ाया करते है)।

नीम (२)
वि० [फा० मि० सं० नेम] आधा। अर्ध। जैसे, नीमटर, नीमहकीम। यौ०—नीमपुख्त, नीमपुख्ता = अधपका। नीमशब = आधीरात। नीमहकीम = अधकचरा ज्ञान रखनेवाला हकीम।

नीमगिर्दा
संज्ञा पुं० [का०] बढ़ई का एक औजार जो रुखानी या पेचकश की तरह का होता है। इसकी नोक सीधी न होकर अर्धचंद्राकार होती है। इससे बढ़ई खरादने के समय सुराही आदि की गर्दन छीलते हैं।

नीमच
संज्ञा [हिं० नदीं + मच्छ] एक मछली जो बंगाल, उड़ीसा, जाब और सिंध की नगियों में होती है। विशेष—इसका माँस खाने में अच्छा होता है।

नीमचा
संज्ञा पुं० [फा० नीमचह्] खाँड़ा।

नीमजाँ
वि० [फा०] अधमरा।

नीमटर
वि० [फा० नीम + हिं० टरटर] अधकचरा। जिसे पूरी विद्या या जानकारी न हो। जो किसी विषय को केवल थोड़ा बहुत जानता हो।

नीमन †
वि० [सं० निर्मल?] १. अच्छा। भला। नीरोग। चंगा। उ०—जानि लेहु हारि इतने ही में कहा करै नीमन को वैद।—सूर (शब्द०)। २. दुरुस्त। जो बिगाड़ा हुआ न हो। जो जीर्ण न हुआ हो। ३. बढ़िया। अच्छा। सुंदर।

नीमबर
संज्ञा पुं० [फा०] कुश्ती का एक पेच। विशेष—यह पेच उस समय काम देता है जब जोड़ पीछे की ओर से कमर पकड़कर बाईं ओर खड़ा होता है। इसमें अपना बायाँ घुटना जोड़ की दाहिनी जाँघ के नीचे ले जाते हैं, फिर बाएँ हाथ को उसकी टाँगों में से निकालकर उसका बायाँ घुटना पकड़ते और दाहिने हाथ से उसकी मुट्ठी पकड़कर भीतर की ओर खींचते हैं जिससे वह चित्त गिर पड़ता है।

नीमर †
वि० [सं० निर्बल, हिं० नीबर] दुर्बल। बलहीन। शक्तिहीन।

नीमरजा
वि० [फा०] १. थोड़ी बहुत रजामदी। २. कुछ तोष या प्रसन्नता। उ०—परि पा करि बिनती घनी नीमरजा ही कीन।—शृं० सत० (शब्द०)।

नीमषारण्य, नीमषारन †
संज्ञा पुं० [सं० नैमिषारण्य] दे० 'नैमिषारण्य'।

नीमस्तीन
संज्ञा स्त्री० [फा० नीम + आस्तीन] दे० 'नीमास्तीन'।

नीमा
संज्ञा पुं० [फा० नीमह्] एक पहरावा जो जामे के नीचे पहना जाता है। उ०—केसरि को नीमा जामा जरी को फेंटा डुपटा जरी को तेजपुंज समहतु है।—रघुनाथ (शब्द०)। विशेष—यह जामे के आकार का होता है पर न तो यह जामे के इतना नीचा होता है और न इसके बंद बगल में होते हैं। यह घुटने के ऊपर तक नीचा होता है और इसके बंद सामने रहते हैं। आस्तीन इसकी पूरी नहीं होती, आधी होती है। इसके दोनों बगल सुराहियाँ होती हैं।

नीमावत
संज्ञा पुं० [हिं० निंव + आवत] वैष्णवों का संप्रदाय। निंबार्काचार्य का अनुयायी वैष्णव।

नीमास्तीन
संज्ञा स्त्री० [फा० नीम + आस्तीन] एक प्रकार की फतुई या कुरती जिसकी आस्तीन आधी होती है।

नीयत
संज्ञा स्त्री० [अ०] भावना। भाव। आंतरिक लक्ष्य। उद्देश्य। आशय। संकल्प। इच्छा। र्मशा। जैसे,—(क) हम किसी बुरी नीयत से नहीं कहते हैं। (ख) तुम्हारी नीयत जाने की नहीं मालूम होती। क्रि० प्र०—करना।—होना। यौ०—बदनीयत। मुहा०—नीयत डिगना, नीयत डोलना = अच्छा वा उचित सकल्प दृढ़ न रहना। मन में विकार उत्पन्न होना। बुरा संकल्प होना। नीयत बद होना = बुरा बिचार होना। बुरी इच्छा या संकल्प होना। अनुचित या बुरी बात की ओर प्रवृत्ति होना। बेईमानी सूझना। नीयत बदल जाना = (१) संकल्प या विचार और का और होना। इरादा दूसरा हो जाना। (२) बुरा विचार होना। अनुचित या बुरी बात की ओर प्रवृत्ति होना। नीयत बाँधना = संकल्प करना। मन में ठानना। इरादा करना। नीयत बिगड़ना = दे० 'नीयत बद होना'। नीयत भरना = जी भरना। मन तृप्त होना। इच्छा पूरी होना। नीयत में फर्क आना = बुरा संकल्प या विचार होना। अनुचित या बुरी बात की और प्रवृत्ति होना। बेईमानी या बुराई सूझना। नीयत लगी रहना = घ्यान बना रहना। इच्छा बनी रहना। जी ललचाया करना।

नीरंध्र
वि० [सं० नीरन्ध्र] १. जिसमें छिद्र न हो। छिद्ररहित। २. ठोस। घना [को०]।

नीर
संज्ञा पुं० [सं०] १. पानी। जल। मुहा०—नीर ढलना = मरते समय आँख से आँसू बहना। किसी का नीर ढल जाना = किसी की लज्जा जाती रहना। निर्लज्ज या बेहया हो जाना। २. कोई द्रव पदार्थ या रस। ३. फफोले आदि के भीतर का चेप या रस। जैसे, शीतला का नीर। ४. सुगंधबाला।

नीरज (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. जल में उत्पन्न वस्तु। २. कमल। ३. मोती। मुक्ता। उ०—यज्ञ पूरन कै रमापति दान देत अशेष। हरी नीरज चीर माणिक वर्षि वर्षा वेष।—केशव (शब्द०)। ४. कुट। कूट। ५. एक प्रकार का तृण। उशीर। ६. ऊदबिलाव। जलमार्जार (को०)। ७. शिव। महादेव (को०)।

नीरज (२)
वि० १. जलीय। जल से होनेवाला या उद् भूत (को०)। २. दे० 'नीरजा'।

नीरजा
वि० [सं० नीरजस्] १. बिना धूल का। स्वच्छ। २. जिसे रजोदर्शन न हुआ हो। अरजस्क (स्त्री) [को०]।

नीरत
वि० [सं०] जो रत न हो। विरत [को०]।

नीरद (१)
संज्ञा पुं० [सं० नीर] १. जल देनेवाला। २. बादल। ३. मोथा। मुस्तक (को०)।

नीरद (२)
वि० [सं० निः + रद] बे दाँत का। अदंत।

नीरधर
संज्ञा पुं० [सं०] बादल। मेघ।

नीरधि
संज्ञा पुं० [सं०] समुद्र।

नीरना †
क्रि० स० [देश०] छिटकाना। छितराना। बिखेरना।

नीरनिधि
संज्ञा पुं० [सं०] समुद्र।

नीरपति
संज्ञा पुं० [सं०] वरुण। देवता।

नीरप्रिय
संज्ञा पुं० [सं०] एक तरह का बेत। अंबुवेतस् [को०]।

नीरम
संज्ञा पुं० [?] वह बोझ जो जहाज पर केवल उसकी स्थिति ठीक रखने के लिये रहता है (लश०)।

नीररुह
संज्ञा पुं० [सं०] कमल [को०]।

नीरव
वि० [सं०] ध्वनिरहित। बिना शब्द का [को०]।

नीरस
वि० [सं०] १. रसहीन। जिसमें रस या गीलापन न हो। २. सूखा। शुष्क। ३. जिसमें कोई स्वाद या मजा न हो। फीका। जिसमें कोई आनंद न हो। जैसे, नीरस काव्य।

नीरांजन
संज्ञा पुं० [सं० नीराजन] [स्त्री० नीराजना] १. दीपदान। आरती। देवता को दीपक दिखाने की विधि।क्रि० प्र०—उतारना।—वारना। २. हथियारों को चमकाने या साफ करने का काम। ३. एक त्योहार जिसमें राजा लोग हथियारों की सफाई कराते थे। यह कुआर कार्तिक में होता था जब यात्रा की तैयारी होती थी।

नीरांजना पु
क्रि० अ० [सं० नीराजना] १. आरती करना। दीपक दिखाना। २. हथियारों को मांजना।

नीरिंदु
संज्ञा पुं० [सं० नीरिन्दु] सिहोर का पेड़।

नीरुक्, नीरुज्
संज्ञा पुं० [सं०] रोगाभाव। रोगराहित्य [को०]।

नीरुज
संज्ञा पुं० [सं०] १. कुष्टौषधि। २. व्याधिरहित। वह जो रोगरहित हो [को०]।

नीरे †
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'नियरे'।

नीरेणुक
वि० [सं०] धूलिरहित। रजशून्य [को०]।

नीरोग
वि० [सं०] जिसे रोग न हो। स्वस्थ। चंगा। तंदुरुस्त।

नीलंगु
संज्ञा पुं० [सं० नीलङ्ग] १. एक प्रकार का कीड़ा। एक क्षुद्र कीट। २. गीदड़। ३. भँवरा। ४. फूल।

नील (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० नीला, नीली] नीले रंग का। गहरे आसमानी रंग का।

नील (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. नीला रंग। गहरा आसमानी रंग। २. एक पौधा जिससे नीला रंग निकाला जाता है। विशेष—यह दो तीन हाथ ऊँचा होता है। पत्तियाँ चमेली की तरह टहनी के दोनों ओर पंक्ति में लगती हैं पर छोटी छोटी होती हैं। फूल मंजरियों में लगते हैं। लंबी लंबी बबूल की तरह फलियाँ लगती हैं। नील के पौधे की ३०० के लगभग जातियाँ होती हैं। पर जिनसे यहाँ रंग निकाला जाता है वे पौधे भारतवर्ष कै हैं और अरब मिस्र तथा अमेरिकां में भी बोए जाते हैं। भारतवर्ष हो नील का आदिस्थान हे और यहीं सबसे पहले रंग निकाला जाता था। ८० ईसवी में सिंध के किनारे के एक नगर से नील का बाहर भेजा जाना एक प्राचीन यूनानी लेखक्र ने लिखा है। पीछे के बहुत से विदेशियों ने यहाँ नील के बोए जाने का उल्लेख किया है। ईसा की पद्रहवीं शताब्दी में जब यहाँ से नील योरप के देशों में जाने लगा तब से वहाँ के निवासियों का ध्यान नील की और गया। सबसे पहले हालैंडवालों ने नील का काम शुरू किया और कुछ दिनों तक वे नील की रंगाई के लिये योरप भर में निपुण समझे जाते थे। नील के कारण जब वहाँ कई वस्तुओं के वाणिज्य को धक्का पहुचने लगा तब फ्रांस, जर्मनी आदि कानून द्वारा नील की आमद बद करने पर विवश हुए। कुछ दिनो तक (सन् १६६० तक) इगलैंड में भी लोग नील को विष कहते रहे जिससे इसका वहाँ जाना बद रहा। पीछे बेलजियम से नील का रंग बनानेवाले बुलाए गए जिन्होंने नील का काम सिखाया। पहले पहल गुजरात और उसके आस पास के देशों में से नील योरप जाता था; बिहार, बंगाल आदि से नहीं। ईस्ट इंडिय कंपनी ने जब नील के काम की और ध्यान दिया तब बंगाल बिहार में नील की बहुत सी कोठियाँ खुल गईं और नील की खेती में बहुत उन्नति हुई। भिन्न भिन्न स्थानों में नील की खेती भिन्न भिन्न ऋतुओं में और भिन्न भिन्न रीति से होती है। कहीं तो फसल तीन ही महीने तक खेत में रहते हैं और कहीं अठारह महीने तक। जहाँ पौधे बहुत दिनों तक खेत में रहते हैं वहाँ उनसे कई बार काटकर पत्तियाँ आदि ली जाती हैं। पर अब फसल को बहुत दिनों तक खेत में रखने की चाल उठती जाती है। बिहार में नील फागुन चैत के महीने में बोया जाता है। गरमी में तो फसल की बाढ़ रुकी रहती है पर पानी पड़ते ही जोर के साथ टहनियाँ और पत्तियाँ निकलती और बढ़ती है। अतः आषाढ़ में पहला कलम हो जाता है और टहनियाँ आदि कारखाने भेज दी जाती हैं। खेत में केवल खूँटियाँ ही रह जाती हैं। कलम के पीछे फिर खेत जोत दिया जाता है जिससे वह बरसात का पानी अच्छी तरह सोखता है और खूँटियाँ फिर बढ़कर पोधों के रूप में हो जाती हैं। दूसरी कटाई फिर कुवार में होती है। नील से रंग दो प्रकार से निकाल जाता है—हरे पौधे से और सूखे पोधे से। कटे हुए हरे पौधों को गड़ी हुई नाँदों में दबाकर रख देते हैं और ऊपर से पानी भर देते हैं। बारह चौदह घंटे पानी में पड़े रहने से उसका रस पानी में उतर आता है और पानी का रंग धानी हो जाता है। इसके पीछे पानी दूसरी नाँद में जाता है जहाँ डेढ़ दो घंटे तक लकड़ी से हिलाया और मथा जाता है। मथने का यह काम मशीन के चक्कर से भी होता है। मथने के पीछे पानी थिराने के लिये छोड़ दिया जाता है जिससे कुछ देर में माल नीचे बैठ जाता है। फिर नीचे बैठा हुआ यह नील साफ पानी में मिलाकर उबाला जाता है। उबल जाने पर यह बाँस की फट्टियों के सहारे तानकर फैलाए हुए मोटे कपड़े (या कनवस) की चाँदनी पर ढाल दिया जाता है। यह चाँदनी छनने का काम करती है। पानी तो निथर कर बह जाता है और साफ नील लेई के रूप में लगा रह जाता है। यह गीला नील छोटे छोटे छिद्रों से युक्त एक संदूक में, जिसमें गीला कपड़ा मढ़ा रहता हे, रखकर खूब दबाया जाता है जिससे उसके सात आठ अंगुल मोटी तह जमकर हो जाती है। इसकै कतरे काटकर घोरे धीरे सूखने के लिये रख दिए जाते हैं। सूखने पर इन कतरों पर एक पपड़ी सी जम जाती है जिसे साफ कर देते हैं। ये ही कतरे नील के नाम से बिकते हैं। मिताक्षरा, विधानपारिजात आदि धर्मशास्त्र के कई ग्रंथों में ब्राह्मण के लिये नील में रँगा हुआ वस्त्र पहनने का निषेध है। मुहा०—नील का टीका लगाना = कलंक लेना। बदनामी उठाना। उ०—नल में तो वल तो बिलास कहाँ बूझत हौ; नील से लरे ते टीको नील को न करिहैं।—हनुमान (शब्द०)। नील का खेत = कलंक का स्थान। नील की सलाई फिरवा देना = आँखे फोड़वा डालना। अंधा कर देना। (कहते हैं, पहले अपराधियों की आँख में नील की गरमसलाई डाल दी जाती थी जिससे वे अंधे हो जाते थे)। नील घोंटना = झगड़ा बखेड़ा मचाना। किसी बात को लेकर देर तक उलझना। नील जलाना = पानी बरसने के लिये नील जलाने का टोटका करना। नील बिगड़ना = (१) चाल चलन बिगड़ना। आचरण भ्रष्ट होना। (२) आकृति बिगड़ना। चेहरे का रंग उड़ना। (३) किसी बे सिर पैर की बात का प्रसिद्ध होना। झूठी और असंगत बात फैलना। (४) ससझ पर पत्थर पड़ना। बुद्धि ठिकाने न रहना। (५) कुदिन आना। शामत आना। दुर्दशा होनेवाली होना। (६) भारी हानि या घाटा होना। दिवाला होना। ३. चोट का नीले या काले रंग का दाग जो शरीर पर पड़ जाता है। जैसे,—जहाँ जहाँ छड़ी बैठी है नील पड़ गया है। क्रि० प्र०—पड़ना। मुहा०—नील जालना = इतनी मार मारना कि शरीर पर नीले दाग पड़ जायँ। गहरी मार मारना। ४. लांछन। कलंक। ५. राम की सेना का एक बंदर। ६. भागवत के अनुसार इलावृत्त खंड का एक पर्वत जो रम्यक वर्ष की सीमा पर है। ७. नव निधियों में से एक। ८. मंगल घोष। मंगल का शब्द। ९. वटवृक्ष। बरगद। १०. इंद्रनील मणि। नीलम। ११. काट लवण। १२. तालीसपत्र। १३. विष। १४. एक नाग का नाम। १५. विष्णुपुराण में वर्णित नीलनी से उत्पन्न अजमीड़ राजा का एक पुत्र। १६. माहिष्मती का एक राजा। विशेष—इसकी कथा महाभारत में इस प्रकार आई है। नील राजा की एक अत्यंत सुंदरी कन्या थी जिसपर मोहित होकर अग्नि देवता ब्राह्मण के वेश में राजा से कन्या माँगने आए। कन्या पाकर अग्नि देवता ने राजा को वर दिया कि जो शत्रु तुमपर चढ़ाई करेगा वह भस्म हो जायगा। पांडवों के राजसूय यज्ञ के अवसर पर सहदेव ने माहिष्मती नगरी को घेरा। अपनी सेना की भस्म होते देख सहदेव ने अग्नि देवता की स्तुति की। अग्निदेव ने प्रगट होकर कहा कि नील के वंश में जबतक कोई रहेगा मैं बराबर इसी प्रकार रक्षा करूँगा। अंत में अग्नि की आज्ञा से नील ने सहदेव की पूजा की और सहदेव उससे इस प्रकार अधीनता स्वीकार कराकर चले गए। १७. नृत्य के १०८ करणों में से एक। १८. एक यम का नाम। १९. एक वर्णवृत्त जिसके प्रत्येक चरण में सोलह वर्ण होते है। यथा,—डंकनि देत अतंकनि संकनि दूरि धरैं। गोमुख दूरनि पूर चहूँ दिसि भीति भरैं। २०. एक प्रकार का विजय साल। २१. मंजुश्री का एक नाम। २२. गहरे नीले रंग का वृषभ (को०)। २३. एक संख्या जो दस हजार अरब की होती है। सौ अरब की संख्या जो इस प्रकार लिखी जाती है— १०००००००००००००।

नीलकंठ (१)
वि० [सं० नीलकण्ठ] [वि० स्त्री० नीलकंठी] जिसका कंठ नीला हो।

नीलकंठ (२)
संज्ञा पुं० १. मोर। मयूर। २. एक चिड़िया। चाष पक्षी। विशेष—यह एक बित्ते के लगभग लंबी होता है। इसका कंठ और डैने नीले होते हैं। शेष शरीर का रंग कुछ ललाई लिए बादामी होता है। चोंच कुछ मोटी होती है। यह कीड़े, मकोड़े पकड़कर खाता है, इससे वर्षा और शरद, ऋतु में उड़ता हुआ अधिक दिखाई पड़ता है। विजयादशमी के दिन इसका दर्शन बहुत शुभ माना जाता है। स्वर इसका कुछ कर्कंश होता है। ३. महादेव का एक नाम। विशेष—कालकूट विष पान करके कंठ में धारण करने के कारण शिव का कंठ कुछ काला पड़ गया इससे यह नाम पड़ा। महाभारत में यह लिखा है कि अमृत निकलने पर भी जब देवताओं ने समुद्र का मथना बंद नहीं किया तब सधूम अग्नि के समान कालकूट विष निकला जिसकी गंध से हो तीनों लोक व्याकुल हो गए। अंत में ब्रह्मा ने शिव से प्रार्थना की और उन्होंने यह कालकूट पान करके कंठ में धारण कर लिया। पुराणों में भी इसी प्रकार की कथा कुछ विस्तार के साथ है। ४. गोरा पक्षी। चटक। (नर के कठ पर काला दाग होता है)। ५. मूली। ६. पियासाल। ७. एक मधुमक्खी (को०)।

नीलकंठ रस
संज्ञा पुं० [सं० नीलकाण्ठ रस] एक रसोषध। विशेष—इसके बनाने की विधि इस प्रकार है—पारा, गंधक, लोहा, विष, चीता, पद्मकाठ, दारचीनी, रेणुका, बायबिडंग, पिपरामूल, इलायची, नागकेसर, सोंठ, पीपल, मिर्च, हड़, आँवला, बहैड़ा और ताँबा सम भाग लेकर सबके दुगने पुराने गुड़ में मिलाकर चने के बराबर गोली बनावे । इसके सेवन से कास, श्वास, प्रमेह, हिचकी, विषम ज्वर, ग्रहणी, शोथ, पांडु, मूत्रकृच्छ इत्यादि रोग दूर होते हैं।

नीलकंठाक्ष
संज्ञा पुं० [सं० नीलकण्ठाक्ष] रुद्राक्ष।

नीलकंठाक्षी
वि० [सं० नीलकण्ठाक्षी] खंजन जैसे नयनोंवाली [को०]।

नीलकंठी
संज्ञा स्त्री० [सं० नीलकण्ठी] १. एक छोटी चिड़िया। यह हिमालय पर पाई जाती है। इसका बोलना बहुत ही मधुर और सुरीला होता है। २. एक प्रकार का छोटा पौधा जो शोभा के लिये बगीचों में लगाया जाता है इसकी पात्तियाँ बहुत कडुवी होती हैं और पुराने ज्वर में दी जाती हैं।

नीलकंद
संज्ञा पुं० [सं० नीलकन्द] भैंसा कंद। महिष्कंद। शुभ्रालु।

नीलक
संज्ञा पुं० [सं०] १. काच लवण। २. वर्त्तलौह। बीदरी लोहा। ३. मटर।४. भौंरा। ५. पियासाल। ६. बीजगणित में अव्यक्त राशि का एक भेद। ७. गहरे नीले या काले रंग का अश्र्व (को०)।

नीलकण
संज्ञा पुं० [सं०] १. नीलम का टुकड़ा। २. ठीड़ी पर गोदे हुए गोदने का बिंदु।

नीलकणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्याह जीरा। कला जीरा।

नीलकमल
संज्ञा पुं० [सं०] नील रंग का कमल। नीलाब्ज। नीलांबुज [को०]।

नीलकांत
संज्ञा पुं० [सं० नीलकान्त] १. एक पहाड़ी चिड़िया जो हिमालय के अंचल में होती है। विशेष—मसूरी में इसे नीलकांत और नैनीताल में इसे दिगदल कहते हैं। इसका माया, कंठ के नीचे का भाग और छाती काली होती है, सिर पर कूछ सफेदी भी होती है। पूँछ नीली होती है। कंठ मे भी कुछ नीलेपन की झलक रहती है। २. विष्णु। ३. एक मणि। नीलम।

नीलकुंतला
संज्ञा स्त्री० [सं० नीलकुन्तला] बृहद्धर्मपुराण के अनुसार गौरी की एक सखी का नाम [को०]।

नीलकुरंटक
संज्ञा पुं० [सं० नीलकुरण्टक] नीली कठसरैया। नील झिंटी [को०]।

नीलकेशी
संज्ञा स्त्री० [सं०] नील का पौधा।

नीलक्रांता
संज्ञा स्त्री० [सं० नीलक्रान्ता] विष्णुक्रांता लता जिसमें बड़े नीले फूल लगते हैं।

नीलक्रौंच
संज्ञा पुं० [सं० नीलक्रौञ्च] काला बगला। वह बगला जिसका पर कुछ कालापन लिए होता है।

नीलगाय
संज्ञा स्त्री० [हिं० नील + गाय] नीलापन लिए भूरे रंग का एक बड़ा हिरन जो गाय के बराबर होता है। विशेष—इसके कान गाय के से और सींग टेढे और छोटे होते हैं। छोटे छोटे बालों का केसर (अयाल) भी होता है। गले के नीचे बड़े बालों का एक छोटा गुच्छा सा होता है। देखने में यह जंतु गाय और हिरन दोनों से मिलता जान पड़ता है और प्रायः जंगलों में ही झुंड बाँधकर रहता है। नीलगाय ऊँट की तरह चारों पैर मोड़कर विश्राम करती है, गाय की तरह पार्श्व भाग भूमि पर रखकर नहीं। पालने से यह पाली जा सकती है। शिकारी चमड़े आदि के लिये इसका शिकार भी करते हैं। चमड़ा इसका बहुत मजबूत होता है। गले के चमड़े की ढालें बनती हैं। वैद्यक के अनुसार नीलगाय का मांस मधुर, वलकारक, उष्णवीर्य स्निग्ध तथा कफ और पित्तवर्धक होता है। पर्या०—गवय। नीलांतक। रोझ।

नीलगिरि
संज्ञा पुं० [सं०] दक्षिण देश का एक पर्वत।

नीलग्रीव
संज्ञा पुं० [सं०] महादेव। शिव।

नीलचक्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. जगन्नाथ जी के मंदिर के शिखर पर माना जानेवाला चक्र। २. एक दंडक वृत्त जो ३० अक्षरों का होता है और अशोक पुष्प मंजरी का एक भेद है। इसमें 'गुरु लघु' १५ बार क्रम से आते हैं। यथा,—जानि कै समै भुवाल राम राज साज साजि ता समै अकाज काज कैकई जु कीन।

नीलचर्मा (१)
वि० [पुं० नीलचर्मन्] नीले चमड़े का।

नीलचर्मा (२)
संज्ञा पुं० १. फालसा। २. नीले रंग का चर्म (को०)।

नीलच्छद (१)
वि० [सं०] नीले पंख या आवरण का।

नीलच्छद (२)
संज्ञा पुं० १. गरुड़। २. खजूर।

नीलज
संज्ञा पुं० [सं०] वर्त्तलौह। बीदरी लोहा।

नीलजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] नील पर्वत से उत्पन्न वितस्ता (झेलम) नदी।

नीलझिंटी
संज्ञा स्त्री० [सं० नीलझिण्टी] नीली कठसरैया।

नीलतरा
स्त्री० स्त्री० [सं० नीलतीरा या नीलतटा] बौद्ध कथाओं के अनुसार गाधार देश की एक नदी जो उरुवेलारण्य से होकर बहती थी जहाँ जाकर बुद्धदेव ने उरुवेल काश्यप, गया काश्यप और नदी काश्यप नामक तीन भाइयों का अभिमान दूर किया था।

नीलतरु
संज्ञा पुं० [सं०] नारियल।

नीलता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. नीलापन। २. कालापन। स्याही।

नीलताल
संज्ञा पुं० [सं०] स्याम तमाल। हिंताल।

नीलदूर्वा
संज्ञा स्त्री० [सं०] हरी दूब।

नीलद्रुम
संज्ञा पुं० [सं०] पीतसाल वा असन नामक वृक्ष।

नीलध्वज
संज्ञा पुं० [सं०] १. तमाल। २. महाभारत के अश्वमेध पर्व में उल्लिखित माहिष्मती का एक राजा। इसकी पत्नी का नाम ज्वाला और कन्या स्वाहा नास की लक्ष्मी के शाप से उत्पन्न थी।

नीलनिर्गुंडी
संज्ञा स्त्री० [सं० लीलनिर्गुण्डी] नील सिंधुवार [को०]।

नीलनिर्यासक
संज्ञा पुं० [सं०] पियासाल का पेड़।

नीलनिलय
संज्ञा पुं० [सं०] आकाश। व्योम।

नीलपंक
संज्ञा पुं० [सं० नीलपङ्क] १. काला कीचड़। २. अंधकार।

नीलपटल
संज्ञा पुं० [सं०] १. घना, काला आवरण। २. अंधे व्यक्ति के आँख की काली भिल्ली या आवरण [को०]।

नीलपत्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. नीलकमल। २. गुंडतृण। गोनरा घास जिसकी जड़ कसेरू है। ३. अश्मंतक वृक्ष। ४. विजय- साल। ५. अनार। दाडिम।

नीलपत्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] नील।

नीलपत्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'नीलपत्रिका'।

नीलपद्म
संज्ञा पुं० [सं०] नील कमल [को०]।

नीलपर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] वृंदार वृक्ष।

नीलपिंगला
संज्ञा स्त्री० [सं० नीलपिङ्गला] बृहद्धर्म पुराण के अनुसार एक विशेष प्रकार की गाय [को०]।

नीलपिच्छ
संज्ञा पुं० [सं०] बाज पक्षी।

नीलपुनर्नवा
संज्ञा स्त्री० [सं०] नीले रंग की पुनर्नवा या गदह- पूर्ना [को०]।

नीलपुष्प
संज्ञा पुं० [सं०] १. नीला फूल। २. नीली भँगरैया। ३. नीलाम्लान। काला कोराठा। ४. ग्रंथिपर्ण। गठिवन।

नीलपुष्पा
संज्ञा स्त्री० [सं०] विष्णुक्रांता लता। अपराजिता।

नीलपुष्पिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अलसी। २. नील का पौधा।

नीलपुष्पी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. काला बोना। नीली कोयल। २. अलसी। तीसी।

नीलपृष्ठ
संज्ञा पुं० [सं०] अग्नि।

नीलफला
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जामुन। २. बैंगन।

नीलबरी
संज्ञा स्त्री० [सं० नील + बटी] कच्चे नील की पट्टी।

नीलबिरई
संज्ञा स्त्री० [हिं० नील + बिरई] सनाय का पौधा। सना।

नीलबीज
संज्ञा पुं० [सं०] पियासाल। नीलवीज।

नीलभ
संज्ञा पुं० [सं०] १. बादल। मेघ। २. चंद्रमा। ३. भौंरा। भ्रमर [को०]।

नीलभृंगराज
संज्ञा पुं० [सं० नीलभृङ्गराज] नीला भँगरा।

नीलम
संज्ञा पुं० [फा० सं० नीलमणि] नील मणि। नीले रंग का रत्न। इंद्रनील। विशेष—नीलम वास्तव में एक प्रकार का कुरंड है जिसका नंबर कड़ाई में हीरे से दूसरा है। जो बहुत चोखा होता है उसका मोल भी हीरे से कम नहीं होता। नीलम हलके नीले से लेकर गहरे नीले रंग तक के होते हैं। अब भारतवर्ष में नीलम की खानें नहीं रह गई हैं। काश्मीर (बसकर) की खानें भी अब खाली हो चली हैं। बरमा में मानिक के साथ नीलम भी निकलता है। सिंहल द्विप और श्याम से भी बहुत अच्छा नीलम आता है। रत्नपरीक्षा संबंधी पुस्तकों में मानिक के समान नीलम भी तीन प्रकारर के कहे गए हैं। उत्तम, महानील और साधारण। महानील के संबध में लिखा है कि यदि वह सौगुने दूध में डाल दिया जाय तो सारा दूध नीला दिखाई पड़ेगा। सबसे श्रेष्ठ इंद्रनील वह है जिसमें से इंद्रधनुष की सी आभा निकले। पर ऐसा नीलम जल्दी मिलता नहीं। नीलम में पाँच बातें देखी जाती हैं—गुरुत्व, स्निग्धत्व, वर्णाढ्यत्व, पार्श्ववर्तित्व और रंजकत्व। जिसमें स्निग्धत्व होता है उसमें से चिकनाई छूटती है। जिसमें वर्णाढ्यत्व होता है उसे प्रातः काल सूर्य के सामने करने से उसमें नीली शिखा सी फूटती दिखाई पड़ती है। पार्श्ववर्तित्व गुण उस नीलम में माना जाता है जिसमें कहीं कहीं पर सोना, चाँदी, स्फटिक आदि दिखाई पड़े। जिसे जलपात्र आदि में रखने से सारा पात्र नीला दिखाई पड़ने लगे उसे रंजक समझना चाहिए। रत्न- संबंधी पुरानी पोथियों में भिन्न भिन्न रत्नों के धारण करने के भिन्न भिन्न फल लिखे हुए हैं।

नीलमाणि
संज्ञा पुं० [सं०] १. नीलम। २. कृष्ण (को०)।

नीलमाधव
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु। जगन्नाथ [को०]।

नीलमाष
संज्ञा पुं० [सं०] काला उरद। राजामाष।

नीलमीलिक
संज्ञा पुं० [सं०] खद्योत। जुगनू।

नीलमृत्तिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुष्पकसीस। काली मिट्टी।

नीलमोर
संज्ञा पुं० [हिं० नील + सं० मयूर > हिं० मोर] कुररी नामक पक्षी जो हिमालय पर पाया जाता है।

नीलरत्न
संज्ञा पुं० [सं०] १. नीलम। २. कृष्ण। नीलमाधव [को०]।

नीललोह
संज्ञा पुं० [सं०] वर्त्तलौह। बीदरी लोहा।

नीललोहित (१)
वि० [सं०] नीलापन लिए लाल। बैगनी।

नीललोहित (२)
संज्ञा पुं० १. शिव का एक नाम जिनका कंठ नीला और मस्तक लोहित वर्ण है। २. एक कल्प का नाम (कौ०)।

नीललोहिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. भूमि जंबू। एक प्रकार की छोटी जामुन। २. पार्वती।

नीलवर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] १. नीला रंग। २. मूली [को०]।

नीलवर्षाभू (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] नीली पुनर्नवा।

नीलवर्षाभू (२)
संज्ञा पुं० भेक। मेढक [को०]।

नीलवल्ली
संज्ञा स्त्री० [सं०] बंदाक। बाँदा। परगाछा।

नीलवसन (१)
पुं० [सं०] नीला कपड़ा।

नीलवसन (२)
वि० नीला व काल वस्त्र धारण करनेवाला।

नीलवसन (३)
संज्ञा पुं० १. शनि ग्रह। २. बलराम।

नीलवीज
संज्ञा पुं० [सं०] पियासाल।

नीलवुह्ना
संज्ञा स्त्री० [सं०] नीलवृघ्ना। नोला बोना नाम का पेड़।

नीलवृंत
संज्ञा पुं० [सं० नीलवृन्त] तूल। रुई।

नीलवृष
संज्ञा पुं० [सं०] एक विशेष प्रकार का साँड़ या बछवा। विशेष—श्राद्ध में नीलवृष एक पारिभाषिक शब्द है। जिस वृष का रंग लाल (लोहित), पूँछ, खुर और सिर शंख वर्ण हों उसे नीलवृष कहते हैं। ऐसे वृष के उत्सर्ग का बड़ा फल है।

नीलवृषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] बैगन।

नीलशिग्रु
संज्ञा पुं० [सं०] सरहजन का पेड़। शोभांजन।

नीलसंध्या
संज्ञा स्त्री० [सं० नीलसन्ध्या] कृष्णापराजिता।

नीलसार
संज्ञा पुं० [सं०] तेंदू का पेड़। विशेष—इसका हीर काला आबनूस होता है।

नीलसिंदुवार
सज्ञा पुं० [सं० नीलसिन्दुवार] नील निगुँडी [को०]।

नीलसिर
संज्ञा पुं० [हिं० नील + शिर] एक प्रकार की बत्तक जिसका सिर नीला होता है। विशेष—यह हाथ भर लंबी होती है और सिंध, पंजाब, काश्मीर आदि में पाई जाती हैं। अंडे यह गर्मी में देती है।

नीलस्नेह
संज्ञा पुं० [सं०] नील रंग के समान गहुरा प्रेम। दृढ़ स्नेह। स्थिर प्रेम [को०]।

नीलस्वरूप
संज्ञा पुं० [सं०] एक वर्णवृत्त, जिसके प्रत्येक चरण में तीन भगण और दो गुरु अक्षर होते हैं। जैसे,—राउर के सम हैं वह बालौ। जीतति है दुतिवंत जहाँ लौ। जो गिरि दुर्गनि माहु बसै जू। जा भूज चंदन डार त्रसै जू।—गुमान (शब्द०)।

नीलस्वरुपक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'नीलस्वरूप'।

नीलांग (१)
वि० [सं० नीलाङ्ग] नीले अंग का।

नीलाग (२)
संज्ञा पुं० सारस पक्षी।

नीलांगु
संज्ञा पुं० [सं० नीलाङगु] दे० 'नीलंगु' [को०]।

नीलांजन
संज्ञा पुं० [सं० नीलाञ्जन] १. नीला सुरमा। २. तूतिया। नीला थोथा।

नीलांजना
संज्ञा स्त्री० [सं० नीलाञ्जना] १. बिजली। २. नीला- जनी। ३. काला कपास।

नीलांजनी
संज्ञा स्त्री० [सं० नीलाञ्जनी] एक क्षुप। कालां- जनी [को०]।

नीलांजसा
संज्ञा स्त्री [सं० नीलाञ्जसा] १. बिजली। २. एक अप्सरा। ३. एक नदी।

नीलांबर (१)
संज्ञा पुं० [सं० नीलाम्बर] १. नीला वस्त्र। नीले रंग का कपड़ा (विशेषतः रेशमी)। २. तालीशपत्र। ३. बलदेव। ४. शनैश्चर। ५. राक्षस।

नीलांबर (२)
वि० नीले कपड़ेवाला। नील वस्त्रं धारण करनेवाला।

नीलांबरी
संज्ञा स्त्री० [सं० वीलाम्बरी] एक रागिनी।

नीलांबुज
संज्ञा पुं० [सं० नीलाम्बुज] नील कमल।

नीला (१)
वि० [सं० नील] आकाश के रंग का। नील के रंग का। क्रि० प्र०—करना।—होना। मुहा०—नीला करना = मारते मारते शरीर पर नीले दाग डालना। बहुत मार मारना। नीला पड़ना = नीला हो जाना। नीला पीला होना = क्रोध दिखाना। क्रुद्ध होना। बिगड़ना। नीले हाथ पाँव हों = ठंढा हो जाय। मर जाय। (स्त्रि० शाप)। चेहरा नीला पड़ जाना = (१) चेहरे का रंग फीका पड़ जाना। आकृति से भय, उद्विग्नता, लज्जा आदि प्रगट होना। (२) आकृति बिगड़ जाना। सजीवता के लक्षण नष्ट होना।

नीला (२)
संज्ञा पुं० १. एक प्रकार का कबूतर। २. नीलम।

नीला (३)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. नीली मक्खी। २. नील पुनर्नवा। ३. नील का पौधा। ४. एक लता। ५. एक नदी (महाभारत)। ६. मल्लार राग की एक भार्या।

नीलाक्ष (१)
वि० [सं०] नीली आँख का।

नीलाक्ष (२)
संज्ञा पुं० राजहंस।

नीलाक्षल
संज्ञा पुं० [सं०] १. नीलगिरि पर्वत। २. जगन्नाथ जी के निकट की एक छोटी पहाड़ी।

नीलाथोथा
संज्ञा पुं० [सं० नीलतुत्थ] ताँबे की उपधातु। ताँबे का नीला क्षार या लवण। तूतिया। विशेष—वैद्यक में लिखा है की जिस धातु को जो उपधातु होती है उसमें उसी का सा गुण होता है पर बहुत हीन। ताँबे का यह नीला लवण खानों में भी मिलता है पर अधिकतर कारखानों में निकाला जाता है। ताँबे के चूर को यदि खुली हवा में रखकर तपावें या गलावें और उसमें थोड़ा सा गंधक का तेजाब डाल दें तो तेजाब का अम्ल गुण नष्ट हो जायगा और उसके योग से तूतिया बन जायगा। नीलाथोथा रँगाई और दवा के काम में आता है। वैद्यक में यह क्षारसंयुक्त, कटु, कसैला, वमनकारक, लघु, लेखन-गुण-युक्त, भेदक, शीतवीर्य, नेत्रों को हितकर तथा कफ, पित्त, विष, पयरी, कुष्ट और खाज को दूर करनेवाला माना गया है। तूतिया शोधकर अल्प मात्रा में दिया जाता है। इसे कई प्रकार से शोधते हैं। बिल्ली की विष्ठा में तुतिए को गूँधकर दशामांश सोहागा मिलाकर धीमी आँच में पकावे। इसके पीछे मधु और सेंधे नमक का पुट दे। दूसरी विधि यह है कि तूतिए में आधा गंधक मिलाकर उसे चार दंड तक पकावे। शुद्ध होने से उसमें वमन आदि का दोष कम हो जाता है।

नीलाब्ज
संज्ञा पुं० [सं०] नील कमल।

नीलापन
संज्ञा पुं० [हिं० नीला + पन (प्रत्य०)] नीलिमा। नीलाहट।

नीलाम
संज्ञा पुं० [पुर्त्त० लीलाम] बिक्री का एक ढंग जिसमें माल उस आदमी को दिया जाता है जो सबसे अधिक दाम बोलता है। बोली बोलकर बेचना। क्रि० प्र०—करना।—होना। यौ०—मीलामघर। मुहा०—नीलाम पर चढ़ना = बोली बोलकर बेचा जाना। (माल) नीलाम पर चढ़ाना = बोलो बोलकर बेचना।

नीतामघर
संज्ञा पुं० [हिं० नीलाम + घर] वह घर या स्थान जहाँ चीजैं नीलाम की जाती हों।

नीलामी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० नीलाम + ई (प्रत्य०)] नीलाम होने का भाव या क्रिया।

नीलामी (२)
वि० [हिं० नीलाम] नीलाम में मोल लिया हुआ।

नीलाम्ला
संज्ञा स्त्री० [सं०] नीली कटसरैया। नील झिंटी [को०]।

नीलाम्लान
संज्ञा पुं० [सं०] एक पौधा जिसमें सुंदर फूल लगते हैं। काला कोराठा (मराठी)।

नीलाम्ली
संज्ञा पुं० [सं०] राजनिघंटु में वर्णित एक क्षुप। नल्लबु- ड़गुड। यह मधुर, रूक्ष और कफ तथा वातहारक कहा गया है।

नीलारुण
संज्ञा पुं० [सं०] उषःकाल। अरुणोदय। प्रत्यूष [को०]।

नीलालु
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का कंद। राजनिघंटु में इसका गुण मधुर, शीतकारक, पित्त, दाह और श्रमनाशक कहा गया है [को०]।

नीलावती
संज्ञा स्त्री० [सं० नीलवती] एक प्रकार का चावल। उ०—नीलावती चाउर दिवि दुर्लभ। भात परोस्यो माता सुर्लभ।—सूर (शब्द०)।

नीलाशी
संज्ञा स्त्री० [सं०] नील निर्गुंडी [को०]।

नीलाश्गा
संज्ञा पुं० [सं० नीलाश्मन्] नील मणि [को०]।

नीलाश्व
संज्ञा पुं० [सं०] एक देश का नाम।

नीलासन
संज्ञा पुं० [सं०] १. पियासाल का पेड़। २. एक रतिबंध।

नीलाहट
संज्ञा स्त्री० [हिं० नील + आहट (प्रत्य०)] नीलापन।

नीलि
संज्ञा पुं० [सं०] एक जलजंतु का नाम।

नीलिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. नीलबरी। २. नीली निर्गुंडी। नीलाशी। नील सम्हालु वृक्ष। ३. आँख का एख रोग। तिमिर रोग के अतंर्गत लिंगनाश का एक भेद। आँख तिलमिलाने का रोग। विशेष—सुश्रुत के अनुसार जिस तिमिर रोग में कभी कभी एकबारगी कुछ न दिखाई पड़े उसे लिंगनाश कहते हैं और जिसमें आकाश में सूर्य, नक्षत्र, बिजली आदि की सी चामक दिखाई पड़े नीलिका कहते हैं। ४. मुख पर का एक रोग जिसमें सरसों के बराबर छोटे छोटे कड़े काले दाने निकलते हैं। इल्ला।

नीलिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. नील का पेड़। २. नीला बोना।

नीलिमा
संज्ञा स्त्री० [सं० निलिमन्] १. नीलापन। २. श्यामता। स्याही। विशेष—संस्कृत में यद्यपि यह पुं० है पर हिंदी में स्त्री० है।

नीली (१)
वि० स्त्री० [हिं० नीला] काले रंग की। नील के रंग की। काली। आसमानी।

नीली (२)
संज्ञा स्त्री० १. नील का पौधा। २. नीलिका रोग। ३. नीले रंग की एक प्रकार की मक्खी (को०)।

नीली घोड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० नीली + घोड़ी] १. काले अथवा सब्ज रंग की घोड़ी। २. जामे के साथ सिली हुई कागज की घोड़ी जिसे पहन लेने से जान पड़ता है कि आदमी घोड़े पर सवार है। डफाली इसे पहनकर गाजी मियाँ के गीत गाते हुए भीख माँगने निकलते हैं।

नीली चकरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० नीली + चकरी] एक प्रकार का पौधा।

नीली चाय
संज्ञा स्त्री० [हिं० नीली + चाय] अगिया घास या यज्ञकुश।

नीली राग
संज्ञा पुं० [सं०] प्रगाढ़ या दृढ प्रेम [को०]।

नीली संधान
संज्ञा पुं० [सं० नीलीसन्धान] नील का संधान या खमीर [को०]। यौ०—नीलीसंधानभांड = नील का बर्तन या नाँद।

नीलू
संज्ञा स्त्री० [हिं० नील] एक प्रकार की घास। पलवान।

नीलोत्पल
संज्ञा पुं० [सं०] नील कमल।

नीलोत्पली
संज्ञा पुं० [सं० नीलोत्पलिन्] १. शिव के एक अंश। २. बौद्ध महात्मा मंजुश्री का एक नाम।

नीलोपल
संज्ञा पुं० [सं०] १. नीलम। २. नीला पत्थर।

नीलोपर
संज्ञा पुं० [फा० नीलोफर मि० सं० नीलोत्पल] १. नील कमल। २. कुई। कुमुद। विशेष—हकीमी नुसखों में कुमुद या कुईं का ही व्यवहार यहाँ होता है।

नीव
संज्ञा स्त्री० [सं० नेमि, प्रा० नेइँ] १. घर बनाने में गहरी नाली के रूप में खुदा हुआ गड्ढा जिसके भीतर से दीवार की जोड़ाई आरंभ होती है। दोवार उठाने के लिये गहरा किया हुआ स्थान। क्रि० प्र०—खोदना। मुहा०—नींव देना = (१) गड्ढा खोदकर दीवार खड़ी करने के लिये स्थान बनाना। दीवार की जड़ जमाने के लिये भूमि खोदना। (२) घर उठाने का आरंभ करना। (किसी बात की) नींव देना = कारण या आधार खड़ा करना। जड़ खड़ी करना। आरंभ करना। उपक्रम करना। सामान करना। जैसे, झगड़े की नींव देना। उ०—बाकी खाँ सो उठि छता दई दुं द की नीवँ।—लाल (शब्द०)। नीयँ भरना = दीवार के लिये खुदे हुए गड्ढे में कंकड़, पत्थर आदि पाटना। २. दीवार के लिये गहरे किए हुए स्थान में ईंट, पत्थर, मिट्टी आदि की जोड़ाई या जमावट जिसके ऊपर दीवार उठाते हैं। दीवार की जड़ या आधार। मूलभित्ति। क्रि० प्र०—धरना।—रखना। मुहा०—नींव का पत्थर = वह पत्थर जो मकान बनाने के आरंभ में पहले पहल नींव में रखा जाता है। नींव जमाना या डालना या देना = दीवार उठाने के लिये नीवँ के गड्ढे में ईंट, पत्थर आदि जमाकर आधार खड़ा करना। दीवार की जड़ जमाना। (किसी बात की) नीवँ जमाना = (१) आधार दृढ़ जमाना। स्थिर करना। स्थापित करना। (२) गर्भ स्थित करना। पेट रखना। (किसी वस्तु या बात की) नींव डालना या देना = आधार खड़ा करना। जड़ जमाना। सूत्रपात करना। बुनियाद डालना। आरंभ करना। जैसे,— क्लाइव ने अँगरेजी राज्य की नीवँ डाली। नीवँ पड़ना = (१) घर की दीवार का आधार खड़ा होना। घर बनने का लग्गा लगाना। उ०—ओक की नींव परी हरि लोक बिलोकत गंग तरगं तिहीरे।—(शब्द०)। (२) आंरभ होना। सूत्रपात होना। जड़ खड़ी होना या जमना। जैसे, झगड़े की नीवँ पड़ना, राज्य की नींव पड़ना। ३. जड़। मूल। स्थिति। आधार।

नीव
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'नीवँ'।

नीवर
संज्ञा पुं० [सं०] १. मिक्षु। परिव्राजक। १. वाणिज्य। ३. कीचड़। ४. जल। ५. व्यापारी। वाणिज्य करनेवाला (को०)। ६. गृह-निर्माण-योग्य-भूमि (को०)।

नीवाक
संज्ञा पुं० [सं०] १. अकाल के समय अन्न की बढ़ी हुई आवश्यकता या माँग। २. अकाल। दुर्भिक्ष [को०]।

नीवानास (१)
संज्ञा पुं० [हिं० नींव + नाश] जड़ मूल से नाश। सत्तानाश। बरबादी। ध्वंस। क्रि० प्र०—करना।—होना।

नीवानास (२)
वि० चौपट। नष्ट। बरबाद। क्रि० प्र०—करना।—जाना।—होना।

नीवार
सज्ञां पुं० [सं०] पसही या तिन्नी का चावल। मुन्यन्न।

नीवारक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'नीवार' [को०]।

नीवि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कमर में लपेटी हुई धोती की वह गाँठ जिसे स्त्रियाँ पेट के नीचे सूत की डोरी से या यों ही बाँधती हैं। कटिवस्त्रबंध। फुफुँदी। नारा। ३. लहंगे में पड़ी हुई वह डोरी जिससे लहँगा कमर में बाँधा जाता है। इजारबंद। ४. साड़ी। धोती। ५. कौटिल्य के अनुसार वह धन जिसके ब्याज आदि की आय किसी काम में खर्च की जाय और जो सदा रक्षित रहे। स्थायी कोश। ६. खर्च करने के बाद बची हुई पूँजी। (कौटि०)।

नीवी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. निधि। स्थायी कोश। दे० 'नीवि'। उ०—इस संबंध में हिंदी में उत्तमोत्तम ग्रंथों के प्रकाशन के लिये एक अध्यक्ष नीवी की व्यवस्था का भी सूत्रपात हो जाय।—करुणा (परिचय)।

नीवीग्राहक
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य के अनुसार वह व्यक्ति जिसके पास चंदा या किसी दूसरी व्यक्ति का धन जमा हो और जो उस धन का प्रबंध करता हो। खजानची।

नीवृत्
संज्ञा पुं० [सं०] १. जनपद। २. ग्रामसमूह। देश [को०]।

नीव्र
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'नीध्र' [को०]।

नीशार
संज्ञा पुं० [सं०] १. सरदी, हवा आदि से बचाव के लिये परदा। कनात। २. मसहरी।

नीस †
संज्ञा पुं० [देश०] सफेद धतूरा।

नीसक पु
वि० [हिं० नि + सक (=शक्ति)] सामर्थ्यहीन। शाक्तिहीन।

नीसान पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'निशान'।

नीसानी
संज्ञा स्त्री० [?] तेईस मात्राओं का एक छंद जिसमें १३ वीं और १० वीं मात्रा पर विराम होता है। यह उपमान के नाम से अधिक प्रसिद्ध है। यथा,—भाई सूरज मल्ल से कहना यह भाई। इम तुम बंदे साहि के बुज्झे न लराई।—सूदन (शब्द०)।

नीसार पु
संज्ञा पुं० [सं० नीशार] पर्दा। कलात। दे० 'नीशार'।

नीसू
संज्ञा पुं० [सं० निष्ठा] जमीन में गड़ा हुआ काठ का कुंदा जिसपर रखकर चारा या गन्ना काटते हैं।

नीह †
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'नीवँ'।

नीहार
संज्ञा पुं० [सं०] १. कुहरा। २. पाला। हिम। तुषारक। बर्फ। ३. बाहर करना। रीता करना (को०)।

नीहारकर
संज्ञा पुं० [सं०] चंद्रमा [को०]।

नीहारजल
संज्ञा पुं० [सं०] ओसाविंदु। शबनम [को०]।

नीहारिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] आकाश में धूएँ या कुहरे की तरह फैला हुआ क्षीण प्रकाशपुंज जो अँधेरी रात में सफेद धब्बे की तरह कहीं कहीं दिखाई पड़ता है। विशेष—नीहारिका के धब्बे हमारे सौर जगत् से बहुत दूर हैं। दूरबीन के द्वारा देखने से ऐसे बहुत से धब्बों का पता अबतक लग चुका हैं जो भिन्न भिन्न अवस्थाओं में हैं। कुछ धब्बे तो ऐसे हैं जो अच्छी से अच्छी दूरबीनों से देखने पर भी कुहरे या भाप के रूप के ही दिखाई पड़ते हैं, और कुछ एक दम छोटे छोटे तारों से मिलकर बने पाए जाते हैं और वास्तव में तारकगुच्छ हैं। आकाश गंगा में इस प्रकार के तारकगुच्छ बहुत से हैं। इन तीनों में शुद्ध नीहारिका एक प्रकार के धब्बे ही हैं जो प्रारंभिक अवस्था में हैं। इनसे आती हुई किरणों की रश्मिविश्लेषण यत्र में परीक्षा करने से कुछ में कई प्रकार की आलोकरेखाएँ पाई जाती हैं। इनमें से कई एक का तो निश्चय नहीं होता कि किस द्रव्य से आती हैं, तीन का पता लगता है कि वे हाइड्रोजन (उतजन) की रेखाएँ हैं। ज्योतिर्विज्ञानियों का कथन है कि नीहारिका के धब्बे ग्रह नक्षत्रों के उपादान हैं। इन्हीं के क्रमशः घनीमूत होकर जमते जमते नक्षत्रों और लोकपिंड़ों की सृष्टि होती हैं। इनमें अत्यंत अधिक मात्रा का ताप होता है। हमारा यह सूर्य अपने ग्रहों और उपग्रहों के साथ आरंभ में नीहारिका रूप में था।

नु
अव्य० [सं०] विकल्प, संदेह, वितर्क, अनिश्चय आदि अर्थों में प्रयुक्त अव्यय। किं के साथ प्रयुक्त होने पर यह सँभावना, निश्चयादि अर्थ व्यक्त करता है।

नुकता (१)
संज्ञा पुं० [अ० नुकतह्] १. बिंदु। बिंदी। २. शून्य। सिफर (को०)। २. चिह्न। दाग। निशान। धब्बा (को०)।

नुकता (२)
संज्ञा पुं० [अ० नुकतह] १. चुटकुला। फबती। लगती हुई उक्ति। क्रि० प्र०—छेड़ना।—छोड़ना। २. ऐब। दोष। दुर्गुण। क्रि० प्र०—निकालना। यौ०—नुकताचीं। नुकताचीनी। ३. झालर के रूप का वह परदा जो घोड़ों के माथे पर इसलिये बाँधा जाता है जिसमें आँख में मक्खियाँ न लगें। तिल्हारी।

नुकताचीँ
वि० [फा० नुकतहूचीं] दे० 'नुकताचीन'।

नुकताचीन
वि० [फा० नुकतहूचीन] ऐब ढूँढनेवाला या निकालने- दाला। दोष ढूँढनेवाला या निकालनेवाला। छिद्रान्वेषी।

नुकताचीनी
संज्ञा स्त्री० [फा०] छिद्रान्वेषण। दोष निकालने का काम। क्रि० प्र०—करना।—होना।

नुकती
संज्ञा स्त्री० [फा० नखुदी] एक प्रकार की मिठाई। बेसन की छोटी महीन बुँदिया।

नुकना †
क्रि० प्र० [हिं० लुकना] लुकना। छिपना।

नुकरा (१)
संज्ञा पुं० [अ० नुकरह्] १. चाँदी। २. घोड़ों का सफेद रंग।

नुकरा (२)
वि० सफेद रंग का (घोड़ा)।

नुकरी
संज्ञा स्त्री० [देश०] जलाशयों के पास रहनेवाली एक चिड़िया जिसके पैर सफेद और चोंच काली होती है।

नुकसान
संज्ञा पुं० [अ०] १. कमी। घटी। ह्रास। छीज। जैसे,— सीड़ में रखने से इतने कागज का नुकसान हो गया। २. हानि। घाटा। फायदा का उलटा। जियान। क्षति। पास की वस्तु का जाता रहना। क्रि० प्र०—करना।—होना। मुहा०—नुकसान उठाना = हानि सहना। पल्ले का खोना। क्षतिग्रस्त होना। नुकसान पहुँचना = नुकसान होना। नुकसान पहूँचाना = हानि करना। क्षतिग्रस्त करना। नुकसान भरना = हानि की पूर्ति करना। घाटा पूरा करना। ३. बिगाड़। खराबी। दोष। अवगुण। विकार। मुहा०—(किसी को) नुकसान करना = दोस उत्पन्न करना। अस्वस्थ करना। स्वास्थ्य के प्रतिकूल होना। जैसे,—आलू हमें बहुत नुकसान करता हैं।

नुकाई
संज्ञा स्त्री० [देश०] खुरपी से निराने का काम।

नुकाना † (१)
क्रि० स० [हिं० लुकना] लुकाना। छिपाना।

नुकाना † (२)
क्रि० स० [देश०] खुरपी से निराना।

नुकीला
वि० [हिं० नोक + ईला (प्रत्य०)] [वि० स्त्री० नुकीली] १. नोकदार। जिसमें नोक निकली हो। जो छोर की ओर बराबर पतला होता गया हो। २. नोक झोंक का। बाँका तिरछा। सुंदर ढब का। सजीला। जैसे, नुकीला जवान।

नुकीली
वि० स्त्री० [हिं० नुकीला] दे० 'नुकीला'।

नुक्कड
संज्ञा पुं० [हिं० नोक का अल्पा०] १. नोक। पतला सिरा। २. सिरा। छोर। अंत। जैसे,—गली के नुक्कड़ पर वह दुकान है। ३. कोना। निकला हुआ कोना।

नुक्का
संज्ञा पुं० [हिं १ नोक] १. नोक। यो०—नुक्का टोपी = पतली दोपलिया टोपी जो लखनऊ में दी जाती है। २. गेड़ी के खेल में एक लकड़ी। मुहा०—नुक्का मारना या लगाना = (१) गेड़ी मारना। गेड़ी के खेल में लकड़ी मारना। (२) कील ठोंकना। बाधा पहुँचाना। कष्ट पहुँचाना।

नुक्स
संज्ञा पुं० [अ० नुक्स] १. दोष। ऐब। खराबी। बुराई। क्रि० प्र०—निकलना।—निकालना। २. त्रुटि। कसर।

नुखरना
क्रि० अ० [देश०] भालू का चित्त लेटना (कलंदर)।

नुखाट
संज्ञा स्त्री० [देश०] छड़ी की मार जो कलंदर भालू के मुँह पर मारते हैं। (कलंदर)।

नुगदी
संज्ञा स्त्री० [हिं० नुकती] दे० 'नुकती'।

नुचना
क्रि० अ० [सं० लुञ्बन] १. अंश या अंग से लगी हुई किसी वस्तु का झटके से खिंचकर अलग होना। खिंचकर अलग होना। खिंचकर उखड़ना। उड़ना, जैसे, बाल नुचना। पत्ती नुचना। २. खरोंचा जाना। नाखून आदि से छिलना। संयो० क्रि० —जाना।

नुचवाना
क्रि० स० [हिं० नीचना का प्रे० रूप] नोचने का काम कराना। नोचने में प्रवृत्त करना। नोचने देना। संयो० क्रि०—डालना।—देना।

नुजट
संज्ञा पुं० [देश०?] संगीत में १४ शोभाओं में से एक।

नुत
वि० [सं०] स्तुत। प्रशंसित। वंदित। जिसकी स्तुति या प्रशंसा की गई हो।

नुति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. स्तुति। वंदना। २. पूजा।

नुत्त
वि० [सं०] १. चलाया हुआ। क्षिप्त। २. प्रेरित।

नुत्फा
संज्ञा पुं० [अं० नुत्फह्] बीर्य। शुक्र। मूहा०—नुत्फा ठहरना = गर्भ रहना। यौ०—नुत्फाहराम। २. संतति। औलाद।

नुत्फाहराम
वि० [अ० नुत्फाह् राम] १. जिसकी उत्पत्ति व्यभिचार से हो। वर्णसंकर। दोगला। २. कमीना। बदमाश (गाली)।

नुनखरा
वि० [हिं० नून + खारा] स्वाद में नमक सा खारा। नमकीन।

नुनखारा
वि० [हिं०] दे० 'नुनखरा'।

नुनना
क्रि० स० [सं० लबन, लून] लूनना। खेत काटना।

नुनाई पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० 'नून' से, नीना, नोनो (= सुंदर या लोना)] लावण्य। सूंदरता। सलोनापन।

नुनी
संज्ञा स्त्री० [देश०] छोटी जाति का तूत जो हिमालय पर काश्मीर से लेकर सिक्किम तक तथा बरमा और दक्षिण भारत के पहाड़ों पर भी होता है।

नुनेरा
संज्ञा पुं० [हिं० नून + एरा (प्रत्य०)] १. नौनी मिट्टी आदि से नमक निकालनेवाला। नमक बनाने का रोजगार करनेवाला। २. लोनिया। नोनिया। (इस जाति के लोग पहले नमक निकाला करते थे)।

नुमा
वि० [फा०] १. दिखानेवाला। बतानेवाला। २. समान। तुल्य। (समासांत में प्रयुक्त) जैसे, खुशनुमा, बदनुमा, राहनुमा [को०]।

नुमाइंदगी
संज्ञा स्त्री० [फा०] प्रतिनिधित्व [को०]।

नुमाइंदा
संज्ञा पुं० [फा० नुमाइन्दह्] प्रतिनिधि।

नुमाइश
संज्ञा स्त्री० [फा०] १. दिखावट। दिखावा। प्रदर्शन। दिखाने वा प्रगट करने का भाव। तड़क भड़क। ठाट बाट। सज धज। ३. नाना प्रकार की वस्तुओं का कुतूहल और परिचय के लिये एक स्थान पर दिखाया जाना। यौ०—नुमाइशगाह। ४. वह मेला जिसमें अनेक स्थानों से इकट्ठी की हुई उत्तम और अद् भूत वस्तुएँ दिखाई जाती हैं। प्रदर्शनी।

नुमाइशगाह
संज्ञा स्त्री० [फा०] वह स्थान जहाँ अनेक प्रकार की उत्तम और अदभुत वस्तुएँ इकट्ठी करके दिखाई जायँ।

नुमाइशी
वि० [फा०] १. दिखाऊ। दिखौवा। जो दिखावट के लिये हो, किसी प्रयोजन का न हो। जो देखने में भड़कीला और सुंदर हो, पर टिकाऊ या काम का न हो। २. जिसमें ऊपरी तड़क भड़क हो, भीतर कुछ सार न हो।

नुमायाँ
वि० [फा०] व्यक्त। जाहिर। स्पष्ट [को०]।

नुसखा
संज्ञा पुं० [अ०] १. लिखा हुआ कागज। २. कागज का वह चिट जिसपर हकीम या वैद्य रोगी के लिये ओषध और सेवनविधि आदि लिखते हैं। दवा का पुरजा। ३. रोगी के लिये लिखी हुई ओषधियाँ और उनकी सेवनाविधि आदि। मुहा०—नुसखा बाँधना = हकीम या वैद्य के लिखे अनुसार दवाएँ देना। पंसारी या अत्तार का काम करना। नुसखा लिखना = रोगी को देख औषध की व्यवस्था करना। दवा लिखना।

नुहरना †
क्रि० अ० [हिं० निहुरना] दे० 'निहुरना'।

नूत (१)
वि० [सं० नूतन, नूत्न] १. नया। नवीन। नूतन। उ०—अरुन नूत पल्लव धरै रँग भीजी ग्वालिनी।—सूर (शब्द०)। (ख) दूत विधि नूत कबहुँ न उर आनहीं।—राम चं०, पृ० ११४। २. अनोखा। अनूठा। उ०—मूलै मौला कहत हैं फलै अंबिया नाव। और तरुन में नूत यह तेरी धन्य सुभाव।—(शब्द०)।

नूत (२)
वि० [सं०] दे० 'नुत' [को०]।

नूतन
वि० [सं०] १. नया। नवीन। २. हाल का। ताजा। ३. अनोखा। अपूर्व। विलक्षण।

नूतनता
संज्ञा स्त्री० [सं०] नूतन का भाव। नवीनता। नयापन।

नूतनत्व
संज्ञा पुं० [सं०] नयापन।

नूत्न
वि० [सं०] दे० 'नूतन'।

नूद
संज्ञा पुं० [सं०] शहतूत।

नूधा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का तंबाकू।

नून (१)
संज्ञा पुं० [देश०] १. आल। २. आल की जाति की एक लता जो दक्षिण भारत तथा आसाम, बरमा आदि देशों में होती है। विशेष—इससे भी एक प्रकार का लाल रंग निकलता है। इसका व्यवहार भारतवर्ष में कम पर जावा आदि द्वीपों में बहुत होता है।

नून † (२)
संज्ञा पुं० [सं० लवण, हिं० लोन] नमक। मुहा०—नून तेल = गृहस्थी का सामान।

नून (३)
वि० [सं० न्यून, प्रा० णूण] दे० 'न्यून'। उ०—(क) सूनो कै परम पद ऊनो कै अनंत मद नूनौ के नदीस नद इंदिरा झुरै परी।—इतिहास, पृ० २६७। (ख) प्रेंमहि सज्जन हिये महँ होन देत नहिं नून।—रसनिधि (शब्द०)।

नूनताई पु
संज्ञा स्त्री० [सं० न्यूनता, हिं० नूनता + ई (प्रत्य०)] दे० 'न्यूनता'।

नूनी †
संज्ञा स्त्री० [सं० न्यून, हिं नून] लिगेंद्रिय, विशेषतः बच्चों की।

नूपुर
संज्ञा पुं० [सं०] १. पैर में पहनने का स्त्रियों का एक गहना। पैंजनी। घुँघुरू। २. नगण के पहले भेद का नाम। ३. इक्ष्वाकुवंशीय एक राजा।

नूका
संज्ञा पुं० [?] १४ मात्राओँ का एक छंद जो कज्जल के नाम से अधिक प्रसिद्ध है। यथा खलभल परी दुग्ग मझार। दलबल दपट देखि अपार। खलबल करत नर अरु नार। छल बल कोट ओट निहार।

नूर
संज्ञा पुं० [अ०] १. प्रकाश। आभा। जैसे,—खुदा का नूर। मुहा०—नूर का तड़का = बहुत सबेरा। प्रातःकाल। नूर बरसना = प्रभा का अधिकता से प्रकट होना। २. श्री। कांति। शोभा। ३. ईश्वर का नाम (सूफी)। ४. संगीत में बारह मुकामों में से एक। यौ०—नुरचश्म = आँखों की रोशनी। लड़का। सुपुत्र। नूर- चश्मी = कन्या। सुपुत्री। नूरबाफ।

नूरबाफ
संज्ञा पुं० [अ० नूर + फा० वाफ] जुलाहा। ताँती।

नूरा (१)
संज्ञा पुं० [देश०] वह कुश्ती जो आपस में मिलकर लड़ी जाय अर्थात् जिसमें जोड़ एक दूसरे के विरोधी न हों (पहलवान)।

नूरा (२)
वि० [अ० नूर] नूरवाला। तेजस्वी। उ०—दधिकदंम खेलत रघुबंसी नरनारी नव नूरे।—रघुराज (शब्द०)।

नूरी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक चिड़िया।

नूह
संज्ञा पुं० [अ०] शामी या इबरानी (यहुदी, ईसाई, मुसलमान) मतों के अनुसार एक पैगंबर का नाम। विशेष—इनके समय में बड़ा भारी तूफान आया था। इस तूफान में सारी सृष्टि जलमग्न हो गई थी, केवल नूह का परिवार और कुछ पशु एक किश्ती पर बैठकर बचे थे। कहते हैं उन्हीं से फिर नए सिरे से सृष्टि चली।

नृ
संज्ञा पुं० [सं०] १. नर। मनुष्य। २. शतरंज या चौसर की गोट (को०)। ३. प्रधान। मुखिया। नेता (को०)।

नृकपाल
स्त्री० पुं० [सं०] मनुष्य की खोपड़ी।

नृकलेवर
संज्ञा पुं० [सं०] मनुष्य का मृत शरीर। मनुष्य का शव।

नृकेशरी
संज्ञा पुं० [सं० नृकेशरिन्] १. नृसिंह अवतार। २. मनुष्यों में सिंह के समान पराक्रमी पुरुष। श्रेष्ठ पुरुष।

नृग
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक राजा जिन्हें गिरगिट योनि में रहकर कृत पाप का फल भोगना पड़ा था। विशेष—महाभारत में इनकी कथा इस प्रकार है—राजा नृग बड़े दानी थे। उन्होंने न जाने कितने गोदान आदि किए थे। एक बार उनकी गायों के झुंड में किसी एक ब्राह्मण की गाय आ मिली। राजा ने एक बार एक ब्राह्मण को सहस्त्र गो दान में दी जिनमें वह ब्राह्मणावाली गाय भी थी। ब्राह्मण ने जब अपनी गाय को पहचाना तब दोनों ब्राह्मण राजा नृग के पास आए। राजा नृग ने जिस ब्राह्मण को गाएँ दान में दी थीं उसे गाय बदल लेने के लिये बहुत समझाया पर उससे एक न मानी। अंत में वह दूसरा ब्राह्मण उदास होकर चला गया। जब राजा का परलोकवास हुआ तब उनसे यम ने कहा कि आपका पुण्य- फल बहुत है पर ब्राह्मण की गाय हरने का पाप भी आपको लगा है। चाहे पाप का फल पहले भोगिए, चाहे पुण्य का। राजा ने पाप का ही फल पहले भोगना चाहा अतः वे सहस्त्र वर्ष के लिये गिरागिट होकर एक कुएँ में रहने लगे। अंत में श्रीकृष्ण के हाथों से उनका उद्धार हुआ। २. मनु के पुत्र का नाम। ३. यौधेय वंश का आदि पुरुष जो नृगा के गर्भ से उत्पन्न उशीनर का पुत्र था। ४. परमात्मा (को०)।

नृगा
संज्ञा स्त्री० [सं०] राजा उशीनर की पत्नी का नाम।

नृघ्न
वि० [सं०] नरघातक।

नृजल
संज्ञा पुं० [सं०] मानव मूत्र। मनुष्य का पेशाब [को०]।

नृतक पु
संज्ञा पुं० [सं० नृत + क] दे० 'नर्तक'।

नृतना पु
क्रि० अ० [सं० नृत] दे० 'नृत्तना'।

नृति
सज्ञा स्त्री० [सं०] नाच। नृत्य।

नृतु
सज्ञा पुं० [सं०] १. नाचनेवाला। नर्तक। २. पृथिवी। धरती (को०)। ३. दीर्घ। बड़ा (को०)। ४. कीट। कृमि (को०)।

नृतू
संज्ञा पुं० [सं०] १. नर्तक। २. नरहिंसक।

नृत्त
संज्ञा पुं० [सं०] नृत्य। अभिनय। हाव भाव से युक्त नाच। भावों का आश्रय लेकर किया जानेवाला नाच।

नृत्तना पु
क्रि० अ० [सं० नृत्त] नाचना। नृत्य करना।

नृत्य
संज्ञा पुं० [सं०] संगीत के ताल और गति के अनुसार हाथ पाँव हिलाने, उछलने कूदने आदि का व्यापार। नाच। नर्तन।विशेष—इतिहास, पुराण, स्मृति इत्यादि सबमें नृत्य का उल्लेख मिलता है। संगीत के ग्रंथों में नृत्य के दो भेद किए गए हैं—तांडव और लास्य। जिसमें उग्र और उद्धत चेष्टा हो उसे तांडव कहते हैं और जो सुकुमार अंगों से किया जाय तथा जिसमें शृंगार आदि कोमल रसों का संचार हो उसे लास्य कहते हैं। 'संगीत नारायण' में लिखा है कि पुरुष के नृत्य को तांडव और स्त्री के नृत्य को लास्य कहते हैं। 'संगीतदामोदर' के मत से तांडव और लास्य भी दो दो प्रकार के होते हैं—पेलवि और बहुरूपक। अभिनयशून्य अंगविक्षेप को पेलवि कहते हैं। जिसमें छेद, भेद तथा अनेक प्रकार के भावों के अभिनय हों उसे बहुरूपक कहते हैं। लास्य नृत्य दो प्रकार का होता है—छुरित और यौवन। अनेक प्रकार के भाव दिखाते हुए नायक नायिका एक दूसरे का चुंबन आलिंगन आदि करते हुए जो नृत्य करते हैं वह छुरित कहलाता है। जो नाच नाचनेवाली अकेले आप ही नाचे वह यौवन है। इसी प्रकार संगीत के ग्रंथों में हाथ, पैर, मस्तक आदि की विविध गतियों के अनुसार अनेक भेद उपभेद किए गए हैं। धर्मशास्त्रों में नृत्य से जीविका करनेवाले निंद्य कहे गए हैं।

नृत्यकी पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० नर्तकी] दे० 'नर्तकी'।

नृत्यप्रिय
संज्ञा पुं० [सं०] १. महादेव (जिन्हें तांडव नृत्य प्रिय है)। २. कार्तिकेय का एक अनुचर।

नृत्यशाला
संज्ञा स्त्री० [सं०] नाचृघर।

नृत्यस्थान
संज्ञा पुं० [सं०] रंगमंच। रंगशाला [को०]।

नृदुर्ग
संज्ञा पुं० [सं०] सेना का चारो ओर का घेरा।

नृदेव
संज्ञा पुं० [सं०] १. राजा। २. ब्राह्मण।

नृधर्मा
संज्ञा पुं० [सं० नृधर्मन्] कुबेर।

नृदेवता
संज्ञा पुं० [सं०] राजा। उ०—देवता अदेवता नृदेवता जिते जहान।—केशव (शब्द०)।

नृपंजय
संज्ञा पुं० [सं० नृपञ्जय] एक पुरुवंशीय राजा।

नृप
संज्ञा पुं० [सं०] नरपति। राजा।

नृपकंद
संज्ञा पुं० [सं० नृपकन्द] लाल प्याज।

नृपगृह
संज्ञा पुं० [सं०] राजप्रासाद। राजमहल। उ०—मंदिर मनि समूह जनु तारा। नृपगृह कलस सो इंदु उदारा।— मानस, १। १९५।

नृपता
संज्ञा स्त्री० [सं०] राजापन। राजा का गुण या भाव।

नृपति
संज्ञा पुं० [सं०] १. राजा। २. क्षत्रिय (को०)। ३. कुबेर।

नृपदुम
संज्ञा पुं० [सं०] १. अमिलतास। २. खिरनी का पेड़।

नृपनय
संज्ञा पुं० [सं०] नृपनीति। राजनीति। उ०—करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि।—मानस, २। २५७।

नृपनीति
संज्ञा संज्ञा [सं०] राजनीति। राजधर्म। उ०—मैं बड़ छोट बिचारि जिय करत रहेउँ नृपनीति।—मानस, २। ३१।

नृपद्रोही
संज्ञा पुं० [सं० नृपद्रोहिन्] परशुराम। उ०—भृगुवर परसु देखावहु मोही। बिप्र बिचारि बचौं नृपद्रोही।— मानस, १। २७६।

नृपपथ
संज्ञा पुं० [सं०] राजपथ। प्रधान मार्ग। राजमार्ग [को०]।

नृपप्रिय
संज्ञा पुं० [सं०] १. लाल प्याज। २. रामशर। सरकंडा। ३. एक प्रकार का बाँस। ४. जड़हन धान। ५. आम का पेड़। ६. राजसुआ। पहाड़ी या पर्वती तोता।

नृपप्रियफला
संज्ञा स्त्री० [सं०] बैंगन।

नृपप्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. केतकी। २. पिंड खजूर।

नृपबदर
संज्ञा पुं० [सं०] बड़ी जात का बेर [को०]।

नृपमांगल्य
संज्ञा पुं० [सं० नृपमाङ्गल्थ] तरवट का पेड़। आहुल।

नृपमान
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का बाजा जो राजाओं के भोजन के समय बजाया जाता था।

नृपलक्ष्म
संज्ञा पुं० [सं०] राजचिह्न। नृपचिह्न [को०]।

नृपलिंग
संज्ञा पुं० [सं० नृपलिङ्ग] दे० 'नृपलक्ष्म' [को०]।

नृपवल्लभ
संज्ञा पुं० [सं०] १. राजाम्रवृक्ष। २. राजा का प्रिय व्यक्ति (को०)।

नृपवल्लभा
संज्ञा स्त्री० [सं०] केतकी।

नृपवृक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] सोनालु का पेड़।

नृपशासन
संज्ञा सं० [सं०] राजाज्ञा। राजा का आदेश [को०]।

नृपशु
संज्ञा पुं० [सं०] १. मनुष्य रूपी पशु। मनुष्य जो पशु के समान हो। २. यज्ञ में बलि देने के लिये चुना हुआ मनुष्य [को०]।

नृपसभ
संज्ञा पुं० [सं०] राजाओं की सभा। वह सभा जिसमें बहुत से राजा सम्मिलित हों [को०]।

नृपसुत
संज्ञा पुं० [सं०] राजकुमार। राजपुत्र। उ०—एक कहइ नृपसुत तेइ आली। सुने जे मुनि सँग आए काली।—मानस, १। २२९।

नृपसभा
संज्ञा स्त्री० [सं०] राजसभा। राजा का दरबार [को०]।

नृपसुता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. राजकन्या। राजकुमारी। २. छछूँदर। छछूँदरी।

नृपाँश
संज्ञा पुं० [सं०] १. राजा का कर। उपज का वह निर्धारित छठा या आठवाँ अंश जो राजा को कर के रूप में मिलता था। २. राजपुत्र [को०]।

नृपात्मज
संज्ञा पुं० [सं०] राजकुमार।

नृपात्मजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. राजकन्या। २. कडुवा धीया। कड़ई तूँबी।

नृपाध्वर
संज्ञा पुं० [सं०] राजसूय यज्ञ।

नृपान्न
संज्ञा पुं० [सं०] राजभोग धान।

नृपाभीर
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का बाजा जो राजाओं के भीजन के समय बजाया लाता था।

नृपामय
संज्ञा पुं० [सं०] राजयक्ष्मा। क्षयरोग। राजरोग।

नृपाल
संज्ञा पुं० [सं०] (मनुष्यों का पालन करनेवाला) राजा। दे० 'नृपति'।

नृपावर्त
संज्ञा पुं० [सं०] राजावर्त। एक प्रकार का रत्न।

नृपासन
संज्ञा पुं० [सं०] भद्रासन। राजसिंहासन। तख्त।

नृपाह्व, नृपाह्वय
संज्ञा पुं० [सं०] १. राजा कहलानेवाला। राजा नामधारी। २. लाल प्याज।

नृपोचित (१)
वि० [सं०] जो राजाओं के योग्य हो।

नृपोचित (२)
संज्ञा पुं० १. राजमाष। काला बड़ा उरद। २. लोबिया।

नृमण
संज्ञा स्त्री० [सं०] भागवत में वर्णित प्लक्ष द्वीप की एक महानदी।

नृमणि
संज्ञा पुं० [सं०] एक पिशाच या भुत जो बच्चों को लगकर तंग किया करता है।

नृमर
संज्ञा पुं० [सं०] (मनुष्यों को मारनेवाला) राक्षस।

नृमिथुन
संज्ञा पुं० [सं०] स्त्री पुरुष का जोड़ा।

नृमेध
संज्ञा पुं० [सं०] नरमेध या पुरुपषमेध यज्ञ।

नृम्ण (१)
वि० [सं०] प्रसन्न करनेवाला [को०]।

नृम्ण (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. कृष्ण। २. पौरुष। ३. साहस। ४. धन [को०]।

नृयज्ञ
संज्ञा पुं० [सं०] पंच यज्ञों में से एक जिसका करना गृहस्थ के लिये कर्तव्य है। अतिथिपूजा। अभ्यागत का सत्कार।

नृलोक
संज्ञा पुं० [सं०] नरलोक। मनुष्यलोक। मर्त्यलोक। मर्त्यलोक।

नृवराह
संज्ञा पुं० [सं०] बाराहरूपधारी भगवान् विष्णु।

नृवाहन
संज्ञा पुं० [सं०] नरवाहन। कुबेर [को०]।

नृवेष्टन
संज्ञा पुं० [सं०] शिव। महादेव [को०]।

नृशंस
वि० [सं०] १. लोगों को कष्ट या पीड़ा पहुँचानेवाला। क्रूर। निर्दय। २. अनिष्टकारी। अपकारी। अत्याचारी। जालिम।

नृशंसता
संज्ञा स्त्री० [सं०] निर्दयता। क्रूरता।

नृशृंग
संज्ञा पुं० [सं० नृश्रृङ्ग] मनुष्य की सींग के समान अनहोनी बात या वस्तु। अलोकपदार्थ।

नृसिंह
संज्ञा पुं० [सं०] १. सिंहरूपी भगवान् विष्णु। विष्णु का चौथा अवतार। विशेष—हरिवंश में लिखा है कि सत्ययुग में दैत्यों के आदि पुरुष हिरण्यकशिपु ने घोर तप करके ब्रह्मा से वर माँग लिया कि न मैं देव, असुर, गंधर्व, नाग, राक्षस या मनुष्य के हाथ से मारा जा सकूँ, न अस्त्र, शस्त्र, वृक्ष, रौल तथा सूखे या गीले पदार्थ से मरूँ; और न स्वर्ग, मर्त्य आदि किसी लोक में या दिन, रात किसी काल में मेरी मृत्यु हो सके। इस प्रकार का वर पाकर वह दैत्य अत्यंत प्रबल हो उठा और स्वर्ग आदि छीनकर देवताओं को बहुत सताने लगा। देवता लोग विष्णु भगवान् की शरण में गए। विष्णु ने उन्हें अभयदान देकर अत्यंत भीषण नृसिंह मूर्ति धारण की जिसका आधा शरीर मनुष्य का और आधा सिंह का था। जब यह नृसिंह मूर्ति हिरण्यकशिपु के पास पहुँची तब उसके पुत्र प्रह्लाद ने कहा कि यह मूर्ति 'देवी है, इसके भीतर सारा चराचर जगत् दिखाई पड़ता है। जान पड़ता है, अब दैत्यकुल नष्ट होगा। यह सुनकर हिरण्यकशिपु ने अपने दैत्यों से नृसिंह को मारने के लिये कहा। पर जितने दैत्य मारने गए सब नष्ट हुए। अंत में हिरर्णकशिपु आप उठकर युद्ध करने लगा। हिरण्यकशिपु के क्रुद्ध नेत्रों की ज्वाला से समुद्र का जल खलबला उठा, सारी पृथ्वी डाँवाडोल हुई और लोकों में हाहाकार मच गया। देवताऔं का आर्तनाद सुन नृसिंह भगवान् अत्यंत भीषण गर्जन करके दैत्य पर झपटे और उन्होंने उसका पेट फाड़ डाला। भागवत और विष्णु पुराण मे सब कथा तो यही है पर प्रह्लाद की भक्ति का प्रसग अधिक है। भागवत में लिखा है कि हिरण्यकशिपु वर पाकर बहुत प्रबल हुआ और स्वर्ग आदि लोकों को जीतकर राज्य करने लगा। उसके चार पुत्र थे जिनमें प्रह्लाद विष्णु भगवान् का बड़ा भारी भक्त था। शुक्राचार्य का पुत्र दैत्यराज के पुत्रों को पढ़ाता था। एक दिन हिरण्यकशिपु ने परीक्षा के लिये सब पुत्रों को अपने सामने बुलाया और कुछ सुनाने के लिये कहा। प्रह्लाद, विष्णु भगवान् की महिमा गाने लगा। इसपर दैत्यराज बहुत बिगड़ा। क्योंकि वह विष्णु का घोर द्वेषी था। पर बिगड़ने का कुछ भी फल नहीं हुआ। प्रह्लाद की भक्ति दिन पर दिन अधिक होती गई। पिता के द्वारा अनेक ताड़न और कष्ट सहकर भी प्रह्लाद भक्ति पर दृढ़ रहे। धीरे धीरे बहुत से सहपाठी बालकों का दल प्रह्लाद का अनुपायी हो गया। इसपर दैत्यराज ने कुपित होकर प्रह्लाद से पूछा कि 'तू किसके बल पर इतना कूदता है ? प्रह्लाद ने कहा 'भगनान् के, जिसके बल पर यह सारा संसार चल रहा है'। हिरण्यकशिपु ने पूछा 'तेरा भगान् कहाँ है' प्रह्लाद ने कहा वह सदा सर्वत्र रहता है। दैत्यराज ने दाँत पीसकर पूछा 'क्या इस खंभे में भी है ? 'प्रहलाद ने कहा 'अवश्य'। हिरण्यकशिपु खङ्ग लेकर बार बार खंभे की और देखने लगा। इतने में खभे के भीतर से प्रलय के समान शब्द हुआ और नृसिंह ने निकलकर दैत्यराज का वध किया। २. श्रेष्ठ पुरुष। ३. एक रतिबंध।

नृसिंह चतुर्दशी
संज्ञा स्त्री० [सं०] वैशाख शुक्ल चतुर्दशी। विशेष—इस तिथि को नृसिंह जी का अवतार हुआ था इससे इस दिन व्रत, पूजन, उत्सव आदि किए जाते हैं।

नृसिंह पुराण
संज्ञा पुं० [सं०] एक उपपुराण।

नृसिंहपुरी
संज्ञा पुं० [सं०] एक तीर्थ जो मुलतान में कहा जाता है।

नृसिंहवन
संज्ञा पुं० [सं०] बृहत्संहिता के अनुसार कूर्म विभाग में पश्चिम उत्तर स्थित एक देश।

नृसोम
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो मनुष्यों में चंद्रमा के सदृश हो। नरश्रेष्ठ।

नृहरि
संज्ञा पुं० [सं०] नृसिंह।

ने †
प्रत्य० [सं० प्रत्य० टा = एण] सकर्मक भूतकालिक क्रिया के कर्ता का चिह्न जो उसके आगे लगाया जाता है। सकर्मक भूतकालिक क्रिया के कर्ता की विभाक्ति। जैसे,—राम ने रावण को मारा। उसने यह काम किया। विशेष—हिंदी की भूतकालिक क्रियाएँ सं० कृदंतों से बनी हैं इसी से कर्मवाच्य रूप में वाक्यों का प्रयोग आरंभ हुआ। क्रमशः उन वाक्यों का ग्रहण कर्तृवाच्य में भी होने लगा।

नेइँ †
संज्ञा स्त्री० [हिं० नेव] दे० 'नीवँ'।

नेई पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० नेव] दे० 'नींव'। उ०—अवध उजारि लीह्नि कैकेई। दोन्हेसि अचल बिपति कै नेई।—मानस, २। २९।

नेउछाउरि, नेउछावरि †
संज्ञा स्त्री० [हिं० न्योछावर] दे० 'न्योछावर' 'निछावर'।

नेउतना †
क्रि० स० [हिं० न्योतना] दे० 'नेवतना', 'न्योतना'।

नेउतहरी †
संज्ञा पुं० [हिं० न्योता + हरि (प्रत्य०)] निमंत्रित जन।

नेउता †
संज्ञा पुं० [हिं० न्योता] दे० 'नेवता', 'न्योता'।

नेउला
संज्ञा पुं० [सं० नकुल, हिं० निवला] दे० 'नेवला'।

नेक (१)
वि० [फा०] १. अच्छा। भला। उत्तम। यौ०—नेक अंजाम। नेक अंदेश = हितचिंतक। खैरख्वाह। नेक- चलन। निकजात = सत्कुलीन। उत्तम जाति का। नेकतर, नेकतरीन = उत्तमतर। श्रेष्ठतर। नेकदिल। नेकनाम। नेकनीयत। नेकबख्त। २. शिष्ट। सज्जन। जेसे, नेक आदमी।

नेक † (२)
वि० [हिं० न + एक] थोड़ा। तनिक। जरा सा। किंचित्। कुछ।

नेक (३)पु
क्रि० वि० थोड़ा। जरा। तनिक। उ०—नेक हँसोहीं बानि तजि लखौ परत मुख नीठि।—बिहारी (शब्द०)।

नेक अंजाम
वि० [फा०] अच्छे परिणामवाला (कार्य)।

नेकचलन
वि० [फा० नेक + हिं० चलन] अच्छे चाल चलन का। सदाचारी।

नेकचलनी
संज्ञा स्त्री० [फा० नेक + हिं० चलन] सुचाल। सदाचार। भलमनसाहत।

नेकदिल
वि० [फा०] शुद्ध हृदय का। साफ दिलवाला।

नेकनाम
वि० [फा०] जिसका अच्छा नाम हो। जो अच्छा प्रसिद्ध हो। यशस्वी।

नेकनामी
संज्ञा स्त्री० [फा०] नामवरी। सुख्याति। कीर्ति। सुयश।

नेकनीयत
वि० [फा० नेक + अ० नीयत] १. अच्छे संकल्प का। शुभग संकल्पवाला। २. जिसका आशय या उद्देश्य अच्छा हो। उत्तम विचार का। उदाराशय। भलाई का विचार रखनेवाला।

नेकनीयती
संज्ञा स्त्री० [फा० नेकनीयत] १. नेकनीयत होने का भाव। अच्छा संकल्प। भला विचार। २. ईमानदारी।

नेकबख्ती
संज्ञा स्त्री० [फा० नेकबख्ती] १. सौभाग्य। खुशकिस्मती। २. उत्तम स्वभाव। सुशीलता।

नेकरो
संज्ञा स्त्री० [?] समुद्र की लहर का थपेड़ा जिससे जहाज किसी और की बढ़ता है। हाँक। (लश०)।

नेकी
संज्ञा स्त्री० [फा०] १. भलाई। उत्तम व्यवहार। २. सज्जनता भलमनसाहत। क्रि० प्र०—करना।—होना। यौ०—नेकी बदी = भलाई बुराई। पाप पुण्य। जैसे,—नेकी बदी साथ जाती है। ३. उपकार। हित। जैसे,—उसने तुम्हारे साथ बड़ी नेकी की है। यौ०—नेकी बदी = उपकार अपकार। हित अहित। मुहा०—नेकी और पूछ पूछ = किसी का उपकार करने में उससे पूछने की क्या आवश्यकचा है !

नेकु पु †
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'नेक'।

नेग
संज्ञा पुं० [सं० नैयमिक, हिं० नेवग] १. विवाह आदि शुभ अवसरों पर संबंधियों, आश्रितों तथा कार्य या कृत्य में योग देनेवाली और लोगों को कुछ दिए जाने का नियम। देने, पाने का हक या दस्तूर। जैसे,—नेग में उनको बहुत कुछ मिला। यौ०—नेगचार। नेगजोग। मुहा०—नेग करना = शुभ मुहूर्त में आरंभ करना। साइत करना । २. वह वस्तु या धन जो विवाह आदि शुभ अवसरों पर संबंधियों, नौकरों चाकरों तथा नाई बारी आदि काम करनेवालों को उनकी प्रसन्नता के लिये नियमानुसार दिया जाता है। बँधा हुआ पुरस्कार। इनाम। बखशिश। उ०—लाख टका अरु झूमका (देहु) सारी दाइ कौं नेग।—सूर०, १०। ४०। क्रि० प्र०—चुकाना।—देना। मुहा०—नेग लगना = (१) पुरस्कार देना आवश्यक होना। रीति के अनुसार कुछ देना जरूरी होना। जैसे,—यहाँ (५०) नेग लगेगा। (२) हीले लगना। काम में आ जाना। सार्थक होना। सफल होना।

नेगचार
संज्ञा पुं० [हिं० नेग + सं० आचार] दे० 'नेगजोग'।

नेगचारु पु
संज्ञा पुं० [हिं० नेगचार] दे० 'निगजोग'। उ०—नेगचारु कहँ नागरि गहरु लगावहिं। निरखि निरखि आनंद सुलोचनि पावहिं।—तुलसी ग्रं०, पृ० ५८।

नेगजोग
संज्ञा पुं० [हिं० नेग + जोग] १. विवाह आदि मंगल अवसरों पर संबंधियों तथा काम करनेवालों को उनके प्रसन्नतार्थ कुछ दिए जाने का दस्तूर। देने पाने की रीति। इनाम बाँटने की रस्म। २. वह धन जो मगल अवसरों पर संबंधियों और नौकरों चाकरों आदि को बाँटा जाता है। इनाम। उ०—नेगी नेगजोग सब लेहीं। रुचि अनुरूप भूपमनि देही।—मानस० १। ३५३।

नेगटी पु †
संज्ञा पुं० [हिं० नेग + टा (प्रत्य०)] नेग या रीति का पालन करनेवाला। दस्तूर पर चलनेवाला। उ०—जग प्रीति कर देखी नाहिं नेगटी कोऊ। छत्रपति रंक ली देखे प्रकृति विरुद्ध न बन्यो कोऊ। दिन जु गए बहुत जनमनि के ऐसे जाहु जिन कोऊ। सुनि हरिदास मीन भलो पायो बिहारी ऐसी पावो सब कोऊ।—स्वामी हरिदास (शब्द०)।

नेगी
संज्ञा पुं० [हिं० नेग] नेग पानेवाला। नेग पाने का हकदार। उ०—लछिमन होहू धरम के नेगी। पावक प्रगट करहु तुम्हँ बेगी।—मानस, ६। २०८।

नेगीजोगो
संज्ञा पुं० [हिं० नेगजोग] निग पानेवाले। विवाह आदि मंगल अवसरों पर इनाम पाने के अधिकारी, जैसे, नातेदार, नाई, बारी, नौकर, चाकर इत्यादि। खुशी का इनाम पाने का हकदार।

नेगु पु
संज्ञा पुं० [हिं० नेग] दे० 'नेग'। उ०—नेगु माँगि मुनि नाइक लोन्हा। आसिरबाद बहुत बिधि दीन्हा।—मानस, १ ३५३।

नेगेटिव (१)
संज्ञा पुं० [अं०] फोटोग्राफी में मसाला लगा वह प्लेट या फिल्म जिसपर उस चीज की उलटे वर्णा की प्रतिकृति आ जाती है जीसका चित्र लिया जाता है। इसी पर मसालेदार कागज रखकर छापा जाता हैं जो यथार्थ चित्र रूप में दिखाई देता है।

नेगेटिव (२)
वि० १. ऋणात्मक। धनात्मक का उलटा। २. नका- रात्मक। जिससे अस्वीकृति या निषेध सूचित हो।

नेचर
संज्ञा पुं० [अं०] १. प्रकृति। कुदरत। जैसे,—वे नेचर को माननेवाले हैं। २. स्वभाव। प्रकृति।

नेचरिया
संज्ञा पुं० [अं० निचर + हिं० इया (प्रत्य०)] प्रकृति के अतिरिक्त ईश्वर आदि को न माननेवाला। लोकायतिक। नास्तिक। प्रकृतिवादी।

नेचवा †
संज्ञा पुं० [देश०] पलँग का पाहा।

नेचरोपैथी
संज्ञा स्त्री० [अं०] प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली [को०]।

नेछावर †
संज्ञा स्त्री० [हिं० निछावर] दे० 'निछावर'।

नेजक
संज्ञा पुं० [सं०] रजक। धोबी।

नेजन
संज्ञा पुं० [सं०] १. धोना। साफ करना। २. धुलाई का स्थान। वस्त्रादि धोने की जगह [को०]।

नेजा
संज्ञा पुं० [फा०] २. भाला। बरछा। २. साँग। निशान। मुहा०—नेजा हिलाना = बरछा था बल्लम फिराना। ३. चिलगोजा नाम की सूखी फली या मेवा।

नेजाबरदार
संज्ञा पुं० [फा०] भाला या राजाओं का निशान लेकर चलनेवाला।

नेजाल पु †
संज्ञा पुं० [फा० नेजा + हिं० ल (स्वा० प्रत्य०)] भाला। बरछा।

नेटा †
संज्ञा पुं० [हिं० नाक + टा] नाक से निकलनेवाला कफ या बलगम। नाक से निकलनेवाला कफ या मल। क्रि० प्र०—बहना। मुहा०—नेटा बहना = गंदा और मैला कुचैला रहना। चेहरा साफ सुथरा न रहना।

नेटिव (१)
वि० [अं०] देश का। देशी। मुल्क का। मुल्की। जैसे, नेटिव आदमी।

नेटिव (२)
संज्ञा पुं० वह जो अपने देश में उत्पन्न हुआ हो और जो विदेशी या बाहर का न हो। आदिम निवासी।

नेठना पु
क्रि० अ० [सं० नष्ट, प्रा० नट्ठ] दे० 'नाठना'।

नेड़े †
क्रि० वि० [सं० निकट, प्रा० निअड] निकट। पास। नजदीक।

नेत (१)
संज्ञा पुं० [सं० नियति (= ठहराव)] १. ठहराव। निर्धारण। किसी बात का स्थिर होना। उ०—अहैं ग्यारहें भौम अस भरत कुंडली नेत।—रघुराज (शब्द०)। २. निश्चय। ठहराव। ठान। संकल्प। इरादा। उ०—(क) आजु न लान देहुँ री ग्वालिन बहुत दिनन को नेत।—सूर (शब्द०)। (ख) चार चोर चामीकर हेतू। किय मारन जयदेवहि नेतू।—रघुराज (शब्द०)। ३. व्यनस्था। प्रबंध। आयोजन। बंदिश। ढंग। उ०—(क) हाय हाय माच्यी विश्वधाम बीच भाखैं सुर काल काहे प्रभु बाँधे प्रलय नेत है।—रघुराज (शब्द०)। (ख) नेत करन की है गति तोरी। जामें जाय बात नहिं मोरी।—रघुराज (शब्द०)।

नेत (२)
संज्ञा पुं० [सं० नेत्र] मथानी की रस्सी। नेता। उ०—(क) को उठि प्रात होत ले माखन को कर नेत गहै ?—सूर (शब्द०)। (ख) नोई नेत की करो चमोटी घूँघट में डरवायो।—सूर (शब्द०)।

नेत (३)
संज्ञा पुं० [देश०] एक गहना। उ०—कहुँ कंकन कहुँ गिरी मुद्रिका कहुँ ताटंक कहुँ नेत।—सूर (शब्द०)।

नेत (४)
संज्ञा स्त्री० दे० 'नेती'।

नेत (५)
संज्ञा स्त्री० [अ० नीयत] दे० 'नीयत'। उ०—जु पढ़े विन क्यों हूँ रह्यौ न परै तौ पढ़ौ चित मैं करि चेत सों जू। रस स्वादहि पाय बिषाद बहाय रहौ रमि कै इहि नेत सों जू।— घनानंद, पृ० ४।

नेत (६)
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की रेशमी चादर। उ०—(क) पुनि गलमत्त चढ़ावा नेत बिछाई खाट। बाजत गाजत राजा आइ बैठ सुख पाट।—जायसी (शब्द०)। (ख) पालँग पाँव कि माछै पाटा। नेत बिछाव चलै जो बाटा।—जायसी (शब्द०)।

नेतली
संज्ञा स्त्री० [सं० नेत्र(= मथानी की डोरी)] एक प्रकार की पतली डोरी (लश०)।

नेता (१)
संज्ञा पुं० [सं० नेतृ] [स्त्री० नेत्री] १. पीछे ले चलनेवाला। अगुआ। नायक। सरदार। २. प्रभु। स्वामी। मालिक। ३. काम को चलानेवाला। निर्वाहक। प्रवर्तक। ४. नीम का पेड़। ५. विष्णु। ६. नाटक का नायक (को०)। ७. दो की संख्या (को०)। ८. दंड देनेवाला (को०)।

नेता (२)
संज्ञा पुं० [सं० नेत्र] मथानी की रस्सी।

नेति
[सं०] एक संस्कृत वाक्य (न इति) जिसका अर्थ है 'इति नहीं' अर्थात् 'अंत नहीं है'। ब्रह्म या ईश्वर के संबंध में यह वाक्य उपनिषदों में अनंतता सूचित करने के लिंये आया है। उ०— नेति नेति कहि वेद पुकारा।—तुलसी (शब्द०)।

नेती
संज्ञा स्त्री० [सं० नेत्र, हिं० नेता] १. वह रस्सी जो मथानी में लपेटी जाती है और जिसके खींचने से मथानी फिरती है या दही मथा जाता है। २. एक क्रिया जो हठ योग में की जाती है।

नेतीधौती
संज्ञा स्त्री० [सं० नेत्र, हिं० नेता + सं० घोति] हठयोग की एक क्रिया जिसमें कपड़े की धज्जी पेट में डालकर आँतें साफ करते है। दे० 'धौति'।

नेत्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. आँख। २. मथानी को रस्सी। ३. एक प्रकार का वस्त्र। ४. वृक्षमूल। पेड़ की जड़। ५. रथ। ६. जटा। ७. नाड़ी। ८. वस्तिशलाका। वस्ती की सलाई। कटीटी। ९. दो की संख्या का सूचक शब्द।

नेत्रकनीनिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] आँख का तारा।

नेत्रकोष
संज्ञा पुं० [सं०] नित्रपटल। नेत्र का गोलक [को०]।

नेत्रगोलक
संज्ञा पुं० [सं०] आँख का डेला। नेत्रमंडल।

नेत्रच्छद
संज्ञा पुं० [सं०] पलक। पपोट [को०]।

नेत्रज
संज्ञा पुं० [सं०] आँसू।

नेत्रजल
संज्ञा पुं० [सं०] आँसू।

नेत्रपर्यत
संज्ञा पुं० [सं० नेत्रपर्यन्त] आँख का कोना।

नेत्रपाक
संज्ञा पुं० [सं०] आँख का एक रोग।

नेत्रपिंड
संज्ञा पुं० [सं० नेत्रपिण्ड] १. नेत्रगोलक। आँख का ढेला। २. बिड़ाल। बिल्ली।

नेत्रपुष्करा
संज्ञा स्त्री० [सं०] रुद्रजटा नाम की लता।

नेत्रबंध
संज्ञा पुं० [सं० नेत्रबन्ध] आँखमिचौली का खेल (महाभारत)।

नेत्रबाला
संज्ञा पुं० [सं० बाला] सुगंधबाला। कचमोद। बालक। विशेष— दे० 'सुगंधबाला'।

नेत्रभाव
संज्ञा पुं० [सं०] संगीत या नृत्य में एक भाव जिसमें केवल आँखो की चेष्टा से सुख दुःख आदि का बोध कराया जाता है और कोई अंग नहीं हिलते डोलते। यह भाव बहुत कठिन समझा जाता है।

नेत्रमंडल
संज्ञा पुं० [सं० नेत्रमण्डल] आँख का घेरा। आँख का डेला।

नेत्रमल
संज्ञा पुं० [सं०] आँख का कीचड़। गिद्द।

नेत्रमार्ग
संज्ञा पुं० [सं०] नेत्रगोलक से मस्तिष्क तक गया हुआ सूत्र जिससे अंतःकरण में दृष्टिज्ञान होता है।

नेत्रमीला
संज्ञा स्त्री० [सं०] यवतिक्ता लता (जिसके सेवन से आँखें बंद रहती हैं)।

नेत्रमुष
वि० [सं०] नेत्रों को अकर्षित करनेवाला। नेत्रों को वशीभूत कर लेनेवाला [को०]।

नेत्रयोनि
संज्ञा पुं० [सं०] १. इंद्र (जिनके शरीर में गौतम के शाप से सहस्र योनिचिह्न हो गए थे जो पीछे नेत्र के आकार के हो गए)। २. चंद्रमा (जो आत्रि की आँख से उत्पन्न हुए थे)।

नेत्ररंजन
संज्ञा पुं० [सं० नेत्ररञ्जन] कज्जल। काजल।

नेत्ररोग
संज्ञा पुं० [सं०] आँख में होनेवाले रोग जो वैद्यक में ७६ माने गए हैं। विशेष—इनमें से १० वायुजन्य, १३. कफजन्य, १६ रक्तजन्य, १० पित्तज, २५ सन्निपातज और २ बाहरी हैं। वायुजन्य रोगों में से हताधिमंथ, निमेषदृष्टिगत, गंभीरिका और वातहत- वर्त्मन् आसाध्य हैं और काचरोग, शुष्काक्षिपाक, अधिमंय, अभिष्यंद और मारुत साध्य हैं। पित्तल रोगों में से ह्रस्वजात, जलस्राव, परिम्लायी और नीली असाध्य हैं और अम्लाध्युषित दृष्टि, शुक्तिका, विदग्ध दृष्टि, पोथकी और लगण साध्य हैं। श्लेष्मज रोगों में स्राव रोग और काच रोग साध्य होता है। पूयस्राव, नाकुलांध्य, अक्षिपाक और अलजी ये सब सर्वदोषज असाध्य हैं। सन्निपातज काचरोग और पक्ष्मकोपरोग साध्य हैं। ७६ नेत्ररोगों में से ९ संधिगत, २१ वर्त्मगत, ११ शुक्ल- भागस्थित, ४ कृष्णभागस्थि, १७ सर्वत्रगत, १२ दृष्टिगत और २ बाह्य रोग है।

नेत्ररोगहा
संज्ञा पुं० [सं०] वृश्चिकाली वृक्ष।

नेत्ररोम
संज्ञा पुं० [सं० नेत्ररोमन्] आँख की बिनी। बरौनी।

नेत्रवस्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की छोटी पिचकारी।

नेत्रवस्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] पलक [को०]।

नेत्रवारि
संज्ञा पुं० [सं०] आँसू [को०]।

नेत्रविष्
संज्ञा पुं० [सं०] आँख का कीचड़।

नेत्रविष
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का दिव्य सर्प जिसकी आँख में विष होता है।

नेत्रसंधि
संज्ञा स्त्री० [सं० नेत्रसन्धि] आँख का कोना।

नेत्रस्तंभ
संज्ञा पुं० [सं० नेत्रस्तम्भ] आँख की पलकों का स्थिर हो जाना, अर्थात् उठना और गिरना बंद हो जाना।

नेत्रस्राव
संज्ञा पुं० [सं०] आँखों से पानी बहना।

नेत्रहा
संज्ञा पुं० [सं० नेत्रहन्] दे० 'नेत्ररोगहा'।

नेत्रांजन
संज्ञा पुं० [सं० नेत्राञ्जन] आँखों में लगाने का सुरमा [को०]।

नेत्रांत
संज्ञा पुं० [सं० नेत्रान्त] आँख के कोने और कान के बीच का भाग। कनपटी।

नेत्रांबु
संज्ञा पु० [सं० नेत्राम्बु] आश्रु। आँसू [को०]।

नेत्रांभ
संज्ञा पुं० [सं० नेत्राम्भस्] आँसू। अश्रु [को०]।

नेत्रातिथि
वि० [सं०] जो दृष्टिगोचर हो। दृष्टिपथ में आनेवाला [को०]।

नेत्राभिष्यंद
संज्ञा पुं० [सं० नेत्राभिष्यन्द] आँख का एक रोग जो छूत से फैलता है। आँख आने का रोग। विशेष— भावप्रकाश के अनुसार इस रोग में आँखें लाला हो जाती हैं और उनमें बड़ी पीड़ा होती है। यह वातज, पित्तज, रक्तज और कफज चार प्रकार का होता है। वातज अभिष्यंद में सूई चुभने की सी पीड़ा होती है और ऐसा जान पड़ता है कि आँखों में किरकिरी पड़ी हो। इसमें ठंढा पानी बहता है और सिर दुखता है। पित्तज अभिष्यंद में आँखों में जलन होती है और बहुत पानी बहता है। ठंढी चीजे रखने से आराम मालूम होता है। कफज अभिष्यंद में आँखें भारी जान पड़ती हैं, सूजन अधिक होती है और बार बार गाढ़ा पानी बहता हैं। इसमें गरम चीजों से आराम मालूम होता है। रक्तज अभिष्यंद में आँखें बहुत लाला रहती हैं और सब लक्षण पित्तज अभिष्यंद के से होते हैं। अभिष्यंद रोग की चिकित्सा न होने से अधिमंथ रोग होने का डर रहता है।

नेत्रारि
संज्ञा पुं० [सं०] थूहर। सेहुँड़।

नेत्रिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार की छोटी पिचकारी (सुश्रुत)। २. श्रुवा। चमस् [को०]।

नेत्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अपने पीछे ले चलनेवाली। अग्रगामिनी। अगुआ। सरदार। २. राह बतानेवाली या सिखानेवाली। रास्ते पर चलानेवाली। शिक्षयित्री। ३ नाड़ी। ४. लक्ष्मी। ५. नदी।

नेत्रोत्सव
संज्ञा पुं० [सं०] १. नेत्रों का आनंद। देखने का मजा। २. वह वस्तु जिसे देखने से नेत्रों को आनंद मिले। दर्शनीय वस्तु।

नेत्रोपम
संज्ञा पुं० [दे०] आँख के आकार का फल-बादाम [को०]।

नेत्रोपम फल
संज्ञा पुं० [सं०] बादाम (भावप्रकाश)।

नेत्रौषध
संज्ञा पुं० [सं०] १. आँख की दवा। २. पुष्प कसीस।

नेत्रौषधि, नेत्रौषधी
संज्ञा स्त्री० [सं०] मेढासिंगी।

नेत्र्य
वि० [सं०] १. आँखों के लिये हितकारक। २. नेत्र संबंधी [को०]।

नेत्र्यगण
संज्ञा पुं० [सं०] रसौत, त्रिफला, लौध, ग्वारपाठा, वनकुलथी आदि नेत्ररोगों के लिये उपकारी औषधियों का समूह।

नेदिष्ठ (१)
वि० [सं०] १. निकट का। पास का। २. निपुण।

नेदिष्ठ (२)
संज्ञा पुं० अंकोठ वृक्ष। ढेरे का पेड़।

नेदिष्ठी (१)
वि० [सं० नेदिष्ठिन्] समीप का। निकटस्थ।

नेदिष्ठी (२)
संज्ञा पुं० सहोदर भाई।

नेनुआ, नेनुवा०
संज्ञा पुं० [देश०] एक भाजी या तरकारी। धिया- तोरई। धिवरा।

नेदीयान्
वि० [सं०] दे० 'नेदिष्ठ'।

नेप
संज्ञा पुं० [सं०] १. कुल पुरोहित। २. जल [को०]।

नेपचून
संज्ञा पुं० [फरासीसी] सूर्य की परिक्रमा करनेवाला एक ग्रह जिसका पता सन् १८४६ के पहले किसी को नहीं था। विशेष— अबतक जितने ग्रह जाने गए हैं उनमें यह सबसे अधिक दूरी पर है। बड़ाई में यह तीसरे दरजे के ग्रहों में है। इस ग्रह का व्यास ३७,००० मील है। सूर्य से इसकी दूरी २, ८०,००,००,००० मील के लगभग है, इससे इसे सूर्य के चारों ओर घूमने में १६४ वर्ष लगते हैं, अर्थात् नेपचून का एक वर्ष हमारे १६४ वर्षों का होता है। जिस प्रकार पृथ्वी का उपग्रह चंद्रमा है उसी प्रकार नेपचून का भी एक उपग्रह है। उसका पता भी सन् १८४६ (अक्टूबर) में ही लगा। वह नेपचून की परिक्रमा ५ दिन २१ घटे ८मिनट में करता है।

नेपथ्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. वेश। भूषण। सजावट। २. वेशस्थान। नृत्य, अभिनय, नाटक आदि में परदे के भीतर का वह स्थान जिसमें नट नटी नाना प्रकार के वेश सजते हैं। नाटक में परदे के पीछे का स्थान जिसमें नट लोग नाटक के पात्रों की नकल बनाते हैं। ३. वह स्थान चहाँ नृत्य अभिनय आदि हो। नाच रंग की जगह। रंगशाला। रंगभूमि।

नेपाल
संज्ञा पुं० [देश०] हिंदुस्तान के उत्तर में एक रुखा पहाड़ी देश जो हिमालय के तट पर है। विशेष— नेपाल नाम के संबंध में कई प्रकार के अनुमान हैं। कुछ लोग कहते हैं कि तिब्बत तथा उसके आसपात की अनार्य जातियाँ अपनी भाषा में उस प्रदेश को जहाँ गोरखे बसते हैं 'पाल' कहती है। सिकिम, भूटान आदि के लोग नेपाल के पूर्वी भाक को 'ने' कहते हैं। तिब्बती भाषा में पाल पशम या ऊन को भी कहते हैं। लेपचा, नेवार आदि जातियों की भाषा में 'ने' शब्द का अर्थ पहाड़ की गुफा लिया जाता है। तिब्बत और बरमा के बौद्ध 'ने' शब्द से पवित्र गुहा या देवता द्वारा रक्षित स्थान का भाव लेते हैं। कुछ लोगों का कथन है कि नेवार जाति ही से नेपाल नाम पड़ा। पंडित लोग शुद्ध शब्द 'नयपाल' मानकर 'न्याय का पालन करनेवाला' अर्थ करते हैं। रामायण महाभारत आदि में इस देश का नाम नहीं मिलता। पुराणों में स्कंदपुराण के रेवाखंड, नागरखंड और सह्यद्रिखंड में तथा गरुड़ पुराण में इस देश खा थोड़ा बहुत उल्लेख मिलता है। बृहत्संहिता में भी नेपाल का नाम आया है। शक्तिसंगमतंत्र, बृहन्नीलतंत्र और वाराहीतंत्र आदि कई तंत्रों में नेपाल का वर्णन मिलता है। शक्तिसंगमतंत्र में जटेश्वर से लेकर योगेश्वर तक के देश को नेपाल कहा है और उसे बहुत सिद्धिदायक बतलाया है। जैन हरिवंश तथा हेमचंद्र की स्थविरावली में भी नेपाल का उल्लेख मिलता है। नैपाली बौद्धों के तंत्रों और पुराणों में नेपाल का माहात्म्य अलौकिक कथाओं के सहित पाया जाता है। २. ताम्र। ताँबा (को०)।

नेपालक
संज्ञा पुं० [सं०] ताँबा। ताम्र [को०]।

नेपालजा
संज्ञा स्त्री० [वि०] मनःशिला। मैनसिल।

नेपालजाता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'नेपालजा' [को०]।

नेपालनिंब
संज्ञा स्त्री० [सं० नेपालनिम्ब] नेपाल की नीम। एक प्रकार का चिरायता। विशेष— वैद्यक में नेपाली नीम कुछ गरम, योगवाही, हलकी, कडुई तथा पित्त, कफ, सूजन, रुधिर रोग, प्यास और ज्वर को दूर करनेवाली मानी जाती है। पर्या०— नैपाल। तृण निंब। ज्वरांतक। नीडितिक्त। अर्धतिक्त। निद्रारि। सन्निपातहा ।

नेपालमूलक
संज्ञा पुं० [सं०] हस्तिकंद से समान एक कंद।

नेपालिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] मनःशिला। मैनसिल।

नेपाली (१)
वि० [हिं० नेपाल] १. नेपाल का। नेपाल में रहने या होनेवाला। २. नेपाल संबंधी।

नेपाली (२)
संज्ञा पुं० नेपाल का रहनेवाला आदमी।

नेपाली (३)
संज्ञा स्त्री० [सं०] २. मनःशिला। मैनसिल। २. नेवारी का पौधा। ३. जंगली खजूर का वृक्ष या उसका फल [को०]।

नेपुर †
संज्ञा पुं० [पुं० नूपुर] दे० 'नूपुर'।

नेफा (१)
संज्ञा पुं० [फा० नेफाह्] पायजामे या लहँगे के घेर में हजारबंद या नाड़ा पिरोने का स्थान।

नेफा (२)
संज्ञा पुं० [देश०] पूर्वोत्तर भारत का सीमांत प्रदेश। मुख्तयः यह आसाम का उत्तरी पहाड़ी हिस्सा है और जिसका पश्चिमौ भाग भूटान से सटा हुआ है। विशेष— अँगरेजी में इस प्रदेश का नाम नार्थ ईस्टर्न फ्रंटियर एजेंसी है जिसके आद्य अक्षरों से यह संक्षिप्त नाम बना है।

नेब पु
संज्ञा पुं० [फा० नायब] सहायक। कार्य में सहायता देनेवाला। मंत्री। दीवान। उ०— (क) कद्रू बिनतहिं दीन्ह तुख तुमहिं कौसिला देब। भरत बंदिगृह सेइहहिं लखनु राम के नेब।— तुलसी (शब्द०)। (ख) ऋषि नृपसीस ठगौरी सी डारी। कुलगुरु, सचिव, निपुन नेबनि अवरेब न समुझि सुधारी। सिरस सुमन सुकुमार कुँअर दोउ सूर सरोष सुरारी। पठए बिनहिं सहाय पयादहि केलि बान धनुधारी।— तुलसी (शब्द०)। (ग) आए नँदनँदन के नेब। गोकुल माँझ जोग बिस्तारयो भली तुम्हारी जेब।— सूर (शब्द०)।

नेबुआ †
संज्ञा पुं० [हिं० नीबू] दे० 'नीबू'।

नेबुला (१)
संज्ञा पुं० [अं०] आकाश में धूएँ या कुहरे की तरह फैला हुआ क्षीण प्रकाशपुंज। नीहारिका। वि० दे 'नीहारिका'।

नेबुला † (२)
संज्ञा पुं० [हिं० नीबू, नेबू+ ला (स्वा० प्रत्य०)] दे० 'नीबू'।

नेबू †
संज्ञा पुं० [हिं० नीबू] दे० 'नीबू'।

नेम (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. काल। समय। २. अवधि। ३. खंड। टुकड़ा। ४प्राकार। दीवार। ५. कैतव। छल। ६. अर्ध। आधा। ७. गर्त। गड्ढा। ८. अन्य हिस्सा। और हिस्सा। ९. सायंकाल। १०. मूल। जड़। ११. दीवाल की नींव (को०)। १२. अभिनय। नृत्य (को०)। १३. अन्न। भोजन। खाना (को०)।

नेम (२)
संज्ञा पुं० [सं० नियम] १. नियम। कायदा। बंधेज। २. बँधी हुई बात। ऐसी बात जो टलती न हो, बराबर होती हो। ३. रीति। दस्तूर। ४. धर्म की दृष्टि से कुछ क्रियाओं का पालन। जैसे व्रत, उपवास आदि। ५. प्रतिज्ञा। दृढ़ निश्चय। यौ०— नेमधरम = पूजा पाठ, व्रत, उपवास आदि। विशेष— दे० 'नियम'।

नेमत
संज्ञा स्त्री० [अ० ने'मत] १. ईश्वर की कृपा। ईश्वरीय देन। २. धन। संपत्ति। दौलत। ३. सुख। आनंद। ४. सुस्वादु भोजन। उत्तम भोजन [को०]। यौ० — नेमतखाना = (१) भोज्य पदार्थों के रखने का स्थान। भोज्य-वस्तु-भंडार। (२) खाद्य पदार्थ रखने की लकड़ी या लोहे की जालीदार आलमारी।

नेमि (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पहिए का घेरा या चक्कर। चक्रपरिधि। प्रधि। नेमी। २. कूएँ के ऊपर चारों ओर बँधा हुआ ऊँचा स्थान या चबूतरा। गूएँ की जगत। ३. भूमिस्थित कूपपट्ट। कूएँ की जमवट। ४. प्रांत भाग। किनारे का हिस्सा। ५. कूएँ के किनारे लकड़ी का वह ढाँचा जिसपर रस्सी रखते और जिसमें प्रायः घिरनो लगी रहती है। ६. धरित्री। पृथिवी (को०)।

नेमि (२)
संज्ञा पुं० १. नेमिनाथ तीर्थंकर। २. तिनिश वृक्ष। तिनास। तिनसुना। ३. एक दैत्य (भागवत)। ४. वज्र।

नेमिचक्र
संज्ञा पुं० [सं०] परीक्षित के वंश के एक राजा जो असीम- कृष्ण के पुत्र थे। इन्होंने कौशांबी में अपनी राजधानी बनाई थी (भागवत)।

नेमी (१)
संज्ञा पुं० [सं० नेमिन्] तिनिश वृक्ष।

नेमी पु (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'नेमि'।

नेमी (३)
वि० [सं० नियम] १. नियम का पालन करनेवाला। २. धर्म की दृष्टि से पूजा पाठ, व्रत उपवास आदि नियमपूर्वक करनेवाला। यौ०— नेमी धरमी।

नेय
वि० [सं०] १. ले जाने योग्य। २. निर्देश्य। शासन करने योग्य। २. पढ़ाने योग्य। शिक्षा देने योग्य। ३. व्यतीत करने योग्य। जैसे, समय [को०]।

नेयार्थता
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक काव्यदोष जहाँ प्रयोजन या रूढ़ि के बिना लक्षणा के प्रयोग किया जाता है वहाँ यह दोष होता है।

नेर † (१)
क्रि० वि० [सं० निकट] दे० 'नियर'।

नेर (२)
संज्ञा पुं० [सं० नगर, प्रा० णयर] दे० 'नगर'। उ०— गवरि पूजि फिरि घर चली रोर परो सब नेर।-रसरतन, पृ० १६३।

नेरता †
संज्ञा स्त्री० [सं० नैऋत] नैऋत्य दिशा। पश्चिम दक्षिण का कोना।

नेरना †
क्रि० स० [हिं० निराना] निकोलना। बिलगाना (रेशा आदि)।

नेरवाती
संज्ञा स्त्री० [देश०] नीले रंग की एक पहाड़ी भेड़ जो भोटान से लद्दाख तक पाई जाती है। इसके ऊन के कंबल आदि बनते हैं।

नेरा
क्रि० वि० [हिं० नियर] [स्त्री० नेरी] निकट। पास। समीप। उ०— पूनि कहु खबरि बिभीखन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी।—मानस, ५। ५३।

नेराई
संज्ञा स्त्री० [हिं० निराना] दे० 'निराई'।

नेराना † (१)
क्रि० अ०, क्रि० स० [सं० निकट, प्रा० निअड़, हिं० नियर] दे० 'नियराना'।

नेराना † (२)
क्रि० स० [हिं० निराना] दे० 'निराना'।

नेरी †
क्रि० वि० [देश०] जरा सा भी। थोड़ा भी। तनिक भी। उ०—रूप छकी तित ही बिथकी, अब ऐसी अनेरी पत्याति न नेरी।— घनानंद, पृ० ५।

नेरुवा †
संज्ञा पुं० [सं० नल, हिं० नाली, नारी] कोल्हू के नीचे बनी हुई तेल बहने की नाली।

नेरे
क्रि० वि० [हिं० नियर] निकट। पास। समीप। उ०— अगम अपवर्ग, अरु स्वर्ग सुकृतैक फल, नाम बल क्यो वसौं जमनगर नेरे।—तुलसी ग्रं०, पृ० ५६४।

नेव पु (१)
संज्ञा पुं० [फा० नायब] दे० 'नेब'।

नेव (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'नींव'।

नेवग पु
संज्ञा पुं० [डिं०] नेग।

नेवगी
संज्ञा पुं० [डिं०] बेगी।

नेवछावर, नेवछावरि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० निछावर] दे० 'निछावर'।

नेवज
संज्ञा पुं० [सं० नैवेद्य] देवता को अर्पित करने की वस्तु। खाने पीने की चीज जो देवता को चढ़ाई जाय। भोग। उ०— (क) गावत मंगलचार महर धर। नेवज करि करि धरति श्याम डर।— सूर (शब्द०)। (ख) बहुत भाँति सब करे पकवानै। नेवज करि धरि साँझ बिहानै।—सूर (शब्द०) (ग) महरि सबै नेवज लै सैंतति। श्याम छुवै कहुँ ताको डरपति।— सूर (शब्द०)।

नेवजा
संज्ञा पुं० [फा०] चिलगोजा।

नेवजी
संज्ञा स्त्री० [?] एक फूल का नाम।

नेवत †
संज्ञा पुं० [सं० निमन्त्रण] दे० 'नेपता', 'न्योता'। उ०— कहेहु नीक मोरेहु मनभावा। यह अनुचित नहिं नेवत पठावा।— मानस, १। ६२।

नेवतना †
क्रि० स० [सं० निमन्त्रण] निमंत्रित करना। नेवता भेजना। उ०— (क) सुर गंधर्व जे नेवत बुलाए। ते सब बधू सहित तहँ आए।— सूर (शब्द०)। (ख) नेवते सादर सकल सुर जे पावत मख भाग।— मानस, १। ६०।

नेवतहरी
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'न्योतहरी'।

नेवता
संज्ञा पुं० [हिं० न्योता] दे० 'न्योता'।

नेवना पु
क्रि० अ० [सं० नमन] नमन होना। झुकना।

नेवर (१)
संज्ञा पुं० [सं० नूपुर] पैर का एक गहना। नूपुर।

नेवर (२)
संज्ञा स्त्री० १. घोडे़ के पैर का वह घाव जो दूसरे पैर की ठोकर या रगड़ से हो जाता है। क्रि० प्र०— लगना।

नेवर † (३)
वि० [सं० न + वर (= अच्छा)] बुरा। खराब।

नेवरना पु
क्रि० अ० [सं० निवारण] १. निवारण होना। दूर होना। उ०— सुनि जोगी के अमर जो करनी। नेवरी विद्या बिरह कै मरनी।— जायसी (शब्द०)। २. समाप्त होना। खतम होना। ३. निपटना।

नेवरा
संज्ञा पुं० [देश०] लाल कपडे़ की झारी की खोली।

नेवल
संज्ञा पुं० [हिं० नेवर] दे० 'नेवर'।

नेवल
वि० [अं०] नौ संबंधी। नौका संबंधी।

नेवला
संज्ञा पुं० [सं० नकुल, प्रा० नउल] चार पैरों से जमीन पर रेंगनेवाला हाथ सवा हाथ लंबा और ४-५ अगुल चौड़ा मांसाहारी पिंडज जंतु। विशेष— यह जंतु देखने में गिलहरी के आकार का पर उससे बड़ा और सूरे रंग का होता है। पूँछ इसकी बहुत लंबी और रोयों से फूली हुई होती है। मुँह इसका चूहै, गिलहरी आदि की तरह आगे की ओर नुकीला होता है। दाँत इसके बहुत पैने होते हैं। टीलों, पुराने घरों, नदी के कगारों आदि में बिल खोदकर प्रायः नर मादा साथ रहते हैं। वसंत ऋतु में मादा दौ या तीन बच्चे देती है जो बहुत दिनों तक उसके पीछें पीछे घूमा करते हैं। नेवला भारतवर्ष में ही पाया जाता है यद्यपि इसकी जाति के और दूसरे जंतु अफ्रिका, अमेरिका आदि के गरम स्थानों में मिलते हैं। नेवले प्रायः चूहों तथा और छोटे जंतुओं को खाकर रहते हैं। साँप को मारने में ये बहुत प्रसिद्ध हैं। बडे़ से बडे़ सर्प को ये अपनी फुरती से खंड खंड कर डालते हैं। लोग इन्हें पालते भी हैं। पालने पर ये इतने परच जाते हैं कि पीछे पीछे दौड़ते हैं।

नेवा (१)
संज्ञा पुं० [सं० नियम?] १. रीति। दस्तूर। रवाज। २. कहावत। लोकोक्ति।

नेवा (२)
वि० [सं० न्याय या सं० निभ] नाई। समान।

नेवा (३)
वि० [?] चुप। मौन।

नेवाज
वि० [फा० निवाज] १. दे० 'निवाज'। उ०— राम गरीब नैवाज ! भए हौं गरीब नेवाज गरीब नेवाजी।— तुलसी ग्रं०, पृ० २२०। २. दे० 'नमाज'।

नेवाजना
क्रि० स० [फा० निवाज] दे० 'निवाजना'। उ०— बालि बलसालि दलि पालि कदपिराज को, बिभीषन नेवाजि सेतु सागर तरन भो।— तुलसी ग्रं०, पृ० १९७।

नेवाडा
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'निवाड़ा'।

नेवाड़ी
संज्ञा स्त्री० [सं० नेपाली या नेमाली] दे० 'नेवारी'।

नेवाना पु †
क्रि० स० [सं० नमन] नमन करना। झुकाना।

नेवार (१)
संज्ञा पुं० [देश०] नेपाल में बसनेवाली वहाँ की एक आदिम जाति।

नेवार (२)
संज्ञा पुं० संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'निवाड़', 'निवार'।

नेवारना पु †
क्रि० स० [सं० निवारण] निवारण करना। दूर करना। हटना।

नेवारी
संज्ञा स्त्री० [सं० नेपाली] जूही या चमेली की जाति का एक पैधा जिसमें छोटे छोटे सफेद फूल लगते हैं। विशेष— इसकी पत्तियाँ कुंद या जूही की सी होती हैं। यह बरसात में अधिक फूलता है और इसके फूलों में बड़ी अच्छी भीनी महक होती है। इसे वनमल्लिका भी कहते हैं।

नेवी
संज्ञा स्त्री० [अं०] एक राष्ट्र या देश के समस्त लड़ाकू जहाज, जलपोत या नौसेना। जलसेना।

नेशन
संज्ञा पुं० [अं०] लोकसमुदाय जो एक ही देश में बसता हो या जो एक ही राज्य या शासन में रहता हुआ एकताबद्ध हो। एक देश में रहने और सम भाषा या अनेक भाषा बोलनेवाला जनसमूह। राष्ट्र।

नेष्टा
संज्ञा पुं० [सं० नेष्ट] १. सोम यज्ञ में प्रधान ऋत्विकों में से एक ऋत्विक्। ये क्रम में १६ वें ऋत्विक् हैं। २. त्वष्टा देवता।

नेष्टु
संज्ञा पुं० [सं०] मिट्टी का डला [को०]०

नेस
संज्ञा पुं० [फा० नेस(= डंक) ?] जंगली जानवरों के लंबे नुकीले दाँत जिनसे वे काटते हैं।

नेसकुन
संज्ञा पुं० [देश०] बंदरों का जोड़ा खाना (कलंदर)।

नेसुक पु †
वि० [हिं० नेकु, नेक] तनक। थोड़ा सा।

नेसुक पु (२)
क्रि० वि० थोड़ा। जरा। टुक। तनक।

नेसुहा †
संज्ञा पुं० [सं० नि + स्था; निष्ठा] जमीन में गड़ा हुआ लकड़ी का कुंदा जिसपर गन्ना या चारा काटते हैं।

नेस्त
वि० [तु० मि० सं० नास्ति] जो न हो। यौ०— नेस्तनाबूद= नष्ट भ्रष्ट। जो जड़मूल से न रह गया हो।

नेस्ती
संज्ञा स्त्री० [फा०] १. न होना। अनस्तित्व। २. आलस्य। ३. नाश। बर्बादी। क्रि० प्र०— फैलाना।

नेह
संज्ञा पुं० [सं० स्नेह] १. स्नेह। प्रेम। प्रीति। प्यार। मुहब्बत। उ०— तुस चाहो न चाहो हमैं चित हो हमैं नेह को नाती निबाहनो है (शब्द०)। (ख) समझै कविता धन आनँद की हिय आँखिन नेह की पीर तकी।— घनानंद, पृ० ३। २. चिकना। तेल या घी।

नेही पु
वि० [हिं० नेह + ई (प्रत्य०)] स्नेह करनेवाला। प्रेमी। उ०— नेही महा ब्रजभाषा प्रबीन औ सुंदरतानि के भेद कों जानैं।—घनानंद, पृ० ३।

नैःश्रेयस
वि० [सं०] १. सुखकारी। कल्याणकारी। २. मोक्षदाता [को०]।

नैःस्व
संज्ञा पुं० [सं०] दरिद्रता। निर्धनता। अकिंचनता [को०]।

नै (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० नय] दे० 'नय'।

नै (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० नदी, प्रा० णई] नदी। उ०— कितो न औगुन जग करत नै बय चढ़ती बार।— बिहारी (शब्द०)।

नै (३)
संज्ञा स्त्री० [फा०] १. बाँस का नली। २. हुक्के की निगाली। ३. बाँसुरी।

नैऋत पु
वि०, संज्ञा पुं० [सं० नैऋत्य] दे० 'नैऋत्य'।

नैक (१)
वि० [सं०] जो एक ही न हो। अनेक। बहुत।

नैक (२)
संज्ञा पुं० विष्णु [को०]।

नैक (३)
वि०, क्रि० वि० [हिं०] दे० 'नेक', 'नेकु'।

नैकचर
वि० [सं०] जो अकेले न चलते हों, झुंड में चलते हों। जैसे, सूअर, भेड़िया, हिरन इत्यादि।

नैकटिक (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० नैकटिकी] पार्श्ववर्ती। समीपवर्ती। निकट का।

नैकटिक (२)
संज्ञा पुं० भिक्षु। यति। ग्राम से कोस भर की दूरी पर रहनेवाले तपस्वी, यति या भिक्षु [को०]।

नैकटय
संज्ञा पुं० [सं०] निकटता। निकट होने का भाव।

नैकधा
क्रि० वि० [सं०] अनेक प्रकार से। विभिन्न प्रकार से [को०]।

नैकभावाश्रय
वि० [सं०] जो एक भावाश्रित न हो। परिवर्तननशील [को०]।

नैकभेद
वि० [सं०] अनेक प्रकार का [को०]।

नैकशृंग
संज्ञा पुं० [सं० नैकश्रृङ्ग] विष्णु का एक नाम। (विष्णु- महस्रनाम)। विशेष— भगवान् विष्णु के तीन पैर और चार सींग माने गए हैं।

नैकषेय
संज्ञा पुं० [सं०] (निकष के वंशज)। राक्षस।

नैकु
वि०, क्रि० वि० [हिं०] दे० 'नेक', 'नेकु'।

नैकृतिक
वि० [सं०] [वि० स्त्री० नैकृतिकी] १. दुसरे की हानि करके निष्ठुर जीविका करनेवाला। निष्ठुर। २. कटुभाषी। ३. निम्न विचार का। क्षुद्र। कमीना [को०]।

नैगम
वि० [सं०] १. निगम संबंधी। जिसमें ब्रह्म आदि का प्रतिपा- दन हो० जैसे उपनिषद्।

नैगम (२)
संज्ञा पुं० १. उपनिषद् भाग। २. नय। नीति। ३. वणिक। व्यापारी। बनिया (को०)। ४. नागर। नागरिक (को०)। ५. साधन। उपाय (को०)। दे० 'नैगमकांड' (को०)।

नैगमकांड
संज्ञा पुं० [सं० नैगमकाणड] निरुक्त के तीन अध्याय जिनमें यास्क ने वैदिक शब्दों की निरुक्ति की है।

नैगमनय
संज्ञा पुं० [सं०] वह नय या तर्क जो द्रव्य और पर्याय दोनों को सामान्य-विशेष-युक्त मानता हो और कहता हो कि सामान्य के बिना विशेष, और विशेष के बिना सामान्य नहीं रह सकता (जैन)।

नैगमिक
वि० [सं०] [वि० स्त्री० नैगमिकी] १. वेद संबंधी। २. वेदों से निर्गत या निष्पन्न [को०]।

नैगमेय
संज्ञा पुं० [सं०] १. कार्तिकेय के एक अनुचर का नाम। २. सुश्रुत के अनुसार नैगमेष नामक बालग्रह।

नैगमेष
संज्ञा पुं० [सं०] सुश्रुत में जो नौ बालग्रह के नए हैं उनमें नवाँ। विशेष— इस बालग्रह द्वारा पीड़ित होने से बच्चों के मुँह से फैल गिरता है, वे होते हैं, बेचैन रहते हैं, उन्हें ज्वर होता है तथा उनकी दृष्टि ऊपर को टँगी रहती है और देह से चरबी की सी गंध आती है।

नैघंटुक
संज्ञा पुं० [सं० नैघणटुक] वैदिक शब्दावली का संग्रह ग्रंथ जिसकी व्याख्या यास्क ने अपने निरुक्त में की है [को०]।

नैचा
संज्ञा पुं० [फा० नैचह्] १. हुक्के की दोहरी नली जिसमें एक के सिरे पर चिलम रखी जाती है और दूसरै का छोर मुँह में रहकर धुआँ खींचते हैं। यौ०— नैचाबंद। २. एकदम दुबला पतला व्यक्ति (व्यंगोक्ति)।

नैचाबंद
संज्ञा पुं० [फा़०] नैचा बनानेवाला।

नैचाबंदी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] नैचा बनाने का काम।

नैचिक
संज्ञा पुं० [सं०] गाय आदि चौपायों का माथा।

नैचिकी
संज्ञा स्त्री० [सं०] अच्छी गाय।

नैची
संज्ञा स्त्री० [हिं० नौचा] पुर, मोट वा चरसा खींचते समय बैलों के चलने के लिये बनी हुई ढालू राह। रपट। पैढी़।

नैचुल
वि० [सं०] निचुल संबंधी। हिज्जल वृक्ष संबंधी।

नैचुल
संज्ञा पुं० निचुल का फल या बीज।

नैज
वि० [सं०] [वि० स्त्री० नैजी] अपना। निज का। निजी [को०]।

नैटी †
संज्ञा स्त्री० [देश०] दुद्धी नाम की घास या जड़ी। दुधियाँ घास।

नैतल
संज्ञा पुं० [सं०] अधोलोक। नीचे का लोक [को०]। यौ०— नैतलसद्या = यमराज।

नैतिक
वि० [सं०] नीति संबंधी। नीतियुक्त।

नैत्य (१)
वि० [सं०] १. नित्य का। २. नित्य दिया जानेवाला।

नैत्य (२)
संज्ञा पुं० नित्य का कर्म।

नैत्यक (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० नैत्यकी] १. अनिवार्य। जिसका निवारण न हो। २. नित्य होनेवाला या नित्य किया जानेवाला [को०]।

नैत्यक (२)
संज्ञा पुं० नैवेद्य [को०]।

नैत्यिक
वि० [सं० ] [वि० स्त्री० नैत्यिकी] दे० 'नैत्यिक' [को०]

नैत्रिक
वि० [सं०] नेत्र संबंधी। नेत्र का [को०]।

नैदाघ (१)
वि० [सं०] निदाघ संबंधी। ग्रीष्म का।

नैदाघ (२)
संज्ञा पुं० [सं०] ग्रीष्म[ को०]।

नैदाघिक
वि० [सं०] निदाघ संबंधी। ग्रीष्म का।

नैदाघीय
वि० [सं०] निदाघ संबंधी।

नैदानिक
वि० संज्ञा पुं० [सं०] १. रोगों का निदान जाननेवाला। २. रोगों का निदान करनेवाला।

नैदेशिक
संज्ञा पुं० [सं०] आदेशों को कार्यान्वित करनेवाला। सेवक। भृत्य। नौकर [को०]।

नैधन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. निधन। मरण। २. फलित। ज्योतिष में लग्न से आठवाँ स्थान। मृत्यु स्थान।

नैधन (२)
वि० नश्वर। मरणशील [को०]।

नैधान
वि० [सं०] (सीमा) जो विभिन्न वस्तुओं के द्वारा निर्धारित हो [को०]।

नैधानी
संज्ञा स्त्री० [सं०] पाँछ प्रकार की सीमाओं में से एक। वह सीमा जिसका चिह्न गडा़ हुआ कोयला या तुष (भूसी) हो। (स्मृति)।

नैधानी सीमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह सीमा या हदबँदी जो भूसी कोयले आदि से भरे घडे़ गाड़कर बनाई जाय। विशेष— बृहस्पति ने इस प्रकार सीमा बनाने का विधान बताया हैं। पराशर ने कहा है कि ग्राम के वृद्ध लोगों का कर्तव्य है कि वे बच्चों को सीमा के चिह्नों से परिचित कराते रहें।

नैधेय
वि० [सं०] निधि संबधी। निधि का। निधि से संबंद्ध [को०]।

नैन पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० नयन] दे० 'नयन'।

नैन (२)
संज्ञा पुं० [सं० नवनीत] मक्खन।

नैनसुख
संज्ञा पुं० [हिं० नैन+सुख] एक प्रकार का चिकना सूती कपडा।

नैनी †
संज्ञा पुं० [सं० नवनीत ] नैनू। मक्खन।

नैनू (१)
संज्ञा संज्ञा पुं० [हिं० नैन (=आँख)] १. एक प्रकार का सूती कपडा़ जिसमें आँख की सी गोल उभरी हुई बूटियाँ बनी होती हैं। उभरे हुए बेलबूटे का सूती कपडा़।

नैनू (२)
संज्ञा पुं० [सं० नवनीत] मक्खन।

नैपाल (१)
वि० [सं०] १. नेपाल संबंधी। २. नेपाल का। नेपाल में होनेवाला।

नैपाल (२)
संज्ञा पुं० १. नैपाल निंब। २. एक प्रकार की ईख।

नैपाल (३)
संज्ञा पुं० दे० 'नेपाल'।

नैपालिक
संज्ञा पुं० [सं०] ताँबा।

नैपाली (१)
वि० [हिं नैपाल] नैपाल देश का। २. नैपाल में रहने या होनेवाला। जैसे, नैपाली सिपाही, नैपाली टाँगन।

नैपाली (२)
संज्ञा पुं० नैपाल का रहनेवाला आदमी।

नैपाली (३)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. नवमल्लिका। नेवाली। २. मन- शिला। मैनसिल। ३. नील का पौधा। ४. शेफालिका। एक प्रकार की निगुँडी।

नैपुण
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'नैपुण्य' [को०]।

नैपुण्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. निपुणता। चतुराई। होशियारी। दक्षता। कमाल। २. वह वस्तु जिसके लिये निपुणता आवश्यक हो (को०)। ३. पूर्णता। सपूर्णता (को०)।

नैभृत्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. विनय। नम्रता। शालीनता। २. गोपनीय। ३. निस्तब्धता। निःशब्दता। ४. स्थैर्य। स्थिरता [को०]।

नैमंत्रणक
संज्ञा पुं० [सं०] ज्यौनार। भोज। दावत [को०]।

नैमय
संज्ञा पुं० [सं०] वणिक। व्यवसायी। रोजगारी।

नैमित्त (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० नैमित्ती] निमित्त संबंधी। चिह्न आदि से संबंध।

नैमित्त (२)
संज्ञा पुं० ज्योतिर्विद। निमित्त शास्त्र का ज्ञाता [को०]।

नैमित्तिक
वि० [सं०] जो किसी निमित्त से किया जाय। जो निमित्त उपस्थित होने पर या किसी विशेष प्रयोजन की सिद्धि के लिये हो। जैसे, नैमित्तिक कर्म, नैमित्तिक स्नान, नैमित्तिक दान। विशेष— यज्ञ आदि कर्म जो किसी निमित्त से किए जाते हैं वे नैमित्तिक कहलाते हैं। जैसे, पुत्रप्राप्ति के निमित्त पुत्रेष्टि यज्ञ। दे० 'कर्म'। ग्रहण आदि उपस्थित होने पर जो स्नान किया जाता है वह नैमित्तिक स्नान कहलाता है। इसी प्रकार दोष या पापशांति के लिये जो दान दिया जाता है वह नैमित्तिक दान कहलाता है।

नैमित्तिकलय
संज्ञा पुं० [सं०] गरुड पुराण के अनुसार एक प्रलय जिसमें सौ वर्ष तक अनावृष्टि होती है, बारहों सूर्य उदित होकर तीनों लोकों का शोषण करते हैं, फिर बड़े भीषण मेघ सौ बरस तक लगातार बरसकर सृष्टि का नाश करते हैं।

नैमिश
संज्ञा पुं० [सं०] दे० . 'नैमिष'।

नैमिष (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. नैमिषारण्य तीर्थ। उ०— तीरथ बर नैमिष विख्याता। अति पुनीत साधक सिधि दाता। — मानस, १। १४३। २. जमुना के दक्षिण तट पर बसनेवाली एक जाति जिसका उल्लेख महाभारत और पुराणों में हैं।

नैमिष (२)
वि० [सं०] निमिष भर में समाप्त होनेवाला। क्षणजीवी। क्षणस्थायी [को०]।

नैमिषारण्य
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्राचीन वन जो आजकल हिंदुओं का एक तीर्थस्थान माना जाता है। यह आजकल नीमखार कहलाता है। विशेष— यह स्थान अवध के सीतापुर जिले में है। पुराणों में इसके संबंध में दो प्रकार की कथाएँ मिलती हैँ। वराह पुराण में लिखा है कि इस स्थान पर गौरमुख नामक मुनि ने निमिष मात्र में असुरों की बडी भारी सेना भस्म कर दी थी इसी से इसका नाम नैमिषारण्य पडा़। देवी भागवत में लिखा है कि ऋषि लोग जब कलिकाल के भय से बहुत घबराए तब ब्रह्मा ने उन्हें एक मनोमय चक्र देकर कहा कि तुम लोग इस चक्र के पीछे पीछे चलो, जहाँ इसकी नेमि (घेरा, चक्कर) विशीर्ण हो जाय उसे अत्यंत पवित्र स्थान समझना। वहाँ रहने से तुम्हें कलि का कोई भय नहीं रहेगा। कहते हैं, सौति मुनि ने इस स्थान पर ऋषियों को एकत्र करके महाभारत की कथा कही थी। विष्णुपुराण में लिखा है, इस क्षेत्र में गोमती में म्नान करने से सब पापों का क्षय हो जाता है।

नैमिषि
संज्ञा पुं० [सं०] नैमिषआरण्यवासौ।

नैमिषीय
वि० [सं०] निमिष संबंधी।

नैमिषेय
वि० [सं०] १ नैमिष संबंधी। २. नैमिषारण्य का।

नैमेय
संज्ञा पुं० [सं०] १. विनिमय। वस्तुओं का बदला। २. वाणिज्य।

नैयग्रोध
संज्ञा पुं० [सं०] न्यग्रोध (बरगद) वृक्ष का फल [को०]।

नैयत्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. नियतत्व। नियत होने का भाव। २. आत्मनिग्रह (को०)।

नैयमिक (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० नैयमिकी] नियमानुसारी। नियामानुकूल। विधिसंमत [को०]।

नैयमिक (२)
संज्ञा पुं० [सं० नैयमिकम्] नियमितता। नियमानु- सारिता [को०]।

नैया पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० नाव, नाय] नाव। किश्ती। उ०— नैया मेरी तनक सी बोझी पाथर भार।— गिरिधर (शब्द०)।

नैयायिक
वि०, संज्ञा पुं० [सं०] न्यायशास्त्र का जाननेवाला। न्यायवेत्ता।

नैरंजना
संज्ञा स्त्री० [सं० नैरञ्जना] गया के पास बहनेवाली फल्गु नदी का प्राचीन नाम। विशेष— फल्गु के पश्चिम की ओर बहनेवाली शाखा को जो मोहानी नदी में जाकर मिल जाती है अब भी लीलांजन कहते हैं।

नैरंतर्य
संज्ञा पुं० [सं० नैरन्तर्य] निरंतरत्व। निरंतर का भाव। अविच्छेद।

नैर पु
संज्ञा पुं० [सं० नगर, प्रा० णयर, पु० हिं० नयर] शहर। देश। जनपद। उ०— मेरे कहे मेर करु, सिवाजी सों बैर, करि गैर करि नैर निज नाहक उजारे तै।— भूषण (शब्द०)।

नैरपेक्ष्य
संज्ञा पुं० [सं०] निरपेक्षता। उपेक्षा। उदासीनता [को०]।

नैरयिक
वि० [सं०] नरक में रहनेवाला।

नैरर्थ्य
संज्ञा पुं० [सं०] निरर्थकता।

नैराश्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. निराशा का भाव। नाउम्मेदी। २. इच्छा का अभाव। आशा का अभाव (को०)।

नैरास्य
संज्ञा पुं० [सं०] वाण छोडने का एक मंत्र।

नैरुक्त (१)
वि० [सं०] निरुक्त संबंधी।

नैरुक्त (२)
संज्ञा पुं० १. निरुक्त संबंधी ग्रंथ। २. निरुक्त का जानने या अध्ययन करनेवाला व्यक्ति।

नैरुक्तिक
संज्ञा पुं० [सं०] निरुक्तवेत्ता। निरुक्त का विद्वान्।

नैरुज्य
संज्ञा पुं० [सं०] रोगविहीनता। स्वस्थता। निरोगता [को०]।

नैरुहिक
संज्ञा पुं० [सं०] सुश्रुत के अनुसार वस्ति का एक भेद।

नैर्ऋत (१)
वि० [सं०] निर्ऋति संबंधी।

नैर्ऋत (२)
संज्ञा पुं० १. निर्ऋति का पुत्र। राक्षस। २. पश्चिम— दक्षिण— कोण का स्वामी। विशेष— ज्योतिष के मत से इस दिशा का स्वामी राहु है। ३. मूल नक्षत्र।

नैर्ऋती
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दक्षिण पश्चिम के मध्य की दिशा। दक्खिन और पश्चिम के बीच का कोन। २. दुर्गा का एक नाम (को०)।

नैर्ऋतेय
स्त्री० पुं० [सं०] निर्ऋत का वंशज।

नैर्ऋत्य
वि० [सं०] निर्ऋति देवता का (पशु आदि)।

नैर्गुण्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. निर्गुणता। अच्छी सिफत का न होना। २. कला कौशल आदि का अभाव। ३. सत्व, रज, तम इन तीनों गुणों का न होना। त्रिगुणशून्यता। (नैगुण्य होने से ब्रह्म की प्राप्ति कही गई है)।

नैर्घृण्य
संज्ञा पुं० [सं०] निर्घृण होने का भाव। कठोरता। दया— हीनता [को०]।

नैर्देशिक
संज्ञा पुं० [सं०] सेवक। नौकर [को०]।

नैर्मल्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. निर्मलता। २. विषयों से विराग।

नैर्लज्ज, नैर्लज्य
संज्ञा पुं० [सं०] निर्लज्जता।

नैर्वाहिक
वि० [सं०] [वि० स्त्री० नैर्वाहिकी] निर्वाह के योग्य। जो निर्वाह के लिये हो।

नैल्य
संज्ञा पुं० [सं०] नीलापन गहरा नीला रंग [को०]।

नैवासिक
वि० [सं०] निवास योग्य [को०]।

नैवासी
संज्ञा पुं० [सं०] १. निवास साधु। वृक्ष पर रहनेवाला देवता।

नैविड्य
संज्ञा पुं० [सं०] निविड़ता। धनत्व।

नैवेद्य
संज्ञा पुं० [सं०] देवता के निवेदन के लिये भोज्य द्रव्य। वह भोजन की सामग्री जो देवता को चढाई जाय। देव— बलि। भोग। विशेष— घी, चीनी, श्वेतान्न, दधि, फल इत्यादि, नैवेद्य द्रव्य कहे गए हैं। नैवेद्य देवता के दक्षिण भाग में रखना चाहिए आगे या पीछे नहीं। कुछ ग्रंथों का मत है कि पक्व नैवेद्य देवता के बाएँ और कच्चा दाहिने रखना चाहिए। देवता को भोगलगा हुआ प्रसाद खाने का बडा़ फल लिखा है पर शिव को चढा़ हुआ निर्माल्य खाने का निषेध हैं। चढा़ए जानें के उपरांत नैवेद्य द्रव्य निर्माल्य कहलाता है।

नैवेशिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. गृहस्थी के उपकरण।२. मिताक्षरा के अनुसार निवेशन के निमित्त प्रदत कन्या जो आभूणादि से युक्त हो। ३. ब्राह्मण को दिया जानेवाला उपहार।

नैश
वि० [सं०] [वि० स्त्री० नैशी] १. निशा संबंधी। रात्रि का। २. रात्रि में होनेवाला [को०]।

नैशनल
वि० [अं०] राष्ट्र संबंधी। राष्ट्र का। राष्ट्रीय। सार्व— जनिक। जैसे, नैशनल कांग्रेस।

नैशनलिस्ट
संज्ञा पुं० [अं०] वह जो राष्ट्र पक्ष का पक्षपाती हो। राष्ट्रवादी।

नैशिक
वि० [सं०] निशा संबंधी। रात का।

नैश्चल्य
संज्ञा पुं० [सं०] निश्चलता। स्थिरता। अचंचलता [को०]।

नैश्चित्य
संज्ञा पुं० [सं० नैश्चिन्त्य] निश्चिंत होने का भाव। चिंता का अभाव। निश्चितता [को०]।

नैश्चित्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्थरिता। २. (विवाह आदि) निश्चित या स्थिर संस्कार वा उत्सव आदि [को०]।

नैषदिक
वि० [सं०] १. उपवेशनकारी। बैठनेवाला। २. निषद देश संबंधी। निषद का।

नैषध (१)
वि० [सं०] निषध देश संबंधी। निषध देश का।

नैषध (२)
संज्ञा पुं० १. निषध देश का निवासी व्यक्ति या वस्तु। २. निषध देश का राजा। ३. नल जो निषध देश के राजा थे। ४. क्ष्रीहर्षरचित एक संस्कृत काव्य जिसमें २२ सर्गों में राजा नल की कथा का वर्णन है। ५. विष्णु पुराण के अनुसार पृथिवी का एक खंड जिसे जंबू द्वीप के अधीश्वर अग्नीघ्र ने अपने पुत्र हरिवर्ष को दिया था (को०)।

नैषधीय
वि० नल संबंधी। जैसे नैषधीय चरित [को०]।

नैषध्य
संज्ञा पुं० [सं०] राजा नल का पुत्र या वंशज।

नैषाद
संज्ञा पुं० [सं०] निषाद का पुत्र [को०]।

नैषादि
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'नैषाद' [को०]।

नैषेचनिक
संज्ञा पुं० [सं०] राज्याभिषेक के उत्सव पर दी हुई वस्तुओं का उपहार। (कौटि०)।

नैष्कर्म्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. अकर्मण्यता। निष्क्रियता। २. आलस्य। ३. कर्म तथा कर्मफल का परित्याग। ४. आत्मज्ञान। यौ०— नैष्कर्म्यसिद्धि = समस्त कर्मों से निपृत्ति।

नैष्किचन्य
संज्ञा पुं० [सं० नैष्किञ्चन्य] निष्किंचनता। दरिद्रता।

नैष्किक (१)
वि० [सं०] १ निष्क संबंधी। २. निष्क द्वारा मोल लिया हुआ।

नैष्किक (२)
संज्ञा पुं० टंकशाला का अध्यक्ष। टकसाल घर का अफसर।

नैष्कृतिक
वि० [सं०] परवृत्ति छेदन में तत्पर। दूसरे की हानि करके अपना प्रयोजन निकालनेवाला। स्वार्थी।

नैष्कमण
संज्ञा पुं० [सं०] नवजात बालक को प्रथम वार घर से वाहर ले जाने का संस्कार [को०]।

नैष्ठिक (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० नैष्ठिकी] १. निष्ठावान्। निष्टा- युक्त। २. मरण काल में कर्तव्य (कर्म)।

नैष्ठिक (१)
संज्ञा पुं० ब्रह्मचारियों का एक भेद। वह ब्रह्मचारी जो उपनयन काल से लेकर मरण काल तक ब्रह्मचर्यपूर्वक गुरु के आश्रम पर ही रहे। विशेष— याज्ञवल्क्य स्मृति में लिखा हैं कि नैष्ठिक ब्रह्मचारी को यावज्जीवन गुरु के पास रहना चाहिए। गुरु यदि न हों तो उनके पुत्र के पास, और आचार्यपुत्र भी न हों तो आचार्यपत्नी की सेवा में, आचार्यपत्नी के अभाव में अग्नि- होत्र की अग्नि के पास उसे जीवन बिताना चाहिए। इस प्रकार का जितेंद्रिय ब्रह्मचारी अंत में मुक्ति पाता है।

नैष्ठुर्य
संज्ञा पुं० [सं०] निठुराई। क्रूरता।

नैष्ठय
संज्ञा पुं० [सं०] दृढ़ निष्ठा [को०]।

नैसर्गिक
वि० [सं०] स्वाभाविक। प्राकृतिक। स्वभावसिद्घ। कुदरती।

नैसर्गिकी
वि० स्त्री० [सं०] प्राकृतिक।

नैसर्गिकी दशा
संज्ञा स्त्री० [सं०] ज्योतिष में एक दशा।

नैसा पु
वि० [सं० अनिष्ट] अनैसा। बुरा। खराब। उ०— (क) सूरदास प्रभु के गुण ऐसे। भक्तन भल, दुष्टन को नैसे।— सूर (शब्द०)। (ख) कहु राधा हरि कैसे हैं। तेरे मन भाये की नाहीं, की सुंदर की नैसे हैं।— सूर (शब्द०)।

नैसुक पु
वि० [हिं०] दे० 'नेसुक'।

नैस्त्रिशिक
संज्ञा पुं० [सं०] निस्त्रिशवाला। खड्गधर। तलवार धारण करनेवाला [को०]।

नैहर
संज्ञा पुं० [सं० ज्ञाति, प्रा० णाति, णाइ (=पिता)+ हीं० घर, अप० णाइहर] स्त्री के पिता का घर। माँ बाप का घर। मायका। पीहर। उ०— नैहर जनम भरब बरु जाई। जिआत न करबि सवति सेवकाई। — मानस, २। २१।

नैहार
वि० [सं०] तुषाराच्छन्न। कुहेलिकामय [को०]।

नो
क्रि० वि० [सं०] नहीं।

नोअना
क्रि० स० [सं० नद्ध] दे० 'नोवना'।

नोआ †
संज्ञा पुं० [हिं० नोवना] [स्त्री० अल्पा० नोई] दूध दूहते समय गाय के पैर बाँधने की रस्सी। बँधी।

नौइनी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० नोवना] दे० 'नोई'।

नोई †
संज्ञा स्त्री० [हिं० नोवना] दूध दूहते समय गाय के पैर बाँधने की रस्सी। बंधी।

नोक
संज्ञा स्त्री० [फा़०] [वि० नुकीला] १.उस ओर का सिरा जिस ओर कोई वस्तु बराबर पतली पड़ती गई हो। सुक्ष्म अग्रभाग। शंकु के आकार की वस्तु का महीन या पतला छोर। अनी। जैसे, सूई की नोक, काँटे की नोक, भाले की नोक, खूँटे की नोक, जूते की नोक। यौ०— नोक झोंक।मुहा०—नोक को लेना = बढ़ बढ़कर बातें करना। गर्व दिखाना। नोक दुम भागना = जी छोड़कर भागना। बेतहाशा भागना। नोक रह जाना = आन की बात रह जाना। टेक या प्रतिज्ञा का निर्वाह हो जाना। बात रह जाना। मर्यादा रह जाना। प्रतिष्ठा बनी रह जाना। नोक बनाना = बनाव सिंगार करना। रुप सँवारना। २. किसी वस्तु के निकले हुए भाग का पतला सिरा। किसी ओर को बढा़ हुआ पतला अग्रभाग। जैसे,—जमीन की एक नोक पानी के भीतर तक गई है। ३. कोण बनानेवाली दो रेखाओं का संगम स्थान या बिंदु। निकला हुआ कोना। जैसे, दीवार की नोक।

नोक झोंक
संज्ञा स्त्री० [फा० नोक+ हिं० झोंक] १. बनाव सिंगार। ठाटबाट। सजावट। जैसे,—कल तो वे बडी़ नोक झोंक से थिएटर देखने निकले थे। २. तपाक। तेज। आतंक। दर्प। जैसे, —कल तो वे बडी़ नोक झोंक से बातें करते थे। उ०— शरद घटान की छटान सी सुगंगधार धारयो है जटान काम कीन्हों नोक झोंक के।—रघुराज (शब्द०)। ३. चुभनेवाली बात। व्यंग्य। ताना। आवाजा। जैसे,—उनकी नोंक झोंक अब नहीं सुनी जाती। ४. छेड़छाड़। परस्पर की चोट। जैसे,—आजकल उन दोनों में खूब नोक झोंक चल रही है। क्रि० प्र०— चलना।

नोकना
क्रि० स० [?] ललचना। उ०—चितै रही राधा हरि को मुख। उत ही श्याम एकटक प्यारी छबि अँग अँग अवलोकत। रीझि रहे उत हरि इत राधा अरस परस दोउ नोकत। सखिन कह्यो वृषभानु सुता सों देखे कुँवर कन्हाई। सूर श्याम एई हैं ब्रज में जिनकी होति बडा़ई।—सूर (शब्द०)।

नोकदार
वि० [फा़०] १. जिसमें नोक हो। २. चुभनेवाला। पैना। ३. चित्त में चुभनेवाला। दिल में असर करनेवाला। ४. शानदार। तड़क भड़क का। ठसक का।

नोकपलक
संज्ञा स्त्री० [हिं० नोक + पलक] आँख, नाक आदि की गढ़न। चेहरे की बनावट। मुहा०—नोकपलक से ठीक = चारों ओर से सुडौल। नख से सिख तक सुंदर।

नोकपान
संज्ञा पुं० [फा़० नोक + हिं० पान] जूते की नोक और एडी़ पर लगा हुआ कीमुख्ती चमडा़ जो पान के आकार का होता है। जूते की काटछाँट, सुंदरता और मजबूती। (जूतेवाले)। जैसे,—जरा इस जूते का नोकपान देखिए।

नोकाझोंकी
संज्ञा स्त्री० [हिं० नोकझोंक] १. छेड़छाड़। परस्पर व्यंग्य आदि द्वारा आक्रमण। ताना। आवाजा। २. परस्पर की चोट। विवाद। झगडा़। क्रि० प्र०— चलना।

नोकीला †
वि० [हिं० नोक + इला (प्रत्य०)] दे० 'नुकीला'।

नोखा †
वि० [हिं० अनोखा] [स्त्री० अनोखी] अदभुत। विचित्र। विलक्षण। अनूठा। अपूर्व। जैसे,— नोखे की नाउन बाँस की नहरन (स्त्रियाँ)।

नोच
संज्ञा स्त्री० [हिं० नोचना] १. नोचने की क्रिया या भाव। २. छीनने या लेन की क्रिया। कई ओर से कई आदमियों का झपाटे के साथ छीनना या लेना। लूट। यौ०— नोचखसोट। नोचाखसोटी। नोचानोची। ३. कई ओर से कई आदमिर्यो का माँगना। चारों ओर की माँग। बहुत से लोगों का तकाजा। जैसे,— चारों ओर से नोच है किसका किसका रुपया दें। क्रि० प्र०— मचना। होना।

नोचखसोट
संज्ञा स्त्री० [हिं० नोचना + खसोटना] झपाटे के साथ लेना या छीनना। जबरदस्ती खींच खाँच करके लेना। छीनाझपटी। लूट। क्रि० प्र०— करना।—मचाना।—होना।

नोचना
क्रि० स० [सं० लुञ्चन] १. किसी जमी या लगी हुई वस्तु को झटके से खींचकर अलग करना। उखाड़ना। जैसे, बाल नोचना, डाढी़ नोचना, पत्ती नोचना। संयो० क्रि०—डालना।— देना।— लेना। २. किसी वस्तु में दाँत, नख या पंजा घँसाकर उसका कुछ अंश खींच लेना। नख आदि से विदीर्ण करना। जैसे,— चीता शिकारी का मांस नोचत हुआ निकल गया। संयो० क्रि०—लेना। यौ०— नोचना खसोटना = खींच खाँचकर लेना। झपाटे से छीनना। लूटना। ३. शरीर पर इस प्रकार हाथ या पंजा लगाना कि नाखून घँस जायँ। खरोंचना। खरोंच डालना। संयो० क्रि०—लेना। ४. बार बार तंग करके लेना। दुःखी और हैरान करके लेना। पीछे पड़कर किसी की इच्छा के विरुद्ध उससे लेना। जैसे,— तीर्थो में पंडे और कचहरियों में अमले नोच डालते हैं। संयो० क्रि०—डालना। ५. बार बार तंग करके माँगना। ऐसा तकाजा करने कि नाक में दम हो जाभ। जैसे,— उसे चारों ओर से महाजन नोच रहे हैं किसका किसका देगा।

नोचानाची
संज्ञा स्त्री० [हिं० नोचना] दे० 'नोचखसोट'।

नोचू
संज्ञा पुं० [हिं० नोचना] १. नोचनेवाला। २. छीना झपटी करके लेनेवाला। ३. तंग करके लेनेवाला। घेरकर या पीछे पड़कर जहाँतक मिल सके लेनेवाला। ४. बार बार माँगकर तंग करनेवाला। तकाजों के मारे नाकों दम करनेवाला।

नोट
संज्ञा पुं० [अं०] १. टाँकने या निखने का काम। ध्यान रहने के लिये लिख लेने का काम। क्रि० प्र०—करना।— होना। २. लिखा हुआ परचा। पत्र। चिट्ठी।यौ० — नोट पेपर। ३. टिप्पणी। आशय या अर्थ प्रकट करनेवाला लेख। ४. सरकार की ओर से जारी किया हुआ वह कागज जिसपर कुछ रुपयों की संख्या रहती है और यह लिखा रहता है कि सरकार से उतना रुपया मिल जायगा। सरकारी हुंडी। विशेष— हिंदुस्तान में नोट दो प्रकार का होता है एक करेंसी, दूसरा प्रामिसरी। करेंसी नोट बराबर सिक्कों के स्थान पर चलता है और उसका रुपया जब चाहें तब मिल सकता है। प्रमिसरी नोट पर केवल सूद मिलता रहता है। सरकार माँगने पर उसका रुपया देने के लिये बाध्य नहीं है। प्रामिसरी नोट का भाव घटता बढ़ता है।

नोटपेपर
संज्ञा पुं० [अं०] चिट्ठी लिखने का कागज।

नोटबुक
संज्ञा स्त्री० [अं०] वह कापी या बही जिसपर कोई बात याद रखने के लिये लिखी जाय।

नोटिस
संज्ञा स्त्री० [अं०] १. विज्ञप्ति। सूचना। २. विज्ञापन। इश्तिहार। विशेष— इस शब्द को कुछ लोग पुल्लिंग भी बोलते हैं।

नोदन
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रेरणा। चलाने या हाँकने का काम। २. बैलों को हाँकने की छडी़ या कोडा़। प्रतोद। पैना। औगी। उ०— मीनरथ सारथी के गोदन नवीने हैं।— केशव (शब्द०)। ३. खंडन।

नोदना
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रेरणा [को०]।

नोदयिता
वि० [सं० नोदयितृ] प्रेरक। प्रेरणा देनेवाला। आगे बढा़नेवाला [को०]।

नोधा
वि० [सं०] नव प्रकार या ढंग का। नवधा [को०]।

नोन †
संज्ञा पुं० [सं० लवण, हिं० लोन] नमक।

नोनचा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० नोन+फा़० अचार] १. नमकीन अचार। २. नमक में डाली हुई आम की फाँकों की खटाई।

नोनचा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० नोन + छार] वह भूमि जहाँ लोनी बहुत हो। लोनी जमीन।

नोनछी
संज्ञा स्त्री० [हिं० नोन + छार] लोनी मिट्टी।

नोनहरा
संज्ञा पुं० [?] पैसा। (गंधर्वों की बोली)।

नोनहरामी पु
वि० [हिं० नोन + हरामी] दे० 'नमकहरामी'।

नोना (१)
संज्ञा पुं० [सं० लवण, हिं० नोन] [स्त्री० नोनी] २. नमक का अंश जो पुरानी दीवारों तथा सीड़ की जमीन में लगा मिलता है। २. लोनी मिट्टी। †३. शरीफा। सीताफल। आत। ४. एक कीडा़ जो नाव था जहाज के पेदे में लगकर उसे कमजोर कर देता है। उधई कीडा़।

नोना † (२)
वि० [वि० स्त्री० नोनी] १ नमक मिला। खारा। जैसे, नोना पानी, नोनी मिट्टी। २. लावण्यमय। सलोना। सुंदर। ३ अच्छा। बढिया।

नोना पु
क्रि० स० [हिं० नोअना, नोवना] दे० 'नोवना'।

नोना चमारी
संज्ञा स्त्री० एक प्रसिद्ध जादूगरनी जिसकी दोहाई। अबतक मंत्रों में दी जाती है। माना जाता है कि यह कामरुप देश की थी। नोना चमाइन।

नोनिया (१)
संज्ञा पुं० [हिं० नोना] लोनी मिट्टी से नमक निकालनेवाली एक जाति।

नोनिया (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० नोन] एक भाजी। लोनिया। अमलोनी।

नोनी † (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० लवण] १. लोनी मिट्टी। लोनिया। अमलोनी का पौधा।

नोनी (२)
वि० स्त्री० [हिं० नोना] १. सुंदर। रुपवती। २. अच्छी। बढ़िया।

नोनो पु †
वि० [हिं० लोन, लोना] [वि० स्त्री० नोनी] १. सलोना। सुंदर। २. अच्छा। भला। बढ़िया।

नोर पु (१)
वि० [सं० नवल हिं० नोल] नवीन। नया। उ०—सित सरोज फूले उतै इत इंदीवर नोर। शशि मंडल वहि ओर जनु विषमंडल यहि ओर।—गुमान (शब्द०)।

नोर (२)
संज्ञा पुं० [हिं० लोर] अश्रु। आँसू। उ०—(क) नहि नहि करए नयन ढर नोर। काँच कमल भमरा झिक झोर।— विद्यापाति, पृ० २०४। (ख) नहि नहि करय नयन ढरु नोर। सूति रहलि धनि सेजक ओर।—विद्यापति, पृ० २०४।

नोल पु (१)
वि० [सं० नवल] दे० 'नवल'।

नोल (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] चिड़िया की चोंच।

नोवना †
क्रि० स० [सं० बद्ध, हिं नढ़ना, नहना] दूहते समय रस्सी से गाय का पैर बाँधना। उ०—बछरा छोरि खरिक को दीनो आप कान्ह तन सुध बिसराई। नोवत वृषभ निकसि गैया गई हँसत सखा कहा दुहत कन्हाई।—सूर (शब्द०)।

नोहर †
वि० [सं० नोपलभ्य, प्रा० नोल्लह, या मनोहर] १. अलभ्य। दुर्लभ। जल्दी न मिलनेवाला। २. अनोखा। अदभुत। उ०—अति सुकुमार शरीर मनोहर नोहर नैन बिसाला।— रघुराज (शब्द०)।

नौंधरई, नौंधराई, नौंधरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० नाम + धरना] दे० 'नामधराई'।

नौ (१)
वि० [सं० नव] जो गिनती में आठ और एक हो। एक कम दस।

नौ (२)
संज्ञा पुं० एक कम दस की संख्या। नौ की संख्या जो इस प्रकार लिखी जाती हैं—९। मुहा०— नौ दो ग्यारह होना = देखते देखते भाग जाना। चलता होना। चल देना। भाग जाना। नौ तेरह बाइस बताना = हीला हवाली करना। टाल मटूल करना। इधर उधर की बातें करके टाल देना। जैसे,—जब मैं रुपया माँगने जाता हूँ तब वे नौ तेरह बाइस बताते हैं।

नौ (३)
संज्ञा पुं० ,स्त्री० [सं०] १. पोत। जहाज। नौका। २. एक राशि या नक्षत्र का नाम (को०)। ३. काल। समय (को०)।

नौ (४)
वि० [सं० नव, तुल० फा़० नौ] नया। नवीन। हाल का। ताजा।

नौकडा़
संज्ञा पुं० [हिं० नौ+कौडी़] एक प्रकार का जूआ जो तीन आदमी तीन तीन कौड़ियाँ लेकर खेलते हैं।

नौकर
संज्ञा पुं० [फा़०] [स्त्री० नौकरानी] १. सेवा करने के लिये वेतन आदि पर नियुक्त मनुष्य। टहल या काम धंधा करने के लिये तनखाह पर रखा हुआ आदमी। भृत्य। चाकर। टहलुवा। खिदमतगार। क्रि० प्र०— रखना।—लगाना। यौ०— नौकर चाकर। २. कोई काम करने के लिये वेतन आदि पर नियुक्त किया हुआ मनुष्य। वैतनिक कर्मचारी। जैसे,— तहसीलदार एक सरकारी नौकर है। मुहा०— (किसी को) नौकर रखना = कार्य पर वेतन देकर नियुक्त करना। काम पर लगाना।

नौकरशाही
संज्ञा स्त्री० [फा़० नौकर+शाही] वह सरकार या शासन प्रणाली जिसमें राजसत्ता या शासनसूत्र उच्च राज— कर्मचारियों या बडे़ बडे़ सरकारी अफसरों के हाथों में रहे। वि० दे० 'ब्यूरोक्रेसी'।

नौकराना
संज्ञा पुं० [फा़० नौकर + आना (प्रत्य०)] १. वेतन के अतिरिक्त नौकर को दिया जानेवाला धन। नौकर का हक। २. वह धन जो दूकानदार माल खरीदनेवाले के नौकर को देता है। दस्तूरी।

नौकरानी
संज्ञा स्त्री० [फा़० नौकर+आनी (प्रत्य०)] दासी। घर का काम धंधा करनेवाली स्त्री।

नौकरी
संज्ञा स्त्री० [फा़० नौकर+ ई (प्रत्य०)] १. नौकर का काम। सेवा। टहल। खिदमत। क्रि० प्र०— करना। मुहा०—नौकरी देना या बजाना = नौकरी के काम में लगना। सेवा में तत्पर होना। नौकरी से लगना = नौकर होना। काम पाना। नौकरी पाना। २. कोई काम जिसके लिये तनखाह मिलती हो। जैसे, सरकारी नौकरी।

नौकरीपेशा
संज्ञा पुं० [फा़० नौकरीपेशह] वह जिसका काम नौकरी करना हो। वह जिसकी जीविका नौकरी से चलती हो।

नौकर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] जहाज की पतवार।

नौकर्णधार
संज्ञा पुं० [सं०] नाव का कर्णधार। जहाज चलानेवाला मल्लाह। पोतचालक [को०]।

नौकर्णी
संज्ञा स्त्री० [सं०] कार्तिकेय की अनुचरी एक मातृका।

नौकर्म
संज्ञा पुं० [सं० नौकर्मन्] मल्लाह का पेशा या काम।

नौका
संज्ञा स्त्री० [सं०] नाव। जहाज।

नौकादंड
संज्ञा पुं० [सं०नौकादण्ड] पतवार। डाँडा़ [को०]।

नौक्रम
संज्ञा पुं० [सं०] नावों का पुल।

नौगरे नौगरही,नौगही पु
संज्ञा स्त्री० [सं० नव + ग्रह था फा़ गिरह ] दे० 'नौग्रही'।

नौगिरही †
संज्ञा स्त्री० [हिं० नौग्रही] दे० 'नौग्रही'।

नौग्रही
संज्ञा स्त्री० [सं० नव+ग्रह] हाथ में पहनने का एक गहना जिसमें नौ कँगूरेदार दाने पाट में गुँधे रहते हैं।

नौचर (१)
संज्ञा पुं०[सं०] मल्लाह।

नौचर (२)
वि० जहाज पर जानेवाला।

नौचा
संज्ञा पुं० [फा़० नौचह] [स्त्री० नौची] नई युवावस्था का व्यक्ति। नवयुवक [को०]।

नौची
संज्ञा स्त्री० [फा़० नौशी(= नववधू), या फा़० नौचह का- स्त्री० ] १. वेश्या की पाली हुई लड़की जिसे वह अपना व्यवसाय सिखाती हो। २. नवयुवती।

नौछावर †
संज्ञा स्त्री० [हिं० निछावर] दे० 'निछावर'।

नौज
अव्य०[सं० नवध, प्रा० नवज्ज; या अ० नऊज] १. ऐसा न हो। ईश्वर न करे। (अनिच्छासूचक)। उ०—नगर कोट घर बाहर सूना। नौज होय घर पुरुष बिहूना।—जायसी (शब्द०)। २. न हो। न सही। (बेपरवाही) (स्त्रि०)।

नौजवान
वि० [फा़०] नवयुवक। नया पठ्ठा। उठती जवानी का।

नौजवाना
संज्ञा स्त्री० [फा़०] उठती युवावस्था। नई जवानी।

नौजा
संज्ञा पुं० [फा़० लौजह ] १. बादाम। २. चिलगोजा। उ०—नौजा नरियर नेतरबाला। नीम निसोत निर्विसी आला।—सूदन (शब्द०)।

नौजी
संज्ञा स्त्री० [?] लीची।

नौजीवक, नौजीविक
संज्ञा पुं० [सं०] मल्लाह। खलासी।

नौतन पु
वि० [सं० नूतन] दे० 'नूतन'।

नौतम पु (१)
वि० [सं० नवतम] १. अत्यंत नवीन। विल्कुल नया। २. ताजा।

नौतम (२)
संज्ञा पुं०[सं० नम्रता] नम्रता। विनय।

नौता (१)
संज्ञा पुं० [सं० निमन्त्रण] दे० 'न्योता'।

नौता पु (२)
वि० [सं० नव या नूतन] [वि० स्त्री० नौती] नया। हाल का। ताजा। उ०—करहिं जो किंगरी लेइ बैरागी। नौती होइ बिरह कै आगी।—जायसी (शब्द०)।

नौतार्य
वि० [सं०] जहाज या नौका से पार होने योग्य [को०]।

नौतेरही
संज्ञा स्त्री० [हिं० नौ + तेरह] १.ककई ईंट। छोटी ईँट। नौ जौं चौडी़ और तेरह जौं लंबी ईंट जो पुरानी चाल के मकानों में लगती थी। २. एक प्रकार का जूआ जो पासों से खेला जाता है।

नौतोड़ (१)
वि० [सं० नव,हिं० नौ+तोड़ना] नया तोडा़ हुआ। जो पहले पहल जोता गया हो। जैसे, नौतोड़ खेत या जमीन।

नौतोड़ (२)
संज्ञा स्त्री० वह भूमि जो पहली बार जोती गई हो।

नौदंड
संज्ञा पुं० [सं० नौदण्ड] नाव खेने का डाँड़ा।

नौदसी
संज्ञा स्त्री० [हिं० नौ+दस] एक रीति जिसके अनुसार किसान अपने जमींदार से रुपया उधार लेते हैं और साल भर में ९) के १०) देते हैं।

नौध
संज्ञा पुं० [सं० नव(= नया) + पौधा] नया पौधा। अँखुवा।

नौधा (१)
संज्ञा पुं० [सं० नव, हिं० + पौधा] १. नील की वह फसल जो वर्षारंभ ही में बोई गई हो। २. नए फ़लदार पौधों काबगीचा। नया लगा हुआ बगीचा। †३, नया पट्ठा। उभरता हुआ जवान।

नौधा पु (२)
वि० [सं० नवधा, नोधा] दे० 'नवधा'।

नैनगा
संज्ञा पुं० [हिं० नौ+ नग] बाहु पर पहनने का एक गहना जिसमें नौ नग जडे़ होते हैं। इसमें नौ दाने होते हैं और प्रत्येक दाने में भिन्न भिन्न रंग के नग जडे़ जाते हैं। इस 'नौरतन' भी कहते हैं।

नौना
क्रि० अ०[सं० नमन] १. नवना। झुकना। २. झुककर टेढा़ होना।

नौनिहाल
संज्ञा पुं० [फा़०] नवयुवक। नौजवान [को०]।

नौनेता
संज्ञा पुं० [सं० नौनेतृ] जहाज की पतवार पकड़नेवाला। कर्णधार। मल्लाह।

नौबंधन
संज्ञा पुं० [सं० नौबन्धन] हिमालय के सर्वोच्च शृंग का नाम। कहते हैं कि महाप्लावन के समय मनु ने इसी से अपना जहाज बाँधा था (महाभारत)।

नौबढ़
वि० [सं० नव + हिं० बढ़ना] हाल में बढा़ हुआ। उच्च। जिसे क्षुद्र या हीन दशा से अच्छी दशा में आए थोडे़ ही दिन हुए हों। उ०—लखौ लखन कौतुक धरि धीरा। काह करत बढि़ नौबढ़ बीरा।—रघुराज (शब्द०)।

नौबढ़िया †नौबढ़वा
वि० [हिं०] दे० 'नौबढ़'।

नौबत
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. बारी। पारी। जैसे, नौबत का बुखार। २. गति। दशा। हालत। जैसे,—घर चलो, देखो तुम्हारी क्या नौबत होती है। क्रि० प्र०—करना।—होना। मुहा०— नौबत को पहूंचना = दशा को प्राप्त होना। हालत में होना। ३. स्थिति में कोई परिवर्तन करनेवाली बातों का घटना। उपस्थित दशा। संयोग। जैसे— जैसे काम न करो जिससे भागने की नौबत आवे। क्रि० प्र०— आना।— पहूंचना। ४. वैभव, उत्सव या मंगलसूचक वाद्य जो पहर पहर भर पर देवमंदिरों, राजप्रसादों था बड़े आदमियों के द्वार पर बजता है। समय समय पर बजनेवाला बाजा। विशेष— नैबत में प्रायः शहनाई और नगाडे बजाते हैं। क्रि० प्र०— बजना। — बजाना। यौ०— नौबतखाना। मुहा०— नौबत झड़ना = नौबत बजना। नौबत बजना = (१) आनंद उत्सव होना। (२) प्रताप या ऐश्वर्य की घोषणा होना। नौबत बजाना = (१) आनंद उत्सव करना। खुशी मनाना। (२) प्रताप या ऐश्वर्य की घोषणा करना। दबदबा दिखाना। आतंक प्रकट करना। नौबत बजाकर = डंके की चोट। खुले आम। नौबत की टकोर = (१) डंके की चोट। (२) डंके या नगाडे़ की आवाज।

नौबतखाना
संज्ञा पुं० [फा़० नौबतखानह्] फाटक के ऊपर बना हुआ वह स्थान जहाँ नौबत बजाई जाती है। नक्कारखाना।

नौबती
संज्ञा पुं० [फा़० नौबत + ई (प्रत्य०)] १. नौबत बजानेवाला। नक्कारची। २. फाटक पर पहरा देनेवाला। पहरेदार। ३. कोतल घोडा़। बिना सवार का सजा हुआ घोडा़। ४. बडा खेमा या तंबू।

नौबतीदार
संज्ञा पुं० [फा़० नौबतदार] १. खेमे पर पहरा देनेवाला। संतरी। २. दरबान। द्वारपाल।

नौबद पु
संज्ञा स्त्री० [फा़० नौबत] दे० 'नौबत'। उ०—नौबद नाद निसान बजि भेरी ढोल मृदंग। —रसरतन, पृ० १८७।

नौबरार
संज्ञा पुं० [फा़०] वह भूमि जो किसी नदी के हट जाने से से निकल आती है।

नौमासा
पुं० [सं० नवमास] १. गर्भ का नवाँ महीना। २. वह रीति रस्म जो गर्भ नौ महीने का हो जाने पर की जाती है और जिसमें पँजीरी मिठाई आदि बाँटी जाती है।

नौमि पु
क्रि० स० [सं० नमामि का अपभ्रंश वा सं०] एक वाक्य जिसका अर्थ है मैं नमस्कार करता हूँ। उ०—नौमि निरंतर श्री रघुबीरं। —तुलसी (शब्द०)।

नौमी
संज्ञा स्त्री० [सं० नवमी] पक्ष को नवीं तिथि।

नौयान
संज्ञा पुं० [सं०] १. जहाज। २. जहाजरानी [को०]।

नौयायी
वि० [सं० नौयायिन्] नाव पर जानेवाला (यात्री या माल)।

नौरंग (१)
संज्ञा पुं० [सं० नव + रङ्ग] एक प्रकार की चिड़िया।

नौरंग पु † (२)
संज्ञा पुं० औरंग (औरंगजेब) का रुपांतर।

नौरंगी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० नारंगी] दे० 'नारंगी'।

नौरतन (१)
संज्ञा पुं० [सं० नवरत्न] दे० 'नवरत्न'।

नौरतन (२)
संज्ञा पुं० [सं० नवरत्न] नौनगा नाम का गहना।

नौरतन (३)
संज्ञा स्त्री० एक प्रकार की चटनी जिसमें ये नौ चिजें पड़ती हैं—खटाई, गुड़, मिर्च, शीतलचीनी, केसर, इलायची, जावित्री सौंफ और जीरा।

नौरस (१)
वि० [सं० नव(= नया) + रस] १. (फल) जिसका रस नया अर्थात् ताजा हो। नाय पका हुआ (फल)। ताजा (फल)। २. नवयुवक।

नौरस (२)
संज्ञा पुं० [सं० नवरस] साहित्य में शृंगार, पीर, करुण, हास्य, अदभुत, भयानक, बीभत्स, रौद्र और शांत ये नौ रस।

नौरातर †
संज्ञा पुं० [सं० नवरात्र] दे० 'नवरात्र'।

नौरुप
संज्ञा पुं० [हिं० नव + रोपना] नील की फसल की पहली कटाई। वि० दे० 'नील'।

नौरोज
संज्ञा पुं० [फा़० नौरोज] १. पारसियों में नए वर्ष का पहला दिन। इस दिन बहुत आनंद उत्सव मनाया जाता था। २. त्यौहार का दिन। ३. खुशी का दिन। कोई शुभ दिन।

नौल (१)
वि० [सं० नवल] दे० 'नवल'।

नौल (२)
संज्ञा पुं० [देश०] जहाज पर माल लादने का भाडा़।

नौलक्खा
वि० [हिं० नौलाख] दे० 'नौलखा'।

नौलखा
वि० [हिं० नौ + लाख] नौलाख का। जिसका मूल्य नौ लाख का हो। जडा़ऊ और बहुमूल्य। जैसे, नौलखा हार।

नौलखी
संज्ञा स्त्री० [देश०] ताने को दबाने के लिये एक लकडी़ जिसमें इधर उधर वजनी पत्थर बँधे रहते हैं। (जुलाहे)।

नौला
संज्ञा पुं० [सं० नकुल] दे० 'नेवला'।

नौलासी
वि० [सं० नवल] नर्म। मुलायम। कोमल।

नौवाव
संज्ञा पुं० [फा० नवाब] दे० 'नवाब'।

नौवाबी
संज्ञा स्त्री० [फा० नवाबी] दे० 'नवाबी'।

नौवाह
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'नौनेता'।

नौशा
संज्ञा पुं० [फा० नौशह] [स्त्री० नोशी] दूल्हा। वर।

नौशाह
संज्ञा पुं० [फा० ] दे० 'नौशा' [को०]।

नौशी
संज्ञा स्त्री० [फा०] नववधू। दुलहिन।

नौशेरवाँ
संज्ञा पु० [फा़०] फारस का एक परम प्रसिद्ध न्यायी और प्रतापी बादशाह। विशेष— यह सन् ५३१ ई० में अपने पिता कुबाद के मरने पर सिंहासन पर बैठा। रोमन लोगों को इसने युद्ध में कई बार परास्त किया। मुसलमान लेखकों ने तो लिखा है कि इसने रोम के बादशाह को कैद किया था। रोंम का सम्राट् उस समय जस्टिनियन था। नौशेरवाँ की अंटियोकस पर विजय, शाम देश तथा भूमध्य सागर के अनेक स्थानों पर अधिकार तथा साइबेरिया, यूक्साइन आदि प्रेदशों पर आक्रमण रोम के इतिहास में भी प्रसिद्ध है। रोम का बादशाह जस्टिनियन पारस्य साम्राज्य के अधीन होकर प्रतिवर्ष तीस हजार अशरिफियाँ कर देता था। ८० वर्ष की बृद्धावस्था में नौशेरवाँ ने रोम राज्य के विरुद्ध चढाई की थी और दारा तथा शाम आदि देशों को अधिकृत किया था। ४८ वर्ष राज्य करके वह प्रतापी और न्यायी बादशाह परलोक सिधारा। फारसी किताबों में नौशेरवाँ के न्याय के बहुत सी कथाएँ हैं। ध्यान रखना चाहिए कि इसी बादशाह के समय में मुसलमानों के पैगंबर मुहम्मद साहब का जन्म हुआ जिनेक मत के प्रभाव से आगे चलकर पारस की आर्य सभ्यता का लोप हुआ।

नौसत पु
संज्ञा [हिं० नौ + सात] सोलहो शृंगार। सिंगार। उ०—नौसत साजे चली गोपिका गोरवर पूजा हेत।— सूर (शब्द०)।

नौसर †
संज्ञा पुं० [हिं० नौ + सर] चालाकी। तिकड़म धोखाघडी़। चालबाजी।

नौसरा
संज्ञा पुं० [हिं० नो + सर] नौ लडी़ की माला। नौलराहार या गजरा।

नौसरिया †
वि० [हिं०] चालाक। चालबाज। तिकड़मी।

नौसादर
संज्ञा पुं० [सं० नर + सादर, फा़० नौशादर] एकतीक्ष्ण झालदार क्षार या नमक जो दो वायव्य द्रव्यों के योग से बनता है। विशेष— यह क्षार वायव्य रुप में हवा में अल्प मात्रा मे मिला रहता है और जंतुओं के शरीर के सड़ने गलने से इकठ्ठा होता है। सींग, खुर, हड्डी, बाल आदि का भबके में अर्क खीचकर यह अकसर निकाला जाता है। गैस के कारखाने में पत्थर के कोयले को भबके पर चढाने से जो एक प्रकार का पानी सा पदार्थ छुटता है, आजकल बहूत सा नौसादर उसी से निकाला जाता है। पहले लोग ईंट के पजावों से भी, जिनमें मिट्टी के साथ कुछ जंतुओं के अंग भी मिलकर जलते थे, यह क्षार निकलते थे। नौसादर औषध तथा कलाकौशल के व्यवहार में आता है। वैद्यक में नौसादर दो प्रकार का कहा गया है। एक कृत्रिम जो और क्षारों से बनाया जाता है, दूसरा अकृत्रिम जो जंतुओं के मूत्र पुरीष आदि के क्षार से निकाला जाता है। आयुर्वेद के अनुसार नौसादर शोथनाशक, शीतल तथा यकृत, प्लीहा, ज्वर, अर्बुद, सिरदर्द, इत्यादि में उपकारी है। पर्या०— नरसार। सादर। वज्रक्षार। विदारण। अमृतक्षार। चूलिका लवण। क्षारश्रेष्ठ।

नौसाधन
संज्ञा पुं० [सं०] जहाजी बेडा़ [को०]।

नौसार
संज्ञा स्त्री० [सं० लवणशाला; हिं० नोन + सार] वह स्थान जहाँ नोनिया लोग लोनी मिट्टी से नमक बनाते हैं।

नौसिख
वि० [सं० नबशिक्षित] दे० 'नौसिखिया'।

नौसिखिया
वि० [सं० नवशिक्षित, प्रा० नवसिक्खिअ] जिसने नया नया सीखा हो। जिसने कौई काम हाल में सीखा हो। जो सीखकर पक्का न हुआ हों। जो दक्ष या कुशल न हुआ हो।

नौसिखुवा †
वि० [सं० नवशिक्षित] दे० 'नौसिखिया'।

नौसेना
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह सेना या फौज जो लडा़कू जल के जहाजों पर चढ़कर युद्ध करती है। लडा़कू जहाजों पर से युद्ध करनेवाली सेना या फौज। जल सेना।

नौसेनापति
संज्ञा पुं० [सं०] नौसेना का प्रधान या अध्यक्ष। जलसेनाध्यक्ष।

नौहड़
संज्ञा पुं० [सं० नव(= नया) + भाणड, हिं० हाँडी़] मिट्टी की नई हाँडी़। कोरी हँडि़या।

नौहडा़
संज्ञा पुं० [सं० नव + भाणड] पितृपक्ष। कनागत (जिसमें मिट्टी के पुराने बरतन फेंक दिए जाते हैं और नए रखे जाते हैं)।

न्यंक
संज्ञा पुं० [सं० न्यङ्क] रथ का एक अंग।

न्यंकु (१)
वि० [सं० न्यङ्कु] नितांत गमनशील। बहुत दौड़नेवाला।

न्यंकु (२)
संज्ञा पुं० १. मृगभेद। एक प्रकार का हिरन। बारहसिंगा। २. एक मुनि। ऋष्यशृंग (को०)। ३. वह छात्र जो गुरु के साथ रहता हो (को०)।

न्यंकुभूरुह
संज्ञा पुं० [सं० न्यङ्कुभूरुह] श्योनाक वृक्ष। सोनापाठा।

न्यंकुसारिणी
संज्ञा स्त्री० [सं० न्यङ्कुसारिणी] एक वैदिक छंद जिसके पहले और दूसरे चरण में १२, १२ अक्षर और तीसरे और चौथे चरण में ८, ८ अक्षर होते हैं।

न्यंग
संज्ञा पुं० [सं० न्यङ्ग] १. लक्षण। चिह्न। २. प्रकार। भेद [को०]।

न्यंचन
संज्ञा पुं० [सं० न्यञ्चन] १. मोड़। घुमाव। २. छिपने की जगह। ३. छिद्र [को०]।

न्यंचनी
संज्ञा स्त्री० [सं० न्यञ्चनी] गोदी। उत्संग [को०]।

न्यंचित
वि० [सं० न्यञ्चित] १. अधःक्षिप्त। नीचे फेंका या डाला हुआ। २. झुकाया हुआ। नवाया हुआ (को०)।

न्यंजलिका
संज्ञा स्त्री० [सं० न्यञ्जलिका] नीचे की ओर की हुई अंजली या हथेली।

न्यंत
संज्ञा पुं० [सं० न्यन्त] १. सन्निकटता। सामीप्य। २. अंतिम या पश्चिमी भाग [को०]।

न्यक्
क्रि० वि० [सं०] अवज्ञा, अपमान, अपकर्ष, अवनति, लघुता मानहानि आदि अर्थों में 'कृ' अथवा 'भू' धातु के साथ प्रयुक्त क्रियाविशेषण। कृ धातु के अतिरिक्त अन्य शब्दों के साथ इसका रुप न्यग् होता है।

न्यक्करण
संज्ञा पुं० [सं०] अवमान। तिरस्कार [को०]।

न्यक्कार
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'न्यक्करण' [को०]।

न्यक्त
वि० [सं०] अंजित। अभिषिक्त।

न्यक्ष (१)
वि० [सं०] निकृष्ट। अधम। क्षुद्र।

न्यक्ष (२)
संज्ञा पुं० १. समग्रता। संपूर्णता। २. परशुराम। ३. महिष। भैंसा [को०]।

न्यग्भाव
संज्ञा पुं० [सं०] १. अपमान। तिरस्कार। २. माननाश। अधीनता। ३. अपकर्ष [को०]।

न्यग्भावित
वि० [सं०] तिरस्कृत। गौण। अमुख्यताप्राप्त [को०]।

न्यग्रोध
संज्ञा पुं० [सं०] १. वट वृक्ष। बरगद। २. शमी वृक्ष। ३. बाहु। ४. लंबाई की एक नाप। उतनी लंबाई जितनी दोनों हाथों के फैलाने से होती है। व्याम। परिमाण। पुरसा। ५. विष्णु। ६. मोहनौषधि। ७. महादेव। ८. उग्रसेन के एक पुत्र का नाम (हरिवंश)। ९. मूसाकानी। मूषिकपर्णी।

न्यग्रोधपरिमंडल
संज्ञा पुं० [सं० न्यग्रोधपरिमणडल] वह जिसकी लंबाई चौडा़ई एक व्यास या पुरसा हो। ऐसे पुरुष त्रेता में राज्य करते थे (मत्स्यपुराण)।

न्यग्रोधपरिमंडला
संज्ञा स्त्री० [सं० न्यग्रोधपरिमणडला] स्त्रियों का एक भेद। वह स्त्री जिसके स्तन कठोर, नितंब विशाल और कटि क्षीण हो।

न्यग्रोधा
संज्ञा स्त्री० [सं०] न्यग्रोधी। मूसाकानी।

न्यग्रोधादि गण
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्यक में वृक्षों का एक गण या वर्ग जिसके अंतर्गत ये वृक्ष माने जाते है—बरगद, पीपल, गूलर, पाकर, महुआ, अर्जुन, आम, कुसुम, आमडा़, जामुन, चिरौंजी, मासरोहिणी, कदम, बेर, तेंदू, सलई, तेजपत्ता, लोध, सावर, भिलावाँ, पलाश,तुन, घुँघची या मुलेठी।

न्यगोर्धिक
वि० [सं०] (स्थान) जहाँ बहुत से वटबृक्ष हो।

न्यग्रोधिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] मूसाकानी लता।

न्यग्रोधी
संज्ञा स्त्री० [सं०] मूसाकानी।

न्यच्छ
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक चर्मरोग जिसमें शरीर पर काले चकत्ते पड़ जाते हैं। २. तिल। शरीर पर का तिल (को०)।

न्यय
संज्ञा पुं० [सं०] १. हानि। नाश। २. क्षय [को०]।

न्यर्बुद
वि० [सं०] दश अर्बुद। दस अरब (संख्या)।

न्यर्बुदि
संज्ञा पुं० [सं०] एक रुद्र का नाम। (अथर्व०)।

न्यसन
संज्ञा पुं० [सं०] १. जमा करना। रखना। २. देना। त्यागना। ३. सामने लाना। उपस्थित करना [को०]।

न्यस्त (१)
वि० [सं ] १. रखा हुआ। धरा हुआ। २. स्थापित। बैठाया या जमाया हुआ। ३. चुनकर सजाया हुआ। ४. क्षिप्त। डाला हुआ। फेंका हुआ। ५. त्यक्त। छोडा़ हुआ।

न्यत्त (२)
संज्ञा पुं० धरोहर रखा हुआ। अमानत रखा हुआ।

नय्स्तशस्त्र (१)
वि० [सं० ] जिसने हथियार रख दिए हों।

न्यस्तशस्त्र (२)
संज्ञा पुं० पितृलोक।

न्यस्य
संज्ञा पुं० [सं०] न्यसन करने योग्य [को०]।

न्यह्न
संज्ञा पुं० [सं०] अमावस्या का सायंकाल।

न्यांकव
संज्ञा पुं० [सं० न्याङ्कव] न्यंकु का मृगचर्म। बारहसिंघे का चमड़ा।

न्याइ †
संज्ञा पुं० [सं० न्याय] दे० 'न्याय'।

न्याउ †
संज्ञा पुं० [सं० न्याय] दे० 'न्याय'।

न्याक्य
संज्ञा पुं० [सं०] पकाया हुआ अथवा भुना हुआ चावल [को०]।

न्याति पु
संज्ञा स्त्री०[सं० ज्ञाति, प्रा० णाति] जाति। उ०— मधुकर कहा कारे की न्याति? ज्यों जलमीन कमल मधुपन को छिन नहिं प्रीति खटाति।—सूर (शब्द०)।

न्याद
संज्ञा पुं० [सं०] आहार।

न्याना †
वि० [सं० अज्ञान या हिं० नि (=नही) + सं० ज्ञान, प्रा० ण्याण] १. जो कुछ न जानता हो। अनजान। निर्बोध। २. छोटी उमर का। अल्प अवस्था का। अल्पवयस्क।

न्याय
संज्ञा पुं० [सं०] १. उचित बात। नियम के अनुकूल बात। हक बात। नीति। इसाफ। जैसे,—(क) न्याय तो यही है कि तुम उसका रुपया फेर दो। (ख) अपराध कोई करे और दंड कोई पावे यह कहाँ का न्याय है। २. सदसद्धिवेक। दो पक्षों के बीच निर्णय। प्रमाणपूर्वक निश्चय। विवाद या व्यवहार में उचित अनुचित का निबटेरा । किसी मामले मुकदमें में दोषी और निर्दोष, अधिकारी और अनधिकारी आदि का निर्धारण। जैसे,—(क) राजा अच्छा न्याय करता है। (ख) इस अदालत में ठीक न्याय नहीं होता। यौ०— न्यायसभा। न्यायालय। ३. वह शास्त्र जिसमें किसी वस्तु के यथार्थ ज्ञान के लिये विचारों की उचित योजना का निरुपण होता है। विवेचनपद्धति। प्रमाण, दृष्टांत, तर्क आदि से युक्त वाक्य। विशेष— न्याय छह दर्शनों में है। इसके प्रवर्तक गौतम ऋषि मिथिला के निवासी कहे जाते हैं। गौतम के न्यायसूत्र अबतक प्रसिद्ध हैं। इन सुत्रों पर वात्स्यायन मुनि का भाष्य है। इस भाष्य पर उद्योतकर ने वार्तिक लिखा है। वार्तिक की व्याख्या वाचस्पति मिश्र ने 'न्यायवार्तिक तात्पर्य ठीका' के नाम से लिखी है। इस टीका की भी टोका उदयनाचार्य कृत 'ताप्तर्य- परिशुद्धि' है। इस परिशुद्धि पर वर्धमान उपाध्याय कृत 'प्रकाश' है।गौतम का न्याय केवल प्रमाण तर्क आदि के नियम निश्चित करनेवाला शास्त्र नहीं है बल्कि आत्मा, इंद्रिय, पुनर्जन्म, दुःख अपवर्ग आदि विशिष्ट प्रमेयों का विचार करनेवाला दर्शन है। गौतम ने सोलह पदार्थों का विचार किया है और उनके सम्यक् ज्ञान द्वारा अपवर्ग या मोक्ष की प्राप्ति कही है। सोलह पदार्थ या विषय में हैं।—प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टांत, सिद्धांत, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितंडा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान। इन विषयों पर विचार किसी मध्यस्थ के सामने बादी प्रतिवादी के कथोपकथन के रुप में कराया गया है। किसी विषय में विवाद उपस्थित होने पर पहले इसका निर्णय आवश्यक होता है कि दोनों वादियों के कौन कौन प्रमाण माने जायँगे। इससे पहले 'प्रमाण' लिया गया है। इसके उपरांत विवाद का विषय अर्थात् 'प्रमेय' का विचार हुआ है। विषय सूचित हो जाने पर मध्यस्त के चित्त में संदेह उत्पन्न होगा कि उसका यथार्थ स्वरुप क्या है। उसी का विचार 'संशय' या 'संदेह' पदार्थ के के नाम से हुआ है। संदेह के उपरंत मध्यस्थ के चित्त में यह विचार हो सकता है कि इस विषय के विचार से क्या मतलब। यही 'प्रयोजन' हुआ। वादी संदिग्ध विषय पर अपना पक्ष दृष्टांत दिखाकर बदलाता है, वही 'दृष्टांत' पदार्थ है। जिस पक्ष को वादी पुष्ट करके बतलाता है वह उसका 'सिद्धांत' हुआ। वादी का पक्ष सूचित होने पर पक्षसाधन की जो जो युक्तियाँ कही गई हैं प्रतिवादी उनके खँड खँड करके उनके खंडन में प्रवृत्त होता है। युक्तियों की खंडित देख वादी फिर से और युक्तियाँ देता है जिनसे प्रतिवादी की युक्तियों का उत्तर हो जाता है। यही 'तर्क' कहा गया है। तर्क द्वारा पंचावयवयुक्त युक्तियों का कथन 'वाद' कहा गया है। वाद या शास्त्रार्थ द्वारा स्थिर सत्य पक्ष को न मानकर यदि प्रतिवादी जीत की इच्छा से अपनी चतुराई के बल से व्यर्थ उत्तर प्रत्युत्तर करता चला जाता है तो वह 'अल्प' कहलाता है। इस प्रकार प्रतिवादी कुछ काल तक तो कुछ अच्छी युक्तियाँ देता जायगा फिर ऊटपटाँग बकने लगेगा जिसे 'वितंडा' कहते हैं। इस वितंडा में जितने हेतु दिए जायँगे वे ठीक न होंगे, वे 'हेत्वाभास' मात्र होंगे। उन हेतुओं और युक्तियों के अतिरिक्त जान बूझकर वादी को घबराने के लिये उसके वाक्यों का ऊटपटाँग अर्थ करके यदि घबराने के लिये उसके वाक्यों का ऊटपटाँग अर्थ करके यदि प्रतिवादी गड़बड़ डालना चाहता है तो वह उसका 'छल' कहलाता है, और यदि व्याप्तिनिरपेक्ष साधर्म्य वैधर्म्य आदि के सहारे अपना पक्ष स्थापित करने लगता है तो वह 'जाति' में आ जाता है। इस प्रकार होते होते जब शास्त्रार्थ में यह अवस्था आ जाती है कि अब प्रतिवादी को रोककर शास्त्रार्थ बंद किया जाय तब 'निग्रहस्थान' कहा जाता है। (विवरण प्रत्येक शब्द के अंतर्गत देखी)। न्याय का मुख्य विषय है प्रमाण। 'प्रमा' नाम है यथार्थ ज्ञान का। यथार्थ ज्ञान का जो करण हो अर्थात् जिसके द्वारा यथार्थ ज्ञान हो उसे प्रमाण कहते हैं। गौतम ने चार प्रमाण माने हैं—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द। इनमें से आत्मा, मन और इंद्रिय का संयोग रुप जो ज्ञान का करण वा प्रमाण है वही प्रत्यक्ष है। वस्तु के साथ इंद्रिय- संयोग होने से जो उसका ज्ञान होता है उसी को 'प्रत्यक्ष' कहते हैं। प्रत्यक्ष को लेकर जो ज्ञान (तथा ज्ञान के कारण) को अनुमान कहते हैं। जैसे, हमने बराबर देखा है कि जहाँ धुआँ रहता है वहाँ आग रहती है। इसी को नैयायिक व्याप्ति ज्ञान कहते हैं जो अनुमान की पहली सीढी़ है। हमने कहीं धूआँ देखा जो आग कि जिस धूएँ के साथ सदा हमने आग देखी है वह यहाँ हैं। इसके अनंतर हमें यह ज्ञान या अनुमान उत्पन्न हुआ कि 'यहाँ आग है'। अपने समझने के लिये तो उपयुक्त तीन खंड काफी है पर नैयायिकों का कार्य है दूसरे के मन में ज्ञान कराना, इससे वे अनुमान के पाँच खंड करते हैं जो 'अवयव' कहलाते हैं। (१) प्रतिरा—साध्य का निर्देश करनेवाला अर्थात् अनुमान से जो बात सिद्ध करना है उसका वर्णन करनेवाला वाक्य, जैसे, यहाँ पर आग है। (२) हैतु—जिस लक्षण या चिह्न से बात प्रमाणित की जाती है, जैसे, क्योंकि यहाँ धूआँ है। (३) उदाहरण—सिद्ध की जानेवाली वस्तु बतलाए हुए चिह्न के साथ जहाँ देखी गई है उसा बतानेवाला वाक्य। जैसे,— जहाँ जहाँ धूआँ रहता है वहाँ वहाँ आग रहती है, जैसे 'रसोईघर में'। (४)उपनय—जो वाक्य बतलाए हुए चिह्न या लिंग का होना प्रकट करे, जैसे, 'यहाँ पर धूआँ है'। (५) निगमन—सिद्ध की जानेवाली बात सिद्ध हो गई यह कथन। अतः अनुमान का पूरा रुप यों हुआ— यहाँ पर आग है (प्रतिज्ञा)। क्योकि यहाँ धूआँ है (हेतु)। जहाँ जहाँ धूआँ रहता है वहाँ वहाँ आग रहती है, 'जैसे रसोई घर में' (उदारहण)। यहाँ पर धूआँ है (उपनय)। इसीलिये यहाँ पर आग है (निगमन)। साधारणतः इन पाँच अवयवों से युक्त वाक्य को न्याय कहते हैं। नवीन नैयायिक इन पाँचों अवयवों का मानना आवश्यक नहीं समझते। वे प्रमाण के लिये प्रतिज्ञा, हेतु और दृष्टांत इन्हींतीनों को काफी समझते हैं। मीमांसक और वेदांती भी इन्हीं तीनों को मानते हैं। बौद्ध नैयायिक दो ही मानते हैं, प्रतिज्ञा और हेतु। दुष्ट हेतु को हेत्वाभास कहते हैं पर इसका प्रमाण गौतम ने प्रमाण के अंतर्गत न करे इसे अलग पदार्थ (विषय) मानकर किया है। इसी प्रकार छल, जाति, निग्रहस्थान इत्यादि भई वास्तव में हेतुदोष ही कहे जा सकते हैं। केवल हेतु का अच्छी तरह विचार करने से अनुमान के सब देश पकडे़ जा सकते हैं और यह मालूम हो सकता है कि अनुमान ठीक है या नहीं। गौतम का तीसरा प्रमाण 'उपमान' है। किसी जानी हुई वस्तु के सादृश्य से न जानी हुई वस्तु का ज्ञान जिस प्रमाण से होता है वही उपमान है। जैसे, नीलगाय गाय के सदृश होती है। किसी के मुँह से यह सुनकर जब हम जंगल में नीलगाय देखते हैं तब चट हमें ज्ञान हो जाता है कि 'यह नीलगाय है'। इससे प्रतीत हुआ कि किसी वस्तु का उसके नाम के साथ संबंध ही उपमिति ज्ञान का विषय है। वैशेषिक और बौद्ध नैयायिक उपमान को अलग प्रमाण नहीं मानते, प्रत्यक्ष और शब्द प्रमाण के ही अंतर्गत मानते हैं। वे कहते हैं कि 'गो के सदृश गवय होता है' यह शब्द या आगम ज्ञान है क्योंकि यह आप्त या विश्वासपात्र मनुष्य कै कहे हुए शब्द द्वारा हुआ फिर इसके उपरांत यह ज्ञान क्रि 'यह जंतु जो हम देखते हैं गो के सदृश है' यह प्रत्यक्ष ज्ञान हुआ। इसका उत्तर नैयायिक यह देते हैं कि यहाँ तक का ज्ञान तो शब्द और प्रत्यक्ष ही हुआ पर इसके अनंतर जो यह ज्ञान होता है कि 'इसी जंतु का नाम गवय है' वह न प्रत्यक्ष है, न अनुमान, न शब्द, वह उपमान ही है। उपमान को कई नए दार्शनिकों ने इस प्रकार अनुमान कै अंतर्गत किया है। वे कहते हैं कि 'इस जंतु का नाम गवय हैं', 'क्योंकि यह गो के सदृश है' जो जो जंतु गो के सदृश होते है उनका नाम गवय होता है। पर इसका उत्तर यह है कि 'जो जो जंतु गो के सदृश्य होते हैं वे गवय हैं' यह बात मन में नहीं आती, मन में केवल इतना ही आता हैं कि 'मैंने अच्छे आदमी के मुँह से सुना है कि गवय गाय के सदृश होता है ?' चौथा प्रमाण है शब्द। सूत्र में लिखा है कि आप्तोपदेश अर्थात आप्त पुरुष का वाक्य शब्दप्रमाण है। भाष्यकार ने आप्तपुरुष का लक्षण यह बतलाया है कि जो साक्षात्कृतधर्मा हो, जैसा देखा सुना (अनुभव किया) हो ठीक ठीक वैसा ही कहनेवाला हो, वही आप्त है, चाहे वह आर्य हो या म्लेच्छ। गौतम ने आप्तोपदेश के दो भेद किए हैं— दृष्टार्थ और अदृष्टार्थ। प्रत्यक्ष जानी हुई बातों को बतानेवाला दृष्टार्थ और केवल अनुमान से जानी जानेवाली बातों (जैसे स्वर्ग, अपवर्ग, पुनर्जन्न इत्यादि) को बतानेवाला अदृष्टार्थ कहलाता है। इसपर भाष्य करते हुए वात्स्यान ने कहा है कि इस प्रकार लौकिक और ऋषि— वाक्य (वैदिक) का विभाग हो जाता है अर्थात् अदृष्टार्थ मे केवल वेदवाक्य ही प्रमाण कोटि में माना जा सकता है। नैयायिकों के मत से वेद ईश्वरकृत है इससे उसके वाक्य सदा सत्य और विश्वसनीय हैं पर लौकिक वाक्य तभी सत्य माने जा सकते हैं। जब उनका कहनेवाला प्रामाणिक माना जाय। सूत्रों में वेद के प्रामाण्य के विषय में कई शंकाएँ उठाकर उनाक समाधान किया गया है। मीमांसक ईश्वर नहीं मानते पर वे भी वेद को अपौरुषेय और नित्य मानते हैं। नित्य तो मीमांसक शब्द मात्र को मानते हैं और शब्द और अर्थ का नित्य संबंध बतलाते हैं। पर नैयायिक शब्द का अर्थ के साथ कोई नित्य संबंध नहीं मानते। वाक्य का अर्थ क्या है, इस विषय में बहुत मतभेद है। मीमांसकों के मत से नियोग या प्रेरणा ही वाक्यार्थ है—अर्थात् 'ऐसा करो', 'ऐसा न करो' यही बात सब वाक्यों से कही जाती है चाहे साफ साफ चाहे ऐसे अर्थवाले दूसरे वाक्यों से संबंध द्वारा। पर नैयायिकों के मत से कई पदों के संबंध से निकलनेवाला अर्थ ही वाक्यार्थ है। परंतु वाक्य में जो पद होते हैं वाक्यार्थ के मूल कारण वे ही हैं। न्यायमंजरी में पदों में दो प्रकार की शक्ति मानी गई है—प्रथम अभिधात्री शक्ति जिससे एक एक पद अपने अपने अर्थ का बोध कराता है और दूसरी तात्पर्य शक्ति जिससे कई पदों के संबंध का अर्थ सूचित होता है। शक्ति के अतिरिक्त लक्षणा भी नैयायिकों ने मानी है। आलंकारिकों ने तीसरी वृत्ति व्यंजना भी मानी है पर नैयायिक उसे पृथक् वृत्ति नहीं मानते। सूत्र के अनुसार जिन कई अक्षरों के अंत में विभक्ति हो वे हो पद हैं और विभक्तियाँ दो प्रकार की होती हैं—नाम विभक्ति और आख्यात विभक्ति। इस प्रकार नैयायिक नाम और आख्यात दो ही प्रकार के पद मानते हैं। अव्यय पद को भाष्यकार ने नाम के ही अंतर्गत सिद्ध किया है। न्याय में ऊपर लिखे चार ही प्रमाण माने गए हैं। मीमांसक और वेदांती अर्थापत्ति, ऐतिह्य, संभव और अभाव ये चार और प्रमाण कहते हैं। नैयायिक इन चारों को अपने चार प्रमाणों के अंतर्गत मानेत हैं। ऊपर के विवरण से स्पष्ट हो गया होगा कि प्रमाण ही न्यायशास्त्र का मुख्य विषय है। इसी से 'प्रमाणप्रवीण', 'प्रमाणकुशल आदि शब्दों का व्यवहार नैयायिक या तार्किक के लिये होता है। प्रमाण अर्थात् किसी बात को सिद्ध करने के विधान का ऊपर उल्लेख हो चुका। अब उक्त विधान के अनुसार किन किन वस्तुओं का विचार और निर्णय न्याय में हुआ है, इसका संक्षेप में कुछ विवरण दिया जाता है। ऐसे विषय न्याय में प्रमेय (जो प्रमाणित किया जाय) पदार्थ के अंतर्गत हैं और बारह गिनाए गए हैं— (१) आत्मा—सब वस्तुओं का देखनेवाला, भोग करनेवाला, जाननेवाला और अनुभव करनेवाला। (२) शरीर—भोगो का आयतन या आधार। (३) इंद्रियाँ—भोगों के साधन। (४) अर्थ—वस्तु जिसका भोग होता है। (५) बुद्धि—भोग। (६) मन—अंतःकरण अर्थात् वह भीतरी इंद्रिय जिसके द्वारा सब वस्तुओं का ज्ञान होता है। (७) प्रवृत्ति—वचन, मनऔर शरीर का व्यापार। (८) दोष—जिसके कारण अच्छे या बुरे कामों में प्रवृत्ति होती है। (९) प्रेत्यभाव—पुनर्जन्म। (१०) फल—सुख दुःख का संवेदन या अनुभव। (११) दुःख—पीडा़, क्लेश। (१२) अपवर्ग—दुःख से अत्यंत निवृत्ति या मुक्ति। इस सूची से यह न समझना चाहिए कि इन वस्तुओं के अतिरिक्त और प्रमाण के विषय या प्रमेय हो ही नहीं सकते। प्रमाण के द्वारा बहुत सी बातें सिद्ध की जाती हैं। पर गौतम ने अपने सूत्रों में उन्हीं बातों पर विचार किया है जिनके ज्ञान से अपवर्ग या मोक्ष की प्राप्ति हो। न्याय में इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख दुःख और ज्ञान ये आत्मा के लिंग (अनुमान के साधन चिह्न या हेतु) कहे गए हैं, यद्यपि शरीर, इंद्रिय और मन से आत्मा पृथक् मानी गई है। वैशेषिक में भी इच्छा, द्वेष सुख, दुःख आदि को आत्मा का लिंग कहा है। शरीर, इंद्रिय और मन से आत्मा के पृथक् होने के हेतु गौतम ने दिए हैं। वेदांतियों के समान नैयायिक एक ही आत्मा नहीं मानते, अनेक मानते हैं। सांख्यवाले भी अनेक पुरुष मानते हैं पर वे पुरुष को अकर्ता और अभोक्ता, साक्षी वा द्रष्टा मात्र मानते हैं। नैयायिक आत्मा को कर्ता, भोक्ता आदि मानते हैं। संसार को रचनेवाली आत्मा ही ईश्वर है। न्याय में आत्मा के समान ही ईश्वर में भी संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, इच्छा, बुद्धि प्रयत्न ये गुण माने गए हैं पर नित्य करके। न्यायमंजरी में लिखा है कि दुःख, द्वेष और संस्कार को छोड़ और सब आत्मा के गुण ईश्वर में हैं। बहुत से लोग शरीर को पाँचों भूतों से बना मानते हैं पर न्याय में शरीर केवल पृथ्वी के परमाणुओं से घटित माना गया है। चेष्टा, इंद्रिय और अर्थ के आश्रय को शरीर कहते हैं। जिस पदार्थ से सुख हो उसके पाने और जिससे दुःख हो उसे दूर करने का व्यापार चेष्टा है। अतः शरीर का जो लक्षण किया गया है उसके अंतर्गत वृक्षों का शरीर भी आ जाता है। पर वाचस्पति मिश्र ने कहा है कि यह लक्षण वृक्षशरीर में नहीं घटता, इससे केवल मनुष्यशरीर का ही अभिप्राय समझना चाहिए। शंकर मिश्र ने वैशेषिक सूत्रोपस्कार में कहा है कि वृक्षों को शरीर है पर उसमें चेष्टा और इंद्रियाँ स्पष्ट नहीं दिखाई पड़तीं इससे उसे शरीर नहीं कह सकते। पूर्वजन्म में किए कर्मों के अनुसार शरीर उत्पन्न होता है। पाँच भूतों से पाँचों इंद्रियों की उत्पत्ति कही गई है। घ्राणेंद्रिय से गंध का ग्रहण होता है, इससे वह पृथ्वी से बनी है। रसना जल से बनी है क्योकि रस जल का ही गुण है। चक्षु तेज से बना हैं क्योकि रूप तेज का ही गुण है। त्वक् वायु से बना है क्योंकि स्पर्श वायु का गुण है। श्रोत्र आकाश से बना है क्योंकि शब्द आकाश का गुण है। बौद्धों के मत से शरीर में इंद्रियों के जो प्रत्यक्ष गोलक देखे जाते हैं उन्हीं को इंद्रियाँ कहते हैं। (जैसे, आँख की पुतली, जीभ इत्यादि); पर नैयायिकों के मत से जो अंग दिखाई पड़ते हैं वे इंद्रियों के अधिष्ठान मात्र हैं, इंद्रियाँ नहीं हैं। इंद्रियों का ज्ञान इँद्रियों द्वारा नहीं हो सकता। कुछ लोग एक ही त्वग् इंद्रिय मानते हैं। न्याय में उनके मत का खंडन करके इंद्रियों का नानात्व स्थापित किया गया है। सांख्य में पाँच कर्मेद्रियाँ और मन लेकर ग्यारह इंद्रियाँ मानी गई हैं। न्याय में कर्मेंद्रियाँ नहीं मानी गई हैं पर मन एक करण और अणुरूप माना गया है। यदि मन सूक्ष्म न होकर व्यापक होता तो युगपद ज्ञान संभव होता, अर्थात् अनेक इंद्रियों का एक क्षण में एक साथ संयोग होने से उन सबके विषयों का एक साथ ज्ञान होता। पर नैयायिक ऐसा नहीं मानते। गंध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द ये पाँचों भूतों के गुण और इंद्रियों के अर्थ या विषय़ हैं। न्याय में बुद्धि को ज्ञान या उपलब्धि का ही दूसरा नाम कहा है। सांख्य में बुद्धि नित्य कही गई है पर न्याय में अनित्य। वैशेषिक के समान न्याय भी परमाणुवादी है अर्थात् परमा- णुओं के योग से सृष्टि मानता है। प्रमेयों के संबंध में न्याय और वैशेषिक के मत प्रायः एक ही हैं इससे दर्शन में दोनों के मत न्याय मत कहे जाते हैं। वात्स्यायन ने भी भाष्य में कह दिया है कि जिन बातों को विस्तार भय से गौतम ने सूत्रों में नहीं कहा है उन्हें वैशेषिक से ग्रहण करना चाहिए। ऊपर जो कुछ लिखा गया है उससे प्रकट हो गया होगा कि गौतम का न्याय केवल विचार या तर्क के नियम निर्धारित करनेवाला शास्त्र नहीं है बल्कि प्रमेयों का विचार करनेवाला दर्शन है। पाश्चात्य लाजिक (तर्कशास्त्र) से यही इसमें भेद हैं। लाजिक दर्शन के अंतर्गत नहीं लिया जाता पर न्याय दर्शन है। यह अवश्य है कि न्याय में प्रमाण या तर्क की परीक्षा विशेष रूप से हुई है। न्यायशास्त्र का भारतवर्ष में कब प्रादुर्भाव हुआ ठीक नहीं कहा जा सकता। नैयायिकों में जो प्रवाद प्रचलित हैं उनके अनुसार गौतम वेदव्यास के समकालीन ठहरते हैं; पर इसका कोई प्रमाण नहीं है। 'आन्वीक्षिकी' 'तर्कविद्या' 'हेतुवाद' का निदापूर्वक उल्लेख रामायण और महाभारत में मिलता है। रामायण में तो नैयायिक शब्द भी अयोध्याकांड में आया है। पाणिनि ने न्याय से नैयायिक शब्द बनने का निर्देश किया है न्याय के प्रादुर्भाव के संबंध में साधारणतः दो प्रकार के मत पाए जाते हैं। कुछ पाश्चात्य विद्वानों की धारणा है कि बौद्ध धर्म का प्रचार होने पर उसके खंडत के लिये ही इस शास्त्र का अभ्युदय हुआ। पर कुछ एतद्देशीय विद्वानों का मत हे कि वैदिक वाक्यों के परस्पर समन्वय और समाधान के लिये जैमिनि ने पूर्वमीमांसा में जिन युक्तियों और तर्कों का ब्यवहार किया वे ही पहले न्याय के नाम से कहे जाते थे। आपस्तंब धर्मसूत्र में जो न्याय शब्द आया है उसका पूर्वमी- मांसा से ही अभिप्राय समझना चाहिए। माधवाचार्य ने पूर्वमीमांसा का जो सारसंग्रह लिखा उसका नाम न्यायमाला- विस्तार रखा। वाचस्पति मिश्र ने भी 'न्यायकणिका' के नामसे मीमांसा पर एक ग्रंथ लिखा है। पर न्याय के प्राचीनत्व से वंग देश का गौरव समझनेवाले कुछ बंगाली पंडितों का कथन है कि न्याय ही सब दर्शनों में प्राचीन है क्योंकि और सब दर्शनसूत्रों में दूसरे दर्शनों का उल्लेख मिलता है पर न्यायसूत्रों में कहीं किसी दूसरे दर्शन का नाम नहीं आया है। यद्यपि यह नहीं कहा जा सकता कि न्याय सब दर्शनों में प्राचीन है, पर इतना अवश्य कह सकते हैं कि तर्क के नियम बौद्ध धर्म के प्रचार से बहुत पूर्व प्रचलित थे, चाहे वे मीमांसा के रहे हों या स्वतंत्र। हेमचंद्र ने न्यायसूत्रों पर भाष्य रचनेवाले वात्स्यायन और चाणक्य को एक ही व्यक्ति माना है। यदि यह ठीक हो तो भाष्य ही बौद्ध-धर्म-प्रचार के पूर्व का ठहरता है। क्योंकि बौद्ध धर्म का प्रचार अशोक के समय से और बौद्ध न्याय का आविर्भाव अशोक के भी पीछे महायान शाखा स्थापित होने पर हुआ। पर वात्स्यायन और चाणक्य का एक होना हेमचँद्र के श्लोक (जिसमें चाणक्य के आठ नाम गिनाए गए है) के आधार पर ही ठीक नहीं माना जा सकता। कुछ विद्वानों का कथन है कि वात्स्यायन ईसा की पाँचवीं शताब्दी में हुए। ईसा की छठी शताब्दी में वासवद- त्ताकार सुबंधु ने मल्लनाग, न्यायस्थिति, धर्मकीर्ति और उद्योतकर इन चार नैयायिकों का उल्लेख किया है। इनमें धर्मकीर्ति प्रसिद्ध बौद्ध नैयायिक थे। उद्योतकराचार्य ने प्रसिद्ध बौद्ध नैयायिक दिड्रनागाचार्य के 'प्रमाणसमुच्चय' नामक ग्रंथ का खंडन करके वात्स्यायन का मत स्थापित किया। 'प्रमाणसमुच्चय' में दिड्नाग ने वात्स्यायन के मत का खंडन किया था। इससे यह निश्चित है कि वात्स्यायन दिङ्नाग के पुर्व हुए। मल्लिनाथ ने दिङ्नाग को कालिदास का समकालीन बतलाया है, पर कुछ लोग इसे ठीक नहीं मानते और दिङ्नाग का काल ईसा की तीसरी शताब्दी कहते हैं। सुबंधु के उल्लेख से दिङ्नागाचार्य का ही काल छठी शताब्दी के पूर्व ठहरता है अतः वात्स्यायन को जो उनसे भी पूर्व हुए पाँचवीं शताब्दी में मानना ठीक नहीं। वे उससे पहले हुए होंगे। वात्स्यायन ने दशावयवादी नैयायिकों का उल्लेख किया है, इससे सिद्ध है कि उनके पहले से भाष्यकार नैयायिकों की परंपरा चली आती थी। अस्तु, सूत्रों की रचना का काल बौद्ध धर्म के प्रचार के पूर्व मानना पड़ता है। वैदिक, बौद्ध और जैन नैयायिकों के बीच विवाद ईसा की पाँचवीं शताब्दी से लेकर १३ वीं शताब्दी तक बराबर चलता रहा। इससे खंडन मंडन के बहुत से ग्रंथ बने। १४ वीं शताब्दी में गंगेशोपाध्याय हुए जिन्होंने 'नव्यन्याय' की नींव डाली। प्राचीन न्याय में प्रमेय आदि जो सोलह पदार्थ थे उनमें से और सबको किनारे करके केवल 'प्रमाण' को लेकर ही भारी शब्दाडंबर खडा किया गया। इस नव्यन्याय का आविर्भाव मिथिला में हुआ। मिथिला से नदिया में जाकर नव्यन्याय ने और भी भयंकर रूप धारण किया। न उसमें तत्वनिर्णय रहा, न तत्वनिर्णय की सामर्थ्य। ४. दृष्टांत वाक्य जिसका व्यवहार लोक में कोई प्रसंग आ पडने पर होता है। कोई विलक्षण घटना सूचित करनेवाली उक्ति जो उपस्थित बात पर घटती हो। कहावत। ऐसे न्याय या दृष्टांत वाक्य बहुत से प्रचलित चले आते हैं जिनमें स कुछ अकारादि क्रम से दिए जाते हैं— (१) अजाकृपाणीय न्याय—कहीं तलवार लटकती थी, नीचे से बकरा गया और वह संयोग से उसकी गर्दन पर गिर पडी़। जहाँ दैवसंयोग से कोई विपत्ति आ पड़ती है वहाँ इसका व्यवहार होता है। (२) अजातपुत्रनामोत्कीर्तन न्याय—अर्थात् पुत्र न होने पर भी नामकरण होने का न्याय। जहाँ कोई बात होने पर भी आशा के सहारे लोग अनेक प्रकार के आयोजन बाँधने लगते हैं वहाँ यह कहा जाता है। (३) अध्यारोप न्याय—जो वस्तु जैसी न हो उसमें वैसे होने का (जैसे रज्जु मे सर्प हीने का) आरोप। वेदांत की पुस्तकों में इसका व्यवहार मिलता है। (४) अंधकूपपतन न्याय—किसी भले आदमी ने अंधे को रास्ता बतला दिया और वह चला, पर जाते जाते कूएँ में गिर पडा़। जब किसी अनधिकारी को कोई उपदेश दिया जाता है और वह उसपर चलकर अपने अज्ञान आदि के कारण चूक जाता है या अपनी हानि कर बैठता है तब यह कहा जाता है। (५) अंधगज न्याय—कई जन्मांधों ने हाथी कैसा होता है यह देखने के लिये हाथी को टठोला। जिसने जो अंग टटोल पाया उसने हाथी का आकार उसी अंग का सा समझा। जिसने पूँछ टटोली उसने रस्सी के आकार का, जिसने पैर टटोला उसने खंभे के आकार रस्सी के आकार का, जिसने पैर टटोला उसने खंभे के आकार का समझा। किसी विषय के पुर्ण अंग का ज्ञान न होने पर उसके संबंध में जब अपनी अपनी समझ के अनुसार भिन्न भिन्न बाते कही जाती हैं तब इस उक्ति का प्रयोग करते हैं। (६) अंधगोलांगूल न्याय—एक अंधा अपने घर के रास्ते से भटक गया था। किसी ने उसके हाथ में गाय की पूँछ पकडा़कर कह दिया कि यह तुम्हें तुम्हारे स्थान पर पहुँचा देगी। गाय के इधर उधर दौड़ने से अंधा अपने घर तो पहुँचा नहीं, कष्ट उसने भले ही पाया। किसी दुष्ट या मूर्ख के उपदेश पर काम करके जब कोई कष्ट या दुःख उठाता है तब यह कहा जाता है। (७) अंधचटक न्याय—अंधे के हाथ बटेर। (८) अंधपरंपरा न्याय—जब कोई पुरुष किसी को कोई काम करते देखकर आप भी वही काम करने लगे तब वहाँ यह कहा जाता है। (९) अंधपंगु न्याय—एक ही स्थान पर जानेवाला एक अंधा और एक लँगडा़ यदि मिल जायँ तो एक दुसरे की सहायता से दोनों वहाँ पहुँच सकते हैं। सांख्य में जड़ प्रकृति और चेतन पुरुष के संयोग से सृष्टि होने के दृष्टांत में यह उक्ति कही गई है। (१०) अपवाद न्याय—जिस प्रकार किसी वस्तु के संबंध मेंज्ञान हो जाने से भ्रम नहीं रह जाता उसी प्रकार। (वेदांत)। (११) अपराह्नच्छाया न्याय— जिस प्रकार दोपहर की छाया बराबर बढती जाती है उसी प्रकार सज्जनों की प्रीति आदि के संबंध में यह न्याय कहा जाता है। (१२) अपसारिताग्रिभूतल न्याय— जमीन पर से आग हटा लेने पर भी जिस प्रकार कुछ देर तक जमीन गरम रहतौ है उसी प्रकार धनी धन के न रह जाने पर भी कृछ दिनों तक अपनी अकड रखता है। (१३) अरण्यरोदन न्याय— जंगल में रोने के समान बात। जहाँ कहने पर कोई ध्यान देनेवाला न हो वहाँ इसका प्रयोग होता है। (१४) अर्कमधु न्याय— यदि मदार से ही मधु मिल जाय तो उसके लिये अधिक परिश्रम व्यर्थ है। जो कार्य सहज में हो उसके लिये इधर उधर वहूत श्रम करने की आवश्यकता नहीं। (१५) अर्द्धजरतीय न्याय— एर ब्राह्मण देवता अर्थकष्ट से दुःख हो नित्य अपनी गाय लेकर बाजार में बेचने जाते पर वह न बिकती। बात यह थई कि अवस्था पूछने पर वे उसकी बहुत अवस्था बतलाते थे। एक दिन एक आदमी ने उनेस न बिकने का कारण पूछा। ब्राह्णण ने कहा जिस प्रकार आदमी की अवस्था अधिक होने पर उसकी कदर बढ जाती है उसी प्रकार मैंने गाय के संबंध में भी समझा था। उसने आगे ऐसा न कहने की सलाह दी। ब्राह्मण ने कोचा कि एक बार गाय को बुड्ढी कहकर अब फिर जवान कैसे कहूँ। अंत में उन्होंने स्थिर किया कि आत्मा तो बुड्ढी होती नही देह बुड्ढी होती है। अतः इसे मैं 'आधी बुड्ढी आधी जवान' कहूँगा। जब किसी की कोई बात इस पक्ष में भई और उस पक्ष में भी हो तब यह उक्ति कही जाती है। (१६) अशोकवनिका न्याय— अशोक बन में जाने के समान (जहाँ छाया सौरम आदि सब कुछ प्राप्त हो)। चब किसी एक ही स्थान परसब कुछ प्राप्त हो लाय और कहीं जाने की आवश्यकता न हो तब यह कहा जाता है। (१७) अश्मलोष्ट न्याय— अर्थात् तराजू पर रखने के लिये पत्थर तो ढेले से भी भारी है। यह विषमता सूचित करने के अवसर पर ही कहा जाता है। जहाँ दो वस्तुओं में सापेक्षिकता सूचित करनी होती है। वहाँ 'पाषाणेष्टिक न्याय' कह जाता है। (१८) अस्नेहदीप न्याय— बिना तेल के दीये की सी बात। थोडे ही काल रहनेवाली बात देखकर यड कहा जाता है। (१९) अस्नेहदप न्याय— साँप के कुंडल मारकर बैठने के समान। किसी स्बाभाविक बात पर। (२०) अहि नकुल न्याय— साँप नेवले के समान। स्वाभाविक विरोध या बैर सूचित करने के लिये। (२१) आकाशापरिच्छिन्नत्व न्याय— आकाश के समान अपरिच्छिन्न। (२२) आभ्राणक न्याय—लोकप्रवाद के समान। (२३) आम्रवण न्याय—जिस प्रकार किसी वन में यदि आम के पेड़ अधिक होते हैं तो उसे 'आम का वन' ही कहते हैं, यद्यपि और भी पेड़ उस वन में रहते हैं, उसी प्रकार जहाँ औरों को छोड़ प्रधान वस्तु का ही उल्लेख किया जाता है वहाँ यह उक्ति कही जाती है। (२४) उत्पाटितदतनाग न्याय—दाँत तोडे़ हुए साँप के समान। कुछ करने धरने या हानि पहुँचाने में असमर्थ हुए मनुष्य के संबंध में। (२५) उदकनिमज्जन न्याय—कोई दोषी है या निर्दोष इसकी एक दिव्य परीक्षा प्राचीन काल में प्रचलित थी। दोषी को पानी में खडा़ करके किसी ओर बाणा छोड़ते थे और बाण छोड़ने के साथ ही अभियुक्त को तबतक डूवे रहने के लिये कहते थे जबतक वह छोडा़ हुआ बाण वहाँ से फिर छूटने पर लौट न आवे। यदि इतने बीच में डूबनेवाले का कोई अंग बाहर न दिखाई पडा़ तो उसे निर्देष समझते थे। जाहाँ सत्या- स्तय की बात आती है वहाँ यह न्याय कहा जाता है। (२६) उभयतः पाशरज्जु न्याय—जहाँ दोनों ओर विपत्ति हो अर्थात् दो कर्तव्यपक्षों में से प्रत्येक में दुःख हो वहाँ इसका व्यवहार होता है। 'साँप छछूँदर की गति'। (२७) उष्टूकंटक भक्षण न्याय—जिस प्रकार थोडे़ से सुख के लिये ऊँट काँटे खाने का कष्ट उठाता है उसी प्रकार जहाँ थोडे़ से सुख के लिये अधिक कष्ट उठाया जाता है वहाँ यह कहावत कही जाती है। (२८) ऊपरवृष्टि न्याय—किसी बात का जहाँ कोई फल न हो वहाँ कहा जाता है। (२९) कंठचामीकर न्याय—गले में सोने का हार हो और उसे इधर उधर ढूढ़ँता फिरे। आनंदस्वरूप ब्रह्म के अपने में रहते भी अज्ञानवश सुख के लिये अनेक प्रकार के दुःख भोगने के दृष्टांत में वेदांती कहते हैं। (३०) कदंबगोलक न्याय—जिस प्रकार कदंब के गोले में सब फूल एक साथ हो जाते हैं, उसी प्रकार जहाँ कई बातें एक साथ हो जाती हैं वहाँ इसे कहते हैं। कुछ नैयायिक शब्दो- त्पत्ति में कई वर्णों के उच्चारण एक साथ मानकर उसके दृष्टांत में यह कहते हैं। यह भी कहते हैं कि जिस प्रकार कदंब में सब तरफ किजल्क होते हैं वैसे सब्द जहाँ उत्पन्न होता है उसके सभी ओर उसकी तरंगों का प्रसार होता है। (३१) कदलीफल न्याय—केला काटने पर ही फलता है इसी प्रकार नीच सीधे कहने से नहीं सुनते। (३२) कफोनिगुड न्याय—सूत न कपास जुलाहों से मटकौवल। (३३) करकंकण न्याय—'कंकण' कहने से ही हाथ के गहने का बोध हो जाता है, 'कर' कहने की आवश्यकता नहीं। पर कर कंकण कहते हैं जिसका अर्थ होता है 'हाथ में पडा़ हुआ कडा़'। इस प्रकार का जहाँ अभिप्राय होता है वहाँ यह न्याय कहा जाता है। (३४) काकतालीय न्याय—किसी ताड़ के पेड़ के नीचे कोई पथिक लेटा था और ऊपर एक कौवा बैठा था। कौवा किसी ओरको उडा़ और उसके उड़ने के साथ ही ताड़ का एक पका हुआ फल नीचे गिरा। यद्यपि फल पककर आपसे आप गिरा था तथापि पथिक ने दोनों बातों को साथ होते देख यही समझा कि कौवे के उड़ने से ही तालफल गिरा। जहाँ दो बातें संयोग से इस प्रकार एक साथ हो जाती हैं वहाँ उनमें परस्पर कोई संबंध न होते दुए भी लोग संबंध समझ लेते हैं। ऐसा संयोग होने पर यह कहावत कही जाती है। (३५) काकदध्युपघातक न्याय—'कौवे से दही बचाना' कहने से जिस प्रकार 'कुत्ते, बिल्ली आदि सब जंतुओं से बचाना' समझ लिया जाता है उसी प्रकार जहाँ किसी वाक्य का अभिप्राय होता है वहाँ यह उक्ति कहीं जाती है। (३६)काकदंतगवेषण न्याय—कौवे का दाँत ढूँढ़ना निष्फल है अतः निष्फल प्रयत्न के संबंध में यह न्याय कहा जाता है। (३७) काकाक्षिगोलक न्याय—कहते हैं, कौवे के एक ही पुतली होती है जो प्रयोजन के अनुसार कभी इस आँख में कभी उस आँख में जाती है। जहाँ एक ही वस्तु दो स्थानों में कार्य करे वहाँ के लिये यह कहावत है। (३८)कारणगुणप्रक्रम न्याय—कारण का गुण कार्य में भी पाया जाता है। जैसे सूत का रूप आदि उससे बुने कपडे़ में। (३९) कुशकाशावलंबन न्याय—जैसे डूबता हुआ आदमी कुश काँस जो कुछ पाता है उसी को सहारे के लिये पकड़ता है, उसी प्रकार जहाँ कोई दृढ़ आधार न मिलने पर लोग इधर उधर की बातों का सहारा लेते हैं वहाँ के लिये यह कहावत है। 'डूबते को तिनके का सहारा' बोलते भी हैं। (४०) कूपखानक न्याय—जैसे कूआँ खोदनेवाले की देह में लगा हुआ कीचड़ उसी कूएँ के जल में साफ हो जाता है उसी प्रकार राम, कृष्ण आदि को भिन्न भिन्न रूपों में समझने से ईश्वर में भेद बुद्धि का जो देष लगता है वह उन्हीं की उपासना द्वारा ही अद्वैतबुद्धि हो जाने पर मिट जाता है। (४१) कूपमंडूक न्याय—समुद्र का मेढक किसी कूएँ में जा पडा़। कूएँ कै मेढक ने पूछा 'भाई ! तुम्हारा समुद्र कितना बडा़ है।' उसने कहा 'बहुत बडा़'। कूएँ के मेढक ने पूछा 'इस कूएँ के इतना बडा़'। समुद्र के मेढक ने कहा 'कहाँ कूआँ, कहाँ समुद्र'। समुद्र से बडी़ कोई वस्तु पृथ्वी पर नहीं। इसपर कूएँ का मेढक जो कूएँ से बडी़ कोई वस्तु जानता ही न था बिगड़कर बोला 'तुम झूठे हो, कूएँ से बडी़ कोई वस्तु हो नहीं सकती'। जहाँ परिमित ज्ञान के कारण कोई अपनी जानकारी के ऊपर कोई दूसरी बात मानता ही नहीं वहाँ के लिये यह उक्ति है। (४२) कूर्माग न्याय—जिस प्रकार कछुआ जब चाहता है तब अपने सब अंग भीतर समेट लेता है और जब चाहता है बाहर करता है उसी प्रकार ईश्वर सृष्टि और लय करता है। (४३) कैमुतिक न्याय—जिसने बडे़ बडे़ काम किए उसे कोई छोटा काम करते क्या लगता है। उसी के दृष्टांत के लिये यह उक्ति कही जाती है (४४) कौंडिन्य न्याय—यह अच्छा है पर ऐसा होता तो और भी अच्छा होता। (४५) गजभुक्त कपित्थ न्याय—हाथी कै खाए हुए कैथ के समान ऊपर से देखने में ठीक पर भीतर भीतर निःसार और शून्य। (४६) गडुलिकाप्रवाह न्याय—भेडिया धसान। (४७) गणपति न्याय—एक बार देवताओं में विवाद चला कि सबमें पूज्य कौन है। ब्रह्मा ने कहा जो पृथ्वी की प्रदक्षिणा पहले कर आवे वही श्रेष्ठ समझा जाय। सब देवता अपने अपने वाहनों पर चले। गणेश जी चूहे पर सवार सबके पीछे रहे। इतने में मिले नारद। उन्होंनें गणेश जी को युक्ति बताई कि राम नाम लिखकर उसी की प्रदक्षिणा करके चटपट ब्रह्मा के पास पहुँच जाओ। गणपति ने ऐसा ही किया और देवताओं में वे प्रथम पूज्य हुए। इसी से जहाँ थोडी़ सी युक्ति से बडी़ भारी बात हो जाय वहाँ इसका प्रयोग करते हैं। (४८) गतानुगतिक न्याय—कुछ ब्राह्मण एक घाट पर तर्पण किया करते थे। वे अपना अपना कुश एक ही स्थान पर रख देते थे जिससे एक का कुश दूसरा ले लेता था। एक दिन पहचान के लिये एक ने अपने कुश को ईँट से दबा दिया। उसकी देखा देखी दूसरे दिन सबने अपने कुश पर ईंट रखी। जहाँ एक की देखादेखी लोग कोई काम करने लगते हैं वहाँ यह न्याय कहा जाता है। (४९) गुड़जिह्विका न्याय—जिस प्रकार बच्चे को कड़वी औषध खिलाने के लिये उसे पहले गुड़ देकर फुसलाते हैं उसी प्रकार जहाँ अरुचिकर या कठिन काम कराने के लिये पहले कुछ प्रलोभन दिया जाता है वहाँ इस उक्ति का प्रयोग होता है। (५०) गोवलीरवर्द न्याय—'वलीवर्द' शब्द का अर्थ है बैल। जहाँ यह शब्द गो के साथ हो वहाँ अर्थ और भी जल्दी खुल जाता है। ऐसे शब्द जहाँ एक साथ होते हैं वहाँ के लिये यह कहावत है। (५१) घट्टकुटीप्राभात न्याय—एक बनिया घाट के महसूल से बचने के लिये ठीक रास्ता छोड़ ऊबड़खाबड़ स्थानों में रातभर भटकता रहा पर सबेरा होते होते फिर उसी महसूल की छावनी पर पहुँचा और उसे महसूल देना पडा़। जहाँ एक कठिनाई से बचने के लिये अनेक उपाय निष्फल हों और अंत में उसी कठिनाई में फँसना पडे़ वहाँ यह न्याय कहा जाता है। (५२) घटप्रदीप न्याय—धडा़ अपने भीतर रखे हुए दीप का प्रकाश बाहर नहीं जाने देता। जहाँ कोई अपना ही भला चाहता है दूसरे का उपकार नहीं करता यहाँ यह प्रयुक्त होता है। (५३) घुणाक्षर न्याय—घुनों के चालने से लकडी़ में अक्षरों के से आकार बन जाते हैं, यद्यपि घुन इन उद्देश्य से नहीं काटते कि अक्षर बनें। इसी प्रकार जहाँ एक काम करने में कोई दूसरी बात अनायस हो जाय वहाँ यह कहा जाता है। (५४) चंपकपटवास न्याय—जिस कपडे़ में चंपे का फूल रखा होउसमें फूलों के न रहने पर भी बहुत देर तक महँक रहती है। इसी प्रकार विषय भोग का संस्कार भी बहुत काल तक बना रहता है। (५५) जलतरंग न्याय—अलग नाम रहने पर भी तरंग जल से भिन्न गुण की नहीं होती। ऐसा ही अभेद सूचित करने के लिये इस उक्ति का व्यवहार होता है। (५६) जलतुंबिका न्याय—(क)तूँबी पानी में नहीं डूबती, डुबाने से ऊपर आ जाती है। जहाँ कोई बात छिपाने से छिपनेवाली नहीं होती वहाँ इसे कहते हैं। (ख) तूँबी के ऊपर मिट्टी कीचड़ आदि लपेटकर उसे पानी में डाले तो वह डूब जाती है पर कीजड़ धोकर पानी में डालें तो नहीं डूबती। इसी प्रकार जीव देहादि के नलों से युक्त रहने पर संसार सागर में निमग्न हो जाता है और मल आदि छूटने पर पार हो जाता है। (५७) जलानयन न्याय—पानी 'लाओं' कहने से उसकै साथ बरतन का लाना भी समझ लिया जाता है क्योंकि बरतन के बिना पानी आवेगा किसमें। (५८) तिलतंडुल न्याय—चावल और तिल की तरह मिली रहने पर भी अलग दिखाई देनेवाली वस्तुओं के संबंध में इसका प्रयोग होता है। (५९) तृणजलौका न्याय—दे०'तृणजलौका' शब्द। (६०) दंडचक्र न्याय—जैसे घडा़ बनने में दंड, चक्र आदि कई कारण हैं वैसे ही जहाँ कोई बात अनेक कारणों से होती है वहाँ यह उक्ति कही जाती है। (६१) दंडापूप न्याय—कोई डंडे में बँधे हुए मालपूए छोड़कर कहीं गया। आने पर उसने देखा कि डंडे का बहुत सा भाग चूहे खा गए हैं। उसने सोचा कि जब चूहे डंडा तक खा गए तब मालपूए को उन्होंने कब छोडा़ होगा। जब कोई दुष्कर और कष्टसाध्य कार्य हो जाता है तब उसके साथ ही लगा हुआ सुखद और सहज कार्य अवश्य ही हुआ होगा यही सूचित करने के लिये यह कहावत कहते हैं। (६२) दशम न्याय—दस आदमी एक साथ कोई नदी तैरकर पार गए। पार जाकर वे यह देखने के लिये सबको गिनने लगे कि कोई छूटा या वह तो नहीं गया। पर जो गिनता वह अपने को छोड़ देता इससे गिनने में नौ ही ठहरते। अंत में उस एक खोए हुए के लिये सबने रोना शुरू किया। एक चतुर पथिक ने आकर उनसे फिर से गिनने के लिये कहा। जब एक उठकर नौ तक गिन गया तब पथिक ने कहा 'दसवें तुम'। इसपर सब प्रसन्न हो गए। वेदांती इस न्याय का प्रयोग यह दिखाने के लिये करते हैं कि गुरु के 'तत्वमसि' आदि उपदेश सुनने पर अज्ञान और तज्जनित दुःख दूर हो जाता है। (६३) देहलीदीपक न्याय—देहली पर दीपक रखने से भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला रहता है। जहाँ एक ही आयोजन से दो काम सधें या एक शब्द या बात दोनों ओर लगे वहाँ इस न्याय का प्रयोग होता है। (६४) नष्टाश्वरदग्धरथ न्याय—एक आदमी रथ पर बन मे जाता था। वन में आग लगी और उसका घोडा़ मर गया। वह बहुत व्याकुल घूमता था कि इतने में एक दूसरा आदमी मिला जिसका रथ जल गया था और घोडा़ बचा था। दोनों ने मिलकर काम चला लिया। इस प्रकार जहाँ दो आदमी मिलकर एक दूसरे की त्रुटि की पूर्ति करके काम चलाते हैं वहाँ इसे कहते हैं। (६५) नारिकेलफलांबु न्याय—नारिकेल के फल में जिस प्रकार न जाने कहाँ से कैसे जल आ जाता है उसी प्रकार लक्ष्मी किस प्रकार आती है नहीं जान पड़ता। (६६) निम्नगाप्रवाह न्याय—नदी का प्रवाह जिस ओर को जाता है उधर रुक नहीं सकता। इसी प्रकार के अनिवार्य क्रम के दृष्टांत में यह कहावत है। (६७) नृपनापितपुत्र न्याय—किसी राजा के यहाँ एक नाई नौकर था। एक दिन राजा ने उससे कहा कि कहीं से सबसे सुंदर बालक लाकर मुझे दिखाओ। नाई को अपने पुत्र से बढ़कर और कोई सुंदर बालक कहीं न दिखाई पडा़ और वह उसी को लेकर राजा के सामने आया। राजा उस काले कलूटे बालक को देख बहुत क्रुद्ध हुआ, पर पीछे उसने सोचा कि प्रेम या राग के वश इसे अपने लड़के सा सुंदर और कोई दिखाई ही न पडा़। राग के वश जहाँ मनुष्य अंधा हो जाता है और उसे अच्छे बुरे की पहचान नहीं रह जाती वहाँ इस न्याय का प्रयोग होता है। (६८) पंकप्रक्षालन न्याय—कीचड़ लग जायगा तो धो डालेंगे इसकी अपेक्षा यही विचार अच्छा है कि कीचड़ लगने ही न पावे। (६९) पंजरचालन न्याय—दस पक्षी यदि किसी पिंजडे़ में बंद कर दिए जायँ और वे सब एक साथ यत्न करें तो पिजडे़ को इधर उधर चला सकते हैं। दस ज्ञानेद्रियाँ और दस कमेंद्रियाँ प्राणरूप क्रिया उत्पन्न करके देह को चलाती हैं इसी के दृष्टांत में साख्यवाले उक्त न्याय करते हैं। (७०) पाषाणेष्टक न्याय—ईट भारी होती है पर उससे भी भारी पत्थर होता है। (७१) पिष्टपेषण न्याय—पीसे को पीसना निरर्थंक है। किए हुए काम को व्यर्थ जहाँ कोई फिर करता है वहाँ के लिये यह उक्ति है। (७२) प्रदीप न्याय—जिस प्रकार तेल, बत्ती और आग इन भिन्न भिन्न वस्तुओं के मेल से दीपक जलता है उसी प्रकार सत्व, रज और तम इन परस्पर भिन्न गुणों के सहयोग से देह- धारण का व्यापार होता है। (सांख्य)। (७३) प्रापाणक न्याय—जिस प्रकार घी, चीनी आदि कई वस्तुओं के एकत्र करने से बढ़िया मिठाई बनती है उसी प्रकार अनेक उपादानों के योग से सुंदर वस्तु तैयार होने के दृष्टांत में यह उक्ति कही जाती है। साहित्यवाले विभाव, अनुभाव आदि द्वारा रस का परिपाक सूचित करने के लिये इसका प्रयोग प्रायः करते हैं।(७४) प्रासादवासि न्याय—महल में रहनेवाला यद्यपि कामकाज के लिये नीचे उतरकर बाहर इधर उधर भी जाता है पर उसे प्रसादवासी ही कहते है इसी प्रकार जहाँ जिस विषय की प्रधानता होती है वहाँ उसी का उल्लेख होता है। (७५) फलवत्सहकार न्याय—आम के पेड़ के नीचे पथिक छाया के लिये ही जाता है पर उसे फल भी मिल जाता है। इसी प्रकार जहाँ एक लाभ होने से दूसरा लाभ भी हो वहाँ यह न्याय कहा जाता है। (७६) बहुवृकाकृष्ट न्याय—एक हिरन को यदि बहुत से भेड़िए लगें तो उसके अंग एक स्थान पर नहीं रह सकते। जहाँ किसी वस्तु के लिये बहुत से लोग खींचाखींची करते हैं वहाँ वह यथास्थान वा समूची नही रह सकती। (७७)विलवर्तिगोधा न्याय—जिस प्रकार बिल में स्थित गोह का विभाग आदि नहीं हो सकता उसी प्रकार जो वस्तु अज्ञात है उसके संबंध में भला बुरा कुछ नहीं कहा जा सकता। (७८) ब्राह्मणग्राम न्याय—जिस ग्राम में ब्राह्मणों की बस्ती अधिक होती है उसे ब्राह्मणों का गाँव करते है यद्यपि उसमें कुछ और लोग भी बसते हैं। औरों को छोड़ प्रधान वस्तु का ही नाम लिया जाता है, यही सूचित करने के लिये यह कहावत है। (७९) ब्राह्मणअमण न्याय—ब्राह्मण यदि अपना धर्म छोड़ श्रमण (बौद्ध भिक्षुक) भी हो जाता है तब भी उसे ब्रह्मण श्रमण कहते हैं। एक वृत्ति को छोड़ जब कोई दूसरी वृत्ति ग्रहण करता है तब भी लोग उसकी पूर्ववृत्ति का निर्देश करते हैं। (८०) मज्जनोन्मज्जन न्याय—तैरना न जाननेवाला जिस प्रकार जल में पड़कर डूबता उतरता है उसी प्रकार मूर्ख या दुष्ट वादी प्रमाण आदि ठीक न दे सकने के कारण क्षुब्ध ओर व्याकुल होता है। (८१) मंडूकतोलन न्याय—एक धूर्त बनिया तराजू पर सौदे के साथ मेढक रखकर तौला करता था। एक दिन मेढक कूदकर भागा और वह पकडा़ गया। छिपाकर की हुई बुराई का भडा एक दिन फूटता है। (८२) रज्जुसर्प न्याय—जबतक दृष्टि ठीक नहीं पड़ती तबतक मनुष्य रस्सी को साँप समझता है इसी प्रकार जबतक ब्रह्मज्ञान नहीं होता तबतक मनुष्य दुश्य जगत् को सत्य समझता है, पीछे ब्रह्मज्ञान होने पर उसका भ्रम दूर होता है और वह समझता है कि ब्रह्म के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। (वेदांती)। (८३) राजपुत्रव्याध न्याय—कोई राजपुत्र बचपन में एक ब्याध के घर पड़ गया और वहीं पलकर अपने को व्याधपुत्र ही समझने लगा। पीछे जब लोगों ने उसे उसका कुल बताया तब उसे अपना ठीक ठीक ज्ञान हुआ। इसी प्रकार जबतक ब्रह्मज्ञान नहीं होता तबतक मनुष्य अपने को न जाने क्या समझा करता है। ब्रह्मज्ञान हो जाने पर वह समझता है कि 'में ब्रह्म हूँ'। (वेदांती)। (८४) राजपुरप्रवेश न्याय—राजा के द्वार पर जिस प्रकार बहुत से लोगों की भीड़ रहती है पर सब लोग बिना गड़बड़ या हल्ला किए चुपचाप कायदे से खडे़ रहते हैं उसी प्रकार जहाँ सुव्यवस्थापूर्वक कार्य होता है वहाँ यह न्याय कहा जाता है। (८५) रात्रिदिवस न्याय—रात दिन का फर्क। भारी फर्क। (८६) लूतातंतु न्याय—जिस प्रकार मकडी़ अपने शरीर से ही सूत निकालकर जाला बनाती है और फिर आप ही उसका संहार करती है इसी प्रकार ब्रह्म अपने से ही सृष्टि करता है और अपने में उसे लय करता है। (८७) लोष्ट्रलगुड न्याय—ढेला तोड़ने के लिये जैसे डंडा होता है उसी प्रकार जहाँ एक का दमन करनेवाला दूसरा होता है वहाँ यह कहावत कही जाती है। (८८) लोह चुंबक न्याय—लोहा गतिहीन और निष्क्रिय होने पर भी चुंबक के आकर्षण से उसके पास जाता है उसी प्रकार पुरुष निष्क्रिय होने पर भी प्रकृति के साहचर्य से क्रिया में तत्पर होता है। (सांख्य)। (८९) वरगोष्ठी न्याय—जिस प्रकार वरपक्ष और कन्यापक्ष के लोग मिलकर विवाह रूप एक ऐसे कार्य का साधन करते हैं जिससे दोनों का अभीष्ट सिद्ध होता है उसी प्रकार जहाँ कई लोग मिलकर सबके हित का कोई काम करते हैं वहाँ यह न्याय कहा जाता है। (९०) वह्निधूम न्याय—धूमरूप कार्य देखकर जिस प्रकार कारण रूप अग्नि का ज्ञान होता है उसी प्रकार कार्य द्वारा कारण अनुमान के संबंध में यह उक्ति है (नैयायिक)। (९१) विल्वखल्लाट (खल्वाट) न्याय—धूप से व्याकुल गंजा छाया के लिये बेल के पेड़ के नीचे गया। वहाँ उसके सिर पर एक बेल टूटकर गिरा। जहाँ इष्टसाध्न के प्रयत्न में अनिष्ट होता है वहाँ यह उक्ति कही जाती है। (९२) विषवृक्ष न्याय—विष का पेड़ लगाकर भी कोई उसे अपने हाथ से नहीं काटता। अपनी पाली पोसी वस्तु का कोई अपने हाथ से नाश नहीं करता। (९३) वीचितरंग न्याय—एक के उपरांत दूसरी, इस क्रम से बरा- बर आनेवाली तरंगों के समान। नैयायिक ककारादि वर्णों की उत्पत्ति वीचितरंग न्याय से मानते हैं। (९४) वीजांकुर न्याय—बीज से अंकुर या अंकुर से बीज है यह ठीक नहीं कहा जा सकता। न बीज के बिना अंकुर हो सकता है न अंकुर के बिना। बीज और अंकुर का प्रवाह अनादि काल से चला आता है। दो संबद्ध वस्तुओं के नित्य प्रवाह के दृष्टांत में वेदांती इस न्याय को कहते हैं। (९५) वृक्षप्रकंपन न्याय—एक आदमी पेड़ पर चढा़। नीचे से एक ने कहा कि यह डाल हिलाओ, दुसरे ने काहा यह डाल हिलाओ। पेड़ पर चढा़ हुआ आदमी कुछ स्थिर न कर सका कि किस डाल को हिलाऊँ। इतने में एक आदमी ने पेड़ का धड़ ही पकड़कर हिला डाला जिससे सब डालें हिल गई। जहाँ कोई एक बात सबके अनुकूल हो जाती है वहाँ इसका प्रयोग होता है।(९६) वृद्धकुमारिका न्याय या वृद्धकुमारी वाक्य न्याय— कोई कुमारी तप करतो करती बुड्ढी हो गई। इंद्रो ने उससे कोई एक वर माँगने के लिये कहा। उसने वर माँगा कि मेरे बहुत से पुत्र सोने के बरतनों में खूब धी दूध और अन्न खायँ। इस प्रकार उसने एक ही वाक्य में पति, पुत्र गोधन धान्य सब कुछ माँग लिया। जहाँ एक की प्राप्ति से सब कुछ प्राप्त हो वहाँ यह कहावत कही जाती है। (९७) शतपत्रभेद न्याय—सौ पत्ते एक साथ रखकर छेदने से जान पड़ता हैं कि सब एक साथ एक काल में ही छिद गए पर वास्तव में एक एक पत्ता भिन्न भिन्न समय में छिदा। कालांतर की सूक्ष्मता के कारण इसका ज्ञान नहीं हुआ। इस प्रकार जहाँ बहुत से कार्य भिन्न भिन्न समयों में होते हुए भी एक ही समय में हुए जान पड़ते हैं वहाँ यह दृष्टांत वाक्य कहा जाता है। (सांख्य)। (९८) श्यामरक्त न्याय—जिस प्रकार कच्चा काला धडा़ पकने पर अपना श्याम गुण छोड़ कर रक्तगुण धारण करता है उसी प्रकार पूर्व गुण का नाश और अपर गुण का धारण सूचित करने के लिये यह उक्ति कही जाती है। (९९) श्यालकशुनक न्याय—किसी ने एक कुत्ता पाला था और उसका नाम अपने साले का नाम रखा था। जब वह कुत्ते का नाम लेकर गालियाँ देता तब उसकी स्त्री अपने भाई का आप- मान समझकर बहुत चिढ़ती। जिस उद्देश्य से कोई बात नहीं की जाती वह यदि उससे हो जाती है तो यह कहावत कही जाती हैं। (१००) संदंशपतित न्याय—सँड़सी जिस प्रकार अपने बीच आई हुई वस्तु के पकड़ती है उसी प्रकार जहाँ पूर्व ओर उत्तर पदार्थ द्वारा मध्यस्थित पदार्थ का ग्रहण होता है वहाँ इस न्याय का व्यवहार होता है। (१०१) समुद्रवृष्टि न्याय—समुद्र में पानी बरसने से जैसे कोई उपकार नहीं होता उसी प्रकार जहाँ जिस बात की कोई आवश्यकता या फल नहीं वहाँ यदि वह की जाती है तो यह उक्ती चरितार्थ की जाती है। (१०२) सर्वापेक्षा न्याय—बहुत से लोगों का जहाँ निमंत्रण होता है वहाँ यदि कोई सबके पहले पहूँचता है तो उसे सबकी प्रतीक्षा करनी होती है। इस प्रकार जहाँ किसी काम के लिये सबका आसरा देखना होता है वहाँ उक्ति कही जाती है। (१०३) सिंहवलोकन न्याय—सिंह शिकार मारकर जब आगे बढ़ता है तब पीछे फिर फिरकर देखता जाता है। इसी प्रकार जहाँ अगली और पिछली सब बातों की एक साथ आलोचना होती है वहाँ इस उक्ति का व्यवहार होता है। (१०४) सूचीकटाह न्याय—सूई बनाकर कडा़ह बनाने के समान। किसी लोहार से एक आदमी ने आकर कडा़ह बनाने को कहा। थोडी़ देर में एक दूसरा आया, उसने सूई बनाने के लिये कहा। लोहार ने पहले सूई बनाई तब कडा़ह। सहज काम पहले करना तब कठिन काम में हाथ लगाना, इसी के दृष्टांत में यह कहा जाता है। (१०५) सुंदोपसुंद न्याय—सुंद और उपसुंद दोनों भाई बडे़ बली दैत्य थे। एक स्त्री पर दोनों मोहित हुए। स्त्री ने कहा दोनों में जो अधिक बलवान होगा उसी के साथ मैं विवाह करूँगी। परिणाम यह हुआ कि दोनों लड़ मरे। परस्पर के फूट से बलवान् से बलवान् मनुष्य नष्ट हो जाता हैं यही सूचित करने के लिये यह कहावत हैं। (१०६) सोपानारोहण न्याय—जिस प्रकार प्रासाद पर जाने के लिसे एक एक सीढी़ क्रम से चढ़ना होता है उसी प्रकार किसी बडे़ काम के करने में क्रम क्रम से चलना पड़ता हैं। (१०७) सोपानावरोहण न्याय—सीढ़ियाँ जिस क्रम से चढ़ते हैं उसी के उलटे क्रम से उतरते हैं। इसी प्रकार जहाँ किसी क्रम से चलकर फिर उसी के उलटे क्रम से चलना होता है (जैसे, एक बार एक से सौ तक गिनती गिनकर फिर सौ से निन्नानवे, अट्ठानबे इस उलटे क्रम से गिनना) वहाँ यह न्याय कहा जाता है। (१०८) स्थविरलगुड न्याय—बुड्ढे के हाथ फेंकी हुई लाठी जिस प्रकार ठीक निशाने पर नहीं पहुँचती उसी प्रकार किसी बात के लक्ष्य तक न पहुँचने पर यह उक्ति कही जाती है। (१०९) स्थूणानिखनन न्याय—जिस प्रकार घर के छप्पर में चाँड़ देने के लिये खंभा गाड़ने में उसे मिट्टी आदि डालकर दृढ़ करना होता है उसी प्रकार युक्ति उदाहरण द्वारा अपना पक्ष दृढ़ करना पड़ता है। (११०) स्थूलारुंधती न्याय—विवाह हो जाने पर वर और कन्या को अरुंधती तारा दिखाया जाता है जो दूर होने के कारण बहुत सूक्ष्म हैं और जल्दी दिखाई नहीं देता। अरुंधती दिखाने में जिस प्रकार पहले सप्तर्षि को दिखाते हैं जो बहुत जल्दी दिखाई पड़ता है और फिर उँगली से बताते हैं कि उसी के पास वह अरुंधती है देखो, इसी प्रकार किसी सूक्ष्म तत्व का परिज्ञान कराने के लिये पहले स्थूल दृष्टांत आदि देकर क्रमशः उस तत्व तक ले जाते हैं। (१११) स्त्रामिभृत्य न्याय—जिस प्रकार मालिक का काम करके नौकर भी स्वामी की प्रसन्नता से अपने को कृतकार्य समझता है उसी प्रकार जहाँ दूसरे का काम हो जाने से अपना भी काम या प्रसन्नता हो जाय वहाँ के लिये यह उक्ति हैं। ऊपर जो न्याय दिए गए है उनका व्यवहार प्रायः होता है और बहुत से न्याय संस्कृत में आते हैं जो विस्तारभय से नहीं दिए गए। लौकिक न्याय संग्रह नामक ग्रंथ में जिसके कर्त्ता रघुनाथ हैं ३६४ न्यायों की सूची हैं। ५. सादृश्यता। अमानता। तुल्यता (को०)। ६. विष्णु का एक नाम (को०)।

न्यायकर्ता
संज्ञा पुं० [सं० न्यायकर्तृ] न्याय करनेवाला। दो पक्षों के विवाद का निर्णय करनेवाला। इंसाफ करनेवाला। मुकदमे का फैसला करनेवाला हाकिम।

न्यायतः
क्रि० वि० [सं० न्यायतस्] १. न्याय से। धर्म और नीति के अनुसार। ईमान से। २. ठीक ठीक।

न्यायता
संज्ञा स्त्री० [सं०] न्याय का भाव। औचित्य।

न्यायनिर्वपण
संज्ञा पुं० [सं०] शिव का एक नाम। (महाभारत)।

न्यायपथ
संज्ञा पुं० [सं०] १. आचरण का न्यायसंमत मार्ग। उचित रीति। २. मीमांसा दर्शन (को०)।

न्यायपर
वि० [सं०] न्यायशील। न्यायी। [को०]।

न्यायपरता
संज्ञा स्त्री० [सं०] न्यायशीलता। न्यायी होने का भाव।

न्यायपरायण
वि० [सं०] दे० 'न्यायपर' [को०]।

न्यायप्रिय
वि० [सं०] जिसे न्याय प्रिय हो।

न्यायवर्ती
वि० [सं० न्यायवतिंन्] न्याय पथ पर चलनेवाला [को०]।

न्यायवादी
वि० [सं० न्यायवादिन्] १. उचित या न्याय को कहनेवाला। २. निर्णायक।

न्यायवान्
संज्ञा पुं० [सं० न्यायवत्] [वि० स्त्री० न्यायवती] न्याय पर चलनेवाला। विवेक। न्यायी।

न्यायवृत्त
संज्ञा पुं० [सं०] शुद्ध आचरण। सदाचरण [को०]।

न्यायशील
वि० [सं०] न्यायी। न्याय करनेवाला [को०]।

न्यायसभा
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह सभा जहाँ विवादों का निर्णय हो। कचहरी। अदालत।

न्यायसारिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] उचित या उपयुक्त व्यवहार [को०]।

न्यायाधीश
संज्ञा पुं० [सं०] न्यायकर्ता। व्यवहार या विवाद का निर्णय करनेवाला। अधिकारी। मुकद्दमे का फैसला करनेवाला अधिकारी। जज।

न्यायालय
संज्ञा पुं० [सं०] वह स्थान जहाँ न्याय अर्थात् व्यवहार या विवाद का निर्णय हो। वह जगह जहाँ मुकदमों का फैसला हो। अदालत। कचहरी।

न्यायी
संज्ञा पुं० [सं० न्यायिन्] न्याय पर चलनेवाला। नीतिसंमत आचरण करनेवाला। उचित पक्ष ग्रहण करनेवाला।

न्याय्य
वि० [सं०] न्याययुक्त। न्यायसंगत।

न्यार पु (१)
वि० [सं० निर्निकट, प्रा० निन्निअड] दे० 'न्यायरा'।

न्यार (२)
संज्ञा पुं० [हिं० निवार] पसही धान। मुन्यन्न।

न्यार † (३)
संज्ञा पुं० [हिं० न्यारा] पशुओं को दिया जानेवाला चारा। भूसा आदि। उ०—दे न्यार बैल को, फेर हाथ, कर प्यार बनी माता धरती।—मिट्टी०, पृ० ४४।

न्यारा
वि० [सं० निर्निकट, प्रा० निन्निअड़, निन्नियर, पृ० हिं० निन्यार] [वि० स्त्री० न्यारी] १. जो पास न हो। दूर। २. जो मिला या लगा न हो। अलग। पृथक्। जुदा। क्रि० प्र०—करना।—रहना।—होना। ३. और ही। अन्य। भिन्न। जैसे,—यह बात न्यारी है। ४. निरला। अनोखा। विलक्षण। जैसे,—मथुरा तीन लोक से न्यारी।

न्यारिया
संज्ञा पुं० [हिं० न्यारा] सुनारों के नियार (राख इत्यादि) को धोकर सोना चाँदी एकत्र करनेवाला।

न्यारे
क्रि० वि० [हिं० न्यारा] १. पास नहीं। दूर। जेसे,—उससे न्यारे रहो। २. अलग। पृथक्। साथ में नहीं। जैसे,—वह हमसे न्यारे हो गया।

न्याव
संज्ञा पुं० [सं० न्याय] १. नियम नीति। आचरण। पद्धति। उ०—ऊधो, ताको न्याव है जाहि न सूझै नैन।—सूर (शब्द०)। २. उचित पक्ष। वाजिब बात। कर्तव्य का ठीक निर्वारण। ३. विवेक। उचित अनुचित की बुद्धि। इंसाफ। जैसे,—जो तुह्मारे न्याव में आवे वही करो। ४. दो पक्षों के बीच निर्णय। विवाद वा झगडे़ का निबटेरा। व्यवहार या मुकद्दमे का फैसला। जैसे—राजा करे सो न्याव। क्रि० प्र०—करना।—होना। मुहा०—न्याव चुकाना = झगडा़ निबटाना। विवाद का निर्णय करना। फैसला करना।

न्यास
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० न्यस्त] १. स्थापना। रखना। २. यथास्थान स्थापन। जगह पर रखना। ठीक जगह क्रम से लगाना या सजाना। ३. स्थापना द्रव्य। किसी की वस्तु जो दूसरे के यहाँ इस विश्वास पर रखी हो कि वह उसकी रक्षा करेगा और माँगने पर लौटा देगा। धरोहर। थाती। ४. अर्पण। ५. त्याग। ६. संन्यास। ७. पूजा की तांत्रिक पद्धति के अनुसार देवता के भिन्न अंगो का ध्यान करते हुए मंत्र पढ़कर उनपर विशेष वर्णों भा स्थापन। यौ०—अंगन्यास। करन्यास। ८. किसी रोग या बाधा की शांति के लिये रोगी या बाधाग्रस्त मनुष्य के एक एक अंग पर हाथ ले जाकर मंत्र पढ़ने का विधान। ९. काशिका वृत्ति (को०)। १०. निशान। चिह्न (को०)। ११. आवाज या ध्वनि का मंद करना (को०)। १२. अंकन। चित्रण (को०)।

न्यासधारी
संज्ञा पुं० [सं०] थाती रखनेवाला। धरोहर रखनेवाला [को०]।

न्यासस्वर
संज्ञा पुं० [सं०] वह स्वर जिससे कोई राग समाप्त किया जाय।

न्यासापह्नव
संज्ञा पुं० [सं०] धरोहर को डकार जाना। थाती लौटाने से अस्वीकार करना [को०]।

न्यासिक
वि० [सं०] धरोहर रखनेवाला। जो किसी की थाती रखे।

न्यासी
संज्ञा पुं० [सं० न्यासिन्] संन्यासी [को०]।

न्युब्ज (१)
वि० [सं०] १. अधोमुख। औंधा। २. कुबडा़। ३. रोग से जिसकी कमर टेढी़ हो गई हो।

न्युब्ज (२)
संज्ञा पुं० १. कुश। २. माला। ३. एक यज्ञपात्र। ४. कर्मरंग फल। कमरख। ५. न्यग्रोध धृक्ष (को०)।

न्युब्जखड्ग
संज्ञा पुं० [सं०] टेढी़ तलवार। वक्रखड्ग [को०]।

न्यूज
संज्ञा स्त्री० [अँ०] समाचार। संवाद। वृत्तांत। वृत्त। खबर। यौ०—न्यूजप्रिंट = समाचारपञ छापने का कागज। एक प्रकार का कागज। न्यूजपेपर।

न्यूजपेपर
संज्ञा० पुं० [अं०] समाचारपञ। अखबार।

न्यून
वि० [सं०] १. कम। थोडा़। अल्प। २. घटकर। कम। नीचा। ३. नीच। क्षुद्र। ४. विकारयुक्त। विकृत।

न्यूनता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कमी। २. हीनता।

न्यूनांग
वि० [सं० न्यूनाङ्ग] विकलांग। अंगभंग। अपंग [को०]।

न्यूनाधिक
वि० [सं०] ३. थोडा़ बहुत। कमोबेश [को०]।

न्योचनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सायण के अनुसार दासी या सेविका। २. स्ञियों का एक आभूषण [को०]।

न्योछावर
संज्ञा स्त्री० [हिं० निछावर] दे० 'निछावर'।

न्योजी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० लीची ! ] १. लीची नामक फल। उ०— कोइ नारँग कोइ झाड़ चिरौंजी। कोइ कटहर बड़हर कोइ न्योजी।—जायसी (शब्द०)। २. नेता। चिलगोजा।

न्योतना
क्रि० स० [हिं० न्योता + ना (प्रत्य०)] १. किसी रीति रस्म या आनंद उत्सव आदि में संमिलित होने के लिये इष्ट मित्र, बंधु बाँधव आदि को बुलाना। निमंत्रित करना। संयो० क्रि०—दोना। २. दूसरे को अपने यहाँ भोजन करने के लिये बुलाना। जैसे,— उसने सौ ब्राह्मण न्योते हैं।

न्योतनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० न्योतना] वह खाना पीना जो विवाह आदि मंगल अवसरों पर होता है।

न्योतहरी
संज्ञा पुं० [हिं० न्योता] निमंत्रित मनुष्य। न्योते में आया हुआ आदमी।

न्योता
संज्ञा पुं० [सं० निमन्त्रण] किसी रीति रल्म, आनंद उत्सव आदि में संमिलित होने के लिये इष्ट मित्र, बंधु बाँधव आदि का आह्नान। बुलावा। निमंत्रण। क्रि० प्र०—देना। २. अपने स्थान पर भोजन के लिये बुलावा। भोजन स्वीकार करने की प्रार्थना। जैसे,—उन्होने दस ब्राह्मणों को न्योता दिया है। क्रि० प्र०—आना।—जाना।—देना। ३. वह भोजन जो दूसरे को अपने यहाँ कराया जाय या दूसरे के यहाँ (उसकी प्रार्थना पर) किया जाय। दावत। जैसे,— (क) वह न्योता खाने गया है। (ख) हमें न्योता खिलाओ। क्रि० प्र०—खाना।—खिलाना। ४. वह भेंट या धन जो अपने इष्टमित्र, संबंधी इत्यादि के यहाँ से किसी शुभ या अशुभ कार्य में संमिलित होने का न्योता पाकर उसके यहाँ भेजा जाता है। जैसे,—इसकी कन्या के विवाह में मैंने १००) न्योता भेजा था।

न्योरा † (१)
संज्ञा पुं० [हिं० नेवला] दे० 'नेवला'।

न्योरा (२)
संज्ञा पुं० [सं० नूपूर] बडे़ दानों का घुँघरू। नेवर।

न्योला
संज्ञा पुं० [हिं० नेवला] दे० 'न्योला'।

न्योली
संज्ञा स्त्री० [सं० नली] नेती, धोती, आदि के समान हठयोग की एक क्रिया जिसमें पेट के नलों को पानी से साफ करते हैं।

न्यौज पु
संज्ञा पुं० [सं० नैवेद्य] नेवज। नैवेद्य।

त्नप पु
संज्ञा पुं० [सं० नृप] राजा। नृप।

न्वैनी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'नोहनी', 'नोई'।

न्हवाना पु
क्रि० स० [सं० स्नापन, प्रा० ण्हावण] स्नान कराना। नहवाना।

न्हान पु
संज्ञा पुं० [सं० स्नान, प्रा० सहान] दे० 'नहान'।

न्हाना † पु
क्रि० अ० [सं० स्नान, प्रा० राहाण] दे० 'नहाना'।

न्हावना †पु
क्रि० स० [दे० स्नापन, प्रा० राहावण, हिं० नहवाना] स्नान कराना। नहलाना।